बुधवार, 31 जनवरी 2018

दोहा दुनिया

चंदा को लग गया है,
ग्रहण मनाएं हर्ष।
चंदा अब मत दीजिए,
तब होगा उत्कर्ष।।
*
चंद्रग्रहण को देखकर,
चंद्रमुखी हैरान।
नीली-लाल अगर हुई,
कौन सके पहचान?
*
लगा टकटकी देखते,
चंद्रमुखी को लोग।
हुई लाल-पीली बहुत,
लगा क्रोध का रोग।।
*
संसद की अध्यक्ष भू,
रवि-शशि पक्ष-विपक्ष।
अनुशासन रखती कड़ा,
धरा सभापति दक्ष।।
*
बदल रहा है चंद्रमा,
तरह-तरह के रंग।
देख-देखकर हो रहा,
गिरगिट हैरां-दंग।।
***
३१.१.२०१८, जबलपुर

शिव दोहावली

शिव हों, भाग न भोग से,
हों न भोग में लीन।
योग साध लें भोग से,
सजा साधना बीन।।
*
चाह एक की जो बने,
दूजे की भी चाह।
तभी आह से मुक्ति हो,
दोनों पाएं वाह।।
*
प्रकृति-पुरुष हैं एक में
दो, दो में हैं एक।
दो अपूर्ण मिल पूर्ण हों,
सुख दे-पा सविवेक।।
*
योनि जीव को जो मिली,
कर्मों का परिणाम।
लिंग कर्म का मूल है,
कर सत्कर्म अकाम।।
*
संग तभी सत्संग है,
जब अभंग सह-वास।
संगी-संगिन में पले,
श्रृद्धा सह विश्वास।
*
मन में मन का वास ही,
है सच्चा सहवास।
तन समीप या दूर हो,
शिथिल न हो आभास।।
*
मुग्ध रमणियों मध्य है,
भले दिगंबर देह।
शिव-मन पल-पल शिवा का,
बना हुआ है गेह।।
*
तन-मन-आत्मा समर्पण
कर होते हैं पूर्ण।
सतत इष्ट का ध्यान कर,
खुद होते संपूर्ण।।
*
भक्त, भक्ति, भगवान भी,
भिन्न न होते जान।
गृहणी, गृहपति, गृह रहें,
एक बनें रसखान।।
*
शंका हर शंकारि शिव,
पाकर शंकर नाम।
अंतर्मन में व्यापकर,
पूर्ण करें हर काम।।
*
नहीं काम में काम हो,
रहे काम से काम।
काम करें निष्काम हो,
तभी मिले विश्राम।।
*
३१.१.२०१८, जबलपुर

मंगलवार, 30 जनवरी 2018

व्यंग्य लेख

व्यंग्य लेख 
दही हांडी की मटकी और सर्वोच्च न्यायालय 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' 
*
दही-हांडी की मटकी बाँधता-फोड़ता और देखकर आनंदित होते आम आदमी के में भंग करने का महान कार्य कर खुद को जनहित के प्रति संवेदनशील दिखनेवाला निर्णय सौ चूहे खाकर बिल्ली के हज जाने की तरह शांतिप्रिय सनातनधर्मियों के अनुष्ठान में अयाचित और अनावश्यक हस्तक्षेप करने के कदमों की कड़ी है। हांड़ी की ऊँचाई उन्हें तोड़ने के प्रयासों को रोमांचक बनाती है। ऊँचाई को प्रतिबंधित करने के निर्णय का आधार, दुर्घटनाओं को बताया गया है कइँती यह कैसे सुनिश्चित किया गया कि निर्धारित ऊँचाई से दुर्घटना नहीं होगी? इस निर्णय की पृष्ठभूमि किसी प्राण-घातक दुर्घटना और जान-जीवन की रक्षा कहा जा रहा है। यदि न्यायलय इतना संवेदनशील है तो मुहर्रम में जलाते अलावों पर चलने, मुंह में छेदना, उन पर कूदने और अपने आप पर घातक शास्त्रों से वार करने की परंपरा हानिहीन कैसे कही जा सकती है? क्या बकरीद पर लाखों बकरों का कत्ल अधिक जघन्य नहीं है? न्यायालय यह जानता नहीं या इसे प्रतिबन्धयोग्य मानता नहीं या सनातन धर्मियों को सॉफ्ट टारगेट मानकर उनके धार्मिक अनुष्ठानों में हस्तक्षेप करना अपना जान सिद्ध अधिकार समझता है? सिख जुलूसों में भी शस्त्र तथा युद्ध-कला प्रदर्शनों की परंपरा है जिससे किसी की हताहत होने को सम्भावना नकारी नहीं जा सकती।
वस्तुत: दही-हांड़ी का आयोजन हो या न हो? हो तो कहाँ हो?, ऊँचाई कितनी हो?, कितने लोग भाग लें?, किस प्रकार मटकी फोड़ें? आदि प्रश्न न्यायालय नहीं प्रशासन हेतु विचार के बिंदु हैं। भारत के न्यायालय बीसों साल से लंबित लाखों वाद प्रकरणों, न्यायाधीशों की कमी, कर्मचारियों में व्यापक भ्रष्टाचार, वकीलों की मनमानी आदि समस्याओं के बोझ तले कराह रहे हैं। दम तोडती न्याय व्यवस्था को लेकर सर्वोच्च न्यायाधिपति सार्वजनिक रूप से आँसू बहा चुके हैं। लंबित लाखों मुकदमों में फैसले की जल्दी नहीं है किन्तु सनातन धर्मियों के धार्मिक अनुष्ठान से जुड़े मामले में असाधारणशीघ्रता और जन भावनाओं के निरादर का औचित्य समझ से परे है। न्यायलय को आम आदमी की जान की इतनी ही चिता है तो दीपा कर्माकर द्वारा प्रदर्शित जिम्नास्ट खेल में निहित सर्वाधिक जान का खतरा अनदेखा कैसे किया जा सकता है? खतरे के कारण ही उसमें सर्वाधिक अंक हैं। क्या न्यायालय उसे भी रोक देगा? क्या पर्वतारोहण और अन्य रोमांचक खेल (एडवेंचर गेम्स) भी बन्द किये जाएँ? यथार्थ में यह निर्णय उतना ही गलत है जितना गंभीर अपराधों के बाद भी फिल्म अभिनेताओं को बरी किया जाना। जनता ने न उस फैसले का सम्मान किया, न इसका करेगी।
इस सन्दर्भ में विचारणीय है कि-
१. विधि निर्माण का दायित्व संसद का है। न्यायिक सक्रियता (ज्यूडिशियल एक्टिविज्म) अत्यंत ग़ंभीऱ और अपरिहार्य स्थितियों में ही अपेक्षित है। सामान्य प्रकरणों और स्थितियों में इस तरह के निर्णय संसद के अधिकार क्षेत्र में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप है।
२. कार्यपालिका का कार्य विधि का पालन करना और कराना है। किसी विधि का हर समय, हर स्थिति में शत-प्रतिशत पालन नहीं किया जा सकता। स्थानीय अधिकारियों को व्यावहारिकता और जन-भावनाओं का ध्यान भी रखना होता है। अत:, अन्य आयोजनों की तरह इस संबंध में भी निर्णय लेने का अधिकार स्थानीय प्रशासन के हाथों में देना समुचित विकल्प होता।
३. न्यायालय की भूमिका सबसे अंत में विधि का पालन न होने पर दोषियों को दण्ड देने मात्र तक सीमित है, जिसमें वह विविध कारणों से असमर्थ हो रहा है। असहनीय अनिर्णीत वाद प्रकरणों का बोझ, न्यायाधीशों की अत्यधिक कमी, वकीलों का अनुत्तरदायित्व और दुराचरण, कर्मचारियों में व्याप्त भ्रष्टाचार के कारण दम तोड़ती न्याय व्यवस्था खुद में सुधार लाने के स्थान पर अनावश्यक प्रकरणों में नाक घुसेड़ कर अपनी हेठी करा रही है।
मटकी फोड़ने के मामलों में स्वतंत्रता के बाद से अब तक हुई मौतों के आंकड़ों का मिलान, बाढ़ में डूब कर मरनेवालों, दंगों में मरनेवालों, समय पर चिकित्सा न मिलने से मरनेवालों, सरकारी और निजी अस्पतालों में चिकित्सकों के न होने से मरनेवालों के आँकड़ों के साथ किया जाए तो स्थिति स्पष्ट होगी यह अंतर कुछ सौ और कई लाखों का है।
यह कानून को धर्म की दृष्टि से देखने का नहीं, धर्म में कानून के अनुचित और अवांछित हस्तक्षेप का मामला है। धार्मिक यात्राएँ / अनुष्ठान ( शिवरात्रि, राम जन्म, जन्माष्टमी, दशहरा, हरछट, गुरु पूर्णिमा, मुहर्रम, क्रिसमस आदि) जन भावनाओं से जुड़े मामले हैं जिसमें दीर्घकालिक परंपराएँ और लाखों लोगों की भूमिका होती है। प्रशासन को उन्हें नियंत्रित इस प्रकार करना होता है कि भावनाएँ न भड़कें, जान-असन्तोष न हो, मानवाधिकार का उल्लंघन न हो। हर जगह प्रशासनिक बल सीमित होता है। यदि न्यायालय घटनास्थल की पृष्भूमि से परिचित हुए बिना कक्ष में बैठकर सबको एक डंडे से हाँकने की कोशिश करेगा तो जनगण के पास कानून की और अधिकारियों के सामने कानून भंग की अनदेखी करने के अलावा कोई चारा शेष न रहेगा। यह स्थिति विधि और शांति पूर्ण व्यवस्था की संकल्पना और क्रियान्वयन दोनों दृष्टियों से घातक होगी।
इस निर्णय का एक पक्ष और भी है। निर्धारित ऊँचाई की मटकी फोड़ने के प्रयास में मौत न होगी क्या न्यायालय इससे संतुष्ट है? यदि मौत होगी तो कौन जवाबदेह होगा? मौत का कारण सिर्फ ऊँचाई कैसे हो सकती है। अपेक्षाकृत कम ऊँचाई की मटकी फोड़ने के प्रयास में दुर्घटना और अधिक ऊँचाई की मटकी बिना दुर्घटना फोड़ने के से स्पष्ट है की दुर्घटना का कारण ऊँचाई नहीं फोडनेवालों की दक्षता, कुशलता और निपुणता में कमी होती है। मटकी फोड़ने संबंधी दुर्घटनाएँ न हों, कम से कम हों, कम गंभीर हों तथा दुर्घटना होने पर न्यूनतम हानि हो इसके लिए भिन्न आदेशों और व्यवस्थाओं की आवश्यकता है -
१. मटकी स्थापना हेतु इच्छुक समिति निकट रहवासी नागरिकों की लिखित सहमति सहित आवेदन देकर स्थानीय प्रशासनिक अधिकारी से अनुमति ले और उसकी लिखित सूचना थाना, अस्पताल, लोक निर्माण विभाग, बिजली विभाग व नगर निगम को देना अनिवार्य हो।
२. मटकी की ऊँचाई समीपस्थ भवनों की ऊँचाई, विद्युत् तारों की ऊँचाई, होर्डिंग्स की स्थिति, अस्पताल जैसे संवेदनशील और शांत स्थलों से दूरी आदि देखकर प्रशासनिक अधिकारियों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों की समिति तय करे।
३. तय की गयी ऊँचाई के परिप्रेक्ष्य में अग्नि, विद्युत्, वर्षा, तूफ़ान, भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं तथा गिरने की संभावना का पूर्वाकलन कर अग्निशमन यन्त्र, विद्युत् कर्मचारी, श्रमिक, चिकित्साकर्मी आदि की सम्यक और समुचित व्यवस्था हो अथवा व्यवस्थाओं के अनुसार ऊँचाई निर्धारित हो।
४. इन व्यवस्थों को करने में समितियों का भी सहयोग लिया जाए। उन्हें मटकी स्थापना-व्यवस्था पर आ रहे खर्च की आंशिक पूर्ति हेतु भी नियम बनाया जा सकता है। ऐसे नियम हर धर्म, हर सम्प्रदाय, हर पर्व, हर आयोजन के लिये सामान्यत: सामान होने चाहिए ताकि किसी को भेदभाव की शिकायत न हो।
५. ऐसे आयोजनों का बीमा काबरा सामियितों का दायित्व हो ताकि मानवीय नियंत्रण के बाहर दुर्घटना होने पर हताहतों की क्षतिपूर्ति की जा सके।
प्रकरण में उक्त या अन्य तरह के निर्देश देकर न्यायालय अपनी गरिमा, नागरिकों की प्राणरक्षा तथा सामाजिक, धार्मिक, प्रशासनिक व्यावहारिकताओं के प्रति संवेदनशील हो सकता था किन्तु वह विफल रहा। यह वास्तव में चिता और चिंतन का विषय है।
समाचार है कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की अवहेलना कर सार्वजनिक रूप से मुम्बई में ४४ फुट ऊँची मटकी बाँधी और फोड़ी गयी। ऐसा अन्य अनेक जगहों पर हुआ होगा और हर वर्ष होगा। पुलिस को नेताओं का संरक्षण करने से फुरसत नहीं है। वह ग़ंभीऱ आपराधिक प्रकरणों की जाँच तो कर नहीं पाती फिर ऐसे प्रकरणों में कोई कार्यवाही कर सके यह संभव नहीं दिखता। इससे आम जान को प्रताड़ना और रिश्वत का शिकार होना होगा। अपवाद स्वरूप कोई मामला न्यायालय में पहुँच भी जाए तो फैसला होने तक किशोर अपराधी वृद्ध हो चुका होगा। अपराधी फिल्म अभिनेता, नेता पुत्र या महिला हुई तब तो उसका छूटना तय है। इस तरह के अनावश्यक और विवादस्पद निर्णय देकर अपनी अवमानना कराने का शौक़ीन न्यायालय आम आदमी में निर्णयों की अवहेलना करने की आदत डाल रहा है जो घातक सिद्ध होगी। बेहतर हो न्यायालय यह निर्णय वापिस ले ले। 
*** 
लेखक संपर्क- आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', २०४ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१, salil.sanjiv@gmail.com, ९४२५१८३२४४ 
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शिव दोहावली

शिव पूजे वह जिसे हो,
शिवता पर विश्वास।
शिवा ने शिव से भिन्न हैं,
यह भी हो आभास।।
*
सत् के प्रति श्रद्धा रखे,
सुंदर जगत-प्रवास।
साथी प्रति विश्वास से,
हो आवास सुवास।।
*
ऋषियों! क्यों विचलित हुए?
डिगा भरोसा दीन।
तप अपना ही भंगकर,
आप हो गए दीन।।
*
संबल हैं जो साध्वियां,
उन पर कर संदेह।
नींव तुम्हीं ने हिला दी,
बचे किस तरह गेह?
*
सप्त सिंधु सी भावना,
नेह-नर्मदा नीर।
दर्शन से भी सुख मिले,
नहा, पिएं मतिधीर।।
*
क्षार घुले संदेह का,
नेह-नीर बेकाम।
देह पिए तो गरल हो,
तजें विधाता वाम।।
*
ऋषि शिव, साध्वी हों शिवा,
रख श्रद्धा-विश्वास।
देह न, आत्मा को वरें,
गृह हरि-रमा निवास।।
*
विधि से प्राप्त प्रवृत्ति जो,
वह निवृत्ति-पर्याय।
हरि दोनों का समन्वय,
जग-जीवन समवाय।।
*
शिव निवृत्ति की राह पर,
हैं प्रवृत्ति की चाह।
वर्तुलवत बह चेतना,
दहा सके हर दाह।।
*
आदि-अंत जिसका नहीं,
सब हैं उसके अंश।
अंश-अंश से मिल बढ़े,
कहे उसे निज वंश।।
*
निज-पर कुछ होता नहीं,
सब जाता है छूट।
लूट-पाट अज्ञान है,
नाता एक अटूट।
*
नाता ताना जब गया,
तब टूटे हो शोक।
नाता हो अक्षुण्ण तो,
जीवन रहे अशोक।।
*
योनि-लिंग के निकट जा,
योनि-लिंग को भूल।
बन जाओ संजीव सब,
बसो साधना-कूल।।
***
३०.१.२०१८, जबलपुर

रविवार, 28 जनवरी 2018

शिव दोहावली

शिव कहते विश्वास ही,
जग-जीवन का सार।
नष्ट हुआ विश्वास तो,
निर्बल है आधार।।
*
सब पाने की वृत्ति ही,
बन जाती है लोभ।
नहीं लोभ का अंत है,
शेष रहे बस क्षोभ।।
जो पाया उससे अधिक,
अच्छा पा-लें भोग।
यह प्रवृत्ति ही साध्वियों!,
अंतर्मन का रोग।।
*
देख दिगंबर युवा को,
प्रगटा छिपा विकार।
साथी-प्रति श्रद्धा अटल,
एकमात्र उपचार।।
*
साथी का विश्वास मत,
करें कभी भी भंग।
सच्चा शिव-पूजन यही,
श्रद्धा रहे अभंग।।
*
मन से जिसको वर दिया,
एक वही है इष्ट।
अन्य उत्तमोतम अगर,
चाहें- करें अनिष्ट।।
*
काम जीवनाधार है,
काम न हो व्यापार।
भोग सकें निष्काम हो,
तभी साध्य स्वीकार।।
*
काम न हेय, न त्याज्य है,
काम सृष्टि का मूल।
संयम से अमृत बने,
शशि सिर पर मत भूल।।
*
अति वर्जित सर्वत्र ही,
विष हो अतिशय काम।
रोक कण्ठ में लें पचा,
शांत चित्त मन-थाम।।
*
सर्प नहीं संदेह का,
डंस पाए दें ध्यान।
साथी पर विश्वास रख,
दें-पा श्रद्धा-मान।।
*
विनत साध्वियों ने किया,
ग्रहण विमल शिव तत्व।
श्रद्धायुत विश्वास ही,
श्वास-आस का सत्व।।
*
२९.१.२०१८, जबलपुर

शनिवार, 27 जनवरी 2018

शिव दोहावली

शिव ने शक का सर्प ले,
किया सहज विश्वास।
कण्ठ सजाया, धन्यता
करे सर्प आभास।
*
द्वैत तजें, अद्वैत वर,
तो रखिए विश्वास।
शिव-संदेश न भूलिए,
मिटे तभी संत्रास।।
*
नारी पर श्रद्धा रखें,
वही जीवनाधार।
नर पर हो विश्वास तो,
जीवन सुख-आगार।।
*
तीन मेखला तीन गुण,
सत्-शिव-सुंदर देख।
सत्-चित्-आनंद साध्य तब,
धर्म-मर्म कर लेख।।
*
उदय-लय-विलय तीन ही,
क्रिया सृष्टि में व्याप्त।
लिंग-वेदिका पूजिए,
परम सत्य हो आप्त।।
*
निराकार हो तरंगित,
बनता कण निर्भार।
भार गहे साकार हो,
चले सृष्टि-व्यापार।।
*
काम-क्रोध सह लोभ हैं,
तीन दोष अनिवार्य।
संयम-नियम-अपरिग्रह,
हैं त्रिशूल स्वीकार्य।।
*
आप-आपके-गैर में,
श्रेष्ठ न करते भेद।
हो त्रिनेत्र सम देखिए,
अंत न पाएं खेद।।
*
त्रै विकार का संतुलन,
सकल सृष्टि-आधार।
निर्विकार ही मुक्त है,
सत्य क्रिया-व्यापार।।
*
जब न सत्य हो साथ तो,
होता संग असत्य।
छलती कुमति कुतर्क रच,
कहे सुमति तज कृत्य।।
*
नग्न सत्य को कर सके,
जो मन अंगीकार।
उसका तन न विवश ढहे,
हो शुचिता-आगार।।
*
२७.१.२०१८, जबलपुर

शुक्रवार, 26 जनवरी 2018

शिव दोहावली

शिव दिक्-अंबर ओढ़कर,
घूम रहे निर्द्वंद।
घेरे हैं ऋषि-पत्नियां,
मन में अंतर्द्वंद।।
*
काश पा सकें संग तो,
पूरी हो हर आस।
शिव मुस्काते मौन रह,
मोह बना संत्रास।।
*
ऋषिगण ईर्ष्या-वश जले,
मिटा आत्म-संतोष।
मोह-कामवश पत्नियां,
बनीं लोभ का कोष।।
*
क्रोध-द्वेष-कामाग्निवश
हुए सभी संत्रस्त।
गंवा शांति-विश्वास सब,
निष्प्रभ ज्यों रवि अस्त।।
*
देख, न शिव को देखते,
रहे लिंग ही देख।
शिव से अंग अलग करें,
काल रहा हंस देख।।
*
मारो-छोड़ो वृत्तियां,
करा रहीं संघर्ष।
तत्व-ज्ञान विस्मृत हुआ,
आध्यात्मिक अपकर्ष।।
*
विधि-हरि से की प्रार्थना,
'देव! मिटाओ क्लेश।
राह दिखाओ शांति हो,
माया रहे न लेश।।
*
आत्मबोध पा ध्यान में,
लौटे शिव के पास।
हारे हम, शक-सर्प ही,
स्वीकारें उपहार।।
*
अवढरदानी दिगंबर,
हंसे ठठाकर खूब।
तत्क्षण सब अवसाद खो,
गए हर्ष में डूब।।
*
शिव-अनुकंपा से मिला,
सत्य सनातन ज्ञान।
प्रवृति मार्ग साधन सहज,
निवृति साध्य संधान।।
*
श्रेष्ठ न लिंग, न योनि है
हीन, नहीं असमान।
नर-नारी पूरक, न कर
शक, दे-पा सम मान।।
*
रहे प्रतिष्ठा परस्पर,
वरें राह अद्वैत।
पूजक-पूजित परस्पर,
बनें भुलाकर द्वैत।।
*
जग-जीवन-आधार जो,
करें उसी की भक्ति।
योनि-रूप सह वेदिका,
लिंग पूज लें शक्ति।।
*
बिंदु-सिंधु का समन्वय,
कर प्रवृत्ति है धन्य।
वीतराग समभाव से,
देख अलिप्त अनन्य।।
*
ऋषभदेव शिव दिगंबर,
इंद्रियजित हो इष्ट।
पुजें वेदिका-खंभवत,
हर भरते हर कष्ट।।
*
२६.१.२०१८, जबलपुर

गुरुवार, 25 जनवरी 2018

कार्यशाला: लता यादव - संजीव

कार्यशाला:
एक कविता - दो कवि
*
लता यादव
मैं क्या जानूं बड़ी बड़ी गहरी बातों को मैं क्या जानूं मन में उठते जज्बातों को
लहर संग मैं उठती गिरती लहर सदृश ही चाँद पकड़ने निकली पूनम की रातों को
कभी लगे अम्बर में खेले कोई छौना
कभी लगे ये तो है मेरा स्वप्न सलोना
अरे! याद आया बाबा ने दिलवाया जो
अम्बर के हाथों में मेरा वही खिलौना
संजीव
चंदा कूद पड़ा नभ से सरवर में आया
पकड़ा हाथों में, गुम होकर मुझे छकाया
मैं नटखट, वह चंचल कोई हार न माने
रूठ चंद्रिका गयी, गया वह उसे मनाने
हुई अमावस काली मन को तनिक न भाए
बादल जाकर मेरा चंदा फिर ले आए
अब न चंद्रिका से मैं झगड़ा कभी करूँगी
स्नेह सलिल तट लता बनूँगी, खूब खिलूँगी
लता
हौले से जो लहर उठी नभ से टकराई
चंदा की कोई युक्ति फिर काम न आई
संजीव
झिलमिल-झिलमिल बहा नीर ज्यों चाँदी पिघली
हाथ न आई, झट से फिसल गयी फिर मछली
***

muktika

मुक्तिका
घर में आग
*
घर में आग लगानेवाला, आज मिल गया है बिन खोजे.
खुद को खुदी मिटानेवाला, हाय! मिल गया है बिन खोजे.
*
जयचंदों की गही विरासत, क्षत्रिय शकुनी दुर्योधन भी
बच्चों को धमकानेवाला, हाथ मिल गया है बिन खोजे.
*
'गोली' बना नारियाँ लूटीं, किसने यह भी तनिक बताओ?
निज मुँह कालिख मलनेवाला, वीर मिल गया है बिन खोजे.
*
सूर्य किरण से दूर रखा था, किसने शत-शत ललनाओं को?
पूछ रहे हैं किले पुराने, वक्त मिल गया है बिन खोजे.
*
मार मरों को वीर बन रहे, किंतु सत्य को पचा न पाते
अपने मुँह जो बनता मिट्ठू, मियाँ मिल गया है बिन खोजे.
*
सत्ता बाँट रही जन-जन को, जातिवाद का प्रेत पालकर
छद्म श्रेष्ठता प्रगट मूढ़ता, आज मिल गया है बिन खोजे.
*
अब तक दिखता जहाँ ढोल था, वहीं पोल सब देख हँस रहे
कायर से भी ज्यादा कायर, वीर मिल गया है बिन खोजे.
***
२५.१.२०१८

navgeet

नवगीत:
कागतन्त्र है 
*
कागतन्त्र है
काँव-काँव
करना ही होगा
नहीं किया तो मरना होगा
.
गिद्ध दिखाते आँख
छीछड़े खा फ़ैलाते हैं.
गर्दभ पंचम सुर में,
राग भैरवी गाते हैं.
जय क्षत्रिय की कह-कहकर,
दंगा आप कराते हैं.
हुए नहीं  सहमत जो
उनको व्यर्थ डराते हैं
नाग तंत्र के
दाँव-पेंच,
बचना ही होगा,
नहीं बचे तो मरना होगा.
.
इस सीमा से आतंकी
जब मन घुस आते हैं.
उस सरहद पर डटे
पड़ोसी सड़क बनाते हैं.
ब्रम्ह्पुत्र के निर्मल जल में
गंद मिलाते हैं.
ये हारें तो भी अपनी
सरकार बनाते हैं.
स्वार्थ तंत्र है
जन-गण को
जगना ही होगा
नहीं जगे तो मरना होगा.
.
नए साल में नए तरीके
हम अपनाएँगे.
बाँटें-तोड़ें, बेच-खरीदें
सत्ता पाएँगे.
हुआ असहमत जो उसका
जीना मुश्किल कर दें
सौ बंदर मिल, घेर शेर को,
हम घुड़काएँगे.
फ़ूट मंत्र है
एक साथ
मिलना ही होगा
नहीं मिले  तो मरना होगा.
.
३१. १२. २०१७ 

दोहा दुनिया

शिव अविकारी मूल हैं,
विधि-हर हैं निर्मूल।
सत-रज-तम से विभूषित,
शिव के साथ त्रिशूल।।
*
सृष्टि-मूल खुद को समझ,
विधि-हरि करें विवाद।
शिव दोनों को शांत कर,
बन जाते संवाद।।
*
विधि-बुधि रचते सृष्टि सब,
मन में उठे विकार।
मैं स्वामी सबसे सबल,
करें सभी स्वीकार।।
*
रमा-विष्णु पालें जगत,
मानें खुद को ज्येष्ठ।
अहम-वहम हावी हुआ,
'मैं' है 'तू' से श्रेष्ठ।।
*
विधि सोचें वे जनक हैं,
हरि आत्मज हैं हीन।
हरि सोचें वे पालते,
पलते ब्रम्हा दीन।।
*
दोनों के संघर्ष का,
मूल 'अहम्' का भाव।
रजस तमस में ढल गया,
सत् का हुआ अभाव।।
*
सकल सृष्टि कंपित हुई,
कैसे करें निभाव?
कौन बनाए संतुलन,
हर कर बुरे प्रभाव??
*
हर ने फेंका केतकी,
पुष्प किया संकेत।
तुम दोनों से भिन्न है,
तत्व एक अनिकेत।।
*
वाद-विवाद न मिट सका,
रही फैलती भ्रांति।
ज्योति लिंग हरने तिमिर,
प्रगटा हो चिर शांति।।
*
विधि ऊपर को उड़ चले,
नापें अंतिम छोर।
हरि नीचे की ओर जा,
लौटे मिली न कोर।।
*
विधि ने छल कर कह दिया,
मैं आया हूं नाप।
हरि ने मानी पराजय,
अस्त गया ज्यों व्याप।।
*
त्यों ही शिव ने हो प्रगट,
व्यक्त कर दिया सत्य।
ब्रम्हा जी लज्जित हुए,
स्वीकारा दुष्कृत्य।।
*
पंच तत्व पचमुखी के,
एक हो गया दूर।
सलिल शीश शिव ने धरा,
झूठ हो गया चूर।।
*
मिथ्या साक्षी केतकी,
दें खो बैठी गंध।
पूजा योग्य नहीं रही,
सज्जा करें अगंध।।
*
विधि-पूजन सीमित हुआ,
सत् नारायण मान्य।
शिव न असत् को सह सकें,
इसीलिए सम्मान्य।।
*
२०.१.२०१८, जबलपुर

नवगीत महोत्सव - २०१५ का सफल आयोजन

लखनऊ,  २१ तथा २२ नवम्बर २०१५ को, अभिव्यक्ति विश्वम द्वारा गोमती नगर में स्थित कालिन्दी विला की दसवीं मंजिल पर नवगीत-महोत्सव का सफल आयोजन किया गया। नवगीत को केन्द्र में रखकर आयोजित होने वाला यह उत्सव सुरुचि, सादगी और वैचारिक संपन्नता के लिये जाना जाता है। नवगीत  की पाठशाला के नाम से वेब पर नवगीतों के विकास में संलग्न अभिव्यक्ति विश्वम द्वारा आयोजित शृंखला का यह पाँचवाँ कार्यक्रम था।


नवगीत समारोह का शुभारम्भ दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। गीतिका वेदिका द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वन्दना के उपरान्त पूर्णिमा वर्मन की माता जी श्रीमती सरोजप्रभा वर्मन और नवगीत समारोह के सदस्य श्रीकान्त मिश्र कान्त को विनम्र श्रद्धांजलि देकर उनकी स्मृतिशेष को नमन किया गया। विभिन्न नवगीतों पर रोहित रूसिया, विजेन्द्र विज, अमित कल्ला और पूर्णिमा वर्मन द्वारा बनायी गयी नवगीतों पर आधारित पोस्टर प्रदर्शनी को सभी ने देखा और सराहा।  

प्रथम सत्र में नवगीत की पाठशाला से जुड़े नये रचनाकारों द्वारा अपने दो दो नवगीत प्रस्तुत किये गये। नवगीत पढ़ने के बाद प्रत्येक के नवगीत पर वरिष्ठ नवगीतकारों द्वारा टिप्पणी की गई इससे नये रचनाकारों को अपनी रचनाओं को समझने और उनमें यथोचित सुधार का अवसर मिलता है। गीतिका वेदिका के नवगीतों पर रामकिशोर दाहिया ने टिप्पणी की, शुभम श्रीवास्तव ओम के नवगीतों पर संजीव वर्मा सलिल ने अपनी टिप्पणी की, रावेन्द्र कुमार रवि के नवगीतों पर राधेश्याम बंधु द्वारा टिप्पणि की गई, इसी प्रकार रंजना गुप्ता, आभा खरे, भावना तिवारी और शीला पाण्डेय के नवगीतों पर क्रमशः डा० रणजीत पटेल, गणेश गम्भीर, मधुकर अष्ठाना एवं राधेश्याम बंधु द्वारा टिप्पणी की गई।

इस मध्य कुछ अन्य प्रश्न भी नये रचनाकारों से श्रोताओं द्वारा पूछे गये जिनका उत्तर वरिष्ठ रचनाकारों द्वारा दिया गया। प्रथम सत्र के अन्त में डा० रामसनेही लाल शर्मा यायावर ने नवगीत की रचना प्रक्रिया पर विहंगम दृष्टि डालते हुये बताया कि ऐसा क्या है जो नवगीत को गीत से अलग करता है। डा० यायावर ने अपनी नवगीत कोश योजना की भी जानकारी देते हुए बताया कि वे विश्व विद्यालय अनुदान आयोग की अति महत्त्वपूर्ण योजना के अन्तर्गत नवगीत कोश का कार्य शुरू करने जा रहे हैं जो लगभग एक वर्ष में पूरा हो जाएगा।

दूसरे सत्र में वरिष्ठ नवगीतकारों द्वारा अपने प्रतिनिधि नवगीतों का पाठ किया गया ताकि नये रचनाकार नवगीतों के कथ्य, लय, प्रवाह, छन्द आदि को समझ सकें। नवगीत पाठ के बाद सभी को प्रश्न पूछने की पूरी छूट दी गई जिसका लाभ नवगीतकारों ने उठाया। इस सत्र में सर्व श्री योगेन्द्र दत्त शर्मा [गाजियाबाद, उ.प्र.], डा० विनोद निगम [होशंगाबाद, म.प्र.], राधेश्याम बंधु [दिल्ली], गणेश गम्भीर [मिर्जापुर, उ.प्र.], डा० भारतेन्दु मिश्र [दिल्ली], रामकिशोर दाहिया [कटनी, म. प्र.], डा० मालिनी गौतम [संतनगर, गुजरात], डा० रणजीत पटेल [मुजफ्फरपुर, बिहार], वेदप्रकाश शर्मा [गाजियाबाद, उ.प्र.], डा० रामसनेहीलाल शर्मा यायावर [फीरोजाबाद], मधुकर अष्ठाना [लखनऊ] ने अपने प्रतिनिधि नवगीतों का पाठ किया।

तीसरे सत्र में सम्राट राजकुमार के निर्देशन में विभिन्न कलाकारों ने नवगीतों की संगीतमयी प्रस्तुति की। गिटार पर स्वयं सम्राट राजकुमार, तबले पर सिद्धांत सिंह, की बोर्ड पर मयंक सिंह और ढोलक पर अरुण मिश्रा ने संगत की। कार्यक्रम का आरंभ आशीष और सौम्या की गणेशवंदना से हुआ। गीतिका वेदिका, श्रुति जायसवाल एवं अन्य कलाकारों द्वारा नवगीतों पर आधारित नाटक प्रस्तुत किया गया। संगीत के कार्यक्रम में प्रतिमा योगी के स्वर में तारादत्त निर्विरोध का गीत 'धूप की चिरैया' बहुत ही कर्णप्रिय रहा।  पूर्णिमा वर्मन के गीत चोंच में आकाश और मंदिर दियना बार को क्रमशः ममता जायसवाल और मयंक सिंह ने स्वर दिया। रोहित रूसिया के स्वर में नईम का गीत चिट्ठी-पत्री और स्वयं उनका गीत 'उड़ गई रे' भी बहुत पसंद किया गया। रोहित रूसिया ने अपनी विशिष्ट सरस शैली में गायन से यह सिद्ध कर दिया कि नवगीतों की प्रस्तुति कितनी मनमोहक और प्रभावशाली हो सकती है। कार्यक्रम का विशेष आकर्षण सुवर्णा दीक्षित द्वारा नरेन्द्र शर्मा के गीत नाच रे मयूरा पर आधारित कत्थक नृत्य रहा। नवगीत पर आधारित कत्थक का यह संभवतः पहला प्रयोग था।  इसके बाद अमित कल्ला तथा विजेन्द्र विज़ द्वारा निर्मित नवगीतों पर आधारित लघु फिल्में भी दिखायी गईं। 

दूसरे दिन का पहला और कार्यक्रम का चौथा सत्र अकादमिक शोधपत्रों के वाचन का था। पहला शोधपत्र कल्पना रामानी ने पढ़ा। यह शोधपत्र कुमार रवीन्द्र के नवगीत संग्रह 'पंख बिखरे रेत पर' के विषय में था। शीर्षक था '' 'पंख बिखरे रेत पर' में धूप की विभिन्न छवियाँ''। दूसरा शोध पत्र शशि पुरवार द्वारा निर्मल शुक्ल के नवगीत संग्रह "एक और अरण्यकाल" पर तैयार किया गया था। शीर्षक था ''मुहावरों का मुक्तांगन 'एक और अरण्यकाल' ''। दोनो आलेख सरस, रोचक और भरपूर परिश्रम के साथ लिखे हुए मालूम होते थे। इन दोनों शोधपत्रों को भरपूर सराहा गया। अन्त में गुजरात विद्यापीठ से पधारी विदुषी, गुजराती भाषा एवं साहित्य विभाग की विभागाध्यक्ष डा० उषा उपाध्याय ने "वर्ष २००० के बाद गुजराती गीतों की वैचारिक पृष्ठभूमि" पर लम्बा व्याख्यान प्रस्तुत किया जो बहुत प्रभावशाली रहा। डा० उषा उपाध्याय ने गुजराती गीतों के विविध अंशों को उदाहरण के रूप में रखकर बताया कि किस प्रकार गुजरात के ''सांप्रत गीतों'' (समकालीन गीत) की संवेदना नवगीत के निकट है।

पाँचवा सत्र २०१४ में प्रकाशित नवगीत संग्रहों की समीक्षा पर केन्द्रित सत्र रहा। इस सत्र का उद्देश्य साल भर में प्रकाशित नवगीत संग्रहों-संकलनों का लेखा जोखा करना तथा उपस्थित श्रोताओं में उनका परिचय प्रस्तुत करना होता है। साथ ही इसमें नवगीत संग्रहों का लोकार्पण भी होता है। डॉ. जगदीश व्योम द्वारा संचालित सत्र में उन २४ नवगीत संग्रहों का उल्लेख किया जिनका प्रकाशन २०१४ में हुआ था इसके बाद रजनी मोरवाल के नवगीत संग्रह "अँजुरी भर प्रीति" पर कुमार रवीन्द्र की लिखी गई भूमिका को ब्रजेश नीरज ने प्रस्तुत किया। जयकृष्ण राय तुषार के नवगीत संग्रह "सदी को सुन रहा हूँ मैं" पर शशि पुरवार ने समीक्षा प्रस्तुत की, अश्वघोष के नवगीत संग्रह "गौरैया का घर खोया है" तथा राघवेन्द्र तिवारी के नवगीत संग्रह "जहाँ दरक कर गिरा समय भी" पर डा० जगदीश व्योम ने समीक्षा प्रस्तुत की, रामशंकर वर्मा के नवगीत संग्रह "चार दिन फागुन के" पर मधुकर अष्ठाना ने समीक्षा प्रस्तुत की, रामकिशोर दाहिया के नवगीत संग्रह "अल्लाखोह मची" पर संजीव वर्मा सलिल द्वारा तथा विनय मिश्र के नवगीत संग्रह "समय की आँख नम है" पर मालिनी गौतम द्वारा समीक्षा प्रस्तुत की गई। इस सत्र में चार नवगीत संग्रहों- "अल्लाखोह मची"- रामकिशोर दाहिया, "झील अनबुझी प्यास की" - डा० रामसनेही लाल शर्मा यायावर, "चार दिन फागुन के" - रामशंकर वर्मा तथा "कागज की नाव" - राजेन्द्र वर्मा, का लोकार्पण किया गया। सत्र के बाद सभी का सामूहिक चित्र लिया गया।

छठे सत्र में नवगीतकारों को अभिव्यक्ति विश्वम् के नवांकुर पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह पुरस्कार प्रतिवर्ष उस रचनाकार के पहले नवगीत-संग्रह की पांडुलिपि को दिया जाता है, जिसने अनुभूति और नवगीत की पाठशाला से जुड़कर नवगीत के अंतरराष्ट्रीय विकास की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हो। पुरस्कार में ११,००० भारतीय रुपये, एक स्मृति चिह्न और प्रमाणपत्र प्रदान किये जाते हैं। आयोजन में २०१५ का नवांकुर पुरस्कार संजीव वर्मा सलिल को तथा २०१४  का नवांकुर पुरस्कार ओमप्रकाश तिवारी को प्रदान किया गया। ओम प्रकाश तिवारी ने अनुपस्थित रहने के कारण यह पुरस्कार एक सप्ताह बाद ग्रहण किया जबकि कल्पना रामानी ने पिछले साल अनुपस्थित रहने के कारण २०१२ का स्मृति चिह्न एवं प्रशस्ति पत्र इस वर्ष ग्रहण किया।

पुरस्कार वितरण के बाद कवित सम्मेलन सत्र की विशिष्ट अतिथि डॉ. उषा उपाध्याय ने अपने गुजराती गीतों के हिंदी अनुवाद के साथ साथ एक मूल रचना का भी पाठ किया। गीत की लय कथ्य ने सभी उपस्थित रचनाकारों को आनंदित किया। इसके बाद सभी उपस्थित रचनाकारों ने अपने एक एक नवगीत का पाठ किया। इस अवसर पर उपस्थित प्रमुख रचनाकार थे- लखनऊ से संध्या सिंह, आभा खरे, राजेन्द्र वर्मा, डंडा लखनवी, डॉ. प्रदीप शुक्ल, रंजना गुप्ता, चन्द्रभाल सुकुमार, राजेन्द्रशुक्ल राज, अशोक शर्मा, डॉ. अनिल मिश्र, निर्मल शुक्ल, महेन्द्र भीष्म, मधुकर अष्ठाना और रामशंकर वर्मा, कानपुर से मधु प्रधान और शरद सक्सेना, छिंदवाड़ा से रोहित रूसिया और सुवर्णा दीक्षित, मीरजापुर से शुभम श्रीवास्तव ओम और गणेश गंभीर, बिजनौर से अमन चाँदुपुरी, दिल्ली से भारतेन्दु मिश्र और राधेश्याम बंधु, नॉयडा से डॉ जगदीश व्योम और भावना तिवारी, संतनगर गुजरात से मालिनी गौतम, गाजियाबाद से वेदप्रकाश शर्मा वेद और योगेन्द्रदत्त शर्मा, वर्धा से शशि पुरवार, मुंबई से कल्पना रामानी, कटनी से रामकिशोर दाहिया, खटीमा से रावेंद्रकुमार रवि, जबलपुर से संजीव वर्मा सलिल, इंदौर से गीतिका वेदिका, फीरोजाबाद से डॉ. राम सनेहीलाल शर्मा यायावर, मुजफ्फरपुर से डॉ. रणजीत पटेल, शारजाह से पूर्णिमा वर्मन, होशंगाबाद से डॉ विनोद निगम आदि। विभिन्न सत्रों का संचालन डा० जगदीश व्योम तथा रोहित रूसिया ने किया। अन्त में पूर्णिमा वर्मन तथा प्रवीण सक्सेना ने सभी के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया।

शिव दोहा

शिव निवृत्ति-पथ पथिक थे,
ऋषि-पत्नियां विमुग्ध।
ऋषिगण श्यामल नग्न नर,
देख हो रहे दग्ध।
*
कुपित पत्नियों प्रति हुए,
शीश चढ़ा क्यों काम?
दंडित हो यति दिगंबर,
विधि न हो सकें वाम।।
*
मर्यादा मर्दित न हो,
दंडित हो अवधूत।
भंग नहीं विश्वास हो,
रिश्ते-नाते पूत।।
*
शिव अभीत मुस्का रहे,
ऋषिगण कुपित न राह।
नीललोहिती लिंग-च्युत'
हो- न सके सत्-दाह।।
*
ऋषि-पत्नियां सचेत हो,
थीं अति लज्जित मौन।
दोष न है यति का तनिक,
किंतु बताएं कौन?
*
मन में दबा विकार जो,
कर उद्घाटित-नष्ट।
योगी ने उपचार कर,
मेटा गर्व-अनिष्ट।।
*
हम निज वश में थी नहीं,
कर सकता था भोग।
किंतु न अवसर-लाभ ले,
रहा साधता योग।।
*
निरपराध को दण्ड से,
लगे अपरिमित पाप।
ऋषि-तप व्यर्थ न नष्ट हो,
साहस उपजा आप।।
*
ऋषिगण! सच जाने बिना,
दें न दण्ड या शाप।
दोषी हैं हम साध्वियां,
झेल न पाईं ताप।।
*
कृत्रिम संयम जी रहीं,
मन-उपजा अभिमान।
मिटा दिया युव तपी ने,
करा देह का भान।।
*
अब तक है निष्पाप तन,
मन को कर निष्पाप।
करा सत्य साक्षात यह,
यति है शिव ही आप।।
*
जो मन-चाहे दण्ड दें,
हमको मान्य सहर्ष।
जीवन हिल-मिलकर जिएं,
हो तब ही उत्कर्ष।।
*
यह यति पावन-पूज्य है,
यदि पाएगा दण्ड।
निरपराध-वध पाप का,
होगा पाप प्रचण्ड।
*
क्रमशः
२५.१.२०१८

बुधवार, 24 जनवरी 2018

narmada namavali acharya sanjiv salil

 
नर्मदा नामावली :

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
सनातन सलिला नर्मदा की नामावली का नित्य स्नानोपरांत जाप करने से भव-बाधा  दूर होकर पाप-ताप शांत होते हैं। मैया अपनी संतानों के मनोकामना पूर्ण करती हैं। 

पुण्यतोया सदानीरा नर्मदा, शैलजा गिरिजा अनिंद्या वर्मदा।
शैलपुत्री सोमतनया निर्मला, अमरकंटी शाम्भवी शुभ शर्मदा।।

आदिकन्या चिरकुमारी पावनी, जलधिगामिनी चित्रकूटा पद्मजा।
विमलहृदया क्षमादात्री कौतुकी, कमलनयना जगज्जननी हर्म्यदा।।

शशिसुता रुद्रा विनोदिनी नीरजा, मक्रवाहिनी ह्लादिनी सौन्दर्यदा।
शारदा वरदा सुफलदा अन्नदा, नेत्रवर्धिनी पापहारिणी धर्मदा।।

सिन्धु सीता गौतमी सोमात्मजा, रूपदा सौदामिनी सुख सौख्यदा।
शिखरिणी नेत्रा तरंगिणी  मेखला, नीलवासिनी दिव्यरूपा कर्मदा।।

बालुकावाहिनी दशार्णा रंजना, विपाशा मन्दाकिनी चित्रोत्पला।
रूद्रदेहा अनुसुया पय-अम्बुजा, सप्तगंगा समीरा जय-विजयदा।।

अमृता कलकल निनादिनी निर्भरा, शाम्भवी सोमोद्भवा स्वेदोद्भवा।
चन्दना शिव-आत्मजा सागर-प्रिया, वायुवाहिनी ह्लादिनी आनंददा।।

मुरदला मुरला त्रिकूटा अंजना, नंदना नम्माडियस भाव-मुक्तिदा।
शैलकन्या शैलजायी सुरूपा, विराटा विदशा सुकन्या भूषिता।।

गतिमयी क्षिप्रा शिवा मेकलसुता, मतिमयी मन्मथजयी लावण्यदा।
रतिमयी उन्मादिनी उर्वर शुभा, यतिमयी भवत्यागिनी वैराग्यदा।।

दिव्यरूपा त्यागिनी भयहारिणी, महार्णवा कमला निशंका मोक्षदा।
अम्ब रेवा करभ कालिंदी शुभा, कृपा तमसा शिवज सुरसा मर्मदा।।

तारिणी मनहारिणी नीलोत्पला, क्षमा यमुना मेकला यश-कीर्तिदा।
साधना-संजीवनी सुख-शांतिदा, सलिल-इष्टा माँ भवानी नरमदा।।

*****

शिव दोहावली

शिव हैं शून्य-अनंत भी,
निर्विकार-सविकार।
शिव-पिण्डी का सत् समझ,
कर भवसागर पार।।
*
दारुल वन में ऋषि-मुनि,
बसे सहित परिवार।
काल कल्प वाराह था,
करती उषा विहार।।
*
वन-विचरण कर ला रहे,
कुश फल समिधा संत।
हो प्रवृत्तिकामी करें,
संचय व्यर्थ न तंत।।
*
मार्ग निवृत्ति का दिखाएं,
हर ने किया विचार।
रूप दिगंबर मनोहर,
ले वन-करें विहार।।
*
नील वर्ण, रक्ताभ दृग,
भुज विशाल, सिंह-चाल।
जटा बिखर नर्तन करें,
चंदन चर्चित भाल।।
*
झूल रहे थे कण्ठ में,
नग-रुद्राक्ष अपार।
कामदेव को लजाता,
पुरुष लावण्य निहार।।
*
मुग्ध हुईं ऋषि पत्नियां,
मन में उठा विकार।
काश! पधारे युवा ऋषि,
स्वीकारे सत्कार।।
*
शिव मुस्कराए देखकर,
मिटा न मोह-विका
रहे विचरते निरंतर,
उच्चारें ओंकार।।
*
संयम तज ऋषि पत्नियां,
छूतीं बाहु विशाल।
कुछ संग-संग नर्तन करें,
देख तरुण पग-ताल।।
*
समझ अरुंधति गईं सच,
करती रहीं निषेध।
रुकी नहीं ऋषि पत्नियां,
दिया काम ने वेध।।
*
शिव निस्पृह चुप घूमते,
कब लौटें‌, ऋषि-संत।
समझें ‌सत्य निवृत्ति का,
तजें ‌प्रवृत्ति अतंत।।
*
क्रमशः
२४.१.२०१८, जबलपुर

मंगलवार, 23 जनवरी 2018

navgeet mahotsav lucknow: 2014

नवगीत महोत्सव लखनऊ - २०१४


लखनऊ में नवगीत को केन्द्र में रखकर दो दिवसीय कार्यक्रम १५ तथा १६ नवम्बर २०१४ को गोमती नगर के कालिन्दी विला में स्थित अभिव्यक्ति विश्वम के सभाकक्ष एवं उन्मुक्तांगन में सम्पन्न हुआ। नवगीत की पाठशाला के नाम से वेब पर नवगीत का अनोखे ढँग से प्रचार-प्रसार करने में प्रतिबद्ध अभिव्यक्ति विश्वम द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम की अनेक विशेषताएँ इसे अन्य साहित्यिक कार्यक्रमों से अलग करती हैं।

आयोजन के प्रथम दिन के प्रथम सत्र में देश भर से आमंत्रित कुल आठ नवोदित रचनाकारों के दो-दो नवगीतों का पाठ हुआ। इस सत्र में पवन सिंह, सुवर्णा दीक्षित, विजेन्द्र विज, प्रदीप शुक्ल, सीमा शर्मा, हरि शर्मा, आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' ने अभिव्यक्ति के मंच से पहली बार अपनी रचनाओं का पाठ किया। जिस पर वरिष्ठ नवगीतकारों के एक समूह, जिसके सदस्य कुमार रवीन्द्र, राम सेंगर, धनन्जय सिंह, बृजेश श्रीवास्तव, पंकज परिमल थे, ने अपनी राय रखी। 

इस अवसर पर श्रद्धेय कुमार रवीन्द्र जी ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में नवगीत में नवता को लेकर व्याप्त भ्रम को दूर करते हुए कहा कि शाब्दिकता तथा संप्रेषणीयता के बीच तारतम्यता के न टूटने देने के प्रति आग्रही होना नवगीतकारों का दायित्व है। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्रद्धेय राम सेंगर जी ने नवगीत महोत्सव को उत्सव बताते हुए कहा है कि इस प्रकार की कार्यशालाएं युवा रचनाकारों के रचनात्मक व्यकितत्व के विकास तथा उनमें नवगीत की समझ बढाने में सहायक होंगी। इस सत्र का सफल संचालन जगदीश व्योम जी ने किया। इसी सत्र के दूसरे भाग में लब्धप्रतिष्ठित गीतकार डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र का 'गीत और नवगीत में अंतर' शीर्षक पर व्याख्यान हुआ। आपका कहना था कि नवगीत का प्रादुर्भाव हुआ ही इसलिये था कि एक ओर हिन्दी कविता लगातार दुरूह होती जा रही थी, और दूसरी ओर हिन्दी साहित्य में शब्द-प्रवाह को तिरोहित किया जाना बहुत कठिन था। अतः नवगीत नव-लय-ताल-छंद और कथ्य के साथ सामने आया।

इसके पश्चात नवगीतों पर आधारित ५० पोस्टरों की एक प्रदर्शनी का उद्घाटन लखनऊ ललित कला महाविद्यालय के डीन पांडेय राजीव नयन द्वारा किया गया। उन्होंने भाग लेने वाले कलाकारों- पूर्णिमा वर्मन, रोहित रूसिया अमित कल्ला और विजेन्द्र विज के बनाए पोस्टरों की सराहना की, उन्मु्क्तांगन में रखे हुए कैनवस पर रेखाचित्र बनाया और अपने हस्ताक्षर किये। इसके बाद उपस्थित अतिथियों और रचनाकारों ने उस कैनवस पर अपने हस्ताक्षर किये, जिसे स्मृति चिह्न के रूप में सहेजा गया।

भोजन अवकाश के बाद कार्यक्रम के दूसरे सत्र में देश भर से आये वरिष्ठ नवगीतकारों द्वारा नवगीतों का पाठ हुआ। इस सत्र के प्रमुख आकर्षण रहे - श्रद्धेय कुमार रवीन्द्र, राम सेंगर, अवध बिहारी श्रीवास्तव, राम नारायण रमण, श्याम श्रीवास्तव, ब्रजेश श्रीवास्तव, शीलेन्द्र सिंह चौहान, डॉ मृदुल, राकेश चक्र, जगदीश पंकज, आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', एवं अनिल मिश्रा। कार्यक्रम के अध्यक्ष कुमार रवीन्द्र जी एवं मुख्य अतिथि राम सेंगर जी रहे। मंच संचालन अवनीश सिंह चौहान ने किया।


कार्यक्रम के प्रथम दिवस के तीसरे और अंतिम सत्र सांस्कृतिक संध्या का आयोजन खुले आँगन में किया गया। कार्यक्रम का प्रारंभ आशीष और सौम्या की गणपति वंदना से हुआ। पेड़ छतनार शीर्षक से एक नुक्कड़ नाटक खेला गया जिसे पूर्णिमा वर्मन ने लिखा और अमित कल्ला ने निर्देशित किया था भाग लेने वाले कलाकार थे- पवन प्रताप सिंह, सुवर्णा दीक्षित, रोहित रूसिया, रामशंकर वर्मा, अमित कल्ला तथा सौम्या। इस नाटक में यश मालवीय, कुमार रवीन्द्र, श्याम श्रीवास्तव, पूर्णिमा वर्मन, डॉ राजेन्द्र गौतम, निर्मल शुक्ल, श्याम निर्मम, सुरेन्द्र सुकुमार, कल्पना रामानी, पंकज परिमल, रामशंकर वर्मा, और राधेश्याम बंधु, के नवगीत, नवगीतों के अंश, कुछ पंक्तियाँ या कुछ पद्याशों का प्रयोग किया गया था। 

इसके बाद डॉ. शिव बहादुर भदौरिया के नवगीत "पुरवा जो डोल गई'' पर सृष्टि श्रीवास्तव ने कत्थक नृत्य प्रस्तुत किया। नवगीतों का गायन सम्राट राजकुमार, अमित कल्ला और रोहित रूसिया ने किया। पूरे कार्यक्रम में गिटार पर सम्राट राजकुमार, तबले पर सिद्धांत सिंह और रजत श्रीवास्तव तथा की बोर्ड पर मयंक सिंह ने संगत की। कार्यक्रम का अंत विजेन्द्र विज द्वारा नवगीतों पर बनाई गई छह लघु फिल्मों से हुआ।

दूसरे दिन के पहले सत्र में देश भर से गीति-काव्य के नवगीत विधा के मूर्धन्य विद्वानों ने इस विधा की वैधानिकता तथा इसके शिल्प पर प्रकाश डाला। विधा के विभिन्न विन्दुओं को समेटते हुए गीत और नवगीत में अंतर, नवगीत की दशा और दिशा, इसकी संरचना, इसके रचाव पर चर्चा की। डॉ. जगदीश व्योम ने नयी कविता तथा नवगीत के मध्य के अंतर को रेखांकित किया। रचनाओं के शिल्प में गेयता-लय की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि प्रस्तुतियों में छंदों और लय का अभाव हिन्दी रचनाओं के लिए घातक सिद्ध हुआ। कविताओं के प्रति पाठकों द्वारा अन्यमन्स्कता का मुख्य कारण यही रहा कि कविताओं से गेयता निकल गयी। कवितायें अनावश्यक रूप से बोझिल हो गयीं। 

डॉ. धनन्जय सिंह की उद्घोषणा इन अर्थों में व्यापक रही कि नवगीत संज्ञा नहीं वस्तुतः विशेषण है। आपने कहा कि आजकी मुख्य आवश्यकता शास्त्र की जड़ता मुक्ति है न कि शास्त्र की गति से मुक्ति। डॉ. धनन्जय सिंह के व्याख्यान का शीर्षक ’नवगीत की दशा और दिशा’ था। ’रचना के रचाव तत्त्व’ पर बोलते हुए डॉ. पंकज परिमल ने कहा कि शब्द, तुक, लय, प्रतीक मात्र से रचना नहीं होती, बल्कि रचनाकार को रचाव की प्रक्रिया से भी गुजरना होता है। रचाव के बिना कोई भाव शाब्दिक भले हो जायें, रचना नहीं हो सकते। आपने रचना प्रक्रिया में अंतर्क्रिया तथा अंतर्वर्ण की सोदाहरण व्याख्या की। प्रथम सत्र के आज के अन्य वक्ताओं में डॉ. मधुकर अष्ठाना तथा राम सेंगर प्रमुख थे। द्वितीय दिवस का यह सत्र कार्यशाला के तौर पर आयोजित हुआ था, जिसके अंतर्गत उद्बोधनों के बाद अन्यान्य नवगीतकारों द्वारा पूछे गये प्रश्नों के वक्ताओं ने समुचित उत्तर दिये।

भोजनावकाश के बाद दूसरे सत्र में विभिन्न प्रकाशनों से प्रकाशित कुल छः नवगीत-संग्रहों का लोकार्पण हुआ। जिसके उपरान्त विभिन्न विद्वानों ने समीक्षकीय चर्चा की। रोहित रूसिया के नवगीत-संग्रह ’नदी की धार सी संवेदनाएँ’ पर डॉ. गुलाब सिंह ने समीक्षा की। डॉ. गुलाब सिंह की अनुपस्थिति में उनका वक्तव्य वीनस केसरी ने पढ़कर सुनाया। वरिष्ठ गीतकार डॉ. महेन्द्र भटनागर के नये संग्रह ’दृष्टि और सृष्टि’ पर बृजेश श्रीवास्तव ने समीक्षा प्रस्तुत की। ओमप्रकाश तिवारी के नवगीत-संग्रह ’खिड़कियाँ खोलो’ पर सौरभ पाण्डेय ने समीक्षा प्रस्तुत की। यश मालवीय के संग्रह ’नींद काग़ज़ की तरह’ पर निर्मल शुक्ल ने समीक्षा प्रस्तुत की। तथा, निर्मल शुक्ल के नवगीत-संग्रह ’कुछ भी असंभव’ पर मधुकर अष्ठाना ने समीक्षा प्रस्तुत की। पूर्णिमा वर्मन के नवगीत-संग्रह ’चोंच में आकाश’ पर आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' ने समीक्षा प्रस्तुत की। सभी समीक्षकों ने नवगीत-संगहों भाव तथा शिल्प पक्षों पर खुल कर अपनी बातें कहीं। सत्र का संचालन डॉ. अवनीश सिंह चौहान किया।

तीसरे सत्र में आयोजन की परिपाटी के अनुसार सभी रचनाकारों ने अपनी-अपनी रचनाओं का पाठ किया. इस वर्ष के आमंत्रित कवियों में चेक गणराज्य से पधारे डॉ. ज्देन्येक वग्नेर विशेष कवि रहे। उनके अतिरिक्त इस सत्र में जयराम जय, पंकज परिमल, शैलेन्द्र शर्मा, ब्रजभूषण गौतम, वीरेन्द्र आस्तिक, निर्मल शुक्ल, पूर्णिमा वर्मन, डॉ. जगदीश व्योम, आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', वीनस केसरी, रोहित रूसिया, डॉ. प्रदीप शुक्ला, रामशंकर वर्मा, मधु प्रधान, संध्या सिंह, अवनीश सिंह चौहान, ब्रजेश श्रीवास्तव, कुमार रवीन्द्र, कमलेश भट्ट कमल, शरद सक्सेना, आभा खरे, सौरभ पांडे, चंद्रभाल सुकुमार, अनिल वर्मा आदि ने अपनी रचनाओं का पाठ किया।

नवगीत पाठ के पूर्व अभिव्यक्ति-अनुभूति संस्था की ओर से नवगीत नवांकुर पुरस्कार का वितरण किया गया। अवनीश सिंह चौहान को उनके नवगीत संग्रह ’टुकड़ा काग़ज़ का’ के लिये २०११ का, कल्पना रामानी को उनके नवगीत संग्रह ’हौसलों के पंख’ के लिये २०१२ का तथा रोहित रूसिया को उनके नवगीत संग्रह ’नदी की धार सी संवेदनाएँ’ के लिए २०१३ का नवगीत नवांकुर पुरस्कार दिया गया। विद्वानों द्वारा नवगीत विधा के बहुमुखी विकास की संभावनाओं की अभिव्यक्ति के साथ ही ’नवगीत महोत्सव २०१४’ का समापन हुआ।

navgeet mahotsav lucknow 2015

नवगीत महोत्सव लखनऊ - २०१५ का सफल आयोजन

लखनऊ,  २१ तथा २२ नवम्बर २०१५ को, अभिव्यक्ति विश्वम द्वारा गोमती नगर में स्थित कालिन्दी विला की दसवीं मंजिल पर नवगीत-महोत्सव का सफल आयोजन किया गया। नवगीत को केन्द्र में रखकर आयोजित होने वाला यह उत्सव सुरुचि, सादगी और वैचारिक संपन्नता के लिये जाना जाता है। नवगीत  की पाठशाला के नाम से वेब पर नवगीतों के विकास में संलग्न अभिव्यक्ति विश्वम द्वारा आयोजित शृंखला का यह पाँचवाँ कार्यक्रम था।


नवगीत समारोह का शुभारम्भ दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। गीतिका वेदिका द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वन्दना के उपरान्त पूर्णिमा वर्मन की माता जी श्रीमती सरोजप्रभा वर्मन और नवगीत समारोह के सदस्य श्रीकान्त मिश्र कान्त को विनम्र श्रद्धांजलि देकर उनकी स्मृतिशेष को नमन किया गया। विभिन्न नवगीतों पर रोहित रूसिया, विजेन्द्र विज, अमित कल्ला और पूर्णिमा वर्मन द्वारा बनायी गयी नवगीतों पर आधारित पोस्टर प्रदर्शनी को सभी ने देखा और सराहा।  

प्रथम सत्र में नवगीत की पाठशाला से जुड़े नये रचनाकारों द्वारा अपने दो दो नवगीत प्रस्तुत किये गये। नवगीत पढ़ने के बाद प्रत्येक के नवगीत पर वरिष्ठ नवगीतकारों द्वारा टिप्पणी की गई इससे नये रचनाकारों को अपनी रचनाओं को समझने और उनमें यथोचित सुधार का अवसर मिलता है। गीतिका वेदिका के नवगीतों पर रामकिशोर दाहिया ने टिप्पणी की, शुभम श्रीवास्तव ओम के नवगीतों पर संजीव वर्मा सलिल ने अपनी टिप्पणी की, रावेन्द्र कुमार रवि के नवगीतों पर राधेश्याम बंधु द्वारा टिप्पणि की गई, इसी प्रकार रंजना गुप्ता, आभा खरे, भावना तिवारी और शीला पाण्डेय के नवगीतों पर क्रमशः डा० रणजीत पटेल, गणेश गम्भीर, मधुकर अष्ठाना एवं राधेश्याम बंधु द्वारा टिप्पणी की गई।

इस मध्य कुछ अन्य प्रश्न भी नये रचनाकारों से श्रोताओं द्वारा पूछे गये जिनका उत्तर वरिष्ठ रचनाकारों द्वारा दिया गया। प्रथम सत्र के अन्त में डा० रामसनेही लाल शर्मा यायावर ने नवगीत की रचना प्रक्रिया पर विहंगम दृष्टि डालते हुये बताया कि ऐसा क्या है जो नवगीत को गीत से अलग करता है। डा० यायावर ने अपनी नवगीत कोश योजना की भी जानकारी देते हुए बताया कि वे विश्व विद्यालय अनुदान आयोग की अति महत्त्वपूर्ण योजना के अन्तर्गत नवगीत कोश का कार्य शुरू करने जा रहे हैं जो लगभग एक वर्ष में पूरा हो जाएगा।

दूसरे सत्र में वरिष्ठ नवगीतकारों द्वारा अपने प्रतिनिधि नवगीतों का पाठ किया गया ताकि नये रचनाकार नवगीतों के कथ्य, लय, प्रवाह, छन्द आदि को समझ सकें। नवगीत पाठ के बाद सभी को प्रश्न पूछने की पूरी छूट दी गई जिसका लाभ नवगीतकारों ने उठाया। इस सत्र में सर्व श्री योगेन्द्र दत्त शर्मा [गाजियाबाद, उ.प्र.], डा० विनोद निगम [होशंगाबाद, म.प्र.], राधेश्याम बंधु [दिल्ली], गणेश गम्भीर [मिर्जापुर, उ.प्र.], डा० भारतेन्दु मिश्र [दिल्ली], रामकिशोर दाहिया [कटनी, म. प्र.], डा० मालिनी गौतम [संतनगर, गुजरात], डा० रणजीत पटेल [मुजफ्फरपुर, बिहार], वेदप्रकाश शर्मा [गाजियाबाद, उ.प्र.], डा० रामसनेहीलाल शर्मा यायावर [फीरोजाबाद], मधुकर अष्ठाना [लखनऊ] ने अपने प्रतिनिधि नवगीतों का पाठ किया।

तीसरे सत्र में सम्राट राजकुमार के निर्देशन में विभिन्न कलाकारों ने नवगीतों की संगीतमयी प्रस्तुति की। गिटार पर स्वयं सम्राट राजकुमार, तबले पर सिद्धांत सिंह, की बोर्ड पर मयंक सिंह और ढोलक पर अरुण मिश्रा ने संगत की। कार्यक्रम का आरंभ आशीष और सौम्या की गणेशवंदना से हुआ। गीतिका वेदिका, श्रुति जायसवाल एवं अन्य कलाकारों द्वारा नवगीतों पर आधारित नाटक प्रस्तुत किया गया। संगीत के कार्यक्रम में प्रतिमा योगी के स्वर में तारादत्त निर्विरोध का गीत 'धूप की चिरैया' बहुत ही कर्णप्रिय रहा।  पूर्णिमा वर्मन के गीत चोंच में आकाश और मंदिर दियना बार को क्रमशः ममता जायसवाल और मयंक सिंह ने स्वर दिया। रोहित रूसिया के स्वर में नईम का गीत चिट्ठी-पत्री और स्वयं उनका गीत 'उड़ गई रे' भी बहुत पसंद किया गया। रोहित रूसिया ने अपनी विशिष्ट सरस शैली में गायन से यह सिद्ध कर दिया कि नवगीतों की प्रस्तुति कितनी मनमोहक और प्रभावशाली हो सकती है। कार्यक्रम का विशेष आकर्षण सुवर्णा दीक्षित द्वारा नरेन्द्र शर्मा के गीत नाच रे मयूरा पर आधारित कत्थक नृत्य रहा। नवगीत पर आधारित कत्थक का यह संभवतः पहला प्रयोग था।  इसके बाद अमित कल्ला तथा विजेन्द्र विज़ द्वारा निर्मित नवगीतों पर आधारित लघु फिल्में भी दिखायी गईं। 

दूसरे दिन का पहला और कार्यक्रम का चौथा सत्र अकादमिक शोधपत्रों के वाचन का था। पहला शोधपत्र कल्पना रामानी ने पढ़ा। यह शोधपत्र कुमार रवीन्द्र के नवगीत संग्रह 'पंख बिखरे रेत पर' के विषय में था। शीर्षक था '' 'पंख बिखरे रेत पर' में धूप की विभिन्न छवियाँ''। दूसरा शोध पत्र शशि पुरवार द्वारा निर्मल शुक्ल के नवगीत संग्रह "एक और अरण्यकाल" पर तैयार किया गया था। शीर्षक था ''मुहावरों का मुक्तांगन 'एक और अरण्यकाल' ''। दोनो आलेख सरस, रोचक और भरपूर परिश्रम के साथ लिखे हुए मालूम होते थे। इन दोनों शोधपत्रों को भरपूर सराहा गया। अन्त में गुजरात विद्यापीठ से पधारी विदुषी, गुजराती भाषा एवं साहित्य विभाग की विभागाध्यक्ष डा० उषा उपाध्याय ने "वर्ष २००० के बाद गुजराती गीतों की वैचारिक पृष्ठभूमि" पर लम्बा व्याख्यान प्रस्तुत किया जो बहुत प्रभावशाली रहा। डा० उषा उपाध्याय ने गुजराती गीतों के विविध अंशों को उदाहरण के रूप में रखकर बताया कि किस प्रकार गुजरात के ''सांप्रत गीतों'' (समकालीन गीत) की संवेदना नवगीत के निकट है।

पाँचवा सत्र २०१४ में प्रकाशित नवगीत संग्रहों की समीक्षा पर केन्द्रित सत्र रहा। इस सत्र का उद्देश्य साल भर में प्रकाशित नवगीत संग्रहों-संकलनों का लेखा जोखा करना तथा उपस्थित श्रोताओं में उनका परिचय प्रस्तुत करना होता है। साथ ही इसमें नवगीत संग्रहों का लोकार्पण भी होता है। डॉ. जगदीश व्योम द्वारा संचालित सत्र में उन २४ नवगीत संग्रहों का उल्लेख किया जिनका प्रकाशन २०१४ में हुआ था इसके बाद रजनी मोरवाल के नवगीत संग्रह "अँजुरी भर प्रीति" पर कुमार रवीन्द्र की लिखी गई भूमिका को ब्रजेश नीरज ने प्रस्तुत किया। जयकृष्ण राय तुषार के नवगीत संग्रह "सदी को सुन रहा हूँ मैं" पर शशि पुरवार ने समीक्षा प्रस्तुत की, अश्वघोष के नवगीत संग्रह "गौरैया का घर खोया है" तथा राघवेन्द्र तिवारी के नवगीत संग्रह "जहाँ दरक कर गिरा समय भी" पर डा० जगदीश व्योम ने समीक्षा प्रस्तुत की, रामशंकर वर्मा के नवगीत संग्रह "चार दिन फागुन के" पर मधुकर अष्ठाना ने समीक्षा प्रस्तुत की, रामकिशोर दाहिया के नवगीत संग्रह "अल्लाखोह मची" पर संजीव वर्मा सलिल द्वारा तथा विनय मिश्र के नवगीत संग्रह "समय की आँख नम है" पर मालिनी गौतम द्वारा समीक्षा प्रस्तुत की गई। इस सत्र में चार नवगीत संग्रहों- "अल्लाखोह मची"- रामकिशोर दाहिया, "झील अनबुझी प्यास की" - डा० रामसनेही लाल शर्मा यायावर, "चार दिन फागुन के" - रामशंकर वर्मा तथा "कागज की नाव" - राजेन्द्र वर्मा, का लोकार्पण किया गया। सत्र के बाद सभी का सामूहिक चित्र लिया गया।

छठे सत्र में नवगीतकारों को अभिव्यक्ति विश्वम् के नवांकुर पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह पुरस्कार प्रतिवर्ष उस रचनाकार के पहले नवगीत-संग्रह की पांडुलिपि को दिया जाता है, जिसने अनुभूति और नवगीत की पाठशाला से जुड़कर नवगीत के अंतरराष्ट्रीय विकास की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हो। पुरस्कार में ११,००० भारतीय रुपये, एक स्मृति चिह्न और प्रमाणपत्र प्रदान किये जाते हैं। आयोजन में २०१५ का नवांकुर पुरस्कार संजीव वर्मा सलिल को तथा २०१४  का नवांकुर पुरस्कार ओमप्रकाश तिवारी को प्रदान किया गया। ओम प्रकाश तिवारी ने अनुपस्थित रहने के कारण यह पुरस्कार एक सप्ताह बाद ग्रहण किया जबकि कल्पना रामानी ने पिछले साल अनुपस्थित रहने के कारण २०१२ का स्मृति चिह्न एवं प्रशस्ति पत्र इस वर्ष ग्रहण किया।

पुरस्कार वितरण के बाद कवित सम्मेलन सत्र की विशिष्ट अतिथि डॉ. उषा उपाध्याय ने अपने गुजराती गीतों के हिंदी अनुवाद के साथ साथ एक मूल रचना का भी पाठ किया। गीत की लय कथ्य ने सभी उपस्थित रचनाकारों को आनंदित किया। इसके बाद सभी उपस्थित रचनाकारों ने अपने एक एक नवगीत का पाठ किया। इस अवसर पर उपस्थित प्रमुख रचनाकार थे- लखनऊ से संध्या सिंह, आभा खरे, राजेन्द्र वर्मा, डंडा लखनवी, डॉ. प्रदीप शुक्ल, रंजना गुप्ता, चन्द्रभाल सुकुमार, राजेन्द्रशुक्ल राज, अशोक शर्मा, डॉ. अनिल मिश्र, निर्मल शुक्ल, महेन्द्र भीष्म, मधुकर अष्ठाना और रामशंकर वर्मा, कानपुर से मधु प्रधान और शरद सक्सेना, छिंदवाड़ा से रोहित रूसिया और सुवर्णा दीक्षित, मीरजापुर से शुभम श्रीवास्तव ओम और गणेश गंभीर, बिजनौर से अमन चाँदुपुरी, दिल्ली से भारतेन्दु मिश्र और राधेश्याम बंधु, नॉयडा से डॉ जगदीश व्योम और भावना तिवारी, संतनगर गुजरात से मालिनी गौतम, गाजियाबाद से वेदप्रकाश शर्मा वेद और योगेन्द्रदत्त शर्मा, वर्धा से शशि पुरवार, मुंबई से कल्पना रामानी, कटनी से रामकिशोर दाहिया, खटीमा से रावेंद्रकुमार रवि, जबलपुर से संजीव वर्मा सलिल, इंदौर से गीतिका वेदिका, फीरोजाबाद से डॉ. राम सनेहीलाल शर्मा यायावर, मुजफ्फरपुर से डॉ. रणजीत पटेल, शारजाह से पूर्णिमा वर्मन, होशंगाबाद से डॉ विनोद निगम आदि। विभिन्न सत्रों का संचालन डा० जगदीश व्योम तथा रोहित रूसिया ने किया। अन्त में पूर्णिमा वर्मन तथा प्रवीण सक्सेना ने सभी के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया।

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नवगीत महोत्सव लखनऊ २०१७ : सफल आयोजन

लखनऊ  २५ तथा २६ नवम्बर २०१७।  अभिव्यक्ति विश्वम द्वारा ओमैक्स सिटी (शहीद पथ) स्थित गुलमुहर ग्रीन स्कूल के भव्य सभागार में नवगीत महोत्सव का सफल आयोजन किया गया। नवगीत को केन्द्र में रखकर आयोजित होने वाला यह उत्सव वैचारिक संपन्नता के साथ साथ नवगीत को मीडिया एवं कला के विभिन्न उपादानों से जोड़ने के लिये जाना जाता है। नवगीत  की पाठशाला के नाम से वेब पर नवगीतों के विकास में संलग्न अभिव्यक्ति विश्वम द्वारा आयोजित शृंखला का यह छठा कार्यक्रम था।

नवगीत समारोह का शुभारम्भ सर्व श्री योगेन्द्र दत्त शर्मा, निर्मल शुक्ल, संजीव सलिल, जगदीश पंकज एवं जगदीश व्योम के कर-कमलों से दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। आरती मिश्रा एवं श्वेता मिश्रा द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वन्दना के उपरान्त 'रंग-प्रसंग' के अंतर्गत सर्व श्री बालगोपालन, डायना महापात्रा, दुर्गाप्रसाद बंदी, दिव्या पांडेय, गिरीश बहेरा, मेघांश थापा, मुकेश साह, राहुल जैन, विनय अंबर, योगेश प्रजापति, अशोक शर्मा, अमित कल्ला एवं विजेंद्र विज द्वारा  बनायी गयी कलाकृतियों के साथ विभिन्न नवगीतों पर आधारित पोस्टर प्रदर्शनी का उद्घाटन किया गया।

प्रथम सत्र में नवगीत की पाठशाला से जुड़े नये रचनाकारों द्वारा अपने दो दो नवगीत प्रस्तुत किये गये। नवगीत पढ़ने के बाद प्रत्येक के नवगीत पर वरिष्ठ नवगीतकारों द्वारा टिप्पणी की गई इससे नये रचनाकारों को अपनी रचनाओं को समझने और उनमें यथोचित सुधार का अवसर मिलता है। कल्पना मनोरमा जी के नवगीतों पर सर्व श्री संजीव वर्मा सलिल एवं रामसनेही लाल शर्मा यायावर ने टिप्पणी की, त्रिलोचन कौर के नवगीतों पर सर्व श्री योगेंद्रदत्त शर्मा एवं राम गरीब विकल ने अपनी टिप्पणियाँ की, धीरज मिश्र के नवगीतों पर सर्व श्री निर्मल शुक्ल एवं जगदीश पंकज द्वारा एवं नीरज द्विवेदी की रचनाओं पर सर्व श्री वेदप्रकाश शर्मा वेद एवं रमेश गौतम द्वारा विचार रखे गये। इस मध्य कुछ अन्य प्रश्न भी नये रचनाकारों से श्रोताओं द्वारा पूछे गये, जिनका उत्तर वरिष्ठ रचनाकारों द्वारा दिया गया। प्रथम सत्र के अन्त में पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ से डॉ अशोक कुमार ने गीत और नवगीत में अन्तर स्पष्ट करते हुए बताया कि नवगीत हिन्दी साहित्य की अविभाज्य विधा है और इस पर विश्वविद्यालों में व्यापक शोधकार्य हो रहा है। उन्होंने नवगीत के विकास में आने वाली बाधाओं, बाजारवाद, सरकारी उपेक्षाओं की बात करते हुए प्रकाशकों से सहयोग का अनुरोध भी किया।

दूसरे सत्र में वरिष्ठ नवगीतकारों द्वारा अपने प्रतिनिधि नवगीतों का पाठ किया गया ताकि नये रचनाकार नवगीतों के कथ्य, लय, प्रवाह, छन्द आदि को समझ सकें। नवगीत पाठ के बाद सभी को प्रश्न पूछने की पूरी छूट दी गई जिसका लाभ नवगीतकारों ने उठाया। इस सत्र में सर्व श्री निर्मल शुक्ल (लखनऊ, उ.प्र.) योगेन्द्र दत्त शर्मा (गाजियाबाद, उ.प्र.), डॉ रामसनेहीलाल शर्मा यायावर (फिरोजाबाद, उ.प्र.), शीलेन्द्र सिंह चौहान (लखनऊ, उ.प्र.), वेदप्रकाश शर्मा 'वेद' (गाजियाबाद, उ.प्र.), संजीव वर्मा 'सलिल' (मंडला, म.प्र.), मायामृग (जयपुर, राजस्थान), राजा अवस्थी (कटनी, म. प्र.), जगदीश पंकज (गाजियाबाद, उ.प्र.), रमेश गौतम (बरेली, उ.प्र.), संजय शुक्ल (गाजियाबाद, उ.प्र.), शिवानन्द सिंह 'सहयोगी' (मेरठ, उ.प्र.) और राम गरीब 'विकल' (सीधी, म.प्र.) ने अपने प्रतिनिधि नवगीतों का पाठ किया। कार्यक्रम की समापन वेला में डॉ विनोद निगम (होशंगाबाद, म.प्र.) एवं डॉ धनञ्जय सिंह (गाजियाबाद, उ.प्र.) ने काव्य-रसिकों के आग्रह पर एक-एक नवगीत सुनाकर मंत्रमुग्ध कर दिया। 
तीसरे सत्र नवगीतों पर आधारित संगीत संध्या का था जिसमें लखनऊ से सम्राट राजकुमार के निर्देशन में विभिन्न कलाकारों ने नवगीतों की संगीतमयी प्रस्तुति की। तारादत्त निर्विरोध के नवगीत धूप की चिरैया को स्वर दिया आरती मिश्रा ने, कृष्णानंद कृष्ण के गीत पिछवारे पोखर में  को स्वर दिया पल्लवी मिश्रा ने, माहेश्वर तिवारी के गीत मूँगिया हथेली को समवेत स्वरों में प्रस्तुत करने वाले कलाकार रहे- आरती मिश्रा, पल्लवी मिश्रा, चंद्रकांता चौधरी, सुजैन और श्वेता मिश्रा । पूर्णिमा वर्मन के गीत सॉस पनीर को स्वर दिया निहाल सिंह ने तथा विनोद श्रीवास्तव के गीत छाया में बैठ एवं माधव कौशिक के गीत चलो उजाला ढूँढें के स्वर दिया अभिनव मिश्र ने। तालवाद्य पर विशाल मिश्रा, की-बोर्ड पर स्वयं सम्राट राजकुमार और गिटार पर विनीत सिंह ने संगत की।  
कार्यक्रम का विशेष आकर्षण डॉ रुचि खरे (भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय, लखनऊ, उ.प्र.) द्वारा 'कत्थक नृत्य' रहा जिसके अंत में उन्होंन संध्या सिंह के नवगीत हाथ में पतवार होगी तथा पूर्णिमा वर्मन के नवगीत फूल बेला पर प्रस्तुति दी। नवगीत पर आधारित कत्थक का यह प्रयोग बहुत लोकप्रिय रहा। कार्यक्रम के अंत में भातखंडे विश्वविद्यालय की भूतपूर्व उपकुलपति एवं कत्थक विशेषज्ञ डॉ. पूर्णिमा पांडे द्वारा नवगीतकार पूर्णिमा वर्मन के नवगीत मंदिर दियना बार पर नृत्य प्रस्तुत कर सबको आह्लादित कर दिया। नृत्य के साथ तबले पर राजीव शुक्ला, सारंगी पर पं. विनोद मिश्र एवं हारमोनियम पर मोहम्मद इलियाज खाँ ने संगत की। संगीत मोहम्मद इलियाज खाँ का था जिसे स्वर से सजाया था स्वयं मोहम्मद इलियाज खाँ के साथ निकी राय ने।

दूसरे दिन का पहला और कार्यक्रम का चौथा सत्र अकादमिक शोधपत्रों के वाचन का था। पहला शोधपत्र- 'नवगीतों में ग्रामीण परिवेश की खोज' पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ में शोधार्थी श्री अनिल कुमार पांडेय  ने  पढ़ा।  दूसरा  भावना तिवारी जी द्वारा 'नवगीतों में महिला रचनाकारों का योगदान' पर प्रस्तुत किया गया। दोनों आलेख सरस, रोचक और ज्ञानवर्धक रहे।  तीसरा शोध पत्र श्री वेदप्रकाश शर्मा 'वेद' द्वारा प्रस्तुत किया गया।  शीर्षक था- 'नवगीत का सौंदर्य औदात्य।' यह शोधपत्र श्री देवेन्द्र शर्मा 'इंद्र' के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर केंद्रित था। अन्त में सीधी जनपद से पधारे श्री राम गरीब 'विकल' ने 'लोक चेतना के संवाहक नवगीत' पर उम्दा व्याख्यान प्रस्तुत किया।

पाँचवा सत्र २०१६ एवं २०१७ में प्रकाशित नवगीत संग्रहों की समीक्षा पर केन्द्रित रहा। इस सत्र का उद्देश्य विगत वर्ष में प्रकाशित नवगीत संग्रहों-संकलनों का लेखा-जोखा करना तथा उपस्थित श्रोताओं में उनका परिचय प्रस्तुत करना होता है। साथ ही इसमें नवगीत संग्रहों का लोकार्पण भी होता है। इस सत्र में श्री निर्मल शुक्ल द्वारा २०१६ में प्रकाशित नवगीत संग्रहों पर विहंगम दृष्टि डाली गयी, जबकि श्री संजय शुक्ल ने दो दर्जन से अधिक नवगीत संग्रहों का उल्लेख किया जिनका प्रकाशन २०१७ में हुआ था। इसके साथ ही मालिनी गौतम जी के नवगीत संग्रह 'चिल्लर सरीखे दिन' पर श्री अनिल कुमार पांडेय ने समीक्षा प्रस्तुत की और संध्या सिंह जी के नवगीत संग्रह 'मौन की झंकार' पर लखनऊ से ही डॉ अनिल कुमार मिश्र ने सारगर्भित टिप्पणी की। शुभम श्रीवास्तव ओम के नवगीत संग्रह फिर उठेगा शोर एक दिन पर आचार्य संजीव सलिल ने अपने विचार प्रस्तुत किया। इस सत्र में बी एल राही जी के गीत संग्रह 'तड़पन' का भव्य लोकार्पण किया गया। सत्र के बाद सभी का सामूहिक चित्र लिया गया।

छठे सत्र में दो नवगीतकारों को अभिव्यक्ति विश्वम् के नवांकुर पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह पुरस्कार प्रतिवर्ष उस रचनाकार के पहले नवगीत-संग्रह की पांडुलिपि को दिया जाता है, जिसने अनुभूति और नवगीत की पाठशाला से जुड़कर नवगीत के अंतरराष्ट्रीय विकास की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हो। पुरस्कार में ११०००/- भारतीय रुपये, एक स्मृति चिह्न और प्रमाणपत्र प्रदान किये जाते हैं। आयोजन में २०१६ का नवांकुर पुरस्कार संध्या सिंह जी को उनकी कृति- 'मौन की झंकार' तथा २०१७ का नवांकुर पुरस्कार शुभम श्रीवास्तव को उनके संग्रह- 'फिर उठेगा शोर एक दिन' पर प्रदान किया गया। दोनों पुरस्कार उपस्थित अतिथियों, नवगीतकारों एवं नवगीत समीक्षकों की उपस्थिति में प्रदान किये गए।


पुरस्कार वितरण के बाद काव्य सत्र के विशिष्ट अतिथि श्याम श्रीवास्तव 'श्याम' एवं कत्थक गुरू डॉ. पूर्णिमा पांडे रहे। श्रीवास्तव जी के नवगीत ने सभी उपस्थित रचनाकारों को आनंदित किया। इसके बाद सभी उपस्थित रचनाकारों ने अपने एक एक नवगीत का पाठ किया। इस अवसर पर उपस्थित प्रमुख रचनाकार थे-
लखनऊ से अनंतप्रकाश तिवारी, संध्या सिंह, आभा खरे, सीमा मधुरिमा, राजेन्द्र वर्मा, डॉ प्रदीप शुक्ल, रंजना गुप्ता, शीला पाण्डेय, राजेन्द्र शुक्ल राज, रामशंकर वर्मा, मीरजापुर से शुभम श्रीवास्तव ओम और आज़ाद आलम, नॉयडा से डॉ जगदीश व्योम और भावना तिवारी, दिल्ली से विजेंद्र विज, मुरादाबाद से अवनीश सिंह चौहान, गाजियाबाद से योगेन्द्रदत्त शर्मा, वेदप्रकाश शर्मा वेद, जगदीश पंकज एवं संजय शुक्ल और कटनी से राजा अवस्थी, बरेली से रमेश गौतम, मेरठ से शिवानन्द सिंह 'सहयोगी', जबलपुर से संजीव वर्मा सलिल, सीधी से राम गरीब विकल, फीरोजाबाद से डॉ राम सनेहीलाल शर्मा यायावर, शारजाह से पूर्णिमा वर्मन, होशंगाबाद से डॉ विनोद निगम, प्रतापगढ़ से रविशंकर मिश्र, जयपुर से अमित कल्ला आदि। डॉ एस एन सिंह, डॉ संदीप शुक्ला, श्वेता आदि। सभी सत्रों का शानदार संचालन डॉ अवनीश सिंह चौहान ने किया। अन्त में पूर्णिमा वर्मन तथा प्रवीण सक्सेना ने सभी के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया।​
छाया सक्सेना 'प्रभु'
चित्र 
जन्म: तिथि, स्थान 
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जीवन साथी: 
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संपर्क:

चलभाष: ०७०२४२८५७८८ ।   

​प्रियवर! 
स्वागत आपका, पुष्प गुच्छ ले आज।
चंदन वंदन आरती, करता सकल समाज।।
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नित नव उन्नति हो रही, हर्ष मनाओ मीत।
अमर रहे साहित्य में, सुंदर सुफल सुनीत।।
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मिलकर करना है सदा, सबको गुरु का ध्यान।
गुरु-चरणों में आइये, तभी मिलेगा ज्ञान।।
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करें सभी साहित्य में, अपने गुरु का नाम।
बिन गुरुवर मिलता नहीं, हमको हरि का धाम।।
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गुरु-चरणों में ही मिले, सकल जगत का सार।
द्वेष, कपट, छल त्यागिए, अर्पित कर अधिकार।।
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नदियाँ साग़र से मिलें, नैसर्गिक अधिकार।
कर्तव्यों को कीजिए, तभी मिलेगा प्यार।।
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प्रेम, त्याग, विश्वास से, सुधरे सकल समाज।
गुरु-सुमिरन से ही बने, बिगड़े सारे काज।।
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गुरु के चरणों का करें, जो सुमिरन दिन रैन।
काज सुफल उसके हुए, आदि-अंत तक चैन।।
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पंछी बैठा डाल पर, देखे अंबर-ओर।
मनहर लाली सज रही, उदित हो रही भोर।।
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सभी सहेजें प्रकृति को, अति उत्तम यह काज।
जन-मन को प्रेरित करें, प्रण लें लें सब आज।।
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रंग-बिरंगी कल्पना, आज हुई साकार।
सुखद-सरस परिकल्पना, दृश्य-श्रव्य आधार।।
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निशिचर दानव दैत्य शठ, असुर अधम दनु दीन।
राम-नाम जप  मुक्त हों, भव-बंधन से हीन।।
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अनावृष्टि दुर्भिक्ष से, जब भी पड़े अकाल।
सूखी धरती  भुखमरी, हो जीवन का काल।। 
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अनल आग पावक अगन, ज्वाला दाहक तेज।
वायुसखा ही अग्नि है, जल को रखो सहेज।।
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भूधर पर्वत शैल गिरि, नग या शिखर पहाड़।
धरणीधर अद्री अचल, शिलागार बाड़।।
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उत्तम अद्भुत सी लगे, अनुपम  अपनी प्रीत।
अप्रतिम उपमा दीजिए, अतुलनीय मनमीत।।
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अमिय अमी सुरभोग है, सोम सुधा रसधार।
अमृत सम साहित्य पर, हँसकर जीवन वार।।
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बिन सोचे करिए नहीं, अपने मत का दान।
बड़ा धर्म से कर्म है, मतदाता ले जान।।
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पाँच साल के बाद ही, कर पाते मतदान।
जागो मतदाता सभी, रहो नहीं अनजान।।
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छंदों की लय ही बनी, लेखन का आधार।
सरल हृदय को 'प्रभु' सदृश, लगे छंद परिवार।। 
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नेक कर्म कर कीर्ति पा, मंगल हो चहुँ ओर।
परहित कर इंसान तो, नाच उठे मन मोर।।
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आध्यात्मिक शुभ कर्म से, मनुज मनुज हो मीत।
मिलतीं शत शुभकामना, सके ह्रदय भी जीत।।
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महिमा माने योग की, विश्व कर रहा नित्य।
सब रोगों से मुक्ति पा, सतत करे सत्कृत्य।।
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अजर-अमर वह लेखनी, जो लिखती नित सत्य।
माँ वाणी की कृपा से, करती सदा सुकृत्य।।  
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कर्म  हमारा धर्म है, कहते वेद पुरान।
सच्चे मन से कीजिए, हों प्रसन्न भगवान।।
*
जैसे होंगे कर्म फल, वैसे होंगे मीत।
अपनों के संग गाइये, प्रभु के मधुरिम गीत।।
*
बच्चे तो भगवान का, होते हैं प्रतिरूप।
दर्शन इनमें कीजिए, राम-कृष्ण के रूप।।
*
सुघड़ लाड़ली जानकी, हिय प्रियतम रघुनाथ।
थकन भुला मुस्का रहीं, वन में रघुवर साथ।।
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सुफल सुफल ही सुफल है, जब हों सुफल सुकाज।
सुयश सुयश बढ़ता रहे, संगम प्रभु का आज ।।
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रघुवर शोभित हो रहे, जनक-लली प्रभु-साथ।
जगत जगत को मोहते, सरस सरस रघुनाथ।।
*
रमण-रमण सुंदर रमण, रमण-रमण तन श्याम ।।
रमण-रमण सम राधिका, रमण-रमण घनश्याम ।।
*
सुमन सुमन चहुँ चहुँ दिशा, सुमन सुमन अरु माल ।
सुमन सुसज्जित भवन है, सुमन सुमन प्रभु लाल ।।
*
सुमित सुमित प्रिय सुमित है, सुमित सुमित मन आज ।
चरण-चरण रज चरण है, हृदय हृदय रघुराज ।।
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खोया है बचपन  कहीं, सारे देखो आज ।
गुम हो गईं कहानियाँ, छूटे सकल सुकाज ।।३५ 
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मेल जोल से दूर हैं, मोबाइल ही यार ।
वाहन लेकर चल दिये, कहीं ढूंढने प्यार ।।
बातें लगती हैं बुरी, जो कोई समझाय ।
छोटी सी ही उमर में ,स्वयं गुरू बन जाय ।।
मानव मूल्यों का करो,  सतत् सदा  सत्कार ।
प्रेम भाव मिलकर रहें, तभी  चलत  संसार  ।।
सच्ची मानवता वही, जिससे हो  कल्याण ।
मानव हिय अनमोल है, इसमें बसते  प्राण ।।
फैली है चहुँ ओर ही, ममतामयी  सुवास  ।
मधुरिम- मधुरिम  हो गया, प्रिय पर अब विश्वास ।।
शिव शंकर के शीश पे, आय विराजी आप ।
निर्मल जल की स्वामिनी, पूजो कटते पाप ।।
सागर  नदियाँ अमिय हैं, जानो तुम यह रीत ।
आशा  पूरी  करत  है,  भक्ति  रत्न अरु प्रीत ।।
प्रेम  रत्न चहुँ ओर है,  सारे  मानो आज ।
मिलत जगत है भगत को, जीवन का यह राज ।।
मुश्किल घटती  है तभी , जब लें  प्रभु का नाम ।
अभी समय है  जागिए,  मिल    जायेंगे राम ।।
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बिन मुश्किल के नहिं बने, जग में कोई काज ।
कदम बढ़ा साथी तभी, मिले सफलता  आज ।।
सबको नित प्रति चाहिए, अच्छा भोजन रोज ।
मिलजुल कर रहते सभी, तब बढ़ जाता ओज ।।
नित्य योग को कीजिए, मिलकर सह परिवार ।
यश वैभव उन्नति  मिले, बने  सुखद  आधार ।।
सच्चाई की राह में, काँटे  मिलते जाय ।
प्रेम भाव से प्रभु मिले, सच्चा सुख उपजाय ।।
श्रद्धा अरु विश्वास का,   अद्भुत है  संयोग ।
अंध भक्ति  से दूर  हो, बने  जागरुक  लोग ।।
दुर्लभ  मानव  जन्म है, इसे बनाएँ  खास ।
दुर्व्यसनों को छोड़ के, मधुर  जागाएँ  आस ।।
अति होती है सदा से,  हरदम  ही बेकार ।
भक्ति भाव जीवन जिएँ,  हों प्रभु पर बलिहार ।।
कथनी करनी में नहीं,  करना  कोई  भेद ।
कठिन भले जीवन लगे, नहिं रखना  मतभेद ।।
लगन लगी श्री राम की, भजती प्रभु को आन।
हाथ जोड़ विनती करूँ,  अज्ञानी  मोहि  जान।।
धनुष विराजे हाथ में,  संकट काटो नाथ ।
शरण तिहारे आ गयी, कीजे आप सनाथ ।।
* बप्पा  को पूजें सभी, गौरा भोले संग ।
चारों वेदों ने कहा,  मैय्या मोहे रंग ।।
संगम के * साहित्य को, देखो जाने लोग ।
जैसी होगी लेखनी,  वैसा होगा भोग ।।
संगम होवे ज्ञान का,  ऐसा कीजे कर्म ।
गुरु आज्ञा को  मान के, पालें साँचा धर्म।।
मनुज सदा  साहित्य में,  रचो नित्य आयाम ।
हिंदी का सम्मान हो,  ज्योतित आठो याम ।।
दोहे का होवे सृजन, आओ वीर सुजान ।
छंदों से शाला सजे, बढ़े ज्ञान अरु शान ।।
दोहे  लिखना  है सभी , रखो ध्यान तुम धीर ।
भाव शिल्प आधार हो, तभी बनोगे वीर ।।
कठिन परीक्षा की घड़ी, जब भी सम्मुख आय ।
याद प्रभू को जो करे,  वही  जीतता जाय ।।
शिव की पूजा कीजिए, शुभ होंगे सब काज ।
चंदन वंदन अर्चना,   मिल के कीजे  आज ।।
लक्ष्मी पूजन कीजिए, हाथ जोड़ कर रोज ।
विष्णु प्रिया माँ आप हैं, सुरभित सुमन सरोज ।।
नाम सुजाता है भला,  जग को जो जी जाय ।
मधुर मधुर जो बोलता , मधुर मधुर फल पाय ।।
अवध सुहावन  लग रहा, देखो कैसा आज ।
सिय  सियवर  का आगमन, शोभित सुफल सुकाज ।।
अधम अधम  अरु अधम ही, करे सुयश का नाश ।
पापी हिय में बसत है, दुष्ट जीव कर पाश ।।
मंजिल उनको ही मिले, जो चलते अविराम ।
एक लक्ष्य को साधिए, तभी बढ़ेगा नाम ।।
सतत परिश्रम जो करे, वह ही विजयी होय ।
भक्ति भाव हिय धार ले, मनुज नहीं वह रोय ।।
राम राम श्री राम हैं, जग के पालनहार ।
नित्य भजन  जो भी करे, वो हो भव से पार ।।
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धरती अम्बर एक से, लगते हैं प्रभु आज ।
ओम मंत्र गुणगान से, सुधरे सकल समाज ।।
करती विनती हूँ  सदा,  शारद मैया रोज ।
भक्तों को माँ ज्ञान दें, भरें  हृदय में ओज ।।
चमत्कार की आस में,  मत बैठो बलवीर ।
कर्म करो योगी बनो,  मनुज बनो रणवीर ।।
चमत्कार होवे तभी,  जब गुरु  किरपा होय ।
शरण गुरू की जो गया, भगवन मिलते  सोय ।।
ओजमयी व्यक्तित्व ही, है जिनकी पहचान ।
चमत्कार हो कर्म से,  बढ़े  मान  अरु शान ।।
मातु पिता आशीष से, चमत्कार  हो जाय ।
नाम करे जग में सदा,  जन्म सफ़ल कहलाय ।।
चमत्कार  हो जात है, यदि दृढ़ हो विश्वास ।
मंगल मंगल हो सदा, पूरण होती  आस ।।
सच्ची मानवता वही, जो  कर दे कल्याण ।
मानव हिय अनमोल है, इसमें बसते प्राण ।।
चलो सजायें पटल को, आत्मकथ्य लिख  धीर ।
सहज  सुखद संदेश हो,  कभी नहीं  हो  पीर  ।।
खट्टी- मीठी  याद को,  लिखना होगा  आज ।
कुछ मनचाही बात भी, बनती सुखद  सुकाज ।।
मान तिरंगे का रखा, जब तक तन में प्राण ।
ऐसे वीर शहीद को,    बारम्बार  प्रणाम ।।
आस और विश्वास की, बड़ी अनोखी प्रीत ।
हिय में धारण जो करे, वो जग जाए जीत ।।
गीत प्रभू के गाइए, मन में रख विश्वास ।
शरण गहे के पूरते, सारे सुफल प्रयास।।
मन मोहन में रम गया, ज्यों सागर में नीर ।
कृपा करें गोपाल जी, रहे नहीं तन पीर ।।
नाम जपो श्री कृष्ण का, तभी मिटेंगे पाप ।
सच्चे मन से कीजिए, दान पुण्य सब आप ।
दानों में सबसे बड़ा , अन्न दान को जान ।
जीवन इससे ही चले , माने सकल जहान ।।
सबसे मीठा जगत में, वाणी का है प्यार।
इससे हिय को जीत के, बन जाते  रसधार ।।
मुश्किल घटती  है सभी , जप लो प्रभु का नाम ।
अभी समय है जागिए, मिल जायेंगे राम ।।
बिन मुश्किल के नहिं बने, जग में कोई काज ।
कदम बढ़ा साथी तभी, मिले सफलता  आज ।।
अहंकार अभिमान ही,  करते  सबका नाश ।
दम्भ दर्प को छोड़ के, करिए  सफ़ल  प्रयास ।।
जीवन के ये चार दिन, देखो हैं अनमोल ।
भजन भगत तब सफल हो,जब हों मीठे बोल ।।
वाणी  तो  वरदान  है, शारद मातु महान ।
वंदन पूजन  कीजिए, मानत सकल जहान ।।
लक्ष्य बना कर कीजिये, सपनों को साकार ।
तब ही मंजिल मिलत है, बनत सुखद आकार ।।
नेक कर्म जो करत है, जग में सफल कहाय ।
चार दिनों की  जिंदगी, सब  के  बनो सहाय ।।
हर्षित हैं साथी सभी, दिखती नयी तरंग ।
झूम झूम नाचे सभी, हिय में  उठी  उमंग ।।
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मनमोहन राधा बने, नील वर्ण भरमाय।
धरती मधुवन सम लगे, रोम- रोम हरषाय।।?
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अकड़-अकड़ कर दंभ ही, अभिमानी बन जाय ।
ठसक  हेकड़ी  दर्प से,  अहंकार पनपाय ।। 
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साहित्यिक उपहार को, चलो सहेजें आज ।
संगम नदियों सा रहे, सुरभित सुफल सुकाज ।।
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आओ! मिलकर प्रण करें, स्वदेशी अपनाय।
प्रकृति धरा के रंग से,  सुरभित तन खिल जाय।।
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अजर -अमर होवे सदा, साचे-साचे कर्म ।
मनवा तू बस धीर से,  सदा निभाये धर्म ।। 
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अंधेरा अरु अंध ही, अंधकार कहलाय ।
तिमिर स्याह तम अंधता,  अँधियारा  बन जाय ।।
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सरस सुहावन बाग है, मधुर मधुर महकाय।
सुरभि सुरभि पावन लगे, मनुज मनुज हरषाय ।।
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पढ़ने बैठी जब भूगोल इतिहास उसमें नज़र आया पीछे था सामान्य ज्ञान और था गणित का काला साया । अंग्रेजी लगा रूठ गयी है दूर व्याकरण को भी कर चुकी है वो किताब से हंस रही थी मानो उपहास कर रही थी । हिंदी ,संस्कृत बोल रही थीं शायद वार्तालाप कर रही थीं चुप चाप उनको सुन रही थी उनकी बातों को सोच रही थी । सारे विषय सामने आने लगे विज्ञान का ज्ञान देने लगे मन मनतिष्क भी सुन रहा था लगा यह भी कुछ कह रहा था । बन्द करके आँखों को बैठी सोचा सबसे मुक्ति मिलेगी पर आये ख़्वाबों में सभी विषय बोले आओ सब नाचे गायें । खोली आँखे -थम गये विषय अंधेरों में जैसे जम गये विषय किताबों में निराश ही बैठे रहे खुद अपना इतिहास रचते रहे । फिर अचानक से रौशनी आई देखा सामने एक कंप्यूटर था गूगल खोल कर जब खोजा सारे विषय फिर यहाँ भी पाये ।
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