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गुरुवार, 6 सितंबर 2018

समीक्षा

पुस्तक चर्चा:

गीत अपने ही सुनें- वीरेन्द्र आस्तिक

डॉ. अवनीश सिंह चौहान 
हिन्दी साहित्य की सामूहिक अवधारणा पर यदि विचार किया जाए तो आज भी प्रेम-सौंदर्य-मूलक साहित्य का पलड़ा भारी दिखाई देगा; यद्यपि यह अलग तथ्य है कि समकालीन साहित्य में इसका स्थान नगण्य है। नगण्य इसलिए भी कि आज इस तरह का सृजन चलन में नहीं है, क्योंकि कुछ विद्वान नारी-सौंदर्य, प्रकृति-सौंदर्य, प्रेम की व्यंजना, अलौकिक प्रेम आदि को छायावाद की ही प्रवृत्तियाँ मानते हैं। हिन्दी साहित्य की इस धारणा को बहुत स्वस्थ नहीं कहा जा सकता। कारण यह कि जीवन और साहित्य दोनों अन्योन्याश्रित हैं, यही दोनों की इयत्ता भी है और इसीलिये ये दोनों जिस तत्व से सम्पूर्णता पाते हैं वह तत्व है- प्रेम-राग। 

इस दृष्टि से ख्यात गीतकवि और आलोचक वीरेन्द्र आस्तिक जी का सद्यः प्रकाशित गीत संग्रह ‘गीत अपने ही सुनें' एक महत्वपूर्ण कृति मानी जा सकती है। बेहतरीन शीर्षक गीत- "याद का सागर/ उमड़ आया कभी तो/ गीत अपने ही सुने" सहित इस कृति में कुल 58 रचनाएं हैं जो तीन खण्डों में हैं, यथा- 'गीत अपने ही सुनें', 'शब्द तप रहा है' तथा 'जीवन का करुणेश'। तीन खण्डों में जो सामान्य वस्तु है, वह है- प्रेम सौंदर्य। यह प्रेम सौंदर्य वाह्य तथा आन्तरिक दोनों स्तरों पर दृष्टिमान है। शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक सौंदर्य का संतुलित समावेश कर सारभौमिक तत्व को उजागर करते हुए कवि संघर्ष और शान्ति (वार एन्ड पीस) जैसे महत्वपूर्ण उपकरणों से जीवन में आए संत्रास को खत्म करना चाहता है; क्योंकि तभी कलरव (प्रकृति) रूपी मूल्यवान प्रेम तक पहुँचा जा सकता है- "सामने तुम हो, तुम्हारा/ मौन पढ़ना आ गया/ आँधियों में एक खुशबू को/ ठहरना आ गया। देखिये तो, इस प्रकृति को/ सोलहो सिंगार है/ और सुनिये तो सही/ कैसा ललित उद्गार है/ शब्द जो व्यक्त था/ अभिव्यक्त करना आ गया। धान-खेतों की महक है/ दूर तक धरती हरी/ और इस पर्यावरण में/तिर रही है मधुकरी/ साथ को, संकोच तज/ संवाद करना आ गया। शांतिमय जीवन;/ कठिन संघर्ष है/ पर खास है/ मूल्य कलरव का बड़ा/ जब हर तरफ संत्रास है/ जिन्दगी की रिक्तता में/ अर्थ भरना आ गया।" 

आस्तिक जी का मानना है कि कवि की भावुकता ही वह वस्तु है जो उसकी कविता को आकार देती है; क्योंकि सौंदर्य न केवल वस्तु में होता है, बल्कि भावक की दृष्टि में भी होता है। कविवर बिहारी भी यही कहते हैं "समै-समै सुन्दर सबै रूप कुरूप न होय/मन की रूचि जैसी जितै, तित तेती रूचि होय।" शायद इसीलिये आस्तिक जी की यह मान्यता भाषा-भाव-बिम्ब आदि प्रकृति उपादानों के विशेष प्रयोगों द्वारा सृजित उनके गीतों को सर्वांग सुन्दर बना देती है। समाज, घर-परिवेश और दैन्य जीवन के शब्द-चित्रों से लबरेज उनके ये गीत प्रेम की मार्मिक अनुभूति कराने में सक्षम हैं- "दिनभर गूँथे/ शब्द,/ रिझाया/ एक अनूठे छंद को/ श्रम से थका/ सूर्य घर लौटा/ पथ अगोरती मिली जुन्हाई/ खूँद रहा खूँटे पर बछड़ा/ गइया ने हुंकार लगायी/ स्वस्थ सुबह के लिये/ चाँदनी/ कसती है अनुबंध को।" 

जीवन के अंतर्द्वंद्वों की कविताई करना इतना सरल भी नहीं है। उसके लिए कठिन तपश्यर्चा की आवश्यकता होती है। कवि यह सब जानता है- "गीत लिखे जीवन भर हमने/ जग को बेहतर करने के/ किन्तु प्रपंची जग ने हमको/ अनुभव दिये भटकने के/ भूलें, पल भर दुनियादारी/ देखें, प्रकृति छटायें/ पेड़ों से बतियायें।" इतना ही नहीं, कहीं-कहीं कवि की तीव्र उत्कंठा प्रेम को तत्व-रूप में देखने की होती है, तब वह इतिहास और शोध-संधानों आदि को भी खंगाल डालता है; तिस पर भी उसके सौंदर्य उपादान गत्यात्मक एवं लयात्मक बने रहते हैं और मन पर सीधा प्रभाव डालते हैं। कभी-कभी तो वह स्वयं के बनाए मील के पत्थरों को भी तोड़ डालता है, कुछ इस तरह- "मुझसे बने मील के पत्थर/ मुझसे ही टूट गए/ पिछली सारी यात्राओं के/ सहयात्री छूट गए/ अब तो अपने होने का/ जो राज पता चलता है/ उससे/ रोज सामना होता है"  और - "हूँ पका फल/ अब गिरा मैं तब गिरा/ मैं नहीं इतिहास वो जो/ जिन्दगी भर द्रोण झेले/ यश नहीं चाहा कभी जो/ दान में अंगुष्ठ ले ले/ शिष्य का शर प्रिय/जो सिर मेरे टिका।" 

निष्कर्ष रूप में कहना चाहता हूँ कि जीवन के शेषांश में समग्र जीवन को जीने वाले वीरेन्द्र आस्तिक जी की पुस्तक ‘गीत अपने ही सुने’ के गीत इस अर्थ में संप्रेषणीय ही नहीं, रमणीय भी हैं कि प्रेम-सौंदर्य के बिना जीवन के सभी उद्देश्य निरर्थक-सेे हो जाते हैं। विश्वास है कि सहृदयों के बीच यह पुस्तक अपना स्थान सुनिश्चित कर सकेगी।
१५.९.२०१७ 
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गीत नवगीत संग्रह- गीत अपने ही सुने, रचनाकार- वीरेन्द्र आस्तिक, प्रकाशक-के के पब्लिकेशन्स, ४८०६/२४, भरतराम रोड, दरियागंज, नई दिल्ली-२, ,  प्रथम संस्करण- २०१७, मूल्य :  रु. ३९५पृष्ठ : १२८, समीक्षा- अवनीश सिंह चौहान

समीक्षा

पुस्तक चर्चा:

दिन क्या बुरे थे- वीरेन्द्र आस्तिक

डॉ. संतोष कुमार तिवारी
ख्यातिलब्ध कवि श्री वीरेन्द्र आस्तिक के नवीन गीत संग्रह से गुजरते हुए मेरी स्मृति में मेरे गुरू आ गए। मेरे गुरू डॉ. प्रेम शंकर कहा करते थे कि ऐसा कभी संभव नहीं होता कि रात को आप डाका डालें और सुबह बैठकर ‘कामायनी’ लिखने लगें। पहले हमें अपने भीतर की यात्रा करनी पड़ती है यानी अपने भीतर का रचाव। यह रचाव ऊर्जा-ऊष्मा सम्पन्न होकर प्रज्ञा शिखर की सीढ़ियाँ दिखलाता है और मनुष्य अपनी सामाजिक आध्यात्मिक चेतना से आप्लावित हो उठता है। 

वीरेन्द्र आस्तिक का कवि आत्मस्थ और ऊर्जावान होकर चैतन्य होने की बात कहता है। जाहिर है कि उसकी साहित्यिक मान्यताएँ और धारणाएँ उच्चकोटि की सर्जना के सही मानदंड हैं। एक सार्थक रचना अपने समय से साक्षात्कार करती हुई उससे टकराने और मुठभेड़ करने का माद्दा भी रखती है। वह जमीनी हक़ीकत का सामना करते हुए परिवेशगत सच्चाइयों का समूचा परिदृश्य पेश करती है और बेहतर जीवन जीने की तलाश का उपक्रम बन जाती है। साहित्य की कोई भी विधा सामाजिक दायित्व से किनाराकशी नहीं कर सकती और न बदलते युग के तेवरों को अनदेखा कर सकती है। वह बदलते समय की नई प्रचलित शब्दावली को भी अनसुना नहीं कर सकती। हमें इस सत्य को स्वीकारना होगा कि कला जीवन के लिए है। जीवन की विकासशील धारा में मनुष्य के आत्यांतिक कल्याण को ओझल नहीं किया जा सकता। 

हमें इस बात की सहज प्रसन्नता है कि वीरेन्द्र आस्तिक अपनी बहुआयामी गीत-यात्रा में मानव हित, नैतिक मूल्य, अन्वेषण तथा ज्ञात से अज्ञात को जानने की कोशिश को सर्वोपरि मानते हैं। रचनाकार का निर्विकार मन स्वतः ही संवेदनाओं की गहराई के साथ मानवता से जुड़ जाता है। वीरेन्द्र की खोज का विषय यह है कि -

वो क्या है जो जीवन-तम में
सूरज को भरता है
पतझर की शुष्क, थकी-हारी
डाली में खिलता है।

गीतों में हमेशा एक ही विचार, भाव या घटनाक्रम की अन्विति का शुरू से अंत तक निर्वाह किया जाता है। रचनाकार अपनी अनुभूतिजन्य वैचारिकता या विचारजन्य अनुभूति से यहाँ-वहाँ भटक नहीं सकता अन्यथा गीत अपनी समग्रता में प्रभावहीन हो जाता है। गीत की जो उठान शुरू में होती है वही उठान समापन तक बनी रहनी चाहिए। गेयता तथा संक्षिप्तता की दृष्टि से भी आस्तिक के गीत निर्दोष हैं। मशीनीकरण के युग में भी वे अपनी प्रकृति-जन्य संवेदना और विचार जन्य संवेदना को छोड़कर व्यवसायी-संवेदना के शिकार नहीं हुए।
वीरेन्द्र के पास, पैनी अभिव्यक्ति है। शब्द और अर्थ सहचर हैं। अबूझ को सहज बनाते हैं। पैनी अभिव्यक्ति के लिए आवश्यक है कि सार्थक शब्दों का मितव्ययता से प्रयोग हो- 

‘आओ! बोलो वहाँ, जहाँ शब्दों को प्राण मिले
पोथी को नव अर्थो में पढ़ने की आँख मिले
बोलो आमजनों की भाषा
खास न कोई बाकी।' 

हम इक्कसवीं सदी के दूसरे दशक में जा रहे हैं फिर हमारी भाषा बीसवीं सदी के पूर्वाद्ध की क्यों हो? बासी-तिबासी अभियक्ति से बचने के लिए जरूरी है कि हम आज की प्रचलित नयी शब्दावली को काव्यात्मकता प्रदान करें या पुराने शब्दों में नयी अर्थवत्ता को भरने की कोशिश करें। वीरेन्द्र आस्तिक ने नये समय की कम्प्यूटराइज्ड शब्दावली को अपनाकर गीतों को नयी कल्पना और ताजगी प्रदान की है जो काबिलेतारीफ है। विण्डो, मेमोरी, चैटिंग, कूल, मार्केटिंग, ग्लोबल, वायरस, एण्ट्री, संसेक्स और केमिस्ट्री आदि शब्दों को काव्य-माला के धागे में पिरोकर कवि ने युगानुरूप नयापन लाने का प्रयास किया है।
कई गीतों में रचनाकार ने प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से ऐसा ‘कान्ट्रास्ट’ पैदा किया है कि हम अतीत और वर्तमान की सांस्कृतिक-सामाजिक-राजनीतिक स्थितियों का तुलनात्मक विश्लेषण करने पर बाध्य हो जाते हैं। 

‘जंगे-आजादी के ‘दिन क्या बुरे थे’ या ‘अब न पहले सी रहीं ये लड़कियाँ’ जैसी पंक्तियाँ इसका प्रमाण हैं।

वीरेन्द्र की प्रकृति जन्य संवेदना उन्हें टेसू, मंजरी, कोयल, निबुआ, अंबुआ, जमुनिया, बनस्थली की ओर ले जाती है और वे प्रकृति-सुदंरी के रोमानी रूप में खो जाते हैं। गीतकार को इस बात की बड़ी शिकायत है कि हमारी संवेदनाएँ पथरा गई हैं।

 'तोते को पिंजड़े का डर है', प्यासी चोचों और जलते हुए नीड़ों ने जीवन से मोह भंग कर दिया है। सेक्स, क्राइम तथा मीडिया बाजार में हमें किसानों तक की चिंता नहीं रही- 

‘लग न जाए रोग
बच्चों को
कुछ बचा रखिए
जमीनी चेतना
अब कहाँ वो आचरण
रामायणी
पाठ से बाहर हुई
कामायनी।'  

रचनाकार को इस बात की पीड़ा है कि -

मुखड़ा मोहक आजादी का
पाँव धँसे लेकिन कीचर में।

मेरी स्पष्ट धारणा है कि जब तक माँ-पिता के वात्सल्य पूर्ण त्याग और संरक्षण को हार्दिक श्रद्धा के साथ नहीं देखा जाता तब तक स्वस्थ समाजिकता संभव नहीं। परिवार जन्य संस्कार ही योग्य नागरिकता का और जीवन का शुद्ध पाठ पढ़ा सकते हैं। ‘माँ’ पर कविता की कुछ मर्मस्पर्शी पंक्तियाँ देखिये- 

‘माँ’। 
'तुम्हारी जिंदगी का गीत गा पाया नहीं
आज भी इस फ्लैट में
तू ढूँढती छप्पर
झूठे बासन माँजने को
जिद्द करती है
आज भी बासी बची रोटी न मिलने पर
बहू से दिन भर नहीं तू बात करती है
मैं न सेवा कर सका 
अर्थात् असली धन कमा पाया नहीं।' 

इसी तरह पिता का स्वतंत्रता संग्राम याद करते हुए गीतकार की चिंता का विषय, बालू पर लोट रहे, कंचे खेल रहे घरौंदे बनाते हुए बच्चों पर केन्द्रित होता है क्योंकि देश का भावी नक्शा इन्हीं के जिम्मे है। चाहे हरित वन का मनुष्यों की स्वार्थपूर्ण आरी से काटने की बात हो, या नदियों के जल-बँटवारे की, चाहे कश्मीर-गोधरा हादसे का दर्द हो या औरत पर पुरुष दासता की नीयत- सब पर वीरेन्द्र की कलम चली है। अखिल सृष्टि के साथ रागात्मक संबंध इसी का नाम है या फिर साँसों की डिबिया में ब्रह्मांड का समा जाना’ भी कहा जा सकता है। ‘स्व’ से ‘पर’ के विस्तारण की कोई हद नहीं होती। फिर भी निराशा-अवसाद-अनास्था का स्वर नकारात्मकता की ओर नहीं जाता- 

‘इस महानाश में
नव-संवेदन
मुझको रचना होगा। 
हारा-सा सूना खंडहर हूँ 
बिरवा-सा उगना होगा।' 

यह आशापूर्ण संघर्ष का स्वर है।
जाहिर है वीरेन्द्र आस्तिक ने नए शब्द-विन्यास और अभिनव शैली-शिल्प से गीतों को सँवारा है, नई धुनें दी हैं और इस मिथक को तोड़ने में सबसे ज्यादा हाथ बँटाया है कि गीतों के लिए तो बस दो दर्जन शब्दावली पर्याप्त है- हथेली, मेंहदी, महावर, चाँदनी, सागर, लहर ...मुखड़ा, चमेली आदि। वे आधुनातन शब्द विन्यास के पक्षधर हैं और इस मामले में अपने ही तटबंधों का अतिक्रमण करते हैं। विषय-वैविध्य इतना है कि इस प्रतिस्पर्धा में गीत-नवगीत नयी कविता का ग्राफ लगभग एक सा है। मेरी विनम्र राय में वीरेन्द्र आस्तिक नयी कविता को गीत-नवगीत के जवाब हैं।
२५.५.२०१५ 
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नवगीत संग्रह- दिन क्या बुरे थे, रचनाकार- वीरेन्द्र आस्तिक, प्रकाशक- कल्पना प्रकाशन, बी-१७७०,  जहाँगीरपुरी, दिल्ली - ३३, प्रथम संस्करण-२०१२, मूल्य- रूपये , पृष्ठ- ,  परिचय- डॉ. संतोष कुमार तिवारी,  ISBN- 9788188790678