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शनिवार, 27 दिसंबर 2025

२७ दिसंबर, सॉनेट, उपनिषद, समीक्षा, नवगीत, ब्रह्मजीत गौतम, श्रुति कुशवाहा, छंद-बह्र


सलिल सृजन २७ दिसंबर
कार्यशाला-
छंद बहर का मूल है- १.
*
उर्दू की १९ बहरें २ समूहों में वर्गीकृत की गयी हैं।
१. मुफरद बहरें-
इनमें एक ही अरकान या लय-खण्ड की पुनरावृत्ति होती है।
इनके ७ प्रकार (बहरे-हज़ज सालिम, बहरे-ऱज़ज सालिम, बहरे-रमल सालिम, बहरे-कामिल, बहरे-वाफिर, बहरे-मुतक़ारिब तथा बहरे-मुतदारिक) हैं।
२. मुरक्कब बहरें-
इनमें एकाधिक अरकान या लय-खण्ड मिश्रित होते हैं।
इनके १२ प्रकार (बहरे-मनसिरह, बहरे-मुक्तज़िब, बहरे-मुज़ारे, बहरे-मुजतस, बहरे-तवील, बहरे-मदीद, बहरे-बसीत, बहरे-सरीअ, बहरे-ख़फ़ीफ़, बहरे-जदीद, बहरे-क़रीब तथा बहरे-मुशाकिल) हैं।
*
क. बहरे-मनसिरह
बहरे-मनसिरह मुसम्मन मतबी मौक़ूफ़-
इस बहर में बहुत कम लिखा गया है। इसके अरकान 'मुफ़तइलुं फ़ायलात मुफ़तइलुं फ़ायलात' (मात्राभार ११११२ २१२१ ११११२ २१२१) हैं।
अ. यह १८ वर्णीय अथधृति जातीय शारद छंद है जिसमें ९-९ पर यति तथा पदांत में जगण (१२१) का विधान है।
आ. यह २४ मात्रिक अवतारी जातीय स्मृति छंद है जिसमें १२-१२ मात्राओं पर यति तथा पदांत में १२१ है। हमने इसका नाम स्मृति (चौबीस स्मृतियाँ- मनु, विष्णु, अत्रि, हारीत, याज्ञवल्क्य, उशना, आंगिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, पराशर, व्यास, शांख्य, लिखित, दक्ष, शातातप, वशिष्ठ, नारद, गौतम, जमदग्नि, विश्वामित्र,  गार्गेय) छंद रखा है। 
उदाहरण-
१. 
थक मत, बोझा न मान, कदम उठा बार-बार
उपवन में शूल फूल, भ्रमर कली पे निसार
पगतल है भू-बिछान, सर पर है आसमान
'सलिल' नहीं भूल भूल, दिन-दिन होगा सुधार
२. 
 जब गवाह सच बोला, तब ही झूठा बयान 
सच बन आया समक्ष, विफल हुआ न्याय-दान
खुद से खुद शर्मिंदा, तुला थाम नेत्रहीन- 
बोल उठा  भला हुआ, मैं न हुआ नेत्रवान 

उर्दू व्याकरण के अनुसार गुरु के स्थान पर २ लघु या दो लघु के स्थान पर गुरु मात्रा का प्रयोग करने पर छंद का वार्णिक प्रकार बदल जाता है जबकि मात्रिक प्रकार तभी बदलता है जब यह सुविधा पदांत में ली गयी हो। हिंदी पिंगल-नियम यह छूट नहीं देते।
३.
अरकान 'मुफ्तइलुन फ़ायलात मुफ्तइलुन फ़ायलात' (मात्राभार २११२ २१२१ २११२ २१२१)
क्यों करते हो प्रहार?, झेल सकोगे न वार
जोड़ नहीं, छीन भी न, बाँट कभी दे पुकार
कायम हो शांति-सौख्य, भूल सकें भेद-भाव
शांत सभी हों मनुष्य, किस्मत लेंगे सुधार
४.
दिल में हम अप/ने नियाज़/रखते हैं सो/तरह राज़
सूझे है इस/को ये भेद/जिसकी न हो/चश्मे-कोर
प्रथम पंक्ति में ए, ओ, अ की मात्रा-पतन दृष्टव्य।
(सन्दर्भ: ग़ज़ल रदीफ़-काफ़िया और व्याकरण, डॉ. कृष्ण कुमार 'बेदिल')
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सॉनेट
परीक्षा
मान परीक्षा हर अवसर को,
करें प्रयास आप जीवन भर,
बने भगीरथ जो जाता तर,
नहीं बैठिए थामे सर को।
रखिए दूर हमेशा डर को,
सुमिरें नित नटवर नटनागर,
भरी रहे भावों की गागर,
सदा भुनाएँ हर अवसर को।
डरकर जो न परीक्षा देता,
वह अवसर खोता सच मानो,
सोता उसका भाग्य मौन हो।
बनना है यदि तुम्हें विजेता,
हर बाधा जय करना ठानो,
भोजन में बन रहो नौन हो।
तक्षशिला महाविद्यालय
२७.१२.२०२३
•••
सॉनेट
उपनिषद
*
आत्मानंद नर्मदा देती, नाद अनाहद कलकल में।
धूप-छाँव सह अविचल रहती, ऊँच-नीच से रुके न बहती।
जान गई सच्चिदानंद है, जीवन की गति निश्छल में।।
जो बीता सो रीता, होनी हो, न आज चिंता तहती।।
आओ! बैठ समीप ध्यान कर गुरु से जान-पूछ लो सत्य।
जिज्ञासा कर, शंका मत कर, फलदायक विश्वास सदा।
श्रद्धा-पथिक ज्ञान पाता है, हटता जाता दूर असत्य।।
काम करो निष्काम भाव से, होनी हो, जो लिखा-बदा ।।
आत्म और परमात्म एक हैं, पूर्ण-अंश का नाता है।
उसको जानो, उस सम हो लो, सबमें झलक दिखे उसकी।
जिसको उसका द्वैत मिटे, अद्वैत एक्य बन जाता है।।
काम करो निष्काम भाव से, होगा वह जो गति जिसकी।।
करो उपनिषद चर्चा सब मिल, चित्त शांत हो, भ्रांति मिटे।
क्रांति तभी जब स्वार्थ छोड़, सर्वार्थ राह चल, शांति मिले।।
२७-१२-२०२१
***
दोहा सलिला
पानी का वादा किया, पूर दिए तालाब.
फ़ूल बनाया शूल दे, कहते दिए गुलाब.
*
कर देकर जनता मरे, शासन है बेफ़िक्र.
सेठों का हित सध सके, बस इतनी है फ़िक्र.
*
मेघा बरसे शिव विहँस, लें केशों में धार.
बहा नर्मदा नेह की, करें जगत उद्धार.
*
मोदी राहुल जप रहे, राहुल मोदी नाम
नूरा कुश्ती कर रहे, जाता ठगा अवाम
***
कृति चर्चा:
'कशमकश' मन में झाँकती कविताएँ
[कृति विवरण: कशमकश, कविता संग्रह, ISBN ९७८-९३-८५०१३-६५-२, श्रुति कुशवाहा, वर्ष २०१६, आकार डिमाई, आवरण सजिल्द बहुरंगी जैकेट सहित, पृष्ठ ११२, मूल्य २५०/-, अंतिका प्रकाशन, सी ५६ / यूजीएफ़ ४, शालीमार बाग़, विस्तार २, गाज़ियाबाद २०१००५, ०१२० २६४८२१२, ९८७१८५६०५३, antika56@gmailcom, कवयत्री संपर्क बी १०१ महानंदा ब्लोक, विराशा हाईटस, दानिश कुञ्ज पुल के समीप, कोलर मार्ग, भोपाल ४६२०४२, shrutyindia@gmail.com]
*
मूल्यों के संक्रमण और आधुनिक कविता के पराभव काल में जब अच्छे-अच्छे पुरोधा कविता का अखाड़ा और ग़ज़ल का मजमा छोड़कर दिनानुदिन अधिकाधिक लोकप्रिय होते नवगीत की पिचकारी थामे कबीरा गाने की होड़ कर रहे हैं, तब अपनी वैचारिक प्रबद्धता, आनुभूतिक मार्मिकता और अभिव्यक्तात्मक बाँकपन की तिपाई पर सामाजिक परिदृश्य का जायजा लेते हुए अपने भीतर झाँककर, बाहर घटते घटनाक्रम के प्रति आत्मीयता रखते हुए भी पूरी शक्ति से झकझोरने का उपक्रम करती कविता को जस- का तस हो जाने देने के दुस्साहस का नाम है 'श्रुति'। 'श्रुति' की यह नियति तब भी थी जब लिपि, लेखनी और कागज़ का आविष्कार नहीं हुआ था और अब भी है जब नित नए गैजेट्स सामने आकर कागज़ और पुस्तक के अस्तित्व के लिए संकट की घोषणा कर रहे हैं। 'श्रुति' जन-मन की अभिव्यक्ति है जो बिना किसी नकाब के जन के मन को जन के मन के सामने अनावृत्त करती है, निर्वसन नहीं। कायदों और परंपराओं के पक्षधर कितनी भी परदेदारी कर लें 'श्रुति' को साँसों का सच और आसों की पीड़ा जानने और कहने से रोक नहीं पाते। जब 'श्रुति' अबाध हो तो 'स्मृति' को अगाध होने से कौन रोक सकता है? जब कविता स्मृति में सुरक्षित हो तो वह समय का दस्तावेज हो जाती है।
'कशमकश' चेतनता, जीवंतता और स्वतंत्रता का लक्षण है। जड़ या मृत में 'कशमकश' कैसे हो सकती है? किसी पिछलग्गू में केवल अनुकरण भाव होता है। 'कशमकश' वैचारिक आन्दोलन का दूसरा नाम है। आंदोलित होती 'श्रुति' जन-गण के मन में घट रहे या जन-मन को घटा रहे घटनाक्रम के प्रति आक्रोशित हो, यह स्वाभाविक है। एक जन की पीड़ा दूसरा न सुने तो उस पर प्रतिक्रया और कुछ करने या न करने की कशमकश कैसे हो? इस रूप में 'श्रुति' ही 'कशमकश' को जन्म देती है। संयोगवश विवेच्य काव्य संग्रह 'कशमकश' की जननी का नाम भी 'श्रुति' है। यह 'श्रुति' सामान्य नहीं 'कुशवाहा' अर्थात कुश धारण करनेवाली है। कुश धारण किया जाता है 'संकल्प' के समय। जब किसी कृत्य को निष्पादित करने का निश्चय कर लिया, संसाधन जुटा लिए, कृत्य संपादित करने के लिए पुरोहित अर्थात मार्गदर्शक भी आ गया तो हाथ में कुश लेकर भूमि पर जल छोड़ते हुए संकल्प में सहायक होता है 'कुश'। जन-मन की 'कशमकश' को कविता रूपी 'कुश' के माध्यम से उद्घाटित ही नहीं यथासंभव उपचारित करने का संकल्प करती 'श्रुति' की यह कृति सिर्फ पठनीय नहीं चिंतनीय भी है।
'श्रुति' की सत्तर कविताओं का यह संकलन 'कशमकश' असाधारण है। असाधारण इस अर्थ में कि यह अपने समय की 'प्रवृत्तियों' का निषेध करते हुए भी 'निवृत्ति' का पथ प्रशस्त नहीं करता। समय की परख कर पाना हर रचनाकार के लिए आवश्यक है। श्रुति कहती है-
'जब बिकने लगता है धर्म
और घायल हो जाती है आस्था
चेहरे हो जाते हैं पत्थर
दिखने में आदमी जैसा
जब नहीं रह जाता आदमी
जब चरों ओर मंडराता है संकट
वही होता है
कविता लिखने का सबसे सही वक़्त'
श्रुति की कविताएँ इस बात की साक्षी हैं कि उसे समय की पहचान है। वह लिजलिजी भावनाओं में नहीं बहती। ज़िन्दगी शीर्षक कविता में कवयित्री का आत्म विश्वास पंक्ति-पंक्ति में झलकता है-
नहीं,
मेरी ज़िन्दगी
तुमसे शुरू होकर
तुमपर ख़त्म नहीं होती....
... हाँ
मेरी ज़िंदगी
मुझसे शरू होती है
और ख़त्म वहीं होगी
जहाँ मैं चाहूँगी ...
स्त्री विमर्श के नाम पर अपने पारिवारिक दायित्वों से पलायन कर कृत्रिम हाय-तोबा और नकली आंसुओं से लबालब कविता करने के स्थान पर कवयित्री संक्षेप में अपने अस्तित्व और अस्मिता को सर्वोच्च मानते हुए कहती है-
अब बस
आज मैं घोषित करती हूँ
तुम्हें
एक आम आदमी
गलतियों का पुतला
और खुद को
पत्नी परमेश्वर
ये कविताएँ हवाई कल्पना जगत से नहीं आईं है। इन्हें यथार्थ के ठोस धरातल पर रचा गया है। स्वयं कवयित्री के शब्दों में-
मेरी कविता का
कचरा बीनता बच्चा
बूट पोलिश करता लड़का
संघर्ष करती लड़की
हाशिए पर खड़े लोग
कोइ काल्पनिक पात्र नहीं
दरअसल
मेरे भीतर का आसमान है
आशावाद श्रुति की कविताओं में खून की तरह दौड़ता है-
सूरज उगेगा एक दिन
आदत की तरह नहीं
दस्तूर की तरह नहीं....
.... एक क्रांति की तरह
.... जिस दिन
वो सूरज उगेगा
तो फिर नहीं होगी कभी कोई रात
'वक्त कितना कठिन है साथी' शीर्षक कविता में स्त्रियों पर हो रहे दैहिक हमलों की पड़ताल करती कवयित्री लीक से हटकर सीधे मूल कारण तलाशती है। वह सीधे सीधे सवाल उठाती है- मैं कैसे प्रेम गीत गाऊँ?, मैं कैसे घर का सपना संजोऊँ?, मैं कैसे विश्वास की नव चढ़ूँ? उसकी नज़र सीधे मर्म पर पहुँचती है कि जो पुरुष अपने घर की महिलाओं की आबरू का रखवाला है, वही घर के बाहर की महिलाओं के लिए खतरा क्यों है? कैसी विडम्बना है?
मर्द जो भाई पति प्रेमी है
वो दूसरी लड़कियों के लिए
भेदिया साबित हो सकता है कभी भी....
'क्या तुम जानते हो' में दुनिया के चर्चित स्त्री-दुराचार प्रकरणों का उल्लेख कर घरवाले से प्रश्न करती है कि वह घरवाली को कितना जानता है?
बताओ क्या तुम जानते हो
सालों से घर के भीतर रहनेवाली
अपनी पत्नी के बारे में
जो हर रात सोती है तुम्हारे बाद
हर सुबह उठती है तुमसे पहले
क्या उसने नींद पर विजय पा ली है?
जो हर वक्त पकाती है तुम्हरी पसंद का खाना
क्या उसे भी वही पसंद है हमेशा से
जो बिस्तर बन जाती है तुम्हारी कामना पर
क्या वो हर बार तैयार होती है देह के खेल के लिए
श्रुति की कविताओं का वैशिष्ट्य तिलमिला देनेवाले सवाल शालीन-शिष्ट भाषा में किंतु दृढ़ता और स्पष्टता के साथ पूछना है। वह न तो निरर्थक लाग-लपेट करते आवरण चढ़ाती है, न कुत्सित और अश्लील शब्दावली का प्रयोग करती है। राम-सीता प्रसंग में गागर में सागर की तरह चंद पंक्तियाँ 'कम शब्दों में अधिक कहने' की कला का अनुपम उअदाह्र्ण है-
सीता के लिए ही था ण
युद्ध
हे राम
फिर जीवित सीता को
क्यों कराया अग्नि-स्नान
श्रुति का आत्मविश्वास, अपने फैसले खुद करने का निश्चय और उनका भला या बुरा जो भी हो परिणाम स्वीकारने की तत्परता काबिले -तारीफ़ है। वह अन्धकार, से प्रेम करना, रावण को समझना तथा कुरूपता को पूजना चाहती है क्योंकि उन्होंने क्रमश: प्रकाश की महत्ता , सीता की दृढ़ता तथा सुन्दरता को उद्घाटित किया किंतु इन सबको भुला भी देना चाहती है कि प्रकाश, दृढ़ता और सुनदरता अधिक महत्वपूर्ण है। यह वैचारिक स्पष्टता और साफगोई इन कविताओं को पठनीय के साथ-साथ चिन्तनीय भी बनाती हैं।
'आशंका' इस संकलन की एक महत्वपूर्ण कविता है। यहाँ कवयित्री अपने पिटा के जन्मस्थान से जुड़ना चाहती है क्योंकि उसे यह आशंका है कि ऐसा ण करने पर कहीं उसके बच्चे भी उसके जन्म स्थान से जुड़ने से इंकार न कर दें। पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने और पालने वाले जीवन-मूल्यों और परंपराओं की जमीन पर रची गयी इस रचना का स्वर अन्य से भिन्न किंतु यथार्थपूर्ण है।
एक और मार्मिक कविता है 'पापा का गुस्सा'। पापा के गुस्से से डरनेवाली बच्ची का सोचना स्वाभाविक है कि पापा को गुस्सा क्यों आता है? बड़े होने पर उसे प्रश्न का उत्तर मिलता है-
आज समझ पाई हूँ
उनके गुस्से का रहस्य
पापा दरअसल गुस्सा नहीं होते
दुखी होते हैं
जब वे डांटते
तो हमारे लिए ही नहीं
उनके लिए भी सजा होती
आत्मावलोकन और आत्मालोचन इन कविताओं में जहाँ-तहाँ अन्तर्निहित है। कवयित्री गुलाब को तोड़ कर गुल्दासे में सजती है पर खुद को चोट पहुँचाने वाले को क्षमा नहीं कर पाती, भूखे भिखारी को अनदेखा कर देती है, अशक्त वृद्ध को अपनी सीट नहीं देती, अभाव में मुस्कुरा नहीं पाती, सहज ही भूल नहीं स्वीकारती यह तो हम सब करते हैं पर हमसे भिन्न कवयित्री इसे कवि होने की अपात्रता मानती है-
नहीं, मैं कवि नहीं
मैं तो मात्र
रचयिता हूँ
कवि तो वह है
जो मेरी कविता को जीता है।
जिस कविता के शीर्षक से पुस्तक के नामकरण हुआ है, वह है 'कशमकश'। अजब विडम्बना है कि आदमी की पहचान उसके अस्तित्व, कार्यों या सुयश से नहीं दस्तावेजों से होती है-
मैंने
पेनकार्ड रखा
पासपोर्ट, आधार कार्ड
मतदाता प्रमाण पत्र
खुद से जुड़े तमाम दस्तावेज सहेजे
और निकल पडी
लेकिन यह क्या
खुद को रखना तो भूल होगी
मुड़कर देखा तो
दूर तक नज़र नहीं आई मैं
अजीब कशमकश है
खुद को तलाशने पीछे लौटूं
या खुद के बगैर आगे बढ़ जाऊँ...
ये कवितायेँ बाहर की विसंगतियों का आकलन कर भीतर झाँकती हैं। बाहर से उठे सवालों के हल भीतर तलाशती कविताओं की भाषा अकृत्रिम और जमीनी होना सोने में सुहागा है। ये कविताएं आपको पता नहीं रहने देती, आपके कथ्य का भोक्ता बना देती हैं, यही कवयित्री और उसकी कारयित्री प्रतिभा की सफलता है।
***
सामयिक हास्य कविता:
राहुल जी का डब्बा गोल
*
लम्बी_चौड़ी डींग हाँकतीं, मगर खुल गयी पल में पोल
मोदी जी का दाँव चल गया, राहुल जी का डब्बा गोल
मातम मना रहीं शीला जी, हुईं सोनिया जी बेचैन
मौका चूके केजरीवाल जी, लेकिन सिद्ध हुए ही मैन
हंग असेम्बली फिर चुनाव का, डंका जनता बजा रही
नेताओं को चैन न आये, अच्छी उनकी सजा रही
लोक तंत्र को लोभ तंत्र जो, बना रहे उनको मारो
अपराधी को टिकिट दे रहे, जो उनको भी फटकारो
गहलावत को वसुंधरा ने, दिन में तारे दिखा दिये
जय-जयकार रमन की होती, जोगी जी पिनपिना गये
खिला कमल शिवराज हँस रहे, पंजा चेहरा छिपा रहा
दिग्गी को रूमाल शीघ्र दो, छिपकर आँसू बहा रहा
मतदाता जागो अपराधी नेता, बनें तो मत मत दो
नोटा बटन दबाओ भैया, एक साथ मिल करवट लो
***
पुस्तक चर्चा-
एक बहर पर एक ग़ज़ल - अभिनव सार्थक प्रयास
चर्चाकार- आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
पुस्तक परिचय- एक बहर पर एक ग़ज़ल, ब्रम्हजीत गौतम, ISBN ९७८-८१-९२५६१३-७-०, प्रथम संस्करण २०१६, आकार २१.५ से.मी. x १४ से.मी., आवरण पेपरबैक, बहुरंगी, पृष्ठ १४४/-, मूल्य २००/-, शलभ प्रकाशन १९९ गंगा लेन, सेक्टर ५, वैशाली, गाजियाबाद २०१०१०, रचनाकार संपर्क- युक्कौ २०६ पैरामाउंट सिम्फनी, क्रोसिंग रिपब्लिक, गाज़ियाबाद २०१०१६, चलभाष- ९७६०००७८३८।
*
'नाद' ही सृष्टि का मूल है। नाद की निरंतरता उसका वैशिष्ट्य है। नाद के आरोह और अवरोह लघु-गुरु के पर्याय हैं। नाद के साथ विविध ध्वनियाँ मिलकर अक्षर को और विविध अक्षर मिलकर शब्द को जन्म देते हैं। लघु-गुरु अक्षरों के विविध संयोग ही गण या रुक्न हैं जिनके अनेक संयोग लयों के रूप में सामने आते हैं। सरस लयों को काव्य शास्त्र छंद या बहर के रूप में वर्णित करता है। हिंदी पिंगल में छंद के मुख्य २ प्रकार मात्रिक (९२,२७,७६३) तथा वार्णिक (१३,४२,१७,६२६) हैं।१ यह संख्या गणितीय आधार पर गिनी गयी है। सामान्यत: २०-२५ प्रकार के छंद ही अधिक प्रयोग किये जाते हैं। उर्दू में बहरों के मुख्य २ प्रकार मुफरद या शुद्ध (७) तथा मुरक्कब या मिश्रित (१२) हैं।२ गजल छंद चेतना में ६० औज़ानों का ज़िक्र है।३ गजल ज्ञान में ६७ बहरों के उदाहरण हैं।४ ग़ज़ल सृजन के अनुसार डॉ. कुंदन अरावली द्वारा सं १९९१ में प्रकाशित उनकी पुस्तक इहितिसाबुल-अरूज़ में १३२ नई बहरें संकलित हैं।५ अरूज़े-खलील-मुक्तफ़ी में सालिम (पूर्णाक्षरी) बहरें १५ तथा ज़िहाफ (अपूर्णाक्षरी रुक्न) ६२ बताये गए हैं।६ गज़ल और गज़ल की तकनीक में ७ सालिम, २४ मुरक्कब बहरों के नमूने दिए गए हैं। ७. विवेच्य कृति में ६५ बहरों पर एक-एक ग़ज़ल कहीं गयी है तथा उससे सादृश्य रखने वाले हिंदी छंदों का उल्लेख किया गया है।
गौतम जी की यह पुस्तक अन्यों से भिन्न तथा अधिक उपयोगी इसलिए है कि यह नवोदित गजलकारों को ग़ज़ल के इतिहास और भूगोल में न उलझाकर सीधे-सीधे ग़ज़ल से मिलवाती है। बहरों का क्रम सरल से कठिन या रखा गया है। डॉ. गौतम हिंदी प्राध्यापक होने के नाते सीखनेवालों के मनोविज्ञान और सिखानेवालों कि मनोवृत्ति से बखूबी परिचित हैं। उन्होंने अपने पांडित्य प्रदर्शन के लिए विषय को जटिल नहीं बनाया अपितु सीखनेवालों के स्तर का ध्यान रखते हुए सरलता को अपनाया है। छंदशास्त्र के पंडित डॉ. गौतम ने हर बहर के साथ उसकी मात्राएँ तथा मूल हिंदी छंद का संकेत किया है। सामान्यत: गजलकार अपनी मनपसंद या सुविधाजनक बहर में ग़ज़ल कहते हैं किंतु गौतम जी ने सर्व बहर समभाव का नया पंथ अपनाकर अपनी सिद्ध हस्तता का प्रमाण दिया है।
प्रस्तुत गजलों की ख़ासियत छंद विधान, लयात्मकता, सामयिकता, सारगर्भितता, मर्मस्पर्शिता, सहजता तथा सरलता के सप्त मानकों पर खरा होना है। इन गजलों में बिम्ब, प्रतीक, रूपक और अलंकारों का सम्यक तालमेल दृष्टव्य है। ग़ज़ल का कथ्य प्रेयसी से वार्तालाप होने की पुरातन मान्यता के कारण ग़ालिब ने उसे तंग गली और कोल्हू का बैल जैसे विशेषण दिए थे। हिंदी ग़ज़ल ने ग़ज़ल को सामायिक परिस्थितियों और परिवेश से जोड़ते हुए नए तेवर दिए हैं जिन्हें आरंभिक हिचक के बाद उर्दू ग़ज़ल ने भी अंगीकार किया है। डॉ. गौतम ने इन ६५ ग़ज़लों में विविध भावों, रसों और विषयों का सम्यक समन्वय किया है।
नीतिपरकता दोहों में सहज किन्तु ग़ज़ल में कम ही देखने मिलती है। गौतम जी 'सदा सत्य बोलो सखे / द्विधा मुक्त हो लो सखे', 'यों न चल आदमी / कुछ संभल आदमी' आदि ग़ज़लों में नीति की बात इस खुबसूरती से करते हैं कि वह नीरस उपदेश न प्रतीत हो। 'हर तरफ सवाल है / हर तरफ उबाल है', 'हवा क्यों एटमी है / फिज़ा क्यों मातमी है', 'आइये गजल कहें आज के समाज की / प्रश्न कुछ भविष्य के, कुछ व्यथाएँ आज की' जैसी गज़लें सम-सामयिक प्रश्नों से आँखें चार करती हैं। ईश्वर को पुकारने का भक्तिकालीन स्वर 'मेरी नैया भंवर में घिरी है / आस तेरी ही अब आखिरी है' में दृष्टव्य है। पर्यावरण पर अपने बात कहते हुए गौतम जी मनुष्य को पेड़ से सीख लेने की सीख देते हैं- 'दूसरों के काम आना पेड़ से सीखें / उम्र-भर खुशियाँ लुटाना पेड़ से सीखें'। गौतम जी कि ग़ज़ल मुश्किलों से घबराती नहीं वह दर्द से घबराती नहीं उसका स्वागत करती है- 'दर्द ने जब कभी रुलाया है / हौसला और भी बढ़ाया है / क्या करेंगी सियाह रातें ये / नूर हमने खुदा से पाया है'।
प्यार जीवन की सुन्दरतम भावना है। गौतम जी ने कई ग़ज़लों में प्रकारांतर से प्यार की बात की है। 'गुस्सा तुम्हारा / है हमको प्यारा / आँखें न फेरो / हमसे खुदारा', 'तेरे-मेरे दिल की बातें, तू जाने मैं जानूँ / कैसे कटते दिन और रातें, तू जानें मैं जानूँ', 'उनको देखा जबसे / गाफिल हैं हम तबसे / यह आँखों की चितवन / करती है करतब से, 'इशारों पर इशारे हो रहे हैं / अदा पैगाम सारे हो रहे हैं' आदि में प्यार के विविध रंग छाये हैं। 'कितनी पावन धरती है यह अपने देश महान की / जननी है जो ऋषि-मुनियों की और स्वयं भगवान की', 'आओ सब मिलकर करें कुछ ऐसी तदबीर / जिससे हिंदी बन सके जन-जन की तकदीर' जैसी रचनाओं में राष्ट्रीयता का स्वर मुखर हुआ है।
सारत: यह पुस्तक एक बड़े अभाव को मिटाकर एक बड़ी आवश्यकता कि पूर्ति करती है। नवगजलकार खुश नसीब हैं कि उन्हें मार्गदर्शन हेतु 'गागर में सागर' सदृश यह पुस्तक उपलब्ध है। गौतम जी इस सार्थक सृजन हेतु साधुवाद के पात्र हैं। उनकी अगली कृति कि बेकरारी से प्रतीक्षा करेंगे गजल प्रेमी।
*** सन्दर्भ- १. छंद प्रभाकर- जगन्नाथ प्रसाद 'भानु', २. गजल रदीफ़ काफिया और व्याकरण- डॉ. कृष्ण कुमार 'बेदिल', ३. गजल छंद चेतना- महावीर प्रसाद 'मुकेश', ४. ग़ज़ल ज्ञान- रामदेव लाल 'विभोर', ५. गजल सृजन- आर. पी. शर्मा 'महर्षि', ६. अरूज़े-खलील-मुक्तफ़ी- ज़ाकिर उस्मानी रावेरी, ७. गज़ल और गज़ल की तकनीक- राम प्रसाद शर्मा 'महर्षि'.
***
पुस्तक चर्चा-
'गज़ल रदीफ़,-काफ़िया और व्याकरण' अपनी मिसाल आप
चर्चाकार- आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
पुस्तक विवरण- गज़ल रदीफ़,-काफ़िया और व्याकरण, डॉ. कृष्ण कुमार 'बेदिल', विधा- छंद शास्त्र, प्रथम संस्करण २०१५, आकार २२ से.मी. X १४.५ से.मी., आवरण सजिल्द बहुरंगी जैकेट सहित, पृष्ठ ९५, मूल्य १९५/-, निरुपमा प्रकाशन ५०६/१३ शास्त्री नगर, मेरठ, ०१२१ २७०९५११, ९८३७२९२१४८, रचनाकार संपर्क- डी ११५ सूर्या पैलेस, दिल्ली मार्ग, मेरठ, ९४१००९३९४३।
*
हिंदी-उर्दू जगत के सुपरिचित हस्ताक्षर डॉ. कृष्ण कुमार 'बेदिल' हरदिल अज़ीज़ शायर हैं। वे उस्ताद शायर होने के साथ-साथ, अरूज़ के माहिर भी हैं। आज के वक्त में ज़िन्दगी जिस कशमकश में गुज़र रही है, वैसा पहले कभी नहीं था। कल से कल को जोड़े रखने कि जितनी जरूरत आज है, उतनी पहले कभी नहीं थी। लार्ड मैकाले द्वारा थोपी गयी और अब तक ढोई जा रही शिक्षा प्रणाली कि बदौलत ऐसी नस्ल तैयार हो गयी है जिसे अपनी सभ्यता और संस्कृति पिछड़ापन तथा विदेशी विचारधारा प्रगतिशीलता प्रतीत होती है। इस परिदृश्य को बदलने और अपनी जड़ों के प्रति आस्था और विश्वास पैदा करने में साहित्य की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण हो गयी है। ऐसे रचनाकार जो सृजन को शौक नहीं धर्म मानकर सार्थक और स्वस्थ्य रचनाकर्म को पूजा की तरह निभाते हैं उनमें डॉ. बेदिल का भी शुमार है।
असरदार लेखन के लिए उत्तम विचारों के साथ-साथ कहने कि कला भी जरूरी है। साहित्य की विविध विधाओं के मानक नियमों की जानकारी हो तो तदनुसार कही गयी बात अधिक प्रभाव छोड़ती है। गजल काव्य की सर्वाधिक लोकप्रिय वि धाओं में से एक है। बेदिल जी, ने यह सर्वोपयोगी किताब बरसों के अनुभव और महारत हासिल करने के बाद लिखी है। यह एक शोधग्रंथ से बहुत अधिक महत्वपूर्ण है। शोधग्रंथ विषय के जानकारों के लिए होता है जबकि यह किताब ग़ज़ल को जाननेवालों और न जाननेवालों दोनों के लिए सामान रूप से उपयोगी है। उर्दू की काव्य विधाएँ, ग़ज़ल का सफर, रदीफ़-काफ़िया और शायरी के दोष, अरूज़(बहरें), बहरों की किस्में, मुफरद बहरें, मुरक़्क़ब बहरें तथा ग़ज़ल में मात्रा गिराने के नियम शीर्षक अष्टाध्यायी कृति नवोदित ग़ज़लकारों को कदम-दर-कदम आगे बढ़ने में सहायक है।
एक बात साफ़ तौर पर समझी जानी चाहिए कि हिंदी और उर्दू हिंदुस्तानी जबान के दो रूप हैं जिनका व्याकरण और छंदशास्त्र कही-कही समान और कहीं-कहीं असमान है। कुछ काव्य विधाएँ दोनों भाषा रूपों में प्रचलित हैं जिनमें ग़ज़ल सर्वाधिक लोकप्रिय और महत्वपूर्ण है। उर्दू ग़ज़ल रुक्न और बहारों पर आधारित होती हैं जबकि हिंदी ग़ज़ल गणों के पदभार तथा वर्णों की संख्या पर। हिंदी के कुछ वर्ण उर्दू में नहीं हैं तो उर्दू के कुछ वर्ण हिंदी में नहीं है। हिंदी का 'ण' उर्दू में नहीं है तो उर्दू के 'हे' और 'हम्ज़ा' के स्थान पर हिंदी में केवल 'ह' है। इस कारण हिंदी में निर्दोष दिखने वाला तुकांत-पदांत उर्दूभाषी को गलत तथा उर्दू में मुकम्मल दिखनेवाला पदांत-तुकांत हिन्दीभाषी को दोषपूर्ण प्रतीत हो सकता है। यही स्थिति पदभार या वज़न के सिलसिले में भी हो सकती है। मेरा आशय यह नहीं है कि हमेशा ही ऐसा होता है किन्तु ऐसा हो सकता है इसलिए एक भाषारूप के नियमों का आधार लेकर अन्य भाषारूप में लिखी गयी रचना को खारिज करना ठीक नहीं है। इसका यह अर्थ भी नहीं है कि विधा के मूल नियमों की अनदेखी हो। यह कृति गज़ल के आधारभूत तत्वों की जानकारी देने के साथ-साथ बहरों कि किस्मों, उनके उदाहरणों और नामकरण के सम्बन्ध में सकल जानकारी देती है। हिंदी-उर्दू में मात्रा न गिराने और गिराने को लेकर भी भिन्न स्थिति है। इस किताब का वैशिष्ट्य मात्रा गिराने के नियमों की सटीक जानकारी देना है। हिंदी-उर्दू की साझा शब्दावली बहुत समृद्ध और संपन्न है।
उर्दू ग़ज़ल लिखनेवालों के लिए तो यह किताब जरूरी है ही, हिंदी ग़ज़ल के रचनाकारों को इसे अवश्य पढ़ना, समझना और बरतना चाहिए इससे वे ऐसी गज़लें लिख सकेंगे जो दोनों भाषाओँ के व्याकरण-पिंगाल की कसौटी पर खरी उतरें। लब्बोलुबाब यह कि बिदिक जी ने यह किताब पूरी फराखदिली से लिखी है जिसमें नौसिखियों के लिए ही नहीं उस्तादों के लिए भी बहुत कुछ है। इया किताब का अगला संस्करण अगर अंग्रेजी ग़ज़ल, बांला ग़ज़ल, जर्मन ग़ज़ल, जापानी ग़ज़ल आदि में अपने जाने वालों नियमों की भी जानकारी जोड़ ले तो इसकी उपादेयता और स्वीकृति तो बढ़ेगी ही, गजलकारों को उन भाषाओँ को सिखने और उनकी ग़ज़लों को समझने की प्रेरणा भी मिलेगी।
डॉ. बेदिल इस पाकीज़ा काम के लिए हिंदी-उर्दू प्रेमियों की ओर से बधाई और प्रशंसा के पात्र हैं। गुज़ारिश यह कि रुबाई के २४ औज़ानों को लेकर एक और किताब देकर कठिन कही जानेवाली इस विधा को सरल रूप से समझाकर रुबाई-लेखन को प्रोत्साहित करेंगे।
२७-१२-२०१६
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लघुकथा -
कब्रस्तान
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महाविद्यालय के प्राचार्य मुख्य अतिथि को अपनी संस्था की गुणवत्ता और विशेषताओं की जानकारी दे रहे थे. पुस्तकालय दिखलाते हुए जानकारी दी की हमारे यहाँ विषयों की पाठ्य पुस्तकें तथा सन्दर्भ ग्रंथों के साथ-साथ अच्छा साहित्य भी है. हम हर वर्ष अच्छी मात्र में साहित्यिक पुस्तकें भी क्रय करते हैं.
आतिथि ने उनकी जानकारी पर संतोष व्यक्त करते हुए पुस्तकालय प्रभारी से जानना चाहा कि गत २ वर्षों में कितनी पुस्तकें क्रय की गयीं, विद्यार्थियों ने कितनी पुस्तकें पढ़ने हेतु लीं तथा किन पुस्तकों की माँग अधिक थी? उत्तर मिला इस वर्ष क्रय की गयी पुस्तकों की आदित जांच नहीं हुई है, गत वर्ष खरीदी गयी पुस्तकें दी नहीं जा रहीं क्योंकि विद्यार्थी या तो विलम्ब से वापिस करते हैं या पन्ने फाड़ लेते हैं.
नदी में बहते पानी की तरह पुस्तकालय से प्रतिदिन पुस्तकों का आदान-प्रदान न हो तो उसका औचित्य और सार्थकता ही क्या है? तब तो वह किताबों का कब्रस्तान ही हो जायेगा, अतिथि बोले और आगे चल दिए.
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ॐकारेश्वर का विष्णु मंदिर – अल्पचर्चित किंतु भव्य
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ओमकारेश्वर ज्योतिर्लिंग होने के कारण यहाँ की पहचान मुख्य मंदिर तथा ॐ आकार का वह पर्वत है जिसकी परिक्रमा श्रद्धालुओं द्वारा की जाती है। यहाँ धार्मिक दृष्टि से आने वाले सैलानियों के लिये भी एक अन्य आकर्षण जुड गया, वह है ॐकारेश्वर में एनएचडीसी द्वारा निर्मित बाँध। इसके अतिरिक्त ममलेश्वर मंदिर नर्मदा नदी के दूसरे तट पर अवस्थित है जिसे कतिपय विद्वान ज्योतिर्लिंग परिभाषित करते हैं। यहाँ मंदिर की दीवारों पर उकेरी गयी प्रस्तराकृतियाँ व लिखे गये स्त्रोत वर्ष 1063 के बताये जाते हैं।
ॐकारेश्वर के इन मुख्य आकर्षणों पर पर्यटकों की अच्छी खासी संख्या दैनिक रूप से उपस्थित रहती है। नौकायन करते हुए जब मैं नदी के उत्तरी तट पर ओमकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शनों के लिये जा रहा था, मध्य से चारों ओर का दृश्य निहारते हुए इस प्राचीन स्थान के महात्म्य और ऐतिहासिकता ने मन-मोह लिया। पर्वत के शीर्ष पर प्राचीन राजमहल बहुत ही दयनीय अवस्था में भी शान से कुछ कहता प्रतीत होता है। यत्र तत्र अनेक ऐतिहासिक महत्व के भग्नावशेष हैं जिनतक पहुँचना भी संभव नहीं चूंकि उनकी पीठ पर कई धर्मशालायें हैं। यह केवल ओंकारेश्वर की ही बात नहीं अपितु कमोबेश पूरे देश में ही इतिहास हमारी सोच में भी केन्द्रित नहीं और हम खण्डहर कह सब कुछ अनदेखा कर देते हैं।
ओंकारेश्वर मुख्य मंदिर और ममलेश्वर मंदिर के अतिरिक्त यहाँ अनेक मंदिरों व आश्रमों की श्रंखला है जो अपनी प्राचीनता के कारण महत्व के स्थान हैं। ओमकार पर्वत और आसपास गोविन्देश्वर गुफा, ऋणमुक्तेश्वर मंडिर, गौरी-सोमनाथ मंदिर, सिद्धनाथ मंदिर, आशापुरी मंदिर, ब्रम्हेश्वर मंदिर, लक्ष्मीनारायण मंदिर, इन्द्रेश्वर मंदिर, काशी-विश्वनाथ मंदिर, वृहदेश्वर मंदिर, कपिलेश्वर मंदिर, हनुमान मंदिर, अन्नपूर्णा मंदिर, मार्कण्डेय आश्रम, गया शिला तीर्थ आदि अवस्थित हैं। केवल मंदिर ही नहीं अपितु इस परिधि में गुरुद्वारा तथा सिद्धवरकूट जैनतीर्थ भी नर्मदा एवं कावेरी नदियों के संगम पर है। नर्मदा नदी पर इन तीर्थों को देख कर यह स्वत: ही मनोभावना उठती है कि “त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवि नर्मदे”।
नदी के दक्षिणी तट पर स्थित एक मंदिर ने अपनी कलात्मकता के कारण मेरा ध्यान खींचा था। मुझे जानकारी प्राप्त हुई कि यह एक विष्णु मंदिर है। मंदिर की पूरी संरचना को सफेद रंग के पोत दिया गया है यहाँ तक कि प्रतिमायें भी लिपि-पुती हैं जो संभव है इतिहास के किसी विद्यार्थी को मायूस कर सकती हैं। बहुत पर्यटक नहीं आते अंत: शांत और एकांतप्रिय लोगों के लिये यहाँ खडे हो कर नर्मदा नदी के प्रवाह को देखना अद्भुत आनंद का सिद्ध हो सकता है। मंदिर का मुख नर्मदा नदी की ओर है तथा यह गर्भगृह, अंतराल एवं मण्डप तीन भागों में विभक्त है।
विष्णु मंदिर के मण्डप वाले हिस्से में सोलह अलंकृत स्तम्भ है जो मंदिर की भव्यता बढाते हैं। मंदिर का प्रत्येक स्तम्भ नृत्य मुद्रा में किसी अपसरा से ले कर किसी पौराणिक आख्यान तक स्वयं में समाविष्ट किये हुए हैं। पृष्ठ भाग छोड कर तीन ओर से सीढियाँ है जिनसे हो कर चबूतरे पर चढा जा सकता है एवं चतुर्भुजी भगवान विष्णु के दर्शन किये जा सकते हैं। अंतराल वाले भाग में दीवारों पर भगवान विष्णु, उमा-महेश्वर तथा भगवान कृष्ण की लीलाओं सम्बन्धी प्रतिमायें देखी जा सकती हैं। मंदिर का गर्भगृह आयताकार है किंतु बहुत विशाल नहीं है। मंदिर का शिखर यद्यपि तुलनात्मक रूप से विशाल व दर्शनीय है। शिखर पर निश्चित अंतराल में दो द्वार बने हुए हैं। मंदिर के चारो को दो हाथी, कमल, भगवान विष्णु आदि सहित कतिपय मिथुन प्रतिमायें भी हैं।
मंदिर के अहाते में ही भगवान विष्णु की एक प्रतिमा खण्डित अवस्था में रखी हुई है। प्रतिमा अलंकृत है तथा दर्शनीय है। इस स्थान से आगे बढ कर नर्मदानदी के विस्तार का आनंद लिया जा सकता है। यहाँ से ओमकारेश्वर का पुराना पुल, अनेकों मंदिर व प्राकृतिक दृष्य दृष्टिगोचर होते हैं। ओमकारेश्वर में अवस्थित यह भव्य विष्णु मंदिर पर्यटकों की उपेक्षा क्यों झेल रहा है इसका कारण संभवत: इस स्थान के समुचित प्रचार – प्रसार का न होना है। मुझे लगता है कि किसी स्थान की महत्ता को यदि वास्तव में जानना-समझना है तो ऐसे ही अल्प-चर्चित स्थलों के लिये थोड़ा समय निकालना भी आवश्यक है।
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नवगीत
गुरु विपरीत
*
गुरु विपरीत
हमेशा चेले
*
गाँधी कहते सत्य बोलना
गाँधीवादी झूठ बोलते
बुद्ध कहें मत प्रतिमा गढ़ना
बौद्ध मूर्तियाँ लिये डोलते
जिन मुनि कहते करो अपरिग्रह
जैन संपदा नहीं छोड़ते
चित्र गुप्त हैं निराकार
कायस्थ मूर्तियाँ लिये दौड़ते
इष्ट बिदा हो जाता पहले
कैसे यह
विडंबना झेले?
गुरु विपरीत
हमेशा चेले
*
त्यागी मठ-आश्रम में बैठे
अपने ही भक्तों को लूटें
क्षमा करो कहते ईसा पर
ईसाई दुश्मन को कूटें
यवन पूजते बुत मक्का में
लेकिन कहते बुत हैं झूठे
अभियंता दृढ़ रचना करते
किन्तु समय से पहले टूटें
माया कहते हैं जो जग को
रमते हैं
लगवाकर मेले
गुरु विपरीत
हमेशा चेले
*
विद्यार्थी विद्या की अर्थी
रोज निकालें नकल कर-कर
जन प्रतिनिधि जनगण को ठगते
निज वेतन-भत्ते बढ़वाकर
अर्धनग्न घूमे अभिनेत्री
नित्य न अभिनय बदन दिखाकर
हम कहते गृह-स्वामी खुद को
गृहस्वामिनी की आज्ञा लेकर
गिनें कहाँ तक
बहुत झमेले?
गुरु विपरीत
हमेशा चेले
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नवगीत -
*
सल्ललाहो अलैहि वसल्लम
*
सल्ललाहो अलैहि
वसल्लम
क्षमा करें सबको
हम हरदम
*
सब समान हैं, ऊँच न नीचा
मिले ह्रदय बाँहों में भींचा
अनुशासित रह करें इबादत
ईश्वर सबसे बड़ी नियामत
भुला अदावत, क्षमा दान कर
द्वेष-दुश्मनी का
मेटें तम
सल्ललाहो अलैहि
वसल्लम
*
तू-मैं एक न दूजा कोई
भेदभाव कर दुनिया रोई
करुणा, दया, भलाई, पढ़ाई
कर जकात सुख पा ले भाई
औरत-मर्द उसी के बंदे
मिल पायें सुख
भुला सकें गम
सल्ललाहो अलैहि
वसल्लम
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ज्ञान सभ्यता, सत्य-हक़ीक़त
जगत न मिथ्या-झूठ-फजीहत
ममता, समता, क्षमता पाकर
राह मिलेगी, राह दिखाकर
रंग- रूप, कद, दौलत, ताकत
भुला प्रेम का
थामें परचम
सल्ललाहो अलैहि
वसल्लम
*
कब्ज़ा, सूद, इजारादारी
नस्लभेद घातक बीमारी
कंकर-कंकर में है शंकर
हर इंसां में है पैगंबर
स्वार्थ छोड़कर, करें भलाई
ईशदूत बन
संग चलें हम
सल्ललाहो अलैहि
वसल्लम
२७-१२-२०१५
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बुधवार, 29 दिसंबर 2021

माहिया, कुण्डलिया, कायस्थ, चित्रगुप्त, छंद-बह्र, लघुकथा, मुक्तिका,

हाइकु
*
समय ग्रंथ 
एक बार फिर से
पलटा पन्ना।
*
हरेक वर्ष 
आता है यह दिन
मनाओ हर्ष।
*
हर पल हो
सत-शिव-सुंदर 
सुख दे साल।
*
हैलो डिअर!
विदाउट फिअर
हो न्यू इयर।
*
डूबता सूर्य 
इक्कीस है बाईस
ऊगता सूर्य।
२९-१२-२०२१
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त्रिपदियाँ, तसलीस, माहिया
*
नोटा मन भाया है,
क्यों कमल चुनें बोलो?
अब नाथ सुहाया है।
*
तुम मंदिर का पत्ता
हो बार-बार चलते
प्रभु को भी तुम छलते।
*
छप्पन इंची छाती
बिन आमंत्रण जाकर
बेइज्जत हो आती।
*
राफेल खरीदोगे,
बिन कीमत बतलाये
करनी भी भोगोगे।
*
पंद्रह लखिया किस्सा
भूले हो कह जुमला
अब तो न चले घिस्सा।
*
वादे मत बिसराना,
तुम हारो या जीतो-
ठेंगा मत दिखलाना।
*
जनता भी सयानी है,
नेता यदि चतुर तो
यान उनकी नानी है।
*
कर सेवा का वादा,
सत्ता-खातिर लड़ते-
झूठा है हर दावा।
*
पप्पू का था ठप्पा,
कोशिश रंग लाई है
निकला सबका बप्पा।
*
औंधे मुँह गर्व गिरा,
जुमला कह वादों को
नज़रों से आज गिरा।
*
रचना न चुराएँ हम,
लिखकर मौलिक रचना
निज नाम कमाएँ हम।
*
गागर में सागर सी
क्षणिका लघु, अर्थ बड़े-
ब्रज के नटनागर सी।
*
मन ने मन से मिलकर
उन्मन हो कुछ न कहा-
धीरज का बाँध ढहा।
*
है किसका कौन सगा,
खुद से खुद ने पूछा?
उत्तर जो नेह-पगा।
*
तन से तन जब रूठा,
मन, मन ही मन रोया-
सुनकर झूठी-झूठा।
*
तन्मय होकर तन ने,
मन-मृण्मय जान कहा-
क्षण भंगुर है दुनिया।
*
कार्यशाला:
दोहा - कुण्डलिया
*
नवल वर्ष इतना करो, हम सब पर उपकार।
रोटी कपड़ा गेह पर, हो सबका अधिकार।। -सरस्वती कुमारी, ईटानगर
हो सबका अधिकार, कि वह कर्तव्य कर सके।
हिंदी से कर प्यार सत्य का पंथ वर सके।।
चमड़ी देखो नहीं, गुणों से प्यार सब करो।
नवल वर्ष उपकार, हम सब पर इतना करो।। -संजीव, जबलपुर
२९-१२-२०१८
***
उपनिषद कहते हैं-
यक्ष प्रश्न १. चित्रगुप्त जी केवल कायस्थों के देवता कैसे हैं?
'काया स्थिते स: कायस्थ:' अर्थात जब वह (निराकार परमात्मा) काया में (आत्मा रूप में) स्थित होता है तो कायस्थ कहलाता है।
यक्ष प्रश्न २. चित्रगुप्त जी सभी जातियों के देवता क्यों नहीं हैं?
चित्रगुप्त प्रणम्यादौ वात्मानम सर्व देहिनाम' अर्थात सभी देहधारियों में आत्मा रूप में बसे चित्रगुप्त (चित्र आकार से बनता है, चित्र गुप्त है अर्थात नहीं है क्योंकि परमात्मा निराकार है) को सबसे पहले प्रणाम।
इसीलिए सशक्त और समृद्ध होने पर भी वैदिक काल से १०० वर्ष पूर्व तक चित्रगुप्त जी के मंदिर, मूर्ति, पुराण, कथा, आरती, भजन, व्रत आदि नहीं बनाये गए। स्वयं को चित्रगुप्त का वारिस माननेवाला समुदाय गणेश, शिव, शक्ति, विष्णु, बुद्ध, महावीर, आर्य समाज, युगनिर्माण योजना, साई बाबा आदि का अनुयायी होता रहा। कण-कण में भगवान् और कंकर कंकर में शंकर के आदि सत्य को स्वीकार कर देश और समाज के प्रति समर्पित रहा। अब अन्यों की नकल पर ये भी मंदिर, मूर्ति और जन्मना जातीयता के शिकार क्यों हो रहे हैं?
यक्ष प्रश्न ३. जात का अर्थ क्या है?
जब कोई भद्र दिखनेवाला मनुष्य गिरी हुई हरकत करे तो कहते हैं 'जात दिखा गया। बुंदेली कहावत 'जात दिखा गया' का अर्थ है अपनी सचाई (असलियत) दिखा गया।
जात कर्म अर्थात जन्म देने कई क्रिया (गर्भ में छिपी सचाई सामने आना), जातक जन्म लेनेवाला शिशु, जाया जन्म दिया, जच्चा जन्मदात्री, जाना बच्चा देना, जगतजननी का एक नाम 'जाया' (जिसने सबको जन्म दिया) भी है।
यक्ष प्रश्न ४. क्या जात और जाति समानार्थी हैं?
जाति अर्थात एक जैसे गुण-धर्म के लोग, जिनमें समानता हो ऐसा समूह। जाट और जाति का अर्थ लगभग समान है।
***
कार्यशाला- छंद बहर का मूल है- २.​​
उर्दू की १९ बहरें २ समूहों में वर्गीकृत की गयी हैं।
१. मुफरद बहरें-
इनमें एक ही अरकान या लय-खण्ड की पुनरावृत्ति होती है।
इनके ७ प्रकार (बहरे-हज़ज सालिम, बहरे-ऱज़ज सालिम, बहरे-रमल सालिम, बहरे-कामिल, बहरे-वाफिर, बहरे-मुतक़ारिब तथा बहरे-मुतदारिक) हैं।
२. मुरक्कब बहरें-
इनमें एकाधिक अरकान या लय-खण्ड मिश्रित होते हैं।
इनके १२ प्रकार (बहरे-मनसिरह, बहरे-मुक्तज़िब, बहरे-मुज़ारे, बहरे-मुजतस, बहरे-तवील, बहरे-मदीद, बहरे-बसीत, बहरे-सरीअ, बहरे-ख़फ़ीफ़, बहरे-जदीद, बहरे-क़रीब तथा बहरे-मुशाकिल) हैं।
*
ख. बहरे-मनसिरह
बहरे-मनसिरह मुसम्मन मतवी मक़सूफ़-
शायरों ने इस बहर का प्रयोग बहुत कम किया है। इसके अरकान 'मुफ़तइलुन फ़ाइलुन मुफ़तइलुन फ़ाइलुन' (मात्राभार ११११२ २१२ ११११२ २१२) हैं।
यह १६ वर्णीय अथाष्टिजातीय छंद है जिसमें ८-८ पर यति तथा पदांत में रगण (२१२) का विधान है।
यह २२ मात्रिक महारौद्र जातीय छंद है जिसमें ११-११ मात्राओं पर यति तथा पदांत में २१२ है।
उदाहरण-
१.
जब-जब जो जोड़ते, तब-तब वो छोड़ते
कर-कर के साथ हैं, पग-पग को मोड़ते
कर कुछ तू साधना, कर कुछ आराधना
जुड़-जुड़ जाता वही, जिस-जिस को तोड़ते
२.
निकट हमें देखना, सजन सुखी लेखना
सजग रहो हो कहीं, सलवट की रेख ना
उर्दू व्याकरण के अनुसार गुरु के स्थान पर २ लघु या दो लघु के स्थान पर गुरु मात्रा का प्रयोग करने पर छंद का वार्णिक प्रकार बदल जाता है जबकि मात्रिक प्रकार तभी बदलता है जब यह सुविधा पदांत में ली गयी हो। हिंदी पिंगल-नियम यह छूट नहीं देते। उर्दू का एक उदाहरण देखें-
१.
यार को क़ा/सिद मिरे/जाके अगर/देखना
मेरी तरफ/से भी तू/ एक नज़र/देखना
(सन्दर्भ ग़ज़ल रदीफ़-काफ़िया और व्याकरण, डॉ. कृष्ण कुमार 'बेदिल')
२९-१२-२०१६
***
लघुकथा:
करनी-भरनी
*
अभियांत्रिकी महाविद्यालय में परीक्षा का पर्यवेक्षण करते हुए शौचालयों में पुस्तकों के पृष्ठ देखकर मन विचलित होने लगा। अपना विद्यार्थी काल में पुस्तकों पर आवरण चढ़ाना, मँहगी पुस्तकों की प्रति तैयार कर पढ़ना, पुस्तकों में पहचान पर्ची रखना ताकि पन्ने न मोड़ना पड़े, वरिष्ठ छात्रों से आधी कीमत पर पुस्तकें खरीदना, पढ़ाई कर लेने पर अगले साल कनिष्ठ छात्रों को आधी कीमत पर बेच अगले साल की पुस्तकें खरीदना, पुस्तकालय में बैठकर नोट्स बनाना, आजीवन पुस्तकों में सरस्वती का वास मानकर खोलने के पूर्व नमन करना, धोखे से पैर लग जाए तो खुद से अपराध हुआ मानकर क्षमाप्रार्थना करना आदि याद हो आया।
नयी खरीदी पुस्तकों के पन्ने बेरहमी से फाड़ना, उन्हें शौच पात्रों में फेंक देना, पैरों तले रौंदना क्या यही आधुनिकता और प्रगतिशीलता है?
रंगे हाथों पकड़ेजानेवालों की जुबां पर गिड़गड़ाने के शब्द पर आँखों में कहीं पछतावे की झलक नहीं देखकर स्तब्ध हूँ। प्राध्यापकों और प्राचार्य से चर्चा में उन्हें इसकी अनदेखी करते देखकर कुछ कहते नहीं बनता। उनके अनुसार वे रोकें या पकड़ें तो उन्हें जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों या गुंडों से धमकी भरे संदेशों और विद्यार्थियों के दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ता है। तब कोई साथ नहीं देता। किसी तरह परीक्षा समाप्त हो तो जान बचे। उपाधि पा भी लें तो क्या, न ज्ञान होगा न आजीविका मिलेगी, जैसा कर रहे हैं वैसा ही भरेंगे।
२९-१२-२०१५
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समस्यापूर्ति:
अना की चादर उतार फेंके, मुहब्बतों के चलन में आये
मुक्तिका
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मिले झुकाये पिया निगाहें, लगा कि चन्दा गहन में आये
बसी बसायी लुटी नगरिया, अमावसी तम सहन में आये
उठी निगाहें गिरी बिजुरिया, न चाक हो दिल तो फिर करे क्या?
मिली नज़रिया छुरी चल गयी, सजन सनम के नयन में आये
समा नज़र में गयी है जबसे, हसीन सूरत करार गम है
पलक किनारे खुले रह गये, करूँ बंद तो सपन में आये
गया दिलरुबा बजा दिलरुबा, न राग जानूँ न रागिनी ही
कहूँ किस तरह विरह न भये, लगन लगी कब लगन में आये
जुदा किया क्यों नहीं बताये?, जुदा रखा ना गले लगाये
खुद न चाहे कभी खुदाया, भुला तेरा दर सदन में आये
छिपा न पाये कली बेकली, भ्रमर गीत जब चमन में गाये
एना की चादर उतार फेंके, मुहब्बतों के चलन में आये
अनहद छेड़ूँ अलस्सुबह, कर लिए मंजीरा सबद सुनाऊँ
'सलिल'-तरंगें कलकल प्रवाहित, मनहर छवि हर-भजन में आये
२९-१२-२०१३
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शनिवार, 9 जून 2018

साहित्य त्रिवेणी १३ राजेंद्र वर्मा -हिंदी काव्य के वर्णिक छंद और उर्दू की बहरें

हिंदी काव्य के वर्णिक छंद और उर्दू की बहरें
- राजेन्द्र वर्मा

परिचय: जन्म १५.३.१९५५, ग्राम सधई पुरवा, तहसील फ़तेहपुर, बाराबंकी उ.प्र.। संप्रति: से.नि. मुख्य प्रबंधक भारतीय स्टेट बैंक, प्रकाशन: चुटकी भर चाँदनी -दोहे, नवसृजन के स्वर -गीत, अन्तर संधि -गीत-नवगीत, बूँद-बूँद बादल -हाइकु, लौ -ग़ज़लें, मिथ्या का सत्य -कविताएँ, भारत उसका नाम -किशोरों हेतु कविताएँ, कागज़ की नाव -नवगीत, अंक में आकाश -ग़ज़लें, जीवन है अनमोल -पद, मुझे ईमानदार मत कहो -व्यंग्य(उ.प्र. हिन्दी संस्थान का श्रीनारायण चतुर्वेदी पुरस्कार), अभिमन्यु की जीत -लघुकथाएँ, दोहा छन्दः एक अध्ययन -आलोचना, दीया और दीवट -निबंध(उ.प्र. हिन्दी संस्थान का महावीर प्रसाद द्विवेदी पुरस्कार), सफलता के सात सोपान -प्रेरक साहित्य, विकल्प -लघुकथाएँ, पद पुराण व्यंग्य, मुक्ति और अन्य कहानियाँ,  पेट और तोंद -व्यंग्य, सत्ता-रस -व्यंग्य, रस-छंद-अलंकार और प्रमुख काव्य-विधाएँ, Selected poems of Rajendra Verma Translation by Awadhesh K. Shrivastava,  उपलब्धि: अखिल भारतीय लघुकथा सम्मान पटना, ‘कथाबिंब पत्रिका का कमलेश्वर कहानी सम्मान, भुवनेश्वर शोध संस्थान (शाहजहाँपुर) का ‘शिवांशु स्मृति सम्मान’, लखनऊ विश्वविद्यालय द्वारा एम्-फिल. 2005, रचनाएँ अंग्रेजी-पंजाबी में अनुवादित। संपादन: गीत शती, गीत गुंजन, अविरल मंथन १९९६-२००३। प्रसारण आकाशवाणी लखनऊ। संपर्क: ३/२९ विकास नगर, लखनऊ २२६०२२, चलभाष ८००९६ ६००९६, ईमेल: rajendrapverma@gmail.com।
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रस और लय कविता के आवश्यक तत्त्व हैं। ‘रस’ वर्णन की वस्तु है, तो ‘लय’ शब्द- योजना की। यह शब्द-योजना छंद के माध्यम से आती है। छंद को कविता के लिए उसी प्रकार आवश्यक है, जैसे नदी के प्रवाह के लिए उसके तट। तटविहीन नदी अपना वेग खोकर गन्तव्य तक नहीं पहुँचती । छंद की दृष्टि से हिंदी कविता के दो भेद हैं: (१) छंदोबद्ध और (२) मुक्तछंद। छंदोबद्ध कविता उसे कहा जाता है, जो किसी छंद विशेष में हो। जैसे: दोहा, चौपाई आदि। तुलसी की रामचरितमानस में मुख्यतः दोहे चौपाइयाँ तथा बीच-बीच में अन्य हरगीतिका, भुजंगप्रयात छंद, श्लोक आदि भी हैं। मुक्तछंद कविता में छंद तो होता है, लेकिन उसका स्वरूप निश्चित नहीं रहता। एक पंक्ति किसी छंद में हो सकती है, तो दूसरी किसी अन्य छंद में। उसकी पंक्तियाँ छोटी-बड़ी भी हो सकती हैं। उसकी लय भी अलग-अलग प्रकार की हो सकती है। कुछ लोग मुक्त छंद कविता को छंदमुक्त कविता भी कहते हैं, जो सही नहीं है। आज यद्यपि गद्य कविता भी प्रचलन में आ गयी है, जिसमें कतिपय शब्दों के दुहराव और उन पर आने वाली यति पर बल देकर लय उत्पन्न की जाती है; जबकि छंदोंबद्ध कविता में लय की स्थापना स्वमेव हो जाती है। छंदोबद्ध कविता दो प्रकार के छंदों से बनती है: मात्रिक और वर्णिक।
मात्रिक छंद: मात्रिक छंद मात्राओं के आधार पर बनते हैं अर्थात् लघु या गुरु स्वर के उच्चारण में जो समय लगता है, उसी के अनुसार लघु या गुरु मात्राएँ गिनी जाती हैं। जैसे- राम शब्द में तीन मात्राएँ हैं- ‘रा’ में २ और ‘म’ में १ । दीर्घ स्वर को इंगित करने के लिए अंग्रेजी के 'एस' अक्षर (S) का निशान और लघु को 'आई' (I) से। इस प्रकार ‘राम’ शब्द की मात्राओं को SI चिह्नों से व्यक्त किया जाता है।
(१). दोहा, चौपाई आदि मात्रिक छंद के उदाहरण हैं। दोहे में चार चरण होते हैं। पहला और तीसरा चरण १३-१३ मात्राओं का होता है, जबकि दूसरा और चौथा चरण ११-११ मात्राओं का। पहले और तीसरे चरण के अंत में लघु-दीर्घ स्वर आते हैं जबकि दूसरे और चौथे में दीर्घ-लघु। इस प्रकार, पहले और दूसरे चरण को मिलाकर २४ मात्राएँ होती हैं। मात्राओं की गणना की दृष्टि से कबीर के एक दोहे को लेते हैं: साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप । / जाके हिरदय साँच है, ताके हिरदय आप ।।
पहले चरण की मात्रा-गणना : साँच २+१=३, बराबर १+२+१+१=- ५, तप १+१= २, नहीं १+२= ३ (कुल तेरह)। दूसरे चरण में : झूठ-३, बराबर-५, पाप-३ (कुल ग्यारह)। चूँकि दोहे के सभी चरणों में मात्राएँ समान नहीं होती हैं, दो-दो चरणों में समान होती हैं; इसलिए, यह अर्धसम मात्रिक छंद कहलाता है । अगर सभी चरणों में मात्राएँ समान होतीं, तो यह सम-मात्रिक छंद कहलाता, जैसे चौपाई।
(२). चौपाई चार पंक्तियों का छंद है, जिसकी प्रत्येक पंक्ति में १६-१६ मात्राएँ होती हैं और उसके अंत में दो दीर्घ स्वर (SS) आते हैं। सभी पंक्तियों में तुकांत होता है। पंक्ति को पद या पाद भी कहते हैं; चरण नहीं। चौपाई का एक उदाहरण देखिए:
रामकथा सुंदर करतारी। संसय विहग उड़ावन हारी। /  रामकथा कलि विटप कुठारी। सादर सुनु गिरिराजकुमारी।।
इसकी प्रत्येक पंक्ति में १६ मात्राएँ होती हैं। पहली पंक्ति जाँचते हैं: राम ३, कथा ३, सुंदर ४, (जब किसी लघु वर्ण के बाद आधा वर्ण आता है, तो वह दीर्घ माना जाता है, इसलिए ‘सुंदर’ = ‘सुं’ २, दर २), कर २, तारी ४. कुल मात्राएँ: तीन+तीन+चार+दो+चार= सोलह । सभी पंक्तियों के अंत में दो दीर्घ भी हैं: तारी, हारी, ठारी और मारी। आपस में ये तुक में भी हैं। इसी छंद में जब दो-दो पंक्तियों में तुकांत होता है, तब वह चौपाई नहीं, अर्धाली कहलाती है। रामचरितमानस में अधिकांशतः अर्धालियाँ हैं।
मात्रिक छंदों में मात्राएँ समान होती हैं, पर उनका क्रम नहीं निश्चित रहता, जबकि वर्णिक छंद में उनका क्रम भी निश्चित रहता है। मात्रिक छंदों में, विष्णुपद, सरसी, ताटंक, आल्हा आदि अधिक प्रचलित छंद हैं। विष्णुपद में २६, सरसी में २७, ताटंक में ३० और आल्हा में ३१ मात्राएँ होती हैं। ये सभी छंद दो-दो चरणों से बने हैं: पहले चरण में सोलह मात्राएँ, शेष दूसरे चरण में। उदाहरण के लिए बच्चन की मधुशाला का एक छंद लेते हैं जो ताटंक छंद में है। १६-१४ मात्राओं में विभक्त ३० मात्राओं का चार पंक्तियों में निबद्ध यह छंद मनोहारी है:
मदिरालय जाने को घर से, चलता है पीनेवाला, / किस पथ से जाऊँ असमंजस, में है वह भोला-भाला।
अलग-अलग पथ बतलाते सब, पर मैं यह बतलाता हूँ, / राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला ।।
वर्णिक छंद: वर्णिक छंद उन्हें कहा जाता है जो वर्णों की गणना के आधार पर बनते हैं। इनमें वर्णों की गणना की विधि वही है, जो मात्रिक छंद की है, अर्थात् जिस वर्ण के उच्चारण में कम समय लगता है, वह लघु वर्ण और जिसमें अधिक समय लगता है, वह दीर्घ। मात्रिक छंद की किसी काव्य-पंक्ति में मात्राएँ समान होती है, पर उनका क्रम नहीं निश्चित रहता; जबकि वर्णिक छंद में उनका क्रम भी निश्चित रहता है। वर्णिक छंद के अंतर्गत सवैया और घनाक्षरी (कवित्त) भी आते हैं। सवैया में वर्ण के नीचे वर्ण आते हैं, लेकिन घनाक्षरी में केवल वर्णों की गणना की जाती है : इसकी एक पंक्ति में प्रायः ३१ वर्ण होते हैं और १६ पर यति होती है।  जैसे:  १ से १६ / १७ से ३१। उदाहरण: 
(३). भेजे मनभावन के, ऊधव के आवन के, सुधि ब्रज गाँवन में पावन जबै लगीं।
कहैं ‘रत्नाकर’ गुवारिनि की झौरि-झौरि, दौरि-दौरि नंद-पौरि आवन तबै लगीं।
उझकि-उझकि पद-कंजनि के पंजनि पै, पेखि-पेखि पाती, छाती छोहनि छबै लगीं।
हमकौ लिख्यो है कहा, हमकौ लिख्यो है कहा, हमकौ लिख्यो है कहा, पूछन सबै लगीं । (रत्नाकर)
वर्णिक छंदों की लय लघु और गुरु वर्णों के मिश्रण से बनती है, लेकिन किसी पंक्ति में जो वर्णों आते हैं, उन्हीं की पुनरावृत्ति से अगली पंक्तियाँ लयबद्ध होती हैं। इस प्रकार वर्णिक छंदों में वर्णों का क्रम निर्धारित रहता है। जब उनका क्रम बदलता है, तो लय भी बदल जाती है। दूसरे शब्दों में वर्ण के नीचे वर्ण आता है- लघु के नीचे लघु और दीर्घ के नीचे दीर्घ। हाँ, दो लघु मिलकर एक दीर्घ बन सकते हैं। इसी प्रकार, एक दीर्घ को दो लघु में विभाजित कर लिखा जा सकता है, पर यह नियम वहाँ नहीं लागू होता है जहाँ कोई अनिवार्य लघु हो, जैसे: ‘न’, अथवा कमल शब्द में- ‘क’। कमल को हम क+मल (IS) ही बोल सकते हैं, कम+ल (SI) नहीं । किसी शब्द में वर्णों की अपेक्षा मात्राएँ अधिक हो सकती है, जैसे: ‘आकाश’ शब्द में पाँच मात्राएँ हैं, लेकिन तीन वर्ण हैं- दो दीर्घ और एक लघु: आ-का-श (SSI)। इसी प्रकार, वाणी में चार मात्राएँ हैं, पर दो दीर्घ वर्ण हैं: वा-णी (SS)। इस प्रकार, आकाशवाणी शब्द में नौ मात्राएँ हैं और वर्ण हैं: पाँच । जिस प्रकार मात्राएँ लघु और गुरु होती हैं, उसी प्रकार वर्ण भी लघु और दीर्घ कहलाते हैं। इन्हें क्रमशः ह्रस्व और गुरु भी कहा जाता है। आठ वर्णिक छंदों की गणना को आचार्य भरत के गणसूत्र  'यमाताराजभानसलगा' ने बहुत आसान कर दिया है। पहले तीन अक्षरों से युग्म बना 'यमाता' (ISS) अर्थात् यगण । दूसरे अक्षर से प्रारंभ कर तीन अक्षरों से बना 'मातारा' (SSS) अर्थात् मगण। इसी क्रम में कुल ८ गण बनते गए। 
उर्दू छंद-विधान में गण को ' रुक्न' (बहुवचन अरकान) और छंद को 'बह्र' कहते हैं। इन आठों गणों को हिंदी के तीन अक्षरों से बने युग्म और उर्दू के अरकान की मदद से समझते हैं:
१. यगण: यमाता (ISS) फ़ईलुन्/फ़ऊलुन्/मफ़ेलुन्, २. मगण: मातारा (SSS) फ़ाईलुन्/मफ़ऊलुन्/फ़इलातुन्, ३. तगण: ताराज (SSI) मफ़ऊल, ४. रगण: राजभा (SIS) फ़ाइलुन्, ५. जगण: जभान (ISI) फ़ईल/फ़ऊल, ६. भगण: भानस (SII) फ़ाइल, ७. नगण: नसल (III) फ़इल/फ़उल, ८.सगण: सलगा (IIS) फ़इलुन्/फ़उलुन्। 
(४). विभिन्न वर्णों के युग्म: 
गणसूत्र की सीमा यह है कि इसमें हर युग्म तीन वर्णों का है, जबकि उर्दू छंद-विधान में, दो से लेकर पाँच वर्णों तक के युग्म हैं।
(१) दो वर्णों के युग्म: दो दीर्घ वर्णों को फ़ेलुन्; दीर्घ-लघु को फ़ाइ या फ़ात; लघु-दीर्घ को फ़ई या फ़ऊ; और दो लघु वर्णों को फ़इ या फ़उ।
(२) तीन वर्णों के युग्म: तीनों दीर्घ हों तो- मफ़ऊलुन् या, फ़ाईलुन्, तीनों लघु- फ़इल या, फ़उल; दीर्घ-लघु-लघु को-फ़ाइल। अन्य वर्णयुग्म उपर्युक्त तालिका के अनुसार।
(३) चार वर्णों के युग्म: IISS- फ़इलातुन्, ISSS- मुफाईलुन् या, फ़ऊलातुन्, SISS- फाइलातुन्, SSIS- मुस्तफ्-इलुन् या, हरगीतिका।
(४) पंचवर्णीय युग्म: IISIS- मुत-फ़ाइलुन्, SIISS- मुत-फइलातु ISIIS- मुफ़ा-इलतुन्, न, SISSS- मुत- फ़ईलातुन, ISISI- मुफाइलात, SSSSS को मुस्तफ़-ईलातुन, अथवा इसे दो हिस्सों में विभक्त कर ‘फेलुन-फ़इलातुन’ अथवा इसका उल्टा, ‘फ़इलातुन-फेलुन’ कहा जा सकता है। इसे तीन हिस्सों में विभक्त कर ‘फेलुन-फेलुन-फ़इ/फ़ा’ अथवा ‘फेलुन- फ़इ-फेलुन’ भी कहा जा सकता है।
वर्णिक छंदों की निर्मिति:
वर्णिक छंद दो प्रकार से निर्मित होते हैं।  किसी वर्ण-समूह (गण) या अरकान की आवृत्ति अथवा, कतिपय वर्ण-समूहों के मिश्रण से। दोनों ही स्थितियों में लय स्वतः उत्पन्न हो जाती है।
१. एक ही गण या कतिपय वर्ण-युग्म (अरकान) की आवृत्ति से बने छंद: उर्दू में ऐसे छंदों को 'मुफ़रद बह्र' कहा जाता है। उदाहरण:
१.१ यह गण विशेष या अरकान को दुहराने से बन जाता है, जैसे ‘यगण’ (यमाता) या ‘फ़ऊलुन’ यानी, लघु-दीर्घ-दीर्घ (ISS) को चार बार दुहराकर। इससे भुजंगप्रयात नामक छंद उर्दू में 'बहरे-मुतक़ारिब' बन जाता है, ISS ISS ISS ISS / यमाता-यमाता-यमाता-यमाता अथवा, फ़ऊलुन्-फ़ऊलुन्-फ़ऊलुन्-फ़ऊलुन्
भला भी कहा है, बुरा भी कहा है, / जो देखा सुना है, वही तो कहा है । -स्वरचित 
न छूटा तुम्हारा बहाना बनाना / न छूटा हमारा तुम्हें यूँ बुलाना।   -संजीव वर्मा 'सलिल'  
१.२ यगण में एक गुरु वर्ण जोड़कर यदि उसे चार बार दुहरा दिया जाए, तो एक नया छंद बन हो जाएगा। जैसे: यमातारा-यमातारा-यमतारा-यमातारा। इस अति प्रचलित छंद का नाम 'विधाता' है। उर्दू में इस वर्णयुग्म को मफाईलुन (ISSS) कहते हैं। इसे चार बार दुहराने अथवा, फ़ऊलुन, फ़ाइलुन, फेलुन को दुहराकर समझा जा सकता है।  उर्दू में इसे 'बहरे-हज़ज' कहते हैं। एक उदाहरण:  ISSS ISSS, ISSS ISSS  / यमातारा-यमातारा-यमातारा-यमातारा अथवा, मफ़ाईलुन, मफ़ाईलुन, मफ़ाईलुन, मफाईलुन
हमन हैं इश्क़ मस्ताना, हमन को होशियारी क्या? / रहें आज़ाद या जग में, हमन दुनिया से यारी क्या? -कबीर 
दियों में तेल या बाती नहीं हो, तो करोगे क्या? / लिखोगे प्रेम में पाती नहीं भी, तो मरोगे क्या? -सलिल 
१.३ इसी प्रकार, ‘रगण’ (राजभा) या ‘फ़ाइलुन्’, अर्थात् दीर्घ-लघु-दीर्घ (SIS) को चार बार दुहराने पर 'स्रग्विणी छंद' बन जाता है। उर्दू में इसे 'बहरे-मुतदारिक' कहा जाता है। उदाहरण: फ़िल्म हकीक़त के एक गाने का मुखड़ा— SIS SIS SIS SIS / राजभा-राजभा-राजभा-राजभा अथवा, फ़ाइलुन्-फ़ाइलुन्-फ़ाइलुन्-फ़ाइलुन्
कर चले हम फ़िदा जानो-तन साथियो! / अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो! -क़ैफ़ी आज़मी 
बोलिए तो सही बात ही बोलिए / राज की बात या झूठ ना बोलिए -सलिल 
१.४ यदि ‘रगण’ या ‘फाइलुन्’ (SIS) में एक दीर्घ (S) और जोड़ दिया जाए, तो उससे ‘फ़ाइलातुन्’ (SISS) अरकान बन जायेगा और इसे यदि चार बार रख दिया जाए, तो उससे एक अन्य (२८ मात्रिक यौगिक जातीय- सं.) छंद बन जाएगा जिसे उर्दू में बहरे-रमल कहते हैं। उदाहरण: SISS SISS SISS SISS / फ़ाइलातुन्- फ़ाइलातुन्- फ़ाइलातुन्- फ़ाइलातुन्
मुद्दतों से चल रहा यह सिलसिला है, / शिव को पीने को हमेशा विष मिला है। -स्वरचित 
साधना ने साध्य को पूजा हमेशा, हास पाया / कामना ने काम्य को चाहा हमेशा त्रास पाया  -सलिल
(इस छंद में १६-१२ पर यति और पदांत में SS हो तो सार, १४-१४ पर यति और पदांत में ISS हो तो विद्या छंद बन जायेंगे- सं.)
१.५ यदि ‘तगण’ (ताराज, SSI) में एक गुरु वर्ण जोड़ दिया जाए, अर्थात् दीर्घ-दीर्घ-लघु-दीर्घ (SSIS) को चार बार दुहरा दिया जाए, तो वह हरगीतिका छंद होगा। ‘हरगीतिका’ शब्द की चार आवृत्तियों (हरगीतिका-हरगीतिका-हरगीतिका-हरगीतिका) से भी यह छंद बन जाता है । उर्दू में इस अरकान को ‘मुस्तफ्इलुन्’ कहते हैं और इससे बनी बहर को 'बहरे-रजज़' SSIS SSIS SSIS SSIS मुस्तफ़इलुन्-मुस्तफ़इलुन्- मुस्तफ़इलुन्-मुस्तफ़इलुन् । ( भनु जी ने छंद प्रभाकर में हरिगीतिका की बह्र आदि गुरु होने पर ४ x मुस्तफ़अलन तथा आदि दो लघु होने पर ४ x मुतफ़ायलुन् बताई है -सं.)।  तुलसी का प्रसिद्ध राम-स्तवन इसी छंद में है:  
श्री रामचंद्र कृपाल भज मन हरण भव भय दारुणम्। / नव कंज लोचन, कंज मुख कर, कंज पद कंजारुणम् ।। -तुलसी 
पहली पंक्ति में ‘हरण’ (IS) आया है, जिसके कारण छंद-दोष उत्पन्न हो गया है। यहाँ दीर्घ-लघु (SI) आना चाहिए था, न कि लघु-दीर्घ (IS), परंतु ‘हरण’ का कोई अच्छा विकल्प न होने के कारण इसे इसी रूप में ग्रहण करना श्रेयस्कर है। (स्पष्ट है कि शिल्प अथवा विधान पर पर कथ्य को वरीयता दी जानी चाहिए किंतु इसका आशय यह कदापि नहीं है कि शिल्प अथवा विधान की अनदेखी की जाए। -सं.)
चंदा न जागा चाँदनी की बाँह में सोया रहा / थे ख्वाब देखे जो न पूरे हो सके खोया रहा।  -सलिल 
२. मिश्रित गणों अथवा वर्ण-समूहों से निर्मित कुछ छंद (उर्दू में मिश्रित छंदों को मुरक्कब बह्र कहा जाता है।)
२.१. भुजंगप्रयात छंद के अंत में आने वाले एक दीर्घ को यदि हटा दें, तो इससे हिंदी का भुजंगी छंद बन जाएगा। जैसे: ISS ISS ISS IS / यमाता-यमाता-यमाता-यमा अथवा, फ़ऊलुन्-फ़ऊलुन्-फ़ऊलुन्-फ़ऊ 
बजे नाद अनहद, सुनायी न दे, / है कण-कण में लेकिन, दिखायी न दे। -स्वरचित
पुजा है हमेशा यहाँ सत्य ही / रहा सत्य सापेक्ष ही धर्म भी। -सलिल 
२.२ यदि रगण (SIS) फ़ाइलुन यानी, दीर्घ-लघु-दीर्घ, में एक गुरु वर्ण और जोड़ दें, तो हिंदी छंद-विधान के अनुसार इसे रगण और एक दीर्घ कहेंगे, लेकिन उर्दू छंदविधान में इसे फ़ाइलातुन कहेंगे। 'फाइलातुन'को तीन बार दुहरायें और उसके बाद एक फ़ाइलुन (रगण) रख दें, तो हिंदी कविता का प्रसिद्ध २६ मात्रिक छंद, गीतिका बन जाएगा। उर्दू में इसे रमल कहते हैं, भले ही उसमें चारों फ़ाइलातुन् हों। गीतिका छंद का एक उदाहरण देखें: SISS SISS SISS SIS / फ़ाइलातुन्-फ़ाइलातुन्, फ़ाइलातुन्-फ़ाइलुन्
हे प्रभो! आनंददाता, ज्ञान हमको दीजिए, शीघ्र सारे दुर्गुणों को दूर हमसे कीजिए। -मैथिलीशरण गुप्त
काट डाले वृक्ष सारे पूर दी तूने नदी / खोद डाला है पहाड़ों को हुई गूंगी सदी। -सलिल 
२.३ गीतिका छंद में से यदि हम एक फाइलातुन निकाल दें, तो यह हिंदी का पीयूषवर्ष छंद बन जाएगा, जैसे— SISS SISS SIS /फ़ाइलातुन्-फ़ाइलातुन्, फ़ाइलुन्
अंक में आकाश भरने के लिए, / उड़ चले हैं हम बिखरने के लिए । -स्वरचित
वायदा पूरा कभी होता नहीं / देश मेरा चाहतें खोता नहीं -सलिल 
२.४ पीयूषवर्ष छंद में अगर एक फ़ाइलुन (दीर्घ-लघु-दीर्घ) जोड़ दें, तो वह राधा छंद बन जाएगा, जैसे: SISS SISS SIS SS / फ़ाइलातुन्-फ़ाइलातुन्, फ़ाइलुन्-फेलुन्
बीन भी हूँ; मैं तुम्हारी रागिनी भी हूँ, / कूल भी हूँ; कूलहीन प्रवाहिनी भी हूँ। -महादेवी
देश पे जो जान देता है हमेशा से / देश से वो मान पाता है हमेशा से -सलिल 
२.५ ISIS IISS ISIS IIS / जगण-भगण-तगण-रगण-सगण अथवा, मफ़ाइलुन्-फ़इलातुन्, मफ़ाइलुन्-फ़इलुन्
कहाँ तो तय था चिरागां हरेक घर के लिए, / कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए। -दुष्यन्त कुमार
कहा, कहा-न कहा, बात तो कही तुमने / सुना, सुना-न सुना, बात तो तही तुमने -सलिल 
२.६ SSI SIS IIS SIS IS / तगण-रगण- सगण-रगण, लघु-गुरु अथवा, फ़ेलुन्-मफ़ाइलात, मफ़ेलुन्-मफ़ाइलुन्। उर्दू में इस बहर का संक्षिप्त नाम है- मुज़ारे-अख़रब ।
दिल चीज़ क्या है, आप मेरी जान लीजिए, /बस एक बार मेरा कहा मान लीजिए। -शहरयार
क्या-क्या, कहाँ-कहाँ न सहा आपके लिए / मारा कहाँ-कहाँ न फिरा आपके लिए  -सलिल-
२.७ SIS SIS ISI IS / रगण-रगण-जगण, लघु-गुरु अथवा, / फ़ाइलातुन्-मफ़ाइलुन्-फ़इलुन्। उर्दू में इस बहर का संक्षिप्त नाम है- खफ़ीफ़ । विस्तृत नाम आगे दिया गया है।
ज़िंदगी से  बड़ी सजा ही  नहीं, / और क्या जुर्म है, पता ही नहीं। -नूर लखनवी
सत्य को सत्य ही कहा जिसने / आदमी आदमी रहा उसमें -सलिल
३. उर्दू छंद विधान की बहरें और उनके उदाहरण:
३.१ किसी वर्ण-युग्म (अरकान) की आवृत्ति से बने छंदों, अथवा मुफ़रद बहरों के निम्नलिखित / सात भेद होते हैं:-
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क्र.   बहर    हिंदी में सम-    आवृत्त अरकान   गण-नाम  उदाहरण S= II; वक्र
                  तुल्य छंद              का नाम                      अक्षर मात्रा पतन, गुरु
                                                                     को लघु पढ़ें, अन्यथा लयभंग 
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१. मुतक़ारिब   भुजंगप्रयात   फ़ऊलुन् (ISS)    यगण     ISS ISS ISS ISS
   किनारा वो हमसे किये जा रहे हैं, / दिखाने को दर्शन दिये जा रहे हैं। -निराला
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२. मुतदारिक    स्रिग्वणी       फ़ाइलुन् (SIS)    रगण     SIS SIS SIS SIS
 मेरी मुट्ठी में सूखे हुए फूल हैं, / ख़ुशबुओं को उड़ाकर हवा ले गयी। -बशीर बद्र
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३. हज़ज      विधाता   मुफ़ाईलुन्(ISSS)   यगण गुरु  ISSS ISSS ISSSI SSS
                                       हज़ारों ख्व़ाहिशें ऐसी कि हर ख्व़ाहिश पे दम निकले,                                                                                                               बहुत निकले मिरे अरमान, लेकिन फिर कम निकले। -ग़ालिब 
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४. रजज़          हरिगीतिका   मुस्तफ़्इलुन्   तगण गुरु      SSIS SSIS SSIS                                                       
                                               (SSIS)                                     SSIS
                                               वह पूर्व की सम्पन्नता, यह वर्तमान विपन्नता,
                 अब तो प्रसन्न भविष्य की आशा यहाँ उपजाइए। -मैथिलीशरण गुप्त 
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५. रमल           गीतिका       फ़ाइलातुन्     रगण, गुरु     SISS SISS SISS
                                             (SISS)                                    SISS                                                                                       
                                                   बीन की झंकार कैसी बस गयी मन में  हमारे,
                             धुल गयीं आँखें जगत की, खुल गये रवि-चन्द्र-तारे -निराला 
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६. कामिल                       मुतफ़ाइलुन्  सगण,लघु-गुरु     IISIS IISIS IISIS
                                             (IISIS)                                      IISIS
                                        कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से,
                    ये नये मिज़ाज का शह्’र है, ज़रा फ़ासले से मिला करो।-बशीर बद्र 
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७. वाफ़िर                        मुफ़ाइलतुन्     जगण, लघु- गुरु  ISIIS ISIIS ISIIS
                                          (ISIIS)                                           ISIIS
                                          ज़माने में कोई ऐसा नहीं कि जैसा वो ख़ूबरू है मेरा,                   
    न ऐसी अदा जहां में कहीं, न ऐसी हया जहां में कहीं। -कमाल अहमद सिद्दीक़ी
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नोट: (१) अपनी-अपनी श्रेणी की सभी बह्रें (उर्दू में बहूर) ‘मुसम्मन सालिम’ हैं। अतः, पहली बह्र का नाम हुआ ‘बह्रे-मुतक़ारिब-मुसम्मन-सालिम।’ अब इस पूरे पद का अर्थ समझते हैं: बह्रे= (....) की बहर (छंद)। मुतक़ारिब= अरकान (वर्ण-युग्म) का नाम। मुसम्मन= अष्टकोणीय या आठ बार, शे’र में ‘मुतक़ारिब’ अरकान (ISS) आठ बार आया है: चार बार पहली पंक्ति में और चार बार दूसरी में। सालिम= समूचा, अखंडित। ‘सालिम’ विशेषण है, जिसकी संज्ञा है- मुसल्लम; यानी, पूरा-का-पूरा, जैसे- मुर्ग़-मुसल्लम।
(२) उपर्युक्त तालिका की सभी बह्रें या बहूर ‘सालिम’ कहलाती हैं।
(३) उपर्युक्त तालिका की अगली बह्र का पूरा नाम होगा ‘बह्रे-मुतदारिक-मुसम्मन-सालिम। इसी क्रम में हर बह्र का नाम बदलता जाएगा।
(४) यदि किसी शे’र में किसी अरकान की आवृत्ति आठ बार से कम, अर्थात् चार अथवा, छः बार हुई हो तो, उसकी बहर ‘मुसम्मन’ के स्थान पर क्रमशः ‘मुरब्बा सालिम’ और ‘मुसद्दस सालिम’ के रूप में जानी जाएगी, जैसे- निम्न शे’र में ‘मुतक़ारिब’ रुक्न (ISS) चार बार (दोनों पंक्तियों में) आए हैं। अतः इसकी बहर का नाम होगा 'बह्रे-मुतदारिक-मुरब्बा-सालिम'। ISS ISS वही तो कहा है, / जो देखा-सुना है।
(५)  निम्नलिखित शे’र बह्रे-मुतदारिक-मुसद्दस-सालिम कहलाएगा, क्योंकि इसमें छः बार मुतदारिक रुक्न आया है: ISS ISS ISS  अगर जान जाती है जाए, / मगर सच को सच हम कहेंगे ।
(६)यदि किसी अरकान की दस आवृत्तियाँ हों, तो वह ‘दुहुम सालिम’ कहलायेगा। ग़ज़ल के शे’र में ऐसी सोलह आवृत्तियाँ मान्य हैं।
३.२ विभिन्न वर्ण-युग्मों से बने मिश्रित छंद या ‘मुरक्कब’ बह्रें: मिश्रित वर्ण-युग्म या, विभिन्न अरकान से जो बह्रें बनती है,। उर्दू अरूज़ में इन्हें ‘मुरक्कब’ बह्र कहा जाता है। अरूज़ के लिहाज से निम्नलिखित ‘मुरक्कब बह्रें’ निम्नलिखित १२ प्रकार की होती हैं। इनसे संबंधित अश'आर भी दिये जा रहे हैं। ये अश'आर बहर में प्रयुक्त अरकान को दर्शाने की दृष्टि से ही देखे जाने चाहिए, शेरियत के लिहाज से नहीं। इन बह्रों में अश'आर कम ही मिलते हैं, क्योंकि इनमें ज़िहाफ लगी बह्रों की अपेक्षा लय कम होती है।
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क्र.  बहर का नाम            अरकान                   उदाहरण: दो लघु II=एक गुरु S
                                    जिन वर्णों की मात्राएँ गिरी हैं, वे वक्र (itallic) दर्शित हैं
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१.      तबील           फ़ऊलुन्-मुफ़ाईलुन्   ISS ISSS, ISS ISSS, तुम्हारी जुदाई
                         २x(मुतक़ारिब+हज़ज)    में लबों पर दम आया है / कोई से यों
                                                            मसीहा कब आया है। - सफ़ी अमरोही
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२.      क़रीब        मुफ़ाईलुन्-मुफ़ाईलुन्-       ISSS ISSS SISS, न यह समझो
                       फ़ाइलातुन् (२ हज़ज+रमल)    रहा हूँ केवल घरों में, / उड़ानें भी
                                                                    रही हैं टूटे परों में।- कुँअर बेचैन
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३.   मुज़ारिअ   मुफ़ाईलुन्-फ़ाइलातुन्    ISSS SISS, ISSS SISS, कभी आती
       (मुज़ारे)     २ x (हज़ज+रमल)  याद उनकी, कभी आती ही नहीं है,/इलाही,
                                      क्या याद भी ख़्वाब-सी होती बेवफ़ा है?-राज पाराशर
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४.        मदीद      फ़ाइलातुन्-फ़ाइलुन्*     SISS SIS, पूजता हूँ बस उसे, / अब
                            (रमल+मुत-दारिक)          वो पत्थर है तो है। - विज्ञान व्रत
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५.    जदीद   फ़ाइलातुन्-फ़ाइलातुन्-  SISS SISS SSIS, ले गया वो बेमुरव्वत
                 मुस्तफ़्इलुन(२रमल+रजज) आरामे-दिल,/कुछ नहीं बाक़ी रहा अब
                                                                       जुज़नामे-दिल।- राज पाराशर
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६.  ख़फ़ीफ़  फ़ाइलातुन्-मुस्तफ्इलुन्-फ़ाइलातुन्  SISS SSIS SISS,  जल गयी
                   (रमल+रजज़+ रमल)                       निःसंदेह अँगुली हमारी,/दीप
                                                  को लेकिन ज्योतित कर  दिया है। - स्वरचित                       
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७.     मुशाकिल     फ़ाइलातुन्-मुफाईलुन्-       SISS ISSS ISSS, इश्क़ क्या है,
                         मुफाईलुन् (रमल+2हज़ज)  नहीं मालूम ये यारो, गो कटी इश्क़
                                                                 में ही ज़िन्दगी मेरी।- राज पाराशर
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८.       मुज़ास     मुस्तफ्इलुन-फाइलातुन्    SSIS SISS, उसको भला कौन मारे,   
        (मुज़्तस)          (रजज़+रमल)             / जीना जिसे आ गया हो।-स्वरचित
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९.       वसीत       मुस्तफ्इलुन्-फाइलुन्*    SSIS SIS, SSIS SIS, जाने-जिगर,
         (ख़सीत)        रजज़+मुतदारिक        जाने-मन, तुझको है मेरी क़सम, / तू
                                          जो न मुझको मिला, मर जाऊँगा मैं सनम।– समीर
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१०.   मुक्तज़िब   मफ़ऊलातु-मुस्तफ्इलुन्  SSSI SSIS, SSSI SSIS,जो भी ठानिये
                                                              दोस्तो! वह कर गुज़रिये आज ही, कल
                                 का क्या ठिकाना, समय की अनुकूलता हो न हो! -स्वरचित
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११.    मुंसरिह        मुस्तफ्इलुन्-मफ़ऊलातु   SSIS SSSI, SSIS SSSI, मिलकर
       (मुंसरिज)                  गले रो लो मीत, अपने नयन धो लो मीत, कितने गिरे
                                              आँसू आज, उनको ज़रा तोलो मीत। -कुँअर बेचैन                           
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१२.    सरीअ         मुस्तफ्इलुन्-                 SSIS SSIS SSSI, मैं भी सुनूँ, तू भी
        (सरीअ:)      मुस्तफ्इलुन्-मफ़ऊलातु   सुने ऐसा गीत, / यदि हो सके मुझको
                                                                             सुना मेरे मीत। -कुँअर बेचैन
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* इन अरकान की भी प्रायः दो आवृत्तियाँ होती हैं। उदाहरण के शे’र में केवल मुरब्बा (चार अर्कान) ही प्रयुक्त हैं।
३.३ ज़िहाफ़ लगी (परिवर्तित अरकान से बनी) बह्रें और उनके भेद उपर्युक्त मुफ़रद बह्रों में जब किसी अरकान को परिवर्तित रूप में रखा जाता है, तो उसे ‘मुज़ाहिफ़’ बह्र (ज़िहाफ़ लगी बह्र) कहते हैं। जैसे: उपर्युक्त ‘मुतक़ारिब’ नामक मुफ़रद बहर के ‘फ़ऊलुन्’ (ISS) के लघु-गुरु-गुरु को बदलकर ‘लघु-गुरु-लघु’ अथवा ‘गुरु-लघु-लघु’ कर दिया जाए तो वे क्रमशः नए अरकान बन जाएँगे।  जैसे: ‘फ़ऊल’ (ISI) या ‘फेलन’ (SII). परिवर्तन की इस व्यवस्था को उर्दू में ‘ज़िहाफ़’ कहते हैं। हिंदी के वर्णिक छंदों में इस प्रकार के परिवर्तन संस्कृत-काल से चले आ रहे हैं। ज़िहाफ यों तो ४८ प्रकार के हैं किंतु निम्न १५-२० ज़िहाफ़ ही प्रचलित हैं:
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क्रमांक  मूल अरकान  परिवर्तित अरकान       ज़िहाफ     मुजाहिफ़ अरकान
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१.  फ़ऊलुन् (ISS)          १-फ़ऊल (ISI)             क़ब्ज़            मक्बूज़
     (बह्रे- मुतक़ारिब)      २-फ़ेलन (SII)             सलम           अस्लम
                                    ३-फ़ऊ (IS)                 क़स्र              मक्सूर
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२. फ़ाइलुन् (SIS)          १-फ़ेलुन् (SS)             १. कत्अ         मक्तूअ
     (बह्रे-मुतदारिक)       २-फ़े (S)                    २. हज़ज         महज़ूज
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३. मुफ़ाईलुन् (ISSS)     १-मफ़ऊल (SSI)          १. ख़र्ब           अख़रब
.    (बह्रे-हज़ज)              २-फ़ऊलुन् (ISS)         २. हज्फ़          महज़ूफ़
                                    ३-मफ़ाईल (ISSI)        ३. क़फ़           मक़फ़ूफ़
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४. मुस्तफ्इलुन (SSIS)  १. मुफ़ाइलुन् (ISIS)     ख़ब्न              मख़्बून
    (बह्रे-रजज़)
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५. फ़ाइलातुन् (SISS)      १-फ़ाइलुन् (SIS)         हज्फ़             महज़ूफ़
     (बह्रे-रमल)                 २-फ़ाइलातु (SISI)      क़फ़              मक़फ़ूफ़
                                       ३-फ़इलातु (IISI)       शक्ल             मश्कूल
                                       ४-फ़इलातुन्(IISS)      ख़ब्न            मख़बून
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६. मुतफ़ाइलुन्(IISIS)     मुस्तफ्इलुन् (SSIS)    इज़्मार          मुज़्मर
    (बह्रे-कामिल)
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७ मुफ़ाइलतुन् (ISIIS)      मुफ़ाईलुन् (ISSS)         अस्ब             मासूब
    (बह्रे-वाफ़िर)
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८ मफ़ऊलातु (SSSI)*         मफ़ऊल (SSI)           रफ़अ               मरफ़ूअ
    (बह्रे-मुक्तज़िब)
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* यह ‘मुफ़रद’ बह्र का हिस्सा नहीं हैं, क्योंकि इसके अंत में हरकत वाला अक्षर ‘तु’ (I) आया है। इसे अगर शेर के ‘अरूज़’ या जर्ब पर, अर्थात् शेर के आख़िरी अरकान में रख देंगे, तो प्रवाह-भंग हो जायेगा। शेष सभी के ‘अंत में साकिन’ हैं।
३.४ ज़िहाफ़ लगी बह्र के उदाहरण: अब ज़िहाफ़ लगी बहूर में कुछ अशआर देखें। जिन वर्णों की मात्रा गिरी है, वे वक्र (itallic) दर्शित हैं:
(१) फ़ऊलुन्-फ़ऊलुन्-फ़ऊलुन्-फ़ऊ  ISS ISS ISS IS  दिखाई दिये यूँ कि बेख़ुद किया, / हमें आपसे भी ज़ुदा कर चले। - मीर
इस बह्र में तीन ‘फ़ऊलुन्’ और एक ‘फ़ऊ’ है, यदि चारों ‘फ़ऊलुन्’ होते तो इसका नाम होता ‘बहरे-मुतक़ारिब- मुसम्मन-सालिम’। अंतिम ‘फ़ऊलुन्’ की जगह ‘फ़ऊ’ है क्योंकि इसमें ‘क़स्र’ नामक जिहाफ़ लगा है। इससे ‘फ़ऊलुन्’ अपने मूल रूप से बदलकर ‘फ़ऊ’ हो गया है। इस परिवर्तित अरकान को ‘मक्सूर’ कहा गया है। इस प्रकार, इस बह्र का नाम हुआ मुतक़ारिब-मुसम्मन-मक्सूर। ‘मुतक़ारिब’ मूल बह्र का नाम; ‘मुसम्मन’ माने शेर में आठ अरकान, और ‘मक्सूर’, अर्थात् ‘मुज़ाहिफ़’ नामक अरकान। हिंदी में इसे ‘भुजंगी’ छंद कहते हैं।
(२) मुफ़ाईलुन्-मुफाईलुन्-फ़ऊलुन् ISSS ISSS ISS ये माना जिंदगी है चार दिन की, / बहुत होते हैं यारो! चार दिन भी। -फ़िराक़ गोरखपुरी
इस बह्र में दो ‘मुफाईलुन्’ और एक ‘फ़ऊलुन्’ है। यदि तीनों ‘मुफ़ाईलुन्’ होते, तो इसका नाम होता- बह्रे-हज़ज- मुसद्दस-सालिम लेकिन, अंतिम ‘मुफाईलुन्’ की जगह ‘फ़ऊलुन्’ आया है, क्योंकि इसमें ‘हज्फ़’ नामक जिहाफ़ लगा है। इससे ‘मुफाईलुन्’ बदलकर ‘फ़ऊलुन्’ हो गया है। इसका परिवर्तित अरकान ‘महज़ूफ़’ है। इसलिए, बह्र का नाम हुआ: हजज-मुसद्दस-महज़ूफ़।
(३) फ़ाइलातुन्-फ़ाइलातुन्-फ़ाइलातुन्-फ़ाइलुन् SISS SISS SISS SIS चुपके-चुपके रात-दिन आँसू बहाना याद है, / हमको अपनी आशिक़ी का वो ज़माना याद है। - हसरत मोहानी
* * *
हम अभी से क्या बताएं, क्या हमारे दिल में है, / देखना है ज़ोर कितना बाज़ु-ए-क़ातिल में है। - रामप्रसाद ‘बिस्मिल’
इस बह्र में क्रमशः तीन ‘फ़ाइलातुन्’ हैं और एक ‘फ़ाइलुन्’ है। अतः यह मुजाहिफ़ (परिवर्तित) बह्र हुई। इसमें भी ‘हज्फ़’ नामक ज़िहाफ लगा है, जिसका नाम है- महज़ूफ़ । अतः, इस बह्र का नाम हुआ- ‘रमल-मुसम्मन-महज़ूफ़’। हिंदी में इसे ‘गीतिका’ छंद कहा जाता है। इसमें यदि एक ‘फ़ाइलातुन्’ कम हो जाए, तो यह ‘पीयूषवर्ष’हो जाएगा। उर्दू में ‘गीतिका’ छंद का नाम होगा- ‘बह्रे-रमल-मुसद्दस-महज़ूफ़’, क्योंकि इसमें कहे गये शे’र में छः अरकान हैं।
(४) मफ़ऊल-मफ़ाईलुन्, मफ़ऊल-मफ़ाईलुन् SSI ISSS SSI ISSS इक लफ़्ज़े-मुहब्बत है, अदना ये फ़साना है, / सिमटे तो दिले आशिक़, फैले तो ज़माना है। - जिगर मुरादाबादी इस बहर का नाम है- हज़ज-मुसम्मन-अख़रब। हज़ज में आठ अरकान है। हज़ज-मुसम्मन- सालिम में चार ‘मफ़ाईलुन्’ होते हैं, मगर यहाँ दो ‘मफ़ाईलुन्’ की जगह, ‘मफ़ऊल’ आये हैं, जो ‘खर्ब’ ज़िहाफ से ‘अखरब’ के रूप में हैं ।
(५) फ़ाइलातुन्-मुफ़ाइलुन्-फ़ेलुन् SISS ISIS SS दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है, / आख़िर इस दर्द की दवा क्या है! - ग़ालिब
(‘आखिर इस’ को बह्र में लाने के लिए ‘आखिरिस’ पढना पड़ेगा, लेकिन यह अनुमन्य है।)
अथवा, कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी, / यों कोई बेवफ़ा नहीं होता। - बशीर बद्र
यह अति-प्रचलित बह्र है। इसके मिसरे में तीन अरकान होते हैं ‘फ़ाइलातुन्- मुफ़ाइलुन्-फ़ेलुन्’, जो मिश्रित (मुरक्कब) बहूर में से एक है। इसका नाम है ‘खफीफ़’। बह्र में ‘ख़ब्न’ नामक ज़िहाफ़ लगने से इसका नाम पड़ा  बह्रे-खफीफ़-मुसद्दस-‘मखबून।’
(६) अब तक केवल एक ज़िहाफ और उससे बने अरकान की बात की गयी है। निम्न बह्र में दो जिहाफ़ लगे हैं-- ‘ख़ब्न’ और ‘कफ्फ़’। इसे ‘सकल’ ज़िहाफ कहा जाता है और इससे ‘मस्कूल’ नामक मुज़ाहिफ़ अरकान बनता है, जैसे: फ़ऊल-फ़ेलुन्, फ़ऊल-फ़ेलुन् ISS SS ISS SS तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो, / क्या ग़म है जिसको छुपा रहे हो! -क़ैफ़ी आज़मी (‘तुम इतना’ को ‘तुमितना’ (ISS) पढ़ा या बोला जाएगा।)
(७) फ़ेलुन्-मफाइलात-मफैलुन्-मफ़ाइलुन् SS ISISI ISS ISIS दिल चीज़ क्या है आप मेरी जान लीजिए, / बस एक बार मेरा कहा मान लीजिए। / इस अंजुमन में आपको आना है बार-बार, / दीवारो-दर को ग़ौर से पहचान लीजिए। - शहरयार
(छंद की दृष्टि से दूसरे शेर के मिसरे में प्रयुक्त शब्दांश- ‘बार-बार’ में एक मात्रा बढ़ी हुई है। प्रयुक्त बह्र के यहाँ, ‘बारबा’ आना चाहिए, लेकिन पहले मिसरे के अंत में एक मात्रा अधिक लगाने की छूट है।)
(८) मफाइलात-मफैलुन्, मफ़ाइलात फ़ऊ ISISI ISS ISIS IIS कहाँ तो तय था चिराग़ां हरेक घर के लिए, / कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए। - दुष्यंत कुमार
(९) मफ़ऊल-फ़ाइलातु-मफ़ाईल-फ़ाइलुन् SSI SISI ISSI SIS मिलती है ज़िंदगी में मुहब्बत कभी-कभी, / होती है दिलबरों की इनायत कभी-कभी। - साहिर लुधियानवी
* * *
दो-चार बार हम जो ज़रा हँस-हँसा लिये, सारे जहाँ ने हाथ में पत्थर उठा लिये। - कुंअर बेचैन
(१०) मफ़ाइलातु-मफ़ैलुन्-मफ़ाइलुन्-फेलुन् ISISI ISS ISIS SS मिले न फूल तो काँटों से दोस्ती कर ली, / इसी तरह से बसर हमने ज़िंदगी कर ली। - इन्दीवर
नोट : (१) दोनों (मुरक्कब और मुजाहिफ़) बह्रों में प्रमुख अंतर यह है कि मुरक्कब में अरकान का मिश्रण रहता है, जबकि मुजाहिफ़ में अरकान की सूरत बदल जाती है।
(२) किसी बह्र का नाम जानना उतना ज़रूरी नहीं है, जितना कि उसके अर्कानों से बनी लय को जानना-समझना।
४. मुक्तछंद कविता में भी छंद  की उपस्थिति:  मुक्तछन्द काव्य कोई नया नहीं है। वह तो संस्कृत और वैदिक साहित्य में मिलता है। कविता किसी नदी की भाँति अनवरत बहती रहती है। जिस प्रकार बड़ी नदी छोटी-छोटी नदियाँ मिलती रहती हैं, उसी प्रकार कविता की मुख्य धारा में छोटी-छोटी काव्य-धाराएँ मिलती रहती हैं और उसका कथ्य और शिल्प बदलता और समृद्ध होता रहता है। कबीर के यहाँ यदि सधुक्कड़ी भाषा है, तो सूरदास के यहाँ ब्रज और तुलसी के यहाँ अवधी । रीतिकाल की ब्रज भाषा थोड़े-बहुत परिवर्तन के बाद भारतेंदु युग में खड़ी बोली बनी। वस्तु की दृष्टि से भक्ति, अध्यात्म, और राष्ट्रीय चेतना, छायावाद, मानव की मुक्ति-चेतना और फिर जनचेतना,  कितने ही रूप दिखायी पड़ते हैं।... अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ का ‘प्रियप्रवास’ १९१४ में रचा गया। यह खड़ी बोली का पहला महाकाव्य माना जाता है, जिसमें अतुकांत छंदों का प्रयोग हुआ है:
अधिक और हुई नभ-लालिमा, / दश दिशा अनुरंजित हो गयी;
सकल पादप-पुंज-हरीतिमा / अरुणिमा-विनिमज्जित-सी हुई।
उक्त कविता बारह वर्णीय ‘द्रुत बिलंबित (जगती)’ छंद में हैं । छंद हेतु निर्धारित गणों का पालन भी हुआ है, क्योंकि सभी चारों पंक्तियों में क्रमशः ‘नगण, भगण, भगण’ और ‘रगण’ (III, SII, SII, SIS) आये हैं; केवल तुकांत की छूट ली गयी है। तुकांत का आग्रह न तो संस्कृत काव्य (श्लोक, अनुष्टप आदि) में है और न ही वैदिक छंदों (ऋचाओं) में। इस प्रसंग में एक श्लोक देखिए, जो तुलसी के रामचरितमानस के प्रारंभ में दिया गया है । श्लोक चार चरणों का छंद होता है, जिसके प्रत्येक चरण में आठ वर्ण होते हैं, पर वे अगली पंक्ति में सवैया या ग़ज़ल की भाँति अपने स्थान पर अडिग नहीं रहते। घनाक्षरी की भाँति केवल उनके वर्ण गिने जाते हैं।
वर्णानामर्थसंघानां, रसानां छन्दसामपि। /  मंगलानां च कर्त्तारौ, वन्दे वाणीविनायकौ।।
जयशंकर ‘प्रसाद’ ने भी १९१८  में ‘झरना’ नामक रचना में खड़ी बोली में तुकांत से मुक्ति पा ली, यद्यपि छंद का पालन उन्होंने अवश्य किया, पर वह मुक्त छंद में है, अर्थात् एक पंक्ति के गण कुछ हैं, तो दूसरी की कुछ, पर उनमें लय है। उदाहरण के लिए दो पंक्तियों की तक्तीअ
(गणना) कर दी गई है। प्रस्तुत है झरना के प्रथम प्रभात का एक अंश:
SS SS ISISS SIS (मगण, रगण, यगण, रगण = फ़ेलुन्-फ़ेलुन्-मुफ़ाइलातुन्-फ़ाइलुन्) वर्षा होने लगी कुसुम मकरंद की,
SII SS SII SS SIS (भगण, मगण, सगण, तगण, दीर्घ = फ़ाइल, फ़ेलुन्, फ़ाइल, फ़ेलुन्, फ़ाइलुन्) प्राण पपीहा बोल उठा आनंद में,
कैसी छवि ने बाल अरुण-सी प्रकट हो / शून्य हृदय को नवल राग रंजित किया।
सद्यस्नात हुआ मैं प्रेम सुतीर्थ में, / मन पवित्र उत्साहपूर्ण-सा हो गया,
विश्व, विमल आनंदभवन-सा हो गया, / मेरे जीवन का वह प्रथम प्रभात था।
‘परिमल’ की भूमिका में निराला कहते हैं, “मनुष्यों की मुक्ति की तरह कविता की भी मुक्ति होती है। मनुष्यों की मुक्ति कर्मों के बंधन से छुटकारा है, और कविता की मुक्ति छंदों के शासन से अलग हो जाना। जिस तरह मुक्त मनुष्य कभी किसी तरह भी दूसरे के प्रतिकूल आचरण नहीं करता, उसके तमाम कार्य औरों को प्रसन्न करने के लिए होते हैं: फिर भी स्वतन्त्र, इसी तरह कविता का भी हाल है। जैसे बाग़ की बँधी और वन की खुली हुई प्रकृति- दोनों ही सुंदर हैं पर दोनों के आनंद तथा दृश्य दूसरे-दूसरे हैं।”
अपनी बात के समर्थन में वे ऋग्वेद और यजुर्वेद की ऋचाओं का उल्लेख करते हैं, जो मुक्त छंद में हैं और उनकी पंक्तियों में न तो वर्ण समान हैं और न ही उनका क्रम! उनके अनुसार, “मुक्तछंद तो वह है, जो छंद की भूमि में रहकर भी मुक्त है।” उनके ‘परिमल’ के तीसरे खंड में इसी प्रकार की कविताएँ हैं। उसकी भूमिका में वे स्वयं कहते हैं, “...मुक्तछंद का समर्थक उसका प्रवाह ही है। वही उसे छंद-सिद्ध करता है, और उसका नियम-राहित्य उसकी मुक्ति।” समर्थन में वे अपनी कविता, ‘जुही की कली’ की कुछ पंक्तियाँ उद्धृत करते हैं। उद्धरण को उर्दू के अरकान के ज़रिये आसानी से समझा जा सकता है—
विजन-वन-वल्लरी पर (ISS SISS - फ़ऊलन् फ़ाइलातुन् ) / सोती थी सुहाग-भरी (SS SIS IIS - फेलुन फ़ाइलुन् फ़इलुन्)
स्नेह-स्वप्न-मग्न अमल-कोमल-तन-तरुणी (SISI SII SSSS SS - फ़ाइलात फ़ाइल मफ़ईलातुन् फेलुन्)
जुही की कली (ISS IS - फ़ऊलुन् फ़ऊ ) दृग बन्द किये- शिथिल पत्रांक में। (SSI ISIS ISIS - मफ़ऊल मफ़ाइलुन्म फ़ाइलुन्)
४.१ मुक्तछंद क्यों?
कभी-कभी वेदना, विसंगति या त्रासदी की अभिव्यक्ति में पारम्परिक छंद का बंधन आड़े आने लगता है, तो कवि उससे मुक्ति चाहता है। वह स्वच्छंद होकर कुछ रचना चाहता है। इसलिए पारंपरिक छंदों को तोड़ने में कुछ बुराई नहीं। लेकिन छंद से कविता का नाता नहीं टूट सकता। उसका स्वरुप कुछ भी हो सकता है। कल्पना कीजिए कि निराला, ‘तोड़ती पत्थर’ या ‘कुकुरमुत्ता’ को यदि दोहा, चौपाई, सवैया-कवित्त जैसे छंद में रचते, तो क्या उसमें वही आस्वाद होता, जो उनके मुक्तछंद रूप में है! मुक्तछंद होने के बावज़ूद ये कविताएँ कतिपय वर्ण-युग्मों पर आधारित हैं और यति-गति से बद्ध हैं।
तोड़ती पत्थर
वह तोड़ती पत्थर। SSIS SS मुस्तफ्-इलुन, फ़ेलुन
देखा उसे मैंने/ इलाहाबाद के पथ पर SSIS SS/ ISSS ISSS मुस्तफ्-इलुन, फ़ेलुन, मफ़ाईलुन, मफ़ाईलुन
वह तोड़ती पत्थर । SSIS SS मुस्तफ्-इलुन, फ़ेलुन
कोई न छायादार SSIS SSI मुस्तफ्-इलुन, मफ़ऊल
पेड़ वह जिसके तले/ बैठी हुई स्वीकार, SISS SISS SIS SSI फ़ाइलातुन, फ़ाइलातुन, फ़ाइलुन, मफ़ऊल
श्याम तन, भर बँधा यौवन, SISS ISSS फ़ाइलातुन, मफ़ाईलुन
नत नयन, प्रिय-कर्म-रत मन, SISS SISS फ़ाइलातुन, फ़ाइलातुन,
गुरु हथौड़ा हाथ, SISS SI फ़ाइलातुन, फ़ातु
करती बार-बार प्रहार : SS SIS IISI फेलुन, फ़ाइलुन, फ़इलातु
सामने तरु मालिका अट्टालिका, प्राकार। SISS SISS SISS SI फ़ाइलातुन, फ़ाइलातुन, फ़ाइलातुन, फ़ातु
इसी क्रम में एक रचना और सुनिए, जो नई कविता के प्रसिद्ध कवि, शमशेर बहादुर सिंह की है—
बात बोलेगी
बात बोलेगी, हम नहीं SISS SSIS फ़ाइलातुन, मुस्तफ्इलुन्
भेद खोलेगी, बात ही। SISS SSIS वही
सत्य का मुख SISS फ़ाइलातुन् /  झूठ की आँखें SIS SS फ़ाइलुन्, फ़ेलुन्
क्या देखें! SSS मफ़ऊलुन् /  सत्य का रुख़ SISS फ़ाइलातुन्
समय का रुख़ है : ISS SS फ़ऊलुन्, फ़ेलुन् / अभय जनता को ISS SS वही
सत्य ही सुख है, SIS SS फ़ाइलुन्, फ़ेलुन् / सत्य ही सुख। SISS फ़ाइलातुन् ।
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