कुल पेज दृश्य

मंगलवार, 28 जनवरी 2020

नवगीत

नवगीत
*
बदल गए रे
दिन घूरे के

कैक्टस
दरवाज़े पर शोभित
तुलसी चौरा
घर से बाहर
पिज्जा
गटक रहे कान्हा जू
माखन से
दूरी जग जाहिर
गौरैया
कौए न बैठते
दुर्दिन पनघट-
कंगूरे के

मत पाने 
चाहे जो बोलो
मत पाकर 
निज पत्ते खोलो
सरकारी 
संपत्ति बेच दो
जनगण-मन में 
नफरत घोलो 
लड़ा-भिड़ा 
खेती बिकवा दो 
तार तोड़ दो
तंबूरे के
***
संजीव 

नवगीत

एक रचना 
*
लज्जा विवश
नहा नलके पर
गुंडई का हो रही शिकार

मँहगी प्याज़ प्यार से ज़्यादा
जुमला होता है हर वादा
छप्पन इंची बड़बोलापन
सहनशीलता नहीं राई भर
बब्बा की
तबियत ख़राब तो
नेहरू ही है जिम्मेदार

बात न माने अगर लुगाई
बहू विदेशी दोषी भाई
मोंडा फिरता है आवारा
पप्पू का कसूर है सारा
मोंड़ी भागी
मिसेज वाड्रा
को सूली दे दे सरकार 
***
संजीव 

ग्वारीघाट जबलपुर : सूर्यास्त


ग्वारीघाट जबलपुर : सूर्यास्त 



चित्र पर रचना 

*
लल्ला-लल्ली रोए मचले हमें घूमना मेला
लालू-लाली ने यह झंझट बहुत देर तक झेला
डाँटा-डपटा बस न चला तो दोनों करें विचार
इन्हें मनायें कैसे? लेना पड़े न हमें उधार
होटल या बाजार गए तो चपत लगेगी भारी
खाली जेब मुसीबत होगी मँहगी चीजें सारी
खर्चा कम, मन बहले ज्यादा, ऐसा करो उपाय
चलो नर्मदा तीर नहाएँ-घूमें, है सदुपाय
शिव पूजें पाएँ प्रसाद सूर्योदय देखें सुंदर
बच्चों का मन बहलेगा जब दिख जाएँगे बंदर
स्कूटर पर चारों बैठे मानो हो वह कार
ग्वारीघाट पहुँचकर देखा ऊषा करे सिंगार
नभ पर बैठी माथे पर सूरज का बेंदा चमके
बिंब मनोहर बना नदी में, हीरा जैसे दमके
चहल-पहल थी खूब घाट पर घूम रहे नारी-नर
नहा रहे जो वे गुंजाएँ बम भोले नर्मद हर
पंडे करा रहे थे पूजा, माँग दक्षिणा भारी
पाप-पुण्य का भय दिखलाकर चला चढ़ोत्री आरी
जाने क्या-क्या मंत्र पढ़ें फिर मस्तक मलते चंदन
नरियल चना चिरौंजीदाने पंडित देता गिन गिन
घूम थके भूखे हो बच्चे पैर पटककर बोले
अब तो चला नहीं जाता, कैसे बोलें बम भोले
लालू लाया सेव जलेबी सबने भोग लगाया
नौकायन कर मौज मनाई नर्मदाष्टक गाया
***
संजीव
२७-१-२०२०
७९९९५५९६१८

के के मुहम्मद पद्मश्री


प्रख्यात पुरातत्वविद के के मुहम्मद पद्मश्री इन्टेक जबलपुर में - अयोध्या में राम 
मंदिर की पुरातनता पर सारगर्भित व्याख्यान व चर्चा के बाद बाएँ से प्रो.संजय वर्मा, 
आचार्य संजीव वर्मा सलिल, डॉ.सुधीर तिवारी, पुरातत्वविद् के के मुहम्मद पद्मश्री, 
डॉ आर के शर्मा तथा अन्य विदवज्जन। २६ जनवरी २०२० 

रविवार, 26 जनवरी 2020

गणतंत्र

जनगण सेवी तंत्र बने राधे माधव
लोक जागृति मंत्र बने राधे माधव
प्रजा पर्व गणतंत्र दिवस यह अमर रहे
देश हेतु जन यंत्र बने राधे माधव
हों मतभेद न पर मनभेद कभी हममें
कोटि-कोटि जन एक बने राधे माधव
पक्ष-विपक्ष विनम्र सहिष्णु विवेकी हों
दाऊ-कन्हैया सदृश सदा राधे माधव
हों नर-नारी पूरक शंकर-उमा बनें
संतति सीता-राम रहे राधे माधव
हो संजीवित जग जीवन की जय बोलें
हो न महाभारत भारत राधे माधव
आर्यावर्त बने भारत सुख-शांतिप्रदा
रिद्धि-सिद्धि-विघ्नेश बसें राधे माधव
देव कलम के! शब्द-शक्ति की जय जय हो
शारद सुत हों सदा सुखी राधे माधव
जगवाणी हिंदी की दस दिश जय गूँजे
स्नेह सलिल अभिषेक करे राधे माधव
***
संजीव
गणतंत्र दिवस २०२०
९४२५१८३२४४

शनिवार, 25 जनवरी 2020

अभियान

अभियान एवं प्रसंग के संयुक्त तत्वावधान में
‘‘बुधिया लेता टोह’’  गीत-नवगीत संग्रह गीतकार बसंत कुमार शर्मा
कृति लोकार्पण समारोह एवं काव्य संगोष्ठी
दिनांक : २६-१-२०२०     

प्रथम सत्र - लोकार्पण समारोह  
संचालन - विनोद नयन            

३.००  - अतिथिगणों द्वारा दीप प्रज्ज्वलन एवं सरस्वती पूजन    
३.०५ - सरस्वती वंदना -  अर्चना गोस्वामी/श्रीमती मिथलेश बड़गैंया/डॉ0 रानू रूही/विनीता श्रीवास्तव  

३.१०  - अतिथि स्वागत/सम्मान/परिचय - श्री विनोद नयन 
प्रो. कपिलदेव मिश्र कुलपति जी   - श्रीमती मंजरी शर्मा / जनाब मकबूल अली 
आचार्य कृष्णकांत चतुर्वेदी जी - श्रीमती छाया सक्सेना / डॉ अनिल कोरी 
आचार्य भगवत दुबे जी - श्रीमती मिथलेश बड़गैंया / श्री आलोक पाठक
डॉ. सुरेश कुमार वर्मा जी - श्रीमती विनीता विधि जी / श्री अविनाश ब्यौहार
आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी - श्रीमती विनीता श्रीवास्तव / श्री राजेंद्र मिश्रा  
डॉ. रामगरीब पांडे ‘विकल’ जी - श्रीमती कृष्णा राजपूत / श्री इंद्र बहादुर श्रीवास्तव
          श्री बसंत कुमार शर्मा जी           - श्रीमती मधु जैन / प्रो. शोभित वर्मा    

संस्था परिचय अभियान - श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव / श्री अखिलेश खरे 
संस्था परिचय प्रसंग - डॉ रानू राहू / श्री डॉ अनिल कोरी

३.२०  - पुस्तक लोकार्पण 
३.२५  - पुस्तक परिचय/कृति चर्चा - बसंत कुमार शर्मा 
३.३०  - समालोचना -
३.३०  - डॉ. राम गरीब पांडेय  ‘विकल’
३.४० - आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’  
३.५० - आचार्य भगवत दुबे

विशिष्ट वक्ता - डॉ. सुरेश कुमार वर्मा  
- मुख्य अतिथि का उद्बोधन प्रो. कपिल देव मिश्र    
- अध्यक्षीय उदबोधन डॉ. कृष्णकांत चतुर्वेदी 
आभार - श्री अखिलेश खरे   

स्वल्पाहार  ४. ३५ से ५.००  बजे तक 

द्वितीय सत्र - काव्य संगोष्ठी 
५ बजे से - ७ बजे तक

अध्यक्षता - श्री मोहन शशि - स्वागत श्री विनोद नयन / श्री संजीव वर्मा ‘सलिल’
विशिष्ट अतिथि - श्री नवीन चतुर्वेदी - स्वागत डॉ. रानू रूही / श्री हरिसहाय पांडेय
आभार -  प्रो. शोभित वर्मा
==========
अतिथि परिचय

आचार्य कृष्णकान्त चतुर्वेदी 

संस्कारधनी जबलपुर में १९ दिसंबर १९३७ को जन्मे, भारतीय मनीषा के श्रेष्ठ प्रतिनिधि, विद्वता के पर्याय, सरलता के सागर, वाग्विदग्धता के शिखर आचार्य कृष्णकांत चतुर्वेदी जी के व्यक्तित्व पर राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी की निम्न पंक्तियाँ सटीक बैठती हैं- 

जितने कष्ट-कंटकों में है जिसका जीवन सुमन खिला  
गौरव गंध उसे उतना ही यत्र-तत्र-सर्वत्र मिला।।

कालिदास अकादमी उज्जैन के निदेशक, रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय जबलपुर में संस्कृत, पाली, प्रकृत विभाग के अध्यक्ष व् आचार्य पदों की गौरव वृद्धि कर चुके, भारत सरकार द्वारा शास्त्र-चूड़ामणि मनोनीत किये जा चुके, अखिल भारतीय प्राच्य विद्या परिषद् के सर्वाध्यक्ष निर्वाचित किये जा चुके, महामहिम राष्ट्रपति जी द्वारा प्राच्य विद्या के विशिष्ट विद्वान के रूप में सम्मानित, राजशेखर अकादमी के निदेशक आदि पदों की शोभा वृद्धि कर चुके आचार्य जी के मार्गदर्शन में ४० छात्रों को पीएच. डी. तथा २ छात्रों ने डी.लिट्. करने का सौभाग्य मिला है। राधा भाव सूत्र, आगत का स्वागत, अनुवाक, अथातो ब्रम्ह जिज्ञासा, वेदांत तत्व समीक्षा, बृज गंधा, पिबत भागवतम आदि अबहुमूल्य कृतियों की रचनाकर आचार्य जी ने भारती के वांग्मय कोष की वृद्धि की है। जगद्गुरु रामानंदाचार्य सम्मान, पद्मश्री श्रीधर वाकणकर सम्मान, अखिल भारतीय कला सम्मान, ज्योतिष रत्न सम्मान, विद्वत मार्तण्ड, विद्वत रत्न, सम्मान, स्वामी अखंडानंद सम्मान, युगतुलसी रामकिंकर सम्मान, ललित कला सम्मान अदि से सम्मानित किये जा चुके आचार्य श्री संस्कारधानी ही नहीं देश के गौरव पुत्र हैं। आप अफ्रीका, केन्या, आदि देशों में भारतीय वांग्मय व् संस्कृति की पताका फहरा चुके हैं। आपकी उपस्थिति व आशीष हमारा सौभाग्य है। =

प्रो. कपिलदेव मिश्र - कुलपति रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय 

प्रो. मिश्र सहज सरल सौम्य व्यक्तित्व के धनी एवं प्रखर वक्ता होने के साथ-साथ एक कुशल प्रशासक के रूप में जाने जाते है। आपको हिंदी की विशिष्ट सेवा के लिए विक्रमशिला हिंदी विश्वविद्यालय भागलपुर ने उन्हें डी.लिट. की मानद उपाधि से सम्मानित किया है। शिक्षा रत्न, बेस्ट सिटीजंस आफ इंडिया, इंदिरा गांधी शिरोमणि, भारत शिक्षा रत्न व राष्ट्रीय विद्या गौरव गोल्ड एवार्ड से प्रो. मिश्र सम्मानित किये गए हैं। आप विश्वविद्यालयों में अन्य प्रशासनिक दायित्वों को भी निभा चुके हैं। रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय को कुलपति रूप में अपनी कर्मठता, दूरदृष्टि तथा नवाचार से आपने नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया है।  

कपिलदेव जी मिश्र हैं, शिक्षा गुरु निष्णात
श्रेष्ठ प्रशासन दक्षता, दूर दूर विख्यात 
करें समस्याएँ सभी दूर, जगा नव आस
नव उन्नति हर दिन मिले, निश-दिन करें प्रयास  
  


प्रो. मिश्र की गौरवमय उपस्थिति से यह नगर, मंच और हम सब धन्यता अनुभव कर रहे हैं। 

डॉ. सुरेश कुमार वर्मा 

श्रद्धेय डॉ. सुरेश कुमार वर्मा नर्मदांचल की साधनास्थली संस्कारधानी जबलपुर के गौरव हैं। "सादा जीवन उच्च विचार" के सूत्र को जीवन में मूर्त करनेवाले डॉ. वर्मा अपनी विद्वता के सूर्य को सरलता व् विनम्रता के श्वेत-श्याम मेघों से आवृत्त किये रहते हैं। २० दिसंबर १९३८ को जन्मे डॉ. वर्मा ने प्राध्यापक हिंदी, विभागाध्यक्ष हिंदी, प्राचार्य तथा अतिरिक्त संचालक उच्च शिक्षा के पदों की शोभा वृद्धि कर शुचिता और समर्पण का इतिहास रचकर ऋषि परंपरा को जीवंत रखा है। 

सरल सहज शब्दर्षि, ज्ञान के सागर, समय-धरोहर हैं 
अनुपम है पांडित्य आपका, रचनाएँ युग का स्वर हैं    

आपने समालोचना कृति ‘डॉ. राम कुमार वर्मा की नाट्यकला’ तथा भाषा विज्ञान का अनुपम ग्रंथ ‘हिंदी अर्थान्तर न्यास’ रचकर ख्याति अर्जित की। नाट्य कृति ‘निम्न मार्गी’ व ‘दिशाहीन’ तथा उपन्यास  ‘मुमताज महल’, ‘रेशमां’, ‘सबका मालिक एक’ तथा ‘महाराज छत्रसाल’ कहानी संग्रह ‘जंग के दरवाजे पर’ तथा ‘मंदिर एवं अन्य कहानियाँ’ निबंध संग्रह ‘करमन की गति न्यारी’, ‘मैं तुम्हारे हाथ का लीला कमल हूँ’ आपके अनमोल ग्रन्थ है। इन ग्रंथों से आपने बहुआयामी रचनाधर्मिता व् सृजन सामर्थ्य की पताका फहराई है। आपकी उपस्थिति हमारा सौभाग्य है।  

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’  
सनातन सलिला नर्मदा तीर पर मंडला नगर में २० अगस्त १९५२ को जन्मे आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी का नाम अंतर्जाल पर हिंदी साहित्य जगत में पारंपरिक एवं नवीन छंदोंके सृजन व शोध-समालोचना, पत्रिकाओं व् समरिकाओं के संपादन हेतु अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। गूगल पर उनके लिखे दो लाख से अधिक पृष्ठ उपलब्ध हैं। अपनी बुआ महीयसी महादेवी वर्मा तथा माँ स्व. शांति देवी से विरासत में प्राप्त संस्कारों तथा सृजन प्रतिभा संपन्न सलिल जी अंतर्जाल पर ३०० से अधिक रचनाकारों को हिंदी भाषा व्याकरण तथा पिंगल का शिक्षण दे चुके हैं। आपने ५०० से अधिक नए छंदों का अन्वेषण कर हिंदी को समृद्ध किया है। आपकी अंतरजाल पत्रिका दिव्य नर्मदा की पाठक संख्या २४ लाख से अधिक है।  'कलम के देव' भक्ति गीत संग्रह, 'लोकतंत्र का मकबरा' तथा 'मीत मेरे' आपकी छंद मुक्त कविता संग्रह, काल है संक्रांति का व सड़क पर नवगीत संग्रह तथा भूकंप के साथ जीना सीखें लोकोपयोगी तकनीकी पुस्तक आपकी बहु चर्चित कृतियाँ हैं। ‘’काल है संक्रांति का’’ को हरिशंकर सम्मान तथा ‘’सड़क पर’’ को अभिव्यक्ति विश्वम सम्मान से सम्मानित किया गया है। आपके तकनीकी लेख “वैश्विकता के निकष पर भारतीय यांत्रिकी संरचनाएँ” को इंस्टीट्यूशन ऑफ़ इंजीनियर्स द्वारा अखिल भारतीय द्वितीय श्रेष्ठता पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया है। प्रो. शरद नारायण खरे के शब्दों में- 
जिसने रौशन कर दिया, पूरा मध्य प्रदेश  
वह वर्मा संजीव हैं, जाने सारा देश 
करते अक्षर साधना, विनत भाव से नित्य 
इसीलिए साहित्य के, सलिल हुए आदित्य  
     

आचार्य भगवत दुबे 

संस्कारधानी जबलपुर में १८ अगस्त १९४३ को जन्मे आचार्य भगवत दुबे गद्य-पद्य की विभिन्न विधाओं में दक्ष हैं। वे आम आदमी की संवेदना को कागज पर उतारने में माहिर हैं।  आपने महाकाव्य दधीचि,दोहा संग्रह शब्दों के संवाद, बुंदेली दोहे व साँसों के संतूर, कहानी संग्रह दूल्हादेव, गीत संग्रह स्मृति गंधा, अक्षर मंत्र, हरीतिमा, रक्षाकवच, संकल्परथी, बजे नगाड़े काल के, वनपाँखी, जियो और जीने दो, विष कन्या, शंखनाद, प्रणय ऋचाएं, कांटे हुए किरीट, करुणा यज्ञ, शब्द विहग, हिंदी तुझे प्रणाम, हिरन सुगंधों के, हम जंगल के अमलतास, अक्कास-बक्कड़, अटकन चटकन, छुपन छुपाई, नन्हें नटखट, चुभन, शिकन, घुटन, साईं की लीला अपार, माँ ममता की मूर्ति, गीत स्वाभिमान के, फागों में लोक रंग, जनक छंद की छवि छटा, हाइकु रत्न, पारसमणि, ताँका बांका छंद है, गौरव पुत्र, चिंतन के चौपाल, कर्म वीर, हिंदी के अप्रतिम सर्जक, लोकमंजरी आदि ४४ पुस्तकों का सृजन किया है । आपने अनेक पत्रिकाओं, स्मारिकाओं व् संकलनों के संपादन किया है। । आपके साहित्य पर छात्र छात्रायें एम.फिल और पी-एच.डी. कर रहे हैं।

भगवत कृपा प्रसाद हैं, भगवत दुबे मनीष 
शोभा हिंदी जगत की, सचमुच शब्द-महीश  

डा. रामगरीब पाण्डेय ‘विकल’

२ दिसम्बर १९६० को , चुरहट (जिला सीधी) मध्यप्रदेश में जन्में डॉ. रामगरीब पण्डे ‘विकल’ दूरसंचार विभाग में लेखाधिकारी होते हुए भी हिंदी साहित्य को समृद्ध करने की दिशा में निरंतर सक्रिय व् सफल हैं। हिंदी साहित्य में शोधोपाधि प्राप्त विकल जी ने हिन्दी कविता, गीत, ग़ज़ल के अलावा विविध विषयों पर निबन्ध लेखन किया है।   रीवांचल की लोकभाषा ‘बघेली’ में विकल जी का साहित्य सृजन उल्लेखनीय है। ‘बदलते मौसम के इन्तजार में’ तथा ‘सूरज की मुक्ति के लिए’ आपके काव्य संग्रह हैं। आपको ‘बदलते मौसम के इन्तजार में’ के लिए मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी से प्रादेशिक ‘श्रीकृष्ण सरल’ कृति पुरस्कार २०१० प्राप्त हुआ है। नवोदितों को साहित्य साधना के प्रति प्रेरित करने व मार्गदर्शन करने में प्रवृत्त विकल जी  इसी माह ३१ जनवरी सेवानिवृत हो रहे हैं। 

अविकल धीरज के धनी, रामगरीब अमीर 
सतत सर्जन कर हर रहे, हिंदी माँ की पीर 


श्री बसंत शर्मा 

वीर भूमि राजस्थान के जोधपुर जिले में स्मृति शेष श्रीमती कमलादेवी शर्मा तथा स्मृतिशेष दौलतराम शर्मा के आत्मज श्री बसंत शर्मा भारतीय रेल यातायात सेवा में ......  पर पर सेवारत हैं। गुरु गंभीर शासकीय दायित्व निर्वहन के साथ निरंतर हिंदी साहित्य की श्रीवृद्धि करने हेतु समर्पित शर्मा जी के दोहे विश्ववाणी हिंदी संस्थान जबलपुर द्वारा शांति-राज पुस्तक माला के अंतर्गत प्रकाशित दोहा शतक मंजूषा के प्रथम भाग दोहा-दोहा नर्मदा में संकलित किये जाकर प्रशंसित हुए हुए हैं। बुधिया बैठा टोह में आपका प्रथम नवगीत संग्रह है। अभियान संस्था के अध्यक्ष श्री बसंत शर्मा हिंदी के विविध छंदों, मुक्तिका, हाइकु आदि का लेखन कर प्रशंसित हो रहे हैं। हिंदी में अधिकतम संभव विभागीय कार्य व् गतिविधियां संचालित कर रहे शर्मा जी से हिंदी साहित्य जगत को बहुत आशा है। 

हिंदी के प्रति समर्पित, वीरभूमि के पूत 
आम्र मंजरी सम खिले, लेकर महक अकूत 
छवि बसंत की बिखेरें, रच दोहे नवगीत 
सलिल पान सम तृप्ति दें, भर ग़ज़लों में प्रीत  


श्री मोहन शशि 

संस्कारधानी जबलपुर के पत्रकार जगत में अपनी कर्मठता, समर्पण तथा दक्षता के लिए जाने जाते मोहन शशि जी का जन्म १ अप्रैल १९३७ को हुआ। १९५६ से २०१८ तक प्रदेश के श्रेष्ठ समाचार पत्रों नवभारत तथा दैनिक भास्कर को शीर्ष पर पहुँचाने में शशि जी का योगदान असाधारण है। शशिजी १९६२ में वर्ल्ड यूथ कैम्प युगोस्लाविया में भारतीय प्रतिनिधि मंडल के  सचिव के रूप में सहभागिता तथा हिंदी काव्य पथ हेतु 'उदारनिक पदक' से सम्मानित किये जा चुके हैं।  सरोज, तलाश एक दाहिने हाथ की, राखी नाहने आई, हत्यारी रात, शक्ति साधना, दुर्गा महिमा, अमिय, बेटे से बेटी भली तथा जाग बुंदेला जाग बुंदेली आपकी बहुचर्चित साहित्यिक कृतियाँ हैं।

पत्रकारिता क्षेत्र के, प्रतिभाशाली रत्न 
मोहन शशि हैं शिखर पर, किये अहर्निश यत्न
हर बाधा संकट गया, हार- न मानी हार
कीर्तिमान रच ‘मिलन’ से, देकर पाया प्यार         

***

ख़बरदार दोहा

ख़बरदार दोहा 
संध्या सिंह को फड्स बुक ने ऑथर माना 
*
संध्या को ऑथर माना मुखपोथी जी
या सिंह से डर यश गाया मुखपोथी जी


फेस न बुक हो जाए लखनऊ थाने में
गुपचुप फेस बचाया है मुखपोथी जी

लाजवाब नवगीत, ग़ज़ल उम्दा लिखतीं
ख्याल न अब तक क्यों आया मुखपोथी जी

जुड़ संध्या के साथ बढ़ाया निज गौरव
क्यों न सैल्फी खिंचवाया मुखपोथी जी

है "मुखपोथी रत्न" ठीक से पहचानो
कद्र न करना आया है मुखपोथी जी

देख 'सलिल' में फेस कभी 'संजीव' बनो
समझ न तुमको क्यों आया मुखपोथी जी

तुम से हम हैं, यह मुगालता मत पालो
हम से तुम हो, सच भाया मुखपोथी जी?
*
संजीव
१९-१-२०
७९९९५५९६१८

दोहा-प्रतिदोहा संध्या सिंह -सलिल

दोहा-प्रतिदोहा
नर्म गिलहरी सी लगी , रेशम रेशम रूप l
कूदी छत पर पेड़ से , जब सर्दी की धूप ll - संध्या सिंह
*
सिंह सूरज दुबका दिखा, संध्या में हो मौन
रहा थरथरा काँपता, धैर्य धराए कौन
*

बसंत पंचमी

 बसंत पंचमी
संजीव
.
महत्व
भारत में जीवन के हर पहलू को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है | और इसी आधार पर पूजा - उपासना की व्यवस्था की गयी है | अगर धन के लिए दीपावली पर माता लक्ष्मी की उपासना की जाती है तो नेघा और बुद्धि के लिए माघ शुक्ल पंचमी को माता सरस्वती की भी उपासना की जाती है | धार्मिक और प्राकृतिक पक्ष को देखे तो इस समय व्यक्ति का मन अत्यधिक चंचल होता है | और भटकाव बड़ता है | इसीलिए इस समय विद्याऔर बुद्धि की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती की उपासना से हम अपने मन को नियंत्रित और बुद्धि को कुशाग्र करते है | वर्तमान संदर्भो की बात करे तो आजकल विधार्थी भटकाव से परेशान है | पढाई में एकाग्रता की समस्या है | और चीजो को लम्बे समय तक याद नहीं रख सकते है , इस दशा में बसंत पंचमी को की गयी माँ सरस्वती की पूजा से न केवल एकाग्रता में सुधार होगा बल्कि बेहतर यादाश्त और बुद्धि की बदोलत विधार्थी परीक्षा में बेहतरीन सफलता भी पायेंगे | विधार्थियों के आलावा बुद्धि का कार्य करने वाले तमाम लोग जैसे पत्रकार , वकील , शिक्षक आदि भी इस दिन का विशेष लाभ ले सकते है |
राशी अनुसार पूजन विधान :-
मेष :- स्वभावत: चंचल राशी होती है | इसीलिए अक्सर इस राशी के लोगो को एकाग्रता की समस्या परेशान करती है | बसंत पंचमी को सरस्वती को लाल गुलाब का पुष्प और सफ़ेद तिल चढ़ा दे | इससे चंचलता और भटकाव से मुक्ति मिलेगी |
वृष:- गंभीर और लक्ष के प्रति एकाग्र होते है परन्तु कभी कभी जिद और कठोरता उनकी शिक्षा और करियर में बाधा उत्पन्न कर देती है | चूँकि इनका कार्य ही आम तौर पर बुद्धि से सम्बन्ध रखने वाला होता है , अत : इनको नीली स्याही वाली कलम और अक्षत सरस्वती को समर्पित करना चाहिए | ताकि बुद्धि सदेव नियंत्रित रहती है |
मिथुन : - बहुत बुद्धिमान होने के बावजूद भ्रम की समस्या परेशान करती है | इसीलिए ये अक्सर समय पर सही निर्णय नहीं ले पाते | बसंत पंचमी के दिन सरस्वती को सफ़ेद पुष्प और पुस्तक अर्पित करने से भ्रम समाप्त हो जाता है एवं बुद्धि प्रखर होती है |
कर्क : - इन पर ज्यादातर भावनाए हावी हो जाती है | यही समस्या इनको मुश्किल में डाले रखती है | अगर बसंत पंचमी के दिन सरस्वती को पीले फूल और सफ़ेद चन्दन अर्पित करे तो भावनाए नियंत्रित कर सफलता पाई जा सकती है |
सिंह : - अक्सर शिक्षा में बदलाव व् बाधाओ का सामना करना पड़ता है | ये योग्यता के अनुसार सही जगह नहीं पहुच पाते है शिक्षा और विधा की बाधाओ से निपटने के लिए सरस्वती को पीले फूल विशेष कर कनेर और धान का लावा अर्पित करना चाहिए |
कन्या : - अक्सर धन कमाने व् स्वार्थ पूर्ति के चक्कर में पड़ जाते है | कभी कभी बुद्धि सही दिशा में नहीं चलती है | बुद्धि सही दिशा में रहे इसके लिए सरस्वती को कलम और दावत के साथ सफ़ेद फूल अर्पित करना चाहिए |
तुला :- जीवन में भटकाव के मौको पर सबसे जल्दी भटकने वाले होते है | चकाचोंध और शीघ्र धन कमाने की चाहत इसकी शिक्षा और करियर में अक्सर बाधा ड़ाल देती है | भटकाव और आकर्षण से निकल कर सही दिशा पर चले इसके लिए नीली कमल और शहद सरस्वती को अर्पित करे |
वृश्चिक : - ये बुद्धिमान होते है | लेकिन कभी कभार अहंकार इनको मुश्किल में ड़ाल देता है | अहंकार और अति आत्म विश्वास के कारण ये परीक्षा और प्रतियोगिता में अक्सर कुछ ही अंको से सफलता पाने से चुक जाते है | इस स्थिति को बेहतर करने के लिए सरस्वती को हल्दी और सफ़ेद वस्त्र अर्पित करना चाहिए |
धनु : - इस राशी के लोग भी बुद्धिमान होते है | कभी कभी परिस्थितिया इनकी शिक्षा में बाधा पहुचाती है | और शिक्षा बीच में रुक जाती है | जिस कारण इन्हें जीवन में अत्यधिक संघर्ष करना पड़ता है | इस संघर्ष को कम करने के लिए इनको सरस्वती को रोली और नारियल अर्पित करना चाहिए |
मकर : - अत्यधिक मेहनती होते है | पर कभी कभी शिक्षा में बाधाओ का सामना करना पड़ता है | और उच्च शिक्षा पाना कठिन होता है | शिक्षा की बाधाओ को दूर करके उच्च शिक्षा प्राप्ति और सफलता प्राप्त करने के लिए इनको सरस्वती को चावल की खीर अर्पित करनी चाहिए |
कुम्भ :- अत्यधिक बुद्धिमान होते है | पर लक्ष के निर्धारण की समस्या इनको असफलता तक पंहुचा देती है | इस समस्या से बचने के लिए और लक्ष पर ध्यान केन्द्रित करने के लिए इसको बसंत पंचमी के दिन सरस्वती को मिश्री का भोग चडाना चाहिए |
मीन : - इस राशी के लोग सामान्यत : ज्ञानी और बुद्धिमान होते है | पर इनको अपने ज्ञान का बड़ा अहंकार होता है | और यही अहंकार इनकी प्रगति में बाधक बनता है | अहंकार दूर करके जीवन में विनम्रता से सफलता प्राप्त करने के लिए इनको बसंत पंचमी के दिन सरस्वती को पंचामृत समर्पित करना चाहिए |
बसंत पंचमी के दिन अगर हर राशी के जातक इन सरल उपायों को अपनाये तो उनको बागिस्वरी , सरस्वती से नि: संदेह विधा और बुद्धि का वरदान मिलेगा |
कैसे करे सरस्वती आराधना : -
बसंत पंचमी के दिन प्रात: कल स्नान करके पीले वस्त्र धारण करे | सरस्वती का चित्र स्थापित करे यदि उनका चित्र सफ़ेद वस्त्रो में हो तो सर्वोत्तम होगा | माँ के चित्र के सामने घी का दीपक जलाए और उनको विशेष रूप से सफ़ेद फूल अर्पित करे | सरस्वती के सामने बैठ " ऍ सरस्वतये नम : " का कम से कम १०८ बार जप करे | एसा करने से विधा और बुद्धि का वरदान मिलेगा तथा मन की चंचलता दूर होगी |
पूजा अर्चना और उसके लाभ : -
लाल गुलाब , सफ़ेद तिल अर्पित करे तथा अक्षत चढाए |
सफ़ेद पुष्प , पुस्तक अर्पित करे |
पीले फूल , सफ़ेद चन्दन अर्पित करे |
पीले पुष्प , धान का लावा चढाए |
कलम - दवात , सफ़ेद फूल अर्पित करे |
नीली कलम , शहद अर्पित करे |
हल्दी और सफ़ेद वस्त्र अर्पित कर रोली , नारियल अर्पित करे |
चावल की खीर और मिश्री का भोग अर्पित करे |
लाभ : -
मन की स्थिरता और ताजगी महसूस होगी तथा बुद्धि विवेक नियंत्रित होंगे |
मन की कशमकश ख़त्म होगी बुद्धि प्रखर होगी |
भावनाए काबू में रहेगी , सफलता मिलेगी |
शिक्षा में सफलता , बुद्धि में वृद्धि होगी |
बुद्धि तेज , सोच सकारात्मक होगी |
सही दिशा मिलेगी |
अहंकार से मुक्ति मिलेगी |
संघर्ष और बाधाऍ कम होगी |
एकाग्रचित्तता में बढ़ोतरी होगी |

नवगीत

नवगीत:
भारत आ रै
संजीव
.
भारत आ रै ओबामा प्यारे,
माथे तिलक लगा रे!
संग मिशेल साँवरी आ रईं,
उन खों हार पिन्हा रे!!
.
अपने मोदी जी नर इन्दर
बाँकी झलक दिखा रए
नाम देस को ऊँचो करने
कैसे हमें सिखा रए
'झंडा ऊँचा रहे हमारा'
संगे गान सुना रे!
.
देश साफ़ हो, हरा-भरा हो
पनपे भाई-चारा
'वन्दे मातरम' बोलो सब मिल
लिये तिरंगा प्यारा
प्रगति करी जो मूंड उठा खें
दुनिया को दिखला रए
.

नवगीत

एक रचना
संजीव
.
छोडो हाहाकार मियाँ!
. दुनिया अपनी राह चलेगी खुदको खुद ही रोज छ्लेगी साया बनकर साथ चलेगी छुरा पीठ में मार हँसेगी आँख करो दो-चार मियाँ! . आगे आकर प्यार करेगी फिर पीछे तकरार करेगी कहे मिलन बिन झुलस मरेगी जीत भरोसा हँसे-ठगेगी करो न फिर भी रार मियाँ! . मंदिर मस्जिद कह लड़ लेगी
गिरजे को पल में तज देगी लज्जा हया शरम बेचेगी इंसां को बेघर कर देगी पोंछो आँसू-धार मियाँ!

आंदोलन-धरने की मारी
भूखा पेट बहुत लाचारी
राजनीति धोखा-अय्यारी
पत्रकारिता है बटमारी
कहीं नहीं है प्यार मियाँ

इसे चाहिए खूब दहेज़
उसे फैमिली से परहेज
जेल रहे अपनों को भेज
तीन तलाक़ सजाये सेज
दुनिया है बेज़ार मियाँ
***