शनिवार, 15 दिसंबर 2018

समीक्षा दोहा-दोहा नर्मदा -डॉ. स्मृति शुक्ल

पुस्तक परिचय:
"दोहा-दोहा नर्मदा, दोहा शतक मंजूषा भाग १"
समीक्षक- प्रो. स्मृति शुक्ल
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[पुस्तक विवरण: दोहा-दोहा नर्मदा (दोहा शतक मञ्जूषा भाग १), आई एस बी एन ८१७७६१००७४, प्रथम संस्करण २०१८, आकार २१.५  से. x १४ से., आवरण बहुरंगी पेपरबैक, पृष्ठ १६०, मूल्य २५०/-, प्रकाशक समन्वय  ,४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१] 
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                              आचार्य संजीव 'सलिल' हिंदी साहित्य में अनवरत स्तरीय लेखन कर रहे हैं। वे विगत बीस वर्षों से अंतरजाल पर भी सक्रिय हैं और हिंदी की विभिन्न विधाओं में सार्थक रच रहे हैं। 'कलम के देव', 'भूकंप के साथ जीना सीखें', 'लोकतंत्र का मकबरा', 'मीत मेरे' आदि कृतियों के साथ आपके नवगीत संग्रहों 'काल है संक्रांति का' ने खासी प्रसिद्धि पाई है। ‘सड़क पर’ आपका सद्य प्रकाशित नवगीत संग्रह है। आचार्य संजीव 'सलिल' और प्रो. साधना वर्मा के संपादकत्व में प्रकाशित 'दोहा-दोहा नर्मदा' दोहा शतक मञ्जूषा  भाग एक, 'दोहा सलिला-निर्मला' दोहा शतक मञ्जूषा भाग दो एवं 'दोहा दीप्त दिनेश' दोहा शतक मञ्जूषा भाग तीन प्रकाशित हुआ है। इन तीनों संग्रहों में पंद्रह-पंद्रह दोहाकारों के सौ-सौ दोहों को संकलित किया गया है। इस प्रकार आचार्य संजीव 'सलिल' व डॉ. साधना वर्मा  ने पैंतालीस दोहाकारों के चार हजार पाँच सौ दोहों के साथ सलिल जी द्वारा रचित लगभग ५०० दोहे और अन्य १०० दोहे मिलकर लगभग ५१०० दोहों को पुस्तकाकार प्रकाशित कर हिंदी साहित्य के प्राचीन छंद दोहा को पुनः नई पीढ़ी के सामने लाने का प्रयास किया है। दोेहा पुरातन काल से आज तक प्रयुक्त हो रहा अत्यंत लोकप्रिय छंद है। सिद्धाचार्य सरोज बज्र ‘सरह’ ने विक्रम संवत् ६९० में अपभ्रंश में दोहा लिखा- 
जेहि मन पवन न सँचरई, रवि-ससि नाहिं पवेस।
तेहि बढ़ चित्त बिसाम करु, सरहे कहिय उवेस।।
                              ‘दोहा-दोहा नर्मदा’ संकलन के प्रथम पृष्ठ पर ‘दोहा-दोहा विरासत’ शीर्षक से सिद्धाचार्य सरोज बज्र ‘सरह’ के इस दोहे के साथ देवसेन जैन, हेमचंद्र, चंदरबरदाई, बाबा फरीद, सोमप्रभ सूरि, अमीर खुसरो, जैनाचार्य मेरूतंग, कबीर, तुलसी, रत्नावली, अब्दुर्ररहीम खानखाना, बिहारी, रसनिधि से लेकर किशोर चंद कपूर संवत् १९५६ तक ३४ दोहा व सर्जक कवियों का कालक्रमानुसार विवरण देना आचार्य संजीव 'सलिल' की अनुसंधानपरक दृष्टि का परिचायक है साथ ही यह बेहद मूल्यवान जानकारी है।
                              आचार्य संजीव 'सलिल' ने पिंगल शास्त्र का गहन अध्ययन किया है । आपने परंपरागत छंदों के साथ ३५० से अधिक नवीन छंदों की भी रचना की है। वे नये रचनाकारों को सदैव छंद रचना का प्रशिक्षण देते रहे हैं और उनके लिखे हुए का परिष्कार करते रहे हैं । समन्वय प्रकाशन से प्रकाशित 'दोहा-दोहा नर्मदा' में पंद्रह वरिष्ठ-कनिष्ठ दोहाकारों के सौ-सौ दोहे संकलित हैं । संपादक ने इस संग्रह की भूमिका ‘दोहा गाथा सनातन’ शीर्षक से लिखी है। यह भूमिका भी एक ऐतिहासिक दस्तावेज की तरह संग्रहणीय है । इस भूमिका में आचार्य संजीव सलिल लिखते हैं कि- ‘‘दोहा विश्व की सभी भाषाओं के इतिहास में सबसे प्राचीन छंद होने के साथ बहुत प्रभावी और तीव्र गति से संप्रेषित होने वाला छंद है। इतिहास गवाह है कि दोहा ही वह छंद है जिससे पृथ्वीराज चौहान और रायप्रवीण के सम्मान की रक्षा हो सकी और महाराजा जयसिंह की मोहनिद्रा भंग हुई।’’  दोहा रचना के प्रमुख तत्वों का भी गहन और वैज्ञानिक दृष्टि से विवेचन संपादकीय में किया गया है।पंद्रह दोहाकारों के परिचय के साथ ही उनके दोहो पर समीक्षात्मक टीप देने का कार्य संपादकद्वय ने किया है जो सराहनीय है।
                              ‘दोहा-दोहा नर्मदा’ में प्रथम क्रम पर आभा सक्सेना ‘दूनवी’ के दोहे संकलित हैं । आभाजी ने प्रथम दोहे में ईश्वर आराधना करते हुए विनय की है उनके भाव सदैव उदात्त हों, सत्य,शिव और सुंदर का समवेत स्वर उनके दोहों में अनुगुंजित होता रहे । अपने गुरू का स्मरण और उनके प्रति कृतज्ञता का भाव भी व्यक्त किया है। आभा सक्सेना के दोहों का प्रारंभ हिंदुओं के सबसे बड़े पाँच दिवसीय त्यौहार दीपावली से हुआ है। धनतेरस दीपावली, करवाचौथ के बाद उन्होंने अपने बचपन को स्मृत किया है । यह बहुत स्वाभाविक भी है कि त्यौहार अक्सर अतीत के गलियारों में ले जाते हैं ।
यादों के उजले दिये, मन-रस्सी पर डार।
बचपन आया झूलने, माँ-आँगन कर पार।।
पुरवाई का मेघ को चिट्ठी देना और सावन में खूब बरसकर नदियाँ ताल भरने का संदेशा देना इस दोहे को बहुत भावपरक बनाता है, साथ ही प्रकृति में मानवीय कार्य व्यापारों का समावेश करता है ।
पुरवाई ने मेघ को, दी है चिठिया लाल ।
अब की सावन में बरस, भर दे नदियाँ ताल ।।
                              ग्रीष्म में सूरज के बढ़ते ताप को एक दोहे में आभा जी ने बहुत सुंदर अभिव्यक्ति दी है । उनके इस दोहे ने पद्माकर के ऋतु वर्णन को स्मृत करा दिया । आभा जी के दोहे में जीवन के अनेक प्रसंग है राजनीति, धर्म, अध्यात्मक, प्रेम, परिवार, जीवन-जगत दर्शन, ऋतुएँ और प्रकृति अर्थात जीवन का कोई पक्ष अछूता नहीं है । दोहों में मात्राओं का निर्वाह पूरी सतर्कता से किया गया है ।
चुन काफिया-रदीफ लो, मनमाफिक सरकार ।
गज़ल बने चुटकी बजा, हो सुनकर अश'आर ।।
                              आभा सक्सेना ने इस दोहे में चुटकी बजाकर गजल बनाने की बात कही है जो मेरे गले इसलिये नहीं उतरी कि गज़ल महज मनमाफिक काफिया या रदीफ के चुनने से ही नहीं बन जाती। बहर और शब्दों के वजन, मक्ता-मतला के साथ काफिया-रदीफ का ध्यान रखा जाए तभी मुअद्दस ग़ज़ल बन पाती है ।
                            दोहाकार आभा सक्सेना के दोहों की समीक्षा में आचार्य संजीव सलिल ने ‘यमकीयता’ शब्द का नवीन प्रयोग किया है । हिन्दी साहित्य में अभी तक इस शब्द का प्रयोग नहीं किया गया । यमक शब्द में ‘इयता’ प्रत्यय लगाकर यह शब्द निर्मित किया गया है, पर यह शब्द प्रयोग की दृष्टि से उचित नहीं है । कबीरदास ने- ‘सद्गुरू की महिमा अनंत, अनंत किया उपकार। लोचन अनंत उघाड़िया, अनंत दिखावन हार।।' इस दोहे में अनंत शब्द का चार बार प्रयोग करके यमक अलंकार का अत्यंत सुंदर प्रयोग किया है लेकिन उनके लिये भी किसी आलोचक ने यमकीयता घोलना शब्द का प्रयोग नहीं किया है। काव्य-रचना के अनुकूल शब्द तथा अर्थ को प्रस्तुत करने की प्रतिभा आभा जी के पास है । धूप का कुलाँचे मारना, मूँड़ उघार कर सोना, आस के पखेरु का उड़ना, जीवन का पापड़ होना, चपल हठीली रश्मियाँ आदि प्रयोग नवीन होने के साथ दोहों में भाव प्रवणता भरते हैं।
                              कालीपद प्रसाद के दोहों में उनके गहन और सुदीर्घ जीवनानुभवों का ताप पूरी प्रखरता से मौजूद है। उनके दोहों में मनुष्य को सिखावन है और नीतिगत बातें है। भारतीय धर्मशास्त्र सदैव हमें आत्मालोचन की सीख देता है। कालीपद जी एक दोहा में लिखते हैं-
अपनी ही आलोचना, मुक्ति प्राप्ति की राह।
गलती देखे और की, जो न गहे वह थाह।।
ईर्ष्या-तृष्णा वृत्ति जो, उन सबका हो नाश।
नष्ट न होती साधुता, रहता सत्य अनाश।।
                                  जीवन सत्य का दिग्दर्शन वाले ये दोहे कहीं-कहीं मध्यकालीन संतों का स्मरण कराते हैं-
सिंधु सदृष संसार है, गहरा पारावार।
यह जीवन है नाव सम, जाना सागर पार।।
                              कालीपद ‘प्रसाद’ जी के दोहे हमें जीवन का मर्म सिखाते हैं, विपरीत परिस्थितियों में हौसला रखने तथा कर्मशील बनने की प्रेरणा देते हैं।
                              डाॅ. गोपालकृष्ण भट्ट ‘आकुल’ के दोहों में विनष्ट होते पर्यावरण के प्रति चिंता और जल संरक्षण की बात कही गई है। राजभाषा हिंदी की वैज्ञानिकता और उसके महत्व तथा वर्तमान स्थिति पर भी ‘आकुल’ जी ने दोहे रचे हैं। छंद्धबद्ध साहित्य और छंदों के निष्णात कवियों के अभाव पर लिखा दोहा साहित्य के प्रति चिंता से जन्मा है-
छंदबद्ध साहित्य का, हुआ पराक्रम क्षीण।
वैसे ही कुछ रह गये, कविवर छंद प्रवीण।।
                              चंद्रकांता अग्निहोत्री एक समर्थ दोहाकार हैं । उनके दोहों में बहुत उदात्त भाव शब्दबद्ध हुए हैं। परनिंदा का त्याग, तृष्णा, लोभ, मोह माया और अहंकार से ऊपर उठने का भाव उनके दोहों में अनुगूँजित है।
अहंकार की नींव पर कैसा नव निर्माण।
साँसों में अटके रहे, दीवारों के प्राण।।
                              छगनलाल गर्ग ‘विज्ञ’ दोहा रचने में माहिर हैं। गर्ग जी के दोहों का मूल कथ्य प्रेम है। लौकिक प्रेम से अलौकिक प्रेम तक की यात्रा इन दोहों में हैं। दोहों में अनुप्रास अलंकार की सुंदर छटा बिखरी है। गर्ग जी के श्रृंगारिक दोहों में बिहारी के दोहों की भाँति भावों, अनुभावों और आंगिक भंगिमाओं का चित्रण हुआ है-
नशा नजर रस नयन में, लाज-लाल मुख रेख।
झुक सजनी भयभीत मन, झिझक विहग सी लेख।।
                              छाया सक्सेना ‘प्रभु’ के दोहे उनकी हृदयगत उदारता और सरलता के परिचायक हैं। उन्होंने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र से कुछ न कुछ अपने दोहों में लिया है। सहज-सरल भाषा में अपने हृदयगत उद्गारों को दोहों में पिरो दिया है। दोहों में प्रचलित मुहावरों का प्रयोग भी वे बहुत खूबसूरती से करती हैं-
दीवारों के कान हैं, सोच-समझकर बोल।
वाणी के वरदान को, ले पहले तू तोल।।
                                 पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता और प्रकृति के प्रति असीम अनुराग भी उनके दोहों में परिलक्षित होता है।
                              त्रिभवन कौल की जन्मस्थली जम्मू-कश्मीर ने उन्हें प्राकृतिक सौंदर्य के प्रति तीव्र लगाव से अनुरंजित किया तो भारतीय वायुसेना की कर्मस्थली ने उन्हें अगाध राष्ट्र-प्रेम से आपूरित किया। अनुशासन बद्ध जीवन ने उनके सृजन को छंदों के अनुशासन में बँधना सिखाया।‘षठं शाठ्यं समाचरेत’ इस सूक्ति को उन्होंने अपना सिद्धांत मानते हुए यह माना है कि जो देश के साथ विश्वासघात करे वह क्षमा के योग्य नहीं और आतंकी को केवल कब्र में ही ठौर मिलना चाहिये। वन, पर्वत, नदियों के संरक्षण की चिंता के साथ ही आज की राजनीति पर भी अनेक अर्थपूर्ण दोहे त्रिभुवन कौल जी ने लिखे हैं। वर्तमान समय में लेखन को भी व्यवसाय समझ लिया गया है। बहुत कुछ निरर्थक भी लिखा जा रहा है इस सत्य का उद्घाटन करते हुए त्रिभुवन कौल लिखते हैं -
हीरों सा व्यापार है, लेखन नहीं दुकान।
जब से  रज-कण आ गये, गुमी कहीं पहचान।।
                              प्रेम बिहारी मिश्र ने अपने दोहों में बड़ी सहजता से हृदय के उद्गारों को अभिव्यक्त किया गया है। भूमंडलीकरण के दौर में परिवर्तित सामाजिक परिवेश को अपने दोहों में चित्रित करने वाले प्रेमबिहारी मिश्र लिखते हैं-
चना चबैना बाजरा, मक्का रोटी साग ।
सब गरीब से छिन गया, हुआ अमीरी राग ।।
दीन-धर्म पैसा यहाँ, पैसा ही है प्यार ।
अमराई छूटी यहाँ, नकली बहे बयार ।।
                              मिथलेश  राज बड़गैया के नारी मन की कोमल संवेदनाएँ उनके दोहों में भावपूर्ण सलिला बनकर प्रवाहित है। प्रेम, श्रृंगार, संयोग, वियोग आदि भावों को उन्होंने अपने दोहों में सँजोया है-
मैं मीरा सी बावली, घट-घट ढूँढूँ श्याम। 
मन वृंदावन हो गया, नैन हुए घनश्याम।।
                              रामेश्वर प्रसाद सारस्वत जी के दोहे सार्थक शब्द चयन और निश्छल अभिव्यक्ति के कारण सम्प्रेषणीय बन गए हैं। सारस्वत जी ने अनेक दोहों में ‘आँखों में पानी नहीं’, ‘आँख में आँख डालना’, ‘हाथ को हाथ न सूझना’, ‘मन के घोड़े दौड़ाना’, ‘आँख मिचौली खेलना’, ‘ताल ठोंकना’, ‘सूखकर काँटा होना’ आदि मुहावरों का सार्थक प्रयोग करके दोहों की अभिव्यंजना शक्ति में वृद्धि की है। बीते समय की जीवन शैली और आज की जीवन शैली का अंतर अनेक दोहों में स्पष्ट है। विकास की अंधी दौड़ के दुष्परिणामों को भी सारस्वत जी अभिव्यक्त करते हैं-
अंधी दौड़ विकास की, छोड़े नहीं वजूद।
इत टिहरी जलमग्न है, उत डूबा हरसूद।।
                              विजय बागरी एक संवेदनशील दोहाकार हैं। आचार्य संजीव 'सलिल' ने लिखा है कि- ‘‘युगीन विसंगतियों और त्रासदियों को संकेतों से मूर्त करने में वे व्यंजनात्मकता और लाक्षणिकता का सहारा लेते हैं।’’ विजय जी के दोहों में वर्तमान समय की विसंगतियाँ पूरी सच्चाई के साथ मूर्त हुई हैं। आज साहित्य जगत में छद्म बुद्धिवाद फैला हुआ है। अपने पैसों से ही सम्मान समारोह आयोजित कराके अखबारों में खबरें प्रकाशित की जाती हैं। इस सच्चाई को विजय जी ने इस दोहे में व्यक्त किया है-
छलनाओं का हो रहा, मंचों से सत्कार।  
सम्मानों की सुर्खियाँ, छाप रहे अखबार।।
                              हम संसार में आकर भूल जाते हैं कि यहाँ हमारा डेरा स्थायी नहीं है, जीवन क्षणिक है। विजय जी संत कवियों की भाँति इस आर्ष सत्य का उद्घाटन करते हैं-

है उधार की जिंदगी, साँसें साहूकार।
रिश्ते-नाते दरअसल, मायावी बाजार।।
                              विनोद जैन ‘वाग्वर’ ने अपने दोहों में आज के मनुष्य की स्वार्थपरता, राजनीति के छल-छद्म, मूल्यों का अवमूल्यन, भ्रष्टाचार और तमाम तरह विभेदों को उजागर किया है । आजादी के इतने वर्षों के पश्चात् भी आम आदमी कितना लाचार और बेबस है-
हम कितने स्वाधीन हैं, कितने बेबस आज।
आजादी के नाम पर गुंडे करते राज।।
                              श्रीधर प्रसाद द्विवेदी के दोहों का कथ्य विविधता पूर्ण और शिल्प समृद्ध है । वर्तमान समय में मनुष्य तकनीक के जाल में उलझ रहा है। उपभोक्तावादी समय में मनुश्य की संवेदनाओं की तरलता शुष्क हो गई है। द्विवेदी जी ने लिखा है -
विकट समय संवेदना, गई मनुज से दूर।
अपनों से संबंध अब, होते चकनाचूर।।
                              श्यामल सिन्हा के दोहों में भाव प्रवणता है। सुख-दुख,हास-रुदन, विरह-मिलन, आशा-निराशा आदि भावों का चित्रण करने में सिन्हा जी सिद्धहस्त है। प्रेम में नेत्रों की भूमिका महत्वपूर्ण हैं। रीतिकाल में बिहारी ने अपने दोहों में नायक और नायिका को नेत्रों से प्रेमपूर्ण संवाद करते दिखाया है । श्यामल सिन्हा भी लिखते हैं-
आँखें जब करने लगी, आँखों से संवाद।
आँखों में आँखे रखें, प्रेम भवन बुनियाद।।
                              श्यामल जी के कुछ दोहे सार्थक शब्द चयन के अभाव में अर्थपूर्ण नहीं बन पाये तथा पाठक के हृदय को छूने में असमर्थ हैं। जैसे-
अहंकार मन में भरा, तन-मन बहुत उदास।
भटक रहा मन अकारण, मोती मिला न घास।।
                              इस दोहे में असंगति दोष भी है। मोती के साथ घास शब्द केवल तुकबंदी के लिए रखा गया है। इस कारण काव्य में औचित्य का निर्वाह नहीं हो पाया है।
                              'दोहा-दोहा नर्मदा' में संकलित अंतिम दोहाकार सुरेश  कुशवाहा ‘तन्मय’ के दोहों में समसामयिक परिवेश की समस्त गतिविधियाँ, परिवर्तनों की एक-एक आहट मौजूद है। मानव मन की अभिलाषाएँ, लिप्साएँ, और भावनाएँ अपने वास्तविक रूप में उभरी हैं । किसी प्रकार मुलम्मा चढ़ाकर उन्हें प्रस्तुत नहीं किया गया है । अभिव्यक्ति की सादगी ही उनके दोहों को विशिष्ट बनाती है-
बूढ़ा बरगद ले रहा, है अब अंतिम श्वास। 
फिर होगा नव अंकुरण, पाले मन में आस।।
                              नव अंकुरण की इसी आशा की डोर थामे हम चलते रहते हैं। आशा ही विपरीत परिस्थिति में हमें टूटने नहीं देती। निष्कर्षतः 'दोहा-दोहा नर्मदा' संपादक द्वय आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ और प्रो. साधना वर्मा के संपादकत्व में विश्व वाणी हिंदी संस्थान, जबलपुर से प्रकाशित एक महत्वपूर्ण कृति है। आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ने 'दोहा शतक मंजूषा १' में पंद्रह दोहाकार रूपी अनमोल मोतियों को एक साथ पिरोया है। उन्होंने अत्यंत कुशलतापूर्वक अपने आचार्यत्व का निर्वाह किया है। अनेक दोहों को परिष्कृत कर उनका संस्कार किया है। सभी पंद्रह दोहाकारों के परिचय के साथ उनके दोहों पर बहुत ही विवेकपूर्ण ढंग से सम्यक समीक्षा भी लिखी है। 'दोहा-दोहा नर्मदा की भूमिका' आपके काव्य काव्य-शास्त्रीय ज्ञान का मुकुर है। पाठक को दोहा का इतिहास और स्वरूप समझने में यह भूमिका बहुत उपयोगी है।
                              इस संकलन के प्रत्येक पृष्ठ पर पाद टिप्पणी के रूप में तथा भूमिका में आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ द्वारा रचित एक सौ बहत्तर दोहे निस्संदेह इस संग्रह की उपलब्धि हैं। इन दोहों में दोहा छंद का स्वरूप, इतिहास, प्रकार दोहा रचने के लिए आवश्यक तत्वों जैसे शब्दों का चारुत्व, मौलिक प्रयोग, रस, अलंकार, भावों की अभिव्यक्ति में समर्थ शब्दों का चयन, अर्थ-गांभीर्य, कम शब्दों में अर्थों की अमितता, लालित्य, सरलता, काव्य दोष, काव्य गुणों आदि की चर्चा करके नये दोहाकारों को दोहा रचना की सिखावन दी है। निश्चय ही 'दोहा शतक मंजूषा भाग-एक' छंदबद्ध कविता को स्थापित करने वाली महत्वपूर्ण कृति है। जनमानस के हृदय में स्पंदित होने वाले लोकप्रिय छंद दोहा की अभ्यर्थना में माँ सरस्वती के चरणों में अर्पित एक अति सुंदर सुमन है।  
दोहा- 'दोहा दोहा नर्मदा'  दोहा शतक मञ्जूषा भाग १ 
संपादक- आचार्य संजीव वर्मा‘सलिल’ एवं प्रो. (डॉ.) साधना वर्मा
समीक्षक- प्रो. (डॉ.) स्मृति शुक्ल
प्रकाशन-ंसमन्वय प्रकाशन अभियान, जबलपुर, रायपुर, बैंगलुरू
पृष्ठ १६०, प्रथम संस्करण- २०१८, आई एस बी एन ८१-७७६१-००७-४, मूल्य- २५०/-
***
संपर्क समीक्षक: प्रो. स्मृति शुक्ल, ए१६, पंचशील नगर, नर्मदा मार्ग, जबलपुर ४८२००१,  चलभाष: ९९९३४१९३७४ 

शुक्रवार, 14 दिसंबर 2018

मुक्तक आँख

मुक्तक:muktak
संजीव 
*
मापनी: २११ २११ २११ २२ 
*
आँख मिलाकर आँख झुकाते
आँख झुकाकर आँख उठाते
आँख मारकर घायल करते
आँख दिखाकर मौन कराते
*
मापनी: १ २ २ १ २ २ १ २ २ १२२
*
न जाओ, न जाओ जरा पास आओ
न बातें बनाओ, न आँखें चुराओ
बहुत हो गया है, न तरसा, न तरसो
कहानी सुनो या कहानी सुनाओ
*
२५-६-२०१५
salil.sanjiv@gmail.com
#दिव्यनर्मदा
#हिंदी_ब्लॉगर

नवगीत: क्यों करे?

एक रचना:
क्यों करे?
*
चर्चा में
चर्चित होने की चाह बहुत
कुछ करें?
क्यों करे?
*
तुम्हें कठघरे में आरोपों के
बेड़ा हमने।
हमें अगर तुम घेरो तो
भू-धरा लगे फटने।
तुमसे मुक्त कराना भारत
ठान लिया हमने।
'गले लगे' तुम,
'गले पड़े' कह वार किया हमने।
हम हैं
नफरत के सौदागर, डाह बहुत
कम करें?
क्यों करे?
*
हम चुनाव लड़ बने बड़े दल
तुम सत्ता झपटो।
नहीं मिले तो धमकाते हो
सड़कों पर निबटो।
अंग हमारे, छल से छीने
बतलाते अपने।
वादों को जुमला कहते हो
नकली हैं नपने।
माँगो अगर बताओ खुद भी,
जाँच कमेटी गठित
मिल करें?
क्यों करे?
*
चोर-चोर मौसेरे भाई
संगा-मित्ती है।
धूल आँख में झोंक रहे मिल
यारी पक्की है।
नूराकुश्ती कर, भत्ते तो
बढ़वा लेते हो।
भूखा कृषक, अँगूठी सुख की
गढ़वा लेते हो।
नोटा नहीं, तुम्हें प्रतिनिधि
निज करे।
क्यों करे?
***
संजीव
१४-१२-२०१८

समीक्षा: लघुकथा, घाट पर ठहराव कहाँ?

कृति चर्चा :
घाट पर ठहराव कहाँ : लघुकथाओं पुष्पोंकी सुवासित बगिया 
चर्चाकार: आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल
(कृति विवरण: घाट पर ठहराव कहाँ, लघुकथा संग्रह, कांता रॉय, ISBN ९७८-८१-८६८१०-३१-५ पृष्ठ १२४, २००/-पुस्तकालय संस्करण, १५०/- जन संस्करण, आकार डिमाई, आवरण बहुरंगी सजिल्द पेपर जैकेट सहित, समय साक्ष्य प्रकाशन, १५ फालतू लाइन, देहरादून २४८००१, रचनाकार संपर्क:९५७५४६५१४७  )
***
'देखन में छोटे लगें, घाव करें गंभीर' सतसइया के दोनों के संदर्भ में कही गयी इस अर्धाली में 'छोटे' को 'छोटी' कर दें तो यह लघुकथा के सन्दर्भ में सौ टंच खरी हो जाती है। लघुकथा के शिल्प और कथ्य के मानकों में निरंतर परिवर्तन हो रहा है। भाषा और साहित्य जड़ता से जितना दूर और चेतना के जितने निकट हो उतना ही सजीव, व्यापक और प्रभावी होता है। पद्य के दोहा और शे'र को छोड़ दें तो नवगीत और मुक्तिका की सी आकारगत लघुता में कथ्य के असीम आकाश को अन्तर्निहित कर सम्प्रेषित करने की  अप्रतिम सामर्थ्य लघुकथा की स्वभावगत विशेषता है। लघु कथा की 'गागर में सागर' जैसी अभिव्यक्ति सामर्थ्य ने न केवल पाठक जुटाये हैं अपितु पाठकों के मन में पैठकर उन्हें लघुकथाकार भी बनाया है। विवेच्य कृति नव लघुकथाकारों की बगिया में अपनी सृजन-सुरभि बिखेर रही काँता रॉय जी का प्रथम लघुकथा संग्रह है. 'जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला ....' बच्चन जी की इन पंक्तियों को जीती लेखिका को जैसे हो वक़्त मिला वह 'मूषक'  (माउस) को थामकर सामाजिक शल्यों की चीरफ़ाड़ी करने में जुट गयी, फलत: ११० लघुकथाओं का पठनीय संग्रह हमारे हाथों में है। संतोष यह कि कृति प्रकाशन को लक्ष्य नहीं पड़ाव मात्र मानकर कांताजी निरंतर लघुकथा सृजन में संलग्न हैं।  

'घाट पर ठहराव कहाँ' की लघुकथाओं के विषय दैनंदिन जीवन से उठाये गये हैं। लाड़ली बिटिया, संकोची नवोढ़ा, ममतामयी माँ, संघर्षशील युवती और परिपक्व नारी के रूप में जिया-भोया-सँवारा जीवन ही इन लघुकथाओं का उत्स है। इनके विषय या कथ्य आकाशकुसुमी नहीं, धरा-जाये हैं। लेखिका के अनुसार 'मैंने हमेशा वही लिखा जो मैंने महसूस किया, बनावटी संविदाओं से मुझे सदा ही परहेज रहा है।' डॉ. मालती बसंत के अनुसार 'कांता रॉय के श्वास-श्वास में, रोम-रोम में लघुकथा है।'

कोई विस्मय नहीं कि अधिकाँश लघुकथाओं का केंद्र नारी है। 'पारो की वेदना' में प्रेमी का छल, 'व्यथित संगम' में संतानहीनता का मिथ्या आरोप, 'ममता की अस्मिता' में नारी-अस्मिता की चेतना, 'दरकती दीवारें चरित्र की' में धन हेतु समर्पण, 'घाट पर ठहराव में' जवान प्रवाह में छूटे का दुःख, 'रीती  दीवार' में सगोत्री प्रेमियों की व्यथ-कथा, 'गरीबी का फोड़ा' में बेटे की असफलता -जनित दुःख, 'रुतबा' मंत्रालय का में झूठी शान का खोखलापन, 'अनपेक्षित' में गोरेपन का अंधमोह, 'गले की हड्डी' में समधी के कुत्सित इरादों से युक्तिपूर्वक छुटकारा, 'श्राद्ध' में अस्पतालों की लोलुपता, 'पतित' में बदले की आग, 'राहत' में पति की बीमारी में शांति की तलाश, 'झमेला' में दुर्घटना-पश्चात पुलिस सूचना, 'दास्तान-ए-कामयाबी' में संघर्ष पश्चात सफलता,' डिस्टेंट  रिलेशनशिप' में नेट के संबंध, 'सुनहरी शाम' में अतीत की यादों में भटकता मन, 'जादू का शो' में मंचीय अश्लीलता, 'मिट्टी की गंध' में नगर प्रवास की व्यथा, 'मुख्य अतिथि' में समय की पाबंदी, 'आदर्श और मिसाल' में वर पक्ष का पाखंड,महिला पार्ष में अयोग्य उम्मीदवार,धर्म के ठेकेदा में मजहबी उन्माद की आग में ध्वस्त प्रेमी,एकलव् में आधुनिक परिप्रेक्ष्य में गुरु-शिष्य द्वन्द अर्थात जीवन के विविध पक्षों में व्याप्त विसंगतियाँ शब्दित हुई हैं। 

कांता जी की विशेषता जीवन को समग्र में देखना है। छद्म नारी हित रक्षकों के विपरीत उनकी लघुकथाएँ पुरुष मात्र को अपराधी मान सूली पर चढ़ाने की मांग नहीं करतीं। वे लघुकथाओं को अस्त्र बनकर पीड़ित के पक्ष में लिखती हैं, वह स्त्री है या पुरुष, बालक या वृद्ध यह गौड़ है। 'सरपंची' लघुकथा पूरे देश में राजनीति को व्यापार बना रही प्रवृत्ति का संकेत करती है। 'तख्तापलट' में वैज्ञानिक प्रगति पर कटाक्ष है। 'आतंकवादी घर के' लघुकथा स्त्री प्रगति में बाधक पुरुष वृत्ति को केंद्र में लाती है। 'मेरा वतन' में सम्प्रदायिकता से उपजी शर्म का संकेत है। 'गठबंधन' लघुकथा महाकल मंदिर की पृष्भूमि में सांसारिकता के व्यामोह में ग्रस्त सन्यासिनी पर केंद्रित है। 'मैं भक्ति के अतिरेक में डूब ही पाई थी कि ……मैं उस श्वेतांबरी के गठबंधन पर विचार करने लगा' यह लिंग परिवर्तन कब और कैसे हो गया, कौन बताये?

'प्रतिभा', 'दोस्ती', 'नेतागिरी', 'व्रती', 'जीवन संकल्प', 'उम्रदराज', 'सुई', 'सहयात्री', 'रिश्ता', 'कब तक का रिश्ता', 'कश्मकश',  पनाह', 'पनाह', 'अनुकंपा', 'नमक', 'फैशन की रसोई'  आदि नारी जीवन के विविध पहलुओं पर केंद्रित हैं तो 'विरासत', 'पार्क', 'रिपोर्ट', 'ब्रेकिंग न्यूज', 'पुनर्जन्म', 'मनरेगा','सत्य अभी मारा नहीं'. इधर का उधर' आदि में सामाजिक पाखंडों पर प्रहार है. कांता जी कहीं-कहें बहुत जल्दबाजी में कथ्य को उभरने में चूक जाती हैं। 'कलम हमारी धार हमारी', 'हार का डर',  'आधुनिक लेखिका', 'नेकी साहित्य की' आदि में साहित्य जगत की पड़ताल की गयी है।

कांता जी की लेखन शैली सरस, प्रवाहमयी, प्रसाद गुण संपन्न है। भाषिक समृद्धि ने उनकी अभिव्यक्ति सामर्थ्य को धार दी है। वे हिंदी, उर्दू, अंग्रेजी के साथ संस्कृतनिष्ठ और देशज शब्दों का यथास्थान प्रयोग कर अपनी बात बखूबी कह पाती हैं। स्नेहिल, स्वप्न, स्वयंसिद्धा, उत्तल, विभक्त, उंकुके, तन्द्रा, निष्प्राण जैसे संस्कृत शब्द, सौंधी, गयेला, अपुन, खाप, बुरबक, बतिया, बंटाधार, खोटी आदि देशज शब्द, जुदाई, ख़ामोशी, इत्तेफ़ाक़, परवरिश, अपाहिज, अहसास, सैलाब, मशगूल, दास्तां. मेहरबानी, नवाज़े, निशानियाँ, अय्याश, इश्तिहार, खुशबू, शिद्दत, आगोश, शगूफा लबरेज, हसरत, कशिश, वक्र, वजूद, बंदोबस्त जैसे उर्दू शब्द, रिमोट, ओन, बॉडी, किडनी, लोग ऑफ, पैडल बोट, बोट क्लब, टेस्ट ड्राइव, मैजिक शो, मैडम ड्रेसिंग टेबल, कंप्यूटर, मिसेज, इंटरनेट, ऑडिशन, कास्टिंग काउच जैसे अंग्रेजी शब्द काँता जी ने बखूबी उपयोग किये हैं। अंग्रेजी के जिन शब्दों के सरल और सटीक पर्याय प्रचलित हैं उन्हें उपयोग न कर अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग किया जाना अनावश्यक प्रतीत होता है। ऐसे शब्दों में डिस्टेंस (दूरी), मेसेज (संदेश), ( बंद, निकट), कस्टमर (ग्राहक), कनेक्शन (संबंध, जुड़ाव), अड्वान्स (अग्रिम), मैनेजमेंट (प्रबंधन), ग्रुप (समूह, झुण्ड), रॉयल (शाही), प्रिंसिपल (प्राचार्य) आदि हैं।

उर्दू शब्द ज़ज़्बा (भावना) का बहुवचन ज़ज़्बात (भावनाएँ) है, 'ज़ज़्बातों' (पृष्ठ ३८) का प्रयोग उतना ही गलत है जितना सर्वश्रेष्ठ या बेस्टेस्ट। 'रेल की रेलमपेल' में (पृष्ठ ४७) भी गलत प्रयोग है।बच्चों की रेलमपेल अर्थात बच्चों की भीड़, रेल = पटरी, ट्रेन = रेलगाड़ी,  रेल की रेलमपेल = पटरियों की भीड़ इस अर्थ की कोई प्रासंगिकता सनरभित लघुकथा 'भारतीय रेल' में नहीं है।  अपवादों को छोड़कर समूचे लघुकथा संकलन में भाषिक पकड़ बनी हुई है। कांता जी लघुकथा के मानकों से सुपरिचित हैं। संक्षिप्तता, लाक्षणिकता, बेधकता, मर्मस्पर्शिता, विसंगति निर्देश आदि सहबी तत्वों का उचित समायोजन कांता जी कर सकी हैं। नवोदित लघु कथाकारों की भीड़ में उनका सृजन अपनी स्वतंत्र छाप छोड़ता है। प्रथम में उनकी लेखनी की परिपक्वता प्रशंसनीय है। आशा है वे लघुकथा विधा को नव आयामित करने में समर्थ होंगी।

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आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', २०४ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, salil.sanjiv@gmail.com, ९४२५१ ८३२४४

गुरुवार, 13 दिसंबर 2018

navgeet

एक रचना
कोई बताए?
*
उगा सूरज कहाँ से
कोई बताए?
*
खबर है
सच बोलता है एक नेता।
मिला है अफसर
नहीं जो घूस लेता।
आधुनिक महिला
मिली दीपक जलाए।
उगा सूरज कहाँ से
कोई बताए?
*
एक ठेकेदार
पूरा काम करता।
एक जज जो
न्याय देने में न डरता।
दिखा विज्ञापन
न जो मिथ्या दिखाए।
उगा सूरज कहाँ से
कोई बताए?
*
परीक्षा जिसमें
नकल किंचित न होती।
नदी कोइ जो
न गंदी; सूख रोती।
एक अधिवक्ता
न जो पेशी बढ़ाए।
उगा सूरज कहाँ से
कोई बताए?
*
एक नारी जो
न नर को दोष देती।
देश-उन्नति
साथ जिसके बढ़े खेती।
पुजारी जो
भोग प्रभु का खुद न खाए।
उगा सूरज कहाँ से
कोई बताए?
*
संजीव
१३-१२-२०१८

व्यंग्य लेख: माया महाठगिनी हम जानी

व्यंग्य लेख::
माया महाठगिनी हम जानी
संजीव
*
तथाकथित लोकतंत्र का राजनैतिक महापर्व संपन्न हुआ। सत्य नारायण कथा में जिस तरह सत्यनारायण को छोड़कर सब कुछ मिलता है, उसी तरह लोकतंत्र में लोक को छोड़कर सब कुछ प्राप्य है। यहाँ पल-पल 'लोक' का मान-मर्दन करने में निष्णात 'तंत्र की तूती बोलती है। कहा जाता है कि यह 'लोक का, लोक के द्वारा, लोक के लिए' है लेकिन लोक का प्रतिनिधि 'लोक' नहीं 'दल' का बंधुआ मजदूर होता है। लोकतंत्र के मूल 'लोक मत' को गरीब की लुगाई, गाँव की भौजाई मुहावरे की तरह जब-तब अपहृत और रेपित करना हर दल अपना जन्म सिद्ध अधिकार मानता है। ये दल राजनैतिक ही नहीं धार्मिक, आर्थिक, सामाजिक भी हो सकते हैं। जो दल जितना अधिक दलदल मचने में माहिर होता है, उसे खबरिया जगत में उतनी ही अधिक जगह मिलती है।

हाँ, तो खबरिया जगत के अनुसार 'लोक' ने 'सेवक' चुन लिए हैं। 'लोक' ने न तो 'रिक्त स्थान की विज्ञप्ति प्रसारित की, न चीन्ह-चीन्ह कर विज्ञापन दिए, न करोड़ों रूपए आवेदन पत्रों के साथ बटोरे, न परीक्षा के प्रश्न-पत्र लीक कर वारे-न्यारे किए, न साक्षात्कार में चयन के नाम पर कोमलांगियों के साथ शयन कक्ष को गुलजार किया, न किसी का चयन किया, न किसी को ख़ारिज किया और 'सेवक' चुन लिए। अब ये तथाकथित लोकसेवक-देशसेवक 'लोक' और 'देश' की छाती पर दाल दलते हुए, ऐश-आराम, सत्तारोहण, कमीशन, घपलों, घोटालों की पंचवर्षीय पटकथाएँ लिखेंगे। उनको राह दिखाएँगे खरबूजे को देखकर खरबूजे की तरह रंग बदलने में माहिर प्रशासनिक सेवा के धुरंधर, उनकी रक्षा करेंगा देश का 'सर्वाधिक सुसंगठित खाकी वर्दीधारी गुंडातंत्र (बकौल सर्वोच्च न्यायालय), उनका गुणगान करेगा तवायफ की तरह चंद टकों और सुविधाओं के बदले अस्मत का सौदा करनेवाला खबरॉय संसार और इस सबके बाद भी कोई जेपी या अन्ना सामने आ गया तो उसके आंदोलन को गैर कानूनी बताने में न चूकनेवाला काले कोटधारी बाहुबलियों का समूह।

'लोकतंत्र' को 'लोभतंत्र' में परिवर्तित करने की चिरकालिक प्रक्रिया में चारों स्तंभों में घनघोर स्पर्धा होती रहती है। इस स्पर्धा के प्रति समर्पण और निष्ठां इतनी है की यदि इसे ओलंपिक में सम्मिलित कर लिया जाए तो स्वर्णपदक तो क्या तीनों पदकों में एक भी हमारे सिवा किसी अन्य को मिल ही नहीं सकता। दुनिया के बड़े से बड़े देश के बजट से कहीं अधिक राशि तो हमारे देश में इस अघोषित व्यवसाय में लगी हुई है। लोकतंत्र के चार खंबे ही नहीं हमारे देश के सर्वस्व तीजी साधु-संत भी इस व्यवसाय को भगवदपूजन से अह्दिक महत्व देते हैं। तभी तो घंटो से पंक्तिबद्ध खड़े भक्त खड़े ही रह जाते हैं और पुजारी की अंटी गरम करनेवाले चाट मंगनी और पैट ब्याह से भाई अधिक तेजी से दर्शन कर बाहर पहुँच जाते हैं।

लोकतंत्र में असीम संभावनाएं होती है। इसे 'कोकतंत्र' में भी सहजता से बदला जाता रहा है। टिकिट लेने, काम करने, परीक्षा उत्तीर्ण करने, शोधोपाधि पाने, नियुक्ति पाने, चुनावी टिकिट लेने, मंत्री पद पाने, न्याय पाने या कर्ज लेने में कैसी भी अनियमितता या बाधा हो, बिस्तर गरम करते ही दूर हो जाती है। और तो और नवग्रहों की बाधा, देवताओं का कोप और किस्मत की मार भी पंडित, मुल्ला या पादरी के शयनागार को आबाद कर दूर की जा सकती है। जिस तरह आप के बदले कोई और जाप कर दे तो आपके संकट दूर हो जाते हैं, वैसे ही आप किसी और को भी इस गंगा में डुबकी लगाने भेज सकते हैं। देव लोक में तो एक ही इंद्र है पर इस नर लोक में जितने भी 'काम' करनेवाले हैं वे सब 'काम' करने के बदले 'काम' होने के पहले 'काम की आराधना कर भवसागर पार उतरने का कोी मौका नहीं गँवाते।धर्म हो या दर्शन दोनों में कामिनी के बिना काम नहीं बनता।

हमारी विरासत है कि पहले 'काम' को भस्म कर दो फिर विवाह कर 'काम' के उपासक बन जाओ या 'पहले काम' को साध लो फिर संत कहलाओं। कोई-कोई पुरुषोत्तम आश्रम और मजारों की छाया में माया से ममता करने का पुरुषार्थ करते हुए भी 'रमता जोगी, बहता पानी' की तरह संग रहते हुए भी निस्संग और दागित होते हुए भी बेदाग़ रहा आता है। एक कलिकाल समानता का युग है। यहाँ नर से नारी किसी भी प्रकार पीछे रहना नहीं चाहती। सर्वोच्च न्यायालय और कुछ करे न करे, ७० साल में राम मंदिर पर निर्णय न दे सके किन्तु 'लिव इन' और 'विवाहेतर संबंधों' पर फ़ौरन से पेश्तर फैसलाकुन होने में अतिदक्ष है।

'लोक' भी 'तंत्र' बिना रह नहीं सकता। 'काम' को कामख्या से जोड़े या काम सूत्र से, 'तंत्र' को व्यवस्था से जोड़े या 'मंत्र' से, कमल उठाए या पंजा दिखाए, कही एक को रोकने के लिए, कही दूसरे को साधने के लिए 'माया' की शरण लेना ही होती है, लाख निर्मोही बनने का दवा करो, सत्ता की चौखट पर 'ममता' के दामन की आवश्यकता पड़ ही जाती है। 'लोभ' के रास्ते 'लोक' को 'तंत्र' के राह पर धकेलना हो या 'तंत्र' के द्वारा 'लोक' को रौंदना हो ममता और माया न तो साथ छोड़ती हैं, न कोई उनसे पीछा छुड़ाना चाहता है। अति संभ्रांत, संपन्न और भद्र लोक जानता है कि उसका बस अपनों को अपने तक रोकने पर न चले तो वह औरों के अपनों को अपने तक पहुँचने की राह बनाने से क्यों चूके? हवन करते हाथ जले तो खुद को दोषी न मानकर सूर हो या कबीर कहते रहे हैं 'माया महाठगिनी हम जानी।'
***
संपर्क: विश्व वाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, salil.sanjiv@gmail.com ।

सूचना दिसंबर २०१८: विश्ववाणी हिंदी संस्थान

ॐ 
विश्ववाणी हिंदी संस्थान 
समन्वयम २०४ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, चलभाष: ९४२५१ ८३२४४ ​/ ७९९९५५९६१८
ऍफ़ २, वी ५ विनायक होम्स, मयूर विहार, अशोक गार्डन,भोपाल ४६२०२३ चलभाष: ९५७५४६५१४७
डी १०५ शैलेंद्र नगर रायपुर छत्तीसगढ़
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इकाई स्थापना आमंत्रण 
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विश्ववाणी हिंदी संस्थान एक स्वैच्छिक अपंजीकृत समूह है जो ​भारतीय संस्कृति और साहित्य के प्रचार-प्रसार तथा विकास हेतु समर्पित है। संस्था पीढ़ियों के अंतर को पाटने और नई पीढ़ी को साहित्यिक-सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने के लिए निस्वार्थ सेवाभावी रचनात्मक प्रवृत्ति संपन्न महानुभावों तथा संसाधनों को एकत्र कर विविध कार्यक्रम न लाभ न हानि के आधार पर संचालित करती है। इकाई स्थापना, पुस्तक प्रकाशन, लेखन कला सीखने, भूमिका-समीक्षा लिखवाने, विमोचन-लोकार्पण-संगोष्ठी-परिचर्चा अथवा स्व पुस्तकालय स्थापित करने हेतु  संपर्क करें: salil.sanjiv@gmail.com, ९४२५१ ८३२४४ ​/ ७९९९५५९६१८। 
'सार्थक लघुकथाएँ २०१८
विश्ववाणी हिंदी संस्थान जबलपुर के तत्वावधान में 'सार्थक लघुकथाएँ' शीर्षक से सहयोगाधार पर इच्छुक लघुकथाकारों की २-२ प्रतिनिधि लघुकथाएँ, चित्र, संक्षिप्त परिचय (जन्मतिथि-स्थान, माता-पिता, जीवन साथी, साहित्यिक गुरु व प्रकाशित पुस्तकों के नाम, शिक्षा, लेखन विधाएँ, अभिरुचि/आजीविका, डाक का पता, ईमेल, चलभाष क्रमांक) आदि  २ पृष्ठों पर प्रकाशित होंगी। लघुकथा पर शोधपरक सामग्री भी होगी। पेपरबैक संकलन की २-२ प्रतियाँ पंजीकृत पुस्त-प्रेष्य की जाएँगी। यथोचित संपादन हेतु सहमत सहभागी मात्र ३००/- सहभागिता निधि पे टी एम द्वारा चलभाष क्रमांक ९४२५१८३२४४ में अथवा बैंक ऑफ़ इण्डिया, राइट टाउन शाखा जबलपुर IFSC- BKDN ०८११११९, लेखा क्रमांक १११९१०००२२४७  में जमाकर पावती salil.sanjiv@gmail.com या roy.kanta@gmail.com पर ईमेल करें। संपादक आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' तथा श्रीमती कांता रॉय हैं। संपर्क हेतु ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com, roy.kanta@gmail.com, चलभाष ९४२५१८३२४४ या ९५७५४६५१४७। अतिरिक्त प्रतियों पर मुद्रित मूल्य से ४०% रियायत पर पैकिंग-डाक व्यय निशुल्क सहित मिलेंगी। 
                                                                      दोहा शतक मंजूषा
विश्ववाणी हिंदी संस्थान जबलपुर के तत्वावधान तथा आचार्य संजीव 'सलिल' व डॉ. साधना वर्मा के संपादन में दोहा शतक मंजूषा के ३ भाग दोहा-दोहा नर्मदा, दोहा सलिला निर्मला तथा दोहा दीप्त दिनेश का प्रकाशन कर सहयोगियों को भेजा जा चुका है। ८००/- मूल्य की ३ पुस्तकें ( ५००० से अधिक दोहे, दोहा-लेखन विधान, २५ भाषाओँ में दोहे तथा बहुमूल्य शोध-सामग्री) ५०% छूट पर पैकिंग-डाक व्यय निशुल्क सहित उपलब्ध हैं। इस कड़ी के भाग ४ "दोहा आशा-किरण" हेतु यथोचित सम्पादन हेतु सहमत दोहाकारों से १२० दोहे, चित्र, संक्षिप्त परिचय (जन्मतिथि-स्थान, माता-पिता, जीवन साथी, साहित्यिक गुरु व प्रकाशित पुस्तकों के नाम, शिक्षा, लेखन विधाएँ, अभिरुचि/आजीविका, डाक का पता, ईमेल, चलभाष क्रमांक आदि) ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com पर आमंत्रित हैं। सहभागिता निधि ३०००/- उक्तानुसार भेजें। प्रत्येक सहभागी को गत ३ संकलनों की एक-एक प्रति तथा भाग ४ की ८ प्रतियाँ कुल ११ पुस्तकें दी जाएँगी। भाग ४  के सहभागी- सर्व श्री/श्रीमती विनीता श्रीवास्तव, इंजी. सुरेंद्र सिंह पवार, इंजी. देवेंद्र गोंटिया, संतोष शुक्ल ग्वालियर, लता यादव कैलिफोर्निया, सुमन श्रीवास्तव, पूजा अनिल स्पेन, सविता तिवारी मारीशस, डॉ. रमन चेन्नई, त्रिलोचना कौर आदि हैं। नव दोहाकारों को दोहा लेखन विधान, मात्रा गणना नियम व मार्गदर्शन उपलब्ध है।
 प्रतिनिधि नवगीत : २०१८ 
विश्ववाणी हिंदी संस्थान जबलपुर के तत्वावधान में 'प्रतिनिधि नवगीत: २०१८'' शीर्षक से प्रकाशनाधीन संकलन हेतु इच्छुक नवगीतकारों से एक पृष्ठीय ८ नवगीत चित्र, संक्षिप्त परिचय (जन्मतिथि-स्थान, माता-पिता, जीवन साथी, साहित्यिक गुरु व प्रकाशित पुस्तकों के नाम, शिक्षा, लेखन विधाएँ, अभिरुचि/आजीविका, डाक का पता, ईमेल, चलभाष क्रमांक) सहभागिता निधि ३०००/- सहित आमंत्रित है। यथोचित सम्पादन हेतु सहमत सहभागी ३०००/- सहभागिता निधि पे टी एम द्वारा चलभाष क्रमांक ९४२५१८३२४४ में अथवा बैंक ऑफ़ इण्डिया, राइट टाउन शाखा जबलपुर IFSC- BKDN ०८११११९, लेखा क्रमांक १११९१०००२२४७  में जमाकर पावती salil.sanjiv@gmail.com या roy.kanta@gmail.com पर ईमेल करें। । प्रत्येक सहभागी को ११ प्रतियाँ निशुल्क उपलब्ध कराई जाएँगी जिनका विक्रय या अन्य उपयोग करने हेतु वे स्वतंत्र होंगे। ग्रन्थ में नवगीत विषयक शोधपरक उपयोगी सूचनाएँ और सामग्री संकलित की जाएगी। देशज बोलिओं व हिंदीतर भारतीय भाषाओँ के नवगीत हिंदी अनुवाद सहित भेजें।  

शांति-राज स्व-पुस्तकालय योजना

विश्ववाणी हिंदी संस्थान जबलपुर के तत्वावधान में नई पीढ़ी के मन में हिंदी के प्रति प्रेम तथा भारतीय संस्कारों के प्रति लगाव तभी हो सकता है जब वे बचपन से सत्साहित्य पढ़ें। इस उद्देश्य से पारिवारिक पुस्तकालय योजना आरम्भ की जा रही है। इस योजना के अंतर्गत निम्न में से ५००/- से अधिक की पुस्तकें मँगाने पर मूल्य में ४०% छूट, पैकिंग व डाक व्यय निशुल्क की सुविधा उपलब्ध है। राशि अग्रिम पे टी एम द्वारा चलभाष क्रमांक ९४२५१८३२४४ में अथवा बैंक ऑफ़ इण्डिया, राइट टाउन शाखा जबलपुर IFSC- BKDN ०८११११९, लेखा क्रमांक १११९१०००२२४७  में जमाकर पावती salil.sanjiv@gmail.com या roy.kanta@gmail.com पर ईमेल करें। इस योजन में पुस्तक सम्मिलित करने हेतु salil.sanjiv@gmail.com या ७९९९५५९६१८/९४२५१८३२४४ पर संपर्क करें। 

पुस्तक सूची
०१. मीत मेरे कविताएँ -आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' १५०/-
०२. काल है संक्रांति का गीत-नवगीत संग्रह -आचार्य संजीव 'सलिल' १५०/-
०३. कुरुक्षेत्र गाथा खंड काव्य -स्व. डी.पी.खरे -आचार्य संजीव 'सलिल' ३००/-
०४. पहला कदम काव्य संग्रह -डॉ. अनूप निगम १००/-
०५. कदाचित काव्य संग्रह -स्व. सुभाष पांडे १२०/-
०६. Off And On -English Gazals -Dr. Anil Jain ८०/-
०७. यदा-कदा -उक्त का हिंदी काव्यानुवाद- डॉ. बाबू जोसफ-स्टीव विंसेंट
०८. Contemporary Hindi Poetry - B.P. Mishra 'Niyaz' ३००/-
०९. महामात्य महाकाव्य -दयाराम गुप्त 'पथिक' ३५०/-
१०. कालजयी महाकाव्य -दयाराम गुप्त 'पथिक' २२५/-
११. सूतपुत्र महाकाव्य -दयाराम गुप्त 'पथिक' १२५/-
१२. अंतर संवाद कहानियाँ -रजनी सक्सेना २००/-
१३. दोहा-दोहा नर्मदा दोहा संकलन -सं. सलिल-डॉ. साधना वर्मा २५०/-
१४. दोहा सलिला निर्मला दोहा संकलन -सं. सलिल-डॉ. साधना वर्मा २५०/-
१५. दोहा दिव्य दिनेश दोहा संकलन -सं. सलिल-डॉ. साधना वर्मा ३००/-
१६. सड़क पर गीत-नवगीत संग्रह आचार्य संजीव 'सलिल' ३००/-
१७. The Second Thought - English Poetry - Dr .Anil Jain​ १५०/-
१८. आदमी जिन्दा है- लघुकथा संग्रह -संजीव वर्मा 'सलिल' प्रकाशनाधीन 
१९. जंगल में जनतंत्र- लघुकथा संग्रह -संजीव वर्मा 'सलिल'  प्रकाशनाधीन 
२०. प्रतिनिधि लघुकथाएँ -सं. सलिल-संजीव सलिल-कांता रॉय प्रकाशनाधीन
२१. सार्थक लघुकथाएँ -सं. सलिल-संजीव सलिल-कांता रॉय प्रकाशनाधीन 
२२. दोहा है आशा-किरण दोहा संकलन -सं. सलिल-डॉ. साधना वर्मा प्रकाशनाधीन 
२३. तुम्हारे लिए - श्रृंगार गीत संग्रह - संजीव वर्मा 'सलिल' प्रकाशनाधीन
२४.   
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