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शुक्रवार, 2 जनवरी 2026

जनवरी २, कब क्या, गीत, निशि, डहलिया, राम सेंगर, त्रिपदी, शिव, शाला छंद,


सलिल सृजन जनवरी २
जनवरी : कब क्या?
*
१. ईसाई नव वर्ष।
३.सावित्री बाई फुले जयंती।
४. लुई ब्रेक जयंती।
५. परमहंस योगानंद जयंती।
१०. विश्व हिंदी दिवस।
१२. विवेकानंद / महेश योगी जयन्ती, युवा दिवस।
१३. गुरु गोबिंद सिंह जयंती।
१४. मकर संक्रांति, बीहू, पोंगल, ओणम।
१५. थल सेना दिवस, कुंभ शाही स्नान।
१९. ओशो महोत्सव।
२०. शाकंभरी पूर्णिमा।
23. नेताजी सुभाष चंद्र बोस जयंती.
२६. गणतंत्र दिवस।
२७. स्वामी रामानंदाचार्य जयंती।
२८. लाला लाजपत राय जयंती।
३०. म. गाँधी शहीद दिवस, कुष्ठ निवारण दिवस।
३१. मैहर बाबा दिवस।
***
साहित्यकार / कलाकार:
सर्व श्री / सुश्री / श्रीमती
१. अर्चना निगम ९४२५८७६२३१
त्रिभवन कौल स्व.
राकेश भ्रमर ९४२५३२३१९५
विनोद शलभ ९२२९४३९९००
सुरेश कुशवाह 'तन्मय'
डॉ. जगन्नाथ प्रसाद बघेल ९८६९०७८४८५
२. राम सेंगर ९८९३२४९३५६
राजकुमार महोबिआ ७९७४८५१८४४
राजेंद्र साहू ९८२६५०६०२५
४. शिब्बू दादा ८९८९००१३५५
८. पुष्पलता ब्योहार ०७६१ २४४८१५२
१२. आदर्श मुनि त्रिवेदी
संतोष सरगम ८८१५०१५१३१
१५. अशोक झरिया ९४२५४४६०३०
१६. हिमकर श्याम ८६०३१७१७१०
२३. अशोक मिजाज ९९२६३४६७८५
२६. उमा सोनी 'कोशिश' ९८२६१९१८७१
***
राम सेंगर
जन्म २-१-१९४५, नगला आल, सिकन्दराऊ, हाथरस उत्तर प्रदेश।
प्रकाशित कृतियाँ:
१. शेष रहने के लिए, नवगीत, १९८६, पराग प्रकाशन दिल्ली।
२. जिरह फिर कभी होगी, २००१, अभिरुचि प्रकाशन दिल्ली।
३.एक गैल अपनी भी, २००९, अनामिका प्रकाशन, इलाहाबाद।
४. ऊँट चल रहा है, २००९, नवगीत, उद्भावना प्रकाशन, दिल्ली।
५. रेत की व्यथा कथा, २०१३, नवगीत, उद्भावना प्रकाशन, दिल्ली।
नवगीत शतक २ तथा नवगीत अर्धशती के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर।
संपर्क: चलभाष ९८९३२४९३५६।
*
शुभांजलि
*
'शेष रहने के लिए',
लिखते नहीं तुम।
रहे लिखना शेष यदि
थकते नहीं तुम।
नहीं कहते गीत 'जिरह
फिर कभी होगी'
मान्यता की चाह कर
बिकते नहीं तुम।
'एक गैल अपनी भी'
हो न जहाँ पर क्रंदन
नवगीतों के राम
तुम्हारा वंदन
*
'ऊँट चल रहा है'
नवगीत का निरंतर।
है 'रेत की व्यथा-कथा'
समय की धरोहर।
कथ्य-कथन-कहन की
अभिनव बहा त्रिवेणी
नवगीत नर्मदा का
सुनवा रहे सहज-स्वर।
सज रहे शब्द-पिंगल
मिल माथ सलिल-चंदन
***
गीत
निशि जिज्ञासु
.
निशि जिज्ञासु सवाल पूछती
ख्वाब दिखा हो मौन बूझती
.
ऊँच-नीच का भेद न माने
तंद्रा-निद्रा सबको देती
धर्म पंथ दल मुल्क जाति को
ठेंगा दिखा, न पंगा लेती
भेद-भाव पर तम की चादर
डाल साम्य पर खुदी रीझती 
निशि जिज्ञासु सवाल पूछती
ख्वाब दिखा हो मौन बूझती
.
किल्ली ढिल्ली करे अहं की
राजा-रंक शरण में आते
कोई हँसकर, कोई रोकर
झुक नैना में नींद बसाते
पार पा सकें, युक्ति किसी को
कोई भी क्यों नहीं सूझती
निशि जिज्ञासु सवाल पूछती
ख्वाब दिखा हो मौन बूझती
.
कौन कहाँ से है आया तू?
जोड़-छोड़ क्यों पछताया तू?
तू तू मैं मैं करी उम्र भर
खुद को जीत कभी पाया तू?
अहं बुद्धि क्यों भटकाती है?
धैर्य चदरिया फटी सीझती
निशि जिज्ञासु सवाल पूछती
ख्वाब दिखा हो मौन बूझती
२.१.२०२६
०००
डहलिया
0
मूलत: मेक्सिको में समुद्र तट से ५००० फुट ऊँचे रेतीले घास मैदानों में ऊगनेवाला डहलिया ब्यूट की मार्चियोनेस द्वारा १७८९ में मैड्रिड के रास्ते इंग्लैंड लाया गया। इनके खो जाने पर १८०४ में लेडी हालैन्ड द्वारा अन्य पौधे लाए गए। ये भी नष्ट हो गए। वर्ष १८१४ में शांति होने तथा महाद्वीप को खोले जाने पर फ्रांस से नए पौधे मँगवाए गए। लिनियस के शिष्य डॉ. डाहल के नाम पर इसे डहलिया कहा गया। महाद्वीप में इसे 'जॉर्जिना' भी कहा जाता है। १८०० के अंत तक डहलिया फूल की पंखुड़ियों से प्राप्त डहलिया एक्सट्रैक्ट प्राचीन दक्षिण अमेरिका से लेकर मध्य मेक्सिको, युकाटन और ग्वाटेमाला की पूर्व-कोलंबियाई संस्कृतियों में एक महत्वपूर्ण जड़वाला औषधीय गुणों के लिए जाना जात था। इसके कंद या जड़ें, उनके अंदर संग्रहीत पौष्टिक इनुलिन और कंद की त्वचा में केंद्रित एंटीबायोटिक यौगिकों दोनों के लिए मूल्यवान थीं। फूल का एज़्टेक नाम एकोकोटली या कोकोक्सोचिटल अर्थात 'पानी का पाइप' है। यह नाम डहलिया के औषधिक प्रभाव (शरीर प्रणाली में पानी की अनुपस्थिति व प्रवाह) को देखते हुए उपयुक्त है।
प्रकार
बगीचे में रंगों और आकृतियों की विविधता के लिए डहलिया लोकप्रिय पुष्प है। ये आसानी से उगने वाले बहुरंगी फूल क्रीमी सफ़ेद, हल्के गुलाबी, चमकीले पीले, लेकर शाही बैंगनी, गहरे लाल आदि अनेक रंगों में खिलते हैं। इस लोकप्रिय उद्यान फूल की ६०,००० से अधिक नामित किस्में हैं। डहलिया बहु आकारी पुष्प है। एकल-फूल वाले ऑर्किड डहलिया से लेकर फूले हुए पोम पोम डहलिया तक, सजावटी डहलिया के फूल आकार, रूप और रंग की विविधता में होते हैं। देर से गर्मियों में खिलनेवाले अपने खूबसूरत फूलों के साथ, डहलिया बगीचे में शानदार पतझड़ का रंग भर देते हैं। बॉल डाहलिया का ऊपरी भाग चपटा होता है, तथा पंखुड़ियाँ सर्पिल आकार में बढ़ती हैं। कैक्टस डहेलिया की पंखुड़ियाँ तारे के आकार में बढ़ती हैं। मिग्नॉन डहलिया में गोल किरण पुष्प होते हैं। आर्किड डाहलिया का केंद्र खुला होता है तथा एक डिस्क के चारों ओर पुष्पों की किरणें होती हैं। पोम्पोम डहलिया गोल आकार में उगते हैं और उनकी पंखुड़ियाँ घुमावदार होती हैं। सजावटी डहलिया को १५ अलग-अलग रंगों और संयोजनों में वर्गीकृत किया जा सकता है।
लाल डहलिया: 'अरेबियन नाइट': गहरे बरगंडी रंग के फूल लगभग ३.५ इंच चौड़े होते हैं। 'बेबीलोन रेड': लंबे समय तक चलने वाली, 8 इंच की डिनर प्लेट एक आकर्षक रंग में खिलती है। 'बिशप लैंडैफ़': मधुमक्खियों और बागवानों दोनों द्वारा पसंद किया जाने वाला यह छोटा लाल डाहलिया लाल पंखुड़ियों और गहरे रंग के पत्तों से सजा हुआ है। 'क्रेव कुएर': ११ इंच के डिनर प्लेट के आकार के ये फूल मजबूत तने के ऊपर खिलते हैं, ये जीवंत लाल फूल ४ फीट से अधिक ऊंचे होते हैं। 'रेड कैप': ४ इंच चौड़े फूल चमकीले लाल रंग में खिलते हैं। 'रेड फॉक्स': सघन पौधे जो गहरे लाल, ४ इंच के फूलों के साथ खिलते हैं।
सफेद डहलिया: 'बूम बूम व्हाइट': ५ इंच के खूबसूरत फूलों वाला एक सफ़ेद बॉल डाहलिया। 'सेंटर कोर्ट': यह सफेद डहलिया मजबूत तने के ऊपर ६ इंच के सफेद फूलों का प्रचुर उत्पादक है। 'लांक्रेसी': ४ इंच का, मलाईदार सफेद गेंद जैसा डाहलिया जो छोटे कंदों से उगता है। 'पेटा की शादी': शानदार, मलाईदार ३ इंच के फूलों की प्रचुरता पैदा करती है। 'स्नोकैप': बीच में हरे रंग के विचित्र स्पर्श के साथ सपाट सफेद पंखुड़ियाँ। 'व्हाइट डिनर प्लेट': ये शानदार, शुद्ध सफेद डहलिया फूल १० इंच तक चौड़े होते हैं। 'व्हाइट ओनेस्टा': यह बहुत अधिक फूलने वाला, सपाट सफेद रंग का डहलिया ३.५ इंच चौड़ा होता है।
गुलाबी डहलिया: 'कैफे औ लेट': सुंदर मलाईदार गुलाबी फूल ९ इंच तक चौड़े होते हैं और शादियों और समारोहों में अपनी खूबसूरती से सबको चौंका देते हैं। 'चिल्सन्स प्राइड': 4 इंच की ये सफेद और गुलाबी सुंदरियां गर्मी में लाल हो जाती हैं। 'एसली': ३ इंच के गुलाबी डहलिया में फूलों की भरमार होती है। 'हर्बर्ट स्मिथ': कंद भले ही छोटे हों, लेकिन ये चमकीले गुलाबी रंग के डहलिया 6 इंच तक चौड़े होते हैं। 'रेबेका लिन': प्रचुर मात्रा में, छोटे गुलाबी फूल बबल गम की याद दिलाते हैं। 'सैंड्रा': गेंद के आकार में गुलाबी पंखुड़ियों के साथ किसी भी परिदृश्य में नाटकीयता जोड़ती है। 'मधुर प्रेम': मलाईदार सफेद किनारों वाले हल्के गुलाबी फूल समय के साथ हल्के लाल रंग में बदल जाते हैं। 'ट्रिपल ली ​​डी': कॉम्पैक्ट पौधों के ऊपर असामान्य गुलाबी-सैल्मन रंग।
पीला डहलिया: 'गोल्डन टॉर्च': गोल, पीले रंग की गेंदें जो कटे हुए फूलों की सजावट के लिए उपयुक्त हैं। 'केल्विन फ्लडलाइट': विशाल, लंबे समय तक टिकने वाले पीले फूल जो 10 इंच तक चौड़े होते हैं। 'पोल्वेंटन सुप्रीम': लंबी शाखाओं के ऊपर गेंदों के रूप में खिलने वाला कोमल पीला डाहलिया। 'सन किस्ड': मजबूत तने, जिसके ऊपर चमकीली पीली पंखुड़ियां होती हैं। 'येलो परसेप्शन': आकर्षक 4 इंच के फूलों में पीले रंग की पंखुड़ियां होती हैं, जिनके सिरे सफेद होते हैं।
बैंगनी डहलिया: 'बेबीलोन पर्पल': विशाल डिनर प्लेट बैंगनी रंग की शाही छटा में खिलती है। 'ब्लू बॉय डाहलिया': शायद नीले डाहलिया का सबसे करीबी विकल्प, यह बकाइन डाहलिया तितलियों को आकर्षित करता है। 'दिवा': गहरे, शाही बैंगनी रंग का डाहलिया मजबूत तने पर खिलता है। 'फ़र्नक्लिफ़ इल्यूज़न': हल्के बकाइन फूल 8 इंच तक चौड़े होते हैं। 'प्रेशियस': एक बैंगनी-लैवेंडर फूल जो धीरे-धीरे सफेद हो जाता है।
औषधिक महत्व
डंडेलियन और चिकोरी में पाया जाने वाला १५ से २० प्रतिशत इनुलिन (शरीर की इंसुलिन आवश्यकता पूरी करने में सहायक प्राकृतिक उच्च फाइबर खाद्य), 'डहलिन' अर्थात डहलिया कंद में होता है। इनुलिन निकालने के लिए, जड़ों या कंदों को काट और चूने के दूध से उपचारित कर भाप में पकाया जाता है। फिर रस को निचोड़-छान-साफ कर तरल को एक घूमने वाले कूलर में गुच्छे बनने तक चलाया जाता है। इन गुच्छों को एक केन्द्रापसारक मशीन द्वारा अलगकर, धो और रंगहीन कर प्राप्त शुद्ध उत्पाद अंत में तनु अम्ल से उपचारित कर लेवुलोज में परिवर्तित किया जाता है। लेवुलोज के इस घोल को बेअसर कर वैक्यूम पैन में सिरप में वाष्पित किया जाता है। प्राप्त पूर्ण शुद्ध उत्पाद का मीठा और सुखद स्वाद मधुमेह रोगियों,कन्फेक्शनरी बनाने और चीनी उत्पादों के क्रिस्टलीकरण को धीमा करने के लिए भी उपयोगी बनाता है। इसे शराब बनाने और मिनरल वाटर उद्योगों में भी आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है। एक स्कॉटिश विश्वविद्यालय ने डहेलिया कंद से सेना के लिए एक मूल्यवान और अत्यंत आवश्यक औषधि निकालने की प्रक्रिया विकसित की।विशेष उपचार से गुजरने के बाद, डाहलिया कंद और चिकोरी से शुद्ध लेवुलोज (अटलांटा स्टार्च या डायबिटिक शुगर) से मधुमेह और तपेदिक तथा बच्चों की दुर्बलता का इलाज किया जाता है। १९०८ में पेरिस में आयोजित चीनी उद्योग की दूसरी अंतर्राष्ट्रीय कांग्रेस में पढ़े गए एक शोधपत्र के अनुसार शुद्ध लेवुलोज इनुलिन को तनु अम्लों के साथ उलट कर बनाया जाता है। सेलुलर क्षतिरोधक एंटीऑक्सीडेंट गुणों, सूजनरोधी प्रभाव, रक्त शर्करा विनियमन, कार्डियोवैस्कुलर सपोर्ट तथा प्रतिरक्षा प्रणाली सहायक के रूप में डहलिया अर्क की महत्वपूर्ण भूमिका पर शोध जारी है।
***
कुछ त्रिपदियाँ
*
नोटा मन भाया है,
क्यों कमल चुनें बोलो?
अब नाथ सुहाया है।
*
तुम मंदिर का पत्ता
हो बार-बार चलते
प्रभु को भी तुम छलते।
*
छप्पन इंची छाती
बिन आमंत्रण जाकर
बेइज्जत हो आती।
*
राफेल खरीदोगे,
बिन कीमत बतलाये
करनी भी भोगोगे।
*
पंद्रह लखिया किस्सा
भूले हो कह जुमला
अब तो न चले घिस्सा।
*
वादे मत बिसराना,
तुम हारो या जीतो-
ठेंगा मत दिखलाना।
*
जनता भी सयानी है,
नेता यदि चतुर तो
यान उनकी नानी है।
*
कर सेवा का वादा,
सत्ता-खातिर लड़ते-
झूठा है हर दावा।
*
पप्पू का था ठप्पा,
कोशिश रंग लाई है-
निकला सबका बप्पा।
*
औंधे मुँह गर्व गिरा,
जुमला कह वादों को
नज़रों से आज गिरा।
*
रचना न चुराएँ हम,
लिखकर मौलिक रचना
आइए हम अपना नाम कमाएं.
*
गागर में सागर सी,
क्षणिक लघु, जिसका अर्थ है बड़ा-
ब्रज के नटनागर सी।
*
मन ने मन से मिलकर
उन्मन हो कुछ न कहा-
धीरज का बाँध ढहा।
*
है किसका कौन सगा,
खुद से खुद ने पूछा?
उत्तर जो नेह-पगा।
*
तन से तन जब रूठा,
मन, मन ही मन रोया-
सुनकर झूठी-झूठा।
*
तन्मय होकर तन ने,
मन-मृण्मय जान कहा-
क्षण भंगुर है दुनिया।
***
शिव वंदना : एक दोहा अनुप्रास का
*
शिशु शशि शीश शशीश पर, शुभ शशिवदनी-साथ
शोभित शशि सी शशिमुखी, मोहित शिव शशिनाथ
*
शशीश अर्थात चन्द्रमा के स्वामी शिव जी के मस्तक पर बाल चन्द्र शोभायमान है, चन्द्रवदनी चन्द्रमुखी पावती जी उनके साथ हैं जिन्हें निहारकर शिव जी मुग्ध हो रहे हैं.
***
एक दोहा श्लेष का 
शुभ रजनी! शशि से कहा, तारे हैं नाराज.
किसकी शामत आ गई, करे हमारा काज.
२.१.२०१८
***
गीत :
घोंसला
*
घोंसले में
परिंदे ही नहीं
आशाएँ बसी हैं
*
आँधियाँ आएँ न डरना
भीत हो,जीकर न मरना
काँपती हों डालियाँ तो
नीड तजकर नहीं उड़ना
मंज़िलें तो
फासलों को नापते
पग को मिली हैं
घोंसले में
परिंदे ही नहीं
आशाएँ बसी हैं
*
संकटों से जूझना है
हर पहेली को सुलझाना है
कोशिशें करते रहे जो
उन्हें राहें सूझना है
ऊगती उषा
तभी जब साँझ
खुद हंसकर ढली है
घोंसले में
परिंदे ही नहीं
आशाएँ बसी हैं
११-१०-२०१६
***
नवगीत
.
हाथों में मोबाइल थामे
गीध दृष्टि पगडंडी भूली
भटक न जाए
.
राजमार्ग पर जाम लगा है
कूचे-गली हुए हैं सूने
ओवन-पिज्जा का युग निर्दय
भटा कौन चूल्हे में भूने?
महानगर में सतनारायण
कौन कराये कथा तुम्हारी?
गोबर बिन गणेश का पूजन
कैसे होगा बिपिनबिहारी?
कलावती की कथा सुन रहे
लीला की लीला मन झूली
मटक न आए
.
रावण रखकर रूप राम का
करे सिया से नैन मटक्का
मक्का जाने खों जुम्मन नें
बेंच दई बीजन कीं मक्का
हक्का-बक्का खाला बेबस
बिटिया बारगर्ल बन सिसके
एड्स बाँट दूँ हर गाहक को
भट्टी अंतर्मन में दहके
ज्वार-बाजरे की मजबूरी
भाटा-ज्वार दे गए सूली
गटक न पाए
.
नवगीत:
*
खुशियों की मछली को
चिंता का बगुला
खा जाता है
.
श्वासों की नदिया में
आसों की लहरें
कूद रहीं हिरणी सी
पलभर ना ठहरें
आँख मूँद मगन
उपवासी साधक
ठग जाता है
.
पथरीले घाटों के
थाने हैं बहरे
देख अदेखा करते
आँसू-नद गहरे
एक टाँग टाँग खड़ा
शैतां, साधू बन
डट खाता है
.
श्वेत वसन नेता से
लेकिन मन काला
अंधे न्यायलय ने
सच झुठला डाला
निरपराध फँस जाता
अपराधी झूठा
बच जाता है
२.१.२०१५
छंद सलिला:
शाला छंद
*
(अब तक प्रस्तुत छंद: आगरा, अचल, अचल धृति, आर्द्रा, आल्हा, इंद्र वज्र, उपेन्द्र वज्र, कीर्ति, घनाक्षरी, प्रेमा, वाणी, शक्तिपूजा, सार, माला)
शाला छंद में 2 छंद, 4 छंद, 44 अक्षर और 71 अक्षर होते हैं। पहले, दूसरे और चौथे चरण में 2 तगण 1 जगण 2 गुरु होते हैं और तीसरे चरण में जगण तगण जगण 2 गुरु होते हैं।
शाला दे आनंद, इंद्रा तीसरे चरण में
हो उपेन्द्र शुभ छंद, चरण एक दो तीन में
उदाहरण:
१. जा पाठशाला कर लो पढ़ाई, भूलो न सीखा तब हो बड़ाई
पढ़ो-लिखो जो वह आजमाओ, छोडो अधूरा मत पाठ भाई
२. बोलो, न बोलो मत राज खोलो, चाहो न चाहो पर साथ हो लो
करो न कोई रुसवा किसी को, सच्चा कहो या मत झूठ बोलो
३. बाती मिलाओ मन साथ पाओ, वादा निभाओ फिर मुस्कुराओ
बसा दिलों में दिल आप दोनों, सदा दिवाली मिल के मनाओ
२.१.२०१४
***

गुरुवार, 11 दिसंबर 2025

दिसंबर ११, दृष्टान्त अलंकार, दोहा, शिव, राम, सीता, सॉनेट, संतोष, नवगीत, लघुकथा,


सलिल सृजन दिसंबर ११
0
मुक्तिका
भीगी-भीगी दो आँखें रतनारी
महक रहीं ज्यों बासंती फुलवारी
.
शोख अदाएँ गिरा रही हैं बिजली
घिरी घटाएँ हवन, पवन अग्यारी
.
शरारती नज़रों का उठ-मिल-झुकना
दिल-बस्ती को जीत, ध्वजा फहरा री!
.
खिल गुलाब खिलखिल करते गालों पर
ताना-बाना तानों का दोधारी
.
दिलकश अदा दिखा फिर- फिर मुसकाना
फिर-फिर देख अदेखा करती प्यारी
.
बन-ठनकर जब-जब आए बनवारी
जीत हारकर, हो हरसिँगार की क्यारी
.
तन तन-तनकर झुके, थाम लें बाँहें
मन, मन ही मन मुरली मधुर गुँजा री
११.१२.२०२५
०००
*
दोहा सलिला
*
राम लोक मंगल करें, सिया लोक कल्याण।
सिया-राम मिल फूँकते, जनगण-मन में प्राण।।
*
श्रद्धा शिवा ह्रदय बसें, शिव विश्वास अनंत।
मिले शिवा-शिव आस हर, करते पूर्ण दिगंत।।
*
निज अंत: सुख हेतु ही, करें राम गुणगान।
शिव शंका का अंत कर, दें चाहा वरदान।।
*
ताप त्रयी से मुक्ति दें, शिव जग-जनक विराट।
धरें हलाहल कंठ में, जिसकी कहीं न काट।।
*
सत्य बसा उर या नहीं, प्रभु पल में लें देख।
करें कृपा हर भक्त पर, कहीं न सीमा रेख।।
*
हनुमत बल के धाम हैं, तनिक नहीं अभिमान।
निगुण-सगुण श्री राम हैं, सकल गुणों की खान।।
*
ऊष्म-शीत संगम परम, शिव जी जग-आराध्य।
शिवा मातु शक्ति अगम, सुगम सभी को साध्य।।
*
है सरोज शत गुण लिए, कौशल अनुपम प्राप्त।
देव-देवियों को सदा, प्रिय है शदल आप्त।।
*
नमन करें कैलाश को, जहाँ शिवा-शिव साथ।
बस श्रद्धा विश्वास उर, वंदन लें- नत माथ।।
*
नारी महिमावान है, सकल गुणों की खान।
नदी सदृश जाती जहाँ, दे पाती वरदान।।
*
वंदनीय नारी वही, जो माने मर्याद।
दंडनीय केवल तभी, जब तोड़े मर्याद।।
*
अवगुण आठ न हों अगर, तब ही नारी इष्ट।
अवगुण का बाहुल्य ही, करता रहा अनिष्ट।।
*
मानस में है समाहित, सत्चिंतन का सार।
मानव मूल्यों के बिना, है साहित्य असार।।
११.१२.२०२२
***
सॉनेट
संतोष
*
है संतोष कृपा शारद की बरस रही हम सबके ऊपर।
हो संतोष अगर कुछ सार्थक गह-कह पाएँ।।
जड़ें जमीं में जमा, उड़ें, आएँ नभ छूकर।
सत-शिव-सुंदर भाव तनिक तो हम तह पाएँ।।
मानव हैं माया-मद-मोह, न ममता छूटे।
इन्सां हैं ईश्वर के निकट तनिक हो पाएँ।
जोड़ें परोपकार की पूँजी, काल न लूटे।।
दीनबंधु बन नर में ही नारायण पाएँ।।
काया-माया-छाया नश्वर मगर सत्य भी।
राग और वैराग्य समन्वय शुभ कर गाएँ।
ईश्वर की करुणा, मनुष्य के हृदय बसेगी।
जब तब ही हम ज्यों की त्यों चादर धर पाएँ।।
सरला विमला मति दे शारद!, सफल साधना।
तभी जीव संजीव हो सके, साज साध ना।।
११-१२-२०२१
***
शिवमय दोहे
*
डिम-डिम डमरू-नाद है, शिव-तात्विक उद्घोष.
अशुभ भूल, शुभ ध्वनि सुनें, नाद अनाहद कोष.
.
डमरू के दो शंकु हैं, सत्-तम का संयोग.
डोर-छोर श्वासास है, नाद वियोगित योग.
.
डमरू अधर टँगा रहे, नभ-भू मध्य विचार.
निराधार-आधार हैं, शिव जी परम उदार.
.
डमरू नाग त्रिशूल शशि, बाघ-चर्म रुद्राक्ष.
वृषभ गंग गणपति उमा कार्तिक भस्म शिवाक्ष.
.
तेरह तत्व त्रयोदशी, कभी न भूलें भक्त.
कर प्रदोष व्रत, दोष से मुक्त, रहें अनुरक्त.
.
शिव विराग-अनुराग हैं, क्रोधी परम प्रशांत.
कांता कांति अजर शिवा, नमन अमर शिव कांत.
.
गौरी-काली एक हैं, गौरा-काला एक.
जो बतलाए सत्य यह्, वही राह है नेक.
११-१२-२०१९
***
कुण्डलिया
कार्य शाला
*
तन की मनहर बाँसुरी, मन का मधुरिम राग।
नैनों से मुखरित हुआ, प्रियतम का अनुराग।। -मिथिलेश बड़गैयाँ
प्रियतम का अनुराग, सलिल सम प्रवहित होता।
श्वास-श्वास में प्रवह, सतत नव आशा बोता।।
जान रहे मिथिलेश, चाह सिय-रघुवर-मन की।
तज सिंहासन राह, गहेंगे हँसकर वन की।। - संजीव
११.१२.२०१८
***
गीत :
नूराकुश्ती खेल रहे हो
देश गर्त में ठेल रहे हो
*
तुम ही नहीं सयाने जग में
तुम से कई समय के मग में
धूल धूसरित पड़े हुए हैं
शमशानों में गड़े हुए हैं
अवसर पाया काम करो कुछ
मिलकर जग में नाम करो कुछ
रिश्वत-सुविधा-अहंकार ही
झिल रहे हो, झेल रहे हो
नूराकुश्ती खेल रहे हो
देश गर्त में ठेल रहे हो
*
दलबंदी का दलदल घटक
राजनीति है गर्हित पातक
अपना पानी खून बतायें
खून और का व्यर्थ बहायें
सच को झूठ, झूठ को सच कह
मैली चादर रखते हो तह
देशहितों की अनदेखी कर
अपनी नाक नकेल रहे हो
नूराकुश्ती खेल रहे हो
देश गर्त में ठेल रहे हो
२२-१२-२०१७
दोहा दुनिया
*
आलम आलमगीर की, मर्जी का मोहताज
मेरे-तेरे बीच में, उसका क्या है काज?
*
नयन मूँद देखूं उसे, जो छीने सुख-चैन
गुम हो जाता क्यों कहो, ज्यों ही खोलूँ नैन
*
पल-पल बीते बरस सा, अपने लगते गैर
खुद को भूला माँगता, मन तेरी ही खैर
*
साया भी अपना नहीं, दे न तिमिर में साथ
अपना जीते जी नहीं, 'सलिल' छोड़ता हाथ
*
रहे हाथ में हाथ तो, उन्नत होता माथ
खुद से आँखे चुराता, मन तू अगर न साथ
११-१२-२०१६
***
गीत
समय के संतूर पर
सरगम सुहानी
बज रही.
आँख उठ-मिल-झुक अजाने
आँख से मिल
लज रही.
*
सुधि समंदर में समाई लहर सी
शांत हो, उत्ताल-घूर्मित गव्हर सी
गिरि शिखर चढ़ सर्पिणी फुंकारती-
शांत स्नेहिल सुधा पहले प्रहर सी
मगन मन मंदाकिनी
कैलाश प्रवहित
सज रही.
मुदित नभ निरखे, न कह
पाए कि कैसी
धज रही?
*
विधि-प्रकृति के अनाहद चिर रास सी
हरि-रमा के पुरातन परिहास सी
दिग्दिन्तित रवि-उषा की लालिमा
शिव-शिवा के सनातन विश्वास सी
लरजती रतनार प्रकृति
चुप कहो क्या
भज रही.
साध कोई अजानी
जिसको न श्वासा
तज रही.
*
पवन छेड़े, सिहर कलियाँ संकुचित
मेघ सीचें नेह, बेलें पल्ल्वित
उमड़ नदियाँ लड़ रहीं निज कूल से-
दमक दामिनी गरजकर होती ज्वलित
द्रोह टेरे पर न निष्ठा-
राधिका तज
ब्रज रही.
मोह-मर्यादा दुकूलों
बीच फहरित
ध्वज रही.
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अलंकार सलिला ४०
दृष्टान्त अलंकार
अलंकार दृष्टान्त को जानें, लें आनंद
*
अलंकार दृष्टान्त को, जानें-लें आनंद|
भाव बिम्ब-प्रतिबिम्ब का, पा सार्थक हो छंद||
जब पहले एक बात कहकर फिर उससे मिलती-जुलती दूसरी बात, पहली बात पहली बात के उदाहरण के रूप में कही जाये अथवा दो वाक्यों में बिम्ब-प्रतिबिम्ब भाव हो तब वहाँ दृष्टान्त अलंकार होता है|
जहाँ उपमेय और उपमान दोनों ही सामान्य या दोनों ही विशेष वाक्य होते हैं और उनमें बिम्ब - प्रतिबिम्ब भाव हो तो दृष्टांत अलंकार होता है|
दृष्टान्त में दो वाक्य होते हैं, एक उपमेय वाक्य, दूसरा उपमान वाक्यदोनों का धर्म एक नहीं होता पर एक समान होता है|
उदाहरण:
१. सिव औरंगहि जिति सकै, और न राजा-राव|
हत्थी-मत्थ पर सिंह बिनु, आन न घालै घाव||
यहाँ पहले एक बात कही गयी है कि शिवाजी ही औरंगजेब को जीत सकते हैं अन्य राजा - राव नहीं| फिर उदाहरण के रूप में पहली बात से मिलती-जुलती दूसरी बात कही गयी है कि सिंह के अतिरिक्त और कोई हाथी के माथे पर घाव नहीं कर सकता|
२. सुख-दुःख के मधुर मिलन से, यह जीवन हो परिपूरन|
फिर घन में ओझल हो शशि, फिर शशि में ओझल हो घन||
३. पगीं प्रेम नन्द लाल के, हमें न भावत भोग|
मधुप राजपद पाइ कै, भीख न माँगत लोग||
४. निरखि रूप नन्दलाल को, दृगनि रुचे नहीं आन|
तज पीयूख कोऊ करत, कटु औषधि को पान||
५. भरतहिं होय न राजमद, विधि-हरि-हर पद पाइ|
कबहुँ कि काँजी-सीकरनि, छीर-सिन्धु बिलगाइ||
६. कन-कन जोरे मन जुरै, खाबत निबरै रोग|
बूँद-बूँद तें घट भरे, टपकत रीतो होय||
७. जपत एक हरि नाम के, पातक कोटि बिलाहिं|
लघु चिंगारी एक तें, घास-ढेर जरि जाहिं||
८. सठ सुधरहिं सत संगति पाई|
पारस परसि कु-धातु सुहाई||
९. धनी गेह में श्री जाती है, कभी न जाती निर्धन-घर में|
सागर में गंगा मिलती है, कभी न मिलती सूखे सर में||
१०. स्नेह - 'सलिल' में स्नान कर, मिटता द्वेष - कलेश|
सत्संगति में कब रही, किंचित दुविधा शेष||
११. तिमिर मिटा / भास्कर मुस्कुराया / बिन उजाला / चाँद सँग चाँदनी / को करार न आया| - ताँका
टिप्पणी:
१. दृष्टान्त में अर्थान्तरन्यास की तरह सामान्य बात का विशेष बात द्वारा या विशेष बात का सामान्य बात द्वारा समर्थन नहीं होता| इसमें एक बात सामान्य और दूसरी बात विशेष न होकर दोनों बातें विशेष होती हैं|
२. दृष्टान्त में प्रतिवस्तूपमा की भाँति दोनों बातों का धर्म एक नहीं होता अपितु मिलता-जुलता होने पर भी भिन्न-भिन्न होता है|
११-१२-२०१५
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नवगीत
ठेंगे पर कानून
*
मलिका - राजकुँवर कहते हैं
ठेंगे पर कानून
संसद ठप कर लोकतंत्र का
हाय! कर रहे खून
*
जनगण - मन ने जिन्हें चुना
उनको न करें स्वीकार
कैसी सहनशीलता इनकी?
जनता दे दुत्कार
न्यायालय पर अविश्वास कर
बढ़ा रहे तकरार
चाह यही है सजा रहे
कैसे भी हो दरबार
जिसने चुना, न चिंता उसकी
जो भूखा दो जून
मलिका - राजकुँवर कहते हैं
ठेंगे पर कानून
संसद ठप कर लोकतंत्र का
हाय! कर रहे खून
*
सरहद पर ही नहीं
सडक पर भी फैला आतंक
ले चरखे की आड़
सँपोले मार रहे हैं डंक
जूते उठवाते औरों से
फिर भी हैं निश्शंक
भरें तिजोरी निज,जमाई की
करें देश को रंक
स्वार्थों की भट्टी में पल - पल
रहे लोक को भून
मलिका - राजकुँवर कहते हैं
ठेंगे पर कानून
संसद ठप कर लोकतंत्र का
हाय! कर रहे खून
*
परदेशी से करें प्रार्थना
आ, बदलो सरकार
नेताजी को बिना मौत ही
दें कागज़ पर मार
संविधान को मान द्रौपदी
चाहें चीर उतार
दु:शासन - दुर्योधन की फिर
हो अंधी सरकार
मृग मरीचिका में जीते
जैसे इन बिन सब सून
मलिका - राजकुँवर कहते हैं
ठेंगे पर कानून
संसद ठप कर लोकतंत्र का
हाय! कर रहे खून
११-१२-२०१५
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लघुकथा -
समरसता
*
भृत्यों, सफाईकर्मियों और चौकीदारों द्वारा वेतन वृद्धि की माँग मंत्रिमंडल ने आर्थिक संसाधनों के अभाव में ठुकरा दी।
कुछ दिनों बाद जनप्रतिनिधियों ने प्रशासनिक अधिकारियों की कार्य कुशलता की प्रशंसा कर अपने वेतन भत्ते कई गुना अधिक बढ़ा लिये।
अगली बैठक में अभियंताओं और प्राध्यापकों पर हो रहे व्यय को अनावश्यक मानते हुए सेवा निवृत्ति से रिक्त पदों पर नियुक्तियाँ न कर दैनिक वेतन के आधार पर कार्य कराने का निर्णय सर्व सम्मति से लिया गया और स्थापित हो गयी समरसता।
७-१२-२०१५
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नवगीत:
जिजीविषा अंकुर की
पत्थर का भी दिल
दहला देती है
*
धरती धरती धीरज
बनी अहल्या गुमसुम
बंजर-पड़ती लोग कहें
ताने दे-देकर
सिसकी सुनता समय
मौन देता है अवसर
हरियाती है कोख
धरा हो जाती सक्षम
तब तक जलती धूप
झेलकर घाव आप
सहला लेती है
*
जग करता उपहास
मारती ताने दुनिया
पल्लव ध्यान न देते
कोशिश शाखा बढ़ती
द्वैत भुला अद्वैत राह पर
चिड़िया चढ़ती
रचती अपनी सृष्टि आप
बन अद्भुत गुनिया
हार न माने कभी
ज़िंदगी खुद को खुद
बहला लेती है
*
छाती फाड़ पत्थरों की
बहता है पानी
विद्रोहों का बीज
उठाता शीश, न झुकता
तंत्र शिला सा निठुर
लगे जब निष्ठुर चुकता
याद दिलाना तभी
जरूरी उसको नानी
जन-पीड़ा बन रोष
दिशाओं को भी तब
दहला देती है
११-१२-२०१४
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लघुकथा:
जंगल में जनतंत्र
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जंगल में चुनाव होनेवाले थे।
मंत्री कौए जी एक जंगी आमसभा में सरकारी अमले द्वारा जुटाई गयी भीड़ के आगे भाषण दे रहे थे।- ' जंगल में मंगल के लिए आपस का दंगल बंद कर एक साथ मिलकर उन्नति की रह पर कदम रखिये। सिर्फ़ अपना नहीं सबका भला सोचिये।'
' मंत्री जी! लाइसेंस दिलाने के लिए धन्यवाद। आपके कागज़ घर पर दे आया हूँ। ' भाषण के बाद चतुर सियार ने बताया। मंत्री जी खुश हुए।
तभी उल्लू ने आकर कहा- 'अब तो बहुत धांसू बोलने लगे हैं। हाऊसिंग सोसायटी वाले मामले को दबाने के लिए रखी' और एक लिफाफा उन्हें सबकी नज़र बचाकर दे दिया।
विभिन्न महकमों के अफसरों उस अपना-अपना हिस्सा मंत्री जी के निजी सचिव गीध को देते हुए कामों की जानकारी मंत्री जी को दी।
राष्ट्रवादी मंत्री जी मिले उपहारों और लिफाफों को देखते हुए सोच रहे थे - 'जंगल में जनतंत्र जिंदाबाद। '
११-१२-२०१३
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