गुरुवार, 25 जनवरी 2018

शिव दोहा

शिव निवृत्ति-पथ पथिक थे,
ऋषि-पत्नियां विमुग्ध।
ऋषिगण श्यामल नग्न नर,
देख हो रहे दग्ध।
*
कुपित पत्नियों प्रति हुए,
शीश चढ़ा क्यों काम?
दंडित हो यति दिगंबर,
विधि न हो सकें वाम।।
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मर्यादा मर्दित न हो,
दंडित हो अवधूत।
भंग नहीं विश्वास हो,
रिश्ते-नाते पूत।।
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शिव अभीत मुस्का रहे,
ऋषिगण कुपित न राह।
नीललोहिती लिंग-च्युत'
हो- न सके सत्-दाह।।
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ऋषि-पत्नियां सचेत हो,
थीं अति लज्जित मौन।
दोष न है यति का तनिक,
किंतु बताएं कौन?
*
मन में दबा विकार जो,
कर उद्घाटित-नष्ट।
योगी ने उपचार कर,
मेटा गर्व-अनिष्ट।।
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हम निज वश में थी नहीं,
कर सकता था भोग।
किंतु न अवसर-लाभ ले,
रहा साधता योग।।
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निरपराध को दण्ड से,
लगे अपरिमित पाप।
ऋषि-तप व्यर्थ न नष्ट हो,
साहस उपजा आप।।
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ऋषिगण! सच जाने बिना,
दें न दण्ड या शाप।
दोषी हैं हम साध्वियां,
झेल न पाईं ताप।।
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कृत्रिम संयम जी रहीं,
मन-उपजा अभिमान।
मिटा दिया युव तपी ने,
करा देह का भान।।
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अब तक है निष्पाप तन,
मन को कर निष्पाप।
करा सत्य साक्षात यह,
यति है शिव ही आप।।
*
जो मन-चाहे दण्ड दें,
हमको मान्य सहर्ष।
जीवन हिल-मिलकर जिएं,
हो तब ही उत्कर्ष।।
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यह यति पावन-पूज्य है,
यदि पाएगा दण्ड।
निरपराध-वध पाप का,
होगा पाप प्रचण्ड।
*
क्रमशः
२५.१.२०१८

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