सोमवार, 24 सितंबर 2018

दोहा छंद अनूप :

दोहा छंद अनूप :
संजीव 
जन-मन-रंजन, भव-बाधा-भंजन, यश-कीर्ति-मंडन, अशुभ विखंडन तथा सर्व शुभ सृजन में दोहा का कोई सानी नहीं है। विश्व-वांग्मय का सर्वाधिक मारक-तारक-सुधारक छंद दोहा छंद शास्त्र की अद्भुत कलात्मक देन है१। संस्कृत वांग्मय के अनुसार 'दोग्धि चित्तमिति दोग्धकम्' अर्थात जो (छंद) श्रोता/पाठक के चित्त का दोहन करे; वह दोग्धक (दोहा) है। दोहा चित्त का ही नहीं वर्ण्य विषय के सार का भी दोहन करने में समर्थ है२। दोहा अपने अस्तित्व-काल के प्रारंभ से ही लोक परंपरा और लोक-मानस से संपृक्त रहा है३। आरंभ में हर काव्य रचना 'दूहा' (दोहा) कही जाती थी४। फिर संस्कृत के द्विपदीय श्लोकों के आधार पर केवल दो पंक्तियों की काव्य रचना 'दोहड़ा' कही गयी। कालांतर में संस्कृत, पाली, प्राकृत, अपभ्रंश भाषाओं की पूर्वपरता एवं युग्परकता में छंद शास्त्र के साथ-साथ दोहा पला-बढ़ा और अनेक नामों से विभूषित हुआ।


दोग्ध्क दूहा दूहरा, द्विपदिक दोहअ छंद.  / दोहक दूहा दोहरा, दुवअह दे आनंद.

द्विपथा दोहयं दोहडा, द्विपदी दोहड़ नाम. / दुहे दोपदी दूहडा, दोहा ललित ललाम.

दोहा मुक्तक छंद है :
संस्कृत साहित्य में बिना पूर्ववर्ती या परवर्ती प्रसंग के एक ही छंद में पूर्ण अर्थ व चमत्कार प्रगट करनेवाले अनिबद्ध काव्य को मुक्तक कहा गया है- ' मुक्तक श्लोक एवैकश्चमत्कारः क्षमः सतां'. अभिनव गुप्त के शब्दों में 'मुक्ता मन्यते नालिंकित तस्य संज्ञायां कन. तेन स्वतंत्रया परिसमाप्त निराकांक्षार्थमपि, प्रबंधमध्यवर्ती मुक्तक मिनमुच्यते'।
हिंदी गीति काव्य के अनुसार मुक्तक पूर्ववर्ती या परवर्ती छंद या प्रसंग के बिना चमत्कार या अर्थ की पूर्ण अभिव्यक्ति करनेवाला छंद है। मुक्तक का प्रयोग प्रबंध काव्य के मध्य में भी किया जा सकता है। रामचरित मानस महाकाव्य में चौपाइयों के बीच-बीच में दोहा का प्रयोग मुक्तक छंद के रूप में सर्व ज्ञात है। मुक्तक काव्य के दो भेद १. पाठ्य (एक भाव या अनुभूति की प्रधानता यथा कबीर के दोहे) तथा गेय (रागात्मकता प्रधान यथा तुलसी के दोहे) हैं। इतिहास गढ़ने, मोड़ने, बदलने तथा रचने में सिद्ध दोहा का उद्भव संभवत: कालिदास (ई. पू. ३००) के विकेमोर्वशीयम के चतुर्थांक में है.
मइँ जाणिआँ मिअलोअणी, निसअणु कोइ हरेइ / जावणु णवतलिसामल, धारारुह वरिसेई

हिंदी साहित्य के आदिकाल (७००ई.-१४००ई..) में नाथ संप्रदाय के ८४ सिद्ध संतों ने विपुल साहित्य का सृजन किया। सिद्धाचार्य सरोजवज्र (स्वयंभू / सरहपा / सरह वि. सं. ६९०) रचित दोहाकोश एवं अन्य ३९ ग्रंथों ने दोहा को प्रतिष्ठित किया।
जहि मन पवन न संचरई, रवि-ससि नांहि पवेस / तहि वट चित्त विसाम करू, सरहे कहिअ उवेस

दोहा की यात्रा भाषा के बदलते रूप की यात्रा है। देवसेन के इस दोहे में सतासत की विवेचना है-
जो जिण सासण भाषियउ, सो मई कहियउ सारु। / जो पालइ सइ भाउ करि, सो सरि पावइ पारु

८ वीं सदी के उत्तरार्ध में राजस्थानी वीरांगना युद्ध पर गये अपने प्रीतम को दोहा-दूत से संदेश भेजती है कि वह वायदे के अनुसार श्रावण की पहली तीज पर न आया तो प्रिया को जीवित नहीं पाएगा
पिउ चित्तोड़ न आविउ, सावण पैली तीज। जोबै बाट बिरहणी, खिण-खिण अणवे खीज
संदेसो पिण साहिबा, पाछो फिरिय न देह। पंछी थाल्या पींजरे, छूटण रो संदेह

दोहा उतम काव्य है :
दोहा उत्तम काव्य है, देश-काल पर्याय। / राह दिखाता मनुज को, जब वह हो निरुपाय

हिंदी ही नहीं विश्व की समस्त भाषाओँ के इतिहास में केवल दोहा ही ऐसा छंद है जिसने युद्धों को रोका है, नारी के मान-मर्यादा की रक्षा की है, भटके हुओं को रास्ता दिखाया है, देश की रक्षा की है, पराजित और बंदी राजा को अरि-मर्दन का हौसला दिया है, बीमारियों से बचने की राह सुझाई है और जिंदगी को सही तरीके से जीने का तरीका ही नहीं बताया भगवान के दर्शन भी कराए। यह दोहे की अतिरेकी प्रशंसा नहीं, सच है। कुछ कालजयी दोहों से साक्षात कीजिये।
दोहा गाथा सनातन, शारद कृपा पुनीत / साँची साक्षी समय की, जनगण-मन की मीत

कल का कल से आज ही, कलरव सा संवाद। / कल की कल हिंदी करे, कलकल दोहा नाद 
(कल = विगत, आगत, शांति, यंत्र)

दोहा है इतिहास:
दसवीं सदी में पवन कवि द्वारा हरिवंश पुराण में कउवों के अंत में प्रयुक्त 'दत्ता' छंद दोहा का  पूर्वज ही है:
जइण रमिय बहुतेण सहु, परिसेसिय बहुगब्बु / अजकल सिहु णवि जिमिविहितु, जब्बणु रूठ वि सब्बु

११वीं सदी में कवि देवसेन गण ने 'सुलोचना चरित' की १८ वी संधि(अध्याय) में कडवकों के आरम्भ में 'दोहय' छंद का प्रयोग किया है। यह भी दोहा का पुरखा है।
कोइण कासु विसूहई, करइण केवि हरेइ। / अप्पारोण बिढ़न्तु बद, सयलु वि जीहू लहेइ।।

मुनि रामसिंह कृत 'पाहुड़ दोहा' संभवतः पहला दोहा संग्रह है । एक दोहा देखें-
वृत्थ अहुष्ठः देवली, बाल हणा ही पवेसु सन्तु निरंजणु ताहि वस्इ, निम्मलु होइ गवेसु।।

दोहा उलटे सोरठा:
सौरठ (सौराष्ट्र गुजरात) की सती सोनल (राणक) को प्रणाम करता दोहा अपने विषम-सम अर्धांश को आपस में बदलकर सोरठा हो गया । कालरी के देवरा राजपूत की अपूर्व सुंदरी कन्या सोनल अणहिल्ल्पुर पाटण नरेश जयसिंह (संवत ११४२-११९९) की वाग्दत्ता थी। जयसिंह को मालवा पर आक्रमण में उलझा पाकर उसके प्रतिद्वंदी गिरनार नरेश रानवघण खंगार ने पाटण पर हमला कर सोनल का अपहरण कर उससे बलपूर्वक विवाह कर लिया । मर्माहत जयसिंह ने बार-बार खंगार पर हमले किये पर उसे हरा नहीं सका। अंततः, खंगार अपने भांजों के विश्वासघात के कारण अपने दो लड़कों सहित पकड़ा गया। जयसिंह ने तीनों को मरवा दिया। यह जानकर जयसिंह के प्रलोभनों को ठुकराकर सोनल वधवाण के निकट भोगावा नदी के किनारे सती हो गई। दोहा गत ९०० वर्षों से सती सोनल की कथा सोरठा बनकर गा रहा है-
वढी तऊं वदवाण, वीसारतां न वीसारईं / सोनल केरा प्राण, भोगा विहिसऊँ भोग्या।।

दोहा घणां पुराणां छंद:
११ वीं सदी के महाकवि कल्लोल की अमर कृति 'ढोला-मारूर दोहा' में 'दोहा घणां पुराणां छंद' कहकर दोहा को सराहा गया है। राजा नल के पुत्र ढोला तथा पूंगलराज की पुत्री मारू की प्रेमकहानी को दोहा ने ही अमर कर दिया।
सोरठियो दूहो भलो, भलि मरिवणि री बात। / जोबन छाई घण भली, तारा छाई रात।।

आतंकवादी कुछ लोगों को बंदी बना लें तो संबंधी हाहाकार मचाने लगते हैं, प्रेस इतना दुष्प्रचार करती है कि सरकार आतंकवादियों को कंधार पहुँचाने पर विवश हो जाती है। एक मंत्री की लड़की बंधक बना ली जाए तो भी आतंकवादी छोड़े जाते हैं। संस्कृत, प्राकृत तथा अपभ्रंश तीनों में दोहा कहनेवाले, 'शब्दानुशासन' के रचयिता हेमचंद्र रचित दोहा बताता है कि ऐसी परिस्थिति में कितना धैर्य रखना चाहिए।
भल्ला हुआ जू मारिआ, बहिणि म्हारा कंतु। / लज्जज्जंतु वयंसि यहु, जह भग्गा घर एंतु।।

अर्थात - भला हुआ मारा गया, मेरा बहिन सुहाग। / मर जाती मैं लाज से, जो आता घर भाग।।

अम्हे थोवा रिउ बहुअ, कायर एंव भणन्ति। / मुद्धि निहालहि गयण फलु, कह जण जाण्ह करंति।।

भाय न कायर भगोड़ा, सुख कम दुःख अधिकाय। / देख युद्ध फल क्या कहूँ, कुछ भी कहा न जाय।।

दोहा दिल का आइना:
दोहा दिल का आइना, कहता केवल सत्य। / सुख-दुःख चुप रह झेलता, कहता नहीं असत्य।।

दोहा सत्य से आँख मिलाने का साहस रखता है। वह जीवन का सत्य पूरी निर्लिप्तता से कहता है-
पुत्ते जाएँ कवन गुणु, अवगुणु कवणु मुएण। / जा बप्पी की भूः णई, चंपी ज्जइ अवरेण।।

अर्थात्
अवगुण कोई न चाहता, गुण की सबको चाह। / चंपकवर्णी कुँवारी, कन्या देती दाह।।

प्रियतम की बेवफाई पर प्रेमिका और दूती का मार्मिक संवाद दोहा ही कह सकता है-
सो न आवै, दुई घरु, कांइ अहोमुहू तुज्झु। / वयणु जे खंढइ तउ सहि ए, सो पिय होइ न मुज्झु।।

यदि प्रिय घर आता नहीं, दूती क्यों नत मुख। / मुझे न प्रिय जो तोड़कर, वचन तुझे दे दुःख।।

हर प्रियतम बेवफा नहीं होता। सच्चे प्रेमियों के लिए बिछुड़ना की पीड़ा असह्य होती है। जिस विरहणी की अंगुलियाँ पीया के आने के दिन गिन-गिन कर ही घिसी जा रहीं हैं उसका साथ कोई दे न दे दोहा तो देगा ही।
जे महु दिणणा दिअहड़ा, दइऐ पवसंतेण। / ताण गणनतिए अंगुलिऊँ, जज्जरियाउ नहेण

जाते हुए प्रवास पर, प्रिय ने कहे जो दिन। / हुईं अंगुलियाँ जर्जरित, उनको नख से गिन।।

परेशानी प्रिय के जाने मात्र की हो तो उसका निदान हो सकता है पर इस प्रियतमा की शिकायत यह है कि प्रिय गए तो मारे गम के नींद गुम हो गयी और जब आए तो खुशी के कारण नींद गुम हो गयी।
पिय संगमि कउ निद्दणइ, पियहो परक्खहो केंब? / मई बिन्नवि बिन्नासिया, निंद्दन एंव न तेंव।।

प्रिय का संग पा नींद गुम, बिछुडे तो गुम नींद। / हाय! गई दोनों तरह, ज्यों-त्यों मिली न नींद।।

मिलन-विरह के साथ-साथ दोहा हास-परिहास में भी पीछे नहीं है। 'सारे जहां का दर्द हमारे जिगर में है' अथवा 'मुल्ला जी दुबले क्यों? - शहर के अंदेशे से' जैसी लोकोक्तियों का उद्गम शायद निम्न दोहा है जिसमें अपभ्रंश के दोहाकार सोमप्रभ सूरी की चिंता यह है कि दशानन के दस मुँह थे तो उसकी माता उन सबको दूध कैसे पिलाती होगी?
रावण जायउ जहि दिअहि, दहमुहु एकु सरीरु। / चिंताविय तइयहि जणणि, कवहुं पियावहुं खीरू।।

एक बदन दस वदनमय, रावन जन्मा तात। दूध पिलाऊँ किस तरह, सोचे चिंतित मात।।

इंद्रप्रस्थ नरेश पृथ्वीराज चौहान अभूतपूर्व पराक्रम के बाद भी मो॰ गोरी के हाथों पराजित हुए। उनकी आँखें फोड़कर उन्हें कारागार में डाल दिया गया। उनके बालसखा निपुण दोहाकार चंदबरदाई (संवत् १२०५-१२४८) ने अपने मित्र को जिल्लत की जिंदगी से आजाद कराने के लिए दोहा का सहारा लिया। उसने गोरी से सम्राट की शब्द-भेदी बाणकला की प्रशंसा कर परीक्षा हेतु उकसाया। परीक्षण के समय कवि मित्र ने एक दोहा पढ़ा। दिल्लीपति ने दोहा हृदयंगम कर लक्ष्य पर तीर छोड़ दिया जो सुल्तान का कंठ चीर गया। वह कालजयी दोहा है-
चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण। / ता ऊपर सुल्तान है, मत चुक्कै चव्हाण।।

दोहा सबका साथ निभाता है, भले ही इंसान एक दूसरे का साथ छोड़ दे। बुंदेलखंड के परम प्रतापी शूर-वीर भाइयों आल्हा-ऊदल के पराक्रम की अमर गाथा महाकवि जगनिक रचित 'आल्हा खंड' (संवत १२३०) का श्री गणेश दोहा से ही हुआ है-
श्री गणेश गुरुपद सुमरि, ईस्ट देव मन लाय। / आल्हखंड बरण करत, आल्हा छंद बनाय।।

इन दोनों वीरों और युद्ध के मैदान में उन्हें मारनेवाले दिल्लीपति पृथ्वीराज चौहान के प्रिय शस्त्र तलवार के प्रकारों का वर्णन दोहा उनकी मूठ के आधार पर करता है-
पार्ज चौक चुंचुक गता, अमिया टोली फूल। / कंठ कटोरी है सखी, नौ नग गिनती मूठ।।

चल पानी पिला: 
हिंदी और उर्दू दोनों भाषाओं, आध्यात्म तथा प्रशासन में निष्णात अमीर खुसरो (संवत् १३१२-१३८२) एक दिन घूमते हुए दूर निकल गये, जोर से प्यास लगी गाँव के बाहर कुँए पर औरतों को पानी भरते देख खुसरो साहब ने उनसे पानी पिलाने की दरखास्त की। उनमें से एक ने कहा पानी तभी पिलाएँगी जब खुसरो उनके मन मुताबिक कविता सुनाएँ। खुसरो समझ गए कि जिन्हें वे भोली-भली देहातिनें समझ रहे थे वे ज़हीन-समझदार हैं और उन्हें पहचान चुकने पर उनकी झुंझलाहट का आनंद ले रही हैं। कोई और उपाय न देख खुसरो ने विषय पूछा तो बिना देर किये चारों ने एक-एक विषय दे दिया खीर... चरखा... कुत्ता... और ढोल... खुसरो की प्यास के मरे जान निकली जा रही थीएँ इन बेढब विषयों पर कविता करें तो क्या? पर खुसरो भी एक ही थे, अपनी मिसाल आप, सबसे छोटे छंद दोहा का दामन थमा और एक ही दोहे में चारों विषयों को समेटते हुए ताजा-ठंडा पानी पिया और चैन की साँस ली खुसरो का वह दोहा है: 
खीर पकाई जतन से,चरखा दिया चलाय / आया कुत्ता खा गया, तू बैठी ढोल बजाय।। / ला पानी पिला 
खुसरो सुमुखि के कर कमलों से शीतल जल पान करने का अवसर तो मिला ही, पहला दुमदार दोहा रचने का श्रेय भी मिला।

कवि को नम्र प्रणाम:
राजा-महाराजा से अधिक सम्मान साहित्यकार को देना दोहा का संस्कार है। परमल रासो में दोहा ने महाकवि चाँद बरदाई को दोहा ने सादर प्रणाम कर उनके योगदान को याद किया-
भारत किय भुव लोक मंह, गणतीय लक्ष प्रमान। / चाहुवाल जस चंद कवि, कीन्हिय ताहि समान।।

बुन्देलखंड के प्रसिद्ध तीर्थ जटाशंकर में एक शिलालेख पर डिंगल भाषा में १३वी-१४वी सदी में गूजरों-गौदहों तथा काई को पराजित करनेवाले विश्वामित्र गोत्रीय विजयसिंह का प्रशस्ति गायन कर दोहा इतिहास के अज्ञात पृष्ठ को उद्घाटित कर रहा है-
जो चित्तौड़हि जुज्झी अउ, जिण दिल्ली दलु जित्त। / सोसुपसंसहि रभहकइ, हरिसराअ तिउ सुत्त।।

खेदिअ गुज्जर गौदहइ, कीय अधी अम्मार। / विजयसिंह कित संभलहु, पौरुस कह संसार।।

वीरों का प्यारा रहा, कर वीरों से प्यार। / शौर्य-पराक्रम पर हुआ'सलिल', दोहा हुआ निसार।।

गृहस्थ संत कबीर (सं. १४५५-१५७५) के लिये 'यह दुनिया माया की गठरी' थी। कबीर जुलाहा थे, जो कपड़ा बुनते उसे बेचकर परिवार पलता पर कबीर वह धन साधुओं पर खर्च कर कहते 'आना खाली हाथ है, जाना खाली हाथ'। उनकी पत्नी लोई नाराज होती पर कबीर तो कबीर... लोई ने पुत्र कमाल को कपड़ा बेचने भेजा, कमाल कपड़ा बेच पूरा धन घर ले आया, कबीर को पता चला तो दोहा ही कबीर की नाराजगी का माध्यम बना-
'बूडा वंश कबीर का, उपजा पूत कमाल। / हरि का सुमिरन छोड़ के, भरि लै आया माल।।

कबीर ने कमाल को भले ही नालायक माना पर लोई प्रसन्न हुई। पुत्र को समझाते हुए कबीर ने कहा-
चलती चक्की देखकर, दिया कबीरा रोय। / दो पाटन के बीच में, साबित बचा न कोय।।

कमाल था तो कबीर का ही पुत्र, उसका अपना जीवन-दर्शन था। दो पीढ़ियों में सोच का जो अंतर आज है वह तब भी था। कमाल ने कबीर को ऐसा उत्तर दिया कि कबीर भी निरुत्तर रह गये। यह उत्तर भी दोहे में हैं:
चलती चक्की देखकर, दिया कमाल ठिठोय। / जो कीली से लग रहा, मार सका नहिं कोय।।

नीर गया मुल्तान:
सतसंगति की चाह में कबीर गुरुभाई रैदास के घर गये। रैदास कुटिया के बाहर चमड़ा पका रहे थे। कबीर को प्यास लगी तो रैदास ने चमड़ा पकाने की हंडी में से लोटा भर पानी दे दिया। कबीर को वह पानी पीने में हिचक हुई तो उन्होंने अँजुरी होंठ से न लगाकर ठुड्डी से लगायी, पानी मुँह में न जाकर कुर्ते की बाँह में चला गया। घर लौटकर कबीर ने कुरता बेटी कमाली को धोने के लिये दिया। कमाली ने कुर्ते की बाँह का का लाल रंग छूटने पर चूस-चूसकर छुड़ाया जिससे उसका गला लाल हो गया। कुछ दिनों बाद वह अपनी ससुराल चली गयी।
सद्गुरु रामानंद शिष्य कबीर के साथ पराविद्या (उड़ने की सिद्धि) से काबुल-पेशावर गए। बीच में कमाली का ससुराल आया तो दोनों बिटिया से मिलने पहुँच गये। कबीर यह देख चकित हुए पूर्व सूचना पहुँचने पर भी कमाली ने हाथ-मुँह धोने के लिये द्वार पर बाल्टी में पानी, अँगोछा लिये खड़ी थी। कमरे में २ बाजोट-गद्दी, २ लोटों में पीने के लिये पानी था। उनके बैठते ही कमाली गरम भोजन ले आई मानो उसे उन दोनों के आगमन की पूर्व सूचना हो। कबीर ने कमाली से पूछा उसने बताया कि राँगा लगा अँगरखा से चूसकर रंग निकालने के बाद से उसे भावी का आभास हो जाता है। अब कबीर समझे कि रैदास बिना बताए कितनी बड़ी सिद्धि दे रहे थे।
लौटने के कुछ समय बाद कबीर फिर रैदास के पास गए। प्यास लगी तो पानी माँगा। रैदास ने स्वच्छ लोटे में लाकर जल दिया। कबीर बोले: पानी तो यहीं कुण्डी में भरा है, वही दे देते। रैदास ने दोहा कहा:
जब पाया पीया नहीं, मन में था अभिमान। / अब पछताए होत क्या, नीर गया मुल्तान।।

कबीर ने भूल सुधारकर अहं से मुक्त हो अंतर्मन में छिपी प्रभु-प्रेम की कस्तूरी को पहचानकर कहा:
कस्तूरी कुण्डल बसै, मृग ढूँढे वन माँहि / ऐसे घट-घट राम है, दुखिया देखे नाँहि।।

पिऊ देखन की आस:
सूफी संतों ने दोहा को प्रगाढ़ आध्यात्मिक रंग दिया। बाबा शेख फरीद शकरगंज (११७३-१२६५ई.) को प्रभु दर्शन की ऐसी चाह थी कि वे कौए से विनती करते हैं कि वह भले ही उनके शरीर से चुन-चुनकर सारा मांस खा ले पर दो आँखों को छोड़ दे ताकि वे प्रभु के दर्शन कर सकें: 
कागा करंग ढढ़ोलिया, सगल खाइया मासु  /ए दुइ नैना मत छुहउ, पिऊ देखन की आस।।

प्रसिद्ध सूफ़ी संत शेख मोहिदी के शागिर्द, पद्मावत, अखरावट तथा आख़िरी कलाम रचयिता मलिक मोहम्मद जायसी ने आज के भाषा विवाद के हल पारदर्शी दृष्टि से ५०० वर्ष पहले ही जानकर दोहा के माध्यम से कह दिया:

तुरकी अरबी हिंदवी, भाषा जेती आहि। /  जामें मारग प्रेम का, सबै सराहै ताहि।।

प्रेम-पथ के पथिक नानक (१५२६-१५९६) ने भी दोहा को गले से लगाए रखा:
इक दू जीभौ लख होहि, लख होवहि लख वीस। / लखु-लखु गेडा आखिअहि, एकु नामु जगदीस।।  

सूरसागर, सूरसारावली तथा साहित्य लहरी रचयिता चक्षुहीन संत सूरदास (सं. १५३५-१६२०) ने दोहे को प्रगल्भता, रस परिपाक, नाद सौंदर्य आलंकारिकता, रमणीयता, लालित्य तथा स्वाभाविकता की सतरंगी किरणों से सार्थकता दी। सूर एक बार कुँए में पड़े, ६ दिन तक पड़े रहे। ७ दिन बाँकेबिहारी को पुकारा तो भक्तवत्सल भगवान ने आकर उन्हें बाहर निकाला। भगवन जाने लगे तो सूर की अंतर्व्यथा लेकर एक दोहा प्रगट हुआ जिसे सुन भगवान भी अवाक् रह गये:
बाँह छुड़ाकर जात हो, निबल जानि के मोहि। / हिरदै से जब जाहिगौ, मरद बदूंगौ तोहि।।

दोहा आदि से अब तक संतों का प्रिय छंद है:
रोम-रोम में रमि रह्या, तू जनि जानै दूर। / साध मिलै तब हरि मिलै, सब सुख आनंद मूर।। - दादूदयाल (सं. १६०१-१६६०)

बाजन जीवन अमर है, मोवा कह्यो न कोय। / जो कोई मोवा कहे, वो ही सौदा होय।। - बाजन

उसका मुख इक जोत है, घूँघट है संसार / घूँघट में वो छिप गया, मुख पर आँचर डार।। - बुल्लेशाह

काला हंसा निर्मला, बसे समंदर तीर / पंख पसारे बकह हरे, निर्मल करे सरीर।। - शेख शर्फुद्दीन याहिया मनेरी

साबुन साजी साँच की, घर-घर प्रेम डुबोय / हाजी ऐसा धोइये, जन्म न मैला होय।। - हाजी अली

सजन सकारे जायेंगे, नैन मरेंगे रोय / विधना ऐसी रैन कर, भोर कभी ना होय।। - बू अली कलंदर

कागा सब तन खाइयो, चुन खइयो मास / दू नैना मत खाइयो, पिया मिलन की आस।। -केशवदास, नागमती

महाकवि तुलसी (सं.१५५४-१६८०) के जन्म, पत्नी रत्नावली द्वारा धिक्कार, श्रीराम-दर्शन, राम-कृष्ण अद्वैत, साकेतगमन तथा स्थान निर्धारण पर दोहा ही साथ निभा रहा था:
पंद्रह सौ चौवन विषै, कालिंदी के तीर / श्रावण शुक्ला सप्तमी, तुलसी धरयौ सरीर।।

अस्थि-चर्ममय देह मम, तामें ऐसी प्रीत? / तैसी जौ श्रीराम महँ, होति न तौ भवभीति।।

चित्रकूट के घाट पर, भई संतन की भीर / तुलसिदास चंदन घिसें, तिलक देत रघुबीर।।

कहा कहौं छवि आज की, भले बने हो नाथ / तुलसी मस्तक तब नबै, धनुष-बाण लो हाथ।।

संवत सोरह सौ असी, असी गंग के तीर। / श्रावण कृष्णा तीज शनि, तुलसी तज्यो सरीर।।

सूर सूर तुलसी ससी, उडगन केशवदास। / अब के कवि खद्योत सम, जहँ-तहँ करत प्रकास।।

सूर ने श्रीकृष्ण को ह्रदय से निकलने की चुनौती दी तो रत्नावली (सं. १५६७-१६५१) ने तुलसी को, माध्यम इस बार भी दोहा ही बना:
जदपि गये घर सों निकरि, मो मन निकरे नाहिं / मन सों निकरौ ता दिनहिं, जा दिन प्रान नसाहिं।।

प्रश्नोत्तरी दोहे: 
मुगल सम्राट अकबर के नवरत्नों में से एक में से एक अब्दुर्रहीम खानखाना (संवत १६१० - संवत १६८२) ने दोहा का श्रृंगार बृज एवं अवधी से किया । प्रश्नोत्तरी दोहे उनका वैशिष्ट्य है -
नैन सलोने अधर मधु, कहि रहीम घटि कौन? / मीठा भावे लोन पर, अरु मीठे पर लोन
देनहार कोई और है:
असि (अस्त्र)-मसि (कलम) को समान दक्षता से चलानेवाले अब्दुर्रहीम खानखाना (सं. १६१०-१६८२) अपने इष्टदेव श्री कृष्ण की तरह रणभेरी और वेणुवादन का आनंद उठाते थे। रहीम दानी थे। महाकवि गंग के एक छप्पय पर प्रसन्न होकर उन्होंने एक लाख रुपयों का ईनाम दे दिया था। रहीम को संपत्ति का घमंड नहीं था। उनकी नम्रता देख गंग कवि ने पूछा:
सीखे कहाँ नवाबजू, देनी ऐसी देन? / ज्यों-ज्यों कर ऊँचो करें, त्यों-त्यों नीचे नैन।।

रहीम ने तुरंत उत्तर दिया:
देनहार कोई और है, देत रहत दिन-रैन / लोग भरम हम पर करें, ताते नीचे नैन।।

रहीम ने ने दोहा को नट तरह कलाओं से संपन्न कहा:
देहा दीरघ अरथ के, आखर थोड़े आहिं / ज्यों रहीम नट कुंडली, सिमटि कूदि चढ़ि जाहिं।।

दोहा एक दोहाकार दो:
दोहा केवल दो पंक्तियों का छोटा सा छंद है। एक अवसर ऐसा भी आया जन एक दोहा छंद को दो निपुण दोहाकारों ने पूर्ण किया। तुलसी की कुटिया में एक दिन एक याचक आया। प्रणाम कर कहा कि बिटिया के हाथ पीले करने हैं, धन चाहिए। रमापति राम में मन रमाये तुलसी की कुटिया में रमा कैसे रहतीं? विप्र समझ गया कि इन तिलों में तेल नहीं है सो निवेदन किया कि बाबा एक कविता लिख दें, तो काम बन जाएगा। तुलसी ने पूछा कविता से बिटिया का ब्याह कैसे होगा? याचक ने बताया कि समीप ही मुग़ल सेना का पड़ाव है, सेनापति सवेरे श्रेष्ठ कविता लानेवाले को एक मुहर ईनाम देते हैं। याचक की चतुराई पर मन ही मन मुस्कुराते बाबा ने कागज़ पर एक पंक्ति घसीट कर दी और पीछा छुड़ाकर पूजन-पाठ में रम गएयाचक ने मुग़ल सेनापति के शिविर की ओर दौड़ लगा दी। हाँफते हुए पहुँचा ही था कि सेनापति तशरीफ़ ले आये, उसकी घिघ्घी बँध गई। किसी तरह हिम्मत कर सलाम किया और कागज़ बढ़ा दिया। सेनापति ने कागज़ लेते हुए उसे पैनी नज़र से देखा, पढ़ा और पूछा तुमने लिखा है? याचक ने सहमति में सर हिलाया तो सेनापति ने कड़ककर पूछा सच कहो नहीं तो सर कलम कर दिया जाएगा। मन मन ही मन बाबा को कोसते याचक ने सचाई बता दी। सेनापति हँस पड़े, कागज़ पर नीचे कुछ लिखा और बोले यह कागज़ बाबा को दे आओ तो तुम्हें दो मुहरें ईनाम में मिलेंगी। सेनापति थे अब्दुर्रहीम खानखाना । कागज़ पर था एक दोहा जिसकी पहली पंक्ति तुलसी ने लिखी थी दूसरी रहीम ने:
सुरतिय नरतिय नागतिय, सब चाहत अस होय।/ गोद लिये हुलसी फिरैं, तुलसी सो सुत होय।।

प्रीत करो मत कोय:
गिरिधर गोपाल की बावरी आराधिका मीरांबाई (१५०३ई.-१५४६ई.) के दोहे देश-काल की सीमा के परे व्याप्त हैं:
जो मैं ऐसा जाणती, प्रीत किये दुःख होय / नगर ढिंढोरा फेरती, प्रीत न कीज्यो कोय।।

दोहा रक्षक लाज का:
महाकवि केशवदास की शिष्या, ओरछा नरेश इंद्रजीत की प्रेयसी प्रवीण विदुषी-सुंदरी थीं। नृत्य, गायन, काव्य लेखन तथा वाक् चातुर्य में उन जैसा कोई अन्य नहीं था। मुग़ल सम्राट अकबर को दरबारियों ने उकसाया कि ऐसा नारी रत्न बादशाह के दामन में होना चाहिए। अकबर ने ओरछा नरेश को संदेश भेजा कि राय प्रवीण को दरबार में हाज़िर करें। नरेश धर्म संकट में पड़े, प्रेयसी को भेजें तो आन-मान नष्ट होने के साथ राय प्रवीण की प्रतिष्ठा तथा सतीत्व खतरे में, न भेजें तो शक्तिशाली मुग़ल सेना के आक्रमण का खतरा।राज्य बचाएँ या प्रतिष्ठा? राजगुरु केशव ने राजा को राज्धार्ण का निर्वहन करने का परामर्श देते हुए राय प्रवीण की सुरक्षा के प्रति आश्वस्त किया। स्वयं राय प्रवीण ने भी साहस दिखाया कि वह हर परिस्थिति का सामना कर सकुशल लौट आएगी। अंतत:, ओरछा राज्य को संकट से बचाने लिए जान हथेली पर लेकर अकबर के दरबार में महाकवि तथा राय प्रवीण उपस्थित हुए। अकबर ने महाकवि का सम्मान कर राय प्रवीण को तलब कर, हरम में जाने को कहा। राय प्रवीण ने बादशाह को सलाम करते हुए एक दोहा कहा और लौटने की अनुमति चाही। दोहा सुनते ही दरबार में सन्नाटा छा गया। बादशाह ने राय प्रवीण को न केवल सम्मान सहित वापिस जाने दिया अपितु कई बेशकीमती नजराने भी दिये। राय प्रवीण की अस्मिता बचाने और अकबर के दर्प को धूल में मिलनेवाला वह वाला दोहा है:
बिनत रायप्रवीन की, सुनिये शाह सुजान। / जूठी पातर भखत हैं, बारी बायस स्वान॥
दोहा साक्षी समय का: 
मुग़ल सम्राट अकबर हर सुंदर स्त्री को अपने हरम में लाने के लिये बेक़रार रहता था। गोंडवाना की महारानी दुर्गावती की सुंदरता, वीरता, लोकप्रियता, शासन कुशलता तथा संपन्नता की चर्चा चतुर्दिक थी। महारानी का चतुर दीवान अधारसिंह कायस्थ तथा सफ़ेद हाथी 'एरावत' अकबर की आँख में काँटे की तरह गड़ रहे थे। अधारसिंग के कारण सुव्यवस्था तथा सफ़ेद हाथी कारण समृद्धि होने का बात सुन अकबर ने रानी के पास संदेश भेजा-
अपनी सीमा राज की, अमल करो फरमान। / भेजो नाग सुवेत सो, अरु अधार दीवान

मरता क्या न करता... रानी ने अधारसिंह को दिल्ली भेजा। दरबार में अधारसिंह ने सिंहासन खाली देख दरबारियों के बीच छिपकर बैठे बादशाह अकबर को कोर्निश की। चमत्कृत अकबर ने अधार से पूछा कि उसने बादशाह को कैसे पहचाना? अधारसिंह ने नम्रता से उत्तर दिया कि जंगल में जिस तरह शेर न दिखने पर अन्य जानवर उस पर निगाह रखते हैं वैसे दरबारी उन पर नज़र रखे थे इससे अनुमान किया। अकबर ने नकली उदारता दिखाते हुए कुछ माँगने और दरबार में रहने को कहा। अधारसिंहने चतुराई से बादशाह द्वारा कुछ माँगने के हुक्म की तामील करते हुए अपने देश लौट जाने की अनुमति माँग ली। अकबर ने अधारसिंह को जाने तो दिया किंतु बाद में गोंडवाना पर हमला करने का हुक्म दे दिया। दोहा बादशाह के सैन्य बल का वर्णन प्रश्नोत्तर शैली में करता है-
कै लख रन मां मुग़लवा, कै लख वीर पठान? / कै लख साजे पारधी, रे दिल्ली सुलतान?

इक लख रन मां मुगलवा, दुई लख वीर पठान। / तिन लख साजे पारधी, रे दिल्ली सुलतान।।

असाधारण बहादुरी से लड़ने के बाद भी अपने देवर की गद्दारी का कारण अंततः महारानी दुर्गावती देश पर शहीद हुईं। मुग़ल सेना ने राज्य लूटा, भागते हुए लोगों और औरतों तक को नहीं छोड़ा। महारानी का नाम लेना भी गुनाह हो गया। जनगण ने अपनी लोकमाता दुर्गावती को श्रद्धांजलि देने के लिये समाधि के समीप सफ़ेद पत्थर एकत्र किये, जो भी वहाँ से गुजरता एक सफ़ेद कंकर समाधि पर चढ़ा देता। स्वतंत्रता सत्याग्रह के समय इस परंपरा का पालनकर आजादी के लिये संघर्ष का संकल्प लिया गया। दोहा आज भी दुर्गावती, अधार सिंह और आजादी के दीवानों की याद दिल में बसाये है-
ठाँव बरेला आइये, जित रानी की ठौर। / हाथ जोर ठांड़े रहें, फरकन लगे बखौर।।
अर्थात बरेला गाँव में रानी की समाधि पर हाथ जोड़कर श्रद्धाभाव से खड़े हों तो उनकी वीर गाथा से प्रेरित हो आपकी भुजाएँ फड़कने लगती हैं।
महाकवि गंग का अंतिम दोहा: 
'तुलसी-गंग दुवौ भये सुकविन के सरदार' प्रसिद्ध महाकवि गंग (सं. १५३८-१६१७) मुग़ल दरबारियों के षड्यंत्र के शिकार हुए उन्हें क्षमायाचना का हुक्म मिला किंतु स्वाभिमानी कवि को यह अपमान स्वीकार नहीं हुआ हाथी के पैर तले कुचलवाने का आदेश मिलने पर उन्होंने गज में गणेश-दर्शन कर कर बिदा ली: 
कबहुँ न भडुआ रन चढ़ै, कबहुँ न बाजी बंब। / सकल सभहिं प्रनाम करि, बिदा होत कवि गंग।। 
माई एहणा पूत जन:
दुर्गावती के बाद अकबर की नज़र में चित्तौरगढ़ महाराणा प्रताप (१५४० ई.-१५९७ई.) खटकते रहे। प्रताप की मौत पर कवि पृथ्वीराज राठौड़ रचित दोहा अकबर को उसकी औकात बताने में नहीं चूका:
माई! एहणा पूत जण, जेहणा वीर प्रताप। / अकबर सुतो ओझके, जाण सिराणे साँप।। 
तानसेन के तान:
अकबर के नवरत्नों में से एक महान गायक तानसेन को नमन करते दोहा की गुणग्राहकता देखिए:
विधना यह जिय जानिकै, शेषहिं दिये न कान। / धरा-मेरु सब डोलिहैं, तानसेन के तान।। 
दोहा रोके युद्ध भी:
मुग़ल दरबारियों ने अकबर के साले और नवरत्नों में अग्रगण्य पराक्रमी मानसिंह को चुनौती दी कि उन्हें अपने बाहुबल पर भरोसा है तो श्रीलंका को जीतकर मुग़ल साम्राज्य में सम्मिलित कर दिखाएँ। मानसिंह से समक्ष इधर खाई उधर कुआँ, चारों तरफ धुआं ही धुआँ' की हालत पैदा हो गई। दूर सेना ले जाकर, समुद्र पार युद्ध अति खर्चीला, सैनिक जाने को तैयार नहीं, जीत की सम्भावना नगण्य, बिना कारण युद्ध हेतु न जाएँ तो सम्मान गँवाएँ। ऐसी विषम परिस्थिति में राजगुरु द्वारा कहा गया निम्न दोहा संकटमोचन सिद्ध हुआ: 
विप्र विभीषण जानि कै, रघुपति कीन्हों दान। / दिया दान किमि लीजियो, महामहीपति मान।। 
सूर्यवंशी मानसिंह अपने पूर्वज श्रीराम द्वारा बाद विप्र विभीषण को दाम में दी गयी लंका कैसे वापिस लें? दोहे ने युद्ध टालकर असंख्य जान-धन की हानि रोक दी। 
मतिराम के अलंकारिक दोहा की रूप छटा मन मोहती है:
दिपै देह दीपति गयौ, दीप बयारि बुझाइ 
अंचल ओट किये तऊ, चली नवेली जाइ -अनुप्रास 
सरद चंद की चाँदनी, को कहिए प्रतिकूल
सरद चंद की चाँदनी, कोक हिए प्रतिकूल -यमक 
अजगर करे न चाकरी
सुखवादियों सिद्धांत सूफियों से बिलकुल उलट होने पर भी दोनों में दोहा-प्रेम समान है।रत्नखान और ज्ञानबोधकार मलूकदास (सं. १६३२-१७३९) ने डूबते शाही जहाज को पानी से निकालकर बचाया और रुपयों का तोड़ा उफनाती गंगा में तैराकर कड़ा से इलाहाबाद भेजा।

अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम 
दास मलूका कहि गए, सबके दाता राम

सुखवादियों को चड़वांक / चार्वाक कहकर लोक ने उन पर व्यंग्य किया। उसका वाहक दोहा ही हुआ:
परे पराई पौर में, बनी बनाई खाँय 
रिन-धन कौ खटका नहीं, काए खें दुबराँय

दोहा आँखें खोलता:
जयपुर नरेश महाराजा जयसिंह जब कमसिन नवोढ़ा रानी के रूपजाल में बँधकर कर्तव्य भूल बैठे तो राजगुरु महाकवि बिहारी (सं.१६६०-१७२०) ने मारक दोहा पढ़कर उन्हें दायित्व बोध कराया:
नहिं पराग नहिं मधुर मधु, नहिं विकास एहि काल 
अली कली ही सौं बँध्यो, आगे कौन हवाल?

महाराज एक दोहा सुनते और एक अशर्फी समर्पित करते। ऐसे ७०० दोहों से बिहारी की दोहा सतसई बनी। श्लेष, वक्रोक्ति, श्रृंगार की त्रिवेणी बिहारी के दोहों में सर्वत्र प्रवाहित है।
मेरी भव बाधा हरो, राधा नागरि सोय 
जा तन की झाईं परै, स्याम हरित दुति होय

कहत नटत रीझत खिझत, मिलत खिलअत लजियात 
भरे भौन में करत हैं, नैनन ही सौं बात

मुग़ल सम्राट औरंगज़ेब ने कुटिलतापूर्वक राजा जयसिंह को मु ग़ल सेना के साथ शिवजी से युद्ध का आदेश दिया। विजय हो तो श्रेय सेना को मिलता, पराजय का ठीकरा जयसिंह फोड़ा जाता। एक बार फिर महाकवि बिहारी ने दोहा को हथियार बनाया और जयसिंह को आत्मघाती युद्ध पर जाने से रोका:
स्वारथ सुकृत न श्रम वृथा, देख विहंग विचार 
बाज पराये पानि पर, तू पंछीन न मार

दोहा रसनिधि अमर है:
ठाकुर पृथ्वीसिंह 'रसनिधि' (सं. १६६०-१७१७) ने सतसई हजारा तक पहुँचाया।रसनिधि का वैशिष्ट्य परिमार्जित बृज भाषा में फारसी के तत्सम शब्दों का प्रयोग, तथा प्रसाद गुण प्रधान शैली है:
हिन्दू मैं क्या और है, मुसलमान मैं और?
साहिब सबका एक है, व्याप रहा सब ठौर.

लोक-प्राण दोहा बसे:
दोहा विद्वज्जनों और जनसामान्य दोनों के कंठ में वास करता है। वृंद (१६४३ई.-१७२३ई.) रचकर जनमानस को आत्मानुशासन का पाठ पढ़ाया। उनके दोहे कहावत बनकर अमर हो गये:
अपनी पहुँच बिचारि कै, करतब करिये दौरि 
तेते पाँव पसारिये, जेती लाम्बी सौरि 
मतिराम (सं.१६७४-१७४५) के अलंकारिक दोहों की रूप छटा मन मोहती है:
दिपै देह दीपति गयौ, दीप बयारि बुझाइ 
अंचल ओट किये तऊ, चली नवेली जाइ -अनुप्रास 
सरद चंद की चाँदनी, को कहिए प्रतिकूल
सरद चंद की चाँदनी, कोक हिए प्रतिकूल -यमक 
धीरे-धीरे रे मना:
बुंदेलखंड में संतों ने दोहा की नर्मदा को सतत प्रवहमान बनाये रखा. विस्मय है कि आज साम्प्रदायिकता, क्षेत्रीयता और भाषिक मतभेद के जिन विवादों से राष्ट्रीय एकता संकट है, उनके समाधान संतों ने सुझाये हैं। महामति प्राणनाथ (१६५८-१७०


दोहा छंदों का राजा है. मानव जीवन को जितना प्रभावित दोहा ने किया उतना किसी भाषा के किसी छंद ने कहीं-कभी नहीं किया. 
दोहा में दो पंक्तियाँ होती हैं. हर पंक्ति में दो चरण होते हैं. पहले-तीसरे चरण में १३-१३ मात्राएँ तथा दूसरे-चौथे चरण में ११-११ मात्राएँ होती हैं. इस प्रकार हर पंक्ति में १३+११ कुल २४ मात्राएँ होती हैं. तेरह मात्राओं के बाद जो क्षणिक ठहराव या विराम होता है उसे यति कहा जाता है. दोहा में १३, ११ मात्राओं पर यति अपरिहार्य है. यदि यह यति ११-१३ या १२-१२ पर हो तो वह दोहा नहीं रह जाएगा. 
दोहा की दोनों पंक्तियों अर्थात सम चरणों के के अंत में गुरु लघु मात्रा होना जरूरी है. स्पष्ट है कि दोहा के पंक्त्यांत में गुरु मात्रा नहीं हो सकती. 
मात्रा गणना: 
हिंदी में स्वरों तथा व्यंजनों के उच्चारण काल के आधार पर उन्हें लघु / छोटा (कम उच्चारण काल) या गुरु, दीर्घ या बड़ा (अधिक उच्चारण काल) वर्गीकृत किया गया है. 
लघु मात्रा : अ, इ, उ, ऋ, 
गुरु मात्रा : आ. ई. ऊ. ए, ऐ. अं. अ:, संयुक्त अक्षर क्त, क्ख, ग्य, र्य, 
संयुक्त अक्षर का आधा अक्षर अपने पहले वाल्व अक्षर के साथ उच्चारित होता है. इसलिए पहले वाले लघु अक्षर को गुरु कर देता है किन्तु पूर्व में गुरु अक्षर हो तो आधे अक्षर का कोई प्रभाव नहीं होता।
उक्त = उक् + त = २ + १ =३ 
विज्ञ = विग् + य = २ + १ =३ 
आप्त = आप् + त = २ + १ = ३ 
दोहा के विषम चरण में एक शब्द में जगण अर्थात जभान = १२१ वर्जित है. इस संबंध में विविध ग्रंथों में मत वैभिन्न्य है. कहीं विषम चरण के आरम्भ में कहीं अंत में , कहीं पूरे विषम चरण में जगण को वर्जित कहा गया है. इसका कारण सम्भवत: जगण से लय भंग होना है. प्रसिद्ध दोहाकारों के प्रसिद्ध दोहों में जगण पाये जाने के बाद भी इस मान्यता को अधिकांश दोहाकार मानते हैं. 
गण की जानकारी: गण का सूत्र 'यमाताराजभानसलगा' है. सूत्र का हर अक्षर गण का संकेत करता है. गण का नाम प्रथमाक्षर के साथ अगले दो अक्षर जोड़कर बनता है. गण-नाम के ३ अक्षर मात्राओं का संकेत करते हैं, जिनसे लयखंड बनता है. 
गण नाम गण सूत्र गण मात्रा 
य गण यमाता १२२=५ 
म गण मातारा २२२=६ 
त गण ताराज २२१=५ 
र गण राजभा २१२=५ 
ज गण जभान १२१=४ 
भ गण भानस २११=४ 
न गण नसल १११=३ 
स गण सलगा ११२=४

य गण, म गण, र गण, तथा सगण के अंत में गुरु मात्रा है. अतः, इन्हें दोहा के सम चरण अथवा पंक्ति के अंत में प्रयोग नहीं किया जा सकता। 
दोहा के दरबार में, रस वर्षण हो खूब 
लिख-सुनकर आनंद हो, जाएँ सुख में डूब 
. 
हँस दोहे से प्रीत कर, बन दोहे का मीत 
मन दोहे का मान रख, यही सृजन की रीत 
. 
शेष छंद हैं सभासद, दोहा छंद-नरेश 
तेइस विविध प्रकार हैं, दोहाकार अशेष 
. 

कायस्थों के कुलनाम उपनाम
 कुलनाम और उपनाम- कायस्थों के कई उपनाम या कुलनाम उनके कार्य से जुड़े रहे हैं. यह भी उनमें से एक है. जिनसे कानून संबंधी सलाह ली जाती थी वे कानूनगो, जिनसे राय महत्वपूर्ण मसलों पर जरूरी समझी जाती थी वे रायजादा, जिन्हें जागीरें बख्श दी गयी थीं, वे बख्शी, जिनका व्यवहार बहुत अच्छा था वे व्यवहार (ब्योहार बुंदेली रूप), जीने पास वास्तव में 'श्री' (धन-विद्या दोनों) थी वे श्रीवास्तव, जो जुझारू तथा सभ्य थे वे भटनागर, जिनका आचार-व्यवहार खरा (ईमानदार) था वे खरे, जो परोपकारी (सहायक) थे वे सहाय, जो विष्णु भक्त थे वे नारायण, जो कलाप्रेमी (गुणवान) थे वे रंजन तथा सारंग, जो पराक्रमी थे वे बहादुर, जो भक्त (धार्मिक) थे वे प्रसाद आदि उपाधियों से जाने गए. एक से अधिक जातियों में समान गुण पाए जाने पर ये उपनाम कायस्थों और गैर कायस्थों दोनों में मिलते हैं. जैसे वर्मा (दूसरों की रक्षा करने वाले) कायस्थ, जाट आदि हैं, सिंह (सिन्हा) कायस्थ, राजपूत दोनों हैं. माथुर कायस्थ और वैश्य हैं.कायस्थों में अल्ल, वैश्यों में आँकने भी होते हैं. सभी वर्णों न गोत्र भी होते हैं. इन सबका अलग-अलग अर्थ है किन्तु आजके समय में लोग न तो इन्हें जानते हैं, न मानते हैं.

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एक रचना 
हर दिन 
*
सिया हरण को देख रहे हैं 
आँखें फाड़ लोग अनगिन। 
द्रुपद सुता के चीरहरण सम 
घटनाएँ होतीं हर दिन। 
*
'गिरि गोपाद्रि' न नाम रहा क्यों?
'सुलेमान टापू' क्यों है?
'हरि पर्वत' का 'कोह महाजन' 
नाम किया किसने क्यों है?
नाम 'अनंतनाग' को क्यों हम 
अब 'इस्लामाबाद' कहें?
घर में घुस परदेसी मारें 
हम ज़िल्लत सह आप दहें?
बजा रहे हैं बीन सपेरे 
राजनीति नाचे तिक-धिन 
द्रुपद सुता के चीरहरण सम 
घटनाएँ होतीं हर दिन। 
*
हम सबका 'श्रीनगर' दुलारा 
क्यों हो शहरे-ख़ास कहो?
'मुख्य चौक' को 'चौक मदीना' 
कहने से सब दूर रहो 
नाम 'उमा नगरी' है जिसका 
क्यों हो 'शेखपुरा' वह अब?
'नदी किशन गंगा' को 'दरिया-
नीलम' कह मत करो जिबह 
प्यार न जिनको है भारत से 
पकड़ो-मारो अब गईं-गईं 
द्रुपद सुता के चीरहरण सम 
घटनाएँ होतीं हर दिन। 
*
पण्डित वापिस जाएँ बसाए 
स्वर्ग बनें फिर से कश्मीर 
दहशतगर्द नहीं बच पाएं 
कायम कर दो नई नज़ीर 
सेना को आज़ादी दे दो 
आज नया इतिहास बने 
बंगला देश जाए दोहराया 
रावलपिंडी समर ठने 
हँस बलूच-पख्तून संग 
सिंधी आज़ाद रहें हर दिन 
द्रुपद सुता के चीरहरण सम 
घटनाएँ होतीं हर दिन। 
*

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नवगीत:
संजीव
*
पानी-पानी
हुए बादल
आदमी की
आँख में
पानी नहीं बाकी
बुआ-दादी
हुईं मैख़ाना
कभी साकी
देखकर
दुर्दशा मनु की
पलट गयी
सहसा छागल
कटे जंगल
लुटे पर्वत
पटे सरवर
तोड़ पत्थर
खोद रेती
दनु हुआ नर
त्रस्त पंछी
देख सिसका
कराहा मादल
जुगाड़े धन
भवन, धरती
रत्न, सत्ता और
खाली हाथ
आखिर में
मरा मनुज पागल
***

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नवगीत २
इसरो को शाबाशी
किया अनूठा काम
'पैर जमाकर
भू पर
नभ ले लूँ हाथों में'
कहा कभी
न्यूटन ने
सत्य किया
इसरो ने
पैर रखे
धरती पर
नभ छूते अरमान
एक छलाँग लगाई
मंगल पर
है यान
पवनपुत्र के वारिस
काम करें निष्काम
अभियंता-वैज्ञानिक
जाति-पंथ
हैं भिन्न
लेकिन कोई
किसी से
कभी न
होता खिन्न
कर्म-पुजारी
सच्चे
नर हों या हों नारी
समिधा
लगन-समर्पण
देश हुआ आभारी
गहें प्रेरणा हम सब
करें विश्व में नाम
**

muktak

मुक्तक 
कान्हा कहता 'करनी का फल सबको मिलता है'
माली नोचे कली-फूल तो, आप न फलता है 
सिर घमण्ड का नीचा होता सभी जानते हैं -
छल-फरेब कर व्यक्ति स्वयं ही खुद को छलता है
*
बहुत बुरा जो तुरत भुला दो, मन से फेंक निकाल
बार-बार क्यों ध्यान करे मन, खुद से करो सवाल?
क्यों अच्छे का ध्यान न आता, मन क्यों अकुलाता?
शुभ संकल्प अगर हों कुछ तो होगा मन न निढाल
*
अपने मन में आप जल लें नव आशा का दीप
तूफानों के बीच मिले मोती, यदि ले लें सीप
शिकवे की रेती पर दौड़े तो थक जायेंगे
क्षमा-घाट पर बैठ जाइये धरा तनिक सी लीप
*
तन धोखा है, मन धोखा है, जीवन धोखा है
श्वास, आस, विश्वास, रास, परिहास भी धोखा है
धोखे के कीचड़ में हमको कमल खिलाना है
खुद को क्षमा कर सकें खुद से ब्यर्थ लजाना है
*


पितृ तर्पण विधि   PITRU TARPAN VIDHI

आवाहन Awahan: 

दोनों हाथों की अनामिका (छोटी तथा बड़ी उँगलियों के बीच की उँगली) में कुश (एक प्रकार की घास) की पवित्री (उँगली में लपेटकर दोनों सिरे ऐंठकर अँगूठी की तरह छल्ला) पहनकर, बायें कंधे पर सफेद वस्त्र डालकर दोनों हाथ जोड़कर अपने पूर्वजों को निम्न मन्त्र से आमंत्रित करें:
First wear pavitree (ring of kushaa- a type of grass) in ring fingers of both the hands and place a white cloth- piece on left shoulder. Now invite (call) your ancestor’s spirit by praying (join your hands) through this mantra:

'ॐ आगच्छन्तु मे पितर एवं ग्रहन्तु जलान्जलिम'
ॐ हे पूज्य पितरों! पधारिये तथा जलांजलि ग्रहण कीजिए। 
“Om aagachchantu me Pitar evam grihanantu Jalaanjalim.”

तर्पण: तिल-जल अर्पित करें Tarpan :(offer water & til)

किसी पवित्र नदी, तालाब, झील या अन्य स्रोत (गंगा / नर्मदा जल पवित्रतम हैं) के शुद्ध जल में थोड़ा सा दूध, तिल तथा जवा मिलाकर बनाये तिलोदक (तिल + उदक = जल में तिल) से निम्न में से प्रत्येक को ३ बार तस्मै स्वधा नमः कहते हुए जलांजलि अर्पित करें। 
Now offer tilodak (water preferably collected from any natural source river, tank, lake etc. Ganga / narmada river's water considered most pious, mix little milk, java & Til. offer 3 times to each one . 

स्वर्गीय पिता को तर्पण  Tarpan to Late Father:
(गोत्र नाम) गोत्रे अस्मतपिता (पिता का नाम) शर्मा वसुरूपस्त्तृप्यतामिदं तिलोदकम (नर्मदा/गंगा जलं वा) तस्मै स्वधा नमः, तस्मै स्वधा नमः, तस्मै स्वधा नमः।
(गोत्र नाम)  गोत्र के मेरे पिता (पिता का नाम) वसुरूप में तिल तथा पवित्र नर्मदा/गंगा जल ग्रहणकर तृप्त हों। तस्मै स्वधा नमः, तस्मै स्वधा नमः, तस्मै स्वधा नमः।
(Pronounce gotra name) Gotre Asmat (mine) Pita ( father's name) Sharma Vasuroopastripyatamidam Tilodakam (Narmada/GangaJalam Vaa) Tasmey Swadha Namah, Tasmey Swadha Namah, Tasmey Swadha Namah.

Tilodakam: Use water mixed with milk java & Til ( water taken from Ganga / narmada rivers cosidered best)Tasmey Swadha Namah recite 3 times while leaving (offering) water from joind hands
स्वर्गीय पितामह हेतु तर्पण Tarpan to late Paternal Grand Father:

उक्त मंत्र में अस्मत्पिता के स्थान पर अस्मत्पितामह तथा वसुरूपस्त्तृप्यतमिदं के स्थान पर रूद्ररूपस्त्तृप्यतमिदं पढ़ें. 

Replace AsmatPita with Asmatpitama & Vasuroopastripyatamidam with Rudraroopastripyatamidam in above mantra. 

स्वर्गीय पितामही हेतु तर्पण Tarpan to late paternal Grand mother:

उक्त में अस्मत्पितामह के स्थान पर अस्मत्मातामह पढ़ें  Replace Asmatpitamah with Asmatma tamah
वसुरूपस्त्तृप्यतमिदं के स्थान पर रूद्ररूपस्त्तृप्यतमिदं पढ़ें 

Replace Vasuroopastripyatamidam with Rudraroopastripyatamidam in above mantra.

माता हेतु  तर्पण Tarpan to Mother:

(गोत्र नाम) गोत्रे अस्मन्माता माता का नाम देवी वसुरूपास्त्तृप्यतमिदं तिलोदकम (गंगा/नर्मदा जलं वा) तस्मै स्वधा नमः, तस्मै स्वधा नमः तस्मै स्वधा नमः।
.......... गोत्र की मेरी माता श्रीमती ....... देवी वसुरूप में तिल तथा पवित्र जल ग्रहण कर तृप्त हों। तस्मै स्वधा नमः, तस्मै स्वधा नमः, तस्मै स्वधा नमः।

AmukGotraa Asmnamata AmukiDevi Vasuroopaa Tripyatamidam Tilodakam Tasmey Swadha Namah, Tasmey Swadha Namah, Tasmey Swadha Namah.

जलांजलि पूर्व दिशा में १६ बार, उत्तर दिशा में ७ बार तथा दक्षिण दिशा में १४ बार अर्पित करें 
offer jalanjali (take tilodikam in both hands joined and leave graduaalee on earth or in some vassel) 16 times in east, 7 times in north & 14 times in south directions.
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निस्संदेह मन्त्र श्रद्धा अभिव्यक्ति का श्रेष्ठ माध्यम हैं किन्तु भावना, सम्मान तथा अनुभूति अन्यतम हैं। तिल-कुश न मिल सके तो केवल जल से, जल भी न मिले तो केवल नाम स्मरण से अथवा नाम भी न ज्ञात हो तो संबंध याद कर हाथ जोड़ कर भी तर्पण किया जा सकता है. तर्पण का आशय दिवंगत की आत्मा के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन है, इस अर्थ में किसी भी आदर/स्नेह पात्र तथा आपदा में दिवंगत अनेक जनों का उन्हें स्वजन मानकर तर्पण किया जा सकता है. 

It is true that mantra is a great medium for prayer offerings. But love, attachment, feelings, sentiments, emotions, regard & emotions are prime not mantras.in case any of the material reqired is not available then take pure water, if water is not available join hands and bow head in pious memory of the expired relatives. In case names are not known tarpan can be offered by remembering relation with them. In the broadest sence tarpan (offering prayer) can be done to any one for the peace of his/her/it's soul. It is nothing but expressing the gratitude to the soul.
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bhasha vividha

भाषा विविधा:  
चार्ल्स बुवोस्की की एक कविता हिंदी अनुवाद सहित 
So You Want To Be A Writer...
तो तुम एक लेखक बनना चाहते हो 
charles bukowski
चार्ल्स बुवोस्की
*
if it doesn't come bursting out of you in spite of everything,
don't do it.

सब कुछ के बाद भी अगर तुम्हारे भीतर से फूटकर न निकले 
तो मत लिखो.
unless it comes unasked out of your heart and 

                       your mind and your mouth and your gut,
don't do it.

यदि तुम्हारे दिल, दिमाग, मुँह और पेट से बिना प्रयास न निकले 
तो मत लिखो 
if you have to sit for hours
staring at your computer screen
or hunched over your typewriter
searching for words,
don't do it.

यदि तुम्हें घंटों बैठना पड़े 
अपने संगणक के परदे को ताकते हुए 
या टंकक पर झुके हुए 
शब्दों की तलाश में 
तो मत लिखो 
if you're doing it for money or fame,
don't do it.

यदि तुम धन या यश के लिए कर रहे हो 
तो मत लिखो  
if you're doing it because you want women in your bed,
don't do it.

यदि तुम इस लिए लिख रहे हो कि तुम्हें बिस्तर पर स्त्री चाहिए 
तो मत लिखो 
if you have to sit there and rewrite it again and again,
don't do it.

यदि तुम्हें वहाँ बैठकर  बार बार लिखना पद रहा है 
तो मत लिखो
if it's hard work just thinking about doing it,
don't do it.

यदि इसके बारे में सोचना ही कठिन है 
तो मत लिखो
if you're trying to write like somebody else,
forget about it.

यदि किसी और की तरह लिखने की कोशिश कर रहे हो 
तो मत लिखो
if you have to wait for it to roar out of you,
then wait patiently.
if it never does roar out of you,
do something else.
यदि तुम्हारे अन्दर से गरजते हुए बाही निकलने के लिए समय चाहिए 

तो धैर्य सहित प्रतीक्षा करो 
यदि गर्जन तुम्हारे अन्दर से कभी न निकले
तो कुछ और करो  
if you first have to read it to your wife or your girlfriend or 

                      your boyfriend or your parents or to anybody at all,
you're not ready.
अगर तुम्हें पहले सुनाना पड़ता है पत्नी, महिला मित्र, 

                                              पुरुष मित्र, अभिभावक या अन्य को 
तब तुम तैयार नहीं हो 
don't be like so many writers,
don't be like so many thousands of people 

who call themselves writers,
don't be dull and boring and pretentious, 

don't be consumed with self- love.
बहुतेरे लेखकों की तरह मत बनो,
जो हजारों लोगों की तरह मत बनो 
जो खुद को लेखक कहते हैं 
मंदबुद्धि, उबाऊ या पाखंडी मत बनो 
आत्म-रति के उपभोग मत बनो 
the libraries of the world have yawned themselves 
to sleep over your kind.
don't add to that.
don't do it.

दुनिया के पुस्तकालय ऊब चुके हैं
तुम जैसों पर सोते-सोते 
उसमें वृद्धि मत करो,
बिलकुल मत करो  
unless it comes out of your soul like a rocket,
unless being still would drive you to madness or
suicide or murder,
don't do it.

जब तक तुम्हारी आत्मा से रोकेट की तरह न निकले 
जब तक वह तुम्हें मजबूर न करने लगे पागलपन, 
आत्महत्या या हत्या के लिए  
तब तक मत लिखो। 
unless the sun inside you is burning your gut,
don't do it.
जब तक तुम्हारे अंदर का सूर्य बाहर आने के लिए जलने न लगे 

तब तक मत लिखो।
when it is truly time,
and if you have been chosen,
it will do it by itself and it will keep on doing it
until you die or it dies in you.
अगर यह सही समय है 

और तुम चुने गए हो 
तो यह अपने आप हो जाएगा और होता रहेगा 
जब तुम या यह खुद समाप्त न हो जाए। 
there is no other way.
and there never was.

कोइ और रास्ता नहीं है,
और कभी नहीं था.
***