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सोमवार, 22 जून 2026

पुरोवाक्, भक्ति गीतांजलि, शशि शर्मा

पुरोवाक्
भक्ति गीतांजलि : प्रभु को अर्पित भावांजलि
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
भक्ति काव्य और उसका अवदान 

            हिन्दी साहित्य के इतिहास के मध्यकाल को विद्वानों ने दो भागों में विभक्त किया है- पूर्व मध्यकाल तथा उत्तर मध्यकाल। पूर्व मध्यकाल का नामकरण विद्वानों ने भक्तिकाल किया है। चौदहवीं शताब्दी के बाद जो हिन्दी साहित्य रचा गया, उसमें अधिकांश साहित्य की मूल प्रेरणा भक्ति भावना रही। इस समय समाज में फैली संकीर्णता, कट्टरता, उच्छृंखलता, टकराव, बिखराव, हताशा तथा निराशा से समाज का बचाने का प्रयत्न भक्त कवियों ने भक्ति के माध्यम से किया। इस भक्ति भाव ने आगे युग चेतना का रूप धारण किया। भक्तिकाल के पदार्पण तक हिन्दी भाषा का रूप स्थापित होकर उसका साहित्य पंजाब से बंगाल और उत्तरांचल से आगे दक्षिण तक प्रसारित हो रहा था। वीरगाथा काल में जिन मुसलमान आक्रमणकर्ताओं से भारतीय जनता आतंकित हो रही थी, भक्तिकाल आते-आते वे विदेशी मुसलमान यहीं के हो चुके थे, शासकऔर शासित भी बन गए थे। सामान्य जनों के पास भक्ति से शक्ति प्राप्त करने और सामंजस्य स्थापित करने के अलावा अन्य कोई चारा नहीं रह गया था। अमन परस्त यवन और नव मुस्लिम भारतीय रीति-रिवाजों का पालन करने लगे थे। हिन्दी मज़्लिन अपने उपास्य देवों की शरण में जाने के साथ-साथ एक दूसरे के इष्ट देवों को भी पूजने लगे थे। अनेक हिंदू सवारियाँ रखते, ईद और मुहर्रम मनाते तो अनेक मुस्लिम कृष्ण और राम के गीत गाते, देवी प्रतिमा अपने घरों में रखते और पूजते।


            भक्तिकाल के सभी कवियों ने गुरु-महिमा को अत्यधिक महत्व दिया है। कबीरदास ने तो गुरु-महिमा को सर्वाधिक स्थान देते हुए कहा-


गुरु गोविंद दोनों खड़े, काके लागूं पांय।

बलिहारी गुरु आपनी, गोविंद दियो बताय।।

            भक्त कवियों ने अपनी भक्तिमय काव्य साधना से अपने इष्टदेव रूपी लक्ष्य को प्राप्त करने का सतत और अथक प्रयास किया। नाम-महिमा, लोक-कल्याण, प्रेम-भावना, सामाजिक समरसता, पाखंड-निषेध आदि भक्ति काल की गीति रचनाओं का वैशिष्ट्य रहा कालांतर में दैन्य, समर्पण और मिलन का भाव अपने इष्ट के प्रति सीमित न रहकर अन्य देवी-देवताओं तक विस्तारित हुआ। इसमें मुख्य भूमिका गुरुओं और ग्रहणियों ने निभाई। गुरु को शिष्य और कन्याओं को ससुराल मूल से भिन्न दैवी स्वरूप की उपासक होने पर नए इष्ट के प्रति समर्पण भाव विकसित होने पर भी पुराने इष्ट को विस्मृत करना संभव न रहा। शैव,वैष्णव, शाक्त, गाणपत्य आदि देवों की उपासना एक ही पूजाघर में होने लेगी। सूर और तुलसी के इष्ट राम और कृष्ण हर हिंदू के घर और अंतर्मन में बस गए। तुलसी ने शिव और राम को शिव एक दूसरे का इष्ट बनाकर सांस्कृतिक समन्वय को पुष्ट किया। यही नहीं यह भक्ति भाव धरती और राष्ट्र के साथ जुड़कर राष्ट्रीय भावधारा के साहित्य का जन्मदाता बना। भारत माता की संकल्पना अवधारणा बनकर हर भारतवासी को देश के लिए प्राणोत्सर्ग हेतु प्रेरित कर सकी। फलत:, देश स्वतंत्र हुआ।


भक्ति काव्य की भाषा

            भक्तिकालीन हिंदी काव्य की प्रमुख भाषा पछाँही, कौरवी, शौरसेनी, ब्रज, बुन्देली अवधी, और भोजपुरी है। सूरदास, तुलसीदास जगनिक और ईसुरी जैसे महान लोकप्रिय कवियों ने सांसारिकता और अलौकिकता का गंगो-जमुनी सम्मिश्रण करते हुए संस्कृत और स्थानीय भाषाओं-बोलियों का ऐसा प्रयोग किया कि उनमें भाषिक द्वैत समाप्त होकर पचमेल खिचड़ी की तरह सर्व स्वीकृत सरस स्वरूप बना। खड़ी बोली ने अपने उद्भव के साथ ही भारत की भाषिक विविधता को एकरूप में ढाला। फलत:, चैतन्य महाप्रभु, अमीर खुसरो, कबीर, गुरु नानक, मीरां, केशव आदि ही नहीं, तुकाराम, नामदेव, नरसिंह मेहता आदि भी हिन्दी के भक्ति काव्य के दैदीप्यमान नक्षत्र स्वीकारे गए।   

भक्ति काव्य रचनाओं का शिल्प और छंद 

            भक्ति साहित्य अनेक विधाओं और छंदों में लिखा गया है, किंतु गेयपद और दोहा-चौपाई में निबद्ध कड़वकबद्धता उसके प्रधान रचना रूप हैं। गेयपदों की परंपरा हिंदी में सिद्धों से प्रारंभ होती है। नामदेव, नानक, कबीर, सूर,रैदास, दादू, तुलसी, मीराबाई आदि ने गेयपदों में रचना की है। गेयपदों में काव्य और संगीत एक-दूसरे से घुल -मिल-से गए हैं। संभवत: ये कवि राग-रागिनियों को ध्यान में रखकर इन गेयपदों की रचना करते थे। गेयपदों की प्रारंभिक पंक्ति आवर्ती या टेक होती है अर्थात् वह केंद्रीय कथ्य होती है। बीच की पंक्तियों में उस कथ्य की व्याख्या होती है और अंतिम पंक्ति में रचनाकार अपना नाम डालकर गेयपद समाप्त करता है। वह अपने अनुभव से गेयपद के केंद्रीय कथ्य को सत्यापित करता है। भक्ति काव्य में चौपाई, दोहा, सोरठा,  रोला, माहिया, आल्हा, अभंग, सवैया, घनाक्षरी, गीतिका, हरिगीतिका आदि छंदों का प्रयोग प्रचुरता से हुआ। सूरदास के पद, गुरु नानक की बानी, कबीर की साखी आदि अपनी मिसाल आप है। 

भक्ति काव्य में अलंकार 

            अलंकार कविता-कामिनी के सौन्दर्य को बढ़ाने वाले तत्व  हैं।  कहा गया है - 'अलंकरोति इति अलंकारः' (जो अलंकृत करता है, वही अलंकार है।) भारतीय भक्ति साहित्य में प्रयुक्त प्रमुख अलंकार अनुप्रास, उपमा, रूपक, अनन्वय, यमक, श्लेष, उत्प्रेक्षा, संदेह, अतिशयोक्ति, वक्रोक्ति आदि हैं। ये व्युत्पत्ति से उपमा आदि अलंकार कहलाते हैं। उपमा आदि के लिए अलंकार शब्द का संकुचित अर्थ में प्रयोग किया गया है। व्यापक रूप में सौंदर्य मात्र को अलंकार कहते हैं और उसी से काव्य ग्रहण किया जाता है। "काव्यं ग्राह्ममलंकारात्। सौंदर्यमलंकार:" - वामन। चारुत्व को भी अलंकार कहते हैं। (टीका, व्यक्तिविवेक)। भामह के विचार से वक्रार्थविजा एक शब्दोक्ति अथवा शब्दार्थवैचित्र्य का नाम अलंकार है। (वक्राभिधेतशब्दोक्तिरिष्टा वाचामलं-कृति:।) रुद्रट अभिधान प्रकार विशेष को ही अलंकार कहते हैं। (अभिधानप्रकाशविशेषा एव चालंकारा:)। दंडी के लिए अलंकार काव्य के शोभाकर धर्म हैं (काव्यशोभाकरान् धर्मान् अलंकारान् प्रचक्षते)। सौंदर्य, चारुत्व, काव्यशोभाकर धर्म इन तीन रूपों में अलंकार शब्द का प्रयोग व्यापक अर्थ में हुआ है और शेष में शब्द तथा अर्थ के अनुप्रासोपमादि अलंकारों के संकुचित अर्थ में। एक में अलंकार काव्य के प्राणभूत तत्व के रूप में ग्रहीत हैं और दूसरे में सुसज्जितकर्ता के रूप में। भक्ति काव्य में इष्ट के सौंदर्य, पराक्रम, दयालुता आदि के वर्णन हेतु अलंकारों का प्रयोग प्रचुरता से किया जाता है।

भक्ति गीतांजलि का प्रयोजन 

            उक्त पृष्ठभूमि में शीघ्र प्रकाश्य भक्ति काव्य धारा की कृति "भक्ति गीतांजलि'' का अवलोकन करना सुखद है। डॉ. शशि शर्मा की काव्य रचनाओं में उक्त विरासत के दर्शन सहज ही किए जा सकते हैं। शशि जी सुशिक्षित (अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, हिन्दी व संस्कृत में स्नातकोत्तर, एम.एड.तथा आयुर्वेद रत्न), सुरुचि संपन्न सुग्रहणी हैं। वे सामाजिक और सांस्कृतिक धरातल पर सतत सक्रिय हैं। वे विदुषी शिक्षिका भी रही हैं। भारतीय पुरुषार्थ चतुष्टय परंपरा आयु के चतुर्थ चरण का प्राप्य ''मोक्ष'' बताती है जिसकी राह भक्ति से होकर जाती है। शशि साधुवाद की पात्र हैं कि अंतरध्वनि तथा भक्ति गीतांजलि काव्य संग्रहों ए माध्यम से वे जीवन के आरंभ में मिले सात्विक संस्कारों को जीवन के मध्य में सहेजते हुए क्रमश: प्रगति-पथ पर अग्रसर हैं। 

            सामान्यत: साहित्य-सृजन मन-रंजनार्थ अथवा आत्म संतुष्टि हेतु किया जाता है। शशि जी द्वारा रचित भक्ति गीत साक्षी हैं कि वे लेखन कार्य को ''स्व'' तथा ''सर्व'' के उत्थान का कारक ही नहीं, उत्प्रेरक भी मानती हैं। शैशव में प्रस्फुटित, बचपन में अंकुरित, कैशौर्य में पल्लवित, यौवन में पुष्पित और वार्धक्य में फलित भक्ति-भाव की लता के सुफल समाज को देने का उदात्त भाव ही इन रचनाओं के सृजन और प्रकाशन का कारण है। ऐसी काव्य रचनाएँ लोकैषणा अथवा धन प्राप्ति हेतु सप्रयास नहीं की जातीं। ये रचनाएँ नर्मदा का अमला-धवला सलिल-धार की तरह अंतर्मन से स्वयमेव अवतरित होती हैं। इन भक्ति गीतों की भाव-धारा में अवगाहन किए बिना इनका रसास्वादन कर पाना और आनंद में सराबोर हो पाना संभव नहीं होता। भजनीक शशि स्वयं मानती हैं कि ये रचनाएँ केवल भक्ति और समर्पण का साक्ष्य हैं। 

            गोविंद के पहले गुरु के स्मरण की परंपर करते हुए शशि जी गुरु-वंदना नहीं भूलीं- 

मेरे गुरुवर कृपया बनाए रखना 

हमें स्वर व्यंजन का ज्ञान नहीं 

मात्राओं का भी भान नहीं 

ढाई अक्षर परेन पढ़ाए रखना 

            विघ्नेश्वर गणेश के पधारे बिना कोई शुभ कार्य कैसे हो सकता है- 

मेरे बिगड़े सुधारो काज, गणपति आ जाना  

            तुलसी दास जी ने लिखा है ''नारि न मोहि नारि कै रूपा'' किंतु यह सांसारिक संदर्भ में है। इन भजनों में अधिकांश नारी द्वारा नारी की ही उपासना है। आदि शक्ति के मातृ स्वरूप को आराधते हुए शशि मातृ-चरण में शयन को सौभाग्य मानती हैं- 

सौभाग्य है हम मात के चरणों में सो लिएss 

हम माँ के हो लिए sss हम माँ के हो लिए  

            शशि जी की आराध्या भवानी संसार से दूर नहीं, संसार में रहकर संसार के कार्य सुधारती हैं- 

अंबे मेरी जगतारिणी, दुनिया के सुधारे काज होs

            माँ दीन-दुर्बलों के प्रति विशेष दयावान हैं- 

निर्धन हो या बाँझ पुकारे 

माँ सबके शशि कष्ट निवारे 

देखा भक्तों ने तेरा चमत्कार रे! 

            माँ के प्रति भक्ति भाव भक्त को योग की राह पर अग्रसर होने की प्रेरणा देता है-  

तेरी जोगन बन जाऊँगी, मैया तोरे  दर्शन को निश-दिन आऊँगी 

न पहनूँ टीका न सोने का बेंदा चंदन का टीका लगाऊँगी

            मीरा की भक्ति धारा में बाधक स्वजन परिजन ही थे। यह परिदृश्य तब से अब तक नहीं बदला, बदलेगा भी नहीं। शशि मैया से ही व्यथा-कथा कहती हैं- 

सास ननद मैया ताने मारे 

ताने मारे मैया शोर मचावे 

छोड़ ललन कहँ जाए री 

मैया ऊँची अटरिया... 

            यहाँ 'मैया' के प्रयोग में श्लेष अलंकार दृष्टव्य है। माँ के पराक्रम का वर्णन की बिना संतान का मन न भरे, यह स्वाभाविक है। शशि लिखती हैं- 

मात की लीला तो अपंपार है, 

भक्तों का करती तू बेड़ा पार है

जब किया सुमिरन दुखों में मात को 

कर कृपा  सुनती वो आधी रात को  

            भक्ति गीतांजलि के कृष्ण भजनों में वात्सल्य, नटखटपन और उपालंभ आनंदप्रद है- 

बड़ो री शैतान मैया! कृष्ण कन्हाई 

नटखट लाला तेरो बड़ो हरजाई 

वरंदावन की कुंज गलिन में, बैठो राह निकारे 

गुजरेंगीं जब बाँकी गुजरिया, छुप-छुप कंकण मारे 

फोड़े री मटकिया, दध-माखन खाई 

            श्री राम भारत के हर सनातन घर में मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में विराजमान हैं। राम मंदिर बनने की प्रसन्नता एक भजन में अभिव्यक्त हुई है- 

सजी है अयोध्या, श्री राम जी हैं आए 

बड़े भाग्य हमने दर्शन जो पाए

            भक्ति भाव धारा का राष्ट्रीय भाव धारा से संगम ''हिंदू राष्ट्र'' शीर्षक रचना में है-  

बन जैहे हिंदू राष्ट्र सबई संतों ने करी है तैयारी 

            इस रचना का वैशिष्ट्य है कि हिंदू राष्ट्र निर्माण का श्रेय किसी राजनेता, आंदोलन या राजनैतिक दल को न देते हुए संतों को दिया गया है किंतु हिंदू राष्ट्र निर्माण के लिए आजीवन अन्न और नमक ग्रहण न करने की प्रतिज्ञा करने और निभाने तथा गौ हत्या बंद करने के लिए सकल भारत में अनशन करने वाले स्वामी रामचन्द्र शर्मा 'वीर' (आचार्य धर्मेन्द्र के पिता), हिंदू राष्ट्र के लिए त्याग करने वाले करपात्री जी आदि का स्मरण सोने में सुहाग होता। 

            जगतपिता-जगतमाता शिव-पार्वती के विवाह का प्रसंग भक्तों का मन मोहता है- 

आज गौरा को बिहाने चले हैं भोलेनाथ 

शीश चंद्रमा गंग बिराजे, जटाओं में रहीं समाय 

चंदन और त्रिपुण्ड तिलक कर मृगछाला लपटाय 

अंग भभूत रमाय लिए हैं, डमरू त्रिशूल है हाथ 

            भक्ति गीतांजलि का वैशिष्ट्य वीरांगना-वंदन है। नारी भारत की शान शीर्षक रचना पारंपरिक भक्ति गीत न होते हुए भी राष्ट्र-भक्ति परक भजनों का नवाचार है। शिक्षिका के नाते शशि जी ने अनेक नवाचार की होंगे, भजनीक के नाते यह नवाचार स्वागतेय है- 

नारी भारत की शान रही 

है शक्ति अपार महान रही 

            इस रचना में सीता जी, अहल्याबाई, लक्ष्मीबाई, जीजा बाई, दुर्गावती आदि से लेकर भारतीय स्वतंत्रता सत्याग्रह में सम्मिलित नारी रत्नों को स्मरण  किया गया है। यदि महादेवी जी जैसे साहित्यकार, इसरो के चंद्र विजय अभियान में संलग्न वैगणिक महिलाओं को जोड़ा जा सकता तो उत्तम होता। 

            सारत: यह निस्संकोच कहा जा सकता है की शशि जी ने भक्ति काव्य के आकाश में आपनी कारयित्री ज्योत्सना की आभा सफलतापूरवाक बेकहेरी है। इस भक्ति गीत संग्रह में भक्ति गीतों की भावधारा के नए आयामों का संकेत समाहित होना ही इसकी सफलता है। मुझे विश्वास है कि यह कृति भविष्य में कई कर्तियों की प्रेरणा स्तोत्र बनेगी। 

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संपर्क- विश्ववाणी हिन्दी संस्थान अभियान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१ 

चलभाष ९४२५१८३२४४, ईमेल salil.sanjiv@gmail.com



पुरोवाक्
भक्ति गीतांजलि : प्रभु को अर्पित भावांजलि
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'

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भाषा, 

            मानव-मन में उठ रहे विचारों की अभिव्यक्ति संकेतों और ध्वनि के माध्यम से की जाती है। नवजात शिशु कोई भाषा या लिपि न जानते हुए भी माँ के विचारों को मुख के भावों अथवा नेत्र के संकेतों से समझ जाता है। क्रमश: मस्तिष्क का विकास होने पर वह मा द्वारा उच्चारित शब्दों के अर्थ ग्रहण करता है। मानव मन के विचारों की ध्वनि अथवा शब्दों के माध्यम से की गई अभिव्यक्ति ही भाषा है। मूल ध्वनियों का क्रम वर्ण माला कहलाती है। आरंभ में मौखिक ध्वनियों को लिखित संकेतों में व्यक्त करने पर लिपि का जन्म होता है। भाषा की सभी ध्वनियों के प्रतिनिधि स्वर एक व्यवस्था में मिलकर भाषा को मूर्त करते हैं। भाषा को वैचारिक आदान-प्रदान का माध्यम कहा जा सकता है। भाषा आभ्यन्तर अभिव्यक्ति का सर्वाधिक विश्वसनीय माध्यम है। यही नहीं वह हमारे आभ्यन्तर के निर्माण, विकास, हमारी अस्मिता, सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान का भी साधन है। भाषा के बिना मनुष्य सर्वथा अपूर्ण है और अपने इतिहास तथा परम्परा से विच्छिन्न है।

साहित्य 

            ''सहितस्य  भाव साहित्यम्'' अर्थात साहित्य वह वैचारिक  अभिव्यक्ति है जिसमें मानव अनुभव, भावनाएँ, विचार और संस्कृति शब्दों के माध्यम से प्रस्तुत किए जाते हैं। साहित्य की निर्मिति स + हित से होने का आशय यह है कि साहित्य में समष्टि का हित समाहित होता है।  आचार्य महावीरप्रयासद द्विवेदी के शब्दों में 'ज्ञान राशि के संचित कोश का नाम साहित्य है।'' 

भक्ति-काव्य

            मानव सभ्यता के विकास के साथ मनुष्य ने प्रकृति के साथ जीना सीखा। जीवन के लिए आवश्यक आग्नि, धरती, आकाश, श्वास में आती-जाती वायु,  प्यास बुझाता नदी का जल, रात्रि के अँधेरे को चीर कर उगता सूरज, रात्रि के एकांत में चाँद-तारों का साथ, छाँह देते पेड़ आदि के प्रति आभारी मानव ने इन्हें अपना संरक्षक, पालक या ईश्वर मान लिया। आदिवासी कबीलों में आज तक इनके सठही पशु-पकशिऑन तक को कुलदेव के रूप में स्वीकार किया जाता है। इसी करण में जन्मदाता माता-पिता के साथ जगतमाता-जगतपिता के रूप में ईश्वर को स्वीकार किया गया। इन सर्वशक्ति शाली दैवीय शक्तियों से संरक्षण की कामना, उनकेआशीष से जीवन में सुख-शांति मिलने की भावना, उनके प्रकोप से आपदा आने के आशंका आदि भावनाओं की लयबद्ध सरस अभिव्यक्ति भक्ति काव्य के रूप में प्रस्फुटित और विकसित हुई।

भक्ति-काव्य का वैविध्य 

            भारत और के विश्व के विविध अंचलों में पर्यावरण, मौसम, ऋतुओं आदि के अनुसार प्रकृति के अंगों और तत्वों की विविधता और प्रभाव में परिवर्तन ने विभिन्न देवी-देवताओं के रूप-गुण-कथाओं, पूजा पद्धतियों आदि में बहुरूपता उत्पन्न की। दैवीय शक्तियों के प्रति विश्वास और आस्था का अतिरेकी प्रभाव चमत्कारिक कथाओं और भजनों में मिलना स्वाभाविक है। एक ही देवी या देवता के रूपों-गुणों में विविध काल खंडों और क्षेत्रों में बहुरूपता सहज दृष्टव्य है। यह अंतर व्यक्ति की भावना, उसकी परंपरा, पारिवारिक मान्यताओं, सामाजिक प्रथाओं, रीति-रिवाजों आदि के अनुसार बदलती चलती है। इस कारण भक्ति काव्य में सनातन नूतनता, रोचकता और जिज्ञासा भाव बनारहता है। ऐसा न हो तो एक ही रूप में कथ्य की पुनरावृत्ति नीरस हो सकती है। 


 



शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026

हरिहर झा, पुरोवाक्,



पुरोवाक्
दृष्टि : सत्य शोधक विचारों की वृष्टि
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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                    भारतीय ज्ञान परंपरा के अनुसार साहित्य में सबका हित समाहित होन आवश्यक है किसी एक वर्ग, समूह या विचारधारा का नहीं। संस्कृत में 'साहित्य' शब्द की व्युत्पत्ति "सहितस्य भावः साहित्यम्" (हितकारी भाव भरी रचना) के रूप में हुई है। ''साहित्यस्य कर्म साहित्यम्'' अर्थात सबके लिए हितकर कर्म (लेखन) ही साहित्य है। ''हितेन सह सहितं, तस्य भाव: साहित्यम्'' अर्थात् हित या कल्याण से युक्त अथवा अथवा कल्याणकारी भाव वाला लेखन साहित्य है।साहित्य सत्य, शिव और सुंदर  को अभिव्यक्त कर सत्-चित्- आनंद की प्राप्ति में सहायक होता है। राजशेखर के अनुसार साहित्य पुराण, न्याय, मीमांसा और धर्मशास्त्र इन चार विद्याओं का निचोड़ अर्थात पंचमी विद्या है।

                प्राच्य से भिन्न पाश्चात्य चितन में साहित्य कोई भी लिखित रचना है। लैटिन शब्द litaritura/litteratura का अर्थ है "अक्षरों द्वारा किया गया साहित्यिक गुणों से युक्त लेखन" जिसमें वाचिक पाठ भी शामिल हैं। 

                साहित्य को मुख्यत: लौकिक (सांसारिक) - अलौकिक (वैदिक/आध्यात्मिक) तथा गद्य ( निबंध, उपन्यास, कहानी, नाटक, एकांकी, जीवनी, आत्मकथा, लघुकथा, समालोचना आदि) - पद्य (कविता, गीत, महाकाव्य, खंडकाव्य आदि) में वर्गीकृत किया जाता है। विषयों (अभियांत्रिकी, कृषि, चिकित्सा, विधि, संगीत, चित्रकला, वाणिज्य आदि) के आधार पर भी साहित्य को वर्गीकृत किया जा सकता है। लक्ष्य पाठक वर्ग के आधार पर साहित्य को बाल, प्रौढ़, तरुण आदि, कथ्य के आधार पर राष्ट्रीय, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक आदि वर्ग की जा सकते हैं। 

            वर्तमान में भारतीय शिक्षा तथा चितन पर पश्चिम का व्यापक प्रभाव है। भारत में सर्व कल्याण का भाव प्रमुख है जबकि पश्चिम में वर्ग विशेष का। इस कारण आजकल साहित्य में वैचारिक प्रतिबद्धता को महत्व मिल रहा है। अखंड को खंड उसे प्रकार बाहर कर रहा है जैसे बुरी मुद्रा अच्छी मुद्रा को बाजार से बाहर कर देती है। इसका परिणाम स्त्री विमर्श, प्रवासी साहित्य, ग्राम्य साहित्य, लोक साहित्य आदि विभाजनों के रूप में सामने आ रहा है। 

                श्रेष्ठ-ज्येष्ठ साहित्यकार हरिहर झा की नवीनतम कृति ''दृष्टि'' भारतीय साहित्यिक चिंतन परंपरा को आगे बढ़ाते हुए खंडित दृष्टि पर अखंडित दृष्टि को वरीयता देती है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने साहित्य को समाज का दर्पण कहा किन्तु वास्तव में साहित्य को समाज का दर्पण कहना भी खंड-सत्य है। दर्पण किसी बिम्ब का हू- ब-हू प्रतिबिंब तो दिखाता है किंतु दाहिने को बायाँ और बाएँ को दाहिना कर देता है। दर्पण बिम्ब का प्रतिबिंब दिखाते समय कोई परिवर्तन नहीं कर सकता जबकि साहित्य सामाजिक परिवर्तनों / क्रांतियों और नव अनुसंधानों का कारक होता है। साहित्य में बिम्ब के साथ भाव, रस, अलंकार, मिथक, रुपक आदि अनेक तत्व अंतर्निहित होते हैं जबकि दर्पण केवल और केवल बिम्ब तक सीमित होता है। इसलिए साहित्य को समाज का दर्पण कहना सही नहीं है। 

                ''दृष्टि'' में आलेख/शोधालेख, संस्मरण/रेखाचित्र, व्यंग्य, समीक्षा तथा यात्रा वृत्तान्त आदि का सारगर्भित संकलन किया गया है। शोधालेखों के विषय स़ीता का व्यक्तित्व, धर्म के सरोकार, कृत्रिम बुद्धि, गांधी तथा संत साहित्य भारतीय तथा वैश्विक दोनों परिदृश्यों में सामयिक और उपयोगी हैं। शोधसलेखों में 'मौलिकता' का बहुत महत्व है। यह मौलिकता है क्या? किसी विषय या कथानक में जो कुछ कहा या लिखा जा चुका है उससे हटकर कुछ 'नया' कहना। यह नयापन काल्पनिक ही होता है। युगों पहले की घटनाओं का प्रत्यक्षदर्शी तो हुआ नहीं जा सकता। रचनाकार पूर्वलिखित सब कुछ पढ़ भी नहीं सकता। उपलब्ध साहित्य का अध्ययन कर उस पर मन-चिंतन कर अपनी राय बनाना और उसे पूर्व ज्ञात तथ्यों के निकष पर कसकर रचनाबद्ध करना ही 'नयापन' है। राम कथा ही नहीं, कृष्ण कथा, शिव-आख्यान जैसे पौराणिक ही नहीं ऐतिहासिक और सम-सामयिक विषयों पर भी 'नयापन' विमर्श और विवाद का विषय बनता रहा है। उत्तर रामायण को प्रक्षिप्त या प्रामाणिक मानना भी नयेपन को अपने विवेक के निकष पर कसना ही है। उत्तर रामायण- डॉ. किशोर काबरा, उत्तर कथा - डॉ. प्रतिभा सक्सेना, महिजा - डॉ. सुशीला कपूर, वैदेही के राम - डॉ. चित्रा चतुर्वेदी, राम का मनस्ताप - डॉ. एम.एल.खरे, स्वयं धरित्री ही थी - रमाकान्त श्रीवास्तव, मर्यादा पुरुषोत्तम - डॉ. कृष्णगोपाल मिश्र, कैकेयी के राम -जयसिंह व्यथित, महाकाव्य कैकेयी - डॉ. इंदु सक्सेना, महारानी कैकेयी -पं. रामकिंकर उपाध्याय आदि में राम कथा संबंधी 'नवता' मत वैभिन्नय से युक्त है। इस कृति में डॉ. साहू प्रणीत महाकाव्य 'सीता' को लेकर लेखक ने तर्क सम्मत विमर्श किया है।  कृत्रिम बुद्धि जैसे सामयिक विषय पर हिन्दी में बहुत कम लिखा गया है। लेखक की परिपक्व कलम विविध तकनीकी और वैज्ञानिक विषयों पर लेखन कर हिन्दी वांगमय को समृद्ध कर सकती है। 

                    'प्रवासी साहित्य' शीर्षक के अंतर्गत अमेरिका-आस्ट्रेलियन संस्कृति, आस्ट्रेलिया की लोक भाषाओं, आस्ट्रेलिया में भारतीय-आस्ट्रेलियन महिलाओं, आस्ट्रेलिया में शिक्षा और धर्म, भारत वंशियों पर हमले और पहचान का संकट जैसे विचारोत्तेजक विषयों पर संयमित-गंभीर विमर्श सर्वोपायोगी है। 'चर्च और नास्तिकता में संघर्ष', 'कांट और सार्त्र' पर जितनी चर्चा की जाए, काम है किन्तु लेखक ने गागर में सागर संहित कर दिया है। आस्ट्रेलिया जाने के इच्छुक पर्यटकों को आस्ट्रेलिया जाने के पहले हरिहर जी द्वारा लिखे गए आलेख पढ़ना चाहिए। इन्हें भारतव आस्ट्रेलिया की सरकारॉन/दूतावासों द्वारा पर्यटकों को उपलब्ध कराया जाना चाहिए। 

                    'आलेख' शीर्षक में समाहित  कबीर, तुलसी, कुँवर नारायण जैसे प्रेरक व्यक्तित्वों के साथ जीवन मूल्यों, पुरुषार्थ, कानून, न्याय, बैंकिंग, कृत्रिम बुद्धि, राजधर्म, भाषाई विवाद आदि विषयों पर स्वस्थ्य चिंतनपरक लोकोपयोगी सामग्री प्रस्तुत करते हैं। समकालीन जीवन मूल्यों तथा चार पुरुषार्थ जैसे लेख नव पीढ़ी ही नहीं वार्धक्य की ओर कदम बढ़ा रहे पाठकों के लिए भी उपयोगी है। हरिहर झा जी विषयों अपर विचार अभिव्यक्त करते समय आक्रामक नहीं होते, वे पूरी सह्रदयता के साथ सरल-सहज प्रसाद गुण संपन्न शैली में जटिल और कठिन विषयों पर इस तरह बात कहते हैं कि असहमति को भी सद्भाव पूर्वक विचारकरना रुचिकर लगे। 

                    संस्मरण तथा रेखाचित्र अपेक्षाकृत कम चर्चित विधाएँ हैं किन्तु हरिहर झा जी ने इन दोनों विधाओं को समृद्ध करते हुए व्यंग्य लेख भी कृति में सम्मिलित की है। व्यंग्य लेखों की भाषा चुटीली और सरस है।  समीक्षाएँ, भूमिकाएँ, रिपोर्ताज तथा यात्रा संस्मरण सममूलित करने से कृति समृद्ध हुई है। हरिहर झा जी की यह कृति समय साक्षी बनते हुए तीन पीढ़ियों को एक साथ बाँधती है। हिन्दी के सजग पाठकों को चिंतन-मनन के लिए बहुविषयी सामग्री लिए 'दृष्टि' उनकी दृष्टि की समर्थ्य बढ़ाने में सक्षम है। एक उत्तम कृति प्रस्तुत करने के लिए लेखक को साधुवाद दिया ही जाना चाहिए। दृष्टि को पढ़ने के बाद आस्ट्रेलिया घूमने का मन बनना स्वाभाविक है। भाई हरिहर झा ने इस कृति के माध्यम से एक अभाव की पूर्ति की है। इसका विमोचन/लोकार्पण भारत में आस्ट्रेलिया दूतावास और आस्ट्रेलिया में भारतीय के माध्यम से हो तो बेहतर होगा। दोनों देशों में घनिष्ठ संबंध हैं उन्हें और अधिक निकट करने में ऐसे ग्रंथ सहायक होते हैं। हरिहर झ जी को बहुत बधाई। 
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शुक्रवार, 27 मार्च 2026

पुरोवाक्, दोहा नैवैद्यम्, मनीषा सहाय


पुरोवाक्
''दोहा नैवैद्यम्'' - सम सामयिक दोहों का लोकोपयोगी संकलन 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल '

            उपनिषदों के अनुसार श्रेष्ठ की उत्पत्ति सृष्टि की उत्पत्ति अनाहद नाद से हुई है। विज्ञान का महाविस्फोट सिद्धांत (बिग बैंग थ्योरी) सृष्टि की उत्पत्ति एक बहुत बड़े विस्फोट से हुई मानती है। नाद से उत्पन्न हुई सृष्टि पर सर्वत्र ध्वनि होना स्वाभाविक है। इसीलिए कहा गया छंद वह है जो सर्वत्र छा जाता है। छंद को वेदों का पाद या चरण भी कहा गया है। इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि चरण का महत्व शीश से कम है, छंद को वेद का चरण कहने का आशय यह है कि जिस तरह मंदिर में देवता से साक्षात्कार करने के लिए चरणों की सहायता से एक-एक कदम रख कर जाया जाता है, वैसे ही वेदों में अंतर्निहित ज्ञान की प्राप्ति के लिए छंद का आश्रय लेना अत्यावश्यक है। वेदों की ऋचाएँ छंदों में ही लिखी गई हैं और छंद ज्ञान के बिना उन्हें समझना संभव नहीं है।

            आदि मानव ने प्रकृति के संसर्ग में ज्ञान प्राप्त किया। पवन प्रवाह की सनसन, जल प्रवाह की कलकल, मेघ का गरजना, बिजली का तड़कना, सिंह की दहाड़, सर्प की फुंफकार इत्यादि ध्वनियाँ आदि मानव ने अपने स्मृति कोष में संचित कीं और उनका उच्चारण कर अपने अन्य समूहों को सूचित कर सतर्क करने का प्रयास किया। यह उसे प्रकार था जैसे आज भी बंदर आदि जीव शेर को देखते ही हूप की ध्वनि कर अन्य पशु-पक्षियों को सूचित कर देते हैं ताकि वे अपना बचाव कर सकें। ध्वनियों में अंतर्निहित आरोहों-अवरोहों की पुनरावृत्ति से छंदों की रचना हुई।भुजंग प्रयात छंद सर्प की फुंफकार पर ही आधारित है। कुंडलिया छंद का कुंडली मारकर बैठे हुए सर्प से सादृष्य सहज दृष्टव्य है। स्पष्ट है कि छंद का जन्म आउए विकास प्रकृति और ध्वनि के संगम से ही हुआ है। आदि मानव ने प्रकृति में व्याप्त ध्वनियों का अनुसरण कर बोलना सीखा। एकाधिक ध्वनियों के संयुक्त उच्चारण से लय खंड बने जिनमें गति-यति भी थी। कई ध्वनियों अर्थात उच्चारों को एक साथ बोलने से क्रमश: शब्द और वाक्य अस्तित्व में आए। मातें शिशुओं को बहलाने के लिए पहले निरर्थक और फिर सार्थक ध्वनियों का गायन कर, छंद रचने लगीं। रात्रि के सन्नाटे और अँधेरे में एकाकीपन को दूर करने के लिए गुनगुनाने-गाने का चलन हुआ।

            किसी आदि मानव ने नदी के किनारे खेल-खेल में रेत पर कुछ आकृति बनाई, किसी अन्य ने किसी पौधे की टहनी तोड़कर उससे बहते द्रव को चट्टानों पर लगाया द्रव सूखने पर कुछ आकृति दिखी। आस-पास घट रही घटनाओं के शैल चित्र इसी तरह बनाए गए। क्रमश: ध्वनियों (उच्चारों) के लिए संकेत लिखे गए और तब लिपि ने जन्म लिया। स्पष्ट है कि छंद का अस्तित्व लेखन के पहले भी था। इस काल में जब तक अक्षर (वर्ण) लिखा ही नहीं गया था तो वर्ण अथवा मात्रा की गणना कैसे हो सकती थी? अतः यह समझ लिया जाना चाहिए कि छंद मूलतः ध्वनि (उच्चार) पर आधारित अर्थात वाचिक होता है। मनुष्य ने लिपि का आविष्कार किया लेकिन अन्य जीव-जंतु ध्वनि के आधार पर ही अब तक संवाद करते हैं। वाक् को लिपि का विकास होने के बाद लिखा जाने लगा और तब उसके वर्ण और मात्रा की गणना क्रमशः प्रारंभ हुई। अतः, यह अवधारणा की छंद के दो प्रकार वार्निक और मात्रिक हैं, तथ्यात्मक रूप से गलत है। छंद मूलतः वाचिक होता है जिसके दो अंग वर्ण और मात्रा हैं।

            दोहा हिंदी का सर्वकालिक सर्वाधिक लोकप्रिय छंद है। सैकड़ो वर्षों से अपभ्रंश, पाली, प्राकृत, अंगिका, बज़्जि,का संस्कृत इत्यादि भाषाओं में दोहा लिखा जाता रहा। दोहे का उद्भव लोक में हुआ, खेतों में, खलिहानों में पनघटों में, दोहे का प्रयोग होता रहा। कबीर, मीरा, रैदास आदि अनेक संत कवियों ने जो कि निरक्षर थे, दोहे का सृजन किया। यह दोहे लय साधते हुए, उच्चार के आधार पर ही लिकहे गए थे। तुलसी जैसे संत कवियों ने सुशिक्षित होते हुए भी प्रभु के प्रेम में मग्न होकर लयात्मक रूप से गुनगुनाते हुए काव्य रचा। आज के नौसिखिया रचनाकार जब इन कालजयी कवियों के कालजयी साहित्य को वर्ण और मात्रा के आधार पर दोषपूर्ण बताते हैं तो उनकी तथाकथित बुद्धिमत्ता पर तरस आता है। संवत १६७७ में अपभ्रंश में रचित 'ढोला-मारू दा दूहा' में सरस्वती वंदना दोहा में ही लिखी गई-

सकल सुरासुर सामिनी, सुण माता सरसत्ति।
विनय करूँ इ वीणवुं, मुझ तउ अविरल मत्ति।।

            दोहा छंद में दो कि प्रधानता पर दोहा के विविध नाम दुषअह, दूहा, दोहड़ा, दोग्कध, दोपदी, द्विपथक, दोहक आदि विविध देश-कालों में प्रचलित हुए। दोहा में पंक्ति संख्या दो, प्रत्येक पंक्ति में विषम चरण दो, सम चरण दो, विषम चरण के आरंभ में समान उच्चारक काल दो,सम चरण के अंत में उच्चार काल २ सहज ही देखे जा सकते हैं। दोहा भारत कि हर भाषा-बोली में कहा गया छंद है।

            हिंदी की सक्रिय, सजग, प्रतिभावान कवियत्री मनीषा सहाय 'सुमन' ने ''दोहा नैवेद्यम्'' नाम से अपना दोहा संग्रह तैयार किया है, यह अत्यंत प्रसन्नता और हर्ष का विषय है। मनीषा प्रतिभावान रचनाकार हैं। उन्होंने ६५ अध्यायों में विविध विषयों पर दोहे संग्रहित किए हैं जिनमें भारत, श्री राम, गाँधी विचार, हिंदी, संविधान, ग्रंथों और शहरों पर आधारित दोहे विशेष हैं। मनीषा को मानवीय व्यवहार, पर्यावरण सुधार, पर्व और त्योहार, अलंकार, वानस्पतिक संसार, अंतर्जालिक नवाचार आदि विषय प्रिय हैं। वे दोहों का सृजन करते समय भाषिक सरलता, सुबोधता, सहजता और लय-बद्धता के तत्वों को साध पाती हैं। देश का गौरव उन्हें सृजन के लिए प्रेरित करता है-

गौरव भारत का बढ़े, सजे देश का भाल।
सदा सतत आगे बढ़े, रहें सभी खुशहाल।।

            'सर्वे भवंतु सुखिनः सर्वे संतु निरामय' के सनातन आदर्श को दोहे में मनीषा ने व्यक्त किया है। मनीषा कलम की शक्ति को पहचानती हैं। वह लिखती हैं-

कलम बड़ी तलवार से, करती गहरे वार।
सोच-समझकर यह चले, फिर बदले संसार।।

            कलम से संसार बदलने का कार्य सत्साहित्य के माध्यम से ही संभव होता है। राष्ट्रीय ध्वज हमारी गर्व का प्रतीक है। मनीषा लिखती हैं-

हाथ तिरंगा थाम कर, चलते सीना तान।
डर चिंता से दूर हो, मंजिल हो आसान।।

            मानवीय जीवन में हर्ष, हुलास, उल्लास, श्रृंगार का अपना महत्व है। हमारे पर्व और त्योहार इन्हीं भावनाओं को व्यक्त करते हैं। मनीषा बिहार की पुत्री हैं। बिहार के सबसे बड़े पर्व छठ को भूल नहीं सकतीं-

छट की महिमा है बड़ी, पूज जग संसार।
सूर्य देव संसार के, एक प्रबल आधार।।

            बिहार में दिनकर पूजन की परंपरा तो है ही, दिनकर बिहार के एक बहुत बड़े राष्ट्रीय कवि भी हुए हैं। हिंदी भाषा के प्रति मनीषा का प्रेम सराहनीय है-

हिंदी भाषा सरल हो, विपुल शब्द भंडार।
भारत को यह जोड़ती, करती सबसे प्यार।।

            वर्तमान में तो हिंदी भारत ही नहीं विश्व के विभिन्न भागों में बोली जा रही है और उन्हें भी जोड़ रही है। भारत का संविधान विश्व का सबसे बड़ा और सर्वोपायोगी संविधान है। यह एक विडंबना है कि जिस संविधान को ३८९ सदस्यी, ८ समितियों (संचालन समिति अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद, प्रक्रिया नियम समिति डॉ. राजेंद्र प्रसाद, संघ शक्ति समिति अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू, संघीय संविधान समिति अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू, राज्य-समझौता समिति अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू, प्रांतीय संविधान समिति अध्यक्ष सरदार वल्लभभाई पटेल, मौलिक अधिकार व अल्प संखयक सलाहकार समिति अध्यक्ष सरदार वल्लभभाई पटेल तथा प्रारूप समिति अध्यक्ष डॉ. बी.आर. अंबेडकर, संपूर्ण संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद) उसके निर्माण का श्रेय केवल एक समिति अध्यक्ष को दिया जा रहा है। इस विसंगति को मनीषा ने एक दोहे में व्यक्त किया है-

संविधान अध्यक्ष थे, श्री राजेंद्र प्रसाद।
जनक हुए अंबेडकर यह कैसा अपवाद।।

            दोहा ४८ उच्चारों (२ x २४) का छंद है जिसकी हर पंक्ति में १३ + ११ उच्चार होते हैं। हर चरण में १-१ लघु उच्चार अनिवार्य हैं, शेष ४४ उच्चारों के आधार पर दोहे में लघु-गुरु उच्चार संख्या के आधार पर २३ निम्न प्रकार बताए गए हैं- भ्रमर, सुभ्रमर, शरभ, श्येन, मण्डूक, मर्कट, करभ, नर, हंस, गयंद, पयोधर, बल, पान, त्रिकल, कच्छप, मच्छ, शार्दूल, अहिवर, व्याल, विडाल, उदर, श्वान तथा सर्प।

            दोहा के सम (दूसरे तथा चौथे) चरणों में गुरु-लघु उच्चार होना अनिवार्य है। दोहे के विषम (पहले-तीसरे) चरणों में, केवल पहले चरण में एवं केवल तीसरे चरण के अंत में गुरु-लघु उच्चारण का प्रयोग कर ३ प्रकार के दोहे लिखे जा सकते हैं।

            हिन्दी में मान्य ११ रसों (श्रृंगार रस, हास्य रस, करुण रस, वीर रस, रौद्र रस, भयानक रस, वीभत्स रस, अद्भुत रस, शान्त रस, वात्सल्य रस और भक्ति रस) के आधार पर ११ प्रकार के दोहे लिखे जाते रहे हैं।

            विश्व वाणी हिन्दी संस्थान अभियान जबलपुर तथा समन्वय प्रकाशन जबलपुर के तत्वावधान में उक्त सबही प्रकार के दोहों को समाविष्ट करते हुए वर्ष २०१८ में दोहा दोहा नर्मदा , दोहा सलिल निर्मला तथा दोहा दिव्य दिनेश ३ साझा संकलन प्रकाशित किए गए हैं। इनमें से प्रत्येक में ११-११ दोहाकारों के १००-१०० दोहों के साथ कुल मिलकर ३८०० दोहे, दोहों का इतिहास, गत २००० वर्षों के प्रतिनिधि दोहे, विविध भाषाओं-बोलिओं व रसों में कहे गए दोहे प्रकाशित हैं।

            मनीषा ने उक्त सभी प्रकारों के दोहे कहे हैं। इससे उनकी सृजन सामर्थ्य का परिचय मिलता है। मनीषा अपने साहित्य को उपनाम सुमन के अनुसार सु-मन से यह दोहा संकलन इष्टदेव श्री चित्रगुप्त जी को समर्पित कर रही हैं, मुझे विश्वास है उनका यह संकलन पाठकों को पसंद आएगा और अनेक कृतियाँ रच चुकी मनीषा की रचना यात्रा निरंतर जारी रहेगी। अनंत शुभकामनाएँ। 

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गुरुवार, 4 दिसंबर 2025

पुरोवाक्, समीक्षा, मनीषा सहाय, सुरेन्द्र नाथ सक्सेना

पुरोवाक्
''विष-बाण'' देशभक्ति भावधारा का प्राण 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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            भारत के जन-जीवन, संस्कृति और सभ्यता में राष्ट्र को देवता माना गया है। विश्व गुरु भारत में देश को 'माँ' कहा गया है जबकि शेष अधिकांश देशों में 'पिता' माना गया है। माँ के गर्भधारण के साथ एक शिशु 'माँ' से जुड़ जाता है और माँ की हर अनुभूति को खुद भी अनुभव करता है जबकि पिता के साथ जुड़ाव जन्म लेने के पश्चात ही हो पाता है। भारत की संतानों का भारत 'माँ' के साथ ऐसा ही अभिन्न जुड़ाव होना स्वाभाविक है। माँ संकट में हो तो संतान उसकी पीड़ा दूर करने के जी-जान से प्रयास करता है, यहाँ तक की खुद अपनी जान हथेली पर लेकर माँ के श्री चरणों पर अर्पित कर देता है। भारत माँ की आन-बान-शान, महिमा, गौरव, सौंदर्य आदि तथा उस पर कुर्बान होनेवाले रण-बाँकुरे पुत्रों-पुत्रियों का गौरव गान करने की सनातन परंपरा भारत में रही है। 
            
            मानव सभ्यता के जन्म के साथ ही जन्म-भूमि से जुड़ाव और जन्म भूमि की रक्षा के लिए संघर्ष करने की प्रवृत्ति की भावधारा निरंतर विकसित होती रही है। भाषा के व्याकरण, पिंगल और लिपि के विकास के पूर्व से लोक में 'मातृ-देवता' और 'मातृ-भूमि' की संकल्पना रही है। 'पंच मातृकाओं', सप्त मातृकाओं की अवधारणा पहले लोक में ही विकसित हुई। 'माँ' से शिशु पोषित होता है इसलिए मनुष्य के पोषण के लिए जिन तत्वों को अपरिहार्य पाया गया, उन सबको लोक ने मातृवत ही नहीं मातृ  ही माँ लिया। इसीलिए लोक में जन्मदात्री, धाय, विमाता, धरती, गौ, नदी, वाक् अथवा वाग्देवी, समृद्धिदात्री लक्ष्मी, शक्तिदात्री शिवा आदि को माता कहा गया। मातृ-भाव का विकास अनिष्टकारिणी शक्तियों तक हुआ और शीतल माता आदि के रूप में महामारियों को भी माता मानकर पूजा गया ताकि में संतान के प्रति ममत्व भाव रखकर अनिष्ट न करें। इस चिंतन-धारा ने आपात-काल में मानव को धैर्य, सहिष्णुता, सद्भाव और सहयोग भाव के साथ मिलकर जूझने और उबरने का सामर्थ्य दिया जबकि कोरोना काल में इस भाव की अनुपस्थिति ने जन सामान्य को कातर, असहाय और भीरु बना दिया। लोक ने मातृभूमि के प्रति आभार व्यक्त करते हुए लोक काव्य में राष्ट्रीय भावधारा को सतत विकसित और समृद्ध किया। लोक काव्य  सीधे जनता से जुड़ता है और राष्ट्रीय चेतना, प्रेम, बलिदान और गौरव की भावना को सरल और प्रभावी ढंग से व्यक्त करता है। 

            भाषा और नागर सभ्यता के विकास के साथ लोक में पली-बढ़ी राष्ट्रीय काव्य-धारा का व्यवस्थित विकास एक महत्वपूर्ण साहित्यिक और ऐतिहासिक प्रक्रिया रही है जो विविध कालों में भारत भूमि पर विदेशी आक्रमणों के समय देशवासियों के मनोबल बढ़ाने, शौर्य जगाने और आत्माहुति हेतु तत्पर युवाओं को संघर्ष करने हेतु आत्म-बल दे सकी। आधुनिक काल में भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान राष्ट्रीय काव्य-धाराअपने चरम पर पहुँची । इस भावधारा ने कवियों को देश प्रेम, सांस्कृतिक गौरव, बलिदान और एकता की भावना को अपनी रचनाओं के माध्यम से व्यक्त करने के लिए प्रेरित किया। इस राष्ट्रीय भावधारा की मुख्य विशेषताएँ देश प्रेम और बलिदान भाव, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक गौरव गान, भारत के गौरवशाली इतिहास और वीर योद्धाओं का गुणगान, जनजागरण और एकतापरक जनगान और आह्वान गीत, आक्रान्ताओं-आतंकियों तथा साम्राज्यवाद विरोधी तथा आदर्शवाद रहे हैं। भारत के दार्शनिक ऋषि-मुनियों ने देश हेतु संघर्षरत योद्धाओं को 'सुर', 'देव' आदि तथा आक्रमणकारियों को 'असुर', 'दैत्य' आदि के रूप में चित्रित किया। असुरों की संहारिणी शक्ति को मातृ-शक्ति के रूप में निरंतर पूजा गया। 

            हिंदी के विकास के साथ राष्ट्रीय भावधारापरक साहित्य सृजन की उदात्त परंपरा सतत पुष्ट होती गई। आदिकाल को वीरगाथाओं के विपुल सृजन के कारण 'वीरगाथा काल' के रूप में नामित किया गया। भक्ति काल में न्याय के पक्ष में संघर्षरत स्थानीय शक्तियों को देव और अन्याय कर रही शक्तियों को राक्षस कहते हुए देवों के पराक्रम और शौर्य का गायन किया गया। सम-सामयिक आक्रान्ताओं के नाश हेतु दैवीय शक्तियों से याचना-प्रार्थना आदि के रूप में राष्ट्रीय-काव्य का नव रूप सामने आया। शिव, दुर्गा, राम और कृष्ण भक्ति काल में राष्ट्रीय नायकों के रूप में अपने भक्तों सहित पूजित हुए। रीतिकाल में कला और शृंगार की प्रधानता होते हुए भी रानी दुर्गावती, राणा प्रताप, चाँद बीबी, छत्रपति शिवाजी, छत्रसाल बुंदेला आदि के संघर्ष और त्याग-बलिदान का गुणगान, आक्रांता यवनों के अत्याचारों का विरोध आदि के रूप राष्ट्रीय काव्यधारा भी पुष्ट होती रही। अंग्रेज शासन-काल में उसने जूझनेवाले बुंदेला क्रांतिकारी, रानी लक्ष्मीबाई, गोड़ राजा शंकरशाह व उनके पुत्र रघुनाथ शाह, कुँवर सिंह, नाना साहब, तात्या टोपे, क्रांतिकारी भगवती चरण वोहरा व उनकी पत्नी दुर्गा भाभी, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल, रास बिहारी बोस, सुभाष चंद्र बोस आदि तथा उनके वीरोचित कार्य राष्ट्रीय काव्य धारा के केंद्र में रहे। स्वाधीनता हेतु संघर्षरत अहिंसक राष्ट्र नायकों भीखाजी कामा, लाल-बाल-पाल, राजा, राम मोहन राय, म. गाँधी, सरोजिनी नायडू, जवाहर लाल नेहरू, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, महर्षि अरविंद घोष, मौलाना आजाद आदि, सत्याग्रह आंदोलनों आदि को केंद्र में रखकर राष्ट्रीय काव्यधारा समय साक्षी हुई।

            स्वतंत्रता पश्चात हिंदी काव्य में राष्ट्रीय चेतना सतत विकसित होती रही। भारत माता, तिरंगा, क्रांतिकारियों, शहीदों सत्याग्राहियों, राष्ट्र निर्माताओं व सेनाओं का गौरव-गान, जनाकांक्षाओं व लोकमत की अभिव्यक्ति, नए तीर्थों (बाँध, कारखानों आदि), कृषि, राष्ट्रीय प्रतीकों-भाषाओं आदि का महिमा गायन, राष्ट्र के नव निर्माण हेतु आह्वान गान, जनगीत आदि आयाम राष्ट्रीय चेतना के पर्याय बनते गए। विडंबन है कि अपनी उदार व सर्व समावेशी नीति के बाद भी भारत को पड़ोसियों की कुदृष्टि का शिकार होकर आक्रमणों का सामना करने की विवशतावश हथियार थमने पड़े। इस स्थिति में आक्रामकों की निंदा, राष्ट्रीय अस्मिता की रक्ष हेतु जन जागरूकता, सैनिकों की कीर्ति-कथा गायन आदि भी राष्ट्रीय चेतना के अंग हो गए। चीन तथा पाकिस्तान के हमलों के विरोध में देश का है साहित्यकार सेनाओं के मनोबल बढ़ाने, जन-गण में चेतन जगाने, सरकार के हाथ मजबूत करने के लिए 'कल'म को मिसाइल के तरह थामकर शत्रुओं पर शब्द-बाण संधान करने हेतु सन्नद्ध हो गया। हिंदी के श्रेष्ठ-ज्येष्ठ कवि डॉ. सुरेन्द्रनाथ सक्सेना ने ''विष-बाण'' सुदीर्घ काव्य की रचना २ सर्गों, ९४ चतुष्पदियों में करते हुए वीर सैनकों के प्रति काव्यांजली समर्पित की। २१ मार्च १९६३ से १५ फरवरी १०६४ की कालावधि में लिखी गई यह वीर-गाथा किसी एक सेनानी के प्रति न लिखी जाकर देश के सैन्य-बल को नायक मानकर लिखी गई है। 

               सरहद पर अपनी जान हथेली पर लिए अहर्निश जाग रहे सैनिक तथा उसके आयुधों की मान-वंदना करते हुए कवि कहता है- 

जय हो उस मस्तक की, जो कट गया किंतु जो झुका नहीं 
जय हो उस उन्मुक्त चरण की, गिरा किंतु जो रुका नहीं 
जय हो उन हाथों की, जिनने कोटि-कोटि है वार किया
जय हो उन तोपों-गोलों की जिनने कोटि-कोटि है वार किया

जय हो उस अदम्य साहस की, रण में भी जो डिगा नहीं  
जय हो उस नर-नाहर की, जो रण-स्थल तज हटा नहीं 
उनकी ही जय के गीतों से, गगन गूँजता नारों से 
गूँज रहा है आज हिमालय, उनकी जय-जयकारों से 

            सीमा पर हमला कर रहे चीन के नेता द्वय चाउ एन लाई तथा माओ त्से तुंग को कवि विश्व के मिट्टी में मिल चुके तानाशाहों में शुमार कर, लानत भेजते हुए चेताता है- 

सँभलो ए दगाबाज! धोखेबाजों! धरती के गद्दारों!
चेतो चाऊ-माऊ युग-युग के, छद्मवेशी नर! मक्कारों!  
धरती की छाती चीर दिखा दूँगा सो रहे सिकंदर को 
ले विश्व विजय की ध्वस्त कामना, मिले खाक में हिटलर को 

यह बोनापार्ट नया देखो आ गया तुम्हारे ही पथ पर
होने दो दफन इसे भी तो, अपनी श्रेणी में इधर-उधर 

            महाकाल मृत्युंजय सदा शिव तथा आदिशक्ति चंडिका का आह्वान करता कवि पुन: तांडव करने की प्रार्थना करता है। भारतीय सेना के रणबाँकुरों से शत्रु को माटी में मिलाने की अपेक्षा करता है- 

लेना बहादूरों एक-एक दुश्मन को चुन-चुनकर लेना 
पापी शत्रु की छाती में, गहरी तलवार घुसा देना
जिन आँखों ने लिप्सा-दृष्टि डाली है इस धरती पर 
पिघला शीशा भरकर उनमें, धरती में उन्हें सुला देना 

            आतताई चीन को आईना दिखाता कवि भारत के के-एक सैनिक के साथ दस-दस सैनिकों को लड़ाने की नीति पर कटाक्ष करता है -

ओ मार्क्सवाद के अंधभक्त! यह रण-कौशल किससे सीखा?
इंसान चीन में होते हैं, या मात्र भेड़ रण-भयभीता?
ये बलि के बकरे काट-काट क्यों व्यर्थ समय को खोता है?
अत्याचारों का घट भरकर क्यों बोझ पाप का ढोता है?

            चीन द्वारा वादा-खिलाफी और विश्वासघात पर शब्दाघात करने के साथ कवि उसे भारत से मिली बौद्ध धर्म की विरासत तथा व्हेनसांग की परंपरा याद दिलाते हुए युद्धों से आसन्न विश्व के विनाश के खतरे के प्रति सजग करता है। 

अणु के विस्फोटों से पहले, फूटेगा यह मानस कराल 
जलने से पहले अखिल विश्व, धधकेगा यह गिरिवर विशाल 

            दुर्भाग्यवश युद्ध में मिली पराजय से निराश न होकर कवि नए संकल्प के साथ कृष्ण से मिले गीता-ज्ञान को हृदयंगम कर, इतिहास हो चुके बलिदानी-पराक्रमी भारतीय महावीरों के बल-विक्रम को याद कर एक ओर देश के जन-मानस में नव आशा, विश्वास और पुन: उठ खड़े होकर आगे बढ़ने काअ भाव जगाता है दूसरी ओर विश्व शक्तियों को उनके दायित्व की याद और पड़ोसी पाकिस्तान को चीन के साथ गलबहियाँ करने पर लताड़ता है। कवि सर्गांत में यह प्रश्न पूछता है की मानव मात्र का कल्याण युद्ध या शांति किसमें है, महाशक्तियाँ इस पर विचार कर अपना आचरण बदलें और दायित्व का निर्वहन करें। 

            द्वितीय सर्ग में पाकिस्तान द्वारा कच्छ के रन में पाकिस्तान द्वारा किए गए आक्रमण के प्रतिकार में कवि दोनों देशों की नीतियों, आदर्शों और आचरण में अंतर को इंगित करता है- 

यह पाकिस्तान और भारत का युद्ध मात्र ही नहीं रहा 
इतिहास साक्षी है हमने रण की पुकार को नहीं सहा 
हमने न सिकंदर उपजाए जो लौट जाए मुँह की खाकर 

            पाकिस्तान में सेना के दबदबे और उसकी अमेरिका-परस्ती पर कटाक्ष कर कवि उसे आईना दिखाता है- 

लाहौर बेच डाला अमरीका के हाथों इन नीचों ने
मुँह बंद कर दिया जनता का जब संगीनों की नोकों से 
तब रावलपिंडी को बेचा चीनी शैतानों के हाथों 
यों पाक नीति के मस्तक पर, नाच रहा चीनी माओ 

            कवि सुरेन्द्र नाथ जी युद्ध-चर्चा तक सीमित नहीं रहते, वे विश्व और मानवता की हित-चिंता करते हुए अतीत और इतिहास के प्रसंगों को इंगित कर उनसे सीख लेने और विश्व-शांति के समक्ष खतरा बन रहे तत्वों का विरोध कर रही शक्तियों से एक साथ मिलने का आह्वान करते हैं- 
 
जो शक्ति गुटों से परे और जिनको स्वतंत्रता प्यारी है
जागे अफ्रीकी-एशियाई, यह घोर घटा घिर आई है 
जम जाए विदेशी चरण नहीं, प्यारे स्वदेश की धरती पर 
जल जाए स्वार्थ के मोह-जाल में पाल स्वयं ही उभर-उभर 

            कवि युग-धर्म के प्रति सचेत करते हुए शांति प्रिय देशों को उनका दायित्व याद दिलाते हुए कृति को युग-बोध का पर्याय बना देता है -

जिन हाथों में है शक्ति और नैतिक बल आत्म-सुरक्षा का 
उन को न किसी का भय-बंधन, उनकी न किसी पर निर्भरता 
क्यों रुके वीरता के बढ़ते पग, किसी अन्य की आशा में 
है व्यर्थ बात करना दुष्टों से, सदा सभ्यतम भाषा में 

            पाकिस्तान द्वारा युद्ध का विस्तार कश्मीर तक किए जाने पर कवि पाकिस्तानी जनता, सैनिकों और नेताओं को याद दिलाता है कि उनकी रगों में बह रहा रक्त किसी ने का नहिं, भारत माता का ही है- 

पूछो हर एक सिपाही से जो खून बह रहा है उसमें 
वह पाकिस्तानी माँ का है या भारत का है रग-रग में?
पूछो हर एक नमाजी से जब वह सजदे में झुकता है 
तब उसकी आँखों के आगे यह कैसा चित्र उभरता है 

            पकिसतान निर्माण की पृष्ठभूमि में भारत के प्रति घृणा को इंगित कर कवि, विश्व और मानवता के कल्याण हेतु पाकिस्तान का भारत में विलय ही एकमात्र समाधान बताता है- 

धो दो आपस का भेदभाव, हम एक राष्ट्र हों बलशाली
फैले सर्वत्र विभा अपनी, जगमग हो अपनी दीवाली 
जय हो जन जीवन की जय हो, विजयी हो जग में जन मानस
हो भारत-पाक संघ निर्मित, हीव फिर से अखंड भारत

            कृति का शीर्षक भले ही 'विष-बाण'' है किंतु समूची कृति में विषैले वर्तमान से आसन्न सर्वनाश की विभीषिका के प्रति चेतावनी देते हुए विश्व और मानव-कल्याण की कामना ही कवि का लक्ष्य है। 

            सुरेन्द्र नाथ जी की भाषा प्रसंगानुकूल, प्रवाहमयी,  सरल, सरस और शब्द-चयन सटीक है। वीर रस और शांति रस प्रधान इस कृति में करुण रस भी यत्र-तत्र है। कवि ने छंद सृजन में विविधता और शिल्प पर कथ्य को वरीयता की राह चुनी है। हिंदी की राष्ट्रीय काव्य धारा में 
''विष-बाण'' देखन में छोटन लगें, घाव करें गंभीर'' की परंपरा का निर्वहन करता है। गागर में सागर की तरह संकेतों में बहुत महत्वपूर्ण और सर्वकालिक मूल्यों की जयकार करता ''विषबाण'' कवि की अभिव्यक्ति सामर्थ्य और सनातन सत्य मूल्य परक चिंतन का दस्तावेज है। 
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गुरुवार, 13 नवंबर 2025

मीना भट्ट, जीवन-धारा, पुरोवाक्

पुरोवाक् 
लोकोपयोगी गीतों की मंजूषा ''जीवन धारा''   
- आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' 
*
                    सनातन सलिला नर्मदा की घाटी आदि काल से साधना भूमि के रूप में प्रसिद्ध है। साधना की यह विरासत अतीत से वर्तमान तक गतिमान है। सर्व हित की साधना केवल आध्यात्मिक व्यक्तित्व ही नहीं करते, सांसारिक व्यक्ति भी सर्व कल्याण की साधना करता है। साहित्य की साधना इसी प्रकार की साधना है। साहित्य वह जिसमें सबका हित समाहित हो। नर्मदा तटीय संस्कारधानी जबलपुर की पुण्य भूमि पर साहित्य सृजन की दिव्य परंपरा चिरकालिक है। संस्कारधानी के समसामयिक साहित्य-साधकों में 'मीना भट्ट' एक ऐसा नाम है जो सत्य-शिव-सुंदर और सत-शिव-सुंदर को साहित्य सृजन का लक्ष्य मानकर, निरंतर सृजन में रत है। सामान्यत: नया साहित्यकार अपने लिखे को ही श्रेष्ठ समझता और आत्म मुग्ध रहता है। अंतर्जाल के विविध समूहों पर अधकचरा साहित्य निरंतर परोसा जा रहा है। मीना जी इस कुप्रवृत्ति का विरोध बोलकर नहीं, निरंतर लिखकर करती हैं। वे लिखने के साथ-साथ निरंतर पढ़ती और समझती हैं। गीत-गजल आदि विधाओं में मीना का रचनाकार कलम उठाने के पहले उसका अध्ययन करता है, निरंतर अभ्यास कर सृजन करता है, जानकारों से विमर्श करता है और अपने लेखन को तराशने के बाद प्रकाशित करता है। संभवत:, इस मनोवृत्ति का कारण मीना जी का विधि और न्याय विभाग से जुड़ा रहना है। मीना जी का एक और वैशिष्ट्य आत्म प्रचार से विमुख रहना और अपने पूर्व पद का अहं न रखना भी है। यह निरासक्त भाव लेखन के विषय और शिल्प के प्रति तटस्थ रहकर उससे संबंधित मौलिक चिंतन करने और उसे रचनाओं में अभिव्यक्त करने में सहायक होता है। ''जीवन धारा'' मीना जी की नवीन काव्य कृति है, जिसमें मीना जी की सुदीर्घ काव्य-सृजन साधना का संस्कार पंक्ति-पंक्ति में प्रतिबिंबित है।

                    जीवन धारा का श्रीगणेश वाग्देवी वंदना से करने की सनातन परंपरा को जीवंत रखते हुए मीना जी उन्हें 'महाबला', 'शत्रुनाशिनी', 'सुलोचना', 'सुमंगला', 'मुक्तिवाहिनी', 'प्रेमदायिनी', 'सुहासिनी', 'श्रीप्रदा', 'प्रशासनी' आदि अपारंपरिक विशेषणों से अभिषिक्त कर, मौलिक चिंतन दृष्टि का परिचय देती हैं। श्रीराम पर केंद्रित रचना में 'गंगा धारे' लिखा जाना मौलिक तो है किंतु लोक में 'गंगा धारे' शिव जी हेतु प्रयुक्त होता है। इसे 'गंग किनारे' लिखना अधिक समीचीन होता। वंदना क्रम में श्री कृष्ण, भारत देश के पश्चात लोक का स्मरण 'प्रेम' भाव को अपनाने के आह्वान से किया जाना द्वेषाधिक्य से ग्रसित इस समय में सर्वथा श्लाघ्य है। जीवन धारा के गीतों में जन सामान्य को जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने, पारस्परिक सद्भाव वृद्धि, सत्कर्म करने की प्रेरणा, राष्ट्र भक्ति, नैतिक मूल्यों की स्थापना तथा पर्यावरण और प्रकृति के प्रति दायित्व बोध के साथ नर-नारी के मध्य स्वस्थ्य पारस्परिक सहयोग भाव की आवश्यकता प्रतिपादित कर मीना जी ने अपने गीतों को केवल वाग्विलास होने से बचाकर, लोकोपयोगी और अनुकरणीय बनाने में सफलता अर्जित की है। गत ७ दशकों में प्रगतिवाद और यथार्थ की दुहाई देकर हिंदी साहित्य में जिस नकारात्मक और द्वेषवर्धक प्रवृत्ति की बढ़ आई है, उसका रचनात्मक प्रतिरोध करते हुए मीना जी ने अपने हर गीत में सकारात्मक और निर्माणात्मक सुरुचि का बीजारोपण किया है। 

                    मानव जीवन में ऋतु परिवर्तन की महती भूमिका है। मीना जी ने मौसमों के अतिरेकी विनाशक परिदृश्य पर मोहक स्वरूप को वरीयता ठीक ही दी है। सावन वर्णन में घोंसले भीगने पर भी पंछी का दाना चुनने आना उसकी जिजीविषा दर्शाता है किंतु चुगने को दाना न मिलना मनुष्यों के कदाचरण का संकेत करता है- 

छोड़ घोंसले भीगे-भीगे, 
पंछी आए आँगन में।
नहीं मिला दान चुगने को,
अब के देखो सावन में।। 

                    हमने बचपन में देखा है कि गरीब से गरीब घर में भी गाय और कुत्ते के लिए रोटी निकली जाती थी, अब संपन्नतम घरों से भी किसी को कुछ नहीं मिलता। मीना जी की खूबी यही है कि वे स्थूल वर्णन न कर परोक्ष संकेत करती हैं, समझनेवाले के लिए इशारा ही काफी होता है। 

                    वर्षा न होने संबंधी गीत में ''रिक्त नेह के घट सारे हैं, / कुटिल मलिनता भरी हुई है। / पत्थर हृदय जमाना सारा, / मानवता भी मरी हुई है।। /  चटक मन नित प्यास तरसे, / सूख हुआ तन भी पंजर है। / तरस रहे वर्षा को हम सब, / मौन मगर बैठ अंबर है।।'' लिखकर गीतकार ने अवर्षा के लिए प्रकृति को दोष न देते हुए मानव में स्नेह के अभाव और मलिनता के आधिक्य को इंगित कर 'वर्षा' को केवल मौसमी बरसात नहीं मानव जीवन में स्नेह की वर्षा के अभाव के रूप में शब्दित किया है, यह श्लेष प्रयोग गीत को चिंतन और चिंता दोनों धरातलों पर प्रतिष्ठित करता है। 

                    लोकतंत्र का आधार हर नागरिक को अपनी  सरकार आप चुनने का संविधान सम्मत मताधिकार है। 'जागो मतदाता, जागो अब' गीत में नागरिकों को उनके गुरुतर दायित्व का बोध कराया गया है। अपने गीतों में मीना जी सरल, सहज, प्रवाहमयी भाषा का उपयोग करते हुए अन्य भाषाओं के शब्दों से परहेज नहीं करतीं। इस गीत में अंग्रेजी भाषा के पोलिंग बूथ, वोटिंग कार्ड शब्दों का प्रयोग उनकी भाषिक उदार दृष्टि का परिचायक है। तद्भव / देशज शब्दों (मनवा, करतार, हिय, टोटा, अँखियाँ, जिया, नैना, डगर, छोरी, भौंरा, करधनिया, इत-उत आदि), उर्दू में व्यवहृत अरबी-फारसी शब्दों (मस्त, तूफान, खुशियाँ, रोशनी आदि), शब्द युग्मों (निशि-वासर, निशि-दिन, दिन-रात, राग-द्वेष, पाप-पुण्य, दीन-दुखी, शीलवंत-गुणवंत, मंदिर-मस्जिद, चंदल-रोली,धूल-धूसरित, राग-रागिनी आदि), तत्सम शब्दों (नवल, हलाहल, मयंक, अनुपम, अंबुज आदि) के साथ अन्य भाषा के शब्दों के देशज रूपों (अंग्रेजी सैंडल - संदल, संस्कृत हट्ट - हाट आदि), शब्द-आवृत्ति (गली-गली, खंड-खंड, निरख-निरख, अंग-अंग आदि)  के साथ बटोही (भोजपुरी), सैंदुर (बुंदेली) आदि शब्दों का सम्यक-सार्थक प्रयोग मीना जी के शब्द-सामर्थ्य का परिचायक है। 

                    इस गीतों में शृंगार (आध्यात्मिक-सांसारिक, मिलन-विरह) , शांत, करुण, भक्ति तथा वीर रस अपनी सरसता के साथ यथास्थान सहभागी होकर संकलन को समृद्ध कर रहे हैं। संकलन का आलंकारिक वैभव रुचिवान पाठक को अनुप्रास, यमक, श्लेष, उपमा, रुपक, अतिशयोक्ति, पुनरावृत्ति आदि अलंकारों की छटा दिखाकर मुग्ध करता है। 

                    मीना जी व्यवसाय से न्यायाधीश रही हैं। स्वाभाविक है कि उन्हें कर्तव्य पालन और अनुशासन प्रिय हों। इस संकलन के माध्यम से केवम मनोरंजन न कार, उन्होंने पाठक के माध्यम से समग्र समाज को जाग्रत कार उसमें कर्तव्य बोध और अनुशासन पालन का पथ शक्कर में लपेटी कुनैन की गोली खिलाने की तरह किया है- 

देता गौरव है अनुशासन, 
देखो अलख जगाएगा। 
अनुशासन के पालन से ही 
युग परिवर्तन आएगा।  

                    इन गीतों की भाषा प्रांजल, प्रवाहमयी, सरस और सुबोध है। मुझे आशा हे नहीं भरोसा भी है कि ये गीत हर आयु वर्ग, क्षेत्र, पंथ और वादाग्रहियों द्वारा सराहे और समझें जाएँगे। लंबे समय बाद साहित्यिक गुणवत्ता युक्त लोकोपयोगी गीत संग्रह की पांडुलिपि का वाचन कर रसानंद में मगन होने का अवसर मिला है। मीना जी साधुवाद की पात्र हैं।  
          
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विचार हेतु 
लक्ष्मी दुर्गावती में काल-क्रम दोष (दुर्गावती पहले हुईं, लक्ष्मीबाई बाद में) 
पाना तुमको लक्ष्य अगर तो / निशि-वासर चलते रहिए  - तुम के साथ रहो, आप से साथ रहिए?

सोमवार, 22 सितंबर 2025

पुरोवाक्, हिंदी गजल, अर्जुन चव्हाण

पुरोवाक्
''सामयिक वैचारिकी का फेस्ट है''- आप सब दोस्तों से एक रिक्वेस्ट है
आचार्य इं. संजीव वर्मा 'सलिल'
*


            गजल विश्व के साहित्य जगत को भारत भूमि का अनुपम उपहार है। लोक साहित्य में सम तुकांती अथवा समान पदभार की दोपदियों में कथ्य कहने की परिपाटी आदिकाल से रही है। घाघ, भड्डरी जैसे लोक कवियों की कहावतों में समान अथवा भिन्न पदभार तथा समतुकांती एवं विषम तुकांती रचनाएँ सहज प्राप्त हैं।
सम तुकांत, समान पदभार-
शुक्रवार की बादरी, रही सनीचर छाय।
तो यों भाखै भड्डरी, बिन बरसे ना जाय।। 
विषम तुकांत, समान पदभार-
सावन सुक्ला सप्तमी, जो गरजै अधिरात।
बरसै तो झूरा परै, नाहीं समौ सुकाल।।   
सम पदांत, असमान पदभार-
गेहूं गाहा, धान विदाहा।
ऊख गोड़ाई से है आहा।।
ग़ज़ल का जन्म 
            काल क्रम में संस्कृत साहित्य में इस शैली में श्लोक रचे गए। संस्कृत से छंद शास्त्र फारसी भाषा ने ग्रहण किया। द्विपदियों को फारसी में शे'र (बहुवचन अश'आर) कहा गया। फारसी में एक द्विपदी के बाद समान पदांत और समान पदभार की पंक्तियों को संयोजन कर रचना को 'ग़ज़ल' नाम दिया गया। भारत में कविता का उद्गम एक क्रौंच युगल के नर का व्याध के शर से मरण होने पर क्रौंची के करुण विलाप को सुनकर महर्षि वाल्मीक के मुख से नि:सृत पंक्तियों से माना जाता है। फारस में इसकी नकल कर शिकारी के तीर से हिरनी के शावक का वध होने पर हिरनी द्वारा किए विलाप को सुनकर निकली काव्य पंक्तियों से ग़ज़ल की उत्पत्ति मानी गई। संस्कृत काव्य में द्विपदिक श्लोकों की रचना आदि काल से की जाती रही है। ​संस्कृत की श्लोक रचना में समान तथा असमान पदांत-तुकांत दोनों का प्रयोग किया गया। भारत से ईरान होते हुए पाश्चात्य देशों तक शब्दों, भाषा और काव्य की यात्रा असंदिग्ध है। १० वीं सदी में ईरान के फारस प्रान्त में सम पदांती श्लोकों की लय को आधार बनाकर कुछ छंदों के लय खण्डों का फ़ारसीकरण नेत्रांध कवि रौदकी ने किया। इन लय खण्डों के समतुकांती दुहराव से काव्य रचना सरल हो गयी। इन लयखण्डों को रुक्न (बहुवचन अरकान) तथा उनके संयोजन से बने छंदों को 'बह्र' कहा गया। फारस में सामंती काल में '​तश्बीब' (​बादशाहों के मनोरंजन हेतु ​संक्षिप्त प्रेम गीत), 'कसीदे' (रूप/रूपसी ​या बादशाहों की ​की प्रशंसा) तथा ​'गजाला चश्म​'​ (मृगनयनी, महबूबा, माशूका) से वार्तालाप ​के रूप में ​ग़ज़ल लोकप्रिय हुई​। भारत में द्विपदियों में पदभार के अंतर पर आधारित अनेक छंद (दोहा, चौपाई, सोरठा, रोला, आल्हा आदि) रचे गए। फारसी में छंदों की लय का अनुकरण और फारसीकरण कर बह्रें बनाई गईं। कहते हैं इतिहास स्वयं को दुहराता है, साहित्य में भी यही हुआ। भारत से द्विपदियाँ ग्रहण कर फारस ने ग़ज़ल के रूप में भारत को लौटाई। फारसी और पश्चिमी सीमांत प्रदेशों की भाषाओं के सम्मिश्रण से क्रमश: लश्करी, रेख्ता, दहलवी, हिंदवी और उर्दू का विकास हुआ। खुसरो, कबीर जैसे रचनाकारों ने हिंदी ग़ज़ल को जन्म दिया। फारसी में 'गजाला चश्म' (मृगनयनी) के रूप की प्रशंसा और आशिको-माशूक की गुफ्तगू तक सीमित रही ग़ज़ल को हिंदी ने वतन परस्ती, इंसानियत और युगीन विसंगतियों की अभिव्यक्ति के जेवरों से नवाजा। फलत: महलों में कैद रही ग़ज़ल आजाद हवा में साँस ले सकी। उर्दू ग़ज़ल का दम बह्रों की बंदिशों में घुटते देखकर उसे 'कोल्हू का बैल' (आफताब हुसैन अली) और  'तंग गली' (ग़ालिब) के विशेषण दिए गए थे। हिंदी ने ग़ज़ल को आकाश में उड़ान भरने के लिए पंख दिए। 
हिंदी ग़ज़ल
            हिंदी ग़ज़ल को आरंभ में 'बेबह्री' होने का आरोप झेलना पड़ा। खुद को 'दां' समझ रहे उस्तादों ने दुष्यंत कुमार आदि की ग़ज़ल के तेवर को न पहचानते हुए खारिज करने की गुस्ताखी की किंतु वे नादां साबित हुए। वक्त ने गवाही दी कि हिंदी ग़ज़ल फारसी और उर्दू की जमीन से अलग अपनी पहचान आप बन और बना रही थी। हिंदी ग़ज़ल ने मांसल इश्क की जगह आध्यात्मिक प्रेम को दी, नाजनीनों से गुफ्तगू करने की जगह आम आदमी की बात की, 'बह्र' की बाँह में बंद होने की जगह छन्दाकाश् में उड़ान भरी, काफ़ियों में कैद होने की जगह तुकांत और पदांत योजना में नई छूट ली, नए मानक गढ़े हैं। हिंदी ग़ज़ल की मेरी परिभाषा देखिए- 

ब्रम्ह से ब्रम्हांश का संवाद है हिंदी ग़ज़ल।
आत्म की परमात्म से फ़रियाद है हिंदी ग़ज़ल।।
*
मत गज़ाला-चश्म कहना, यह कसीदा भी नहीं।
जनक-जननी छन्द-गण, औलाद है हिंदी ग़ज़ल ।।
*
जड़ जमी गहरी न खारिज़ समय कर सकता इसे
सिया-सत सी सियासत, मर्याद है हिंदी ग़ज़ल ।।
*
भार-पद गणना, पदांतक, अलंकारी योजना
दो पदी मणि माल, वैदिक पाद है हिंदी ग़ज़ल ।।
*
सत्य-शिव-सुन्दर मिले जब, सत्य-चित-आनंद हो
आsत्मिक अनुभूति शाश्वत, नाद है हिंदी ग़ज़ल ।।
*
नहीं आक्रामक, न किञ्चित भीरु है, युग जान ले
प्रात कलरव, नव प्रगति का नाद है हिंदी ग़ज़ल ।।
*
धूल खिलता फूल, वेणी में महकता मोगरा
छवि बसी मन में समाई याद है हिंदी ग़ज़ल ।।
*
धीर धरकर पीर सहती, हर्ष से उन्मत्त न हो
ह्रदय की अनुभूति का, अनुवाद है हिंदी ग़ज़ल ।।
*
मुक्तिका है, तेवरी है, गीतिका है, सजल भी
पूर्णिका अनुभूति से संवाद है हिंदी ग़ज़ल ।।
*
परिश्रम, पाषाण, छेनी, स्वेद गति-यति नर्मदा
युग रचयिता प्रयासों की दाद है हिंदी ग़ज़ल ।।

            हिंदी ग़ज़ल में अनेक प्रयोग किए गए हैं। यह दीवान ''आप सब दोस्तों से यह रिक्वेस्ट है' हिंदी के प्रामाणिक विद्वान शायर प्रो. अर्जुन चव्हाण लिखित १०५ प्रयोगधर्मी ग़ज़लों का महकता हुआ गुलदस्ता है। 'कहते हैं कि ग़ालिब का है अंदाजे-बयां और' की तरह अर्जुन जी का भी अपना बात कहने के तरीका और सलीका है। वे शिल्प पर कथ्य को वरीयता देते हैं। 'या हंसा मोती कहने या भूख मार जाय' अर्जुन जी चुनने की स्वतंत्रता से कोई समझौता नहीं करते। वे हिंदी, संस्कृत, मराठी, फारसी, अंग्रेजी या अन्य भाषाओं के शब्द ग्रहण करने में संकोच नहीं करते। अनुभूति को अभिव्यक्त करने के लिए उन्हें जो शब्द उपयुक्त लगता है, चुन लेते हैं। उनके लिए तत्सम और तद्भव शब्द संपदा सारस्वत निधि है। हिंदी के प्राध्यापक होते हुए भी वे 'भाषिक शुद्धता' के संकीर्ण आग्रह से मुक्त हैं। इसलिए अर्जुन जी की ग़ज़लें आम आदमी की भाषा में आम आदमी से संवाद कर पाती हैं। 

            कम से कम शब्दों में अधिक से अधिक कहने की सामर्थ्य अर्जुन जी के शायर में है। ''ऐसे ही नहीं, अच्छे लोगों की भीड़ चाहिए;  बेरुके खिलाफ खड़े होने को रीढ़ चाहिए'' कहकर वे निष्क्रिय बातूनी आदर्शवादियों को आईना दिखाते हैं। समाज में महापुरुषों का गुणगान करने या उन्हें प्रणाम करने की प्रथा है किंतु उनका अनुकरण करने की प्रवृत्ति बहुत कम है। महान क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी बिरसा मुंडा को समर्पित रचना में अर्जुन जी लिखते हैं- ''वंदन स्मरण नहीं,अनुगमन भी हो 'अर्जुन जी' समाज और देश सेवा की जान बिरसा मुंडा।'' न्याय व्यवस्था की विसंगतियों पर प्रहार करने में अर्जुन जी तनिक भी संकोच नहीं करते- 

भेड़ियों और बकरियों का खेल है; 
टॉस में मगर दोनों ओर टेल है।। 
लोमड़ी की अदालत भेड़िया बरी 
      मेमनों को फांसी, ताउम्र जेल है।।    

            सामाजिक विसंगतियों को इंगित करते हुए अर्जुन जी हँस पर कौए को वरीयता देने की प्रवृत्ति को संकेतित कर प्रश्न करते हैं कि पितृ पक्ष में दशमी के दिन हँस पर कौए को वरीयता क्यों दी जाति है? सवाल है कि अगर कौए को वरीयता देने का कोई कारण है तो उसे हर दिन वरीयता दें, सिर्फ एक दिन क्यों? - 

पिंड छूने के वक्त, दसवें के दिन  में उनको 
हंस से बढ़कर अहम वो काग ही क्यों लगे? 

            समाज में तन को सँवारने और मन की अनदेखी करने की कुप्रवृत्ति पर शब्दाघात करते हुए अर्जुन जी व्यंग्य करते हैं- 

लोग अक्सर तन का करवा लेते हैं 
भूल जाते हैं मन के भी मसाज हैं  

            भारतीय संस्कृति अपने मानवतावादी मूल्यों 'वसुधैव कुटुंबकम्' और 'विश्वैक नीड़म्' के लिए सनातन काल से जानी जाती है। शायर अर्जुन नफरत को बेमानी बताते हुए मानवता की कजबूती की कामना करते हैं- 

दोस्ती के पुल मजबतू सारे चाहिए
दुश्मनी की ध्वस्त सब दीवारें चाहिए

क्या रखा है नफ़रत की ज़िंदगानी में
मानवता की मजबूती के नारे चाहिए 

            समाज में बढ़ती जा रही मानसिक बीमारियों का कारण तनाव को बताते हुए मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि  अपने मन में बच्चे को जिंदा  रखा जाए। अर्जुन जी समस्या और समाधान दोनों को यूं बयान करते हैं- 

जिंदगी में जिंदा अपने अंदर का बच्चा रख  
सब पकाना न समझदारी, कुछ कच्चा रख 
औरों पे उंगली उठाने से कोई सुधरेगा नहीं 
अपने मन का मिजाज  सदा से सच्चा रख 

            लोकतंत्र में हर नागरिक को पहरुआ बनकर गुहार लगाना चाहिए 'जागते रहो', तबही शासन-प्रशासन और न्याय व्यवस्था जागेगी अन्यथा लोकतंत्र का दामन दागदार हो जाएगा। 
 
दान करने, बेच देने का सवाल नहीं 
मताधिकार को गर सयाना वोटर है! 

            अर्जुन जी ज़िंदगी के हर पहलू को जाँचते-परखते हैं और तब विसंगतियों को सुसंगतियों में बदलने के लिए गजल लिखते हैं। गत ७ दशक के हिंदी साहित्य में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा ने समाज में नफरत, अविश्वास, द्वेष, टकराव, बिखराव का अतिरेकी शब्दांकन कर मनुष्य, परिवार, देश और समाज को हानि पहुँचाई है। यही कारण है कि समाज आज भी साहित्य के नाम पर संदेशवाही सकारात्मक रचनाओं को पढ़ता है। सं सामयिक साहित्य के पाठक नगण्य हैं। उपन्यास, कहानी, व्यंग्य लेख, नवगीत, लघुकथा आदि विधाओं में यथार्थवाद के नाम पर विद्रूपताओं को स्थान दिया जा रहा है। अर्जुन जी उद्देश्यपूर्ण, संदेशवाही सकारात्मक साहित्य का सृजनकर कबीर की तरह आईना दिखने के साथ-साथ राह भी दिखा रहे हैं। उनकी लिखी गज़लें इसकी साक्षी हैं। 

  छोड़ देती है आत्मा हमेशा साथ तब 
जिंदगी में जब कभी तनादेश होता है!
० 
किसी से माफी माँग, किसी को माफ़ कर; 
खुशनुमा जिंदगी की कुंजी रखें ढाँक कर! 
घर-आँगन रोज-ब-रोज करते रहते हो 
कभी मन का आँगन भी सारा साफ़ कर!
०  
है ढील या पाबंदी का नतीजा,पर सच है 
बच्चा जहाँ नहीं जाना, वहीं पर जाता है!
० 
साजिश क्यों, कोशिश चाहिए अर्जुन जी 
कामयाबी से वो,जो बेशक मिलाती है!
० 
किसी वृद्धाश्रम की जरूरत नहीं होगी, 
यदि अपने माँ-बाप खुशहाल भाई-भैन चाहते हैं!
० 
सितारा होटल के खाने से बढ़िया 
ठेलेवाले के छोले-भटूरे होते हैं! 
० 
फिर भी नदियाँ साथ में रहती ही हैं 
भले सारे के सारे जो खारे सागर हैं!
० 
दिल में जीत की जबरदस्त चाह चाहिए; 
जद्दोजहद में भी जीने की राह चाहिए!
एक सच याद रखना, सूरज हो या चाँद 
जिस दिन चढ़ता, उसी दिन ढलता है! 
० 
उंगली पकड़ के रखने से काम नहीं होगा 
बच्चे को खुद-ब-खुद चलने दिया जाए!
० 
आप ताउम्र घूमते रहते हैं दुनिया भर में 
नौकर को तनिक तो टहलने दिया जाए!
० 
सिर्फ राजधानी या ख़ास राजमहल की नहीं 
गुलशन की हर डाली फलनी-फूलनी चाहिए!
० 
बड़ों की दुनिया  कुछ और है 'अर्जुन जी' मगर
कौन है,जो फिदा न बच्चों की किलकारी पर!

            'आप सब दोस्तों से एक रिक्वेस्ट है' हिंदी गजल संग्रह की हर गजल गजलकार की ईमानदार सोच, बेलाग साफ़गोई, सबकी भलाई की चाह और निडर अभिव्यक्ति की राह पर कलम को हल की तरह इस्तेमाल कर 'सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय' के सद्भावपरक विचारों और आचारों की फसल उगाने की मनोकामना का प्रमाण है। अपने बात वहीं खत्म करूँ जहाँ से शुरू की थी-

सामयिक वैचारिकी का फेस्ट है
'आप सब दोस्तों से एक रिक्वेस्ट है'
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 दोस्तों की दोस्ती ही बेस्ट है
डिश अनोखी है अनोखा टेस्ट है
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फ्लैट-बंगलों की इसे जरुरत नहीं
रहे दिल में हार्ट इसका नेस्ट है
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एनिमी से लड़े अर्जुन की तरह
वज्र सा स्ट्रांग सचमुच चेस्ट है
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टूट मन पाए नहीं संकट में भी
दोस्ती दिल जोड़ने का पेस्ट है
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प्रोग्रेस इन्वेंशन हिलमिल करे
दोस्ती ही टैक्निक लेटेस्ट है
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जिंदगी की बंदगी है दोस्ती
गॉड गिफ्टेड 'सलिल' यह ही फेस्ट है
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जीव को 'संजीव' करती दोस्ती
कोशिशों का, परिश्रम का क्रेस्ट है
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