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सोमवार, 11 अक्टूबर 2010

शक्ति पूजन पर्व पर विशेष कविता: बेटी माँ --- पंकज त्रिवेदी

शक्ति पूजन पर्व पर विशेष कविता:

बेटी माँ

पंकज त्रिवेदी 
*
खरगोश सी भोली हसीं,
और
तितलियों  सा उड़ता हुआ स्वप्न....
चौंधियाने लगा अचानक ही
मेरी आँखों में
और फिर....

पंछिओं की चहचहाहट के बदले
मंदिर में बजती घंटियों की ध्वनि से
सजने लगी मेरी सुबह.....

कुछ दूर बैठे हुए थे
कमजोर हाथों से ताली बजाकर
माँ की आरती में मग्न 
कुछ भक्त परिसर की कुर्सियों पर.

"मैं  नहीं   मानता इस माँ को 
जिसने मुझे ये दिन दिखाए" - 
कहते हुए हाथ लाठी  के सहारे
भटक रहे थे कुछ अन्य.
किसी की पत्नी नहींकिसी का पति नहीं.

हम दो हैं यहाँ, इन बूढ़ों के बीच में
अपना छोटा सा संसार लिये
वृद्धाश्रम की एक खोली में
दो रोटी के लिये आस जोहते.

नवरात्रि के दिए की लौ के साथ
प्रज्ज्वल्लित हो रहा है हमारा जीवन 
इस सेवाधाम में..
मन ही मन सोचता हूँ: 
'हमारी दो बिटियाँ हैं.
जीवन जीने के लिये 
भले ही हम हैं यहाँ...
अंतिम सांस तो नहीं बीतेगी यहाँ ?'

"नहींयह कभी नहीं होगा"-कहती हुई तुम
सिहर उठती हो और  तभी-
अचानक आईं हमारी बेटियाँ
कंधे पर हाथ रखकर झाँकती हैं हमारी
सूनी आँखों में....

सन्नाटे से उभरते हुए हम
चलने लगते हैं-
अपनी बेटियों के सहारे
और उनके मजबूत कंधों ने
कुछ कहे बिना कह दिया:
'अब हम उठा सकते हैं
आपके प्यार भरे दुलार का भार.
आपसे मिले दुलार का ऋण तो कभी नहीं
चुकाया जा सकता पर
आपके गले लगकर आपका आशीष पाने का
दमख़म हममें है अभी भी... !!

हवा में घुलती
घंटियों की ध्वनि के साथ
मेरा मन कह रहा है :
'माँ!  मंदिर में ही नहीं है,
वह तो ज़मीन पर भी रहती है
कभी-कभी बेटी बनकर भी.
हम ही नहीं कह पाते उसे
'बेटी माँ'.

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