रविवार, 21 जनवरी 2018

दोहा दुनिया

शिव अविकारी मूल हैं,
विधि-हर हैं निर्मूल।
सत-रज-तम से विभूषित,
शिव के साथ त्रिशूल।।
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सृष्टि-मूल खुद को समझ,
विधि-हरि करें विवाद।
शिव दोनों को शांत कर,
बन जाते संवाद।।
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विधि-बुधि रचते सृष्टि सब,
मन में उठे विकार।
मैं स्वामी सबसे सबल,
करें सभी स्वीकार।।
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रमा-विष्णु पालें जगत,
मानें खुद को ज्येष्ठ।
अहम-वहम हावी हुआ,
'मैं' है 'तू' से श्रेष्ठ।।
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विधि सोचें वे जनक हैं,
हरि आत्मज हैं हीन।
हरि सोचें वे पालते,
पलते ब्रम्हा दीन।।
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दोनों के संघर्ष का,
मूल 'अहम्' का भाव।
रजस तमस में ढल गया,
सत् का हुआ अभाव।।
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सकल सृष्टि कंपित हुई,
कैसे करें निभाव?
कौन बनाए संतुलन,
हर कर बुरे प्रभाव??
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हर ने फेंका केतकी,
पुष्प किया संकेत।
तुम दोनों से भिन्न है,
तत्व एक अनिकेत।।
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वाद-विवाद न मिट सका,
रही फैलती भ्रांति।
ज्योति लिंग हरने तिमिर,
प्रगटा हो चिर शांति।।
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विधि ऊपर को उड़ चले,
नापें अंतिम छोर।
हरि नीचे की ओर जा,
लौटे मिली न कोर।।
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विधि ने छल कर कह दिया,
मैं आया हूं नाप।
हरि ने मानी पराजय,
अस्त गया ज्यों व्याप।।
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त्यों ही शिव ने हो प्रगट,
व्यक्त कर दिया सत्य।
ब्रम्हा जी लज्जित हुए,
स्वीकारा दुष्कृत्य।।
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पंच तत्व पचमुखी के,
एक हो गया दूर।
सलिल शीश शिव ने धरा,
झूठ हो गया चूर।।
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मिथ्या साक्षी केतकी,
दें खो बैठी गंध।
पूजा योग्य नहीं रही,
सज्जा करें अगंध।।
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विधि-पूजन सीमित हुआ,
सत् नारायण मान्य।
शिव न असत् को सह सकें,
इसीलिए सम्मान्य।।
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२०.१.२०१८, जबलपुर

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