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सोमवार, 10 सितंबर 2018

समीक्षा

कृति चर्चा:

नवगीत के नये प्रतिमान- सं. राधेश्याम बंधु

- संजीव सलिल
नवगीत को हिंदी समालोचना के दिग्गजों द्वारा अनदेखा किया जाने के बावजूद वह जनवाणी बनकर उनके कानों में प्रविष्ट हो गया है। फलतः, नवगीत के मूल्यांकन के गंभीर प्रयास हो रहे हैं। नवगीत की नवता-परीक्षण के प्रतिमानों के अन्वेषण का दुरूह कार्य सहजता से करने का पौरुष दिखाया है श्रेष्ठ-ज्येष्ठ नवगीतकार राधेश्याम बंधु ने। नवगीत के नये प्रतिमानों पर चर्चा करता सम्पादकीय खंड आलोचना और सौन्दर्य बोध, वस्तुवादी वर्गीय चेतना और उसका यथार्थवाद, प्रयोगवाद और लोकधर्मी प्रयोग, इतिहासबोध: उद्भव और विकास, लोकचेतना और चुनौतियाँ, नये रूप और वस्तु की प्रासंगिकता, छंद और लय की प्रयोजनशीलता, मूल्यान्वेषण की दृष्टि और उसका समष्टिवाद, वैज्ञानिक और वैश्विक युगबोध, सामाजिक चेतना और जनसंवादधर्मिता, वैचारिक प्रतिबद्धता और जनचेतना तथा जियो और जीने दो आदि बिन्दुओं पर केन्द्रित है। यह खंड कृतिकार के गहन और व्यापक अध्ययन-मनन से उपजे विचारों के मंथन से निसृत विचार-मुक्ताओं से समृद्ध-संपन्न है। 

परिचर्चा खंड में डॉ। नामवर सिंह, डॉ। विश्वनाथ त्रिपाठी, डॉ। नित्यानंद तिवारी, डॉ। मैनेजर पाण्डेय, डॉ। मुरलीमनोहर प्रसाद सिंह, डॉ। परमानन्द श्रीवास्तव, डॉ। विमल, रामकुमार कृषक जैसे विद्वज्जनों ने हिचकते-ठिठकते हुए ही सही नवगीत के विविध पक्षों का विचारण किया है। यह खंड अधिक विस्तार पा सकता तो शोधार्थियों को अधिक संतुष्ट कर पाता। वर्तमान रूप में भी यह उन बिन्दुओं को समाविष्ट किये है जिनपर भविष्य में प्रासाद निर्मित किये का सकते हैं। 

sसमीक्षात्मक आलेख खंड के अंतर्गत डॉ। शिव कुमार मिश्र ने नवगीत पर भूमंडलीकरण के प्रभाव और वर्तमान की चुनौतियाँ, डॉ। श्री राम परिहार ने नवगीत की नयी वस्तु और उसका नया रूप, डॉ। प्रेमशंकर ने लोकचेतना और उसका युगबोध, डॉ। प्रेमशंकर रघुवंशी ने गीत प्रगीत और नयी कविता का सच्चा उत्तराधिकारी नवगीत, डॉ। वेदप्रकाश अमिताभ ने सामाजिक चेतना और चुनौतियाँ, डॉ। भारतेंदु मिश्र ने आलोचना की असंगतियाँ, डॉ। सुरेश उजाला ने विकास में लघु पत्रिकाओं का योगदान, डॉ। वशिष्ठ अनूप ने नईम के लोकधर्मी नवगीत, महेंद्र नेह ने रमेश रंजक के अवदान, लालसालाल तरंग ने कुछ नवगीत संग्रहों, डॉ। रामसनेही लाल शर्मा ‘यायावर’ ने गीत-नवगीत की तुलनात्मक रचनाशीलता तथा डॉ। राजेन्द्र गौतम ने नवगीत के जनोन्मुखी परिदृश्य पर उपयोगी आलेख प्रस्तुत किये हैं। 

विरासत खंड में निराला जी, माखनलाल जी, नागार्जुन जी, अज्ञेय जी, केदारनाथ अग्रवाल जी, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी, धर्मवीर भारती जी, देवेन्द्र कुमार, नईम, डॉ। शंभुनाथ सिंह, रमेश रंजक तथा वीरेंद्र मिश्र का समावेश है। यह खंड नवगीत के विकास और विविधता का परिचायक है।
’नवगीत के हस्ताक्षर’ तथा ‘नवगीत के कुछ और हस्ताक्षर’ खंड में लेखक ने ७० तथा ६० नवगीतकारों को बिना किसी पूर्वाग्रह के उन प्रमुख नवगीतकारों को सम्मिलित किया है जिनकी महत्वपूर्ण रचनाएँ उसके पढ़ने में आ सकीं। ऐसे खण्डों में नाम जोड़ने की गुंजाइश हमेशा बनी रह सकती है। इसके पूरक खंड भी हो सकते हैं और पुस्तक के अगले संस्करण में संवर्धन भी किया जा सकता है। 

बंधु जी नवगीत विधा से लम्बे समय से जुड़े हैं। वे नवगीत विधा के उत्स, विकास, वस्तुनिष्ठता, अवरोधों, अवहेलना, संघर्षों तथा प्रमाणिकता से सुपरिचित हैं। फलत: नवगीत के विविध पक्षों का आकलन कर संतुलित विवेचन, विविध आयामों का सम्यक समायोजन कर सके हैं। सर्वाधिक महत्वपूर्ण है उनका निष्पक्ष और निर्वैर्य होना। व्यक्तिगत चर्चा में भी वे इस कृति और इसमें सम्मिलित अथवा बारंबार प्रयास के बाद भी असम्मिलित हस्ताक्षरों के अवदान के मूल्यांकन प्रति समभावी रहे हैं। इस सारस्वत अनुष्ठान में जो महानुभाव सम्मिलित नहीं हुए वे महाभागी हैं अथवा नहीं स्वयं सोचें और भविष्य में ऐसे गंभीर प्रयासों के सहयोगी हों तो नवगीत और सकल साहित्य के लिये हितकर होगा। 

डॉ। शिवकुमार मिश्र ने ठीक ही कहा है: ‘डॉ। राधेश्याम बंधु का यह प्रयास नवगीत को उसके समूचे विकासक्रम, उसकी मूल्यवत्ता और उसकी संभावनाओं के साथ समझने की दिशा में एक स्तुत्य प्रयास माना जायेगा।’ कृतिकार जानकारी और संपर्क के आभाव में कृति में सम्मिलित न किये जा सके अनेक हस्ताक्षरों को जड़ते हुए इसका अगला खंड प्रकाशित करा सकें तो शोधार्थियों का बहुत भला होगा। 

‘नवगीत के नये प्रतिमान’ समकालिक नवगीतकारों के एक-एक गीत तो आमने लाता है किन्तु उनके अवदान, वैशिष्ट्य अथवा न्यूनताओं का संकेतन नहीं करता। सम्भवत: यह लेखक का उद्देश्य भी नहीं है। यह एक सन्दर्भ ग्रन्थ की तरह उपयोगी है। इसकी उपयोगिता में और अधिक वृद्धि होती यदि परिशिष्ट में अब तक प्रकाशित प्रमुख नवगीत संग्रहों तथा नवगीत पर केन्द्रित समलोचकीय पुस्तकों के रचनाकारों, प्रकाशन वर्ष, प्रकाशक आदि तथा नवगीतों पर हुए शोधकार्य, शोधकर्ता, वर्ष तथा विश्वविद्यालय की जानकारी दी जा सकती। 

ग्रन्थ का मुद्रण स्पष्ट, आवरण आकर्षक, बँधाई मजबूत और मूल्य सामग्री की प्रचुरता और गुणवत्ता के अनुपात में अल्प है। पाठ्यशुद्धि की ओर सजगता ने त्रुटियों के लिये स्थान लगभग नहीं छोड़ा है।
१५.६.२०१५
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समीक्ष्य संकलन- नवगीत के नये प्रतिमान, संपादक- राधेश्याम बंधु, प्रकाशक- कोणार्क प्रकाशन, बी-3/163 यमुना विहार, दिल्ली-110053, प्रथम संस्करण-२०१२, मूल्य- ५०० रूपये , पृष्ठ- ४६४, परिचय- संजीव सलिल।

समीक्षा

समीक्षा:

प्यास के हिरन- राधेश्याम बंधु

- संजीव सलिल
नवगीतों और छंदानुशासन को सामान कुशलता से साध सकने की रूचि, सामर्थ्य और कौशल जिन हस्ताक्षरों में है उनमें से एक हैं राधेश्याम बंधु जी।  बंधु जी के नवगीत संकलन 'प्यास के हिरन' के नवगीत मंचीय दबावों में अधिकाधिक व्यावसायिक होती जाती काव्याभिव्यक्ति के कुहासे में सांस्कारिक सोद्देश्य रचित नवगीतों की अलख जगाता है। नवगीतों को लोक की अभिव्यक्ति का माध्यम माननेवालों में बंधु जी अग्रणी हैं। वे भाषिक और पिन्गलीय विरासत को अति उदारवाद से दूषित करने को श्रेयस्कर नहीं मानते और पारंपरिक मान्यताओं को नष्ट करने के स्थान पर देश-कालानुरूप अपरिहार्य परिवर्तन कर लोकोपयोगी और लोकरंजनीय बनाने के पथ पर गतिमान हैं।  

बंधु जी के नवगीतों में शब्द-अर्थ की प्रतीति के साथ लय की समन्विति और नादजनित आल्हाद की उपस्थिति और नियति-प्रकृति के साथ अभिन्न होती लोकभावनाओं की अभिव्यक्ति का मणिकांचन सम्मिलन है। ख्यात समीक्षक डॉ. गंगा प्रसाद विमल के अनुसार’ बंधु जी में बडबोलापन नहीं है, उनमें रूपक और उपमाओं के जो नये प्रयोग मिलते हैं उनसे एक विचित्र व्यंग्य उभरता है।  वह व्यंग्य जहाँ स्थानिक संबंधों पर प्रहार करता है वहीं वह सम्पूर्ण व्यवस्था की विद्रूपता पर भी बेख़ौफ़ प्रहार करता है।  बंधु जी पेशेवर विद्रोही नहीं हैं, वे विसंगत के प्रति अपनी असहमति को धारदार बनानेवाले ऐसे विद्रोही हैं जिसकी चिंता सिर्फ आदमी है और वह आदमी निरंतर युद्धरत है।’

प्यास के हिरन (२३ नवगीत), रिश्तों के समीकरण (२७ नवगीत) तथा जंग जारी है (७ नवगीत) शीर्षक त्रिखंदों में विभक्त यह नवगीत संकलन लोक की असंतुष्टि, निर्वाह करते रहने की प्रवृत्ति और अंततः परिवर्तन हेतु संघर्ष की चाह और जिजीविषा का दस्तावेज है।  ये गीति रचनाएँ न तो थोथे आदर्श का जय घोष करती हैं, न आदर्शहीन वर्तमान के सम्मुख नतमस्तक होती हैं, ये बदलाव की अंधी चाह की मृगतृष्णा में आत्माहुति भी नहीं देतीं अपितु दुर्गन्ध से जूझती अगरुबत्ती की तरह क्रमशः सुलगकर अभीष्ट को इस तरह पाना चाहती हैं कि अवांछित विनाश को टालकर सकल ऊर्जा नवनिर्माण हेतु उपयोग की जा सके।
   
बाजों की 
बस्ती में, धैर्य का कपोत फँसा 
गली-गली अट्टहास, कर रहे बहेलिये, आदमकद 
टूटन से, रोज इस तरह जुड़े 
सतही समझौतों के प्यार के लिए जिए, उत्तर तो 
बहरे हैं, बातूनी प्रश्न
उँगली पर ठहर गये, पर्वत से दिन, गुजरा 
बंजारे सा एक वर्ष और, चंदा तो बाँहों में 
बँध गया, किन्तु 
लुटा धरती का व्याकरण, यह 
घायल सा मौन 
सत्य की पाँखें नोच रहा है ...  

आदि-आदि पंक्तियों में गीतकार पारिस्थितिक वैषम्य और विडम्बनाओं के शब्द चित्र अंकित करता है।     
साधों के 
कन्धों पर लादकर विराम 
कब तक तम पियें, नये 
सूरज के नाम?, ओढ़ेंगे 
कब तक हम, अखबारी छाँव?
आश्वासन किस तरह जिए?
चीर हरणवाले 
चौराहों पर, मूक हुआ 
क्यों युग का आचरण? 
आश्वासन किस तरह जिए? 
नगरों ने गाँव डस लिये
कल की मुस्कान हेतु 
आज की उदासी का नाम ताक न लें?
मैंने तो अर्पण के 
सूर्य ही उगाये नित 
जाने क्यों द्विविधा की 
अँधियारी घिर आती, हम 
उजाले की फसल कैसे उगाये? 
अपना ही खलिहान न देता 
क्यों मुट्ठी भर धान

जैसी अभिव्यक्तियाँ जन-मन में उमड़ते उन प्रश्नों को सामने लाती हैं जो वैषम्य के विरोध की मशाल बनकर सुलगते ही नहीं शांत मन को सुलगाकर जन असंतोष का दावानल बनाते हैं।          
जो अभी तक 
मौन थे वे शब्द बोलेंगे 
हर महाजन की बही का भेद खोलेंगे
धूप बनकर 
धुंध में भी साथ दो तो 
ज़िन्दगी का व्याकरण कुछ 
सरल हो जाए बाबा की अनपढ़ 
बखरी में शब्दों का सूरज ला देंगे
अनब्याहे फासले 
ममता की फसलों से पाटते चलो, परिचय की 
शाखों पर, संशय की अमरबेल मत पालो
मैं विश्वासों को चन्दन कर लूँगा 

आदि में जन-मन की आशा-आकांक्षा, सपने तथा विश्वास की अभिव्यक्ति है। यह विश्वास ही जनगण को सर्वनाशी विद्रोह से रोककर रचनात्मक परिवर्तन की  ओर उन्मुख करता है। क्रांति की भ्रान्ति पालकर जीती प्रगतिवादी कविता के सर्वथा विपरीत नवगीत की यह भावमुद्रा लोक की, लोक के द्वारा, लोक के लिये सक्षम व्यवस्था का आव्हान करती है।  

बंधु जी के नवगीत सरस श्रृंगार-सलिला में अवगाहन करते हुए मनोरम अभिव्यक्तियों से पाठक का मन मोहने में समर्थ हैं 

यादों के 
महुआ वन
तन-मन में महक उठे 
आओ! हम बाँहों में
गीत-गीत हो जायें

तुम महकते द्वीप की मुस्कान 
हम भटकते प्यार के जलयान 
क्यों न हम-तुम मिल 
छुअन के छंद लिख डालें? 
क्यों न आदिम गंध से
अनुबंध लिख डालें
आओ, हम-तुम मिल 
प्यार के गुणकों से 
रिश्तों के समीकरण
हल कर लें
दालानों की 
हँसी खनकती, बाजूबंद हुई 
आँगन की अठखेली बोली
नुपुर छंद हुई, चम्पई इशारों से 
लिख-लिख अनुबंध 
एक गंध सौंप गयी
सौ-सौ सौगंध, खिड़की में 
मौलश्री, फूलों का दीप धरे 
कमरे का खालीपन
गंध-गीत से भरे 
नयनों में 
इन्द्रधनुष, अधरोंपर शाम 
किसके स्वागत में ये मौसमी प्रणाम? 
जैसी मादक-मदिर अभिव्यक्तियाँ किसके मन को न मोह लेंगी? 

बंधु जी का वैशिष्ट्य सहज-सरल भाषा और सटीक शब्दों का प्रयोग है। वे न तो संस्कृतनिष्ठता को आराध्य मानते हैं, न भदेसी शब्दों को ठूँसते हैं, न ही उर्दू या अंग्रेजी के शब्दों की भरमार कर अपनी विद्वता की धाक जमाते हैं। इस प्रवृत्ति के सर्वथा विपरीत बंधु जी नवगीत के कथ्य को उसके अनुकूल शब्द ही नहीं बिम्ब और प्रतीक भी चुनने देते हैं। उनकी उपमाएँ और रूपक अनूठेपन का बाना खोजते हुए अस्वाभाविक नहीं होते। धूप-धिया, चितवन की चिट्ठी, याद की मुंडेरी, शतरंजी शब्द, वासंती सरगम, कुहरे की ओढ़नी, रश्मि का प्रेमपत्र आदि कोमल-कान्त अभिव्यक्तियाँ नवगीत को पारंपरिक वीरासा से अलग-थलग कर प्रगतिवादी कविता से जोड़ने के इच्छुक चंद जनों को भले ही नाक-भौं चढ़ाने के लिये  विवश कर दे अधिकाँश सुधि पाठक तो झूम-झूम कर बार-बार इनका आनंद लेंगे।  नवगीत लेखन में प्रवेश कर रहे मित्रों के लिए यह नवगीत संग्रह पाठ्य पुस्तक की तरह है। हिंदी गीत लेखन में उस्ताद परंपरा का अभाव है, ऐसे संग्रह एक सीमा तक उस अभाव की पूर्ति करने में समर्थ हैं।  

रिश्तों के इन्द्रधनुष, शब्द पत्थर की तरह आदमी की भीड़ में शीर्षक ३ मुक्तिकाएँ (हिंदी गज़लें) तथा 'आदमी' शीर्षक एकमात्र मुक्तक की उपस्थिति चौंकाती है।  इससे संग्रह की शोभा नहीं बढ़ती। तमसा के तट पर, मेरा सत्य हिमालय पर नवगीत अन्य सम्मिलित, नवगीतों की सामान्य लीक से हटकर हैं। सारतः यह नवगीत संग्रह बंधु जी की सृजन-सामर्थ्य का जीवंत दस्तावेज होने के साथ-साथ आम पाठक के लिये रस की गागर भी है।   
११.५.२०१५ 
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नवगीत संग्रह- प्यास के हिरन, रचनाकार- राधेश्याम बंधु, प्रकाशक- पराग प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम संस्करण-१९९८, मूल्य- रूपये ४०, पृष्ठ ९४,  परिचय- संजीव सलिल

समीक्षा

कृति चर्चा:

एक गुमसुम धूप- राधेश्याम बंधु

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' 
नवगीत को ‘स्व’ से ‘सर्व’ तक पहुँचाकर समाज कल्याण का औजार बनाने के पक्षधर हस्ताक्षरों में से एक राधेश्याम बंधु की यह कृति सिर्फ पढ़ने नहीं, पढ़कर सोचने और सोचकर करनेवालों के लिये बहुत काम की है-

बाबा की, अनपढ़ बखरी में
शब्दों का सूरज ला देंगे

जो अभी तक मौन थे 
वे शब्द बोलेंगे 

जीवन केवल 
गीत नहीं है 
गीता की है प्रत्याशा 

चाहे थके पर्वतारोही 
धूप शिखर पर चढ़ती रहती

इन नवाशा से भरपूर नवगीतों से मुर्दों में भी प्राण फूँकने का सतत प्रयास करते बंधु जी के लिये लेखन शगल नहीं धर्म है। वे कहते हैं- ‘जो काम कबीर अपनी धारदार और मार्मिक छान्दस कविताओं से कर सके, वह जनजागरण का काम गद्य कवि कभी नहीं कर सकते...जागे और रोवे की त्रासदी सिर्फ कबीर की नहीं है बल्कि हर युग में हर संवेदनशील ईमानदार कवि की रही है। गीत सदैव जनजीवन और जनमानस को यदि आल्हादित करने का सशक्त माध्यम रहा है तो तो वह जन जागरण के लिए आम आदमी को आंदोलित करनेवाला भी रहा है।’

कोलाहल हो 
या सन्नाटा 
कविता सदा सृजन करती है 

यह कहनेवाला गीतकार शब्द की शक्ति के प्रति पूरी तरह आश्वस्त है-

जो अभी 
तक मौन थे 
वे शब्द बोलेंगे 

नवगीत के बदलते कलेवर पर प्रश्नचिन्ह उपस्थित करनेवालों को उनका उत्तर है- 

शब्दों का  
कद नाप रहे जो
वक्ता ही बौने होते हैं। 

शहर का नकली परिवेश उन्हें नहीं सुहाता- 

शहरी शाहों 
से ऊबे तो 
गीतों के गाँव चले आये

किन्तु विडम्बना यह कि गाँव भी अब गाँव से न रहे- 

गाँवों की 
चौपालों में भी 
होरीवाला गाँव कहाँ?

वातावरण बदल गया है- 

पल-पल 
सपनों को महकाती 
फूलों की सेज कसौली है 

कवि चेतावनी देता है- 

हरियाली मत 
हरो गंध की 
कविता रुक जाएगी।  

कवि को भरोसा है कल पर- 

अभी परिंदों 
में धड़कन है 
पेड़ हरे हैं जिंदा धरती 
मत उदास 
हो छाले लखकर 
ओ  माझी! नदिया कब थकती?

 डॉ. गंगाप्रसाद विमल ठीक ही आकलन करते हैं-
"राधेश्याम बंधु ऐसे जागरूक कवि हैं जो अपने साहित्यिक सृजन द्वारा बराबर उस अँधेरे से लड़ते रहे हैं जो कवित्वहीन कूड़े को बढ़ाने में निरत रहा है।" 

नवगीतों में छ्न्दमुक्ति के नाम पर छंदहीनता का जयघोष कर कहन को तराशने का श्रम करने से बचने की प्रवृत्तिवाले कलमकारों के लिये बंधु जी के छांदस अनुशासन से चुस्त-दुरुस्त नवगीत एक चुनौती की तरह हैं। बंधु जी के सृजन-कौशल का उदहारण है नवगीत-‘वेश बदल आतंक आ रहा'।  सभी स्थाई तथा पहला व तीसरा अंतरा संस्कारी तथा आदित्य छंदों का क्रमिक उपयोग कर रचे गये हैं जबकि दूसरा अंतरा संस्कारी छंद में है। 

जो रहबर
खुद ही सवाल हैं
वे क्या उत्तर देंगे?
पल-पल चुभन बढ़ानेवाले
कैसे पीर हरेंगे?

गलियों में पसरा सन्नाटा
दहशत है स्वच्छंद
सरेशाम ही हो जाते हैं
दरवाजे अब बंद

वेश बदल
आतंक आ रहा
कैसे गाँव जियेंगे?

बस्ती में कुहराम मचा है
चमरौटी की लुटी चाँदनी
मुखिया के बेटे ने लूटी
अम्मा की मुँहलगी रौशनी

जब प्रधान
ही बने लुटेरे
वे क्या न्याय करेंगे?

जब डिग्री ने लाखों देकर
नहीं नौकरी पायी
छोटू कैसे कर्ज़ भरेगा
सोच रही है माई?

जब थाने  
ही खुद दलाल हैं
वे क्या रपट लिखेंगे?

'यह कैसी सिरफिरी हवाएँ' शीर्षक नवगीत के स्थाई व अंतरे संस्कारी तथा मानव छंदों की पंक्तियों का क्रमिक उपयोग कर रचे गये हैं, ‘उनकी खातिर कौन लड़े?’ नवगीत में संस्कारी तथा दैशिक छन्दों का क्रमिक प्रयोग कर रचे गये स्थायी और अंतरे हैं-

उनकी खातिर
कौन लड़े जो
खुद से डरे-डरे?
बचपन को
बँधुआ कर डाला
कर्जा कौन भरे?

जिनका दिन गुजरे भट्टी में
झुग्गी में रातें
कचरा से पलनेवालों की
कौन सुने बातें?

बिन ब्याही
माँ, बहन बन गयी
किस पर दोष धरे?

परमानन्द श्रीवास्तव के अनुसार: ‘राधेश्याम बंधु प्रगीतात्मक संवेदना के प्रगतिशील कवि हैं, जो संघर्ष का आख्यान भी लिखते हैं और राग का वृत्तान्त भी बनाते हैं।  एक अर्थ में राधेश्याम बंधु ऐसे मानववादी कवि हैं कि उन्होंने अभी तक छंद का अनुशासन नहीं छोड़ा है।’ 
  

इस संग्रह के नवगीत सामयिकता, सनातनता, सार्थकता, सम्प्रेषणीयता, संक्षिप्तता, सहजता तथा सटीकता के सप्त सोपानों पर खरे हैं। बंधु जी दैनंदिन उपयोग में आने वाले आम शब्दों का प्रयोग करते हैं। वे अपना वैशिष्ट्य या विद्वता प्रदर्शन के लिये क्लिष्ट संस्कृतनिष्ठ अथवा न्यूनज्ञात उर्दू या ग्राम्य शब्दों को खोजकर नहीं ठूँसते, उनका हर नवगीत पढ़ते ही मन को छूता है, आम पाठक को भी न तो शब्दकोष देखना होता है, न किसी से अर्थ पूछना होता है। ‘एक गुमसुम धूप’ का कवि युगीन विसंगतियों, और विद्रूपताओं जनित विडंबनाओं से शब्द-शस्त्र साधकर निरंतर संघर्षरत है। उसकी अभिव्यक्ति जमीन से जुड़े सामान्य जन के मन की बात कहती है, इसलिए ये नवगीत समय की साक्षी देते हैं।
१७.४.२०१५ 
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गीत- नवगीत संग्रह - एक गुमसुम धूप, रचनाकार- राधेश्याम बंधु, प्रकाशक- कोणार्क प्रकाशन बी ३/१६३ यमुना विहार दिल्ली ११००५३, प्रथम संस्करण-२००८, मूल्य- रूपये १५०, पृष्ठ ९६, समीक्षक- संजीव सलिल

समीक्षा

पुस्तक चर्चा:

नदियाँ क्यों चुप हैं - राधेश्याम बंधु

- डॉ. परमानंद श्रीवास्तव
वरिष्ठ जनचेतना के कवि राधेश्याम बंधु के नवगीतों का यह चौथा संग्रह है ’नदियाँ क्यों चुप है ?‘ इसके पहले उनके तीन नवगीत संग्रह ’बरसो रे घन‘ , ’प्यास के हिरन‘ , ’एक गुमसुम धूप‘ और एक खण्डकाव्य ’एक और तथागत‘ भी प्रकाशित और चर्चित हो चुके हैं। ’नदियाँ क्यों चुप हैं?‘ के नवगीत अपनी प्रखर अन्तर्वस्तु और सहज शिल्प के कारण पठनीय भी हैं और एक बड़े पाठक समुदाय तक पहुँचने में सक्षम भी हैं। इसके पहले राधेश्याम बंधु द्वारा सम्पादित ’नवगीत और उसका युगवोध‘ के माध्यम से ’नवगीत‘ को लेकर सघन विचार-मंथन भी हो चुका है और उसकी परम्परा को निराला और नागार्जुन से जोड़ने की बात भी की गयी है।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि समय का दंश इन गीतों में प्रकट है। कवि की दृष्टि में आज ’रिश्तों की नदियाँ‘ सूख गयी हैं। महानगरों में अमानवीयकरण ने व्यवहार में एक ठंढेपन को जन्म दिया है। ज्यों-ज्यों नगर महान हो रहे हैं, नदियाँ सूख रही हैं। यह केवल पर्यावरण का संकट नहीं है बल्कि सामाजिक रिश्तों के छीजने का संकट भी है।
राधेश्याम बंधु मानवीय रिश्तों की भाषा में नदियों को सम्बोधित करते हुए कहते हैं -
’दादी सी दुबली, गरीब हैं, नदियाँ बहुत उदास,
सबकी प्यास बुझातीं उनकी, कौन बुझाये प्यास ?‘

इसी तरह वे भ्रष्ट व्यवस्था की ओर भी इंगित करते हुए कहते हैं- नहरे तो हैं लेकिन वे फाइलों में ही बहती हैं। अब पानी बोतलों में बिकता है। अब तो प्यासी नदी भी बादलों को टेरती है -
’प्यासी नदी रेत पर तड़पे , अब तो बादल आ।‘
मुंह उचकाये बछिया टेरे , अब तो बादल आ।‘
दादी की गुड़गुड़ी बुलाये ,
अब तो बादल आ।‘

पर्यावरण दिवस पर वृक्षारोपण केवल रस्म नहीं है बल्कि कवि की लोकचेतना की दृष्टि से हार्दिक कामना भी है कि हर आँगन में हरियल पेड़ रोपे जांय, रिश्तों की बगिया मुरझाने न पाये, आँगन की तुलसी एक अम्मा की हर अरदास पहुँचे। साथ ही सफेदपोश बादलों की झूठी हमदर्दी पर भी कवि व्यंग्य करते हुए कहता है -
’बादल भी हो गये सियासी , दर्द नहीं सुनते ,
लगते हैं ये मेघदूत , पर प्यास नहीं हरते,
पानी औ गुड़धानी देंगे ,
फिर - फिर हैं कहते।‘

 यह कैसी बिडम्बना है कि सामाजिक प्रदूषण के प्रभाव से अब बादल भी अछूते नहीं हैं और अब बादल भी तस्कर हो गये हैं। उनसे भी अब प्यास नहीं बुझती। बल्कि उनके शोरगुल से लोगों की नींद ही खराब होती है -
’बदरा सारी रात जगाते,
फिर भी प्यास नहीं बुझ पाती।‘

 इनके अतिरिक्त ’बरखा की चाँदनी‘ जैसे गीत कवि - दृष्टि के सार्थक साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं। यहाँ भी रिश्ते अर्थवान हैं-
’कभी उतर आँगन में , निशिगंधा चूमती,
कभी खड़ी खिड़की पर, ननदी सी झांकती।
 करती रतजगा कभी, गुमसुम सी रेत पर,
 बरखा की चाँदनी, फिरती मुंडेर पर।‘

 कभी-कभी तनावग्रस्त जिन्दगी की जटिलतायें और बेचैनियाँ इतनी असह्य हो उठती हैं कि चाँदनी भी बेचैन लगने लगती है -
’लेटी है बेचैन चाँदनी, पर आंखों में नींद कहाँ ?
आंखें जब रतजगा करें तो, सपनों की उम्मीद कहाँ ?‘

 इसी तरह ’यादों की निशिगंधा‘ गीत की ये पंक्तियाँ रिश्तों की असंगतियों को आत्मीयता की लय से सुलझा लेने का सुझाव कुछ इस प्रकार देती हुई प्रतीत होती हैं -
’चाहो तो बांहों को, हथकड़ी बना लेना,
मौन के कपोलों पर, सन्धिपत्र लिख देना।
 महुआ - तन छेड़-छेड़, इठलाती चाँदनी,
 पिछवाड़े बेला संग, बतियाती चाँदनी।‘

इसी संग्रह के एक गीत ’चाँदनी को धूप मैं कैसे कहूं ?‘ मे राधेश्याम बंधु रागात्मक संवेदना की तीव्रता को प्रकट करने के लिए कुछ विरोधाभाषी शब्दों का सहारा लेते हैं और इस प्रकार वाक्य के कुछ टुकड़े भाषा का संगीत रचते हुए प्रतीत होते हैं-
’तुम मिले तो गंध की चर्चा हुई,
प्यार के सौगंध की चर्चा हुई,
चाँदनी जो नहीं मेरी हो सकी,
रूप के अनुबंध की चर्चा हुई।‘

कभी-कभी असंगति में संगति की तलाश भी जिन्दगी के कुछ नये आयाम खोलती है। ऐसे में किसी का मौन भी जब मादक लगने लगे तो उसका बोलना कितना आकर्षक होगा ? फिर उसके चित्र की मोहकता, पत्र की रोचकता भी जीवन को अर्थवान बनाने में कितनी सहायक हो सकती है? इस प्रकार हम देखते हैं कि कवि का प्रकृति- राग कितना अर्थपूर्ण है-
’कभी पलाशों के उत्सव में, कोकिल बन गाते,
कभी जुही, गुलनार, केतकी, के संग इठलाते।‘

राधेश्याम बंधु द्वारा निर्मित फिल्म ’रिश्ते‘ में उनका एक गीत ’कभी हंसाते कभी रूलाते‘ टाइटिल सांग के रूप में प्रयुक्त हुआ है। यहाँ भी यथार्थ के साथ सघन लयात्मकता विद्यमान है-
’सम्बोधन बेकार हो गये,
बेमानी सब प्यार हो गये,
माली ही जब बगिया लूटे,
रिश्ते सब व्यापार हो गये।‘

यह आज के आधुनिकतावादी और उपभोक्तावादी समाज की कैसी विडम्बना है कि जहाँ व्यक्ति की हर चीज बिकाऊ है। ऐसे में कवि संकल्प करता है कि चाहे जो भी हो, ’हम कलम बिकने न देंगे‘ और शायद सच्चे कवि की यही पहचान भी है। राधेश्याम बंधु की काव्ययात्रा में कई नये प्रस्थान आते हैं। पर मूल संवेदना गीत-संवेदना ही है। उनके गीतों में कहीं महाभारत का प्रसंग है तो कहीं निठारी-काण्ड के प्रति आक्रोश भी है। यूरिया - बोफोर्स के घुटालों के प्रसंग कविता को राजनीतिक परिप्रेक्ष्य प्रदान करते हैं। वहीं बुध्द, गांधी, नानक के संदर्भ धर्म निरपेक्ष संवेदना का साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं। इसी भारत की आजादी और उसकी अस्मिता का सवाल भी है। इसलिए कवि कहता है-
’चाहे सब दुनिया बिक जाये,
हम तक़दीर नहीं बेचेंगे,
जब तक तन में लहू शेष है,
हम कश्मीर नहीं बेचेंगे।‘

ये पंक्तियाँ हमारे इस विश्वास को मजबूत बनाती हैं कि यदि देश है तो हम है और यदि हम हैं तो देश है। मैं आशा करता हूं कि राधेश्याम बंधु का यह ’नदियाँ क्यों चुप हैं ?‘ नवगीत संग्रह, नवगीत को व्यक्ति प्रदान करेगा और पाठकों से संवाद बनाने में भी सफल होगा।
२७.१०.२०१२ 
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नवगीत संग्रह- नदियाँ क्यों चुप हैं, रचनाकार- राधेश्याम बन्धु, प्रकाशक- कोणार्क प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम संस्करण-२०११ , मूल्य-रू. १५०/-, पृष्ठ-११२, समीक्षा लेखक- डॉ. परमानंद श्रीवास्तव।

गुरुवार, 5 मार्च 2015

kruti charcha: ek gumsum dhoop radhe shyam bandhu -sanjiv

कृति चर्चा:
एक गुमसुम धूप : समय की साक्षी देते नवगीत
चर्चाकार: आचार्य संजीव वर्मा सलिल’ 
[कृति विवरण: एक गुमसुम धूप, राधेश्याम बंधु, आकार डिमाई, आवरण पेपरबैक बहुरंगी जेकेटयुक्त, पृष्ठ ९६, मूल्य १५०/-, प्रकाशक कोणार्क प्रकाशन बी ३/१६३ यमुना विहार दिल्ली ११००५३, नवगीतकार संपर्क ९८६८४४४६६६, rsbandhu2@gmail.com]

नवगीत को ‘स्व’ से ‘सर्व’ तक पहुँचाकर समाज कल्याण का औजार बनाने के पक्षधर हस्ताक्षरों में से एक राधेश्याम बंधु की यह कृति सिर्फ पढ़ने नहीं, पढ़कर सोचने और सोचकर करनेवालों के लिये बहुत काम की है. बाबा की / अनपढ़ बखरी में  / शब्दों का सूरज ला देंगे, जो अभी / तक मौन थे / वे शब्द बोलेंगे, जीवन केवल / गीत नहीं है / गीता की है प्रत्याशा, चाहे / थके पर्वतारोही / धूप शिखर पर चढ़ती रहती जैसे नवाशा से भरपूर नवगीतों से मुदों में भी प्राण फूँकने का सतत प्रयास करते बंधु जी के लिये लेखन शगल नहीं धर्म है. वे कहते हैं: ‘जो काम कबीर अपनी धारदार और मार्मिक छान्दस कविताओं से कर सके, वह जनजागरण का काम गद्य कवि कभी नहीं कर सकते..... जागे और रोवे की त्रासदी सिर्फ कबीर की नहीं है बल्कि हर युग में हर संवेदनशील ईमानदार कवि की रही है... गीत सदैव जनजीवन और जनमानस को यदि आल्हादित करने का सशक्त माध्यम रहा है तो तो वह जन जागरण के लिए आम आदमी को आंदोलित करनेवाला भी रहा है.’

‘कोलाहल हो / या सन्नाटा / कविता सदा सृजन करती है’ कहनेवाला गीतकार शब्द की शक्ति के प्रति पूरी तरह आश्वस्त है: ‘जो अभी / तक मौन थे / वे शब्द बोलेंगे’. नवगीत के बदलते कलेवर पर प्रश्नचिन्ह उपस्थित करनेवालों को उनका उत्तर है: ‘शब्दों का  / कद नाप रहे जो/ वक्ता ही बौने होते हैं’.

शहर का नकली परिवेश उन्हें नहीं सुहाता: ‘शहरी शाहों / से ऊबे तो / गीतों के गाँव चले आये’ किन्तु विडम्बना यह कि गाँव भी अब गाँव से न रहे ‘ गाँवों की / चौपालों में भी / होरीवाला गाँव कहाँ?’ वातावरण बदल गया है: ‘पल-पल / सपनों को महकाती / फूलों की सेज कसौली है’, कवि चेतावनी देता है: ‘हरियाली मत / हरो गंध की / कविता रुक जाएगी.’, कवि को भरोसा है कल पर: ‘अभी परिंदों / में धड़कन है / पेड़ हरे हैं जिंदा धरती / मत उदास / हो छाले लखकर / ओ  माझी! नदिया कब थकती?.’ डॉ. गंगाप्रसाद विमल ठीक ही आकलन करते हैं :’राधेश्याम बंधु ऐसे जागरूक कवि हैं जो अपने साहित्यिक सृजन द्वारा बराबर उस अँधेरे से लड़ते रहे हैं जो कवित्वहीन कूड़े को बढ़ाने में निरत रहा है.’

नवगीतों में छ्न्दमुक्ति के नाम पर छंदहीनता का जयघोष कर कहन को तराशने का श्रम करने से बचने की प्रवृत्तिवाले कलमकारों के लिये बंधु जी के छांदस अनुशासन से चुस्त-दुरुस्त navgeeनवगीत एक चुनौती की तरह हैं. बंधु जी के सृजन-कौशल का उदहारण है navgeetनवगीत ‘वेश बदल आतंक आ रहा’. सभी स्थाई तथा पहला व तीसरा अंतरा संस्कारी तथा आदित्य छंदों का क्रमिक उपयोग कर रचे गये हैं जबकि दूसरा अंतरा संस्कारी छंद में है.

‘जो रहबर
खुद ही सवाल हैं,
वे क्या उत्तर देंगे?
पल-पल चुभन बढ़ानेवाले
कैसे पीर हरेंगे?
गलियों में पसरा सन्नाटा
दहशत है स्वच्छंद,
सरेशाम ही हो जाते हैं
दरवाजे अब बंद.
वेश बदल
आतंक आ रहा
कैसे गाँव जियेंगे?
बस्ती में कुहराम मचा है
चमरौटी की लुटी चाँदनी
मुखिया के बेटे ने लूटी
अम्मा की मुँहलगी रौशनी
जब प्रधान
ही बने लुटेरे
वे क्या न्याय करेंगे?
जब डिग्री ने लाखों देकर
नहीं नौकरी पायी
छोटू कैसे कर्ज़ भरेगा
सोच रही है माई?
जब थाने  
ही खुद दलाल हैं
वे क्या रपट लिखेंगे?
.
यह कैसी सिरफिरी हवाएँ शीर्षक नवगीत के स्थाई व अंतरे संस्कारी तथा मानव छंदों की पंक्तियों का क्रमिक उपयोग कर रचे गये हैं. ‘उनकी खातिर कौन लड़े?’ नवगीत में संस्कारी तथा दैशिक छन्दों का क्रमिक प्रयोग कर रचे गये स्थायी और अंतरे हैं:

उनकी खातिर
कौन लड़े जो
खुद से डरे-डरे?
बचपन को
बँधुआ कर डाला
कर्जा कौन भरे?
जिनका दिन गुजरे भट्टी में
झुग्गी में रातें,
कचरा से पलनेवालों की
कौन सुने बातें?
बिन ब्याही
माँ, बहन बन गयी
किस पर दोष धरे?

परमानन्द श्रीवास्तव के अनुसार: ‘राधेश्याम बंधु प्रगीतात्मक संवेदना के प्रगतिशील कवि हैं, जो संघर्ष का आख्यान भी लिखते हैं और राग का वृत्तान्त भी बनाते हैं. एक अर्थ में राधेश्याम बंधु ऐसे मानववादी कवि हैं कि उन्होंने अभी तक छंद का अनुशासन नहीं छोड़ा है.’ 
            
इस संग्रह के नवगीत सामयिकता, सनातनता, सार्थकता, सम्प्रेषणीयता, संक्षिप्तता, सहजता तथा सटीकता के सप्त सोपानों पर खरे हैं. बंधु जी दैनंदिन उपयोग में आने वाले आम शब्दों का प्रयोग करते हैं. वे अपना वैशिष्ट्य या विद्वता प्रदर्शन के लिये क्लिष्ट संस्कृतनिष्ठ अथवा न्यूनज्ञात उर्दू या ग्राम्य शब्दों को खोजकर नहीं ठूँसते... उनका हर नवगीत पढ़ते ही मन को छूता है, आम पाठक को भी न तो शब्दकोष देखना होता है, न किसी से अर्थ पूछना होता है. ‘एक गुमसुम धूप’ का कवि युगीन विसंगतियों, और विद्रूपताओं जनित विडंबनाओं से शब्द-शस्त्र साधकर निरंतर संघर्षरत है. उसकी अभिव्यक्ति जमीन से जुड़े सामान्य जन के मन की बात कहती है, इसलिए ये नवगीत समय की साक्षी देते हैं.
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