गुरुवार, 18 जनवरी 2018

doha shatak: arun sharma

दोहा शतक:
अरुण शर्मा 

Arun Sharma का प्रोफ़ाइल फ़ोटो

मिट्टी की इस देह से, पाल रहे अनुराग।
जब तक साँसें मित्रता, टूट गई तब आग।। 
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अगर-मगर में क्यों प्रिये, जीवन रहीं गुजार।
जब तक साँसें चल रही, तब तक यह संसार।। 
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अब कहने को शेष क्या, तुमसे दिल की बात।
मौन हुए अहसास सब, सुप्त हुए जज्बात।। 
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कथनी-करनी पर मुझे, खूब मिला उपदेश।
वही हलाहल बाँटता, जो खुद है अमरेश।। 
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शीत मौसमी भेंट है, घना कोहरा, ओस।
सर्दी के कारण हुआ, तरल जलाशय ठोस।। 
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इस विस्तृत संसार की, सोच हुई संकीर्ण।
सिमट गये सब आज में, कल जो रहे प्रकीर्ण।। 
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वैधानिक चेतावनी, सिर्फ कागजी काम।
धूम्र-मद्य का पान कर, मरता रोज अवाम।। 
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हम-तुम दोनों ठीक थे, बहके थे जज्बात।
ढूँढ़ रहा हूँ आज भी, नगमों वाली रात।। 
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अंतर में छल छंद है, बाह्य आवरण शुद्ध।
ऐसे कैसे तुम भला, बन पाओगे बुद्ध।। 
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अति ही व्याकुलता भरे, अति करती मजबूर।
प्रेम करें अनिवार्य से, अति से रहना दूर।।
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खौफ न है कानून का, और न है अनुराग।
इसीलिए है देश में, पाकिस्तानी राग।।
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आशाओं के बीज से, निकले हैं कुछ खार।
हम तो भूखे रह गये, व्यंग्य करे संसार।। 
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क्रोध कभी मत कीजिए, यह दुर्गुण की खान।
हरता बुद्धि, विवेक भी, नहीं छोड़ता ज्ञान।।
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छप्पन इंची वक्ष में, दुनिया का परिमाप।
तब क्यों भूखी देहरी,  पेट रही है नाप।। 
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इन नैनों की कोर से, टपक रहे हैं शब्द।
प्रिय! अब तो आकर मिलो, बीत रहा है अब्द।। 
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पाहन कब कहता हमें, पूज्य बनाओ यार।
मानो तो मैं देव हूँ, या पत्थर बेकार।। 
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नवल वर्ष ये आपको, रखे सुखद, समृद्ध।
पूर्ण करे हर कामना, हो न हुलासा वृद्ध।। 
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लाए वर्ष नवीनता, पाएं हर पल हर्ष।
सुखमय हो जीवन सदा, मिले नित्य उत्कर्ष।। 
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गत ने आगत से कहा, खुश रखना हर हाल।
हाथ तुम्हारे दे दिया, मैनें पूरा साल।।
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अंतर के संताप ने, कलम थमा दी हाथ।
शब्द न रोटी बन सका, बस आँसू का  साथ।।
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ऐसे- कैसे तुम मुझे, कहते हो कंगाल।
अंतरघट में है छुपा, माया का जंजाल।। 
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पावक नभ जल भू हवा, पंचभूत की देह।
सिक्के से क्यों तौलता, होना है जब खेह।। 
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आँसू तेरा मोल क्या, तुझ में ऐब हजार।
जग क्या जाने पीर को, नीर दिखे हर बार।। 
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जिसने पायी ज़िंदगी, निश्चित है अवसान।
फिर भी  माया-मोह में, डूब रहा इंसान।। 
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ढल जाएगी एक दिन, उम्र, समय यह देह।
फिर तन से है प्रेम क्यों, जो मिट्टी का गेह।।
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कर्कश स्वर है काग का, करता दूर विछोह।
कोयल काली है मगर, वाणी लेती मोह।।
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दिल को जो अच्छा लगे, कर लेना निष्काम।
कल की चिंता में कहाँ,खत्म हुआ सब काम।।
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इस कलियुग ने आजकल,किस्से सुने तमाम।
दशरथ जैसे पिता सौ, पुत्र न पाया राम।। 
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खुशबू बसी गुलाब में, पीर छुपाये शूल।
जैसी जिसकी कामना, मिला उसे अनुकूल।।
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विनती करना प्रेम से, करना नहीं दहाड़।
चंद मिनट में आजकल, राई बने पहाड़।।
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ढ़ल जाएँगे एक दिन, उम्र, रूप, यह देह।
तन पर इतना प्रेम क्यों, जो मिट्टी का गेह।। 
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अगर चाहिए जिंदगी, सेहत भी भरपूर।
परामर्श मेरा यही, हों व्यसनों से दूर।। 
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राहों में बिखरे पड़े, बैर-भाव के शूल।
सोंच-समझकर पैर रख, राह नहीं माकूल।। 
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है खराब वह व्यंजना, बाँट रही जो मौत।
बात हमारी सत्य है,व्यसन जिंदगी सौत।। 
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एक पंक्ति में हैं खड़े, तुलसी, नीम बबूल।
अलग-अलग तासीर को, जाने वही रसूल।।
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मौत सत्य है जान लें, जीवन कपट सलील।
जीने को क्यों जिन्दगी, करता रोज दलील।। 
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सुखद सुभग सानिध्य को, नमन करूँ कर जोर।
चिरकालिक हो बंधुता, सहज मैत्री डोर।। 
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रखना सदा कुटुंब में, समरसता का भाव।
नियम बने समुदाय को, अपनों में सद्भाव।। 
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जाना सबको एक दिन, राजा रंक फकीर।
सुखद कर्म करते रहें, जब तक रहे शरीर।। 
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रूपवती के रूप में, मैं खोया दिन-रात।
बुद्धिमती समझी नहीं, मेरे मन की बात।। 
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कुछ तारक,कुछ तारका, तारकमय आकाश।
एक सूर्य के उदय से, घर-घर हुआ उजास।। 
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पराधीन को बेड़ियाँ, कर देतीं मजबूर।
आज़ादी संग जिन्दगी, जी ले मित्र जरूर।। 
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कुछ क्यारी में पुष्प हैं, कुछ में उगे बबूल।
सोच-समझ अनुबंध कर, काँटे,खुशबू, फूल।। 
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मौन भला कब राह दे, मार्ग न दे वाचाल।
नियत काल की उक्ति ही,करती मालामाल।। 
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शाकाहारी शुद्ध है, नित्य करें आहार।
जीवन को देते कहाँ, मृत शरीर आधार।। 
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रे! मन क्यों होता रहा,जग में नित्य अधीर।
वही कर रहा कर्म तू, जो कहती तकदीर।। 
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स्वयं सिद्धि का मंत्र जो, जपता सुबहो-शाम।
अंत समय में क्या उसे, मिल जाता सुखधाम।। 
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कौन उजाला बाँटता, कौन घनेरी रात?
अपने-अपने कर्म ही, देते फल सौगात।। 
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अणुवत जन्मा जो वही, होगा आप विलीन।
कद बढ़ना निस्सार है,  मानस अगर मलीन।। 
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विषधर विष धारे सदा, कभी न करता पान।
दशन करे वह अन्य का, नहीं गँवाता जान।। 
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चादर छोटी हो गई, या बढ़ गया शरीर।
चला सांत्वना ओढ़कर, जब से हुआ फकीर।। 
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लेखा-जोखा कर्म का, दिया तराजू डाल।
कलयुग बैठा तौलने, सद्गुण दिया निकाल।। 
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जीवन भर परिहास को, रहा तौलता रोज।
अंत हुआ जब सन्निकट,करे स्वयं की खोज।। 
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चंदन घिस-घिस कर मनुज, मस्तक लेता थोप।
पाएगा क्या सत्य को, करे अकारण कोप।। 
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हाथ जोड़कर ज्ञान पा, हाथ पसारे दान।
इज्जत मिलती प्रेम से, भक्ति-मिले भगवान।। 
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जीवन के परिप्रेक्ष्य में, आँखें रखना चार।
दो आँखें सत्कर्म पर, दो रोकें व्यभिचार।। 
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प्रतिस्पर्धा स्वच्छ रहे, हृदय न किंचित द्वेष।
हार-जीत संज्ञान से, समझे लोग विशेष।। 
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जीवन में प्रभु के लिए, रखें समर्पण-भाव।
भवसागर तारे यही, बनकर सुंदर नाव।। 
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कंकर में शंकर मिले, शंकर में शमशान।
अंतरपट को स्वच्छ रख, पा जाएगा ज्ञान।। 
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काल प्रवर्तित आज में, बदले रोज स्वरूप।
ढाई आखर छोड़कर, कुछ न रहा अनुरूप।। 
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हमने उनसे आज तक, की केवल फरियाद।
और उन्हें लगता रहा, बातें हैं अपवाद।। 
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हार हृदय की हार है, हार यथार्थ, अतीत।
हार मान ले हार जब, तब बेहतर हो जीत।। 
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ठंडक इतनी बढ़ गयी, काँपे नित्य शरीर।
मौन हो गए सूर्य भी, कौन हरे अब पीर।। 
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दिवा स्वप्न जैसे हुई, सुखद सुनहरी धूप।
आग, अँगीठी ही लगे, सुखमय दिव्य अनूप।। 
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कर्म किये हैं जो यहाँ, उसका है परिणाम।
पर लोगों को लग रहा, शरद ऋतु का काम।। 
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शीत लहर में हो गया,सर्द दिवस सह रात।
चिंगारी बस आँख में, सुप्त रहे जज्बात।।65
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काले कागज हो रहे, दोहे लिख-लिख यार।
रोटी भर क्या मोल है, अगर बिके बाजार।।
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