रविवार, 7 जनवरी 2018

doha gatha 2

Tuesday, December 23, 2008

दोहा गाथा २. ललित छंद दोहा अमर

[आपने पढ़ा- पाठ १, गोष्ठी १, प्रस्तुत है पाथ२, गोष्ठी २] 

ललित छंद दोहा अमर, भारत का सिरमौर.
हिन्दी माँ का लाडला, इस सा छंद न और.


देववाणी संस्कृत तथा लोकभाषा प्राकृत से हिन्दी को गीति काव्य का सारस्वत कोष विरासत में मिला। दोहा विश्ववाणी हिन्दी के काव्यकोश का सर्वाधिक मूल्यवान रत्न है दोहा का उद्गम संस्कृत से ही है। नारद रचित गीत मकरंद में कवि के गुण-धर्म वर्णित करती निम्न पंक्तियाँ वर्तमान दोहे के निकट हैं-

शुचिर्दक्षः शान्तः सुजनः विनतः सूनृत्ततरः.
कलावेदी विद्वानति मृदुपदः काव्य चतुरः.
रसज्ञौ दैवज्ञः सरस हृदयः सतकुलभवः.
शुभाकारश्ददं दो गुण विवेकी सच कविः.


अर्थात-

नम्र निपुण सज्जन विनत, नीतिवान शुचि शांत.
काव्य-चतुर मृदु पद रचें, कहलायें कवि कान्त.
जो रसज्ञ-दैवज्ञ हैं, सरस हृदय सुकुलीन.
गुनी विवेकी कुशल कवि, होता यश न मलीन.


काव्य शास्त्र है पुरातन :


काव्य शास्त्र चिर पुरातन, फिर भी नित्य नवीन.
झूमे-नाचे मुदित मन, ज्यों नागिन सुन बीन.


लगभग ३००० साल प्राचीन भारतीय काव्यशास्त्र के अनुसार काव्य ऐसी रचना है जिसके शब्दों-अर्थों में दोष कदापि न हों, गुण अवश्य हों चाहे अलंकार कहीं-कहीं पर भी न हों। दिग्गज काव्याचार्यों ने काव्य को रमणीय अर्थमय चित्त को लोकोत्तर आनंद देने में समर्थ, रसमय वाक्य, काव्य को शोभा तथा धर्म को अलंकार, रीति (गुणानुकूल शब्द विन्यास/ छंद) को काव्य की आत्मा, वक्रोक्ति को काव्य का जीवन, ध्वनि को काव्य की आत्मा, औचित्यपूर्ण रस-ध्वनिमय, कहा है। काव्य (ग्रन्थ} या कविता (पद्य रचना) श्रोता या पाठक को अलौकिक भावलोक में ले जाकर जिस काव्यानंद की प्रतीति कराती हैं वह वस्तुतः शब्द, अर्थ, रस, अलंकार, रीति, ध्वनि, वक्रोक्ति, वाग्वैदग्ध्य, तथा औचित्य की समन्वित-सम्मिलित अभिव्यक्ति है।

दोहा उतम काव्य है :

दोहा उत्तम काव्य है, देश-काल पर्याय.
राह दिखाता मनुज को, जब वह हो निरुपाय.


आरम्भ में हर काव्य रचना 'दूहा' (दोहा) कही जाती थी१०। फिर संस्कृत के द्विपदीय श्लोकों के आधार पर केवल दो पंक्तियों की काव्य रचना 'दोहड़ा' कही गयी। कालांतर में संस्कृत, पाली, प्राकृत, अपभ्रंश भाषाओं की पूर्वपरता एवं युग्परकता में छंद शास्त्र के साथ-साथ दोहा भी पला-बढ़ा।

दोहा छंद अनूप :

जन-मन-रंजन, भव-बाधा-भंजन, यश-कीर्ति-मंडन, अशुभ विखंडन तथा सर्व शुभ सृजन में दोहा का कोई सानी नहीं है। विश्व-वांग्मय का सर्वाधिक मारक-तारक-सुधारक छंद दोहा छंद शास्त्र की अद्भुत कलात्मक देन है११

नाना भाषा-बोलियाँ, नाना जनगण-भूप.
पंचतत्व सम व्याप्त है, दोहा छंद अनूप.

दोग्ध्क दूहा दूहरा, द्विपदिक दोहअ छंद.
दोहक दूहा दोहरा, दुवअह दे आनंद.

द्विपथा दोहयं दोहडा, द्विपदी दोहड़ नाम.
दुहे दोपदी दूहडा, दोहा ललित ललाम.


दोहा मुक्तक छंद है :

संस्कृत वांग्मय के अनुसार 'दोग्धि चित्तमिति दोग्धकम्' अर्थात जो श्रोता/पाठक के चित्त का दोहन करे वह दोग्धक (दोहा) है किंतु हिन्दी साहित्य का दोहा चित्त का ही नहीं वर्ण्य विषय के सार का भी दोहन करने में समर्थ है१२. दोहा अपने अस्तित्व-काल के प्रारम्भ से ही लोक परम्परा और लोक मानस से संपृक्त रहा है१३. संस्कृत साहित्य में बिना पूर्ववर्ती या परवर्ती प्रसंग के एक ही छंद में पूर्ण अर्थ व चमत्कार प्रगट करनेवाले अनिबद्ध काव्य को मुक्तक कहा गया है- ' मुक्तक श्लोक एवैकश्चमत्कारः क्षमः सतां'. अभिनव गुप्त के शब्दों में 'मुक्ता मन्यते नालिंकित तस्य संज्ञायां कन. तेन स्वतंत्रया परिसमाप्त निराकांक्षार्थमपि, प्रबंधमध्यवर्ती मुक्तक मिनमुच्यते'।

हिन्दी गीति काव्य के अनुसार मुक्तक पूर्ववर्ती या परवर्ती छंद या प्रसंग के बिना चमत्कार या अर्थ की पूर्ण अभिव्यक्ति करनेवाला छंद है। मुक्तक का प्रयोग प्रबंध काव्य के मध्य में भी किया जा सकता है। रामचरित मानस महाकाव्य में चौपाइयों के बीच-बीच में दोहा का प्रयोग मुक्तक छंद के रूप में सर्व ज्ञात है। मुक्तक काव्य के दो भेद १. पाठ्य (एक भावः या अनुभूति की प्रधानता यथा कबीर के दोहे) तथा गेय (रागात्मकता प्रधान यथा तुलसी के दोहे) हैं।

छंद :

अक्षर क्रम संख्या तथा, गति-यति के अनुसार.
छंद सुनिश्चित हो 'सलिल', सही अगर पदभार.


छंद वह सांचा या ढांचा है जिसमें ढलने पर ही शब्द कविता कहलाते हैं। छंद कविता का व्याकरण तथा अविच्छेद्य अंग है। छंद का जन्म एक विशिष्ट क्रम में वर्ण या मात्राओं के नियोजन, गति (लय) तथा यति (विराम) से होता है। वर्णों की पूर्व निश्चित संख्या एवं क्रम, मात्र तथा गति-यति से सम्बद्ध विशिष्ट नियोजित काव्य रचना छंद कहलाती है।

दोहा :

दोहा दो पंक्तियों (पदों) का मुक्तक काव्य है। प्रत्येक पद में २४ मात्राएँ होती हैं। हर पद दो चरणों में विभजित रहता है। विषम (पहले, तीसरे) पद में तेरह तथा सम (दूसरे, चौथे) पद में ग्यारह कलाएँ (मात्राएँ) होना अनिवार्य है।

दोहा और शेर :

दोहा की अपने आप में पूर्ण एवं स्वतंत्र होने की प्रवृत्ति कालांतर में शे'र के रूप में उर्दू काव्य में भिन्न भावः-भूमि में विकसित हुई। दोहा और शे'र दोनों में दो पंक्तियाँ होती हैं, किंतु शे'र में चुलबुलापन होता है तो दोहा में अर्थ गौरव१४। शेर बहर (उर्दू chhand) में कहे जाते हैं जबकि दोहा कहते समय हिन्दी के 'गण' का ध्यान रखना होता है। शे'रों का वज़्न (पदभार) भिन्न हो सकता है किंतु दोहा में हमेशा समान पदभार होता है। शे'र में पद (पंक्ति या मिसरा) का विभाजन नहीं होता जबकि दोहा के दोनों पद दो-दो चरणों में यति (विराम) द्वारा विभक्त होते हैं।

हमने अब तक भाषा, व्याकरण, वर्ण, स्वर, व्यंजन, तथा शब्द को समझने के साथ दोहा की उत्पत्ति लगभग ३००० वर्ष पूर्व संस्कृत, अपभ्रंश व् प्राकृत से होने तथा मुक्तक छंद की जानकारी ली। दोहा में दो पद, चार चरण तथा सम चरणों में १३-१३ और विषम चरणों में ११-११ मात्राएँ होना आवश्यक है। दोहा व शेर के साम्य एवं अन्तर को भी हमने समझा। अगले पाठ में हम छंद के अंगों, प्रकारों, मात्राओं तथा गण की चर्चा करेंगे। तब तक याद रखें-

भाषा-सागर मथ मिला, गीतिकाव्य रस कोष.
समय शंख दोहा करे, सदा सत्य का घोष.

गीति काव्य रस गगन में, दोहा दिव्य दिनेश.
अन्य छंद शशि-तारिका, वे सुर द्विपदि सुरेश.

गौ भाषा को दूह कर, कवि कर अमृत पान.
दोहों का नवनीत तू, पाकर बन रसखान.



सन्दर्भ :
१. तद्दोशौ शब्दार्थो सगुणावनलंकृति पुनः क्वापि -- मम्मट, काव्य प्रकाश,
२. रमणीयार्थ प्रतिपादकः शब्दः काव्यम -- पं. जगन्नाथ,
३. लोकोत्तरानंददाता प्रबंधः काव्यनामभाक -- अम्बिकादत्त व्यास,
४. रसात्मकं वाक्यं काव्यं -- महापात्र विश्वनाथ,
५. काव्यशोभाकरान धर्मान अलंकारान प्रचक्षते -- डंडी, काव्यादर्श,
६. रीतिरात्मा काव्यस्य -- वामन, ९०० ई., काव्यालंकार सूत्र,
७. वक्रोक्तिः काव्य जीवितं -- कुंतक, १००० ई., वक्रोक्ति जीवित,
८. काव्यस्यात्मा ध्वनिरितिः, आनंदवर्धन, ध्वन्यालोक,
९. औचित्यम रस सिद्धस्य स्थिरं काव्यं जीवितं -- क्षेमेन्द्र, ११०० ई., औचित्य विचार चर्चा,
१०. बरजोर सिंह 'सरल', हिन्दी दोहा सार, पृ. ३०,
११. आचार्य पूनम चाँद तिवारी, समीक्षा दृष्टि, पृ. ६४,
१२. डॉ. नागेन्द्र, हिन्दी साहित्य का इतिहास, पृ. ७७,
१३. डॉ. देवेन्द्र शर्मा 'इन्द्र' की भूमिका - शब्दों के संवाद- आचार्य भगवत दुबे,
१४. डॉ. देवेन्द्र शर्मा 'इन्द्र', भूमिका- जैसे, हरेराम 'समीप'.

आपके मन में कोई सवाल हो तो कमेंट (टिप्पणी) द्वारा हमें अवश्य बतायें।
सीमा सचदेव का कहना है कि - सलिल जी यह सब बातें हम भूल चुके थे ,याद कराने का बहुत-बहुत धनयवाद ,पूरा कावय-शासतर याद आ रहा है   December 23, 2008 3:13 PM
बिसर गया जो भूत मे , किया वो दोहा याद
छोटा पाठ पढाईए , है गुरु से फरियाद
दोहा और छ्न्द की महत्त्वपूर्ण जानकारी बहुत अच्छी लग रही है | बस एक निवेदन है - अगर आप एक ही बार मे इतना लम्बा पाठ पढाएँगे , तो आप के नादान शिष्य कैसे सीख पाएँगे |  December 23, 2008 3:22 PM
शोभा का कहना है कि -
बहुत अच्छी और उपयोगी जानकारी दी है। December 23, 2008 4:14 PM
दोहा ने मोहा : आचार्य संजीव 'सलिल' का कहना है कि -
दोहा ने मोहा सलिल, रुद्ध हो गयी धार.
दिल हारे दिल जीतकर, दिल जीते दिल हार.

परिवर्तन नव सृजन का, सत्य मानिये मूल.
जड़ को करता काल ख़ुद, निर्मम हो निर्मूल.

हो निशांत ऊगे नयी, उजली निर्मल भोर.
प्राची से आकर उषा, कहती खुशी अँजोर.

लाल भाल है गाल भी, हुए लाज से लाल.
प्रियतम सूरज ने किया, हाय! हाल बेहाल.

छमछम छमछम नाचती, सूर्य किरण रह मौन.
कलरव करके पूछती, गौरैया तुम कौन?

बरगद बब्बा बांचते, किसका कैसा भाग्य.
जान न पाये कब हुआ, ख़ुद को ही वैराग्य.

पनघट औ' चौपाल से, पूछ रहा खलिहान.
पायल कंगन क्यों गए शहर गाँव वीरान.

हूटर चीखा जोर से, भागे तुरत मजूर.
नागा मत काटें करें हम पर कृपा हजूर.

मालिक थे वे खेत के, पर नौकर हैं आज.
जो न किया सब कर रहे, तज मर्यादा लाज.

मुई सियासत ने किया, हर घर को बरबाद.
टूटा नाता नेह का, हो न सका आबाद.

लोभतंत्र की जीत है लोकतंत्र की हार.
प्रजा तंत्र सिर पीटता, तंत्र हुआ सरदार.

आतंकी बम फोड़ते, हम होते भयभीत.
डरना अपनी हार है, मरना उनकी जीत.

दहशतगर्दों का नहीं, किंचित करें प्रचार.
टी. वी. अनदेखा करे, अनदेखी अख़बार.

जाति धर्म के नाम पर, क्यों करिए तकरार?
खुश हो हिल-मिल मना लें क्रिसमस का त्यौहार.

हिंद और हिन्दी हुआ, युग्म बहुत मशहूर.
हर भारतवासी करे, इन पर 'सलिल' गुरूर.

चलते-चलते: December 25, 2008 12:19 AM

किस मिस को कर मिस रहे, किस मिस को किस आप.
देख मिसेस को हो गया, प्रेम पुण्य से पाप.

Saturday, December 27, 2008

दोहा गोष्ठी 2 : मैं दोहा हूँ



दोहा मित्रो,

मैं दोहा हूँ आप सब हैं मेरा परिवार.
कुण्डलिनी दोही सखी, 'सलिल' सोरठा यार.


दोहा गोष्ठी २ में उन सबका अभिनंदन जिन्होंने दोहा लेखन का प्रयास किया है। उन्हें समर्पित है एक दोहा-

करत-करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान.
रसरी आवत-जात ते, सिल पर पड़त निसान.


हारिये न हिम्मत... लिखते और भेजते रहें दोहे। अब तक दोहा दरबार में सर्व श्री भूपेन्द्र राघव, दिवाकर मिश्र, मनु, तपन शर्मा, देवेन्द्र, शोभा, सुर, सीमा सचदेव, निखिल आनंद गिरी आदि ने दोहा भेज कर उपस्थति दी है, जबकि अर्श, विश्व दीपक 'तनहा', पूजा अनिल, अनिरुद्ध चौहान, साहिल आलोक सिंह, संगीता पुरी, रविकांत पाण्डेय, देवेन्द्र पाण्डेय, विवेक रंजन श्रीवास्तव आदि पत्र प्रेषित कर द्वार खटखटा रहे हैं। इस दोहा गोष्ठी में हम सब कुछ कालजयी दोहाकारों के लोकप्रिय-चर्चित दोहों का रसास्वादन कर धन्य होंगे।

दोहा है इतिहास:


दसवीं सदी में पवन कवि ने हरिवंश पुराण में 'कउवों के अंत में 'दत्ता' नामक जिस छंद का प्रयोग किया है वह दोहा ही है.

जइण रमिय बहुतेण सहु, परिसेसिय बहुगब्बु.
अजकल सिहु णवि जिमिविहितु, जब्बणु रूठ वि सब्बु.


११वीं सदी में कवि देवसेन गण ने 'सुलोचना चरित' की १८ वी संधि (अध्याय) में कडवकों के आरम्भ में 'दोहय' छंद का प्रयोग किया है। यह भी दोहा ही है.

कोइण कासु विसूहई, करइण केवि हरेइ.
अप्पारोण बिढ़न्तु बद, सयलु वि जीहू लहेइ


मुनि रामसिंह के 'पाहुड दोहा' संभवतः पहला दोहा संग्रह है। एक दोहा देखें-

वृत्थ अहुष्ठः देवली, बाल हणा ही पवेसु.
सन्तु निरंजणु ताहि वस्इ, निम्मलु होइ गवेसु


कहे सोरठा दुःख कथा:

सौरठ (सौराष्ट्र गुजरात) की सती सोनल (राणक) का कालजयी आख्यान को पूरी मार्मिकता के साथ गाकर दोहा लोक मानस में अम्र हो गया। कथा यह कि कालरी के देवरा राजपूत की अपूर्व सुन्दरी कन्या सोनल अणहिल्ल्पुर पाटण नरेश जयसिंह (संवत ११४२-११९९) की वाग्दत्ता थी। जयसिंह को मालवा पर आक्रमण में उलझा पाकर उसके प्रतिद्वंदी गिरनार नरेश रानवघण खंगार ने पाटण पर हमला कर सोनल का अपहरण कर उससे बलपूर्वक विवाह कर लिया. मर्माहत जयसिंह ने बार-बार खंगार पर हमले किए पर उसे हरा नहीं सका। अंततः खंगार के भांजों के विश्वासघात के कारन वह अपने दो लड़कों सहित पकड़ा गया। जयसिंह ने तीनों को मरवा दिया। यह जानकर जयसिंह के प्रलोभनों को ठुकराकर सोनल वधवाण के निकट भोगावा नदी के किनारे सती हो गयी। अनेक लोक गायक विगत ९०० वर्षों से सती सोनल की कथा सोरठों (दोहा का जुड़वाँ छंद) में गाते आ रहे हैं-

वढी तऊं वदवाण, वीसारतां न वीसारईं.
सोनल केरा प्राण, भोगा विहिसऊँ भोग्या.


दोहा की दुनिया से जुड़ने के लिए उत्सुक रचनाकारों को दोहा की विकास यात्रा की झलक दिखने का उद्देश्य यह है कि वे इस सच को जान और मान लें कि हर काल कि अपनी भाषा होती है और आज के दोहाकार को आज की भाषा और शब्द उपयोग में लाना चाहिए। अब निम्न दोहों को पढ़कर आनंद लें-

कबिरा मन निर्मल भया, जैसे गंगा नीर.
पाछो लागे हरि फिरे, कहत कबीर-कबीर.

असन-बसन सुत नारि सुख, पापिह के घर होय.
संत समागम राम धन, तुलसी दुर्लभ होय.

बांह छुड़ाकर जात हो, निबल जान के मोहि.
हिरदै से जब जाइगो, मर्द बदौंगो तोहि. - सूरदास

पिय सांचो सिंगार तिय, सब झूठे सिंगार.
सब सिंगार रतनावली, इक पियु बिन निस्सार.

अब रहीम मुस्किल पडी, गाढे दोऊ काम.
सांचे से तो जग नहीं, झूठे मिले न राम.


अंत में एक काम छात्रों के लिए- अपनी पसंद का एक दोहा लिख भेजिए, दोहाकार का नाम और आपको क्यों पसंद है जरूर बताएं। यह काम करनेवाले अपनी शंकाओं का समाधान पहले पाने के पात्र होंगे।
pooja anil का कहना है कि - 
"काल करे सो आज कर ,आज करे सो अब,
पल में परलय होएगी , बहुरि करेगा कब?"

मुझे ये दोहा बड़ा पसंद है, दोहाकार का नाम तो पता नहीं, किंतु समय की महत्ता का जो वर्णन जन सामान्य की भाषा में किया गया है, वह अति उत्तम और ग्राह्य है .

"गुरूजी ने पकड़े कान तो, बुद्दि पर हुआ प्रहार,
ज्ञान अनमोल गुरू दे रहे, यही बड़ा उपकार."   सादर वंदना,  पूजा अनिल   December 27, 2008 2:33 PM
manu का कहना है कि -
रूठे तो अच्छा किया दिखा दिया यह आज,
जो अपना होता वही अपनों से नाराज

आचार्य का ही ये दोहा है जिसके बाद मैं इस कक्षा में आज पहली बार ना ना करते भी खींचा चला आया हूँ ...
बेहद असरदार   December 27, 2008 11:47 PM
तपन शर्मा का कहना है कि -
बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर,
पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर...

काल करे सो आज कर... वाला दोहा भी मुझे प्रिये। सुने तो और भी होंगे.. पर यही कुछ दो-चार दोहे होते हैं जो हम बोलते रहते हैं इसलिये याद रह जाते हैं....   December 27, 2008 11:58 PM
rashmi का कहना है कि -
"rahiman dhaga prem ka mat todo chtakay,
tute to fir na jude,jude to ghanth pad jaye"

ye doha kavi rahim ka likha hua hai,ye doha rishto ki sachchai ko byan karti hai,jo tutne ke bad man ke kahi na kahi khatas chod jati hai  December 29, 2008 10:32 PM
सीमा सचदेव का कहना है कि -  मेरा प्रिय दोहा है :-
रहिमन धागा प्रेम का ,मत तोरो चटकाय
टूटे ते फिर ना जुरे , जुरे गांठ परि जाय    December 30, 2008 5:43 PM
pooja anil का कहना है कि - प्रणाम आचार्यजी ,
कृपया एक शंका का समाधान करें, सुझायें ,
दोहा, छंद, श्लोक में अन्तर क्या, बतलायें .
धन्यवाद पूजा अनिल  December 30, 2008 7:14 PM
Mirhamid का कहना है कि -  It was wondering if I could use this write-up on my other website, I will link it back to your website though.Great Thanks   downloadmyfileshere.com   April 03, 2016 9:52 AM
Jayesh Sindhi का कहना है कि -गुरू गुरू सब कोई कहे बिन गुरू मिले न ज्ञान कृपा होय गुरू देव की तो भक्ति मॉ आवे रंग.. जय गुरू देव  November 14, 2016 11:42 PM


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