कुल पेज दृश्य

rohitashva asthana लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
rohitashva asthana लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 25 फ़रवरी 2018

dr. rohitashva asthana

लेख:
हिंदी ग़ज़ल के शलाका पुरुष डॉ. रोहिताश्व अस्थाना 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' 
*
डॉ. रोहिताश्व अस्थाना के लिए इमेज परिणामविश्व वाणी हिंदी ने सुरवाणी संस्कृत से शब्द-भण्डार, व्याकरण और पिंगल ग्रहण कर उसे अपने रंग में ढाल लिया है। फलत:, हिंदी को छंदों का विराट कोष मिल गया है। संस्कृत के अनुष्टुप छंदों में कम-अधिक ध्वनि-खण्डों के श्लोकों को सस्वर पढ़ने की जो वादिक परंपरा है वैसी विश्व की किसी अन्य भाषा में नहीं है। द्विपदिक श्लोकों में लघु-गुरु उच्चार के आधार को सामान वर्ण के तुकांत में परिवर्तित कर गीति-काव्य की जिस विधा ने लोकप्रियता पाई उसे फारसी में ग़ज़ल कहा गया। संस्कृत के छंदों को उच्चार के अनुसार फारसी शब्द-ध्वनियों में ढालकर रुक्न और बह्र का विकास हुआ। कहते हैं इतिहास खुद को दोहराता है। देश के पराभव काल में आक्रान्ता मुग़ल सैनिकों और पराजित भारतीय सैनिकों, श्रमिकों, किसानों के मध्य बात-चीत से क्रमश: लश्करी (सैन्य शिविर में बोले जाने वाली भाषा), रेख्ता ( फारसी प्रधान मिश्रित भाषा) और उर्दू (छावनी में बोली जानेवाली भारतीय शब्द प्रधान भाषा) का विकास हुआ। मुग़ल सत्ता का प्रिय बनने के लिए उनकी भाषा सीखने का दौर आया तो फ़ारसी की अन्य काव्य विधाओं की तुलना में सरल होने के कारण ग़ज़ल का भारतीयकरण हुआ किंतु उर्दू विद्वानों ने इसे पसंद नहीं किया। ग़ालिब ग़ज़ल को 'कोल्हू का बैल' और 'तंग गली' जैसे विशेषणों से नवाज़ते रहे। विधि कि विडम्बना यह कि ग़ालिब ने जो गज़लें हलके-फुल्के मनोरंजन के लिए लिखीं उनसे वे जाने जा रहे हैं जबकि उनके द्वारा किये गए गंभीर कार्य की चर्चा नहीं होती।  

भारतीय ग़ज़ल अरबी-फारसी के प्रभाव से धीरे-धीरे मुक्त होकर उर्दू ग़ज़ल के रूप में विकसित हुई जिसका विधान (रुक्न, बह्र, काफिया-रदीफ़ आदि संबंधी नियम और शब्दावली) आज भी मूल से प्रेरित है। स्वतंत्रता के आन्दोलन में हिंदी द्वारा निभाई गयी भूमिका ने उसे देश की सर्वाधिक लोकप्रिय भाषा बना दिया। फलत: साहित्य की अन्य विधाओं की तरह ग़ज़ल ने भी हिंदी को आत्मसात कर लिया। हिंदी ग़ज़ल को हाशिए से पुख्य पृष्ठ पर लाने में  महती भूमिका निभानेवाले डॉ. रोहिताश्व अस्थाना समर्पण की अद्भुत मिसाल हैं। १ दिसंबर १९४९ को अटवाअली मरदानपुर जिला हरदोई उ. पर. में जन्में रोहिताश्व जी ने एम. ए. हिंदी, बी. एड. करने के पश्चात्अवध की सरजमीं पर लखनऊ के समीप हरदोई जैसे कसबे में रहते हुए भी बाल साहित्य के साथ-साथ हिंदी ग़ज़ल में महत्वपूर्ण रचनाओं का प्रणयन तथा शोध परक कार्य किया। उनके शोधकार्य 'हिंदी ग़ज़ल: उद्भव और विकास' १९८५ में पूर्ण तथा १९८७ में सुनील साहित्य सदन, दरियागंज नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित हुआ। 

शोध ग्रन्थ के प्रथम अध्याय में काव्य में ग़ज़ल के स्थान, ग़ज़ल की व्युत्पत्ति, परिभाषा, व्यापकता, प्रकृति, स्वरूप, प्रेमाभिव्यक्ति, तीवारानुभुती, संप्रेशानीयता, मैद्रिगाल तथा सोंनेट छंदों से सामीप्य, नव नामकरण आदि बिन्दुओं पर बिना किसी पूरवाग्रह के विचार किया गया है। अध्याय २ में हिंदी ग़ज़ल की पृष्ठ भूमि में उर्दू-फारसी ग़ज़लों की बुनावट, भाषा, शिल्प-विधान, संक्षिप्त इतिहास, अन्य काव्य शैलियों से अंतर आदि महत्वपूर्ण विषयों पर सुस्पष्ट जानकारी हैं। तृतीय अध्याय में हिंदी में ग़ज़ल विधा के औचित्य, उर्दू ग़ज़ल के प्रभाव, हिंदी ग़ज़ल के जन्मदाताओं (खुसरो, कबीर) व काल का निर्धारण जैसे प्रसंगों पर प्रमाणिक जानकारी उपलब्ध कराई की गई है। चौथे अध्याय में हिंदी ग़ज़ल के वर्ण्य विषय, हिंदी ग़ज़ल में जीवन-दर्शन, विकास-यात्रा तथा काल विभाजन जैसे महत्वपूर्ण बिंदु समाहित हैं। पाँचवे अध्याय में आलोचना के निकष पर हिंदी ग़ज़लकारों डॉ. बशीर बद्र, अमीक हनफी, बेकल उत्साही, शमशेर बहादुर सिंह,  दुष्यंत कुमार, सूर्यभानु गुप्त, चंद्रसेन विराट, शेरजंग गर्ग, रामावतार त्यागी, बालस्वरूप रही, रूद्र काशिकेय, आदि के ग़ज़ल साहित्य का सम्यक-समीचीन विश्लेषण करने के साथ उस समय हिंदी ग़ज़ल के नव हस्ताक्षरों अजय प्रसून, अंजना संधीर, अवधनारायण मुद्गल, डॉ. उर्मिलेश, ओंकार गुलशन, केदारनाथ कोमल, डॉ, गिरिराजशरण अग्रवाल, ज़हीर कुरैशी, तारादत्त निर्विरोध, धंनजय सिंह, डॉ. नरेंद्र वशिष्ठ, डॉ. नरेश, पुरषोत्तम मिश्र मधुप, नीर शबनम, बालकृष्ण गर्ग,  माहेश्वर तिवारी, योगेन्द्र दत्त शर्मा, रऊफ परवेज़, रमेश राज, राजकुमारी रश्मि, राजेश मेहरोत्रा, रामकुमार कृषक, रामगोपाल परदेशी, रामबहादुर सिंह भदौरिया, रामावतार चेतन, प्रो. राम स्वरुप सिन्दूर, रोहिराश्व अस्थाना, विकल सामंती, विजयकिशोर मानव, प्रो विद्यासागर वर्मा, शिव ॐ अम्बर, श्याम बेबस, सरोजिनी अग्रवाल, रामसिंह शलभ, ज्ञानवती सक्सेना आदि के अवदान का उल्लेख किया है। यह अस्थाना जी के औदार्य और दूरदृष्टि का प्रमाण है कि इनमें से अनेक हस्ताक्षर अब तक हिंदी ग़ज़ल के विकास हेती सक्रिय हैं। छठवा अध्याय हिंदी ग़ज़ल के शिल्प-विधान, तथा उर्दू-फारसी ग़ज़ल से साम्य और वैषम्य (भाषा, छंद, अलंकार, रस-परिपाक, काव्य-दोष, तुलनात्मक अध्ययन) से समृद्ध है।  सातवें अध्याय में हिंदी ग़ज़ल की संभावनाएं व भविष्य, उन्नयन में पात्र-अत्रिकाओं क योगदान का उल्लेख है। परिशिष्ट के अंतर्गत हिंदी चलचित्रों में ग़ज़ल, तथा सन्दर्भ ग्रंथों का समावेशन है। सारत: यह शोध ग्रन्थ औपचारिकता का निर्वहन न होकर गहन अध्ययन,  गवेषणापूर्ण तुलनात्मक मनन-चिंतन से प्राप्त निष्कर्षों से समृद्ध है। हिंदी ग़ज़ल के नए हस्ताक्षर यदि इस ग्रन्थ का अध्ययन करने के बाद कलम चलायें तो न केवल उनके लेखन का स्तर उन्नत होगा अपितु दोषमुक्त भी होगा।   

डॉ.रोहिताश्व अस्थाना जी महाविद्यालयीन शिक्षण कार्य के सम्नातर सतत साहित्य सृजन करते रहे हैं। उनके शताधिक शोध परक लेख उस समय की प्रतिनिधि पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। उनकी प्रकाशित पुस्तकें बाँसुरी विस्मित है (हिंदी ग़ज़ल संग्रह), जलतरण बजते हैं (प्रणयगीत), माटी की गंध तथा चाँदी की चूड़ियाँ उपन्यास तथा जय इंदिरा खंडकाव्य हैं। रोहिताश्व जी ने अपने लेखन पर नवोदितों के मार्गदर्शन को वरीयता दी। नई पीढ़ी को हिंदी ग़ज़ल ही नहीं हिंदी भाषा और साहित्य के उन्नयन के प्रति प्रेरित करने में आपका सानी नहीं है। चार दशकों तक हरदोई का नाम डॉ. अस्थाना के महत्वपूर्ण अवदान एक कारण समूचे साहित्य जगत में समादृत होता रहा। हिंदी ग़ज़ल पर सर्व प्रथम शोध करने के अतिरिक्त हिंदी ग़ज़लकारों की नई पीढ़ी तैयार करने के उद्देश्य से उनहोंने हिंदी ग़ज़ल पंचदशी के पाँच भाग सम्पादित प्रकाशित किए। इस श्रृंखला के अंतर्गत १९९७ में भाग १ में आसी पुरनावी, उषा यादव, डॉ. जयश्री शर्मा, जितेन्द्र धीर, डॉ, दयाशंकर शुक्ल 'सजग', दिनेश शुक्ल, डॉ. महाश्वेता चतुर्वेदी, डॉ. योग्रन्द्र नक्षी, डॉ. रविन्द्र उपाध्याय, डॉ. राकेश सक्सेना, डॉ, रामसनेही लाल शर्मा, वीरेंद्र हमदम, शिवकुमार पराग, सागर मीरजापुरी तथा सूर्यदेव पाठक 'पराग' जोसे हस्ताक्षर है। इनमें से सागर मीराजुरी ने बाद में गज़लपुर, नव गज़लपुर, तथा गीतिकायनम नाम से हिंदी ग़ज़ल पर तीन शोधपरक ग्रन्थ प्रकाशित किए हैं।  वर्ष १९९ में प्रकाशित भाग २ में अकिलेश श्रीवास्तव 'चमन;, डॉ. अजरा खान 'नूर', डॉ. अपर्णा चतुर्वेदी 'प्रीता', डॉ. आदर्श मिश्र, उमाशंकर शुक्ल 'आलोक', डॉ. ऋषिपाल धीमान 'ऋषि', कपिलदेव कल्याणी, डॉ. कमर खां 'वहम', कमल प्रसाद 'कमल', चंद्रपाल शर्मा 'शीलेश', डॉ. रेनू चन्द्र, शिवनंदन सिंह, डॉ. श्याम सनेही लाल शर्मा, श्रीपति विषपायी तथा सूरज 'मृदुल' हैं। इस कड़ी का भाग ३ वर्ष २००० में अब्बास खान 'संगदिल', डॉ. अशोक गुलशन, उपेन्द्र प्रसाद सिंह, डॉ. ओमप्रकाश सिंह, डॉ. कमलेश शर्मा, डॉ. गणेश दत्त सारस्वत, डॉ. टेकचंद गुलाटी, बद्री विशाल तिवारी, मयंक अवस्थी, रमेश माहेश्वरी, रवीन्द्र प्रभात, राजेंद्र कुमार, राजेश मिश्र 'सूरज', विनोद उइके' दीप' तथा शशि जोशी हैं। भाग चार वर्ष २००१ में आया जिसमें अशोक गीते (बाद में ज्ञानपीठ पुरस्कृत), आचार्य भगवत दुबे, आनंद सिंह आनंद, गोपीनाथ कालभोर, दिलीप सिंह 'दीपक', पवन शर्मा, पूर्णेंदु कुमार सिंह, बृजकिशोर पटेल, मनमोहन शील, राजा चौरसिया, रामशंकर मिश्र 'पंकज;, शिव उदयभान सिंह चंदेल 'सार्थ', डॉ. शंकर मोहन झा, डॉ. सुनील अग्रवाल तथा सुभाष चंद्र वर्मा 'सुभाष' हैं। इस क्रम के अंतिम पाँचवे भाग २००३ में डॉ. दिनेश यादव, भानुमित्र, डॉ. ममता आशुतोष शर्मा, डॉ. राजकुमारी शर्मा 'राज', राजनारायण चौधरी, रामसनेही कनौजिया 'स्नेही', रंजना श्रीवास्तव 'रंजू', लक्ष्मी खन्ना 'सुमन', लक्ष्मी नारायण शर्मा 'साधक', डॉ. सादिका नवाब 'सहर', डॉ. साधना शुक्ल, सुरेशचन्द्र वर्मा 'मधुप', डॉ. सूर्यप्रकाश अष्ठाना 'सूरज', सोहन लाल 'सुबुद्ध' तथा ज्ञानेंद्र मोहन 'ज्ञान' सम्मिलित हुए। इन संकलनों के महत्त्व का अनुमान पद्म श्री नीरज द्वारा आशीष वचन दिए जाने तथा क्रमश: डॉ कुंवर बेचैन, माधव मधुकर, डॉ. उर्मिलेश, डॉ. अनंतराम मिश्र 'अनंत' व डॉ. शिव ॐ 'अम्बर' द्वारा विस्तृत भूमिकाएं लिखे जाने व देश के जाने-माने साहित्यिक हस्ताक्षरों डॉ. रामप्रसाद मिश्र, चंद्रसेन विराट, डॉ. उर्मिलेश, कृष्णानंद चौबे, अशोक अंजुम, मधुकर गौड़, शशि जोशी, ज़हीर कुरेशी, जानकी वल्लभ शास्त्री, डॉ. तारादत्त निर्विरोध, डॉ. महर्न्द्र कुमार अग्रवाल, डॉ. आकुल, डॉ. गिरिजा शंकर त्रिवेदी, डॉ. जगदीश प्रसाद श्रीवास्तव, जीवन मेहता, डॉ. यतीन्द्र तिवारी, डॉ. वर्डप्रकाश अमिताभ, शिव ॐ अम्बर, सुरेन्द्र चतुर्वेदी, कमलेश्वर, पद्मश्री चिरंजीत, सुरेश नीरव, सुलेखा पाण्डेय, दीक्षित दिन्कौरी व रसूल अहमद सागर  द्वारा प्रेषित समीक्षाओं व प्रतिक्रियाओं से जाना जा सकता है।

वर्ष २००७-०८ में पुनः 'हिंदी ग़ज़ल के कुशल चितेरे भाग १ में डॉ. अस्थाना ने २२ हिंदी ग़ज़लकारों डॉ. अजय जन्मेजय, उपेन्द्र प्रसाद सिंह, उषा यादव 'उषा', कपिल देव कल्याणी, गोपाल कृष्णा सक्सेना 'पंकज', दिनेश कुमार मिश्र 'स्नेही', डॉ. मधु भारतीय, मधुकर शैदाई, मधुकर अष्ठाना, डॉ. योगेन्द्र बक्शी, रमेश चंद्र श्रीवास्तव, रमेश माहेश्वरी, राजेंद्र व्यथित, लक्ष्मीनारण शर्मा 'साधक', विज्ञानव्रत, वीरेंद्र मृदु, वीरेन्द्र हमदम, डॉ. शंकर मोहन झा, डॉ. स्वदेश कुमार भटनागर, सागर मीरजापुरी, डॉ. सादिक नवाब 'सहर तथा सूर्यदेव पाठक 'पराग' की प्रतिनिधि रचनाओं का संकलन सम्पादित-प्रकाशित किया। वर्ष २०१६ में डॉ. अस्थाना ने डॉ. घमंडीलाल अग्रवाल के सहयोग से ७१ सरस्वती वन्दनाओं का संकलन सम्पादित-प्रकाशित किया जसमें देश के कोने-कोने से श्रेष्ठ कवियों की रचनाएँ हैं। वर्ष २०१७ में पुन: हिंदी ग़ज़लों का संग्रहणीय संकलन 'चुनी हुई हिंदी गज़लें' शीर्षक से डॉ. अस्थाना के संपादन में प्रकाशित हुआ. इसमें ४० रचनाकारों की प्रतिनिधि हिंदी गज़लें सम्मिलित हैं। इस महत्वपूर्ण कृति में भूमिका आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' व चंद्रसेन विराट द्वारा लिखी गयी है। डॉ. रोहिताश्व अस्थाना के बाल साहित्य पर अगर के डॉ. शेषपाल सिंह 'शेष; द्वारा शोध कार्य किया जा चुका है किंतु हिंदी ग़ज़ल के क्षेत्र में किये गए कालजयी अवदान पर शोध किया जाना शेष है। 

डॉ. अस्थाना को वर्ष १९८४ में महीयसी महादेवी वर्मा द्वारा  पुरस्कृत किया गया। वे उ.प्र. हिन्दी संस्थान, लखनऊ द्वारा ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान से अलंकृत किए गए। उन्हें दर्जनों अन्य पुरस्कार एवं सम्मान समय-समय पर प्राप्त होते रहे हैं।  ऐकान्तिका, निकट बावन चुंगी चौराहा, हरदोई-241001 (उ.प्र.) मोबाइल: 07607983984 में वार्धक्य तथा रोगों से जीर्ण-शीर्ण हो चुके शरीर तथा दोनों पुत्रों के अन्यत्र पदस्थ होने से उपजे एकाकीपन से जूझते-लड़ते डॉ, रोहिताश्व अस्थाना का घर साहित्य के मंदिर की तरह है। उनके पास महत्वपूर्ण पुस्तकों का महत संकलन है। उनकी चिंता पुस्तकों को किसी ऐसे स्थान पर पहुँचाने की है जहाँ शोध छात्र इनका उपयोग कर सकें। डॉ. रोहिताश्व अस्थाना हिंदी ग़ज़लों तथा हिंदी बाल साहित्य के ऐसे हस्ताक्षर हैं जिन्हें प्रदेश और राष्ट्रीय सरकारों द्वारा उनके महत्वपूर्ण अवदान को देखते हुए सम्मानित-पुरस्कृत किया जाना चाहिए। लखनऊ विश्ववद्यालय को उनके ऊपर अधिक से अधिक शोध कार्य करे जाने जाना चाहिए। हिन्दी ग़ज़ल को वर्तमान  मुकाम पर पहुँचाने वाले हस्ताक्षरों में डॉ. रोहिताश्व अस्थाना का स्थान  अनन्य है। वे शतायु हों और हिंदी के सारस्वत कोष की श्रीवृद्धि करते रहें।     
======================
संपर्क: विश्व वाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, 
salil.sanjiv@gmailcom, ७९९९५५९६१८ / ९४२५१८३२४४, www.divyanarmada.in  

रविवार, 10 जुलाई 2016

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा
आधुनिक समय का प्रमाणिक दस्तावेज 'काल है संक्रांति का' 
समीक्षक- डॉ. रोहिताश्व अस्थाना, हरदोई 
*
                       
  गीत संवेदनशील हृदय की कोमलतम, मार्मिक एवं सूक्ष्मतम अभिव्यक्तियों की गेयात्मक, रागात्मक एवं संप्रेषणीय अभिव्यक्ति का नाम है।  गीत में प्रायः व्यष्टिवदी एवं नवगीत में समष्टिवादी   स्वर प्रमुख होता है।  गीत के ही शिल्प में नवगीत के अंतर्गत नई उपमाओं, एवं टटके बिंबों के सहारे दुनिया जहान की बातों को अप्रतिम प्रतीकों के माध्यम से अभिव्यक्त किया जाता है।  छन्दानुशासन में बँधे रहने के कारण गीत शाश्वत एवं सनातन विधा के रूप में प्रचलित रहा है किंतु प्रयोगवादी काव्यधारा के अति नीरस स्वरूप के विद्रोह स्वरूप नवगीत, ग़ज़ल, दोहा जैसी काव्य विधाओं का प्रचलन आरम्भ हुआ।  

                          अभी हाल में भाई हरिशंकर सक्सेना कृत 'प्रखर संवाद', सत्येंद्र तिवारी कृत 'मनचाहा आकाश' तथा यश मालवीय कृत 'समय लकड़हारा' नवगीत के श्रेष्ठ संकलनों के रूप में प्रकाशित एवं चर्चित हुए हैं। इसी क्रम में समीक्ष्य कृति 'काल है संक्रांति का' भाई आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' के गीतों और नवगीतों की उल्लेखनीय प्रस्तुति है।  सलिल जी समय की नब्ज़ टटोलने की क्षमता रखते हैं।  वस्तुत: यह संक्रांति का ही काल है।  आज सामाजिक एवं सांस्कृतिक मूल्यों में टूटने एवं बिखरने तथा उनके स्थान पर नवीन मूल्यों की प्रतिस्थापना का क्रम जारी है। कवि ने कृति के शीर्षक में इन परिस्थितियों का सटीक रेखांकन करते हुए कहा है- "काल है संक्रांति / तुम मत थको सूरज / प्राच्य पर पाश्चात्य का / चढ़ गया है रंग / शराफत को शरारत / नित का कर रही है तंग / मनुज-करनी देखकर खुद नियति भी है दंग' इसी क्रम में सूरज को सम्बोधित कई अन्य गीत-नवगीत उल्लेखनीय हैं।

                          कवि सत्य की महिमा के प्रति आस्था जाग्रत करते हुए कहता है- 

''तक़दीर से मत हों गिले 
तदबीर से जय हों किले 
मरुभूमि से जल भी मिले
तन ही नहीं, मन भी खिले 
करना सदा- वह जो सही।''

                          इतना ही नहीं कवि ने सामाजिक एवं आर्थिक विसंगति में जी रहे आम आदमी का जीवंत चित्र  खींचते हुए कहा है-

"मिली दिहाड़ी 
चल बाजार। 
चवल-दाल किलो भर ले ले,
दस रुपये की भाजी। 
घासलेट का तेल लिटर भर 
धनिया मिर्ची ताज़ी।" 

                           सचमुच रोज कुआं खोदकर पानी पीनेवालों की दशा अति दयनीय है।  इसी विषय पर 'राम बचाये'  शीर्षक नवगीत की निम्न पंक्तियाँ भी दृष्टव्य है -

"राम-रहीम बीनते कूड़ा 
रजिया-रधिया झाड़ू थामे 
सड़क किनारे बैठे लोटे 
बतलाते कितने विपन्न हम ?"

                          हमारी नयी पीढ़ी पाश्चात्य सभ्यता के दुष्प्रभाव में अपने लोक जीवन को भी भूलती जा रही है। कम शब्दों में संकेतों के माध्यम से गहरे बातें कहने में कुशल कवि हर युवा के हाथ में हर समय दिखेत चलभाष (मोबाइल) को अपसंस्कृति का प्रतीक बनाकर एक और तो जमीन से दूर होने पर चिंतित होते हैं, दूसरी और भटक जाने की आशंका से व्यथित भी हैं- 

" हाथों में मोबाइल थामे 
गीध-दृष्टि पगडण्डी भूली,
भटक न जाए।   
 राज मार्ग पर जाम लगा है 
कूचे-गली हुए हैं सूने। 
ओवन-पिज्जा का युग निर्दय
भटा कौन चूल्हे में भूने ?"

                          सलिल जी ने अपने कुछ नवगीतों में राजनैतिक प्रदूषण के शब्द-चित्र कमाल के खींचे हैं। वे विविध बिम्बों और प्रतीकों के माध्यम से बहुत कुछ ऐसा कह जाते हैं जो आम-ख़ास हर पाठक के मर्म को स्पर्श करता है और सोचने के लिए विवश भी करता है-

"लोकतंत्र का पंछी बेबस 
नेता पहले दाना डालें 
फिर लेते पर नोच। 
अफसर रिश्वत-गोली मारें
करें न किंचित सोच।"

अथवा 
"बातें बड़ी-बड़ी करते हैं,
मनमानी का पथ वरते हैं। 
बना-तोड़ते संविधान खुद 
दोष दूसरों पर धरते हैं।"

                          इसी प्रकार कवि के कुछ नवगीतों में छोटी-छोटी पंक्तियाँ उद्धरणीय बन पड़ी हैं।  जरा देखिये- "वह जो खासों में खास है / रूपया जिसके पास है। ", "तुम बंदूक चलो तो / हम मिलकर कलम चलायेंगे। ", लेटा हूँ मखमल गादी पर / लेकिन नींद नहीं आती है। ", वेश संत का / मन शैतान। ", "अंध श्रृद्धा शाप है / बुद्धि तजना पाप है। ", "खुशियों की मछली को। / चिंता  बगुला / खा जाता है। ", कब होंगे आज़ाद? / कहो हम / कब होंगे आज़ाद?" आदि। 

                          अच्छे दिन आने की आशा में बैठे दीन-हीन जनों को सांत्वना देते हुए कवि कहता है- "उम्मीदों की फसल / उगाना बाकी है 
अच्छे दिन नारों-वादों से कब आते हैं ?
कहें बुरे दिन मुनादियों से कब जाते हैं??"

                          इसी प्रकार एक अन्य नवगीत में कवि द्वारा प्रयुक्त टटके प्रतीकों एवं बिम्बों का उल्लेख आवश्यक है- 
"खों-खों करते / बादल बब्बा 
तापें सूरज सिगड़ी। 
पछुआ अम्मा / बड़बड़ करतीं 
डाँट लगातीं तगड़ी।"

                          निष्कर्षत: कृति के सभी गीत-नवगीत एक से बरहकर एक सुन्दर, सरस, भाव-प्रवण एवं नवीनता से परिपूर्ण हैं।  इन सभी रचनाओं के कथ्य का कैनवास अत्यन्त ही विस्तृत और व्यापक है। यह सभी रचनाएँ छन्दों के अनुशासन में आबद्ध और शिल्प के निकष पर सौ टंच खरी उतरने वाली हैं। 

                          कविता के नाम पर अतुकांत और व्याकरणविहीन गद्य सामग्री परोसनेवाली प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं को प्रस्तुत कृति आइना दिखने में समर्थ है।  कुल मिलाकर प्रस्तुत कृति पठनीय ही नहीं अपितु चिन्तनीय और संग्रहणीय भी है।  इस क्षेत्र में कवि से ऐसी ही सार्थक, युगबोधक परक और मन को छूनेवाली कृतियों की आशा की सकती है।  
***
[पुस्तक परिचय - काल है संक्रांति का, गीत-नवगीत संग्रह, कवि आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', प्रकाशक- समन्वय प्रकाशन अभियान, २०४ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१ म. प्र., प्रकाशन वर्ष २०१६,मूल्य सजिल्द ३००/-, पेपरबैंक  २००/-, चलभाष ९४२५१८३२४४]
समीक्षक- डॉ. रोहिताश्व अस्थाना, निकट बावन चुंगी चौराहा, हरदोई २४१००१ उ. प्र. दूरभाष ०५८५२ २३२३९२। 
-----------------------------------------------------