गुरुवार, 4 जनवरी 2018

doha duniya


शिव दोहावली
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नाथ बसे कैलाश पर, विपिन रहा मन मोह
काम अकाम सुकाम लख, रति-पति करता द्रोह
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भाव समाधि अटूट जब, टूटी हाहाकार
पुष्पलता के अश्रु बह, बने नर्मदा-धार
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चंद्र झुलस श्यामल हुआ, कंपित रश्मि सुशील
शेष श्लेष भी धैर्य तज, हुआ भीति से नील
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शशि का मन उन्मन हुआ, क्यों? बोलो शशिनाथ
उस बाधा को हटा दो, जिसका इसमें हाथ
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रति-पति मति बौरा गई, किया शम्भु पर वार
पल में जल कर क्षार हो, पाया कष्ट अपार
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शिव संयम साक्षात हैं, कभी न होते बाध्य
शिव चाहें तो क्या नहीं, होगा उनका प्राप्य?
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स्वार्थी सुर निज हित करें, भोगे अन्य अनिष्ट
शिव-शिक्षा खुद कष्ट सह, बनकर रहिए शिष्ट
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सीमोल्लंघन से हुए, शिव रति-पति पर रुष्ट
रति की विनती सुन द्रवित, हुए मिटाया कष्ट
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शक्ति-शक्तिधर आप मिल, करें सृजन-संहार
करे बाध्य कोई अगर, हो भीषण संहार
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४.१.२०१८

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