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गुरुवार, 9 जुलाई 2020

विश्ववाणी हिंदी संस्थान जबलपुर दोहा शतक मंजूषा ४

विश्ववाणी हिंदी संस्थान जबलपुर
दोहा शतक मंजूषा ४
दोहा है आशा-किरण
*
दोहा है आशा-किरण में ११ दोहाकारों के १००-१०० दोहे, चित्र, परिचय, दोहों पर समीक्षा, सम्मिलित हैं। हर सहभागी को ११ प्रतियाँ डाक व्यय निशुल्क सुविधा सहित प्राप्त होंगी। सहभागिता निधि ३०००/- मात्र दोहे स्वीकृत होने के पश्चात बताये बैंक लेखा में जमा करनी होगी। पूर्व प्रकाशित ३ भाग तथा संस्थान के निम्न प्रकाशन मूल्य ८००/-, ५०% छूट सहित उपलब्ध हैं।
शांति-राज स्व-पुस्तकालय योजना
निम्न में से ५००/- से अधिक की पुस्तकें मँगाने पर मूल्य में ४०% छूट, पैकिंग व डाक व्यय निशुल्क की सुविधा उपलब्ध है। राशि बैंक ऑफ़ इण्डिया, राइट टाउन शाखा जबलपुर IFSC- BKDN ०८११११९, लेखा क्रमांक १११९१०००२२४७ में जमा करें।
पुस्तक सूची
०१. मीत मेरे कविताएँ -आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' १५०/-
०२. काल है संक्रांति का गीत-नवगीत संग्रह -आचार्य संजीव 'सलिल' १५०/-
०३. कुरुक्षेत्र गाथा खंड काव्य -स्व. डी.पी.खरे -आचार्य संजीव 'सलिल' ३००/-
०४. पहला कदम काव्य संग्रह -डॉ. अनूप निगम १००/-
०५. कदाचित काव्य संग्रह -स्व. सुभाष पांडे १२०/-
०६. Off And On -English Gazals -Dr. Anil Jain ८०/-
०७. यदा-कदा -उक्त का हिंदी काव्यानुवाद- डॉ. बाबू जोसफ-स्टीव विंसेंट
०८. Contemporary Hindi Poetry - B.P. Mishra 'Niyaz' ३००/-
०९. महामात्य महाकाव्य -दयाराम गुप्त 'पथिक' ३५०/-
१०. कालजयी महाकाव्य -दयाराम गुप्त 'पथिक' २२५/-
११. सूतपुत्र महाकाव्य -दयाराम गुप्त 'पथिक' १२५/-
१२. अंतर संवाद कहानियाँ -रजनी सक्सेना २००/-
१३. दोहा-दोहा नर्मदा दोहा संकलन -सं. सलिल-डॉ. साधना वर्मा २५०/-
१४. दोहा सलिला निर्मला दोहा संकलन -सं. सलिल-डॉ. साधना वर्मा २५०/-
१५. दोहा दिव्य दिनेश दोहा संकलन -सं. सलिल-डॉ. साधना वर्मा ३००/-
१६. सड़क पर गीत-नवगीत संग्रह आचार्य संजीव 'सलिल' ३००/-
१७. The Second Thought - English Poetry - Dr .Anil Jain​ १५०/-
१८. मौसम अंगार है नवगीत संग्रह -अविनाश ब्योहार १६०/-
१९. सार्थक लघुकथाएँ -सं. संजीव सलिल-कांता रॉय प्रकाशनाधीन
२०. आदमी जिन्दा है लघुकथा संग्रह -आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' २००/- यंत्रस्थ
२१. दिव्य गृह - खंड काव्य -आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' १५०/- यंत्रस्थ
(रोमानियन काव्य लुसिआ फेरुल का दोहा भावानुवाद)
२२. हस्तिनापुर की बिथा-कथा (बुंदेली महाकाव्य ) डॉ. मुरारीलाल खरे ३००/-
२३ दोहा है आशा-किरण दोहा संकलन -सं. सलिल-डॉ. साधना वर्मा प्रकाशनाधीन
२४. प्रतिनिधि लघुकथाएँ -सं. -संजीव सलिल, छाया सक्सेना प्रकाशनाधीन
***

द्वि इंद्रवज्रा सवैया

स्नेहिल सलिला सवैया ​​ : १.
द्वि इंद्रवज्रा सवैया
सम वर्ण वृत्त छंद इन्द्रवज्रा (प्रत्येक चरण ११-११ वर्ण, लक्षण "स्यादिन्द्र वज्रा यदि तौ जगौ ग:" = हर चरण में तगण तगण जगण गुरु)
SSI SSI ISI SS
तगण तगण जगण गुरु गुरु
विद्येव पुंसो महिमेव राज्ञः, प्रज्ञेव वैद्यस्य दयेव साधोः।
लज्जेव शूरस्य मुजेव यूनो, सम्भूषणं तस्य नृपस्य सैव॥
उदाहरण-
०१. माँगो न माँगो भगवान देंगे, चाहो न चाहो भव तार देंगे। होगा वही जो तकदीर में है, तदबीर के भी अनुसार देंगे।। हारो न भागो नित कोशिशें हो, बाधा मिलें जो कर पार लेंगे।
माँगो सहारा मत भाग्य से रे!, नौका न चाहें मँझधार लेंगे।
०२ नाते निभाना मत भूल जाना, वादा किया है करके निभाना।
या तो न ख़्वाबों तुम रोज आना, या यूँ न जाना करके बहाना। तोड़ा भरोसा जुमला बताया, लोगों न कोसो खुद को गिराया।
छोड़ो तुम्हें भी हम आज भूले, यादों न आँसू हमने गिराया।
_ ८.७.२०१९ संजीव __________

मुक्तिका: सुमेरु छंद

एक मुक्तिका:
महापौराणिक जातीय, सुमेरु छंद
विधान: १९ मात्रिक, यति १०-९, पदांत यगण
*
न जिंदा है; न मुर्दा अधमरी है.
यहाँ जम्हूरियत गिरवी धरी है.
*
चली खोटी; हुई बाज़ार-बाहर
वही मुद्रा हमेशा जो खरी है.
*
किये थे वायदे; जुमला बताते
दलों ने घास सत्ता की चरी है.
*
हरी थी टौरिया; कर नष्ट दी अब
तपी धरती; हुई तबियत हरी है.
*
हवेली गाँव की; हम छोड़ आए.
कुठरिया शहर में, उन्नति करी है.
*
न खाओ सब्जियाँ जो चाहता दिल.
भरा है जहर दिखती भर हरी है.
*
न बीबी अप्सरा से मन भरा है
पड़ोसन पूतना लगती परी है.
*
slil.sanjiv@gmail.com
९.७.२०१८, ७९९९५५९६१८

कार्यशाला: सोहन परोहा 'सलिल'-संजीव वर्मा 'सलिल' *

कार्यशाला: एक रचना दो रचनाकार
सोहन परोहा 'सलिल'-संजीव वर्मा 'सलिल'
*
'सलिल!' तुम्हारे साथ भी, अजब विरोधाभास।
तन है मायाजाल में, मन में है सन्यास।। -सोहन परोहा 'सलिल'
मन में है सन्यास, लेखनी रचे सृष्टि नव।
जहाँ विसर्जन वहीं निरंतर होता उद्भव।।
पा-खो; आया-गया है, हँस-रो रीते हाथ ही।
अजब विरोधाभास है, 'सलिल' हमारे साथ भी।। -संजीव वर्मा 'सलिल'
*
९.७.२०१८

दोहा सलिला

दोहा सलिला:
जान जान की जान है
*
जान जान की जान है, जान जान की आन.
जहाँ जान में जान है, वहीं राम-रहमान.
*
पड़ी जान तब जान में, गई जान जब जान.
यह उसके मन में बसी, वह इसका अरमान.
*
निकल गई तब जान ही, रूठ गई जब जान.
सुना-अनसुना कर हुई, जीते जी बेजान.
*
देता रहा अजान यह, फिर भी रहा अजान.
जिसे टेरता; रह रहा, मन को बना मकान.
*
है नीचा किरदार पर, ऊँचा बना मचान.
चढ़ा; खोजने यह उसे, मिला न नाम-निशान.
*
गया जान से जान पर, जान देखती माल.
कुरबां जां पर जां; न हो, जब तक यह कंगाल.
*
नहीं जानकी जान की, तनिक करे परवाह.
आन रहे रघुवीर की, रही जानकी चाह.
*
जान वर रही; जान वर, किन्तु न पाई जान.
नहीं जानवर से हुआ, मनु अब तक इंसान.
*
कंकर में शंकर बसे, कण-कण में भगवान.
जो कहता; कर नष्ट वह, बनता भक्त सुजान.
*
जान लुटाकर जान पर, जिन्दा कैसे जान?
खोज न पाया आज तक, इसका हल विज्ञान.
*
जान न लेकर जान ले, जो है वही सुजान.
जान न देकर जान दे, जो वह ही रस-खान.
*
जान उड़ेले तब लिखे, रचना रचना कथ्य.
जान निकाले ले रही, रच ना; यह है तथ्य.
*
कथ्य काव्य की जान है, तन है छंद न भूल.
अलंकार लालित्य है, लय-रस बिन सब धूल.
*
९.७.२०१८, ७९९९५५९६१८

दोहा सलिला

दोहा सलिला 
*
प्रभा लाल लख उषा की, अनिल रहा है झूम
भोर सुहानी हो गई, क्यों बतलाये कौन?
*
श्वास सुनीता हो सदा, आस रहे शालीन
प्यास पुनीता हो अगर, त्रास न कर दे दीन
*
वही पूर्णिमा निरूपमा, जो दे जग उजियार
चंदा तारे नभ धरा, उस पर हों बलिहार
*
जो दे सबको प्रेरणा, उसका जीवन धन्य.
गुप्त रहे या हो प्रगट, है अवदान अनन्य.
*
खिल बसन्त में मंजरी, देती है पैगाम.
देख आम में खास तू, भला करेंगे राम.
*
देख अरुण शर्मा उषा, हुई शर्म से लाल.
आसमान के गाल पर, जैसे लगा गुलाल.
*
चन्द्र कांता खोजता, कांति सूर्य के साथ.
अग्नि होत्री सितारे, करते दो दो हाथ.
*
श्री वास्तव में साथ ले, तम हरता आलोक.
पैर जमाकर धरा पर, नभ हाथों पर रोक.
*
आ दिनेश सह चंद्र जब, छू लेता आकाश.
धूप चाँदनी हों भ्रमित, किसको बाँधे पाश.
*
नहीं रमा का, दिलों पर, है रमेश का राज.
दौड़े तेवरी कार पर, पहने ताली ताज.
*
९-७-२०१८ 

दोहा सलिला

दोहा सलिला:
*
गुरु न किसी को मानिये, अगर नहीं स्वीकार
आधे मन से गुरु बना, पछताएँ मत यार
*
गुरु पर श्रद्धा-भक्ति बिन, नहीं मिलेगा ज्ञान
निष्ठा रखे अखंड जो, वही शिष्य मतिमान
*
गुरु अभिभावक, प्रिय सखा, गुरु माता-संतान
गुरु शिष्यों का गर्व हर, रखे आत्म-सम्मान
*
गुरु में उसको देख ले, जिसको चाहे शिष्य
गुरु में वह भी बस रहा, जिसको पूजे नित्य
*
गुरु से छल मत कीजिए, बिन गुरु कब उद्धार?
गुरु नौका पतवार भी, गुरु नाविक मझधार
*
गुरु को पल में सौंप दे, शंका भ्रम अभिमान
गुरु से तब ही पा सके, रक्षण स्नेह वितान
*
गुरु गुरुत्व का पुंज हो, गुरु गुरुता पर्याय
गुरु-आशीषें तो खुले, ईश-कृपा-अध्याय
*

तुलसी सदा समीप हो, नागफनी हो दूर
इससे मंगल कष्ट दे, वह सबको भरपूर
***

गीत: कमल-कमलिनी विवाह

अभिनव प्रयोग-
गीत:
कमल-कमलिनी विवाह
संजीव 'सलिल'
*
*
अंबुज शतदल कमल
अब्ज हर्षाया रे!
कुई कमलिनी का कर
गहने आया रे!...
*
अंभज शीतल उत्पल देख रहा सपने
बिसिनी उत्पलिनी अरविन्दिनी सँग हँसने
कुंद कुमुद क्षीरज अंभज नीरज के सँग-
नीलाम्बुज नीलोत्पल नीलोफर के रंग.
कँवल जलज अंबोज नलिन पुहुकर पुष्कर
अर्कबन्धु जलरुह राजिव वारिज सुंदर
मृणालिनी अंबजा अनीकिनी वधु मनहर
यह उसके, वह भी
इसके मन भाया रे!...
*
बाबुल ताल, तलैया मैया हँस-रोयें
शशिप्रभ कुमुद्वती किराविनी को खोयें.
निशापुष्प कौमुदी-करों मेंहदी सोहे.
शारंग पंकज पुण्डरीक मुकुलित मोहें.
बन्ना-बन्नी, गारी गायें विष्णुप्रिया.
पद्म पुंग पुन्नाग शीतलक लिये हिय.
रविप्रिय शीकर कैरव को बेचैन किया
अंभोजिनी अंबुजा
हृदय अकुलाया रे!...
*
चंद्रमुखी-रविमुखी हाथ में हाथ लिये
कर्णपूर सौगन्धिक सहरापद साथ लिये.
इन्दीवर सरसिज सरोज फेरे
लेते.
मौन अलोही अलिप्रिय सात वचन देते.
असिताम्बुज असितोत्पल-शोभा कौन कहे?
सोमभगिनी शशिकांति-कंत सँग मौन रहे.
'सलिल'ज हँसते नयन मगर जलधार बहे
श्रीपद ने हरिकर को
पूर्ण बनाया रे!...
***************
टिप्पणी: कमल, कुमुद, व कमलिनी का प्रयोग कहीं-कहीं भिन्न पुष्प प्रजातियों
के रूप में है, कहीं-कहीं एक ही प्रजाति के पुष्प के पर्याय के रूप में.
कमल के रक्तकमल, नीलकमल तथा श्वेतकमल तीन प्रकार रंग के आधार पर वर्णित हैं. कमल-कमलिनी का विभाजन बड़े-छोटे आकर के आधार पर प्रतीत होता है. कुमुदको कहीं कमल कहीं कमलिनी कहा गया है. कुमद के साथ कुमुदिनी का भी प्रयोग हुआ है. कमल सूर्य के साथ उदित होता है, उसे सूर्यमुखी, सूर्यकान्ति, रविप्रिया आदि कहा गया है. रात में खिलनेवाली कमलिनी को शाशिमुखी, चन्द्रकान्ति कहा गया है. रक्तकमल के लाल रंग की हरि तथा लाक्स्मी के कर-पद पल्लवों से समानता के कारण हरिपद, श्रीकर जैसे पर्याय बने हैं, सूर्य, चन्द्र, विष्णु, लक्ष्मी, जल, नदी, समुद्र, सरोवर आदि के पर्यायों के साथ जोड़ने पर कमल के अनेक और पर्यायी शब्द बनते हैं. मुझेसे अनुरोध था कि कमल के सभी पर्यायों को गूँथकर रचना करूँ. मान शारदा के श्री चरणों में यह कमल माल अर्पित करने का सुअवसर देने के लिये पाठशाला-संचालकों का आभारी हूँ.
सभी पर्यायों को गूंथने पर रचना अत्यधिक लंबी होगी. पाठकों की प्रतिक्रिया
ही बताएगी कि गीतकार निकष पर खरा उतर सका या नहीं.

दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम
९-७-२०१०

मुक्तिका मोहन छंद

हिंदी ग़ज़ल / मुक्तिका
[रौद्राक जातीय, मोहन छंद, ५,६,६,६]
*
''दिलों के / मेल कहाँ / रोज़-रोज़ / होते हैं''
मिलन के / ख़्वाब हसीं / हमीं रोज़ / बोते हैं
*
बदन को / देख-देख / हो गये फि/दा लेकिन
न मन को / देख सके / सोच रोज़ / रोते हैं
*
न पढ़ अधि/क, ले समझ/-सोच कभी /तो थोड़ा
ना समझ / अर्थ राम / कहें रोज़ / तोते हैं
*
अटक जो / कदम गए / बढ़ें तो मि/ले मंज़िल
सफल वो / जो न धैर्य / 'सलिल' रोज़ / खोते हैं
*
'सलिल' न क/रिए रोक / टोक है स/फर बाकी
करम का / बोझ मौन / काँध रोज़ / ढोते हैं
***

९-७-२०१६ 

यौन और ध्यान : ऊर्जा संतुलन

यौन  ऊर्जा को सामान्य व्यक्ति बिल्कुल नहीं समझता। कोई समझाने का प्रयत्न करता है, तो उसको 'यौन गुरु' कह दिया जाता है। व्यापारिक यौन गुरु इसे व्यवसाय बनाकर ठगते हैं। प्रत्यक्ष और सहज रूप में अध्यात्मिक दृष्टिकोण से समझकर इस दुविधा से  मुक्त होना आवश्यक है। धर्म और सामाजिक मान्यताएँ कहती हैं सेक्स से बचो,‌  दूसरी ओर हमारा शरीर और मन को यौन की भूख निरंतर सताती है। इंसान सेक्स करे तो अपराध भाव से पीड़ित है और ना करे तो प्रकृति पागल कर देती है और फिर इस पागलपन से कई अपराध उत्पन्न होते हैं। इंसान की हालत एक  प्रेशर कुकर जैसी है - एक ऐसा प्रेशर कुकर जिसके नीचे आग सुलगाकर ऊपर सीटी लगा दी गई है और उस सीटी को एक अत्यंत वजनदार वस्तु से दबा दिया गया है। प्रकृति की आग है और सांसारिक और धार्मिक मान्यताएँ वजनदार वस्तुएँ ऊर्जा को बहने से रोकती हैं। इस दबाव के कारण जो ऊर्जा प्रकृति अनुसार सेक्स सेंटर से बहनी थी, वह क्रोध, ईर्ष्या, घृणा, हिंसा आदि के रूप में बाहर आती है।
यौन इच्छाओं से ऊपर उठने की बात इसलिए की गई थी कि इंसान स्वत: शांत और उल्लास पूर्ण हो सके परंतु जो हो रहा है वह उसका बिल्कुल उल्टा है। कुछ तो गलती हुई है इस यौन को समझने में। अगर यौन पाप है तो इस पूरी दुनिया का जन्म पाप से ही है और पूरी दुनिया तो परमात्मा का ही रूप है। तो परमात्मा को भी हमने पापी बना दिया। यौन शब्द इंसान के मन पर हावी है। मैं यह नहीं कहता कि इंसान सेक्स की तरफ अग्रसर है। मैं यह कहता हूं कि या तो इंसान बहुत ही कामोत्तेजक है या फिर यौन का अत्यंत दमित है। दोनों  अवस्थाओं में इंसान बहुत ऊर्जा व्यर्थ करता है। बहुत अजीब है कि यौन के दमन अथवा काम उत्तेजना में जितनी ऊर्जा व्यर्थ जाती है, उसके सामने सेक्स कर लेने में बहुत ही नाममात्र ऊर्जा इस्तेमाल होती है। यौन एक ऊर्जा है जो कि आपके मूलाधार पर केंद्रित है। यह आटे की तरह है जिससे आप पूरी, रोटी,‌ परांठे  बहुत कुछ बना सकते हैं, जिसमें आटा मूल तत्व है और उससे उत्पन्न होने वाली वस्तु एक सुंदर रूपांतरण है। इस उत्तर को सही अर्थों में समझने के लिए यौन को पाप की तरह नहीं, एक ऊर्जा की तरह देखना होगा। धार्मिक और सामाजिक मान्यताओं से ऊपर उठकर धर्म सत्य में क्या कहना चाहता है, उसे समझना होगा। जान लीजिए कि अध्यात्म यौन के विरुद्ध नहीं है।  
यौन इच्छाओं पर काबू पाना ही क्यों है? एक ओर तो धर्म प्रचारक यौन न करने की बात करते हैं और दूसरी ओर पूरा विश्व यौन करता चला जाता है। समाज यौन को समझने में असमर्थ रहा है। बचपन से ही आपको यह सिखा दिया गया कि यौन बुरा है, उससे बचना है क्योंकि वह पाप अथवा अशुद्ध है। अत्यंत ही दुख की बात है कि जिस क्रीड़ा से जीवन इस पृथ्वी पर बहता है, उसी को पाप कह दिया गया। ऐसी भूल अज्ञानता वश की जा रही है। यह बात एक बच्चे के कोमल मन में इतनी गहराई से उतार दी जाती है कि वह युवावस्था में पहुँचने के बाद अपराध भाव से ग्रस्त रहता है।सही समझ ना मिलने के कारण यह दुख जीवन भर बना रहता है, बुढ़ापे में भी।मान्यताओं उन पर प्रश्न करनेसे आपको ऊर्जा के विज्ञान को समझने में सहायता मिलेगी।
दूसरी बात यह समझनी होगी कि यौन इच्छाओं को काबू करने का सिलसिला कैसे हुआ। हमारे कई महान् ऋषि-मुनियों ने जाना कि ऊर्जा का स्रोत हमारे मूलाधार चक्र पर ही है जिसे कुंडलिनी भी कहते हैं। अगर इसको जगा कर रूपांतरित किया जा सके या इसको ऊपर की ओर निर्देशित किया जा सके तो यही ऊर्जा प्रेम शांति और आनंद हो जाती है। तो बात इतनी सरल है। किसी भी महर्षि ने यौन शक्ति के दमन की बात नहीं की। केवल और केवल ऊर्जा रूपांतरण और ऊर्जा प्रवाह को निर्देशित करने की बात की है। धर्म के शिक्षक इस स्तर पर नहीं है कि इस ऊर्जा को पूर्णतया जान सके, इसके बारे में बहुत भ्रांतियाँ फैला दी गई। वह ऊर्जा जो जीवन का स्रोत है, वह तो जीवन का एक उपहार है। यह जान लेने के बाद कि सेक्स तो केवल एक ऊर्जा है, न्यूट्रल है, उसको रूपांतरण करने करने की जिम्मेदारी हम पर है। बहुत लोग हैं जो कह देते हैं कि ध्यान कहीं और लगाओ, स्वयं को कार्य में व्यस्त रखो अथवा कुछ। यह उपाय कुछ ही दिनों में खंड-खंड हो जाते हैं क्योंकि उद्देश्य सेक्स के दमन का है।
सबसे जरूरी और तीसरी बात - अगर सेक्स के प्रति अपराध भाव है, तो सेक्स इच्छाओं से मुक्ति नहीं पाई जा सकती, केवल दमन हो सकता है जो अक्सर विनाशकारी होता है। अगर इच्छाओं पर काबू पाना चाहते हो, तो पहले सेक्स के प्रति अपराध भाव को त्यागना होगा। उसको एक ऊर्जा की भांति देखना होगा, समझना होगा। केवल और केवल ऊर्जा के विज्ञान को समझ कर इस ऊर्जा का श्रेष्ठ इस्तेमाल किया जा सकता है। सेक्स की इच्छा की उत्पत्ति इतनी तीव्र है ही इसलिए क्योंकि हमने सेक्स का बहुत दमन कर दिया। इसको इस तरह समझिए- जब भूख लगती है तो क्या आप यह कहते हुए फिरते हैं कि कुछ खाने की इच्छा है, मैं इसे किस तरह काबू करूं? लेकिन सेक्स के लिए आप यह कहते फिरते हैं जबकि शारीरिक स्तर पर यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। गौर कीजिए, ऐसा क्यों है और सेक्स के साथ ही क्यों, भोजन के साथ क्यों नहीं? कहीं ऐसा तो नहीं जिन्हें खुद ही ज्ञान नहीं, उन्होंने आपको बहुत कुछ सिखा दिया? 
शक्ति तो जीवनदायिनी है - केवल भीतर शक्ति का रूपांतरण कर शिव तक पहुंचा जा सकता है, शक्ति का निरादर कर नहीं। अब शक्ति के रूपांतरण की बात करते हैं। जैसा मैंने पहले कहा, रूपांतरण पूर्णत: तभी संभव है जब सेक्स के प्रति अपराध भाव से व्यक्ति मुक्त है। शुरुआत की जा सकती है अपराध भाव होते हुए भी लेकिन अंत तभी हो पाएगा या यूं कह लीजिए की रूपांतरण तभी पूर्ण हो पाएगा जब सेक्स के प्रति अपराध भाव पूरा समाप्त हो जाए। इस उत्तर में मैं जो भी विद्या लिख रहा हूं वह एक आम व्यक्ति के लिए है। हो सकता है कि कोई साधक किसी ऐसे सत्यगुरु के पास हो जो सेक्स ना करने को कहता हूं और वह उसके लिए अपने शिष्य को कुछ विधियाँ बताए। लेकिन ऐसी विद्या केवल बहुत ही कम लोगों के लिए होती है और यह संसार से दूर रहकर अर्जित की जाती है। संसारी को अगर संसार में रहते हुए ही योग करना है, तो उसमें उचित है कि सरल मार्ग से चला जाए।
तो इस विद्या का पहला मुख्य उपाय है यह समझना कि सेक्स शरीर से संबंधित है। उसे मन पर हावी नहीं होने देना। सेक्स मन पर तब हावी होता है या तीव्र इच्छाओं के रूप में तब प्रकट होता है जब शरीर को सेक्स ना मिले अथवा मिले परंतु साथ ही अपराध भाव भी मिले, जिससे संतुष्टि हो नहीं पाती। तो पहली बात, अगर सेक्स कर ही रहे हो,‌ तो पूर्णतया करो। उसमें अपराध भाव मत लाओ। जितनी ऊर्जा सेक्स पर लगाओगे उससे कई गुना अधिक ऊर्जा सेक्स की इच्छाओं में व्यर्थ करोगे, अगर शरीर के स्तर पर तृप्ति नहीं है तो।
एक संसारी के लिए यह वह आधार है जिस पर खड़े हो ऊर्जा का रूपांतरण सही अर्थों में शुरू किया जा सकता है। बात को समझिए - सेक्स के दमन से आप मन के स्तर पर सेक्स ऊर्जा से इतनी दूर हो गए हैं की ऊर्जा पर काम ही नहीं हो पाता। जब आप खाना बनाते हैं तो क्या दूर से रहकर ही खाना बन जाएगा? नहीं, सब्जियाँ काटनी होंगी, पकानी होंगी। खाना बनाने के लिए मूल वस्तुओं पर काम करना ही पड़ेगा और वह दूर रहकर हो नहीं सकता। इसी प्रकार सेक्स ऊर्जा के रूपांतरण के लिए सेक्स उर्जा को समझ कर उस पर काम करना होगा। जिसे रूपांतरण करना चाहते हो, उसे प्रेम से अपनाना होगा। अगर यह मूल समझ में आ गया तो अब रूपांतरण की बात की जा सकती है। रूपांतरण के लिए बहुत सी क्रियाएँ और साधन उपलब्ध है। मैं एक सरल मार्ग की बात करूँगा जो कि एक आम व्यक्ति जीवन में अपना सकता है।
इस मार्ग के दो स्तंभ समझिए- हृदय विकास और ध्यान। हमें सेक्स के दमन या उसकी ओर काम करने की जरूरत कम और ध्यान और हृदय विकास की तरफ काम करने की जरूरत ज्यादा है। कहने की कोशिश यह है की उल्टी उंगली से कान पकड़ा जाएगा। अत्याधिक दमन के कारण सेक्स ऊर्जा के ऊपर सीधा सीधा काम करना एक आम व्यक्ति के लिए बहुत मुश्किल है। इसलिए सेक्स जैसा चलता है ठीक है, पर्याप्त है - वह इस प्रक्रिया का केंद्र है ही नहीं। हमारा केंद्र है ह्रदय विकास और ध्यान। इस प्रकार सेक्स की इच्छाएँ धीरे-धीरे स्वयं से ही गिरनी शुरू हो जाती हैं। क्योंकि वही उर्जा जो सेक्स में जानी थी अब ह्रदय और ध्यान पर जाने लगे हैं। जितना हृदय का विकास होगा उतनी ही ऊर्जा मूलाधार से ह्रदय की ओर प्रस्थान करने लगेगी।  हृदय और ध्यान की प्रक्रिया के लिए यह उपाय हैं:
१) जो भी काम रचनात्मक या सेवाभाव युक्त होता है वह हृदय से संबंधित होता है। तो एक बच्चे की तरह अगर किसी को गाना, बजाना, खेलना, नृत्य, संगीत,‌चित्रकारी, काव्य रचना, सेवा भाव जैसे खाना पकाना, अन्न बाँटना या इस तरह के कार्य अच्छे लगे उसमें पूर्ण रुचि से शामिल हों। पशु पक्षियों और प्रकृति के साथ रहने में भी हृदय का विकास होता है और ध्यान में भी सहायता मिलती है। जितना रचनात्मक कार्य बढ़ेगा, उतनी ही उर्जा स्वयं से ही हृदय की तरफ आकर्षित होती चली जाएगी इसमें कुछ वक्त लग सकता है परंतु होगा यही।
२) जीवन में ध्यान को स्थान दीजिए ।बहुत ही सुंदर ध्यान विधियाँ आजकल यूट्यूब और कई जगह पर उपलब्ध है। इसमें भी वह विधि जो हृदय का विकास करे ज्यादा लाभकारी सिद्ध हो सकती है -जैसे हार्टफुलनेस। सुंदर होगा अगर आप किसी ऐसे संगठन या सत्संगति में जाते हैं जहाँ ध्यान पर जोर हो सेक्स के दमन पर नहीं। सेक्स तो मन से निकाल ही दीजिए जैसा चल रहा है ठीक है- हम इस प्रक्रिया में सेक्स के दमन या सेक्स को खत्म करने पर जोर दे ही नहीं रहे। पूरे का पूरा काम ऊर्जा को ह्रदय और ध्यान की ओर प्रेरित करने के लिए है। फल स्वरूप, जो सेक्स के साथ होना है वह स्वयं से होता रहेगा।
३) यह आवश्यक है की एक गुरु जीवन में हो जो आपको ऊर्जा के रहस्य से अवगत करा सके। एक सही समझ दे सके जो कि आपके जीवन के अनुसार हो। जिस समझ का अनुसरण कर आप अपने जीवन को खूबसूरत बना सकें।
बस इतना सा ही है - अगर यह उपाय उत्तम जीवन में पूर्ण रूप से उतार लिए गए तो सेक्स पर काम स्वयं से ही हो जाएगा। ना ही अपराध भाव की जरूरत है, ना ही प्रताड़ित होने की। यह एक आम व्यक्ति के लिए अति सुंदर व सरल मार्ग है। जिस तरह जीवन में कक्षा को पास करने के लिए समय लगता है उसी तरह इसमें भी कुछ समय लगेगा।

बुधवार, 8 जुलाई 2020

मन के दोहे

दोहा सलिला:
मन के दोहे
*
मन जब-जब उन्मन हुआ, मन ने थामी बाँह.
मन से मिल मन शांत हो, सोया आँचल-छाँह.
*
मन से मन को राह है, मन को मन की चाह.
तन-धन हों यदि सहायक, मन पाता यश-वाह.
*
चमन तभी गुलज़ार हो, जब मन को हो चैन.
अमन रहे तब जब कहे, मन से मन मृदु बैन.
*
द्वेष वमन जो कर रहे, दहशत जिन्हें पसंद.
मन कठोर हो दंड दे, मिट जाए छल-छंद.
*
मन मँजीरा हो रहा, तन कीर्तन में लीन.
मनहर छवि लख इष्ट की, श्वास-आस धुन-बीन.
*
नेह-नर्मदा सलिल बन, मन पाता आनंद.
अंतर्मन में गोंजते, उमड़-घुमड़कर छंद.
*
मन की आँखें जब खुलीं, तब पाया आभास.
जो मन से अति दूर है, वह मन के अति पास.
*
मन की सुन चेता नहीं, मनुआ बेपरवाह.
मन की धुन पूरी करी, नाहक भरता आह.
*
मन की थाह अथाह है, नाप सका कब-कौन?
अंतर्मन में लीन हो, ध्यान रमाकर मौन.
*
धुनी धूनी सुलगा रहा, धुन में हो तल्लीन.
मन सुन-गुन सुन-गुन करे, सुने बिन बजी बीन.
*
मन को मन में हो रहे, हैं मन के दीदार.
मन से मिल मन प्रफुल्लित, सर पटके दीवार.
*
८.७.२०१८, ७९९९५५९६१८.

राजस्थानी सणगार : कौशल कौशलेन्द्र

=====-: पैली बार राजस्थानी सणगार :-=====
कौशल कौशलेन्द्र
काम री कमाण काया रंग चाँदी रो छै पाणी,
बाजूड़ा तो गोरा-गोरा फूलाँ की सी डाळ छै।
नीला नैण मीठा बैण छायो डील मँ बसन्त,
होठ कचनार गालाँ रूप री उछाळ छै।
रूणक-झुणक चा ल गोरी गजगामणी सी,
साँस री सुगन्ध जाण मीठी-मीठी भाळ छै।
साँवळी सहेल्याँ बीच बतळाव मुसकाव,
बादळाँ र बीच जाणँ चाँद रो उजाळ छै।
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एक मुक्तकी राम-लीला, एक श्लोकी रामायण

एक मुक्तकी राम-लीला
*
राम जन्मे, वन गए, तारी अहल्या, सिय वरी।
स्वर्णमृग-बाली वधा, सुग्रीव की पीड़ा हरी ।।
सिय हरण, लाँघा समुद,लड़-मार रावण को दिया-
विभीषण-अभिषेक, गद्दी अवध की शोभित करी।।
*
८-७-२०१६
रामकथा
* एक श्लोकी रामायण *

अदौ राम तपोवनादि गमनं हत्वा मृगं कांचनम्।
वैदेही हरणं जटायु मरणं सुग्रीव संभाषणम्।
वालि निग्रहणं समुद्र तरणं लंका पुरी दास्हम्।
पाश्चाद् रावण कुंभकर्ण हननं तद्धि रामायणम्।

यदि इसे भी रामायण माने तो यह विश्व की सबसे छोटी एक श्लोकी रामायण है. इसे रचने वाले कवि गोस्वामी तुलसीदास माने जाते हैं .
'रामायण' का विश्लेषित रुप 'राम का अयन' है जिसका अर्थ है 'राम का यात्रा पथ', क्योंकि अयन यात्रापथवाची है। इसकी अर्थवत्ता इस तथ्य में भी अंतर्निहित है कि यह मूलत: राम की दो विजय यात्राओं पर आधारित है जिसमें प्रथम यात्रा यदि प्रेम-संयोग, हास-परिहास तथा आनंद-उल्लास से परिपूर्ण है, तो दूसरी क्लेश, क्लांति, वियोग, व्याकुलता, विवशता और वेदना से आवृत्त। विश्व के अधिकतर विद्वान दूसरी यात्रा को ही रामकथा का मूल आधार मानते हैं। एक श्लोकी रामायण में राम वन गमन से रावण वध तक की कथा ही रूपायित हुई है।

बुन्देली मुक्तिका: बखत बदल गओ

बुन्देली मुक्तिका:
बखत बदल गओ
संजीव
*
बखत बदल गओ, आँख चुरा रए।
सगे पीठ में भोंक छुरा रए।।
*
लतियाउत तें कल लों जिनखों
बे नेतन सें हात जुरा रए।।
*
पाँव कबर मां लटकाए हैं
कुर्सी पा खें चना मुरा रए।।
*
पान तमाखू गुटका खा खें
भरी जवानी गाल झुरा रए।।
*
झूठ प्रसंसा सुन जी हुमसें
सांच कई तेन अश्रु ढुरा रए।।
*

दुर्मिला छंद

छंद सलिला:
दुर्मिला छंद
संजीव
*
छंद-लक्षण: जाति लाक्षणिक, प्रति चरण मात्रा ३२ मात्रा, यति १०-८-१४, पदांत गुरु गुरु, चौकल में लघु गुरु लघु (पयोधर या जगण) वर्जित।

लक्षण छंद:
दिशा योग विद्या / पर यति हो, पद / आखिर हरदम दो गुरु हों
छंद दुर्मिला रच / कवि खुश हो, पर / जगण चौकलों में हों
(संकेत: दिशा = १०, योग = ८, विद्या = १४)
उदाहरण:
१. बहुत रहे हम, अब / न रहेंगे दू/र मिलाओ हाथ मिलो भी
बगिया में हो धू/ल - शूल कुछ फू/ल सरीखे साथ खिलो भी
कितनी भी आफत / आये पर भू/ल नहीं डट रहो हिलो भी
जिसको जो कहना / है कह ले, मुँह / मत खोलो अधर सिलो भी

२. समय कह रहा है / चेतो अनुशा/सित होकर देश बचाओ
सुविधा-छूट-लूट / का पथ तज कद/म कड़े कुछ आज उठाओ
घपलों-घोटालों / ने किया कबा/ड़ा जन-विश्वास डिगाया
कमजोरी जीतो / न पड़ोसी आँ/ख दिखाये- धाक जमाओ

३. आसमान पर भा/व आम जनता/ का जीवन कठिन हो रहा
त्राहिमाम सब ओ/र सँभल शासन, / जनता का धैर्य खो रहा
पूंजीपतियों! धन / लिप्सा तज भा/व् घटा जन को राहत दो
पेट भर सके मे/हनतकश भी, र/हे न भूखा, स्वप्न बो रहा
----------
(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अरुण, अवतार, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उड़ियाना, उपमान, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, कुकुभ, कज्जल, कामिनीमोहन, काव्य, कीर्ति, कुण्डल, कुडंली, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, चंद्रायण, छवि, जग, जाया, तांडव, तोमर, त्रिभंगी, त्रिलोकी, दण्डकला, दिक्पाल, दीप, दीपकी, दोधक, दुर्मिला, दृढ़पद, नित, निधि, निश्चल, प्लवंगम्, प्रतिभा, प्रदोष, प्रभाती, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदन,मदनावतारी, मधुभार, मधुमालती, मनहरण घनाक्षरी, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली, माया, माला, मोहन, मृदुगति, योग, ऋद्धि, रसामृत, रसाल, राजीव, राधिका, रामा, रूपमाला, लीला, वस्तुवदनक, वाणी, विरहणी, विशेषिका, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शास्त्र, शिव, शुद्ध ध्वनि, शुभगति, शोभन, समान, सरस, सवाई, सार, सारस, सिद्धि, सिंहिका, सुखदा, सुगति, सुजान, सुमित्र, संपदा, हरि, हेमंत, हंसगति, हंसी)

दृष्टांत कथा गुरु क्यों?

पारंपरिक लघु कथा : दृष्टांत कथा 
गुरु क्यों?
*
स्वामी रामकृष्ण परमहंस की खेती सुनकर तरुण नरेन्द्र ने एक दिन उनसे कहा, " स्वामीजी! मैं रामायण जानता हूँ , भगवद्गीता जानता हूँ, सारे वेद पढ़े हैं और हर विषय पर अच्छा व्याख्यान दे लेता हूँ, फिर मुझे गुरु की आवश्यकता क्यों ?"
परमहंस ने कोई उत्तर नहीं दिया। सिर्फ मुस्कुरा दिए। 
कुछ दिनों बाद परमहंस ने नरेन्द्र को बुलवाया, कुछ सामान और मान-पते की एक पर्ची देकर कहा, " इसे नदी के पार इनको कल दे आओ।"
नरेन्द्र ने सामान ले लिया। दूसरे दिन सवेरे उस गाँव की तरफ निकल पड़े ताकि जल्दी से देकर वापस आ सकें। रास्ते में एक नदी पड़ती थी जहाँ नाव तैयार थी, नाविक उन्हें लेकर चल पड़ा। नदी के पार उतर कर उन्होंने देखा कि घाट से कई सारे रास्तेे, कई गाँवों की तरफ जाते हैं। उन्होंने नाविक से पूछा, "भैया ! इस गाँव तक पहुँचने का रास्ता कौन सा है ? 
नाविक ने कहा, "मुझे नहीं मालुम। "
नरेन्द्र असमंजस में पड़ गए।  अब क्या करें ? यहाँ तो कई रास्ते हैं,  किससे जाएँ कि बिना भटके सही गाँव में पहुँच जाएँ। काफी देर तक देखते रहे, कोइ अन्य जानकार नहीं आया तो नाववाले से बोले, "भैया, मुझे वापस ले चलो।  बिना रास्ता जाने ही चला आया। इस बार पूछ कर आऊँगा।"
वापस आकर नरेन्द्र स्वामी परमहंस के पास रास्ता पूछने गए तो उन्होंने रास्ता बताने के स्थान पर सामान वापिस ले लिया और कहा की अब पहुँचाने की आवश्यकता नहीं है यह तो तुम्हारे उस दिन के प्रश्न का उत्तर है।  गंतव्य स्थान पर जाने के लिए तुम्हारे पास माध्यम (नाव) है, संसाधन (नाविक) है, यह भी मालूम है कि क्या करना है (सामान देना है), कहाँ जाना है, लेकिन रास्ता नहीं मालूम ! बिना मार्गदर्शन के किस रास्ते से भटकते रह जाएगा। 
नरेंद्र समझ गए कि गुरु मार्गदर्शक होता है। उसे पता होता है कि किस शिष्य को कौन सा सामान देना है, कौन सी राह बतानी है? 
***

मंगलवार, 7 जुलाई 2020

हाइकू गीत

हाइकू गीत
*
बोल रे हिंदी
कान में अमरित
घोल रे हिंदी
*
नहीं है भाषा
है सभ्यता पावन
डोल रे हिंदी
*
कौन हो पाए
उऋण तुझसे, दे
मोल रे हिंदी?
*
आंग्ल प्रेमी जो
तुरत देना खोल
पोल रे हिंदी
*
झूठा है नेता
कहाँ सच कितना?
तोल रे हिंदी
*

साहित्य जगत के विलक्षण साधक –संजीव वर्मा 'सलिल'

साहित्य जगत के विलक्षण साधक –संजीव वर्मा 'सलिल'
डॉ. पुष्पा जोशी
*
मंडला( मध्य प्रदेश ) में जन्मे संजीव वर्मा ‘सलिल” जी, आधुनिक मीरा महादेवी वर्मा के भतीजे हैं। संजीव जी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर ट्रू मीडिया राष्ट्रीय पत्रिका में जब विशेषाँक निकालने की बात चली तो मुझे लगा कि बेशक संजीव जी के महादेवी वर्मा जी से रक्त सम्बंध हैं परंतु हमसे भी उनके शब्द सम्बंध तो हैं ही । इसी सम्बंध के चलते लगा उनके विषय में कुछ लिखूँ । संजीव जी की शिक्षा: त्रिवर्षीय डिप्लोमा सिविलअभियांत्रिकी, बी.ई., एम. आई. ई., विशारद, एम. ए. (अर्थशास्त्र, दर्शनशास्त्र), एल.एल. बी., डिप्लोमा पत्रकारिता, डी. सी. ए.न के साथ-साथ न जाने कितनी ही भारी भरकम डिग्रियाँ उनके पास हैं।
मुझे याद आ रहा 11 जनवरी 2018 का वह दिन जब विश्व पुस्तक मेले में लेखक मंच पर ऋत फाउंडेशन एवं युवा उत्कर्ष साहित्य्क मंच के तत्वाधान में पुस्तक लोकार्पण एवं साहित्यिक परिचर्चा में मुख्य अतिथि के आसन पर संजीव जी विराजमान थे । मैं सभी के समक्ष लेखक मंच से साहित्य और राज्याश्रय परिचर्चा विषय पर बोल रही थी। मंच से क्रमश: जब सलिल जी का बोलने का समय आया तो उन्होंने सबसे पहले मंच से बोलने वालों पर छोटी-छोटी कविताएं सुना डाली। बस तभी उनकी काव्य क्षमता का अनुमान लग गया था.......भला भात तैयार हो गया यह जानने केलिए एक दो चावल के दाने ही तो पतीली से निकाल कर दबाकर तसल्ली कर ली जाती है । बस वो ही अभी तक की मुलाकात है हमारी ।
यहाँ पर आपकी भाव-तीव्रता का सहज स्वाभाविक समावेश हुआ है।
बना मंदिर नया,दे दिया तीर्थ है ,
नया जिसे कहें सभी गौरव कथा ।
महामानव तुम्हीं, प्रेरणा स्त्रोत हो ,
हमें उजास दो गढें किस्मत नयी।
खडे हैं सुर सभी , देवतालोक में
प्रशस्ति गा रहे , करें स्वागत सभी।
संजीव जी आजकल सवैया छंद पर काम कर रहे हैं। मुझे लगता है नवान्वेषित सवैये उन्हें साहित्याकाश की ऊँचाईयों पर ले जाएंगे। आईये ! देखते हैं एक सवैया –
तलाशते रहे कमी, न खूबियाँ
निहारते , प्रसन्नता कहाँ मिले ?
विरासते रहें हमीं, न और को
पुकारते, हँसी – खुशी कहाँ मिले?
बटोरने रहे सदा , न रंक बंधु हो
सके, न आसमां – जमें मिले ।
निहारते रहे छिपे , न मीत प्रीत पा
सके , मिले – कभी नही मिले।
समसामयिक रचनाओं में भी आपका कोई सानी नही ।
सांत्वना है ‘ सलिल ‘ इतनी लोग
सच सुन समझते
मुखौटा हर एक नेता है चुनावी
मास का
माँ नर्मदा के भक्तिरस में डूबे साहित्य सागर संजीव वर्मा ‘ सलिल ‘ से साहित्य की कोई विधा इनसे अछूती नही है जिस प्रकार सागर में गोते लगाकर रत्न हाथ लगते हैं उसी प्रकार् इनके साहित्य साग्र में गोता लगाने पर कोई न कोई विधा हाथ लग जाती है।
कवि हृदय लेकर कल्पना के सप्तरंगी आकाश में आसन जमाकर इन्होंने जिस काव्य का सृजन किया है, वह घर-घर पहुँचे। अपनी अन्तर्मुखी मनोवृत्ति एवं साहित्य सुलभ गहरे अनुभवों के कारण आपके द्वारा रचित काव्य में वेदना एवं सूक्ष्म अनुभूतियों के कोमल भाव मुखरित हुए हैं। आपके काव्य में संगीतात्मकता एवं भाव-तीव्रता का सहज स्वाभाविक समावेश हुआ है।
साहित्य के विलक्षण साधक आप निरंतर साहित्य –पथ पर अग्रसर रहें, युगों-युगों तक आपका यश गान हो। शुभकामनाओं सहित मैं …………….
डॉ. पुष्पा जोशी
सह- संपादक ट्रू मीडिया
नोएडा एक्सटैंशन यू.पी.

दोहा सलिला

दोहा सलिला:
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
अजर अमर अक्षर अमित, अजित असित अवनीश
अपराजित अनुपम अतुल, अभिनन्दन अमरीश
*
अंबर अवनि अनिल अनल, अम्बु अनाहद नाद
अम्बरीश अद्भुत अगम, अविनाशी आबाद
*
अथक अनवरत अपरिमित, अचल अटल अनुराग
अहिवातिन अंतर्मुखी, अन्तर्मन में आग
*
आलिंगन कर अवनि का, अरुण रश्मियाँ आप्त
आत्मिकता अध्याय रच, हैं अंतर में व्याप्त
*
अजब अनूठे अनसुने, अनसोचे अनजान
अनचीन्हें अनदिखे से,अद्भुत रस अनुमान
*
अरे अरे अ र र र अड़े, अड़म बड़म बम बूम
अपनापन अपवाद क्यों अहम्-वहम की धूम?
*
अकसर अवसर आ मिले, बिन आहट-आवाज़

अनबोले-अनजान पर, अलबेला अंदाज़
*
छप्पर छाया तो हुई, सर पर छाया मीत

छाया छाया बिन शयन, करती भूल अतीत - 
यमक (छाया = बनाया, छाँह, नाम, परछाईं)
*
सुर साधे सुख-शांति हो, मुँद जाते हैं नैन
मानस जीवन-मूल्यमय, देता है नित चैन 
- श्लेष (सुर = स्वर, देवता / मानस = मनस्पटल, रामचरित मानस)
*
कहा 'पहन लो चूड़ियाँ', तो हो क्यों नाराज?
कहा सुहागिन से गलत, तुम्हें न आती लाज? 
- श्लेष वक्रोक्ति (पहन लो चूड़ी - चूड़ी खरीद लो, कल्पित अर्थ ब्याह कर लो)
*
वह जीवन जीवन नहीं, जिसमें शेष न आस
वह मानव मानव नहीं जिसमें शेष न श्वास 
- लाटानुप्रास (जीवन तथा मानव शब्दों का समान अर्थ में दुहराव)
*


दया-दफीना दे दिया, दस्तफ्शां को दान
दरा-दमामा दाद दे, दल्कपोश हैरान
(दरा = घंटा-घड़ियाल, दफीना = खज़ाना, दस्तफ्शां = विरक्त, दमामा = नक्कारा, दल्कपोश = भिखारी)
*
दर पर था दरवेश पर, दरपै था दज्जाल
दरहम-बरहम दामनी, दूर देश था दाल
(दर= द्वार, दरवेश = फकीर, दरपै = घात में, दज्जाल = मायावी भावार्थ रावण, दरहम-बरहम = अस्त-व्यस्त, दामनी = आँचल भावार्थ सीता, दाल = पथ प्रदर्शक भावार्थ राम )
*
दिलावरी दिल हारकर, जीत लिया दिलदार
दिलफरेब-दीप्तान्गिनी, दिलाराम करतार

(दिलावरी = वीरता, दिलफरेब = नायिका, दिलदार / दिलाराम = प्रेमपात्र)
*
अधिक कोण जैसे जिए, नाते हमने मीत।
न्यून कोण हैं रिलेशन, कैसे पाएँ प्रीत।।
*
हाथ मिला; भुज भेंटिए, गले मिलें रह मौन।
किसका दिल आया कहाँ बतलायेगा कौन?
*
रिमझिम को जग देखता, रहे सलिल से दूर।
रूठ गया जब सलिल तो, उतरा सबका नूर।।
*
माँ जैसा दिल सलिल सा, दे सबको सुख-शांति।
ममता के आँचल तले, शेष न रहती भ्रांति।।
*
वाह, वाह क्या बात है, दोहा है रस-खान।
पढ़; सुन-गुण कर बन सके, काश सलिल गुणवान।।
*
आप कहें जो वह सही, एक अगर ले मान।
दूजा दे दूरी मिटा, लोग कहें गुणवान।।
*
यह कवि सौभाग्य है, कविता हो नित साथ।
चले सृजन की राह पर, लिए हाथ में हाथ।।
*
बात राज की एक है, दीप न हो नाराज।
ज्योति प्रदीपा-वर्तिका, अलग न करतीं काज।।
*
कभी मान-सम्मान दें, कभी लाड़ या प्यार।
जिएँ ज़िंदगी साथ रह, करें मान-मनुहार।।
*
साथी की सब गलतियाँ, विहँस कीजिए माफ़।
बात न दिल पर लें कभी, कर सच्चा इंसाफ।।
*
साथ निभाने का यही, पाया एक उपाय।
आपस में बातें करें, बंद न हो अध्याय।।
*
खुद को जो चाहे कहो, दो न और को दोष।
अपना गुस्सा खुद पियो, व्यर्थ गैर पर रोष।।
*
सबक सृजन से सच मिला, आएगा नित काम।
नाम मिले या मत मिले, करे न प्रभु बदनाम।।
*
जो न सके कुछ जान वह, सब कुछ लेता जान।
जो भी शब्दातीत है, सत्य वही लें मान।।
*
ममता छिप रहती नहीं, लिखा न जाता प्यार।
जिसका मन खाली घड़ा, करे शब्द-व्यवहार।।
*
७.७.२०१८, ७९९९५५९६१८