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सोमवार, 28 सितंबर 2020

पुरोवाक : तुम्हें मेरी कसम - धर्मेंद्र आज़ाद

पुरोवाक्
"तुम्हें मेरी कसम" समय-साक्षी कविताएँ 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
सृष्टि में मानव के विकास का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पड़ाव वाक् शक्ति से परिचित होना है। कंठ के वाक्-सामर्थ्य का आभास होते ही मानव ने निरंतर प्रयास कर ध्वनियों में भेद करना, उनके प्रभाव को स्मृति कोष में संचित कर उनसे घटनाओं का पूर्वानुमान करना, विविध मनस्थितियों को व्यक्त करना सीखा। अनुभूत को अभिव्यक्त करते समय 'कम से कम में' 'अधिक से अधिक' कहने की चाह ने पूर्ण वाक्य के स्थान पर संक्षिप्त कथन, कहे को स्मरण रख सकने के लिए सरस बनाने हेतु समान उच्चारण के शब्दों का चयन, कहे हुए को शत्रु न समझ सकें इसलिए प्रतीकों में बात कहने, प्रिय को प्रसन्न करने के लिए कोमलकांत पदावली का प्रयोग आदि चरणों ने काव्य रचना को महत्वपूर्ण ही नहीं, अपरिहार्य भी बना दिया। वेद पूर्व काल में ही कविता आम जनों से लेकर विदवज्जनों तक के बीच में रच-बस चुकी थी और उसे कहने, स्मरण रखने और समझने में सहायक मान लिया गया था। कविता में ध्वनि खंडों की आवृत्ति ने छंदों को जन्म दिया। समान पदभार, गति-यति और पदांत योजना ने गीत, मुकतक, मुक्तिका (ग़ज़ल, गीतिका, तेवरी, अनुगीत, सजल) आदि विधा-वैविध्य का विकासकर पिंगल शास्त्र को इतनी प्रतिष्ठा दी कि आचार्य पिंगल, आचार्य भरत और आचार्य नंदिकेश्वर अमर हो गए। इनमें से आचार्य नंदिकेश्वर नर्मदा तट पर जबलपुर में निर्मित बरगी बाँध के समीपवर्ती ग्राम के निवासी थे जो बाँध की झील में डूब गया। आचार्य नन्दिकेश्वर द्वारा पूजित शिवलिंग को एक पहाड़ी पर शिवालय बनाकर प्रतिष्ठित कर दिया गया है। इसलिए निर्विवाद है कि नर्मदांचल में काव्य रचना का संस्कार आदिकाल से पुष्ट होता रहा है। 
कवि पूर्व-वर्तमान तथा भविष्य में एक साथ जीते हुए काव्य रचना करता है इसलिए उसे त्रिकालदर्शी कहा जा सकता है। वह यथार्थ के संग कल्पित-अकल्पित का संयोग कर काव्य रचता है, इसलिए उसे अपनी काव्य सृष्टि का ब्रह्मा कहा जाता है। विज्ञान के हर बढ़ते चरण के साथ साहित्य और कविता पर समाप्ति का खतरा अनुभव किया जाता है किंतु 'कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं.....' अपितु अधिकाधिक मजबूत होती जाती है। अद्यतन अन्तर्जाल (इंटरनेट), चलभाष (मोबाइल) आदि के विकास के साथ साहित्य और पुस्तक संस्कृति पर खतरे की बात खूब की गयी किंतु दिन-ब-दिन नए कवि जन्म ले रहे हैं और अधिकाधिक संग्रह प्रकाशित हो रहे हैं। किसी समय वर्षों में एक पुस्तक की एक प्रति तैयार होती थी, अब हर दिन लाखों पुस्तकें छप रही हैं। विस्मय यह कि विपुल लेखन निरंतर होने पर भी नवता नष्ट नहीं हुई, न कभी होगी। हर नया कवि अपनी अनुभूतियों को भिन्न विधि से व्यक्त करता है। श्रोता और पाठक उसे भिन्न-भिन्न अर्थों में सुन-पढ़-ग्रहण कर प्रतिक्रिया देता है। कहते हैं 'जहाँ न पहुँचे रवि, वहाँ पहुँचे कवि।' 
कवि कुल के युवा सदस्य धर्मेन्द्र तिजोड़ीवाले 'आजाद' माँ सरस्वती के दरबार में भाव पुष्पों की थाली 'तुम्हें मेरी कैसम' सजाकर पूजार्चन हेतु प्रस्तुत हैं। प्रकाशकों के अनुसार काव्य संकलन सबसे कम बिकते हैं तथापि कविता लिखने, पढ़ने और सुननेवाले सर्वाधिक हैं। इसका कारण केवल यह है कि कविता मनुष्य के मन के निकट है जबकि गद्य मस्तिष्क के। मनुष्य ने पहले गद्य लिखा या पद्य इसका उत्तर पहले मुर्गी हुई या अंडा की तरह अनुत्तरित है। मैं नवजात शिशु में इसका उत्तर खोजता हूँ जो कोई भाषा-बोली, शब्द, धर्म, लिंग, क्षेत्र, दल या मनुष्य को बाँटनेवाला विचार नहीं जानता। वह जानता है तो ममता, प्यार और अपनत्व। यही कविता का मूल है। 
आदिकवि वाल्मीकि ने मिथुनरत क्रौंच युगल के नर का बहेलिये द्वारा वध किये जाने पर उसकी संगिनी का करुण क्रंदन सुन, करुणा पूर्ण ह्रदय से पहली कविता कही। फारस में इसी प्रसंग का रूपांतरण कर शिकारी द्वारा मृगशावक का वध किये जाने पर हिरणी का क्रंदन सुनकर ग़ज़ल कही जाने का मिथक गढ़ा गया और 'गज़ाला चश्म' को ग़ज़ल के साथ जोड़ दिया गया। शैली ने लिखा 'अवर स्वीटेस्ट सांग्स आर दोस विच टैल ऑफ़ सैडेस्ट थॉट'। कविवर सुमित्रनंदन पंत ने कहा 'वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान'। गीतकार शैलेंद्र के शब्दों में 'हैं सबसे मधुर वो गीत जिन्हें हम दर्द के सुर में गाते हैं'। आज़ाद तबीयत आदमी अपने तक सीमित नहीं रह पाता, वह औरों के सुख से सुखी और दुःख में दुखी हो, यह स्वाभाविक है। 
बुंदेलखंड में कहा जाता है किसी के सुख में सम्मिलित न हो सको तो कोई बात नहीं पर दुःख में अवश्य सहभागी हो। काव्य संकलन 'मीत मेरे' में मेरी कविता सुख-दुःख की पंक्तियाँ है- 
सुख 
आदमी को बाँटता है। 
मगरूर बनाता है 
परिवेश से काटता है। 
दुःख आदमी को जोड़ता है, 
दिल से मिलने के लिए 
दिल दौड़ता है। 
फिर क्यों, क्यों हम
दुःख से दूर भागते हैं?
सुख की भीख माँगते हैं?
काश! सुख को 
दुःख की तरह बाँट पाते, 
काश! दुःख को 
सुख की तरह चाह पाते,
अपनी मुस्कान दे 
औरों के आँसू पी पाते, 
आदमी तो हैं, 
इंसान बनकर जी पाते। 
बकौल मिर्ज़ा ग़ालिब 'आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसां होना'। धर्मेंद्र की कवितायेँ आदमी से इंसान होने के बीच की जीवन यात्रा के बीच हुई अनुभूतियों की अभिव्यक्तियाँ हैं। 'हाँ, ये इन दिनों की ही बात है' शीर्षक रचना 'स्व' और 'सर्व' को ही समेटे है। 
यहाँ एक बाग़-बगीचा था 
जिसे सबने मिलके ही सींचा था। 
न तो रंग थे, न ही नाम थे 
न खुदा, ईसा, न ही राम थे 
सभी गुल ही एक समान थे 
सभी एक दूजे की जान थे
काश! यह यह 'था', 'है' हो सके। 
धर्मेंद्र अनुभूति के श्रम गहनतन स्तर पर जो अनुभव करते हैं, वही कहते हैं- 
'प्यार के बदले में प्यार चाहना भी प्यार नहीं' 
यह पंक्ति सूक्ति की तरह चिरस्मरणीय है। प्यार केवल 'देने' का नाम है, 'चाहना' प्यार को दूषित कर देता है-
जैसे करते हो प्यार रब को मुझे ऐसे करो 
जैसे माँ करती है दुलार, मुझे वैसे करो 
बच्चन के के गीत की पंक्ति है 'मगर मैं हूँ कि सब कुछ जानकर अनजान बनता हूँ', धर्मेंद्र की अनुभूति है-
जानता हूँ एक पत्थर है जिसे मैं पूजता हूँ 
उसके घर में रौशनी करने स्वयं तिल-तिल जला हूँ 
दीप उसके दर जलाया है हमेशा शुद्ध घी का
और उसके भोग की खातिर कभी भूखा रह हूँ 
जखन पर मरहम लगाने आये वो या फिर न आये 
तो क्या उसके सामने ये दिल सिसकना छोड़ देगा 
'पिता' शीर्षक रचना गागर में सागर की तरह है जिसमें माँ केवल उपस्थित नहीं है, एक पंक्ति में ही माँ का पूरा अस्तित्व ही समाहित हो गया है। 'बंद संदूक' और 'खाली बंदूक' जितना पिता के विषय में कहते हैं, उससे अधिक 'राधा से अधिक दीवानापन' माँ के विषय में कह देता है। यह सामर्थ्य सहज नहीं होती। 
बंद पड़ा संदूक पिता 
इक खाली बंदूक पिता 
दिल उनका है इक कविता 
हर इक झुर्री एक कहानी 
जाने ऐसा क्या है उनमें 
माँ राधा से बड़ी दीवानी 
शनि सिंगणापुर गाँव में लोह घरों में ताले नहीं लगाते, यह अतीत की बात है। अब हमारा समाज पढ़-लिखकर सभ्य हो गया है, अब बैंक की तिजोरियाँ और ए टी एम भी सुरक्षित नहीं हैं। कवि की कामना 'विगत' को 'आगत' बनाना चाहती है- 
दरवाजे हों भी तो ताले या दीवार न हो 
ऐसी दुनिया, ऐसा घर या ऐसी रीत रचो 
कविवर भवानी प्रसाद मिश्र की कालजयी रचना है गीतफरोश - 'मैं गीत बेचता हूँ जी हाँ, हुजूर मैं गीत बेचता हूँ'। धर्मेंद्र 'गीतों के सौदागर' हैं -
दुःख इसका लें, उसका भी लें 
खुशियाँ देकर आँसू पी लें 
भीड़ भरी दुनिया में साथी 
हम वो हैं जो तनहा जी लें 
सागर हैं फिर भी गागर हैं 
हम गीतों के सौदागर हैं 
सियासत उन्हीं का खून चूसती है जो उसे जन्म देते हैं। धर्मेंद्र प्रचलित शब्दों को अप्रचलित अर्थों में उपयोग कर पाते हैं या यूँ कहें कि सामान्य शब्दों से नव अर्थों की प्रतीति करा पाते हैं। यह कमाल दुष्यंत कुमार ने बखूबी किया- 'अब तो इस तालाब का पानी बदल दो / ये कमल के फूल मुरझाने लगे हैं।' आपातकाल के दौर में सेंसर से बचकर ऐसे पंक्तियाँ वह सब कह सकीं जो इनका सामान्य अर्थ नहीं है। 'बुद्ध मुस्कुराये' में धर्मेंद्र ने बुद्ध, पाकिस्तान आदि शब्दों का प्रयोग भिन्नार्थों में किया है- 
अप्पने-अपने स्वारथ से ही 
घर-घर पाकिस्तान बनाये 
बुद्ध मंद-मंद मुस्काये.... 
.... हिरोशिमा-नागासाकी के 
जब दोनों को सपने आये 
ताजमहल में हाथ मिलाये 
लेकिन ह्रदय नहीं मिल पाये 
फिर गुर्राये 
समकालिक सियासत पर तीक्ष्ण व्यंग्य काबिले-तारीफ़ है। यह पूरी रचना अपने समय का जीवित दस्तावेज है। ओ राधे, चल सको तो चलो, लड़की के सपने, आखिरकार, किराये का घर, लोकतंत्र में हनुमान आदि कवितायें समय और सत्ता की विद्रूपता को निष्पक्षता और निर्ममता सहित उद्घाटित करती हैं। 
ईश्वर के पास, साक्षात्कार, आहट, साहस, गीता, रोशनी, ऊँचा, गंदगी, यादों की देह, लड़की के बारे में, धुआँ, संघर्ष, बेटियाँ जानती है जैसी लघ्वाकारी रचनाएँ आइना हैं जिनमें कवि के आज़ाद ख्यालों के नाक-नक्श देखे जा सकते हैं। इन रचनाओं में अन्तर्निहित तीखापन और बेबाकी मंटो की याद दिलाता है- 
किसी साक्षात्कार में 
एक औरत से 
दनादन सवाल पूछे गये 
नौकरी क्यों करना चाहती हो?
आपके पतिदेव क्या करते हैं?
धर्म राजनीति शिक्षा साहित्य 
न्याय और इतिहास के अलावा 
दुनिया के बारे में क्या जानती हो?
जवाब में उसने बटनें खोलीं 
नाडा खोला 
और अचानक नंगी हो गई। 
एक बानगी और देखें -
कण-कण में नहीं है ईश्वर 
अगर होता तो 
टट्टी पेशाब में भी होता 
और नहीं होता अगर 
मंदिर मस्जिद गुरुद्वारा चर्च 
जैसी जगहों में तो नहीं ही होता। 
इस रचना का अंत भी चौंकाता और सोचने के लिए विवश करता है- 
समझ से परे है 
मेरा हर एक विचार 
कठोर नास्तिकता के बावजूद 
ईश्वर के पक्ष में क्यों है?
कहना न होगा कि ये रचनाएँ कवि को एक वर्ग विशेष के आक्रोश का पात्र बना सकती हैं। इस समय ऐसी रचनाएँ लिखने और प्रकाशित करने के अपने खतरे हैं लेकिन खतरों से खेले बिना कवि धर्म का निर्वहन हो भी नहीं सकता। 'आज़ाद' तबियत कवि 'आज़ाद' रहे बिना समय का सत्य कह भी नहीं सकता। 
संकलन में ४७ गीतों के साथ ४२ गज़लें भी सम्मिलित हैं। इन्हें समान रचनाकाल के आधार पर एक संकलन में सँजोया गया है। लोक साहित्य के समतुकांती दोहड़ों, साखियों और संस्कृत के श्लोकों में प्रयुक्त ध्वनि-खण्डों के आधार पर अरबी-फ़ारसी में समभारिक ध्वनिखंड रखकर बनाये गए रुक्नों और बह्रों का प्रयोग करते ग़ज़ल लिखी गयी। मुगलों आक्रांताओं और सैनिकों के बीच सैन्य शिविरों में आरंभ हुई बातचीत में उनके देशों तथा भारत के पश्चिमी सीमान्त क्षेत्रों की भाषाओँ के सम्मिलन से लश्करी  का जन्म हुआ जो क्रमशः उर्दू और रेख़्ता के रूप में विकसित हुई। 
कुछ लोगों के मतानुसार अरब में ग़ज़ल नामक एक कवि था जिसने अपनी आयु प्रेम और मस्ती में बिता दी। उसकी प्रेमपरक कविताएँ ग़ज़ल कहलाईं (हिंदी ग़ज़ल उद्भव और विकास, डॉ. रोहिताश्व अस्थाना)। अन्य मतानुसार ग़ज़ल को  अरब में अरबी-फ़ारसी 'कसीदा' लघु प्रेम गीत की तश्बीब (शुरुआत)  को तग़ज़्ज़ुल (ग़ज़ल) कहा गया (यदा कदा, डॉ. बाबू जोसेफ-स्टीव विंसेंट, पृ. ५)। ग़ज़ल का शाब्दिक अर्थ 'औरतों से बातें करना' (शमीमे बलाग़त, पृ. ४), 'जवानी का हाल बयान करना' (सरवरी, जदीद उर्दू शायरी पृ. ४८), 'इश्क़ व् जवानी का ज़िक्र' (कादिरी, तारीखो तनक़ीद, पृ. १०१), 'दिलवरों की बात (डॉ. सैयद ज़ाफ़र, तनक़ीद और अंदाज़े नज़र, पृ. १४४), 'नाज़ुक खयाली  का जरिआ' (तनक़ीद क्या है, पृ. १३३), मजे की चीज (डॉ. सैयद अब्दुल्ला) है। आरंभ में खुसरो, सरवरी आदि ग़ज़ल का  उर्दू में, एक फ़ारसी में लिखते थे।  जिस ग़ज़ल में खयालात व जज़्बात  औरतों की तरफ से हो उसे रेख़्ती (शमीमे बलाग़त पृ. ४८) कहा गया। 
एक अन्य मत के अनुसार ग़ज़ल शब्द की उत्पत्ति ग़िज़ाला अर्थात हिरनी से हुई (नरेश नदीम, उर्दू कविता और छंद शास्त्र, पृ. १५)।गज़ाला-चश्मी (प्रेमिका से बातचीत) को भी ग़ज़ल कहा गया। भारत में मिथुनरत नर क्रौंच का बहेलिये द्वारा वध होने पर क्रौंची का विलाप सुनकर आदिकवि वाल्मीकि के मुख से निकली पंक्तियों से काव्योत्पत्ति मान्य है। अरब के रेगिस्तान में क्रौंच नहीं मिलता। इसलिए हिरनी के बच्चे का वध होने पर उसके मुख से निकली चीत्कार को ग़ज़ल की उत्पत्ति बता दिया गया। कुछ लोगों के ख़याल में छंद और तुक की पाबंदी ग़ज़ल के पाँव में पड़ी बेड़ियाँ हैं (उर्दू काव्यशास्त्र में काव्य का स्वरूप, डॉ. रामदास नादार, पृ. ९५)। उस्ताद शायरों मिर्ज़ा ग़ालिब ने ग़ज़ल को  'तंग गली' और आफताब हुसैन अली ने 'कोल्हू का बैल' विशेषणों से नवाज़ा (ऑफ़ एन्ड ऑन, अंग्रेजी ग़ज़ल संग्रह, अनिल जैन, पृ. १६ )। कालांतर में ग़ज़ल ने इश्क़े मज़ाजी (लौकिक प्रेम) के साथ-साथ इश्के-हक़ीक़ी (अलौकिक प्रेम) को भी आत्मसात कर लिया।  
इस पृष्ठ भूमि में धर्मेंद्र की ग़ज़लें न तो विषय, न लय दृष्टि से उर्दू ग़ज़ल हैं। हिंदी ग़ज़ल  पर प्रथम शोध करनेवाले डॉ. रोहिताश्व अस्थाना के अनुसार साठोत्तरी उर्दू ग़ज़ल वास्तव में हिंदुस्तानी ग़ज़ल है (हिंदी ग़ज़ल उद्भव और विकास, डॉ . रोहिताश्व अस्थाना, पृ. १५)। फ़िराक गोरखपुरी ग़ज़ल को 'असंबद्ध कविता और समर्पणवादी मिज़ाज की' मानते हैं (उर्दू भाषा और साहित्य, रघुपति सहाय फ़िराक, पृ. ३५०-३५१)।कबीर प्रथम हिंदी ग़ज़लकार हैं। हिंदी ग़ज़ल का वैशिष्ट्य देशज शब्दों व हिंदी छंदों का समावेशन है। हिंदी ग़ज़ल हिंदी व्याकरण और पिंगल को अपनाती है। तदनुसार ङ, ञ, ड, ड़, ण, ऋ आदि वर्णों तथा क्त, ख्य, ज्ञ, च्छ, ट्य, ठ्य , त्य, क्त, क्ष, त्र, आदि संयुक्ताक्षरों का प्रयोग करती है। ज़हीर कुरैशी के अनुसार 'हिंदी प्रकृति की ग़ज़ल आम आदमी की जनवादी (भीड़वादी नहीं) अभिव्यक्ति है (हिंदी ग़ज़ल उद्भव और विकास, डॉ . रोहिताश्व अस्थाना, पृ. १५८)। शिवओम अंबर के अनुसार 'समसामयिक हिंदी ग़ज़ल भाषा के भोजपत्र पर लिखी हुई विप्लव की अग्निऋचा है'। डॉ. उर्मिलेश हिंदी ग़ज़ल में 'हिंदी की आत्मा' की उपस्थिति आवश्यक मानते हैं कुंवर बेचैन इसे 'जागरण के बाद उल्लास' कहते हैं। वस्तुत: आनुभूतिक तीव्रता और संगीतात्मकता हिंदी ग़ज़ल के प्राण हैं। हिंदी ग़ज़ल शिल्प पक्ष पर ग़ज़लपुर, नव ग़ज़लपुर तथा गीतिकायनम नामित तीन शोध कृतियों के कृतिकार सागर मीरजापुरी ग़ज़ल को मुक्तिका, मतला को उदयिका, मकता को अंतिका, काफिया को तुकांत, रदीफ़ को पदांत कहते हैं। मूलत: संस्कृत कालांतर में हिंदी छंदों आधार पर बनी फ़ारसी रुक्नों और बह्रों का खुलासा सृजन -आर. पी. शर्मा 'महरिष', संवेदनाओं के क्षितिज -रसूल अहमद साग़र, ग़ज़ल ज्ञान -रामदेव लाल विभोर आदि अनेक पुस्तकों में किया गया है। हिंदी ग़ज़ल को मुक्तिका, गीतिका, सजल, तेवरी, अनुगीत आदि नाम हैं। धर्मेंद्र हिंदी ग़ज़ल को हिंदी ग़ज़ल ही कहते हैं।
बाईस मात्रिक महारौद्र जातीय कुंडल छंद में कही ग़ज़ल में धर्मेंद्र संगत का असर उदयिका में बताते हैं-
मटर के साथ में गर घास-फूस सिंचता है
चने के साथ में 'आज़ाद' घुन भी पिसता है।
प्रथम द्विपदी में उपनाम का प्रयोग, वह भी शब्द कोशीय अर्थ में करना गज़लकार की सामर्थ्य का साक्ष्य है।
सत्रह मात्रिक महासंस्कारी जातीय छंद में कहन की सादगी देखते ही बनती है -
दोष उनका भी तो बराबर था
क्यों मुझे ही मिली सजा तन्हा
मैं तुम्हें साथ ले नहीं सकता
जब गया आदमी गया तनहा
धर्मेंद्र गहरे सवाल भी मासूमियत से पूछते हैं-
पास मेरे हल नहीं इस बात का
प्रेम से क्यों पेट यह भरता नहीं?
पौराणिक पात्रों के माध्यम से कम शब्दों में अधिक अर्थ की अभिव्यक्ति देखें -
दोस्तो घर में विभीषण की तरह जो लोग हैं
राज की बातों से उनको बेखबर रक्खा करो
सुना है राम होता है 'धरम' आराम में लेकिन
वो दिल बीमार करने का कभी मौका नहीं देते
व्यंजना शक्ति का कमाल देखिये -
दोस्ती है ये ऐतबार करें
एक दूजे पे आओ वार करें
अब तो दुश्मन भी दुआ देते हैं
क्या हुई मुझसे खता याद नहीं       
'तुम्हें मेरी कसम' की रचनाएँ पाठक को चिंतन-मनन प्रेरित करेंगी। ये रचनाएँ गुदगुदाती नहीं तिलमिलाती हैं, यह तिलमिलाहट बदलाव की मानसिकता को जन्म देने में समर्थ हो, यही कामना है। 
*****
संपर्क : आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', संयोजक विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१ 
चलभाष ९४२५१८३२४४ , ईमेल salil.sanjiv@gmail.com   




रविवार, 27 सितंबर 2020

छत्तीसगढ़ी पर्व संगोष्ठी २७-९-२०२०

छत्तीसगढ़ी पर्व संगोष्ठी  २७-९-२०२०  
हे हरि! ठाकुर हो तुम्हीं, मधुर पुनीता याद  
राष्ट्र-लक्ष्मी शत नमन, श्रम सीकर हो खाद  
कर चेतन माँ भारती, ज्ञान रश्मि विस्तार
शक्ति ईश्वरी साथ हो, दे संतोष अपार 
ज्ञान लता सुषमा अमित, दे संतोष हमेश 
गीता-सूरज तम हरे, सपन सजाये देश 
रजनी पूनम की हँसे, पा संगीता साथ 
गोवर्धन पर तपस्या, करें कन्हैया नाथ 
वीणा सुन तन्मय सु मन, जमुना सलिल अथाह 
टीकेश्वरी तारकेश्वरी, पावन सृजन प्रवाह 
काव्य चमेली की महक, रामकली है साथ 
बोधिराम मीनू गहें, सलिल एनुका हाथ 
तम हर लेती वर्तिका, अरुणा लिए उजास 
निधि जीवन की नव सृजन, आशा लिए हुलास  
अन्य समस्त सहयोगियों को नमन        
  
      

बघेली सरस्वती वंदना

बघेली सरस्वती वंदना
डॉ. नीलमणि दुबे
शहडोल
*
को अब आइ सहाइ करै,पत राखनहार सरस्सुति मइया,
तोर उजास अॅंजोर भरै,उइ आइ मनो रस-रास जुॅंधइया!
बीन बजाइ सॅंभारि करा,हमरे तर आय न आन मॅंगइया,
भारत केर उबार किहा,महॅंतारि बना मझधार क नइया!!
नीलमणि दुबे
दिनांक २६-०९-२०१९

सरस्वती कवच

सरस्वती कवच

ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार विश्वविजय सरस्वती कवच का नित्य पाठ करने से साधक में अद्भुत शक्तियों का संचार होता है तथा जीवन के हर क्षेत्र में सफलता मिलती है। देवी सरस्वती के इस विश्वविजय सरस्वती कवच को धारण करके ही महर्षि वेदव्यास, ऋष्यश्रृंग, भरद्वाज, देवल तथा जैगीषव्य आदि ऋषियों ने सिद्धि पाई थी। यह विश्वविजय सरस्वती कवच इस प्रकार है

*
श्रीं ह्रीं सरस्वत्यै स्वाहा शिरो मे पातु सर्वत:।
श्रीं वाग्देवतायै स्वाहा भालं मे सर्वदावतु।।
ऊं सरस्वत्यै स्वाहेति श्रोत्र पातु निरन्तरम्।
ऊं श्रीं ह्रीं भारत्यै स्वाहा नेत्रयुग्मं सदावतु।।
ऐं ह्रीं वाग्वादिन्यै स्वाहा नासां मे सर्वतोवतु।
ह्रीं विद्याधिष्ठातृदेव्यै स्वाहा ओष्ठं सदावतु।।
ऊं श्रीं ह्रीं ब्राह्मयै स्वाहेति दन्तपंक्ती: सदावतु।
ऐमित्येकाक्षरो मन्त्रो मम कण्ठं सदावतु।।
ऊं श्रीं ह्रीं पातु मे ग्रीवां स्कन्धं मे श्रीं सदावतु।
श्रीं विद्याधिष्ठातृदेव्यै स्वाहा वक्ष: सदावतु।।
ऊं ह्रीं विद्यास्वरुपायै स्वाहा मे पातु नाभिकाम्।
ऊं ह्रीं ह्रीं वाण्यै स्वाहेति मम पृष्ठं सदावतु।।
ऊं सर्ववर्णात्मिकायै पादयुग्मं सदावतु। ऊं
रागधिष्ठातृदेव्यै सर्वांगं मे सदावतु।।
ऊं सर्वकण्ठवासिन्यै स्वाहा प्राच्यां सदावतु।
ऊं ह्रीं जिह्वाग्रवासिन्यै स्वाहाग्निदिशि रक्षतु।।
ऊं ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं सरस्वत्यै बुधजनन्यै स्वाहा।
सततं मन्त्रराजोऽयं दक्षिणे मां सदावतु।।
ऊं ह्रीं श्रीं त्र्यक्षरो मन्त्रो नैर्ऋत्यां मे सदावतु।
कविजिह्वाग्रवासिन्यै स्वाहा मां वारुणेऽवतु।।
ऊं सदाम्बिकायै स्वाहा वायव्ये मां सदावतु।
ऊं गद्यपद्यवासिन्यै स्वाहा मामुत्तरेवतु।।
ऊं सर्वशास्त्रवासिन्यै स्वाहैशान्यां सदावतु।
ऊं ह्रीं सर्वपूजितायै स्वाहा चोध्र्वं सदावतु।।
ऐं ह्रीं पुस्तकवासिन्यै स्वाहाधो मां सदावतु।
ऊं ग्रन्थबीजरुपायै स्वाहा मां सर्वतोवतु।।
(ब्र. वै. पु. प्रकृतिखंड ४/७३-८५)

गीत

गीत 
*
सिया हरण को देख रहे हैं
आँखें फाड़ लोग अनगिन
द्रुपद सुता के चीरहरण सम
घटनाएँ होतीं हर दिन।
*
'गिरि गोपाद्रि' न नाम रहा क्यों?
'सुलेमान टापू' क्यों है?
'हरि पर्वत' का 'कोह महाजन'
नाम किया किसने क्यों है?
नाम 'अनंतनाग' को क्यों हम
अब 'इस्लामाबाद' कहें?
घर में घुस परदेसी मारें
हम ज़िल्लत सह आप दहें?
बजा रहे हैं बीन सपेरे
राजनीति नाचे तिक-धिन
द्रुपद सुता के चीरहरण सम
घटनाएँ होतीं हर दिन।
*
हम सबका 'श्रीनगर' दुलारा
क्यों हो शहरे-ख़ास कहो?
'मुख्य चौक' को 'चौक मदीना'
कहने से सब दूर रहो
नाम 'उमा नगरी' है जिसका
क्यों हो 'शेखपुरा' वह अब?
'नदी किशन गंगा' को 'दरिया-
नीलम' कह मत करो जिबह
प्यार न जिनको है भारत से
पकड़ो-मारो अब गिन-गिन
द्रुपद सुता के चीरहरण सम
घटनाएँ होतीं हर दिन।
*
पण्डित वापिस जाएँ-बसाएँ
स्वर्ग बनें फिर से कश्मीर
दहशतगर्द नहीं बच पाएँ
कायम कर दो नई नज़ीर
सेना को आज़ादी दे दो
आज नया इतिहास बने
बंगला देश जाए दोहराया
रावलपिंडी समर ठने
हँस बलूच-पख्तून संग
सिंधी आज़ाद रहें हर दिन
द्रुपद सुता के चीरहरण सम
घटनाएँ होतीं हर दिन।
*

रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद

रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद के बीच हुए एक अद्भुत संवाद के अंश...
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स्वामी विवेकानंद : मैं समय नहीं निकाल पाता। जीवन आपाधापी से भर गया है।
रामकृष्ण परमहंस : गतिविधियां तुम्हें घेरे रखती हैं, लेकिन उत्पादकता आजाद करती है।
स्वामी विवेकानंद : आज जीवन इतना जटिल क्यों हो गया है?
रामकृष्ण परमहंस : जीवन का विश्लेषण करना बंद कर दो। यह इसे जटिल बना देता है। जीवन को सिर्फ जियो।
स्वामी विवेकानंद : फिर हम हमेशा दु:खी क्यों रहते हैं?
रामकृष्ण परमहंस : परेशान होना तुम्हारी आदत बन गई है, इसी वजह से तुम खुश नहीं रह पाते।
स्वामी विवेकानंद : अच्छे लोग हमेशा दुःख क्यों पाते हैं?
रामकृष्ण परमहंस : हीरा रगड़े जाने पर ही चमकता है। सोने को शुद्ध होने के लिए आग में तपना पड़ता है। अच्छे लोग दुःख नहीं पाते बल्कि परीक्षाओं से गुजरते हैं। इस अनुभव से उनका जीवन बेहतर होता है, बेकार नहीं होता।
स्वामी विवेकानंद : आपका मतलब है कि ऐसा अनुभव उपयोगी होता है?
रामकृष्ण परमहंस : हां, हर लिहाज से अनुभव एक कठोर शिक्षक की तरह है। पहले वह परीक्षा लेता है और फिर सीख देता है।
स्वामी विवेकानंद : समस्याओं से घिरे रहने के कारण हम जान ही नहीं पाते कि किधर जा रहे हैं?
रामकृष्ण परमहंस : अगर तुम अपने बाहर झांकोगे तो जान नहीं पाओगे कि कहां जा रहे हो। अपने भीतर झांको। आखें दृष्टि देती हैं। हृदय राह दिखाता है।
स्वामी विवेकानंद : क्या असफलता सही राह पर चलने से ज्यादा कष्टकारी है?
रामकृष्ण परमहंस : सफलता वह पैमाना है, जो दूसरे लोग तय करते हैं। संतुष्टि का पैमाना तुम खुद तय करते हो।
स्वामी विवेकानंद : कठिन समय में कोई अपना उत्साह कैसे बनाए रख सकता है?
रामकृष्ण परमहंस : हमेशा इस बात पर ध्यान दो कि तुम अब तक कितना चल पाए, बजाय इसके कि अभी और कितना चलना बाकी है। जो कुछ पाया है, हमेशा उसे गिनो; जो हासिल न हो सका उसे नहीं।
स्वामी विवेकानंद : लोगों की कौन सी बात आपको हैरान करती है?
रामकृष्ण परमहंस : जब भी वे कष्ट में होते हैं तो पूछते हैं, 'मैं ही क्यों?' जब वे खुशियों में डूबे रहते हैं तो कभी नहीं सोचते, 'मैं ही क्यों?'
स्वामी विवेकानंद : मैं अपने जीवन से सर्वोत्तम कैसे हासिल कर सकता हूं?
रामकृष्ण परमहंस : बिना किसी अफसोस के अपने अतीत का सामना करो। पूरे आत्मविश्वास के साथ अपने वर्तमान को संभालो। निडर होकर अपने भविष्य की तैयारी करो।
स्वामी विवेकानंद : एक आखिरी सवाल। कभी-कभी मुझे लगता है कि मेरी प्रार्थनाएं बेकार जा रही हैं?
रामकृष्ण परमहंस : कोई भी प्रार्थना बेकार नहीं जाती। अपनी आस्था बनाए रखो और डर को परे रखो। जीवन एक रहस्य है जिसे तुम्हें खोजना है। यह कोई समस्या नहीं जिसे तुम्हें सुलझाना है। मेरा विश्वास करो- अगर तुम यह जान जाओ कि जीना कैसे है तो जीवन सचमुच बेहद आश्चर्यजनक है।

सच झूठ

कार्यशाला
सवाल-जवाब
*
सच कहूँ तो चोट उन को लगती है
झूठ कहने से जुबान मेरी जलती है - राज आराधना
*
न कहो सच, न झूठ मौन रहो
सुख की चाहत जुबान सिलती है -संजीव
*

शिवतांडवस्तोत्र

शिवतांडवस्तोत्र
:: शिव स्तुति माहात्म्य ::
श्री गणेश विघ्नेश शिवा-शिव-नंदन वंदन.
लिपि-लेखनि, अक्षरदाता कर्मेश शत नमन..
नाद-ताल,स्वर-गान अधिष्ठात्री माँ शारद-
करें कृपा नित मातु नर्मदा जन-मन-भावन..
*
प्रात स्नान कर, श्वेत वसन धारें, कुश-आसन.
मौन करें शिवलिंग, यंत्र, विग्रह का पूजन..
'ॐ नमः शिवाय' जपें रुद्राक्ष माल ले-
बार एक सौ आठ करें, स्तोत्र का पठन..
भाँग, धतूरा, धूप, दीप, फल, अक्षत, चंदन,
बेलपत्र, कुंकुम, कपूर से हो शिव-अर्चन..
उमा-उमेश करें पूरी हर मनोकामना-
'सलिल'-साधना सफल करें प्रभु, निर्मल कर मन..
*
: रावण रचित शिवताण्डवस्तोत्रम् :
हिन्दी काव्यानुवाद तथा अर्थ - संजीव 'सलिल'
श्रीगणेशाय नमः
जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम् |
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं चकार चण्ड्ताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् || १||
सघन जटा-वन-प्रवहित गंग-सलिल प्रक्षालित.
पावन कंठ कराल काल नागों से रक्षित..
डम-डम, डिम-डिम, डम-डम, डमरू का निनादकर-
तांडवरत शिव वर दें, हों प्रसन्न, कर मम हित..१..
सघन जटामंडलरूपी वनसे प्रवहित हो रही गंगाजल की धाराएँ जिन शिवजी के पवित्र कंठ को प्रक्षालित करती (धोती) हैं, जिनके गले में लंबे-लंबे, विकराल सर्पों की मालाएँ सुशोभित हैं, जो डमरू को डम-डम बजाकर प्रचंड तांडव नृत्य कर रहे हैं-वे शिवजी मेरा कल्याण करें.१.
*
जटाकटाहसंभ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी- विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि |
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम || २||
सुर-सलिला की चंचल लहरें, हहर-हहरकर,
करें विलास जटा में शिव की भटक-घहरकर.
प्रलय-अग्नि सी ज्वाल प्रचंड धधक मस्तक में,
हो शिशु शशि-भूषित शशीश से प्रेम अनश्वर.. २..
जटाओं के गहन कटावों में भटककर अति वेग से विलासपूर्वक भ्रमण करती हुई देवनदी गंगाजी की लहरें जिन शिवजी के मस्तक पर लहरा रही हैं, जिनके मस्तक में अग्नि की प्रचंड ज्वालायें धधक-धधककर प्रज्वलित हो रही हैं, ऐसे बाल-चन्द्रमा से विभूषित मस्तकवाले शिवजी में मेरा अनुराग प्रतिपल बढ़ता रहे.२.
धराधरेन्द्रनंदिनीविलासबन्धुबन्धुरस्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे |
कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि क्वचिद्दिगम्बरे मनोविनोदमेतु वस्तुनि || ३||
पर्वतेश-तनया-विलास से परमानन्दित,
संकट हर भक्तों को मुक्त करें जग-वन्दित!
वसन दिशाओं के धारे हे देव दिगंबर!!
तव आराधन कर मम चित्त रहे आनंदित..३..
पर्वतराज-सुता पार्वती के विलासमय रमणीय कटाक्षों से परमानन्दित (शिव), जिनकी कृपादृष्टि से भक्तजनों की बड़ी से बड़ी विपत्तियाँ दूर हो जाती हैं, दिशाएँ ही जिनके वस्त्र हैं, उन शिवजी की आराधना में मेरा चित्त कब आनंदित होगा?.३.
*
लताभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे |
मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे मनोविनोदमद्भुतं विभर्तुभूतभर्तरि || ४||
केशालिंगित सर्पफणों के मणि-प्रकाश की,
पीताभा केसरी सुशोभा दिग्वधु-मुख की.
लख मतवाले सिन्धु सदृश मदांध गज दानव-
चरम-विभूषित प्रभु पूजे, मन हो आनंदी..४..
जटाओं से लिपटे विषधरों के फण की मणियों के पीले प्रकाशमंडल की केसर-सदृश्य कांति (प्रकाश) से चमकते दिशारूपी वधुओं के मुखमंडल की शोभा निरखकर मतवाले हुए सागर की तरह मदांध गजासुर के चरमरूपी वस्त्र से सुशोभित, जगरक्षक शिवजी में रमकर मेरे मन को अद्भुत आनंद (सुख) प्राप्त हो.४.
*
ललाटचत्वरज्वलद्धनंजस्फुल्लिंगया, निपीतपंचसायकं नमन्निलिम्पनायकं |
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं, महाकपालिसंपदे सरिज्जटालमस्तुनः ||५||
ज्वाला से ललाट की, काम भस्मकर पलमें,
इन्द्रादिक देवों का गर्व चूर्णकर क्षण में.
अमियकिरण-शशिकांति, गंग-भूषित शिवशंकर,
तेजरूप नरमुंडसिंगारी प्रभु संपत्ति दें..५..
अपने विशाल मस्तक की प्रचंड अग्नि की ज्वाला से कामदेव को भस्मकर इंद्र आदि देवताओं का गर्व चूर करनेवाले, अमृत-किरणमय चन्द्र-कांति तथा गंगाजी से सुशोभित जटावाले नरमुंडधारी तेजस्वी शिवजी हमें अक्षय संपत्ति प्रदान करें.५.
*
सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर प्रसूनधूलिधोरणी विधूसराङ्घ्रिपीठभूः |
भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटक: श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः ||६||
सहसनयन देवेश-देव-मस्तक पर शोभित,
सुमनराशि की धूलि सुगन्धित दिव्य धूसरित.
पादपृष्ठमयनाग, जटाहार बन भूषित-
अक्षय-अटल सम्पदा दें प्रभु शेखर-सोहित..६..
इंद्र आदि समस्त देवताओं के शीश पर सुसज्जित पुष्पों की धूलि (पराग) से धूसरित पाद-पृष्ठवाले सर्पराजों की मालाओं से अलंकृत जटावाले भगवान चन्द्रशेखर हमें चिरकाल तक स्थाई रहनेवाली सम्पदा प्रदान करें.६.
*
करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वलद्ध नञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके |
धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक-प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचनेरतिर्मम || ७||
धक-धक धधके अग्नि सदा मस्तक में जिनके,
किया पंचशर काम-क्षार बस एक निमिष में.
जो अतिदक्ष नगेश-सुता कुचाग्र-चित्रण में-
प्रीत अटल हो मेरी उन्हीं त्रिलोचन-पद में..७..
*
अपने मस्तक की धक-धक करती जलती हुई प्रचंड ज्वाला से कामदेव को भस्म करनेवाले, पर्वतराजसुता (पार्वती) के स्तन के अग्र भाग पर विविध चित्रकारी करने में अतिप्रवीण त्रिलोचन में मेरी प्रीत अटल हो.७.
नवीनमेघमण्डली निरुद्धदुर्धरस्फुरत् - कुहूनिशीथिनीतमः प्रबन्धबद्धकन्धरः |
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरंधरः || ८||
नूतन मेघछटा-परिपूर्ण अमा-तम जैसे,
कृष्णकंठमय गूढ़ देव भगवती उमा के.
चन्द्रकला, सुरसरि, गजचर्म सुशोभित सुंदर-
जगदाधार महेश कृपाकर सुख-संपद दें..८..
नयी मेघ घटाओं से परिपूर्ण अमावस्या की रात्रि के सघन अन्धकार की तरह अति श्यामल कंठवाले, देवनदी गंगा को धारण करनेवाले शिवजी हमें सब प्रकार की संपत्ति दें.८.
*
प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा-वलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम् |
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छिदांधकछिदं तमंतकच्छिदं भजे || ९||
पुष्पित नीलकमल की श्यामल छटा समाहित,
नीलकंठ सुंदर धारे कंधे उद्भासित.
गज, अन्धक, त्रिपुरासुर भव-दुःख काल विनाशक-
दक्षयज्ञ-रतिनाथ-ध्वंसकर्ता हों प्रमुदित..
खिले हुए नीलकमल की सुंदर श्याम-प्रभा से विभूषित कंठ की शोभा से उद्भासित कन्धोंवाले, गज, अन्धक, कामदेव तथा त्रिपुरासुर के विनाशक, संसार के दुखों को मिटानेवाले, दक्ष के यज्ञ का विध्वंस करनेवाले श्री शिवजी का मैं भजन करता हूँ.९.
*
अखर्वसर्वमङ्गलाकलाकदंबमञ्जरी रसप्रवाहमाधुरी विजृंभणामधुव्रतम् |
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे || १०||
शुभ अविनाशी कला-कली प्रवहित रस-मधुकर,
दक्ष-यज्ञ-विध्वंसक, भव-दुःख-काम क्षारकर.
गज-अन्धक असुरों के हंता, यम के भी यम-
भजूँ महेश-उमेश हरो बाधा-संकट हर..१०..
नष्ट न होनेवाली, सबका कल्याण करनेवाली, समस्त कलारूपी कलियों से नि:सृत, रस का रसास्वादन करने में भ्रमर रूप, कामदेव को भस्म करनेवाले, त्रिपुर नामक राक्षस का वध करनेवाले, संसार के समस्त दु:खों के हर्ता, प्रजापति दक्ष के यज्ञ का ध्वंस करनेवाले, गजासुर व अंधकासुर को मारनेवाले, यमराज के भी यमराज शिवजी का मैं भजन करता हूँ.१०.
*
जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वसद्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट् |
धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचण्डताण्डवः शिवः || ११||
वेगवान विकराल विषधरों की फुफकारें,
दहकाएं गरलाग्नि भाल में जब हुंकारें.
डिम-डिम डिम-डिम ध्वनि मृदंग की, सुन मनमोहक.
मस्त सुशोभित तांडवरत शिवजी उपकारें..११..
अत्यंत वेगपूर्वक भ्रमण करते हुए सर्पों के फुफकार छोड़ने से ललाट में बढ़ी हुई प्रचंड अग्निवाले, मृदंग की मंगलमय डिम-डिम ध्वनि के उच्च आरोह-अवरोह से तांडव नृत्य में तल्लीन होनेवाले शिवजी सब प्रकार से सुशोभित हो रहे हैं.११.
*
दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजोर्गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः |
तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः समप्रवृत्तिकः कदा सदाशिवं भजाम्यहत || १२||
कड़ी-कठोर शिला या कोमलतम शैया को,
मृदा-रत्न या सर्प-मोतियों की माला को.
शत्रु-मित्र, तृण-नीरजनयना, नर-नरेश को-
मान समान भजूँगा कब त्रिपुरारि-उमा को..१२..
कड़े पत्थर और कोमल विचित्र शैया, सर्प और मोतियों की माला, मिट्टी के ढेलों और बहुमूल्य रत्नों, शत्रु और मित्र, तिनके और कमललोचनी सुंदरियों, प्रजा और महाराजाधिराजों के प्रति समान दृष्टि रखते हुए कब मैं सदाशिव का भजन करूँगा?
*
कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन् विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरस्थमञ्जलिं वहन् |
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः शिवेति मंत्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् || १३||
कुञ्ज-कछारों में रेवा सम निर्मल मन हो,
सिर पर अंजलि धारणकर कब भक्तिलीन हो?
चंचलनयना ललनाओं में परमसुंदरी,
उमा-भाल-अंकित शिव-मन्त्र गुंजाऊँ सुखी हो?१३..
मैं कब नर्मदा जी के कछार-कुंजों में निवास करता हुआ, निष्कपट होकर सिर पर अंजलि धारण किये हुए, चंचल नेत्रोंवाली ललनाओं में परमसुंदरी पार्वती जी के मस्तक पर अंकित शिवमन्त्र का उच्चारण करते हुए अक्षय सुख प्राप्त करूँगा.१३.
*
निलिम्पनाथनागरी कदंबमौलिमल्लिका, निगुम्फ़ निर्भरक्षन्म धूष्णीका मनोहरः.
तनोतु नो मनोमुदं, विनोदिनीं महर्नीशं, परश्रियं परं पदं तदंगजत्विषां चय: || १४||
सुरबाला-सिर-गुंथे पुष्पहारों से झड़ते,
परिमलमय पराग-कण से शिव-अंग महकते.
शोभाधाम, मनोहर, परमानन्दप्रदाता,
शिवदर्शनकर सफल साधन सुमन महकते..१४..
देवांगनाओं के सिर में गुंथे पुष्पों की मालाओं से झड़ते सुगंधमय पराग से मनोहर परम शोभा के धाम श्री शिवजी के अंगों की सुंदरताएँ परमानन्दयुक्त हमारे मनकी प्रसन्नता को सर्वदा बढ़ाती रहें.१४.
प्रचंडवाडवानल प्रभाशुभप्रचारिणी, महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूतजल्पना.
विमुक्तवामलोचनो विवाहकालिकध्वनि:, शिवेतिमन्त्रभूषणों जगज्जयाम जायतां|| १५||
पापभस्मकारी प्रचंड बडवानल शुभदा,
अष्टसिद्धि अणिमादिक मंगलमयी नर्मदा.
शिव-विवाह-बेला में सुरबाला-गुंजारित,
परमश्रेष्ठ शिवमंत्र पाठ ध्वनि भव-भयहर्ता..१५..
प्रचंड बड़वानल की भाँति पापकर्मों को भस्मकर कल्याणकारी आभा बिखेरनेवाली शक्ति (नारी) स्वरूपिणी अणिमादिक अष्ट महासिद्धियों तथा चंचल नेत्रोंवाली देवकन्याओं द्वारा शिव-विवाह के समय की गयी परमश्रेष्ठ शिवमंत्र से पूरित, मंगलध्वनि सांसारिक दुखों को नष्टकर विजयी हो.१५.
*
इदम् हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेतिसंततम् |
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिंतनम् || १६||
शिवतांडवस्तोत्र उत्तमोत्तम फलदायक,
मुक्तकंठ से पाठ करें नित प्रति जो गायक.
हो सन्ततिमय भक्ति अखंड रखें हरि-गुरु में.
गति न दूसरी, शिव-गुणगान करे सब लायक..१६..
इस सर्वोत्तम शिवतांडव स्तोत्र का नित्य प्रति मुक्त कंठ से पाठ करने से भरपूर सन्तति-सुख, हरि एवं गुरु के प्रति भक्ति अविचल रहती है, दूसरी गति नहीं होती तथा हमेशा शिव जी की शरण प्राप्त होती है.१६.
*
पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं यः शंभुपूजनपरं पठति प्रदोषे |
तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां लक्ष्मीं सदैव सुमुखिं प्रददाति शंभुः || १७||
करें प्रदोषकाल में शिव-पूजन रह अविचल,
पढ़ दशमुखकृत शिवतांडवस्तोत्र यह अविकल.
रमा रमी रह दे समृद्धि, धन, वाहन, परिचर. करें कृपा शिव-शिवा 'सलिल'-साधना सफलकर..१७..
परम पावन, भूत भवन भगवन सदाशिव के पूजन के नत में रावण द्वारा रचित इस शिवतांडव स्तोत्र का प्रदोष काल में पाठ (गायन) करने से शिवजी की कृपा से रथ, गज, वाहन, अश्व आदि से संपन्न होकर लक्ष्मी सदा स्थिर रहती है.१७.
|| इतिश्री रावण विरचितं शिवतांडवस्तोत्रं सम्पूर्णं||
|| रावणलिखित(सलिलपद्यानुवादित)शिवतांडवस्तोत्र संपूर्ण||

दोहा

दोहा-
*
पुरुष कभी स्वामी लगा, कभी चरण का दास
कभी किया परिहास तो, कभी दिया संत्रास
*
चित्र गुप्त जिसका, बनी मूरत कैसे बोल?
यदि जयंती तो मरण दिन, बतला मत कर झोल
***

बुंदेली मुक्तिका

 मुक्तिका बुंदेली में

*
पाक न तन्नक रहो पाक है?
बाकी बची न कहूँ धाक है।।
*
सूपनखा सें चाल-चलन कर
काटी अपनें हाथ नाक है।।
*
कीचड़ रहो उछाल हंस पर
मैला-बैठो दुष्ट काक है।।
*
अँधरा दहशतगर्द पाल खें
आँखन पे मल रओ आक है।।
*
कल अँधियारो पक्का जानो
बदी भाग में सिर्फ ख़ाक है।।
*
पख्तूनों खों कुचल-मार खें
दिल बलूच का करे चाक है।।
*
२६-९-२०१६

विमर्श: चरण स्पर्श

विमर्श: 
चरण स्पर्श क्यों?
संजीव 
*
चरण स्पर्श के कई आयाम है। गुरु या सिद्ध सन्त के चरण स्पर्श का आशय उनकी सकारात्मक ऊर्जा को ग्रहण करना होता है। इस हेतु दाहिने हाथ की अंगुलियों से बाएं पैर के अंगुष्ठ को तथा बाएं हाथ की अँगुलियों से दाहिने पैर के अंगुष्ठ का स्पर्श किया जाता है। परमहंस ने अपने पैर का अंगुष्ठ नरेंद्र के मस्तक पर अपने अंतिम समय में स्पर्श कराकर अपनी सकल सिद्धियाँ देकर उन्हें विवेकानन्द बना दिया था। अपनों से ज्ञान, मान, अनुभव, योग्यता व उम्र में बड़ों के पैर छूने की प्रथा का आशय अपने अहन को तिलांजलि देकर विनम्रता पूर्वक आशीर्वाद पाना है। आजकल छद्म विनम्रता दिखाकर घुटने स्पर्श करने का स्वांग करनेवाले भूल जाते हैं की इसका आशय शत्रुता दर्शन है। के कई आयाम है। गुरु या सिद्ध सन्त के चरण स्पर्श का आशय उनकी सकारात्मक ऊर्जा को ग्रहण करना होता है। इस हेतु दाहिने हाथ की अंगुलियों से बाएं पैर के अंगुष्ठ को तथा बाएं हाथ की अँगुलियों से दाहिने पैर के अंगुष्ठ का स्पर्श किया जाता है। परमहंस ने अपने पैर का अंगुष्ठ नरेंद्र के मस्तक पर अपने अंतिम समय में स्पर्श कराकर अपनी सकल सिद्धियाँ देकर उन्हें विवेकानन्द बना दिया था। अपनों से ज्ञान, मान, अनुभव, योग्यता व उम्र में बड़ों के पैर छूने की प्रथा का आशय अपने अहन को तिलांजलि देकर विनम्रता पूर्वक आशीर्वाद पाना है। आजकल छद्म विनम्रता दिखाकर घुटने स्पर्श करने का स्वांग करनेवाले भूल जाते हैं की इसका आशय शत्रुता दर्शन है।

कविता: शेर और आदमी

कविता:
शेर और आदमी 
*
शेर के बाड़े में
कूदा आदमी
शेर था खुश
कोई तो है जो
न घूरे दूर से
मुझसे मिलेगा
भाई बनकर.
निकट जा देखा
बँधी घिघ्घी
थी उसकी
हाथ जोड़े
गिड़गिड़ाता:
'छोड़ दो'
दया आयी
फेरकर मुख
चल पड़ा
नरसिंह नहीं
नरमेमने
जा छोड़ता हूँ
तब ही लगा
पत्थर अचानक
हुआ हमला
क्यों सहूँ मैं?
आत्मरक्षा
है सदा
अधिकार मेरा
सोच मारा
एक थप्पड़
उठा गर्दन
तोड़ डाली
दोष केवल
मनुज का है
***

कार्यशाला : सिगरेट

कार्यशाला :
सिगरेट 
संजीव 
*
ज़िंदगी सिगरेट सी जलती रही 
ऐश ट्रे में उमीदों की राख है। 
दिलजले ने दाह दी हर आह
जला कर सिगरेट, पाया चैन कुछ।  
*
राह उसकी रात तक देखा किया 
थाम कर सिगरेट, बेबस मौन दिल। 
*
धौंककर सिगरेट छलनी ज़िंदगी 
बंदगी की राख ले ले ऐ खुदा!
*
अधरों पे रखा, फेंक दिया, सिगरेट की तरह। 
न उसकी कोई वज़ह रही, न इसकी है वजह। 

शनिवार, 26 सितंबर 2020

गीत

 एक गीत:

संजीव
*
ह्रदय प्रफुल्लित
मुकुलित मन
अपनों से मिलकर
*
सद्भावों की क्यारी में
प्रस्फुटित सुमन कुछ
गंध बिखेरें अपनेपन की.
स्नेहिल भुजपाशों में
बँधकर बाँध लिया सुख.
क्षणजीवी ही सही
जीत तो लिया सहज दुःख
बैर भाव के
पर्वत बौने
काँपे हिलकर
ह्रदय प्रफुल्लित
मुकुलित मन
सपनों से मिलकर
*
सलिल-धार में सुधियों की
तिरते-उतराते
छंद सुनाएँ, उर धड़कन की.
आशाओं के आकाशों में
कोशिश आमुख,
उड़-थक-रुक-बढ़ने को
प्रस्तुत, चरण-पंख कुछ.
बाधाओं के
सागर सूखे
गरज-हहरकर
ह्रदय प्रफुल्लित
मुकुलित मन
छंदों से मिलकर
*
अविनाशी में लीन विनाशी
गुपचुप बिसरा, काबा-
काशी, धरा-गगन की.
रमता जोगी बन
बहते जाने को प्रस्तुत,
माया-मोह-मिलन के
पल, पल करता संस्तुत.
अनुशासन के
बंधन पल में
टूटे कँपकर.
ह्रदय प्रफुल्लित
मुकुलित मन
नपनों से मिलकर
*
मुक्त, विमुक्त, अमुक्त हुए
संयुक्त आप ही
मुग्ध देख छवि निज दरपन की.
आभासी दुनिया का हर
अहसास सत्य है.
हर प्रतीति क्षणजीवी
ही निष्काम कृत्य है.
त्याग-भोग की
परिभाषाएँ
रचें बदलकर.
ह्रदय प्रफुल्लित
मुकुलित मन
गंधों से मिलकर
*
२६-९-२०१५

गीत - आवाज़ तेरी

गीत
*
क्यों न फुनिया कर
सुनूँ आवाज़ तेरी?
*
भीड़ में घिर
हो गया है मन अकेला
धैर्य-गुल्लक
में, न बाकी एक धेला
क्या कहूँ
तेरे बिना क्या-क्या न झेला?
क्यों न तू
आकर बना ले मुझे चेला?
मान भी जा
आज सुन फरियाद मेरी
क्यों न फुनिया कर
सुनूँ आवाज़ तेरी?
*
प्रेम-संसद
विरोधी होंगे न मैं-तुम
बोल जुमला
वचन दे, पलटें नहीं हम
लाएँ अच्छे दिन
विरह का समय गुम
जो न चाहें
हो मिलन, भागें दबा दुम
हुई मुतकी
और होने दे न देरी
क्यों न फुनिया कर
सुनूँ आवाज़ तेरी?
*
२४-२५ सितंबर २०१६

राग तैलंग

मनपसन्द कवि और कविता
दूसरा
राग तैलंग
*
एक को एक अच्छे काम का विचार आया
तो दूसरे ने उस पर शक जताया
एक ने
काम करना शुरू किया
तो दूसरे ने निक्स निकाला
एक
जब काम पूरा कर रहा था
तो दूसरा तब भी आलोचना कर रहा था
काम जब सफल हो गया
तो दूसरे ने
दूसरों के साथ
एक के लिए
ताली बजाई और
भीड़ में गुम हो गया।
***
कवि परिचय - राग तैलंग, जन्म १८-४-१९६३, शहपुरा, डिंडोरी, मध्य प्रदेश। शिक्षा- एम्. एससी. इलेक्ट्रॉनिक्स। संप्रति महामंत्री मध्य प्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन, सहायक महाप्रबंधक मध्य प्रदेश दूर संचार परिमंडल बी. एस. एन. एल. भोपाल। प्रकाशित काव्य संग्रह- शब्द गुम हो जाने के खतरे, मिट्टी में नमी की तरह, बाजार से बेदखल, कहीं किसी जगह कई चेहरों की एक आवाज़, कविता ही आदमी को बचाएगी, अंतर्यात्रा, मैं पानी बचत हूँ, निबन्ध संग्रह- समय की बात। ईमेल raagtelang@gmail.com .

गीत - ज़िंदगी के मानी

बाल गीत / नव गीत:
ज़िंदगी के मानी
संजीव 'सलिल'
खोल झरोखा, झाँक-
ज़िंदगी के मानी मिल जायेंगे.
मेघ बजेंगे, पवन बहेगा,
पत्ते नृत्य दिखायेंगे.....
*
बाल सूर्य के संग ऊषा आ,
शुभ प्रभात कह जाएगी.
चूँ-चूँ-चूँ-चूँ कर गौरैया
रोज प्रभाती गायेगी..
टिट-टिट-टिट-टिट करे टिटहरी,
करे कबूतर गुटरूं-गूं-
कूद-फांदकर हँसे गिलहरी
तुझको निकट बुलायेगी..
आलस मत कर, आँख खोल,
हम सुबह घूमने जायेंगे.
खोल झरोखा, झाँक-
ज़िंदगी के मानी मिल जायेंगे.....
*
आई गुनगुनी धूप सुनहरी
माथे तिलक लगाएगी.
अगर उठेगा देरी से तो
आँखें लाल दिखायेगी..
मलकर बदन नहा ले जल्दी,
प्रभु को भोग लगाना है.
टन-टन घंटी मंगल ध्वनि कर-
विपदा दूर हटाएगी.
मुक्त कंठ-गा भजन-आरती,
सरगम-स्वर सध जायेंगे.
खोल झरोखा, झाँक-
ज़िंदगी के मानी मिल जायेंगे.....
*
मेरे कुँवर कलेवा कर फिर,
तुझको शाला जाना है.
पढ़ना-लिखना, खेल-कूदना,
अपना ज्ञान बढ़ाना है..
अक्षर,शब्द, वाक्य, पुस्तक पढ़,
तुझे मिलेगा ज्ञान नया.
जीवन-पथ पर आगे चलकर
तुझे सफलता पाना है..
सारी दुनिया घर जैसी है,
गैर स्वजन बन जायेंगे.
खोल झरोखा, झाँक-
ज़िंदगी के मानी मिल जायेंगे.....
*
२६-९-२०१० 

शुक्रवार, 25 सितंबर 2020

दोहा चंचरीक पर

 चंचरीक - चरित दोहावली

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल
*
'चंचरीक' प्रभु चरण के, दैव कृपा के पात्र
काव्य सृजन सामर्थ्य के, नित्य-सनातन पात्र
*
'नारायण' सा 'रूप' पा, 'जगमोहन' शुभ नाम
कर्म कुशल कायस्थ हो, हरि को हुए प्रणाम
*
'नारायण' ने 'सूर्य' हो, प्रगटाया निज अंश
कुक्षि 'वासुदेवी' विमल, प्रमुदित पा अवतंश
*
सात नवंबर का दिवस, उन्निस-तेइस वर्ष
पुत्र-रुदन का स्वर सुना, खूब मनाया हर्ष
*
बैठे चौथे भाव में, रवि शशि बुध शनि साथ
भक्ति-सृजन पथ-पथिक से, कहें न नत हो माथ
*
रवि उजास, शशि विमलता, बुध दे भक्ति प्रणम्य
शनि बाधा-संकट हरे, लक्ष्य न रहे अगम्य
*
'विष्णु-प्रकाश-स्वरूप' से, अनुज हो गए धन्य
राखी बाँधें 'बसन्ती, तुलसी' स्नेह अनन्य
*
विद्या गुरु भवदत्त से, मिली एक ही सीख
कीचड में भी कमलवत, निर्मल ही तू दीख
*
रथखाना में प्राथमिक, शिक्षा के पढ़ पाठ
दरबार हाइ स्कूल में, पढ़े हो सकें ठाठ
*
भक्तरत्न 'मथुरा' मुदित, पाया पुत्र विनीत
भक्ति-भाव स्वाध्याय में, लीन निभाई रीत
*
'मन्दिर डिग्गी कल्याण' में, जमकर बँटा प्रसाद
भोज सहस्त्रों ने किया, पा श्री फल उपहार
*
'गोविंदी' विधवा बहिन, भुला सकें निज शोक
'जगमोहन' ने भक्ति का, फैलाया आलोक
*
पाठक सोहनलाल से, ली दीक्षा सविवेक
धीरज से संकट सहो, तजना मूल्य न नेक
*
चित्र गुप्त है ईश का, निराकार सच मान
हो साकार जगत रचे, निर्विकार ले जान
*
काया स्थित ब्रम्ह ही, है कायस्थ सुजान
माया की छाया गहे, लेकिन नहीं अजान
*
पूज किसी भी रूप में, परमशक्ति है एक
भक्ति-भाव, व्रत-कथाएँ, कहें राह चल नेक
*
'रामकिशोरी' चंद दिन, ही दे पायीं साथ
दे पुत्री इहलोक से, गईं थामकर हाथ
*
महाराज कॉलेज से, इंटर-बी. ए. पास
किया, मिले आजीविका, पूरी हो हर आस
*
धर्म-पिता भव त्याग कर, चले गए सुर लोक
धैर्य-मूर्ति बन दुःख सहा, कोई सका न टोंक
*
रचा पिता की याद में, 'मथुरेश जीवनी' ग्रन्थ
'गोविंदी' ने साथ दे, गह सृजन का पंथ
*
'विद्यावती' सुसंगिनी, दो सुत पुत्री एक
दे, असमय सुरपुर गयीं, खोया नहीं विवेक
*
महाराजा कॉलेज से, एल-एल. बी. उत्तीर्ण
कर आभा करने लगे, अपनी आप विकीर्ण
*
मिली नौकरी किन्तु वह, तनिक न आयी रास
जुड़े वकालत से किये, अनथक सतत प्रयास
*
प्रगटीं माता शारदा, स्वप्न दिखाया एक
करो काव्य रचना सतत, कर्म यही है नेक
*
'एकादशी महात्म्य' रच, किया पत्नि को याद
व्यथा-कथा मन में राखी, भंग न हो मर्याद
*
रच कर 'माधव-माधवी', 'रुक्मिणी मंगल' काव्य
बता दिया था कलम ने, क्या भावी संभाव्य
*
सन्तानों-हित तीसरा, करना पड़ा विवाह
संस्कार शुभ दे सकें, निज दायित्व निबाह
*
पा 'शकुंतला' हो गया, घर ममता-भंडार
पाँच सुताएँ चार सुत, जुड़े हँसा परिवार
*
सावित्री सी सुता पा, पितृ-ह्रदय था मुग्ध
पाप-ताप सब हो गए, अगले पल ही दग्ध
*
अधिवक्ता के रूप में, अपराधी का साथ
नहीं दिया, सच्चाई हित, लड़े उठाकर माथ
*
दर्शन 'गलता तीर्थ' के, कर भूले निज राह
'पयहारी' ने हो प्रगट, राह दिखाई चाह
*
'सन्तदास'-संपर्क से, पा आध्यात्म रुझान
मन वृंदावन हो चला, भरकर भक्ति-उड़ान
*
'पुरुषोत्तम श्री राम चरित', रामायण-अनुवाद
कर 'श्री कृष्ण चरित' रचा, सुना अनाहद नाद
*
'कल्कि विष्णु के चरित' को, किया कलम ने व्यक्त
पुलकित थे मन-प्राण-चित, आत्मोल्लास अव्यक्त
*
चंचरीक मधुरेश थे, मंजुल मृदुल मराल
शंकर सम अमृत लुटा। पिया गरल विकराल
*
मोहन सोहन विमल या, वृन्दावन रत्नेश
मधुकर सरस उमेश या , थे मुचुकुन्द उमेश
*
प्रेमी गुरु प्रणयी वही, अम्बु सुनहरी लाल
थे भगवती प्रसाद वे, भगवद्भक्त रसाल
*
सत्ताईस तारीख थी, और दिसंबर माह
दो हजार तेरह बरस, त्यागा श्वास-प्रवाह
*
चंचरीक भू लोक तज, चित्रगुप्त के धाम
जा बैठे दे विरासत, अभिनव ललित ललाम
*
उन प्रभु संजीव थे, भक्ति-सलिल में डूब
सफल साधना कर तजा, जग दे रचना खूब
*
निर्मल तुहिना दूब पर, मुक्तामणि सी देख
मन्वन्तर कर कल्पना, करे आपका लेख
*
जगमोहन काया नहीं, हैं हरि के वरदान
कलम और कवि धन्य हो, करें कीर्ति का गान ४२
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-आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
समन्वयम २०४ विजय अपार्टमेंट,
नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१
०७६१ २४१११३१, ९४२५१ ८३२४४
salil.sanjiv@gmail.com