शुक्रवार, 26 जनवरी 2018

शिव दोहावली

शिव दिक्-अंबर ओढ़कर,
घूम रहे निर्द्वंद।
घेरे हैं ऋषि-पत्नियां,
मन में अंतर्द्वंद।।
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काश पा सकें संग तो,
पूरी हो हर आस।
शिव मुस्काते मौन रह,
मोह बना संत्रास।।
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ऋषिगण ईर्ष्या-वश जले,
मिटा आत्म-संतोष।
मोह-कामवश पत्नियां,
बनीं लोभ का कोष।।
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क्रोध-द्वेष-कामाग्निवश
हुए सभी संत्रस्त।
गंवा शांति-विश्वास सब,
निष्प्रभ ज्यों रवि अस्त।।
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देख, न शिव को देखते,
रहे लिंग ही देख।
शिव से अंग अलग करें,
काल रहा हंस देख।।
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मारो-छोड़ो वृत्तियां,
करा रहीं संघर्ष।
तत्व-ज्ञान विस्मृत हुआ,
आध्यात्मिक अपकर्ष।।
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विधि-हरि से की प्रार्थना,
'देव! मिटाओ क्लेश।
राह दिखाओ शांति हो,
माया रहे न लेश।।
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आत्मबोध पा ध्यान में,
लौटे शिव के पास।
हारे हम, शक-सर्प ही,
स्वीकारें उपहार।।
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अवढरदानी दिगंबर,
हंसे ठठाकर खूब।
तत्क्षण सब अवसाद खो,
गए हर्ष में डूब।।
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शिव-अनुकंपा से मिला,
सत्य सनातन ज्ञान।
प्रवृति मार्ग साधन सहज,
निवृति साध्य संधान।।
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श्रेष्ठ न लिंग, न योनि है
हीन, नहीं असमान।
नर-नारी पूरक, न कर
शक, दे-पा सम मान।।
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रहे प्रतिष्ठा परस्पर,
वरें राह अद्वैत।
पूजक-पूजित परस्पर,
बनें भुलाकर द्वैत।।
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जग-जीवन-आधार जो,
करें उसी की भक्ति।
योनि-रूप सह वेदिका,
लिंग पूज लें शक्ति।।
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बिंदु-सिंधु का समन्वय,
कर प्रवृत्ति है धन्य।
वीतराग समभाव से,
देख अलिप्त अनन्य।।
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ऋषभदेव शिव दिगंबर,
इंद्रियजित हो इष्ट।
पुजें वेदिका-खंभवत,
हर भरते हर कष्ट।।
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२६.१.२०१८, जबलपुर

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