बुधवार, 13 दिसंबर 2017

navgeet- gittee sadakon ki

नवगीत
गिट्टी सड़को की
.
कुटती-पिटती,
दबती जाए
गिट्टी सड़कोँ की.
.
चोटें सहती,
पीर न कहती,
ठेकेदार करे हँस ठट्ठा,
सोचे जड़ में डालू मट्ठा
सुध आती भूखी बिटिया की
गुपचुप दहती.
बिखरी-सिहरी
घुलती जाए
मिट्टी सड़कोँ की.
.
अफ़सर रोलर,
नेता ठोकर,
चीरहरण चाहे दुर्योधन,
कहीं नहीं दिखते मनमोहन,
कुटिल दुशासन आँख तरेरे,
दरुआ ब्रोकर.
सिमटी-सिकुडी,
फ़िर भी चुभती,
चिट्ठी सड़कोँ की.
.
सह एकाकी
ताका-ताकी,
पाकर अवसर कोई न छोड़े,
पत्रकार भी हाथ मरोड़े,
लाज लीलने नेता दौड़े,
लुकती-छिपती.
कहीं न टिपती,
कहीं न टिकती,
बिट्टी सड़कोँ की
...
संजीव, 9425183244
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#हिन्दी_ब्लोगर

navgeet

नवगीत: 
लेटा हूँ
मखमल गादी पर
लेकिन 
नींद नहीं आती है 
.
इस करवट में पड़े दिखाई
कमसिन बर्तनवाली बाई
देह सांवरी नयन कटीले
अभी न हो पाई कुड़माई
मलते-मलते बर्तन
खनके चूड़ी
जाने क्या गाती है
मुझ जैसे
लक्ष्मी पुत्र को
बना भिखारी वह जाती है
.
उस करवट ने साफ़-सफाई
करनेवाली छवि दिखलाई
आहा! उलझी लट नागिन सी
नर्तित कटि ने नींद उड़ाई
कर ने झाड़ू जरा उठाई
धक-धक धड़कन
बढ़ जाती है
मुझ अफसर को
भुला अफसरी
अपना दास बना जाती है
.
चित सोया क्यों नींद उड़ाई?
ओ पाकीज़ा! तू क्यों आई?
राधे-राधे रास रचाने
प्रवचन में लीला करवाई
करदे अर्पित
सब कुछ
गुरु को
जो
वह शिष्या
मन भाती है
.
हुआ परेशां नींद गँवाई
जहँ बैठूं तहँ थी मुस्काई
मलिन भिखारिन, युवा, किशोरी
कवयित्री, नेत्री तरुणाई
संसद में
चलभाष देखकर
आत्मा तृप्त न हो पाती है
मुझ नेता को
भुला सियासत
गले लगाना सिखलाती है
.

१३-१२-२०१४ 
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#हिंदी_ब्लॉगर 

दोहा दुनिया

सुबह जगें शिव-शिव कहें,
होंगी शिवा प्रसन्न.
कार्तिक रक्षें, गजानन
हरें विघ्न आसन्न.
.
शिव संयममय श्वास हैं,
शिव मंगलमय आस.
करें अशुभ को शुभ सतत,
मेट जगत का त्रास.
.
शिव सचेत, निष्क्रिय नहीं,
शिव न तपस्वी मात्र.
शिव पल-पल सो-जागते,
शिव पुजते नवरात्र.
.
भिन्न नहीं हैं शिव-शिवा,
इसमें उसका रूप.
उसमें इसके प्राण हैं,
दोनों तत्व अरूप.
.
शिवा सलिल, शिव अग्नि हैं,
काम-अकाम सुसंग.
भाव-अभाव स्वभाव है,
ऊर्जा पुंज तरंग.
...

मंगलवार, 12 दिसंबर 2017

muktika

मुक्तिका 
*
मैं समय हूँ, सत्य बोलूँगा. 
जो छिपा है राज खोलूँगा.
*
अनतुले अब तक रहे हैं जो
बिना हिचके उन्हें तोलूँगा.
*
कालिया है नाग काला धन
नाच फन पर नहीं डोलूँगा.
*
रूपए नकली हैं गरल उसको
मिटा, अमृत आज घोलूँगा
*
कमीशनखोरी न बच पाए
मिटाकर मैं हाथ धो लूँगा
*
क्यों अकेली रहे सच्चाई?
सत्य के मैं साथ हो लूँगा
*
ध्वजा भारत की उठाये मैं
हिन्द की जय 'सलिल' बोलूँगा
***

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#हिंदी_ब्लॉगर 

geet

गीत:
मन से मन के तार जोड़ती.....
संजीव 'सलिल'
*
*
मन से मन के तार जोड़ती कविता की पहुनाई का.
जिसने अवसर पाया वंदन उसकी चिर तरुणाई का.....
*
जहाँ न पहुँचे रवि पहुँचे वह, तम् को पिए उजास बने.
अक्षर-अक्षर, शब्द-शब्द को जोड़, सरस मधुमास बने..
बने ज्येष्ठ फागुन में देवर, अधर-कमल का हास बने.
कभी नवोढ़ा की लज्जा हो, प्रिय की कभी हुलास बने..
होरी, गारी, चैती, सोहर, आल्हा, पंथी, राई का
मन से मन के तार जोड़ती कविता की पहुनाई का.
जिसने अवसर पाया वंदन उसकी चिर तरुणाई का.....
*
सुख में दुःख की, दुःख में सुख की झलक दिखाकर कहती है.
सलिला बारिश शीत ग्रीष्म में कभी न रूकती, बहती है.
पछुआ-पुरवैया होनी-अनहोनी गुपचुप सहती है.
सिकता ठिठुरे नहीं शीत में, नहीं धूप में दहती है.
हेर रहा है क्यों पथ मानव, हर घटना मन भाई का?
मन से मन के तार जोड़ती कविता की पहुनाई का.
जिसने अवसर पाया वंदन उसकी चिर तरुणाई का.....
*
हर शंका को हरकर शंकर, पियें हलाहल अमर हुए.
विष-अणु पचा विष्णु जीते, जब-जब असुरों से समर हुए.
विधि की निधि है प्रविधि, नाश से निर्माणों की डगर छुए.
चाह रहे क्यों अमृत पाना, कभी न मरना मनुज मुए?
करें मौत का अब अभिनन्दन, सँग जन्म के आई का.
मन से मन के तार जोड़ती कविता की पहुनाई का.
जिसने अवसर पाया वंदन उसकी चिर तरुणाई का.....
**********************
१२-१२-२०१३

navgeet

नवगीत:
जिजीविषा अंकुर की
पत्थर का भी दिल
दहला देती है
*
धरती धरती धीरज
बनी अहल्या गुमसुम
बंजर-पड़ती लोग कहें
ताने दे-देकर
सिसकी सुनता समय
मौन देता है अवसर
हरियाती है कोख
धरा हो जाती सक्षम
तब तक जलती धूप
झेलकर घाव आप
सहला लेती है
*
जग करता उपहास
मारती ताने दुनिया
पल्लव ध्यान न देते
कोशिश शाखा बढ़ती
द्वैत भुला, अद्वैत राह पर
चिड़िया उड़ती
रचती अपनी सृष्टि आप
बन अद्भुत गुनिया
हार न माने कभी
ज़िंदगी खुद को खुद
बहला लेती है
*
छाती फाड़ पत्थरों की
बहता है पानी
विद्रोहों का बीज
उठाता शीश, न झुकता
तंत्र शिला सा निठुर
लगे जब निष्ठुर चुकता
याद दिलाना तभी
जरूरी उसको नानी
जन-पीड़ा बन रोष
दिशाओं को भी तब
दहला देती है
*
१२-१२-२०१४
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#हिंदी_ब्लॉगर

muktak

मुक्तक: 
गीत रचें नवगीत रचें अनुगीत रचें या अगीत रचें 
कोशिश यह हो कि रचें जो भी न कुरीत रचें, सद्ऱीत रचें 
कुछ बात कहें अपने ढंग से, रस लय नव बिम्ब प्रतीक रहे 
नफरत-विद्वेष न याद रहे, बंधुत्व स्नेह संग प्रीत रचें
१२-१२-२०१४ 

लघुकथा बैठक

समाचार:
लघुकथा जीवन का दर्पण- प्रदीप शशांक 
*
जबलपुर, ११-१२-२०१६. स्थानीय भँवरताल उद्यान में विश्व वाणी हिंदी संस्थान जबलपुर तथा अभियान जबलपुर के तत्वावधान में नवलेखन संगोष्ठी के अंतर्गत मुख्य वक्ता वरिष्ठ लघुकथाकार श्री प्रदीप शशांक ने 'लघुकथा के उद्भव और विकास' विषय पर सारगर्भित वक्तव्य में लघु कथा को जीवन का दर्पण निरूपित किया. पुरातन बोध कथाओं, दृष्टांत कथाओं, जातक कथाओं आदि को आधुनिक लघुकथा का मूल निरूपित करते हुए वक्ता ने लघुकथा के मानकों, शिल्प, तत्वों तथा तकनीक कि जानकारी दी. आरम्भ में लघुकथा को स्वतंत्र विधा स्वीकार न किये जाने, चुटकुला कहे जाने और पूरक कहे जाने का उल्लेख करते हुए 'फिलर' से 'पिलर' के रूप में लघुकथा के विकास पर संतोष करते हुए शशांक जी ने यह अवसर उपलब्ध करने के लिए अपने ४ दशक पुराने सहरचनाकार साथ और इस अनुष्ठान के संयोजक आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' के अवदान को महत्वपूर्ण बताते हुए नवांकुर पल्लवित करने के इस प्रयास को महत्वपूर्ण माना.

श्रीमती मंजरी शर्मा कि अध्यक्षता में संपन्न कार्यक्रम में आचार्य संजीव 'सलिल' ने लघुकथा के विविध आयामों तथा तकनीक से संबंधित प्रश्नोत्तर के माध्यम से नव लघुकथाकारों की शंकाओं का समाधान करते हुए मार्गदर्शन किया. उन्होंने लघुकथा, कहानी और निबंध में अंतर, लघुकथा के अपरिहार्य तत्व, तत्वों के लक्षण तथा शैली और शिल्प आदि पर प्रकाश डाला.
डॉ. मीना तिवारी, श्रीमती मिथलेश बड़गैयां, श्रीमती मधु जैन, श्री बसंत शर्मा, श्री पवन जैन, श्री कामता तिवारी, संजीव 'सलिल', प्रदीप शशांक आदि ने काला धन, सद्भाव विषयों पर तथा अन्य लघुकथाओं वाचन किया. गोष्ठी का वैशिष्ट्य भोपाल से श्रीमती कांता रॉय तथा कानपूर से श्रीमती प्रेरणा गुप्ता द्वारा वाट्स एप के माध्यम से भेजी गयी लघुकथाओं का वाचन रहा. प्रेरणा जी की लघुकथा में हिंदी के देशज रूप मिर्जापुरी का रसास्वादन कर श्रोता आनंदित हुए. श्री सलिल ने समन्वय प्रकाशन अभियान द्वारा शीघ्र प्रकाश्य सामूहिक लघुकथा संकलन प्रकाशन योजना की जानकारी दी.
आभार प्रदर्शन मिथलेश जी ने किया. 
***

बुन्देली लघुकथाएँ

बुंदेली लघुकथाकार और लघुकथाएँ
अनुक्रम:
१. संजीव, जबलपुर  - जिन्नगी खों गणत, जज, पाठ, समजदार, सिच्छा 
२. डॉ. सुमन श्रीवास्तव, जबलपुर-  कुलच्छनी, कचोंट 
३. प्रो. किरण श्रीवास्तव, रायपुर- संतोस, मौक़ा  
४. श्रीमती पुष्पा सक्सेना, बेंगलुरु- हुसियारी, घडियाली आँसू 
५. इंजी. सुरेन्द्र सिंह पवार, जबलपुर-  जबाबी पोस्टकार्ड,  माँ, इंसानियत, नर्मदा मैया की जै
६. प्रदीप शशांक, जबलपुर  लालच, जागरूकता, ठगी, आस का दीपक
७. प्रभुदयाल श्रीवास्तव, छिंदवाड़ा अरमान
८. राशि सिंह, मुरादाबाद, सूर्यास्त, गिरगिटान, फ़ैसला, बिखरे तिनके, सौगात
९. डॉ रंजना शर्मा, खिसकते पल, पोल बड़े बड़ेन की, श्यामवर्णा, कर्मयोगी, छोड़-छुट्टी
१०. गीता गीत, जबलपुर आड़, अज्ञानता का खौफ़
११. लक्ष्मी शर्मा, जबलपुर जरूरत, दया
***
१. संजीव
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*
१. जिंन्नगी खों गणत
था तो बो बित्ता भर को मनो अधरत्ता में मुस्करात भए ढाबे में खाना लगा रओ तो। मो सें नई रओ गओ सो पूँछ लई 'काय बऊ, दद्दा, भैयन, बहनन खों बिसर गए का? इते काए डरे आओ? उतई रूखी-सूखी खा कें काय नें पर रए? और कछू नें होत तो बऊ को लाड़.... '
सुनतई बो पनीली होत आँखों खों पोंछ के सुबकन लगो हतो... तबई ढाबेबारा दहाडो- 'काय बे! किते मर गओ?हात-पैरन में मेंहदी लगा लई है का? काम को ना काज को, दुसमन अनाज को, जिते जात आय उतई अटक जात.... आत है के लगाऊँ दो लात... ओ खें मूँ पे गुस्सा झलको, मनो सर झुका खें जात भए बोल गओ- 'लाड़ सें जठर की आग नई बुझत आय। उते रैत तो मताई खबाए बगैर ने खाती, खबा देत तो ऑखें काजे कछू नें बचत तो। अब मोरे भाग का हींसा गटक लैहे , इत्ते भोत आय। 
मैं तो बाय नादां समझत रओ मनो बा तो भोतई सयानो हतो। भागबे की बजाय लड़ रओ हतो, समझ रओ थो जिंन्नगी खों गणत।   
*** 
२. जज 
चपरासियन खें फटकारत, बाबुअन सें दिन भरे को हिसाब-किताब करे के बाद बाको पैर भारी सें लगन लगे। अब लौं जो कछू जबान सें निकरो बा पूरो भओ। जन को मुकदमो आओ ओई खों भारी सजा सुना दई। अब बुरो बखत सामने हतो। जैंसे-तैंसे आसमान की तरफी हेर खें बाने अपने पैर बढ़ाए, अब बचबे को कौनौ चारा नें हतो, दरवज्जा सामने हतो। दिन भर दिग्बिजई रैबे खें बाद, लड़ाई हार चुके जोद्धा घाईं बाने हिम्मत जुटाई और जी कर्रो कर खें घुसई हतो कि गड़गड़ाते बद्दल जैंसी गर्जना सुनाई दई 'काय किते मूँ कारो कर रए हते अब लों? कछू घर-द्वार की फिकर हैं के नई। भाड़ में जाए जे नासपीटी नौकरी... बे कछू कै पाएं बाके पैलेई जा घन गर्जन सुन खें फाइलें धरबे आओ चपरासी उनके मूँ पे बारा बजे बजते देख भग लओ। अब सेरनी  के सामू बिल्ली घाई मूंड झुकाए खडो हतो जज।
*
३. पाठ 
हम दोऊ मुतके दिना तक साथई काम करत हते। मोखों मालूम हतो के बो अनीस्वरबादी आय। जब लौं साथ हतो तिलक - जनेऊ को ले खें छेड़त रैत तो।  बाको बस चालत तो दुनिया में एकऊ मंदिर नें बाकी रैत। आज मुतके दिना बाद ओने फोन करो सो खुसी तो होनई हती, अचरज जे के बाने सत् नरायन की कथा सुनबे और बाके बाद पंगत काजे सोई कओ।  
मो खों बात कछू पल्ले नई परी, मनो बिना जाए बी गुजरा नें हतो सो हाँ - ना, हाँ - ना करत -करत अपने राम पोंचई गए बाके घर। बा ने लपक के स्वागत करो, हात-पाँव धुलाए, भीतर कमरा में लै गओ, घरवारी के संगे बैठ खें कथा सोई सुनी। हवन करे के बाद दौऊ जनों ने सृद्धा सें पाँव छू के दच्छिना सोई दई। मोरी हालत साँप-छछूंदर की सी हती। एक गाँव के होबे के नाते कित्तई अपनापन हतो मगर अफसर अफसरई होत आय।  
भोजन करे की कई तो धरम संकट और बढ़ गओ, परसबे के काजे बो खुदई ठाँडो हतो। मुसकल सें ओखों राजी करी के संगे जीमबे  बैठ जाय, भौजी परसत जैहें। 
औसर देख केन बासे पूछी के ईश्वर पे भरोसो कब सें हो गओ?
ओने छूटतई कही 'ज़िन्दगी इश्के बुतां में कटी मोमिन / आखिरी वक्त में क्या ख़ाक मुसलमान होंगे?' तुमाए भगवान पे हमें ने तब भरोसो हतो, नें अब आय।' 
हमें कछू समझ में नें आई। फिर पूछो 'तो फिर जे कथा?'
बा ठहाका मार केन हँस पड़ो, फिर बोलो 'रे पोंगा पंडत, तुम नें समझहो, अक्कल भगबान कहाँ गिरबी धर आए हो का? बात कुल इत्ती आय की तुमाई भौजी हमाई हर बात आँख मूंड केन मान लेत आय। कबऊँ कौनऊ बात काजे ना नुकुर नें करें सिबाय जे भगवान जी के। तो का हम इत्ते गँवार आंय के बाकी खुसी के लाने इत्तो सो काम नें कर सकें। अब बा अपनी जगा खुस, हम अपनी जगा खुस।' 
मैं मूँ बाय देख रओ थो बाहे, अब लौं बाखो नादां समझत तो मनो बाने बिना कए पढ़ा दओ हतो बेस कीमती पाठ। 
***
४. समजदार 
काम करबे काजे बढ़ई खों बुलाओ हटो, बाने आके पूछी के का काम होने आय। 
हमने मोंड़ा खें आवाज़ दई, बिनने अबई-अबई इंजीनियर की पढ़ाई पूरी की हती। उनखो काम बता के पूछी के कित्ती लकरी, कित्तो कीला लाने हूहे? बे पैले तो कागज-कलम लें के गुना - भाग करत रए, फिर मशीन पे जाने का-का करत रए, मुताकी देर लगन देख बढ़ई बोलो 'बाबूजी! मोरो तो रोजई को काम आय, अबई बताउत हूँ। बाने जाने का अंगुलियन पे जोरो-घटाओ और तन्नक देर मा कुल्ल सामान लिखा दओ।  
हम का सबई जने देख रए हते के 'सिखाए पूत दरबार नें चढ़ें'। किताबी सिच्छा मोंड़न खें नई बना पा रई समजदार। 
***
५. सिच्छा 
हमाए संगी जब सें गजरथ सें लौटे हते रोजई मुनी महाराज के प्रबचन को हवाला दे खें हम औरन को नीचा दिखांए के तुमाए पण्डे-पुजारी छक खें माल डकारत आंय फेर त्याग को पाठ पढ़ात आंय, ऐइसें कछू असर नई होत आय, हमाए मुनी महाराज मुतको त्याग करत आंय। 
भगबान की लीला कछू ऐंसी भई के जबलपुर में भूकंप आ गओ। कछू लोग मारे गए, का कच्चे, का पक्के आधे से जादा मकान चटक गए, भोत से पूरी तरह टूट गए। त्राहि माम मच गओ।  सरकार नें गरीब गुरबा खों राहत देबे की घोसना करी, मकान मरम्मत के काजे दस हजार रुपैया दए जा रए हते। 
कछू दिना भेंट नें भई तो एक दिना हम उनई संगी के घरे पोंच गए। बिनाको पुरानो बड़ो सो मकान में चार कमरा गली में आंय एक के बाजू एक। हम देख कें भौंचक हते के अलग-अलग कमरा पे अलग-अलग नामों की पट्टी लटक रई हती। एक पे उनको नाम हतो, दूसरी पे भौजी को, तीसरी पे दूसरी जगा ब्याई जीजी बाई को, चौथी पे गए साल गुजर गए कक्का जू को। कछू समज नें परी के ऐसो काय करो आय? बे घर पे ना ह ते सो कारन पूछबे की बात मन की मन में रै गई। 
२-३ दिना बाद सरकारी करमचारी नुक्सान की पूछ-गुच्छ करबे हमाए घरे आए। हमें चिंता भई के उनके घरे पूछताछ भई के नई। करमचारी नें पैले तो  मना करी मनो जब हमनें घरेलू रिश्तों को हवाला दऔ तो बाने पन्ना पलट के खाजबो की कोसिस करी। कछू देरी में उनखो नाम मिल गओ। हमाए दीदा फटे के फटे रै गए। बे तो  अपने संगे भौजी, जीजी बाई, कक्का जू कें नाम सें सोई रकम लै चुके हते। अब समाज परी के बे इत्ते दिना सें का कर रए हते जो मिलबे की फुरसत नई मिली। जा सोई के बे कैत चाए जो रए उनने मुनी जी नई लई कछू सिच्छा। 
*** 
डॉ. सुमनलता श्रीवास्तव, जबलपुर 
*
Suman Shrivastava की प्रोफ़ाइल फ़ोटो, चित्र में ये शामिल हो सकता है: 1 व्यक्ति, मुस्कुराते हुए, चश्मे

१. कुलच्छनी 
निकिता नें अपने पापा सें साफ़-साफ़ कै दई हती के ओको ब्याव बे जिते चाएं सो पक्को कर लैबें मनो दायजे में मोटर साइकिल नें दैबें भलेई बनत रिस्ता काएं नें टूट जाए। निकिता के लएं बाइक की आबाज और बाकी तेज रफ़्तार भोत दहसत पैदा कर देत हती। बाइक पे बैठबे के लयं तो बो कब्भू तैयार नें हो सकत ती। ओने अपने बचपना में सामने सें आते भए एक बाइसिकिल सबार को एंसो एक्सीडेंट देखो हतो कै अबै लौं सोचतइ सें थर्रा जात ती। नईं भूल पात कै कैसें बाइक कुलती मार केन आगी को गोला बन गयी हती, कैंसें ऊ लड़का के मूंड सें खून को फव्वारों छूटो हटो और कैंसें तो पिरान छोड़बे के पैले बो किलबिलानो हतो। ऐसो असर दिमाग पे हो गाओ हतो के बाइक की आवाज सेंई बा काँप जाए और आँख-कान मीच लेबे। डॉक्टरन नें 'साइक्लोफ़ोबिआ' बतला कें इलाज भी करो मनो ऊखो बाइक सेंई चिढ़ हो गई ती।
पापा नें भरोसो दओ के लड़काबारे मोटर साइकिल मान तो रए हते मनो इनकी सरत सुन केन राजी हो गय। बे तो एंसी बिटिया, ऐंसो घर देख केंइ मगन हो रए हैं। निकिता खों तसल्ली हो गई। बरात आई, खुसी-खुसी भाँवरें पर गईं। दूसरे दिना दूल्हा रोहित कुंअर कलेबा पै अड़ गओ कै बाइक मिलहै तबई कौर तोरहै। यार-दोस्त और हबा देंन लगे। निकिता के बाप-भाई नें भोत समझाओ मनो दूल्हा तो अंगद के पाँव घांईं टस्स सें मस्स नें होय, जब तक मोटर साइकिल नें आ गई, जिद्द करत रओ। इतईं सें निकिता के मन में अपने पति रोहित के लयं अनादर पैदा हो गओ। ओको पूरो उल्लास मिट गओ।
सादी की पैली रात नें रोहित ने निकिता की पूँछी, नें भबिस्य की बातें करीं बस अपनेई सेखी बघारत रओ के बाइक पे कैंसे-कैंसे करतब करत है और पुलिस सें उरझत है। निकिता पति के ओछेपन पे सर्मिन्दा और अपमानित महसूस करत रई, जैंसें बाको ब्याओ निकिता सें नईं मोटर साइकिल सें भओ होय। दोई दिना बाद रोहित अपने दोस्तों के बुलाबे पर नई बाइक लैकेन प्रदर्सन करबे चलो गओ, निकिता नें खुल केन बिरोध करो मनो कौनऊ  नें नईं सुनी। रोहित गओ और प्रदर्सन करत में ऐंसी चोट रीढ़ की हड्डी पी लगी के जीबन भरे के लाने ज़िंदा लहास बन कै रै गओ। निकिता अपनो फर्ज़ निभाबे के लंय सबा-सुस्रुसा में रहत है मनो सासू कैत आंय 'बहू कुलच्छन निकरी कहाई।'  
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२. कचोंट 
*
सत्तनारान तिबारीजी बराण्डा में बैठे मिसराजी के घर की तरपीं देख रअे ते और उनें कल्ल की खुसयाली सिनेमा की रील घाईं दिखा रईं तीं। मिसराजी के इंजीनियर लड़का रघबंस को ब्याओ आपीसर कालोनी के अवस्थी तैसीलदार की बिटिया के संगें तै हो गओ तो। कल्ल ओली-मुंदरी के लयं लड़का के ममआओरे-ददयाओरे सब कहुँ सें नाते-रिस्तेदारों को आबो-जाबो लगो रओ। बे ओंरें तिबारीजी खों भी आंगें करकें समद्याने लै गअे ते। लहंगा-फरिया में सजी मोड़ी पूजा पुतरिया सी लग रई ती। जी जुड़ा गओ। आज मिसराजी कें सूनर मची ती। खबास ने बंदनबार बाँदे हते, सो बेई उतरत दुफैरी की ब्यार में झरझरा रअे ते।
इत्ते में भरभरा कें एक मोटर-साइकल मिसराजी के घर के सामनें रुकी। मिसराजी अपनी दिल्लान में बाहर खों निकर कें आय, के, को आय ? तबई्र एक लड़किनी जीन्स-सर्ट-जूतों में उतरी और एक हांत में चाबी घुमात भई मिसराजी के पाँव-से परबे खों तनक-मनक झुकी और कहन लगी - ‘पापाजी, रघुवंश है ?’ मिसराजी तो ऐंसे हक्के-बक्के रै गअे के उनको बकइ नैं फूटो। मों बांयं, आँखें फाड़ें बिन्नो बाई खों देखत रै गये। इत्ते में रघबंस खुदई कमीज की बटनें लगात भीतर सें निकरे और बोले - ‘पापा, मैं पूजा के साथ जा रहा हूँ। हम बाहर ही खा लेंगे। लौटने में देर होगी।’ मिसराजी तो जैंसई पत्थर की मूरत से ठांड़े हते, ऊँसई ठांडे़ के ठांड़े रै गय। मोटरसाइकल हबा हो गई। तब लौं मिसराइन घुंघटा सम्हारत बाहरै आ गईं - काय, को हतो ? अब मिसराजी की सुर्त लौटी - अरे, कोउ नईं, तुम तो भीतरै चलो। कहकैं मिसराइन खों ढकेलत-से भीतरैं लोआ लै गअे। तिबारी जी चीन्ह गअे के जा तो बई कन्या हती, जीके सगुन-सात के लयं गअे हते। तिबारी जी जमाने को चलन देखकैं मनइं मन मुस्कान लगे। नांय-मांय देखो, कोउ नैं हतौ कै बतया लेते। आज की मरयादा तो देखो। कैंसी बेह्याई है ? फिर कुजाने का खेयाल आ गओ के तिलबिला-से गअे। उनकें सामनें सत्तर साल पैलें की बातें घूम गईं। आज भलेंईं तिबारीजी को भरौ-पूरौ परिबार हतो, बेटा-बेटी-नाती-पोता हते, उनईं की सूद पै चलबे बारीं गोरी-नारी तिबारन हतीं, मनां बा कचोंट आज लौं कसकत ती।
सत्तनारान तिबारी जी को पैलो ब्याओ हो गओ तो, जब बे हते पन्दरा साल के। दसमीं में पड़त ते। आजी की जिद्द हती, जीके मारें; मनों दद्दा ने कड़क कें कै दइ ती कै हमाये सत्तू पुरोहितयाई नैं करहैं। जब लौं बकालत की पड़ाई नैं कर लैंहैं, बहू कौ मों नैं देखहैं। आज ब्याओ भलेंईं कल्लो, मनों गौनौ हूहै, जब सही समौ आहै। सो, ब्याओ तो हो गओ। खूब ढपला बजे, खूब पंगतें भईं। मनों बहू की बिदा नैं कराई गई। सत्तू तिबारी मेटरिक करकें गंजबसौदा सें इन्दौर चले गअे और कमरा लें कें कालेज की पड़ाई में लग गअे। उनके संग के और भी हते दो चार गाँव-खेड़े के लड़का, जिनके ब्याओ हो गअे हते, कइअक तो बाप सुंदां बन गअे हते। सत्तू तो बहू की मायाजाल में नैं परे ते, मनो समजदार तो हो गय ते। कभउँ-कभउँ सोच जरूर लेबें कै कैंसो रूप-सरूप हुइये देबासबारी को, हमाय लयं का सोचत हुइये, अब तो चाय स्यानी हो गई हुइये।
खबर परी कै देबास बारी खूबइ बीमार है और इन्दौर की बड़ी अस्पताल में भरती है। अब जौन भी आय, चाय देबास सें, चाय गंजबसौदा सें, सत्तू केइ कमरा पै ठैरै। सत्तू सुनत रैबें के तबीअत दिन पै दिन गिरतइ जा रइ है, सेबा-सम्हार सब बिरथां जा रइ है। सत्तू फड़फड़ायं कै हमइ देख आबें, मनों कौनउ नें उनसें नईं कई, कै तुमइ चलो। दद्दा आय, कक्का आय, बड़े भैया आय मनों आहाँ। जे सकोच में रय आय और महिना-दो महिना में सुनी कै डाकटरों ने सबखां लौटार दओ। फिर महीना खाँड़ में देबास सें जा भी खबर आ गई कै दुलहन नईं रई। जे गतको-सो खाकैं रै गअे।


एइ बात की कचोंट आज तलक रै गई कै जीखौं अरधांगनी बनाओ, फेरे डारे, सात-पाँच बचन कहे-सुने, ऊ ब्याहता को हम मों तक नैं देख पाय। बा सुइ पति के दरसनों खों तरसत चली गई और हम पोंचे लौं नईं, नैं दो बोल बोल पाय। हम सांगरे मरयादइ पालत रै गअे। ईसें तो आजइ को जमानो अच्छो है। संग-साथ क बचन तो निभा रय। हमें तो बस, बारा-तेरा साल की बहू को हांत छूबो याद रै गओ जिन्दगी-भर के लयं, जब पानीग्रहन में देबास बारी को हाथ छुओ तो।,,,,,,और बोइ आज लौं कचोंट रओ। 
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प्रो. किरण श्रीवास्तव, रायपुर 

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१. संतोस
' काए भाई? जे का हाल बना रखो आय? अपन दोऊ इकाई कक्छा में पढ़त हते। तुम हमेसा अव्वल और  हम तुमाए पिछलग्गू। तुमाई किरपा से जैसे-तैसे पास हो जात हते। बीस बरस भए... अपुनी एक छोटी सी दूकान हती बातो बढ़ई गयी मनो परभू की किरपा सें  चार मोड़न की चार दुकानें अलग सें आंय।'
तुम सें कित्ती बेरा कई के हमाए संगे जुर जाओ, छोडो जे कलम घिसाई। का धरो आय जामे? बाबूगिरी सें जो कछू कामात हो बामें घरई मुसकल से चलत आय. भौजी और बच्चे परेसान होत रैते आंय सो अलग। जैसे-तैसे किताब छपात हो सो कौनौ खरीदत नांय। अब बी मान जाओ, छोडो जे सम्मेलन-अम्मेलन। मिळत का है जा सबमें?'
' संतोस' कैत भए बा जय राम जे की कर खें चल दओ

२. मौक़ा 
आधी रात हती, सबई जने नींद में हते। भारी आवाज भई। घबरा के घर सें निकरे के कहूँ भूडोल तो नई आ गओ? मनो देखी के बस्ती नजीक सें गुजर रई रेलगाड़ी के डब्बे पलट गए हते। चीख-पुकार सुन के बाने संगी-साथन के संगे लोगन को सम्हारानो सुरु कर दओ। 
फुसफुसाहट कानन में परी तो ध्यान सें देखो गली को छुटभैया नेता अपने चेलन खों कछू सामान पकरा के कह रओ हतो 'तुरतै दफा हो जा, कौनौ देख नें ले। ऐसो मौक़ा बेर-बेर नईं मिलत आय 
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पुष्पा सक्सेना, बेंगलुरु 

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१. हुसियारी 
बे बचपन की सहेली आंय। भोत दिना बाद बिनसें भेंट भई ई बेर। बचपन में दोई जनी खूब मस्ती करत हते। पढ़े-लिखे के बाद दोई के सादी ब्याह भए सो अपने-अपने सासरे पोंच गए, समै कैंसे निकर गओ, पतई नें चलो।ई बेर दोई जनी सावन में मैके आईं हतीं सो नई-पुरानी बातों का अंतई नें हतो। 
बे पाने बच्चन की भोत बद्वारी हांकत हतीं के दिल्ली के सबसें मैंगे स्कूल में पढ़त आंय, बेजा हुसियार आंय वगैरे-वगैरे। हमाए बच्चे सरकारी हिंदी बिद्यालय में पढ़त रए सुनके बिनने मूँ बिचका दओ 
तबई सब्जी बारी निकरी। हम दोनई नें ताज़ी सब्जी देखी सो तुरतई खरीद लई। दोऊ ने बच्चन खों टेरो के आके पैसा दें जाएं और सब्जी लै लैबें। हमाए उन्यासी रुपैया भए और बिनके अड़सठ, हमाई बिटिया सुनतई रुपैया लाबे काजे चलन लगी मनो बिनकी बिटिया नें पूछी 'अड़... सठ माने?'  
हमाई बिटिया बोल परी 'सिक्सटी एट' सुनके बिनकी बिटिया सोई चल दई मनो बाकी समजदारी की कलई तो खुली गयी हती
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घडियाली आँसू 
निर्भया काण्ड के बाद सहर में जुलूस और सभाओं की बाढ़ई सी आ गई हती। बे पढ़ी-लिखी तेज-तर्रार नेतन कहाउत हतीं। चाए जब बिनके भासन अखबारन में छपत रए। जब-तब पुरुषों को कोस-कोस के औरतन को घर सें बाहर निकरबे को उकसाउत रैत हतीं। लोग-बाग़ बिन्सें भोत परभावित होत ते। 
बिधि को बिधान, बिनकी सास खें कैंसर हो गओ लंबो और मन्ह्गो इलाज चलन हतो। कैट आंय 'धीरज धरम मित्र अरु नारी, आपात काल परखिहहिं चारी'। बिनके पति हते निहायत सीदे-सादे इनसान। बे अम्मा के इलाज काजे कौनऊ कसार नें छोड़न चात ते अम्मा खें नरसन की बातें रुचत नें हती। बे घर को बनो साफ़-सूफ हलकों भोजन चाउत तीं। मनो बऊ रानी खें फुरसत नें हती सो को बनाए? महाराजन को बनाओ बीमार खों तनकऊ नें भात तो। 
नतीजा जे भओ के पति-पतनी में मनमुटाव बढ़न लगो। कौनऊ चारा नें देख पति नें अपनी भैन खों बुला लओ।बऊ रानी को जामें बी चैन ने पडी। रोज-रोज नन्द सें उरझें... अपनी सहेलियां को घरे बुला के रोज सभा-सम्मेलन की योजना बनात रई। ननद को अम्मा के काजे बनाबे में कौनऊ परेसानी ने हती मनो भौजी की नाकारा सहेलियन की खातिरदारी नागवार गुजरत ती। सहेलियां ने पट्टी पढ़ा दई तो बऊ जी नें थाने में भाई-भैन के खिलाफ रपट कर दई के दहेज़ काजे परेसान करत आंय। 
सब दिन जात नें एक समान... धीरे-धीरे अम्मा की सेहत ठीक हों लगी। पुलिस जाँच मा बऊ के आरोप निराधार पाए गए। बे सबके मन सें उतर गईं। बेटे ने तलाक देबे की सोची सो पोता-पोती की सोच के अम्मा जी नें रोक दई। अब्ब बू जी की सहेलीयण नें सोर्र मूँ मोड़ लओ। बऊ जी को स्त्री बिमर्स को बुखार उतर रओ आय मनो बे खुदई अपने बेटे-बेटी, पति और सास सबके मन सें उतर गई आंय। रोटी-कपड़ा की कमी नइया मनो अकेले बैठी बहात रैत आंय घडियाली आँसू लाड-प्यार, सम्मान गंवाबे के बाद
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सुरेन्द्र सिंह पवार, जबलपुर  

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१. जबाबी पोस्टकार्ड 
सागरवारे भैय्या, व्हीकल फेक्ट्री, जबलपुर मा काम करत हते। बे हर महीना मनीआर्डर से रुपैए भेजत हते, संगे एक ठइयां जबाबी पोस्ट कार्ड सोई पठात हते, जौन में रुपैया कौन-कौन मद में कित्तो-कित्तो खरच करने है सोई लिख देत हते। खरच सेन बचे रुपैया गाँव में रहबे बारे छोटे भैया चन्द्र भान को देब खातिर लिखो रहत तो। भौजी खों करिया अक्छर भैंसिया बरोबर हतो सो वे कौनऊ सें चिठिया बचबाबे खें बाद जबाब लिखाउत हतीं ‘सुन करिया! (भौजी गोरी-चिट्टी थीं और भैया काले-कलूटे) तुमने भेजे दो सौ रुपैया। सो आधेलग गए पप्पू (उनका पुत्र) की दवा-दारु में। सुनो, बो ने खात है, ने पियत है। कनकने वैद कैत हते “सूखो रोग आय—होत-होत ठीक हुइये। ” अब बाकी बचे रुपइयों में नोन-तेल-लकडियें और दूधवारे की उधारी, हाथ में आहें बीस रुपइया, सो का ओढहें, का बिछाहें. रोज की साग-सब्जी और ऊपर के खर्चा , नास हो जाए जे चंद्रभान की, अब ओए रुपइया कहाँ से देहें?—चलो, एक काम करत हें। बाहर दरवाजे पे खुटिया ठुकी है, ओये हिलावें से रुपइया झरहें- सो बेई चंद्रभान खों दे देहें.’
भौजी चिट्ठी के अंत में कुछ भावुक हो जातीं और यह लिखना ण भूलतीं -‘जब टेम मिले सो आ जइयो, पप्पू बेजा याद करत है. और सुनो, “ लौटत बेर कटंगी कें रसगुल्ला सोई लेत अइयो अपने घाईं करिया-करिया’ 
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२. माँ 

हमाए घर के नजीके वृध्दाश्रम आय. उते की रहबेबारी एक डुकरो दाई मेहरारू कने आत-जात हती। बे गहूं बीनने, पापड़-बड़ी सुखाने जैसे छोटे-छोटे कामों में श्रीमती की मदद करत हतीं। एक दिना संझा बेर आईं और कैन लगीं “राम- राम भैय्या, बिटिया! हलकान ने हुइयो. हम चाय ने पीहें। ”
‘राम- राम अम्मा, काय! चाय काय ने पीहो?’हमने पूछी। 
डुकरो नें कई“आज हरछठ उपासे हैं, एक बेर महुआ डरी चाय पी लई है, अब ने पी हैं।”
मोसें रुको नई गाओ, तुरतई बोल परो ‘अम्मा! बेटा-बहू ताका खों नई पूछत आंय, बीमारी सोई नें देखी, परदेस में पटक गओ और तुमबाके काजे हरछठ का उपवास करहो, कौन माटी की बनी हो?’
डुकरो खों ऐसी उम्मीद ना हती, सो पल भर चुप रै गईं, फिर धीरे सें बोलीं 'बाकी करनी बाके साथ मनो हम तो माँ आंय। 
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३. इंसानियत 
गरमी के दिन हते, भरी दुपरिया सड़क किनाए हाथ-ठेले पे ताजे फल दिखाने सो खरीदाबे खातिर लोग जुटन लगे। ओई टैम एक नओ दम्पति पौंचे। जननी केन माथे पर छलकता पसीना बता रओ हतो के बे पैर-पैदल चले आत आंय। जनानी नें आतई ठांडे होबे खातिर ठेले का सहारा लओ और ओ पे बंधे मैले-कुचैले छाजन में सर छिपाबे की कोसिस कारन लगी। बाकी कातर निगाहें कबऊ फलवाले पे टिकतीं कबऊ घरवाले पे। फलवाले ने बाकी परेसानी देखी तो ठंडा हो गाओ और अपनो स्टूल बाको बैठबे खातिर देन लगो, मनो लडखडान लगो तो ठेले का सहारा ले के सम्हर गओ। सब औरन ने देखो ओको एक पैरई ना हतो। 
अपनी मुस्किल भूल खें औरन की मदद करबे के लाने तैयार ठेलेबारे की इंसानियत देख सब प्रसंसा करन लगे। 
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४. नर्मदा मैया की जै 
बरगी बाँध और नहरें तैया भईं।नहरों से पहली-पहली बार सिंचाई का पानी छोड़ने हतो। नाहर के सिंचाई क्षेत्र में ज्वार, बाजार, मका की फसलें हतीं। छोटे किसानण खों खेतों में रबी फसल की लगाबे लाने हौसला दओ जा रओ हतो। जमुनियाखड़े के परधान कोंडीलाल राय से बात भई तो वे तो एकदम उबल पड़े, बोले,-“साब!आप भरम में भूले हो, तुम्हाही जे नहरें-वहरें कछु ने चल पें हें, समझ लो, मैया कुंवारी हें, उनखों अबे तक कोऊ नहीं रोक पाओ, ने सोनभदर, ने सहसबाहू, जो तुमाओ बाँध कैसे बच हे? भगवानई जानें। ”
-दद्दू! आप ठीक कैत हो, मनो नर्मदा मैया ने किरपा की और नहरों के रास्ते खेतान माँ पौंच गईं तो का करहो?'
_“देखहें!” बिनने टालबे काजे कै दई। नियत दिना जब जमुनिया की नहरों में जल बहन लगो तो बाजे–गाजे के साथ “नर्मदा मैया की जय” बोलत भए गाँववारन के संगे सबसें आगू खड़े हते परधान कोंडी लाल राय। 
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सुरेन्द्र सिंह पंवार/ 201, शास्त्रीनगर, गढ़ा,जबलपुरम(म.प्र.) / 9300104296/email- pawarss2506@gmail.com
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प्रदीप शशांक, जबलपुर   

Pradeep Shashank की प्रोफ़ाइल फ़ोटो, चित्र में ये शामिल हो सकता है: 1 व्यक्ति, मुस्कुराते हुए, सूट
१. लालच 
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'काय ,सुनो तो जरा, हमका ऊ कलेंडर मा देखेके बतावा कुम्भ ,सोमवती अमावस्या ,कारतक पूरनिमा कौनो तारीख मा पड़ रई आय?'
गोपाल ने अपनी बीवी की ओर अचरज से देखत भये पूछी -- 'तुमको का करने है ई सब जानके ?' 
कछु नई हम सोचत हते कि कौनो ऐसे परब के नजदीक मा सासु मां को तीरथ के लाने भिजवाई दें , मांजी को तीरथ भी हो जायगो और भीड़-भाड़ की भगदड़ मा दब-दबाकर बुढ़िया मर जावे तो सरकार से हम औरन को मुआवजा में एक लाख रुपइया भी मिल जेहे और बुढ़िया से मुक्ति ।
गोपाल हतप्रभ हो अपनी बीवी की आँखन में लालच की चमक देखत रह गओ । 
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२. जागरूकता 
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आदिवासी जिला के सरकारी अस्पताल में दो दना से औरतों को नसबन्दी शिविर चल रहो थो । ऊ शिविर में नसबन्दी करावे के काजे औरतन की बहुत भीड़ हती ।उ न में परिवार नियोजन के लाने बढ़ती जागरूकता से डागदर भी मन ही मन बहुत खुश हो रओ थो
उत्सुकतावश डाक्टर ने मजदूर औरत से नसबन्दी करावे को कारन पूछो तो बा बोली:अरे डागदर साब! कछु मत पूछो ,हम मजदूरी करवे जात है तो ठेकेदार परेशान करत है और फिर नों महीना तक ओको पाप हम औरन को भोगवे पड़त है । ई बीच मा मजदूरी भी नाही मिलत हती, सो हमें और हमरे बच्चों को भूखे मरवे की नोबत आ जात थी । ऐई से ई सब झंझट से मुक्ति पावे हम ओरें नसबन्दी करवा रए हैं । 
डॉक्टर उन की जागरूकता का रहस्य जानकर अवाक रह गए । 
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३. ठगी 
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" काय कलुआ के बापू, इत्ती देर किते लगाये दई? वा नेता लोगन की रैली तो तिनै बजे बिला गई हती ना? सौ रुपैया तो मिलइ गए हुइहें? " 
रमुआ कुछ देर उदास बैठा रहा फिर उसने बीवी से कहा -- " का बताएं इहां से तो बे लोग लारी में भरकर लेई गए थे और कई भी हती थी कि रैली खतम होत ही सौ-सौ रुपइया सबई को दे देहें ,मगर उन औरों ने हम सबई को ठग लऔ । मंत्री जी की रैली खतम होवे के बाद सबई को धता बता दओ । हम ओरें शहर से गांव तक निगत-निगत आ रए हैं । बा लारी में भी हम औरों को नई बैठाओ । बहुतै थक गए हैं । आज की मजूरी भी गई और कछु हाथे न लगो ,अब तो तुम बस एकइ लोटा भर पानी पिलाए देओ,ओई से पेट भर लेत हैं।" 
रमुआ की बीवी ऐसे ठगों को बेसाख्ता गाली बकती हुई अंदर पानी लेने चली गई ।
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४. आस का दीपक 
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" आए गए कलुआ के बापू! आज तो अपन का काम होइ गओ हुईए''  कहत भई बाहर निकरी  तो आदमी के मूँ पे छाई मुर्दनी देखतई  खुशी से खिला उसका चेहरा पीलो पड़ गओ । 
रघुवा ने उदास नजरों से अपनी बीवी को देखा और बोला- " इत्ते दिना से जबरनई तहसीलदार साहब के दफ्तर के चक्करवा लगाए रहे, आज तो ऊ ससुरवा ने हमका दुत्कार दियो और कहि कि तुमको मुआवजा की राशि मिल गई है ,ये देखो तुम्हारा अंगूठा लगा है इस कागज़ पर और लिखो है कि रघुवा ने २५०० रुपैया पा लए । " 
जिस दिन से बाबू ने आकर रघुवा से कागद में अंगूठा लगवाओ हतो और कही हती कि सरकार की तरफ से फसल को भये नुकसान को मुआवजा मिल हे , तभई से ओकी बीवी और बच्चे के मन में दिवाली मनावे हते एक आस का दीपक टिमटिमाने लगा था , लेकिन बाबुओं के खेल के कारण उन आंखों में जो आस का दीपक टिमटिमा रहा था वह जैसे दिए में तेल सूख जाने के कारण एकाएक ही बुझ गया। 

*** 
प्रभुदयाल श्रीवास्तव, छिंदवाड़ा 

प्रभु दयाल श्रीवास्तव के लिए इमेज परिणाम

*
अरमान
आपने आश्रम में बाबाजू अधलेटी अवस्था में विश्राम कर रये ते। भक्तन की भीड़ लगी ती और बाबाजू की जै जैकार हो रै ती एक लुगाई बाबाजू के पांवं पे माथो धरकें गिड़गिड़ा रई ती
"किरपा करो बाबा मोरे मोड़ा खों ठीक कर दो बाबा, ऊकी अकल ठीक कर देओ, ऊखों ग्यान देओ, ऊखों खूब जस होय और ऊखों ऐसो आसीर्बाद देओ के सबके सामने मूड़ उठा सके"
" तोरे मोड़ा खों कछू दुख है, कछु तकलीफ है का?" बाबाजू ने पूंछी
"महराज ऊ सच्च बोलत‌ है। दिनभर सांची बोलत रेत, भुन्सारे सें रात सोउत लो सांची बोलत|झूंठी बोलई नईं पाउत कित्तौ समझाउत-सिखाउत असरई नईं परत"
"और का दिक्कत है बेटी"
"महराज ऊ ईमानदार सोई है, ने कौनौउं सें पैसा एँठ सके, ने मुफत को माल पचा सके'
"आगे बोलो"
जब देखो गरीबों भुखमरों की सेवा में लगो रेत। अपने हिस्सा की रोटी लो गरीबन खों दे आउतकौनौउं दोरे सें खाली हाथ नईं जा पाउत। कैत है मेहमान भगवान् आंय नें जाने कौन सी भाषा बोलन लगो है। पैसा बारन सें तो भौतई घिन‌यात"
" ईमें का बुराई है बाई, गरीबों की मदद तो अच्छी बात आये'
"महराज मैं चाहुत हों के बो अमीरों में रेकें पैसा कमाबे के हुनर सीखे महराज बो गौतम बुद्ध, महाबीर स्वामी और गाँधीजी के बारे में भोतई बतकाव करत"
"तुम का चाउतीं हो?"
"मैं का बताऊं महराज, मोरी तो इच्छा है के बो खूब पैसा कमाए, चारऊँ तरफ ओखों नाम होय, राजा-महाराजा घाईं बड़ो आदमी बने"
"काये तुम इन लफेंदन में परीं हो, लरकाखों काये बिगाड़ो चाहतीं हो?"
"महराज जो बिगाड़ नोईं सुधार आये, सुधरहे नेँ तो समाज में केसें जगा बना पेहे बिना पईसन कौ, को पूंछत, चार छै लठेत संगे रेहें तो गांव भर सलाम करहे नेता सोई आगे पाछॆं फिरहें के भैया चुनाव में उनकी तरपे रईओ मैं सोई बहादुर मौड़ा की मतारी बनो चाहत
"का कहें? ऐसो करो मौड़ाखों चुनाव लड़वाओ, पंची-सरपंची सें सुरु करो। भगवान सूदे रये तो सब ठीक हो जेहे"
***



राशि सिंह, मुरादाबाद
एम. ए. अंगरेजी साहित्य, बी.एड., एलएल. बी.

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१. सूर्यास्त
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''अब काहे बैठे हो जा तरे से मुँह लटकाये,जाओ! हाथ-पाँव धोय लेओ और गैयन के हरियायी मिलाय आओ।'' ताशला ने अपने पति चरन सिंह को समझाते हुए कहा ।
''अरे का करैं कछऊ समझ में नाय आ रई। एक तो जो अंबर पर बादर तनो पडो है और मेरे मन में बिजरी चमक रही है, राम जाने का हौयगो?''चरन सिंह ने बेचैनी से टूटी हुई खाट से उठते हुए कहा ।
''अरे तुम चिंता नाय करो -ऊपर बारो इतनो निर्दयी नाय जो हमारी फ़सल को नुकसान पहुँचायगो।''-ताशला ने भरोसे सें कहा ।
''देख ताशला! इते फ़सल को कोई भरौसो नाय है और उते सीमा पर हमारो लाल तैनात है गयो। मन भौत घबराय रहो है
मोय दोनों लाल मुश्किल में आंय ।''-चरनसिंह अपने कुर्ते की जेब को बेबजह टटोलते भए बोलो।
''दोनों लाल? हमाओ तो!''
''हओ, हमाओ एकई लाल आय पर मैं तो जा फ़सल को भी अपनो लाल मानत हौ। का करौं ?''चरन सिंह ने मेहरारू की बात काटत भए कहो।
'तबई आसमान में बिजुरी कौंधी और तेज बारिस के साथ ओले पड़ने लगे। ''ताऊ! प्रकाश की चिठिया डाकिया दे गओ है !'' कैत भए एक पडोसी बारिश में भीगत-भगत चरनसिंह की झुपड़िया में दाखिल भओ।
''पिता जी! दुश्मन ने हमारे कैम्प पे हमला कर दओ है। हम दो-दो हाथ कर रए मनो कछू अनहोनी होय तो अपनो और अम्मा को ध्यान रखिओ।'' पढ़तई चरनसिंह का सिर घूम गओ। ऐसो लगो मनो जिनगी को सूरज अस्त होबे बारो है।
तालशा ने देखतई चरण सिंह के हात सें गिरी चिठिया उठा खें बाँची और कई 'मन काए गिरात हो, बा देखो इतनी बारिस होय खें बाद भी बा चिरइया घोंसला नई छोर रई। जा लेओ सूरज देवता सोई बिदा माँगबे काजे झाँकन लगे मनो बे बे कल्ल सकारे फिर आजैहें। जॉन कहें बाद सूर्योदय नई हो, कबऊँ देखो आय ऐसो सूर्यास्त?' कैत भई त्रिशाला दिया-बत्ती करन लगी।
७-११-२०१७
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२. गिरगिटान
*
''अब बात नें बनेगी जी!लल्ला को दूसरो ब्याओ करन पडैगो ।'' ठकुराइन ने ठाकुर साहब के हुक्के में तम्बाखू की पुडिया खोलत भए कहो ।
''पर भओ का है? कैसी बौरा रही है? काए अनाप-शनाप बक रही है?'' ठाकुर साहब ने गुर्राते भए टोंको।
''अब हमकौ दादी बननो है बस्स, हम कच्छू ने मानें।''ठकुराइन ने पल्ला संभालते भए तिरछी नज़ए सेन ठाकुर कौन देखत भए बात पूरी की।
''जा बहुरिया नें बन सकत माँ, जाय तो निकार देओ घर से ।''ठकुराईन ने ठाकुर साहब के नजीक आते भए मन की बात काई।
''अरे! काहे सिर पर चढ़ी आत हो?''ठाकुर साहब ने झल्लाते हुए कहा। ''आज लल्ला को भी भ्रम मिट जायगो। गओ है डाक्डरानी के धौरे बहुरिया को इलाज करबाबे।'' कहत भए दोनों जोर से हँस परे।
''अरे बहू! लल्ला को का है गयो? किते आय? संगै नई आओ?''ठकुराइन ने मुतके सवाल एकई सात पूछ लए।
''माँ जी! वो , वो !''
''अरे का बो-बो लगा रई है? जल्दी बता, का है गओ?'' ठकुराइन ने परेशान होत भए पूछी।
''बे दवाई लेबे गये हैं''
''अरे दवाई से कछू न होयगो, सब बेकार है, तेरे न होयगी औलाद।'ठकुराइन मूं बनात भी बड़बड़ाई।
''माँ जी! बे अपनी दवाई लेने गये हैं, हम.. हमें... तो बिल्कुल ठीक बताओ है डाक्टरनी बाई ने।''बहू ने सकपकाते हुए कहा और जान बचात भई अपने कमरा में घुस गई ।
''अब कौन खों ब्याओ करेगी?'' ठाकुर साहब ने व्यंग से कहा।
''अरे नाय! हम नांय मान सकत के हमाए लल्ला में कौनऊ कमी आय? मनो कछू होय भी तो मेहरारू को धरम है मरद को साथ निभाए।' रंग बदलने लगे थे दोनों और खिड़की सेन झाँक री हटी गिरगिटान।
६-११-२०१७
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३. फ़ैसला
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पंचायत जुटई हती के पुरानी फटी धोती में खुद को छिपाबे की कोसिस करती एक औरत डरते भए हाजर भई। ओई की आड़ में एक सोला-सत्रा साल की मोंड़ी पुरानी सी चुन्नी सेन सर ढँके हती। भीड़ ने दोऊ जनी को रास्ता दओ, फुसफुसाहट बड़ गयी ।
''सरपंच साब जा डायन आय। अपने खसम कहें खा गई। एई के मारेगाँव में बीमाबीमारी फ़ैल रई । जाए गाँव सें निकार देओ एक बोला। जाए जिन्दा जला दो ।' दूसरा चिल्लाया ।
''कलई मोर बच्चा मर गओ, जाई डायन खा गयी ओको।''इस बार एक महिला चिल्लाई।
''दोऊ माँ-बिटिया खें कुये में धक्का दओ जाए सरकार।''इस बार फिर भीड़ में से आवाज आई ।
दोई माँ-बेटी थर-थर काँप रईं हतीं। बे एक दूसरे सें लिपट के हिम्मत रखबे की कोसिस कर रई हतीं।
''जाई औरत डायन आय?'',सरपंच जी ने ओई औरत की तरफ उंगरिया उठा खें पूछो।
''हओ सरकार'' सबनें तुरतई कई।
''तुम ओरें कैत तो आज सेन से एक महीने काजे हम ईखों गाँव निकार दैहें मनो बाके बाद गाँव में कौनउ मौत भई तो ओई घर के लोग जिम्मेदार हुईहें और उनको सोई जाई सजा दई जईहे।''सरपंच जी ने फ़ैसला सुनाओ तो भीड़ को साँप सूँघ गओ ।
''काए, अब काए नई बोल रए कछू? जे माँ-बिटिया गरीब-बेसहारा आंय सो तुम औरन मदद करे की जगा डायन कै रए, गाँव सें निकार खें इनको खेत कब्जान चात हों।'' सरपंच जी लाल भभूका हते।
''जे बीमारी और मौतें गंदगी की बजह से हर साल होत आंय। मनो तुम औरें साफ़-सफाई नई रखत। काल्ह डाक्टरनी बाई और नर्स आहें। उन सें पूछ-गूछ खें बाल-बच्चन की साफ़-सफाई के बारे में औरतन खें सीख मिल जैहे तो जे मौतें कम हो जैहें।''
जा बात ध्यान सें सुन लेओ, जे महतारी-बिटिया कहूँ ने जैहें, इनें कौनऊ कास्ट नें होय। जे दुआ दैहें तो तुमाए बाल-बच्चा सलामत रैहें'',दूसरे पंच ने कहा। सबई गाँव वारे सिर झुकात भए अपनी गलती मान खें साफ़-सफ़ाई रखने को संकल्प करके चल दए। दोऊ माँ-बिटिया की जान में जान आई। सबने कई दूध का दूध पानी का पानी घाईं फैसला हो तो ऐसो।
५-१०-२०१७
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४. बिखरे तिनके
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' भानू की माँ! आज कछू नाश्ता-वाश्ता मिलेहे की नई ?'' ओमवीर ने अपनी घरवाली शीला आवाज दई।
''अब्बई ला रई, हाला काय कर रए? तनक सबर करो'' शीला ने उत्तर दओ।
''लेओ, अपनी पसन्द के पराँठे आलू के!''
''तुम काए बना रईं नाश्ता? दोऊ बहुएं किते गईं?'' ओमवीर ने जाननो चाहो।
''काय मोरे हाथ के बनाए माँ कछू खराबी है का?'' शीला ने गुस्से सें पूछी।
''नई नई, बहोत दिना बाद बना रई हो ना ऐइसे !'' ओमवीर ने सकपकाते भए सफाई दई।
''दोऊ जनीन आज सें अलग-अलग रसोई बनान चात!'' शीला की आँखों में आँसू आ गए।
''काय, का भओ?''
''दोऊ भैयन में मुतके दिना सें बातचीत बंद हती। अब बहुएं सोई... मनो कौनौ फरक नईया, बच्चे खुस तो अपन सोई खुस'' शीला ठंडी सांस ले के बोलीं।
''ठीक कैत हो, लगत है घरौंदा बिखर रओ, जब छोटे हते तो दोऊ एक-दूसरे के साथ खाबे ,खेलबे, सोबे काजे लड़त हते। मजाल हती के कोई अलग कर दे और आज एक दूसरे से बात तो दूर, मूँ भी देखना भीगवारा नई!''
आलू का पराँठा प्लेट में धरो-धरो ठंडा राओ हतो, ओमवीर और शीला के अरमानों की तरह।
५-१२-२०१७
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५. सौगात
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''का बात है भौजी! आज तो मुखडे को नूर कुछ औरई कह रओ आय, बताओ नें --का भइया आ रए?''  घूँघट की ओट में लजाती-शरमाती बिजुरी खें ननदिया चंदा ने छेडते भए पूछी तो लजाई बिजुरी ''धत्त'' कहत भई कोठरी में घुस गई। उसका मर्द दूर सहर में टेक्सी चलात हतो। आज बिजुरी भौत कुस हती। खुश होबे का कारन भी हतो। ब्याहबे के तुरतई बाद मर्द नौकरी के काजे सहर चलो गओ हतो। हमेसा चुप्प रहबेबारी बिजुरी और उसकी पायल दोनों आज घर माँ मधुर संगीत उत्पन्न कर रई हतीं।
बिजुरी का पति आओ और दस दिना रहखें सहर वापस चलो गओ।  बिजुरी भौत रोई मनो पति के दिलासे से कि बो जल्दी फिर से आ जैहे खुस हो गई।
''का बात है बहुरिया! कमजोर होत जाय रही है , कौनउ बीमारी है का?''बिजुरी के ससुर ने एक दिन उसकी सास से पूँछा ।
''हाँ, इस दफ़ा तो लल्ला भी कमजोर लग रओ हतो,जाने का बात है?'' सास ने फिकर सें कहा। कछू दिना बाद  बिजुरी का पति फिर घर आओ। अबकी पिता ने कई ''चलो लल्ला! डाँकटर के धौरे चलो, सूख कै पिंजर हो रए और बहुरिया को सोई चली चले। थोड़ी नं-नुकुर केन बाद दोऊ जने सहर जाके इलाज काजे तैयार हो गए।
अस्पताल में जाँचें भईं और जब डाक्टर ने सच बताओ तो बिजुरी की तो मानो दुनिया उजड़ गई। दोनों एच.आई.बी. पोजिटिब हते।
अस्पताल के लोग हिकारत की नजर से देखत हते, मनो हालात से अन्जान बिजुरी घूँघट की ओट सें अपने मनबसिया को हेर खें खुस होत ती। उसे का मालूम मनबसिया कैसी सौगात दे गओ हतो। 
*** हिंदी लघु कथा
'पेड़ से कटकर '
एक विशाल बरगद का पेड़ बडी शालीनता के साथ विशाल शाखाओं  का बोझ लादकर खडा था  । धूप ,,,बरसात और ठंड हर मुश्किल का सामना बडी समझदारी और सहनशीलता से करता था ।
एक दिन  डालियाँ हवा के झौंकों के साथ मस्ती में डूबकर लहरा रहीं थीं। तभी एक डाली को शरारत सूझी और उसने दूसरी डाली से कहा --
''देखो बहिन इस बरगद की शोभा हमसे है --लेकिन लोग गुणगान इसका करते हैं  एक दिन इससे अलग होकर दिखायंगे कि इसका महत्त्व ज्यादा है या हमारा हमसे ही तो है इसका असित्तव बना फिरता है हमारा परिवार -----मुझे तो बहुत ही क्रोध और अब तो ईर्ष्या भी होने लगी है इससे --हमारी सुंदरता को कोई नहीं बखानता ---!''
''हाँ --हमसे ही तो इसकी सुंदरता है ---!''दूसरी ने गर्व से मुँह बनाते हुए कहा ।
तभी एक लकड़हारा आया और पेड़ पर चढ गया लकडी काटने के लिये --और एक -एक कर कई डालियाँ काटकर उसने नीचे फेंक दीं ---।कटी हुई डालियाँ रूँदन करने लगी तो वे दोनों डालियाँ जो अभी तक परिवार रूपी पेड़ की बुराई कर रहीं थीं ,सिंहर उठी डालिओं की दुर्दशा पर ।
लकड़हारे ने सारी डालिओं को खींच कर एक स्थान पर एकत्रित किया और अपमी कुल्हाडी से उनको अनेक टुकडो मे विभाजित कर दिया --।तोड़ कर रख दिया ।
सभी टहनिया चीत्कार करती रहीं ,परंतु अब पेड़ से कटकर उनका कोई भी अस्तितव नहीं रह गया ।मात्र कूडे का ढेर बनकर रह गयीं जलने के लिये ।पेड अब भी खडा था इस विश्वास के साथ कि टहनियाँ फिर उगेन्गी और परिवार फिर हरा -भरा हो जायेगा परिवार से टूटकर --कटकर किसी कोई मोल नहीं --!
८-१२-२०१७ 
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डॉ रंजना शर्मा
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ranjanasharma50@gmail.com
१. खिसकते पल
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अंधेरी रात हती, भीरु खेत मा खड़ो-खड़ो सोचत हतो के जीवन की डगर कित्ती लंबी हो गई? मुट्ठी में बंधे बे हँसी-खुसी के पल जाने किते बिला गए जब खेत में बीज डालतई अंकुर फूटबे की आस रैत ती? मनो कल्लई की बात हो आत-जात समै पंछियों घाईं उड़त बद्दल, बरसत पानी, अन्खुआउत बीज, लहलहात पौधे और कोलाहल करत बच्चे कित्तो कुछ बटोर लेओ चाहत थो मन, बो भी एकई पल में।
हाथ में छोटी सी लालटेन जौनकी चिमनी में कालिख जमी हती और उजालो चारई कदम तक जाके चुक जात तो थामे भए भीरू घर सें निकर आओ। दिन का परकास भीरू काजे अभिसाप बन गओ हतो, घर से निकलतई करजा वसूलबेवारन को तांता लग जात थो।
एक कदम बढ़तई ठिठका सायद कौनऊ की पदचाप है। तबई सन्नाटे को चीरत भई पत्नी की आवाज आई 'ऐ जी! इत्ती राते किते जा रए?'
"कहूँ नहीं जा रओ, तें घर जा मटरुआ जाग जैहे।"
"लौट जा तें, हों तो तनक हवा खा रओ।"
रमकू वापस आखें मटरुआ को कलेजे से लगाखें सो गईं। सकारे घर के सामनू भीड़ देखी तो पूछन लगी "काय भैया का हो गओ? इत्ते मरद काय जुटे हो?"
"हरिया धीरे से आगे आओ, मटरुआ के मूंड पर प्यार से हाथ फेरते भए बोलो "रमकू भौजी तनक इते आओ, भीरू भैया ने पीपर की डार तरें फांसी लगा लई।"
पतझड़ के दौड़ते पत्तों सी उन्मत्त रमकू, सन्नाटे में डूबी भीड़ को चीरती भीरू की लंबी गर्दन से लिपट गई। रोअत-रोअत ऑसू सूख गए तो उठकें धरती को अपने ऑचल सें झाड़-पोंछ कें भीरू को लिटा दओ।
कर्जा माँगबेबारों से एक पूछ परी "मरबे पे कित्ते दे रई आज-काल सरकार?' तुम औरन की भूख मिट जैहे की नई?
***
२. पोल बड़े बड़ेन की
*
"पड़ौस में कोऊ आ गओ, देखत हैं को है?"दिखात तो है लोग भले हैं, नमस्ते कर रओ तो। रमा और शंकर से दुआ सलाम भई और घरे बुलाबे को न्योता भी दे दओ। दोऊ जना जैसेई उनके इते सोफा पे बैठे कि पास में एक पींजरा में तोता राम-राम रट रओ तो।"
"बतराउत-बतराउत तनक अबेर हो गई तो तोता कैन लगो "जे जोन आये हैं कबे जैहें, पिरान खा रई"।
"बिने सरम सी लगी और पींजरा उठा कें भीतरे धर दओ"।
व्योहार तो निभाने तो सो रमा ने सोई बिनखों अपने घर आवे को कह दओ: 'आप औंरे घरे अइयो हमाये।'
दूसरे दिन पड़ौसी रमा के घरे पधार गए, उनके संगे उनको छोटो बेटा भी आओ।
"बेटा बोलो," जब तुम औरे हमारे घर आये ते तो हमने चाय-नाश्ता कराओ हतो। इत्ती देर हो गई अबे तक तुम औरन नें नाश्ता नई कराओ, चलो बाई घरे चलो।"
"रमा हँसी और झट सें नाश्ता लगाउन लगीं"।
"जैसेई नाश्ता लगो उनको हल्को मोड़ा प्लेट गोद में धर के खाउन लगो"।
"पड़ौसिन को सरम आई,"अरे, अरे बेटा आराम सें खाओ, देखो गिरे न"।
"बच्चे ने हवा में हाथ लहराते भए कहो:"जे देखो है"।
"रमा बच्चे और तोते के माध्यम से पड़ौसियों को भली प्रकार समझ चुकी हतीं।

३. श्यामवर्णा
*
"जा बताओ रमा! "जे कालीमाई कौन पे गयी है?, घरे सब गोरे गट्ट धरे, ई कजाने किते सें हमाये पल्ले पड़ गयी?"
"दादी की रोज की रोज सुन के रमा खों बहुत बुरो लगत तो बा सोंचत ती कि दादी ऊ खों श्यामा कह सकत हैं या कृष्णा भी कह सकत हैं पर कल्लो कहबे से सायद दादी को संतुष्टी होत आय।
"आज रमा अपने लाने नओ हिमालय फेश वास लिआई और मोंह पे रगड़ रहीं थीं कि दादी पूँछ बैठी, जो का लगा रहीं हो?"
"कोयला होय न ऊजरो, सौ मन साबुन खाय"
"रंग अवश्य सांवला था पर रमा के नाक नक्श इतने सुगढ थे कि जैसे ही जज साहब के बेटे से बात चलायी तुरंत हां हो गयी"।
"दादी रमा के पास बैठ गयीं ,बोली रमा बिटिया काय हम खों भूल तो न जैहो?"

४. कर्मयोगी
*
"का बकत हो,हों बिना सिर-पैर की बातें करत हों?"
"मो खों गुस्सा जिन दिलाओ"।
"देखो जा 'भ्रष्टाचार, लूटन-खसोटन, मंहगाई, बेरोजगारी जैसेई इनके लाने सोंसत हों, रामधई खुपड़िया खराब हो जात है"।
"नौने रओ तुमाई समझ में कछु ने आहे, जो दुनियादारी आय"
"का मतलब तुमाओ?"
"एक तो तम अपने संगी-साथी बदलो, जे ऐंसी-बेंसी बातें सिखाउत आंय, जी सें हर सभा में तुमाओ मजाक उड़त है"।
"ऐईसें आजकल गीता पढ़ रओ हों, बाई कै रई ती तनक ज्ञान बढ़ाओ"।
"मंदिर-मंदिर भी जा रओ, भगवान जरूर ज्ञान देहैं"।
"सभा में भीड़ देख के तुम्हें लग रओ हूऐ ,कछु-कछु करम योग समझ में आवे लगो"।
***
५.छोड़-छुट्टी
*
"देख गड़ासी उते फेंक दे, मोखों लक्षमीबाई की कसम, आज के तो तैं रेहे के हों रेहों?"
"निबका दे मोरे पैंजना, तैं मोखों मारहे? खसम खों?"
"हओ!! खसम गओ भाड़ में, चलो जा इते सें मोड़ा-मोड़ी उठ जेहैं तो पकड़ के तोरी अकल ठिकाने लगा देहें। पिरान कड़ जायें, पैंजना ने देहों जो तोरी कमाई के नइयां, डुक्को ने मोंह दिखाई में दए ते"।
"हों सीला के संगे रेहों, तोसें मन भर गओ। पटर -पटर करत ,खाबे खों दौड़त"।
"हओ चलो जा, तोखों रोज-रोज जनी बदलबे की आदत जोन पड़ गई आय"।
"अपने मोड़ी-मोड़ा खों भी लेत जा, जे तोरे आय तें पाल"।
"मोरो मन भी तोसें भर गओ"।
***
गीता गीत, जबलपुर

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१.आड़
बा रोजई दारू पीबे काजे महारारू सें पैसे माँगत रैत तो, नें मिले तो रगेद-रगेद कें ठोंकत तो। बच्चे सोई भर पेट रोटी नें पात हते सो बीमार और अधनंगे रए आउत ते
कछू दिना बाद ओसे मुलाकात भई तो तनक साफ़-सुथरी हती, मोड़ा-मोड़ी सोई ठीक-ठीक हते। हाल-चाल पूछी तो ओने बताई गिल बनाबे को काम करन लगी आय। मेहनत तो तनक जादई आय मनो मजूरी समै सें मिल जाबे सें दाल-रोटी खें को जुगाड़ ठीक-ठाक हो जात आय
एक दिना सकारे-सकारे दिखी, भोत परेसान हती। 'काय काम पे काय नें गई?" मैंने पूँछी तो कैन लगी 'मैडम! जे अस्पताल में डरे आंय, कहूँ टकरा गए हते। उनई खों खाबे को कछू पोंचा देऊँ फिर उतई सें काम पे जांन परहे।'
'नासपीटा अब लों जाहे गरियात आय, मनो जे ओ पे जां छिडकत आय। काम को नें काज को, दुसमन अनाज को, नें सुदरत आय, नें पीछो छोड़त आय। इनसे मरद से तो नें होय तो भलो।' उसके साथवाली औरत बडबडान लगी
'नई रे! ऐसो नें कओ। नरबदा मैया उनखों हमेसा बनाए रखें। कैसऊँ आंय, मोरे सुहाग आंय, उनखों सबरे संकट मोय दे दें मैया। मारत आंय सो का भई लाड़ सोई करत आंय।' कहत भए ओके मूँ पे सुहाग की लाली ऐंसी सजी के बा और भली दिखान लगी
***
२.अज्ञानता का खौफ़
'ए री! उतै हेर, बे उड़नखटोला पे लदे-लदे हमाए खेत नापत जा रए आंय। मोरी जान निकरी जा रई, एक ठइयां छोटो सो ख़त आय, बाहे बी सरकार छीन लैहे तो का हुईहै? मुस्किल सें खाबे भर को गल्ला होत आय, जे असारो बी छिन जैहे तो जीहें कैंसे?'
''तें ठीकई कै रई आय। मोरे टोला मा सोई ऐसो खटोला उतरो रओ। बामें तीन ठइयां आदमी हते। नीचे उतर खें बिनने आगी बारी, एक रस्सी ऊपर, एक नींचे लटकत हती। बे नें जाने का-का सामान लै हते, मजूरन खें लगाओ फिर सबी खें खेतन खों नाप-जोख कें बापस हो गए।''
उनकी घबराहट देख के मोरो मन नें मानो सो बाहर झाँक के सच जनाबे की कोसिस करी। मोय हँसत देख बे संकुचात भई पूछं लगीं 'का भओ?'
'तुम औरें फालतू में घाबरत हों, जे तो फ़ौज को गुब्बारों आय। वे औरें आपके काम-काज के लाने नाप-जोख रखत आंय मनो कौनऊ की जमीन नई लेत आंय। किते कैंसी माटी आय?, कित्तो बारिस होत आय? कौन सी फसलें बई जात आंय?, कौन जात के कित्ते लोग-लुगाई रैत आंय?, सच्छा कित्ती आय?, का काम-काज करत आंय?, कित्तो कमात आंय? जे सब जानकारी ले खें सरकार बिकास की योजना बनाउत आय।'
'सच्ची बात जनाबे खें बाद उनके चहरे सें अज्ञानता को खौफ़ हट रओ थो
***
लक्ष्मी शर्मा

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१. जरूरत

साब के बंगला के बग़ीचा में माली पानी डार रओ हतो। पानी डारत-डारत उने सोची के मोरे घरे पानी की भारी किल्लत आय, आज नल सोऊ नई आओ है। मैं एक डब्बा में पानी भर केन इते सें ले जैहों ते घरे कछू काम चा जैहे। काम ख़तम करबे के बाद माली नें डब्बे में पानी भरो और जाई रओ हतो के मालकन की गाडी पोंच गई। मालकन नें पूँछी- 'माली जे का लए जा राए हतो?'
माली ने कई- 'मालकन! मोरे घरे आज पानी नें आओ, ऐंसे ले जा रओ हतो।'
मालकन नें कई- 'देखो, हमाये पौधे सूखे जा रए आंय। भोत मांगे खरीदे हते, जो पानी इनमें दार दो। तुम कहूँ और सें भर लइओ।'
'हओ मालकन' कैत भए माली नें पानी पौधन में उडेर दओ
***
२. आभार
बेजा ठंडी पड़ रई हती। एक भिखारी रात में अपनी कथरी लपेटे ठंडी सें काँप रओ हतो। इत्ते में कहूँ सें घूमत-घामत एक कुत्ता निकर आओ। बा सोई ठंडी से काँपत भए कूँ-कूँ कर रओ हतो। भिखारी नें देखो तो सोची के ए खों ठंडी से ने बचाओ तो ई के प्राण निकर जैहें
भिखारी उठो और उनें कुत्ता खों उठा केन अपनी कथरी के अन्दर संगे सुला लओ
सबेरे उठो तो चटक धूप निकर आई हती। बा कुत्ता सामे ठांड़ो दम हिला रओ हतो
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