मंगलवार, 29 जून 2010

गीत: आँख का पानी ---संजीव 'सलिल'

नवगीत:
आँख का पानी
संजीव 'सलिल'
*
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*
आँख का पानी न सूखे,
आँख का पानी...
*
सुबह सूरज उगे या संझा ढले.
नहीं पल भर भी कभी निज कर मले.
कहे नानी नित कहानी सुन-गुनो-
श्रम-रहित सपना महज खुद को छले.
जल बचा पौधे लगा
भू को करो धानी.
आँख का पानी न सूखे,
आँख का पानी...
*
भुलाकर मतभेद सबसे मिल गले.
हो नहीं मन-भेद अपनापन पले.
सभी अपने किसे कहता गैर तू-
तभी तो कुल-दीप के हाथों जले.
ढाई आखर सुन-सुनाने
कहे तू बानी.
आँख का पानी न सूखे,
आँख का पानी...
*
कबीरा का ठाठ राजा को खले.
कोई बंधन नहीं मन-मर्जी चले.
ठेठ दिल को छुए साखी क्यों भला?
स्वार्थ सब सर्वार्थ-भट्टी में जले.
जोड़ मरती रिक्त हाथों
जिंदगानी.
आँख का पानी न सूखे,
आँख का पानी...
*

गीत: कहे कहानी, आँख का पानी. संजीव 'सलिल'

गीत:
कहे कहानी, आँख का पानी.
संजीव 'सलिल'
*
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*
कहे कहानी, आँख का पानी.
की सो की, मत कर नादानी...
*
बरखा आई, रिमझिम लाई.
नदी नवोढ़ा सी इठलाई..
ताल भरे दादुर टर्राये.
शतदल कमल खिले मन भाये..
वसुधा ओढ़े हरी चुनरिया.
बीरबहूटी बनी गुजरिया..
मेघ-दामिनी आँख मिचोली.
खेलें देखे ऊषा भोली..
संध्या-रजनी सखी सुहानी.
कहे कहानी, आँख का पानी...
*
पाला-कोहरा साथी-संगी.
आये साथ, करें हुडदंगी..
दूल्हा जाड़ा सजा अनूठा.
ठिठुरे रवि सहबाला रूठा..
कुसुम-कली पर झूमे भँवरा.
टेर चिरैया चिड़वा सँवरा..
चूड़ी पायल कंगन खनके.
सुन-गुन पनघट के पग बहके.
जो जी चाहे करे जवानी.
कहे कहानी, आँख का पानी....
*
अमन-चैन सब हुई उड़न छू.
सन-सन, सांय-सांय चलती लू..
लंगड़ा चौसा आम दशहरी
खाएँ ख़ास न करते देरी..
कूलर, ए.सी., परदे खस के.
दिल में बसी याद चुप कसके..
बन्ना-बन्नी, चैती-सोहर.
सोंठ-हरीरा, खा-पी जीभर..
कागा सुन कोयल की बानी.
कहे कहानी, आँख का पानी..

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Acharya Sanjiv Salil

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सोमवार, 28 जून 2010

कुण्डली : आँख का पानी -- संजीव 'सलिल'


कुण्डली  :

आँख का पानी
 
संजीव 'सलिल'
*






















*
अनिल अनल भू नभ सलिल, पञ्च तत्वमय सृष्टि.
कंकर में शंकर दिखे, अगर खुली हो दृष्टि. .
अगर खुली हो दृष्टि, न तेरा-मेरा सूझे.
पल में हर सवाल को मानव हँसकर बूझे..
नहीं आँख का पानी सूखे, हो न अमंगल.
नेह नर्मदा रहे प्रवाहित कलकल-कलकल..
****
'रहिमन' पानी राखिए, बिन पानी सब सून.
पानी गए न ऊबरे, मोती मानस चून..
मोती मानस चून, न चाहें तनिक मलिनता.
जो निर्मल उसके, जीवन में रहे विमलता..
कहे 'सलिल' कविराय, न बोलें कड़वी बानी.
बहे न, रोकें मीत प्रीत की आँख का पानी..
(रहीम के दोहे पर कुण्डली)
******
भाव बिम्ब लय छंद रस, खोज रहे हैं ठाँव.
शब्दाक्षर से मिल गले, पहुँचे कविता-गाँव..
पहुँचे कविता-गाँव, आँख का पानी बोले
दरवाज़े दिल के दिल खातिर रखना खोले..
.अलंकार से मिल गले, दे सबको आनंद.
काव्य-कामिनी मोह ले भाव बिम्ब लय छंद..
*******

Acharya Sanjiv Salil

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रविवार, 27 जून 2010

डाक टिकटों पर काया कमल की — पूर्णिमा वर्मन

टिकट संग्रह
डाक टिकटों पर काया कमल की
पूर्णिमा वर्मन

१९७७ में भारत द्वारा जारी डाकटिकट


संपूर्ण विश्व की संस्कृति को जिस प्रकार कमल के फूल ने प्रभावित किया है उसको देखते हुए अनेक देशों के डाकटिकटों पर कमल की उपस्थिति स्वाभाविक ही है। भारत और वियतनाम का तो यह राष्ट्रीय पुष्प भी है इसलिए इन दोनो देशों के डाकटिकटों पर कमल का चित्र होना सबसे महत्त्वपूर्ण है। १ जुलाई १९७७ को डाक विभाग द्वारा जारी किए गए ऊपर दिखाए गए २५ पैसे के डाकटिकट को ४ डाकटिकटों के एक सेट के साथ जारी किया गया था। अन्य फूल थे- कदंब, बुरांस और करिहारी।
यों तो वियतनाम में कमल के फूल पर की शृंखलाएँ जारी की गई हैं लेकिन १९७८ में तीन रंगों वाली एक विशेष शृंखला जारी की गई थी जिसमें कमल की तीन प्रजातियों को सफेद, नीले और पीले रंगों में चित्रित किया गया था। एक और बारह वियतनामी डालर मूल्य वाले इन डाक टिकटों पर फोटो के स्थान पर कलाकृतियों को स्थान दिया गया है।
चीन अपनी जलरंगों द्वारा बनी कलाकृतियों के कारण विश्व भर में प्रसिद्ध हैं। चीन के डाक विभाग द्वारा ४ अगस्त १९८० को कला की इसी विधा पर आधारित एक अत्यंत आकर्षक डाकटिकट जारी किया गया था। बेजिंग पोस्टेज स्टाम्प प्रिंटिंग प्रेस द्वारा मुद्रित इस टिकट के कलाकार थे चेन ज़ियांकुन। ७०.५२ मिमि के बड़े आकार वाले ९४ फेन मूल्य के इस डाकटिकट पर पत्तों के साथ कमल को जिस कुशलता से चित्रित किया है वह चीनी जलरंगों के तरल सौदर्य का सटीक उदाहरण है।
मलेशिया द्वारा ३१ दिसंबर २००७ को जारी बगीचे के फूलों पर आधारित ६ डाकटिकटों के एक सेट में कमल के फूल को स्थान दिया गया है। अपनी समृद्ध और अनगिनत पुष्प प्रजातियों के लिए प्रसिद्ध मलेशिया के सबाह और सरवक प्रांत की स्वस्थ जलवायु में फूल बहुतायत से उगते हैं। डाक-टिकटों के इस सेट पर ५ से ५० सेन मूल्य वाले टिकटों पर कमल के अतिरिक्त गुड़हल, बोगनविला, मार्निंग ग्लोरी, लिली और हाइड्रेन्जिया को स्थान दिया गया है। इसके साथ ही एक बड़ा सुंदर प्रथम दिवस आवरण भी जारी किया गया है। इसे डाकटिकट पर क्लिक कर के देखा जा सकता है।
अत्यंत आकर्षक प्रथम दिवस आवरण के साथ १४ मार्च २००८ को जारी कमल का एक और टिकट हांगकांग का है। सुंदर बगीचे की पृष्ठभूमि वाले इस प्रथम दिवस आवरण के साथ छह टिकटों को जारी किया गया था पारंपरिच चीनी शैली में बनी इन फूलों वाली कलाकृतियों के लिए प्रथम दिवस आवरण को कंप्यूटर पर तैयार कर के इसे आधुनिक और पारंपरिक कला के नमूने के रूप में प्रकाशित किया गया था। इस पर लाल चीनी पलाश और गुडहल, गुलाबी कमल और अज़ेलिया, बैंगनी मार्निंग ग्लोरी और पीले अलामांडा के चित्र थे।
१९६४ में स्विटज़रलैंड द्वारा कमल का एक सुंदर डाक टिकट प्रकाशित किया गया था। नीले रंग की पृष्ठभूमि पर निम्फिया अल्बा नामक श्वेत कमल के चित्र वाले इस टिकट का मूल्य ५० स्विस फ्रैंक था।  इस शृंखला में दो चित्र और प्रकाशित किए गए थे जिसमें एक पर डौफोडिल और दूसरे पर गुलाब के चित्र अंकित किए गए थे।
इस शृंखला में प्रकाशित अन्य टिकटों पर डैफोडिल और गुलाब के फूलों के चित्र प्रकाशित किए गए थे। इसी प्रकार २००२ में आस्ट्रेलिया द्वारा कमल पर आधारित दो टिकटों वाली एक सुंदर टिकट शृंखला प्रकाशित की गई थी। इसमें एक पर गुलाबी कमल था तो दूसरे पर नील कमल। २००६ में कमल पर ही एक और शृंखला जारी की गई जिसमें कमल की अलग अलग पाँच प्रजातियों को प्रदर्शित किया गया था।
२००७ में यू एस के प्रांत ओरेगन के डाक विभाग ने फूलों के सुंदर चित्रों वाली १० टिकटों की एक शृंखला ब्यूटीफुल ब्लूम्स शीर्षक से प्रकाशित की थी जिसमें वाटर लिली के फूल को भी स्थान मिला था। कैलिफोर्निया प्रांत के कुलवर सिटी निवासी फोटोग्राफर मार्क लीटा ने इन टिकटों के लिए फोटोग्राफी की थी। कला निर्देशक कार्ल टी हरमन के निर्देशन में बने इन टिकटों के स्पष्ट दृश्यों के लिए इनके मुद्रण का स्तर बहुत अच्छा रखा गया था। इसके साथ जिन अन्य फूलों को शामिल किया गया था उनमें आइरिस, मंगोलिया, डहेलिया, लाल जरबेरा, कोन फ्लावर, ट्यूलिप, पौपी,  गुलदावदी और नारंगी जरबेरा थे।
९ अक्तूबर २००६ को यूक्रेन द्वारा १८ टिकटों की एक शृंखला २००१ से २००६ तक जारी विशिष्ट टिकटों की स्मृति में जारी की की गई थी।  १६० x ११० मिली मीटर आकार के एक पत्र (शीट) पर प्रकाशित इन स्मारक टिकटों में एक टिकट पर श्वेत कमल का चित्र प्रकाशित किया गया था। इस पत्र के हाशियों पर सुंदर चित्रकारी की गई थी और दो भाषाओं यूक्रेन व रूसी में विवरण लिखा गया था- यूक्रेन के विशेष टिकटों का पाँचवाँ और छठा संस्करण। बायीं ओर के चित्र में नीचे की पंक्ति में बीच वाले टिकट पर श्वेत कमल के चित्र को देखा जा सकता है। इनकी ३०० प्रतियों को १०वी राष्ट्रीय डाक टिकट प्रदर्शनी में लोगों का ध्यान यूक्रेन के डाकटिकटों की ओर आकर्षित करने के लिए भेजा गया था। इस पूरे चित्र को बायीं और के चित्र को क्लिक कर के देखा जा सकता है।
१५ नवंबर २००८ को थाईलैंड पोस्ट ने कमल के फूलों के ४ टिकटों की एक शृंखला जारी की थी। इस पर कमल की चार परिष्कृत जातियों के चित्र थे। इन फूलों को प्रयोगशाला में मेक्सिकाना और पेरिस फाइव ओ जातियों से परिष्कृत कर के विकसित किया गया है। परिष्कार करनेवाले वैज्ञानिक का नाम प्रो. डॉ. नोपाचाई चान्सिल्वा भी इसके साथ वितरित जानकारी पर अंकित किया गया था। इन कमल के फूलों में घनी पंखुड़ियों की कई तहें विकसित की गई हैं। अलग अलग रंगों के फूलों के संकर से इन्हें नए मिश्रित रंग भी प्रदान किए गए हैं। दाहिनी ओर के चित्र पर क्लिक कर के चार टिकटों वाली इस शृंखला के सभी चित्रों को देखा जा सकता है।
स्लोवानिया के डाक विभाग द्वारा २६ सितंबर २००७ को श्वेत कमल के चित्र वाला एक डाकटिकट जारी किया था। इसे ६०x७० मिली मीटर के एक आकर्षक पत्र (शीट) पर ४ रंगों वाली आफसेट प्रिंटिंग में प्रकाशित किया गया था तथा बाहरीन के ओरिंएँटल प्रेस में इसकी छपाई हुई थी। बेली लोकवांज नामक स्लोवाकियन श्वेत कमल की यह प्रजाति पर लुप्त होने का संकट मंडरा रहा है। एक ओर जहाँ परागण के कारण इसका रंग बिगड़ने का डर बना रहता है वहीं दूसरी ओर कुछ मछलियों का यह अत्यंत प्रिय आहार है। रंगीन प्रजातियाँ आकर्षक दिखने के कारण लोग अपने बगीचों के लिए श्वेत कमल खरीदना अधिक पसंद नहीं करते इस कारण इसके उगाने में भी लोगों की रुचि कम हो रही है।
                                                                             (साभार: अभिव्यक्ति) 
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गीत : आँख का पानी -संजीव 'सलिल'

गीत

संजीव 'सलिल'
*
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*
बेचते हो क्यों
कहो निज आँख का पानी?
मोल समझो
बात का यह है न बेमानी....

जानती जनता
सियासत कर रहे हो तुम.
मानती-पहचानती
छल कर रहे हो तुम.
हो तुम्हीं शासक-
प्रशासक न्याय के दाता.
आह पीड़ा दाह
बनकर पल रहे हो तुम.
खेलते हो क्यों
गँवाकर आँख का पानी?
मोल समझो
बात का यह है न बेमानी....

लाश का
व्यापार  करते शर्म ना आई.
बेहतर तुमसे
दशानन ही रहा भाई.
लोभ ईर्ष्या मौत के
सौदागरों सोचो-
साथ किसके गयी
कुर्सी  साथ कब आई?
फेंकते हो क्यों
मलिनकर आँख का पानी?
मोल समझो
बात का यह है न बेमानी....

गिरि सरोवर
नदी जंगल निगल डाले हैं.
वसन उज्जवल
पर तुम्हारे हृदय काले हैं.
जाग जनगण
फूँक देगा तुम्हारी लंका-
डरो, सम्हलो
फिर न कहना- 'पड़े लाले हैं.'
बच लो कुछ तो 
जतन कर आँख का पानी
मोल समझो
बात का यह है न बेमानी....
*

शनिवार, 26 जून 2010

हाइकु गीत: आँख का पानी संजीव 'सलिल'

हाइकु गीत:

आँख का पानी

संजीव 'सलिल'
*



        









                  


*
आँख का पानी,
        मर गया तो कैसे
              धरा हो धानी?...
             *
तोड़ बंधन
आँख का पानी बहा.
रोके न रुका.

             आसमान भी
             हौसलों की ऊँचाई
             के आगे झुका.

कहती नानी
       सूखने मत देना
               आँख का पानी....
            *
रोक न पाये
जनक जैसे ज्ञानी
आँसू अपने.

           मिट्टी में मिला
           रावण जैसा ध्यानी
           टूटे सपने.

आँख से पानी
      न बहे, पर रहे
             आँख का पानी...
             *
पल में मरे
हजारों बेनुगाह
गैस में घिरे.

           गुनहगार
           हैं नेता-अधिकारी
           झूठे-मक्कार.

आँख में पानी
       देखकर रो पड़ा
              आँख का पानी...
              *
-- दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम

शुक्रवार, 25 जून 2010

मुक्तिका: लिखी तकदीर रब ने.......... --संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:

लिखी तकदीर रब ने...

संजीव वर्मा 'सलिल'
*

















*
लिखी तकदीर रब ने फिर भी  हम तदबीर करते हैं.
फलक उसने बनाया है, मगर हम रंग भरते हैं..

न हमको मौत का डॉ है, न जीने की तनिक चिंता-
न लाते हैं, न ले जाते मगर धन जोड़ मरते हैं..

कमाते हैं करोड़ों पाप कर, खैरात देते दस.
लगाकर भोग तुझको खुद ही खाते और तरते हैं..

कहें नेता- 'करें क्यों पुत्र अपने काम सेना में?
फसल घोटालों-घपलों की उगाते और चरते हैं..

न साधन थे तो फिरते थे बिना कपड़ों के आदम पर-
बहुत साधन मिले तो भी कहो क्यों न्यूड फिरते हैं..

न जीवन को जिया आँखें मिलाकर, सिर झुकाए क्यों?
समय जब आख़िरी आया तो खुद से खुह्द ही डरते हैं..

'सलिल' ने ज़िंदगी जी है, सदा जिंदादिली से ही.
मिले चट्टान तो थमते. नहीं सूराख करते हैं..

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दिव्यनर्मदा.ब्लॉगस्पोट.कॉम

हाइकु का रंग मैथिली के सँग --- संजीव 'सलिल'

हाइकु का रंग मैथिली के सँग
संजीव 'सलिल'





 










स्नेह करब
की सगर दुनिया
देवक श्रृष्टि

प्रेमक संग
मिलु सब संग ज्यों
की नफरत


पान मखान
मधुबनी पेंटिंग
अछिए शान

सम्पूर्ण क्रान्ति
जय प्रकाश बाबू
बिसरी गेल
चले आज
विकासक बयार
नीक धारणा

चलि परल
विकासक रस्ता
तS बिहारी बाबू

*
चलय  आज
विकासक बयार
नीक धारणा
*

गुरुवार, 24 जून 2010

मुक्तिका: ज़िन्दगी हँस के गुजारोगे तो --संजीव 'सलिल'













आज की रचना : मुक्तिका:
:संजीव 'सलिल'


ज़िन्दगी हँस के गुजारोगे तो कट जाएगी.

कोशिशें आस को चाहेंगी तो पट जाएगी..


जो भी करना है उसे कल पे न टालो वरना

आयेगा कल न कभी, साँस ही घट जाएगी..


वायदे करना ही फितरत रही सियासत की.

फिर से जो पूछोगे, हर बात से नट जाएगी..


रख के कुछ फासला मिलना, तो खलिश कम होगी.

किसी अपने की छुरी पीठ से सट जाएगी..


दूरियाँ हद से न ज्यादा हों 'सलिल' ध्यान रहे.

खुशी मर जाएगी गर खुद में सिमट जाएगी..


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दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम

Acharya Sanjiv Salil

मुक्तिका: ..... आँख का पानी. --संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:

आँख का पानी

संजीव वर्मा 'सलिल'
*


















*
आजकल दुर्लभ हुआ है आँख का पानी.
बंद पिंजरे का सुआ है आँख का पानी..

शिलाओं को खोदकर नाखून टूटे हैं..
आस का सूखा कुंआ है आँख का पानी..

द्रौपदी को मिल गया है यह बिना माँगे.
धर्मराजों का जुआ है आँख का पानी..

मेमने को जिबह करता शेर जब चाहे.
बिना कारण का खुआ है आँख का पानी..

हजारों की मौत भी उनको सियासत है.
देख बिन बोले चुआ है आँख का पानी..

किया मुजरा, मिला नजराना न तो बोले-
जहन्नुम जाए मुआ! है आँख का पानी..

देवकी राधा यशोदा कभी विदुरानी.
रुक्मिणी कुंती बुआ है आँख का पानी..

देख चन्दा याद आतीं रोटियाँ जिनको
दिखे सूरज में पुआ है आँख का पानी..

भजन प्रवचन सबद साखी साधना बानी
'सलिल' पुरखों की दुआ है आँख का पानी..

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दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम

बुधवार, 23 जून 2010

कुछ द्विपदियाँ : संजीव 'सलिल'

कुछ द्विपदियाँ :

संजीव 'सलिल'

वक्-संगति में भी तनिक, गरिमा सके न त्याग.
राजहंस पहचान लें, 'सलिल' आप ही आप..      
*
चाहे कोयल-नीड़ में, निज अंडे दे काग.
शिशु न मधुर स्वर बोलता, गए कर्कश राग..
*
रहें गृहस्थों बीच पर, अपना सके न भोग.
रामदेव बाबा 'सलिल', नित करते हैं योग..
*
मैकदे में बैठकर, प्याले पे प्याले पी गये.
'सलिल' फिर भी होश में रह, हाय! हम तो जी गए..
*
खूब आरक्षण दिया है, खूब बाँटी राहतें.
झुग्गियों में जो बसे, सुधरी नहीं उनकी गतें..
*
थक गए उपदेश देकर, संत मुल्ला पादरी.
सुन रहे प्रवचन मगर, छोड़ें नहीं श्रोता लतें.
*
Acharya Sanjiv Salil

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ईमानदारी से मत जाना, गंभीर :चेतन भगत - विजय कौशल

यात्रा 
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शुक्रवार, 18 जून 2010

- : शुभकामनायें : - कपिल- क्षिप्रा परिणय


- : पावन-परिणय शुभकामनायें : - 
आयुष्मान कपिल आत्मज श्रीमती रजनी - प्रो. नरेन्द्र वर्मा, नागपुर

संग

आयुष्मती क्षिप्रा आत्मजा श्रीमती - श्री अतुल खरे, छतरपुर.

*
परिणय पर्व,शनिवार १९.६.२०१०, नागपुर.

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*
. सकल 'सृष्टि' के रचनाकर्ता, चित्रगुप्त भगवान .
.. मातु नन्दिनी-माँ इरावती, राग-विराग निधान..
*
. रिद्धि-सिद्धि विघ्नेश नमन,  'विधि'-हरि-हर महिमावान .
.. भारत-भारती मातु नर्मदा, 'रवि'-'शशि' दें वरदान ..
*
. रीति सनातन, नीति पुरातन, प्रकृति-पुरुष हों एक .
.. चंदा-'पूनम', 'सूरज'-'ऊषा', सदृश रहें सविवेक ..
*
. श्वास-हास का, आस-रास का, नैसर्गिक सम्बन्ध .
.. नीर-क्षीर सम एक प्राण हों, अजर-अमर अनुबंध ..
*
. 'जग-लीला' हित 'जगन्नाथ' ने, किया नागपुर-वास .
.. जबलपुर से 'लीला' ने आ, धन्य किया आवास ..
*
. सुत 'नरेंद्र-रजनी' ने पाया, 'कपिल' नेक-अभिराम .
.. 'प्रगति' संग 'पंकज', 'योगी-अभिलाषा', मिले ललाम ..
*
. 'क्षिप्रा'- 'नेहा कीर्ति शांति यश' नेह-नर्मदा धार .
.. आये 'पुष्पा-अतुल' हुआ आभारी सब परिवार ..
*
. 'क्षिप्रा-प्रभा अजय' उज्जवल, ले नव 'आशा' भूपेश .
.. 'कपिल'- 'कृष्ण' सम निपुण,  कुशल ज्यों 'शरद-शिशिर-राजेश'..
*
. 'नीना-सविता-रेणु-स्मृति', 'राहुल-मुकुल अनंत' .
.. 'तान्या-नव्या तुहिना' दिव्या, प्रमुदित दिशा-दिगंत ..
*
. 'रचित-ऋतिक' मुद-मग्न सुन रहे, बन्ना-बन्नी गीत .
.. महाराष्ट्र-बुन्देलखण्ड' का मिलन, प्रीत की जीत ..
*
. चुटकी भर सिन्दूर, रखेगा 'मन्वन्तर' तक साथ .
.. मंगल-सूत्र-मुद्रिका हर्षित, देख हाथ-में हाथ ..
*
. बेंदा घूँघट नथ करधन,  चूड़ी पायल लालित्य .
.. कंगन अचकन पटका पगड़ी, कलगी नव आदित्य ..
*
. लज्जा हर्ष हुलास रुदन, बिछुड़ें-मिल अपने आज .
.. स्वागत, गारी, गीत विदाई के, गूँजें सँग साज ..
*
 . नयन उठे मिल सँकुच झुके, उठ मिल होते खुद बंद .
.. नयन बोलते बिन बोले ही, कहे-अनकहे छंद ..
*
. 'सलिल-साधना' सतत स्नेह की, देती परमानंद .
.. है 'अशोक' शुभ 'संध्या', दें वर आकर आनंदकंद ..
*
दुनिया का हर सुख पाओ, बढ़ वंश-बेल दे नाम.
.. सदन 'कपिल-क्षिप्रा' का हो, स्वर्गोपम तीरथ-धाम ..

******************

 शब्द-सुमनांजलि : आचार्य  संजीव  'सलिल', सम्पादक दिव्यनर्मदा नेट पत्रिका.
salil.sanjiv@gmail.com, 09425183244

मुक्तिका मिट्टी मेरी... संजीव 'सलिल'

 मुक्तिका
मिट्टी मेरी...
संजीव 'सलिल'
*

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*
मोम बनकर थी पिघलती रही मिट्टी मेरी.
मौन रहकर भी सुलगती रही मिट्टी मेरी..


बाग़ के फूल से पूछो तो कहेगा वह भी -
कूकती, नाच-चहकती रही मिट्टी मेरी..

पैर से रौंदी गयी, सानी गयी, कूटी गयी-
चाक-चढ़कर भी, निखरती रही मिट्टी मेरी..

ढाई आखर न पढ़े, पोथियाँ रट लीं, लिख दीं.
रही अनपढ़ ही, सिसकती रही मिट्टी मेरी..

कभी चंदा, कभी तारों से लड़ायी आखें.
कभी सूरज सी दमकती रही मिट्टी मेरी..

खता लम्हों की, सजा पाती रही सदियों से.
पाक-नापाक चटकती रही मिट्टी मेरी..

खेत-खलिहान में, पनघट में, रसोई में भी.
मैंने देखा है, खनकती रही मिट्टी मेरी..

गोद में खेल, खिलाया है सबको गोदी में.
फिर भी बाज़ार में बिकती रही मिट्टी मेरी..

राह चुप देखती है और समय आने पर-
सूरमाओं को पटकती
रही मिट्टी मेरी..

कभी थमती नहीं, रुकती नहीं, न झुकती है.
नर्मदा नेह की, बहती रही
मिट्टी मेरी..

******************

Acharya Sanjiv Salil
http://divyanarmada.blogspot.com

गुरुवार, 17 जून 2010

गीत : प्रतिगीत --- अम्बरीश श्रीवास्तव, सलिल















अब तक बजती बांसुरी, गीतों में है नाम.
आये पूनम रात संग, उसकी याद तमाम..

सरगमी प्यास को अपनी मैं बुझा लूँ तो चलूँ
तुम को दिल में आहिस्ता से सजा लूँ तो चलूँ ……

भीनी यादों को यूँ संजोया है
बीज जन्नत का मैंने बोया है
मन मेरा बस रहा इन गीतों में
ख़ुद को आईना, मैं दिखा लूँ तो चलूँ
सरगमी प्यास को अपनी मैं बुझा लूँ तो चलूँ ……

दिल की आवाज़ यूं सहेजी है
मस्त मौसम में अश्रु छलके हैं
गम की बूँदों को रखा सीपी में
शब्द मुक्तक मैं उठा लूँ तो चलूँ

सरगमी प्यास को अपनी मैं बुझा लूँ तो चलूँ
तुम को दिल में आहिस्ता से सजा लूँ तो चलूँ ……

*

प्रतिगीत:

जिसकी यादों में 'सलिल', खोया सुबहो-शाम.
कण-कण में वह दीखता, मुझको आठों याम..

दूरियाँ उससे जो मेरी हैं, मिटा लूँ तो चलूँ
उसमें बस जाऊँ उसे खुद में बसा लूँ तो चलूँ ……

मैं तो साया हूँ, मेरा ज़िक्र भी कोई क्यों करे.
जब भी ले नाम मेरा, उसका ही जग नाम वरे..
बाग़ में फूल नया कोई खिला लूँ तो चलूँ
उसमें बस जाऊँ उसे खुद में बसा लूँ तो चलूँ ……

ईश अम्बर का वो, वसुधा का सलिल हूँ मैं तो
वास्तव में वही श्री है, कुछ नहीं हूँ मैं तो..
बनूँ गुमनाम, मिला नाम भुला लूँ तो चलूँ.
उसमें बस जाऊँ उसे खुद में बसा लूँ तो चलूँ ……

वही वो शेष रहे, नाम न मेरा हो कहीं.
यही अंतिम हो 'सलिल', अब तो न फेरा हो कहीं..
नेह का गह तजे देह, विदा दो तो चलूँ.
उसमें बस जाऊँ उसे खुद में बसा लूँ तो चलूँ ……

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दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम/ सलिल.संजीव@जीमेल.कॉम

सोमवार, 14 जून 2010

चंद मुक्तक -संजीव 'सलिल'

चंद मुक्तक
संजीव 'सलिल'
*















*
कलम तलवार से ज्यादा, कहा सच वार करती है.
जुबां नारी की लेकिन सबसे ज्यादा धार धरती है.
महाभारत कराया द्रौपदी के व्यंग बाणों ने-
नयन के तीर छेदें तो न दिल की हार खलती है..
*
कलम नीलाम होती रोज ही अखबार में देखो.
खबर बेची-खरीदी जा रही बाज़ार में लेखो.
न माखनलाल जी ही हैं, नहीं विद्यार्थी जी हैं-
रखे अख़बार सब गिरवी स्वयं सरकार ने देखो.
*
बहाते हैं वो आँसू छद्म, छलते जो रहे अब तक.
हजारों मर गए पर शर्म इनको आयी ना अब तक.
करो जूतों से पूजा देश के नेताओं की मिलकर-
करें गद्दारियाँ जो 'सलिल' पायें एक भी ना मत..
*
वसन हैं श्वेत-भगवा किन्तु मन काले लिये नेता.
सभी को सत्य मालुम, पर अधर अब तक सिये नेता.
सभी दोषी हैं इनको दंड दो, मत माफ़ तुम करना-
'सलिल' पी स्वार्थ की मदिरा सतत, अब तक जिए नेता..
*
जो सत्ता पा गए हैं बस चला तो देश बेचेंगे.
ये अपनी माँ के फाड़ें वस्त्र, तन का चीर खीचेंगे.
यही तो हैं असुर जो देश से गद्दारियाँ करते-
कहो कब हम जागेंगे और इनको दूर फेंकेंगे?
*
तराजू न्याय की थामे हुए हो जब कोई अंधा.
तो काले कोट क्यों करने से चूकें  सत्य का धंधा.
खरीदी और बेची जा रही है न्याय की मूरत-
'सलिल' कोई न सूरत है न हो वातावरण गन्दा.
*
दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम

रविवार, 13 जून 2010

सामयिक त्रिपदियाँ : --- संजीव 'सलिल'

सामयिक त्रिपदियाँ :
संजीव 'सलिल'
*

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*
खोज कहाँ उनकी कमर,
कमरा ही आता नज़र,
लेकिन हैं वे बिफिकर..
*
विस्मय होता देखकर.
अमृत घट समझा जिसे
विषमय है वह सियासत..
*
दुर्घटना में कै मरे?
गैस रिसी भोपाल में-
बतलाते हैं कैमरे..
*
एंडरसन को छोड़कर
की गद्दारी देश से
नेताओं ने स्वार्थ वश..
*
भाग गया भोपाल से
दूर कैरवां जा छिपा
अर्जुन दोषी देश का..
*
ब्यूटी पार्लर में गयी
वृद्धा बाहर निकलकर
युवा रूपसी लग रही..
*
नश्वर है यह देह रे!
बता रहे जो भक्त को
रीझे भक्तिन-देह पे..
*
संत न करते परिश्रम
भोग लगाते रात-दिन
सर्वाधिक वे ही अधम..
*
गिद्ध भोज बारात में
टूटो भूखें की तरह
अब न मान-मनुहार है..
*
पितृ-देहरी छीन गयी
विदा होटलों से हुईं
हाय! हमारी बेटियाँ..
*
करते कन्या-दान जो
पाते हैं वर-दान वे
दे दहेज़ वर-पिता को..
*
Acharya Sanjiv Salil

http://divyanarmada.blogspot.com

श्री मदभगवदगीता : भावानुवाद ---मृदुल कीर्ति

श्री मदभगवदगीता : भावानुवाद
मृदुल कीर्ति जी, ऑस्ट्रेलिया.

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मूल:
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति,
तदहं भक्त्युप हृतंश्रनामी        प्रयतात्मनः.II गीता ९/२६


भावानुवाद:
प्रभु जी तोरे मंदिर कैसे आऊँ ?
दीन हीन हर भांति विहीना,  क्या नैवेद्य चढाऊँ?
गीता कथित तुम्हारे वचना,  घनी शक्ति अब पाऊँ.
भाव पुष्प, सुमिरन की माला, असुंवन नीर चढाऊँ .
फल के रूप करम फल भगवन , बस इतना कर पाऊँ .
पत्र रूप में तुलसी दल को, कृष्णा भोग लगाऊँ.

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 mridulkirti@hotmail.com; mridulkirti@gmail.com; lavnis@gmail.कॉम

शनिवार, 12 जून 2010

कवीन्द्र रवींद्रनाथ ठाकुर की एक रचना का भावानुवाद: ---संजीव 'सलिल'

कवीन्द्र रवींद्रनाथ ठाकुर की एक रचना का भावानुवाद:
संजीव 'सलिल'
*

















 
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*
रुद्ध अगर पाओ कभी, प्रभु! तोड़ो हृद -द्वार.
कभी लौटना तुम नहीं, विनय करो स्वीकार..
*
मन-वीणा-झंकार में, अगर न हो तव नाम.
कभी लौटना हरि! नहीं, लेना वीणा थाम..
*
सुन न सकूँ आवाज़ तव, गर मैं निद्रा-ग्रस्त.
कभी लौटना प्रभु! नहीं, रहे शीश पर हस्त..
*
हृद-आसन पर गर मिले, अन्य कभी आसीन.
कभी लौटना प्रिय! नहीं, करना निज-आधीन..

Acharya Sanjiv Salil

http://divyanarmada.blogspot.com
Acharya Sanjiv Salil

http://divyanarmada.blogspot.com

शुक्रवार, 11 जून 2010

जनक छंदी मुक्तिका: सत-शिव-सुन्दर सृजन कर ---संजीव 'सलिल'

जनक छंदी मुक्तिका:
सत-शिव-सुन्दर सृजन कर
संजीव 'सलिल'
*










*
सत-शिव-सुन्दर सृजन कर,
नयन मूँद कर भजन कर-
आज न कल, मन जनम भर.
               
                   कौन यहाँ अक्षर-अजर?
                   कौन कभी होता अमर?
                   कोई नहीं, तो क्यों समर?

किन्तु परन्तु अगर-मगर,
लेकिन यदि- संकल्प कर
भुला चला चल डगर पर.

                   तुझ पर किसका क्या असर?
                   तेरी किस पर क्यों नज़र?
                   अलग-अलग जब रहगुज़र.

किसकी नहीं यहाँ गुजर?
कौन न कर पाता बसर?
वह! लेता सबकी खबर.

                    अपनी-अपनी है डगर.
                    एक न दूजे सा बशर.
                    छोड़ न कोशिश में कसर.

बात न करना तू लचर.
पाना है मंजिल अगर.
आस न तजना उम्र भर.

                     प्रति पल बन-मिटती लहर.
                     ज्यों का त्यों रहता गव्हर.
                     देख कि किसका क्या असर?

कहे सुने बिन हो सहर.
तनिक न टलता है प्रहर.
फ़िक्र न कर खुद हो कहर.

                       शब्दाक्षर का रच शहर.
                       बहे भाव की नित नहर.
                       ग़ज़ल न कहना बिन बहर.

'सलिल' समय की सुन बजर.
साथ अमन के है ग़दर.
तनिक न हो विचलित शजर.

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दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम /सलिल.संजीव@जीमेल.कॉम

गुरुवार, 10 जून 2010

धन्याष्टकं ---आदि गुरु शंकराचार्य, भावानुवाद: मृदुलकीर्ति



धन्याष्टकं
आदि गुरु शंकराचार्य विरचित
भावानुवाद: मृदुलकीर्ति














*
ज्ञान वही जिन देत जनाई,  इन्द्रिन सकल चपलता जाई.
जाननि जोग उपनिषद सारा,  सगरो ज्ञान अनंत पसारा.
धन्य धरनि पर वे जन महती,  परमारथ हित जिन चित रहती,
अन्य निःशेष करत निज जनमा,  मोह जगत मोहित मन भरमा.---१


राग द्वेष रिपु कर निर्मूला, विषय वासनाहीन समूला.
ज्ञान ग्रहण उद्यम जिन प्रेया , योगारूढ़ अवस्था श्रेया.
आत्म ज्ञान संग सदा सुहाती, संग भार्या जस दिन राती,
धन्य-धन्य जिन वन गृह गेह़ा, विरत न नेकु निकेतन नेहा     -----२

नेह, निकेतन को जिन त्यागी,  आत्म-ज्ञान अमृत अनुरागी,
उपनिषदीय सार आसक्ता,  पद, विषयन सों रहत विरक्ता.
वीतराग, वैरागी चित्ता,  जनम समर्पित ब्रह्म निमित्ता
धन्य भाग उनके बहुताई,  अस असंग, संग संगति पाई.       ------३
 
मैं, मेरा, ममकार अहंता,  जीवन बंधन, जनम अनंता,
मान और अपमान समाना,  सम दृष्टा, सबको सम माना.
कर्ता, कर्म करत कोऊ अन्या, अस विचार जिनके मन धन्या.
धन्य-धन्य निष्कामी प्रानी, करम विपाक, करत वे ज्ञानी.     -------४

पुत्र, वित्त लोकेष्णा त्यागी, वे ही मोक्ष-मार्ग अनुरागी.
बस भिक्षान्न, अमिय जिन तृप्ता,  देह निर्वहन हेतु न लिप्ता.
परे परात्पर ब्रह्म प्रकासा,  अंतस धरे ब्रह्म की आसा,
धन्य-धन्य अस द्विज जन सोई,  धन्य-धन्य शुभ जनम संजोई.     -------५

ना अणु ना ही महत अनंता, ना सत, असत, विरल ही सत्ता.
ना नारी ना पुरुष नपुंसक,  एक मूल कारण जग सर्जक.
मन एकाग्र ब्रह्म जिन साधा, वे भव सिन्धु तरें बिनु बाधा.
धन्य-धन्य जिन ब्रह्म उपासा, अन्य-अन्य बंधित भव पाशा.       --------६

तिन पर कृपा नियंता कीन्हा,  जिन अज्ञान सहज तजि दीन्हा.
जनम, मृत्यु, दुःख, ज़रा अवस्था,  जिन जानाति अथ प्रकृति व्यवस्था.
ज्ञान रूप अरि काटहिं बन्धा,  जीवन दर्शन, मुक्ति प्रबंधा.
धन्य-धन्य जिनके चित जागा, अस विराग,  वे ही बढ भागा.    --------७

शांत, सुमति, शुभ, मधुर सुभावा,  विरत, जिन्हें दृढ़ निश्चय भावा.
आत्म तत्त्व वेत्ता  वनवासी,  कण-कण ब्रह्म तत्त्व विश्वासी.
परम ब्रह्म परि पूरन सत्ता, आदि-अंत  परब्रह्म इयत्ता.
धन्य- धन्य, जीवन प्रभुताई,  ब्रह्म तत्त्व जिन चित्त समाई.   ---------८
 
इति धन्याष्टकं
***********
इस धन्याष्टक को पढ़ें, सुनें-गुनें जो जीव.
उन पर सदा सदय रहें, हरि-हर करुणासींव..

मृदुल कीर्ति की हो कृपा, द्स दिश रहे सुनाम.
धन्य-धन्य सर्वत्र सुन, देह धरें निष्काम..

कल-कल 'सलिल'-निनाद में, धन्याष्टक का वास.
जो सुन पाये, वह तरे, मिले न फिर भव-त्रास.

पाकर कृपा-प्रसाद यह, झूम उठा है आत्म.
शब्द-ब्रम्ह अक्षर-अजर-अमर, प्रगट परमात्म..

छंद भाव लय ताल का, मिश्रण है अनमोल.
परमानन्द मिला सलिल, शब्द-शब्द में घोल..

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बुधवार, 9 जून 2010

हिन्दी टूल किट : आई एम ई को इंस्टाल करें --- संजीव तिवारी

हिन्दी टूल किट : आई एम ई को इंस्टाल करें एवं अपने कम्प्यूटर को हिन्दी सक्षम बनायें

>> मंगलवार, २२ सितम्बर २००९


कम्‍यूटर में हिन्‍दी सक्षम करने के विभिन्‍न औजार हैं एवं इन पर मेरे से पूर्व मेरे हिन्‍दी सेवी अग्रजों नें ढेरों लेख लिखे हैं। इन सबके बावजूद इधर छत्‍तीसगढ में प्रिंट मीडिया में एवं नेट पर आरंभ में कुछेक तकनीकी कलम घसीटी के बाद मेरे मित्र मुझे लगभग प्रत्‍येक दिन मेल से या फोन से मुझे इसके संबंध में पूछते हैं। प्रत्‍येक को इस संबंध में अलग अलग जानकारी देने के बजाए मैं जिस हिन्‍दी टूल का प्रयोग करता हूं उसके संबंध में अपने शब्‍दों में जानकारी प्रस्‍तुत कर रहा हूं। मैं कम्‍प्‍यूटर में हिन्‍दी टाईपिंग के लिए पहले डब्‍लू एस में अक्षर, पेजमेकर में श्री लिपि फिर वर्ड में कृतिदेव एवं क्‍वार्क में चाणक्‍य फोंट पर काम करता था। मेरी उंगलियां रेमिंगटन एवं गोदरेज कीबोर्ड के अनुसार काम करती हैं। आईएमई से मैंने वही यूनीकोड हिन्‍दी फोंट कीबोर्ड पाया जो मैं कम्‍प्‍यूटर पर डॉस के समय से लगभग पंद्रह-बीस वर्ष से प्रयोग कर रहा हूं। देखें क्रमबद्ध संस्‍थापना निर्देश (एक्‍सपी के लिए) -
नीचे दिये लिंक को क्लिक कर IME हिन्दी टूल किट डाउनलोड करें, यह लिंक श्रीश शर्मा जी द्वारा सहेजा गया है इसका आकार 1.23 एमबी है -
इसे क्लिक कर अपने कम्‍प्‍यूटर में इस टूल का ईएक्‍सई फाईल डाउनलोड कर लेवें.
फिर इस ईएक्‍सई फाईल को क्लिक करें व इंस्‍टाल प्रक्रिया आरंभ करें 'नेक्‍स्‍ट' 'नेक्‍स्‍ट' से आगे बढें.
जब पूर्ण रूप से यह टूल इंस्‍टाल हो जायेगा तब यह विंडो आयेगा जिसमें आपके कम्‍प्‍यूटर को रिस्‍टार्ट करने को पूछा जायेगा, यहां आप नो ....... विकल्‍प को चुने और फिनिश को क्लिक कर देवें.
अब स्‍टार्ट - सेटिंग - कन्‍ट्रोल पैनल में जायें. जब आप कन्‍ट्रोल पैनल को क्लिक करेंगें तो यह विंडो खुलेगा . इसमें आप डेट टाईम एण्‍ड रीजनल ऑप्‍शन को क्लिक करें-
अब यह विंडो खुलेगा इसमें रीजनल लैंग्‍वेज सैटिंग को क्लिक करें (एक्‍सपी के अन्‍य वर्जनों में यदि यह प्रक्रिया कुछ अलग हो फिर भी हमें रीजनल लैंग्‍वेज सैटिंग में आना है)-
रीजनल लैंग्‍वेज सैटिंग को क्लिक करने पर यह नया विंडो खुलेगा जिसमें आप लैंग्‍वेज टैब को क्लिक करें -
अब डिटेल को क्लिक करें -
इस विंडो में एड बटन को क्लिक करें -
फिर यह विंडो आयेगा । इसमें इनपुट लैंगवेज के डाउन एरो की को क्लिक करें - इससे विभिन्न भाषाओं की एक लंबी लिस्ट निकलेगी जिसमें से Hindi को सलेक्ट करें एवं ओके बटन क्लिक करें -
अब Hindi भाषा आपके कम्प्यूटर में संस्‍थापित हो गई, अब हमें अपने कम्प्यूटर में अपने पसंद का कीबोर्ड चयन करना है जो इस प्रोग्राम से प्राप्‍त होगा इसके लिये इस विंडो के हिन्‍दी ट्रेडीशनल के डाउन एरो को क्लिक करें - इससे विभिन्‍न भाषाओं के की बोर्ड की लिस्‍ट सामने आयेगी जिसमें से आईएमई की बोर्ड सलेक्‍ट करने के लिए सबसे नीचे जाईये यहां आईएमई को सलेक्‍ट करिये -
ओके बटन को क्लिक करें -
आपके सिस्‍टम में आईएमई इंस्‍टाल हो चुका । अब आपके कम्‍प्‍यूटर को ओके बटन दबाकर रिस्‍टार्ट करें -
रिस्‍टार्ट होने के बाद आपके कम्‍प्‍यूटर के बार में या उपर दाहिनी ओर EN लिखा हुआ दिखेगा । यह प्रदर्शित करता है कि आपके कम्‍प्‍यूटर में अंग्रेजी के अतिरिक्‍त कोई अन्‍य भाषा भी संस्‍थापित है. यदि यह उपर दाहिनी ओर नीचे दिये गये चित्र की तरह दिखाई देता है तो उसे मिनिमाईज कर लें -
आप अपने कम्‍प्‍यूटर के वर्ड, नोट पैड या कोई अन्‍य प्रोगरेम को चलाने के बाद इस टूल से वहां हिन्‍दी में ऑफलाईन होते हुए भी लिख सकेंगे एवं अपने पोस्‍ट की सामग्री को ऑनलाईन होने से पहले भी लिखकर सहेज सकते हैं. इससे आप इंटरनेट में हिन्‍दी सर्च करने एवं ब्‍लागर में पोस्‍ट करने के लिए भी प्रयोग कर सकते हैं. आवश्‍यक यह है कि जब जहां पर हिन्‍दी लिखना हो उस प्रोग्राम को चालू करके; आपके कम्‍प्‍यूटर के निचले बार में दाहिनी ओर दिख रहे EN को क्लिक करें; वहां हिन्‍दी के लिए विकल्‍प मिलेगा, EN को क्लिक करने पर एक मिनी टैग खुलेगा जिसमें से Hindi को चयन करें -
हिन्‍दी को चयन करने पर साईडबार में कीबोर्ड का चित्र आ जायेगा, एवं EN की जगह HI दिखने लगेगा। अब यहां अपने पसंद के कीबोर्ड के चयन के लिये इस कीबोर्ड को क्लिक करना होगा -
यहां आठ प्रकार के कीबोर्ड विकल्‍प मौजूद हैं जिसमें फोनेटिक कीबोर्ड जिससे आप अंग्रेजी में टाइप करेंगें तो हिन्‍दी में लिखायेगा वह पहला विकल्‍प है एवं रेमिंगटन की बोर्ड दूसरा, जिसे आप अपनी सुविधा अनुसार चुन सकते हैं -
यह प्रकिया आप अपने वर्ल्ड प्रोसेसर या ब्लॉगर मे अपनाकर हिन्दी लिख सकते है ! हिन्‍दी में चैट कर सकते हैं, हिन्‍दी में आरकुट स्‍क्रैप लिख सकते हैं -
यह इंटरनेट एक्‍सप्‍लोरर, ओपेरा या फॉयर फॉक्‍स में भी काम करता है जैसे कि आपको इंटरनेट के सर्च आप्‍शन में कोई हिन्‍दी शब्‍द खोजना है तो आप EN को HI करें एवं अपने जाने पहचाने की बोर्ड से हिन्‍दी टाईप कर सर्च करें । यह किसी भी मेल, आरकुट, मैसेंजर में हिन्‍दी को सक्षम बनाता है और जब आप EN को HI करते है तब किसी भी प्रोग्राम में हिन्‍दी में लिखना संभव करता है । यहां यह बात ध्‍यान में रखने योग्‍य है कि जब आप कम्‍प्‍यूटर चालू करते है तो लैंग्वेज बार में EN लिखा रहता है जैसे ही आप कोई प्रोग्राम, जिसमें कि आप हिन्‍दी में लिखना चाहते हैं, खोलते हैं उसके बाद EN को HI करें तब यह आईएमई उस प्रोग्राम के लिए सक्षम हो पाता है जैसे ही आप उस प्रोग्राम को मिनिमाईज या बंद करते हैं लैंग्वेज बार पुन: EN दिखाने लगता है यानी तब अंग्रेजी सक्षम हो जाता है । प्रत्‍येक प्रोग्राम के लिए आपको प्रोग्रसम खोलने के बाद EN को HI करना है बस फिर जहां हिन्‍दी में टाईप करना है वहां क्लिक कर कर्सर लाईये और शुरू हो जाईये ।

(चित्रों को स्‍पष्‍ट देखने के लिए उसे क्लिक करें)

विशेष ध्‍यान रखें : जब आप अपने ई मेल खाते में, बैंकिंग खाते में अथवा अन्‍य किन्‍हीं खातों में लॉगिन करते हैं उस समय EN दिख रहा हो अन्‍यथा आप सोचेंगे कि वहां पर यूजर आई डी और पासवर्ड गलत क्‍यों आ रहा है या स्‍वीकार क्‍यों नहीं कर रहा है। कंप्‍यूटर स्‍टार्ट करते समय यदि पासवर्ड मांगता है और सही पासवर्ड देने में भी स्‍वीकार न कर रहा हो Alt+Shift कीज़ को इकट्ठा दबाकर छोड़ दें फिर पासवर्ड टाईप करें, तब कंप्‍यूटर उसे स्‍वीकार कर लेगा। बिना दिखाई दिए अथवा किसी भी अवस्‍था में इन दोनों कीज़ को इकट्ठा दबाकर भाषा EN या HI बदली जा सकती है। संजीव तिवारी