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शुक्रवार, 14 मई 2021

अक्षय तृतीया

अक्षय तृतीया 

वैशाख शुक्ल तृतीया को अक्षय तृतीया, अखती या आखा तीज  कहते हैं। यह बसंत ऋतु के समापन तथा ग्रीष्मारंभ के आरम्भ अर्थात ऋतु परिवर्तन का पर्व है। भविष्य पुराण के अनुसार इस तिथि की युगादि तिथियों में गणना होती है, सतयुग और त्रेता युग का प्रारंभ इसी तिथि से हुआ है। इस दिन किए शुभ कार्य का अक्षय फल मिलता है। सभी बारह महीनों की शुक्ल पक्षीय तृतीया शुभ होती है, किन्तु वैशाख माह की तिथि स्वयंसिद्ध मुहूर्त मान्य है। इस दिन सब शुभ व मांगलिक कार्य जैसे विवाह, गृह-प्रवेश, वस्त्र-आभूषणों की खरीददारी या घर, भूखण्ड, वाहन, नवीन वस्त्र, आभूषण आदि का क्रय, नई संस्था, समाज, कार्यक्रम आदि की स्थापना या उदघाटन का कार्य श्रेष्ठ फलप्रद होता है। इस दिन पितरों को किया गया तर्पण तथा पिन्डदान अथवा किसी और प्रकार का दान, अक्षय फल प्रदान करता है। इस दिन गंगा स्नान करने से तथा भगवत पूजन से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। इस दिन किया गया जप, तप, हवन, स्वाध्याय और दान भी अक्षय हो जाता है। यह तिथि यदि सोमवार तथा रोहिणी नक्षत्र के दिन आए तो इस दिन किए गए दान, जप-तप का फल बहुत अधिक बढ़ जाता हैं। यदि यह तृतीया मध्याह्न से पहले शुरू होकर प्रदोष काल तक रहे तो बहुत ही श्रेष्ठ मानी जाती है। आज मनुष्य अपने या स्वजनों द्वारा किए गए जाने-अनजाने अपराधों की सच्चे मन से ईश्वर से क्षमा प्रार्थना करे तो भगवान उसके अपराधों को क्षमा कर देते हैं और उसे सदगुण प्रदान करते हैं। आज के दिन अपने दुर्गुणों को भगवान के चरणों में सदा के लिए अर्पित कर उनसे सदगुणों का वरदान माँगन चाहिए।

अक्षय तृतीया के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर समुद्र या गंगा स्नान करने के बाद भगवान विष्णु की शान्त चित्त होकर विधि विधान से पूजा करने का प्रावधान है। नैवेद्य में जौ या गेहूँ का सत्तू, ककड़ी और चने की दाल अर्पित किया जाता है। गुरु या विद्वानों को भोजन कराकर फल, फूल, बरतन, वस्त्र, गौ, भूमि, स्वर्ण आदि का दानकर भोजन दक्षिणा आदि  कल्याणकारी व पुण्यदायी  होता है। इस दिन सत्तू अवश्य खाने तथा नए वस्त्र-आभूषण पहनने की परंपरा है। परिवर्तित होते मौसम के अनुसार अक्षय तृतीया के दिन जल से भरे घड़े, कुल्हड़, सकोरे, पंखे, खडाऊँ, छाता, चावल, नमक, घी, खरबूजा, ककड़ी, चीनी, साग, इमली, सत्तू आदि गरमी में लाभकारी वस्तुओं का दान पुण्यकारी माना गया है। इस दान के पीछे यह लोक विश्वास है कि इस दिन जिन-जिन वस्तुओं का दान किया जाएगा, वे समस्त वस्तुएँ स्वर्ग या अगले जन्म में प्राप्त होगी। इस दिन लक्ष्मी नारायण की पूजा सफेद कमल अथवा सफेद गुलाब या पीले गुलाब से करना चाहिए।

सर्वत्र शुक्ल पुष्पाणि प्रशस्तानि सदार्चने।

दानकाले च सर्वत्र मन्त्र मेत मुदीरयेत्॥

अर्थात सभी महीनों की तृतीया में सफेद पुष्प से किया गया पूजन प्रशंसनीय माना गया है।


लोक मान्यता है कि अक्षय तृतीया पर अपने अच्छे आचरण और सद्गुणों से दूसरों का आशीर्वाद लेना अक्षय रहता है। भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा विशेष फलदायी मानी गई है। इस दिन किया गया आचरण और सत्कर्म अक्षय रहता है। 
भगवान विष्णु के नर-नारायण रूप, हयग्रीव, परशुराम, ब्रह्माजी के पुत्र अक्षय कुमार आदि का आविर्भाव इसी दिन हुआ। आज श्री बद्रीनाथ जी की का पूजन और श्री लक्ष्मी नारायण के दर्शन किए जाते हैं। प्रसिद्ध तीर्थ स्थल बद्रीनारायण के कपाट अखती से ही पुनः खुलते हैं। वृन्दावन स्थित श्री बाँकेबिहारी जी मन्दिर में केवल इसी दिन श्री विग्रह के चरण दर्शन होते हैं, शेष पूरे वर्ष वस्त्रों से ढके रहते हैं। जी.एम. हिंगे के अनुसार तृतीया ४१ घटी २१ पल होती है तथा धर्म सिन्धु एवं निर्णय सिन्धु ग्रन्थ के अनुसार अक्षय तृतीया ६ घटी से अधिक होना चाहिए। पद्म पुराण के अनुसा इस तृतीया को अपराह्न व्यापिनी मानना चाहिए। इसी दिन महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ था और द्वापर युग का समापन भी इसी दिन हुआ था। मदनरत्न के अनुसार:


अस्यां तिथौ क्षयमुर्पति हुतं न दत्तं। तेनाक्षयेति कथिता मुनिभिस्तृतीया॥

उद्दिष्य दैवतपितृन्क्रियते मनुष्यैः। तत् च अक्षयं भवति भारत सर्वमेव॥

प्रचलित कथाएँ

अक्षय तृतीया की कथा के अनुसार प्राचीन काल में एक धर्मदास नामक वैश्य था। उसकी सदाचार, देव और ब्राह्मणों के प्रति काफी श्रद्धा थी। इस व्रत के महात्म्य को सुनने के पश्चात उसने इस पर्व के आने पर गंगा में स्नान करके विधिपूर्वक देवी-देवताओं की पूजा की, व्रत के दिन स्वर्ण, वस्त्र तथा दिव्य वस्तुएँ ब्राह्मणों को दान में दी। अनेक रोगों से ग्रस्त तथा वृद्ध होने के बावजूद भी उसने उपवास करके धर्म-कर्म और दान पुण्य किया। यही वैश्य दूसरे जन्म में कुशावती का राजा बना। कहते हैं कि अक्षय तृतीया के दिन किए गए दान व पूजन के कारण वह बहुत धनी प्रतापी बना। वह इतना धनी और प्रतापी राजा था कि त्रिदेव तक उसके दरबार में अक्षय तृतीया के दिन ब्राह्मण का वेष धारण करके उसके महायज्ञ में शामिल होते थे। अपनी श्रद्धा और भक्ति का उसे कभी घमण्ड नहीं हुआ और महान वैभवशाली होने के बावजूद भी वह धर्म मार्ग से विचलित नहीं हुआ। यही राजा आगे चलकर राजा चंद्रगुप्त के रूप में पैदा हुआ।

स्कंद पुराण और भविष्य पुराण के अनुसार वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया को रेणुका के गर्भ से भगवान विष्णु ने परशुराम रूप में जन्म लिया। कोंकण और चिप्लून के परशुराम मंदिरों में अखती को परशुराम के आविर्भाव की कथा श्रवण, पूजा करअर्घ्य देने का माहात्म्य माना गया है। सौभाग्यवती स्त्रियाँ और क्वारी कन्याएँ इस दिन गौरी-पूजा कर धातु या मिट्टी के कलश में जल, फल, फूल, तिल, अन्न, मिठाई, और भीगे हुए चने बाँटती हैं। एक कथा के अनुसार परशुराम की माता और विश्वामित्र की माता को पूजन के बाद प्रसाद देते समय ऋषि ने प्रसाद बदल कर दे दिया था जिसके प्रभाव से परशुराम ब्राह्मण होते हुए भी क्षत्रिय स्वभाव के थे और क्षत्रिय पुत्र होने के बाद भी विश्वामित्र ब्रह्मर्षि कहलाए। सीता स्वयंवर के समय परशुराम जी अपना धनुष बाण श्री राम को समर्पित कर संन्यासी हो गए थे। 

जैन धर्म में अक्षय-तृतीया

अक्षय तृतीया के दिन जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ श्री ऋषभदेव भगवान ने सत्य व अहिंसा का प्रचार करने एवं अपने कर्म बन्धनों को तोड़ने के लिए संसार के भौतिक एवं पारिवारिक सुखों का त्याग कर जैन वैराग्य अंगीकार कर लिया। सत्य और अहिंसा के प्रचार करते-करते आदिनाथ प्रभु हस्तिनापुर गजपुर पधारे जहाँ इनके पौत्र सोमयश का शासन था। प्रभु का आगमन सुनकर सम्पूर्ण नगर दर्शनार्थ उमड़ पड़ा। सोमयश के पुत्र राजकुमार श्रेयांस कुमार ने प्रभु  आदिनाथ को पहचान लिया और तत्काल शुद्ध आहार के रूप में प्रभु को गन्ने का रस दिया, लगभग ४००  दिवस की तपस्या के पश्चात  इक्षु शोरडी (गन्ने के  रस) से आदिनाथ ने व्रत का पारायण किया।  इस कारण यह दिन इक्षु तृतीया एवं अक्षय तृतीया के नाम से विख्यात हो गया। जैन धर्म में इसे वर्षीतप कहा जाता है। जैन धर्मावलम्बी वर्षीतप की आराधना कर अपने को धन्य समझते हैं। यह तपस्या प्रति वर्ष कार्तिक के कृष्ण पक्ष की अष्टमी से आरम्भ होती है और दूसरे वर्ष वैशाख के शुक्लपक्ष की अक्षय तृतीया के दिन पारायण कर पूर्ण की जाती है। तपस्या आरम्भ करने से पूर्व इस बात का पूर्ण ध्यान रखा जाता है कि प्रति मास की चौदस को उपवास करना आवश्यक होता है। इस प्रकार का वर्षीतप करीबन १३ मास और दस दिन का हो जाता है। उपवास में केवल गर्म पानी का सेवन किया जाता है। भारत वर्ष में इस प्रकार की वर्षी तपश्चर्या करने वालों की संख्या हज़ारों तक पहुँच जाती है। यह तपस्या धार्मिक दृष्टिकोण से अन्यक्त महत्त्वपूर्ण है, वहीं आरोग्य जीवन बिताने के लिए भी उपयोगी है। संयम जीवनयापन करने के लिए इस प्रकार की धार्मिक क्रिया करने से मन को शान्त, विचारों में शुद्धता, धार्मिक प्रवृत्रियों में रुचि और कर्मों को काटने में सहयोग मिलता है। मन, वचन एवं श्रद्धा से वर्षीतप करने वाले को महान समझा जाता है।

लोक जीवन में

बड़े-बुजुर्ग अपने पुत्र-पुत्रियों के लगन (विवाह) का मांगलिक कार्य आरंभ कर देते हैं। छोटे बच्चे भी पूरी रीति-रिवाज के साथ अपने गुड्‌डा-गुड़िया का विवाह रचाते हैं। इस प्रकार गाँवों में बच्चे सामाजिक कार्य व्यवहारों को स्वयं सीखते व आत्मसात करते हैं। परिवार के साथ-साथ पूरा का पूरा गाँव भी बच्चों के द्वारा रचे गए वैवाहिक कार्यक्रमों में सम्मिलित हो जाता है। अक्षय तृतीया सामाजिक व सांस्कृतिक शिक्षा का अनूठा त्यौहार है। कृषक समुदाय आने वाले वर्ष के आगमन, कृषि पैदावार आदि के शगुन देखते हैं। इस दिन जो सगुन कृषकों को मिलते हैं, वे शत-प्रतिशत सत्य होते हैं। राजपूत समुदाय में आने वाला वर्ष सुखमय हो, इसलिए इस दिन शिकार पर जाने की परंपरा है।

विभिन्न प्रान्तों में अक्षय तृतीया

बुन्देलखण्ड में अक्षय तृतीया से प्रारम्भ होकर पूर्णिमा तक धूमधाम से उत्सव मनाया जाता है, जिसमें कुँवारी कन्याएँ अपने भाई, पिता तथा गाँव-घर और कुटुम्ब के लोगों को शगुन बाँटती हैं और गीत गाती हैं। अक्षय तृतीया को राजस्थान में वर्षा के लिए शगुन निकाला जाता है, वर्षा की कामना की जाती है, लड़कियाँ झुण्ड बनाकर घर-घर जाकर शगुन गीत गाती हैं और लड़के पतंग उड़ाते हैं। यहाँ इस दिन सात तरह के अन्नों से पूजा की जाती है। मालवा में नए घड़े के ऊपर खरबूजा और आम के पल्लव रख कर पूजा होती है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन कृषि कार्य का आरम्भ किसानों को समृद्धि देता है।

*

गुरुवार, 13 मई 2021

सुखदा छंद

छंद सलिला:
सुखदा छंद
संजीव
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छंद-लक्षण: जाति महारौद्र, प्रति चरण मात्रा २२ मात्रा, यति १२-१०, चरणांत गुरु (यगण, मगण, रगण, सगण)
लक्षण छंद:
सुखदा बारह-दस यति, मन की बात कहे
गुरु से करें पद-अंत, मंज़िल निकट रहे
उदाहरण:
१. नेता भ्रष्ट हुए जो / उनको धुनना है
जनसेवक जो सच्चे / उनको सुनना है
सोच-समझ जनप्रतिनिधि, हमको चुनना है
शुभ भविष्य के सपने, उज्ज्वल बुनना है
२. कदम-कदम बढ़ना है / मंज़िल पग चूमे
मिल सीढ़ी चढ़ना है, मन हँसकर झूमे
कभी नहीं डरना है / मिल मुश्किल जीतें
छंद-कलश छलकें / 'सलिल' नहीं रीतें
३. राजनीति सुना रही / स्वार्थ क राग है
देश को झुलसा रही, द्वेष की आग है
नेतागण मतलब की , रोटियाँ सेंकते
जनता का पीड़ा-दुःख / दल नहीं देखता
*********
१३-५-२०१४
(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अरुण, अवतार, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उड़ियाना, उपमान, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, कुकुभ, कज्जल, कामिनीमोहन, कीर्ति, कुण्डल, कुडंली, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, चंद्रायण, छवि, जग, जाया, तांडव, तोमर, त्रिलोकी, दीप, दीपकी, दोधक, दृढ़पद, नित, निधि, निश्चल, प्लवंगम्, प्रतिभा, प्रदोष, प्रभाती, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदनअवतार, मधुभार, मधुमालती, मनहरण घनाक्षरी, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली, माया, माला, मोहन, योग, ऋद्धि, रसामृत, राजीव, राधिका, रामा, लीला, वाणी, विरहणी, विशेषिका, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शास्त्र, शिव, शुभगति, सरस, सार, सिद्धि, सुखदा, सुगति, सुजान, संपदा, हरि, हेमंत, हंसगति, हंसी)

मधुमालती छंद, मनमोहन छंद, मनोरम छंद, मानव छंद, माली (राजीवगण) छंद,

रसानंद दे छंद नर्मदा ८१:
दोहा, ​सोरठा, रोला, ​आल्हा, सार​,​ ताटंक (चौबोला), रूपमाला (मदन), चौपाई​, ​हरिगीतिका, उल्लाला​, गीतिका, ​घनाक्षरी, बरवै, त्रिभंगी, सरसी, छप्पय, भुजंगप्रयात, कुंडलिनी, सवैया, शोभन/सिंहिका, सुमित्र, सुगीतिका , शंकर, मनहरण (कवित्त/घनाक्षरी), उपेन्द्रव​​ज्रा, इंद्रव​​ज्रा, सखी​, विधाता/शुद्धगा, वासव​, ​अचल धृति​, अचल​​, अनुगीत, अहीर, अरुण, अवतार, ​​उपमान / दृढ़पद, एकावली, अमृतध्वनि, नित, आर्द्रा, ककुभ/कुकभ, कज्जल, कमंद, कामरूप, कामिनी मोहन (मदनावतार), काव्य, वार्णिक कीर्ति, कुंडल, गीता, गंग, चण्डिका, चंद्रायण, छवि (मधुभार), जग, जाया, तांडव, तोमर, त्रिलोकी, दिग्पाल / दिक्पाल / मृदुगति, दीप, दीपकी, दोधक, निधि, निश्चल, प्लवंगम, प्रतिभा, प्रदोष, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदनाग छंदों से साक्षात के पश्चात् मिलिए मधुमालती छंद से
मधुमालती छंद
*
छंद-लक्षण: जाति मानव, प्रति चरण मात्रा १४ मात्रा, यति ७-७, चरणांत गुरु लघु गुरु (रगण) होता है.
लक्षण छंद:
मधुमालती आनंद दे
ऋषि साध सुर नव छंद दे
चरणांत गुरु लघु गुरु रहे
हर छंद नवउत्कर्ष दे।
उदाहरण:
१. माँ भारती वरदान दो
सत्-शिव-सरस हर गान दो
मन में नहीं अभिमान हो
घर-अग्र 'सलिल' मधु गान हो।
२. सोते बहुत अब तो जगो
खुद को नहीं खुद ही ठगो
कानून को तोड़ो नहीं-
अधिकार भी छोडो नहीं
**************
शारदे माँ
कल्पना भट्ट
*
माँ शारदे! वरदान दो
सदबुद्धि दो, सँग ज्ञान दो
मन में नहीं अभिमान हो
शुभ-अशुभ की पहचान दो।
वाणी मधुर रसवान दो
'मैं' का नहीं गुण गान हो
बच्चे अभी नादान हैं
निर्मल मधुर मुस्कान दो
किसको पता हम कौन हैं
अपनी हमें पहचान दो
हम अल्प ज्ञानी माँ! हमें
निज चरण में तुम स्थान दो ।।
************
रसानंद दे छंद नर्मदा ८२:
दोहा, ​सोरठा, रोला, ​आल्हा, सार​,​ ताटंक (चौबोला), रूपमाला (मदन), चौपाई​, ​हरिगीतिका, उल्लाला​, गीतिका, ​घनाक्षरी, बरवै, त्रिभंगी, सरसी, छप्पय, भुजंगप्रयात, कुंडलिनी, सवैया, शोभन/सिंहिका, सुमित्र, सुगीतिका , शंकर, मनहरण (कवित्त/घनाक्षरी), उपेन्द्रव​​ज्रा, इंद्रव​​ज्रा, सखी​, विधाता/शुद्धगा, वासव​, ​अचल धृति​, अचल​​, अनुगीत, अहीर, अरुण, अवतार, ​​उपमान / दृढ़पद, एकावली, अमृतध्वनि, नित, आर्द्रा, ककुभ/कुकभ, कज्जल, कमंद, कामरूप, कामिनी मोहन (मदनावतार), काव्य, वार्णिक कीर्ति, कुंडल, गीता, गंग, चण्डिका, चंद्रायण, छवि (मधुभार), जग, जाया, तांडव, तोमर, त्रिलोकी, दिग्पाल / दिक्पाल / मृदुगति, दीप, दीपकी, दोधक, निधि, निश्चल, प्लवंगम, प्रतिभा, प्रदोष, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदनाग, मधुमालती छंदों से साक्षात के पश्चात् मिलिए मनमोहन छंद से
मनमोहन छंद
*
छंद-लक्षण: जाति मानव, प्रति चरण मात्रा १४ मात्रा, यति ८-६, चरणांत लघु लघु लघु (नगण) होता है.
लक्षण छंद:
रासविहारी, कमलनयन
अष्ट-षष्ठ यति, छंद रतन
अंत धरे लघु तीन कदम
नतमस्तक बलि, मिटे भरम.
उदाहरण:
१. हे गोपालक!, हे गिरिधर!!
हे जसुदासुत!, हे नटवर!!
हरो मुरारी! कष्ट सकल
प्रभु! प्रयास हर करो सफल.
२. राधा-कृष्णा सखी प्रवर
पार्थ-सुदामा सखा सुघर
दो माँ-बाबा, सँग हलधर
लाड लड़ाते जी भरकर
३. कंकर-कंकर शंकर हर
पग-पग चलकर मंज़िल वर
बाधा-संकट से मर डर
नीलकंठ सम पियो ज़हर
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रसानंद दे छंद नर्मदा ८३:
दोहा, ​सोरठा, रोला, ​आल्हा, सार​,​ ताटंक (चौबोला), रूपमाला (मदन), चौपाई​, ​हरिगीतिका, उल्लाला​, गीतिका, ​घनाक्षरी, बरवै, त्रिभंगी, सरसी, छप्पय, भुजंगप्रयात, कुंडलिनी, सवैया, शोभन/सिंहिका, सुमित्र, सुगीतिका , शंकर, मनहरण (कवित्त/घनाक्षरी), उपेन्द्रव​​ज्रा, इंद्रव​​ज्रा, सखी​, विधाता/शुद्धगा, वासव​, ​अचल धृति​, अचल​​, अनुगीत, अहीर, अरुण, अवतार, ​​उपमान / दृढ़पद, एकावली, अमृतध्वनि, नित, आर्द्रा, ककुभ/कुकभ, कज्जल, कमंद, कामरूप, कामिनी मोहन (मदनावतार), काव्य, वार्णिक कीर्ति, कुंडल, गीता, गंग, चण्डिका, चंद्रायण, छवि (मधुभार), जग, जाया, तांडव, तोमर, त्रिलोकी, दिग्पाल / दिक्पाल / मृदुगति, दीप, दीपकी, दोधक, निधि, निश्चल, प्लवंगम, प्रतिभा, प्रदोष, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदनाग, मधुमालती, मनमोहन छंदों से साक्षात के पश्चात् मिलिए मनोरम छंद से
मनोरम छंद
*
छंद-लक्षण: समपाद मात्रिक छंद, जाति मानव, प्रति चरण मात्रा १४ मात्रा, चरणारंभ गुरु, चरणांत गुरु लघु लघु या लघु गुरु गुरु होता है.
लक्षण छंद:
हैं भुवन चौदह मनोरम
आदि गुरु हो तो मिले मग
हो हमेश अंत में अंत भय
लक्ष्य वर लो बढ़ाओ पग
उदाहरण:
१. साया भी साथ न देता
जाया भी साथ न देता
माया जब मन भरमाती
काया कब साथ निभाती
२. सत्य तज मत 'सलिल' भागो
कर्म कर फल तुम न माँगो
प्राप्य तुमको खुद मिलेगा
धर्म सच्चा समझ जागो
३. लो चलो अब तो बचाओ
देश को दल बेच खाते
नीति खो नेता सभी मिल
रिश्वतें ले जोड़ते धन
४. सांसदों तज मोह-माया
संसदीय परंपरा को
आज बदलो, लोक जोड़ो-
तंत्र को जन हेतु मोड़ो
************************
रसानंद दे छंद नर्मदा ८४:
दोहा, ​सोरठा, रोला, ​आल्हा, सार​,​ ताटंक (चौबोला), रूपमाला (मदन), चौपाई​, ​हरिगीतिका, उल्लाला​, गीतिका, ​घनाक्षरी, बरवै, त्रिभंगी, सरसी, छप्पय, भुजंगप्रयात, कुंडलिनी, सवैया, शोभन/सिंहिका, सुमित्र, सुगीतिका , शंकर, मनहरण (कवित्त/घनाक्षरी), उपेन्द्रव​​ज्रा, इंद्रव​​ज्रा, सखी​, विधाता/शुद्धगा, वासव​, ​अचल धृति​, अचल​​, अनुगीत, अहीर, अरुण, अवतार, ​​उपमान / दृढ़पद, एकावली, अमृतध्वनि, नित, आर्द्रा, ककुभ/कुकभ, कज्जल, कमंद, कामरूप, कामिनी मोहन (मदनावतार), काव्य, वार्णिक कीर्ति, कुंडल, गीता, गंग, चण्डिका, चंद्रायण, छवि (मधुभार), जग, जाया, तांडव, तोमर, त्रिलोकी, दिग्पाल / दिक्पाल / मृदुगति, दीप, दीपकी, दोधक, निधि, निश्चल, प्लवंगम, प्रतिभा, प्रदोष, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदनाग, मधुमालती, मनमोहन, मनोरम छंदों से साक्षात के पश्चात् मिलिए मानव छंद से
मानव छंद
*
छंद-लक्षण: समपाद मात्रिक छंद, जाति मानव, प्रति चरण मात्रा १४ मात्रा, चरणारंभ गुरु, चरणांत गुरु लघु लघु या लघु गुरु गुरु होता है.
लक्षण छंद:
हैं भुवन चौदह मनोरम
आदि गुरु हो तो मिले मग
हो हमेश अंत में अंत भय
लक्ष्य वर लो बढ़ाओ पग
उदाहरण:
१. साया भी साथ न देता
जाया भी साथ न देता
माया जब मन भरमाती
काया कब साथ निभाती
२. सत्य तज मत 'सलिल' भागो
कर्म कर फल तुम न माँगो
प्राप्य तुमको खुद मिलेगा
धर्म सच्चा समझ जागो
३. लो चलो अब तो बचाओ
देश को दल बेच खाते
नीति खो नेता सभी मिल
रिश्वतें ले जोड़ते धन
४. सांसदों तज मोह-माया
संसदीय परंपरा को
आज बदलो, लोक जोड़ो-
तंत्र को जन हेतु मोड़ो
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रसानंद दे छंद नर्मदा ८५:
​दोहा, ​सोरठा, रोला, ​आल्हा, सार​,​ ताटंक (चौबोला), रूपमाला (मदन), चौपाई​, ​हरिगीतिका, उल्लाला​, गीतिका, ​घनाक्षरी, बरवै, त्रिभंगी, सरसी, छप्पय, भुजंगप्रयात, कुंडलिनी, सवैया, शोभन/सिंहिका, सुमित्र, सुगीतिका , शंकर, मनहरण (कवित्त/घनाक्षरी), उपेन्द्रव​​ज्रा, इंद्रव​​ज्रा, सखी​, विधाता/शुद्धगा, वासव​, ​अचल धृति​, अचल​​, अनुगीत, अहीर, अरुण, अवतार, ​​उपमान / दृढ़पद, एकावली, अमृतध्वनि, नित, आर्द्रा, ककुभ/कुकभ, कज्जल, कमंद, कामरूप, कामिनी मोहन (मदनावतार), काव्य, वार्णिक कीर्ति, कुंडल, गीता, गंग, चण्डिका, चंद्रायण, छवि (मधुभार), जग, जाया, तांडव, तोमर, त्रिलोकी, दिग्पाल / दिक्पाल / मृदुगति, दीप, दीपकी, दोधक, निधि, निश्चल, प्लवंगम, प्रतिभा, प्रदोष, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदनाग, मधुमालती, मनमोहन, मनोरम, मानव छंदों से साक्षात के पश्चात् मिलिए माली (राजीवगण) छंद से
माली (राजीवगण) छंद
*
छंद-लक्षण: जाति मानव, प्रति चरण मात्रा १८ मात्रा, यति ९ - ९
लक्षण छंद:
प्रति चरण मात्रा, अठारह रख लें
नौ-नौ पर रहे, यति यह परख लें
राजीव महके, परिंदा चहके
माली-भ्रमर सँग, तितली निरख लें
उदाहरण:
१. आ गयी होली, खेल हमजोली
भीगा दूं चोली, लजा मत भोली
भरी पिचकारी, यूँ न दे गारी,
फ़िज़ा है न्यारी, मान जा प्यारी
खा रही टोली, भांग की गोली
मार मत बोली,व्यंग्य में घोली
तू नहीं हारी, बिरज की नारी
हुलस मतवारी, डरे बनवारी
पोल क्यों खोली?, लगा ले रोली
प्रीती कब तोली, लग गले भोली
२. कर नमन हर को, वर उमा वर को
जीतकर डर को, ले उठा सर को
साध ले सुर को, छिपा ले गुर को
बचा ले घर को, दरीचे-दर को
३. सच को न तजिए, श्री राम भजिए
सदग्रन्थ पढ़िए, मत पंथ तजिए
पग को निरखिए, पथ भी परखिए
कोशिशें करिए, मंज़िलें वरिये

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मुक्तक

मुक्तक सलिला:
दिल ही दिल
संजीव
*
तुम्हें देखा, तुम्हें चाहा, दिया दिल हो गया बेदिल
कहो चाहूँगा अब कैसे, न होगा पास में जब दिल??
तुम्हें दिलवर कहूँ, तुम दिलरुबा, तुम दिलनशीं भी हो
सनम इंकार मत करना, मिले परचेज का जब बिल
*
न देना दिल, न लेना दिल, न दिलकी डील ही करना
न तोड़ोगे, न टूटेगा, नहीँ कुछ फ़ील ही करना
अभी फर्स्टहैंड है प्यारे, तुम सैकेंडहैंड मत करना
न दरवाज़ा खुला रखना, न कोई दे सके धऱना
*
न दिल बैठा, न दिल टूटा, न दहला दिल, कहूँ सच सुन
न पूछो कैसे दिल बहला?, न बोलूँ सच , न झूठा सुन,
रहे दिलमें अगर दिलकी, तो दर्दे-दिल नहीं होगा
कहो संगदिल भले ही तुम, ये दिल कातिल नहीँ होगा
*
लगाना दिल न चाहा, दिल लगा कब? कौन बतलाये??
सुनी दिल की, कही दिल से, न दिल तक बात जा पाये।
ये दिल भाया है जिसको, उसपे क्यों ये दिल नहीं आया?
ये दिल आया है जिस पे, हाय! उसको दिल नहीं भाया।
१३-५-२०१४
***
रही दिल की हमेशा दिल में, दिल सुनकर नहीं सुनता
नहीं दिल तोड़ता सपने अगरचे दिल नहीं बुनता
दिलों ने दिल ही तोड़े हैं न फेविकोल से जोड़े-
सुखाता दिल न दलहन सा, न दिल गम से अगर घुनता
*
न ए वी एम में है दिल, गनीमत आप यह मानें
जो होता फेल हो जाता, फजीहत आप हाथ ठानें
न बाई पास हो पाता, न बदला वाल्व ही जाता
मुसीबत दिल की दिल करता, केजरी-कपिल हो जाता
*
१३-५-२०१७

गीति रचना

एक गीति रचना:
करो सामना
संजीव
*
जब-जब कंपित भू हुई
हिली आस्था-नीव
आर्तनाद सुनते रहे
बेबस करुणासींव
न हारो करो सामना
पूर्ण हो तभी कामना
ध्वस्त हुए वे ही भवन
जो अशक्त-कमजोर
तोड़-बनायें फिर उन्हें
करें परिश्रम घोर
सुरक्षित रहे जिंदगी
प्रेम से करो बन्दगी
संरचना भूगर्भ की
प्लेट दानवाकार
ऊपर-नीचे चढ़-उतर
पैदा करें दरार
रगड़-टक्कर होती है
धरा धीरज खोती है
वर्तुल ऊर्जा के प्रबल
करें सतत आघात
तरु झुक बचते, पर भवन
अकड़ पा रहे मात
करें गिर घायल सबको
याद कर सको न रब को
बस्ती उजड़ मसान बन
हुईं प्रेत का वास
बसती पीड़ा श्वास में
त्रास ग्रस्त है आस
न लेकिन हारेंगे हम
मिटा देंगे सारे गम
कुर्सी, सिल, दीवार पर
बैंड बनायें तीन
ईंट-जोड़ मजबूत हो
कोने रहें न क्षीण
लचीली छड़ें लगाओ
बीम-कोलम बनवाओ
दीवारों में फंसायें
चौखट काफी दूर
ईंट-जुड़ाई तब टिके
जब सींचें भरपूर
रैक-अलमारी लायें
न पल्ले बिना लगायें
शीश किनारों से लगा
नहीं सोइए आप
दीवारें गिर दबा दें
आप न पायें भाँप
न घबरा भीड़ लगायें
सजग हो जान बचायें
मेज-पलंग नीचे छिपें
प्रथम बचाएं शीश
बच्चों को लें ढांक ज्यों
हुए सहायक ईश
वृद्ध को साथ लाइए
ईश-आशीष पाइए
***
१३-५-२०१५

लघुकथा

लघुकथा
कानून के रखवाले
*
'हमने आरोपी को जमकर सबक सिखाया, उसके कपड़े तक ख़राब हो गये, बोलती बंद हो गयी। अब किसी की हिम्मत नहीं होगी हमारा विरोध करने की। हम किसी को अपना विरोध नहीं करने देंगे।' वक्ता की बात पूर्ण होने के पूर्व हो एक जागरूक श्रोता ने पूछा- ''आपका संविधान और कानून के जानकार है और अपने मुवक्किलों को उसके न्याय दिलाने का पेशा करते हैं। कृपया, बताइये संविधान के किस अनुच्छेद या किस कानून की किस कंडिका के तहत आपको एक सामान्य नागरिक होते हुए अन्य नागरिक विचाराभिव्यक्ति से रोकने और खुद दण्डित करने का अधिकार प्राप्त है? क्या आपसे असहमत अन्य नागरिक आपके साथ ऐसा ही व्यवहार करे तो वह उचित होगा? यदि नागरिक विवेक के अनुसार एक-दूसरे को दण्ड देने के लिए स्वतंत्र हैं तो शासन, प्रशासन और न्यायालय किसलिए है? ऐसी स्थिति में आपका पेशा ही समाप्त हो जायेगा। आप क्या कहते हैं?
प्रश्नों की बौछार के बीच निरुत्तर-नतमस्तक खड़े थे कानून के तथाकथित रखवाले।
***
१३-५-२०१६

मुक्तिका

मुक्तिका
संजीव
*
जितने चेहरे उतने रंग
सबकी अलग-अलग है जंग
*
ह्रदय एक का है उदार पर
दिल दूजे का बेहद तंग
*
यह जिसका हो रहा सहायक
वह इससे है बेहद तंग
*
चिथड़ों में भी लाज ढकी है
आधुनिका वस्त्रों में नंग
*
जंग लगी जिसके दिमाग में
वह औरों से छेड़े जंग
*
बेढंगे में छिपा न दिखता
खोज सको तो खोजो ढंग
*
नेह नर्मदा 'सलिल' स्वच्छ है
मलिन हो गयी सुरसरि गंग
***
१३.५.२०१६

नवगीत

नवगीत:
संजीव
.
खून-पसीने की कमाई
कर में देते जो
उससे छपते विज्ञापन में
चहरे क्यों हों?
.
जिन्हें रात-दिन
काटा करता
सत्ता और कमाई कीड़ा
आँखें रहते
जिन्हें न दिखती
आम जनों को होती पीड़ा
सेवा भाव बिना
मेवा जी भर लेते हैं
जन के मन में ऐसे
लोलुप-बहरे क्यों हों?
.
देश प्रेम का सलिल
न चुल्लू भर
जो पीते
मतदाता को
भूल स्वार्थ दुनिया
में जीते
जन-जीवन है
बहती 'सलिला'
धार रोकते बाधा-पत्थर
तोड़ी-फेंको, ठहरे क्यों हों?
*
१३-५-२०१५ 

नवगीत

नवगीत:
छोड़ दें थोड़ा...
संजीव 'सलिल'
* *
जोड़ा बहुत,
छोड़ दें थोड़ा...
*
चार कमाना, एक बाँटना
जो बेहतर हो वही छाँटना
मँझधारों-भँवरों से बचना-
बिसरे तन्नक घाट-बाट ना
यही सिखाया परंपरा ने
जुत तांगें में
बनकर घोड़ा...
*
जब-जब अंतर्मुखी हुए हो
तब एकाकी दुखी हुए हो
मायावी दुनिया का यह सच
बहिर्मुखी हो सुखी हुए हो
पाठ पढ़ाया पराsपरा ने
कुंभकार ने
रच-घट फोड़ा...
*
मेघाच्छादित आसमान सच
सूर्य छिपा ऊषा से लुक-बच
चैन न लेने हवा दे रही 
मेघ बिचारा थकता है नच 
पुरवैया ने
मारा कोड़ा...
*
१३-५-२०१२ 

बुधवार, 12 मई 2021

स्वतंत्रता समर व सत्याग्रह में जबलपुर के कायस्थों का योगदान

 

************
एका जबलपुर - विकास जबलपुर



भारतीय स्वतंत्रता अमृत महोत्सव २०२०-२०२१
स्वतंत्रता समर व सत्याग्रह में जबलपुर के कायस्थों का योगदान
************
भारतीय स्वतंत्रता की अमृत जयंती वर्ष के अवसर पर भारत की स्वतन्त्रता प्राप्ति में जबलपुर के कायस्थों के योगदान की झलक प्रस्तुत करती स्मरणिका तैयार की जा रही है। इस हेतु जबलपुर में जन्मे / कार्यरत रहे / बसे कायस्थ शहीदोड़ों तथा सत्याग्रहियों के चित्र तथा संक्षिप्त परिचय (नाम, जन्म तिथि, मूल स्थान, माता-पिता-जीवनसाथी के नाम, शिक्षा, आजीविका, प्रकाशित पुस्तकें, उपलब्धियाँ, डाक का पता, दूरभाष/चलभाष क्रमांक, ईमेल आदि) आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' वॉट्सऐप ९४२५१-८३२४४ ईमेल salil.sanjiv@gmail.com या राजीव लाल वॉट्सऐप ९४२५८ ६४३६४ पर अविलंब उपलब्ध कराएँ। यह सामग्री भावी पीढ़ियों को अपने पूर्वजों के अवदान की जानकारी उपलब्ध कराएगी।
जबलपुर जिले तथा संभाग में स्थित चित्रगुप्त मंदिरों, कार्यरत कायस्थ संस्थाओं संबंधी जानकारी भी आमंत्रित है।
************
०१. चिदंबरम पिल्लै                                           १९०७, रासबिहारी घोष, १६.१२.१९१६ नजरबंद जबलपुर, १९२३ झंडा सत्याग्रह।  
०२. शिवप्रसाद वर्मा, वकील, सिहोरा  १९०७, रासबिहारी घोष, १६.१२.१९१६ नजरबंद लखनादौन १९२३ झंडा सत्याग्रह।  
०३. शलेंद्रनाथ घोष, बी ए शिक्षक हितकारिणी गिरफ्तार १६.१२.१९१६ नजरबंद जबेरा १६ माह, कवितायें, २ नाटक।
०४. प्रफुल्ल कुमार चक्रवर्ती राली ब्रदर्स की दुकान में बाबू  १६.१२.१९१६ नजरबंद बरेला। 
०५. मास्टर देवीचरण सिंह शिक्षक हितकारिणी १६.१२.१९१६ नजरबंद धुंआ, खंडवा गए, दिवंगत १९१९। 
०६. नलिनिमोहन मुकर्जी बनारस में कैद, आजन्म कारावास। बंगाली ब्राह्मण। 
०७. नलिनीकांत घोष गोहाटी में कैद 
०८. विनायक राव कपले बी ए रॉबर्ट्सन कॉलेज 
०९. ब्योहार रघुबीर सिंह 
१०. शिव प्रसाद वर्मा अध्यक्ष जबलपुर जिला कांग्रेस कमेटी १९२२  
११. रायबहादुर माता प्रसाद सिन्हा मैनपुरी त्रिपुरी में कार्यकर्ता
१२. ज्ञान चंद वर्मा 
१३. सुरेश चंद्र मुखर्जी 
१४. राधिका प्रसाद वर्मा 
१५. ब्योहार राजेंद्र सिंह 
१६. नर्मदा प्रसाद खरे 
१७. मोहन सिन्हा  
१८. स्वराज्य चंद्र वर्मा 
१९. रामानुज लाल श्रीवास्तव 'ऊँट बिलहरीवी'   लोकमत १८.२.१९३०, प्रेमा १९३२ 
२०. ज्वाला प्रसाद वर्मा, होजरी दुकान बड़ा फुहारा, ८.९.१९३० - २७.९.३० कैद दमोह जेल, २०/- जुर्माना 
२१. डॉ. विनय रंजन सेन 
२२. महेश प्रसाद निगम त्रिपुरी कार्यकर्ता, नर्मदा स्नान करते डूबे 
२३. बृजबिहारी श्रीवास्तव 
२४. नारायण प्रसाद वर्मा 
२५. शंभू प्रसाद श्रीवास्तव 
२६. बृजेन्द्र श्रीवास्तव 
२७. बैजनाथ प्रसाद (सक्सेना छिंदवाड़ा)
२८. डी. ए. एस. कुलकर्णी 
२९. गणेश प्रसाद श्रीवास्तव 
३०. गया प्रसाद वर्मा   
३१. बद्रीप्रसाद श्रीवास्तव 
३२. जगमोहन प्रसाद सिन्हा काराबोह, छिंदवाड़ा 
३३. शकुन्तला वर्मा 
३४. श्रीमती राधा रानी वर्मा पत्नी विजय बहादुर वर्मा 
३५. शकुंतला खरे 
३६. विष्णुकांत वर्मा  
३७. जंगबहादुर वर्मा पिता रामकुमार वर्मा 
३८.    

हिंदी साहित्य के विकास में जबलपुर के कायस्थों का योगदान

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एका जबलपुर - विकास जबलपुर



भारतीय स्वतंत्रता अमृत महोत्सव २०२०-२०२१
हिंदी साहित्य के विकास में जबलपुर के कायस्थों का योगदान
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भारतीय स्वतंत्रता की अमृत जयंती वर्ष के अवसर पर हिंदी साहित्य के विकास में जबलपुर के कायस्थों के योगदान की झलक प्रस्तुत करती स्मरणिका तैयार की जा रही है। इस हेतु जबलपुर में जन्मे / कार्यरत रहे / बसे कायस्थ साहित्यकारों के चित्र तथा संक्षिप्त परिचय (नाम, जन्म तिथि, मूल स्थान, माता-पिता-जीवनसाथी के नाम, शिक्षा, आजीविका, प्रकाशित पुस्तकें, उपलब्धियाँ, डाक का पता, दूरभाष/चलभाष क्रमांक, ईमेल आदि) आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' वॉट्सऐप ९४२५१-८३२४४ ईमेल salil.sanjiv@gmail.com या राजीव लाल वॉट्सऐप ९४२५८ ६४३६४ पर अविलंब उपलब्ध कराएँ। यह सामग्री भावी पीढ़ियों को अपने पूर्वजों के अवदान की जानकारी उपलब्ध कराएगी।
जबलपुर जिले तथा संभाग में स्थित चित्रगुप्त मंदिरों, कार्यरत कायस्थ संस्थाओ, संबंधी जानकारी भी आमंत्रित है।
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०१. महादेव प्रसाद श्रीवास्तव 'सामी'  २०.७.१८९५ - २.१०.१९७१  कलामे-सामी १९७३ 
०२. उषादेवी मित्रा                             
 

दोहा सलिला

 दोहा सलिला

*
मंगल है मंगल करें, विनती मंगलनाथ
जंगल में मंगल रहे, अब हर पल रघुनाथ
सभ्य मनुज ने कर दिया, सर्वनाश सब ओर
फिर हो थोड़ा जंगली, हो उज्जवल हर भोर
संपद की चिंता करें, पल-पल सब श्रीमंत
अवमूल्यित हैं मूल्य पर, बढ़ते मूल्य अनंत
नया एक पल पुराना, आजीवन दे साथ
साथ न दे पग तो रहे, कैसे उन्नत माथ?
रह मस्ती में मस्त मन, कभी न होगा पस्त
तज न दस्तकारी मनुज, दो-दो पाकर दस्त
***
संजीव
१२-५-२०२०

दोहा, मुक्तक

दोहा सलिला 
*
जब चाहा संवाद हो, होता वाद-विवाद
निर्विवाद में भी मिला, हमको छिपा विवाद.
१२-५-२०१५
मुक्तक:
संजीव
.
कलकल बहते निर्झर गाते
पंछी कलरव गान सुनाते गान
मेरा भारत अनुपम अतुलित
लेने जन्म देवता आते
.
ऊषा-सूरज भोर उगाते
दिन सपने साकार कराते
सतरंगी संध्या मन मोहे
चंदा-तारे स्वप्न सजाते
.
एक साथ मिल बढ़ते जाते
गिरि-शिखरों पर चढ़ते जाते
सागर की गहराई नापें
आसमान पर उड़ मुस्काते
.
द्वार-द्वार अल्पना सजाते
रांगोली के रंग मन भाते
चौक पूरते करते पूजा
हर को हर दिन भजन सुनाते
.
शब्द-ब्रम्ह को शीश झुकाते
राष्ट्रदेव पर बलि-बलि जाते
धरती माँ की गोदी खेले
रेवा माँ में डूब नहाते
***
१२-५-२०१५

नवगीत कब होंगे आज़ाद?

नवगीत
कब होंगे आज़ाद???...
संजीव 'सलिल'
*
कब होंगे आजाद?
कहो हम
कब होंगे आजाद?
*
गए विदेशी पर देशी
अंग्रेज कर रहे शासन
भाषण देतीं सरकारें पर दे
न सकीं हैं राशन
मंत्री से संतरी तक कुटिल
कुतंत्री बनकर गिद्ध-
नोच-खा रहे
भारत माँ को
ले चटखारे स्वाद
कब होंगे आजाद?
कहो हम
कब होंगे आजाद?
*
नेता-अफसर दुर्योधन हैं,
जज-वकील धृतराष्ट्र
धमकी देता सकल राष्ट्र
को खुले आम महाराष्ट्र
आँख दिखाते सभी
पड़ोसी, देख हमारी फूट-
अपने ही हाथों
अपना घर
करते हम बर्बाद
कब होंगे आजाद?
कहो हम
कब होगे आजाद?
*
खाप और फतवे हैं अपने
मेल-जोल में रोड़ा
भष्टाचारी चौराहे पर खाए
न जब तक कोड़ा
तब तक वीर शहीदों के
हम बन न सकेंगे वारिस-
श्रम की पूजा हो
समाज में
ध्वस्त न हो मर्याद
कब होंगे आजाद?
कहो हम
कब होंगे आजाद?
*
पनघट फिर आबाद हो
सकें, चौपालें जीवंत
अमराई में कोयल कूके,
काग न हो श्रीमंत
बौरा-गौरा साथ कर सकें
नवभारत निर्माण-
जन न्यायालय पहुँच
गाँव में
विनत सुनें फ़रियाद-
कब होंगे आजाद?
कहो हम
कब होंगे आजाद?
*
रीति-नीति, आचार-विचारों
भाषा का हो ज्ञान
समझ बढ़े तो सीखें
रुचिकर धर्म प्रीति
विज्ञान
सुर न असुर, हम आदम
यदि बन पायेंगे इंसान-
स्वर्ग तभी तो
हो पायेगा
धरती पर आबाद
कब होंगे आजाद?
कहो हम
कब होंगे आजाद?
**************

महेश किशोर शर्मा

शोकांजलि 
महेश किशोर शर्मा जी के महाप्रस्थान पर
























भोला था स्वभाव जिनका वे श्री महेश जी नहीं रहे 
व्यथा कथा लक्ष्मी भौजी के मन की बोलो कौन कहे
कोरोना मैया क्या कर रईं?, कितनों को ले जाओगी?
शांत शीतला हुईं, आप भी शीघ्र शांत हो, सुत न दहे 

अग्रज जाते, हमको कहिए कौन मार्ग दिखलाएगा 
अनुज जा रहे, कंधों पर फिर हमको कौन उठाएगा?
परेशान यम गण बेचारे, निश-दिन करते काम थके-
कुछ अवकाश उन्हें दो, मानव भी कुछ राहत पाएगा 

अश्रु पोंछने कैसे जाएँ?, रोक लगी है मत निकलो 
घर में बैठ बहाओ आँसू, व्यथा-ताप पाकर पिघलो 
कठिन परीक्षा की बेला है, भौजी मन में धैर्य धरें -
बच्चे-बहुएँ, नाती-पोते, गहो विरासत झट सम्हलो 
१२-५-२०२१ 
***

मंगलवार, 11 मई 2021

बाल गीत: लँगड़ी खेलें

बाल गीत:
लँगड़ी खेलें.....
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
आओ! हम मिल
लँगड़ी खेलें.....
*
एक पैर लें
जमा जमीं पर।
रखें दूसरा
थोडा ऊपर।
बना संतुलन
निज शरीर का-
आउट कर दें
तुमको छूकर।
एक दिशा में
तुम्हें धकेलें।
आओ! हम मिल
लँगड़ी खेलें.....
*
आगे जो भी
दौड़ लगाये।
कोशिश यही
हाथ वह आये।
बचकर दूर न
जाने पाए-
चाहे कितना
भी भरमाये।
हम भी चुप रह
करें झमेले।
आओ! हम मिल
लँगड़ी खेलें.....
*
हा-हा-हैया,
ता-ता-थैया।
छू राधा को
किशन कन्हैया।
गिरें धूल में,
रो-उठ-हँसकर,
भूलें- झींकेगी
फिर मैया।
हर पल 'सलिल'
ख़ुशी के मेले।
आओ! हम मिल
लँगड़ी खेलें.....
*************

बाल कविता मुहावरा कौआ स्नान

बाल कविता
मुहावरा कौआ स्नान
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
कौआ पहुँचा नदी किनारे, शीतल जल से काँप-डरा रे!
कौवी ने ला कहाँ फँसाया, राम बचाओ फँसा बुरा रे!!
*
पानी में जाकर फिर सोचे, व्यर्थ नहाकर ही क्या होगा?
रहना काले का काला है, मेकप से मुँह गोरा होगा। .
*
पूछा पत्नी से 'न नहाऊँ, क्यों कहती हो बहुत जरूरी?'
पत्नी बोली आँख दिखाकर 'नहीं चलेगी अब मगरूरी।।'
*
नहा रहे या बेलन, चिमटा, झाड़ू लाऊँ सबक सिखाने
कौआ कहे 'न रूठो रानी! मैं बेबस हो चला नहाने'
*
निकट नदी के जाकर देखा पानी लगा जान का दुश्मन
शीतल जल है, करूँ किस तरह बम भोले! मैं कहो आचमन?
*
घूर रही कौवी को देखा पैर भिगाये साहस करके
जान न ले ले जान!, मुझे जीना ही होगा अब मर-मर के
*
जा पानी के निकट फड़फड़ा पंख दूर पल भर में भागा
'नहा लिया मैं, नहा लिया' चिल्लाया बहुत जोर से कागा
*
पानी में परछाईं दिखाकर बोला 'डुबकी आज लगाई
अब तो मेरा पीछा छोडो, ओ मेरे बच्चों की माई!'
*
रोनी सूरत देख दयाकर कौवी बोली 'धूप ताप लो
कहो नर्मदा मैया की जय, नाहक मुझको नहीं शाप दो'
*
गाय नर्मदा हिंदी भारत भू पाँचों माताओं की जय
भागवान! अब दया करो चैया दो तो हो पाऊँ निर्भय
*
उसे चिढ़ाने कौवी बोली' आओ! संग नहा लो-तैर'
कर ''कौआ स्नान'' उड़ा फुर, अब न निभाओ मुझसे बैर
*
बच्चों! नित्य नहाओ लेकिन मत करना कौआ स्नान
रहो स्वच्छ, मिल खेलो-कूदो, पढ़ो-बढ़ो बनकर मतिमान
-----------------------

मुक्तक, गीत

मुक्तक
भारत का धन जो विदेश में उसको भारत लायेंगे.
रामदेव बाबा के संग हम सच की अलख जगायेंगे..
'सलिल'-साधना पूरी हो संकल्प सभी जन-गण ले अब-
राजनीति हो लोकनीति, हम नया सवेरा लायेंगे..
११-५-२०११

*
गीत:
ओ मेरे मन...  
*
धूप-छाँव सम सुख-दुःख आते-जाते रहते.
समय-नदी में लहर-भँवर प्रति पल हैं बहते.
राग-द्वेष से बच, शुभ का कर चिंतन.
ओ मेरे मन...
*
पुलक मिलन में, विकल विरह में तपना-दहना.
ऊँच-नीच को मौन भाव से चुप हो सहना.
बात दूसरों की सुन, खुद भी कर मन-मंथन.
ओ मेरे मन...
*
पीर-व्यथा अपने मन की मत जगसे कहना?
यादों की उजली चादर को फिर-फिर तहना.
दुनियावालों! दुनियादारी करती उन्मन.
ओ मेरे मन...
११-५-२०१२ 
*

दोहे गीता अध्याय २

 ॐ
श्रीमद्भग्वद्गीता  
*
छोटा मन रखकर कभी, बड़े न होते आप। 
औरों के पैरों कभी, खड़े न होते आप।।  
*
भीष्म भरम जड़ यथावत, ठुकराएँ बदलाव। 
अहंकार से ग्रस्त हो, खाते-देते घाव
*
अर्जुन संशय पूछता प्रश्न, न करता कर्म। 
मोह और आसक्ति को समझ रहा निज धर्म
*
पल-पल परिवर्तन सतत, है जीवन का मूल
कंकर हो शंकर कभी, और कभी हो धूल
*
उहापोह में भटकता, भूल रहा निज कर्म। 
चिंतन कर परिणाम का, करता भटक विकर्म
*
नहीं करूँगा युद्ध मैं, कहता धरकर शस्त्र। 
सम्मुख योद्धा हैं अगिन, लिए हाथ में अस्त्र
*
जो जन्मा वह मरेगा, उगा सूर्य हो अस्त। 
कब होते विद्वानजन, सोच-सोचकर त्रस्त
*
मिलीं इन्द्रियाँ इसलिए, कर उनसे तू कर्म। 
फल क्या होगा इन्द्रियाँ, सोच न करतीं धर्म
*
चम्मच में हो भात या, हलवा परसें आप।  
शोक-हर्ष सकता नहीं, है चम्मच में व्याप
*
मीठे या कटु बोल हों, माने कान समान। 
शोक-हर्ष करता नहीं, मन मत बन नादान
*
जीवन की निधि कर्म है, करते रहना धर्म। 
फल का चिन्तन व्यर्थ है, तज दो मान विकर्म
*
सांख्य शास्त्र सिद्धांत का, ज्ञान-कर्म का मेल। 
योगी दोनों साधते, जग-जीवन हो खेल
*
सम्यक समझ नहीं अगर, तब ग्रस लेता मोह
बुद्धि भ्रमित होती तभी, तन करता विद्रोह
*
मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। 
संशय कर देता भ्रमित, फल चिंता तज मीत
*
केवल देह न सत्य है, तन में मन भी साथ। 
तन-मन भूषण आत्म के, मूल एक परमात्म
*
आत्मा लेती जन्म जब, तब तन हो आधार। 
वस्त्र सरीखी बदलती, तन खुद बिन आकार।।
*
सांख्य ज्ञान सँग कर्म का, सम्मिश्रण है मीत।  
मन प्रवृत्ति कर विवेचन, सहज निभाए रीत
*
तर्क कुतर्क न बन सके, रखिए इसका ध्यान। 
सांख्य कहे भ्रम दूर कर, कर्म करे इंसान
*
देखें अपने दोष खुद, कहें न करिए शर्म
दोष दूर कर कर्म कर, वरिए अपना धर्म
*
कर सकते; करते नहीं, जो होते बदनाम। 
कर सकते जो कीजिए, तभी मिले यश-मान
*
होनी होती है अटल, होगी मत कर सोच। 
क्या कब कैसे सोचकर, रखो न किंचित लोच
*
दो पक्षों के बीच में, जा संशय मत पाल। 
बढ़ता रह निज राह पर, कर्म योग मत टाल
*
हानि-लाभ हैं एक से, यश-अपयश सम मान। 
सोच न फल कर कर्म निज, पाप न इसको जान
*
ज्ञान योग के साथ कर, कर्म योग का मेल। 
अपना धर्म न भूल तू, घटनाक्रम है खेल
*
हानि लाभ जीवन मरण, यश अपयश विधि हाथ। 
करता चल निज कर्म तू, उठा-झुका कर माथ
*
तज कर फल आसक्ति तू, करते जा निज कर्म। 
बंधन बने न कर्म तब, कर्म योग ही धर्म
*
१०-५-२०२१ 

मुक्तिका

मुक्तिका
*
कोरोना की टाँग अड़ी है
सबकी खटिया हुई खड़ी है
मुश्किल में है आज जिंदगी
सतत मौत की लगी झड़ी है
शासनतंत्र-प्रशासन असफल
भीत मीडिया विषम घड़ी है
जनगण मरता है, मरने दो
सत्ता की लालसा बड़ी है
रोजी-रोटी के लाले हैं
व्यापारी की नियत सड़ी है
अस्पताल औषधि अति मँहगे
केर-बेर की जुड़ी कड़ी है
मेहनतकश का जीना दूभर
भक्तों का दल लिए छड़ी है
***