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गुरुवार, 6 सितंबर 2018

पुस्तक चर्चा:

शब्द अपाहिज मौनी बाबा - शिवानंद सिंह सहयोगी

मधुकर अष्ठाना 
सहयोगीजी की रचनाओं में सम्वेदनात्मक अनुभूतियों की चरम परिणति स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। कवि सामान्य व्यक्तियों से अधिक सम्वेदनशील होते हैं तथा सम्वेदना उन्हें काव्यकला के सहयोग से कृतित्व के लिये प्रेरित करती है। संगीत यदि काव्य का शरीर है तो निजी भावातिरेक और आत्मनिवेदन उसकी आत्मा है। निजी भावातिरेक और आत्मनिवेदन सम्वेदना का प्रतिबिम्ब होता है तथा इसमें अतिरेक का सूचक ही सम्वेदना है। 

इस क्रम में यह कहना आवश्यक कि सम्वेदना का प्रभावी अवतरण करुणा में होता है इसीलिये भवभूति ने करुण रस को एक मात्र रस माना है। यही करुणा गीत में जब प्रगतिशील विचारों के साथ समाजोन्मुखी होती है तो उसमें हमारे परिवेश में व्याप्त सम्वेदना और आसपास की वास्तविकताएँ मदिखाई पड़ने लगती हैं। क्ल्पनातिरेक के स्थान पर यथार्थ का दर्शन होने लगता है। 

इतिकृतात्मकता को त्याग कर गीत का रूप लघु हो जाता है और रचनाकार न्यूनतम शब्दों में अधिकतम कथ्य प्रस्तुत करने के लक्ष्य की ओर अग्रसर होता है जिसके लिये प्रतीक-बिम्ब, मिथक, मुहावरों एवं कहावतों के माध्यम से कथ्य प्रस्तुत करने लगता है। नवगीत संकेतों में अपनी बात पाठक के सम्मुख रखने में जिस भाषा, शिल्प और मानवीयकरण का उपयोग करता है वह गीत से उसे पृथक कर देता है। नवगीत का रचनाकार इसी संकेतात्मक शिल्प में समाज में व्याप्त विषमता, विसंगति, विघटन, विवशता, विडम्बना, विद्रूपता आदि की करुणा को प्रस्तुत करता है जिससे सामान्य-जन के कठोर जीवन-संघर्ष और उसकी जिजीविषा का बोध होने लगता है और इस कारण गीत का स्थान नवगीत ले लेता है। गीत सामन्तवादी मनोरंजनी प्रवृत्ति और कवि-सम्मेलनी गलेबाजी से ऊपर उठकर साधारण-मानव की भूख-प्यास, गरीबी और उसके समस्त सुख-दुःख से जुड़ जाता है। सहयोगीजी की रचनाओं में अधिकतर यही तथ्य और तत्व रचे-बसे हैं जो समय-सम्वेदना की अभिव्यक्ति में सक्षम हैं। ’मुटुरी मौसी’ के प्रतीक के साथ आंचलिकता का परिचय देते हुए वे ग्रामीण महिला के श्रम, निर्धनता, उसका जीवन-संघर्ष, जिजीविषा और पूरे जग का मंगल मनाती बिम्बात्मक शैली और शिल्प सराहना योग्य है जो निम्नांकित है :- 
 "चढ़ी बाँस पर पतई तोड़े
 बछिया खातिर मुटुरी मौसी

झुककर पकड़ी ऊँची फुनगी
जीती केवल अपनी जिनिगी
डाल मरोड़ी अपने दम से
पतई तोड़ी आते क्रम से
स्नेह लुटाती
मुटुरी मौसी

चना-चबेना फाँका-फाँका
चावल घर में कभी न झाँका
गिरता आँसू चाट रही है
घर की खाई पाट रही है
अंजर-पंजर
मुटुरी मौसी"
मुटुरी मौसी के माध्यम से ग्रामीण जीवन की सरलता, कठिन परिश्रम और समस्त दुखों के अतिरिक्त सबके लिये मंगलकामना, यही तो है ग्रामीण जीवन। अब भी हमारे देश की अस्सी प्रतिशत जनता गाँवों में रहती है। पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड आदि में खेत विहीन मजदूर वर्ग रोजी-रोटी के लिये दूर-दराज के क्षेत्रों में चला जाता है और गाँव में शेष रह जाते हैं उनके परिवार के वृद्ध-जन और ऐसी स्थिति में उनका जीवन यापन दुष्कर हो जाता है। ’सहयोगीजी’ पूर्वी उत्तर प्रदेश के बलिया जनपद में गाँव से सम्बन्धित हैं और ग्राम्य जीवन से सुपरिचित हैं अत: उनकी ऎसी अनुभूतियाँ प्रामाणिक हैं। वास्तव में नवगीत संकेतों की शिल्पता को प्रधानता देता है। ’सहयोगीजी’ ने प्रतीक के द्वारा परोक्ष रूप से ग्रामीण जीवन की विसंगतियों को ही प्रस्तुत किया है जिसमें मुटुरी मौसी लाखों निर्धन ग्रामीण वृद्धजनों की प्रतीक बन गई है। एक विशेष तथ्य यह भी है कि ‘सहयोगीजी’ के कथ्य की व्यंजना को पूरब के लोग ही समझ सकेंगे।

‘सहयोगीजी’ की रचनाएँ अर्थबोधक, शब्द-रस और अभिव्यंजना से अभिसिंचित हैं जिसके पीछे उनकी दीर्घ साधना का परिचय मिलता है। मौलिक रचनाएँ उनके मौलिक चिन्तन और पर्यवेक्षण का परिणाम है जिसके प्रतिफल में नवगीत की दहलीज पर वे दस्तक दे रहे हैं। नवगीत की विशेषता है कि उसमें मानवीयकरण पर बल दिया जाता है और ‘सहयोगीजी’ की अधिकांश रचनाओं में यह विशेषता नवगीत पर उनकी पकड़ का द्योतक है। इस प्रकरण में उनकी एक रचना प्रस्तुत है-
"सुनो बुलावा !
क्या खाओगे !
घर में एक नहीं है दाना

सहनशीलता घर से बाहर
गई हुई है किसी काम से
राजनीति को डर लगता है
किसी ‘अयोध्या’ ‘राम-नाम’ से
चढ़ा चढ़ावा !
धरे पुजारी !
असफल हुआ वहाँ का जाना

आजादी के उड़े परखचे
तड़प रही है सड़क किनारे
लोकतंत्र का फटा पजामा
पैबंदों के पड़ा सहारे
लगा भुलावा !
वोटतंत्र यह !
मनमुटाव का एक घराना"


इस रचना में सहनशीलता, राजनीति, आजादी तथा लोकतंत्र आदि का मानवीकरण दर्शनीय है। चाहे सामाजिक विसंगति हो अथवा राजनीतिक, सभी पर ‘सहयोगीजी’ सटीक व्यंग्य करते हैं। वास्तव में वर्तमान साहित्य का मूल स्वर ही व्यंग्य है। व्यंग्य ही नवगीत को धार और तेवर देता है जिससे उसकी मारक क्षमता श्रोता को सोचने की प्रेरणा देती है। इस सम्बन्ध में ‘सहयोगीजी’ पर्याप्त सजग हैं और व्यंग्य के माध्यम से प्रतिरोध की भूमिका तैयार करते हैं। ’सहयोगीजी’ ने नवगीत की समस्त भाषिक एवं शिल्पात्मक विशेषताओं को आत्मसात कर लिया है। कहा जाता है कि प्रथम सोपान शब्दों की साधना है, द्वितीय सोपान में गीत का स्थान है और अच्छे गीत सिद्ध होने के उपरान्त ही नवगीत का द्वार खुलता है। एक विशेष तथ्य यह भी है कि जो जिस परिमाण में सम्वेदनशील होगा उसी के अनुसार उसके नवगीतों की श्रेणी होगी। निश्चित रूप से ‘सहयोगीजी’ का अंतर्मन सम्वेदना का सागर है जिसमें व्यक्तिगत सम्वेदनाएँ भी समाजोन्मुखी हैं। इस प्रकार उनकी यथार्थ अनुभूतियाँ समष्टिगत आकार ग्रहण कर अपने सामाजिक सरोकार का उत्तरदायित्व निर्वहन करने में पूरी तरह सक्षम हैं। नवगीत बहुआयामी सृजनधर्मा है जिसमें जीवन के प्रत्येक पक्ष को समेटकर प्रस्तुत करने की विलक्षणता वर्तमान है। इसी के क्रम में ‘सहयोगीजी’ का सृजन भी बहुआयामी है। इस सन्दर्भ में पर व्यंग्य करते हुए वे लिखते हैं :-
"नेता हैं कुछ भी कह देंगे
भाषा से क्या लेना-देना
इनको तो बस
वोट चाहिये

ये तो हैं केले के पत्ते
भिड़ के हैं ये लटके छत्ते
चापलूस बस बनकर रहिये
भूख-प्यास की बात न कहिये
जनता से क्या लेना-देना
इनको तो बस
नोट चाहिये"

नेताओं के चरित्र और आचरण से देश की जनता सुपरिचित है। वोट प्राप्त करने के लिये वे कितने वादे करते हैं और कितने सपने दिखाते हैं, किन्तु एक बार जीत जाने के उपरान्त पाँच वर्ष तक दिखाई भी नहीं पड़ते। सत्तर वर्षों में स्वतन्त्रता के उपरान्त गरीब और गरीब हुआ है और पूँजीपति की पूंजी में दिन दूना रात चौगुना वृद्धि हुई है। जीत कर नेता एक ही वर्ष में कोठी, कार और बड़ा बैंक बैलेंस बना लेता है किन्तु निर्धन की झोंपड़ी तो और खस्ता हाल हो जाती है जो भारतीय राजनीति में मूल्यों का क्षरण, अपसंस्कृति और सम्वेदन हीनता का कटु परिचायक है। नवगीत की भाषा संकेतात्मक होती है जो प्रतीक और बिम्ब के माध्यम से न्यूनतम शब्दों में कथ्य प्रस्तुत कर देती है और व्याख्या द्वारा उसका विस्तार होता है। ’सहयोगी जी’ की भाषा भी इसी प्रकार की शिल्पता से समृद्ध है। इस सन्दर्भ में उनकी एक रचना प्रस्तुत है-

"अनुशासन के
तोड़फोड़ का हुआ धमाका है

आँखें सूजी हैं फागुन की किस्से बदल गए
बातचीत की दीवारों के  हिस्से बदल गए
तिड़कझाम से भरा हुआ यह
सघन इलाका है

त्योहारों की साँस-साँस पर भृकुटी के पहरे
मेलजोल की शहनाई के  कान हुए बहरे
पटाक्षेप के गगनांचल में
फटा पटाका है

असमंजस की जोड़-तोड़ की  झाँझ लगी बजने
उठा-पटक की शंकाओं के  साम लगे सजने
बोलचाल के सूट-बूट का
सजा ठहाका है"
देश में अनुशासन का नाम नहीं है, चारों ओर तोड़-फोड़ और धमाके हो रहे हैं, देश द्रोह और आतंक का बोलबाला है, समाज में समरसता, प्रेम, सद्भाव का वातावरण समाप्त हो गया है। त्योहारों की धूमधाम का मौसम जब आता है तो दंगे होने लगते हैं और साम्प्रदायिक मेलजोल का नामोनिशान नहीं है। हर तरफ आराजकता की तूती बोल रही है। कोई किसी पर विश्वास नहीं करता और ऐसे समय में कट्टरपंथी अलगाववादी ठहाके लगा रहे हैं। अविश्वास, अशिक्षा का लाभ सत्ताधारी ‘बाँटों और राज करो’ की नीति से लाभान्वित हो रहे हैं। जहाँ गाँवों में अभी अनपढ़ लोग अँगूठा लगाते हैं वहाँ अनीति और अन्याय जन्म लेती है। विधायिका को गरम जलेबी समझकर माफिया और तिहाड़िये संसद तक पहुँचने में कामयाब हो रहे हैं। राजनीतिक दल उसी को उम्मीदवार बनाते हैं जो अपने धन-बल और छल-बल द्वारा जीतने की सामर्थ्य रखते हों। ईमानदार और सच्चा व्यक्ति चुनाव में खड़ा भी नहीं हो पाता। लोकतंत्र तो एक खेल है जिसमें एक लगाओ तो एक हजार पाओ का तौर चलता है। राजभवन का स्वप्न तो छोटे-गरीब लोग देखते ही रह जाते हैं, जिसका कोई अंत नहीं।

इस बार काव्य का सर्वोच्च सम्मान ‘नोबेल प्राइज’ एक गीतकार को दिया गया है, जो नई कविता के पतन-पराभव की ओर इंगित करता है और ऐसी स्थिति में नवगीत ही उसका स्थान ले सकता है तथा इस ओर अग्रसर भी है। ऐसी स्थिति में नवगीतकार का दायित्व एक वृहत्तर रूप में समाज के सम्मुख उभर रहा है। नवगीत के प्रति समाज का दृष्टिकोण सकारात्मक हो रहा है। अत: नवगीत को भी सामाजिक सरोकारों की विशेष चिंता होनी चाहिये। नयी कविता के न तो अब पाठक हैं और न श्रोता। नवगीत की सम्वेदनापूर्ण यथार्थ के चित्रण में और भी सजग होना पड़ेगा तथा सामाजिक परिवर्तन की दिशा में अपनी ठोस भूमिका भी निर्धारित करनी होगी। नवगीत को सहज, संप्रेषणीय, प्रसाद गुण सम्पन्न होने के लिये अभी भी कई मंजिलें पार करनी हैं, उसकी उपयोगिता और प्रयोजन को ध्यान में रखते हुए सार्थक सृजन की ओर गतिशील होना उसे दीर्घजीवी बनने का एक मात्र आधार है। ’सहयोगीजी’ ऐसे ही उटपटांग कुछ पंक्तियों को उलटा–सीधा जोड़ने वाले रचनाकारों पर व्यंग्य करते हुए लिखते हैं-
“शब्दों की इस पीच सड़क पर
चलने वाले बहुत हो गए

लय-यति-गति का शब्द-योनि का
बदल गया है तौर-तरीका अनुभव प्यासा अनुबोधों को
निकली चेचक लगता टीका रचनाओं की गरिमाओं को
छलने वाले बहुत हो गए

शाब्दिक गौरव पड़े अपाहिज भाव-प्रबलता तिनके चुनती
कालिदास अब रहा न कोई बिंब-संपदा गीत न बुनती
पुरस्कार की मृगतृष्णा में
पलने वाले बहुत हो गए"
वास्तव में पुरस्कार, विशेष रूप से राजकीय पुरस्कार तो कविसम्मेलनी भाँड़ों और गलेबाजों अथवा जुगाड़ करने वालों को ही मिलता है। श्रेष्ठ और सच्चे साधक न तो चाटुकार होते हैं न जुगाड़ करने वाले होते हैं। पुरस्कार तो ऐसे लोग प्राप्त कर लेते हैं जिन्हें साहित्य की समझ ही नहीं है किन्तु वह सब उनके जीवन काल तक सीमित रहता है जबकि श्रेष्ठ साहित्यकार का सुयश इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित रहता है जो चिर काल तक प्रेरणास्रोत के रूप में मार्गदर्शन करता है। ’सहयोगीजी’ की रचनाधर्मिता इसी कोटि में आती है।

एक ओर नयी पीढ़ी रोजी-रोटी के लिये नगरों में जीवन-संघर्ष की जटिल परिस्थितियों से जूझ रही है तो दूसरी ओर पुरानी पीढ़ी अपने को नगरीय जीवन-शैली में अपने को समायोजित नहीं कर पा रही है। नयी पीढ़ी ने जिस अराजक समय में जन्म लिया है, उसमें बचपन से ही अपने को स्थापित करने के लिये प्रयत्नशील है क्योंकि उसके अभाव में जीना ही असंभव है। किन्तु दूसरी ओर पुरानी पीढ़ी अपनी मानसिकता को समयानुकूल नहीं ढाल पा रही है। वैचारिक मतभेद के अतिरिक्त पारिस्थितिक भेद भी हैं जिसमें पुरानी पीढ़ी शान्ति अनुभव नहीं करती और उसका मन नहीं लगता। ’सहयोगीजी’ लिखते हैं कि -
"आज पिताजी शहर छोड़कर
गाँव लगे जाने

बोल रहे हैं शहरों में अब साँस अटकती है
घर में बैठी पड़ी आत्मा राह भटकती है
बरगद की वह छाँह छबीली
मार रही ताने

ऊँचे महलों के छज्जों तक किरणों का आना
खिड़की पर चढ़ पड़ी खाट तक पास न आ पाना
सता रहे हैं सोरठी-बिरहा
कोयल के गाने

पगडंडी पर ईख चाभना खेतों से मिलना
मखमल की उस गद्दी पर सो कलियों का हिलना
जहाँ जिन्दगी जीना होता
जीने का माने"
प्रदूषण रहित गाँवों का खुला

कहावत है कि "जाके पाँव न फटी बिवाई  सो क्या जाने पीर पराई" और इस क्रम में जब मैं ‘सहयोगीजी’ की कृति की अंतर्यात्रा करता हूँ तो यह स्पष्ट हो जाता है कि उनकी रचनाओं में आनुभूतिक सम्वेदना के यथार्थ का दर्शन होता है। मैं तो इनकी रचनाओं के माध्यम से ही उनके अंतर्मन की व्यथा-कथा को पढ़ रहा हूँ जो अगाध है जिसका आकलन जितना सरल है उतना ही कठिन भी। वे फैशन में नवगीत नहीं लिख रहे हैं बल्कि यही उनकी नियति है क्योंकि नवगीत-सृजन से ही उन्हें शांति मिलती है। उनकी मुठभेड़ अंध विश्वासों, रूढ़ियों, पाखण्डों से है जो समाज में व्याप्त हैं, सामाजिक विसंगति, धार्मिक कट्टरता, भ्रष्ट राजनीतिक व्यवस्था और अमानुषी सम्वेदनहीनता से है जिसमें सामान्य जन पिस रहा है। रचनाकार तटस्थ द्रष्टा होता है और किसी विशेष का पक्षधर नहीं होता, इसीलिये यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि नवगीत वैचारिकता दासता से मुक्त होकर आनुभूतिक यथार्थ का गीत है जो पारम्परिक गीत से बिलकुल अलग है। राजनीतिक हथकण्डों पर ‘सहयोगीजी’ लिखते हैं-
"उड़न खटोले पर बैठी है
राजनीति की चाय

शुभचिंतक की कुशल-क्षेम की फूट गई है आँख अफवाहों की
पूँजी की बस फुदक रही है पाँख घपलेबाजी जुटा रही है
 राजनीति की राय

फिर चुनाव की बैसाखी पर हर वादा आरूढ़ कुछ थाली के
बैंगन भी हैं कुछ चमचे हैं गूढ़ भटकी मुद्दों की मथुरा में
राजनीति की गाय

गांधी टोपी पहन लँगोटी टहल रही है गाँव
आसमान पर जमे हुए हैं उसके सक्षम पाँव
मत का बटुआ ढूँढ़ रही है
राजनीति की आय"


‘सहयोगीजी’ के अंतर्मन में उनके बचपन का गाँव बसता है। वही सीधा, सरल गाँव जहाँ वास्तव में इनसान बसते थे। साम्प्रदायिकता का कहीं भी स्थान नहीं था लेकिन जब वे वर्तमान गाँव की दशा पत्र के द्वारा ज्ञात करते हैं तो उनके भीतर के गाँव की छवि को आघात लगता है जिसमें
“बरगद का वह पेड़ कट गया
टूटा पीपल कटी नीम की छाँह
बाँसों के उस झुरमुट पर अब
नई प्रगति की नई ईंट की बाँह "

लेकिन दबंग हवलदार का लखराँव अब भी सुरक्षित है। गाँव एक अविकसित नगर सा हो गया है जहाँ समस्याएँ ही समस्याएँ हैं। इस रचना में कुछ ऐसे आंचलिक बोली के शब्द भी आए हैं जिन्हें समझना हो तो बोली का ज्ञान आवश्यक है क्योंकि इस शब्द का प्रचलन किसी भी रूप में दूर-दराज के पश्चिमी क्षेत्र में नहीं है जैसे ‘बो’, ’तर’ आदि। कौन समझेगा कि ‘बो’ का अर्थ ‘पत्नी’ और ‘तर’ का अर्थ ‘नीचे’ है। इससे भाषा में जटिलता का आना सम्भव है। बिम्ब भी कुछ और स्पष्ट हों तो अधिक प्रभावोत्पादक बन सकते हैं। लेकिन मुझे विश्वास कि आगामी कृतियों में वे और प्रभावशाली ढंग से कथ्य को प्रस्तुत कर सकेंगे यद्यपि मेरे जैसे कुछ लोगों को इन्हें समझने में कोई कठिनाई नहीं होती है। अब भी हमारे देश में पचास प्रतिशत जनता अशिक्षित है जो आवश्यकता पड़ने पर केवल अँगूठा लगाती है। इसके अतिरिक्त दहेज की कुरीति भी समाज में व्याप्त है। इन परिस्थितियों में जहाँ अनपढ़ को लोग मूर्ख बनाकर उसका सब कुछ छीन लेते हैं वहीं दहेज न दे पाने के कारण लड़कियों का विवाह नहीं हो पाता है। ’सहयोगीजी’ की दृष्टि समाज की समस्त विसंगतियों पर पड़ती है और उनकी लेखनी उसे रेखांकित करने में पीछे नहीं रहती। वे लिखते हैं-
 "अक्षर तक भी चीन्ह न पाती बीस साल की गीता
 ईंगुर खातिर भटक रही है तीस साल की सीता
 गुणा-भाग के बीजगणित में
 उलझी है कंगाली"

‘सहयोगीजी’ अंतर्मन की गहराई से सृजन करते हैं जिसमें जीवन का प्रत्येक पक्ष प्रतिबिम्बित होता है। उनकी रचनाएँ स्वतः जीवन का यथार्थ महाकाव्य बन जाती हैं जिसके सन्दर्भ में निम्नांकित रचना प्रस्तुत है :-
"अविरत पथ का असहज अनुभव
इस जीवन का रथ पैदल है

मृग-मरीचिका भूल-भुलैया  झेल चुका है कुछ गतांक तक
पता नहीं है खेल चले यह ओलम्पिक का किस क्रमांक तक
एक नदी का दग्ध किनारा
एक प्रतीक्षित टुक मखमल है

 काल खंड की जिस रेती पर  दौड़ रही वय   चक्करघिरनी
 उसी रेत पर लिये कमंडल  लेट रही है   नींद-सुमिरनी
 समय सिन्धु के धवल धरातल
 पर लहरों की   कुछ हलचल है

कब सलीब पर यह लटकेगा साँस श्लेष का   मदन मसीहा
रामेश्वर हो या हो काशी या मथुरा हो   प्राण पपीहा
जहाँ खड़ा है जहाँ पड़ा है
वह जमीन भी   कुछ दलदल है "
अंतर्मन में छिपे खारे सागर में डुबकी लगाकर निकली रचना असीमित व्यथाओं की ऐसी भूलभुलैया है जहाँ एक मरुस्थल बसता है जिसमें मृगमरीचिका में भागते रहना जीवन-संग्राम की नियति है। न कहीं विश्राम, न कहीं मंजिल। आजीवन सलीब पर लटके रहने की बेबसी, घोर निराशा और हताशा की दलदली धरती पर मानव कब तक टिका रहे। जीवन के लिये एक उम्मीद, एक आशा का होना अपरिहार्य है, अन्यथा जिजीविषा की जीवन्तता का क्या होगा ?

‘सहयोगीजी’ की रचनाएँ विशेष रूप से ग्राम्य-बिम्बों से सजी हुई हैं जिनकी छान्दसिक प्रौढ़ता विद्वानों और पाठकों को सम्मोहित करती हैं। निर्दोष छंद और अनछुए बिम्ब नवता के साथ गेयता से सम्बद्ध हैं। इस सन्दर्भ में उनकी ये पंक्तियाँ कितनी सार्थक प्रतीत होती हैं -
"बिंब बिंबित आ रहा है अनुनयी उद्गार लेकर 
व्याकरण की पालकी में सृजन का श्रृंगार लेकर
रागिनी की माँग भरता अर्थ का सिन्दूर कोई"
वास्तव में तथ्यगत सत्य है। ’सहयोगीजी’ की प्रत्येक रचना में प्रशंसा और सराहना लिये बहुत कुछ है और प्रत्येक रचना उद्धृत करने योग्य है। जब वे लिखते हैं :-
"घर में बैठी हुई गरीबी
तोड़े रोज चटाई

हँड़िया-पतुकी के सब कंधे हुए शहर के राही
भूख गई है पेट कमाने बाहर खड़ी उगाही
पैर तुड़ाई पगडंडी पर
सोई पड़ी कटाई "
या
"तड़पी भूभल जला पसीना आँख बनीं डल झील
फटही गमछी झाँझर कुरता अचरज में तबदील
पड़े उघारे होंठ सूखकर हुए छुहारे
धूप रही ललकार "
आदि ऐसे नव्य बिम्ब हैं जो अन्यत्र अभी सामने नहीं आए ’सहयोगी जी’ प्रत्येक दृष्टि से मौलिकता से परिपूर्ण हैं। इन रचनाओं में गाँवों की गरीबी, पलायन और रुग्ण व्यवस्था के अनेक स्वानुभूत चित्र हैं जो सम्वेदना के सागर प्रतीत होते हैं।

दैवी आपदा अर्थात सूखा, बाढ़, अग्निकाण्ड आदि दुर्घटनाएँ होती हैं तो शासन अनुदान की घोषणा करता है किन्तु यह अनुदान दुर्घटना ग्रस्त लोगों तक पहुँच ही नहीं पाता अथवा उसके लिये रिश्वत देनी पड़ती है। ’सहयोगी जी’ ने इसे भी अपनी लेखनी की धार पर तेवर के साथ अभिव्यक्त किया है -
"राजभवन में अब तक बैठा
राजकीय अनुदान

लिखते तो थे खुशबू को खत सरसों के हर फूल
बहती नदियों के आँचल में हँसते भी थे कूल
कहाँ चैन से सोने देती
सठिया गई कटान

बोरिया-बिस्तर बाँध चुका है उजड़ा हुआ असाढ़
है पलंग पर आकर लेटी जोगिन बनकर बाढ़
छप्पर लेकर भाग रहा है
आया हुआ नहान

कई दिनों से बादल के घर रात बिताई धूप
पता लगा है बूड़ गया है सरकारी नलकूप
अनिजक छत पर जला रही है
चूल्हा रोज धसान"

गाँव के जीवन के, प्रकृति के, उसकी विषम परिस्थितियों और समस्याओं के बिम्बात्मक अभिनव चित्र ‘सहयोगी जी’ की रचनाओं को अन्यतम बनाते हैं और वे श्रेष्ठ नवगीतकार की संज्ञा के सुपात्र हैं। मुझे विश्वास है कि उनकी प्रस्तुत कृति का हिन्दी जगत में समुचित स्वागत होगा और यह कृति नवगीत के इतिहास में एक मील का पत्थर सिद्ध होगी। 
१.१२.२०१७
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गीत नवगीत संग्रह- शब्द अपाहिज मौनी बाबा, रचनाकार- शिवानंद सहयोगी, प्रकाशक- अयन प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण, मूल्य- रु. ३४०, पृष्ठ- १७१, समीक्षा- मधुकर अस्थाना

पुस्तक चर्चा:

सूरज भी क्यों बंधक - शिवानंद सिंह सहयोगी

डॉ. पशुपतिनाथ उपाध्याय 
गीत का प्राणतत्व गेयता है, जिसमें लयात्मकता हो, ध्वन्यात्मकता हो और संगीतात्मकता हो – वही सार्थक शब्द रचना गीत कहलाती है। सृष्टि स्वयं लयात्मक है जिसमें एक लय है, एक स्पंदन है और एक सक्रियता का वेग है। जहाँ यह लय नहीं है वहाँ प्रलय का तांडव होने लगता है। यही कारण है कि आदि काल से गीति काव्य धारा लोक जीवन से सम्पृक्त सतत प्रवाहित होती चली आ रही है। आदिम मनोभावों की अभिव्यंजना गीतों में सहज सम्भाव्य है जिसमें भाव की तीव्रता और सौन्दर्यबोध की विलक्षणता निहित होती है। गीत प्रसूता नवगीत अद्यतन परिवेश में अपना स्वरूप निखार रहा है जिसे पूर्व में प्रगीत, जनगीत आदि नामों से पुकारा गया। सम्प्रति नवगीत गीत का परिष्कृत और परिमार्जित संस्करण है जिसमें रचनाकारों ने सहजता, सरलता एवं सुगमता के आधार पर उन्मुक्तता को अंगीकार किया है।         
          
उपभोक्तावादी प्रवृत्ति, बाजारवादी संस्कृति एवं प्रतियोगितावादी वृत्ति से किसी न किसी रूप में रचनाकार प्रभावित हुआ है। वैश्विक स्तर पर द्रुतगति से परिवर्तन हो रहे हैं। साहित्य और साहित्यकार भी  सम्प्रति भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया में अपने को अछूता नहीं रख सका है जिसके परिणाम स्वरूप शार्टकट और द्रुतगति से लेखन हो रहा है। रचनाधर्मिता का निर्वहन प्रतियोगिता-जगत में उत्पादन पर दृष्टि केन्द्रित करते हुए किया जा रहा है। कोई भी रचनाकार किसी भी विधा या किसी भी काव्य रूप में पीछे रहना नहीं चाहता। यही कारण है कि गीतकारों ने भी नवगीत के प्रति अपनी काव्य-प्रतिभा का दिग्दर्शन किया है जिसकी परिणति में शिवानन्द सिंह “सहयोगी” का नवगीत संग्रह “सूरज भी क्यों बन्धक” प्रकाशित है।
          
समीक्ष्य कृति में एक सौ छ: रचनायें हैं, जिनमें बहुविषयक भावानुभूति की अभिव्यंजना काम्य सिद्ध है। गूँगी गरम हवायें आवाजाही करती हुई प्रतीत होती हैं क्योंकि नल की लापरवाही से पियास की छीना झपटी हुई है। गरीबी के कारण चाँदी की सिकड़ी भी कई साल से गिरवी रखी है। ग्राम्य संस्कृति से प्रभावित रचनाकार पाकड़, पीपल एवं नीम की छाँव में ही विश्राम लेता है तथा ढोल की थाप गाँव में सुनकर रसानुभूति करता है क्योंकि,

                    गीत गाँव के रहनेवाले 
                    शहर ठिकाना है
                    धूप-छाँह का आना-जाना
                    एक बहाना है              (पृष्ठ-२५)
          
भोजन के टेबल की थाली को रोटी माँगते हुये रचनाकार ने खुली आँखों से देखा है। सामाजिक विषमताओं, अस्त-व्यस्त व्यवस्थाओं एवं जीर्ण-शीर्ण अवधारणाओं को आनुभूतिक धरातल पर अभिव्यंजित किया गया है जिसमें राष्ट्रीय ज्वलंत समस्याओं को भी वर्ण्य-विषय बनाया गया है। संवेदनशील रचनाकार साम्प्रतिक वातावरण और परिवेश से क्षुब्ध है, दुखी है, देखें-

                    पाल रही है अपना बच्चा 
                    ठटरी महुआ बीन 
                    कुरसी-कुरसी बैठ गया है 
                    वंशवाद का जीन
                    खुला हुआ आतंकवाद का 
                    टोला-टोला जीम               (पृष्ठ-२८)
          
राजनीतिक परिवेश और राजनीतिक प्रदूषण पर भी चिंता व्यक्त की गई है। सड़क से संसद तक यह प्रदूषण सर्वत्र व्याप्त है। घोटाले पर घोटाले हो रहे हैं फिर भी राजनेता कुरसी पर आज भी काबिज हैं। प्रजातन्त्र माखौल बनकर रह गया है। शासन-प्रशासन मौन हैं। राजनेता स्वार्थपरता की रीति-नीति में रत हैं। व्यंग्योक्ति द्रष्टव्य है,

                    भूख-प्यास का कैसा अंतर 
                    कैसी दिल्ली जंतर-मंतर
                    कैसा गँवई कैसा शहरी 
                    अर्थनीति की खिंचड़ी-तहरी
                    साँस-साँस है आहत-आहत
                    अवगत नहीं प्रशासन आला 
                    गीत कहानी कविता मौन 
                    इनकी बिजली काटे कौन?      (पृष्ठ-३१)
           
रोजी-रोटी के लिए लोग गाँव से पलायन कर रहे हैं और शहर में भीड़ कर रहे हैं तथा मजबूरी में शहर में बने हुये हैं। चमक-दमक का गिरवी होना, सूरज तक का बन्धक होना, भौतिकता में सभी का लिप्त होना, सुन्दरता की अँगूठी में काँटों का नग होना, अव्यवस्था, असमानता एवं अस्त-व्यस्तता का प्रतीक है। मनचली हवायें, खेतों की हरियाली की गह गह, गाती घटायें, कमर हिलाती भदई आदि ने मनमोहक वातावरण उत्पन्न कर दिया है। व्यंजना से आपूरित शब्दावली प्रयोग करनेवाले, वर्णमाला को सुघर रूप में पिरोनेवाले तथा वेदना से काव्यविधा को विधा हुआ देखनेवाले रचनाकार की स्पष्टोक्ति है-

                   खिलखिलाहट भरी जिन्दगी 
                   छंद शबनम लिए चल पड़ी 
                   हलचलों की छिड़ी रागिनी 
                   वर्तनी की कली खिल पड़ी 
                   भावना का मुखर अवतरण 
                   शब्द का संकलन हो गया       (पृष्ठ-३९)
          
जातिवाद, क्षेत्रवाद, राजनीतिक प्रपंच, धर्म भेद, भीड़ भाड़, वादों का बाजार, आपाधापी, छीना झपटी आदि के कारण रचनाकार अफसोस जाहिर करता है। गंगासागर भी खारा-खारा लगता है तथा आजादी के बाद भी आजतक राशन कंगाल दिखता है क्योंकि-

                    सड़क किनारे जहाँ खड़ा है 
                    लफड़ा रोटी का
                    रोज-रोज का एक झमेला 
                    रगड़ा रोटी का              (पृष्ठ-४५)

उसे आत्मानुभूति को अभिव्यंजित करने के लिये बाध्य करते हैं। कागज के टुकड़े वाद के प्रतीक हैं जबकि नदी की देह विरहाग्नि का द्योतन करती है। ग्रामीण आँचल में जन्मा, पला-बढ़ा रचनाकार प्रौढ़ावस्था में भी उसी खाटी माटी की गंध में अपने को सुवासित करना चाहता है क्योंकि उसका संस्कार पुन: उसी पुरातन परिवेश में, स्वर्णिम अतीत में लौटने को विवश करते हैं। अभिव्यंजना साक्ष्य है-

                    माटी की वह धूल भुरभुरी
                    मेरा खेल-खिलौना होती 
                    लंगड़ी-बिछिया छीना-झपटी 
                    मेरी माया मेरा मोती 
                    धूल रगड़कर हाथ-पैर में 
                    बचपन ढोया और बढ़ा हूँ     (पृष्ठ-४८)
          
गीतों में तुकान्त शब्दावली का प्रयोगधर्मी रचनाकार नवगीतों में भी उसी लयात्मकता, ध्वन्यात्मकता एवं संगीतात्मकता का आग्रही दिखाई पड़ता है तथा स्वस्थ परम्परानुमोदन का पक्षधर भी है। वह नव्य प्रयोग उसी सीमा तक करना चाहता है जहाँ तक भारतीय संस्कृति, मानवीय मूल्य और स्वस्थ परम्पराओं पर प्रहार न होता हो। उसका लकीर का फकीर बनने में विश्वास नहीं है। यही कारण है कि उसके अधिकांश नवगीत गेयता, लयात्मकता, ध्वन्यात्मकता  एवं संगीतात्मकता से आपूरित हैं, समन्वित हैं एवं मंडित हैं। शब्दानुशासन को सतर्कतापूर्ण कायम बनाये रखने में रचनाकार दक्ष हैं, कुशल हैं एवं सक्षम हैं। लोकमानस की रागात्मकता और बौद्धिकता को संतुष्ट करनेवाली ये रचनायें निश्चय ही नव्य-चिंतन की परिणति हैं। साम्प्रतिक परिप्रेक्ष्य में रचनाकारों का पुनीत दायित्व है कि वे अपने जीवन की अभिव्यक्ति करते हुये राष्ट्रीय समकालीन ज्वलन्त समस्याओं पर विचार करें तथा जनमानस को जागरित करें। 
“सहयोगीजी” ने इस पर चलने का प्रयास किया है और उन्हें सफलता भी मिली है। सावन की नशीली घूप, खुशियों की पिअरी, नव वसंत का कोमल कोंपल, गजल गाती खंजनों की टोलियाँ, बहकती हुई शाम की हवा, उगता हुआ खिला-खिला सूरज आदि प्राकृतिक तथ्यों और तत्वों ने रचनाकार के मानस को काव्य-सर्जना के लिये प्रेरित और प्रोत्साहित किया है। जीवन को एक लहर की संज्ञा से अभिहित करनेवाले रचनाकार ने सुख-दुःख, आरोह-अवरोह, मधुर-तिक्त, राग-विराग आदि के परिप्रेक्ष्य में अपनी अभिव्यंजना की है। देखें-

                    मर्त्यलोक का एक निवासी 
                    सपनों का जंगल है 
                    मानवता का एक प्रवासी 
                    चंदा है मंगल है 
                    गीत गाँव का एक फरिश्ता 
                    उजड़ा हुआ शहर है             (पृष्ठ-५७)
          
विकास के नाम पर मात्र आदमकद विश्वास दिया गया है। नवयुग का स्वप्न साकार नहीं हो सका है। प्रगतिवाद विनाश लीला में व्यस्त है। मनुस्मृतियों की कथा-कहानी बया सुनाती है तथा सुषमा गायब है। संकल्पों की खाट खड़ी होना, आस का कटोरा लिये घूमना, ऊसर में आश्वासन मिलना, सामाजिकता का आँख मूँदकर सोना, प्रजातंत्र का रोना तथा दुराचार के कारटून का रोना आदि ऐसे कथ्य और तथ्य हैं जिनसे रचनाकार की कारयित्री प्रतिभा प्रभावित हुई है फिर भी वह जीवन यापन कर रहा है। कारण है-

                    हिंदी की नौका पर चढ़कर 
                    गीतों का संसार बसाता 
                    पीड़ा की घनघोर गली में 
                    भावाकुल बाजार लगाता 
                    हार निरंतर हाथ लगी है 
                    जीत नहीं पर जीता हूँ मैं       (पृष्ठ-७०)
          
बहरा शासन, दानवी मानवता, लांछन का सैलाब, संवादों का गहन विभाजन, अनुबंधों का अनमन रहना, विषयी अत्याचार, संबंधों के नये गठजोड़, दुरभिसंधि की डाँट-डपट का डंका बजना, नगर की सड़कों की दुर्दशा, नगरवधुओं की सोचनीय स्थिति, स्नेह के दरिया का सूखना आदि की दयनीय स्थिति और परिस्थिति को देखकर संवेदनशील रचनाकार का हृदय व्यथित हो उठा है। यही कारण है कि वह कह उठता है-

                    भीड़ भरी सडकों पर बाईक 
                    तेज चलाते हैं 
                    और नशा का सेवन करते 
                    पान चबाते हैं 
                    छेड़-छाड़ कलियों से करते 
                    ऐसे लमहों को समझाऊँ 
                    मन तो करता है              (पृष्ठ-९२)
          
मानवीय मूल्यों के ह्रास और परिहास तथा उपहास ने रचनाकार की व्यथा बढ़ा दी है। आशावादी जीवन दृष्टि से रूपायित रचनाओं में प्रेमगीत, मौसम बदल रहा, जिन्दगी का भागवत, समय का हाथ आदि हैं जिनमें जीवन मूल्यों के प्रति आशा और विश्वास जागरित करने का रचनाकार ने अथक प्रयास किया है। आंचलिकता की चाशनी में पगे ये गीत-नवगीत मिश्रित वृत्ति का द्योतन करते हैं जिनमें गीत की गेयता सम्पूर्ण कृति में ध्वनित हुई है। भोजपुरी भाषा की शब्दावली को चुन-चुनकर यथेष्ट प्रयोग करने में रचनाकार को सफलता मिली है। धूप-छनौटा, कजरौटा, पियास, भूभल, भगई, टुटही-टटिया, सतुई, चिचियाहट, बिसुखी गाय, गड़ही, लेंढ़ा, जाँत-लोढ़ा, बेना, मसहरी, रसरी, सानी-पानी, डीह, सतुआन, ढेला, खपड़े की ओरी, भाखी, मकई, चिरइया मोड़, भभक, तिलंगी, छरहरी, लँगड़ी-बिछिया, छितराया, निहोरा, पिअरी, चुहानी, जिनिगी, ताक, बतियाता, लमहर, चिरई, रेहन, गमछी, चिखुर, हरिअर, ददरी मेला  आदि शब्दों के प्रयोग ने एक ओर रचनाकार को भोजपुरी भाषा पर आधिपत्य को रेखांकित किया है वहीं दूसरी ओर आंचलिकता की प्रवृत्ति से भाषायी संप्रेषणीयता और समृद्धि का भी साक्ष्य प्रस्तुत हुआ है। पूर्वांचल का ददरी मेला जनपद बलिया की बलिदानीवृत्ति, भृगुनाथ मंदिर से जुड़ी संस्कृति एवं ऐतिहासिक क्षितिज की निर्मिति को आंचलिकता के धरातल पर अधिष्ठित और प्रतिष्ठित करता है जिसका वर्णन भारतेंदु हरिश्चंद्र ने अपने निबन्ध “भारतवर्षोन्नति” में किया है जो सांस्कृतिक समन्वय का प्रतीक सिद्ध हुआ है।
         
निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि शीर्षक सटीक, उपयुक्त एवं अपनी सार्थकता स्वयं प्रमाणित करता है। संग्रह की रचनायें षड् रस का प्रतिनिधित्व करती हैं जिनमें गीत, नवगीत, मुक्तक एवं गजल के शेअरों की अभिव्यंजना के स्वर ध्वनित होते हैं। आंचलिकता ग्राम्य परिवेश, प्रकृति-चित्रण, सांस्कृतिक-चैतन्यता, यथार्थवादी चित्रांकन, राजनीतिक परिवेश की अभिव्यक्ति आदि प्रवृत्तियों में कृति की वृत्ति अधिक रमी है। नवगीत के क्षेत्र में रचनाकार का यह ट्रायलबाल का नव प्रयोग काव्यानुरागियों को प्रीत करेगा ऐसा मेरा विश्वास है जिसके लिये शिवानन्द सिंह “सहयोगी” बधाई के पात्र हैं। कृति स्वागत योग्य है जिसमें काव्य-निकष रस का प्रतिमान ही काम्य सिद्ध है। 
१.७.२०१७ 
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गीत नवगीत संग्रह- सूरज भी क्यों बंधक, रचनाकार- शिवानंद सहयोगी, प्रकाशक-कोणार्क प्रकाशन, नई दिल्ली। प्रथम संस्करण- २०१५, मूल्य-२०० रुपये, पृष्ठ-१२८, समीक्षा- डा. पशुपतिनाथ उपाध्याय, ISBN-979-81-920238-7-8