शुक्रवार, 19 जनवरी 2018

दोहा दुनिया

शिव ही शिव जैसे रहें,
विधि-हरि बदलें रूप।
चित्र गुप्त हो त्रयी का,
उपमा नहीं अनूप।।
*
अणु विरंचि का व्यक्त हो,
बनकर पवन अदृश्य।
शालिग्राम हरि, शिव गगन,
कहें काल-दिक् दृश्य।।
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सृष्टि उपजती तिमिर से,
श्यामल पिण्ड प्रतीक।
रवि मण्डल निष्काम है,
उजियारा ही लीक।।
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गोबर पिण्ड गणेश है,
संग सुपारी साथ।
रवि-ग्रहपथ इंगित करें,
पूजे झुकाकर माथ।।
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लिंग-पिण्ड, भग-गोमती,
हर-हरि होते पूर्ण।
शक्तिवान बिन शक्ति के,
रहता सुप्त अपूर्ण।।
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दो तत्त्वों के मेल से,
बनती काया मीत।
पुरुष-प्रकृति समझें इन्हें,
सत्य-सनातन रीत।।
*
लिंग-योनि देहांग कह,
पूजे वामाचार।
निर्गुण-सगुण न भिन्न हैं,
ज्यों आचार-विचार।।
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दो होकर भी एक हैं,
एक दिखें दो भिन्न।
जैसे चाहें समझिए,
चित्त न करिए खिन्न।।
*
सत्-शिव-सुंदर सृष्टि है,
देख सके तो देख।
सत्-चित्-आनंद ईश को,
कोई न सकता लेख।।
*
१९.१.२०११, जबलपुर।

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