शुक्रवार, 12 जनवरी 2018

दोहा दुनिया


शिव से यह संसार है, शिव का यह संसार।
शिव में यह संसार है, शिव अंसार में सार।।
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जीव रूप शिव लिंग हैं, आत्म रूप शिव बिंदु।
देह रूप शिव पिंड हैं, नेह रूप शिव सिंधु।।
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शिव से मोह न कीजिए, शिव से रहें न दूर।
शिव आराधें स्नेह से, शिव चाहें भरपूर।।
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शिव जी शुभ संकल्प हैं, शिव का नहीं विकल्प।
निमिष-निमिष हैं एक शिव, कल्प-कल्प शिव तल्प।।
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शिव भावों से शून्य हैं, शिव ही सारे भाव।
शिव अतिरेकी हैं नहीं, शिव में नहीं अभाव।।
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भावाभाव न शंभु में, शिव थिर शांत स्वभाव।
कोई नहीं जिस पर न शिव, छोड़ें अमिट प्रभाव।।
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सहज सरल शिव मति विमल, शिव कुशाग्र मतिधीर।
परमानंदित शिव रहें, शिव जीतें हर पीर।।
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२२.१.२०१८
सरिता विहार, दिल्ली

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