सोमवार, 31 दिसंबर 2012

शिशु गीत सलिला : 8 संजीव 'सलिल'


शिशु गीत सलिला : 8
संजीव 'सलिल'
*

71. हाथी


सूंढ़ हिलाता आता है,
बच्चों के मन भाता है।
सूपे जैसे कान बड़े-
खम्बे जैसे पैर खड़े।

गन्ना इसको मन भाए,
पल में गट्ठा भर खाए।
बैठ महावत संग ऊपर
तुमको सैर करा लाये।।
*
72. गेंद


फेंको गेंद पकड़ना है,
नाहक नहीं झगड़ना है।
टप-टप टप्पे बना गिनो-
हँसो, न हमें अकड़ना है।।
*
73. बल्ला
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आ जाओ लल्ली-लल्ला,
होने दो जमकर हल्ला।
यह फेंकेगा गेंद तुम्हें -
रोको तुम लेकर बल्ला।।
*
74. रेलगाड़ी


छुक-छुक करते आती है,
सबको निकट बुलाती है।
टिकिट खरीदो, फिर बैठो-
हँसकर सैर कराती है।
*
75.आइसक्रीम


नाना-नाती, दादा-पोता,
नहीं कोई भी पाकर खोता।
जो भी बच्चा इसे न पाए-
वही मचलता जी भर रोता।।

नानी-दादी हँसकर खाती-
आइसक्रीम सभी को भाती।
स्वाद, रंग, आकार कई हैं,
जैसी भी हो 'सलिल' लुभाती।।
*
76. मेल


आओ, हम-तुम खेलें खेल,
कभी न कम हो अपना मेल।
एक साथ जो रहते हैं-
हर मुश्किल लेते हैं झेल।।
*
77.  दिवाली



आओ! मनाएं दिवाली,
उजली हों रातें काली.
घर की साफ़-सफाई करें.
लक्ष्मी मैया को पूजें.
खूब मिठाई खायेंगे,
मिल फुलझड़ी जलाएंगे.
*
78. होली



रंग खेलो आयी होली.
भर लो खुशियों से झोली.
खाओ गुझिया गाओ फाग-
झूमे बच्चों की टोली..
*
79. राखी



सावन की जब पड़े फुहार,
आये राखी का त्यौहार.
भाई की कलाई पर राखी
बंधे बहिन करे दुलार.
भाई बहिन की रक्षा का
जिम्मा लेता दे उपहार.
*
80. बड़ा दिन



सांताक्लाज खुशी-उपहार,
दे बच्चों को करता प्यार।

सबको गले लगाता है-
बच्चों के मन भाता है।।

खाते केक मिठाई हम
करती ठण्ड नाक में दम।

मना बड़ा दिन पर्व अनूप 
नया साल मन भाती धूप।।          
***


गीत: झाँक रही है... संजीव 'सलिल'

गीत:
झाँक रही है...
संजीव 'सलिल'
*
झाँक रही है
खोल झरोखा
नए वर्ष में धूप सुबह की...
*
चुन-चुन करती चिड़ियों के संग
कमरे में आ.
बिन बोले बोले मुझसे
उठ! गीत गुनगुना.
सपने देखे बहुत, करे
साकार न क्यों तू?
मुश्किल से मत डर, ले
उनको बना झुनझुना.

आँक रही
अल्पना कल्पना
नए वर्ष में धूप सुबह की...
*
कॉफ़ी का प्याला थामे
अखबार आज का.
अधिक मूल से मोह पीला
क्यों कहो ब्याज का?
लिए बांह में बांह
डाह तज, छह पल रही-
कशिश न कोशिश की कम हो
है सबक आज का.

टाँक रही है
अपने सपने
नए वर्ष में धूप सुबह की...
*

व्यंग्य रचना: हो गया इंसां कमीना... संजीव 'सलिल'

व्यंग्य रचना:
हो गया इंसां कमीना...
संजीव 'सलिल'
*
गली थी सुनसान, कुतिया एक थी जाती अकेली.
दिखे कुछ कुत्ते, सहम संकुचा गठी थी वह नवेली..
कहा कुत्तों ने: 'न डरिए, श्वान हैं इंसां नहीं हम.
आंच इज्जत पर न आयेगी, भरोसा रखें मैडम..
जाइए चाहे जहाँ सर उठा, है खतरा न कोई.
आदमी से दूर रहिए, शराफत उसने है खोई..'

कहा कुतिया ने:'करें हडताल लेकर एक नारा.
आदमी खुद को कहे कुत्ता नहीं हमको गवारा..'
'ठीक कहती हो बहिन तुम, जानवर कुछ तुरत बोले.
मांग हो अब जानवर खुद को नहीं इंसां बोले.
थे सभी सहमत, न अब इन्सान को मुंह लगायेंगे.
हो गया लुच्चा कमीना, आदमी को बताएँगे..
*****

कब? क्या?? जनवरी २०१३ संजीव 'सलिल'

कब?  क्या?? जनवरी २०१३
संजीव 'सलिल'
*
0१ जनवरी. ईसाई वर्षारंभ, चीनी राष्ट्रवादी सर्कार अथापित १९२७, सूडान गणराज्य दिवस १९५६, क्यूबा क्रांति १९५९, समोआ गणराज्य दिवस १९६२,
भारतीय दंड संहिता लागू १८६२, डॉ. सम्पूर्णानंद जयंती १८९०, डॉ. सतेन्द्र नाथ बोस जयंती १८९४,  डॉ. शांति स्वरुप भटनागर पुण्य तिथि १९५५, बीमा निगम राष्ट्रीयकरण १९७३,  
०२ जनवरी. जैनेन्द्र कुमार जयंती १९०६,
०४ जनवरी. बर्मा स्वाधीन,
०६ जनवरी. भारतेंदु हरिश्चन्द्र निधन १८८५, संगीतकार जयदेव दिवंगत १९८७,
०७ जनवरी. सोमनाथ मंदिर ध्वंस १०२५, स्वामी प्रणवनन्द निधन १९४१,     
०८ जनवरी. आशापूर्ण देवी जन्म १९१०, मोहन राकेश जन्म १९२५, 
०९ जनवरी. वृन्दावन लाल वर्मा जन्म १८८९, डॉ. हरगोविन्द खुराना जन्म १९२२, डॉ. सम्पूर्णानंद निधन १९६९,
१० जनवरी. हफीज मेरठी जन्म १९२२, ताशकंद घोषणा १९६६,
११ जनवरी. लालबहादुर शास्त्री निधन १९६६ ताशकंद रूस,
१२ जनवरी. स्वामी विवेकानंद जन्म १८६३, डॉ भगवान दास जन्म १८६९, दीनबन्धु एंड्रूज़ जन्म १८७१, क्रांतिकारी सूर्यसेन शहादत १९३४, महर्षि महेश योगी जन्म, प्रथम राष्ट्रीय युवा महोत्सव १९९४,
१३ जनवरी. शमशेर बहादुर सिंह जन्म १९११,
१४ जनवरी. डॉ. विद्यानिवास मिश्र जन्म १९२६,
१५ जनवरी. गुरु गोबिंद सिंग जन्म, मायावती जन्म १९५६,
१६ जनवरी. नेताजी सुभाषचन्द्र बोस फरार १९४१,
१७ जनवरी. हिंदी थिसारसकार अरविन्द कुमार जन्म १९३०, लीला मिश्र निधन १९८८,
१८ जनवरी. महादेव गोविन्द रानाडे जन्म, एन. टी. रामाराव निधन १९९६,
१९ जनवरी. सुधारानी श्रीवास्तव जन्म १९३२, ओशो दिवंगत १९९०, उपेन्द्रनाथ 'अश्क' दिवंगत १९९६, 
२० जनवरी. सीमान्त गाँधी अब्दुल गफ्फार खान जन्म,
२१ जनवरी. क्रांतिकारी रासबिहारी बोस शहादत, विष्णु प्रभाकर जन्म १९१२, गीता बाली निधन १९६५,
२३ जनवरी. रामानंदाचार्य जन्म, नेताजी सुभाषचन्द्र बोस जन्म,
२४ जनवरी. स्वामी रामदास जयंती, कलकत्ता विश्वविद्यालय स्थापित १८५७, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद राष्ट्रपति बने, जन गण मन... राष्ट्रीय गीत स्वीकार्य १९५०, डॉ. होमी जहाँगीर भाभा निधन १९६६,
२५ जनवरी. राजेन्द्र अवस्थी जन्म, राजमाता सिंधिया निधन,
२६ जनवरी. पूर्ण स्वराज्य की शपथ १९२९, भारत गणतंत्र बना १९५०,
२७ जनवरी. बहादुर शाह जफर पर मुकदमा १८५८,
२८ जनवरी. लाला लाजपत राय जयंती,
२९ जनवरी. प्रथम भारतीय अखबार प्रकाशित १७८०, रामकृष्ण मठ स्थापित १९३९, संगीत-नाटक अकादमी स्थापित १९५३,
३० जनवरी. म. गाँधी शहीद १९४८, माखनलाल चतुर्वेदी दिवंगत
३१ जनवरी. खलनायक के. एन. सिंह दिवंगत २०००,
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लघुकथा: एकलव्य संजीव 'सलिल' *

लघुकथा:
एकलव्य
संजीव 'सलिल'
*
- 'नानाजी! एकलव्य महान धनुर्धर था?'
- 'हाँ; इसमें कोई संदेह नहीं है.'
- उसने व्यर्थ ही भोंकते कुत्तों का मुंह तीरों से बंद कर दिया था ?'
-हाँ बेटा.'
- दूरदर्शन और सभाओं में नेताओं और संतों के वाग्विलास से ऊबे पोते ने कहा - 'काश वह आज भी होता.'
*****
salil.sanjiv@gmail.com

सामयिक रचना: लिख गयी प्रतिकार की अद्भुत कहानी : संजीव 'सलिल'

सामयिक रचना:
लिख गयी प्रतिकार की अद्भुत कहानी :
संजीव 'सलिल'



 


 


दिल्ली की बलात्कार पीड़िता ज्योति सिंह पाण्डे (ब्राह्मण) बलिया, उत्तर प्रदेश
(कल्पित नाम दामिनी)
* 
हम नया वर्ष जरूर मनाएंगे 
दामिनी के आंसुओं,
चीखों और कराहों को 
याद करने के लिए 
और यह संकल्प करने के लिए 
कि हम अपनी ज़िंदगी में 
किसी नारी का अपमान नहीं करेंगे।
अपने बच्चों को ऐसे संस्कार देंगे 
कि वह नारी को सिर्फ भोग्या न माने।
हम अपने शहर के हर थाने  में  
नारी का सम्मान करने और 
तत्काल ऍफ़. आई. आर.दर्ज करने 
सम्बन्धी  पोस्टर चिपकाएँ।
सरकार से मांग करें कि  
पुलिस विभाग को 
अपराध-संख्या बढ़ने पर 
दण्डित न किया जाए क्योंकि 
संख्या घटाने के लिए ही 
अपराध दर्ज नहीं किये जाते।
अपराध की त्वरित जांच और
अपराधी को  दंड दिलाने की
की संख्या के आधार पर 
पुलिस महकमे में पदोन्नति दी जाए।
दूर दर्शन, अख़बारों और विज्ञापनों में
नारी देह की प्रदर्शनी और
सौदेबाजी बंद की जाए।
हम एक दिन ही नहीं हर दिन 
नारी सम्मान की अलख जलाएं।


***** 

  




नया वर्ष है... संजीव 'सलिल'

नया वर्ष है...
संजीव 'सलिल'
*
खड़ा मोड़ पर आकर फिर इक नया वर्ष है।
पहलू में निज किये समाहित शोक-हर्ष है।।

करें नमस्ते, हाथ मिलाएं, टा-टा कह दें।
गत को कर दें विदा, गलत को कभी न शह दें।।
आगत स्वागत श्रम-संयम-सहकार सीख ले-
काल कह रहा: 'रे इंसां! आइना देख ले।।'
स्वार्थ-जिद्द के आगे बेबस क्यों विमर्श है?
खड़ा मोड़ पर आकर फिर इक नया वर्ष है...

शुभ की लेकर आड़ अशुभ क्यों पली भावना?
भोग प्रबल क्यों हुआ, सबल अनकही कामना??
उत्तर देगा कौन?, कहाँ-किसकी गलती है?
उतर सड़क पर कर में पत्थर थाम मारना।
वर्षों में निर्माण, नाश पल में, अमर्ष है।  
खड़ा मोड़ पर आकर फिर इक नया वर्ष है...

बना लिया बाज़ार देश तज संस्कार सब। 
अनाचार को देख याद क्यों अब आता रब?
धन-सुविधा ने मोहा, त्यागा निज माटी को-
'रूखी खा संतोष करें'- निज परिपाटी को।।
सज्जन है असहाय, करे दुर्जन कु-कर्ष है।
खड़ा मोड़ पर आकर फिर इक नया वर्ष है...
*
कर्ष = झुकाना, जोतना, खींचना
Acharya Sanjiv verma 'Salil'
http://divyanarmada.blogspot.com

रविवार, 30 दिसंबर 2012

चित्र पर कविता: निशाना

चित्र पर कविता:
निशाना  

इस स्तम्भ की अभूतपूर्व सफलता के लिये आप सबको बहुत-बहुत बधाई. एक से बढ़कर एक रचनाएँ अब तक प्रकाशित चित्रों में अन्तर्निहित भाव सौन्दर्य के विविध आयामों को हम तक तक पहुँचाने में सफल रहीं हैं. संभवतः हममें से कोई भी किसी चित्र के उतने पहलुओं पर नहीं लिख पाता जितने पहलुओं पर हमने रचनाएँ पढ़ीं. 

चित्र और कविता की कड़ी में संवाद, स्वल्पाहार,
दिल-दौलत, प्रकृति, ममता,  पद-चिन्ह, जागरण,  परिश्रम, स्मरण, उमंग, सद्भाव, रसपान, विश्राम आदि के पश्चात् प्रस्तुत है नया चित्र  निशाना. ध्यान से देखिये यह नया चित्र और रच दीजिये एक अनमोल कविता.


नवगीत: न्याय चाहिये - ओम प्रकाश तिवारी

नवगीत:
न्याय चाहिये
- ओम प्रकाश तिवारी
*
महामहिम जी,
न्याय चाहिए

लाठी-गोली पुलिस की टोली
नेताओं की मीठी बोली
पानी की वो तेज फुहारें
आँसू गैस खून
की होली

ऐसे जुल्म जबर्दस्ती का
अब हमको पर्याय
चाहिए

कभी कोख में मरना पड़ता
कभी-खाप-को-सुनना-पड़ता
महानगर की सड़कों पर भी
डर-डर के है चलना
पड़ता

घिसे पिटे पाठों से हटकर
एक नया अध्याय
चाहिए

करके जुल्म छूटते कामी
मिलती है हमको बदनामी
लाचारी कानून दिखाए
लोग निकालें
मेरी खामी


बहुत हुई असहाय व्यवस्था
अब तो कोई उपाय
चाहिए

*****
 


शनिवार, 29 दिसंबर 2012

राष्ट्रीय कायस्थ महापरिषद : राष्ट्रीय सम्मलेन पटना

राष्ट्रीय कायस्थ महापरिषद : राष्ट्रीय सम्मलेन पटना

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चिंतन: दुर्घटना और हम संजीव 'सलिल'

चिंतन:
दुर्घटना और हम
संजीव 'सलिल'
*
इस सम्पूर्ण प्रकरण का पुनरावलोकन करें:
१. राजधानी में एक महिला के साथ सामूहिक बलात्कार..., अख़बारों तथा दूरदर्शनी खबर चैनलों द्वारा समाचार प्रसारण, पुलिस द्वारा तत्परतापूर्वक अपराधियों की धर-पकड़. प्रशासन द्वारा पुलिस अधिकारियों का निलंबन...
२. मीडिया द्वारा लगातार उत्तेजक भाषा का प्रयोग कर समाचार को चटपटे तरीके से प्रसारित कर आम लोगों को सडक पर आने के लिए प्रेरित करना... दैनिक भास्कर द्वारा कुछ अधिकारियों के संपर्क सूत्र प्रसारित कर पाठकों से उन पर ई-मेल भजने के लिए लगातार कई दिनों तक प्रेरित करना.
सडक पर उतारे लोगों द्वारा निषेधाज्ञा का उल्लंघन कर कानून-व्यवस्था को भंग करने का प्रयास... अपराधियों के तत्काल फांसी देने या भीड़ को सौंपने की मांग... नेतृत्त्वहीन भीड़ से वार्ता हेतु जन प्रतिनिधियों का सामने न आना... स्थिति को नियंत्रण में रखने के लिए विवश पुलिस द्वारा कदम उठाये जाने पर भीड़ का प्रतिरोध... एक सिपाही की मृत्यु...
निर्दोष पीडिता की नाजुक स्थिति में लगातार इलाज के बाद भी सुधार नहीं... चिकित्सकों के अभिमत को अनसुना कर सुधार की कोई सम्भावना न होने पर भी सरकार द्वारा उसे विदेश भेज जाना और अंततः दिवंगत होना...
*
इस प्रकरण से निकलते सवाल:
१. दुर्घटना का जिम्मेदार कौन?
निस्संदेह अपराधियों से किसी की सहानुभूति नहीं हो सकती... इस दुर्घटना के लिए किसी एक व्यक्ति, संस्था या समूह को सीधे जिम्मेदार नहीं कहा जा सकता. यह एक दुर्योग है जिसके लिए अपराधियों को पुलिस द्वारा शीघ्रादिशीघ्र पकड़कर न्यायालय द्वारा कठोर दंड दिया जाना चाहिए.  
क्या मीडिया का आचरण सही था?
मीडिया का कार्य समाचारों की सूचना देना है या उसे अतिरंजित कर चटपटी चाट की तरह सजा-संवार कर लगातार परोसकर जनता को भड़काना?...
दुर्घटना के बाद पुलिस कदम न उठाये तो मीडिया द्वारा दवाब बनाया जाना तर्कसंगत हो सकता है किन्तु यहाँ न्यूनतम समय में पुलिस ने अपराधियों को पकड़ लिया... ऐसे में भीड़ को लगातार भड़काना कैसे सही कहा जा सकता है? इस कारण सरकार ने अकारण पुलिस अधिकारियों को केवल इसलिए निलंबित किया कि भीड़ शांत हो जबकि इससे पुलिस के मनोबल पर विपरीत प्रभाव पड़ना सुनिश्चित है. अब जांच में उन अधिकारीयों पर कौन सा आरोप सिद्ध होगा? क्या उन्हें पुनः बहाल न करना पड़ेगा?
२. जनप्रतिनिधियों की नकारात्मक भूमिका:
इस पूरे प्रकरण में सर्वाधिक नकारात्मक भूमिका हमेशा की तरह जनप्रतिनिधियों की रही. किसी भी जनप्रतिनिधि ने स्थिति का आकलन कर सत्य जानने का प्रयास नहीं किया, न जनता को मार्गदर्शन दिया. प्रेस को भी वे सही दिशा में ले जा सकते थे किन्तु मौन रहे. पुलिस के दिशादर्शन, अनावश्यक निलंबन क़ा विरोध, चिकित्सा व्यवस्था की जानकारी, जनता को सूचित तथा शांत करने में उनकी महती भूमिका हो सकती थी किन्तु केवल दूरदर्शन पर दलीय राजनीतिपरक बयानबाजी के अलावा किसी ने कुछ नहीं किया. इसकी भर्त्सना की जानी चाहिए थी किन्तु प्रेस इस बिंदु पर
मौन रहा.
३. नागरिकों क़ा दायित्व: सडकों पर आनेवालों को यह विचार करना ही होगा कि वे चाहते क्या और क्यों हैं? वे समूचे देश या समाज क़ा प्रतिनिधित्व नहीं करते... केवल राजधानी में होने या टी.व्ही. कैमरे के सामने आने के उत्साह में गैर जिम्मेदारीपूर्ण बयान देकर देश या समाज क़ा अहित करने क़ा उन्हें अधिकार नहीं है. यदि बाद में उनके बयान उन्हें ही सुनवाए जाएं तो उनके पास अपनी बात को सही कहने क़ा कोई आधार न होगा. इस प्रसंग में अपराधियों को सौंपे जाने की मांग या तुरंत फांसी देने की मांग, बिना अनुमति धरने पर बैठने क़ा प्रयास या प्रतिबंधित क्षेत्र में घुसने क़ा प्रयास... इन्हें कैसे सही ठहराया जा सकता है? इस दौरान पुलिस पर हमला, सिपाहे एकी मौत... इसका जिम्मेदार कौन? राष्ट्रीय संपत्ति को हुई क्षति क़ा जिम्मेदार कौन? यदि पुलिस विवेकपूर्वक न्यूनतम आवश्यक कार्यवाही पर न रुककर कठोर कदम उठा लेती तो क्या कई लोगों के चोटें खाने और जेल जाने की स्थिति न बन जाती? क्या भीड़ क़ा कोई भी आदमी घर से निकलने के पहले पूरी जानकारी लेकर क्या करना उचित है सोचकर चला था? मीडिया के भ्रामक और उत्तेजक समाचारों से भ्रमित होकर कानून-व्यवस्था को हाथ में लेना कितना उचित है? आपदा या संकट के समय जब शासन और प्रशासन के सामने चुनौती होती तब नागरिक शांत रहकर स्थिति के सुधार में सहयोगी हों या उत्तेजित होकर स्थिति को अधिक विषम बनायें?
यहाँ यह भी याद करें कि आतंकवादियों द्वारा कुछ बंधक बनाये गए लोगों के रिश्तेदारों के बयानों को बारबार प्रसारित कर मीडिया ने सरकार पर इतना दबाव बनाया
था की सरकार को अपने विमान में आतंकवादियों को विदेश पहुँचाना पड़ा था. तब भी नागरिक मीडिया के औजार बने थे. भविष्य में भीड़ बनने के पहले भली-भांति सोच लें. 
४. जांच और न्याय की प्रक्रिया: सभ्य समाज में ऐसा घिनौना आचरण सहन नहीं किया जा सकता किन्तु फिर भी न्यायप्रणाली के अनुसार बिना सुनवाई का अवसर दिए किसी को दंडित नहीं किया जा सकता. अपराध कॆ जांच करना पुलिस क़ा कर्त्तव्य और अधिकार है, उसमें बाधक होने पर दंड क़ा प्रावधान है. मीडिया के बयान और भीड़ क़ा आचरण क्या पुलिस की राह में बाधा नहीं उपस्थित कर रही थी? अपराध होते समय वहां से गुजरनेवाले और अपराध के बाद पीड़ितों कॆ कराहों कॆ अनसुनी करनेवाले इसी भीड़ क़ा हिस्सा थे यदि वे समय पर सक्रिय होते तो अपराध न घटता, या उसकी गंभीरता कम होती या पीड़ितों को शीघ्र राहत मिल पाती.
 ५. घिनौनी दलीय राजनीति: दलीय राजनीति देश और समाज की कीमत पर नहीं की जानी चाहिए. हमेशा कॆ तरह नेता दलीय दृष्टिकोण से एक-दूसरे के विरोध में बोलते रहे और मीडिया उन्हें उछालकर लोगों को भड़काता रहा. दुर्घटना के तुरंत बाद शांति-व्यवस्था समिति कॆ बैठक कर प्रशासन से स्थिति कॆ जानकारी लेकर, आगामी कदमों क़ा निर्णय कर सभी दल एक साथ जनता से शांत रहने, जांच होने देने, पीड़ित को सर्वश्रेष्ठ चिकित्सा उपलब्ध कराने और अपराधियों को शीघ्र और कठोर दंड देने के प्रति आश्वस्त कराते तो व्यर्थ के आन्दोलन न होते. सभी दलों को सकारात्मक होना होगा अन्यथा उन पर से घटती जनास्था उन्हीं के लिए घातक होगी तथा लोकतंत्र क़ा ढाँचा संकट में फँस जायेगा.
६. अब क्या?...
बलात्कार के अनेक अपराध प्रतिदिन देश के विविध हिस्सों में हो रहे हैं. जहाँ रसूखदार नेता, व्यापारी और अफसर या उनके स्वजन आरोपी हैं वहाँ राजनैतिक दवाब में पुलिस कोई कदम नहीं उठा पाती. ऐसे प्रकरणों के प्रति प्रेस भी उदासीन रहती है. इन प्रकरणों को चिन्हांकित कर द्रुत न्याय प्रक्रिया के बाद कठोर दंड दिया जा सके तो इन अपराधों में कमी आयेगी.
शिक्षा प्रणाली में प्राथमिक स्तर से नैतिक शिक्षा और नारी के प्रति सम्मान कॆ भावना विकसित की जाए. लडकों और लडकियों में भेदभाव को समाप्त करने के प्रयास अधिक हों.
सर्वाधिक जरूरी कदम लडकियों को आत्मरक्षा कॆ कलाएं जुडो, कराते आदि क़ा प्रशिक्षण शाली शिक्षा के साथ दिया जाना है. इसके साथ ही आपदाकाल में क्या कदम उठा कर बचा जा सकता है वह भी सिखाना होगा. इस घटना में पीड़ित लडकी तथा उसके साथी दोनों के पास मोबाइल था... यदि सजग होते तथा पुलिस कंट्रोल रूम के नंबर फीड किये होते तो तत्क्षण सूचित करने क़ा प्रयास करते... लडकी पर हमला होने पर साथी ने दौड़कर चालक पर हमला कर वहाँ कॆ चाबी निकाल ली होती तो बचने कॆ स्थिति हो सकती थी... बीएस में चढ़ने के पूर्व खाली बस में एक भी सवारी न होने पर खतरे क़ा पूर्वानुमान कर सकने कॆ स्थिति में भी दुर्घटना टल सकती थी. इस चर्चा क़ा उद्देश्य किसी को बचाना या किसी पर आरोप लगाना नहीं है किन्तु दुर्घटनाओं के प्रति मानसिक सजगता उत्पन्न करना है जो अब तक नहीं की गयी. इस प्रसंग में एक घटना याद करें... श्री लंका दौरे पर भारत के प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी पर सलामी परेड के समय एक सिपाही द्वारा हमला किया गया था, वे अपनी सजगता के कारण ही झुककर वार बचा गए थे. पूर्वानुमान, सटीक आकलन, सजगता और त्वरित बुद्धि आसन्न संकटों में प्राण रक्षक होते हैं. यह हर व्यक्ति को समझना और सीखना होगा.
पुलिस और प्रशासन को कटघरे में खड़ा करने के पूर्व अगर हम अपने दायित्व क़ा विचार करें. उस जगह हम हों तो क्या बेहतर कर सकेंगे सोचें, सुझाएँ और तब आरोप लगायें तो हमारा आचरण सही होगा, निराधार आरोप लगाना भी अपराध को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ाना ही है. अस्तु....
दिवंगता के प्रति सच्ची श्रृद्धांजलि ऐसी दुर्घटनाओं पर नयन्त्रण कर और कमी लाके ही दी जा सकती है.  

शुक्रवार, 28 दिसंबर 2012

चर्चा: अखबारों और दूरदर्शनी खबरियों का दायित्व

चर्चा: अखबारों और दूरदर्शनी खबरियों का दायित्व 
 कवरेज में जनता के असभ्य व्यवहार को कवरेज देकर भीड़ को उकसाया है। लाइव कवरेज के नाम पर अधिकांश टीवी चैनलों में संपादकीय नीति अनुपस्थित थी। मसलन् सरकारी संपत्ति तोड़ती भीड़ को कवरेज दिया। भीड़ में फांसी की मांग करने वालों को कवरेज देकर सही नहीं किया। टीवी पत्रकारों ने लगातार उत्तेजना पैदा करने का काम किया। पत्रकारों ने अपनी जिम्मेदारी को संयम के साथ नहीं निभाया। बलात्कार की घटना पर मीडिया ने उत्तेजना पैदा करने का काम करने जनता की अपूर्णीय क्षति की है। हाल ही में अमेरिका में 27 बच्चों की हत्या की घटना पर मीडिया ने वहां पर आम जनता को संयम बरतने और धैर्य से काम लेने की भूमिका अदा की। भारत में सामूहिक बलात्कार कांड पर आम जनता को उत्तेजित करने से बचा जाना चाहिए। पहले से ही उत्तेजित भीड़ को भड़काया है।
***
महेश चन्द्र द्विवेदी 




रेप -कांड के आन्दोलन में अभियुक्तों को फँसी की सजा की अनुचित ढंग से मांगने वालों ने एक सिपाही कीजान  ले ली।
मैंने जब इसकी चर्चा छेड़नी चाही, तो एक खाते-पीते  घर की महिला ने शिकायत की की पुलिस ने इतनी ठण्ड में 
पानी की बौछार कर कितना बड़ा अत्याचार किया।
ज़रा सोचिये की हमारी सोच कितनी पूर्वाग्रहग्रस्त हो सकती है।
mcdewedy@gmail.com
_______________________
संजीव 'सलिल'
आपसे पूरी तरह सहमत हूँ। मीडिया और प्रेस ने अतिरेकी अतिशयोक्तिपूर्ण समाचार प्रसारित कर लोगों को भ्रमित और उत्तेजित किया। दिशाहीन भीड़ को नियंत्रित करना पुलिस की विवशता है। क्या वह भीड़ हाथ जोड़कर निवेदन करने से लौट जाती भीड़ की मांग पर सरकार फंसी कैसे दे सकती है? सजा देना या न देना या कितनी देना न्यायालय का काम है। दिवंगत पुलिसवाले की मौत और राष्ट्रीय क्षति का jजिम्मेवार मीडिया है। पत्रकारों पर नियंत्रण किया जाना आवश्यक है।
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डॉ. दीप्ति गुप्ता, पुणे




पुलिस की  स्थिति को तो कोई भी गंभीरता  से  लेता ही नहीं ! उनकी  reputation  बिगाडने , जान जाने के असली जिम्मेदार  ये राजनेता लोग हैं  जो कहीं भी  उन्हें action oriented robot   की  तरह  depute  कर देते हैं बिना  किसी सुरक्षा के ! उनकी सुरक्षा के  जो उपयुक्त  'संसाधन '  सरकार को   उपलब्ध  कराने चाहिए, उसमें वे कोताही करते हैं !  क्योंकि  नेताओं को  सब विभागों  के  बजट  खा  जाने   के ज़रूरी काम जो करने होते हैं !  मुम्बई  ब्लास्ट में  जो  तीन पुलिस अधिकारी बेमौत मारे गए - अगर  वे life jacket  पहने होते  तो मरते नहीं !
राजनेता चाहे तो आसानी से  शांति से  प्रोटेस्ट करने वाले समूह में से  दो-तीन प्रतिनिधियों  को विश्वास   में लेकर  और  गंभीर मसले  पर  वार्ता करके उन्हें १०-१५ दिन का समय देकर शांत कर सकते थे !  पुलिस को ज़रा  सी  भी   आँसूं  गैस छोडने  या  पानी  छोडने की ज़रूरत न पडती ! लेकिन  नेता  समझदारी  और   (आहत  भीड़ के प्रति)  मनोवैज्ञानिक ढंग से  सक्रिय  न होकर,  अपनी  जिम्मेवारी पुलीस को सौंप कर  आराम  से  A.C  कमरों में पसर जाते  हैं  !  खुद Body Guard   के साथ  बाहर कदम निकालते हैं !  ये नेता  ही हैं जो पुलिस   से हिंसा की शुरुआत करवाते   है  और उसके बाद  जो घटता  रहा  है  आज तक-   उसका  इतिहास साक्षी है !

सो  शरीर और  अक्ल से स्थूल  ये सारे राजनीतिज्ञ  असली  अपराधी है   -  जिनके कारण जनता, पुलिस, डाक्टर, इंजीनियर्स (लखनऊ के कितने अभियंता  जान  से गए - राजनीतिक हथकंडों की वजह से ) , सामजिक कार्यकर्ता (अन्ना) ,योगी (बाबा रामदेव) , सब  की  जान को  खतरा   बना  रहता है !  *
आसान बहुत है काम ,  ख़ाकी पर इल्ज़ाम .........
 विजेंद्र शर्मा

सीमा सुरक्षा बल ,बीकानेर
का 
मेल ………पढिये इसे …………और जानिये कौन है दोषी ?   
पुलिस , हम या सरकार?
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इसमें कोई शक नहीं कि दिल्ली गैंग - रेप के हादसे ने पूरे मुल्क को हिला कर रख दिया ! दरिन्दगी का ऐसा घिनोना कृत्य शायद ही इससे पहले किसी ने सुना हो ! दिल - दहला देने वाले इस हादसे ने उन लोगों के अन्दर भी संवेदना के बीज अंकुरित कर  दिए जिनका संवेदना से दूर - दूर तक कोई सरोकार ही नहीं था ! पूरे देश का सोया हुआ हस्सास इस घटना से एका-एक जाग गया ! ऐसी घटना सभ्य समाज के माथे पे कभी ना मिटने वाला कलंक है !

ऐसी वीभत्स घटना के बाद आवाम का ग़ुस्सा जायज़ था , लोगों ने अपने इस आक्रोश को ज़ाहिर भी किया मगर आरोप – प्रत्यारोप के बीच अगर सब से ज़ियादा किसी पे गाज गिरी तो वो गिरी दिल्ली पुलिस पर ! ख़ाकी की यहाँ, मैं इस लिए पैरवी नहीं कर रहा कि मेरा त-अल्लुक़ भी ख़ाकी से है !

एक क्षण के लिए सोचिये इस घटना के बाद अगर वो भेड़िये ना पकड़े जाते तो हिन्दुस्तान की जम्हूरियत(लोकतंत्र )के मरकज़ (केंद्र ) राजपथ पर हज़ारों लोग किन्हें फांसी पे चढाने की आवाज़ बुलंद करते !

सोयी हुई हुकूमत को जगाने वाले प्रदर्शनकारियों की हर तख्ती पर लिखा था “ बलात्कारियों को फांसी दो “ अगर वे दरिन्दे हाथ ना आते तो शायद इस जन- आन्दोलन का स्वरुप आज कुछ और ही होता !

उस मासूम सी लड़की के जिस्म और रूह को नौचने के बाद उन दरिंदों ने उसे और उसके साथी को तक़रीबन मरे हुए समझकर महिपालपुर की पहाड़ियों के क़रीब फैंक दिया था ! लड़की के साथी ने बेहोशी की सी हालत में पुलिस को सिर्फ़ इतना बताया कि बस के ऊपर “ यादव “ लिखा था ! इस लीड के अलावा दिल्ली पुलिस के पास कोई भी और क्लू नहीं था ! पुलिस पर अक्सर संवेदनहीन होने का आरोप लगता है , हो सकता है कोई और केस होता तो पुलिस इतना मश्क नहीं करती पर कहीं ना कहीं दिल्ली पुलिस की उस टीम में संवेदना थी जो उस बच्ची की वो हालत देखकर उन्होंने अपनी एडी – चोटी का ज़ोर लगा दिया ! आधे घंटे तक पास से गुज़रने वाले लोगों ने उनकी पुकार नहीं सुनी, दो फ़रिश्ते ( फ़रिश्ते इस लिए लिखा क्यूंकि इंसान तो रुके ही नहीं ) अपनी बाइक पर जा रहे थे उन्होंने जब एक लड़के के कराहने की आवाज़ सुनी तो वे रुके उन्होंने 100 नंबर पे पी.सी.आर को फोन किया ! उनके फोन करने के ठीक साढ़े पांच मिनट के बाद पुलिस की गाड़ी आ गयी ,पुलिस वालों ने अपनी जैकट से उनके जिस्म को ढका ,वो दोनों फ़रिश्ते पास के एक ढाबे से चद्दर लेकर आये जिसमे लपेट कर पीड़िता और उसके साथी को अस्पताल ले जाया गया !

इसके फ़ौरन बाद मुआमले की संवेदनशीलता को देखते हुए दिल्ली पुलिस ने अपनी कई टीमें गठित की जिन्होंने अपना काम शुरू कर दिया !

दिल्ली में जितनी भी चार्टड बसे चलती है रात भर उनका रिकॉर्ड खंगाला गया , पता चला लगभग ऐसी 370 बसें है जिन पर यादव लिखा है ! सोलह दिसंबर की उस सर्द और सियाह रात में पुलिस की टीम एक – एक बस ,उसके मालिक और बसों के ड्राइवरों को ढूंढती रही ! पूरी रात की मशक्कत के बाद सुबह तक पुलिस उस बस को ढूंढ पाने में कामयाब हो गयी जिस बस में हैवानियत का गंदा नाच हुआ था ! मुख्य आरोपी राम सिंह के गिरफ़्त में आने के बाद पुलिस के लिए बाक़ी भेड़ियों को पकड़ने की राह आसान हो गयी ! अगले दिन शाम तक पुलिस ने चार आरोपी अदालत में पेश कर दिए ! एक नाबालिग आरोपी राजू को पकड़ने में भी दिल्ली पुलिस ने अपनी सूझ –बुझ का परिचय दिया केवल राम सिंह उसे पहचानता था उसका न कोई पता था न कोई मोबाईल नंबर ! राजू को दो दिन की भाग –दौड़ के बाद दिल्ली के आनंन्द विहार इलाके से पकड़ा गया जिसके पास पीड़ित बच्ची का ऐटीएम् कार्ड और पर्स मिला !

किसी ब्लाइंड केस को इस तरह दिल से सुलझाने की ऐसी मिसाल बहुत कम देखने को मिलती है !

ये भी सच है कि जज़्बात का चश्मा हमे हर चीज़ साफ़ - साफ़ नहीं दिखाता, लोग शानदार जांच और इतनी जल्द समाज के दुश्मनों को पकड़ने वालों के ऊपर ही इल्ज़ाम लगाने लगे !

अमेरिका में छुटियाँ मना रहे दिल्ली के उप राज्यपाल ने आते ही दिल्ली पुलिस के दो सहायक कमिश्नर बर्खाश्त कर दिए ! पुलिस पर दवाब बना कर काम करवाने वाले हुक्मरानों ने इतना भी नहीं सोचा कि ऐसा करने से उन पुलिसवालों के मनोबल पे क्या असर पड़ेगा जो इस हादसे के बाद 36 घंटों तक लगातार बिना सोये इस केस के लिए काम करते रहे ! कमज़ोर सियासत का वर्दी पर इस तरह इल्ज़ाम ढोल देना कोई नई बात नहीं है !

जितने लोग उतनी बातें , किसी ने कहा की दरिन्दे दो घंटे तक दिल्ली की सड़कों पर बस घुमाते रहे पुलिस उस वक़्त क्या सोयी रही ? इस बात का जवाब वो लोग आसानी से समझ सकते है जो दिन – रात दिल्ली की सड़कों पर सफ़र करते हैं ! उस चार्टड बस में परदे लगे थे , अन्दर से बस की लाइट्स बंद थी ! दिल्ली की सड़कों पर वाहन कीड़े – मकोड़ों की तरह चौबीसों घंटे रेंगते रहते है ऐसा प्रायोगिक रूप से कतई संभव नहीं है कि बस को किसी चेक पोस्ट या लाल बत्ती पर जांच के लिए रोका जाता ! यूँ तो बस के क़रीब से भी कई वाहन गुजरें होंगे ..क्या उन्हें नहीं दिखा ये सब ? दिखता कैसे ये सब तो संभव नहीं था ! जो लोग वहाँ रोज़ सफ़र करते है वे ये बात समझ सकते है ! जनता के आक्रोश के सामने दिल्ली पुलिस का तमाम मुल्ज़िमों को इतने कम समय में सलाखों के पीछे कर देने का काम किसी को दिखाई ही नहीं दिया ! मुझे हैरत इस बात की भी हुई कि पुलिस की कार्य - प्रणाली समझने वाले भी पुलिस को ही इस हादसे का ज़िम्मेदार ठहराने लगे ! हमारे समाज और पुलिस के बीच आंकडा वैसे भी 36 से कम होता ही नहीं है यही वज़ह है कि समाज पुलिस को कभी उसके अच्छे काम के लिए भी शाबाशी नहीं देता !

पुलिस पे इल्ज़ाम धर देना बड़ा आसान है मगर ऐसे हादसे क्यूँ होते हैं इस पर समाज कभी गौर नहीं करता ! अदालतों में हज़ारों बलात्कार के मुआमले लंबित है ऐसा नहीं है कि ये तमाम केस पुलिस की अकर्मण्यता के कारण किसी अंजाम तक नहीं पहुँच पा रहे है ! राष्ट्रीय अपराध रिकोर्ड संस्थान के आंकड़ों के अनुसार देश में ९० % बलात्कार महिला के जानकार या किसी सगे संबंधी के द्वारा किये गए हैं ! दिल्ली गैंग रेप अपने आपमें एक अलग और राष्ट्रीय शर्म का केस है !

ये बात मेरी समझ से परे है कि किसी महिला से उसके घर में किसी रिश्तेदार या जानकार द्वारा ये घृणित कृत्य किया जाता है तो इसमें पुलिस कहाँ दोषी हो जाती है ?

पीड़ित महिला को इन्साफ़ देरी से मिलता है इसके लिए हमारी न्यायिक प्रक्रिया भी बराबर की कुसूरवार है ! अभी तक “बलात्कार “ की परिभाषा भी हमारा क़ानून ठीक से गढ़ नहीं पाया है ! एक तो किसी की अस्मत लूट ली जाती है उस पर घटना के बाद पीड़िता से इन्साफ़ के मंदिर अदालत में ऐसे ऐसे सवाल किये जाते हैं जैसे उसी ने ही बलात्कार किया हो ! बकौल राहत इन्दौरी :--

इन्साफ़ जालिमों की हिमायत में जाएगा

ये हाल है तो कौन अदालत में जाएगा

मगर दिल्ली गैंग रेप की इस घटना ने इंसाफ़ को भी सोचने पे मजबूर किया है ! हमारी पुलिस , सियासत , आवाम और समाज का सर वाकई शर्म से झुक गया है ! सच तो ये है की इस घटना के बाद हम अपने आप से भी नज़र नहीं मिला पा रहे हैं !

इंसानियत को शर्मसार करने वाली ऐसी घटनाओं की पुनरावृति ना हो इसके लिए हम ख़ुद अपने गिरेबान में झांके ना कि पुलिस पे दोष मंढ कर हम हक़ीक़त से पल्ला झाड़लें ! समाज को ख़ुद सजग होना पडेगा , हमे अपने बच्चों, ख़ास तौर पे लड़कों को ऐसे संस्कार देने होंगे कि उनकी निगाह किसी महिला की तरफ़ जब भी उठे तो इज्ज़त ओ एहतराम के साथ उठे ! अपने इर्द-गिर्द ऐसी फ़िज़ां हमे बनानी होगी जिससे कि मनचलों का मन जब भी चले तो सही दिशा में चले !

भौतिकवादी इस दौर में हमलोग चाहते है कि हमारे बच्चे डाक्टर बने इंजिनीयर बने हम ये क्यूँ नहीं चाहते कि हमारी नस्ल कबीर बने , नानक बने , गौतम बने , भगत सिंह बने ,बोस बने ,अशफ़ाक़ बने ! इस दौरे-तरक्क़ी की सबसे बड़ी विडम्बना ये है कि हम लोग अपने बच्चों का कैरियर बनाने में मसरूफ हैं ना कि किरदार बनाने में ! बच्चों को किरदार बनाने की तालीम ना तो स्कूल कॉलेज में दी जा रही है ना ही घरों में ऊपर से रही सही कसर टी.वी , मोबाईल , इंटरनेट ने पूरी कर दी है ! अपने आप को आधुनिक समझने और ज़माने से आगे निकलने के चस्के में हमे ख़बर ही नहीं है कि हमारे बच्ची क्या पढ़ रहें हैं और उन्हें क्या परोसा जा रहा है !

अपनी आबरू की कुर्बानी देकर दिल्ली गैंग रेप की शिकार इस बच्ची ने हमारे मृत पड़े ज़मीर को जीवित किया है , पूरा राष्ट्र आज एक स्वर में बोल रहा है ! हमारी सियासत कितनी संवेदनशील है हमने देख लिया , इंडिया गेट पर हुए जन आन्दोलन के दवाब के बिना अगर हुकूमत कोई कठोर क़दम उठाती तो बात कुछ और होती !

इतवार के रोज़ राजपथ पर ज़बरदस्त आन्दोलन हुआ , सरकार आवाम की भावनाओं का सम्मान नहीं कर पायी ,बड़ी बर्बरता के साथ लाठी-चार्ज हुआ ,कंपकंपाती ठण्ड में छात्र – छात्राओं पर पानी की बौछारें , यहाँ तक उम्रदराज़ महिलाओं पर भी लाठी-चार्ज किया गया ! इन सब के लिए भी आरोप दिल्ली पुलिस पर लगा दिया गया , एक चीज़ लोगों को समझनी चाहिए की पुलिस को भी कहीं से हुक्म मिलते है , पुलिस की अपनी मजबूरियां है , मैं सुरक्षा बल की उस कार्यवाही को जायज़ नहीं ठहरा रहा हूँ पर मोब को नियंत्रण में करना उतना आसान नहीं है जितना बाहर से दिखता है ! प्रदर्शन-कारियों में कुछ सियासी रोटिया सेकने वाले भी घुस गए और हालात बिगड़ते गए कुछ ज़ियादती सुरक्षा बल से भी हुई ! इस पूरे प्रदर्शन में पुलिस ने भी अपना एक जवान सुभाष तोमर खो दिया !

पुलिस समाज से अलग नहीं है , एक पुलिस वाला भी एक भाई है, एक बाप है, एक बेटा है उसकी भी रगों में लाल रंग का ही खून दौड़ता है हाँ अगर कहीं कोई कमी है तो वो है हम में और पुलिस में आपसी एतबार की ! सबसे पहले पुलिस और समाज को ये एतबार बहाल करना होगा !

बहरहाल, इन तमाम बातों से हटकर मेरी एक गुज़ारिश है कि हम सब मिलकर ऐसा माहौल बनाए की इस तरह की घटनाएं मुस्तक़बिल में ना हों ..और पुलिस को हम अपने समाज का ही हिस्सा समझें ना कि कोई छूत की बिमारी ! हमारी पुलिस अपनी मेहनत और जांबाज़ी से जब कोई अछा काम करे तो हमे उसकी पीठ भी थप-थपानी चाहिए ना कि पूर्वा-ग्रहों से ग्रसित हो हम उसपे आरोप ही आरोप थौंपते रहें !

आख़िर में ईश्वर से यही प्रार्थना कि अभी तक बहादुरी के साथ मौत से जंग लड़ने वाली उस बच्ची को इतनी हिम्मत और हौसला दे ताकि वो पूरी तरह ठीक होकर अपनी आँखों से उन भेड़ियों का हश्र देख सके और हमारे मुंसिफ़ों की क़लम में ईश्वर वो ताक़त दे जिससे कि वे उन दरिंदों के हक़ में मौत से भी बदतर सज़ा लिख सकें !..आमीन

हाकिम हो गर मुल्क के , जल्द करो इन्साफ़ !

वरना तुमको बेटियाँ , नहीं करेंगी माफ़ !!

Vijendra.vijen@gmail.com 
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सत्यनारायण शर्मा 'कमल'
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  अभी  तक प्राप्त समाचारों से लगता है पुलिस वाले की मृत्यु हार्ट-फेल से हुई । जितनी चोटें आन्दोलनकारियों ने सहीं पुलिसवाले पर नहीं मिलीं । ऐसी अवस्था में आन्दोलनकारियों को दोष देना समझ में नहीं आता । पुलिस भी सच्चाई पर पर्दा डालने में पीछे नही। पुलिस ने लड़की के बयान उपजिलाधिकारी  द्वारा लेने पर भी हस्तक्षेप किया । 
सुप्रेअम कोर्ट का आदेश की गाड़ियों पर काली शीत न चढ़ाई जाय ऐसी प्राइवेट और बसें खुले आम सड़कों पर कैसे चल रही हैं ?
क्या ऐसी घटनाओं के लिए पुलिस जिम्मेदार नहीं जबकि वह बस तीन तीन पुलिस पिकेटों से गुज़री । अब  पुलिस आला अफसर
आँख में धुल झोंकने का काम कर रहे हैं ।_________________