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रविवार, 22 अक्टूबर 2017

navgeet

नव गीत :
कम लिखता हूँ
अधिक समझना
अक्षर मिलकर
अर्थ गह
शब्द बनें कह बात
शब्द भाव-रस
लय गहें
गीत बनें तब तात
गीत रीत
गह प्रीत की
हर लेते आघात
झूठ बिक रहा
ठिठक निरखना
एक बात
बहु मुखों जा
गहती रूप अनेक
एक प्रश्न के
हल कई
देते बुद्धि-विवेक
कथ्य एक
बहु छंद गह
ले नव छवियाँ छेंक
शिल्प
विविध लख
नहीं अटकना
एक हुलास
उजास एक ही
विविधकारिक दीप
मुक्तामणि बहु
समुद एक ही
अगणित लेकिन सीप
विषम-विसंगत
कर-कर इंगित
चौक डाल दे लीप
भोग
लगाकर
आप गटकना
***
salil.sanjiv@gmail.com, ९४२५१८३२४४
http://divyanarmada@blogspot.com
#हिंदी_ब्लॉगर 

बुधवार, 7 जून 2017

sagar sikata seep















चित्र पर रचना
** सिकता, सागर, सीप **
----------------------
सिकता हूँ वसुधा की बिटिया मेरी गोदी में सागर.
मेरे आँचल में नद-निर्झर जिनसे भरते घट-गागर.
अहं शिलाओं का खंडित हो मुझको देता जन्म रहा.
गले लगाते रही पंक मैं पंकज जग ने तभी गहा.
मेरी संतानें घोंघे हैं सीपी जिनका कड़ा कवच.
मोती-मुक्ता पलते जिनमें शंख न मनु से पाते बच.
बच्चे फैला पैर बनाते घरघूला मैं मुस्काती.
छोटी हरकत बड़े बड़ों की देख कहूँ सच दुःख पाती.
लोभ तुम्हारा दंशित करता,खोद-बेचते करते लोभ.
भवन बना संतोष न पाते, कभी न जाता मन का क्षोभ.
थपक-थपक सागर की लहरें, मुझे सांत्वना देती हैं.
तुम मनुजों सी नहीं स्वार्थी, दाम न कुछ भी लेती हैं.
दिनकर आता, खूब तपाता, चन्दा शीतल करता है.
क्रीडा करती शुभ्र ज्योत्सना, रूप देख शशि मरता है.
प्रकृति-पुत्र हम,नियति नटी के, ऋतु-चक्रों अनुसार ढलें.
मनुज सीख ले, प्रकृति वक्ष पर निज हित हेतु न दाल दले.
मलिन न सिकता-सलिल को करे, स्वच्छ रखे सारे जग को.
पर्यावरण न दूषितकर, मंगल जगती का तनिक करे.
***

मंगलवार, 2 नवंबर 2010

मुक्तिका: संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:

संजीव 'सलिल'
*
ज्यों मोती को आवश्यकता सीपोंकी.
मानव मन को बहुत जरूरत दीपोंकी..

संसद में हैं गर्दभ श्वेत वसनधारी
आदत डाले जनगण चीपों-चीपोंकी..

पदिक-साइकिल के सवार घटते जाते
जनसंख्या बढ़ती कारों की, जीपोंकी..

चीनी झालर से इमारतें है रौशन
मंद हो रही ज्योति झोपड़े-चीपों की..

नहीं मिठाई और पटाखे कवि माँगे
चाह 'सलिल' मन में तालीकी, टीपोंकी..

**************