बुधवार, 31 अक्तूबर 2018

मुक्तक

मुक्तक
शुभ कामना
*
चंद्रकांता आत्मदीप्ति से, सब जग को जगमग कर दो।
दस दिश में आनंद बिखेरो,श्वास प्रदीपा हो वर दो।।
आस न बेघर हो कोई भी, केवल कृष्ण समर्पित हो-
कर कोशिश का अग्निहोत्र तुम, सलिल-धार निर्झर कर दो।।
*
चित्रगुप्त का गुप्त चित्र ही श्वास-आस संचालक है।
विधि-हरि-हर का भी निर्माता, यह ही भाग्य विधाता है।।
बुधि बल लेन-देन सेवा में, है जिसका प्रावीण्य 'सलिल'-
वह कर्मठ ही सत्य अर्थ में अब 'कायस्थ' कहाता है।।
*
हुआ सवेरा जगे जन्म हो, मूंदे नयन मरण होता।
साथ न कुछ भी आता-जाता, जोड़ चैन क्यों मनु खोता?
जिससे मिलना हो उस पर हँस, नेह-प्रेम वात्सल्य लुटा-
हो अशोक जग को अशोक कर, 'सलिल' न क्यों तू सुख बोता?
*
​समय ग्रन्थ के एक पृष्ठ को संजीवित कर आप रहे बिंदु सिंधु में, सिंधु बिंदु में होकर नित प्रति व्याप रहे हर दिन जन्म नया होना है, रात्रि मूँदना आँख सखे! पैर धरा पर जमा, गगन छू आप सफलता नाप रहे
*

मंगलवार, 30 अक्तूबर 2018

गीत

संजीव वर्मा 'सलिल' ४०१ विजय अपार्टमेंट
संयोजक विश्ववाणी हिंदी संस्थान नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१
चेयरमैन इंडियन जिओटेक्निकल सोसायटी salilsanjiv@gmail.com
सभापति अभियान ७९९९५५९६१८ / ९४२५१८३२४४

गीत
सत्य-शिव-सुंदर के शाश्वत गान सी।
बह रही है नर्मदावत मानसी।।
*
आँख में सपने,
करे साकार सब।
कोशिशें लेने लगीं
आकार सब।
जूझ कर दे विघ्न को
नित मात अब-
लक्ष्य आ करने लगें
मनुहार अब।
साधना-अभ्यर्थना के गान भी-
रच रही, हँस गा रही है मानसी।।
*
ठिठक, रुक-झुक, फिसल,
गिर-उठ बढ़ चली।
पग धरा-धर, नभ छुए
लगती भली।।
मधुर कलरव, मृदुल
कलकल, नाद सी।।
वाक्-लिपि-सुर, नृत्य-
अंकन, ताल सी।।
उषा-दुपहर-साँझ-रजनी चाँदनी।
संयमित गति-यति, विलय लय भान सी।।
*
रमा-शारद-शक्ति,
भक्ति विरक्ति भी।
सृजन पथ वर कर
सहज आसक्ति भी।
कर रही कर्तव्य,
पा अधिकार यह।
मोह-ममता-स्नेह का
स्वीकार यह।
कभी गीता, कभी सीता मानवी-
श्रुति-स्मृति है, यह ऋचा की जान सी।।
***
संजीव वर्मा 'सलिल',
३०-१०-२०१८, ७९९९५५९६१८
salil.sanjiv@gmail.com
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मुक्तक / मुक्तिका

नव प्रयोग
*
नौ मात्रिक छंद
छंद सूत्र: य न ल
मापनी: १२२११११
*
मुक्तक-
मिलोगी जब तुम
मिटेंगे तब गम।
खिलेंगे नित गुल
हँसेंगे मिल हम।।
***
मुक्तिका -
हँसा है दिनकर
उषा का गह कर।
*
कहेगी सरगम
चिरैया छिपकर।
*
अँधेरा डरकर
गया है मरकर।
*
पियेगा जल नित
मजूरा उठकर।
*
न नेता सुखकर
न कोई अफसर
***
संजीव 'सलिल'
७९९९५५९६१८

रविवार, 28 अक्तूबर 2018

चंचरीक की याद में

सत-शिव-सुंदर सृजन-पथ,
काव्य-दीप शत बाल।
जगमोहन जग मोहकर,
खुद ही बने मिसाल।
*
आँसू बहे न एक, 
चंचरीक की याद कर।
काव्य-सृजन कर नेक, 
रसानंद का स्वाद चख।।

राम-राम कर राम से, 
न रख काम से काम।
निज मर्यादा मानिए, 
तब प्रसन्न हों राम।।

बिटिया-नारी सिया,
होती जीवन सहचरी।
सुख-दुख में रह साथ, 
बनतीं मनु की प्रेरणा।।

चंचरीक ने सीख दी, 
लेखन किया कमाल।
जगमोहन जग-मोहकर, 
खुद ही बने मिसाल।।
*
श्याम-चरित से सीख, 
करना युग-निर्माण है।
जो जीवन निष्प्राण,
उसमें फूँको प्राण मिल।।

काम करो निष्काम रह, 
कदम-कदम बढ़ नित्य।
मंजिल खुद मस्तक-तिलक
करे याद रख कृत्य।।

उस नटवर से सीख,
रास रचाना-भुलाना।
अन्यायी से जूझकर, 
पाठ न्याय का पढ़ाना।।

जैसी बहे बयार जब, 
ले खुद को तू ढाल।।
जगमोहन जग-मोहकर,
खुद ही बने मिसाल।।
*
कल्कि चरित से सीख, 
तू न भुला निज धर्म दे।
हरदम रखना याद, 
कर्म धर्म का मर्म है ।।

युग-परिवर्तन अटल है, 
पर न भुला गंतव्य।
सबका सबसे हो भला, 
साध्य यही मंतव्य।।

कण-कण में भगवान,
कंकर में शंकर बसे।
जड़-चेतन में राम, 
मान बरत इंसान तू।।

काव्य-दीप संजीव तम
हर लेता नित बाल।
जगमोहन जग-मोहकर,
खुद ही बने मिसाल।।
***
संजीव वर्मा 'सलिल'
विश्ववाणी हिंदी संस्थान 
४०१ विजय अपार्टमेंट, 
नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१
चलभाष: ७९९९५५९६१८ / ९४२५१८३२४४ 
ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com 


चंचरीक स्मरणांजलि

आँसू बहे न एक,
चंचरीक को याद कर।
मिले प्रेरणा नेक,
प्रभु से नित फरियाद कर।।
*
जगमोहन को मोह जग,
सका नहीं थक-हार।
नतमस्तक हो देखता,
रहा भक्ति का ज्वार।।

प्रभु की कृपा अहैतुकी,
पाई सतत अनंत।
साक्षी धरती ही नहीं,
रवि-शशि दिशा-दिगंत।।

श्वास-श्वास हरि-नाम जप,
रचा अमर साहित्य।
भाव बिंब रस छंदमय,
बन अक्षर आदित्य।।

दोहा सलिला

दोहा सलिला
*
रहे प्रदीपा आत्म जब, तभी मिले आनंद।
सलिल न भव की फिक्र कर, सुन-गा गुरु के छंद।।
*
अर्थ न होता अर्थ में, व्यर्थ अर्थ की होड़।
कर संजीव अनर्थ कुछ, घट जाए कुछ जोड़।।
*
दुविधा से सुविधा मिले, रखे हाथ पर आत्म।
बैठ रहो सुख-शांति से, साथ रहे परमात्म।।
*
पग उत्तर की चाह में, जा दक्षिण की ओर।
प्रत्युत्तर दे रहे हैं, मचा-मचाकर शोर।।
*
जो है बाहर समझ के, व्याप्त वहीं पर आप।
समझ रहा जो नासमझ,बिन समझे कर जाप।।
***
संजीव
२७-१०-२०१८
७९९९५५९६१८

शनिवार, 27 अक्तूबर 2018

मुक्तिका

मुक्तिका  
*
अर्चना कर सत्य की, शिव-साधना सुन्दर करें।
जग चलें गिर उठ बढ़ें, आराधना तम हर करें।।
*
कौन किसका है यहाँ?, छाया न देती साथ है।
मोह-माया कम रहे, श्रम-त्याग को सहचर करें।।
*
एक मालिक है वही, जिसने हमें पैदा किया।
मुक्त होकर अहं से, निज चित्त प्रभु-चाकर करें।।
*
वरे अक्षर निरक्षर, तब शब्द कविता से मिले।
भाव-रस-लय त्रिवेणी, अवगाह चित अनुचर करें।।
*
पूर्णिमा की चंद्र-छवि, निर्मल 'सलिल में निरखकर।
कुछ रचें; कुछ सुन-सुना, निज आत्म को मधुकर करें।।
***
संजीव, ७९९९५५९६१८
करवा चौथ २७-१०-२०१८
जबलपुर

​इकाई स्थापना आमंत्रण

​विश्ववाणी हिंदी संस्थान 
समन्वयम २०४ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, चलभाष: ९४२५१ ८३२४४ ​/ ७९९९५५९६१८ ​
​इकाई स्थापना आमंत्रण 
*
विश्ववाणी हिंदी संस्थान एक स्वैच्छिक अपंजीकृत समूह है जो ​भारतीय संस्कृति और साहित्य के प्रचार-प्रसार तथा विकास हेतु समर्पित है। संस्था पीढ़ियों के अंतर को पाटने और नई पीढ़ी को साहित्यिक जड़ों से जोड़ने के लिए निस्वार्थ सेवाभावी रचनात्मक प्रवृत्ति संपन्न महानुभावों तथा संसाधनों को एकत्र कर विविध कार्यक्रम संचालित करती है। इकाई स्थापना के लिए इच्छुक सदस्य संपर्क करें: salil .sanjiv @gmail .com
​​​विश्ववाणी हिंदी संस्थान
समन्वयम २०४ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, चलभाष: ९४२५१ ८३२४४
ऍफ़ २, वी ५ विनायक होम्स, मयूर विहार, अशोक गार्डन,भोपाल ४६२०२३ चलभाष: ९५७५४६५१४७
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शांति-राज पारिवारिक पुस्तकालय योजना

विश्ववाणी हिंदी संस्थान जबलपुर
शांति-राज पारिवारिक पुस्तकालय योजना 
*
विश्ववाणी हिंदी संस्थान जबलपुर के तत्वावधान में नई पीढ़ी के मन में हिंदी के प्रति प्रेम तथा भारतीय संस्कारों के प्रति लगाव तभी हो सकता है जब वे बचपन से सत्साहित्य पढ़ें। इस उद्देश्य से पारिवारिक पुस्तकालय योजना आरम्भ की जा रही है। इस योजना के अंतर्गत निम्न में से ४००/- से अधिक की पुस्तकें मँगाने पर मूल्य में ४०% छूट, पैकिंग व डाक व्यय निशुल्क की सुविधा उपलब्ध है। पुस्तक खरीदने के लिए salil.sanjiv@gmail.com या ७९९९५५९६१८/९४२५१८३२४४ पर सम्पर्क करें।
पुस्तक सूची
काव्य
०१. मीत मेरे कविताएँ -आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' १५०/-
०२. काल है संक्रांति का गीत-नवगीत संग्रह -आचार्य संजीव 'सलिल' १५०/-
०३. कुरुक्षेत्र गाथा खंड काव्य -स्व. डी.पी.खरे -आचार्य संजीव 'सलिल' ३००/-
०४. पहला कदम काव्य संग्रह -डॉ. अनूप निगम १००/-
०५. कदाचित काव्य संग्रह -स्व. सुभाष पांडे १२०/-
०६. Off And On -English Gazals Dr. Anil Jain ८०/-
०७. यदा-कदा -उक्त का हिंदी काव्यानुवाद- डॉ. बाबू जोसफ-स्टीव विंसेंट
०८. Contemporary Hindi Poetry - B.P. Mishra 'Niyaz' ३००/-
०९. महामात्य महाकाव्य दयाराम गुप्त 'पथिक' ३५०/-
१०. कालजयी महाकाव्य दयाराम गुप्त 'पथिक' २२५/-
११. सूतपुत्र महाकाव्य दयाराम गुप्त 'पथिक' १२५/-
१२. अंतर संवाद कहानियाँ रजनी सक्सेना २००/-
१३. दोहा-दोहा नर्मदा दोहा संकलन सं. सलिल-डॉ. साधना वर्मा २५०/-
१४. दोहा सलिला निर्मला दोहा संकलन सं. सलिल-डॉ. साधना वर्मा २५०/-
१५. दोहा दिव्य दिनेश दोहा संकलन सं. सलिल-डॉ. साधना वर्मा ३००/-
१६. सड़क पर गीत-नवगीत संग्रह आचार्य संजीव 'सलिल' ३००/-
१७. The Second Thought - English Poetry - Dr .Anil Ashok Jain​
***

सूचना- 'सार्थक लघुकथाएँ'

विश्ववाणी हिंदी संस्थान 
समन्वयम २०४ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, चलभाष: ९४२५१ ८३२४४ 
ऍफ़ २, वी ५ विनायक होम्स, मयूर विहार, अशोक गार्डन,भोपाल ४६२०२३ चलभाष: ९५७५४६५१४७ 
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प्रतिनिधि भारतीय लघुकथाकार और लघुकथाएँ : २०१८ 
विश्ववाणी हिंदी संस्थान जबलपुर के तत्वावधान में 'प्रतिनिधि भारतीय लघुकथाकार और लघुकथाएँ : २०१८'' शीर्षक से २५ लघुकथाकारों की १०-१० लघु कथाएँ ८-८ पृष्ठों पर चित्र, संक्षिप्त परिचय तथा संपर्क सूत्र सहित सहयोगाधार पर प्रकाशित करने की योजना है। संकलन का आवरण बहुरंगी पेपरबैक होगा।प्रत्येक सहभागी को मात्र ३०००/- का अंशदान, सभी सहयोगी जुटने तथा रचनाएँ स्वीकृत होने के बाद भेजना होगा। प्रत्येक सहभागी को २० प्रतियाँ निशुल्क उपलब्ध कराई जाएँगी जिनका विक्रय या अन्य उपयोग करने हेतु वे स्वतंत्र होंगे। इच्छुक लघुकथाकार ९४२५१८३२४४ या ९५७५४६५१४७ पर संयोजकों से बात कर सकते हैं। ग्रन्थ के आरंभ में लघुकथा विषयक शोधपरक लेख तथा अंत में परिशिष्ट में शोध छात्रों हेतु उपयोगी सूचनाएँ और सामग्री संकलित की जाएगी। हिंदी के साथ अन्य भारतीय भाषाओँ की लघु कथाएं हिंदी अनुवाद सहित भी आमंत्रित हैं। सहमति व सामग्री हेतु ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com, roy. kanta@gmail.com .
​***​
'सार्थक लघुकथाएँ'
*
विश्ववाणी हिंदी संस्थान जबलपुर के तत्वावधान में 'सार्थक लघुकथाएँ' शीर्षक से सहयोगाधार पर १११ लघुकथाकारों की २-२ प्रतिनिधि लघु कथाएँ २ पृष्ठों पर चित्र, संक्षिप्त परिचय (जन्मतिथि-स्थान, माता-पिता, जीवन साथी, साहित्यिक गुरु व प्रकाशित पुस्तकों के नाम, शिक्षा, लेखन विधाएँ, अभिरुचि/आजीविका, डाक का पता, ईमेल, चलभाष क्रमांक आदि) सहित प्रकाशित की जा रही हैं। संकलन में लघुकथा पर शोधपरक सामग्री भी होगी। लगभग २५० पृष्ठों के पठनीय पेपरबैक संकलन की २-२ प्रतियाँ पंजीकृत पुस्त-प्रेष्य की जाएँगी। प्रत्येक सहभागी को मात्र ३००/- का अंशदान रचनाएँ स्वीकृत होने के बाद बताये गए बैंक खाते में जमाकर पावती ईमेल करना होगी। इच्छुक लघुकथाकार नीचे टिप्पणी में नाम-पता, चलभाष (मोबाइल) क्रमांक अंकित कर सकते हैं। सहमति व सामग्री हेतु ईमेल: salil.sanjiv@ gmail.com, roy. kanta@gmail.com इच्छुक लघुकथाकार ९४२५१८३२४४ या ९५७५४६५१४७ पर संयोजकों से बात कर सकते हैं। अतिरिक्त प्रतियों पर मुद्रित मूल्य से ३०% रियायत मिलेंगी। कुछ ही स्थान शेष, निराशा से बचने हेतु शीघ्रता करें।
***

सूचना दोहा शतक मंजूषा ४

विश्ववाणी हिंदी संस्थान 
समन्वयम २०४ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, चलभाष: ९४२५१ ८३२४४ 
ऍफ़ २, वी ५ विनायक होम्स, मयूर विहार, अशोक गार्डन,भोपाल ४६२०२३ चलभाष: ९५७५४६५१४७ 
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दोहा शतक मंजूषा 
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विश्ववाणी हिंदी संस्थान जबलपुर के तत्वावधान तथा आचार्य संजीव 'सलिल'
व डॉ. साधना वर्मा के संपादन में दोहा शतक मंजूषा के ३ भाग दोहा दोहा नर्मदा, दोहा सलिला निर्मला तथा दोहा दीप्त दिनेश का प्रकाशन कर सहयोगियों को भेजा जा चुका है। ८००/- मूल्य की ३ पुस्तकें ( ५००० से अधिक दोहे, दोहा-लेखन विधान, २५ भाषाओँ में दोहे तथा बहुमूल्य शोध-सामग्री) ५०% छूट पर उपलब्ध हैं। इस कड़ी के भाग ४ "दोहा आशा-किरण" हेतु दोहाकारों से १२० दोहे, चित्र, संक्षिप्त परिचय (जन्मतिथि-स्थान, माता-पिता, जीवन साथी, साहित्यिक गुरु व प्रकाशित पुस्तकों के नाम, शिक्षा, लेखन विधाएँ, अभिरुचि/आजीविका, डाक का पता, ईमेल, चलभाष क्रमांक आदि) ईमेल: salil.sanjiv@ gmail.com पर आमंत्रित हैं। दोहों की स्वीकृति-पश्चात् सहभागिता निधि ३०००/- भेजना होगी। प्रत्येक सहभागी को गत ३ संकलनों की एक-एक प्रति तथा भाग ४ की ८ प्रतियाँ कुल ११ पुस्तकें दी जाएँगी। नव दोहाकारों को दोहा लेखन विधान, मात्रा गणना नियम व मार्गदर्शन उपलब्ध है।
***

सोमवार, 22 अक्तूबर 2018

कृति परिचय- "रस-छंद-अलंकार और काव्य विधाएँ" कविताई की संहिता

कृति परिचय- "रस-छंद-अलंकार और काव्य विधाएँ" कविता की संहिता
(कृति विवरण: रस-छंद-अलंकार और काव्य विधाएँ, पिंगल ग्रंथ, राजेंद्र वर्मा, आई. एस. बी. एन. ९७८८१७७७९६२६१,  प्रथम संस्करण, वर्ष २०१८, आवरण बहुरंगी, पेपरबैक, जैकेट सहित,  आकार डिमाई, पृष्ठ ३५१,  मूल्य ३२५रु., प्रकाशक साहित्य भंडार, ५ चाहचंद,  जीरो रोड, इलाहाबाद २११००३, चलभाष ०९३३५१५५७९२, ९४१५२१४८७८, कृतिकार संपर्क- ३/२९ विकास नगर, लखनऊ २२६०२२,  चलभाष ९४१५३११४५०,  ८००९६६००९६,  ई मेल- salil.sanjiv@gmail.com.)                           ***

सृष्टि के अन्य जीवों की तुलना में मानव सभ्यता की उन्नति तथा स्थायित्व का कारण ध्वनि को आत्मसात कर स्मरण रखना, ध्वनि से अर्थ ग्रहण कर संप्रेषित करना, ध्वनि का नियमबद्ध प्रयोगकर भाषा तथा ध्वनि को चिन्ह विशेष के माध्यम से अंकित-लिपिबद्ध कर लिख-पढ़-समझ पाना है। इस प्रक्रिया ने आदिकाल से अब तक मानव मात्र को हुए अनुभवों की अनुभूतियाँ संचयित-संरक्षित तथा संप्रेषित किया जाना संभव किया। पीढ़ी-दर-पीढ़ी सृजित-संकलित ग्यान राशि  सर्वकल्याण की कामना से संयुक्त की जाकर साहित्य कही गई। न्यूनाधिक लयात्मकता तथा सरसता के आधार पर साहित्य को गद्य तथा पद्य में वर्गीकृत किया गया।

विश्ववाणी हिंदी में पद्य साहित्य की रचना संबंधी आचार संहिता को प्रथमाचार्य महर्षि पिंगल के नाम पर पिंगल शास्त्र कहा गया है। पिंगल शास्त्र के तीन प्रकोष्ठ पद्य रचना, पद्य समझना तथा पद्य सिखाना हैं। ऋषि-आश्रमों तथा गुरु-शिष्य परंपरा को यवन-अँंग्रेज पराधीनता काल में सुविचारित ढंग से नष्ट कर क्रमशः अरबी-फारसी आधारित उर्दू व अंग्रेजी को राज-काज की भाषा बनाकर भारतीय साहित्य विशेषकर पिंगल के स्वतंत्र चिंतन-मनन-सृजन को हतोत्साहित कर उस पर अरबी-फारसी छंदशास्त्र को आरोपित किया गया।

लगभग दो सदी पूर्व जगन्नाथ प्रसाद "भानु" रचित छंद' प्रभाकर ने अपभ्रंश व संस्कृत से हिंदी को विरासत में मिले छंदों के विधान का वर्णन किया। रस-छंद-अलंकार विषयक अधिकांश पुस्तकें विविध पाठ्यक्रमों पर आधारित रहीं। ओमप्रकाश बरसैंया कृत 'छंद-क्षीरधि' तथा रामदेव लाल "विभोर" कृत 'छंद-विधान' छंद प्रभाकर की छाया से मुक्त न हो सकीं। नारायण दास व सौरभ पांडे नवरचनाकारों की सुविधा के लिए कुछ छंदों की रचना प्रक्रिया तक सीमित रहे। इस पृष्ठ भूमि में विवेच्य कृति भानु जी के पश्चात मौलिक दृष्टि से हिंदी पिंगल के आकलन का महत्वपूर्ण स्वतंत्र प्रयास कहा जा सकता है।

राजेंद्र वर्मा जी बैंक अधिकारी रहे हैं, भिन्न ध्रुवों के मध्य समन्वय-संतुलन स्थापित करने की कला में निपुण हैं। अत: विषय के वर्गीकरण, अपनी मान्यताओं के अनुरूप चयनित विषय सामग्री के चयन तथा 'पिंगल' एवं 'उरूज' के मध्य सेतु-स्थापन करने का पुष्ट प्रयास कर सके हैं। कृति के प्रत्येक अध्याय में विषय वस्तु के विस्तार को सीमित पृष्ठों में समेटना और अपनी मान्यताओं की पुष्टि करना नट कौशल की तरह कठिन है, तनिक संतुलन डगमगाते ही सम्हालना दुष्कर हो सकता है किंतु राजेंद्र जी कहीं डगमगाए नहीं।
उर्दू छंद-शास्त्री पिंगल-लेखन में उर्दू तक ही सीमित रहते हैं जबकि हिंदी छंद-शास्त्री उर्दू-पिंगल के महिमा मंडन का मोह नहीं तज पाते। यह प्रवृत्ति नव रचनाकारों को हिंदी का क्रीड़ांगण छोड़ उर्दू की तंग गली में खड़ा कर देती है। राजेंद्र जी ने एक पग आगे रखते हुए अंग्रेजी और जापानी के भी कुछ छंदों को स्पर्श किया है।

काव्य क्या है?, रस गुण रीति और वृत्ति, अलंकार, छंद विधान, काव्य दोष तथा प्रमुख काव्य विधाएँ  शीर्षक अध्यायों तथा परिशिष्टों के माध्यम से राजेंद्र जी ने जटिल तथा गूढ़ विषय को वर्गीकृत कर समझाया है। प्रथम अध्याय में संस्कृत, हिंदी व अंग्रेजी काव्याचार्यों के अनुभवों का संकेतन वरिष्ठों के चिंतन-मनन के लिए उपयुक्त है किंतु नवोदित इतने मतों को एकसा देखकर भ्रमित हो सकते हैं। रस की निष्पत्ति, तत्व,  उत्पत्ति, प्रकार, गुण,  रीति व वृत्ति आदि की चर्चा 'कम लिखे को अधिक समझना' की लोकोक्ति के अनुसार है।

अलंकार को अपेक्षाकृत अधिक महत्वपूर्ण मानते हुए लेखक ने शब्द-अर्थ तथा चित्र अलंकारों पर प्रकाश डाला है। छंद-विधान अध्याय के अंतर्गत छंद-भेदों का सारणीबद्ध विवेचन संभवत: पहली बार किया गया है। इस पद्धति ने वाक्य विन्यासकृत विस्तार की संभावना ही समाप्त कर दी। इससे छंदों का तुलनात्मक साम्य और वैषम्य देख पाना सहज साध्य हुआ किंतु जटिलता और नीरसता भी बढ़ी।

इस कृति का वैशिष्ट्य काव्य दोषों को महत्व देना है। राजेंद्र जी जानते हैं कि हिसाब तब तक ठीक नहीं होता जब तक दोष समाप्त न हों। सारणीकरण ने शिल्प,  तुकांत,  समांत,  पद, अर्थ,  रस आदि से संबंधित दोषों का सोदाहरण निरूपण किया है। इससे कृति की उपादेयता बढ़ी है।

प्रमुख काव्य विधाएँ शीर्षक अध्याय के अंतर्गत दोहा, सोरठा, कुंडलिया, पदावलि, सवैया, कवित्त, नवगीत,  ग्राम्य गीत,  फिल्मी गीत, गजल,  हिंदी गजल आदि की उत्पत्ति, प्रकार, गुण-दोष आदि का विवेचन पूर्व ग्रंथों की अपेक्षा अधिक साफगोई व विस्तार से की गई है। हिंदी-प्रेमियों की नाराजगी और उर्दू-पक्षधरों की नाराजगी का खतरा उठाकर भी राजेंद्र जी ने गंगो-जमुनी परंपरा का पालन करने की कोशिश की है। हाइकु, ताँका, सदोका, चोका आदि जापानी छंदों तथा सॉनेट जैसे अल्प प्रचलित छंद को समेटनेवाले राजेंद्र जी ने माहिया,  गिद्दा, अभंग, ककुभ, जनक छंद आदि की अनदेखी की है।

ग्रंथांत में परिशिष्टों के अंतर्गत शोधछात्रों के लिए उपयोगी साहित्य के उल्लेख ने कृति की उपादेयता  बढ़ाई है। सारत: राजेंद्र वर्मा रचित विवेचित कृति रचनाकारों, अध्यापकों तथा विद्यार्थी वर्ग के लिए समान रूप से उपयोगी है।
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संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१।

शनिवार, 20 अक्तूबर 2018

मराल युग का अंत

महाशोक
मराल बिन सूना जबलपुर
*
जबलपुर, २०-१०-२०१८। हिंदी साहित्य के बहुआयामी रचनाकार, विख्यात शिक्षाविद, कुशल वक्ता, समर्पित हिंदीसेवी, महाकवि और सबसे बढ़कर सहृदय मानव सरस्वतीपुत्र डॉ. गार्गीशरण मिश्र 'मराल' आज प्रात: ६ बजे इहलोक छोड़कर सरस्वती-लोक प्रस्थान कर गए।
संस्कारधानी जबलपुर में सारस्वत साधना कर देशव्यापी प्रसिद्धि अर्जित करने के साथ-साथ मराल जी ने बाल शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण, पौधारोपण,  साहित्यिक पत्रकारिता और संपादन को भी सफलतापूर्वक साधा। मुझे उनका भरपूर स्नेह मिला। अखिल भारतीय दिव्य नर्मदा अलंकरण के अंतर्गत उनकी दो कृतियों को सम्मानित किया गया। साहित्य पत्रिका नर्मदा के संपादनकाल में वे प्रधान संपादक के नाते पथ प्रदर्शन कर रहे थे। मेरे तीसरे काव्य संग्रह 'मीत मेरे' की भूमिका मराल जी ने ही लिखी। अपनी महत्वपूर्ण कृतियों पर मेरी लिखी समीक्षा की वे प्रतीक्षा करते थे।
संस्कारधानी जबलपुर के प्रति उनकी संवेदन-शीलता अपनी मिसाल आप थी। अभियान तथा समर्पण संस्थाओं के पौधारोपण कार्यक्रमों से वे निरंतर जुड़े रहते थे। भाई साज जबलपुरी के साथ वर्तिका संस्था की स्थापना करते समय भी मराल जी से सहयोग मिला। वे मतभेदों को मतभेद न बनने देने के पक्षधर थे।
शिक्षा विभाग में उच्च प्रशासनिक पदों की शोभा बढ़ा चुके मराल जी की कार्यपद्धति का परिचय मुझे पहली बार जबलपुर में आए भूकंप के बाद तब मिला जब लोक निर्माण विभाग द्वारा नव निर्मित डाइट महाविद्यालय की क्षतिग्रस्त इमारत की मरम्मत का  कार्य मुझे सौंपा गया। मराल जी की कार्यपद्धति पर सुदीर्घ प्रशासनिक अनुभवों का प्रभाव था। वे स्पष्ट तथा शीघ्र निर्णय लेते थे तथा एक बार निर्णय कर लेने पर उसे बदलते नहीं थे।
इंजीनियर्स फोरम के महामंत्री होने के नाते मुझे विविध विभागों में अभियंता बंधुओं से संपर्क रखना होता था। जबलपुर विकास प्राधिकरण में सर्वाधिक सहयोग देते रहे अभियंता डी. एस. मिश्र   जो तब कार्यपालन अभियंता थे, अब अधीक्षण यंत्री हैं। वे मिलने पर साहित्य की चर्चा अवश्य करते। मुझे विस्मय होता, एक दिन मैंने कारण पूछा तो निकट बैठे इंजी. बंधु ने बताया कि इनके पिता जी प्रसिद्ध साहित्यकार मराल जी हैं। मैं मराल जी के निवास पर कई बार जा चुका था। अत: विस्मित हुअा कि अब तक यह क्यों न जान सका। पूछने पर विदित हुआ अनुशासन प्रिय पिता के सामने अभियंता और प्रथम श्रेणी अधिकारी होने के बाद भी पुत्र आवश्यकता होने पर ही जाता था। मेरे परिवार में भी पिता जी का ऐसा ही अनुशासन था।
मराल जी भारतीय जीवनपद्धति और जीवनमूल्यों के वाहक थे। उनका देहावसान मेरी व्यक्तिगत क्षति है। उन्होंने एक बार बताया था कि वे छंद विषयक शोध करना चाहते थे किंतु कार्य की विराटता और निदेशक की सलाह पर उन्होंने विषय बदल दिया। इससे मुझे उत्सुकता हुई और मैंने छंद का अध्ययन आरंभ किया। मराल जी, आचार्य कृष्णकांत चतुर्वेदी जी तथा आचार्य भगवत दुबे छंद विषयक कार्य के संबंध में सतत उत्साहवर्धन करते रहे हैं।
मराल जी के महाप्रस्थान ने मुझे एक परामर्शदाता ही नहीं अग्रजवत हाथ के सहारे से वंचित कर दिया है। दुर्भाग्य यह कि मैं अभिव्यक्ति विश्वम् के तत्वावधान में छंद विषयक कार्यशाला के लिए लखनऊ में हूँ। अग्रजवत मराल जी को श्रद्धांजलि अर्पण कर कार्यशाला होगी। परमपिता से प्रार्थना है कि शोकाकुल स्वजनों को यह क्षति सहन करने हेतु साहस प्रदान करें। ओम् शांति: शांति: शांति:।
***

शुक्रवार, 19 अक्तूबर 2018

doha-soratha salila

दोहा-सोरठा सलिला:

छंद सवैया सोरठा, लुप्त नहीं- हैं मौन
ह्रदय बसाये पीर को, देख रहे चुप कौन?
*
करे पीर से प्रेम जब, छंद तभी होता प्रगट  
बसें कलम में तभी रब, जब आँसू हों आँख में 
*
पीर-प्रेम का साथ ही, राधा-मीरावाद
सूर-यशोदा पीर का, ममतामय अनुवाद
*
शब्द-शब्द आनंद, श्वास-श्वास में जब बसे
तभी गुंजरित छंद, होते बनकर प्रार्थना
*
धुआँ कामना हो गयी, छूटी श्वासा रेल 
जग-जीवन लगने लगा, जीत-हार का खेल 
*
किशन देखता मौन, कितने कहाँ सरोज हैं?
शब्द-वेध कर कौन, बने धंनजय 'सलिल' फिर.
***
नवगीत: 
संजीव 
(मुखड़ा दोहा, अन्तरा सोरठा)
दर्पण का दिल देखता 
कहिए, जग में कौन?
आप न कहता हाल 
भले रहे दिल सिसकता 
करता नहीं खयाल  
नयन कौन सा फड़कता? 
सबकी नज़र उतारता
लेकर राई-नौन 
पूछे नहीं सवाल 
नहीं किसी से हिचकता 
कभी न देता टाल 
और न किंचित ललकता 
रूप-अरूप निहारता 
लेकिन रहता मौन 

रहता है निष्पक्ष 
विश्व हँसे या सिसकता 
सब इसके समकक्ष 
जड़ चलता या फिसलता 
माने सबको एक सा 
हो आधा या पौन  
… 
अभिनव प्रयोग
सोरठा-दोहा  गीत
संजीव
*
इतना ही इतिहास,
मनुज, असुर-सुर का रहा 
हर्ष शोक संत्रास,
मार-पीट, जय-पराजय
*
अक्षर चुप रह देखते, क्षर करते अभिमान
एक दूसरे को सता, कहते हम मतिमान
सकल सृष्टि का कर रहा, पल-पल अनुसन्धान
किन्तु नहीं खुद को 'सलिल', किंचित पाया जान
अपनापन अनुप्रास,
श्लेष स्नेह हरदम रहा 
यमक अधर धर हास,
सत्य सदा कहता अभय
*
शब्द मुखर हो बोलते,  शिव का करिए गान
सुंदर वह जो सनातन, नश्वर तन-मन मान
सत चित में जब बस रहे, भाषा हो रस-खान 
पा-देते आनंद तब, छंद न कर अभिमान 
जीवन में परिहास,
हो भोजन में नमक सा
जब हो छल-उपहास
साध्य, तभी होती प्रलय
*
मुखड़ा संकेतित करे, रोकें नहीं उड़ान
हठ मत ठानें नापना, क्षण में सकल वितान
अंतर से अंतर मिटा, रच अंतरा सुजान
गति-यति, लय मत भंग कर, तभी सधेगी तान
कुछ कर ले सायास,
अनायास कुछ हो रहा
देखे मौन सहास
अंश पूर्ण में हो विलय
*** 
सोरठा - दोहा गीत
संबंधों की नाव
*
संबंधों की नाव,
पानी - पानी हो रही।
अनचाहा अलगाव,
नदी-नाव-पतवार में।।
*
स्नेह-सरोवर सूखते,
बाकी गन्दी कीच।
राजहंस परित्यक्त हैं,
पूजते कौए नीच।।

नहीं झील का चाव,
सिसक रहे पोखर दुखी।
संबंधों की नाव,
पानी - पानी हो रही।।
*
कुएँ - बावली में नहीं,
शेष रहा विश्वास।
निर्झर आवारा हुआ,
भटके ले निश्वास।।

घाट घात कर मौन,
दादुर - पीड़ा अनकही।
संबंधों की नाव,
पानी - पानी हो रही।।
*
ताल - तलैया से जुदा,
देकर तीन तलाक।
जलप्लावन ने कर दिया,
चैनो - अमन हलाक।।

गिरि खोदे, वन काट
मानव ने आफत गही।
संबंधों की नाव,
पानी - पानी हो रही।।  
 ***
२०-७-२०१६
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दोहा-सोरठा सलिला:

छंद सवैया सोरठा, लुप्त नहीं- हैं मौन
ह्रदय बसाये पीर को, देख रहे चुप कौन?
*
करे पीर से प्रेम जब, छंद तभी होता प्रगट  
बसें कलम में तभी रब, जब आँसू हों आँख में 
*
पीर-प्रेम का साथ ही, राधा-मीरावाद
सूर-यशोदा पीर का, ममतामय अनुवाद
*
शब्द-शब्द आनंद, श्वास-श्वास में जब बसे
तभी गुंजरित छंद, होते बनकर प्रार्थना
*
धुआँ कामना हो गयी, छूटी श्वासा रेल 
जग-जीवन लगने लगा, जीत-हार का खेल 
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किशन देखता मौन, कितने कहाँ सरोज हैं?
शब्द-वेध कर कौन, बने धंनजय 'सलिल' फिर.
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नवगीत: 
संजीव 
(मुखड़ा दोहा, अन्तरा सोरठा)
दर्पण का दिल देखता 
कहिए, जग में कौन?
आप न कहता हाल 
भले रहे दिल सिसकता 
करता नहीं खयाल  
नयन कौन सा फड़कता? 
सबकी नज़र उतारता
लेकर राई-नौन 
पूछे नहीं सवाल 
नहीं किसी से हिचकता 
कभी न देता टाल 
और न किंचित ललकता 
रूप-अरूप निहारता 
लेकिन रहता मौन 
रहता है निष्पक्ष 
विश्व हँसे या सिसकता 
सब इसके समकक्ष 
जड़ चलता या फिसलता 
माने सबको एक सा 
हो आधा या पौन  
… 
अभिनव प्रयोग
सोरठा-दोहा  गीत
संजीव
*
इतना ही इतिहास,
मनुज, असुर-सुर का रहा 
हर्ष शोक संत्रास,
मार-पीट, जय-पराजय
*
अक्षर चुप रह देखते, क्षर करते अभिमान
एक दूसरे को सता, कहते हम मतिमान
सकल सृष्टि का कर रहा, पल-पल अनुसन्धान
किन्तु नहीं खुद को 'सलिल', किंचित पाया जान
अपनापन अनुप्रास,
श्लेष स्नेह हरदम रहा 
यमक अधर धर हास,
सत्य सदा कहता अभय
*
शब्द मुखर हो बोलते,  शिव का करिए गान
सुंदर वह जो सनातन, नश्वर तन-मन मान
सत चित में जब बस रहे, भाषा हो रस-खान 
पा-देते आनंद तब, छंद न कर अभिमान 
जीवन में परिहास,
हो भोजन में नमक सा
जब हो छल-उपहास
साध्य, तभी होती प्रलय
*
मुखड़ा संकेतित करे, रोकें नहीं उड़ान
हठ मत ठानें नापना, क्षण में सकल वितान
अंतर से अंतर मिटा, रच अंतरा सुजान
गति-यति, लय मत भंग कर, तभी सधेगी तान
कुछ कर ले सायास,
अनायास कुछ हो रहा
देखे मौन सहास
अंश पूर्ण में हो विलय
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सोरठा - दोहा गीत
संबंधों की नाव
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संबंधों की नाव,
पानी - पानी हो रही।
अनचाहा अलगाव,
नदी-नाव-पतवार में।।
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स्नेह-सरोवर सूखते,
बाकी गन्दी कीच।
राजहंस परित्यक्त हैं,
पूजते कौए नीच।।

नहीं झील का चाव,
सिसक रहे पोखर दुखी।
संबंधों की नाव,
पानी - पानी हो रही।।
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कुएँ - बावली में नहीं,
शेष रहा विश्वास।
निर्झर आवारा हुआ,
भटके ले निश्वास।।

घाट घात कर मौन,
दादुर - पीड़ा अनकही।
संबंधों की नाव,
पानी - पानी हो रही।।
*
ताल - तलैया से जुदा,
देकर तीन तलाक।
जलप्लावन ने कर दिया,
चैनो - अमन हलाक।।

गिरि खोदे, वन काट
मानव ने आफत गही।
संबंधों की नाव,
पानी - पानी हो रही।।  
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२०-७-२०१६
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