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शनिवार, 9 अक्टूबर 2010

मुक्तिका: वह रच रहा... संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:

वह रच रहा...

संजीव 'सलिल'
*
वह रच रहा है दुनिया, रखता रहा नजर है.
कहता है बाखबर पर इंसान बेखबर है..

बरसात बिना प्यासा, बरसात हो तो डूबे.
सूखे न नेह नदिया, दिल ही दिलों का घर है..

झगड़े की तीन वज़हें, काफी न हमको लगतीं.
अनगिन खुए, लड़े बिन होती नहीं गुजर है..

कुछ पल की ज़िंदगी में सपने हजार देखे-
अपने न रहे अपने, हर गैर हमसफर है..

महलों ने चुप समेटा, कुटियों ने चुप लुटाया.
आखिर में सबका हासिल कंधों का चुप सफर है..

कोई हमें बताये क्या ज़िंदगी के मानी?
है प्यास का समर यह या आस की गुहर है??

लिख मुक्त हुए हम तो, पढ़ सिर धुनेंगे बाकी.
अक्सर न अक्षरों बिन होती 'सलिल' बसर है..
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रविवार, 12 सितंबर 2010

मुक्तिका कुछ भला है..... संजीव 'सलिल'

मुक्तिका                                                   

कुछ भला है.....                                                                                               

संजीव 'सलिल'
*
जो  उगा  है, वह  ढला है.
कुछ बुरा है, कुछ भला है..

निकट जो दिखते रहे हैं.
हाय!  उनमें  फासला  है..

वह  हुआ जो  रही  होनी
जो न चाहा क्या टला है?

झूठ  कहते - चाहते सच
सच सदा सबको खला है..

स्नेह के सम्बन्ध नाज़ुक
साध  लेना  ही  कला  है..

मिले  पहले, दबाते  फिर
काटते वे क्यों?  गला है..

खरे  की  है  पूछ अब कम
टका  खोटा  ही  चला  है..

भले  रौशन  हों   न  आँखें
स्वप्न  उनमें  भी  पला है..

बदलते    हालात    करवट
समय  भी  तो  मनचला है.. 

लाख़   उजली   रहे   काया.
श्याम  साया  दिलजला  है..

ज़िंदगी  जी  ली,  न  समझे
'सलिल' दुनिया क्या बला है..
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http://divyanarmada.blogspot.com