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गुरुवार, 4 दिसंबर 2025

पुरोवाक्, समीक्षा, मनीषा सहाय, सुरेन्द्र नाथ सक्सेना

पुरोवाक्
''विष-बाण'' देशभक्ति भावधारा का प्राण 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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            भारत के जन-जीवन, संस्कृति और सभ्यता में राष्ट्र को देवता माना गया है। विश्व गुरु भारत में देश को 'माँ' कहा गया है जबकि शेष अधिकांश देशों में 'पिता' माना गया है। माँ के गर्भधारण के साथ एक शिशु 'माँ' से जुड़ जाता है और माँ की हर अनुभूति को खुद भी अनुभव करता है जबकि पिता के साथ जुड़ाव जन्म लेने के पश्चात ही हो पाता है। भारत की संतानों का भारत 'माँ' के साथ ऐसा ही अभिन्न जुड़ाव होना स्वाभाविक है। माँ संकट में हो तो संतान उसकी पीड़ा दूर करने के जी-जान से प्रयास करता है, यहाँ तक की खुद अपनी जान हथेली पर लेकर माँ के श्री चरणों पर अर्पित कर देता है। भारत माँ की आन-बान-शान, महिमा, गौरव, सौंदर्य आदि तथा उस पर कुर्बान होनेवाले रण-बाँकुरे पुत्रों-पुत्रियों का गौरव गान करने की सनातन परंपरा भारत में रही है। 
            
            मानव सभ्यता के जन्म के साथ ही जन्म-भूमि से जुड़ाव और जन्म भूमि की रक्षा के लिए संघर्ष करने की प्रवृत्ति की भावधारा निरंतर विकसित होती रही है। भाषा के व्याकरण, पिंगल और लिपि के विकास के पूर्व से लोक में 'मातृ-देवता' और 'मातृ-भूमि' की संकल्पना रही है। 'पंच मातृकाओं', सप्त मातृकाओं की अवधारणा पहले लोक में ही विकसित हुई। 'माँ' से शिशु पोषित होता है इसलिए मनुष्य के पोषण के लिए जिन तत्वों को अपरिहार्य पाया गया, उन सबको लोक ने मातृवत ही नहीं मातृ  ही माँ लिया। इसीलिए लोक में जन्मदात्री, धाय, विमाता, धरती, गौ, नदी, वाक् अथवा वाग्देवी, समृद्धिदात्री लक्ष्मी, शक्तिदात्री शिवा आदि को माता कहा गया। मातृ-भाव का विकास अनिष्टकारिणी शक्तियों तक हुआ और शीतल माता आदि के रूप में महामारियों को भी माता मानकर पूजा गया ताकि में संतान के प्रति ममत्व भाव रखकर अनिष्ट न करें। इस चिंतन-धारा ने आपात-काल में मानव को धैर्य, सहिष्णुता, सद्भाव और सहयोग भाव के साथ मिलकर जूझने और उबरने का सामर्थ्य दिया जबकि कोरोना काल में इस भाव की अनुपस्थिति ने जन सामान्य को कातर, असहाय और भीरु बना दिया। लोक ने मातृभूमि के प्रति आभार व्यक्त करते हुए लोक काव्य में राष्ट्रीय भावधारा को सतत विकसित और समृद्ध किया। लोक काव्य  सीधे जनता से जुड़ता है और राष्ट्रीय चेतना, प्रेम, बलिदान और गौरव की भावना को सरल और प्रभावी ढंग से व्यक्त करता है। 

            भाषा और नागर सभ्यता के विकास के साथ लोक में पली-बढ़ी राष्ट्रीय काव्य-धारा का व्यवस्थित विकास एक महत्वपूर्ण साहित्यिक और ऐतिहासिक प्रक्रिया रही है जो विविध कालों में भारत भूमि पर विदेशी आक्रमणों के समय देशवासियों के मनोबल बढ़ाने, शौर्य जगाने और आत्माहुति हेतु तत्पर युवाओं को संघर्ष करने हेतु आत्म-बल दे सकी। आधुनिक काल में भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान राष्ट्रीय काव्य-धाराअपने चरम पर पहुँची । इस भावधारा ने कवियों को देश प्रेम, सांस्कृतिक गौरव, बलिदान और एकता की भावना को अपनी रचनाओं के माध्यम से व्यक्त करने के लिए प्रेरित किया। इस राष्ट्रीय भावधारा की मुख्य विशेषताएँ देश प्रेम और बलिदान भाव, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक गौरव गान, भारत के गौरवशाली इतिहास और वीर योद्धाओं का गुणगान, जनजागरण और एकतापरक जनगान और आह्वान गीत, आक्रान्ताओं-आतंकियों तथा साम्राज्यवाद विरोधी तथा आदर्शवाद रहे हैं। भारत के दार्शनिक ऋषि-मुनियों ने देश हेतु संघर्षरत योद्धाओं को 'सुर', 'देव' आदि तथा आक्रमणकारियों को 'असुर', 'दैत्य' आदि के रूप में चित्रित किया। असुरों की संहारिणी शक्ति को मातृ-शक्ति के रूप में निरंतर पूजा गया। 

            हिंदी के विकास के साथ राष्ट्रीय भावधारापरक साहित्य सृजन की उदात्त परंपरा सतत पुष्ट होती गई। आदिकाल को वीरगाथाओं के विपुल सृजन के कारण 'वीरगाथा काल' के रूप में नामित किया गया। भक्ति काल में न्याय के पक्ष में संघर्षरत स्थानीय शक्तियों को देव और अन्याय कर रही शक्तियों को राक्षस कहते हुए देवों के पराक्रम और शौर्य का गायन किया गया। सम-सामयिक आक्रान्ताओं के नाश हेतु दैवीय शक्तियों से याचना-प्रार्थना आदि के रूप में राष्ट्रीय-काव्य का नव रूप सामने आया। शिव, दुर्गा, राम और कृष्ण भक्ति काल में राष्ट्रीय नायकों के रूप में अपने भक्तों सहित पूजित हुए। रीतिकाल में कला और शृंगार की प्रधानता होते हुए भी रानी दुर्गावती, राणा प्रताप, चाँद बीबी, छत्रपति शिवाजी, छत्रसाल बुंदेला आदि के संघर्ष और त्याग-बलिदान का गुणगान, आक्रांता यवनों के अत्याचारों का विरोध आदि के रूप राष्ट्रीय काव्यधारा भी पुष्ट होती रही। अंग्रेज शासन-काल में उसने जूझनेवाले बुंदेला क्रांतिकारी, रानी लक्ष्मीबाई, गोड़ राजा शंकरशाह व उनके पुत्र रघुनाथ शाह, कुँवर सिंह, नाना साहब, तात्या टोपे, क्रांतिकारी भगवती चरण वोहरा व उनकी पत्नी दुर्गा भाभी, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल, रास बिहारी बोस, सुभाष चंद्र बोस आदि तथा उनके वीरोचित कार्य राष्ट्रीय काव्य धारा के केंद्र में रहे। स्वाधीनता हेतु संघर्षरत अहिंसक राष्ट्र नायकों भीखाजी कामा, लाल-बाल-पाल, राजा, राम मोहन राय, म. गाँधी, सरोजिनी नायडू, जवाहर लाल नेहरू, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, महर्षि अरविंद घोष, मौलाना आजाद आदि, सत्याग्रह आंदोलनों आदि को केंद्र में रखकर राष्ट्रीय काव्यधारा समय साक्षी हुई।

            स्वतंत्रता पश्चात हिंदी काव्य में राष्ट्रीय चेतना सतत विकसित होती रही। भारत माता, तिरंगा, क्रांतिकारियों, शहीदों सत्याग्राहियों, राष्ट्र निर्माताओं व सेनाओं का गौरव-गान, जनाकांक्षाओं व लोकमत की अभिव्यक्ति, नए तीर्थों (बाँध, कारखानों आदि), कृषि, राष्ट्रीय प्रतीकों-भाषाओं आदि का महिमा गायन, राष्ट्र के नव निर्माण हेतु आह्वान गान, जनगीत आदि आयाम राष्ट्रीय चेतना के पर्याय बनते गए। विडंबन है कि अपनी उदार व सर्व समावेशी नीति के बाद भी भारत को पड़ोसियों की कुदृष्टि का शिकार होकर आक्रमणों का सामना करने की विवशतावश हथियार थमने पड़े। इस स्थिति में आक्रामकों की निंदा, राष्ट्रीय अस्मिता की रक्ष हेतु जन जागरूकता, सैनिकों की कीर्ति-कथा गायन आदि भी राष्ट्रीय चेतना के अंग हो गए। चीन तथा पाकिस्तान के हमलों के विरोध में देश का है साहित्यकार सेनाओं के मनोबल बढ़ाने, जन-गण में चेतन जगाने, सरकार के हाथ मजबूत करने के लिए 'कल'म को मिसाइल के तरह थामकर शत्रुओं पर शब्द-बाण संधान करने हेतु सन्नद्ध हो गया। हिंदी के श्रेष्ठ-ज्येष्ठ कवि डॉ. सुरेन्द्रनाथ सक्सेना ने ''विष-बाण'' सुदीर्घ काव्य की रचना २ सर्गों, ९४ चतुष्पदियों में करते हुए वीर सैनकों के प्रति काव्यांजली समर्पित की। २१ मार्च १९६३ से १५ फरवरी १०६४ की कालावधि में लिखी गई यह वीर-गाथा किसी एक सेनानी के प्रति न लिखी जाकर देश के सैन्य-बल को नायक मानकर लिखी गई है। 

               सरहद पर अपनी जान हथेली पर लिए अहर्निश जाग रहे सैनिक तथा उसके आयुधों की मान-वंदना करते हुए कवि कहता है- 

जय हो उस मस्तक की, जो कट गया किंतु जो झुका नहीं 
जय हो उस उन्मुक्त चरण की, गिरा किंतु जो रुका नहीं 
जय हो उन हाथों की, जिनने कोटि-कोटि है वार किया
जय हो उन तोपों-गोलों की जिनने कोटि-कोटि है वार किया

जय हो उस अदम्य साहस की, रण में भी जो डिगा नहीं  
जय हो उस नर-नाहर की, जो रण-स्थल तज हटा नहीं 
उनकी ही जय के गीतों से, गगन गूँजता नारों से 
गूँज रहा है आज हिमालय, उनकी जय-जयकारों से 

            सीमा पर हमला कर रहे चीन के नेता द्वय चाउ एन लाई तथा माओ त्से तुंग को कवि विश्व के मिट्टी में मिल चुके तानाशाहों में शुमार कर, लानत भेजते हुए चेताता है- 

सँभलो ए दगाबाज! धोखेबाजों! धरती के गद्दारों!
चेतो चाऊ-माऊ युग-युग के, छद्मवेशी नर! मक्कारों!  
धरती की छाती चीर दिखा दूँगा सो रहे सिकंदर को 
ले विश्व विजय की ध्वस्त कामना, मिले खाक में हिटलर को 

यह बोनापार्ट नया देखो आ गया तुम्हारे ही पथ पर
होने दो दफन इसे भी तो, अपनी श्रेणी में इधर-उधर 

            महाकाल मृत्युंजय सदा शिव तथा आदिशक्ति चंडिका का आह्वान करता कवि पुन: तांडव करने की प्रार्थना करता है। भारतीय सेना के रणबाँकुरों से शत्रु को माटी में मिलाने की अपेक्षा करता है- 

लेना बहादूरों एक-एक दुश्मन को चुन-चुनकर लेना 
पापी शत्रु की छाती में, गहरी तलवार घुसा देना
जिन आँखों ने लिप्सा-दृष्टि डाली है इस धरती पर 
पिघला शीशा भरकर उनमें, धरती में उन्हें सुला देना 

            आतताई चीन को आईना दिखाता कवि भारत के के-एक सैनिक के साथ दस-दस सैनिकों को लड़ाने की नीति पर कटाक्ष करता है -

ओ मार्क्सवाद के अंधभक्त! यह रण-कौशल किससे सीखा?
इंसान चीन में होते हैं, या मात्र भेड़ रण-भयभीता?
ये बलि के बकरे काट-काट क्यों व्यर्थ समय को खोता है?
अत्याचारों का घट भरकर क्यों बोझ पाप का ढोता है?

            चीन द्वारा वादा-खिलाफी और विश्वासघात पर शब्दाघात करने के साथ कवि उसे भारत से मिली बौद्ध धर्म की विरासत तथा व्हेनसांग की परंपरा याद दिलाते हुए युद्धों से आसन्न विश्व के विनाश के खतरे के प्रति सजग करता है। 

अणु के विस्फोटों से पहले, फूटेगा यह मानस कराल 
जलने से पहले अखिल विश्व, धधकेगा यह गिरिवर विशाल 

            दुर्भाग्यवश युद्ध में मिली पराजय से निराश न होकर कवि नए संकल्प के साथ कृष्ण से मिले गीता-ज्ञान को हृदयंगम कर, इतिहास हो चुके बलिदानी-पराक्रमी भारतीय महावीरों के बल-विक्रम को याद कर एक ओर देश के जन-मानस में नव आशा, विश्वास और पुन: उठ खड़े होकर आगे बढ़ने काअ भाव जगाता है दूसरी ओर विश्व शक्तियों को उनके दायित्व की याद और पड़ोसी पाकिस्तान को चीन के साथ गलबहियाँ करने पर लताड़ता है। कवि सर्गांत में यह प्रश्न पूछता है की मानव मात्र का कल्याण युद्ध या शांति किसमें है, महाशक्तियाँ इस पर विचार कर अपना आचरण बदलें और दायित्व का निर्वहन करें। 

            द्वितीय सर्ग में पाकिस्तान द्वारा कच्छ के रन में पाकिस्तान द्वारा किए गए आक्रमण के प्रतिकार में कवि दोनों देशों की नीतियों, आदर्शों और आचरण में अंतर को इंगित करता है- 

यह पाकिस्तान और भारत का युद्ध मात्र ही नहीं रहा 
इतिहास साक्षी है हमने रण की पुकार को नहीं सहा 
हमने न सिकंदर उपजाए जो लौट जाए मुँह की खाकर 

            पाकिस्तान में सेना के दबदबे और उसकी अमेरिका-परस्ती पर कटाक्ष कर कवि उसे आईना दिखाता है- 

लाहौर बेच डाला अमरीका के हाथों इन नीचों ने
मुँह बंद कर दिया जनता का जब संगीनों की नोकों से 
तब रावलपिंडी को बेचा चीनी शैतानों के हाथों 
यों पाक नीति के मस्तक पर, नाच रहा चीनी माओ 

            कवि सुरेन्द्र नाथ जी युद्ध-चर्चा तक सीमित नहीं रहते, वे विश्व और मानवता की हित-चिंता करते हुए अतीत और इतिहास के प्रसंगों को इंगित कर उनसे सीख लेने और विश्व-शांति के समक्ष खतरा बन रहे तत्वों का विरोध कर रही शक्तियों से एक साथ मिलने का आह्वान करते हैं- 
 
जो शक्ति गुटों से परे और जिनको स्वतंत्रता प्यारी है
जागे अफ्रीकी-एशियाई, यह घोर घटा घिर आई है 
जम जाए विदेशी चरण नहीं, प्यारे स्वदेश की धरती पर 
जल जाए स्वार्थ के मोह-जाल में पाल स्वयं ही उभर-उभर 

            कवि युग-धर्म के प्रति सचेत करते हुए शांति प्रिय देशों को उनका दायित्व याद दिलाते हुए कृति को युग-बोध का पर्याय बना देता है -

जिन हाथों में है शक्ति और नैतिक बल आत्म-सुरक्षा का 
उन को न किसी का भय-बंधन, उनकी न किसी पर निर्भरता 
क्यों रुके वीरता के बढ़ते पग, किसी अन्य की आशा में 
है व्यर्थ बात करना दुष्टों से, सदा सभ्यतम भाषा में 

            पाकिस्तान द्वारा युद्ध का विस्तार कश्मीर तक किए जाने पर कवि पाकिस्तानी जनता, सैनिकों और नेताओं को याद दिलाता है कि उनकी रगों में बह रहा रक्त किसी ने का नहिं, भारत माता का ही है- 

पूछो हर एक सिपाही से जो खून बह रहा है उसमें 
वह पाकिस्तानी माँ का है या भारत का है रग-रग में?
पूछो हर एक नमाजी से जब वह सजदे में झुकता है 
तब उसकी आँखों के आगे यह कैसा चित्र उभरता है 

            पकिसतान निर्माण की पृष्ठभूमि में भारत के प्रति घृणा को इंगित कर कवि, विश्व और मानवता के कल्याण हेतु पाकिस्तान का भारत में विलय ही एकमात्र समाधान बताता है- 

धो दो आपस का भेदभाव, हम एक राष्ट्र हों बलशाली
फैले सर्वत्र विभा अपनी, जगमग हो अपनी दीवाली 
जय हो जन जीवन की जय हो, विजयी हो जग में जन मानस
हो भारत-पाक संघ निर्मित, हीव फिर से अखंड भारत

            कृति का शीर्षक भले ही 'विष-बाण'' है किंतु समूची कृति में विषैले वर्तमान से आसन्न सर्वनाश की विभीषिका के प्रति चेतावनी देते हुए विश्व और मानव-कल्याण की कामना ही कवि का लक्ष्य है। 

            सुरेन्द्र नाथ जी की भाषा प्रसंगानुकूल, प्रवाहमयी,  सरल, सरस और शब्द-चयन सटीक है। वीर रस और शांति रस प्रधान इस कृति में करुण रस भी यत्र-तत्र है। कवि ने छंद सृजन में विविधता और शिल्प पर कथ्य को वरीयता की राह चुनी है। हिंदी की राष्ट्रीय काव्य धारा में 
''विष-बाण'' देखन में छोटन लगें, घाव करें गंभीर'' की परंपरा का निर्वहन करता है। गागर में सागर की तरह संकेतों में बहुत महत्वपूर्ण और सर्वकालिक मूल्यों की जयकार करता ''विषबाण'' कवि की अभिव्यक्ति सामर्थ्य और सनातन सत्य मूल्य परक चिंतन का दस्तावेज है। 
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संपर्क- विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, व्हाटऐप ९४२५१८३२४४ 

 
  

गुरुवार, 13 नवंबर 2025

मीना भट्ट, जीवन-धारा, पुरोवाक्

पुरोवाक् 
लोकोपयोगी गीतों की मंजूषा ''जीवन धारा''   
- आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' 
*
                    सनातन सलिला नर्मदा की घाटी आदि काल से साधना भूमि के रूप में प्रसिद्ध है। साधना की यह विरासत अतीत से वर्तमान तक गतिमान है। सर्व हित की साधना केवल आध्यात्मिक व्यक्तित्व ही नहीं करते, सांसारिक व्यक्ति भी सर्व कल्याण की साधना करता है। साहित्य की साधना इसी प्रकार की साधना है। साहित्य वह जिसमें सबका हित समाहित हो। नर्मदा तटीय संस्कारधानी जबलपुर की पुण्य भूमि पर साहित्य सृजन की दिव्य परंपरा चिरकालिक है। संस्कारधानी के समसामयिक साहित्य-साधकों में 'मीना भट्ट' एक ऐसा नाम है जो सत्य-शिव-सुंदर और सत-शिव-सुंदर को साहित्य सृजन का लक्ष्य मानकर, निरंतर सृजन में रत है। सामान्यत: नया साहित्यकार अपने लिखे को ही श्रेष्ठ समझता और आत्म मुग्ध रहता है। अंतर्जाल के विविध समूहों पर अधकचरा साहित्य निरंतर परोसा जा रहा है। मीना जी इस कुप्रवृत्ति का विरोध बोलकर नहीं, निरंतर लिखकर करती हैं। वे लिखने के साथ-साथ निरंतर पढ़ती और समझती हैं। गीत-गजल आदि विधाओं में मीना का रचनाकार कलम उठाने के पहले उसका अध्ययन करता है, निरंतर अभ्यास कर सृजन करता है, जानकारों से विमर्श करता है और अपने लेखन को तराशने के बाद प्रकाशित करता है। संभवत:, इस मनोवृत्ति का कारण मीना जी का विधि और न्याय विभाग से जुड़ा रहना है। मीना जी का एक और वैशिष्ट्य आत्म प्रचार से विमुख रहना और अपने पूर्व पद का अहं न रखना भी है। यह निरासक्त भाव लेखन के विषय और शिल्प के प्रति तटस्थ रहकर उससे संबंधित मौलिक चिंतन करने और उसे रचनाओं में अभिव्यक्त करने में सहायक होता है। ''जीवन धारा'' मीना जी की नवीन काव्य कृति है, जिसमें मीना जी की सुदीर्घ काव्य-सृजन साधना का संस्कार पंक्ति-पंक्ति में प्रतिबिंबित है।

                    जीवन धारा का श्रीगणेश वाग्देवी वंदना से करने की सनातन परंपरा को जीवंत रखते हुए मीना जी उन्हें 'महाबला', 'शत्रुनाशिनी', 'सुलोचना', 'सुमंगला', 'मुक्तिवाहिनी', 'प्रेमदायिनी', 'सुहासिनी', 'श्रीप्रदा', 'प्रशासनी' आदि अपारंपरिक विशेषणों से अभिषिक्त कर, मौलिक चिंतन दृष्टि का परिचय देती हैं। श्रीराम पर केंद्रित रचना में 'गंगा धारे' लिखा जाना मौलिक तो है किंतु लोक में 'गंगा धारे' शिव जी हेतु प्रयुक्त होता है। इसे 'गंग किनारे' लिखना अधिक समीचीन होता। वंदना क्रम में श्री कृष्ण, भारत देश के पश्चात लोक का स्मरण 'प्रेम' भाव को अपनाने के आह्वान से किया जाना द्वेषाधिक्य से ग्रसित इस समय में सर्वथा श्लाघ्य है। जीवन धारा के गीतों में जन सामान्य को जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने, पारस्परिक सद्भाव वृद्धि, सत्कर्म करने की प्रेरणा, राष्ट्र भक्ति, नैतिक मूल्यों की स्थापना तथा पर्यावरण और प्रकृति के प्रति दायित्व बोध के साथ नर-नारी के मध्य स्वस्थ्य पारस्परिक सहयोग भाव की आवश्यकता प्रतिपादित कर मीना जी ने अपने गीतों को केवल वाग्विलास होने से बचाकर, लोकोपयोगी और अनुकरणीय बनाने में सफलता अर्जित की है। गत ७ दशकों में प्रगतिवाद और यथार्थ की दुहाई देकर हिंदी साहित्य में जिस नकारात्मक और द्वेषवर्धक प्रवृत्ति की बढ़ आई है, उसका रचनात्मक प्रतिरोध करते हुए मीना जी ने अपने हर गीत में सकारात्मक और निर्माणात्मक सुरुचि का बीजारोपण किया है। 

                    मानव जीवन में ऋतु परिवर्तन की महती भूमिका है। मीना जी ने मौसमों के अतिरेकी विनाशक परिदृश्य पर मोहक स्वरूप को वरीयता ठीक ही दी है। सावन वर्णन में घोंसले भीगने पर भी पंछी का दाना चुनने आना उसकी जिजीविषा दर्शाता है किंतु चुगने को दाना न मिलना मनुष्यों के कदाचरण का संकेत करता है- 

छोड़ घोंसले भीगे-भीगे, 
पंछी आए आँगन में।
नहीं मिला दान चुगने को,
अब के देखो सावन में।। 

                    हमने बचपन में देखा है कि गरीब से गरीब घर में भी गाय और कुत्ते के लिए रोटी निकली जाती थी, अब संपन्नतम घरों से भी किसी को कुछ नहीं मिलता। मीना जी की खूबी यही है कि वे स्थूल वर्णन न कर परोक्ष संकेत करती हैं, समझनेवाले के लिए इशारा ही काफी होता है। 

                    वर्षा न होने संबंधी गीत में ''रिक्त नेह के घट सारे हैं, / कुटिल मलिनता भरी हुई है। / पत्थर हृदय जमाना सारा, / मानवता भी मरी हुई है।। /  चटक मन नित प्यास तरसे, / सूख हुआ तन भी पंजर है। / तरस रहे वर्षा को हम सब, / मौन मगर बैठ अंबर है।।'' लिखकर गीतकार ने अवर्षा के लिए प्रकृति को दोष न देते हुए मानव में स्नेह के अभाव और मलिनता के आधिक्य को इंगित कर 'वर्षा' को केवल मौसमी बरसात नहीं मानव जीवन में स्नेह की वर्षा के अभाव के रूप में शब्दित किया है, यह श्लेष प्रयोग गीत को चिंतन और चिंता दोनों धरातलों पर प्रतिष्ठित करता है। 

                    लोकतंत्र का आधार हर नागरिक को अपनी  सरकार आप चुनने का संविधान सम्मत मताधिकार है। 'जागो मतदाता, जागो अब' गीत में नागरिकों को उनके गुरुतर दायित्व का बोध कराया गया है। अपने गीतों में मीना जी सरल, सहज, प्रवाहमयी भाषा का उपयोग करते हुए अन्य भाषाओं के शब्दों से परहेज नहीं करतीं। इस गीत में अंग्रेजी भाषा के पोलिंग बूथ, वोटिंग कार्ड शब्दों का प्रयोग उनकी भाषिक उदार दृष्टि का परिचायक है। तद्भव / देशज शब्दों (मनवा, करतार, हिय, टोटा, अँखियाँ, जिया, नैना, डगर, छोरी, भौंरा, करधनिया, इत-उत आदि), उर्दू में व्यवहृत अरबी-फारसी शब्दों (मस्त, तूफान, खुशियाँ, रोशनी आदि), शब्द युग्मों (निशि-वासर, निशि-दिन, दिन-रात, राग-द्वेष, पाप-पुण्य, दीन-दुखी, शीलवंत-गुणवंत, मंदिर-मस्जिद, चंदल-रोली,धूल-धूसरित, राग-रागिनी आदि), तत्सम शब्दों (नवल, हलाहल, मयंक, अनुपम, अंबुज आदि) के साथ अन्य भाषा के शब्दों के देशज रूपों (अंग्रेजी सैंडल - संदल, संस्कृत हट्ट - हाट आदि), शब्द-आवृत्ति (गली-गली, खंड-खंड, निरख-निरख, अंग-अंग आदि)  के साथ बटोही (भोजपुरी), सैंदुर (बुंदेली) आदि शब्दों का सम्यक-सार्थक प्रयोग मीना जी के शब्द-सामर्थ्य का परिचायक है। 

                    इस गीतों में शृंगार (आध्यात्मिक-सांसारिक, मिलन-विरह) , शांत, करुण, भक्ति तथा वीर रस अपनी सरसता के साथ यथास्थान सहभागी होकर संकलन को समृद्ध कर रहे हैं। संकलन का आलंकारिक वैभव रुचिवान पाठक को अनुप्रास, यमक, श्लेष, उपमा, रुपक, अतिशयोक्ति, पुनरावृत्ति आदि अलंकारों की छटा दिखाकर मुग्ध करता है। 

                    मीना जी व्यवसाय से न्यायाधीश रही हैं। स्वाभाविक है कि उन्हें कर्तव्य पालन और अनुशासन प्रिय हों। इस संकलन के माध्यम से केवम मनोरंजन न कार, उन्होंने पाठक के माध्यम से समग्र समाज को जाग्रत कार उसमें कर्तव्य बोध और अनुशासन पालन का पथ शक्कर में लपेटी कुनैन की गोली खिलाने की तरह किया है- 

देता गौरव है अनुशासन, 
देखो अलख जगाएगा। 
अनुशासन के पालन से ही 
युग परिवर्तन आएगा।  

                    इन गीतों की भाषा प्रांजल, प्रवाहमयी, सरस और सुबोध है। मुझे आशा हे नहीं भरोसा भी है कि ये गीत हर आयु वर्ग, क्षेत्र, पंथ और वादाग्रहियों द्वारा सराहे और समझें जाएँगे। लंबे समय बाद साहित्यिक गुणवत्ता युक्त लोकोपयोगी गीत संग्रह की पांडुलिपि का वाचन कर रसानंद में मगन होने का अवसर मिला है। मीना जी साधुवाद की पात्र हैं।  
          
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संपर्क- विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, चलभाष ९४२५१८३२४४                     

विचार हेतु 
लक्ष्मी दुर्गावती में काल-क्रम दोष (दुर्गावती पहले हुईं, लक्ष्मीबाई बाद में) 
पाना तुमको लक्ष्य अगर तो / निशि-वासर चलते रहिए  - तुम के साथ रहो, आप से साथ रहिए?

सोमवार, 22 सितंबर 2025

पुरोवाक्, हिंदी गजल, अर्जुन चव्हाण

पुरोवाक्
''सामयिक वैचारिकी का फेस्ट है''- आप सब दोस्तों से एक रिक्वेस्ट है
आचार्य इं. संजीव वर्मा 'सलिल'
*


            गजल विश्व के साहित्य जगत को भारत भूमि का अनुपम उपहार है। लोक साहित्य में सम तुकांती अथवा समान पदभार की दोपदियों में कथ्य कहने की परिपाटी आदिकाल से रही है। घाघ, भड्डरी जैसे लोक कवियों की कहावतों में समान अथवा भिन्न पदभार तथा समतुकांती एवं विषम तुकांती रचनाएँ सहज प्राप्त हैं।
सम तुकांत, समान पदभार-
शुक्रवार की बादरी, रही सनीचर छाय।
तो यों भाखै भड्डरी, बिन बरसे ना जाय।। 
विषम तुकांत, समान पदभार-
सावन सुक्ला सप्तमी, जो गरजै अधिरात।
बरसै तो झूरा परै, नाहीं समौ सुकाल।।   
सम पदांत, असमान पदभार-
गेहूं गाहा, धान विदाहा।
ऊख गोड़ाई से है आहा।।
ग़ज़ल का जन्म 
            काल क्रम में संस्कृत साहित्य में इस शैली में श्लोक रचे गए। संस्कृत से छंद शास्त्र फारसी भाषा ने ग्रहण किया। द्विपदियों को फारसी में शे'र (बहुवचन अश'आर) कहा गया। फारसी में एक द्विपदी के बाद समान पदांत और समान पदभार की पंक्तियों को संयोजन कर रचना को 'ग़ज़ल' नाम दिया गया। भारत में कविता का उद्गम एक क्रौंच युगल के नर का व्याध के शर से मरण होने पर क्रौंची के करुण विलाप को सुनकर महर्षि वाल्मीक के मुख से नि:सृत पंक्तियों से माना जाता है। फारस में इसकी नकल कर शिकारी के तीर से हिरनी के शावक का वध होने पर हिरनी द्वारा किए विलाप को सुनकर निकली काव्य पंक्तियों से ग़ज़ल की उत्पत्ति मानी गई। संस्कृत काव्य में द्विपदिक श्लोकों की रचना आदि काल से की जाती रही है। ​संस्कृत की श्लोक रचना में समान तथा असमान पदांत-तुकांत दोनों का प्रयोग किया गया। भारत से ईरान होते हुए पाश्चात्य देशों तक शब्दों, भाषा और काव्य की यात्रा असंदिग्ध है। १० वीं सदी में ईरान के फारस प्रान्त में सम पदांती श्लोकों की लय को आधार बनाकर कुछ छंदों के लय खण्डों का फ़ारसीकरण नेत्रांध कवि रौदकी ने किया। इन लय खण्डों के समतुकांती दुहराव से काव्य रचना सरल हो गयी। इन लयखण्डों को रुक्न (बहुवचन अरकान) तथा उनके संयोजन से बने छंदों को 'बह्र' कहा गया। फारस में सामंती काल में '​तश्बीब' (​बादशाहों के मनोरंजन हेतु ​संक्षिप्त प्रेम गीत), 'कसीदे' (रूप/रूपसी ​या बादशाहों की ​की प्रशंसा) तथा ​'गजाला चश्म​'​ (मृगनयनी, महबूबा, माशूका) से वार्तालाप ​के रूप में ​ग़ज़ल लोकप्रिय हुई​। भारत में द्विपदियों में पदभार के अंतर पर आधारित अनेक छंद (दोहा, चौपाई, सोरठा, रोला, आल्हा आदि) रचे गए। फारसी में छंदों की लय का अनुकरण और फारसीकरण कर बह्रें बनाई गईं। कहते हैं इतिहास स्वयं को दुहराता है, साहित्य में भी यही हुआ। भारत से द्विपदियाँ ग्रहण कर फारस ने ग़ज़ल के रूप में भारत को लौटाई। फारसी और पश्चिमी सीमांत प्रदेशों की भाषाओं के सम्मिश्रण से क्रमश: लश्करी, रेख्ता, दहलवी, हिंदवी और उर्दू का विकास हुआ। खुसरो, कबीर जैसे रचनाकारों ने हिंदी ग़ज़ल को जन्म दिया। फारसी में 'गजाला चश्म' (मृगनयनी) के रूप की प्रशंसा और आशिको-माशूक की गुफ्तगू तक सीमित रही ग़ज़ल को हिंदी ने वतन परस्ती, इंसानियत और युगीन विसंगतियों की अभिव्यक्ति के जेवरों से नवाजा। फलत: महलों में कैद रही ग़ज़ल आजाद हवा में साँस ले सकी। उर्दू ग़ज़ल का दम बह्रों की बंदिशों में घुटते देखकर उसे 'कोल्हू का बैल' (आफताब हुसैन अली) और  'तंग गली' (ग़ालिब) के विशेषण दिए गए थे। हिंदी ने ग़ज़ल को आकाश में उड़ान भरने के लिए पंख दिए। 
हिंदी ग़ज़ल
            हिंदी ग़ज़ल को आरंभ में 'बेबह्री' होने का आरोप झेलना पड़ा। खुद को 'दां' समझ रहे उस्तादों ने दुष्यंत कुमार आदि की ग़ज़ल के तेवर को न पहचानते हुए खारिज करने की गुस्ताखी की किंतु वे नादां साबित हुए। वक्त ने गवाही दी कि हिंदी ग़ज़ल फारसी और उर्दू की जमीन से अलग अपनी पहचान आप बन और बना रही थी। हिंदी ग़ज़ल ने मांसल इश्क की जगह आध्यात्मिक प्रेम को दी, नाजनीनों से गुफ्तगू करने की जगह आम आदमी की बात की, 'बह्र' की बाँह में बंद होने की जगह छन्दाकाश् में उड़ान भरी, काफ़ियों में कैद होने की जगह तुकांत और पदांत योजना में नई छूट ली, नए मानक गढ़े हैं। हिंदी ग़ज़ल की मेरी परिभाषा देखिए- 

ब्रम्ह से ब्रम्हांश का संवाद है हिंदी ग़ज़ल।
आत्म की परमात्म से फ़रियाद है हिंदी ग़ज़ल।।
*
मत गज़ाला-चश्म कहना, यह कसीदा भी नहीं।
जनक-जननी छन्द-गण, औलाद है हिंदी ग़ज़ल ।।
*
जड़ जमी गहरी न खारिज़ समय कर सकता इसे
सिया-सत सी सियासत, मर्याद है हिंदी ग़ज़ल ।।
*
भार-पद गणना, पदांतक, अलंकारी योजना
दो पदी मणि माल, वैदिक पाद है हिंदी ग़ज़ल ।।
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सत्य-शिव-सुन्दर मिले जब, सत्य-चित-आनंद हो
आsत्मिक अनुभूति शाश्वत, नाद है हिंदी ग़ज़ल ।।
*
नहीं आक्रामक, न किञ्चित भीरु है, युग जान ले
प्रात कलरव, नव प्रगति का नाद है हिंदी ग़ज़ल ।।
*
धूल खिलता फूल, वेणी में महकता मोगरा
छवि बसी मन में समाई याद है हिंदी ग़ज़ल ।।
*
धीर धरकर पीर सहती, हर्ष से उन्मत्त न हो
ह्रदय की अनुभूति का, अनुवाद है हिंदी ग़ज़ल ।।
*
मुक्तिका है, तेवरी है, गीतिका है, सजल भी
पूर्णिका अनुभूति से संवाद है हिंदी ग़ज़ल ।।
*
परिश्रम, पाषाण, छेनी, स्वेद गति-यति नर्मदा
युग रचयिता प्रयासों की दाद है हिंदी ग़ज़ल ।।

            हिंदी ग़ज़ल में अनेक प्रयोग किए गए हैं। यह दीवान ''आप सब दोस्तों से यह रिक्वेस्ट है' हिंदी के प्रामाणिक विद्वान शायर प्रो. अर्जुन चव्हाण लिखित १०५ प्रयोगधर्मी ग़ज़लों का महकता हुआ गुलदस्ता है। 'कहते हैं कि ग़ालिब का है अंदाजे-बयां और' की तरह अर्जुन जी का भी अपना बात कहने के तरीका और सलीका है। वे शिल्प पर कथ्य को वरीयता देते हैं। 'या हंसा मोती कहने या भूख मार जाय' अर्जुन जी चुनने की स्वतंत्रता से कोई समझौता नहीं करते। वे हिंदी, संस्कृत, मराठी, फारसी, अंग्रेजी या अन्य भाषाओं के शब्द ग्रहण करने में संकोच नहीं करते। अनुभूति को अभिव्यक्त करने के लिए उन्हें जो शब्द उपयुक्त लगता है, चुन लेते हैं। उनके लिए तत्सम और तद्भव शब्द संपदा सारस्वत निधि है। हिंदी के प्राध्यापक होते हुए भी वे 'भाषिक शुद्धता' के संकीर्ण आग्रह से मुक्त हैं। इसलिए अर्जुन जी की ग़ज़लें आम आदमी की भाषा में आम आदमी से संवाद कर पाती हैं। 

            कम से कम शब्दों में अधिक से अधिक कहने की सामर्थ्य अर्जुन जी के शायर में है। ''ऐसे ही नहीं, अच्छे लोगों की भीड़ चाहिए;  बेरुके खिलाफ खड़े होने को रीढ़ चाहिए'' कहकर वे निष्क्रिय बातूनी आदर्शवादियों को आईना दिखाते हैं। समाज में महापुरुषों का गुणगान करने या उन्हें प्रणाम करने की प्रथा है किंतु उनका अनुकरण करने की प्रवृत्ति बहुत कम है। महान क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी बिरसा मुंडा को समर्पित रचना में अर्जुन जी लिखते हैं- ''वंदन स्मरण नहीं,अनुगमन भी हो 'अर्जुन जी' समाज और देश सेवा की जान बिरसा मुंडा।'' न्याय व्यवस्था की विसंगतियों पर प्रहार करने में अर्जुन जी तनिक भी संकोच नहीं करते- 

भेड़ियों और बकरियों का खेल है; 
टॉस में मगर दोनों ओर टेल है।। 
लोमड़ी की अदालत भेड़िया बरी 
      मेमनों को फांसी, ताउम्र जेल है।।    

            सामाजिक विसंगतियों को इंगित करते हुए अर्जुन जी हँस पर कौए को वरीयता देने की प्रवृत्ति को संकेतित कर प्रश्न करते हैं कि पितृ पक्ष में दशमी के दिन हँस पर कौए को वरीयता क्यों दी जाति है? सवाल है कि अगर कौए को वरीयता देने का कोई कारण है तो उसे हर दिन वरीयता दें, सिर्फ एक दिन क्यों? - 

पिंड छूने के वक्त, दसवें के दिन  में उनको 
हंस से बढ़कर अहम वो काग ही क्यों लगे? 

            समाज में तन को सँवारने और मन की अनदेखी करने की कुप्रवृत्ति पर शब्दाघात करते हुए अर्जुन जी व्यंग्य करते हैं- 

लोग अक्सर तन का करवा लेते हैं 
भूल जाते हैं मन के भी मसाज हैं  

            भारतीय संस्कृति अपने मानवतावादी मूल्यों 'वसुधैव कुटुंबकम्' और 'विश्वैक नीड़म्' के लिए सनातन काल से जानी जाती है। शायर अर्जुन नफरत को बेमानी बताते हुए मानवता की कजबूती की कामना करते हैं- 

दोस्ती के पुल मजबतू सारे चाहिए
दुश्मनी की ध्वस्त सब दीवारें चाहिए

क्या रखा है नफ़रत की ज़िंदगानी में
मानवता की मजबूती के नारे चाहिए 

            समाज में बढ़ती जा रही मानसिक बीमारियों का कारण तनाव को बताते हुए मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि  अपने मन में बच्चे को जिंदा  रखा जाए। अर्जुन जी समस्या और समाधान दोनों को यूं बयान करते हैं- 

जिंदगी में जिंदा अपने अंदर का बच्चा रख  
सब पकाना न समझदारी, कुछ कच्चा रख 
औरों पे उंगली उठाने से कोई सुधरेगा नहीं 
अपने मन का मिजाज  सदा से सच्चा रख 

            लोकतंत्र में हर नागरिक को पहरुआ बनकर गुहार लगाना चाहिए 'जागते रहो', तबही शासन-प्रशासन और न्याय व्यवस्था जागेगी अन्यथा लोकतंत्र का दामन दागदार हो जाएगा। 
 
दान करने, बेच देने का सवाल नहीं 
मताधिकार को गर सयाना वोटर है! 

            अर्जुन जी ज़िंदगी के हर पहलू को जाँचते-परखते हैं और तब विसंगतियों को सुसंगतियों में बदलने के लिए गजल लिखते हैं। गत ७ दशक के हिंदी साहित्य में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा ने समाज में नफरत, अविश्वास, द्वेष, टकराव, बिखराव का अतिरेकी शब्दांकन कर मनुष्य, परिवार, देश और समाज को हानि पहुँचाई है। यही कारण है कि समाज आज भी साहित्य के नाम पर संदेशवाही सकारात्मक रचनाओं को पढ़ता है। सं सामयिक साहित्य के पाठक नगण्य हैं। उपन्यास, कहानी, व्यंग्य लेख, नवगीत, लघुकथा आदि विधाओं में यथार्थवाद के नाम पर विद्रूपताओं को स्थान दिया जा रहा है। अर्जुन जी उद्देश्यपूर्ण, संदेशवाही सकारात्मक साहित्य का सृजनकर कबीर की तरह आईना दिखने के साथ-साथ राह भी दिखा रहे हैं। उनकी लिखी गज़लें इसकी साक्षी हैं। 

  छोड़ देती है आत्मा हमेशा साथ तब 
जिंदगी में जब कभी तनादेश होता है!
० 
किसी से माफी माँग, किसी को माफ़ कर; 
खुशनुमा जिंदगी की कुंजी रखें ढाँक कर! 
घर-आँगन रोज-ब-रोज करते रहते हो 
कभी मन का आँगन भी सारा साफ़ कर!
०  
है ढील या पाबंदी का नतीजा,पर सच है 
बच्चा जहाँ नहीं जाना, वहीं पर जाता है!
० 
साजिश क्यों, कोशिश चाहिए अर्जुन जी 
कामयाबी से वो,जो बेशक मिलाती है!
० 
किसी वृद्धाश्रम की जरूरत नहीं होगी, 
यदि अपने माँ-बाप खुशहाल भाई-भैन चाहते हैं!
० 
सितारा होटल के खाने से बढ़िया 
ठेलेवाले के छोले-भटूरे होते हैं! 
० 
फिर भी नदियाँ साथ में रहती ही हैं 
भले सारे के सारे जो खारे सागर हैं!
० 
दिल में जीत की जबरदस्त चाह चाहिए; 
जद्दोजहद में भी जीने की राह चाहिए!
एक सच याद रखना, सूरज हो या चाँद 
जिस दिन चढ़ता, उसी दिन ढलता है! 
० 
उंगली पकड़ के रखने से काम नहीं होगा 
बच्चे को खुद-ब-खुद चलने दिया जाए!
० 
आप ताउम्र घूमते रहते हैं दुनिया भर में 
नौकर को तनिक तो टहलने दिया जाए!
० 
सिर्फ राजधानी या ख़ास राजमहल की नहीं 
गुलशन की हर डाली फलनी-फूलनी चाहिए!
० 
बड़ों की दुनिया  कुछ और है 'अर्जुन जी' मगर
कौन है,जो फिदा न बच्चों की किलकारी पर!

            'आप सब दोस्तों से एक रिक्वेस्ट है' हिंदी गजल संग्रह की हर गजल गजलकार की ईमानदार सोच, बेलाग साफ़गोई, सबकी भलाई की चाह और निडर अभिव्यक्ति की राह पर कलम को हल की तरह इस्तेमाल कर 'सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय' के सद्भावपरक विचारों और आचारों की फसल उगाने की मनोकामना का प्रमाण है। अपने बात वहीं खत्म करूँ जहाँ से शुरू की थी-

सामयिक वैचारिकी का फेस्ट है
'आप सब दोस्तों से एक रिक्वेस्ट है'
.
 दोस्तों की दोस्ती ही बेस्ट है
डिश अनोखी है अनोखा टेस्ट है
.
फ्लैट-बंगलों की इसे जरुरत नहीं
रहे दिल में हार्ट इसका नेस्ट है
.
एनिमी से लड़े अर्जुन की तरह
वज्र सा स्ट्रांग सचमुच चेस्ट है
.
टूट मन पाए नहीं संकट में भी
दोस्ती दिल जोड़ने का पेस्ट है
.
प्रोग्रेस इन्वेंशन हिलमिल करे
दोस्ती ही टैक्निक लेटेस्ट है
.
जिंदगी की बंदगी है दोस्ती
गॉड गिफ्टेड 'सलिल' यह ही फेस्ट है
.
जीव को 'संजीव' करती दोस्ती
कोशिशों का, परिश्रम का क्रेस्ट है
००० 
संपर्क- विश्ववाणी हिंदी संस्थान अभियान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, चलभाष- ९४२५१८३२४४

शुक्रवार, 24 मई 2024

हिंदी छंद मंजूषा, आचार्य अनमोल, पुरोवाक्

पुरोवाक्
उज्ज्वल पिंगल प्रत्यूषा : हिंदी छंद मंजूषा
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*

            छंद सृष्टि का मूल है। आध्यात्म के अनुसार सृष्टि का मूल अनाहद नाद (ॐ) है। विज्ञान का महाविस्फोट सिद्धांत (बिग बैंग थ्योरी) इसकी पुष्टि करता है। तदनुसार ध्वनि तरंगों के लगातार खरबों वर्ष टकराने से भारहीन कण, भारयुक्त कण तथा कण में चेतना संचार से जीवों का जन्म हुआ। आचार्य जगदीश चंद्र बोस ने यह सिद्ध किया कि वनस्पति तथा शिला, मृदा आदि भी चेतना और अनुभूति शून्य नहीं हैं। 'छंद वह जो सर्वत्र छा जाए' का आशय भी यही है कि छंद रहित कोई स्थान नहीं है। 'छंद' को 'वेदों का चरण कहा गया है। चरण के बिना किसी लक्ष्य तक पहुँचा नहीं जा सकता अर्थात छंद के बिना वेदों को जाना नहीं जा सकता। किसी को प्रसन्न करना हो तो चरण स्पर्श कर आशीष लिया जाता है आशय यह कि वेद और विधाता को प्रसन्न करना हो अथवा सृष्टि का मूल जानना हो तो वेद (ईश-वाणी) के चरण अर्थात छंद को पाना, ह्रदय में बसाना होगा। कात्यायन के अनुसार छंद के बिना मंत्रों का अध्ययन-अध्यापन और देवताओं को प्रसन्न करना असंभव है। छंद को अक्षर का परिमाण (नियामक) कहा गया है। मेदिनी कोश में छंद का अर्थ पद्य (काव्य) है।  आचार्य भरत (ई.पू. चौथी सदी) अपने कालजयी ग्रंथ नाट्यशास्त्र के १८ वें अध्याय में छंद के दो प्रकार नियताक्षर बंध तथा अनियताक्षर बंध बताते हैं। अक्षर वह जो अविनाशी है, ध्वनि या नाद ही अविनाशी है। 

            हिंदी ने अपभ्रंश और संस्कृत से छंद की विरासत ग्रहण की है। सनातन काल से अनमोल रहा छंद-ज्ञान आजकल अंतर्जाल पर बिना मोल लुटाया और लूटा जा रहा है किंतु अधिकांश पटल और समूह अधकचरा छंद ज्ञान परोस कर नवोदितों को भ्रमित कर रहे हैं। गुरुओं और शिष्यों दोनों का ध्यान लघु पथ (शॉर्ट कट) से छंद रचना करने तक सीमित है। इस कारण काव्य रचनाओं में आनुभूतिक सघनता और हृदस्पर्शी मारकता का अभाव उन्हें प्रभावहीन बना देता है। आचार्य अनमोल कृत 'हिंदी छंद मंजूषा' इस संक्रांति काल में बालारुण की तरह अज्ञान तिमिर का अंत कर उज्जवल पिंगल प्रत्यूषा बिखर कर नए कवियों के पथ प्रदर्शन हेतु रची गई है। इस कृति का वैशिष्ट्य गूढ़तम ज्ञान सरल-सहज बनाकर इस तरह उपलब्ध कराना है कि हर जिज्ञासु मन छंद को जान-पढ़-समझ कर रच सके। छंद-महत्व, काव्य-दोष, शब्द-शक्ति, भाव, अंग, प्रकार आदि की आधारभूत प्रामाणिक जानकारी के साथ वर्ण वृत्त, अर्धसम वर्ण वृत्त, कवित्त, मुक्तक छंद, मुक्त छंद, नवगीत तथा कतिपय नव छंदों के रचना विधान और उदाहरणों से सुसज्जित यह कृति हर छंदविद् और छंद विद्यार्थी के लिए उपयोगी है।  

            आचार्य अनमोल जी ने अपनी विद्वता की कुनैन सरलता की चाशनी में लपेटकर छंद को कठिन मानकर उससे दूर भागनेवालों के लिए शुगर कोटेड गोली की तरह उपलब्ध कराकर सर्व हितकारी कार्य किया है। पारंपरिक छंदों के साथ जापानी हाइकु छंद, पंजाबी माहिया छंद, वर्ण पिरामिड आदि ने कृति की उपादेयता में वृद्धि की है। कृति का वैशिष्ट्य काव्य दोषों (सपाट बयानी, अतिशयोक्ति, अधिकथन, अवकथन, असंगत सर्वनाम दोष, अपशब्द दोष, असंगत उपमा दोष, शब्द-विसंगति दोष, पुनरावृत्ति दोष, निरर्थक शब्द प्रयोग दोष, शब्द-विरोधाभास दोष आदि) की सोदाहरण प्रस्तुति है। अन्य ग्रंथों में काव्य दोष लगभग अंत में दिए जाते हैं ताकि छंद ज्ञान पाने के बाद दोष देखे सुधारे जा सकें। संभवत:, अनमोल जी का ध्येय कृति के आरंभ में ही छंद दोष देकर जिज्ञासुओं को सजग करना है कि वे छंदाध्ययन करते समय ही दोषों को देखकर लिखते समय उनसे बच सकें। यह उचित भी है, बाद में दोष दूर करने की अपेक्षा आरंभ से ही दोषों का परिमार्जन करने क अभ्यास होना बेहतर है। 

            पिंगल ग्रंथों में कुछ वर्णों को दग्धाक्षर कहा गया है। कवयादी इनका प्रयोग सामान्यत: वर्जित है किंतु शुभ प्रसंगों में अनुमेय है। इस मान्यता का वैज्ञानिक या तार्किक आधार स्पष्ट नहीं है। बहुधा जो एक के लिए शुभ होता है वह विरोधी के लिए अशुभ होता है। ऐसी मान्यताओं की जानकारी होना चाहिए किंतु इन्हें बंधक न मन जाए। 

            भाषा की तीनों शब्द शक्तियों अमिधा, व्यंजना तथा लक्षणा का सम्यक-संक्षिप्त विश्लेषण अनमोल जी ने किया है। छंद के षडांगों (चरण, वर्ण, मात्रा, गण,  गति, यति तथा तुक), स्वर भेद, मात्रा-गणना नियम, छंद-भेद आदि सभी के लिए उपयोगी हो इस तरह सरल कर प्रस्तुत किया गया है। पिंगल में 'पद' शब्द का बहुअर्थी प्रयोग नवोदितों को भ्रमित करता है। शब्दकोश में चरण, पद, पाद समानार्थी हैं किंतु छंद शास्त्र में 'दोहा को दोपदी' भी कहा जाता है' किंतु 'सूरदास के कृष्ण भक्ति पद अप्रतिम हैं', 'चौपाई के चारों चरण सोलह मात्रिक होते हैं' में 'पद' का अर्थ क्रमश: पंक्ति, संपूर्ण काव्य रचना तथा पंक्ति का एक भाग है। यहाँ यह समझना होगा की साहित्य में विज्ञान की तरह शब्द का अर्थ 'रूढ़' नहीं 'लचीला' होता है। साहित्य में 'ह्रदय' प्रेम का धाम है जबकि विज्ञान में शरीर को रक्त देने वाला पंप मात्र। साहित्य में शब्द का अर्थ प्रसंगानुसार लिया जाता है। अनमोल जी ने नाव अध्येताओं के लिए ऐसे प्रसंगों को पर्याप्त स्पष्ट किया है। 

            छंद शास्त्र के अधिकांश लक्षण ग्रंथ अत्यधिक विस्तार या अतिरेकी संकुचन से ग्रस्त हैं जबकि अनमोल जी ने यथावश्यक जानकारी देते हुए भी अनावश्यक विस्तार से दूरी बनाए रखी है। वे छंद के शिल्प (छंद प्रकार, पद-चरण, तुक नियम, गति-यति, अन्य विधान आदि) की जानकारी के साथ स्वरचित उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। छंद और रस का अंतरसंबंध तथा छंद में अलंकार का महत्व इन दो महत्वपूर्ण पक्षों का किंचित समावेश हो सकता तो ग्रंथ का कुछ विस्तार होने के साथ उपादेयता में वृद्धि होगी। उदाहरणों की सटीकता के प्रति अनमोल जी की सजगता सराहनीय है। 

            समकालिक लोकप्रिय ग्रंथों छंद प्रभाकर - जगन्नाथ प्रसाद 'भानु',  छंद विधान- छंदोदय - बाबा दौलत राम, हिंदी छंदोलक्षण - नारायण दास, रस-छंद-अलंकार और काव्य विधाएँ- राजेंद्र वर्मा रामदेव लाल 'विभोर' आदि का अनुसरण न कर स्वतंत्रचेता अनमोल जी ने अपनी राह आप बनाकर हिंदी छंद मंजूषा का सृजन नवोदितों में छन्दानुराग उत्पन्न करने की दृष्टि से किया है. यह सनातन सत्य है कि कठिन होना बहुत सरल तथा सरल होना बहुत कठिन होता है। अनमोल जी ने कथन कार्य को सरलतापूर्वक संपादित करते हुए छंदाध्ययन को सहज बनकर महत कार्य किया है। मुझे विश्वास है कि यह कृति न केवल नवोदितों में अपितु सामान्य पाठकों और विद्वज्जनों में भी समादृत होगी। 
***
संपर्क : विश्ववाणी हिंदी संस्थान अभियान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१ 
चलभाष ९४२५१८३२४४, salil.sanjiv@gmail.com 








गुरुवार, 15 फ़रवरी 2024

पुरोवाक्, चुनाव चकल्लस, गुरु सक्सेना, हास्य, पिंगल, छंद, घनाक्षरी, सवैया

पुरोवाक्:
'चुनाव चकल्लस' : हास्य रस से लबालब छंद कलश 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
                    'सर्वोत्तम जिंदा रहे' ('सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट') ही सृष्टि में जीवन का मूल सूत्र है। मानवेतर प्राणियों में सर्वोत्तम की पहचान दैहिक बल से होती है। मानव में बुद्धितत्व की प्रधानता तथा भाषा का विकास होने के कारण जीवन का निर्धारण तन, मन तथा मति तीन  आधार पर भी होता है। बुद्धि की प्रधानता विकल्पों को पहचानकर सर्वोत्तम के चयन की कसौटी की दो विधियों संघर्ष और चयन में से दूसरे को प्राथमिकता देती है। इसका कारण संघर्ष से जन-धन की हानि तथा चयन से शांति व विकास होना है। 

                    जीव और जीवन में सामंजस्य, अनुशासन, सुव्यवस्था, विकास तथा शांति के लिए शासक और शासित का होना अपरिहार्य है। मानवेतर जीवों में शासक का चयन संघर्ष से हत्या है जिसमें पर्याय: पराजित के समक्ष प्राणहनी या पलायन के अलावा अन्य विकल्प नहीं होता किंतु बुद्धिजीवी मनुष्य शासक का चयन शांतिपूर्ण तरीके से करने को प्रमुखता दे रहा है। राजनीति शास्त्र में वर्णित विविध शासन पद्धतियों में से लोकतंत्र, प्रजातन्त्र या गणतंत्र (डेमोक्रेसी) शांतिमे शासन व्यवस्था परिवर्तन की श्रेष्ठ और लोकप्रिय पद्धति है। भारत में यह पद्धति वैदिक काल से यत्र-तत्र प्रचलित रही है। वर्तमान में भारत विश्व का सबसे अधिक बड़ा और सबसे अधिक सफल लोकतन्त्र है जिसमें प्रति पाँच वर्ष बाद अगले पाँच वर्षों के लिए चयनित जनप्रतिनिधियों से सबड़े अधिक बड़े समूह द्वारा बहुमत से अगले शासक का चुनाव किया जाता है। अनेकता में एकता भारत की विशेषता है। इस विशेषता, वृहद आकार तथा विशाल जनसंख्या के कारण चुनाव का अनुष्ठान विविध रोचक दृश्य उपस्थित करता है।

                   मानव भाव्यभिव्यक्ति के लिए गद्य तथा पद्य दो माध्यमों का उपयोग करता है। पद्य की सरसता, सहजता, सरलता, संक्षिप्तता तथा लोकप्रियता रोचक प्रसंगों की अभिव्यक्ति हेतु अधिक उपयुक्त है। हिंदी भाषी काव्य के ९ रसों ( श्रृंगार, हास्य, वीर, भयानक, बीभत्स, रौद्र, अद्भुत, शांत और करुण) में से सर्वाधिक लोकप्रिय हास्य रस है। किसी पदार्थ या व्यक्ति की असाधारण आकृति, वेशभूषा, चेष्टा आदि को देखकर अथवा किसी काव्य को सुनकर हृदय में जो विनोद का भाव जाग्रत होता है, उसे हास्य कहा जाता है। हास्यजनित आनंद या भाव की  अनुभूति ही हास्य रस है। किसी विचार, व्यक्ति, वस्तु व घटना का स्वरूप वैचित्र्य ही हास्य का जनक है। यह वैचित्र्य विस्मय या आश्चर्य उत्पन्न कार लक्षित व्यक्ति को गुदगुदा जाता है। भरतमुनि के अनुसार 'दूसरों की चेष्टा से अनुकरण से' ‘हास’ की उत्पत्ति तथा स्मित, हास एवं अतिहसित द्वारा अभिव्यक्ति होती है।' पण्डितराज 'वाणी एवं अंगों के विकारों को देखने आदि से हास ही उत्पत्ति मानते हैं।' डॉ. गणेश दत्त सारस्वत के मत में'हास्य जीवन की वह शैली है, जिससे मनुष्य के मन के भावों की सुंदरता झलक उठती है।' हास्य वास्तव में निच्छल मन से निकला, मानव मन का वह कवच है जो उद्दात्त भावों को नियंत्रण कर हमें पृथ्वी पर रहने योग्य बनाता है। विश्वप्रसिद्ध लेखक "वाल्तेयर" ने कहा था' जो हँसता नहीं वो लेखक नहीं हो सकता।' मार्क ट्वेन के अनुसार समाज की सही तस्वीर उतारने की सबसे ज्यादा जिम्मेदारी व्यंगकार पर ही है।


                   हास्य रस के दो प्रकार आत्मस्थ हास्य रस (किसी व्यक्ति या विषय की विचित्र वेशभूषा, वाणी, आकृति तथा चेष्टा आदि को देखने  से उत्पन्न) तथा परस्थ हास्य रस (हँसते हुए व्यक्ति को देखकर जो उत्पन्न हास्य) हैं। आचार्य केशवदास ने हास के ४ प्रकार मन्दहास, कलहास, अतिहास एवं परिहास माने हैं। आधुनिक काव्यशास्त्र ने हास्य के छ: प्रकार स्मित, हसित, विहसित, उपहसित, अपहसित तथा अतिहसित बताए हैं। हास्य रस का  स्थाई भाव- हास (हास्य), आलंबन विभाव-  विकृत वेशभूषा, आकार, क्रियाएँ, चेष्टाएँ आदि,  उद्दीपन विभाव- अनोखा पहनावा और आकार, बातचीत और क्रिया-कलाप, अनुभाव- आश्रय की मुस्कान, आँखों का मिचमिचाना, ठहाका, अट्ठहास आदि  तथा संचारी भाव हँसी, उत्सुकता, चपलता, कंपन, आलस्य आदि हैं। अमिधा-लक्षणा से हास्य तथा लक्षण-व्यंजना से व्यंग्य का सृजन होता है। 

                   भारतीय लोक साहित्य तथा हिंदी साहित्य में पुरातन काल हास्य की समृद्ध परंपरा है। नौटंकी, लोकनृत्य, लोकगीत, लोककथा,  आख्यायिका, नाटक, गीत, महाकाव्य, पंचतंत्र, जातक कथाएँ, अभिज्ञान शाकुन्तलम् आदि में हास्य चिर काल से है। उपनिषदों, पंचतंत्र, जातक कथाओं, पर्व कथाओं, बोध कथाओं, सूर रचित कृष्ण लीला के पदों, पृथ्वीराज रासो में चंदरबरदाई और जयचंद की वार्ता, भारतेंदु हरिश्चंद (अंधेर नगरी, ताजीराते शौहर), गोपालराम 'गहमरी', प्रताप नारायण मिश्र, बालमुकुंद गुप्त, बालकृष्ण भट्ट, शिवपूजनसहाय, विश्वभरनाथ शर्मा 'कौशिक', बाबू गुलाबराय, रामानुजलाल श्रीवास्तव 'ऊँट बिलहरीवी',  मुंशी प्रेमचन्द, काका हाथरसी, निर्भय हाथरसी, झलकन लाल वर्मा छैल, हरिशंकर परसाई, शरद जोशी, रवीन्द्र नाथ त्यागी, पद्मश्री के.पी. सक्सेना, गुरु सक्सेना (साँड़ नरसिंहपुरी), सुरेश उपाध्याय, सुरेन्द्र शर्मा, हुल्लड़ मुरादाबादी, अशोक चक्रधर, अनूप श्रीवास्तव, संजीव वर्मा 'सलिल', राजेंद्र वर्मा, अरुण अर्णव खरे, इन्द्रबहादुर श्रीवास्तव आदि अगिन साहित्यकारों ने हास्य-व्यंग्य की श्रेष्ठ गाड़ी-पद्य रचनाओं के द्वारा हिंदी साहित्य को और समृद्ध किया। 

                   हास्य-व्यंगकार हँसते-हँसते सब कुछ कह जाता है और सुनने वाले भी बिना बुरा माने हँसते- हँसते सुनते हैं और फिर सोचने के लिए बाध्य भी होते हैं कि हम खुद की कारस्तानियों , खुद के द्वारा उत्पन्न की हुई परिस्थिति पर स्वयं ही हँस रहे हैं। वास्तव में जो बात क्रोध से, शांति से कहने में समझ नहीं आती वो इंसान हँसी -हँसी में समझ लेता है चूँकि उसका अहम् आहत नहीं होता। इसलिए हास्य-व्यंग्य प्रधान साहित्य से समाज को स्वास्थ्य दिशा दिखाकर सामाजिक परिवर्तन करना संभव हो पाता है।

                   इस पृष्ठ भूमि में सनातन सलिला नर्मदा के तट पर भारत के हृद प्रदेश के निवासी गुरु सक्सेना जी की नवीनतम कृति 'चुनाव चकल्लस' भारतीय राजनीति, लोकतंत्र तथा जन सामान्य के लिए पथ प्रदर्शक कृति है। गुरु सक्सेना ग्रामीण और नगरीय जीवनशैली, कृषक और शिक्षक वृत्ति, चिंतक और व्यंगकार मनोवृत्ति के कॉकटेल हैं। मसिजीवी कायस्थ कुल (मैं कायस्थ कुलोद्भव मेरे पुरखों ने इतना ढाला, मेरे लोहू में मिश्रित है पचहत्तर प्रतिशत हाला) उत्पन्न गुरु जी शुद्ध शाकाहार और सात्विक आचार-आहार के पक्षधर हैं। गुरु जी के व्यक्तित्व-कृतित्व को 'विचित्र किंतु सत्य' ही कहा जा सकता है।

                   १६ प्रकार के घनाक्षरी छंद (मनहरण, जनहरण, जलहरण, कलाधर, रूप, डमरू, कृपाण, विजया, देव, महीधर, सूर, नीलचक्र अशोक पुष्प मंजरी, सुधा निधि, अनंगशेखर व मत्त मातंग लीलाधर), १० प्रकार के सवैए (सुमुखी, वाम, मुक्तहरा, लवंगलता, मत्तगयंद, मदिरा, मंदारमाला, चकोर अरसात व किरीट)  तथा २१ अन्य छंद रत्नों (सरसी, कनकमंजरी, राधा, विजात, गीतिका, अहीर, दीनबंधु, चंद्र, दिग्पाल, मानव, हाकलि, प्रदीप, लावणी, ताटंक, शिव, भानु, राधिका, सुमेरु, तोटक, द्वि मनोरमा) के छंद विधान एवं उदाहरणों से समृद्ध 'चुनाव चकल्लस' 'एक के साथ एक फ्री' के समय में मनोरंजन के साथ-साथ छंद शास्त्र की पर्याप्त जानकारी भी देती है।   

                   'चुनाव चकल्लस' का रचनाकार कुशल छंदज्ञ, गंभीर विचारक, ओजस्वी मंचीय कवि तथा सहज-सरल व्यक्तित्व का धनी है। अपने आप पर हँसने का माद्दा कम ही लोगों में होता है। गुरु उन्हीं कम लोगों में से एक हैं। वे खुद अपना ही परिचय इस तरह देते हैं- 

करने को कोई काम नहीं
अण्टी में बिलकुल दाम नहीं
भारत माता के नूर हैं हम
हर हालत में मजबूर हैं हम

                   यह 'भारत माता का नूर' देश के राजनैतिक आकाओं को उनकी औकात निम्न पंक्तियों के आईने में दिखाता है-

नदियों से रेत साफ,जंगलों से पेड़ साफ, लड़कियों के भ्रूण साफ, भारत महान है ।
कविता से छंद साफ, नेह के संबंध साफ, सफाई का साफ साफ, हो रहा ऐलान है।
शांति के लगाव साफ, सारे सद्भाव साफ, धरने को देख संविधान परेशान है।
लगता है पूरा देश साफ करके रहेंगे, सड़क सड़क सफाई का अभियान है।

                   कवि गुरु सक्सेना की कलम सच कहने से न तो डरती है, न हिचकती है। सिर पर कफन बाँधकर, शासन-प्रशासन की बखिया उधेड़ने की कला का साहस और परिस्थितियों की विद्रूपता पर करारी चोट करने का कौशल गुरु को 'गुरु' बनाता है। शासन-प्रशासन द्वारा विधि के शासन की परवाह न कर बुलडोजर संस्कृति अपनाने के दौर में सत्य कहने का दुस्साहस करनेवाले अंगुलियों पर गिने जा सकते हैं। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाने वाला पत्रकार जगत सत्ता-स्तुति को ही लक्ष्य बना चुका है किंतु गुरु का गुरुत्व सत्ता को आईना दिखने से नहीं चूकता - 

यह चुनाव का पर्व मिला है पाँच साल के बाद। 
हे चुनाव का क्षेत्र बना है कुंभ इलाहाबाद।। 
जो भी घाट सामने आया गहरी डुबकी मार। 
पूजा नगद नरायण की कर हो जा सागर पार।। 
रंग रूप दल से क्या मतलब, किसमें क्या है खोट?
कुछ मत देख देखना है तो देख नोट ही नोट।। 
सारे ऐब सहज ढँक जाते जहाँ नोट की छाँव।
नोट बिछाकर सब निकले हैं पड़ने कुर्सी-पाँव।।
                   
                   वर्तमान बाजार संस्कृति 'एक के साथ एक फ्री' के पाखंड रचकर आमजन की जेब खाली कराने को ठगी नहीं, प्रबंध कौशल की संज्ञा देकार जेब खाली करा लेती है। गुरु की छांदस रचनाएँ 'एक (मनोरंजन) के साथ तीन (पिंगल-ज्ञान, कर्तव्य बोध तथा स्वस्थ्य चिंतन) फ्री देकर लोकतंत्र की नींव दृढ़ करने के लिए सजग जनमत बनाने का काम करती हैं। मतदान करने की प्रेरणा देने के साथ-साथ नवोढ़ा कुलवधुओं को कर्तव्य की सीख देती निम्न घनाक्षरी कवि गुरु जी के सामर्थ्य के परिचायक है-   

रखा रख फट नहीं जाए इस कारण से समय से दूध को उबालना जरूरी है। 
बहू बन घर में आ जाना बड़ी  बात नहीं, तरीके से घर को सम्हालना जरूरी है।।
बच्चे पैदा कर देना कोई बड़ी बात नहीं, फिकर के साथ उन्हें पालना जरूरी है। 
लोकतंत्र मजबूत रहे देश ठीक चले, हर आदमी को वोट डालना जरूरी है।।   

                वर्ण और मात्रा को लक्ष्मण रेखा मानकर किताबी यांत्रिक विधि से नीरस छंद रचे जाने के वर्तमान कल में गुरु जमीन से जुड़कर, छंद सृजन की वाचिक परंपरा के अग्रदूत की तरह सरस छंद रच रहे हैं। भाषा की तथाकथित शुद्धता के पत्थर उछालने-मारनेवाले नासामझों को तर्क नहीं सृजन से उत्तर देते हैं। गुरु के छंदों की भाषा देशज-तद्भव शब्दावली संपन्न है। कथ्य की पतली रस्सी पर गति-यति का बाँस थामे गुरु नट की तरह संतुलन कौशल साधकर श्रोता-पाठक को करतल ध्वनि और वाह वाह करने के लिए विवश कर देते हैं। मुझे भरोसा है कि कॉनवेंटी नई पीढ़ी, नगरीय अपसंस्कृति को जी रहे बाबू साहबों- नव धनाढ्य सेठों तथा ग्राम्य और वन्य क्षेत्रों में रह रहे कुशकों-श्रमिकों  को गुरु जी के इन छंदों से दायित्व बोध होगा तथा वे नकली दूरदर्शनी और मोबाइली दुनिया से निकलकार अपनी माटी से जुड़ने की दिशा ग्रहण कर सकेंगे। इस लोकोपयोगी कृति से विश्ववाणी हिंदी के सारस्वत कोश को समृद्ध करने के लिए गुरु सक्सेना साधुवाद के पात्र हैं। 
***
संपर्क- विश्ववाणी हिंदी संस्थान अभियान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१ 
चलभाष ९४२५१८३२४४, ईमेल- salil.sanjiv@gmail.com 

बुधवार, 7 फ़रवरी 2024

घनाक्षरी, गुरु सक्सेना, पुरोवाक्

पुरोवाक्
छंदों की किताब - घनाक्षरी लाजवाब
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
                    महा विस्फोट सिद्धांत (बिग बैंग थ्योरी) के अनुसार लगभग १५ अरब वर्ष पूर्व ब्रह्मांड का निर्माण आरंभ हुआ। विस्फोट जनित नाद-निनाद ही सृष्टि उत्पत्ति का कारण है। भारतीय मनीषा नाद ब्रह्म की उपासना 'ॐ' ध्वनि से करती है जो सूर्य के प्रभा मण्डल से भी निसृत होता है। यह विज्ञान ने भी प्रमाणित किया है। ज्ञान-विज्ञान-कला की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती की वीणा से सप्त स्वर निनादित होते हैं। नाद तरंगों के सतत प्रवहण, टकराव, मिलन, बिखराव आदि के फल स्वरूप भारहीन कण तथा कालांतर में भारयुक्त कण का जन्म हुआ। यह निराकारी परब्रह्म का साकारी ब्रह्म में रूपांतरण होना है। चित्रगुप्त के गुप्त चित्र का प्रगटीकरण यही है। नाद-निनाद जो सकल सृष्टि पर छाया और निराकार के साकार होने में सहायक हुआ, यही छंद है। इस नाद की ध्वनि तरंगों की आवृत्ति सुनियोजित तथा लयबद्ध थी इसीलिए छंद में 'लय' का महत्व सर्वाधिक है। नाद-निनाद में लय तथा आवृत्ति की भिन्नता से सृष्टि के विविध तत्वों का निर्माण हुआ।

                    भौतिक विज्ञान के अनुसार लगभग १३.७ अरब वर्ष पूर्व एक बहुत छोटे से बिंदु से फैलते हुए ब्रह्माण्ड का निर्माण व क्रमश: विस्तार हुआ। चारों वेदों और स्कंद पुराण 'रेवा खंड' में वर्णित सनातन सलिला मेकलसुता शिवात्मजा-शिवप्रिया नर्मदा की लम्हेटा घाट संरचना लगभग ६.५ करोड़ वर्ष प्राचीन है। लगभग ५ करोड़ वर्ष पूर्व दक्षिणी गोंडवाना लैण्ड्स और उत्तरी अंगारा लैण्ड्स से प्रवहित नदियों द्वारा लाखों वर्षों तक टेथिस महासागर (वर्तमान हिमालय, कश्मीर, पंजाब, राजस्थान उत्तर प्रदेश, बिहार झारखंड, छतीसगढ़, मध्य प्रदेश, गुजरात आदि) में बहाई गई मिट्टी ने महासागर को पूर दिया। लगभग ३ करोड़ वर्ष पूर्व हिमालय तथा २ करोड़ वर्ष पूर्व गंगा नदी का उद्भव काल है। नर्मदा घाटी में विचरनेवाले भीमाकारी डायनासौर राजासौरस नर्मडेन्सिस का काल लगभग २० लाख वर्ष पूर्व का है। नर्मदा घाटी में आदि मानव द्वारा बनाए गए शैल चित्र लगभग २५ हजार से ३५ हजार वर्ष पूर्व के हैं। यह संकेत करने का उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि 'छंदों की किताब' का रचयिता उस कलकल निनादिनी नर्मदा का सुत है जिसके दक्षिण में 'असुर' तथा उत्तर में 'सुर' सभ्यताओं का जन्म, विकास और टकराव हुआ तथा इस घटनाक्रम में नर्मदा घाटी की नाग सभ्यता 'दो पाटन के बीच में साबित बचा न कोय' की गति को प्राप्त हुई। वेदकालीन सूर्य ऋषि की तनया नंदिनी तथा नागकुल राजकन्या इरावती से विवाहित दोनों कुलों के पूज्य कर्मेश्वर धर्मेश्वर लिपि-लेखनी-अक्षर दाता श्री चित्रगुप्त के महावंश में जन्म लेने का सौभाग्य इस कृति के कृतिकार को और मुझे भी मिला है। स्वाभाविक है कि वृत्ति से शिक्षक और अभिरुचि से कवि (मानव होना भाग्य है, कवि होना सौभाग्य - नीरज) शब्द ब्रह्म की सतत आराधना करते-करते छंद से साक्षात करे और कराए।

                    नर्मदा तट साधना से सिद्धि और गंगा तट सिद्धि से प्रसिद्धि के लिए चिरकाल से ख्यात है। 'नर्मम् ददाति इति नर्मदा' अर्थात जो आनंददेनेवाली है वह नर्मदा है। संस्कृत की 'चिद' धातु से बने 'छंद' का अर्थ आह्लादित करना है। नर्मदा-दर्शन से आनंद और छंद-सृजन से आह्लाद प्राप्ति का दुर्लभ सुख मुझ मूढ़मति को मिल रहा है तो मुझसे ज्येष्ठ गुरु जी की सुपात्रता असंदिग्ध है ही।

                    भगवान ब्रह्मा को कलुषित मति हेतु मिले श्राप से मुक्त कराने वाले ब्रह्मांड घाट (बरमान) में नर्मदा के सलिल-प्रवाह में अवगाहन का सौभाग्य कृतिकार को मिला है। बरमान घाट में  परमब्रह्म चित्रगुप्त भगवान के मंदिर निर्माण और विग्रह स्थापन का माध्यम बनने का सौभाग्य इन पंक्तियों के लेखक को मिला है। कृतिकार के पूर्व जन्म के संस्कार उसे कवि-मञ्च के प्रपंच की ऊँचाई तक पहुँचाने के बाद छंद-साधना और सिद्धि की दिशा में गतिमान कर चुके हैं। सिद्धि का प्रसाद श्रद्धालुओं को वितरित करने की परंपरा का निर्वाह इस कृति के माध्यम से हो रहा है, यह अत्यंत महत्वपूर्ण है।

छंद-महत्व तथा विरासत

                    'यदक्षरं परिमाणं तच्छन्दः' अर्थात् जहाँ अक्षरों की गिनती की जाती है या परिगणन किया जाता है, वह छन्द है। पाणिनीय शिक्षा में छन्दों के महत्व को प्रतिपादित करते हुए कहा गया है-'छन्दः पादौ तु वेदस्य'। यहाँ 'पैर' से भाव 'लात' नहीं 'चरण' ग्राह्य है। वेद मंदिर में प्रवेश चरण के बिना नहीं किया जा सकता अर्थात छंद जाने बिना वेद को समझा नहीं जा सकता। संस्कृत वांगमय में ७ वैदिक छंद (गायत्री २४ अक्षर, उष्णिक २८ अक्षर, अनुष्टुप् ३२ अक्षर, बृहती ३६ अक्षर, पंक्ति: ४० अक्षर, त्रिष्टुप ४४ अक्षर तथा जगती ४८ अक्षर) तथा १४ अति छंद (अतिजगती ५२ अक्षर, शक्वरी ५६ अक्षर, अतिशक्वरी ६० अक्षर, अष्टि ६४ अक्षर, अत्यष्टि ६८ अक्षर, धृति ७२ अक्षर, अतिधृति ७६ अक्षर, कृति ८० अक्षर, प्रकृति ८४, अक्षर, आकृति ८८ अक्षर, विकृति ९२ अक्षर, संस्कृति ९६ अक्षर, अभिकृति १०० अक्षर तथा उत्कृति १०४ अक्षर) हैं। इसके अतिरिक्त वार्णिक (सम, अर्धसम, विषम) तथा मात्रिक वृत्तों में विभक्त लौकिक छंद हैं। हिंदी छंद शास्त्र को अपभ्रंश तथा संस्कृत पिंगल की उदात्त विरासत प्राप्त है। हिंदी पिंगल के सर्वमान्य ग्रंथ छंद प्रभाकर (रचयिता जगन्नाथ प्रसाद 'भानु') में लगभग ७०० लौकिक छंदों का रचना विधान तथा उदाहरण प्राप्त हैं। गुरु जी ने छंद शास्त्र के उपलब्ध ग्रंथों का अनुशीलन कर अपने प्रिय घनाक्षरी छंद को केंद्र में रखकर इस पिंगल ग्रंथ का सृजन किया है।

घनाक्षरी

                    हिंदी पिंगल के सर्वकालिक सर्वाधिक लोकप्रिय छंदों में एक 'घनाक्षरी' का सृजन कवि की काव्य कला की कसौटी है। घनाक्षरी (घन + अक्षरी) नाम ही संकेत करता है कि इस छंद में अक्षरों का संगुफन सघन है। घनाक्षरी में सघनता भावों, रसों, अलंकारों, शब्द शक्तियों आदि की सघनता होना घनाक्षरीकार की गुरुता की परिचायक होती है। इस कृति की घनक्षरियों में विविध आयामी सघनता पंक्ति-पंक्ति में दृष्टव्य है। यदि इस दृष्टि से विवेचन किया जाए तो एक स्वतंत्र ग्रंथ ही तैयार हो जाएगा। इसलिए, यह विवेचन भावी शोधकर्ताओं के लिए छोड़ता हूँ। 
  
                    घनाक्षरी में 'चार' का महत्व है। चार पंक्तियाँ, चार यति स्थल। परंपरा से प्राप्त घनाक्षरी छंद ४ x २ = ८ (३१ वर्ण- मनहरण व जनहरण तथा ३२ वर्ण - रूप, जलहरण, डमरू, विजया, कृपाण तथा हरिहरण ) हैं। गुरु जी ने अपनी गुरुता के हस्ताक्षर करते हुए ७ अन्य घनाक्षरियों (३१ वर्ण- कलाधर, ३२ वर्ण- अनंगशेखर, सुधानिधि, मदनहरण,  ३३ वर्ण- देव, महीधर, ३० वर्ण सूर) पर न केवल रचनाएँ की हैं, पुस्तकांत में सभी १५ घनक्षरियों का रचना विधान भी संलग्न कर दिया है ताकि नव घनाक्षरीकार जोर आजमाइश कर सकें। 

                    घनाक्षरी छंद का परिवार बहुत बड़ा है। वर्ण मर्यादा के अनुसार ३१, ३२ तथा ३३ वर्णों के छंदों को घनाक्षरी माना जाए तो कुल प्रकार के छंद इस कुल में सम्मिलित होते हैं जिनकी यति, तुकांत आदि खोजे जा सकते हैं किंतु ये सभी घनाक्षरी इसलिए नहीं हो सकते कि इनकी लय घनाक्षरी कुल के छंदों की लय से सादृश्य नहीं रख सकेगी। इन छंदों में से किन-किन में घनाक्षरी कुल की लय है यह अन्वेषण शोध परियोजना में ही हो सकता है। व्यावहारिकता का तकाजा है कि भावी पीढ़ी को घनाक्षरी के चारुत्व और लालित्य से परिचित कराने के लिए अब तक अन्वेषित घनाक्षरियों के रचना विधान और उत्तम उदाहरण सुलभ कराए जाएँ। अंतर्जाल पर ८ जनवरी २००९ को हिंदयुग्म.कॉम पर घनाक्षरी की चर्चा प्रथमत: इन पंक्तियों के लेखक ने की थी और लगभग २ वर्ष चली विश्व की सर्वाधिक लंबी छंद शिक्षण शृंखला में घनाक्षरी  लेखन का विधान, उदाहरण और शिक्षण किया था। इस कार्यशाला की दो घनाक्षरियाँ प्रस्तुत हैं- 

भारती की आरती उतारिये 'सलिल' नित, सकल जगत को सतत सिखलाइये.
जनवाणी हिंदी को बनायें जगवाणी हम, भूत अंगरेजी का न शीश पे चढ़ाइये.
बैर ना विरोध किसी बोली से तनिक रखें, पढ़िए हरेक भाषा, मन में बसाइये.
शब्द-ब्रम्ह की सरस साधना करें सफल, छंद गान कर रस-खान बन जाइए.
*
आठ-आठ-आठ-सात, पर यति रखकर, मनहर घनाक्षरी, छंद कवि रचिए।
लघु-गुरु रखकर, चरण के आखिर में, 'सलिल'-प्रवाह-गति, वेग भी परखिए।।
अश्व-पदचाप सम, मेघ-जलधार सम, गति अवरोध न हो, यह भी निरखिए।
करतल ध्वनि कर, प्रमुदित श्रोतागण- 'एक बार और' कहें, सुनिए-हरषिए।।

मेरे वेब स्थल दिव्य नर्मदा.इन पर घनाक्षरी संबंधी ४७ प्रस्तुतियाँ उपलब्ध हैं। घनाक्षरी शिक्षण की दिशा में इस कृति के माध्यम से गुरु जी ने यह सराहनीय कार्य किया है। वे साधुवाद के पात्र हैं। आज बीसों वेब स्थलों पर घनाक्षरी शिक्षण का कार्य जारी है। 

                घनाक्षरी को समृद्ध करनेवाले कालजयी घनाक्षरीकारों में देव, दूलह, नंदराम, पजनेस, गोस्वामी तुलसीदास, रहीम, गंग, बोधा, ग्वाल, द्विज, नवनीत, सेनापति, केशव, बिहारी, पद्माकर, भूषण, घनानंद, वृंद,  प्रताप सिंह , मतिराम, चिंतामणि, भिखारीदास, रघुनाथ, बेनी, टीकाराम, ग्वाल, चन्द्रशेखर बाजपेई, हरनाम, कुलपति मिश्र, नेवाज, सुरति मिश्र , कवीन्द्र उदयनाथ, ऋषिनाथ, रतन कवि, बेनी बन्दीजन, प्रवीन, ब्रह्मदत्त, ठाकुर बुन्देलखण्डी, बोधा, गुमान मिश्र, महाराज जसवन्त सिंह, भगवन्त राय खीची, भूपति, रसनिधि, महाराज विश्वनाथ, महाराज मानसिंह, मतिराम, रत्नाकर, नरोत्तमदास, मैथिलीशरण गुप्त, दिनकर, ब्रजेन्द्र अवस्थी, काका हाथरसी, निर्भय हाथरसी आदि तथा समकालिक घनाक्षरीकारों में सत्यनारायण सत्तन, उदय प्रताप सिंह, विष्णु विराट, हरिओम पंवार, जगदीश सोलंकी, अल्हड़ बीकानेरी, ओमप्रकाश आदित्य, विनीत चैहान, वेदव्रत वाजपेयी, ओमपाल सिंह 'निडर', रामदेव लाल 'विभोर', संजीव वर्मा 'सलिल', गुरु सक्सेना, राजेन्द्र वर्मा, ब्रजेश सिंह, ॐ नीरव आदि तथा नवोदित घनाक्षरीकारों में प्रवीण शुक्ल, चोवाराम बादल, छाया सक्सेना, नीलम कुलश्रेष्ठ, मिथलेश बड़गैया, हरि सहाय पांडे,  बसंत शर्मा, अनिल बाजपेई, मीना भट्ट, मनीषा सहाय 'सुमन', अरुण श्रीवास्तव, 'अर्णव', अरुण दीक्षित अनभिज्ञ, सुरेन्द्र यादवेंद्र, शशिकांत यादव, राहुल राय, पवन पांडेय, गौरी शंकर धाकड़, कैलाश जोशी पर्वत, राजेन्द्र चौहान, विवेक सक्सेना, विजय बागरी, कैलाश सोनी सार्थक, अखिलेश प्रजापति, अखिलेश त्रिपाठी 'केतन', प्रतीक तिवारी, प्रीतिमा पुलक आदि उल्लेखनीय हैं। स्पष्ट है कि घनाक्षरी का सृजन दुरूह होने के बाद भी इसके प्रति नई पीढ़ी में लगाव है और इसीलिए घनाक्षरी का भविष्य उज्ज्वल है। 

गुरु की घनाक्षरियाँ 

                घनाक्षरी की किताबी शिक्षा दे रहे स्थलों पर घनाक्षरी को वार्णिक  छंद के रूप में यति स्थान तक सीमित कर सिखाया जा रहा है। मेरा और गुरु जी का मानना है कि अन्य छंदों की तरह घनाक्षरी भी वार्णिक या मात्रिक नहीं मूलत: वाचिक छंद है जिसका गायन उच्चार पर आधारित है। यही कारण है कि निरक्षर कवियों (कृषकों, श्रमिकों, संतों आदि) ने भी उत्कृष्ट और कालजयी घनक्षरियों का सृजन किया है। ये घनाक्षरियाँ लोक के कंठ में अमरत्व पा सकी हैं। इनमें लय को प्रमुखता देते हुए शब्दों को शब्दकोषीय रूप-बंधन से मुक्त कर लय की आवश्यकतानुसार परिवर्तित कर प्रयोग किया गया है। लोकभाषा हिंदी को लोक से जुड़ा रहना है तो उसे विश्वविद्यालायीन किताबी रूप से भिन्न होना होगा। घनाक्षरी छंद यह कार्य चिरकाल से कर रहा है। गुरु की घनाक्षरियाँ इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। 

                उच्चार और लय का समन्वय इस तरह करना कि शब्द-परिवर्तन के बाद भी उसके अर्थ और भाव में परिवर्तन न हो, कवि की कसौटी है। गुरु की घनाक्षरियाँ इस कसौटी पर शत-प्रतिशत खरी हैं। जिसने भी गुरु के कंठ से इन घनाक्षरियों का पाठ सुना है, वह जान सकेगा कि उच्चार और लय का सामंजस्य कैसे स्थापित किया जाता है। मुझे यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं हैं कि वर्ण गणना और यति स्थान पर आधृत अधिकांश घनाक्षरियाँ लय के निकष पर खरी नहीं हैं और उनका कोई भविष्य भी नहीं है। 
                
                गुरु की घनाक्षरियाँ सम सामयिकता की चुनौती को स्वीकार करती हैं। गुरु केवल पारंपरिक विषयों तक सीमित नहीं रहते। वे समय के साथ आँखें मिलाते हुए पुरातन घनाक्षरी छंद को बोतल में आधुनिक परिप्रेक्षय और संदर्भों की सुरा भरकर अपनी घनाक्षरियों को नवागत पीढ़ी के लिए सहज ग्राह्य और उपयोगी बना सके हैं। स्थान-सीमा को देखते हुए मैं उदाहरण नहीं दे रह हूँ किंतु पाठक इस तथ्य से सहमत होंगे, यह मैं जानता हूँ। 

                गुरु की घनाक्षरियाँ अन्य घनाक्षरीकारों के लिए एक चुनौती की तरह हैं। घनाक्षरी के किताबी मानकों के समांतर, लोक में व्याप्त अचर्चित मानकों को साध सकना तलवार की धार पर चलने की तरह है। इन घनाक्षरियों का भाषिक संस्कार 'बुंदेली' है। हर कवि की अपनी भाषा शैली होती है। इस शैली से ही कवि की पहचान होती है। भूषण, घनानंद, प्रेमचंद, पंत, महादेवी, दिनकर आदि की भाषा-शैली उनकी पहचान है। आज के किताबी कवियों की भाषा-शैली उनकी पहचान नहीं बनाती।  बाजारू मसालों से गृहणियाँ एक से स्वाद का खाना बनती हैं। जबकि अपने मसाले पिसाकर उपयोग करनेवाली गृहणियों की पहचान उनकी पाक कला निपुणता से होती है। गुरु की अपनी भाषा-शैली लोक से नि:सृत भाषा के अनुसार है शब्दकोश के अनुसार नहीं। इसलिए गुरु की घनाक्षरियाँ यांत्रिक नहीं जमीनी हैं। यही उनकी सार्थकता है।    

                मुझे विश्वास है कि यह कृति गुरु के शिष्यों को ही नहीं, साहित्य प्रेमियों को ही नहीं, छन्दकारों को ही नहीं आम आदमी को भी भाएगी और यह लोक में स्थान पाकर उसे अलौकिक आनंद देगी। नर्मदा का आनंद और छंद का आह्लाद इन घनाक्षरियों के माध्यम से लोक को छंद, साहित्य और भाषा से जोड़कर राष्ट्रीय एकत्व भाव के प्रसार में सहायक होगा।
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रविवार, 21 जनवरी 2024

पुरोवाक्, अमिता मिश्रा "मीतू"

पुरोवाक्
मन से मन के तार जोड़ती कविताएँ
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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कविता क्या है?  एक यक्ष प्रश्न जिसके उत्तर उत्तरदाताओं की संख्या से भी अधिक होते हैं। कविता क्यों है?,  कविता कैसे हो? आदि प्रश्नों के साथ भी यही स्थिति है। किसी प्रकाशक से काव्य संग्रह छापने बात कीजिए उत्तर मिलेगा 'कविता बिकती नहीं'। पाठक कविता पढ़ते नहीं हैं, पढ़ लें तो समझते नहीं हैं, जो समझते हैं वे सराहते नहीं हैं। विचित्र किंतु सत्य यह कि इसके बाद भी कविता ही सर्वाधिक लिखी जाती है। देश और दुनिया की किसी भी भाषा में कविता लिखने और कविता की किताबें छपानेवाले सर्वाधिक हैं। इसका सीधा सा अर्थ है कि तथाकथित  प्रकाशकों के घर का चूल्हा कविता ही जलाती है। 

दुनिया में लोगों की  केवल दो जातियाँ हैं। पहली वह जिसका समय नहीं कटता,  दूसरी वह जिसको समय नहीं मिलता। मजेदार बात यह है की कविता का वायरस दोनों को कोरोना-वायरस की  तरह पड़कता-जकड़ता है और फिर कभी नहीं छोड़ता।

दरवाजे पर खड़े होकर 'जो दे उसका भी भला, जो न दे उसका भी भला' की टेर लगानेवाले की तरह कहें तो 'जो कविता लिखे उसका भी भला, जो कविता न लिखे उसका भी भला'। कविता है ऐसी बला कि जो कविता पढ़े उसका भी भला, जो कविता न पढ़े उसका भी भला', 'जो कविता समझे उसका भी भला, जो कविता न समझे उसका भी भला'। 

कविता अबला भी है, सबला भी है और तबला भी है। अबला होकर कविता आँसू बहाती है, सबला होकर सामाजिक क्रांति को जनम देती है और तबला होकर अपनी बात डंके पर चोट की तरह कहती है। 

'कहते हैं जो गरजते हैं वे बरसते नहीं', कविता इस बात को झुठलाती और नकारती है, वह गरजती भी, बरसती भी है और तरसती-तरसाती भी है।

कविता के सभी लक्षण और गुण कामिनी में भी होते हैं। शायद इसीलिए कि दोनों समान लिंगी हैं। कविता और कामिनी के तेवर किसी के सम्हालते नहीं सम्हलते। 

मीतू मिश्रा की कविता भी ऐसी ही है। सदियों से सड़ती-गलती सामाजिक कुरीतियों और कुप्रथाओं पर पूरी निर्ममता के साथ शब्दाघात करते हुए मीतू चलभाष और अंतर्जाल के इस समय में शब्दों का अपव्यय किए बिना 'कम लिखे से अधिक समझना' की भुलाई जा चुकी प्रथा को कविताई में जिंदा रखती है। मीतू की कविताओं के मूल में स्त्री विमर्श है किंतु यह स्त्री विमर्श तथा कथित प्रगति शीलों के अश्लील और दिग्भ्रमित स्त्री विमर्श की तरह न होकर शिक्षा, तर्क और स्वावलंबन पर आधारित सार्थक स्त्री विमर्श है। कुरुक्षेत्र में कृष्ण के शंखनाद की तरह मीतू इस संग्रह के शाब्दिक शिलालेख पर लिखती है-    

'निकल पड़ी है वो सतरंगी ख्वाबों में
भरती रंग.... स्वयं सिद्धा बनने की ओर।' 

मीतू यहीं नहीं रुकती, वह समय और समाज को फिर चेताती है- 

'चल पड़ी है वो औरत अकेली
छीनने अपने हिस्से का आसमान।' 

लोकोक्ति है 'अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता' लेकिन मीतू की यह 'अकेली औरत' हिचकती-झिझकती नहीं। यह तेवर इन कविताओं को जिजीविषाजयी बनाता है। अकेली औरत किसी से कुछ अपेक्षा न करे इसलिए कवयित्री उसे झकझोरकर कहती है-  

'हे स्त्री! मौन हो जाओ
नही है कोई जो महसूस कर सके
तुम्हारी अव्यक्त पीड़ा..
लगा सके मरहम, पोंछे आँसू 
कभी विद्रोही, कभी चरित्रहीन
कहकर चल देंगे समाज के जागरूक लोग
धीरे धीरे तुम्हें सुलगता छोड़कर।' 

समाज के जिन जागरूक लोगों (लुगाइयों समेत) की मनोवृत्ति का संकेत यहाँ है, वे हर देश-काल में रहे हैं। सीता हों या द्रौपदी, राधा हों या मीरां इन जागरूक लोगों ने पूरी एकाग्रता और पुरुषार्थ के साथ उन्हें कठघरे में खड़ा किया, बावजूद इस सच के कि वे कन्या पूजन भी करते रहे और त्रिदेवियों की उपासना भी। दोहरे चेहरे, दोहरे आचरण और दोहरे मूल्यों के पक्षधरों को मीतू बताती है-  

'कण कण में ही नारी है
नारी है तो नर जीवन है
बिन नारी क्या सृष्टि है?'

यह भी कहती है- 

'नारी
ढूँढ ही लेती है
निराशाओं के बीच
एक आशा की डोर
थामे टिमटिमाती लौ आस की
बीता देती है जीवन के अनमोल पल
एक धुँधले सुकून की तलाश में
एक पल जीती ..फिर टूटती अगले ही पल' 

इयान कविताओं की 'नारी' अंत में इन तथाकथित 'लोगों' की अक्षमता और असमर्थता को आईना दिखाते हुए  'साम्राज्य के आधे भाग की जगह केवल पाँच गाँव' की चाह करती है-   

'मध्यमवर्ग की कोमल स्त्री
जिंदगी की जमापूंजी से
खर्च करना चाहती है
कुछ वक्त अपने लिए अपने ही संग' 

इतिहास पाने को दुहराता है, पाँच गाँव चाहने पर 'सुई की नोक के बराबर भूमि भी नहीं दूँगा' की गर्वोक्ति करने वाले सत्ताधीशों और उन्हें पोषित करनेवाले नेत्रहीनों को समय ने कुरुक्षेत्र में सबक सिखाया। वर्तमान समाज के ये 'लोग' भी यही आचरण कर रहे हैं। ये आँखवाले आँखें होते हुए भी नहीं देख पाते कि-     

'एक चेहरा
ढोता बोझ
कई किरदारों का' 

वे महसूस नहीं कर पाते कि- 

'नारी सबको उजियारा दे
खुद अँधियारे में रोती है।'

यह समाज जानकार भी नहीं जानना चाहता कि- 

'अपने ही हाथों
जला लेती हैं
अपना आशियाना
घर फूँक तमाशा देखती हैं
प्रपंच और दुनियादारी में
उलझी किस्सा फरेब
बेचारी औरतें'

इस समाज की आँखें खोलने का एक ही उपाय है कि औरत 'बेचारी' न होकर 'दुधारी' बने और बता दे-  

'कोमल देह इरादे दृढ़ हैं
हालातों से नही डरे
तोड़ पुराने बंधन देखो
नव समाज की नींव गढ़े।'

औरत के सामने एक ही राह है। उसे समझना और समझाना होगा कि वह खिलौना नहीं खिलाड़ी है, बेचारी नहीं चिंगारी है। मीतू की काव्य नायिका समय की आँखों में आँखें डालकर कहती है- 

'जीत पाओगे नहीं
पौरुष जताकर यूँ कभी
हार जाऊंगी स्वयं ही
प्रीत करके देखलो!
दंभ सारे तोड़कर
निश्छल प्रणय स्वीकार लो,
मैं तुम्हारी परिणीता
अनुगामिनी बन जाऊंगी!' 

समाज इन कविताओं के मर्म को धर्म की तरह ग्रहण कर सके तो ही शर्म से बच सकेगा। ये कविताएँ वाग्विलास नहीं हैं। इनमें कसक है, दर्द है, पीड़ा है, आँसू हैं लेकिन बेचारगी नहीं है, असहायता नहीं है, निरीहता नहीं है, यदि है तो संकल्प है, समर्पण है, प्रतिबद्धता है। ये कविताएँ तथाकथित स्त्री विमर्श से भिन्न होकर सार्थक दिशा तलाशती हैं। स्त्री पुरुष को एक दूसरे के पूरक और सहयोगी की तरह बनाना चाहती हैं। तरुण कवयित्री मीतू का प्रौढ़ चिंतन उसे कवियों की भीड़ में 'आम' से 'खास' बनाता है। उसकी कविता निर्जीव के संजीव होने की परिणति हेतु किया गया सार्थक प्रयास है। इस संग्रह को बहुतों के द्वारा पढ़, समझा और सराहा जाना चाहिए। 

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नाम-अमिता मिश्रा"मीतू"

जन्मतिथि -17/10/1978

जन्मस्थान -हरदोई(उत्तर प्रदेश)

माता-श्रीमती मधुबाला मिश्रा

पिता-स्व श्रीकांत मिश्रा

पति संजीव मिश्रा

निवास-हरदोई(उ.प्रदेश)

शिक्षा-स्नातक(माइक्रोबायोलॉजी),बी.एड और डिप्लोमा इन न्यूट्रीशन एंड हेल्थ एजुकेशन

पुस्तकें-पारुल और सुगंधा उपन्यास