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सोमवार, 22 दिसंबर 2025

२२ दिसंबर, हाइकु गीत, सॉनेट, गणपति, माधव, नारी, रेफ, दोहा सलिला

सलिल सृजन- २२ दिसंबर

दोहा सलिला
सूली पर मँहगाई की, लटकाती सरकार। 
बेकारी की कीलियाँ, ठोंक करे बेजार।। 
विष नकली इतिहास का, पिला रहे हैं रोज। 
खुश नफ़रत के भेड़िए, ठठा कर रहे भोज।। 
बना-बेच हथियार जो, करें-कराएँ युद्ध। 
चाहें सारा जग कहे, उनको गौतम बुद्ध।। 
भू-जल-जंगल बेच दो, खेत खेत नीलाम। 
घूस मुक्त कर घोषणा, खूब कमाओ दाम।। 
शत्रु पड़ोसी को बना, खूब मारिए डींग। 
छौंक खीर को आप दें, डाल जिस तरह हींग।। 
२२.१२.२०२५ 
०००

हाइकु गीत
जोड़-घटाना
प्रेम-नफरत को,
जीवन जीना.....
गुणा करना / परिश्रम का मीत / मत थकना।
भाग करना / थकावट का, जीत / मत रुकना।।
याद रखना
वस्त्र फ़टे या दिल
तुरंत सीना.....
प्रेम परिधि / संदेह के चाप से / कट न सके।
नेह निधि / आय घट-बढ़ से / घट न सके।।
नहीं फलता
गैर का प्राप्य यदि
तुमने छीना.....
जीवन रेखा / सरल हो या वक्र / टूट न सके।
भाग्य का लेखा / हाथ में लिया हाथ / छूट न सके।।
लाज का पर्दा
लोहे से मजबूत
किंतु है झीना.....
२२-१२-२०२२, २०.३३
जबलपुर
***
सॉनेट
गणपति
*
जय जय गणपति!, ऋद्धि-सिद्धिपति, मंगलकर्ता, हे प्रथमेश।
भव बाधा हर, हे शब्देश्वर!, सदय रहो प्रभु जोड़ूँ हाथ।
जयति गजानन, जय मतिदाता, शिवा तनय जय, हे विघ्नेश।।
राह न भटकूँ, कहीं न अटकूँ, पैर न पटकूँ, बल दो नाथ।।
वंदन-चंदन, कर अभिनंदन, करूँ स्तवन नित, हे सर्वेश!
जगजननी-जगपिता की कृपा, हो हम पर ऐसा वर दो।
विधि-हरि, शारद-रमा कृपा पा, भज पाएँ हम तुम्हें हमेश।।
करें काम निष्काम भाव से, शांति निकेतन सा घर दो।।
सत्य सनातन कह पाएँ जो ऐसी रचनाएँ हो दैव।
समयसाsक्षी घटनाओं में देखें-दिखा प्रगति की रेख।
चित्र गुप्त हो हरदम उज्जवल, निर्मल हो आचार सदैव।।
सकल सृष्टि परिवार हमारा, प्रकृति मैया पाएँ लेख।।
जय जय दीनानाथ! दयामय, द्रुतलेखी जय जय कलमेश!
रहे नर्मदा जीवन यात्रा, हर लो सारे कष्ट-कलेश।।
२२-१२-२०२१
***
सॉनेट
विवाह
*
चट मँगनी पट माँग भराई।
दुलहा सूरज दुल्हन धूप है।
उषा निहारे खूब रूप है।।
सास धरा को बहू सुहाई।।
द्वार हरिद्रा-छाप लगाई।
छाप पाँव की शुभ अनूप है।
सुतवधु रानी, पुत्र भूप है।।
जोड़ी विधि ने भली मिलाई।।
भौजाई की कर पहुनाई।
है हर्षाई ननदी कोयल।
नाचे मिट्ठू, देवर झूमे।।
ससुर गगन दे मुँह दिखराई।
सँकुचाई बरबस वधु चंचल।
नजर बजा सूरज वधु चूमे।।
२२-१२-२०२१
***
सॉनेट
नारी
*
शारद-रमा-उमा की जय-जय, करती दुनिया सारी।
भ्रांति मिटाने साथ हाथ-पग बढ़ें तभी हो क्रांति।
एक नहीं दो-दो मात्राएँ, नर से भारी नारी।।
सफल साधना तभी रहे जब जीवन में सुख-शांति।।
जाया-माया, भोगी-भोग्या, चित-पट अनगिन रंग।
आशा पुष्पा दे बगिया को, सुषमा-किरण अनंत।
पूनम तब जब रहे ज्योत्सना, रजनीपति के संग।।
उषा-दुपहरी-संध्या सहचर दिनपति विभा दिगंत।।
शिक्षा-दीक्षा, रीति-नीति बिन सार्थक हुई न श्वासा।
क्षुधा-पिपासा-तृष्णा बिना हो, जग-जीवन बेरंग।
कीर्ति-प्रतिष्ठा, सज्जा-लज्जा से जीवन मधुमासा।।
राधा धारा भक्ति-मुक्ति की, शुभ्रा-श्वेता संग।।
अमला विमला धवला सरला, सुख प्रदायिनी नारी।
मैया भगिनि भामिनि भाभी पुत्री सखी दुलारी।।
२२-१२-२०२१
***
सुभाषित
*अस्थिरं जीवितं लोके, अस्थिरे धनयौवने।*
*अस्थिरा: पुत्रदाराश्च, धर्मकीर्तिद्वयं स्थिरं*।।
अस्थिर जीवित लोक, धन यौवन स्थिर है नहीं।
सुत-स्त्री अस्थिर यहाँ, धर्म-कीर्ति स्थिर रहे।।
अर्थात्- इस जगत में जीवन सदा नही रहने वाला है, धन और यौवन भी सदा नहीं रहने वाले हैं, पुत्र और स्त्री भी सदा नहीं रहने वाले हैं ;केवल धर्म और कीर्ति ही सदा रहने वाले हैं॥
***
प्रात नमन स्वीकार कीजिए हे माधव।
स्वप्न सभी साकार कीजिए हे माधव।।
राघव सा लाघव, सीता सी मर्यादा
युत हमको आचार दीजिए हे माधव।।
वृंदा को जो छले न ऐसे हरि हों हम
शूर्पणखा हित लखन भेजिए हे माधव।।
नगरवधू से मुक्त समूचा भारत हो
गृहवधुओं सज्जित गृह करिए हे माधव।।
नेता हों रणछोड़; न लूटें जनगण को
गो गिरि वन नद पीड़ा हरिए हे माधव।।
हिरणकशिपु सेठों की भस्म करें लंका
जनहित-पथ पर फिर पग धरिए हे माधव।।
कंस प्रशासन ऐश कर रहा जन-धन पर
दर्प हरें कालिय फण नचिए हे माधव।।
न्याय व्यवस्था बंदी काले कोटों की
इन्हें दूर कर श्वेत-सरल करिए माधव।।
श्रीराधे को हृदय बसी छवि जो मधुरिम
वह से सलिल-हृदय में हँस बसिए माधव।।
२२-१२-२०१९
***
मुक्तक:
*
दे रहे सब कौन सुनता है सदा?
कौन किसका कहें होता है सदा?
लकीरों को पढ़ो या कोशिश करो-
वही होता जो है किस्मत में बदा।
*
ठोकर खाएँ नहीं हम हार मानते।
कारण बिना नहीं किसी से रार ठानते।।
कुटिया का छप्पर भी प्यारा लगता-
संगमर्मरी ताजमहल हम न जानते।।
*
तम तो पहले भी होता था, ​अब भी होता है।
यह मनु पहले भी रोता था, अब रोता है।।
पहले थे परिवार, मित्र, संबंधी उसके साथ-
आज न साया संग इसलिए धीरज खोता है।।
२२.१२.२०१८
***
मुक्तक
*
जब बुढ़ापा हो जगाता रात भर
याद के मत साथ जोड़ो मन इसे.
प्रेरणा, जब थी जवानी ली नहीं-
मूढ़ मन भरमा रहा अब तू किसे?
२२-१२-२०१६
***
सामयिक गीत :
नूराकुश्ती खेल रहे हो
देश गर्त में ठेल रहे हो
*
तुम ही नहीं सयाने जग में
तुम से कई समय के मग में
धूल धूसरित पड़े हुए हैं
शमशानों में गड़े हुए हैं
अवसर पाया काम करो कुछ
मिलकर जग में नाम करो कुछ
रिश्वत-सुविधा-अहंकार ही
झिला रहे हो, झेल रहे हो
नूराकुश्ती खेल रहे हो
देश गर्त में ठेल रहे हो
*
दलबंदी का दलदल घातक
राजनीति है गर्हित पातक
अपना पानी खून बताएँ
खून और का व्यर्थ बहाएँ
सच को झूठ, झूठ को सच कह
मैली चादर रखते हो तह
देशहितों की अनदेखी कर
अपनी नाक नकेल रहे हो
नूराकुश्ती खेल रहे हो
देश गर्त में ठेल रहे हो
२१-१२-२०१५
***
मुक्तिका:
नए साल का अभिनंदन
अर्पित है अक्षत-चंदन
तम हरने दीपक जलता
कब कहता है लगी अगन
कोशिश हार न मानेगी
मरु को कर दे नंदन वन
लक्ष्य वही वर पाता है
जो प्रयास में रहे मगन
बाधाओं को विजय करे
दृढ़ हो जिसका अंतर्मन
गिर मत रुक, उठ आगे बढ़
मत चुकने दे 'सलिल' लगन
बंदूकों से 'सलिल' न डर
जीता भय पर सदा अमन
२२.१२.२०१४
***
धूप -छाँव: बात निकलेगी तो फिर
गुजरे वक़्त में कई वाकये मिलते हैं जब किसी साहित्यकार की रचना को दूसरे ने पूरा किया या एक की रचना पर दूसरे ने प्रति-रचना की. अब ऐसा काम नहीं दिखता। संयोगवश स्व. डी. पी. खरे द्वारा गीता के भावानुवाद को पूर्ण करने का दायित्व उनकी सुपुत्री श्रीमती आभा खरे द्वारा सौपा गया. किसी अन्य की भाव भूमि पर पहुँचकर उसी शैली और छंद में बात को आगे बढ़ाना बहुत कठिन मशक है. धूप-छाँव में हेमा अंजुली जी के कुछ पंक्तियों से जुड़कर कुछ कहने की कोशिश है. आगे अन्य कवियों से जुड़ने का प्रयास करूंगा ताकि सौंपे हुए कार्य के साथ न्याय करने की पात्रता पा सकूँ. पाठक गण निस्संकोच बताएं कि पूर्व पंक्तियों और भाव की तारतम्यता बनी रह सकी है या नहीं? हेमा जी को उनकी पंक्तियों के लिये धन्यवाद।
हेमा अंजुली
इतनी शिद्दत से तो उसने नफ़रत भी नहीं की ....
जितनी शिद्दत से हमने मुहब्बत की थी.
.
सलिल:
अंजुली में न नफरत टिकी रह सकी
हेम पिघला फिसल बूँद पल में गई
साथ साये सरीखी मोहब्बत रही-
सुख में संग, छोड़ दुख में 'सलिल' छल गई
*
हेमा अंजुली
तुम्हारी वो एक टुकड़ा छाया मुझे अच्छी लगती है
जो जीवन की चिलचिलाती धूप में
सावन के बादल की तरह
मुझे अपनी छाँव में पनाह देती है
.
सलिल
और तुम्हारी याद
बरसात की बदरी की तरह
मुझे भिगाकर अपने आप में सिमटना
सम्हलना सिखा आगे बढ़ा देती है.
*
हेमा अंजुली
कभी घटाओं से बरसूँगी ,
कभी शहनाइयों में गाऊँगी,
तुम लाख भुलाने कि कोशिश कर लो,
मगर मैं फिर भी याद आऊँगी ...
.
सलिल
लाख बचाना चाहो
दामन न बचा पाओगे
राह पर जब भी गिरोगे
तुम्हें उठायेंगे
*
हेमा अंजुली
छाने नही दूँगी मैं अँधेरो का वजूद
अभी मेरे दिल के चिराग़ बाकी हैं
.
सलिल
जाओ चाहे जहाँ मुझको करीब पाओगे
रूह में खनक के देखो कि आग बाकी है
*
हेमा अंजुली
सूरत दिखाने के लिए तो
बहुत से आईने थे दुनिया में
काश! कि कोई ऐसा आईना होता
जो सीरत भी दिखाता
.
सलिल
सीरत 'सलिल' की देख टूट जाए न दर्पण
बस इसलिए ही आइना सूरत रहा है देख
***
मुक्तक
मन-वीणा जब करे ओम झंकार
गीत हुलास कर खटकाते हैं द्वार
करे संगणक स्वागत टंकण यंत्र-
सरस्वती मैया की जय-जयकार
***
मातृ वंदना -
*
ममतामयी माँ नंदिनी-करुणामयी माँ इरावती।
सन्तान तेरी मिल उतारें, भाव-भक्ति से आरती...
लीला तुम्हारी हम न जानें, भ्रमित होकर हैं दुखी।
सत्पथ दिखाओ माँ, बने सन्तान सब तेरी सुखी॥
निर्मल ह्रदय के भाव हों, किंचित न कहीं अभाव हों-
सात्विक रहे आचार, माता सदय रहो निहारती..
कुछ काम जग के आ सकें, महिमा तुम्हारी गा सकें।
सत्कर्म कर आशीष मैया!, पुत्र तेरे पा सकें॥
निष्काम औ' निष्पक्ष रह, सब मोक्ष पायें अंत में-
निश्छल रहें मन-प्राण, वाणी नित तम्हें गुहारती...
चित्रेश प्रभु केकृपा मैया!, आप ही दिलवाइये।
जैसे भी हैं, हैं पुत्र माता!, मत हमें ठुकराइए॥
कंकर से शंकर बन सकें, सत-शिव औ' सुंदर वर सकें-
साधना कर सफल, क्यों मुझ 'सलिल' को बिसारती...
२१-१२-२०१२
***
विचार-विमर्श नारी प्रताड़ना का दंड? संजीव 'सलिल'
*
दिल्ली ही नहीं अन्यत्र भी भारत हो या अन्य विकसित, विकासशील या पिछड़े देश, भाषा-भूषा, धर्म, मजहब, आर्थिक स्तर, शैक्षणिक स्तर, वैज्ञानिक उन्नति या अवनति सभी जगह नारी उत्पीडन एक सा है. कहीं चर्चा में आता है, कहीं नहीं किन्तु इस समस्या से मुक्त कोई देश या समाज नहीं है.
फतवा हो या धर्मादेश अथवा कानून नारी से अपेक्षाएं और उस पर प्रतिबन्ध नर की तुलना में अधिक है. एक दृष्टिकोण 'जवान हो या बुढ़िया या नन्हीं सी गुडिया, कुछ भी हो औरत ज़हर की है पुड़िया' कहकर भड़ास निकलता है तो दूसरा नारी संबंधों को लेकर गाली देता है.
यही समाज नारी को देवी कहकर पूजता है यही उसे भोगना अपना अधिकार मानता है.
'नारी ने जनम दिया मर्दों को, मर्दों ने उसे बाज़ार दिया' यदि मात्र यही सच है तो 'एक नहीं दो-दो मात्राएँ नर से भारी नारी' कहनेवाला पुरुष आजीवन माँ, बहन, भाभी, बीबी या कन्या के स्नेहानुशासन में इतना क्यों बंध जाता है 'जोरू का गुलाम कहलाने लगता है.
स्त्री-पीड़ित पुरुषों की व्यथा-कथा भी विचारणीय है.
घर में स्त्री को सम्मान की दृष्टि से देखनेवाला युवा अकेली स्त्री को देखते ही भोगने के लिए लालायित क्यों हो जाता है?
ऐसे घटनाओं के अपराधी को दंड क्या और कैसे दिया जाए? इन बिन्दुओं पर विचार-विमर्श आवश्यक प्रतीत होता है. आपका स्वागत है।
२२-१२-२०१२
***
विमर्श : रेफ युक्त शब्द
राकेश खंडेलवाल
रेफ़ वाले शब्दों के उपयोग में अक्सर गलती हो जाती हैं। हिंदी में 'र' का संयुक्त रूप से तीन तरह से उपयोग होता है। '
१. कर्म, धर्म, सूर्य, कार्य
२. प्रवाह, भ्रष्ट, ब्रज, स्रष्टा
३. राष्ट्र, ड्रा
जो अर्ध 'र' या रेफ़ शब्द के ऊपर लगता है, उसका उच्चारण हमेशा उस व्यंजन ध्वनि से पहले होता है, जिसके ऊपर यह लगता है। रेफ़ के उपयोग में ध्यान देने वाली महत्वपूर्ण बात यह है कि स्वर के ऊपर नहीं लगाया जाता। यदि अर्ध 'र' के बाद का वर्ण आधा हो, तब यह बाद वाले पूर्ण वर्ण के ऊपर लगेगा, क्योंकि आधा वर्ण में स्वर नहीं होता। उदाहरण के लिए कार्ड्‍‍स लिखना गलत है। कार्ड्‍स में ड्‍ स्वर विहीन है, जिस कारण यह रेफ़ का भार वहन करने में असमर्थ है। इ और ई जैसे स्वरों में रेफ़ लगाने की कोई गुंजाइश नहीं है। इसलिए स्पष्ट है कि किसी भी स्वर के ऊपर रेफ़ नहीं लगता।
ब्रज या क्रम लिखने या बोलने में ऐसा लगता है कि यह 'र' की अर्ध ध्वनि है, जबकि यह पूर्ण ध्वनि है। इस तरह के शब्दों में 'र' का उच्चारण उस वर्ण के बाद होता है, जिसमें यह लगा होता है ,
जब भी 'र' के साथ नीचे से गोल भाग वाले वर्ण मिलते हैं, तब इसके /\ रूप क उपयोग होता है, जैसे-ड्रेस, ट्रेड, लेकिन द और ह व्यंजन के साथ 'र' के / रूप का उपयोग होता है, जैसे- द्रवित, द्रष्टा, ह्रास।
संस्कृत में रेफ़ युक्त व्यंजनों में विकल्प के रूप में द्वित्व क उपयोग करने की परंपरा है। जैसे- कर्म्म, धर्म्म, अर्द्ध। हिंदी में रेफ़ वाले व्यंजन को द्वित्व (संयुक्त) करने का प्रचलन नहीं है। इसलिए रेफ़ वाले शब्द गोवर्धन, स्पर्धा, संवर्धन शुद्ध हैं।
''जो अर्ध 'र' या रेफ़ शब्द के ऊपर लगता है, उसका उच्चारण हमेशा उस व्यंजन ध्वनि से पहले होता है। '' के संबंध में नम्र निवेदन है कि रेफ कभी भी 'शब्द' पर नहीं लगाया जाता. शब्द के जिस 'अक्षर' या वर्ण पर रेफ लगाया जाता है, उसके पूर्व बोला या उच्चारित किया जाता है।
- संजीव सलिल:
''हिंदी में 'र' का संयुक्त रूप से तीन तरह से उपयोग होता है.'' के संदंर्भ में निवेदन है कि हिन्दी में 'र' का संयुक्त रूप से प्रयोग चार तरीकों से होता है। उक्त अतिरिक्त ४. कृष्ण, गृह, घृणा, तृप्त, दृष्टि, धृष्ट, नृप, पृष्ठ, मृदु, वृहद्, सृष्टि, हृदय आदि। यहाँ उच्चारण में छोटी 'इ' की ध्वनि समाविष्ट होती है जबकि शेष में 'अ' की।
यथा: कृष्ण = krishn, क्रम = kram, गृह = ग्रिह grih, ग्रह = grah, श्रृंगार = shringar, श्रम = shram आदि।
राकेश खंडेलवाल :
एक प्रयोग और: अब सन्दर्भ आप ही तलाशें:
दोहा:-
सोऽहं का आधार है, ओंकार का प्राण।
रेफ़ बिन्दु वाको कहत, सब में व्यापक जान।१।
बिन्दु मातु श्री जानकी, रेफ़ पिता रघुनाथ।
बीज इसी को कहत हैं, जपते भोलानाथ।२।
हरि ओ३म तत सत् तत्व मसि, जानि लेय जपि नाम।
ध्यान प्रकाश समाधि धुनि, दर्शन हों बसु जाम।३।
बांके कह बांका वही, नाम में टांकै चित्त।
हर दम सन्मुख हरि लखै, या सम और न बित्त।४।
रेफ का अर्थ:
-- वि० [सं०√रिफ्+घञवार+इफन्] १. शब्द के बीच में पड़नेवाले र का वह रूप जो ठीक बाद वाले स्वरांत व्यंजन के ऊपर लगाया जाता है। जैसे—कर्म, धर्म, विकर्ण। २. र अक्षर। रकार। ३. राग। ४. रव। शब्द। वि० १. अधम। नीच। २. कुत्सित। निन्दनीय। -भारतीय साहित्य संग्रह.
-- पुं० [ब० स०] १. भागवत के अनुसार शाकद्वीप के राजा प्रियव्रत् के पुत्र मेधातिथि के सात पुत्रों में से एक। २. उक्त के नाम पर प्रसिद्ध एक वर्ष अर्थात् भूखंड।
रेफ लगाने की विधि : डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक', शब्दों का दंगल में
हिन्दी में रेफ अक्षर के नीचे “र” लगाने के लिए सदैव यह ध्यान रखना चाहिए कि ‘र’ का उच्चारण कहाँ हो रहा है?
यदि ‘र’ का उच्चारण अक्षर के बाद हो रहा है तो रेफ की मात्रा सदैव उस अक्षर के नीचे लगेगी जिस के बाद ‘र’ का उच्चारण हो रहा है। यथा - प्रकाश, संप्रदाय, नम्रता, अभ्रक, चंद्र।
हिन्दी में रेफ या अक्षर के ऊपर "र्" लगाने के लिए सदैव यह ध्यान रखना चाहिए कि ‘र्’ का उच्चारण कहाँ हो रहा है ? “र्" का उच्चारण जिस अक्षर के पूर्व हो रहा है तो रेफ की मात्रा सदैव उस अक्षर के ऊपर लगेगी जिस के पूर्व ‘र्’ का उच्चारण हो रहा है । उदाहरण के लिए - आशीर्वाद, पूर्व, पूर्ण, वर्ग, कार्यालय आदि ।
रेफ लगाने के लिए जहाँ पूर्ण "र" का उच्चारण हो रहा है वहाँ उस अक्षर के नीचे रेफ लगाना है जिसके पश्चात "र" का उच्चारण हो रहा है। जैसे - प्रकाश, संप्रदाय , नम्रता, अभ्रक, आदि में "र" का पूर्ण उच्चारण हो रहा है ।
*
६३ ॥ श्री अष्टा वक्र जी ॥
दोहा:-
रेफ रेफ तू रेफ है रेफ रेफ तू रेफ ।
रेफ रेफ सब रेफ है रेफ रेफ सब रेफ ॥१॥
*
१५२ ॥ श्री पुष्कर जी ॥
दोहा:-
रेफ बीज है चन्द्र का रेफ सूर्य का बीज ।
रेफ अग्नि का बीज है सब का रेफैं बीज ॥१॥
रेफ गुरु से मिलत है जो गुरु होवै शूर ।
तो तनकौ मुश्किल नहीं राम कृपा भरपूर ॥२॥
*
चलते-चलते : अंग्रेजी में रेफ का प्रयोग सन्दर्भ reference और खेल निर्णायक refree के लिये होता है.
***

शुक्रवार, 25 नवंबर 2022

आद्यक्षरी रचना, राजेंद्र निगम 'राज', इंदु राज निगम, दोहा सलिला


आद्यक्षरी रचना

राजेंद्र निगम 'राज'

'रा' करता है राज दिलों पर

'जे' जेवर सम काव्य रचे।

'न्' से न्यून न हुआ काव्य-रस

'द्र'वित हुआ दिल, भाव बचे।।

'नि'बल सबल सब साथ रहें मिल

'ग'म पीकर दें बाँट हँसी।

'म'न की बात न हो मनमानी

'रा'ज तभी दे सके ख़ुशी।।

*

इंदु राज निगम

'इ' सको उसको घास न डाली।

'न्'याय किया है दिल के साथ।।

'दु'आ सुनी प्रभु जी ने मेरी

'रा'ह मिली रख ऊँचा माथ।। आद्यक्षरी रचना

'रा' करता है राज दिलों पर

'जे' जेवर सम काव्य रचे।

'न्' से न्यून न हुआ काव्य-रस

'द्र'वित हुआ दिल, भाव बचे।।

'नि'बल सबल सब साथ रहें मिल

'ग'म पीकर दें बाँट हँसी।

'म'न की बात न हो मनमानी

'रा'ज तभी दे सके ख़ुशी।।

*

'ज' य माला ले जीवन साथी

'नि'गम मिले गम मिटे सभी।

'ग'जब हुआ कविता कविता मिल

'म'मता-समता हुई अभी।।

***
दोहा सलिला 

मन आँगन में इंदु हों, लेकर रश्मि अनेक

चित्र गुप्त साकार हों, जाग्रत रखें विवेक

राज करें राजेंद्र जी, रहें नि-गम हँस नित्य

बेगम बे-गम रह उन्हें, दें आनंद अनित्य

भेजें वे गुरु ग्राम खुद, रहें शहर में मस्त

कविता सुना सुना करें, जिसको चाहें त्रस्त

आम आदमी हम मिले, आ हमसे राजेंद्र

काश कभी निशि सकें मिल, आकर आप नरेंद्र

शुक्रवार, 11 नवंबर 2022

रमेशचंद्र खरे, दोहा सलिला, गीत, समीक्षा


कृति परिचय -
किताबों में से निकली किताब - साहित्य बगिया में महकता गुलाब
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
[कृति विवरण - किताबों में से निकली किताब, समीक्षा संकलन, डॉ. रमेशचंद्र खरे, प्रथम संस्करण २०२०, आकार २१.५ से.मी. x १४ से.मी., पृष्ठ १८०, मूल्य १७५/-, प्रकाशक इंद्र पब्लिशिंग हाउस भोपाल]
*
मानव समाज में नीतिशास्त्र या संविधान की तरह साहित्य में समीक्षा अथवा समलोचना का महत्वपूर्ण स्थान है। समालोचना द्वारा ही किसी कृति की श्रेष्ठता, सामान्यता या हीनता का चिंतन किया जाता है। समालोचक साहित्य के सिद्धांतों के निकष पर कसने के साथ स्वविवेक से कृति की श्रेष्ठता, उपादेयता आदि पर विचार व्यक्त करता है। समालोचना के सिद्धांत, मानक या नियम देश-काल-परिस्थति सापेक्ष होते हैं, नश्वर नहीं। समालोचक की विचारधारा, मान्यताएँ, रुचि-अरुचि तथा लोकमत का भी महत्व है। किसी कृति को एक समीक्षक श्रेष्ठ निरूपित करता है तो अन्य सामान्य या हीन, तथापि निष्पक्ष और विवेकी समीक्षक नीर-क्षीर विवेचन कर कृति का मूल्यांकन करते हैं। संस्कृत की 'लोच्' क्रिया का अर्थ देखना (नयनों से), समझना (मन से) और प्रकाशित करना है। 'आ' उपसर्ग का अर्थ है चारों और से अथवा पूर्णतया। आलोचना का अर्थ है किसी वस्तु या कृति को सांगोपांग देख-समझकर उस पर / उसके संबंध में कुछ कहन या लिखना। 'सम' उपसर्ग के साथ संयुक्त होकर आलोचना, समालोचना हो जाती है जिसका अर्थ है संतुलित, निष्पक्ष या भली-भाँति मूल्यांकन करना। संस्कृत की टीका, व्याख्या या भाष्य, अंग्रेजी के क्रिटिसिज़्म, रिव्यू या ओपिनियन, अरबी के नज़रसानी, नुक्ताचीनी से समालोचना का आशय लिया जा सकता है। संस्कृत की एक उक्ति है 'कवि: करोति काव्यानां रसं जानाति पंडित:' अर्थात कवि कृति की रचना करता है जबकि विद्वान् उसका रस लेता है। बाबू श्यामसुंदर दास के अनुसार 'अच्छा कवि जीवन की व्याख्या करता है तो अच्छा समालोचक उस व्याख्या को समझने में सहायक होता है।'
डॉ. रमेशचंद्र खरे राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक, सहृदय कवि, प्रखर व्यंग्यकार, कुशल कहानीकार, सक्षम समीक्षक तथा समझदार पाठक हैं। इस नाते किसी कृति पर उनके विचार, उनका चिंतन, उनका अभिमत समीक्षा के रूप में उपलब्ध होना रचनाकार, पाठकों, शोधार्थियों व विद्वानों सबके लिए बहुत उपयोगी है। विवेच्य कृति 'किताबों में से निकली किताब लघु समीक्षा कोष है जिसमें डॉ. खरे द्वारा समकालिक कृतियों पर लिखित ४२ महत्वपूर्ण समीक्षाएँ संकलित हैं। ये पुस्तकें विविध विधाओं (८ उपन्यास, ५ गीत-नवगीत संग्रह, ४ निबंध संग्रह ,३ खंडकाव्य, ३ काव्य संकलन, ३ व्यंग्य लेख संग्रह ,२ उपन्यासिकाएँ, २ प्रबंध काव्य, २ कहानी संग्रह, २ मुक्तक संग्रह, २ ग़ज़ल संग्रह, १ महाकाव्य, १ शोधकृति, १ दैनन्दिनी, १ पत्र संकलन, १ व्यंग्य काव्य, १ संस्मरण संग्रह, १ यात्रा संस्मरण, १ समालोचना कृति, १ भाषा शास्त्र) पर महत्वपूर्ण रचनाकारों (अम्बिका प्रसाद दिव्य, हरिभाऊ उपाध्याय, इंद्रबहादुर खरे, नरेश मेहता, प्रभाकर श्रोत्रिय, लीलाधर मंडलोई, कुँअर नारायण, डॉ. श्यामसुंदर दुबे, चंद्रसेन विराट, गंगाप्रसाद बरसैंया, मयंक श्रीवास्तव, संतोष खरे, डॉ. रामनारायण शर्मा, डॉ. सुरेश कुमार वर्मा, डॉ. शिवकुमार तिवारी, ओमप्रकाश श्रीवास्तव, डॉ. देवप्रकाश खन्ना, डॉ. रामबल्लभ आचार्य, जंगबहादुर श्रीवास्तव, पूनम ए. चावला, दिलजीतसिंह रील, निर्मला जोशी, रमेश बख्शी, सत्यमोहन वर्मा, डॉ. रघुनंदन चिले, डॉ. नाथूराम राठौर, आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', शंकर शरण बत्रा, विनोद श्रीवास्तव, डॉ. अनिता, अभभरती, डॉ. गिरीश कुमार श्रीवास्तव तथा विनोद गुप्ता) द्वारा लिखी गयी और चर्चित हुई हैं।
विधा-वैविध्य से डॉ. रमेशचंद्र खरे के विस्तृत अध्ययन आकाश का आभास होता है। किसी पुस्तक की समीक्षा करना अपने आपमें जटिल काम है। विविध विधाओं की पुस्तकों की समीक्षा करना अर्थात उन सब विधाओं के मानकों, उनमें हुए महत्वपूर्ण सृजन से परिचित होना और मनोयोगपूर्वक हर कृति के गुण-दोष परख कर इस तरह प्रस्तुत करना कि कृति, कृतिकार और पाठक सबके साथ न्याय होते हुए कुछ नया और सार्थक कथ्य संप्रेषित हो सके। एक ही विधा की कई कृतियों की समीक्षाओं संकलित करते समय दुहराव और ऊब न हो, विविध कालखंडों की रचनाओं में प्रामाणिकता और ऐतिहासिकता का आकलन करना, भिन्न-भिन्न विचारधाराओं से प्रेरित कृतियों की सटीक विवेचना कर निष्पक्षता बनाये रख पाना और वह भी कम से कम शब्दों में, यह कार्य रज्जु पर खेल दिखाते नट के संतुलन-कौशल से भी बहुत अधिक दुष्कर है।
सामान्यत: पुस्तक का समीक्षा लेखन सैद्धांतिक समीक्षा का अंश मात्र है। समीक्षक के समक्ष अनेक प्रतिबंध होते हैं। यथा कृति की अंतर्वस्तु का आभास सामान्य पाठक को हो सके ताकि वह पढ़ने के लिए प्रेरित हो, विद्वानों के लिए नीर-क्षीर विवेचन हो, रचनाकार हतोत्साहित न हो तथा पत्रिकाओं में उपलब्ध सीमित स्थान के अनुरूप समीक्षा भी 'गागर में सागर' की तरह संक्षिप्त हो। डॉ. खरे स्वयं श्रेष्ठ-ज्येष्ठ और बहुविधायी लेखन के धनी रचनाकार हैं, इसलिए वे इस कठिनतम कार्य को सहजता और प्रमाणिकता के साथ निष्पादित कर सके हैं। कृति की भूमिका में वरिष्ठ भाषाशास्त्री, शिक्षाविद, उपन्यासकार, कहानीकार, निबंधकार, नाटककार और कवि डॉ. सुरेश कुमार वर्मा ने ठीक ही लिख है "समीक्षक की यात्रा दो चरणों में संपन्न होती है- अध्ययन और लेखन। अध्ययन से रचना (समीक्षा) में परिपक्वता आती है और तुलनात्मक समीक्षा के नए आयाम खुलते हैं। रमेश खरे जी की बहुज्ञता का एक कारण उनका विपुल अध्ययन है। उन्होंने गद्य-पद्य की समस्त विधाओं के महत्वपूर्ण ग्रंथों को गंभीरता से पढ़ा है। यह पठन उनके समस्त लेखन में झलकता है और उनकी रचनाओं की विश्वसनीयता में वृद्धि करता है। खरे जी ने अपने समीक्षा कर्म में नीर-क्षीर विवेक का प्रयोग किया है।'' मैं इस आकलन से पूरी तरह सहमत हूँ।
विवेच्य कृति हिंदी वांग्मय को समृद्ध करने के साथ वन रचनाकारों का पथप्रदर्शन करने में भी समर्थ है। इसे पढ़कर रचनाकार समझ सकता है की उसे अपने विषय और विधा के साथ न्याय किस तरह करना है? उसकी कृति का मूल्यांकन किन आधारों पर किया जाएगा। नव समीक्षकों के लिए यह कृति पाठ्य पुस्तक की तरह है। विविध विधाओं की कृतियों में किन पहलूओं को कितना महत्व दिया जाना चाहिए,किन मानकों के आधार पर उन्हें परखा जाना चाहिए आदि जानकारी सप्रयोग उपलब्ध है। इस दृष्टि से इस कृति का वही महत्त्व है जो विज्ञान में प्रयोग कार्य के मैनुअल का होता है।
हिंदी भाषा और साहित्य को गंभीर क्षति डॉ. रमेशचंद्र खरे के असामयिक निधन से हुई है। महाप्रस्थान कुछ दिन पूर्व ही उनसे मुझे यह कृति प्राप्त हुई थी। काश, यह समीक्षा वे पढ़ पाते। विधि का विधान डॉ. खरे के कृतित्व का सम्यक मूल्यांकन उनके जीवन काल में नहीं हो सका, अब होना चाहिए। उनके अप्रकाशित कार्य को प्रकाशित करने की दिशा में भी पहल की जानी चाहिए। स्व. विष्णुस्वरूप खरे और स्व. श्यामा बाई खरे के पुत्र रमेश जी क जन्म १९ जुलाई १९३७ को होशंगाबाद में हुआ था। उन्होंने साहित्य रत्न, एम. ए., (इतिहास, हिंदी) तथा पीएच। डी. की उपाधियाँ अर्जित कीं। 'अंबिका प्रसाद 'दिव्य' : व्यक्तित्व और कृतित्व' उनका महत्वपूर्ण शोध ग्रंथ अब तक अप्रकाशित है। डॉ. खरे रचित प्रमुख प्रकाशित कृतियाँ है- पद्य : गोस्वामी तुलसीदास पर रचित महाकाव्य 'विरागी अनुरागी' (३ संस्करण,अभियान जबलपुर द्वारा भाषा भूषण १९९८, बालकृष्ण शर्मा पुरस्कार), गीत संग्रह 'संवेदनाओं के सोपान' (चंद्रप्रकाश वर्मा पुरस्कार), व्यंग्यायन खंड काव्य (म.प्र. लेखिका संघ पुरस्कार), गीता योगायन खंड काव्य (अक्षर आदित्य सम्मान), संभावनाओं के आयाम, बहरा युग, बाल साहित्य : आओ गाएँ शाला पढ़ते-पढ़ते, आओ सीखें मैदानों में गाते-गाते, आओ खेलें रंगमंच पर मंथन करते, आओ बाँटें यादें बचपन की हँसते-हँसते, प्रकृति से पहचान, कहानियाँ बुद्धि और विवेक की (दिव्य पुरस्कार, बाल पुरस्कार), व्यंग्य : अधबीच में लटके, शेष कुशल है, मेरे भरोसे मत रहना शरद जोशी व्यंग्य पुरस्कार, सूत्रों के हवाले से, निबंध : भावानुभूति, भावानुकृति, कृतित्व से झाँकते व्यक्तित्व आदि।
'किताबों में से निकली किताब' डॉ. राम्रश्चंद्र खरे की साहित्यिक पैठ, बहुविधायी सामर्थ्य, समीक्षकीय नैपुण्यता तथा तटस्थ चिंतन की साक्षी है। डॉ. खरे लिखित समीक्षाओं का वैशिष्ट्य कृति की विधा व अंतर्वस्तु के अनुरूप परख करना तथा सरसता है। उनकी विपुल अध्ययनशीलता गुण-दोष निर्धारण में सहायक है। आदर्श शिक्षक होने के नाते वे संप्रेषणीयता कला पर अधिकार रखते हैं। उनके गयी समीक्षाएँ पाठकों को बाँधती हैं। वे न तो विधा के मानकों को पुलिस के डंडे की तरह प्रयोग करते हैं, न नेताओं द्वारा विधान को ठेंगे पर मारने की तरह मानकों की अनदेखी करते हैं। घर के तटस्थ मुखिया की तरह वे सहृदयता पूर्वक गुण-दोषों के मध्य तटस्थ रहकर समीक्षा कर्म से रचनाकारों और कृतियों को अभिसिंचित करते हैं। डॉ.खरे की प्रथम समालोचना कृति 'किताबों में से निकली किताबें उन्हें कुशल समीक्षकों की पंक्ति में प्रतिष्ठित करती है।
११-११-२०२०
***
दोहा सलिला
शिशु शशि शीश शशीश चुप, शशिवदनी-शशिनाथ
कुंडलि कुंडलिनाथ की, निरखें गहकर हाथ
*
अरुण गीतमय हो रहा, रजनी भाव विभोर
उषा लाल-पीली हुई, पवन कर रहा शोर
*
भू, जल, अग्नि, पवन,गगन, पञ्च चक्र के तत्व
रख विवेक जाग्रत सलिल', तभी प्राप्त हो सत्व
*
खुदा खुदी खुद में रहे, खुद न खुदा से भिन्न
जुदा खुदा से कब हुआ, कोई सलिल'अभिन्न
*
खुद में खुद ही डूब जा, खुद रह खुद से दूर
खुद ही खुद मिल जायेगा, तुझको खुद का नूर
*
श्री श्री की श्री-सरलता, मीठी वाणी खूब
उतना ही ज्यादा मिले, जितना जाओ डूब
*
तन कुंडा में कुंडली, आत्म चेतना जान
छंद कुंडलनि रच 'सलिल', मन होगा रसखान
*
सरसों के पीले किये, जब से भू ने हाथ
एक साथ हँस-रो रही, उठा-झुका कर माथ
*
जन्म ब्याह राखी तिलक, गृह-प्रवेश त्यौहार
हर अवसर पर दे 'सलिल', पुस्तक ही उपहार
*
मत प्रयास करना अधिक, और न देना छोड़
थोड़ी-थोड़ी कोशिशें, लोहा भी दें मोड़
*
जोड़-तोड़ से क्या मिला?, खोया मन का चैन
होड़ न करना किसी से, छोड़ स्वार्थ पा चैन
*
अधिक खींचने से 'सलिल', टूटे मन की डोर
अधिक ढील से उलझकर, गुम चैन के छोर
*
सु-मन ग्रहण कविता करे, मिले सुमन सी गंध
दूर दृष्ट भी हो निकट, हट जाए मन-बंध
११-११-२०१६
***
गीत:
कौन हो तुम?
*
कौन हो तुम?
मौन हो तुम?...
*
समय के अश्वों की वल्गा
निरंतर थामे हुए हो.
किसी को अपना किया
ना किसी के नामे हुए हो.

अनवरत दौड़ा रहे रथ
दिशा, गति, मंजिल कहाँ है?
डूबते ना तैरते, मझधार या
साहिल कहाँ है?

क्यों कभी रुकते नहीं हो?
क्यों कभी झुकते नहीं हो?
क्यों कभी चुकते नहीं हो?
क्यों कभी थकते नहीं हो?

लुभाते मुझको बहुत हो
जहाँ भी हो जौन हो तुम.
कौन हो तुम?
मौन हो तुम?...
*
पूछता है प्रश्न नाहक,
उत्तरों का जगत चाहक.
कौन है वाहन सुखों का?
कौन दुःख का कहाँ वाहक?

करो कलकल पर न किलकिल.
ढलो पल-पल विहँस तिल-तिल.
साँझ को झुरमुट से झिलमिल.
झाँक आँकों नेह हिलमिल.

क्यों कभी जलते नहीं हो?
क्यों कभी ढलते नहीं हो?
क्यों कभी खिलते नहीं हो?
क्यों कभी फलते नहीं हो?

छकाते हो बहुत मुझको
लुभाते भी तौन हो तुम.
कौन हो तुम?
मौन हो तुम?...
११-११-२०१०
***

मंगलवार, 18 अक्टूबर 2022

लक्ष्मी मंत्र, दोहा सलिला

अनुष्ठान:
लक्ष्मी मंत्र : क्यों और कैसे?
सहस्त्रों वर्ष पूर्व रचित भागवत पुराण के अनुसार कलियुग में एक अच्छा कुल (परिवार) वही कहलाएगा, जिसके पास सबसे अधिक धन होगा। आजकल धन जीवन की आवश्यकता पूर्ति का साधन मात्र नहीं, समाज में सम्मान पाने आधार है। जीवन में सफलता के दो आधार भाग्य और पौरुष हैं। तुलसी 'हुईहै सोहि जो राम रचि राखा / को करि तरक बढ़ावै साखा' के साथ 'कर्म प्रधान बिस्व करि राखा / जो जस करहि सो तस फल चाखा' कहकर इस द्वैत को व्यक्त करते हैं। शास्त्रों में 'उद्यमेन हि सिद्धन्ति कार्याणि न मनोरथैः / नहिं सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशंति मुख्य मृगा:' कहकर कर्म का महत्त्व दर्शाया गया है। गीता भी 'कर्मण्येवाधिकारस्ते माँ फलेषु कदाचन' अर्थात 'कर्म मात्र अधिकार तुम्हारा, क्या फल होगा सोच न कऱ निष्काम कर्म हेतु प्रेरित करती है।
यह भी देखा जाता है कि भाग्य में धन लिखा है तो किसी न किसी प्रकार मिल जाता है, भाग्य में न हो तो सकल सावधानी के बाद भी सब वैभव नष्ट हो जाता है। सत्य नारायण की कथा के अनुसार अपने स्वजनों के अकरम का फल भी जीव को भोगना पड़ता है। ज्योतिष शास्त्र तथा धार्मिक कर्मकांड के अनुसार अनेक शास्त्रीय उपाय हैं जिन्हें करने से मनुष्य अपनी इच्छाओं को पूर्ण करने में सक्षम होता है। ये शास्त्रीय उपाय मंत्र जाप, दान-पुण्य आदि हैं। धनवान बनने हेतु जातक की राशि के अनुसार धन की देवी लक्ष्मी के मंत्र का जाप करें। इससे जातक के ऊपर धन की वर्षा होकर जीवन से दरिद्रता दूर होती है और वह सुखी बनता है। लक्ष्मी का आशीर्वाद जीवन में धन और खुशहाली दोनों लाते हैं।
मेष राशि- मंगल ग्रह से प्रभावित मेष जातक में कम साधनों में गुजारा करने का गुण नहीं होता। ये हमेशा जीवन से अधिक की अपेक्षा रखते हैं। मेष जातक को धन हेतु ‘श्रीं’ मंत्र का जाप १०००८ बार करना चाहिए।
वृषभ राशि- परिवार व जीवन के प्रति संवेदनशील वृषभ जातक 'ॐ सर्व बढ़ा विनिर्मुक्तो धन-धान्यसुतान्वित:। मनुष्योमत्प्रसादेन भविष्यति न संशय:।।' मंत्र की एक माला नित्य जपें।
मिथुन राशि- दोहरे व्यक्तित्ववाले मिथुन जातक अपनी धुन के पक्के तथा कार्य के प्रति समर्पित होते हैं। इन्हें 'ॐ श्रीं श्रींये नम:' मंत्र की एक माला नित्य जपनी चाहिए ।
कर्क राशि- परिवार की हर आवश्यकतापूर्ति को अपनी जिम्मेदारी समझनेवाले कर्क जातक 'ॐ श्री महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णु पत्न्यै च धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात् ॐ॥' मंत्र की एक माला नित्य जपें।
सिंह राशि- सम्मान, यश व धन के प्रति बेहद आकर्षित रहनेवाले सिंह जातक 'ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नम:' मंत्र की एक माला नित्य जपें।
कन्या राशि- समझदार और सभी लोगों को साथ लेकर चलने वाले कन्या जातकों की जीवन के प्रति सोच सरल किन्तु शेष से भिन्न होती है। ये 'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं महालक्ष्मी नम:' मंत्र की एक माला नित्य प्रात: जपें।
तुला राशि- समझदार और सुलझे तुला जातक' ॐ श्रीं श्रीय नम:' मंत्र की एक या अधिक माला नित्य जपें।
वृश्चिक राशि- जीवनारंभ में परेशानियाँ झेल, २८ वर्ष के होने तक संपन्न होनेवाले वृश्चिक जातक अधिक उन्नति हेतु 'ॐ ह्रीं श्रीं लक्ष्मीभयो नम:' मन्त्र की एक माला नित्य जपें।
मकर राशि- मेहनती-समझदार मकर जातक जल्दबाजी न कर, हर काम सोच-विचार कर करते हैं। ये ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौं ॐ ह्रीं क्लीं ह्रीं श्रीं ह्रीं क्लीं ह्रीं ॐ सौं ऐं क्लीं ह्रीं श्रीं ॐ॥' मंत्र की एक माला नित्य जपें।
कुंभ राशि- कुम्भ राशि स्वामी शनि कर्मानुसार फल देने वाला ग्रह है। कुम्भ जातक कर्मानुसार शुभाशुभ फल शीघ्र पाते हैं। इन्हें 'ऐं ह्रीं श्रीं अष्टलक्ष्यम्ये ह्रीं सिद्धये मम गृहे आगच्छागच्छ नमः स्वाहा।' मंत्र की एक माला जाप नित्य जपना चाहिए।
मीन राशि- राशि स्वामी देवगुरु बृहस्पतिधन-धान्य प्रदाता हैं। मीन जातक को ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नम:' मंत्र की दो माला नित्य जपने से फल की प्राप्ति होगी।
१८-१०-२०१७
***
दोहा सलिला:
जिज्ञासा ही धर्म है
*
धर्म बताता है यही, निराकार है ईश.
सुनते अनहद नाद हैं, ऋषि, मुनि, संत, महीश..
मोहक अनहद नाद यह, कहा गया ओंकार.
सघन हुए ध्वनि कण, हुआ रव में भव संचार..
चित्र गुप्त था नाद का. कण बन हो साकार.
परम पिता ने किया निज, लीला का विस्तार..
अजर अमर अक्षर यही, 'ॐ' करें जो जाप.
ध्वनि से ही इस सृष्टि में, जाता पल में व्याप..
'ॐ' बना कण फिर हुए, ऊर्जा के विस्फोट.
कोटि-कोटि ब्रम्हांड में, कण-कण उसकी गोट..
चौसर पाँसा खेल वह, वही दाँव वह चाल.
खिला खेलता भी वही, होता करे निहाल..
जब न देख पाते उसे, लगता भ्रम जंजाल.
अस्थि-चर्म में वह बसे, वह ही है कंकाल..
धूप-छाँव, सुख-दुःख वही, देता है पोशाक.
वही चेतना बुद्धि वह, वही दृष्टि वह वाक्..
कर्ता-भोक्ता भी वही, हम हैं मात्र निमित्त.
कर्ता जानें स्वयं को, भरमाता है चित्त..
जमा किया सत्कर्म जो, वह सुख देता नित्य.
कर अकर्म दुःख भोगती, मानव- देह अनित्य..
दीनबन्धु वह- आ तनिक, दीनों के कुछ काम.
मत धनिकों की देहरी, जा हो विनत प्रणाम..
धन-धरती है उसी की, क्यों करता भण्डार?
व्यर्थ पसारा है 'सलिल', ढाई आखर सार..
ज्यों की त्यों चादर रहे, लगे न कोई दाग.
नेह नर्मदा नित नहा, तज सारा खटराग..
जिज्ञासा ही धर्म है, ज्ञान प्राप्ति ही कर्म.
उसकी तनिक प्रतीति की, चेतनता का मर्म..
१८-१०-२०१०
*

रविवार, 7 अगस्त 2022

सुषमा स्वराज,लघुकथा,दोहा सलिला

भावांजलि
*
शारद सुता विदा हुई, माँ शारद के लोक
धरती माँ व्याकुल हुई, चाह न सकती रोक
*
सुषमा से सुषमा मिली, कमल खिला अनमोल
मानवता का पढ़ सकीं, थीं तुम ही भूगोल
*
हर पीड़ित की मदद कर, रचा नया इतिहास
सुषमा नारी शक्ति का, करा सकीं आभास
*
पा सुराज लेकर विदा, है स्वराज इतिहास
सब स्वराज हित ही जिएँ, निश-दिन किए प्रयास
*
राजनीति में विमलता, विहँस करी साकार
ओजस्वी वक्तव्य से, दे ममता कर वार
*
वाक् कला पटु ही नहीं, कौशल का पर्याय
लिखे कुशलता के कई, कौशलमय अध्याय
*
राजनीति को दे दिया, सुषमामय आयाम
भुला न सकता देश यह, अमर तुम्हारा नाम
*
शब्द-शब्द अंगार था, शीतल सलिल-फुहार
नवरस का आगार तुम, अरि-हित घातक वार
*
कर्म-कुशलता के कई, मानक रचे अनन्य
सुषमा जी शत-शत नमन, पाकर जनगण धन्य
*
शब्दों को संजीव कर, फूँके उनमें प्राण
दल-हित से जन-हित सधे, लोकतंत्र संप्राण
*
महिमामयी महीयसी, जैसा शुचि व्यक्तित्व
फिर आओ झट लौटकर, रटने नव भवितव्य
*
चिर अभिलाषा पूर्ति से, होकर परम प्रसन्न
निबल देह तुमने तजी, हम हो गए विपन्न
*
युग तुमसे ले प्रेरणा, रखे लक्ष्य पर दृष्टि
परमेश्वर फिर-फिर रचे, नव सुषमामय सृष्टि
*
संजीव
७-८-२०१९
***
लघुकथा
बेपेंदी का लोटा
*
'आज कल किसी का भरोसा नहीं, जो कुर्सी पर आया लोग उसी के गुणगान करने लगते हैं और स्वार्थ साधने की कोशिश करते हैं। मनुष्य को एक बात पर स्थिर रहना चाहिए।' पंडित जी नैतिकता का पाठ पढ़ा रहे थे।
प्रवचन से ऊब चूका बेटा बोल पड़ा- 'आप कहते तो ठीक हैं लेकिन एक यजमान के घर कथा में सत्यनारायण भगवान की जयकार करते हैं, दूसरे के यहाँ रुद्राभिषेक में शंकर जी की जयकार करते हैं, तीसरे के निवास पर जन्माष्टमी में कृष्ण जी का कीर्तन करते हैं, चौथे से अखंड रामायण करने के लिए कह कर राम जी को सर झुकाते हैं, किसी अन्य से नवदुर्गा का हवन करने के लिए कहते हैं। परमात्मा आपको भी तो कहता होंगे बेपेंदी का लोटा।'
***
लघुकथा
शर संधान
*
आजकल स्त्री विमर्श पर खूब लिख रही हो। 'लिव इन' की जमकर वकालत कर रहे हैं तुम्हारी रचनाओं के पात्र। मैं समझ सकती हूँ।
तू मुझे नहीं समझेगी तो और कौन समझेगा?
अच्छा है, इनको पढ़कर परिवारजनों और मित्रों की मानसिकता ऐसे रिश्ते को स्वीकारने की बन जाए उसके बाद बताना कि तुम भी ऐसा करने जा रही हो। सफल हो तुम्हारा शर-संधान।
***
लघुकथा
निज स्वामित्व
*
आप लघुकथा में वातावरण, परिवेश या पृष्ठ भूमि क्यों नहीं जोड़ते? दिग्गज हस्ताक्षर इसे आवश्यक बताते हैं।
यदि विस्तार में जाए बिना कथ्य पाठक तक पहुँच रहा है तो अनावश्यक विस्तार क्यों देना चाहिए? लघुकथा तो कम से कम शब्दों में अधिक से अधिक कहने की विधा है न? मैं किसी अन्य विचारों को अपने लेखन पर बन्धन क्यों बनने दूँ। किसी विधा पर कैसे हो सकता है कुछ समीक्षकों या रचनाकारों का निज स्वामित्व?
***
लघुकथा
दूषित वातावरण
*
अपने दल की महिला नेत्री की आलोचना को नारी अपमान बताते हुए आलोचक की माँ, पत्नि, बहन और बेटी के प्रति अपमानजनक शब्दों की बौछार करते चमचों ने पूरे शहर में जुलूस निकाला। दूरदर्शन पर दृश्य और समाचार देख के बुरी माँ सदमें में बीमार हो गयी जबकि बेटी दहशत के मारे विद्यालय भी न जा सकी। यह देख पत्नी और बहन ने हिम्मत कर कुछ पत्रकारों से भेंट कर विषम स्थिति की जानकारी देते हुए महिला नेत्री और उनके दलीय कार्यकर्ताओं को कटघरे में खड़ा किया।
कुछ वकीलों की मदद से क़ानूनी कार्यवाही आरम्भ की। उनकी गंभीरता देखकर शासन - प्रशासन को सक्रिय होना पड़ा, कई प्रतिबन्ध लगा दिए गए ताकि शांति को खतरा न हो। इस बहस के बीच रोज कमाने-खानेवालों के सामने संकट उपस्थित कर गया दूषित वातावरण।
७-८-२०१७

***

दोहा सलिला:
'मैं'-'मैं' मिल जब 'हम' हुए...
संजीव 'सलिल'
*
'मैं'-'मैं' मिल जब 'हम' हुए, 'तुम' जा बैठा दूर.
जो न देख पाया रहा, आँखें रहते सूर..
*
'मैं' में 'तुम' जब हो गया, अपने आप विलीन.
व्याप गयी घर में खुशी, हर पल 'सलिल' नवीन..
*
'तुम' से 'मैं' की गैरियत, है जी का जंजाल.
'सलिल' इसी में खैरियत, 'हम' बन हों खुशहाल..
*
'मैं' ने 'मैं' को कब दिया, याद नहीं उपहार?
'मैं' गुमसुम 'तुम' हो गयी, रूठीं 'सलिल' बहार..
*
'मैं' 'तुम' 'यह' 'वह' प्यार से, भू पर लाते स्वर्ग.
'सलिल' करें तकरार तो, दूर रहे अपवर्ग..
*
'मैं' की आँखों में बसा, 'तू' बनकर मधुमास.
जिस-तिस की क्यों फ़िक्र हो, आया सावन मास..
*
'तू' 'मैं' के दो चक्र पर, गृह-वाहन गतिशील.
'हम' ईधन गति-दिशा दे, बाधा सके न लील..
*
'तू' 'तू' है, 'मैं' 'मैं' रहा, हो न सके जब एक.
तू-तू मैं-मैं न्योत कर, विपदा लाईं अनेक..
*
'मैं' 'तुम' हँस हमदम हुए, ह्रदय हर्ष से चूर.
गाल गुलाबी हो गये, नत नयनों में नूर..
*
'मैं' में 'मैं' का मिलन ही, 'मैं'-तम करे समाप्त.
'हम'-रवि की प्रेमिल किरण, हो घर भर में व्याप्त..
७-८-२०१२
*

गुरुवार, 30 जून 2022

सॉनेट,भोजपुरी हाइकु,बुंदेली नवगीत,दोहा सलिला,

सॉनेट
सरकार 
• 
जाको ईंटा, बाको रोड़ो 
आई बहुरिया, मैया बिसरी 
भओ पराओ अपनो मोड़ो 
जा पसरी, बा एड़ी घिस रई 

पल मा पाला बदल ऐंठ रए 
खाल ओढ़ लई रे गर्दभ की 
धोबी के हो सेर रेंक रए 
बारी बंदर के करतब की 

मूँड़ मुड़ाओ, सीस झुकाओ 
बदलो पाला, लै लो माला 
राजा जी की जै-जै गाओ 
करो रात-दिन गड़बड़झाला 

मनमानी कर लो हर बार 
जोड़-तोड़ कर, बन सरकार 
३०-६-२०२२ 
•••
भोजपुरी हाइकु:
*
आपन बोली
आ ओकर सुभाव
मैया क लोरी.
*
खूबी-खामी के
कवनो लोकभासा
पहचानल.
*
तिरिया जन्म
दमन आ शोषण
चक्की पिसात.
*
बामनवाद
कुक्कुरन के राज
खोखलापन.
*
छटपटात
अउरत-दलित
सदियन से.
*
राग अलापे
हरियल दूब प
मन-माफिक.
*
गहरी जड़
देहात के जीवन
मोह-ममता.

***
नवगीत
*
काए टेरो?, मैया काए टेरो?
सो रओ थो, कओ मैया काए टेरो?
*
दोरा की कुंडी बज रई खटखट
कौना पाहुना हेरो झटपट?
कौना लगा रओ पगफेरो?
काय टेरो?, मैया काए टेरो?...
*
हांत पाँव मों तुरतई धुलाओ
भुज नें भेंटियो, दूरई बिठाओ
मों पै लेओ गमछा घेरो
काय टेरो?, मैया काए टेरो?
*
बिन धोए सामान नें लइयो
बिन कारज बाहर नें जइयो
घरई डार रइओ डेरो
काए टेरो?, मैया काए टेरो
३०-६-२०२०
***
दोहा सलिला
*
नहीं कार्य का अंत है, नहीं कार्य में तंत।
माया है सारा जगत, कहते ज्ञानी संत।।
*
आता-जाता कब समय, आते-जाते लोग।
जो चाहें वह कार्य कर, नहीं मनाएँ सोग।।
*
अपनी-पानी चाह है, अपनी-पानी राह।
करें वही जो मन रुचे, पाएँ उसकी थाह।।
*
एक वही है चौधरी, जग जिसकी चौपाल।
विनय उसी से सब करें, सुन कर करे निहाल।।
*
जीव न जग में उलझकर, देखे उसकी ओर।
हो संजीव न चाहता, हटे कृपा की कोर।।
*
मंजुल मूरत श्याम की, कण-कण में अभिराम।
देख सके तो देख ले, करले विनत प्रणाम।।
*
कृष्णा से कब रह सके, कृष्ण कभी भी दूर।
उनके कर में बाँसुरी, इनका मन संतूर।।
*
अपनी करनी कर सदा, कथनी कर ले मौन।
किस पल उससे भेंट हो, कह पाया कब-कौन??
*
करता वह, कर्ता वही, मानव मात्र निमित्त।
निर्णायक खुद को समझ, भरमाता है चित्त।।
*
चित्रकार वह; दृश्य वह, वही चित्र है मित्र।
जीव समझता स्वयं को, माया यही विचित्र।।
*
बिंब प्रदीपा ज्योति का, सलिल-धार में देख।
निज प्रकाश मत समझ रे!, चित्त तनिक सच लेख।।
***

३०.६.२०१८, ७९९९५५९६१८, ९४२५१८३२४४

रविवार, 10 अप्रैल 2022

मुक्तिका, दोहा सलिला,राम, घनाक्षरी,कवित्त, नवगीत

मुक्तिका
अरे! चल हट।
कहा मत नट।।

नहीं कुछ दम
परे चल झट।
फरेब न कर

न भूल, न रट।
शऊर न तज

न दूर; न सट।
न नाव; न जल

नहीं नद-तट।
न हार; न जय

नहीं चित-पट।
न भाग; ठहर

जरा रुक-डट
१०-४-२०२२
•••
दोहा सलिला
आओ यदि रघुवीर
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
गले न मिलना भरत से, आओ यदि रघुवीर
धर लेगी योगी पुलिस, मिले जेल में पीर

कोरोना कलिकाल में, प्रबल- करें वनवास
कुटिया में सिय सँग रहें, ले अधरों पर हास

शूर्पणखा की काटकर, नाक धोइए हाथ
सोशल डिस्टेंसिंग रखें, तीर मारकर नाथ

भरत न आएँ अवध में, रहिए नंदीग्राम
सेनेटाइज शत्रुघन, करें- न विधि हो वाम

कैकई क्वारंटाइनी, कितने करतीं लेख
रातों जगें सुमंत्र खुद, रहे व्यवस्था देख

कोसल्या चाहें कुसल, पूज सुमित्रा साथ
मना रहीं कुलदेव को, कर जोड़े नत माथ

देवि उर्मिला मांडवी, पढ़ा रहीं हैं पाठ
साफ-सफाई सब रखें, खास उम्र यदि साठ

श्रुतिकीरति जी देखतीं, परिचर्या हो ठीक
अवधपुरी में सुदृढ़ हो, अनुशासन की लीक

तट के वट नीचे डटे, केवट देखें राह
हर तब्लीगी पुलिस को, सौंप पा रहे वाह

मिला घूमता जो पिटा, सुनी नहीं फरियाद
सख्ती से आदेश निज, मनवा रहे निषाद

निकट न आते, दूर रह वानर तोड़ें फ्रूट
राजाज्ञा सुग्रीव की, मिलकर करो न लूट

रात-रात भर जागकर, करें सुषेण इलाज
कोरोना से विभीषण, ग्रस्त विपद में ताज

भक्त न प्रभु के निकट हों, रोकें खुद हनुमान
मास्क लगाए नाक पर, बैठे दयानिधान

कौन जानकी जान की, कहो करे परवाह?
लव-कुश विश्वामित्र ऋषि, करते फ़िक्र अथाह

वध न अवध में हो सके, कोरोना यह मान
घुसा मगर आदित्य ने, सुखा निकली जान
१०-४-२०२०
***
घनाक्षरी या कवित्त
सघन संगुफन भाव का, अक्षर अक्षर व्याप्त.
मन को छूते चतुष्पद, रच घनाक्षरी आप्त..
अष्ट अक्षरी त्रै चरण, चौथे अक्षर सात .
लघु-गुरु मात्रा से करें, अंत हमेशा भ्रात..
*
चतुष्पदी मुक्तक छंद घनाक्षरी या छप्पय के पदों में वर्ण-संख्या निश्चित होती हैं किंतु छंद के पद वर्ण-क्रम या मात्रा-गणना से मुक्त होते हैं। किसी अन्य वर्णिक छंद की तरह इसके गण (वर्णों का नियत समुच्चय) व्यवस्थित नहीं होते अर्थात पदों में गणों की आवृत्तियाँ नहीं होतीं।वर्ण-क्रम मुक्तता घनाक्षरी छंद का वैशिष्ट्य है। वाचन में प्रवाहभंग या लयभंग से बचने के लिये सम कलों वाले शब्दों के बाद सम कल के शब्द तथा विषम कलों के शब्द के बाद विषम कलों के शब्द समायोजित किये जाते हैं। वर्ण-गणना में व्यंजन या व्यंजन के साथ संयुक्त स्वर अर्थात संयुक्ताक्षर एक वर्ण माना जाता है।
हिंदी के मुक्तक छंदों में घनाक्षरी सर्वाधिक लोकप्रिय, सरस और प्रभावी छंदों में से एक है। घनाक्षरी की पंक्तियों में वर्ण-संख्या निश्चित (३१, ३२, या ३३) होती है किन्तु मात्रा गणना नहीं की जाती। अतः, घनाक्षरी की पंक्तियाँ समान वर्णिक किन्तु विविध मात्रिक पदभार की होती हैं जिन्हें पढ़ते समय कभी लघु का दीर्घवत् उच्चारण और कभी दीर्घ का लघुवत् उच्चारण करना पड़ सकता है। इससे घनाक्षरी में लालित्य और बाधा दोनों हो सकती हैं। वर्णिक छंदों में गण नियम प्रभावी नहीं होते। इसलिए घनाक्षरीकार को लय और शब्द-प्रवाह के प्रति अधिक सजग होना होता है। समान पदभार के शब्द, समान उच्चार के शब्द, आनुप्रासिक शब्द आदि के प्रयोग से घनाक्षरी का लावण्य निखरता है। वर्ण गणना करते समय लघु वर्ण, दीर्घ वर्ण तथा संयुक्ताक्षरों को एक ही गिना जाता है अर्थात अर्ध ध्वनि की गणना नहीं की जाती है।
१ वर्ण = न, व, या, हाँ आदि.
२ वर्ण = कल, प्राण, आप्त, ईर्ष्या, योग्य, मूर्त, वैश्य आदि.
३ वर्ण = सजल,प्रवक्ता, आभासी, वायव्य, प्रवक्ता आदि.
४ वर्ण = ऊर्जस्वित, अधिवक्ता, अधिशासी आदि.
५ वर्ण = पर्यावरण आदि.
६ वर्ण = वातानुकूलित आदि.
आठ-आठ-आठ-सात, पर यति रखकर, मनहर घनाक्षरी, छन्द कवि रचिए.
लघु-गुरु रखकर, चरण के आखिर में, 'सलिल'-प्रवाह-गति, वेग भी परखिये..
अश्व-पदचाप सम, मेघ-जलधार सम, गति अवरोध न हो, यह भी निरखिए.
करतल ध्वनि कर, प्रमुदित श्रोतागण- 'एक बार और' कहें, सुनिए-हरषिए..
*
घनाक्षरी के ९ प्रकार होते हैं;
१. मनहर: कुल वर्ण संख्या ३१. समान पदभार, समतुकांत, पदांत गुरु अथवा लघु-गुरु, चार चरण ८-८-८-७ वर्ण।
२. जनहरण: कुल वर्ण संख्या ३१. समान पदभार, समतुकांत, पदांत गुरु शेष सब वर्ण लघु।
३. कलाधर: कुल वर्ण संख्या ३१. समान पदभार, समतुकांत, पदांत गुरु-लघु, चार चरण ८-८-८-८ वर्ण ।
४. रूप: कुल वर्ण संख्या ३२. समान पदभार, समतुकांत, पदांत गुरु-लघु, चार चरण ८-८-८-८ वर्ण।
५. जलहरण: कुल वर्ण संख्या ३२. समान पदभार, समतुकांत, पदांत लघु-लघु, चार चरण ८-८-८-८ वर्ण।
६. डमरू: कुल वर्ण संख्या ३२. समान पदभार, समतुकांत, पदांत बंधन नहीं, चार चरण ८-८-८-८ वर्ण।
७. कृपाण: कुल वर्ण संख्या ३२. समान पदभार, समतुकांत, पदांत गुरु-लघु, चार चरण, प्रथम ३ चरणों में समान अंतर तुकांतता, ८-८-८-८ वर्ण।
८. विजया: कुल वर्ण संख्या ३२. समान पदभार, समतुकांत, पदांत लघु-गुरु, चार चरण ८-८-८-८ वर्ण।
९. देव: कुल वर्ण संख्या ३३. समान पदभार, समतुकांत, पदांत ३ लघु-गुरु, चार चरण ८-८-८-९ वर्ण।
उदाहरण-
०१. शस्य-श्यामला सघन, रंग-रूप से मुखर देवलोक की नदी है आज रुग्ण दाह से
लोभ मोह स्वार्थ मद पोर-पोर घाव बन रोम-रोम रीसते हैं, हूकती है आह से
यहाँ 'शस्य' (२ वर्ण, ३ मात्रा = २१ ), के बाद 'श्यामला' (३ वर्ण, ५ मात्रा, रगण = २१२ = ३ + २) है। अतः 'शस्य' के त्रिकल, के ठीक बाद श्याम का त्रिकल सटीक व्यवस्था कर वाचन में लयभंग नहीं होने देता। ऐसी मात्रा-व्यवस्था घनाक्षरी के सभी पदों में आवश्यक है। घनाक्षरी छन्द के कुल नौ भेदों में मुख्य चार १. मनहरण, २. जलहरण, ३. रूप तथा ४. देव घनाक्षरी हैं।
मनहरण घनाक्षरी- चार पदों के इस छंद के प्रत्येक पद में कुल वर्ण-संख्या ३१ तथा पदांत में गुरु अनिवार्य है। लघु-गुरु का कोई क्रम नियत नहीं है किंतु पदान्त लघु-गुरु हो तो लय सुगम हो जाती है। हर पद में चार चरण होते हैं। हर चरण में वर्ण-संख्या ८, ८, ८, ७ की यति के अनुसार होती है। पदांत में मगण (मातारा, गुरु-गुरु-गुरु, ऽऽऽ, २ २ २) वर्जित है।
अपवाद स्वरूप किसी चरण में वर्ण-व्यवस्था ८, ७, ९, ७ हो किंतु शब्द-कल का निर्वहन सहज हो अर्थात वाचन या गायन में लय-भंग न हो छन्द निर्दोष माना जाता है। सुविधा के लिये ३१ वर्ण की पद-यति १६-१५, १५, १६, १७-१४, १४-१७,१५-१६, १६-१५ या अन्य भी हो सकती है यदि लय बाधित न हो।
उदाहरण-
०२. हम कृतघ्न पुत्र हैं या दानवी प्रभाव है, स्वार्थ औ' प्रमाद में ज्यों लिप्त हैं वो क्या कहें? यति १६-१५
ममत्व की हो गोद या सुरम्यता कारुण्य की, नकारते रहे सदा मूढ़ता को क्या कहें?? यति १६-१५
यहां लय भंग नहीं है किन्तु शब्द-क्रम में यत्किंचित परिवर्तन भी लय भंग का हेतु बन जाता है।
'ममत्व की हो गोद या' को 'या गोद ममत्व की हो' अथवा 'गॉड या ममत्व की हो' किया जाय तो चरण में समान वर्ण होने के बावज़ूद लयभंगता स्पष्ट है। तथा पद-प्रवाह सहज रहें.
उदाहरण-
- सौरभ पांडेय
०१. शस्य-श्यामला सघन, रंग-रूप से मुखर देवलोक की नदी है आज रुग्ण दाह से
लोभ मोह स्वार्थ मद पोर-पोर घाव बन रोम-रोम रीसते हैं, हूकती है आह से
जो कपिल की आग के विरुद्ध सौम्य थी बही अस्त-पस्त-लस्त आज दानवी उछाह से
उत्स है जो सभ्यता व उच्च संस्कार की वो सुरनदी की धार आज रिक्त है प्रवाह से - इकड़ियाँ जेबी से
०२. नीतियाँ बनीं यहाँ कि तंत्र जो चला रहा वो श्रेष्ठ भी दिखे भले परन्तु लोक-छात्र हो
तंत्र की कमान जन-जनार्दनों के हाथ हो, त्याग दे वो राजनीति जो लगे कुपात्र हो
भूमि-जन-संविधान, विन्दु हैं ये देशमान, संप्रभू विचार में न ह्रास लेश मात्र हो
किन्तु सत्य है यही सुधार हो सतत यहाँ, ताकि राष्ट्र का समर्थ शुभ्र सौम्य गात्र हो
- संजीव 'सलिल'
०३. फूँकता कवित्त प्राण, डाल मुरदों में जान, दीप बाल अंधकार, ज़िन्दगी का हरता।
नर्मदा निनाद सुनो,सच की ही राह चुनो, जीतता सुधीर वीर, पीर पीर सहता।।
'सलिल'-प्रवाह पैठ, आगे बढ़ नहीं बैठ, सागर है दूर पूर, दूरी हो निकटता।
आना-जाना खाली हाथ, कौन कभी देता साथ, हो अनाथ भी सनाथ, प्रभु दे निकटता।।
०४. गीत-ग़ज़ल गाइये / डूबकर सुनाइए / त्रुटि नहीं छिपाइये / सीखिये-सिखाइए
शिल्प-नियम सीखिए / कथ्य समझ रीझिए / भाव भरे शब्द चुन / लय भी बनाइए
बिम्ब नव सजाइये / प्रतीक भी लगाइये / अलंकार कुछ नये / प्रेम से सजाइए
वचन-लिंग, क्रिया रूप / दोष न हों देखकर / आप गुनगुनाइए / वाह-वाह पाइए
.
०५. कौन किसका है सगा? / किसने ना दिया दगा? / फिर भी प्रेम से पगा / जग हमें दुलारता
जो चला वही गिरा / उठ हँसा पुन: बढ़ा / आदि-अंत सादि-सांत / कौन छिप पुकारता?
रात बनी प्रात नित / प्रात बने रात फिर / दोपहर कथा कहे / साँझ नभ निहारता
काल-चक्र कब रुका? / सत्य कहो कब झुका? /मेहनती नहीं चुका / धरांगन बुहारता
.
०६. न चाहतें, न राहतें / न फैसले, न फासले / दर्द-हर्ष मिल सहें / साथ-साथ हाथ हों
न मित्रता, न शत्रुता / न वायदे, न कायदे / कर्म-धर्म नित करें / उठे हुए माथ हों
न दायरे, न दूरियाँ / रहें न मजबूरियाँ / फूल-शूल, धूप-छाँव / नेह नर्मदा बनें
गिर-उठें, बढ़े चलें / काल से विहँस लड़ें / दंभ-द्वेष-छल मिटें / कोशिशें कथा बुनें
०७. चाहते रहे जो हम / अन्य सब करें वही / हँस तजें जो भी चाह / उनके दिलों में रही
मोह वासना है यह / परार्थ साधना नहीं / नेत्र हैं मगर मुँदे / अग्नि इसलिए दही
मुक्त हैं मगर बँधे / कंठ हैं मगर रुँधे / पग बढ़े मगर रुके / सर उठे मगर झुके
जिद्द हमने ठान ली / जीत मन ने मान ली / हार छिपी देखकर / येन-केन जय गही
सावन में झूम-झूम, डालों से लूम-लूम,
झूला झूल दुःख भूल, हँसिए हँसाइये.
एक दूसरे की बाँह, गहें बँधें रहे चाह,
एक दूसरे को चाह, कजरी सुनाइये..
दिल में रहे न दाह, तन्नक पले न डाह,
मन में भरे उछाह, पेंग को बढ़ाइए.
राखी की है साखी यही, पले प्रेम-पाखी यहीं,
भाई-भगिनी का नाता, जन्म भर निभाइए..
*
बागी थे हों अनुरागी, विरागी थे हों सुहागी,
कोई भी न हो अभागी, दैव से मनाइए.
सभी के माथे हो टीका, किसी का न पर्व फीका,
बहनों का नेह नीका, राखी-गीत गाइए..
कलाई रहे न सूनी, राखी बाँध शोभा दूनी,
आरती की ज्वाल धूनी, अशुभ मिटाइए.
मीठा खाएँ मीठा बोलें, जीवन में रस घोलें,
बहना के पाँव छूलें, शुभाशीष पाइए..
*
बंधन न रास आये, बँधना न मन भाये,
स्वतंत्रता ही सुहाये, सहज स्वभाव है.
निर्बंध अगर रहें, मर्याद को न गहें,
कोई किसी को न सहें, चैन का अभाव है..
मना राखी नेह पर्व, करिए नातों पे गर्व,
निभायें संबंध सर्व, नेह का निभाव है.
बंधन जो प्रेम का हो, कुशल का क्षेम का हो,
धरम का नेम हो, 'सलिल' सत्प्रभाव है..
*
संकट में लाज थी, गिरी सिर पे गाज थी,
शत्रु-दृष्टि बाज थी, नैया कैसे पार हो?
करनावती महारानी, पूजतीं माता भवानी,
शत्रु है बली बहुत, देश की न हार हो..
राखी हुमायूँ को भेजी, बादशाह ने सहेजी,
बहिन की पत राखी, नेह का करार हो.
शत्रु को खदेड़ दिया, बहिना को मान दिया,
नेह का जलाया दिया, भेंट स्वीकार हो..
*
महाबली बलि को था, गर्व हुआ संपदा का,
तीन लोक में नहीं है, मुझ सा कोई धनी.
मनमानी करूँ भी तो, रोक सकता न कोई,
हूँ सुरेश से अधिक, शक्तिवान औ' गुनी..
महायज्ञ कर दिया, कीर्ति यश बल लिया,
हरि को दे तीन पग, धरा मौन था गुनी.
सभी कुछ छिन गया, मुख न मलिन हुआ,
हरि की शरण गया, सेवा व्रत ले धुनी..
बाधा दनु-गुरु बने, विपद मेघ थे घने,
एक नेत्र गँवा भगे, थी व्यथा अनसुनी.
रक्षा सूत्र बाँधे बलि, हरि से अभय मिली,
हृदय की कली खिली, पटकथा यूँ बनी..
विप्र जब द्वार आये, राखी बांध मान पाये,
शुभाशीष बरसाये, फिर न हो ठनाठनी.
कोई किसी से न लड़े, हाथ रहें मिले-जुड़े,
साथ-साथ हों खड़े, राखी मने सावनी..
*
कल :
कज्जल के कूट पर दीप शिखा सोती है कि, श्याम घन मंडल मे दामिनी की धारा है ।
भामिनी के अंक में कलाधर की कोर है कि, राहु के कबंध पै कराल केतु तारा है ।
शंकर कसौटी पर कंचन की लीक है कि, तेज ने तिमिर के हिये मे तीर मारा है ।
काली पाटियों के बीच मोहनी की माँग है कि, ढ़ाल पर खाँड़ा कामदेव का दुधारा है ।
काले केशों के बीच सुन्दरी की माँग की शोभा का वर्णन करते हुए कवि ने ८ उपमाएँ दी हैं.-
१. काजल के पर्वत पर दीपक की बाती.
२. काले मेघों में बिजली की चमक.
३. नारी की गोद में बाल-चन्द्र.
४. राहु के काँधे पर केतु तारा.
५. कसौटी के पत्थर पर सोने की रेखा.
६. काले बालों के बीच मन को मोहने वाली स्त्री की माँग.
७. अँधेरे के कलेजे में उजाले का तीर.
८. ढाल पर कामदेव की दो धारवाली तलवार.
कबंध=धड़. राहु काला है और केतु तारा स्वर्णिम, कसौटी के काले पत्थर पर रेखा खींचकर सोने को पहचाना जाता है. ढाल पर खाँडे की चमकती धार. यह सब केश-राशि के बीच माँग की दमकती रेखा का वर्णन है.


१०-४-२०१९
***
नवगीत:
*
जाल न फैला
व्यर्थ मछेरे
मछली मिले कहाँ बिन पानी।
*
नहा-नहा नदियाँ की मैली
पुण्य, पाप को कहती शैली
कैसे औरों की हो खाली
भर लें केवल अपनी थैली
लूट करोड़ों,
बाँट सैंकड़ों
ऐश करें खुद को कह दानी।
*
पानी नहीं आँख में बाकी
लूट लुटे को हँसती खाकी
गंगा जल की देख गंदगी
पानी-पानी प्याला-साकी
चिथड़े से
तन ढँके गरीबीे
बदन दिखाती धनी जवानी।
*
धंधा धर्म रिलीजन मजहब
खुली दुकानें, साधो मतलब
साधो! आराधो, पद-माया
बेच-खरीदो प्रभु अल्ला रब
तू-तू मैं-मैं भुला,
थाम चल
भगवा झंडा, चादर धानी।
*
१०-४-२०१८
***
नवगीत:
करना होगा...

हमको कुछ तो
करना होगा...
***
देखे दोष,
दिखाए भी हैं.
लांछन लगे,
लगाये भी है.
गिरे-उठे
भरमाये भी हैं.
खुद से खुद
शरमाये भी हैं..
परिवर्तन-पथ
वरना होगा.
हमको कुछ तो
करना होगा...
***
दीपक तले
पले अँधियारा.
किन्तु न तम की
हो पौ बारा.
डूब-डूबकर
उगता सूरज.
मिट-मिट फिर
होता उजियारा.
जीना है तो
मरना होगा.
हमको कुछ तो
करना होगा...
***
नवगीत:
चलो! कुछ गायें...
*
क्यों है मौन?
चलो कुछ गायें...
*
माना अँधियारा गहरा है.
माना पग-पग पर पहरा है.
माना पसर चुका सहरा है.
माना जल ठहरा-ठहरा है.
माना चेहरे पर चेहरा है.
माना शासन भी बहरा है.
दोषी कौन?...
न शीश झुकायें.
क्यों है मौन?
चलो कुछ गायें...
*
सच कौआ गा रहा फाग है.
सच अमृत पी रहा नाग है.
सच हिमकर में लगी आग है.
सच कोयल-घर पला काग है.
सच चादर में लगा दाग है.
सच काँटों से भरा बाग़ है.
निष्क्रिय क्यों?
परिवर्तन लायें.
क्यों है मौन?
चलो कुछ गायें...

***
नवगीत:
करो बुवाई...

खेत गोड़कर
करो बुवाई...
*
ऊसर-बंजर जमीन कड़ी है.
मँहगाई जी-जाल बड़ी है.
सच मुश्किल की आई घड़ी है.
नहीं पीर की कोई जडी है.
अब कोशिश की
हो पहुनाई.
खेत गोड़कर
करो बुवाई...
*
उगा खरपतवार कंटीला.
महका महुआ मदिर नशीला.
हुआ भोथरा कोशिश-कीला.
श्रम से कर धरती को गीला.
मिलकर गले
हँसो सब भाई.
खेत गोड़कर
करो बुवाई...
*
मत अपनी धरती को भूलो.
जड़ें जमीन हों तो नभ छूलो.
स्नेह-'सलिल' ले-देकर फूलो.
पेंगें भर-भर झूला झूलो.
घर-घर चैती
पड़े सुनाई.
खेत गोड़कर
करो बुवाई...
१०-४-२०१०
*