मंगलवार, 23 जनवरी 2018

navgeet

नवगीत:

शीत से कँपती धरा

शीत से कँपती धरा की
ओढ़नी है धूप
कोहरे में छिप न पाये
सूर्य का शुभ रूप
*
सियासत की आँधियों में 
उड़ाएँ सच की पतंग
बाँध जोता और माँझा, 
हवाओं से छेड़ जंग
उत्तरायण की अँगीठी में 
बढ़े फिर ताप-
आस आँगन का बदल 
रवि-रश्मियाँ दें रंग
स्वार्थ-कचरा फटक-फेंके
कोशिशों का सूप
*
मुँडेरे श्रम-काग बैठे 
सफलता को टेर
न्याय-गृह में देर 
कर पाये न अब अंधेर
लोक पर हावी नहीं हो 
सेवकों का तंत्र-
रजक-लांछित सिया वन 
जाए न अबकी बेर
झोपड़ी में तम न हो
ना रौशनी में भूप
*
पड़ोसी दिखला न पाए 
अब कभी भी आँख
शौर्य बाली- स्वार्थ रावण 
बाले निज काँख
क्रौंच को कोई न शर 
अब कभी पाये वेध-
आसमां को नाप ले 
नव हौसलों का पांख
समेटे बाधाएँ अपनी
कोख में अब कूप
*
२१.१. २०१२ 

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