बुधवार, 31 जनवरी 2018

शिव दोहावली

शिव हों, भाग न भोग से,
हों न भोग में लीन।
योग साध लें भोग से,
सजा साधना बीन।।
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चाह एक की जो बने,
दूजे की भी चाह।
तभी आह से मुक्ति हो,
दोनों पाएं वाह।।
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प्रकृति-पुरुष हैं एक में
दो, दो में हैं एक।
दो अपूर्ण मिल पूर्ण हों,
सुख दे-पा सविवेक।।
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योनि जीव को जो मिली,
कर्मों का परिणाम।
लिंग कर्म का मूल है,
कर सत्कर्म अकाम।।
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संग तभी सत्संग है,
जब अभंग सह-वास।
संगी-संगिन में पले,
श्रृद्धा सह विश्वास।
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मन में मन का वास ही,
है सच्चा सहवास।
तन समीप या दूर हो,
शिथिल न हो आभास।।
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मुग्ध रमणियों मध्य है,
भले दिगंबर देह।
शिव-मन पल-पल शिवा का,
बना हुआ है गेह।।
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तन-मन-आत्मा समर्पण
कर होते हैं पूर्ण।
सतत इष्ट का ध्यान कर,
खुद होते संपूर्ण।।
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भक्त, भक्ति, भगवान भी,
भिन्न न होते जान।
गृहणी, गृहपति, गृह रहें,
एक बनें रसखान।।
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शंका हर शंकारि शिव,
पाकर शंकर नाम।
अंतर्मन में व्यापकर,
पूर्ण करें हर काम।।
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नहीं काम में काम हो,
रहे काम से काम।
काम करें निष्काम हो,
तभी मिले विश्राम।।
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३१.१.२०१८, जबलपुर

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