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शनिवार, 27 दिसंबर 2025

२७ दिसंबर, सॉनेट, उपनिषद, समीक्षा, नवगीत, ब्रह्मजीत गौतम, श्रुति कुशवाहा, छंद-बह्र


सलिल सृजन २७ दिसंबर
कार्यशाला-
छंद बहर का मूल है- १.
*
उर्दू की १९ बहरें २ समूहों में वर्गीकृत की गयी हैं।
१. मुफरद बहरें-
इनमें एक ही अरकान या लय-खण्ड की पुनरावृत्ति होती है।
इनके ७ प्रकार (बहरे-हज़ज सालिम, बहरे-ऱज़ज सालिम, बहरे-रमल सालिम, बहरे-कामिल, बहरे-वाफिर, बहरे-मुतक़ारिब तथा बहरे-मुतदारिक) हैं।
२. मुरक्कब बहरें-
इनमें एकाधिक अरकान या लय-खण्ड मिश्रित होते हैं।
इनके १२ प्रकार (बहरे-मनसिरह, बहरे-मुक्तज़िब, बहरे-मुज़ारे, बहरे-मुजतस, बहरे-तवील, बहरे-मदीद, बहरे-बसीत, बहरे-सरीअ, बहरे-ख़फ़ीफ़, बहरे-जदीद, बहरे-क़रीब तथा बहरे-मुशाकिल) हैं।
*
क. बहरे-मनसिरह
बहरे-मनसिरह मुसम्मन मतबी मौक़ूफ़-
इस बहर में बहुत कम लिखा गया है। इसके अरकान 'मुफ़तइलुं फ़ायलात मुफ़तइलुं फ़ायलात' (मात्राभार ११११२ २१२१ ११११२ २१२१) हैं।
अ. यह १८ वर्णीय अथधृति जातीय शारद छंद है जिसमें ९-९ पर यति तथा पदांत में जगण (१२१) का विधान है।
आ. यह २४ मात्रिक अवतारी जातीय स्मृति छंद है जिसमें १२-१२ मात्राओं पर यति तथा पदांत में १२१ है। हमने इसका नाम स्मृति (चौबीस स्मृतियाँ- मनु, विष्णु, अत्रि, हारीत, याज्ञवल्क्य, उशना, आंगिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, पराशर, व्यास, शांख्य, लिखित, दक्ष, शातातप, वशिष्ठ, नारद, गौतम, जमदग्नि, विश्वामित्र,  गार्गेय) छंद रखा है। 
उदाहरण-
१. 
थक मत, बोझा न मान, कदम उठा बार-बार
उपवन में शूल फूल, भ्रमर कली पे निसार
पगतल है भू-बिछान, सर पर है आसमान
'सलिल' नहीं भूल भूल, दिन-दिन होगा सुधार
२. 
 जब गवाह सच बोला, तब ही झूठा बयान 
सच बन आया समक्ष, विफल हुआ न्याय-दान
खुद से खुद शर्मिंदा, तुला थाम नेत्रहीन- 
बोल उठा  भला हुआ, मैं न हुआ नेत्रवान 

उर्दू व्याकरण के अनुसार गुरु के स्थान पर २ लघु या दो लघु के स्थान पर गुरु मात्रा का प्रयोग करने पर छंद का वार्णिक प्रकार बदल जाता है जबकि मात्रिक प्रकार तभी बदलता है जब यह सुविधा पदांत में ली गयी हो। हिंदी पिंगल-नियम यह छूट नहीं देते।
३.
अरकान 'मुफ्तइलुन फ़ायलात मुफ्तइलुन फ़ायलात' (मात्राभार २११२ २१२१ २११२ २१२१)
क्यों करते हो प्रहार?, झेल सकोगे न वार
जोड़ नहीं, छीन भी न, बाँट कभी दे पुकार
कायम हो शांति-सौख्य, भूल सकें भेद-भाव
शांत सभी हों मनुष्य, किस्मत लेंगे सुधार
४.
दिल में हम अप/ने नियाज़/रखते हैं सो/तरह राज़
सूझे है इस/को ये भेद/जिसकी न हो/चश्मे-कोर
प्रथम पंक्ति में ए, ओ, अ की मात्रा-पतन दृष्टव्य।
(सन्दर्भ: ग़ज़ल रदीफ़-काफ़िया और व्याकरण, डॉ. कृष्ण कुमार 'बेदिल')
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सॉनेट
परीक्षा
मान परीक्षा हर अवसर को,
करें प्रयास आप जीवन भर,
बने भगीरथ जो जाता तर,
नहीं बैठिए थामे सर को।
रखिए दूर हमेशा डर को,
सुमिरें नित नटवर नटनागर,
भरी रहे भावों की गागर,
सदा भुनाएँ हर अवसर को।
डरकर जो न परीक्षा देता,
वह अवसर खोता सच मानो,
सोता उसका भाग्य मौन हो।
बनना है यदि तुम्हें विजेता,
हर बाधा जय करना ठानो,
भोजन में बन रहो नौन हो।
तक्षशिला महाविद्यालय
२७.१२.२०२३
•••
सॉनेट
उपनिषद
*
आत्मानंद नर्मदा देती, नाद अनाहद कलकल में।
धूप-छाँव सह अविचल रहती, ऊँच-नीच से रुके न बहती।
जान गई सच्चिदानंद है, जीवन की गति निश्छल में।।
जो बीता सो रीता, होनी हो, न आज चिंता तहती।।
आओ! बैठ समीप ध्यान कर गुरु से जान-पूछ लो सत्य।
जिज्ञासा कर, शंका मत कर, फलदायक विश्वास सदा।
श्रद्धा-पथिक ज्ञान पाता है, हटता जाता दूर असत्य।।
काम करो निष्काम भाव से, होनी हो, जो लिखा-बदा ।।
आत्म और परमात्म एक हैं, पूर्ण-अंश का नाता है।
उसको जानो, उस सम हो लो, सबमें झलक दिखे उसकी।
जिसको उसका द्वैत मिटे, अद्वैत एक्य बन जाता है।।
काम करो निष्काम भाव से, होगा वह जो गति जिसकी।।
करो उपनिषद चर्चा सब मिल, चित्त शांत हो, भ्रांति मिटे।
क्रांति तभी जब स्वार्थ छोड़, सर्वार्थ राह चल, शांति मिले।।
२७-१२-२०२१
***
दोहा सलिला
पानी का वादा किया, पूर दिए तालाब.
फ़ूल बनाया शूल दे, कहते दिए गुलाब.
*
कर देकर जनता मरे, शासन है बेफ़िक्र.
सेठों का हित सध सके, बस इतनी है फ़िक्र.
*
मेघा बरसे शिव विहँस, लें केशों में धार.
बहा नर्मदा नेह की, करें जगत उद्धार.
*
मोदी राहुल जप रहे, राहुल मोदी नाम
नूरा कुश्ती कर रहे, जाता ठगा अवाम
***
कृति चर्चा:
'कशमकश' मन में झाँकती कविताएँ
[कृति विवरण: कशमकश, कविता संग्रह, ISBN ९७८-९३-८५०१३-६५-२, श्रुति कुशवाहा, वर्ष २०१६, आकार डिमाई, आवरण सजिल्द बहुरंगी जैकेट सहित, पृष्ठ ११२, मूल्य २५०/-, अंतिका प्रकाशन, सी ५६ / यूजीएफ़ ४, शालीमार बाग़, विस्तार २, गाज़ियाबाद २०१००५, ०१२० २६४८२१२, ९८७१८५६०५३, antika56@gmailcom, कवयत्री संपर्क बी १०१ महानंदा ब्लोक, विराशा हाईटस, दानिश कुञ्ज पुल के समीप, कोलर मार्ग, भोपाल ४६२०४२, shrutyindia@gmail.com]
*
मूल्यों के संक्रमण और आधुनिक कविता के पराभव काल में जब अच्छे-अच्छे पुरोधा कविता का अखाड़ा और ग़ज़ल का मजमा छोड़कर दिनानुदिन अधिकाधिक लोकप्रिय होते नवगीत की पिचकारी थामे कबीरा गाने की होड़ कर रहे हैं, तब अपनी वैचारिक प्रबद्धता, आनुभूतिक मार्मिकता और अभिव्यक्तात्मक बाँकपन की तिपाई पर सामाजिक परिदृश्य का जायजा लेते हुए अपने भीतर झाँककर, बाहर घटते घटनाक्रम के प्रति आत्मीयता रखते हुए भी पूरी शक्ति से झकझोरने का उपक्रम करती कविता को जस- का तस हो जाने देने के दुस्साहस का नाम है 'श्रुति'। 'श्रुति' की यह नियति तब भी थी जब लिपि, लेखनी और कागज़ का आविष्कार नहीं हुआ था और अब भी है जब नित नए गैजेट्स सामने आकर कागज़ और पुस्तक के अस्तित्व के लिए संकट की घोषणा कर रहे हैं। 'श्रुति' जन-मन की अभिव्यक्ति है जो बिना किसी नकाब के जन के मन को जन के मन के सामने अनावृत्त करती है, निर्वसन नहीं। कायदों और परंपराओं के पक्षधर कितनी भी परदेदारी कर लें 'श्रुति' को साँसों का सच और आसों की पीड़ा जानने और कहने से रोक नहीं पाते। जब 'श्रुति' अबाध हो तो 'स्मृति' को अगाध होने से कौन रोक सकता है? जब कविता स्मृति में सुरक्षित हो तो वह समय का दस्तावेज हो जाती है।
'कशमकश' चेतनता, जीवंतता और स्वतंत्रता का लक्षण है। जड़ या मृत में 'कशमकश' कैसे हो सकती है? किसी पिछलग्गू में केवल अनुकरण भाव होता है। 'कशमकश' वैचारिक आन्दोलन का दूसरा नाम है। आंदोलित होती 'श्रुति' जन-गण के मन में घट रहे या जन-मन को घटा रहे घटनाक्रम के प्रति आक्रोशित हो, यह स्वाभाविक है। एक जन की पीड़ा दूसरा न सुने तो उस पर प्रतिक्रया और कुछ करने या न करने की कशमकश कैसे हो? इस रूप में 'श्रुति' ही 'कशमकश' को जन्म देती है। संयोगवश विवेच्य काव्य संग्रह 'कशमकश' की जननी का नाम भी 'श्रुति' है। यह 'श्रुति' सामान्य नहीं 'कुशवाहा' अर्थात कुश धारण करनेवाली है। कुश धारण किया जाता है 'संकल्प' के समय। जब किसी कृत्य को निष्पादित करने का निश्चय कर लिया, संसाधन जुटा लिए, कृत्य संपादित करने के लिए पुरोहित अर्थात मार्गदर्शक भी आ गया तो हाथ में कुश लेकर भूमि पर जल छोड़ते हुए संकल्प में सहायक होता है 'कुश'। जन-मन की 'कशमकश' को कविता रूपी 'कुश' के माध्यम से उद्घाटित ही नहीं यथासंभव उपचारित करने का संकल्प करती 'श्रुति' की यह कृति सिर्फ पठनीय नहीं चिंतनीय भी है।
'श्रुति' की सत्तर कविताओं का यह संकलन 'कशमकश' असाधारण है। असाधारण इस अर्थ में कि यह अपने समय की 'प्रवृत्तियों' का निषेध करते हुए भी 'निवृत्ति' का पथ प्रशस्त नहीं करता। समय की परख कर पाना हर रचनाकार के लिए आवश्यक है। श्रुति कहती है-
'जब बिकने लगता है धर्म
और घायल हो जाती है आस्था
चेहरे हो जाते हैं पत्थर
दिखने में आदमी जैसा
जब नहीं रह जाता आदमी
जब चरों ओर मंडराता है संकट
वही होता है
कविता लिखने का सबसे सही वक़्त'
श्रुति की कविताएँ इस बात की साक्षी हैं कि उसे समय की पहचान है। वह लिजलिजी भावनाओं में नहीं बहती। ज़िन्दगी शीर्षक कविता में कवयित्री का आत्म विश्वास पंक्ति-पंक्ति में झलकता है-
नहीं,
मेरी ज़िन्दगी
तुमसे शुरू होकर
तुमपर ख़त्म नहीं होती....
... हाँ
मेरी ज़िंदगी
मुझसे शरू होती है
और ख़त्म वहीं होगी
जहाँ मैं चाहूँगी ...
स्त्री विमर्श के नाम पर अपने पारिवारिक दायित्वों से पलायन कर कृत्रिम हाय-तोबा और नकली आंसुओं से लबालब कविता करने के स्थान पर कवयित्री संक्षेप में अपने अस्तित्व और अस्मिता को सर्वोच्च मानते हुए कहती है-
अब बस
आज मैं घोषित करती हूँ
तुम्हें
एक आम आदमी
गलतियों का पुतला
और खुद को
पत्नी परमेश्वर
ये कविताएँ हवाई कल्पना जगत से नहीं आईं है। इन्हें यथार्थ के ठोस धरातल पर रचा गया है। स्वयं कवयित्री के शब्दों में-
मेरी कविता का
कचरा बीनता बच्चा
बूट पोलिश करता लड़का
संघर्ष करती लड़की
हाशिए पर खड़े लोग
कोइ काल्पनिक पात्र नहीं
दरअसल
मेरे भीतर का आसमान है
आशावाद श्रुति की कविताओं में खून की तरह दौड़ता है-
सूरज उगेगा एक दिन
आदत की तरह नहीं
दस्तूर की तरह नहीं....
.... एक क्रांति की तरह
.... जिस दिन
वो सूरज उगेगा
तो फिर नहीं होगी कभी कोई रात
'वक्त कितना कठिन है साथी' शीर्षक कविता में स्त्रियों पर हो रहे दैहिक हमलों की पड़ताल करती कवयित्री लीक से हटकर सीधे मूल कारण तलाशती है। वह सीधे सीधे सवाल उठाती है- मैं कैसे प्रेम गीत गाऊँ?, मैं कैसे घर का सपना संजोऊँ?, मैं कैसे विश्वास की नव चढ़ूँ? उसकी नज़र सीधे मर्म पर पहुँचती है कि जो पुरुष अपने घर की महिलाओं की आबरू का रखवाला है, वही घर के बाहर की महिलाओं के लिए खतरा क्यों है? कैसी विडम्बना है?
मर्द जो भाई पति प्रेमी है
वो दूसरी लड़कियों के लिए
भेदिया साबित हो सकता है कभी भी....
'क्या तुम जानते हो' में दुनिया के चर्चित स्त्री-दुराचार प्रकरणों का उल्लेख कर घरवाले से प्रश्न करती है कि वह घरवाली को कितना जानता है?
बताओ क्या तुम जानते हो
सालों से घर के भीतर रहनेवाली
अपनी पत्नी के बारे में
जो हर रात सोती है तुम्हारे बाद
हर सुबह उठती है तुमसे पहले
क्या उसने नींद पर विजय पा ली है?
जो हर वक्त पकाती है तुम्हरी पसंद का खाना
क्या उसे भी वही पसंद है हमेशा से
जो बिस्तर बन जाती है तुम्हारी कामना पर
क्या वो हर बार तैयार होती है देह के खेल के लिए
श्रुति की कविताओं का वैशिष्ट्य तिलमिला देनेवाले सवाल शालीन-शिष्ट भाषा में किंतु दृढ़ता और स्पष्टता के साथ पूछना है। वह न तो निरर्थक लाग-लपेट करते आवरण चढ़ाती है, न कुत्सित और अश्लील शब्दावली का प्रयोग करती है। राम-सीता प्रसंग में गागर में सागर की तरह चंद पंक्तियाँ 'कम शब्दों में अधिक कहने' की कला का अनुपम उअदाह्र्ण है-
सीता के लिए ही था ण
युद्ध
हे राम
फिर जीवित सीता को
क्यों कराया अग्नि-स्नान
श्रुति का आत्मविश्वास, अपने फैसले खुद करने का निश्चय और उनका भला या बुरा जो भी हो परिणाम स्वीकारने की तत्परता काबिले -तारीफ़ है। वह अन्धकार, से प्रेम करना, रावण को समझना तथा कुरूपता को पूजना चाहती है क्योंकि उन्होंने क्रमश: प्रकाश की महत्ता , सीता की दृढ़ता तथा सुन्दरता को उद्घाटित किया किंतु इन सबको भुला भी देना चाहती है कि प्रकाश, दृढ़ता और सुनदरता अधिक महत्वपूर्ण है। यह वैचारिक स्पष्टता और साफगोई इन कविताओं को पठनीय के साथ-साथ चिन्तनीय भी बनाती हैं।
'आशंका' इस संकलन की एक महत्वपूर्ण कविता है। यहाँ कवयित्री अपने पिटा के जन्मस्थान से जुड़ना चाहती है क्योंकि उसे यह आशंका है कि ऐसा ण करने पर कहीं उसके बच्चे भी उसके जन्म स्थान से जुड़ने से इंकार न कर दें। पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने और पालने वाले जीवन-मूल्यों और परंपराओं की जमीन पर रची गयी इस रचना का स्वर अन्य से भिन्न किंतु यथार्थपूर्ण है।
एक और मार्मिक कविता है 'पापा का गुस्सा'। पापा के गुस्से से डरनेवाली बच्ची का सोचना स्वाभाविक है कि पापा को गुस्सा क्यों आता है? बड़े होने पर उसे प्रश्न का उत्तर मिलता है-
आज समझ पाई हूँ
उनके गुस्से का रहस्य
पापा दरअसल गुस्सा नहीं होते
दुखी होते हैं
जब वे डांटते
तो हमारे लिए ही नहीं
उनके लिए भी सजा होती
आत्मावलोकन और आत्मालोचन इन कविताओं में जहाँ-तहाँ अन्तर्निहित है। कवयित्री गुलाब को तोड़ कर गुल्दासे में सजती है पर खुद को चोट पहुँचाने वाले को क्षमा नहीं कर पाती, भूखे भिखारी को अनदेखा कर देती है, अशक्त वृद्ध को अपनी सीट नहीं देती, अभाव में मुस्कुरा नहीं पाती, सहज ही भूल नहीं स्वीकारती यह तो हम सब करते हैं पर हमसे भिन्न कवयित्री इसे कवि होने की अपात्रता मानती है-
नहीं, मैं कवि नहीं
मैं तो मात्र
रचयिता हूँ
कवि तो वह है
जो मेरी कविता को जीता है।
जिस कविता के शीर्षक से पुस्तक के नामकरण हुआ है, वह है 'कशमकश'। अजब विडम्बना है कि आदमी की पहचान उसके अस्तित्व, कार्यों या सुयश से नहीं दस्तावेजों से होती है-
मैंने
पेनकार्ड रखा
पासपोर्ट, आधार कार्ड
मतदाता प्रमाण पत्र
खुद से जुड़े तमाम दस्तावेज सहेजे
और निकल पडी
लेकिन यह क्या
खुद को रखना तो भूल होगी
मुड़कर देखा तो
दूर तक नज़र नहीं आई मैं
अजीब कशमकश है
खुद को तलाशने पीछे लौटूं
या खुद के बगैर आगे बढ़ जाऊँ...
ये कवितायेँ बाहर की विसंगतियों का आकलन कर भीतर झाँकती हैं। बाहर से उठे सवालों के हल भीतर तलाशती कविताओं की भाषा अकृत्रिम और जमीनी होना सोने में सुहागा है। ये कविताएं आपको पता नहीं रहने देती, आपके कथ्य का भोक्ता बना देती हैं, यही कवयित्री और उसकी कारयित्री प्रतिभा की सफलता है।
***
सामयिक हास्य कविता:
राहुल जी का डब्बा गोल
*
लम्बी_चौड़ी डींग हाँकतीं, मगर खुल गयी पल में पोल
मोदी जी का दाँव चल गया, राहुल जी का डब्बा गोल
मातम मना रहीं शीला जी, हुईं सोनिया जी बेचैन
मौका चूके केजरीवाल जी, लेकिन सिद्ध हुए ही मैन
हंग असेम्बली फिर चुनाव का, डंका जनता बजा रही
नेताओं को चैन न आये, अच्छी उनकी सजा रही
लोक तंत्र को लोभ तंत्र जो, बना रहे उनको मारो
अपराधी को टिकिट दे रहे, जो उनको भी फटकारो
गहलावत को वसुंधरा ने, दिन में तारे दिखा दिये
जय-जयकार रमन की होती, जोगी जी पिनपिना गये
खिला कमल शिवराज हँस रहे, पंजा चेहरा छिपा रहा
दिग्गी को रूमाल शीघ्र दो, छिपकर आँसू बहा रहा
मतदाता जागो अपराधी नेता, बनें तो मत मत दो
नोटा बटन दबाओ भैया, एक साथ मिल करवट लो
***
पुस्तक चर्चा-
एक बहर पर एक ग़ज़ल - अभिनव सार्थक प्रयास
चर्चाकार- आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
पुस्तक परिचय- एक बहर पर एक ग़ज़ल, ब्रम्हजीत गौतम, ISBN ९७८-८१-९२५६१३-७-०, प्रथम संस्करण २०१६, आकार २१.५ से.मी. x १४ से.मी., आवरण पेपरबैक, बहुरंगी, पृष्ठ १४४/-, मूल्य २००/-, शलभ प्रकाशन १९९ गंगा लेन, सेक्टर ५, वैशाली, गाजियाबाद २०१०१०, रचनाकार संपर्क- युक्कौ २०६ पैरामाउंट सिम्फनी, क्रोसिंग रिपब्लिक, गाज़ियाबाद २०१०१६, चलभाष- ९७६०००७८३८।
*
'नाद' ही सृष्टि का मूल है। नाद की निरंतरता उसका वैशिष्ट्य है। नाद के आरोह और अवरोह लघु-गुरु के पर्याय हैं। नाद के साथ विविध ध्वनियाँ मिलकर अक्षर को और विविध अक्षर मिलकर शब्द को जन्म देते हैं। लघु-गुरु अक्षरों के विविध संयोग ही गण या रुक्न हैं जिनके अनेक संयोग लयों के रूप में सामने आते हैं। सरस लयों को काव्य शास्त्र छंद या बहर के रूप में वर्णित करता है। हिंदी पिंगल में छंद के मुख्य २ प्रकार मात्रिक (९२,२७,७६३) तथा वार्णिक (१३,४२,१७,६२६) हैं।१ यह संख्या गणितीय आधार पर गिनी गयी है। सामान्यत: २०-२५ प्रकार के छंद ही अधिक प्रयोग किये जाते हैं। उर्दू में बहरों के मुख्य २ प्रकार मुफरद या शुद्ध (७) तथा मुरक्कब या मिश्रित (१२) हैं।२ गजल छंद चेतना में ६० औज़ानों का ज़िक्र है।३ गजल ज्ञान में ६७ बहरों के उदाहरण हैं।४ ग़ज़ल सृजन के अनुसार डॉ. कुंदन अरावली द्वारा सं १९९१ में प्रकाशित उनकी पुस्तक इहितिसाबुल-अरूज़ में १३२ नई बहरें संकलित हैं।५ अरूज़े-खलील-मुक्तफ़ी में सालिम (पूर्णाक्षरी) बहरें १५ तथा ज़िहाफ (अपूर्णाक्षरी रुक्न) ६२ बताये गए हैं।६ गज़ल और गज़ल की तकनीक में ७ सालिम, २४ मुरक्कब बहरों के नमूने दिए गए हैं। ७. विवेच्य कृति में ६५ बहरों पर एक-एक ग़ज़ल कहीं गयी है तथा उससे सादृश्य रखने वाले हिंदी छंदों का उल्लेख किया गया है।
गौतम जी की यह पुस्तक अन्यों से भिन्न तथा अधिक उपयोगी इसलिए है कि यह नवोदित गजलकारों को ग़ज़ल के इतिहास और भूगोल में न उलझाकर सीधे-सीधे ग़ज़ल से मिलवाती है। बहरों का क्रम सरल से कठिन या रखा गया है। डॉ. गौतम हिंदी प्राध्यापक होने के नाते सीखनेवालों के मनोविज्ञान और सिखानेवालों कि मनोवृत्ति से बखूबी परिचित हैं। उन्होंने अपने पांडित्य प्रदर्शन के लिए विषय को जटिल नहीं बनाया अपितु सीखनेवालों के स्तर का ध्यान रखते हुए सरलता को अपनाया है। छंदशास्त्र के पंडित डॉ. गौतम ने हर बहर के साथ उसकी मात्राएँ तथा मूल हिंदी छंद का संकेत किया है। सामान्यत: गजलकार अपनी मनपसंद या सुविधाजनक बहर में ग़ज़ल कहते हैं किंतु गौतम जी ने सर्व बहर समभाव का नया पंथ अपनाकर अपनी सिद्ध हस्तता का प्रमाण दिया है।
प्रस्तुत गजलों की ख़ासियत छंद विधान, लयात्मकता, सामयिकता, सारगर्भितता, मर्मस्पर्शिता, सहजता तथा सरलता के सप्त मानकों पर खरा होना है। इन गजलों में बिम्ब, प्रतीक, रूपक और अलंकारों का सम्यक तालमेल दृष्टव्य है। ग़ज़ल का कथ्य प्रेयसी से वार्तालाप होने की पुरातन मान्यता के कारण ग़ालिब ने उसे तंग गली और कोल्हू का बैल जैसे विशेषण दिए थे। हिंदी ग़ज़ल ने ग़ज़ल को सामायिक परिस्थितियों और परिवेश से जोड़ते हुए नए तेवर दिए हैं जिन्हें आरंभिक हिचक के बाद उर्दू ग़ज़ल ने भी अंगीकार किया है। डॉ. गौतम ने इन ६५ ग़ज़लों में विविध भावों, रसों और विषयों का सम्यक समन्वय किया है।
नीतिपरकता दोहों में सहज किन्तु ग़ज़ल में कम ही देखने मिलती है। गौतम जी 'सदा सत्य बोलो सखे / द्विधा मुक्त हो लो सखे', 'यों न चल आदमी / कुछ संभल आदमी' आदि ग़ज़लों में नीति की बात इस खुबसूरती से करते हैं कि वह नीरस उपदेश न प्रतीत हो। 'हर तरफ सवाल है / हर तरफ उबाल है', 'हवा क्यों एटमी है / फिज़ा क्यों मातमी है', 'आइये गजल कहें आज के समाज की / प्रश्न कुछ भविष्य के, कुछ व्यथाएँ आज की' जैसी गज़लें सम-सामयिक प्रश्नों से आँखें चार करती हैं। ईश्वर को पुकारने का भक्तिकालीन स्वर 'मेरी नैया भंवर में घिरी है / आस तेरी ही अब आखिरी है' में दृष्टव्य है। पर्यावरण पर अपने बात कहते हुए गौतम जी मनुष्य को पेड़ से सीख लेने की सीख देते हैं- 'दूसरों के काम आना पेड़ से सीखें / उम्र-भर खुशियाँ लुटाना पेड़ से सीखें'। गौतम जी कि ग़ज़ल मुश्किलों से घबराती नहीं वह दर्द से घबराती नहीं उसका स्वागत करती है- 'दर्द ने जब कभी रुलाया है / हौसला और भी बढ़ाया है / क्या करेंगी सियाह रातें ये / नूर हमने खुदा से पाया है'।
प्यार जीवन की सुन्दरतम भावना है। गौतम जी ने कई ग़ज़लों में प्रकारांतर से प्यार की बात की है। 'गुस्सा तुम्हारा / है हमको प्यारा / आँखें न फेरो / हमसे खुदारा', 'तेरे-मेरे दिल की बातें, तू जाने मैं जानूँ / कैसे कटते दिन और रातें, तू जानें मैं जानूँ', 'उनको देखा जबसे / गाफिल हैं हम तबसे / यह आँखों की चितवन / करती है करतब से, 'इशारों पर इशारे हो रहे हैं / अदा पैगाम सारे हो रहे हैं' आदि में प्यार के विविध रंग छाये हैं। 'कितनी पावन धरती है यह अपने देश महान की / जननी है जो ऋषि-मुनियों की और स्वयं भगवान की', 'आओ सब मिलकर करें कुछ ऐसी तदबीर / जिससे हिंदी बन सके जन-जन की तकदीर' जैसी रचनाओं में राष्ट्रीयता का स्वर मुखर हुआ है।
सारत: यह पुस्तक एक बड़े अभाव को मिटाकर एक बड़ी आवश्यकता कि पूर्ति करती है। नवगजलकार खुश नसीब हैं कि उन्हें मार्गदर्शन हेतु 'गागर में सागर' सदृश यह पुस्तक उपलब्ध है। गौतम जी इस सार्थक सृजन हेतु साधुवाद के पात्र हैं। उनकी अगली कृति कि बेकरारी से प्रतीक्षा करेंगे गजल प्रेमी।
*** सन्दर्भ- १. छंद प्रभाकर- जगन्नाथ प्रसाद 'भानु', २. गजल रदीफ़ काफिया और व्याकरण- डॉ. कृष्ण कुमार 'बेदिल', ३. गजल छंद चेतना- महावीर प्रसाद 'मुकेश', ४. ग़ज़ल ज्ञान- रामदेव लाल 'विभोर', ५. गजल सृजन- आर. पी. शर्मा 'महर्षि', ६. अरूज़े-खलील-मुक्तफ़ी- ज़ाकिर उस्मानी रावेरी, ७. गज़ल और गज़ल की तकनीक- राम प्रसाद शर्मा 'महर्षि'.
***
पुस्तक चर्चा-
'गज़ल रदीफ़,-काफ़िया और व्याकरण' अपनी मिसाल आप
चर्चाकार- आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
पुस्तक विवरण- गज़ल रदीफ़,-काफ़िया और व्याकरण, डॉ. कृष्ण कुमार 'बेदिल', विधा- छंद शास्त्र, प्रथम संस्करण २०१५, आकार २२ से.मी. X १४.५ से.मी., आवरण सजिल्द बहुरंगी जैकेट सहित, पृष्ठ ९५, मूल्य १९५/-, निरुपमा प्रकाशन ५०६/१३ शास्त्री नगर, मेरठ, ०१२१ २७०९५११, ९८३७२९२१४८, रचनाकार संपर्क- डी ११५ सूर्या पैलेस, दिल्ली मार्ग, मेरठ, ९४१००९३९४३।
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हिंदी-उर्दू जगत के सुपरिचित हस्ताक्षर डॉ. कृष्ण कुमार 'बेदिल' हरदिल अज़ीज़ शायर हैं। वे उस्ताद शायर होने के साथ-साथ, अरूज़ के माहिर भी हैं। आज के वक्त में ज़िन्दगी जिस कशमकश में गुज़र रही है, वैसा पहले कभी नहीं था। कल से कल को जोड़े रखने कि जितनी जरूरत आज है, उतनी पहले कभी नहीं थी। लार्ड मैकाले द्वारा थोपी गयी और अब तक ढोई जा रही शिक्षा प्रणाली कि बदौलत ऐसी नस्ल तैयार हो गयी है जिसे अपनी सभ्यता और संस्कृति पिछड़ापन तथा विदेशी विचारधारा प्रगतिशीलता प्रतीत होती है। इस परिदृश्य को बदलने और अपनी जड़ों के प्रति आस्था और विश्वास पैदा करने में साहित्य की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण हो गयी है। ऐसे रचनाकार जो सृजन को शौक नहीं धर्म मानकर सार्थक और स्वस्थ्य रचनाकर्म को पूजा की तरह निभाते हैं उनमें डॉ. बेदिल का भी शुमार है।
असरदार लेखन के लिए उत्तम विचारों के साथ-साथ कहने कि कला भी जरूरी है। साहित्य की विविध विधाओं के मानक नियमों की जानकारी हो तो तदनुसार कही गयी बात अधिक प्रभाव छोड़ती है। गजल काव्य की सर्वाधिक लोकप्रिय वि धाओं में से एक है। बेदिल जी, ने यह सर्वोपयोगी किताब बरसों के अनुभव और महारत हासिल करने के बाद लिखी है। यह एक शोधग्रंथ से बहुत अधिक महत्वपूर्ण है। शोधग्रंथ विषय के जानकारों के लिए होता है जबकि यह किताब ग़ज़ल को जाननेवालों और न जाननेवालों दोनों के लिए सामान रूप से उपयोगी है। उर्दू की काव्य विधाएँ, ग़ज़ल का सफर, रदीफ़-काफ़िया और शायरी के दोष, अरूज़(बहरें), बहरों की किस्में, मुफरद बहरें, मुरक़्क़ब बहरें तथा ग़ज़ल में मात्रा गिराने के नियम शीर्षक अष्टाध्यायी कृति नवोदित ग़ज़लकारों को कदम-दर-कदम आगे बढ़ने में सहायक है।
एक बात साफ़ तौर पर समझी जानी चाहिए कि हिंदी और उर्दू हिंदुस्तानी जबान के दो रूप हैं जिनका व्याकरण और छंदशास्त्र कही-कही समान और कहीं-कहीं असमान है। कुछ काव्य विधाएँ दोनों भाषा रूपों में प्रचलित हैं जिनमें ग़ज़ल सर्वाधिक लोकप्रिय और महत्वपूर्ण है। उर्दू ग़ज़ल रुक्न और बहारों पर आधारित होती हैं जबकि हिंदी ग़ज़ल गणों के पदभार तथा वर्णों की संख्या पर। हिंदी के कुछ वर्ण उर्दू में नहीं हैं तो उर्दू के कुछ वर्ण हिंदी में नहीं है। हिंदी का 'ण' उर्दू में नहीं है तो उर्दू के 'हे' और 'हम्ज़ा' के स्थान पर हिंदी में केवल 'ह' है। इस कारण हिंदी में निर्दोष दिखने वाला तुकांत-पदांत उर्दूभाषी को गलत तथा उर्दू में मुकम्मल दिखनेवाला पदांत-तुकांत हिन्दीभाषी को दोषपूर्ण प्रतीत हो सकता है। यही स्थिति पदभार या वज़न के सिलसिले में भी हो सकती है। मेरा आशय यह नहीं है कि हमेशा ही ऐसा होता है किन्तु ऐसा हो सकता है इसलिए एक भाषारूप के नियमों का आधार लेकर अन्य भाषारूप में लिखी गयी रचना को खारिज करना ठीक नहीं है। इसका यह अर्थ भी नहीं है कि विधा के मूल नियमों की अनदेखी हो। यह कृति गज़ल के आधारभूत तत्वों की जानकारी देने के साथ-साथ बहरों कि किस्मों, उनके उदाहरणों और नामकरण के सम्बन्ध में सकल जानकारी देती है। हिंदी-उर्दू में मात्रा न गिराने और गिराने को लेकर भी भिन्न स्थिति है। इस किताब का वैशिष्ट्य मात्रा गिराने के नियमों की सटीक जानकारी देना है। हिंदी-उर्दू की साझा शब्दावली बहुत समृद्ध और संपन्न है।
उर्दू ग़ज़ल लिखनेवालों के लिए तो यह किताब जरूरी है ही, हिंदी ग़ज़ल के रचनाकारों को इसे अवश्य पढ़ना, समझना और बरतना चाहिए इससे वे ऐसी गज़लें लिख सकेंगे जो दोनों भाषाओँ के व्याकरण-पिंगाल की कसौटी पर खरी उतरें। लब्बोलुबाब यह कि बिदिक जी ने यह किताब पूरी फराखदिली से लिखी है जिसमें नौसिखियों के लिए ही नहीं उस्तादों के लिए भी बहुत कुछ है। इया किताब का अगला संस्करण अगर अंग्रेजी ग़ज़ल, बांला ग़ज़ल, जर्मन ग़ज़ल, जापानी ग़ज़ल आदि में अपने जाने वालों नियमों की भी जानकारी जोड़ ले तो इसकी उपादेयता और स्वीकृति तो बढ़ेगी ही, गजलकारों को उन भाषाओँ को सिखने और उनकी ग़ज़लों को समझने की प्रेरणा भी मिलेगी।
डॉ. बेदिल इस पाकीज़ा काम के लिए हिंदी-उर्दू प्रेमियों की ओर से बधाई और प्रशंसा के पात्र हैं। गुज़ारिश यह कि रुबाई के २४ औज़ानों को लेकर एक और किताब देकर कठिन कही जानेवाली इस विधा को सरल रूप से समझाकर रुबाई-लेखन को प्रोत्साहित करेंगे।
२७-१२-२०१६
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लघुकथा -
कब्रस्तान
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महाविद्यालय के प्राचार्य मुख्य अतिथि को अपनी संस्था की गुणवत्ता और विशेषताओं की जानकारी दे रहे थे. पुस्तकालय दिखलाते हुए जानकारी दी की हमारे यहाँ विषयों की पाठ्य पुस्तकें तथा सन्दर्भ ग्रंथों के साथ-साथ अच्छा साहित्य भी है. हम हर वर्ष अच्छी मात्र में साहित्यिक पुस्तकें भी क्रय करते हैं.
आतिथि ने उनकी जानकारी पर संतोष व्यक्त करते हुए पुस्तकालय प्रभारी से जानना चाहा कि गत २ वर्षों में कितनी पुस्तकें क्रय की गयीं, विद्यार्थियों ने कितनी पुस्तकें पढ़ने हेतु लीं तथा किन पुस्तकों की माँग अधिक थी? उत्तर मिला इस वर्ष क्रय की गयी पुस्तकों की आदित जांच नहीं हुई है, गत वर्ष खरीदी गयी पुस्तकें दी नहीं जा रहीं क्योंकि विद्यार्थी या तो विलम्ब से वापिस करते हैं या पन्ने फाड़ लेते हैं.
नदी में बहते पानी की तरह पुस्तकालय से प्रतिदिन पुस्तकों का आदान-प्रदान न हो तो उसका औचित्य और सार्थकता ही क्या है? तब तो वह किताबों का कब्रस्तान ही हो जायेगा, अतिथि बोले और आगे चल दिए.
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ॐकारेश्वर का विष्णु मंदिर – अल्पचर्चित किंतु भव्य
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ओमकारेश्वर ज्योतिर्लिंग होने के कारण यहाँ की पहचान मुख्य मंदिर तथा ॐ आकार का वह पर्वत है जिसकी परिक्रमा श्रद्धालुओं द्वारा की जाती है। यहाँ धार्मिक दृष्टि से आने वाले सैलानियों के लिये भी एक अन्य आकर्षण जुड गया, वह है ॐकारेश्वर में एनएचडीसी द्वारा निर्मित बाँध। इसके अतिरिक्त ममलेश्वर मंदिर नर्मदा नदी के दूसरे तट पर अवस्थित है जिसे कतिपय विद्वान ज्योतिर्लिंग परिभाषित करते हैं। यहाँ मंदिर की दीवारों पर उकेरी गयी प्रस्तराकृतियाँ व लिखे गये स्त्रोत वर्ष 1063 के बताये जाते हैं।
ॐकारेश्वर के इन मुख्य आकर्षणों पर पर्यटकों की अच्छी खासी संख्या दैनिक रूप से उपस्थित रहती है। नौकायन करते हुए जब मैं नदी के उत्तरी तट पर ओमकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शनों के लिये जा रहा था, मध्य से चारों ओर का दृश्य निहारते हुए इस प्राचीन स्थान के महात्म्य और ऐतिहासिकता ने मन-मोह लिया। पर्वत के शीर्ष पर प्राचीन राजमहल बहुत ही दयनीय अवस्था में भी शान से कुछ कहता प्रतीत होता है। यत्र तत्र अनेक ऐतिहासिक महत्व के भग्नावशेष हैं जिनतक पहुँचना भी संभव नहीं चूंकि उनकी पीठ पर कई धर्मशालायें हैं। यह केवल ओंकारेश्वर की ही बात नहीं अपितु कमोबेश पूरे देश में ही इतिहास हमारी सोच में भी केन्द्रित नहीं और हम खण्डहर कह सब कुछ अनदेखा कर देते हैं।
ओंकारेश्वर मुख्य मंदिर और ममलेश्वर मंदिर के अतिरिक्त यहाँ अनेक मंदिरों व आश्रमों की श्रंखला है जो अपनी प्राचीनता के कारण महत्व के स्थान हैं। ओमकार पर्वत और आसपास गोविन्देश्वर गुफा, ऋणमुक्तेश्वर मंडिर, गौरी-सोमनाथ मंदिर, सिद्धनाथ मंदिर, आशापुरी मंदिर, ब्रम्हेश्वर मंदिर, लक्ष्मीनारायण मंदिर, इन्द्रेश्वर मंदिर, काशी-विश्वनाथ मंदिर, वृहदेश्वर मंदिर, कपिलेश्वर मंदिर, हनुमान मंदिर, अन्नपूर्णा मंदिर, मार्कण्डेय आश्रम, गया शिला तीर्थ आदि अवस्थित हैं। केवल मंदिर ही नहीं अपितु इस परिधि में गुरुद्वारा तथा सिद्धवरकूट जैनतीर्थ भी नर्मदा एवं कावेरी नदियों के संगम पर है। नर्मदा नदी पर इन तीर्थों को देख कर यह स्वत: ही मनोभावना उठती है कि “त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवि नर्मदे”।
नदी के दक्षिणी तट पर स्थित एक मंदिर ने अपनी कलात्मकता के कारण मेरा ध्यान खींचा था। मुझे जानकारी प्राप्त हुई कि यह एक विष्णु मंदिर है। मंदिर की पूरी संरचना को सफेद रंग के पोत दिया गया है यहाँ तक कि प्रतिमायें भी लिपि-पुती हैं जो संभव है इतिहास के किसी विद्यार्थी को मायूस कर सकती हैं। बहुत पर्यटक नहीं आते अंत: शांत और एकांतप्रिय लोगों के लिये यहाँ खडे हो कर नर्मदा नदी के प्रवाह को देखना अद्भुत आनंद का सिद्ध हो सकता है। मंदिर का मुख नर्मदा नदी की ओर है तथा यह गर्भगृह, अंतराल एवं मण्डप तीन भागों में विभक्त है।
विष्णु मंदिर के मण्डप वाले हिस्से में सोलह अलंकृत स्तम्भ है जो मंदिर की भव्यता बढाते हैं। मंदिर का प्रत्येक स्तम्भ नृत्य मुद्रा में किसी अपसरा से ले कर किसी पौराणिक आख्यान तक स्वयं में समाविष्ट किये हुए हैं। पृष्ठ भाग छोड कर तीन ओर से सीढियाँ है जिनसे हो कर चबूतरे पर चढा जा सकता है एवं चतुर्भुजी भगवान विष्णु के दर्शन किये जा सकते हैं। अंतराल वाले भाग में दीवारों पर भगवान विष्णु, उमा-महेश्वर तथा भगवान कृष्ण की लीलाओं सम्बन्धी प्रतिमायें देखी जा सकती हैं। मंदिर का गर्भगृह आयताकार है किंतु बहुत विशाल नहीं है। मंदिर का शिखर यद्यपि तुलनात्मक रूप से विशाल व दर्शनीय है। शिखर पर निश्चित अंतराल में दो द्वार बने हुए हैं। मंदिर के चारो को दो हाथी, कमल, भगवान विष्णु आदि सहित कतिपय मिथुन प्रतिमायें भी हैं।
मंदिर के अहाते में ही भगवान विष्णु की एक प्रतिमा खण्डित अवस्था में रखी हुई है। प्रतिमा अलंकृत है तथा दर्शनीय है। इस स्थान से आगे बढ कर नर्मदानदी के विस्तार का आनंद लिया जा सकता है। यहाँ से ओमकारेश्वर का पुराना पुल, अनेकों मंदिर व प्राकृतिक दृष्य दृष्टिगोचर होते हैं। ओमकारेश्वर में अवस्थित यह भव्य विष्णु मंदिर पर्यटकों की उपेक्षा क्यों झेल रहा है इसका कारण संभवत: इस स्थान के समुचित प्रचार – प्रसार का न होना है। मुझे लगता है कि किसी स्थान की महत्ता को यदि वास्तव में जानना-समझना है तो ऐसे ही अल्प-चर्चित स्थलों के लिये थोड़ा समय निकालना भी आवश्यक है।
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नवगीत
गुरु विपरीत
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गुरु विपरीत
हमेशा चेले
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गाँधी कहते सत्य बोलना
गाँधीवादी झूठ बोलते
बुद्ध कहें मत प्रतिमा गढ़ना
बौद्ध मूर्तियाँ लिये डोलते
जिन मुनि कहते करो अपरिग्रह
जैन संपदा नहीं छोड़ते
चित्र गुप्त हैं निराकार
कायस्थ मूर्तियाँ लिये दौड़ते
इष्ट बिदा हो जाता पहले
कैसे यह
विडंबना झेले?
गुरु विपरीत
हमेशा चेले
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त्यागी मठ-आश्रम में बैठे
अपने ही भक्तों को लूटें
क्षमा करो कहते ईसा पर
ईसाई दुश्मन को कूटें
यवन पूजते बुत मक्का में
लेकिन कहते बुत हैं झूठे
अभियंता दृढ़ रचना करते
किन्तु समय से पहले टूटें
माया कहते हैं जो जग को
रमते हैं
लगवाकर मेले
गुरु विपरीत
हमेशा चेले
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विद्यार्थी विद्या की अर्थी
रोज निकालें नकल कर-कर
जन प्रतिनिधि जनगण को ठगते
निज वेतन-भत्ते बढ़वाकर
अर्धनग्न घूमे अभिनेत्री
नित्य न अभिनय बदन दिखाकर
हम कहते गृह-स्वामी खुद को
गृहस्वामिनी की आज्ञा लेकर
गिनें कहाँ तक
बहुत झमेले?
गुरु विपरीत
हमेशा चेले
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नवगीत -
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सल्ललाहो अलैहि वसल्लम
*
सल्ललाहो अलैहि
वसल्लम
क्षमा करें सबको
हम हरदम
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सब समान हैं, ऊँच न नीचा
मिले ह्रदय बाँहों में भींचा
अनुशासित रह करें इबादत
ईश्वर सबसे बड़ी नियामत
भुला अदावत, क्षमा दान कर
द्वेष-दुश्मनी का
मेटें तम
सल्ललाहो अलैहि
वसल्लम
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तू-मैं एक न दूजा कोई
भेदभाव कर दुनिया रोई
करुणा, दया, भलाई, पढ़ाई
कर जकात सुख पा ले भाई
औरत-मर्द उसी के बंदे
मिल पायें सुख
भुला सकें गम
सल्ललाहो अलैहि
वसल्लम
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ज्ञान सभ्यता, सत्य-हक़ीक़त
जगत न मिथ्या-झूठ-फजीहत
ममता, समता, क्षमता पाकर
राह मिलेगी, राह दिखाकर
रंग- रूप, कद, दौलत, ताकत
भुला प्रेम का
थामें परचम
सल्ललाहो अलैहि
वसल्लम
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कब्ज़ा, सूद, इजारादारी
नस्लभेद घातक बीमारी
कंकर-कंकर में है शंकर
हर इंसां में है पैगंबर
स्वार्थ छोड़कर, करें भलाई
ईशदूत बन
संग चलें हम
सल्ललाहो अलैहि
वसल्लम
२७-१२-२०१५
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सोमवार, 12 दिसंबर 2022

सॉनेट, शिव, साक्षात्कार, ब्रह्मजीत गौतम, समीक्षा, दोहा गीत, मुक्तक, गंगा स्तोत्र,

सॉनेट
शिव
सदा शिव का भजन करिए
शक्ति के आधार हैं शिव
भक्तिमय संसार हैं शिव
साथ शिव के सलिल रहिए

मित्र! शिव का मनन करिए
युक्ति हैं; व्यापार हैं शिव
पतित तारणहार हैं शिव
मौन रहकर सतत भजिए

शुभद हैं कल्याण हैं शिव
भव-भयों से त्राण हैं शिव
प्राणि हम; संप्राण हैं शिव

सत्य हैं शिव याद रखिए
परम सुंदर मत बिसरिए
आत्म को विश्वात्म करिए
संजीव
१२-१२-२०२२
जबलपुर,७॰०१
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साक्षात्कार
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आज सच मे सरस्वती माँ के पुत्र का साक्षात्कार लेकर खुद को सौभाग्य शाली समझता हूं

वर्षो पूर्व लिखी सरस्वती वंदना जो सरस्वती शिशु मंदिर में बच्चे प्रातः गाकर शिक्षा गृहण करते है,और शायद प्रथम सरस्वती वंदना है।
उस वन्दना के रचयिता दादा संजीव वर्मा,सलिल जी से एक भेंट,पूरा कार्यक्रम इस लिंक पर देखे
अंतरराष्ट्रीय काव्य प्रेमी मंच,

गोविन्द गुप्ता

वीणापाणी सुनें वंदना, कुमुद लिए कमलेश

दिव्य मोहिनी छवि है अनुपम, विनत हुए राजेश

आशुतोष मृत्युंजय वंदन, नमन राम घनश्याम

सदय राम मोहन हों हम पर, ममता मृदुल ललाम

गीता गोविन्द कहें एकता, कर हों हम राजेंद्र

प्रीतम-प्रिया न दूर रहें अब, हों वे शचि-देवेंद्र

करे अर्चना सौरभ बिखरा, जिया थाम धीरेश

उषा-शशि किरण सुमन लिए ऋतु , कर जोड़े देवेश

झरना प्रवहित भक्ति भाव का, सपना है साकार

विजय प्रकाश हमें दो मैया, हो पाएँ अवनीश

आशा-आशी हों आशीषित, खुश मनीष रजनीश

अनुपमा अनुभा अनामिका, अंजुरी भर राजीव

बबिता चंद्र अंजना सज्जित, नमित हुई संजीव

सचिन शनाया राजपाल मिल, मग्न जोड़ कर साथ

नीतू नित्य नव्य स्वर छेड़े, गा स्तुति नत माथ

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कृति चर्चा :
दोहे पानीदार
चर्चाकार - आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’
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[कृति विवरण: दोहे पानीदार, दोहा संकलन, डॉ. ब्रह्मजीत गौतम, प्रथम संस्करण २०१९, आईएसबीएन ९७८-९३-८८९४६-८०-३, आकार २२.से.मी. x १३.५ से.मी., आवरण बहुरंगी पेपरबैक, पृष्ठ २००, मूल्य १५० रु., बेस्ट बुक बडीज टेक्नोलॉजीस, नई दिल्ली, दोहाकार संपर्क - युक्का २०६, पैरामाउण्ट सिम्फनी, क्रॉसिंग रिपब्लिक, ग़ाज़ियाबाद २०१०१६ उ. प्र., चलभाष - ०९७६०००७८३८, ०९४२५१०२१५४०, ई-मेल bjgautam2007@gmail.com ।]
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भारत में किसी कार्य का श्री गणेश ईश वंदना से करने की परंपरा है। वरिष्ठ दोहाकार डॉ. ब्रह्मजीत गौतम ने एक नयी रीति का आरंभ ‘ध्यातव्य बातें’ शीर्षक के अंतर्गत दोहा-लेखन के दोषों की चर्चा से किया है। कबीर काव्य में प्रतीक विधान पर शोध और कबीर प्रतीक कोष की रचना करनेवाला दोषों को चुन-चुन कर चोट करने की कबीरी राह पर चले यह स्वाभाविक है। गौतम जी बहुआयामी रचनाकार हैं। शोधपरक कृति जनक छंद - एक विवेचन, काव्य संग्रह अंजुरी, ग़ज़ल संग्रह वक़्त के मंजर व एक बह्र पर एक ग़ज़ल, जनक छंद संग्रह जनक छंद की साधना, मुक्तक संग्रह दोहा मुक्तक माल तथा समीक्षा संग्रह दृष्टिकोण के रचनाकार सेवानिवृत्त हिंदी प्राध्यापक डॉ. गौतम ने दोहराव, अस्पष्टता तथा पूर्वापर संबंध को दोहा लेखन का कथ्यदोष तथा अनूठापन, धार और संदेशपरकता को दोहा लेखन का गुण ठीक ही बताया है। ‘शिल्प’ उपशीर्षक के अंतर्गत मात्रा गणना, अधिक मात्रा दोष, न्यून मात्रा दोष, ग्यारहवीं मात्रा लघु न होना, वाक्य भंजक दोष, लय दोष, मात्रा विभाजन दोष, तुक विधान दोष, अनुस्वार दोष, अवांछित व्यंजनागम की चर्चा है। भाषा रूप उपशीर्षक के अंतर्गत पुनरक्ति दोष, एक शब्द दो उच्चारण, शब्दों के मध्य अनावश्यक दूरी, पर का प्रयोग, अवैध संधि, लिंग, वचन, पुरुष, काल, अमानक शब्द-प्रयोग आदि पर विमर्श है तथा अंत में दोहा के २३ प्रकारों की निरर्थकता का संकेत है। डॉ. गौतम ने छंदप्रभाकरकार जगन्नाथ प्रसाद ‘भानु’ द्वारा उल्लिखित नियमों का संदर्भ दिया है किन्तु पदारंभ में दग्धाक्षर व् जगण निषेध की चर्चा नहीं है। भाषा और नदी सतत परिवर्तित होकर निर्मल बनी रहती हैं। भानु जी ने ग्यारहवीं मात्रा को लघु रखे जाने का संकेत किया है किन्तु उनके पूर्व और पश्चात् के अनेक दोहाकारों (जिनमें कबीर, खुसरो, जायसी, तुलसी, बिहारी जैसे अमर दोहाकार भी हैं) ने इस नियम को अनुल्लंघनीय न मानकर दोहे रचे हैं।
अब वंदना के प्रथम दोहे से गौतम जी ने परंपरा-पालन किया है। दोहा मुक्तक छंद है। वह पूर्व या पश्चात् के दोहों से पूरी तरह मुक्त, अपने आप में पूर्ण होता है। आजकल एक विषय पर दोहों को एकत्र कर अध्यायों में विभक्त करने का चलन होने पर भी गौतम जी ने ५२० दोहे क्रमानुसार प्रकाशित कर लीक को ठीक ही तोडा है। सामान्य रचनाकार ‘स्वांत: सुखाय’ लिखता है जबकि गौतम जी जैसा रचनाकार इसके समानांतर श्रोता और पाठक में सत्साहित्य की समझ भी विकसित करते हैं। गौतम जी कबीर की तरह भाषा को शाब्दिक संस्कृतनिष्ठता का कुआँ न बनाकर कथ्यानुकूल विविध भाषाओँ से शब्द चयन कर ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ के वैदिक आदर्श को मूर्त करते हैं। यह आदर्श धार्मिक समानता और समरसता की जननी है -
अल्ला या ईसा कहो, या फिर कह लो राम।
करता ‘वही’ सहायता, जब पड़ता है काम।।
गौतम जी ‘तत्तु समन्वयात’ के बौद्ध सूत्र को जीवन में अनिवार्य मानते हैं-
आत्मिक-भौतिक उन्नयन, दोनों हैं अनिवार्य।
यदि इनमें हो संतुलन, जीवन हो कृतकार्य।।
दोहों में लोकोक्तियों का प्रयोग करने की परंपरा गौतम जी को भाती है। लोकोक्ति दोहे को मुहावरेदार और लोक ग्राह्य बनाती है। ‘आप भले तो जग भला’ लोकोक्ति का सार्थक प्रयोग देखिए -
आप भले तो जग भला, कहें पुराने लोग।
जिसने समझा सूत्र यह, खुद पर करे प्रयोग।।
हिंदी व्याकरण के अनुसार ‘एक’ के स्थान पर ‘इक’ का प्रयोग गलत है किंतु गौतम जी ने ‘इक’ का प्रयोग किया है। भाषिक शुद्धता के पक्षधर विद्वान दोहाकार के लिए इससे बचना कठिन नहीं है पर संभवत: उर्दू ग़ज़ल से जुड़ाव के कारण उन्हें इसमें आपत्ति नहीं हुई।
इक तो आलस दूसरे, बात-बात में क्रोध।
कैसे ठहरे अनुज में, फिर विवेक या बोध।।
इक विरहानल दूसरे, सूरज का आतंक।
दो-दो ज्वालाएँ सहे, कैसे मुखी मयंक।।
महानगरीय स्वार्थपरक जीवन दृष्टि प्रकृति को भोग्य मानकर उसका शोषण कर विनाश को आमंत्रित कर रही है। दोहाकार उस जीवन पद्धति को अपनाने का गृह करता है जो प्रकृति के अनुकूल हो-
इस सीमा तक हो सहज, अपने जीवन-ढंग।
हो जाए जो प्रकृति से, एक रूप-रस-रंग।।
‘कर्म’ को महत्त्व देना भारतीय जन-जीवन का वैशिष्ट्य है. गीता ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते” कहती है तो तुलसी ‘कर्म प्रधान बिस्व करि राखा’ कहकर कर्म की महत्ता प्रतिपादित करते हैं। गौतम जी कर्मव्रती खद्योत को प्रणाम कर कर्म-पथ का महत्ता प्रतिपादित करते हैं-
उस नन्हें खद्योत को, बारंबार प्रणाम।
जो करता है रात में, तम का काम तमाम।।
कबीर ‘गुरु’ और ‘गोबिंद’ में से गुरु को पहले प्रणाम करते हैं चूँकि ‘गुरु’ ही ‘गोबिंद’ से मिलवाता है। कबीर के अनुयायी गौतम जी गुरु को कृपानिधान कहकर प्रणाम करते हैं-
उस सद्गुरु को है नमन, जो है कृपा-निधान।
ज्ञान-ज्योति से शिष्य का, जो हरता अज्ञान।।
शिक्षा जगत से जुड़े गौतम जी को भाषा की उपेक्षा और गलत प्रयोग व्यथित करे, यह स्वाभाविक है. वे स्वतंत्र देश में विदेशी सम्प्रभुओं की भाषा के बढ़ते वर्चस्व को देखकर हिंदी के प्रति चिंतित हैं-
ए बी सी आये नहीं, पर अंग्रेजी बोल।
हिंदी की है देश में, नैया डाँवाडोल।।
अमिधा के साथ-साथ लक्षणा और व्यंजना का प्रयोग जगह-जगह बखूबी किया गया है है इस दोहा संग्रह में।
ओ पानी के बुलबुले!, करता क्यों अभिमान?
हवा चली हो जाएगा, पल में अंतर्ध्यान।।
नश्वर ज़िंदगी को ओस बूँद बताते इस दोहे में पापजनित ताप को नाशक ठीक ही बताया गया है-
ओस-बूँद सी ज़िंदगी, इसे सहेजें आप।
ताप लगा यदि पाप का, बन जाएगी भाप।।
‘बनने’ के लिए प्रयत्न करना होता है। नष्ट होने के लिए कोई प्रयत्न नहीं करता। दोहाकार आप ही प्रथम पंक्ति में ज़िंदगी को सहेजने का संदेश देता है। ‘होना’ बिना प्रयास के होता है। ‘बन’ के स्थान पर ‘हो’ का प्रयोग अधिक स्वाभाविक होगा।
कब से यह मन रट रहा, सतत एक ही नाम।
कब यह मंज़िल पायगा, तू जाने या राम।।
यहाँ प्रयोग किया गया ‘पायगा’ शब्दकोशीय ‘पायेगा’ का अपभृंश है। इससे बच जाना उचित होता।
इस संग्रह का स्मरणीय दोहा शिव-निवासस्थली काशी और कबीर की इहलीला संवरणस्थली मगहर के मध्य सेतु स्थापित करने के साथ-साथ गौतम जी के दोहाकार की सामर्थ्य का भी परिचायक है -
कर दे मुझ पर भी कृपा, कुछ तो कृपा-निकेत।
तू काशी का देवता, मैं मगहर का प्रेत।।
‘आस्तीन में साँप’ मुहावरे का उपयोग कर गौतम जी ने एक और जानदार दोहा रचा है -
करते हैं अब साँप सब, आस्तीन में वास।
बांबी से बढ़कर उन्हें, यहाँ सुरक्षा ख़ास।।
काव्य रचना केवल मनोविलास या वाग्विलास नहीं है। यह सामान्यत: प्रसांगिक रहकर शांति और विशेष परिस्थितियों में क्रांति की वाहक होकर परिवर्तन लाती है -
कविता का उद्देश्य है, स्वांत: सुख औ’ शांति।
लेकिन वही समाज में, ला देती है क्रांति।।
कविता में यदि है नहीं, जन जीवन की पीर।
समझो सागर में भरा, केवल खारा नीर।।
सामाजिक विसंगतियों पर गौतम जी के दोहा-प्रहार सटीक हैं-
काम करना हो अगर, रखिये पेपरवेट।
जितना भारी काम हो, उतना भारी रेट।।
कुर्सी जिसको मिल गयी, हो जाता सर्वज्ञ।
कक्षा में जी उम्र भर, रहा भले हो अज्ञ।।
कोई चारा खा रहा, कोई खाता खाद।
नेताओं के स्वाद की, देनी होगी दाद।।
चाहे दिल्ली में रहो, या कि देहरादून।
पाओगे सर्वत्र ही, अंध-बधिर कानून।।
चिड़ियाँ चहकें किस तरह, किसे दिखाएँ नाज़।
मँडराते हैं जब निडर, नीड़-नीड़ पर बाज।।
जंगल काटे स्वार्थवश, बनकर वीर प्रचंड
पर्यावरण विनाश का, धरा भोगती दंड।।
जो भू पर न बना सके, एक प्रेम का सेतु।
जा पहुँचे वे चाँद पर, शहर बसाने हेतु।।
इन दोहों में अलंकारों (अनुप्रास, पुनरुक्ति प्रकाश, यमक, श्लेष, उपमा, रूपक, वक्रोक्ति, विरोधाभास, असंगति, अतिशयोक्ति आदि) के प्रचुर प्रयोग हैं-
पति पंचानन पुत्र हैं, गजमुख षड्मुख नाम।
देवि अन्नपूर्णा करें, उदर-पूर्ति अविराम।। -वक्रोक्ति
पत्ता हिले न ग्रीष्म में, हवा जेल में बंद।
कर्फ्यू में ज्यों गूँजते, सन्नाटों के छंद।। - अतिशयोक्ति
पीते हैं घी-दूध नित, पत्थर के भगवान्।
शिल्पकार उसके मगर, तजें भूख से प्राण।।
सारत: दोहे पानीदार के दोहे नवोदितों के लिए पाठ्य पुस्तक, स्थापितों के लिए प्रेरणा तथा सिद्धहस्तों के लिए संतोषकारक हैं। गौतम जी जैसे वरिष्ठ दोहाकार अपने मानक आप ही निर्धारित करते हैं -
भाषा-भाव समृद्ध हों, हो सुंदर अभिव्यक्ति।
कविता रस निष्पत्ति की, तब पाती है शक्ति।।
पाठक बेकली से गौतम जी के इस दोहा संग्रह कर काव्यानंद की जयकार करते हुए अगले दोहा संग्रह की प्रतीक्षा करेंगे।
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संपर्क - आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’, विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, चलभाष - ९४२५१८३२४४, ईमेल - salil.sanjiv@gmail.com
१२-१२-२०१९

***
सामयिक दोहा गीत
*
अहंकार की हार
*
समय कह रहा: 'आँक ले
तू अपनी औकात।
मत औरों की फ़िक्र कर,
भुला न बोली बात।।
जीत नम्रता की हुई,
अहंकार की हार...
*
जनता ने प्रतिनिधि चुने,
दूर करें जन-कष्ट।
मुक्त कराओ किसी से,
नहीं घोषणा शिष्ट।।
बड़बोले का सिर झुका,
सही नियति का न्याय।
रोजी छन गरीब की,
हो न सेठ-पर्याय।।
शाह समझ मत कर कभी,
जन-हित पर आघात।
समय कह रहा आँक ले
तू अपनी औकात।।
लौटी आकर लक्ष्मी
देख बंद है द्वार,
जीत नम्रता की हुई,
अहंकार की हार...
*
जोड़-तोड़कर मत बना,
जहाँ-तहाँ सरकार।
छुटभैये गुंडइ करें,
बिना बात हुंकार।।
सेठ-हितों की नीतियाँ,
अफसर हुए दबंग।
श्रमिक-कृषक क्रंदन करें,
आम आदमी तंग।
दाम बढ़ा पेट्रोल के,
खुद लिख ली निज मात।
समय कह रहा आँक ले
तू अपनी औकात।।
किया गैर पर; पलटकर
खुद ही झेला वार,
जीत नम्रता की हुई,
अहंकार की हार...
*
लघु उद्योगों का हुआ,
दिन-दिन बंटाढार।
भूमि किसानों की छिनी,
युवा फिरें बेकार।
दलित कहा हनुमंत को,
कैसे खुश हों राम?
गरज प्रवक्ता कर रहे,
खुद ही जनमत वाम।
दोष अन्य के गिनाकर,
अपने मिटें न तात।
समय कह रहा आँक ले
तू अपनी औकात।।
औरों खातिर बोए थे,
खुद को चुभते खार,
जीत नम्रता की हुई,
अहंकार की हार...
***
१२.१२.२०१८
(३ राज्यों में भाजपा की हार पर)
***
दोहा
दीप-ज्योति जलती रहे, तिमिर न पाए जीत.
शब्द दीप से प्रकाशित, हो अन्तर्मन मीत.
१२-१२-२०१७
***
मुक्तक:
गीत रचें नवगीत रचें अनुगीत रचें या अगीत रचें
कोशिश यह हो कि रचें जो भी न कुरीत रचें, सद्ऱीत रचें
कुछ बात कहें अपने ढंग से, रस लय नव बिम्ब प्रतीक रहे
नफरत-विद्वेष न याद रहे, बंधुत्व स्नेह संग प्रीत रचें
१२-१२-२०१४
***
नवगीत:
जिजीविषा अंकुर की
पत्थर का भी दिल
दहला देती है
*
धरती धरती धीरज
बनी अहल्या गुमसुम
बंजर-पड़ती लोग कहें
ताने दे-देकर
सिसकी सुनता समय
मौन देता है अवसर
हरियाती है कोख
धरा हो जाती सक्षम
तब तक जलती धूप
झेलकर घाव आप
सहला लेती है
*
जग करता उपहास
मारती ताने दुनिया
पल्लव ध्यान न देते
कोशिश शाखा बढ़ती
द्वैत भुला अद्वैत राह पर
चिड़िया चढ़ती
रचती अपनी सृष्टि आप
बन अद्भुत गुनिया
हार न माने कभी
ज़िंदगी खुद को खुद
बहला लेती है
*
छाती फाड़ पत्थरों की
बहता है पानी
विद्रोहों का बीज
उठाता शीश, न झुकता
तंत्र शिला सा निठुर
लगे जब निष्ठुर चुकता
याद दिलाना तभी
जरूरी उसको नानी
जन-पीड़ा बन रोष
दिशाओं को भी तब
दहला देती है
१२-१२-२०१४
***
श्री गंगा स्तोत्र...
रचना : आदि जगद्गुरु शंकराचार्य...
दॆवि! सुरॆश्वरि! भगवति! गङ्गॆ त्रिभुवनतारिणि तरलतरङ्गॆ ।
शङ्करमौलिविहारिणि विमलॆ मम मतिरास्तां तव पदकमलॆ ॥ 1 ॥
[हे देवी ! सुरेश्वरी ! भगवती गंगे ! आप तीनो लोको को तारने वाली हो... आप शुद्ध तरंगो से युक्त हो... महादेव शंकर के मस्तक पर विहार करने वाली हो... हे माँ ! मेरा मन सदैव आपके चरण कमलो पर आश्रित है...
O Goddess Ganga! You are the divine river from heaven, you are the saviour of all the three worlds, youare pure and restless, you adorn Lord Shiva’s head. O Mother! may my mind always rest at your lotus feet...]
भागीरथिसुखदायिनि मातस्तव जलमहिमा निगमॆ ख्यातः ।
नाहं जानॆ तव महिमानं पाहि कृपामयि मामज्ञानम् ॥ 2 ॥
[ हे माँ भागीरथी ! आप सुख प्रदान करने वाली हो... आपके दिव्य जल की महिमा वेदों ने भी गई है... मैं आपकी महिमा से अनभिज्ञ हू... हे कृपामयी माता ! आप कृपया मेरी रक्षा करें...
O Mother Bhagirathi! You give happiness to everyone. The significance of your holy waters is sung in the Vedas. I am ignorant and am not capable to comprehend your importance. O Devi! you are full of mercy. Please protect me...]
हरिपदपाद्यतरङ्गिणि गङ्गॆ हिमविधुमुक्ताधवलतरङ्गॆ ।
दूरीकुरु मम दुष्कृतिभारं कुरु कृपया भवसागरपारम् ॥ 3 ॥
[ हे देवी ! आपका जल श्री हरी के चरणामृत के समान है... आपकी तरंगे बर्फ, चन्द्रमा और मोतिओं के समान धवल हैं... कृपया मेरे सभी पापो को नष्ट कीजिये और इस संसार सागर के पार होने में मेरी सहायता कीजिये...
O Devi! Your waters are as sacred as “Charanamriti” of Sri Hari. Your waves are white like snow, moon and pearls. Please wash away all my sins and help me cross this ocean of Samsara...]
तव जलममलं यॆन निपीतं परमपदं खलु तॆन गृहीतम् ।
मातर्गङ्गॆ त्वयि यॊ भक्तः किल तं द्रष्टुं न यमः शक्तः ॥ 4 ॥
[हे माता ! आपका दिव्य जल जो भी ग्रहण करता है, वह परम पद पता है... हे माँ गंगे ! यमराज भी आपके भक्तो का कुछ नहीं बिगाड़ सकते...
O Mother! those who partake of your pure waters, definitely attain the highest state. O Mother Ganga! Yama, the Lord of death cannot harm your devotees...]
पतितॊद्धारिणि जाह्नवि गङ्गॆ खण्डित गिरिवरमण्डित भङ्गॆ ।
भीष्मजननि हॆ मुनिवरकन्यॆ पतितनिवारिणि त्रिभुवन धन्यॆ ॥ 5 ॥
[हे जाह्नवी गंगे ! गिरिवर हिमालय को खंडित कर निकलता हुआ आपका जल आपके सौंदर्य को और भी बढ़ा देता है... आप भीष्म की माता और ऋषि जह्नु की पुत्री हो... आप पतितो का उद्धार करने वाली हो... तीनो लोको में आप धन्य हो...
O Jahnavi! your waters flowing through the Himalayas make you even more beautiful. You are Bhishma’s mother and sage Jahnu’s daughter. You are saviour of the people fallen from their path, and so you are revered in all three worlds...]
कल्पलतामिव फलदां लॊकॆ प्रणमति यस्त्वां न पतति शॊकॆ ।
पारावारविहारिणिगङ्गॆ विमुखयुवति कृततरलापाङ्गॆ ॥ 6 ॥
[ हे माँ ! आप अपने भक्तो की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करने वाली हो... आपको प्रणाम करने वालो को शोक नहीं करना पड़ता... हे गंगे ! आप सागर से मिलने के लिए उसी प्रकार उतावली हो जिस प्रकार एक युवती अपने प्रियतम से मिलने के लिए होती है...
O Mother! You fulfill all the desires of the ones devoted to you. Those who bow down to you do not have to grieve. O Ganga! You are restless to merge with the ocean, just like a young lady anxious to meet her beloved...]
तव चॆन्मातः स्रॊतः स्नातः पुनरपि जठरॆ सॊपि न जातः ।
नरकनिवारिणि जाह्नवि गङ्गॆ कलुषविनाशिनि महिमॊत्तुङ्गॆ ॥ 7 ॥
[हे माँ ! आपके जल में स्नान करने वाले का पुनर्जन्म नहीं होता... हे जाह्नवी ! आपकी महिमा अपार है... आप अपने भक्तो के समस्त कलुशो को विनष्ट कर देती हो और उनकी नरक से रक्षा करती हो...
O Mother! those who bathe in your waters do not have to take birth again. O Jahnavi! You are held in the highest esteem. You destroy your devotee’s sins and save them from hell...]
पुनरसदङ्गॆ पुण्यतरङ्गॆ जय जय जाह्नवि करुणापाङ्गॆ ।
इन्द्रमुकुटमणिराजितचरणॆ सुखदॆ शुभदॆ भृत्यशरण्यॆ ॥ 8 ॥
[हे जाह्नवी ! आप करुणा से परिपूर्ण हो... आप अपने दिव्य जल से अपने भक्तो को विशुद्ध कर देती हो... आपके चरण देवराज इन्द्र के मुकुट के मणियो से सुशोभित हैं... शरण में आने वाले को आप सुख और शुभता (प्रसन्नता) प्रदान करती हो...
O Jahnavi! You are full of compassion. You purify your devotees with your holy waters. Your feet are adorned with the gems of Indra’s crown. Those who seek refuge in you are blessed with happiness...]
रॊगं शॊकं तापं पापं हर मॆ भगवति कुमतिकलापम् ।
त्रिभुवनसारॆ वसुधाहारॆ त्वमसि गतिर्मम खलु संसारॆ ॥ 9 ॥
[ हे भगवती ! मेरे समस्त रोग, शोक, ताप, पाप और कुमति को हर लो... आप त्रिभुवन का सार हो और वसुधा (पृथ्वी) का हार हो... हे देवी ! इस समस्त संसार में मुझे केवल आपका ही आश्रय है...
O Bhagavati! Take away my diseases, sorrows, difficulties, sins and wrong attitudes. You are the essence of the three worlds and you are like a necklace around the Earth. O Devi! You alone are my refuge in this Samsara...]
अलकानन्दॆ परमानन्दॆ कुरु करुणामयि कातरवन्द्यॆ ।
तव तटनिकटॆ यस्य निवासः खलु वैकुण्ठॆ तस्य निवासः ॥ 10 ॥
[हे गंगे ! प्रसन्नता चाहने वाले आपकी वंदना करते हैं... हे अलकापुरी के लिए आनंद-स्रोत... हे परमानन्द स्वरूपिणी... आपके तट पर निवास करने वाले वैकुण्ठ में निवास करने वालो की तरह ही सम्मानित हैं...
O Ganga! those who seek happiness worship you. You are the source of happiness for Alkapuri and source of eternal bliss. Those who reside on your banks are as privileged as those living in Vaikunta...]
वरमिह नीरॆ कमठॊ मीनः किं वा तीरॆ शरटः क्षीणः ।
अथवाश्वपचॊ मलिनॊ दीनस्तव न हि दूरॆ नृपतिकुलीनः ॥ 11 ॥
[ हे देवी ! आपसे दूर होकर एक सम्राट बनकर जीने से अच्छा है आपके जल में मछली या कछुआ बनकर रहना... अथवा तो आपके तीर पर निर्धन चंडाल बनकर रहना...
O Devi ! It is better to live in your waters as turtle or fish, or live on your banks as poor “candal” rather than to live away from you as a wealthy king...]
भॊ भुवनॆश्वरि पुण्यॆ धन्यॆ दॆवि द्रवमयि मुनिवरकन्यॆ ।
गङ्गास्तवमिमममलं नित्यं पठति नरॊ यः स जयति सत्यम् ॥ 12 ॥
[हे ब्रह्माण्ड की स्वामिनी ! आप हमें विशुद्ध करें... जो भी यह गंगा स्तोत्र प्रतिदिन गाता है... वह निश्चित ही सफल होता है...
O Godess of Universe! You purify us. O daughter of muni Jahnu! one who recites this Ganga Stotram everyday, definitely achieves success...]
यॆषां हृदयॆ गङ्गा भक्तिस्तॆषां भवति सदा सुखमुक्तिः ।
मधुराकन्ता पञ्झटिकाभिः परमानन्दकलितललिताभिः ॥ 13 ॥
[ जिनके हृदय में गंगा जी की भक्ति है... उन्हें सुख और मुक्ति निश्चित ही प्राप्त होते हैं... यह मधुर लययुक्त गंगा स्तुति आनंद का स्रोत है...
Those who have devotion for Mother Ganga, always get happiness and they attain liberation. This beautiful and lyrical Gangastuti is a source of Supreme bliss...]
गङ्गास्तॊत्रमिदं भवसारं वांछितफलदं विमलं सारम् ।
शङ्करसॆवक शङ्कर रचितं पठति सुखीः तव इति च समाप्तः ॥ 14 ॥
[भगवत चरण आदि जगद्गुरु द्वारा रचित यह स्तोत्र हमें विशुद्ध कर हमें वांछित फल प्रदान करे...
This Ganga Stotram, written by Sri Adi Shankaracharya,devotee of Lord Shiva, purifies us and fulfills all our desires...]
भगवती गंगा देवये नमः ...|
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गीत:
मन से मन के तार जोड़ती.....
*
*
मन से मन के तार जोड़ती कविता की पहुनाई का.
जिसने अवसर पाया वंदन उसकी चिर तरुणाई का.....
*
जहाँ न पहुँचे रवि पहुँचे वह, तम् को पिए उजास बने.
अक्षर-अक्षर, शब्द-शब्द को जोड़, सरस मधुमास बने..
बने ज्येष्ठ फागुन में देवर, अधर-कमल का हास बने.
कभी नवोढ़ा की लज्जा हो, प्रिय की कभी हुलास बने..
होरी, गारी, चैती, सोहर, आल्हा, पंथी, राई का
मन से मन के तार जोड़ती कविता की पहुनाई का.
जिसने अवसर पाया वंदन उसकी चिर तरुणाई का.....
*
सुख में दुःख की, दुःख में सुख की झलक दिखाकर कहती है.
सलिला बारिश शीत ग्रीष्म में कभी न रूकती, बहती है.
पछुआ-पुरवैया होनी-अनहोनी गुपचुप सहती है.
सिकता ठिठुरे नहीं शीत में, नहीं धूप में दहती है.
हेर रहा है क्यों पथ मानव, हर घटना मन भाई का?
मन से मन के तार जोड़ती कविता की पहुनाई का.
जिसने अवसर पाया वंदन उसकी चिर तरुणाई का.....
*
हर शंका को हरकर शंकर, पियें हलाहल अमर हुए.
विष-अणु पचा विष्णु जीते, जब-जब असुरों से समर हुए.
विधि की निधि है प्रविधि, नाश से निर्माणों की डगर छुए.
चाह रहे क्यों अमृत पाना, कभी न मरना मनुज मुए?
करें मौत का अब अभिनन्दन, सँग जन्म के आई का.
मन से मन के तार जोड़ती कविता की पहुनाई का.
जिसने अवसर पाया वंदन उसकी चिर तरुणाई का.....
१२-१२-२०१३
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रविवार, 12 दिसंबर 2021

नवगीत, गंगा स्तोत्र, गीत, मुक्तक, दोहा, समीक्षा, ब्रह्मजीत गौतम,

कृति चर्चा :
दोहे पानीदार
चर्चाकार - आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’
*
[कृति विवरण: दोहे पानीदार, दोहा संकलन, डॉ. ब्रह्मजीत गौतम, प्रथम संस्करण २०१९, आईएसबीएन ९७८-९३-८८९४६-८०-३, आकार २२.से.मी. x १३.५ से.मी., आवरण बहुरंगी पेपरबैक, पृष्ठ २००, मूल्य १५० रु., बेस्ट बुक बडीज टेक्नोलॉजीस, नई दिल्ली, दोहाकार संपर्क - युक्का २०६, पैरामाउण्ट सिम्फनी, क्रॉसिंग रिपब्लिक, ग़ाज़ियाबाद २०१०१६ उ. प्र., चलभाष - ०९७६०००७८३८, ०९४२५१०२१५४०, ई-मेल bjgautam2007@gmail.com ।]
*
भारत में किसी कार्य का श्री गणेश ईश वंदना से करने की परंपरा है। वरिष्ठ दोहाकार डॉ. ब्रह्मजीत गौतम ने एक नयी रीति का आरंभ ‘ध्यातव्य बातें’ शीर्षक के अंतर्गत दोहा-लेखन के दोषों की चर्चा से किया है। कबीर काव्य में प्रतीक विधान पर शोध और कबीर प्रतीक कोष की रचना करनेवाला दोषों को चुन-चुन कर चोट करने की कबीरी राह पर चले यह स्वाभाविक है। गौतम जी बहुआयामी रचनाकार हैं। शोधपरक कृति जनक छंद - एक विवेचन, काव्य संग्रह अंजुरी, ग़ज़ल संग्रह वक़्त के मंजर व एक बह्र पर एक ग़ज़ल, जनक छंद संग्रह जनक छंद की साधना, मुक्तक संग्रह दोहा मुक्तक माल तथा समीक्षा संग्रह दृष्टिकोण के रचनाकार सेवानिवृत्त हिंदी प्राध्यापक डॉ. गौतम ने दोहराव, अस्पष्टता तथा पूर्वापर संबंध को दोहा लेखन का कथ्यदोष तथा अनूठापन, धार और संदेशपरकता को दोहा लेखन का गुण ठीक ही बताया है। ‘शिल्प’ उपशीर्षक के अंतर्गत मात्रा गणना, अधिक मात्रा दोष, न्यून मात्रा दोष, ग्यारहवीं मात्रा लघु न होना, वाक्य भंजक दोष, लय दोष, मात्रा विभाजन दोष, तुक विधान दोष, अनुस्वार दोष, अवांछित व्यंजनागम की चर्चा है। भाषा रूप उपशीर्षक के अंतर्गत पुनरक्ति दोष, एक शब्द दो उच्चारण, शब्दों के मध्य अनावश्यक दूरी, पर का प्रयोग, अवैध संधि, लिंग, वचन, पुरुष, काल, अमानक शब्द-प्रयोग आदि पर विमर्श है तथा अंत में दोहा के २३ प्रकारों की निरर्थकता का संकेत है। डॉ. गौतम ने छंदप्रभाकरकार जगन्नाथ प्रसाद ‘भानु’ द्वारा उल्लिखित नियमों का संदर्भ दिया है किन्तु पदारंभ में दग्धाक्षर व् जगण निषेध की चर्चा नहीं है। भाषा और नदी सतत परिवर्तित होकर निर्मल बनी रहती हैं। भानु जी ने ग्यारहवीं मात्रा को लघु रखे जाने का संकेत किया है किन्तु उनके पूर्व और पश्चात् के अनेक दोहाकारों (जिनमें कबीर, खुसरो, जायसी, तुलसी, बिहारी जैसे अमर दोहाकार भी हैं) ने इस नियम को अनुल्लंघनीय न मानकर दोहे रचे हैं।
अब वंदना के प्रथम दोहे से गौतम जी ने परंपरा-पालन किया है। दोहा मुक्तक छंद है। वह पूर्व या पश्चात् के दोहों से पूरी तरह मुक्त, अपने आप में पूर्ण होता है। आजकल एक विषय पर दोहों को एकत्र कर अध्यायों में विभक्त करने का चलन होने पर भी गौतम जी ने ५२० दोहे क्रमानुसार प्रकाशित कर लीक को ठीक ही तोडा है। सामान्य रचनाकार ‘स्वांत: सुखाय’ लिखता है जबकि गौतम जी जैसा रचनाकार इसके समानांतर श्रोता और पाठक में सत्साहित्य की समझ भी विकसित करते हैं। गौतम जी कबीर की तरह भाषा को शाब्दिक संस्कृतनिष्ठता का कुआँ न बनाकर कथ्यानुकूल विविध भाषाओँ से शब्द चयन कर ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ के वैदिक आदर्श को मूर्त करते हैं। यह आदर्श धार्मिक समानता और समरसता की जननी है -
अल्ला या ईसा कहो, या फिर कह लो राम।
करता ‘वही’ सहायता, जब पड़ता है काम।।
गौतम जी ‘तत्तु समन्वयात’ के बौद्ध सूत्र को जीवन में अनिवार्य मानते हैं-
आत्मिक-भौतिक उन्नयन, दोनों हैं अनिवार्य।
यदि इनमें हो संतुलन, जीवन हो कृतकार्य।।
दोहों में लोकोक्तियों का प्रयोग करने की परंपरा गौतम जी को भाती है। लोकोक्ति दोहे को मुहावरेदार और लोक ग्राह्य बनाती है। ‘आप भले तो जग भला’ लोकोक्ति का सार्थक प्रयोग देखिए -
आप भले तो जग भला, कहें पुराने लोग।
जिसने समझा सूत्र यह, खुद पर करे प्रयोग।।
हिंदी व्याकरण के अनुसार ‘एक’ के स्थान पर ‘इक’ का प्रयोग गलत है किंतु गौतम जी ने ‘इक’ का प्रयोग किया है। भाषिक शुद्धता के पक्षधर विद्वान दोहाकार के लिए इससे बचना कठिन नहीं है पर संभवत: उर्दू ग़ज़ल से जुड़ाव के कारण उन्हें इसमें आपत्ति नहीं हुई।
इक तो आलस दूसरे, बात-बात में क्रोध।
कैसे ठहरे अनुज में, फिर विवेक या बोध।।
इक विरहानल दूसरे, सूरज का आतंक।
दो-दो ज्वालाएँ सहे, कैसे मुखी मयंक।।
महानगरीय स्वार्थपरक जीवन दृष्टि प्रकृति को भोग्य मानकर उसका शोषण कर विनाश को आमंत्रित कर रही है। दोहाकार उस जीवन पद्धति को अपनाने का गृह करता है जो प्रकृति के अनुकूल हो-
इस सीमा तक हो सहज, अपने जीवन-ढंग।
हो जाए जो प्रकृति से, एक रूप-रस-रंग।।
‘कर्म’ को महत्त्व देना भारतीय जन-जीवन का वैशिष्ट्य है. गीता ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते” कहती है तो तुलसी ‘कर्म प्रधान बिस्व करि राखा’ कहकर कर्म की महत्ता प्रतिपादित करते हैं। गौतम जी कर्मव्रती खद्योत को प्रणाम कर कर्म-पथ का महत्ता प्रतिपादित करते हैं-
उस नन्हें खद्योत को, बारंबार प्रणाम।
जो करता है रात में, तम का काम तमाम।।
कबीर ‘गुरु’ और ‘गोबिंद’ में से गुरु को पहले प्रणाम करते हैं चूँकि ‘गुरु’ ही ‘गोबिंद’ से मिलवाता है। कबीर के अनुयायी गौतम जी गुरु को कृपानिधान कहकर प्रणाम करते हैं-
उस सद्गुरु को है नमन, जो है कृपा-निधान।
ज्ञान-ज्योति से शिष्य का, जो हरता अज्ञान।।
शिक्षा जगत से जुड़े गौतम जी को भाषा की उपेक्षा और गलत प्रयोग व्यथित करे, यह स्वाभाविक है. वे स्वतंत्र देश में विदेशी सम्प्रभुओं की भाषा के बढ़ते वर्चस्व को देखकर हिंदी के प्रति चिंतित हैं-
ए बी सी आये नहीं, पर अंग्रेजी बोल।
हिंदी की है देश में, नैया डाँवाडोल।।
अमिधा के साथ-साथ लक्षणा और व्यंजना का प्रयोग जगह-जगह बखूबी किया गया है है इस दोहा संग्रह में।
ओ पानी के बुलबुले!, करता क्यों अभिमान?
हवा चली हो जाएगा, पल में अंतर्ध्यान।।
नश्वर ज़िंदगी को ओस बूँद बताते इस दोहे में पापजनित ताप को नाशक ठीक ही बताया गया है-
ओस-बूँद सी ज़िंदगी, इसे सहेजें आप।
ताप लगा यदि पाप का, बन जाएगी भाप।।
‘बनने’ के लिए प्रयत्न करना होता है। नष्ट होने के लिए कोई प्रयत्न नहीं करता। दोहाकार आप ही प्रथम पंक्ति में ज़िंदगी को सहेजने का संदेश देता है। ‘होना’ बिना प्रयास के होता है। ‘बन’ के स्थान पर ‘हो’ का प्रयोग अधिक स्वाभाविक होगा।
कब से यह मन रट रहा, सतत एक ही नाम।
कब यह मंज़िल पायगा, तू जाने या राम।।
यहाँ प्रयोग किया गया ‘पायगा’ शब्दकोशीय ‘पायेगा’ का अपभृंश है। इससे बच जाना उचित होता।
इस संग्रह का स्मरणीय दोहा शिव-निवासस्थली काशी और कबीर की इहलीला संवरणस्थली मगहर के मध्य सेतु स्थापित करने के साथ-साथ गौतम जी के दोहाकार की सामर्थ्य का भी परिचायक है -
कर दे मुझ पर भी कृपा, कुछ तो कृपा-निकेत।
तू काशी का देवता, मैं मगहर का प्रेत।।
‘आस्तीन में साँप’ मुहावरे का उपयोग कर गौतम जी ने एक और जानदार दोहा रचा है -
करते हैं अब साँप सब, आस्तीन में वास।
बांबी से बढ़कर उन्हें, यहाँ सुरक्षा ख़ास।।
काव्य रचना केवल मनोविलास या वाग्विलास नहीं है। यह सामान्यत: प्रसांगिक रहकर शांति और विशेष परिस्थितियों में क्रांति की वाहक होकर परिवर्तन लाती है -
कविता का उद्देश्य है, स्वांत: सुख औ’ शांति।
लेकिन वही समाज में, ला देती है क्रांति।।
कविता में यदि है नहीं, जन जीवन की पीर।
समझो सागर में भरा, केवल खारा नीर।।
सामाजिक विसंगतियों पर गौतम जी के दोहा-प्रहार सटीक हैं-
काम करना हो अगर, रखिये पेपरवेट।
जितना भारी काम हो, उतना भारी रेट।।
कुर्सी जिसको मिल गयी, हो जाता सर्वज्ञ।
कक्षा में जी उम्र भर, रहा भले हो अज्ञ।।
कोई चारा खा रहा, कोई खाता खाद।
नेताओं के स्वाद की, देनी होगी दाद।।
चाहे दिल्ली में रहो, या कि देहरादून।
पाओगे सर्वत्र ही, अंध-बधिर कानून।।
चिड़ियाँ चहकें किस तरह, किसे दिखाएँ नाज़।
मँडराते हैं जब निडर, नीड़-नीड़ पर बाज।।
जंगल काटे स्वार्थवश, बनकर वीर प्रचंड
पर्यावरण विनाश का, धरा भोगती दंड।।
जो भू पर न बना सके, एक प्रेम का सेतु।
जा पहुँचे वे चाँद पर, शहर बसाने हेतु।।
इन दोहों में अलंकारों (अनुप्रास, पुनरुक्ति प्रकाश, यमक, श्लेष, उपमा, रूपक, वक्रोक्ति, विरोधाभास, असंगति, अतिशयोक्ति आदि) के प्रचुर प्रयोग हैं-
पति पंचानन पुत्र हैं, गजमुख षड्मुख नाम।
देवि अन्नपूर्णा करें, उदर-पूर्ति अविराम।। -वक्रोक्ति
पत्ता हिले न ग्रीष्म में, हवा जेल में बंद।
कर्फ्यू में ज्यों गूँजते, सन्नाटों के छंद।। - अतिशयोक्ति
पीते हैं घी-दूध नित, पत्थर के भगवान्।
शिल्पकार उसके मगर, तजें भूख से प्राण।।
सारत: दोहे पानीदार के दोहे नवोदितों के लिए पाठ्य पुस्तक, स्थापितों के लिए प्रेरणा तथा सिद्धहस्तों के लिए संतोषकारक हैं। गौतम जी जैसे वरिष्ठ दोहाकार अपने मानक आप ही निर्धारित करते हैं -
भाषा-भाव समृद्ध हों, हो सुंदर अभिव्यक्ति।
कविता रस निष्पत्ति की, तब पाती है शक्ति।।
पाठक बेकली से गौतम जी के इस दोहा संग्रह कर काव्यानंद की जयकार करते हुए अगले दोहा संग्रह की प्रतीक्षा करेंगे।
१२-१२-२०१९
संपर्क - आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’, विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, चलभाष - ९४२५१८३२४४, ईमेल - salil.sanjiv@gmail.com
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दोहा

दीप-ज्योति जलती रहे, तिमिर न पाए जीत.
शब्द दीप से प्रकाशित, हो अन्तर्मन मीत.

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सलिला में मार्तन्ड-छवि, बिंबित करती स्नान.
ठिठुर न जाए शीत में, संजीवित अम्लान.

१२-१२-२०१७
मुक्तक:
गीत रचें नवगीत रचें अनुगीत रचें या अगीत रचें
कोशिश यह हो कि रचें जो भी न कुरीत रचें, सद्ऱीत रचें
कुछ बात कहें अपने ढंग से, रस लय नव बिम्ब प्रतीक रहे
नफरत-विद्वेष न याद रहे, बंधुत्व स्नेह संग प्रीत रचें
१२-१२-२०१४

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नवगीत:
जिजीविषा अंकुर की
पत्थर का भी दिल
दहला देती है
*
धरती धरती धीरज
बनी अहल्या गुमसुम
बंजर-पड़ती लोग कहें
ताने दे-देकर
सिसकी सुनता समय
मौन देता है अवसर
हरियाती है कोख
धरा हो जाती सक्षम
तब तक जलती धूप
झेलकर घाव आप
सहला लेती है
*
जग करता उपहास
मारती ताने दुनिया
पल्लव ध्यान न देते
कोशिश शाखा बढ़ती
द्वैत भुला अद्वैत राह पर
चिड़िया चढ़ती
रचती अपनी सृष्टि आप
बन अद्भुत गुनिया
हार न माने कभी
ज़िंदगी खुद को खुद
बहला लेती है
*
छाती फाड़ पत्थरों की
बहता है पानी
विद्रोहों का बीज
उठाता शीश, न झुकता
तंत्र शिला सा निठुर
लगे जब निष्ठुर चुकता
याद दिलाना तभी
जरूरी उसको नानी
जन-पीड़ा बन रोष
दिशाओं को भी तब
दहला देती है
१२-१२-२०१४
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श्री गंगा स्तोत्र...
रचना : आदि जगद्गुरु शंकराचार्य...
दॆवि! सुरॆश्वरि! भगवति! गङ्गॆ त्रिभुवनतारिणि तरलतरङ्गॆ ।
शङ्करमौलिविहारिणि विमलॆ मम मतिरास्तां तव पदकमलॆ ॥ 1 ॥
[हे देवी ! सुरेश्वरी ! भगवती गंगे ! आप तीनो लोको को तारने वाली हो... आप शुद्ध तरंगो से युक्त हो... महादेव शंकर के मस्तक पर विहार करने वाली हो... हे माँ ! मेरा मन सदैव आपके चरण कमलो पर आश्रित है...
O Goddess Ganga! You are the divine river from heaven, you are the saviour of all the three worlds, youare pure and restless, you adorn Lord Shiva’s head. O Mother! may my mind always rest at your lotus feet...]
भागीरथिसुखदायिनि मातस्तव जलमहिमा निगमॆ ख्यातः ।
नाहं जानॆ तव महिमानं पाहि कृपामयि मामज्ञानम् ॥ 2 ॥
[ हे माँ भागीरथी ! आप सुख प्रदान करने वाली हो... आपके दिव्य जल की महिमा वेदों ने भी गई है... मैं आपकी महिमा से अनभिज्ञ हू... हे कृपामयी माता ! आप कृपया मेरी रक्षा करें...
O Mother Bhagirathi! You give happiness to everyone. The significance of your holy waters is sung in the Vedas. I am ignorant and am not capable to comprehend your importance. O Devi! you are full of mercy. Please protect me...]
हरिपदपाद्यतरङ्गिणि गङ्गॆ हिमविधुमुक्ताधवलतरङ्गॆ ।
दूरीकुरु मम दुष्कृतिभारं कुरु कृपया भवसागरपारम् ॥ 3 ॥
[ हे देवी ! आपका जल श्री हरी के चरणामृत के समान है... आपकी तरंगे बर्फ, चन्द्रमा और मोतिओं के समान धवल हैं... कृपया मेरे सभी पापो को नष्ट कीजिये और इस संसार सागर के पार होने में मेरी सहायता कीजिये...
O Devi! Your waters are as sacred as “Charanamriti” of Sri Hari. Your waves are white like snow, moon and pearls. Please wash away all my sins and help me cross this ocean of Samsara...]
तव जलममलं यॆन निपीतं परमपदं खलु तॆन गृहीतम् ।
मातर्गङ्गॆ त्वयि यॊ भक्तः किल तं द्रष्टुं न यमः शक्तः ॥ 4 ॥
[हे माता ! आपका दिव्य जल जो भी ग्रहण करता है, वह परम पद पता है... हे माँ गंगे ! यमराज भी आपके भक्तो का कुछ नहीं बिगाड़ सकते...
O Mother! those who partake of your pure waters, definitely attain the highest state. O Mother Ganga! Yama, the Lord of death cannot harm your devotees...]
पतितॊद्धारिणि जाह्नवि गङ्गॆ खण्डित गिरिवरमण्डित भङ्गॆ ।
भीष्मजननि हॆ मुनिवरकन्यॆ पतितनिवारिणि त्रिभुवन धन्यॆ ॥ 5 ॥
[हे जाह्नवी गंगे ! गिरिवर हिमालय को खंडित कर निकलता हुआ आपका जल आपके सौंदर्य को और भी बढ़ा देता है... आप भीष्म की माता और ऋषि जह्नु की पुत्री हो... आप पतितो का उद्धार करने वाली हो... तीनो लोको में आप धन्य हो...
O Jahnavi! your waters flowing through the Himalayas make you even more beautiful. You are Bhishma’s mother and sage Jahnu’s daughter. You are saviour of the people fallen from their path, and so you are revered in all three worlds...]
कल्पलतामिव फलदां लॊकॆ प्रणमति यस्त्वां न पतति शॊकॆ ।
पारावारविहारिणिगङ्गॆ विमुखयुवति कृततरलापाङ्गॆ ॥ 6 ॥
[ हे माँ ! आप अपने भक्तो की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करने वाली हो... आपको प्रणाम करने वालो को शोक नहीं करना पड़ता... हे गंगे ! आप सागर से मिलने के लिए उसी प्रकार उतावली हो जिस प्रकार एक युवती अपने प्रियतम से मिलने के लिए होती है...
O Mother! You fulfill all the desires of the ones devoted to you. Those who bow down to you do not have to grieve. O Ganga! You are restless to merge with the ocean, just like a young lady anxious to meet her beloved...]
तव चॆन्मातः स्रॊतः स्नातः पुनरपि जठरॆ सॊपि न जातः ।
नरकनिवारिणि जाह्नवि गङ्गॆ कलुषविनाशिनि महिमॊत्तुङ्गॆ ॥ 7 ॥
[हे माँ ! आपके जल में स्नान करने वाले का पुनर्जन्म नहीं होता... हे जाह्नवी ! आपकी महिमा अपार है... आप अपने भक्तो के समस्त कलुशो को विनष्ट कर देती हो और उनकी नरक से रक्षा करती हो...
O Mother! those who bathe in your waters do not have to take birth again. O Jahnavi! You are held in the highest esteem. You destroy your devotee’s sins and save them from hell...]
पुनरसदङ्गॆ पुण्यतरङ्गॆ जय जय जाह्नवि करुणापाङ्गॆ ।
इन्द्रमुकुटमणिराजितचरणॆ सुखदॆ शुभदॆ भृत्यशरण्यॆ ॥ 8 ॥
[हे जाह्नवी ! आप करुणा से परिपूर्ण हो... आप अपने दिव्य जल से अपने भक्तो को विशुद्ध कर देती हो... आपके चरण देवराज इन्द्र के मुकुट के मणियो से सुशोभित हैं... शरण में आने वाले को आप सुख और शुभता (प्रसन्नता) प्रदान करती हो...
O Jahnavi! You are full of compassion. You purify your devotees with your holy waters. Your feet are adorned with the gems of Indra’s crown. Those who seek refuge in you are blessed with happiness...]
रॊगं शॊकं तापं पापं हर मॆ भगवति कुमतिकलापम् ।
त्रिभुवनसारॆ वसुधाहारॆ त्वमसि गतिर्मम खलु संसारॆ ॥ 9 ॥
[ हे भगवती ! मेरे समस्त रोग, शोक, ताप, पाप और कुमति को हर लो... आप त्रिभुवन का सार हो और वसुधा (पृथ्वी) का हार हो... हे देवी ! इस समस्त संसार में मुझे केवल आपका ही आश्रय है...
O Bhagavati! Take away my diseases, sorrows, difficulties, sins and wrong attitudes. You are the essence of the three worlds and you are like a necklace around the Earth. O Devi! You alone are my refuge in this Samsara...]
अलकानन्दॆ परमानन्दॆ कुरु करुणामयि कातरवन्द्यॆ ।
तव तटनिकटॆ यस्य निवासः खलु वैकुण्ठॆ तस्य निवासः ॥ 10 ॥
[हे गंगे ! प्रसन्नता चाहने वाले आपकी वंदना करते हैं... हे अलकापुरी के लिए आनंद-स्रोत... हे परमानन्द स्वरूपिणी... आपके तट पर निवास करने वाले वैकुण्ठ में निवास करने वालो की तरह ही सम्मानित हैं...
O Ganga! those who seek happiness worship you. You are the source of happiness for Alkapuri and source of eternal bliss. Those who reside on your banks are as privileged as those living in Vaikunta...]
वरमिह नीरॆ कमठॊ मीनः किं वा तीरॆ शरटः क्षीणः ।
अथवाश्वपचॊ मलिनॊ दीनस्तव न हि दूरॆ नृपतिकुलीनः ॥ 11 ॥
[ हे देवी ! आपसे दूर होकर एक सम्राट बनकर जीने से अच्छा है आपके जल में मछली या कछुआ बनकर रहना... अथवा तो आपके तीर पर निर्धन चंडाल बनकर रहना...
O Devi ! It is better to live in your waters as turtle or fish, or live on your banks as poor “candal” rather than to live away from you as a wealthy king...]
भॊ भुवनॆश्वरि पुण्यॆ धन्यॆ दॆवि द्रवमयि मुनिवरकन्यॆ ।
गङ्गास्तवमिमममलं नित्यं पठति नरॊ यः स जयति सत्यम् ॥ 12 ॥
[हे ब्रह्माण्ड की स्वामिनी ! आप हमें विशुद्ध करें... जो भी यह गंगा स्तोत्र प्रतिदिन गाता है... वह निश्चित ही सफल होता है...
O Godess of Universe! You purify us. O daughter of muni Jahnu! one who recites this Ganga Stotram everyday, definitely achieves success...]
यॆषां हृदयॆ गङ्गा भक्तिस्तॆषां भवति सदा सुखमुक्तिः ।
मधुराकन्ता पञ्झटिकाभिः परमानन्दकलितललिताभिः ॥ 13 ॥
[ जिनके हृदय में गंगा जी की भक्ति है... उन्हें सुख और मुक्ति निश्चित ही प्राप्त होते हैं... यह मधुर लययुक्त गंगा स्तुति आनंद का स्रोत है...
Those who have devotion for Mother Ganga, always get happiness and they attain liberation. This beautiful and lyrical Gangastuti is a source of Supreme bliss...]
गङ्गास्तॊत्रमिदं भवसारं वांछितफलदं विमलं सारम् ।
शङ्करसॆवक शङ्कर रचितं पठति सुखीः तव इति च समाप्तः ॥ 14 ॥
[भगवत चरण आदि जगद्गुरु द्वारा रचित यह स्तोत्र हमें विशुद्ध कर हमें वांछित फल प्रदान करे...
This Ganga Stotram, written by Sri Adi Shankaracharya,devotee of Lord Shiva, purifies us and fulfills all our desires...]
भगवती गंगा देवये नमः ...|
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गीत:
मन से मन के तार जोड़ती.....
संजीव 'सलिल'
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मन से मन के तार जोड़ती कविता की पहुनाई का.
जिसने अवसर पाया वंदन उसकी चिर तरुणाई का.....
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जहाँ न पहुँचे रवि पहुँचे वह, तम् को पिए उजास बने.
अक्षर-अक्षर, शब्द-शब्द को जोड़, सरस मधुमास बने..
बने ज्येष्ठ फागुन में देवर, अधर-कमल का हास बने.
कभी नवोढ़ा की लज्जा हो, प्रिय की कभी हुलास बने..
होरी, गारी, चैती, सोहर, आल्हा, पंथी, राई का
मन से मन के तार जोड़ती कविता की पहुनाई का.
जिसने अवसर पाया वंदन उसकी चिर तरुणाई का.....
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सुख में दुःख की, दुःख में सुख की झलक दिखाकर कहती है.
सलिला बारिश शीत ग्रीष्म में कभी न रूकती, बहती है.
पछुआ-पुरवैया होनी-अनहोनी गुपचुप सहती है.
सिकता ठिठुरे नहीं शीत में, नहीं धूप में दहती है.
हेर रहा है क्यों पथ मानव, हर घटना मन भाई का?
मन से मन के तार जोड़ती कविता की पहुनाई का.
जिसने अवसर पाया वंदन उसकी चिर तरुणाई का.....
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हर शंका को हरकर शंकर, पियें हलाहल अमर हुए.
विष-अणु पचा विष्णु जीते, जब-जब असुरों से समर हुए.
विधि की निधि है प्रविधि, नाश से निर्माणों की डगर छुए.
चाह रहे क्यों अमृत पाना, कभी न मरना मनुज मुए?
करें मौत का अब अभिनन्दन, सँग जन्म के आई का.
मन से मन के तार जोड़ती कविता की पहुनाई का.
जिसने अवसर पाया वंदन उसकी चिर तरुणाई का.....
१२-१२-२०१३

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