सोमवार, 21 जनवरी 2019

समीक्षा- हाइकु संग्रह -मंजूषा मन

कृति परिचय:
अभिनव प्रयोग: हाइकु संग्रह की हाइकु समीक्षा
''मैं सागर सी'' हाइकु-ताँका लहरों की मंजूषा
चर्चाकार: आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
[कृति विवरण: मैं सागर सी, हाइकु-टांका संग्रह, मंजूषा मन, प्रथम संस्करण, २०१७, आकर डिमाई, आवरण सजिल्द बहुरंगी जैकेट सहित, पृष्ठ ९५, मूल्य १४०/-, प्रकाशक पोएट्री बुक बाजार, एफ एफ १६७९ लेखराज तौर, इंदिर नगर लखनऊ २२६०१६, कृतिकार संपर्क- कार्यक्रम अधिकारी, अंबुजा सीमेंट फाउंडेशन, ग्राम खान,  बाजार छत्तीसगढ़ ४९३३३१]
*
जापानी छंद / पाँच साथ औ' पाँच / वर्ण हाइकु।
"मैं सागर सी" / रुचिकर संग्रह / पठनीय भी।
प्रकृति नटी / छवियाँ अनुपम / मन मोहित।
निहित लय / संगीत की धुन सी / लगती प्रिय।
भाव-सागर / मंथन नवनीत / हाइकु - ताँका।
"करूँ वंदन" / प्रभु का सुमिरन / सह नमन।
मन की व्यथा / किए है समाहित / "पीर हमारी"।
हाइकु रचे / गागर में सागर / प्रिय मंजूषा।
जीवनानुभव / माला  के पुष्प सम / हुए शब्दित।
"शीशे का दिल / करें चकनाचूर / कड़वे बोल।" -पृष्ठ २९
"शोर मचाती / अधूरी कामनाएँ / चाहें पूर्णता।" -पृष्ठ ३१
"आँसुओं सींची / ये धरती बंजर / फूटा अंकुर।" -पृष्ठ ३४
मंजूषा मन / सम्यक शब्द-धनी / हुईं सफल।
"मन-साँकल / तुम खोलो आकर / सुख के पल।" -पृष्ठ ३५
निकलते हैं / अब नहीं गुलाब / पुस्तिकाओं से।
चलभाष का / बढ़ता प्रचलन / न भाए उन्हें।
लिखतीं तभी / हो दुखी हाइकु में / मंजूषा मन-
"किताब मेरी / लौटाई, थी उसमें / याद तेरी।" -पृष्ठ ३८
"मन न रँगा / रँग-रँग हारे तो / घरौंदा रँगा।" -पृष्ठ ४०
अनुभूतियाँ / सघन पिघलकर / बनीं हाइकु।
"साँस धौंकनी / चले अनवरत / आस झुलसे। -पृष्ठ ४५
"मन के भाव / कविता का रूप ले / बने लगाव।" -पृष्ठ ४८
गहराई है / विस्तार-ऊँचाई भी / हाइकुओं में।
जीवन दृष्टि / किए हैं समाहित / ये त्रिपदियाँ।
"फेंक आये हैं / सपनों की गठरी / बोझ बड़ा था।" -पृष्ठ ४८
"प्रकृति-रूप" / हाइकुकार को ही / बनाता भूप।
"नन्हीं गौरैया / तिनका चुनकर / संसार रचे।" -पृष्ठ ५७
"गुलमोहर / मन-बगिया फूला / जीवन झूला।'-पृष्ठ ६२
भारतीयता / भावनाओं का सिंधु / नवता घोले।
हाइकु पढ़े / उन्मन मन शांत / होकर डोले।
"अनजाने ही / जुड़ा मन का नाता / आपके संग।" -पृष्ठ ७१
हैं अनुभवी / आँखों ने पढ़ लिया / मन का दर्द।
नहीं बिसरी / स्वच्छता भारत की / हाइकुकार को।
सामाजिकता / सामयिकता भी है / नव आभा ले।
"अभियान ये / स्वच्छ भारत चला / हँसी धरती।' -पृष्ठ ८४
पढ़-गुनिए / ताँका छंद दे रहे / खूब आनंद।
"पगडंडी पे / मन झूमता जाए / खुशियाँ पाए।
और ये अचानक / दुःख कहाँ से आए?"         --पृष्ठ ८९
भाषा शैली है / यथोचित ही / हाइकुओं की।
शब्द-चयन / सम्यक-सटीक है / आनंद मिला।
आँसू-मुस्कान / छाँव-धूप सरीखी / है घुली-मिली।
 पठनीयता / सहज-सरलता / विशेषता है।
अपनापन / लुटा रहा है हर / हाइकु-ताँका।
जैसे बृज में / लीला कर रहा हो / कन्हैया बाँका।
"मैं सागर सी" / है सरस-सफल / आस जगाती।
मंजूषा मन / हिंदी काव्य भंडार / समृद्ध करें।


***
समीक्षाकार संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१, अनुडाक: salil.sanjiv@gmail.com, चलभाष: ७९९९५५९६१८, ९४२५१८३२४४।
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रविवार, 20 जनवरी 2019

sabari mala

एक रचना 
सबरीमाला 
*
सबरीमाला केंद्र है, 
जनगण के विश्वास का। 
नर-नारी के साम्य का,
ईश्वर के अहसास का
*
जो पतितों को तारता,
उससे दूर न कोई रहे-
आयु-रंग प्रतिबंध न हो,
हर जन हरिजन व्यथा कहे।।
अन्धकार में देवालय
स्रोत अनंताभास का
*
बना-बदलता परंपरा,
मानव जड़ता ठीक नहीं।
लिंग-भेद हो पूजा में,
सत्य ठीक यह लीक नहीं।
राजनीति ही कारन है,
मानव के संत्रास का
*
पोंगापंथी दूर करें,
एक समान सभी संतान।
अन्धी श्रद्धा त्याज्य सखे!
समता ईश्वर का वरदान।।
आरक्षण कारण बनता
सदा विरोधाभास का
***
२०-१-२०१९
संजीव, ७९९९५५९६१८

गुरुवार, 17 जनवरी 2019

समीक्षा: सड़क पर 'शांत'

समीक्षा:
आश्वस्त करता नवगीत संग्रह 'सड़क पर'
देवकीनंदन 'शांत'
*
[कृति विववरण: सड़क पर, गीत-नवगीत संग्रह, आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', प्रथम संस्करण २०१८, आकार २१ x  १४ से.मी., आवरण पेपरबैक बहुरंगी, कलाकार मयंक वर्मा, पृष्ठ ९६, मूल्य २५०/-, समन्वय प्रकाशन अभियान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१, चलभाष ७९९९५५९६१८, ९४२५१८३२४४, ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com]
*

बुधवार, 16 जनवरी 2019

tripadika muktika

त्रिपदिक मुक्तिका 
*
निर्झर कलकल बहता 
किलकिल न करो मानव 
कहता, न तनिक सुनता। 
*
नाहक ही सिर धुनता
सच बात न कह मानव
मिथ्या सपने बुनता।
*
जो सुन नहीं माना
सच कल ने बतलाया
जो आज नहीं गुनता।
*
जिसकी जैसी क्षमता
वह लूट खा रहा है
कह कैसे हो समता?
*
बढ़ता न कभी कमता
बिन मिल मिल रहा है
माँ का दुलार-ममता।
***
संजीव, ७९९९५५९६१८
२-१२-२०१८

doha muktika

दोहा मुक्तिका
संजीव 

दोहा दर्पण में दिखे, साधो सच्चा रूप। 
पक्षपात करता नहीं, भिक्षुक हो या भूप।।
*
सार-सार को गह रखो, थोथा देना फेंक।
मनुज स्वभाव सदा रखो, जैसे रखता सूप।।
*
प्यासा दर पर देखकर, द्वार न करना बंद।
जल देने से कब करे, मना बताएँ कूप।।
*
बिसरा गौतम-सीख दी, तज अचार-विचार।
निर्मल चीवर मलिन मन, नित प्रति पूजें स्तूप।।
*
खोट न अपनी देखती, कानी सबको टोंक।
सब को कहे कुरूप ज्यों, खुद हो परी अनूप।।
***
१६-१२-२०१८

muktika

मुक्तिका:
संजीव
.
अपने क़द से बड़ा हमारा साया है 
छिपा बीज में वृक्ष समझ अब आया है
खड़ा जमीं पर नन्हे पैर जमाये मैं
मत रुक, चलता रह रवि ने समझाया है
साया-साथी साथ उजाले में रहते
आँख मुँदे पर किसने साथ निभाया है?
'मैं' को 'मैं' से जुदा कर सका कब कोई
सब में रब को देखा गले लगाया है?
है अजीब संजीव मनुज जड़ पत्थर सा
अश्रु बहाता लेकिन पोंछ न पाया है
===

geet vatsalya ka kambal

अभिनव प्रयोग:
गीत
वात्सल्य का कंबल
संजीव
*
गॉड मेरे! सुनो प्रेयर है बहुत हंबल
कोई तो दे दे हमें वात्सल्य का कंबल....
*
अब मिले सरदार सा सरदार भारत को
अ-सरदारों से नहीं अब देश गारत हो
असरदारों की जरूरत आज ज़्यादा है
करे फुलफिल किया वोटर से जो वादा है
एनिमी को पटकनी दे, फ्रेंड को फ्लॉवर
समर में भी यूँ लगे, चल रहा है शॉवर
हग करें क़ृष्णा से गंगा नर्मदा चंबल
गॉड मेरे! सुनो प्रेयर है बहुत हंबल
कोई तो दे दे हमें वात्सल्य का कंबल....
*
मनी फॉरेन में जमा यू टर्न ले आये
लाहौर से ढाका ये कंट्री एक हो जाए
दहशतों को जीत ले इस्लाम, हो इस्लाह
हेट के मन में भरो लव, ​शाह के भी शाह    
कमाई से खर्च कम हो, हो न सिर पर कर्ज
यूथ-प्रायरटी न हो मस्ती, मिटे यह मर्ज
एबिलिटी ही हो हमारा, ओनली संबल
गॉड मेरे! सुनो प्रेयर है बहुत हंबल
कोई तो दे दे हमें वात्सल्य का कंबल....
*

कलरफुल लाइफ हो, वाइफ पीसफुल हे नाथ!
राजमार्गों से मिलाये हाथ हँस फुटपाथ
रिच-पुअर को क्लोद्स पूरे गॉड! पहनाना
चर्च-मस्जिद को गले, मंदिर के लगवाना  
फ़िक्र नेचर की बने नेचर , न भूलें अर्थ 
भूल मंगल अर्थ का जाएँ न मंगल व्यर्थ
करें लेबर पर भरोसा, छोड़ दें गैंबल 
गॉड मेरे! सुनो प्रेयर है बहुत हंबल
कोई तो दे दे हमें वात्सल्य का कंबल....
*     
(इस्लाम = शांति की चाह, इस्लाह = सुधार)

कृति चर्चा: चिप्पू -गीता गीत

कृति चर्चा:
'चिप्पू' क़िस्सागोई को ज़िंदा करती कहानियाँ
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
(कृति विवरण: चिप्पू, कहानी संग्रह, गीता गीत, प्रथम संस्करण २०१२, आवरण पेपरबैक बहुरंगी, पृष्ठ ९६, मूल्य १२० रु., कहानीकार  संपर्क- १०५० सरस्वती निवास, शक्ति नगर,  गुप्तेश्वर, जबलपुर।)
*
वाक् शक्ति के विकास के साथ कहने-सुनने का क्रम मानव सभ्यता को भाषा की भेंट से समृद्ध कर अन्य प्रभारियों से बेहतर बना सका। 'अनुभूत' की 'अनुभूति' को 'अभिव्यक्त' करने की कला साहित्य रचना है। 'साहित्य' वह जिसमें सबका हित समाहित हो। 'कहानी' तभी जन्म लेती है जब कहानीकार के पास कुछ कहने के लिए हो। 'किस्सा गोई' किस सा बनना चाहिए को वर्ण्य बनाती है। 'गप्प' मारने की कला की 'गल्प' है जो कल्पना को विश्वसनीय बनाकर प्रस्तुत करती है। कथनीय को सामने लाकर उसके प्रति आदर और अनुकरण वृत्ति के विकास हेतु 'कथा' कही जाती है। कथ्य को बातचीत की तरह प्रश्नोत्तर शैली में प्रस्तुत किया जाए तो 'वार्ता' जन्म लेती है। वर्तमान शिक्षा प्रणाली ने 'टीच' करने को लक्ष्य बनाकर 'ग्रास्प' करने पर ध्यान नहीं दिया। शिक्षक वही है जो शिक्षार्थी को शिक्षा दे सके। शिक्षा देनेवाला निरक्षर और शिक्षा पानेवाला ग्यानी भी हो सकता है। ऐसा न होता तो 'साखी' न होती। साखी कहनेवाले प्राय: निरक्षर रहे हैं जबकि साखी से सीख लेने वाले विद्वान।

शिक्षका गीता गीत के कहानी संग्रह चिप्पू' पर चर्चा के पूर्व यह पृष्ठ भूमि इसलिए कि गीता पेशेवर या आदतन कलमघिस्सू नहीं हैं। वे सिर्फ लिखने के लिए नहीं लिखतीं। समाजशास्त्र तथा हिंदी साहित्य से स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त गीता रे सृजन पर विधिस्नातक होने की छाप न होने से रचनाएँ आम आदमी की दृष्टि से सहज ग्राह्य बन सकी हैं। गीता को 'बंगाली हिंदी कथाकार' कहना गलत है। वास्तव में वह 'हिंदीभाषी बंगाली सृजनशिल्पी' हैं। 'कर्म' का महत्व 'जन्म' से अधिक होता है। जब समाज में 'जन्म' को अधिक और 'कर्म' को कम महत्व दिया जाता है  तो चिप्पू' का जन्म ही नहीं, असामयिक मृत्यु भी होती है। गीता की संवेदनशील कलम 'चिप्पू' को न केवल पहचानती है अपितु उसे कथानायक बनाकर उसकी व्यथा-कथा सबके सामने भी लाती है।

गीता का जीवन संघर्ष उन्हें समाज के हाशिए पर रह रहे लोगों से जोड़ता है। उनकी कहानियाँ न तो साम्यवादी चिंतनधारा प्रणीत दिशा-हीन सर्वहारा की व्यथा-कथाएँ हैं, न ही अंध स्त्री-विमर्श की एकांगी अतिरेकी कहानियाँ। तथापि ये कहानियाँ विसंगतियों को इंगित, समाहित और उपचारित करने की कोशिश करने में कसर नहीं छोड़तीं। अनु,  शुभा,  उपमा,  प्रीता, नीरू,  शर्मा जी आदि गढ़े गए पात्र गढ़ा हुए न लगना गीता के कहानीकार की सफलता है। पाठक इन कहानियों को अपने निकट घटता हुआ अनुभव करता है।
शिल्प की दृष्टि से चिप्पू की कहानियाँ 'गत' को 'आगत' तक पहुँचाती हैं। इनमें कहीं संस्मरण की झलक है, कहीं आत्मकथा की। प्रायः गीता की शिक्षिका कहानी में अपनी झलक दिखा देती है। पर्यायवाची शब्दों का प्रयोग, घटनाक्रम का परिवेश और पर्यावरण, प्रकृति चित्रण, शालेय छात्रों को अनुकूल सहज-सरल भाषा आदि इन कहानियों का वैशिष्ट्य है। गीता की कवयित्री भी यत्र-तत्र उपस्थित होकर 'कथा' को 'गीत' से संयुक्त करती है।

अंतर्दृष्टि कहानी में आँखों का वर्णन सरस निबंध की तरह है। यहाँ आँख के पर्यायवाची, आँख की उपयोगिता, दृष्टि के प्रकार आदि की विस्तृत चर्चा भी कहानी के विकास या रोचकता में बाधक नहीं होती। ग्यारह कहानियों साहस, प्रीता,  रुचिका, तलाश एक दिल की, चिप्पू, अंतर्दृष्टि, दर्द,  खुशियों के दीप, टुकू, उपमा तथा आत्मा में से टुकू पूरी तरह संस्मरण है।

कृति की साहित्यिकता को वैयक्तिक संबंधपरक अनुभूतियों से क्षति पहुँचती है। बेहतर हो कि शुभेच्छु जन श्रेय लेने या आशीष देने के स्थान पर रचना कर्म की समीक्षा करें, कहानियों पर बात करें । पाठ्य अशुद्धियाँ, बिंदी-चंद्रबिंदी के गलत प्रयोग खटकते हैं। चिप्पू गीता गीत का पहला कहानी संग्रह है, संभावना की दृष्टि से आश्वस्त हुआ जा सकता है कि आगामी कहानी संकलन में परिपक्व कहानियाँ मिलेंगी। अभिव्यक्ति सामर्थ्य, शब्द भंडार तथा घटित होते में कहानी खोजकर कहने की कला गीता में है। गीता के आगामी कहानी संकलन में कहानी कला का उत्कर्ष देखने की पूरी-पूरी संभावना है।
***
समीक्षक संपर्क: आचार्य संजीव वर्मा सलिल, विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, चलभाष: ७९९९५५९६१८।
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रविवार, 13 जनवरी 2019

व्यंग्य लेख माया महाठगिनी हम जानी

व्यंग्य लेख::
माया महाठगिनी हम जानी
संजीव
*
तथाकथित लोकतंत्र का राजनैतिक महापर्व संपन्न हुआ। सत्य नारायण कथा में जिस तरह सत्यनारायण को छोड़कर सब कुछ मिलता है, उसी तरह लोकतंत्र में लोक को छोड़कर सब कुछ प्राप्य है। यहाँ पल-पल 'लोक' का मान-मर्दन करने में निष्णात 'तंत्र की तूती बोलती है। कहा जाता है कि यह 'लोक का, लोक के द्वारा, लोक के लिए' है लेकिन लोक का प्रतिनिधि 'लोक' नहीं 'दल' का बंधुआ मजदूर होता है। लोकतंत्र के मूल 'लोक मत' को गरीब की लुगाई, गाँव की भौजाई मुहावरे की तरह जब-तब अपहृत और रेपित करना हर दल अपना जन्म सिद्ध अधिकार मानता है। ये दल राजनैतिक ही नहीं धार्मिक, आर्थिक, सामाजिक भी हो सकते हैं। जो दल जितना अधिक दलदल मचने में माहिर होता है, उसे खबरिया जगत में उतनी ही अधिक जगह मिलती है।
हाँ, तो खबरिया जगत के अनुसार 'लोक' ने 'सेवक' चुन लिए हैं। 'लोक' ने न तो 'रिक्त स्थान की विज्ञप्ति प्रसारित की, न चीन्ह-चीन्ह कर विज्ञापन दिए, न करोड़ों रूपए आवेदन पत्रों के साथ बटोरे, न परीक्षा के प्रश्न-पत्र लीक कर वारे-न्यारे किए, न साक्षात्कार में चयन के नाम पर कोमलांगियों के साथ शयन कक्ष को गुलजार किया, न किसी का चयन किया, न किसी को ख़ारिज किया और 'सेवक' चुन लिए। अब ये तथाकथित लोकसेवक-देशसेवक 'लोक' और 'देश' की छाती पर दाल दलते हुए, ऐश-आराम, सत्तारोहण, कमीशन, घपलों, घोटालों की पंचवर्षीय पटकथाएँ लिखेंगे। उनको राह दिखाएँगे खरबूजे को देखकर खरबूजे की तरह रंग बदलने में माहिर प्रशासनिक सेवा के धुरंधर, उनकी रक्षा करेंगा देश का 'सर्वाधिक सुसंगठित खाकी वर्दीधारी गुंडातंत्र (बकौल सर्वोच्च न्यायालय), उनका गुणगान करेगा तवायफ की तरह चंद टकों और सुविधाओं के बदले अस्मत का सौदा करनेवाला खबरॉय संसार और इस सबके बाद भी कोई जेपी या अन्ना सामने आ गया तो उसके आंदोलन को गैर कानूनी बताने में न चूकनेवाला काले कोटधारी बाहुबलियों का समूह।
'लोकतंत्र' को 'लोभतंत्र' में परिवर्तित करने की चिरकालिक प्रक्रिया में चारों स्तंभों में घनघोर स्पर्धा होती रहती है। इस स्पर्धा के प्रति समर्पण और निष्ठां इतनी है की यदि इसे ओलंपिक में सम्मिलित कर लिया जाए तो स्वर्णपदक तो क्या तीनों पदकों में एक भी हमारे सिवा किसी अन्य को मिल ही नहीं सकता। दुनिया के बड़े से बड़े देश के बजट से कहीं अधिक राशि तो हमारे देश में इस अघोषित व्यवसाय में लगी हुई है। लोकतंत्र के चार खंबे ही नहीं हमारे देश के सर्वस्व तीजी साधु-संत भी इस व्यवसाय को भगवदपूजन से अह्दिक महत्व देते हैं। तभी तो घंटो से पंक्तिबद्ध खड़े भक्त खड़े ही रह जाते हैं और पुजारी की अंटी गरम करनेवाले चाट मंगनी और पैट ब्याह से भाई अधिक तेजी से दर्शन कर बाहर पहुँच जाते हैं।
लोकतंत्र में असीम संभावनाएं होती है। इसे 'कोकतंत्र' में भी सहजता से बदला जाता रहा है। टिकिट लेने, काम करने, परीक्षा उत्तीर्ण करने, शोधोपाधि पाने, नियुक्ति पाने, चुनावी टिकिट लेने, मंत्री पद पाने, न्याय पाने या कर्ज लेने में कैसी भी अनियमितता या बाधा हो, बिस्तर गरम करते ही दूर हो जाती है। और तो और नवग्रहों की बाधा, देवताओं का कोप और किस्मत की मार भी पंडित, मुल्ला या पादरी के शयनागार को आबाद कर दूर की जा सकती है। जिस तरह आप के बदले कोई और जाप कर दे तो आपके संकट दूर हो जाते हैं, वैसे ही आप किसी और को भी इस गंगा में डुबकी लगाने भेज सकते हैं। देव लोक में तो एक ही इंद्र है पर इस नर लोक में जितने भी 'काम' करनेवाले हैं वे सब 'काम' करने के बदले 'काम' होने के पहले 'काम की आराधना कर भवसागर पार उतरने का कोी मौका नहीं गँवाते।धर्म हो या दर्शन दोनों में कामिनी के बिना काम नहीं बनता।
हमारी विरासत है कि पहले 'काम' को भस्म कर दो फिर विवाह कर 'काम' के उपासक बन जाओ या 'पहले काम' को साध लो फिर संत कहलाओं। कोई-कोई पुरुषोत्तम आश्रम और मजारों की छाया में माया से ममता करने का पुरुषार्थ करते हुए भी 'रमता जोगी, बहता पानी' की तरह संग रहते हुए भी निस्संग और दागित होते हुए भी बेदाग़ रहा आता है। एक कलिकाल समानता का युग है। यहाँ नर से नारी किसी भी प्रकार पीछे रहना नहीं चाहती। सर्वोच्च न्यायालय और कुछ करे न करे, ७० साल में राम मंदिर पर निर्णय न दे सके किन्तु 'लिव इन' और 'विवाहेतर संबंधों' पर फ़ौरन से पेश्तर फैसलाकुन होने में अतिदक्ष है।
'लोक' भी 'तंत्र' बिना रह नहीं सकता। 'काम' को कामख्या से जोड़े या काम सूत्र से, 'तंत्र' को व्यवस्था से जोड़े या 'मंत्र' से, कमल उठाए या पंजा दिखाए, कही एक को रोकने के लिए, कही दूसरे को साधने के लिए 'माया' की शरण लेना ही होती है, लाख निर्मोही बनने का दवा करो, सत्ता की चौखट पर 'ममता' के दामन की आवश्यकता पड़ ही जाती है। 'लोभ' के रास्ते 'लोक' को 'तंत्र' के राह पर धकेलना हो या 'तंत्र' के द्वारा 'लोक' को रौंदना हो ममता और माया न तो साथ छोड़ती हैं, न कोई उनसे पीछा छुड़ाना चाहता है। अति संभ्रांत, संपन्न और भद्र लोक जानता है कि उसका बस अपनों को अपने तक रोकने पर न चले तो वह औरों के अपनों को अपने तक पहुँचने की राह बनाने से क्यों चूके? हवन करते हाथ जले तो खुद को दोषी न मानकर सूर हो या कबीर कहते रहे हैं 'माया महाठगिनी हम जानी।'
***
संपर्क: विश्व वाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, salil.sanjiv@gmail.com ।

शनिवार, 12 जनवरी 2019

अंग्रेजी - छत्तीसगढ़ी

अंग्रेजी से छत्तीसगढ़ी सीखें:

छत्तीसगढ़ी ENGLISH 

स्पीकिंग कोर्स – मोर डहार ले…

Excuse me – एक कन सुन  तो

Let him go – जान दे किरहा ला

Fast – लकर धकर

Smooth – चिक्कन

Father – ददा ग

Resolved – निपट गे

Slapping – तान के राहपट म दे रोगहा ला

Let’s go – चलना बेटखई चल

Go – त ले रेंग ,

Wife – डौकी

Come here – एक्कनिक आतो

Same to same – दाई किरिया एकदम डीक्टो रे

Sunlight – घाम

Raining – रद रदा के गिरही

Go There – ओती जा

Very- खबखब ले, अब्बड़

Bed – गोदरी खटिया के दसना

Gate – कपाट ,राचर, फइरका

Neck – घेंच, नरी

Knee – माड़ी

Finger – अंगठी

Rat – मूसवा

Cat -बिलई

Dog- कुकुर

Cow- गरुआ

Sleep on- चल सुतना रे भोकवा

Good night- सुतना रे किरहा

Good morning- उठना रे अजरहा

Oh my god- हत रे निपोर

Quiet- कलेचुप

Pray- जोजियाना

Tail- पूछी

Acacia- बमरी रुक

Mango- आमा

Axe- कुदारी

Aunty – काकी

Boy- टुरा 

Girl- टुरी

Women- माईलोगिन

Man- बाबूपिला

Bed stead- खटिया

Broom- बहरी

Bone- हाडा

Face- थोथना

Liver- करेजा

Ayelash- बिरइन

Juice – झोर

Pigeon peas- राहेरदार

Honey- मंदरस

Wheat- गहू

Rise- चाउर

Betterment- परछी

Courtyard- अंगना

Cottage- खदर

Doorstill- देहरौठी

Eaves – छानही

Bathroom- नाहनी खोली

Kitchen- रंधनी खोली

Don’t worry -मोर रहत ले ते चिंता झन कर।

शुक्रवार, 11 जनवरी 2019

laghukatha

लघुकथा:
निपूती भली थी
*

बापू के निर्वाण दिवस पर देश के नेताओं, चमचों एवं अधिकारियों ने उनके आदर्शों का अनुकरण करने की शपथ ली. अख़बारों और दूरदर्शनी चैनलों ने इसे प्रमुखता से प्रचारित किया.

अगले दिन एक तिहाई अर्थात नेताओं और चमचों ने अपनी आँखों पर हाथ रख कर कर्तव्य की इति श्री कर ली. उसके बाद दूसरे तिहाई अर्थात अधिकारियों ने कानों पर हाथ रख लिए, तीसरे दिन शेष तिहाई अर्थात पत्रकारों ने मुँह पर हाथ रखे तो भारत माता प्रसन्न हुई कि देर से ही सही इन्हे सदबुद्धि तो आई.

उत्सुकतावश भारत माता ने नेताओं के नयनों पर से हाथ हटाया तो देखा वे आँखें मूंदे जनगण के दुःख-दर्दों से दूर सता और सम्पत्ति जुटाने में लीन थे. दुखी होकर भारत माता ने दूसरे बेटे अर्थात अधिकारियों के कानों पर रखे हाथों को हटाया तो देखा वे आम आदमी की पीडाओं की अनसुनी कर पद के मद में मनमानी कर रहे थे. नाराज भारत माता ने तीसरे पुत्र अर्थात पत्रकारों के मुँह पर रखे हाथ हटाये तो देखा नेताओं और अधिकारियों से मिले विज्ञापनों से उसका मुँह बंद था और वह दोनों की मिथ्या महिमा गा कर ख़ुद को धन्य मान रहा था.

अपनी सामान्य संतानों के प्रति तीनों की लापरवाही से क्षुब्ध भारत माता के मुँह से निकला- 'ऐसे पूतों से तो मैं निपूती ही भली थी.

* * * * *

प्रख्यात साहित्यकार माहेश्वर तिवारी जी का चर्चित नवगीत -एक तुम्हारा होन...

लावणी मुक्तिका

लावणी 
*
छंद विधान: यति १६-१४, समपदांती द्विपदिक मात्रिक छंद, पदांत नियम मुक्त

पुस्तक मेले में पुस्तक पर, पाठक-क्रेता गायब हैं। 
थानेदार प्रकाशक कड़ियल, विक्रेतागण नायब हैं।।

जहाँ भीड़ है वहाँ विमोचन, फोटो ताली माला है। 
इंची भर मुस्कान अधर पर, भाषण घंटों वाला है।। 

इधर-उधर ताके श्रोता, मीठा-नमकीन कहाँ कितना?
जितना मिलना माल मुफ्त का, उतना ही हमको सुनना।।

फोटो-सेल्फी सुंदरियों के, साथ खिंचा लो चिपक-चिपक। 
गुस्सा हो तो सॉरी कह दो, खोज अन्य को बिना हिचक।।

मुफ्त किताबें लो झोला भर, मगर खरीदो एक नहीं। 
जो पढ़ने को कहे समझ लो, कतई इरादे नेक नहीं।।

हुई देश में व्याप्त आजकल, लिख-छपने की बीमारी।
बने मियाँ मिट्ठू आपन मुँह, कविगण करते झखमारी।।

खुद अभिनंदन पत्र लिखा लो, ले मोमेंटो श्रीफल शाल। 
स्वल्पाहार हरिद्रा रोली, भूल न जाना मल थाल।।

करतल ध्वनि कर चित्र खींच ले, छपवा दे अख़बारों में। 
वह फोटोग्राफर खरीद लो, सज सोलह सिंगारों में।। 

जिम्मेदारी झोंक भाड़ में, भूलो घर की चिंता फ़िक्र। 
धन्य हुए दो ताली पाकर, तरे खबर में पाकर ज़िक्र।।
***
११.१.२०१९  

navgeet

नवगीत:
संजीव
.
दिशा न दर्शन
दीन प्रदर्शन
.
क्यों आये हैं?
क्या करना है??
ज्ञात न पर
चर्चा करना है
गिले-शिकायत
शिकवे हावी
यह अतीत था
यह ही भावी
मर्यादाओं का
उल्लंघन
.
अहंकार के
मारे सारे
हुए इकट्ठे
बिना बिचारे
कम हैं लोग
अधिक हैं बातें
कम विश्वास
अधिक हैं घातें
क्षुद्र स्वार्थों
हेतु निबंधन
.
चित्र गुप्त
सू रत गढ़ डाली
मनमानी
मूरत बनवा ली
आत्महीनता
आत्ममोह की
खुश होकर
पीते विष-प्याली
पल में गाली
पल में ताली
मंथनहीन
हुआ मन-मंथन

२९.१२. २०१४ जयपुर

navgeet

नवगीत:
संजीव

ग्रंथि श्रेष्ठता की 
पाले हैं 
.
कुटें-पिटें पर बुद्धिमान हैं
लुटे सदा फिर भी महान हैं
खाली हाथ नहीं संसाधन
मतभेदों का सर वितान है
दो-दो हाथ करें आपस में
जाने क्या गड़बड़
झाले हैं?
.
बातें बड़ी-बड़ी करते हैं
मनमानी का पथ वरते हैं
बना तोड़ते संविधान खुद
दोष दूसरों पर धरते हैं
बंद विचारों की खिड़की
मजबूत दिशाओं पर
ताले हैं
.
सच कह असच नित्य सब लेखें
शीर्षासन कर उल्टा देखें
आँख मूँद 'तूफ़ान नहीं' कह
शतुरमुर्ग निज पर अवरेखें
परिवर्तित हो सके न तिल भर
कर्म सकल देखे
भाले हैं.

14.30, 29.12.2014
panchayati dharmshala jaipur

muktika

मुक्तिका 
*
ज़िंदगी है बंदगी, मनुहार है.
बंदगी ही ज़िंदगी है, प्यार है.
सुबह-संझा देख अरुणिम आसमां
गीत गाए, प्रीत की झंकार है.
अचानक आँखें, उठीं, मिल, झुक गईं
अनकहे ही कह गयीं 'स्वीकार है'.
.
सांस सांसों में घुलीं, हमदम हुईं
महकता मन हुआ हरसिंगार है.
मौन तजकर मौन बरबस बोलता
नासमझ! इनकार ही इकरार है.
***

गुरुवार, 10 जनवरी 2019

अभियान साप्ताहिक कार्यक्रम

🌅☯🔔🌎🐚🕉🐚🌎🔔☯🌅
🌱✒ विश्ववाणी हिंदी संस्थान ✒🌱
   समन्वय प्रकाशन अभियान जबलपुर
📞७९९९५५९६१८, ९६६९२५१३१९ 📞
🌱📖🌱📖🌱📖🌱📖🌱
। जन्म ब्याह राखी तिलक, गृह प्रवेश त्यौहार। 
।। सलिल बचा पौधे लगा, दें पुस्तक उपहार।।
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संयोजक/संचालक:
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
अध्यक्ष: बसंत शर्मा
उपाध्यक्ष: जयप्रकाश श्रीवास्तव, सुरेश तन्मय
सचिव: मिथिलेश बड़गैया
मुख्यालय सचिव: छाया सक्सेना 
संगठन सचिव: विनीता श्रीवास्तव, शोभित वर्मा 
प्रचार सचिव: इंद्र बहादुर श्रीवास्तव, अविनाश ब्योहार
  ☀☔☂☔☂☔☂☔☂☔☀
   । हिंदी आटा माढ़िए, देशज मोयन डाल। 
  ।।सलिल संस्कृत सान दे, पूड़ी बने कमाल।।  
🌼🌺🌸🌼🌺🌸🌼🌺🌸🌼
रचना-समय: ७ बजे - १९ बजे तक।
पटल-प्रतिवेदन, सारांश, समीक्षा तथा अन्य प्रस्तुतियाँ: १९ बजे - ६ बजे तक।
-------------------------------------
दायित्व: सचेतक: पटल आरंभ करना।
पटल प्रबंधक: सवेरे पटल पर विषय सूचित करना, असंगत प्रस्तुति हटवाना, निरंतर अनुशासन भंग करने वालों को प्रतिबंधित करना, शान ६ बजे के बाद पटल प्रतिवेदन प्रस्तुत करना।
पटल प्रभारी: प्रस्तुतियों पर विमर्श करना, मतभेद होने पर सामंजस्य रखना, रचना-काल समाप्त होने पर गतिविधियों का सारांश प्रस्तुत करना।
सहभागी गण: निर्धारित अनुसार रचना प्रस्तुत करना, विमर्श करना, प्रभारी व प्रबंधक के परामर्श के अनुसार सक्रिय रहना, मतभेद को मतभेद न बनने देना।
-------------------------------------
सोमवार: रस, छंद, अलंकार, मुक्तक काव्य, मुक्तिका (हिंदी ग़ज़ल) आदि।     
प्रबंधक: मिथलेश बड़गैयाँ।      
प्रभारी:  छाया सक्सेना, मीना भट्ट, छगनलाल गर्ग  सिरोही  
समीक्षक: अमरनाथ लखनऊ।
-------------------------------------
मंगलवार: कहानी, लघुकथा, विज्ञान कथा, बाल कथा, लोक कथा, उपन्यास आदि।
प्रबंधक:राजकुमार महोबिआ।
प्रभारी: विनीता श्रीवास्तव, छाया त्रिवेदी, राजलक्ष्मी शिवहरे।
समीक्षक: चंद्रकांता अग्निहोत्री पंचकूला, कांता राय भोपाल।
-------------------------------------
बुधवार:  गीत, नवगीत, बाल गीत, राष्ट्रीय गीत, लोक गीत, प्रबंधकाव्य, खंडकाव्य, महाकाव्य आदि। 
प्रबंधक: अविनाश ब्योहार।
प्रभारी: जयप्रकाश श्रीवास्तव,  सुरेश तन्मय, अनिल मिश्र उमरिया।
समीक्षक: संजीव तनहा एटा, राजा अवस्थी कटनी।
----------------------------------                        
गुरुवार: निबंध, व्यंग्य लेख, रिपोर्ताज, साक्षात्कार, नाटक, संस्मरण, पर्यटन वृत्त, जीवनी पत्र साहित्य आदि। 
प्रबंधक: विवेकरंजन श्रीवास्तव। 
प्रभारी:  रमेश श्रीवास्तव 'चातक' सिवनी, रामकुमार
चतुर्वेदी सिवनी। 
समीक्षक: राजेंद्र वर्मा लखनऊ, प्रतुल श्रीवास्तव।
-------------------------------------
शुक्रवार: पुस्तक-पत्रिका व साहित्यिक समूह चर्चा, भाषा ,व्याकरण, मुहावरे, सुभाषित, तकनीकी लेख। 
प्रबंधक: प्रो. शोभित वर्मा।
प्रभारी; , सुरेंद्र सिंह पवार, रामकुमार वर्मा।         
समीक्षक: डॉ. अनामिका तिवारी, अवनीश 'अकेला' मेरठ।
---------------------------------
शनिवार: कविता, क्षणिका, अन्य भाषाओँ के छंद (माहिया, लावणी, सॉनेट, हाइकु आदि)
प्रबंधक: छाया सक्सेना।
प्रभारी:  विजय बागरी, इंद्रबहादुर श्रीवास्तव, मनोज शुक्ल।  
समीक्षक: देवकीनंदन 'शांत' लखनऊ, गुरु सक्सेना गाडरवारा।
-------------------------------------
रविवार:  संगीत (गायन, वादन), नृत्य, चित्रकला,
ऑडियो/वीडियो, पर्यावरण, गृह सज्जा, पाक कला आदि।
प्रबंधक: बसंत शर्मा।  
प्रभारी: शरद भटनागर मेरठ, अखिलेश खरे कटनी,  संतोष शुक्ला ग्वालियर।
समीक्षक:  अरुण अर्णव खरे बेंगलुरु , डॉ. स्मृति शुक्ल।
-------------------------------------

गीत-नमन

नमन
*
नमन,
न मन तो भी करें
नम न अहम् सब व्यर्थ।
*
व्यर्थ
अहम् का वहम है
आप न होता नष्ट।
आप आपको,
अन्य सब
को भी देता कष्ट।।
पता न चलता
अहम् से
कब क्या हुआ अनिष्ट?
गत देखें
करता रहा
अहम् सदैव अनर्थ।
नमन
न मन तो भी करें
नम न अहम् सब व्यर्थ।।
*
व्यर्थ नहीं
कण मात्र भी,
कण-कण में मौजूद।
वही
न जिसके बिना है
कोई कहीं वजूद।।
नादां!
सच को समझ ले
व्यर्थ मत उछल-कूद।
केवल वह
दूजा यहाँ,
कोई नहीं समर्थ।
नमन
न मन तो भी करें
नम न अहम् सब व्यर्थ।।
***

अभियान गुरुवार

 🌅🌱🌳🌺🐚🕉🐚🌺🌳🌱🌅
 🇮🇳विश्ववाणी हिंदी संस्थान अभियान🇮🇳                        📖 समन्वय प्रकाशन जबलपुर 📖                         ☀पौष शुक्ल षष्ठी वि. सं. २०७५☀                        🌺 शनिवार, १२ जनवरी २०१९ 🌺                       🐚  🌸  आज की विधाएँ। 🌸  🐚                    यांत्रिकी वास्तु चिकित्सा पर्यावरण पुुुुरातत्व                 उद्यानिकी-वानिकी विकास समाज परिवार।               -----------------------------------------                                  🌻  - : पटल प्रबंधक : - 🌻                                         🌻शोभित वर्मा 🌻                                           🌺 - : पटल प्रभारी : - 🌺                              🌺डॉ़.अजय जायसवाल गाडरवारा🌺                         🌺 इं. अनिल खंडेलवाल इंदौर 🌺                                   🌸 - : समीक्षक : - 🌸                                 🌸 इं. अरुण अर्णव खरे भोपाल 🌸                                      🌸 🌸🌸🌸🌸

🌱🍃🍀☘☔☘🍀🍃☘
। पौष छठी तिथि की सुबह, बीस पचहत्तर साल।
।।बारह जनवरी दो सहस, रवि-ऊषा द्वय लाल।।      🌾🎋🌴🌵🦚🌵🌴🎋🌾

🌅 🇮🇳 दायित्व - संकेत 🇮🇳 🌅
🛎पटल सचेतक: छाया सक्सेना 🛎
🛎 प्रबंधक : निर्धारित विधाओं की रचनाओं को प्रोत्साहित करना, अन्य सामग्री हटवाना। विधाओं की जानकारी देना। विवाद रोकना। पटल प्रतिवेदन प्रस्तुत करना।
✍🏻 प्रभारी: प्रस्तुतियों पर प्रतिक्रिया देना, कमी इंगित करना, सुधार सुझाना, अनावश्यक विमर्श व विवाद रोकना। समर्थ रचनाकारों को पटल से जोड़ना।
🖋 समीक्षक: रचनाओं को निष्पक्षता से परखकर यथावश्यक सुझाव देना।
✒ सहभागी: विधा-विषयगत रचनाएँ प्रस्तुत करना, पढ़कर अभिमत देना, स्वस्थ विमर्श करना। संयोजक, प्रबंधक, प्रभारी को सहयोग देना।
===========================
स्थायी स्तंभ: मुहावरे,  एक शब्द कई अर्थ,  कुछ शब्दों के लिए एक शब्द, चित्र पर रचना, समस्या पूर्ति आदि।
🥢📖📝🖋🦚🖋📝📖🥢

  

🙏🙌🌅⏰✍🏻📖🕉📝🎤🛎🌅🙌🙏

संस्मरण: हिंदी क्यों?

संस्मरण
हिंदी क्यों?
*
शहर का श्रेष्ठ-उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, कड़े अनुशासन हेतु प्रसिद्ध प्राचार्य का कार्यालय कक्ष।
एक विद्यार्थी ने अवकाश दिनों में गृहनगर से बाहर यात्रा करने के लिए रेलवे किराए में छात्रों को देय किराया रियायत हेतु आवेदन करते हुए कारण बताया "सर!  मेरे पिता जी थर्ड क्लास गवर्नमेंट अॉफीसर हैं, इसलिए मैं इस रियायत का पात्र हूँ।"
सुनकर प्राचार्य चौंके, मोटे काँचवाले चश्मे से झाँकते हुए बोले "क्या कहा? फिर से सोच कर बोलो?"
बच्चा प्राचार्य के स्वर से समझ गया कुछ गड़बड़ हो गई है। उसे मौन देख प्राचार्य ने फिर कहा "डरकर चुप मत रहो, सोचकर कहो क्या कहना चाहते हो?"
बच्चे ने पल भर सोचकर कहा "मुझे छुट्टी में बाहर जाना है, पिताजी तृतीय श्रेणी अधिकारी हैं।"
"ठीक है" आवेदन पर हस्ताक्षर करते हुए प्राचार्य ने कहा "क्लास थ्री और थर्ड क्लास में बहुत अंतर होता है। अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग जरूरी नहीं है। बात सही कहो भले ही हिंदी में कहो।"
विद्यार्थी ने बात गाँठ बाँध ली। जब भी किसी को अंग्रेजी या उर्दू के शब्दों का गलत प्रयोग करते देखता, टोंकता, हिंदी बोलने-लिखने के लिए प्रोत्साहित करता है। वह समझ चुका है कि हिंदी क्यों?
*****

संस्मरण: हिंदी क्यों

संस्मरण
हिंदी क्यों?
*
अभियांत्रिकी महाविद्यालय, थर्मोडायनामिक्स की प्रायोगिक परीक्षा के बाद मौखिक साक्षात्कार। बाह्य परीक्षक द्वारा पूछे गए प्रश्न के उत्तर में परीक्षार्थी ने 'वाटर वेपर' शब्द का प्रयोग किया। परीक्षक ने रोकते हुए दुबारा उत्तर देने को कहा।
परीक्षार्थी ने उत्तर दिया तो परीक्षक बोला 'सोचकर बोलो, जैसे का तैसा नहीं'।
परीक्षार्थी ने इस बार वही उत्तर दिया पर 'वाटर वेपर' के स्थान पर 'स्टीम' कहा।
ठीक है, तुम फिर 'वाटर वेपर' कहते तो फेल हो जाते। परीक्षक ने कहा।
शब्द कोश में 'स्टीम' और 'वाटर वेपर' दोनों का अर्थ 'भाप' है। भाप के लिए 'स्टीम' और 'वाटर वेपर' दोनों शब्द प्रयोग किए जाते हैं।
विद्यार्थी तकनीकी शिक्षा का माध्यम हिंदी कराने और हिंदी की तकनीकी लेखन सामर्थ्य वृद्धि की बात निरंतर करता है किंतु तथाकथित समझदार आज भी पूछता हैं हिंदी क्यों?
***

व्यंग्य लेख: गरीबी हटाओ और गरीबनवाजू

व्यंग्य लेख:
गरीबी हटाओ और गरीबनवाजू
*
तुलसी बब्बा कह गए 'होइहे वही जो राम रचि राखा' मतलब यह कि हम तुच्छ नश्वर  कायाधारियों के क्या औकात जो हम कुछ कर सकें। लुटने-पिटने-मिटने लुट-पिट-कट रहे हैं तो इसलिए कि राम ने ऐसा ही रचनाएँ रखा है।
'गरीबी हटाओ' की घोषणा के बाद भी गरीबी न हटी तो घोषणाकर्ता का क्या दोष? दोषी तो राम जी हैं जिन्होंने गरीब और गरीबी को रच रखा है। हम रामभक्त राम के काम को गलत कैसे कह सकते हैं? गरीबों को गरीबी से परहेज है तो सरकार क्या करे?
सर कार पर बैठकर बेसर-पैर की बातें करने के लिए इसीलिए तशरीफ लाते हैं कि गरीब परवर हैं।
तुलसी राम को गरीबनवाजू कहते हैं तो राम गरीबों को अमीर बनाकर अपना रुतबा क्यों घटाएँ? आप ही कहें जब राम जी गरीबनवाजू कहलाने के लिए लोगों को गरीब बनाए रखते हैं तो हम रामभक्त  सरकार बनाने और बचाने के लिए वायदों को जुमला बता दें तो क्या गलत है?
राम ने केवट को अवसर दिया कि वह बिना उतराई लिए गंगा पार कराए, चरणों को धोकर  पिए और खुद को धन्य माने। राम के भक्त काम का परंपरा का पालन करें और कलियुग के पापी उसे शोषण कहें तो यह उनकी दृष्टि का दोष है।
राम ने शबरी की कुटिया में जाकर जूठे बेर तक नहीं छोड़े, छककर भोग लगाया और बिना दाम चुकाए गुडबाई,  टाटा कर लिया। वाल्मीकि से लेकर मुरारी बापू तक किसी ने राम को दोष नहीं दिया। शबरी वंशजों से रामभक्त येन-केन मत लेते हैं तो कम से कम आश्वासन तो देते हैं। इतना ही नहीं हम गरीबपरवर तो छिप-छिपाकर कंबल और दारू भी बाँट देते हैं। इतनी उदारता को बाद भी हमें आदिवासी समाज का शोषक कहा जाए तो घोर अन्याय है।
राम का काम करते जटायु शहीद हुए तो भी राम ने उन्हें कुछ नहीं दिया। हमने तो अपने काम में काम आए मीसाबंदियों को पेंशन दी। चीन्ह-चीन्ह कर रेवड़ी बाँटने का आरोप लगानेवाले भी तो चीन्ह-चीन्ह कर टिकिट बाँटता हैं। ऐसा न होता तो मामा जी के पुनर्जन्म प्राप्ति यग्य में भांजे-भांजी भाँजी न मारते।
मैथिलीशरण जी कहते हैं  'जो है जहाँ राम रहते हैं, वहीं राज वे करते हैं'। राम का गुण काम भत्ते में भी होना ही चाहिए। इसलिए हम रामभक्त जहाँ रहते हैं वहाँ राज्य करने को अपना जन्म सिद्ध अधिकार मानते हैं। गोवा में सबसे बड़े दल को मिले जनादेश को मिट्टी में मिलाकर हमने रामभक्त का अभूतपूर्व उदाहरण प्रस्तुत किया है।
राम हमारे और हम राम के हैं। इसलिए अपना काम साधने के लिए राम के नाम को भुनाना हमारा एकाधिकार है।
हम राम मंदिर बनाने का अवसर माँग सत्ता में आएँ,  मंदिर न बनाएँ, राम के नाम को बार-बार भुनाएँ, मंदिर बनाएँ या न बनाएँ किसी के बाप का क्या जाता है? यह हमारे और राम जी के बीच की बात है।
राम ने एक बार धरती पर आकर जो कुछ भोगा उसके बाद वे दुबारा अवतार लेने की गल्ती तो करेंगे नहीं जो हमें रोक सकें और अगर दुबारा आ ही गए तो हम उन्हें राम मानने से ही इंकार कर देंगे।
हमें ऐसा करने से कोई नहीं रोक सकता, तुलसी बब्बा कह गए हैं 'राम से अधिक राम कर दासा' सो हमारे इंकार को राम भी स्वीकार में नहीं बदल सकते।
हम शुद्ध समानतावादी हैं। नीरव हो या अंबानी,  हम बिना किसी भेदभाव के सबको गले लगा लेते हैं। शिवसेना हो या ममता काम न हो तो सबको धता बता देते हैं। चौकीदार होते हुए भी राजकुमार को आरोपों के कटघरे में घेरकर शाह के साथी बना लेते हैं। बात
गरीबी हटाने की हो या गरीबनवाजू होने की, राम और राम मंदिर हाशिए पर थे और हैं लेकिन इसकी फिक्र हम क्यों करें? तुलसी कह ही गए हैं 'होइहै सोई जे काम रचि राखा' ।
*****
१० जनवरी २०१९