सोमवार, 22 अप्रैल 2019

गीत

एक रचना
शीश उठा शीशम हँसे
*
शीश उठा शीशम हँसे,
बन मतदाता आम
खटिया खासों की खड़ी
हुआ विधाता वाम
*
धरती बनी अलाव
सूरज आग उगल रहा
नेता कर अलगाव
जन-आकांक्षा रौंदता
मुद्दों से भटकाव
जन-शिव जहर निगल रहा
द्वेषों पर अटकाव
गरिमा नित्य कुचल रहा

जनहित की खा कसम
कहें सुबह को शाम
शीश उठा शीशम हँसे
लोकतंत्र नाकाम
*
तनिक न आती शर्म
शौर्य भुनाते सैन्य का
शर्मिंदा है धर्म
सुनकर हनुमत दलित हैं
अपराधी दुष्कर्म
कर प्रत्याशी बन रहे
बेहद मोटा चर्म
झूठ बोलकर तन रहे

वादे कर जुमला बता
कहें किया है काम
नोटा चुन शीशम कहे
भाग्य तुम्हारा वाम
*

विश्ववाणी हिंदी संस्थान
अभियान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१
salil.sanjiv@gmail.com, ७९९९५५९६१८, ९४२५१८३२४४
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रचना आमंत्रण
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भारतीय भाषा-बोलियों में समन्वय और सद्भाव की वृद्धि के लिए वरिष्ठ साहित्यकार आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' के संपादन में एक अखिल भारतीय काव्य संकलन युवा उत्कर्ष साहित्य मंच दिल्ली के सहयोग से प्रकाशित किया जाना है। सहभागिता हेतु इच्छुक कवि अपनी क्षेत्रीय भाषा / बोली में अपनी श्रेष्ठ दस पृष्ठीय रचनाएँ अपने चित्र, व्यक्तिगत परिचय (नाम, जन्म तिथि, शिक्षा, साहित्यिक गुरु, लेखन विधाएँ, प्रकाशित कृतियाँ, उपलब्धि, पता, दूरभाष, चलभाष, ईमेल, आदि) यथा शीघ्र प्रेषित करें। संस्थान की सदस्यता सहित सहभागिता निधि १५००/- सहभागिता निधि पे टी एम द्वारा चलभाष क्रमांक ९४२५१८३२४४ में अथवा बैंक ऑफ़ इण्डिया, राइट टाउन शाखा जबलपुर IFSC- BKDN ०८११११९, लेखा क्रमांक १११९१०००२२४७ में जमाकर पावती salil.sanjiv@gmail.com पर ईमेल करें। सभी देशज बोलियों (भोजपुरी, अवधी, ब्रज, हरियाणवी, छत्तीसगढ़ी, बुंदेलखण्डी, मालवी, निमाड़ी, मारवाड़ी, हाड़ौती, मेवाड़ी, मैथिली, कन्नौजी, बैंसवाड़ी, अंगिका, बज्जिका आदि) में लिखी रचनाएँ आमंत्रित हैं। अन्य प्रांतीय भाषाओँ (पंजाबी, हरयाणवी, सिंधी, बांगला, असमिया, मराठी, गुजरती, गुजराती, तमिल, तेलुगु कन्नड़ आदि) की रचनाएँ देवनागरी लिपि में हिंदी-अनुवाद सहित भेजें। हर सहभागी को ८ पृष्ठ दिए जाएँगे। प्रकाशित होने पर २-२ प्रतियाँ निशुल्क तथा अतिरिक्त प्रतियाँ २५% रियायत व् डाक शुल्क निशुल्क सुविधा सहित उपलब्ध कराई जाएँगी। रचनाएँ १५ मई तक उक्त ईमेल पते पर यूनिकोड में टंकित कर भेजें। संकलन का विमोचन २० अगस्त को तथा लोकार्पण हिंदी दिवस पर किया जाएगा। सभी सहभागियों को प्रशस्ति पत्र भेंट किये जाएँगे।
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समीक्षा सकारात्मक सूक्तियाँ हीरो वाधवानी

विश्ववाणी हिंदी संस्थान
अभियान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१
salil.sanjiv@gmail.com, ७९९९५५९६१८, ९४२५१८३२४४
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कृति चर्चा:
सकारात्मक अर्थपूर्ण सूक्तियाँ : नवाशा का सूर्य उगाती कृति
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
[कृति परिचय: सकारात्मक अर्थपूर्ण सूक्तियाँ, सूक्ति संकलन, हीरो वाधवानी, प्रथम संस्करण, २०१७, आई एस बी एन ९७८९३८७६२२१११, आकार डिमाई, आवरण बहुरंगी, सजिल्द जैकेट सहित, पृष्ठ १६८, मूल्य ३००/-, अयन प्रकाशन दिल्ली, लेखक संपर्क- wadhwanihiro@yahoo.com ]
*
साहित्य वही है जिसमें सबका हित समाहित हो। यदि पर अपना हर कार्य परखा जाए कोई विवाद, द्वेष, झगड़ा आदि ही न हो। सब विवादों का मूल कारन एक ही है कि हम चाहते की सब हमारे मनोनुकूल कार्य करें किन्तु हम खुद किसी अन्य के मन का कार्य नहीं करते। 'तू-तू मैं-मैं घर में हो या बाहर', उसकी जड़ एक ही होती है कि 'मैं' और 'तू' मिलकर 'हम' नहीं हो पाते। नीर-क्षीर की तरह मिलकर समरस हो सकें तो सब टकराव आरंभ होने के पूर्व ही अपने आप समाप्त हो।
'मैं'-'तू' यदि 'हम' हो सकें, 'तू-तू-मैं-मैं' छोड़।
'मैं'-'तू' 'तू'-'मैं' 'हम' बनें, नाहक करें न होड़।।

इस जीवन सूत्र को साकार करने के लिए भाई हीरो वाधवानी ने संक्षिप्त विचार-मणियों को माला रूप में गूंथते हुए यह पुस्तक तैयार की है। यह पुस्तक सांसारिक परिस्थितियों से तालमेल बैठा पाने में असमर्थ, खुद को किसी योग्य न समझ रहे दिग्भ्रमित मनुष्यों में नवशा का संचार कर सकने की क्षमता रखती है। निराशा के महासागर में डूबकर खुद को कुछ भी कर पाने में असमर्थ मनुष्यों को यह कृति अवश्य पढ़नी चाहिए। 'इंसान दिन में सौ बार से भी अधिक बार मुस्कुरा सकता है पर आँसू बीस बार भी नहीं बहा सकता।', 'दुःख का कारण? बुरे विचार और अभद्र कार्य।', 'मिल-जुलकर रहने वालों के घर में रोज त्यौहार होता है।', 'वाद्य यंत्रों को बजानेवाला उन्हें जीवित कर जुबान देता है।', 'समुद्र चाहे कितना भी बड़ा हो वह माता-पिता के प्यार और आशीर्वाद से बड़ा नहीं हो सकता। ' जैसी सूक्तियाँ सामान्य पाठक को नई जीवन दृष्टि दे सकती हैं।

आधुनिक जीवन शैली अधिकाधिक आरामतलब होने की प्रवृत्ति पैदा कर रहे हैं। फलत:, बच्चे और किशोर आलसी होकर अनेक रोगों के शिकार हो रहे हैं। हीरो जी कहते हैं- 'अधिक परिश्रम से शरीर मजबूत होता है, गलता, घिसता और टूटता नहीं।' एक अन्य सूक्ति है 'सप्ताह भर बाहर सवेरे उठने का मतलब है उपहार में एक दिन अधिक पाना।'

हम सब किसी न किसी आदत या लत के शिकार होते हैं- 'बुरी आदतें अपराधी की तरह होती हैं, नियम और कानून तोड़ती हैं।', 'आदतें शेर से गीदड़ जैसे कार्य करती हैं।' पढ़कर कुटैव से मुक्ति पाई जा सकती है।'

सूक्तियों का सरल, सहज और बोधगम्य हिंदी में होना उनकी उपयोगिता में वृद्धि करता है। हीरो वाधवानी जी के इस समाजोपयोगी कार्य की जितनी प्रशंसा की जाए कम है। मेरा एक सुझाव है कि कृति को रोचक बनाने के लिए सूक्तियों को गद्य में रखने के साथ-साथ उनका पद्यान्तरण (दोहा, सोरठा आदि) भी साथ ही दिया जाए। इससे सूक्तियों की स्मरणीयता बढ़ेगी। ऐसी जीवन सूक्त विद्यालयों, सभागारों, उद्यानों, रास्तों के किनारे की दीवारों आदि पर लिखी जाएँ तो सामाजिक जीवन और मानवीय आचरण में सुधार ला सकती हैं।
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संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, चलभाष ७९९९५५९६१८
ईमेल salil.sanjiv@gmail.com

रविवार, 21 अप्रैल 2019

सूचनाएँ

विश्ववाणी हिंदी संस्थान
अभियान, समन्वय प्रकाशन जबलपुर
समन्वयम २०४ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, चलभाष: ९४२५१ ८३२४४ ​/ ७९९९५५९६१८ ​
ऍफ़ २, वी ५ विनायक होम्स, मयूर विहार, अशोक गार्डन,भोपाल ४६२०२३ चलभाष: ९५७५४६५१४७
डी १०५ शैलेंद्र नगर रायपुर छत्तीसगढ़
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​इकाई स्थापना आमंत्रण
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विश्ववाणी हिंदी संस्थान एक स्वैच्छिक अपंजीकृत समूह है जो ​भारतीय संस्कृति और साहित्य के प्रचार-प्रसार तथा विकास हेतु समर्पित है। संस्था पीढ़ियों के अंतर को पाटने और नई पीढ़ी को साहित्यिक-सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने के लिए निस्वार्थ सेवाभावी रचनात्मक प्रवृत्ति संपन्न महानुभावों तथा संसाधनों को एकत्र कर विविध कार्यक्रम न लाभ न हानि के आधार पर संचालित करती है। इकाई स्थापना, पुस्तक प्रकाशन, लेखन कला सीखने, भूमिका-समीक्षा लिखवाने, विमोचन-लोकार्पण-संगोष्ठी-परिचर्चा अथवा स्व पुस्तकालय स्थापित करने हेतु संपर्क करें: salil.sanjiv@gmail.com, ९४२५१ ८३२४४ ​/ ७९९९५५९६१८। इकाई स्थापना हेतु न्यूनतम एक आजीवन, दो स्थायी तथा ९ वार्षिक सदस्य होना आवश्यक है। ईकाइयोंको केंद्रीय कार्यालय से गतिविधि सञ्चालन हेतु मार्गदर्शन दिया जाएगा।
पाठक पंचायत
प्रत्येक इकाई को हर माह संस्थान द्वारा चयनित एक पुस्तक निशुल्क (अधिक प्रतियां ५०% छूट पर) भेजी जाएगी। संस्थान के सदस्य इसे पढ़कर उस पर चर्चा करेंगे तथा प्रतिवेदन / समीक्षा केंद्रीय कार्यालय को भेजेंगे।
------------------------- 'सार्थक लघुकथाएँ' २०१८ -----------------------
चयनित लघुकथाकारों की २-२ प्रतिनिधि लघु कथाएँ २ पृष्ठों पर चित्र, पते सहित सहयोगाधार पर प्रकाशित की जा रही हैं। संकलन पेपरबैक होगा। आवरण बहुरंगी, मुद्रण अच्छा होगा। सहभागिता के इच्छुक लघुकथाकार ४ लघुकथाएँ, चित्र, पता, चलभाष, ईमेल व सहमति ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com या roy. kanta@gmail.com पर अविलंब भेजें। यथोचित संपादन हेतु सहमत सहभागी रचनाएँ स्वीकृत होने के बाद मात्र ३००/- सहभागिता निधि पे टी एम द्वारा चलभाष क्रमांक ९४२५१८३२४४ में अथवा बैंक ऑफ़ इण्डिया, राइट टाउन शाखा जबलपुर IFSC- BKDN ०८११११९, लेखा क्रमांक १११९१०००२२४७ में जमाकर पावती salil.sanjiv@gmail.com तथा roy.kanta@gmail.com पर ईमेल करें। अब तक सम्मिलित लघुकथाकार अरुण अर्णव खरे, अरुण शर्मा, अर्चना मिश्र, अर्विना गहलोत, अविनाश ब्योहार, अशोक मनवानी, आशीष दलाल, इंद्रबहादुर श्रीवास्तव, उपमा शर्मा, ऊषा भदौरिया, ओमप्रकाश क्षत्रिय, कालीपद प्रसाद, घनश्याम मैथिल'अमृत', चंद्रा सायता, चंद्रेश छ्तलानी, चितरंजन मित्तल, ज्योति शर्मा, नीना छिब्बर, नेहा नाहटा जैन, पंकज जोशी, पदम गोधा, पवन जैन, प्रदीप कुमार शर्मा, प्रभात दुबे, प्रीति प्रवीण खरे, प्रेरणा गुप्ता, मार्टिन जॉन, बसंत शर्मा, मालती महावर बसंत, मिथिलेश बड़गैया, मिन्नी मिश्रा, मुक्ता अरोरा, मुज़फ़्फ़र इक़बाल सिद्दीकी, मौसमी परिहार, मृणाल आशुतोष, राजकुमार निजात, रुपाली भारद्वाज, रूपेंद्र राज, रेणु गुप्ता, वंदना गुप्ता, वंदना सहाय, वर्षा ढोबले, विनोद कुमार दवे, विभा रश्मि, शोभित वर्मा, संजय पठाडे़ 'शेष’, सदानंद कवीश्वर, सरिता बघेला, सविता मिश्रा, सीमा भाटिया, सुनीता यादव, सुनीता मिश्रा, सुमन त्रिपाठी, सुरेश तन्मय, संपादन: संजीव वर्मा 'सलिल' - कांता राय। सम्पादक संपर्क ९४२५१८३२४४ या ९५७५४६५१४७। अतिरिक्त प्रतियाँ ५०% रियायत पर डाक व्यय निशुल्क सुविधा सहित मिलेंगी।
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भारतीय भाषा काव्य संकलन २०१९
युवा उत्कर्ष साहित्यिक मंच और विश्ववाणी हिंदी संस्थान शीघ्र ही भारतीय भाषा-बोलियों में समन्वय और सद्भाव की वृद्धि के लिए एक काव्य संकलन प्रकाशित कर रहे हैं। सहभागिता हेतु इच्छुक कवि अपनी श्रेष्ठ दस रचनाएँ अपने चित्र, व्यक्तिगत परिचय (नाम, जन्म तिथि, शिक्षा, साहित्यिक गुरु, लेखन विधाएँ, प्रकाशित कृतियाँ, उपलब्धि, पता, दूरभाष, चलभाष, ईमेल) यथा शीघ्र प्रेषित करें।सहभागिता निधि १५००/- सभी देशज बोलियों (भोजपुरी, अवधी, ब्रज, हरियाणवी, छत्तीसगढ़ी, बुंदेलखण्डी, मालवी, निमाड़ी, मारवाड़ी, हाड़ौती, मेवाड़ी, मैथिली, कन्नौजी, बैंसवाड़ी, अंगिका, बज्जिका आदि) में लिखी रचनाएँ आमंत्रित हैं। अन्य प्रांतीय भाषाओँ की रचनाएँ देवनागरी लिपि में हिंदीअनुवाद सहित भेजें। हर सहभागी को ८ पृष्ठ दिए जाएँगे।
दोहा शतक मंजूषा
विश्ववाणी हिंदी संस्थान जबलपुर के तत्वावधान तथा आचार्य संजीव 'सलिल' व डॉ. साधना वर्मा के संपादन में दोहा शतक मंजूषा के ३ भाग दोहा-दोहा नर्मदा, दोहा सलिला निर्मला तथा दोहा दीप्त दिनेश का प्रकाशन कर सहयोगियों को भेजा जा चुका है। ८००/- मूल्य की ३ पुस्तकें (५००० से अधिक दोहे, दोहा-लेखन विधान, २५ भाषाओँ में दोहे तथा बहुमूल्य शोध-सामग्री) ५०% छूट पर पैकिंग-डाक व्यय निशुल्क सहित उपलब्ध हैं। इस कड़ी के भाग ४ "दोहा है आशा-किरण" में सहभागिता हेतु यथोचित संपादन हेतु सहमत दोहाकारों से १२० दोहे (चयनित १०० दोहे छपेंगे), चित्र, संक्षिप्त परिचय (जन्मतिथि-स्थान, माता-पिता, जीवन साथी, साहित्यिक गुरु व प्रकाशित पुस्तकों के नाम, शिक्षा, लेखन विधाएँ, अभिरुचि/आजीविका, डाक का पता, ईमेल, चलभाष क्रमांक आदि) ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com पर आमंत्रित हैं। सहभागिता निधि ३०००/- उक्तानुसार भेजें। प्रत्येक सहभागी को गत ३ संकलनों की एक-एक प्रति तथा भाग ४ की ८ प्रतियाँ कुल ११ पुस्तकें दी जाएँगी। भाग ४ के संभावित सहभागी- सर्व श्री/श्रीमती विनीता श्रीवास्तव, इंजी. सुरेंद्र सिंह पवार, इंजी. देवेंद्र गोंटिया, संतोष शुक्ल ग्वालियर, मेधा नारायण लखनऊ, लता यादव कैलिफोर्निया, सुमन श्रीवास्तव, पूजा अनिल स्पेन, सविता तिवारी मारीशस, डॉ. रमन चेन्नई, त्रिलोचना कौर आदि हैं। नव दोहाकारों को दोहा लेखन विधान, मात्रा गणना नियम व मार्गदर्शन उपलब्ध है।
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प्रतिनिधि नवगीत : २०१८
विश्ववाणी हिंदी संस्थान जबलपुर के तत्वावधान में 'प्रतिनिधि नवगीत: २०१८'' शीर्षक से प्रकाशनाधीन संकलन हेतु इच्छुक नवगीतकारों से एक पृष्ठीय ८ नवगीत चित्र, संक्षिप्त परिचय (जन्मतिथि-स्थान, माता-पिता, जीवन साथी, साहित्यिक गुरु व प्रकाशित पुस्तकों के नाम, शिक्षा, लेखन विधाएँ, अभिरुचि/आजीविका, डाक का पता, ईमेल, चलभाष क्रमांक) सहभागिता निधि ३०००/- सहित आमंत्रित है। यथोचित सम्पादन हेतु सहमत सहभागी ३०००/- सहभागिता निधि पे टी एम द्वारा चलभाष क्रमांक ९४२५१८३२४४ में अथवा बैंक ऑफ़ इण्डिया, राइट टाउन शाखा जबलपुर IFSC- BKDN ०८११११९, लेखा क्रमांक १११९१०००२२४७ में जमाकर पावती salil.sanjiv@gmail.com या roy.kanta@gmail.com पर ईमेल करें। । प्रत्येक सहभागी को ११ प्रतियाँ निशुल्क उपलब्ध कराई जाएँगी जिनका विक्रय या अन्य उपयोग करने हेतु वे स्वतंत्र होंगे। ग्रन्थ में नवगीत विषयक शोधपरक उपयोगी सूचनाएँ और सामग्री संकलित की जाएगी। देशज बोलिओं व हिंदीतर भारतीय भाषाओँ के नवगीत हिंदी अनुवाद सहित भेजें।
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शांति-राज स्व-पुस्तकालय योजना
विश्ववाणी हिंदी संस्थान जबलपुर के तत्वावधान में नई पीढ़ी के मन में हिंदी के प्रति प्रेम तथा भारतीय संस्कारों के प्रति लगाव तभी हो सकता है जब वे बचपन से सत्साहित्य पढ़ें। इस उद्देश्य से पारिवारिक पुस्तकालय योजना आरम्भ की जा रही है। इस योजना के अंतर्गत निम्न में से ५००/- से अधिक की पुस्तकें मँगाने पर मूल्य में ४०% छूट, पैकिंग व डाक व्यय निशुल्क की सुविधा उपलब्ध है। राशि अग्रिम पे टी एम द्वारा चलभाष क्रमांक ९४२५१८३२४४ में अथवा बैंक ऑफ़ इण्डिया, राइट टाउन शाखा जबलपुर IFSC- BKDN ०८११११९, लेखा क्रमांक १११९१०००२२४७ में जमाकर पावती salil.sanjiv@gmail.com या roy.kanta@gmail.com पर ईमेल करें। इस योजना में पुस्तक सम्मिलित करने हेतु salil.sanjiv@gmail.com या ७९९९५५९६१८/९४२५१८३२४४ पर संपर्क करें।
पुस्तक सूची-
०१. मीत मेरे कविताएँ -आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' १५०/-
०२. काल है संक्रांति का गीत-नवगीत संग्रह -आचार्य संजीव 'सलिल' १५०/-
०३. कुरुक्षेत्र गाथा खंड काव्य -स्व. डी.पी.खरे -आचार्य संजीव 'सलिल' ३००/-
०४. पहला कदम काव्य संग्रह -डॉ. अनूप निगम १००/-
०५. कदाचित काव्य संग्रह -स्व. सुभाष पांडे १२०/-
०६. Off And On -English Gazals -Dr. Anil Jain ८०/-
०७. यदा-कदा -उक्त का हिंदी काव्यानुवाद- डॉ. बाबू जोसफ-स्टीव विंसेंट
०८. Contemporary Hindi Poetry - B.P. Mishra 'Niyaz' ३००/-
०९. महामात्य महाकाव्य -दयाराम गुप्त 'पथिक' ३५०/-
१०. कालजयी महाकाव्य -दयाराम गुप्त 'पथिक' २२५/-
११. सूतपुत्र महाकाव्य -दयाराम गुप्त 'पथिक' १२५/-
१२. अंतर संवाद कहानियाँ -रजनी सक्सेना २००/-
१३. दोहा-दोहा नर्मदा दोहा संकलन -सं. सलिल-डॉ. साधना वर्मा २५०/-
१४. दोहा सलिला निर्मला दोहा संकलन -सं. सलिल-डॉ. साधना वर्मा २५०/-
१५. दोहा दिव्य दिनेश दोहा संकलन -सं. सलिल-डॉ. साधना वर्मा ३००/-
१६. सड़क पर गीत-नवगीत संग्रह आचार्य संजीव 'सलिल' ३००/-
१७. The Second Thought - English Poetry - Dr .Anil Jain​ १५०/-
१८. प्रतिनिधि लघुकथाएँ -सं. सलिल-संजीव सलिल-कांता रॉय प्रकाशनाधीन
१९. सार्थक लघुकथाएँ -सं. संजीव सलिल-कांता रॉय प्रकाशनाधीन
२०. दोहा है आशा-किरण दोहा संकलन -सं. सलिल-डॉ. साधना वर्मा प्रकाशनाधीन
***

मुक्तक, द्विपदी

द्विपदी 
*
तितलियाँ खुद-ब-खुद चूमेंगी हमें 
चल महकते फूल बनें, खिल जाएँ
मुक्तक
*
दर्पण में जिसको देखा वह बिम्ब मात्र था 
और उजाले में केवल साया पाया. 
जब-जब बाहर देखा तो पाया मैं हूँ. 
जब-कब भीतर झाँका तो उसको पाया

*
दर्पण में जिसको देखा वह बिम्ब मात्र था
और उजाले में केवल साया पाया.
जब-जब बाहर देखा तो पाया मैं हूँ. 
जब-कब भीतर झाँका तो उसको पाया

*

२१.४.२०१७ 

अंगिका दोहे

दोहे का रंग, अंगिका के संग: 
(अंगिका बिहार के अंग जनपद की भाषा, हिन्दी का एक लोक भाषिक रूप)
*
काल बुलैले केकरs, होतै कौन हलाल? 
मौन अराधे दैव कै, ऐतै प्रातः काल..
*
मौज मनैतै रात-दिन, होलै की कंगाल.
साथ न आवै छाँह भी, आगे कौन हवाल?.
*
एक-एक के खींचतै, बाल- पकड़ लै खाल.
नीन नै आवै रात भर, पलकें करैं सवाल..
*
कौन हमर रक्षा करै, मन में 'सलिल' मलाल.
केकरा से बिनती करभ, सभ्भई हवै दलाल..
*
धूल झोंक दें आँख में, कज्जर लेंय निकाल.
जनहित के नाटक रचैं, नेता निगलें माल..
***
२१-४-२०१०

हेमंत छंद

छंद सलिला:
हेमंत छंद
संजीव
*
छंद-लक्षण: जाति महादैशिक , प्रति चरण मात्रा २० मात्रा, चरणांत गुरु लघु गुरु (रगण), यति बंधन नहीं।
लक्षण छंद:
बीस-बीस दिनों सूर्य दिख नहीं रहा
बदन कँपे गुरु लघु गुरु दिख नहीं रहा
यति भाये गति मन को लग रही सजा
ओढ़ ली रजाई तो आ गया मजा
उदाहरण:
१. रंग से रँग रही झूमकर होलिका
छिप रही गुटककर भांग की गोलिका
आयी ऐसी हँसी रुकती ही नहीं
कौन कैसे कहे क्या गलत, क्या सही?
२. देख ऋतुराज को आम बौरा गया
रूठ गौरा गयीं काल बौरा गया
काम निष्काम का काम कैसे करे?
प्रीत को यादकर भीत दौरा गया
३.नाद अनहद हुआ, घोर रव था भरा
ध्वनि तरंगों से बना कण था खरा
कण से कण मिल नये कण बन छा गये
भार-द्रव्यमान पा नव कथा गा गये
सृष्टि रचना हुई, काल-दिशाएँ बनीं
एक डमरू बजा, एक बाँसुरी बजी
नभ-धरा मध्य थी वायु सनसनाती
सूर्य-चंदा सजे, चाँदनी लुभाती
*********************************************
(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अरुण, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, ककुभ, कज्जल, कामिनीमोहन कीर्ति, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, छवि, जाया, तांडव, तोमर, दीप, दोधक, नित, निधि, प्रतिभा, प्रदोष, प्रेमा, बाला, भव, मदनअवतार, मधुभार, मधुमालती, मनहरण घनाक्षरी, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली, माया, माला, मोहन, योग, ऋद्धि, राजीव, रामा, लीला, वाणी, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शास्त्र, शिव, शुभगति, सरस, सार, सिद्धि, सुगति, सुजान, हेमंत, हंसगति, हंसी)
२१-४-२०१४

नवगीत क्यों भय खाते?

नवगीत:
संजीव 
.
बदलावों से क्यों भय खाते?
क्यों न 
हाथ, दिल, नजर मिलाते??
.
पल-पल रही बदलती दुनिया
दादी हो जाती है मुनिया
सात दशक पहले का तेवर
हो न प्राण से प्यारा जेवर
जैसा भी है सैंया प्यारा
अधिक दुलारा क्यों हो देवर?
दे वर शारद! नित्य नया रच
भले अप्रिय हो लेकिन कह सच
तव चरणों पर पुष्प चढ़ाऊँ
बात सरलतम कर कह जाऊँ
अलगावों के राग न भाते
क्यों न
साथ मिल फाग सुनाते?
.
भाषा-गीत न जड़ हो सकता
दस्तरखान न फड़ हो सकता
नद-प्रवाह में नयी लहरिया
आती-जाती सास-बहुरिया
दिखें एक से चंदा-तारे
रहें बदलते सूरज-धरती
धरती कब गठरी में बाँधे
धूप-चाँदनी, धरकर काँधे?
ठहरा पवन कभी क्या बोलो?
तुम ठहरावों को क्यों तोलो?
भटकावों को क्यों दुलराते?
क्यों न
कलेवर नव दे जाते?
.
जितने मुँह हैं उतनी बातें
जितने दिन हैं, उतनी रातें
एक रंग में रँगी सृष्टि कब?
सिर्फ तिमिर ही लखे दृष्टि जब
तब जलते दीपक बुझ जाते
ढाई आखर मन भरमाते
भर माते कैसे दे झोली
दिल छूती जब रहे न बोली
सिर्फ दिमागों की बातें कब
जन को भाती हैं घातें कब?
अटकावों को क्यों अपनाते?
क्यों न
पथिक नव पथ अपनाते?
***
२१.४.२०१५

बाला / रामवत छंद

ॐ 
छंद बहर का मूल है: ८ 
*
छंद परिचय:
संरचना: SIS SIS SIS S / SIS SIS SISS 
सूत्र: रररग।
दस वार्णिक पंक्ति जातीय बाला छंद।
सत्रह मात्रिक महासंस्कारी जातीय रामवत छंद।
बहर: फ़ाइलुं फ़ाइलुं फ़ाइलुं फ़े / फ़ाइलुं फ़ाइलुं फ़ाइलातुं ।
*
आप हैं जो, वही तो नहीं हैं
दीखते है वही जो नहीं हैं
*
खोजते हैं खुदी को जहाँ पे
जानते हैं वहाँ तो नहीं हैं
*
जो न बोला वही बोलते हैं
बोलते, बोलते जो नहीं हैं
*
माल को तौलते ही रहे जो
आत्म को तौलते वो नहीं
*
देश शेष क्या? पूछते हैं
देश में शेष क्या जो नहीं हैं
*
आद्म्मी देवता क्या बनेगा?
आदमी आदमी ही नहीं है
*
जोश में होश को खो न देना
देश में जोश हो, क्यों नहीं है?
***
SIS SIS SISS
आपका नूर है आसमानी
गायकी आपकी शादमानी
*
आपका ही रहा बोलबाला
लोच है, सोज़ है रातरानी
*
आसमां छू रहीं भावनाएँ
भ्रांत हों ही नहीं वासनाएँ
*
खूब हालात ने आजमाया
आज हालात को आजमाएँ
*
कोशिशों को मिली कामयाबी
कोशिशें ही सदा काम आएँ
*
आदमी के नहीं पास आएँ
हैं विषैले न वे काट खाएँ
***
२१.४.२०१७
***

नवगीत: इन्द्रप्रस्थ में

एक दोहा
*
हम तो हिंदी के हामी हैं, फूल मिले या धूल
अंग्रेजी को 'सलिल' चुभेंगे, बनकर शूल बबूल
*
नवगीत:
इन्द्रप्रस्थ में
.
इन्द्रप्रस्थ में
विजय-पराजय
पर लगते फिर दाँव
.
कृष्णार्जुन
रणनीति बदल नित
करते हक्का-बक्का.
दुर्योधन-राधेय
मचलकर
लगा रहे हैं छक्का.
शकुनी की
घातक गुगली पर
उड़े तीन स्टंप.
अम्पायर धृतराष्ट्र
कहे 'नो बाल'
लगाकर जंप.
गांधारी ने
स्लिप पर लपका
अपनों का ही कैच.
कर्ण
सूर्य से आँख फेरकर
खोज रहा है छाँव
इन्द्रप्रस्थ में
विजय-पराजय
पर लगते फिर दाँव
.
द्रोणाचार्य
पितामह के सँग
कृष्ण कर रहे फिक्सिंग.
अर्जुन -एकलव्य
आरक्षण
माँग रहे कर मिक्सिंग.
कुंती
द्रुपदसुता लगवातीं
निज घर में ही आग.
राधा-रुक्मिणी
को मन भाये
खूब कालिया नाग.
हलधर को
आरक्षण देकर
कंस सराहे भाग.
गूँज रही है
यमुना तट पर
अब कौओं की काँव
इन्द्रप्रस्थ में
विजय-पराजय
पर लगते फिर दाँव
.
मठ, मस्जिद,
गिरिजा में होता
श्रृद्धा-शोषण खूब.
लंगड़ा चढ़े
हिमालय कैसे
रूप-रंग में डूब.
बोतल नयी
पुरानी मदिरा
गंगाजल का नाम.
करो आचमन
अम्पायर को
मिला गुप्त पैगाम.
घुली कूप में
भाँग रहे फिर
कैसे किसको होश.
शहर
छिप रहा आकर
खुद से हार-हार कर गाँव
इन्द्रप्रस्थ में
विजय-पराजय
पर लगते फिर दाँव
.

२१.४.२०१७ 

बुंदेली कहानी समझदारी

बुंदेली कहानी
समझदारी
*
आज-काल की नईं, बात भौर दिनन की है।
अपने जा बुंदेलखंड में चन्देलन की तूती बोलत हती।
सकल परजा भाई-चारे कें संगै सुख-चैन सें रैत ती।
सेर और बुकरियाँ एकई घाट पै पानी पियत ते।
राजा की मरजी के बगैर नें तो पत्ता फरकत तो, नें चिरइया पर फड़फड़ाउत ती।
सो ऊ राजा कें एक बिटिया हती।
बिटिया का?, कौनऊ हूर की परी घाईं, भौतऊ खूबसूरत।
बा की खूबसूरती को कह सकत आय?
जैसे पूरनमासी में चाँद, दीवारी में दिया जोत की सी, जैंसे दूद में झाग।
ऐंसी खिलंदड जैसे नर्मदा और ऊजरी जैंसे गंगा।
जब कभूं राजकुँवरि दरबार में जात तीं तौ दरबार जगमगान लगत तो।
राजकुँवरि के रूप और गुनन कें बखान सें सकल परजा को सर उठ जात तो।
एक सें बढ़के एक राजा, जागीरदार अउर जमींदार उनसें रिश्ते काजे ललचात रैत ते।
मनो राजकुँवरि कौनऊ के ढिंगे आँख उठा के भी नें हेरत ती।
जब कभऊं राजदरबार में कछू बोलत ती तो मनो बीना कें तार झनझना जाउत ते।
राजा के मूं लगे दरबारन नें एक दिना हिम्मत जुटा कहें राजा साब सें कई।
"महाराज जू! बिटिया रानी सयानी भई जात हैं।
उनके ब्याह-काज कें लाने बात करो चाही।
समय जात देर नईं लगत, बात-चीत भओ चहिए।''
दरबारन की बातें कान में परतई राजकुँवरि के गालन पे टमाटर घाईं लाली छा गई।
राजकुँवरि के नैन नीचे झुक गए हते।
राजा साहब ने जा देख कें अनुमान कर लओ कि दरबारी ठीकई कै रए।
राजकुँवरि ने परदे की ओट सें कई -''दद्दा जू! हुसियार राजा कहें अपनेँ वफादार दरबारन की बात सुनों चाही।''
राजा साब नें अचरज के साथ राजकुँवरि की तरफ हेर खें कई ''हम सोई ऐंसई सोचत रए। ''
''दद्दा जू! मनो ब्याह काजे हमरी एक शर्त है।
हम बा शर्त पूरी करबे बारे सें ब्याह करो चाहत हैं।"
अब तो महाराज जू और दरबारां सबईं खों जैसे साँप सूंघ गओ।
बेटी जू के मूं सें सरत को नाम सुनतई राजा साब और दरबारी सब भौंचक्के रए गए।
कोई ने सोची नईं हती के राजकुँवरि ऐसो कछू बोल सकत ती।
सबरे जाने सोच में पर गए कि राजकुँवरि कछू ऐसो-वैसो नें कै दें।
कहूँ उनकी कई पूरी नें कर पाए तो का हुईहै?
राजकुँवरि नें सबखों चुप्पी लगाए देख खें आपई कई।
"आप औरन खों परेसान होबे की कौनऊ जरूरत नईआ।''
अब राजा साब ने बेटी जू सें कई- "बेटी जू! अपुन अपुनी सरत बताओ तें हम सब अपुन की सरत पूरी करबे में कछू कोर-कसार नें उठा रखबी।"
अब बेटी जु ने संकुचाते-संकुचाते अपनी सरत बताबे खातिर हिम्मत जुटाई और बोलीं-
"दद्दा जू! हम ऐसें वर सें ब्याह करो चाहत हैं जो चाहे गरीब हो या अमीर, गोरो होय चाए कारो, पढ़ो-लिखो होय चाए अनपढ़, लंगड़ो होय चाए लूलो पै बो बैठ खें उठ्बो नें जानत होय।"
बेटी जू सें ऐंसी अनोखी सरत सुन खें दरबारन खों दिमाग चकरा गओ।
आप राजा साब सोई कछू नें समझ पा रए थे।
मनो राजा साब राजकुँवरि की समझदारी के कायल हते।
सबई दारबारन खों सोच-बिचार में डूबो देख राजा जू नें तुरतई राज घराने कें पुरोहित खें बुला लाबे काजे एक चिठिया ले कें खबास खें भेज दओ।
पंडज्जी और खबास खों आओ देख कें महाराज जू नें एक चिट्ठी दे कें आदेस दओ-
"तुम दोउ जनें देस-बिदेस घूम-घूम खें जा मुनादी कराओ और कौनऊ ऐसे खों पता लगैयों जो बैठ खें उठाबो नें जानत होए।"
तुमें जिते ऐसो कौनऊ जोग बार मिले जो बैठ खें उठ्बो नेब जानत होय, उतई बेटी जू का ब्याह तय कर अइयो।
उतई बेटू जु के ब्याओ काजे फलदान को नारियल धर अइयो।
राजा साब की आज्ञा सुनकें पंडज्जी और खबास दोई जनें देसन-देसन कें राजन लौ गए।
बे हर जगू बिन्तवारी करत गए मनो निरासा हाथ लगत गई।
बे जगूं-जगूं कैत गए "जून राजकुंवर बैठ खें उठ्बो नें जानत होय ओई के संगे अपनी राजकुंवरि का फलदान करबे काजे आये हैं।"
बे जिते-जिते गए, उतई नाहीं को जवाब मिलत गओ।
कहूँ-कहूँ राजा लोग कयें 'जे कैसी अजब सर्त सुनात हो?
राजकुंवरि खें ब्याओ करने हैं कि नई?
पंडज्जी और खबास घूमत-घूमत थक गए।
महीनों पे महीने निकारत गए मनो बात नई बनीं।
सर्त पूरी करबे बारो कौनौ राजकुमार नें मिलो।
आखिरकार बिननें थक-हार कर बापिस होबे को फैसला करो।
आखिरी कोसिस करबे बार बे आखिरी रजा के ढींगे गए।
इतै बी सर्त सुन कें राजदर्बाराब और राजा ने हथियार दार दै।
दोऊ झनें लौटन लगे तबई राजकुमार बाहर सें दरबार में पधारे।
उनने पूरी बात जानबे के बाद रजा साब सें अरज करी-
" महाराज जू! आज लॉन अपने दरबार सें कौनऊ मान्गाबे बारो खली हात नई गओ है।
पुरखों को जस माटी में मिलाए से का फायदा?
अपने देस जाके और रस्ते में जे दोनों जगू-जगू अपन अपजस कहत जैहें।
ऐसें बचबे को एकई तरीको है।
आप जू इन औरन की बात रख लेओ।
आपकी अनुमत होय तो मैं इन राजकुमारी की सर्त पूरी करे के बाद ब्याओ कर सकत।"
जा सुन खें महाराज जू और दरबारी पैले तो संकुचाये कि बे ओरन कछू राह नई निकार पाए।
कम अनुभवी राजकुमार नें रास्ता खोज लओ।
अपनें राजकुमार की होसियारी पे भरोसा करखें महाराज जू नें कई-
" कुंवर जू! अपनी बात पे भरोसा कर खें हम फलदान रख लेंत हैं, मनो हमाओ सर नें झुकइयो।
काये कि सर्त पूरी नें भई तो राजकुमारी मुस्किल में पड़ जैहें।
राज कुमार ने कई "आप हमाओ भरोसा करकें फलदान ले लेओ मगर हमरी सोई एक सर्त है।
अब सबरे दरबारी, रजा, पंडज्जी और खबास चकराए।
अब लौ एकई सर्त पूरीनें हो रई हती, अब एक और सर्त का चक्कर कैसे सुलझेगो?
महाराज नें पूछी तो राजकुमार नें सर्त बताई।
महाराज आप जेई कागज़ पे एक संदेस लिख कें पठा दें।
हमाई सरत है कि राजकुमारी की सरत पूरी करबे के काजे हमाओ राजकुमार तैयार है।
मनो अकेले बे ऊ राजकुमारी सें ब्याओ कर्हें जो परके टरबो नें जानत होय।'
जो राजकुमारी खों जे सर्त स्वीकार होय तो बो अपनी हामी के संगे अपने पिताजू सें फलदान पठा देवें।
राजकुँवर सें हामी भरवाखें पंडज्जी और खवास दोउ जनों ने जान की खैर मनाई।
बे दोनों सारदा मैया की जय कर अपने राज खों लौट चले।
राजा के लिंगा लौट खें पुरोहित नें पूरो हालचाल बताओ।
पुरोहित नें कई "महाराज! हम दोउ जनें कहूँ रुकें बिना दिन-रात दौरतई रए।
पैले एक तरफ सें आगे बढ़े हते।
हौले-हौले देस-बिदेस कें सबई राजा जनों के दरबार में जात गए।
मनो अकेलीं बेटी जू की सर्त पूरी करे काजे कौनऊ राजकुमार नें हामी नई भरी।
हर जगूं सुरु-सुरु में भौत उत्साह सें न्योटा लऔ जात।
मनो सर्त की बात सामने आतेई बिनकों सांप सूंघ जात तो।
आखर में हम दोऊ निरास हो खें अपने परोसी राजा कने गए।
बिनने हुलास सें स्वागत-सत्कार करो।
जैसेई सर्त की बात भई सबकें मूं उतर गए।
राजा और दरबारी तो चुप्पै रए गए।
हम औरन नें सोचीं के खाली हात वापिस होबे के सिवाय कौनौ चारो नईयाँ।
मनो बुजुर्ग ठीकई कै गए हैं मन सोची कबहूँ नई, प्रभु सोची तत्काल।
हमाई बिदाई होते नें होते राजकुंवर जू दरबार में पधार गए।
कुँवर जू ने सारी बात ध्यान सें सुनी, कछू देर सोचो और सर्त के लाने हामी भर दई।
मनों अपनी तरफ सें एक सर्त और धर दई।
एं कौन सी सर्त? कैसी सर्त? महाराज जू नें हडबडा खें पूछी।
बतात हैं महाराज! बा सर्त बी बड़ी बिचित्र है।
कुँवर नें कई के बें ऐसी स्त्री सें ब्याओ करहें जोन पर खें टरबो नईं जानत होय।
नें मानो तो अपुन जू जा कागज़ खों बांच लेओ।
जा कागज में सब कछू लिखा दओ है कुँवर नें।
जा सर्त जान खें महाराज और दरबानी परेसान हते।
कौनौ खें समझ मीन कौनऊ रास्ता नें सूझो।
महाराज ने राजकुँवरी खें बुला भेजो।
बे अपनी सखियाँ खें संगे अमराई में हतीं।
महाराज जू को संदेसा मिलो तो तुरतई दरबार कें लाने चल परीं।
राजकुँवरी ने जुहार कर अपनी जगह पे पधार गईं।
महाराज नें कौनौ भूमिका बनाए बिना पंडज्जी सें कई के बा कागज़ बांच देओ।
पंडत नें राजा कें हुकुम का पालन कर्खें बा कागज़ झट सें बांच दओ।
बामें लिखी सर्त सुन खें राजकुँवरी हौले सें मुसक्या दईं और सरम सें सर झुका लओ।
जा देख खें सबई की जान में जान आई।
महाराज नें पूछी तो राजकुँवरी नें धीरे सें कै दई के बे जा सर्त पूरी कर सकत हैं।
फिर का हती, बिटिया रानी की हामी सुनतई पंडत नें तुरतई रजा जी सें कई 'अब बिलम्ब केहि कारज कीजे ?'
रजा जू पंडत खों मतलब समझ गए और बोले- श्री गनेस जू का ध्यान कर खें मुहूर्त बताओ।
पंडज्जी तो ए ई औसर की तलास में हते।
बिनने झट से पोथा-पत्तर निकारो और मुहूरत बता दओ।
राजा नें महारानी खें बुलाबा भेजो और उन रजामंदी सें संदेश निमंत्रण पत्रिका लिखा दई।
पत्रिका में लिखो हतो के आप जू अपने राजकुंवर की बारात लें खें अमुक तिथि खों पधारें।
कवास खें आदेस दओ के जा पत्रिका राजा साब जू खें धिंगे पौन्चाओ।
खवास तो ऐई मौके की टाक माँ हतो।
जानत तो दोऊ जगू मोटी बखसीस मिलहै।
पत्रिका पहुँचतई दोऊ राजन के महलन में ब्याओ की तैयारियां सुरु हो गईं।
लिपाई-पुताई, चौक पुराई, गाने-बजाने, आबे-जाबे औए मेहमानन के सोर-सराबे से चहल-पहल हो गई।
दसों दिसा में भोर सें साँझ लौ मंगाल गान गूंजन लगे।
जैसेंई ब्याओ की तिथि आई बैसेई राजा जू अपने कुँवर साब खों दुल्हा बना खें पूरे फ़ौज-फांटे के संगे चल परे। समधी की राज में बिनकी खूबई आवभगत भई।
जनवासे में बरात की अगवानी की गई।
बेंड़नी खों नाच देखबे के खातिर लोग उमड़ परे।
बरातियों खों पेट भर जलपान और भोजन कराओ गओ।
जहाँ-तहाँ सहनाई और ढोल-बतासे बजट हते।
बरात की अगवानी भई, पलक पांवड़े बिछा दए गए।
सजी-धजी नारियाँ स्वागत गीत गुंजात तीं।
नाऊ और खवास बरातियन की मालिस करत हते।
ज्योनार कें समै कोकिलकंठों से ज्योनार गीत और गारी सुन-सुन खें बराती खूबई मजा लेत ते।
बरात उठी तो बाकी सोभा कही नें जात ती।
हाथी, घोड़ा, रथ, पैदल सब अपनी मस्ती में मस्त हते।
ढोल, मंजीरा, ताशा, बिगुल, शहनाई के सँग नाच-गाना की धूम हती।
मंडवा तरे भांवरन की तैयारी होन लगी।
मंडवा तरे राजकुमारी, राजकुमार दूल्हा-दुलहन के काजे रखे पटा पे बिराजे।
दोउ राजा जू, रानीजू, नजीकी रिस्तेदार दास-दासियाँ, पंडज्जी और खवास सबै आस-पास बैठे हते।
बन्ना-बन्नी गीत गूंजत हते।
चारों तरफी हल्ला-गुल्ला, चहल-पहल, उत्साह हतो।
अब जैसेईं तीं भांवरें पड़ चुकीं, बैसेई कन्या पक्ष को पुरोहित खड़ो हो गओ।
वर पक्ष के पंडज्जी सें बोलो 'नेंक रुक जाओ पंडज्जी!
अपुन दोऊ जनन खों मालुम है कै ब्याओ होबे के काजे कछू शर्तें हतीं।
पैले उनका खुलासा हो जावे, तब आगे की भाँवरें पारी जैहें।
फिर बानें कुँवर जू सें कई "कुँवर जू! पैले अपुन बतावें के बेटी जू नें कौन सी सर्त रखी हती?
अपुन जा सोई बताएँ के बा सर्त कब-कैंसें पूरी कर सकत?"
जा बात सुनतेई दुल्हा बने राजकुमार झट सें खड़े हो गए।
बे बोले स्यानन कें बीच में जादा बोलबो ठीक नईयाँ।
अपनी अकल के माफिक मैं जा समझो के राजकुमारी जी ने सर्त रखी हती के बै ऐसो बर चाउत हैं जो बैठ कें उठबो नें जानत होय।
जा सर्त में राजकुमारी जू की जा इच्छा छिपी हती के उनको बर जानकार, अकलमंद, कुल-सीलवान, सुन्दर, औए बलसाली भओ चाही।
ई इच्छा का कारन जे है के कौनऊ सभा में, कौनऊ मुकाबले में ओ खों कौउ हरा नें सकें।
बिद्वान सें बिद्वान जन हों चाए ताकतवर लोग कौनऊ बाखों हरा खें उठा नें पावे।
सबै जगा बाकी जीत को डंका पिटो चाही।
ओके जीतबे से राजकुमारी जू को सर हमेसा ऊँचो रहेगो।
राजकुमारी अपने वर के कारन नीचो नई देखो चाहें।
बे जब चाहे, जैसे चाहें आजमा सकत आंय। "
दूल्हा राजा के चुप होतई पंडज्जी ने राजकुमारी से पूछो- 'काय बिटिया जू! तुमाई सर्त जोई हती के कछू और हती?"
जा सुन कें राजकुमारी नें हामी में सर हिला दओ।
मंडवा कें नीचे बैठे सबई जनें राजकुमार की अकाल की तारीफ कर कें वाह, वाह कै उठे।
जा के बाद राजकुमार को पुरोहित खडो हो गओ।
पुरोहित नें खड़े हो खें कही 'हमाए राजकुमार ने भी एक सर्त रखी हती।
अब राजकुमारी जू बताबें के बा सर्त का हती और बे कैसे पूरी कर सकत हैं?'
ई पै राजकुमारी लाज और संकोच सें गड़ सी गईं, मनो धीरे से सिमट-संकुच कें खड़ी भईं।
कौनऊ और चारा नें रहबे से बिन्ने जमीन को ताकत भए मंडवा के नीचे बैठे बड़ों-बुजुर्गों से अपने बात रखे के काजे आज्ञा माँगी।
आज्ञा मिलबे पर धीमी लेकिन साफ़ आवाज़ में कई 'राजकुँवर की सर्त जा हती के बें ऐसी स्त्री सें ब्याओ करो चाहत हैं जौन पर खें टरबो नईं जानत होय।'
हम सर्त से जा समझें के राजकुमार नम्र और चतुर पत्नी चाहत हैं।
ऐंसी पत्नी जो घरब के सब काम-काज जानत होय।
ऐंसी पत्नी जो कामचोर और आलसी नें होय।
जो घर के सब बड़ों को अपने रूप, गुण, सील और काम-काज सें प्रसन्न रख सके।
ऐसो नें होय के जब दोउ जनें परबे खों जांय तो कछू छूटो काम याद आने से उठनें परे।
ऐसो भी ने होय कि बड़ो-बूढ़ों परबे या उठबे के बाद कौनौ बात की सिकायत करे और घर में कलह हो।
राजकुमार ऐंसी सुघड़ घरबारी चाहत हैं जो कमरा में आ कें परे तो कौनऊ कारन सें उठबो नें जानें।
राजकुमार जब - जैसे चाहें परीक्छा ले लें।
दुल्हन के चुप होतई पुरोहित ने राजकुमार से पूछो- 'काय कुँवर जू! तुमाई सर्त जोई हती के कछू और हती?"
जा सुन कें राजकुमार नें अपनी रजामंदी जता दई।
मंडवा कें नीचे बैठे सबई लोग-लुगाई और सगे-संबंधी ताली बजाओं लगै।
राजकुंवरी और राजकुमार की समझदारी नें सबई खों मन मोह लओ हतो।
पंडज्जी और पुरोहित नें दोऊ पक्षों के सर्त पूरी होबे की मुनादी कर दई।
राजकुँवर मंद-मंद मुसक्या रए हते।
राजकुमारी अपने गोर नाज़ुक पैर के अंगूठे सें गोबर लिपा अँगना कुरेदत हतीं।
उनकें गोरे गालन पे लाली सोभायमान हती।
पंडज्जी और पुरोहित जी ने अगली भांवर परानी सुरु कर दई।
सब जनें भौत खुस भये कि दुल्हा-दुल्हन एक-दूसरे के मनमाफिक आंय।
सबसे ज्यादा खुसी जे बात की हती के दोऊ के मन में धन-संपत्ति और दहेज को लोभ ना हतो।
दोऊ जनें गुन और सील को अधिक महत्व देखें संतोस और एक-दूसरे की पसंद को ख्याल रख कें जीवन गुजारन चाहत ते।
सब जनों ने भांवर पूरी होबे पर दूल्हा-दुल्हिन और उनके बऊ-दद्दा खों खूब मुबारकबाद दई।
इस ब्याव के पैले सबई जन घबरात हते कि "बैठ कें उठबो नें जानन बारो" वर और "पर खें टरबो नईं जानन बारी बहू" कहाँ सें आहें?
असल में कौनऊ इन शर्तों का मतलबई नें समझ पाओ हतो।
आखिर में जब सब राज खुल गओ तो सबनें चैन की सांस लई।
इनसे समझदार मोंड़ा-मोंडी हर घर में होंय जो धन की जगू गुन खों चाहें।
तबई देस और समाज को उद्धार हुइहै।
राजकुमारी और राजकुमार को भए सदियाँ गुजर गईं मनों आज तक होत हैं चर्चे उनकी समझदारी के।
***

गीत शेष है

एक रचना 
शेष है 
*
दुनिया की 
उत्तम किताब हम 
खुद को पढ़ना
मगर शेष है
*
पोथी पढ़-पढ़ थक हारे हैं
बिना मौत खुद को मारे हैं
ठाकुर हैं पर सत्य न बूझें
पूज रहे ठाकुरद्वारे हैं
विधना की
उत्तम रचना हम
खुद कुछ रचना
मगर शेष है
*
अक्षर होकर क्षर ही जोड़ा
राह बना, अपना पग मोड़ा
तिनका-तिनका चले जोड़ने
जोड़-जोड़कर हर दिल तोडा
छंदों का
उत्तम निभाव हम
खुद का निभना
मगर शेष है
*
डर मत, उछल-कूद मस्ता ले
थक जाए तो रुक सुस्ता ले
क्यों यंत्रों सा जीवन जीता?
चल पंछी बन, कलरव गा ले
कर्मों की
उत्तम कविता हम
खुद को कहना
मगर शेष है
***

२१-४-२०१७ 

छंद बहर का मूल है: ७

https://kamlakriti.blogspot.com/2019/04/blog-post_27.html?spref=fb&fbclid=IwAR3VXvnlrDdom5XC7ONWuDkZIeY2Kf7rICXN-qnWG5gw0iysT2Pc1AasXrI

ॐ 
छंद बहर का मूल है: ७ 
*
छंद परिचय:
संरचना: SIS SIS IS / SISS ISIS
सूत्र: ररलग।
आठ वार्णिक जातीय छंद।
तेरह मात्रिक जातीय छंद।
बहर: फ़ाइलुं फ़ाइलुं फ़अल / फ़ाइलातुं मुफ़ाइलुं ।
*
देवता है वही सही
जो चढ़ा वो मँगे नहीं
*
बाल सारे सफेद हैं
धूप में ये रँगे नहीं
*
लोग ईसा बनें यहाँ
सूलियों पे टँगे नहीं
*
दर्द नेता न भोगता
सत्य है ये सभी कहीं
*
आम लोगों न हारना
हिम्मतें ही जयी रहीं
*
SISS ISIS
जी न चाहे वहीं चलो
धार ही में बहे चलो
*
दूसरों की न बात हो
हाथ खाली मले चलो
*
छोड़ भी दो तनातनी
ख्वाब हो तो पले चलो
*
दुश्मनों की निगाह में
शूल जैसे चुभे चलो
*
व्यर्थ सीना न तान लो
फूल पाओ झुके चलो
***
२०.४.२०१७
***

चित्र पर कविता चित्र - अनुप्रिया, कविता संजीव

चित्र पर कविता
चित्र - अनुप्रिया, कविता संजीव

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चीर तिमिर को प्रकट हुई शुचि काव्य कामिनी।
दिप-दिप दमक रही मेघों में दिव्य दामिनी।
दिखती लुकती चपल चंचला मन भरमाती-

उषा-साँझ सखियों सह शोभित 'सलिल' यामिनी।।

अविश्वासं फलम् दायकम्

व्यंग्य

अविश्वासं फलम् दायकम्


विवेक रंजन  श्रीवास्तव

ए १ , विद्युत मण्डल कालोनी , शिला कुन्ज

जबलपुर

मो ७०००३७५७९८ , vivek1959@yahoo.co.in


  संस्कृत उक्ति है "विश्वासं फलम् दायकम्" . भगवत भक्ति के संदर्भ में और परमात्मा की कृपा प्राप्ति हेतु प्रायः साधु , संत  इसी उक्ति को दोहराकर उनके कहे पर भरोसा करने और विश्वास बनाये रखने को कहते हैं . "विश्वासं फलम् दायकम्"  ढ़ाढ़स बंधाने के काम आता है . भक्त बाबा जी के वचनो पर मगन झूमता रहता है .  सदियो से "विश्वासं फलम् दायकम्" का मंत्र फलीभूत भी होता रहा है . अपना सब कुछ , घरबार छोड़कर नवविवाहिता नितांत नये परिवार में इसी विश्वास की ताकत से ही चली आती है और सफलता पूर्वक नई गृहस्थी बसा कर उसकी स्वामिनी बन जाती है . भरोसे से ही सारा व्यापार चलता है . 

पर जब मैं नौकरी के संदर्भ में देखता हूं , योजनाओ की जानकारियो के ढ़ेर सारे फार्मेट देखता हूं और टारगेट्स की प्रोग्रेस रिपोर्ट का एनालिसिस करते अधिकारियो की मीटिंगो में हिस्सेदारी करता हूं तो मुझे लगता है कि इनका आधारभूत सिद्धांत ही  अविश्वासं फलम् दायकम् होता है . किसी को किसी के कहे पर कोई भरोसा ही नही होता , स्मार्टफोन के इस जमाने में हर कोई फोटो प्रूफ चाहता है .  "इफ और बट" वादो के दो बड़े दुश्मन होते हैं . अधिकारी लिखित सर्टिफिकेट से कम पर कोई भरोसा नहीं करता . अविश्वासं फलम् दायकम् के बल पर  वकीलो की चल निकलती है , एफीडेविट , और पंजीकरण के बिना न्यायालयो के काम ही नही चलते . अविश्वास के बूते ही रजिस्ट्रार का आफिस सरकार का कमाऊ पूत होता है .

भरी गर्मी में पसीना बहाते चुनावी रैलियां और भाषण करते नेताओ को देखकर विश्वास करना पड़ता है कि इन सब को वोटर पर और तो और खुद की की गई कथित जनसेवा पर तक तन्निक भी भरोसा नही है . वरना भला जिस नेता ने पांच सालो तक वोटर की हर तरह से खिदमत की हो उसे अपने लिये मुंए वोटर से महज एक वोट मांगने के लिये इस तरह साम दाम दण्ड भेद , मार पीट , लूट पाट , खून खराबा न करवाना पड़ता . बेवफा वोटर को लुभाने के लिये जारी सारे घोषणा पत्र , वचन पत्र और संकल्प पत्र यही प्रमाणित करते हैं कि राजनेता वोटर संबंध अविश्वासं फलम् दायकम् के मंत्र पर ही काम करते हैं . चुनाव जीतने से पहले नेता वोटर पर अविश्वास करता है और चुनाव जीत जाने के बाद खुद पर वोटर के अविश्वास को प्रमाणित करने में जुटा रहता है . अविश्वास का ही फल होता है कि शर्मा हुजूरी कुछ जन कल्याण के काम हो ही जाते हैं , क्योकि बजट खतम करने की एक लास्ट डेट होती है , अविश्वासं फलम् दायकम् के चलते ही काम के लिये पर्सु॓एशन किया जाता है , कुछ काम समय पर हो जाते हैं .आाकड़ो में सजा हुआ विकास दरअसल अविश्वासं फलम् दायकम् का ही सुफल होता है .   इसलिये कुछ भरोसे लायक पाना हो तो भरोसा ना करिये .  



विवेक रंजन  श्रीवास्तव

पटना और प्रधानमंत्री

रपट:
पटना और प्रधानमंत्री 
कहा जाता है कि राजनीति संभावनाओं का खेल है। गत तीन दिनी पटना प्रवास ने संभावनाओं के उस क्षितिज को उद्घाटित किया जिस पर देश को प्रथम राष्ट्रपति देनेवाले राज्य बिहार और शहर पटना को आगामी प्रधानमंत्री देने का अवसर मिल सकता है।

कायस्थ विरोधी षड्यंत्र
विचित्र विरोधाभास है कि हिंदू महासभा के आरंभ में महाराष्ट्र वीर जगन्नाथ प्रसाद वर्मा से लेकर वर्तमान भाजपा में आर. के. सिन्हा, शत्रुघ्न सिन्हा व रविशंकर प्रसाद जैसे समर्थ व्यक्तित्वों के होते हुए भाजपा नेतृत्व कायस्थों के कमजोर करने की राह पर चलता रहा है । अटल-शासन में मंत्री रह चुके शत्रुघ्न सिन्हा को लगातार हाशिए पर रखकर उपेक्षित करने से मन नहीं भरा तो टिकिट न देकर दल छोड़ने के लिए विवश किया गया। 
पटनानिवासियों ही नहीं भारत के कायस्थ जनों के आशा-केंद्र आर. के. सिन्हा को टिकिट न देकर भाजपामें बैठे कायस्थ विरोधी तबके ने कायस्थों की आशा पर तुषाराघात कर दिया। देश के कोने-कोने से विश्व कायस्थ समाज, चित्रगुप्त सेना, अखिल भारतीय कायस्थ महासभा, राष्ट्रीय कायस्थ महापरिषद, इटरनल कायस्थ फ्रेटरनिटी आदि संस्थाओं के कार्यकर्ता आर. के. सिन्हा को प्रचारार्थ पटना जाने के लिए तैयार हैं किंतु इस निर्णय ने उन्हें इतना आक्रोशित किया है कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में भाजपा से मुख मोड़कर बैठ गए हैं। कायस्थ विरोधी तबके ने आत्मघाती कदम उठाकर पटना को कुरुक्षेत्र से- सिन्हा द्वय को बाहर कर दिया है।

कायस्थ सांसद घटाने का षड़यंत्र
देश की सर्वाधिक बुद्धिजीवी और शिक्षित कायस्थ जाति के गिने-चुने सांसदों-विधायकों को भी समाप्त करने की नीति के अंतर्गत बिहार के तीन सांसदों आर. के. सिन्हा, शत्रुघ्न सिन्हा व रविशंकर प्रसाद के घटाकर एक करने की कुटिलतापूर्ण चाल चलते हुए कायस्थ विरोधी तबका शत्रु का टिकिट काटकर ही नहीं रुका अपितु एक साल बाद राज्यसभा कार्यकाल समाप्त कर रहे आर. के.  सिन्हा को टिकिट देने की प्रत्याशा में दिल्ली बुलाकर टिकिट न देकर अपमानित भी किया। हद तो तब हुई जब राज्य सभा में चार साल का कार्यकाल शेष रखनेवाले रविशंकर प्रसाद को पटना से प्रत्याशी बना दिया गया। उल्लेखनीय है कि रविशंकर प्रसाद की छवि सक्रिय सामाजिक कायस्थ संस्थाओं से दूर रहने की है जबकि आर. के. सिन्हा कायस्थ समाज में सर्वाधिक लोकप्रिय हैं।
कायस्थ विरोधी धड़े ने 'या कायथ को कायथ मारे या मारे करतार' का नीति का अनुसरण करते हुए पटना में तीनों कायस्थ नेताओं के लड़ाकर कायस्थ सांसदों को घटाने का घटिया दाँव खेला। उल्लेखनीय कि भोपाल मध्यप्रदेश को वर्तमान लोकप्रिय सांसद आलोक संजर का टिकिट काटा जाकर साध्वी प्रग्या को दिया जा चुका है। इस चक्रव्यूह में आर. के. सिन्हा को शत्रुघ्न का तरह फँसाकर दल बाहर किए जाने की चाल का पूर्वानुमान कर चतुर आर. के. ने दल के प्रति प्रेम और समर्पण का परिचय देते हुए अन्यत्र महाराष्ट्र में प्रचार कार्य में खुद को लगा लिया।

पटना से प्रधानमंत्री
भाजपा को भीतरी कायस्थविरोध ने पटना को मतदाताओं के सम्मुख संभावना का अकल्पनीय अवसर ला दिया है। विपक्ष में सर्वमान्य प्रधानमंत्री प्रत्याशी न होने के तर्क का उत्तर पटना से रविशंकर प्रसाद को पटकनी देकर शत्रु के मित्र बने रहकर पटनावासी दे सकते हैं। इससे आर. के., शत्रु व रविशंकर तीनों कायस्थ सांसद भी बने रह सकते हैं।
मौका और चौका
भाजपा नीत गठबंधन को स्पष्ट बहुमत न मिलने की स्थिति में महागठबंधन सर्व सम्मत नेता की तलाश कर सरकार बनाने का दावा पेश करेगा। सांसद चुने जाने पर शत्रुघ्न सिन्हा को कांग्रेस के साथ-साथ सपा - बसपा गठबंधन की समर्थन मिल सकेगा चूँकि शत्रु-पत्नी पूनम सपा का सांसद प्रत्याशी हैं। ऐसी स्थिति में अटल सरकार में शत्रु के साथ मंत्री  रह चुके शरद पवार, चंद्रबाबू नायडू व ममता का समर्थन उन्हें मिल सकता है। पटनायक को भी साथ आने में परेशानी न होगी। उपराष्ट्रपति पद के प्रस्ताव पाकर शिवसेना भी समर्थन दे सकती है। कराल, राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकारें हैं ही। 
प्रधान मंत्री बनकर चौतरफा आक्रमण झेलने के स्थान पर राहुल सोनिया की तरह किंगमेकर बनकर संतुष्ट, सुरक्षित और सुखी रह सकते हैं।

पटनावासी देश को भावी प्रधानमंत्री देने की संभावना के बीज को वट वृक्ष बनाते हैं या नष्ट कर देते हैं इसका उत्तर चुनाव परिणाम देगा। अतीत में देवेगौड़ा, चंद्रशेखर, गुजराल, चरणसिंह जैसे असंभावित प्रधान मंत्री बन ही चुके हैं। शत्रुघ्न का आभामंडल और समर्थन उनसे बीस ही है, उन्नीस नहीं। रही बात स्थायित्व की तो सभी पूर्ववर्ती गैर कांग्रेसी थे,  शत्रु कांग्रेसी हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि पटना प्रधानमंत्री बनाने की संभावना को कैसे मूर्त करता या नहीं करता है।
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संजीव वर्मा 'सलिल'
विश्ववाणी समाचार
९४२५१८३२४४

बुधवार, 17 अप्रैल 2019

एक रचना

एक रचना
आओ भौंकें
*
आओ भौंकें
लोकतंत्र का महापर्व है
हमको खुद पर बहुत गर्व है
चूक न जाए अवसर भौंकें
आओ भौंकें
*
क्यों सोचें क्या कहाँ ठीक है?
गलत बनाई यार लीक है
पान मान का नहीं सुहाता
दुर्वचनों का अधर-पीक है
मतलब तज, बेमतलब टोंकें
आओ भौंकें
*
दो दूनी हम चार न मानें
तीन-पाँच की छेड़ें तानें
गाली सुभाषितों सी भाए
बैर अकल से पल-पल ठानें
देख श्वान भी डरकर चौंकें
आओ भौंकें
*
बिल्ला काट रास्ता जाए
हमको नानी याद कराए
दंडों रे सम्मुख नतमस्तक
हमें न नियम-कायदे भाए
दुश्मन देखें झट से पौंकें
आओ भौंकें
*
हम क्या जानें इज्जत देना
हमें सभ्यता से क्या लेना?
ईश्वर को भी बीच घसीटें

मंगलवार, 16 अप्रैल 2019

भक्ति गीत : कहाँ गया

भक्ति गीत :
कहाँ गया
*
कहाँ गया रणछोड़ रे!
जला प्रेम की ज्योत 
*
कण-कण में तू रम रहा
घट-घट तेरा वास.
लेकिन अधरों पर नहीं
अब आता है हास.
लगे जेठ सम तप रहा
अब पावस-मधुमास
क्यों न गूंजती बाँसुरी
पूछ रहे खद्योत
कहाँ गया रणछोड़ रे!
जला प्रेम की ज्योत
*
श्वास-श्वास पर लिख लिया
जब से तेरा नाम.
आस-आस में तू बसा
तू ही काम-अकाम.
मन-मुरली, तन जमुन-जल
व्यथित विधाता वाम
बिसराया है बोल क्यों?
मिला ज्योत से ज्योत
कहाँ गया रणछोड़ रे!,
जला प्रेम की ज्योत
*
पल-पल हेरा है तुझे
पाया अपने पास.
दिखता-छिप जाता तुरत
ओ छलिया! दे त्रास.
ले-ले अपनीं शरण में
'सलिल' तिहारा दास
दूर न रहने दे तनिक
हम दोनों सहगोत
कहाँ गया रणछोड़ रे!
जला प्रेम की ज्योत 
१६.४.२०१७
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ग्रीष्म के दोहे

ग्रीष्म के दोहे 
*
नित्य निनादित नर्मदा, कलकल सलिल प्रवाह
ताप किनारे ही रुका, लहर मिटाती दाह
*
परकम्मा करते चरण, वरते पुण्य असीम
छेंक धूप को छाँह दें, पीपल, बरगद, नीम
*
मन कठोर चट्टान सा, तप पा-देता कष्ट
जल संतों सा तप करे, हरता द्वेष-अनिष्ट
*
मग पर पग पनही बिना, नहीं उचित इस काल
बाल न बाँका लू करे, पनहा पी हर हाल
*
गाँठ प्याज की संग रख, लू से करे बचाव
मट्ठा पी ठट्ठा करो, व्यर्थ न खाओ ताव
*
भर गिलास लस्सी पियो, नित्य मलाईदार
कहो 'नर्मदे हर' सलिल, एक नहीं कई बार
*
पीस पोदीना पत्तियाँ, मिर्ची-कैरी-प्याज
काला नमक व गुड़ मिला, जमकर खा तज लाज
*
मीठी या नमकीन हो, रुचे महेरी खूब
सत्तू पी ले घोलकर, जा ठंडक में डूब
*
खरबूजे-तरबूज से, मिले तरावट खूब
लीची खा संजीव नित, मस्ती में जा डूब
*
गन्ना-रस ग्लूकोज़ का, करता दूर अभाव
गुड़-पानी अमृत सदृश, पार लगाता नाव 
१६.४.२०१७
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