मंगलवार, 30 जनवरी 2018

शिव दोहावली

शिव पूजे वह जिसे हो,
शिवता पर विश्वास।
शिवा ने शिव से भिन्न हैं,
यह भी हो आभास।।
*
सत् के प्रति श्रद्धा रखे,
सुंदर जगत-प्रवास।
साथी प्रति विश्वास से,
हो आवास सुवास।।
*
ऋषियों! क्यों विचलित हुए?
डिगा भरोसा दीन।
तप अपना ही भंगकर,
आप हो गए दीन।।
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संबल हैं जो साध्वियां,
उन पर कर संदेह।
नींव तुम्हीं ने हिला दी,
बचे किस तरह गेह?
*
सप्त सिंधु सी भावना,
नेह-नर्मदा नीर।
दर्शन से भी सुख मिले,
नहा, पिएं मतिधीर।।
*
क्षार घुले संदेह का,
नेह-नीर बेकाम।
देह पिए तो गरल हो,
तजें विधाता वाम।।
*
ऋषि शिव, साध्वी हों शिवा,
रख श्रद्धा-विश्वास।
देह न, आत्मा को वरें,
गृह हरि-रमा निवास।।
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विधि से प्राप्त प्रवृत्ति जो,
वह निवृत्ति-पर्याय।
हरि दोनों का समन्वय,
जग-जीवन समवाय।।
*
शिव निवृत्ति की राह पर,
हैं प्रवृत्ति की चाह।
वर्तुलवत बह चेतना,
दहा सके हर दाह।।
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आदि-अंत जिसका नहीं,
सब हैं उसके अंश।
अंश-अंश से मिल बढ़े,
कहे उसे निज वंश।।
*
निज-पर कुछ होता नहीं,
सब जाता है छूट।
लूट-पाट अज्ञान है,
नाता एक अटूट।
*
नाता ताना जब गया,
तब टूटे हो शोक।
नाता हो अक्षुण्ण तो,
जीवन रहे अशोक।।
*
योनि-लिंग के निकट जा,
योनि-लिंग को भूल।
बन जाओ संजीव सब,
बसो साधना-कूल।।
***
३०.१.२०१८, जबलपुर

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