शुक्रवार, 5 जनवरी 2018

muktika

मुक्तिका
*
नेह नर्मदा बहने दे
मन को मन की कहने दे
*
बिखरे गए रिश्ते-नाते
फ़िक्र न कर चुप तहने दे
*
अधिक जोड़ना क्यों नाहक
पीर पुरानी सहने दे
*
निज हित की चिंता जायज
कुछ सब-हित भी रहने दे
*
काला धन जिसने जोड़ा
उसको थोड़ा दहने दे
*
देह सजाते उम्र कटी
'सलिल' रूह को गहने दे


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