रविवार, 28 जनवरी 2018

शिव दोहावली

शिव कहते विश्वास ही,
जग-जीवन का सार।
नष्ट हुआ विश्वास तो,
निर्बल है आधार।।
*
सब पाने की वृत्ति ही,
बन जाती है लोभ।
नहीं लोभ का अंत है,
शेष रहे बस क्षोभ।।
जो पाया उससे अधिक,
अच्छा पा-लें भोग।
यह प्रवृत्ति ही साध्वियों!,
अंतर्मन का रोग।।
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देख दिगंबर युवा को,
प्रगटा छिपा विकार।
साथी-प्रति श्रद्धा अटल,
एकमात्र उपचार।।
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साथी का विश्वास मत,
करें कभी भी भंग।
सच्चा शिव-पूजन यही,
श्रद्धा रहे अभंग।।
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मन से जिसको वर दिया,
एक वही है इष्ट।
अन्य उत्तमोतम अगर,
चाहें- करें अनिष्ट।।
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काम जीवनाधार है,
काम न हो व्यापार।
भोग सकें निष्काम हो,
तभी साध्य स्वीकार।।
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काम न हेय, न त्याज्य है,
काम सृष्टि का मूल।
संयम से अमृत बने,
शशि सिर पर मत भूल।।
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अति वर्जित सर्वत्र ही,
विष हो अतिशय काम।
रोक कण्ठ में लें पचा,
शांत चित्त मन-थाम।।
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सर्प नहीं संदेह का,
डंस पाए दें ध्यान।
साथी पर विश्वास रख,
दें-पा श्रद्धा-मान।।
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विनत साध्वियों ने किया,
ग्रहण विमल शिव तत्व।
श्रद्धायुत विश्वास ही,
श्वास-आस का सत्व।।
*
२९.१.२०१८, जबलपुर

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