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बुधवार, 28 जून 2017

navgeet

नवगीत 
खिला मोगरा 
*
खिला मोगरा 
जब-जब, तब-तब 
याद किसी की आई।
महक उठा मन
श्वास-श्वास में
गूँज उठी शहनाई।
*
हरी-भरी कोमल पंखुड़ियाँ
आशा-डाल लचीली।
मादक चितवन कली-कली की
ज्यों घर आई नवेली।
माँ के आँचल सी सुगंध ने
दी ममता-परछाई।
खिला मोगरा
जब-जब, तब-तब
याद किसी की आई।
*
ननदी तितली ताने मारे
छेड़ें भँवरे देवर।
भौजी के अधरों पर सोहें
मुस्कानों के जेवर।
ससुर गगन ने
विहँस बहू की
की है मुँह दिखलाई।
खिला मोगरा
जब-जब, तब-तब
याद किसी की आई।
*
सजन पवन जब अंग लगा तो
बिसरा मैका-अँगना।
द्वैत मिटा, अद्वैत वर लिया
खनके पायल-कँगना।
घर-उपवन में
स्वर्ग बसाकर
कली न फूल समाई।
खिला मोगरा
जब-जब, मुझको
याद किसी की आई।
***
२८-६-२०१६

geet

गीत-
*
भूल नहीं पल भर को भी यह चेतन का संक्रान्तिकाल है
राकेशी ज्योत्सना न शीतल, लिये क्रांति की नव मशाल है 
*
अचल रहे संकल्प, विकल्पों पर विचार का समय नहीं है
हुई व्यवस्था ही प्रधान, जो करे व्यवस्था अभय नहीं है
*
कल तक रही विदेशी सत्ता, क्षति पहुँचाना लगा सार्थक
आज स्वदेशी चुने हुए से टकराने का दृश्य मार्मिक
कुरुक्षेत्र की सीख यही है, दु:शासन से लड़ना होगा
धृतराष्ट्री है न्याय व्यवस्था मिलकर इसे बदलना होगा
वादों के अम्बार लगे हैं, गांधारी है न्यायपीठ पर
दुर्योधन देते दलील, चुक गये भीष्म, पर चलना होगा
आप बढ़ा जी टकराने अब उसका तिलकित नहीं भाल है
भूल नहीं पल भर को भी यह चेतन का संक्रान्तिकाल है
*
हाथ हथौड़ा तिनका हाथी लालटेन साइकिल पथ भूले
कमल मध्य को कुचल, उच्च का हाथ थाम सपनों में झूले
निम्न कटोरा लिये हाथ में, अनुचित-उचित न देख पा रहा
मूल्य समर्थन में, फंदा बन कसा गले में कहर ढा रहा
दाल टमाटर प्याज रुलाये, खाकर हवा न जी सकता जन
पानी-पानी स्वाभिमान है, चारण सत्ता-गान गा रहा
छाते राहत-मेघ न बरसें, टैक्स-सूर्य का व्याल-जाल है
भूल नहीं पल भर को भी यह चेतन का संक्रान्तिकाल है
*
महाकाल जा कुंभ करायें, क्षिप्रा में नर्मदा बहायें
उमा बिना शिव-राज अधूरा, नंदी चैन किस तरह पायें
सिर्फ कुबेरों की चाँदी है, श्रम का कोई मोल नहीं है
टके-तीन अभियंता बिकते, कहे व्यवस्था झोल नहीं है
छले जा रहे अपनों से ही, सपनों- नपनों से दुःख पाया
शानदार हैं मकां, न रिश्ते जानदार कुछ तोल नहीं है
जल पलाश सम 'सलिल', बदल दे अब न सहन के योग्य हाल है
भूल नहीं पल भर को भी यह चेतन का संक्रान्तिकाल है
***
१८-६-२०१६

मंगलवार, 27 जून 2017

दोहा

दोहा सलिला                                                                                            *                                                                                                     जिसे बसाया छाँव में, छीन रहा वह ठाँव 
आश्रय मिले न शहर में, शरण न देता गाँव 
*
जो पैरों पर खड़े हैं, 'सलिल' उन्हीं की खैर 
पैर फिसलते ही बनें, बंधु-मित्र भी गैर 
*
सपने देखे तो नहीं, तुमने किया गुनाह 
किये नहीं साकार सो, जीवन लगता भार 
*
दाम लागने की कला, सीख किया व्यापार 
नेह किया नीलाम जब, साँस हुई दुश्वार 
माटी में मिल गए हैं, बड़े-बड़े रणवीर  
किन्तु समझ पाए नहीं, वे माटी की पीर 
नाम रख रहे आज वे, बुला-मनाकर पर्व  
नाम रख रहे देख जन, अहं प्रदर्शन गर्व  
*                                                                                                   
हैं पत्थर के सनम भी, पानी-पानी आज                                           
पानी शेष न आँख में, देख आ रही लाज 
*

laghuktha

लघुकथा
दुहरा चेहरा
*
- 'क्या कहूँ बहनजी, सच बोला नहीं जाता और झूठ कहना अच्छा नहीं लगता इसीलिये कहीं आना-जाना छोड़ दिया. आपके साथ तो हर २-४ दिन में गपशप होती रही है, और कुछ हो न हो मन का गुबार तो निकल जाता था. अब उस पर भी आपत्ति है.'

= 'आपत्ति? किसे?, आपको गलतफहमी हुई है. मेरे घर में किसी को आपत्ति नहीं है. आप जब चाहें पधारिये और निस्संकोच अपने मन की बात कर सकती हैं. ये रहें तो भी हम लोगों की बातों में न तो पड़ते हैं, न ध्यान देते हैं.'
- 'आपत्ति आपके नहीं मेरे घर में होती है. वह भी इनको या बेटे को नहीं बहूरानी को होती है.'
= 'क्यों उन्हें हमारे बीच में पड़ने की क्या जरूरत? वे तो आज तक कभी आई नहीं.'
-'आएगी भी नहीं. रोज बना-बनाया खाना चाहिए और सज-धज के निकल पड़ती है नेतागिरी के लिए. कहती है तुम जैसी स्त्रियाँ घर का सब काम सम्हालकर पुरुषों को सर पर चढ़ाती हैं. मुझे ही घर सम्हालना पड़ता है. सोचा था बहू आयेगी तो बुढ़ापा आराम से कटेगा लेकिन महारानी तो घर का काम करने को बेइज्जती समझती हैं. तुम्हारे चाचाजी बीमार रहते हैं, उनकी देख-भाल, समय पर दवाई और पथ्य, बेटे और पोते-पोती को ऑफिस और स्कूल जाने के पहले खाना और दोपहर का डब्बा देना. अब शरीर चलता नहीं. थक जाती हूँ.'
='आपकी उअमर नहीं है घर-भर का काम करने की. आप और चाचाजी आराम करें और घर की जिम्मेदारी बहु को सम्हालने दें. उन्हें जैसा ठीक लगे करें. आप टोंका-टाकी भर न करें. सबका काम करने का तरीका अलग-अलग होता है.'
-'तो रोकता कौन है? करें न अपने तरीके से. पिछले साल मैं भांजे की शादी में गयी थी तो तुम्हारे चाचाजी को समय पर खाना-चाय कुछ नहीं मिला. बाज़ार का खाकर तबियत बिगाड़ ली. मुश्किल से कुछ सम्हली है. मैंने कहा ध्यान रखना था तो बेटे से नमक-मिर्च लगाकर चुगली कर दी और सूटकेस उठाकर मायके जाने को तैयार ही गयी. बेटे ने कहा तो कुछ नहीं पर उसका उतरा हुआ मुँह देखकर मैं समझ गई, उस दिन से रसोई में घुसती ही नहीं. मुझे सुना कर अपनी सहेली से कह रही थी अब कुछ कहा तो बुड्ढे-बुढ़िया दोनों को थाने भिजवा दूँगी. दोनों टाइम नाश्ते-खाने के अलावा घर से कोई मतलब नहीं.'
पड़ोस में रहनेवाली मुँहबोली चाची को सहानुभूति जता, शांत किया और चाय-नाश्ता कराकर बिदा किया. घर में आयी तो चलभाष पर ऊँची आवाज में बात कर रही उनकी बहू की आवाज़ सुनायी पड़ी- ' माँ! तुम काम मत किया करो, भाभी से कराओ. उसका फर्ज है तुम्हारी सेवा करे....'
मैं विस्मित थी स्त्री हितों की दुहाई देनेवाली शख्सियत का दुहरा चेहरा देखकर.
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संपर्क- ९४२५१ ८३२४४, salil.sanjiv@gmail.com

muktak

मुक्तक
*
प्राण, पूजा कर रहा निष्प्राण की
इबादत कर कामना है त्राण की
वंदना की, प्रार्थना की उम्र भर-
अर्चना लेकिन न की संप्राण की
.
साधना की साध्य लेकिन दूर था
भावना बिन रूप ज्यों बेनूर था
कामना की यह मिले तो वह करूँ
जाप सुनता प्रभु न लेकिन सूर था
.
नाम ले सौदा किया बेनाम से
पाठ-पूजन भी कराया दाम से
याद जब भी किया उसको तो 'सलिल'
हो सुबह या शाम केवल काम से
.
इबादत में तू शिकायत कर रहा
इनायत में वह किफायत कर रहा
छिपाता तू सच, न उससे कुछ छिपा-
तू खुदी से खुद अदावत कर रहा
.
तुझे शिकवा वह न तेरी सुन रहा
है शिकायत उसे तू कुछ गुन रहा
है छिपाता ख्वाब जो तू बुन रहा-
हाय! माटी में लगा तू घुन रहा
.
तोड़ मंदिर, मन में ले मन्दिर बना
चीख मत, चुप रह अजानें सुन-सुना
छोड़ दे मठ, भूल गुरु-घंटाल भी
ध्यान उसका कर, न तू मौके भुना
.
बन्दा परवर वह, न तू बन्दा मगर
लग गरीबों के गले, कस ले कमर
कर्मफल देता सभी को वह सदा-
काम कर ऐसा दुआ में हो असर
***

मुक्तक

जो खुश रहता है
वह यह करता है
मर मर जीता है
जी जी मरता है

केवल व्यक्ति नहीं, संगठनात्मक शक्ति का नाम है – मधु धवन



केवल व्यक्ति नहीं, संगठनात्मक शक्ति का नाम है – मधु धवन
(अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि)


मधु धवन

आज प्रातः 4 बजे अग्रज बशीर जी से वाट्सैप संदेश में मधु धवन का फोटो मिला, थोड़ी देर बाद उनका फोन कॉल था, इस बात की पुष्टि के लिए कि मधु धवन न रही, क्या यह बात सच है ।  मित्रों को कॉल करने पर उन्हें कोई सूचना नहीं मिली थी, अतः बशीर जी मुझसे इसकी पुष्टि चाहते थे ।  मैंने तुरंत दो-चार नाम सुझाया, जिनसे पता कर मुझे भी सूचित करने के लिए ।  थोड़ी ही देर बाद बशीर जी ने पुनः कॉल करने इसकी पुष्टि की ।  इसके बावजूद मैं मानने के लिए तैयार नहीं था ।  लगातार कुछ मित्रों एस.एम.एस., फोन कॉल आने से मुझे उनकी बातों पर यकीन करना पड़ा ।  मधु धवन नहीं रही, इस बात को मैं अभी हजम नहीं कर पा रहा हूँ ।  उनका लेखना जितना विराट है, व्यक्तित्व उतना ही आत्मीय ।

सचमुच केवल व्यक्ति नहीं, संगठनात्मक शक्ति का नाम है – मधु धवन ।  आत्मीयता की प्रतिमूर्ति मधु धवन जी के साथ मेरा परिचय का दायरा लगभग तीन दशकों का है ।  लेखक, हिंदी प्रेमिका के रूप में उनकी गतिविधियों से लाखों लोग सुपरिचित हैं । 
तमिलनाडु में हिंदी लेखन के संबंध में लिखते हुए मैंने उनके कृतित्व के संबंध में भी लिखा था ।  2007-08 में जब अल्ताफ़ हुसैन जी ने मुझे चेन्नई में व्य़ाख्यान के लिए आमंत्रित किया, मेरे आगमन की सूचना पाकर चेन्नई के वरिष्ठ लेखक जो पधारे थे, उनमें मधु धवन जी भी थी ।  मेरा वक्तव्य कंप्यूटर-इंटरनेट के विकास के युग में लेखकों की भूमिका पर केंद्रित था ।  मेरे वक्तव्य के बाद कई लेखकों ने कहा कि हम अब कंप्यूटर-इंटरनेट से जुड़ जाएंगे ।  उनमें मधु धवन जी भी एक थी ।  उन्होंने मुझे कंप्यूटर पर कार्य करना सिखाना अनुरोध किया, दो-चार बार सिखाते ही वे स्वयं कंप्यूटर पर ई-मेल भेजने लगी । एक दूसरे संदर्भ में उन्होंने अपने लिए एक ब्लॉग तैयार करने का अग्रह किया और आश्वसन दिया कि उसे लगातार वे अपडेट करती रहेंगी, उन्होंने ब्लॉग नाम सुझाया तपस्या ।  मैंने उसी दिन (21 मई, 2013 को ही)  www.tapashya.blogspot.com  उनके लिए ब्लॉग सृजित कर उनकी कहानी बैखौफ का उसमें प्रकाशित कर दिया था ।  शायद व्यस्ततावश वे ब्लॉग को अपडेट नहीं कर पायीं ।  पांडिच्चेरी विश्वविद्यालय में मेरे आगमन के बाद उन्होंने आग्रह किया कि तमिल नाडु हिंदी साहित्य अकादमी की ओर एक कार्यक्रम का आयोजन करें ।  तदनुसार 2-3 दिसंबर, 2011 को पांडिच्चेरी विश्ववविद्याल एक राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया, जिसमें देश के विभिन्न प्रांतों के 150 से अधिक विद्वान शामिल हो गए थे । (http://yugmanas.blogspot.in/2011/12/blog-post.html )
            मधु धवन जी की आत्मीयता के असंख्य संस्मरण मेरे दिलों, दिमागों में सुरक्षित हैं ।  वे पांडिच्चेरी आने पर मेरे आवास पर अवश्य आ जाती थी, रास्त में कही जाते समय भी वे जरूर मुझसे मिलकर ही जाती थी ।  उनकी संगठनात्मक शक्ति का परिणाम है – तमिल नाडु हिंदी साहित्य अकादमी ।  अकादमी की पत्रिका बुलिटेन को लेकर भी वे हमेशा व्यस्त रहती थी ।  जनवरी 10 के एकाध आयोजनों में ही मैं जा पाया था ।  लगातार हर वर्ष कार्य करते हुए हज़ारों हिंदी प्रेमियों को एक मंच पर लाने की कोशिश उन्होंने की है ।  विगत दिनों में जब उन्होंने मुझे कॉल किया और इच्छा जतायी कि बहुभाषी लेखिका संघ की ओर से पांडिच्चेरी में हिंदी शिक्षण की गतिविधियाँ चलाना चाहते हैं और उसमें राधिका भी अपनी भूमिका निभा सकती हैं ।  मैंने फोन राधिका के हाथ में पकड़ा दिया था कि वे दोनों आपस सीधी बातचीत कर लें ।  इसके बाद उनका कॉल मेरे आलेख को लेकर था, जो तेलुगु साहित्य में राष्ट्रीयता की भावना पर था । भवानी गंगाधर जी के प्रेस में बैठकर उन्होंने मुझे कॉल किया था ।  सदा हिंदी भाषा एवं साहित्य की सेवा में वे सक्रिय रही हैं । 
       वे भौतिक रूप से इस संसार से दूर होने पर भी असंख्य आत्मीय मित्रों के दिलों में उनकी आत्मीय स्मृतियाँ सुरक्षित व अमर रहेंगी । उनकी शताधिक कृतियों के माध्यम से, विचारों के माध्यम से पाठकों के बीच भी वे अमर रहेंगी ।
       युग मानस के साथ भी वे सक्रिय जुड़ी रहीं ।

       उनके असामयिक निधन पर शोक के इन क्षणों में उनके स्वर्गस्थ आत्म की चिर शांति के लिए अश्रु नयनों से प्रार्थना से बढ़कर अधिक संस्मरण कह पाने में मैं अपने को असमर्थ महसूस कर रहा हूँ । 
            उनका पार्थिव शरीर उनके मित्रों, आत्मीयजनों के दर्शनार्थ चेन्नई स्थित उनका आवास के-3, अन्ना नगर पूर्व में रखा गया है ।  आज दुपहर 3 बजे के बाद उनकी अंत्योष्टि होगी ।
       अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि सहित...
-    डॉ. सी. जय शंकर बाबु

शनिवार, 24 जून 2017

ghanakshari

 
घनाक्षरी
- संजीव 'सलिल'
०३. फूँकता कवित्त प्राण, डाल मुरदों में जान, दीप बाल अंधकार, ज़िन्दगी का हरता।     
      नर्मदा निनाद सुनो,सच की ही राह चुनो, जीतता सुधीर वीर, पीर पीर सहता।।
      'सलिल'-प्रवाह पैठ, आगे बढ़ नहीं बैठ, सागर है दूर पूर, दूरी हो निकटता।
      आना-जाना खाली हाथ, कौन कभी देता साथ, हो अनाथ भी सनाथ, प्रभु दे निकटता।।  

०४. गीत-ग़ज़ल गाइये / डूबकर सुनाइए / त्रुटि नहीं छिपाइये / सीखिये-सिखाइए
      शिल्प-नियम सीखिए / कथ्य समझ रीझिए / भाव भरे शब्द चुन / लय भी बनाइए
      बिम्ब नव सजाइये / प्रतीक भी लगाइये / अलंकार कुछ नये / प्रेम से सजाइए
      वचन-लिंग, क्रिया रूप / दोष न हों देखकर / आप गुनगुनाइए / वाह-वाह पाइए  
.
०५. कौन किसका है सगा? / किसने ना दिया दगा? / फिर भी प्रेम से पगा / जग हमें दुलारता
      जो चला वही गिरा / उठ हँसा पुन: बढ़ा / आदि-अंत सादि-सांत / कौन छिप पुकारता?
      रात बनी प्रात नित / प्रात बने रात फिर / दोपहर कथा कहे / साँझ नभ निहारता
      काल-चक्र कब रुका? / सत्य कहो कब झुका? /मेहनती नहीं चुका / धरांगन बुहारता
.
०६. न चाहतें, न राहतें / न फैसले, न फासले / दर्द-हर्ष मिल सहें / साथ-साथ हाथ हों
      न मित्रता, न शत्रुता / न वायदे, न कायदे / कर्म-धर्म नित करें / उठे हुए माथ हों 
      न दायरे, न दूरियाँ / रहें न मजबूरियाँ / फूल-शूल, धूप-छाँव / नेह नर्मदा बनें
      गिर-उठें, बढ़े चलें / काल से विहँस लड़ें / दंभ-द्वेष-छल मिटें / कोशिशें कथा बुनें

०७. चाहते रहे जो हम / अन्य सब करें वही / हँस तजें जो भी चाह / उनके दिलों में रही 
      मोह वासना है यह / परार्थ साधना नहीं / नेत्र हैं मगर मुँदे  / अग्नि इसलिए दही 
      मुक्त हैं मगर बँधे / कंठ हैं मगर रुँधे / पग बढ़े मगर रुके / सर उठे मगर झुके 
      जिद्द हमने ठान ली / जीत मन ने मान ली / हार छिपी देखकर / येन-केन जय गही 
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सावन में झूम-झूम, डालों से लूम-लूम,
                                       झूला झूल दुःख भूल, हँसिए हँसाइये. 
एक दूसरे की बाँह, गहें बँधें रहे चाह,
                                         एक दूसरे को चाह, कजरी सुनाइये..
दिल में रहे न दाह, तन्नक पले न डाह,
                                          मन में भरे उछाह, पेंग को बढ़ाइए.
राखी की है साखी यही, पले प्रेम-पाखी यहीं,
                                भाई-भगिनी का नाता, जन्म भर निभाइए..
*

 

बागी थे हों अनुरागी, विरागी थे हों सुहागी,
                                     कोई भी न हो अभागी, दैव से मनाइए.
सभी के माथे हो टीका, किसी का न पर्व फीका,
                                   बहनों का नेह नीका, राखी-गीत गाइए..
कलाई रहे न सूनी, राखी बाँध शोभा दूनी,
                                   आरती की ज्वाल धूनी, अशुभ मिटाइए.
मीठा खाएँ मीठा बोलें, जीवन में रस घोलें,
                                        बहना के पाँव छूलें, शुभाशीष पाइए..
*

 

बंधन न रास आये, बँधना न मन भाये,
                                       स्वतंत्रता ही सुहाये, सहज स्वभाव है.
निर्बंध अगर रहें, मर्याद को न गहें,
                                   कोई किसी को न सहें, चैन का अभाव है..
मना राखी नेह पर्व, करिए नातों पे गर्व,
                                        निभायें संबंध सर्व, नेह का निभाव है.
बंधन जो प्रेम का हो, कुशल का क्षेम का हो,
                                    धरम का नेम हो, 'सलिल' सत्प्रभाव है..
*

 

संकट में लाज थी, गिरी सिर पे गाज थी,
                                        शत्रु-दृष्टि बाज थी, नैया कैसे पार हो?
करनावती महारानी, पूजतीं माता भवानी,
                                         शत्रु है बली बहुत, देश की न हार हो..
राखी हुमायूँ को भेजी, बादशाह ने सहेजी,
                                       बहिन की पत राखी, नेह का करार हो.
शत्रु को खदेड़ दिया, बहिना को मान दिया,
                                     नेह का जलाया दिया, भेंट स्वीकार हो..
*

 

महाबली बलि को था, गर्व हुआ संपदा का,
                                   तीन लोक में नहीं है, मुझ सा कोई धनी.
मनमानी करूँ भी तो, रोक सकता न कोई,
                                    हूँ सुरेश से अधिक, शक्तिवान औ' गुनी..
महायज्ञ कर दिया, कीर्ति यश बल लिया,
                                      हरि को दे तीन पग, धरा मौन था गुनी.
सभी कुछ छिन गया, मुख न मलिन हुआ,
                                       हरि की शरण गया, सेवा व्रत ले धुनी..

 

बाधा दनु-गुरु बने, विपद मेघ थे घने,
                                      एक नेत्र गँवा भगे, थी व्यथा अनसुनी.
रक्षा सूत्र बाँधे बलि, हरि से अभय मिली,
                                     हृदय की कली खिली, पटकथा यूँ बनी..
विप्र जब द्वार आये, राखी बांध मान पाये,
                                     शुभाशीष बरसाये, फिर न हो ठनाठनी.
कोई किसी से न लड़े, हाथ रहें मिले-जुड़े,
                                       साथ-साथ हों खड़े, राखी मने सावनी..
 *
कल : 
 
कज्जल के कूट पर दीप शिखा सोती है कि, श्याम घन मंडल मे दामिनी की धारा है ।

 भामिनी के अंक में कलाधर की कोर है कि, राहु के कबंध पै कराल केतु तारा है ।
 

शंकर कसौटी पर कंचन की लीक है कि, तेज ने तिमिर के हिये मे तीर मारा है ।




काली पाटियों के बीच मोहनी की माँग है कि, ढ़ाल पर खाँड़ा कामदेव का दुधारा है ।



काले केशों के बीच सुन्दरी की माँग की शोभा का वर्णन करते हुए कवि ने ८ उपमाएँ दी हैं.-

१. काजल के पर्वत पर दीपक की बाती.
२. काले मेघों में बिजली की चमक.
३. नारी की गोद में बाल-चन्द्र.
४. राहु के काँधे पर केतु तारा.
५. कसौटी के पत्थर पर सोने की रेखा.
६. काले बालों के बीच मन को मोहने वाली स्त्री की माँग.
७. अँधेरे के कलेजे में उजाले का तीर.
८. ढाल पर कामदेव की दो धारवाली तलवार.

कबंध=धड़. राहु काला है और केतु तारा स्वर्णिम, कसौटी के काले पत्थर पर रेखा खींचकर सोने को पहचाना जाता है. ढाल पर खाँडे की चमकती धार. यह सब केश-राशि के बीच माँग की दमकती रेखा का वर्णन है.

*****
आज : संजीव


संसद के मंच पर, लोक-मत तोड़े दम,  राजनीति सत्ता-नीति,  दल-नीति कारा है ।

 


नेताओं को निजी हित, साध्य- देश साधन है, मतदाता घुटालों में, घिर बेसहारा है ।
 


 

'सलिल' कसौटी पर, कंचन की लीक है कि, अन्ना-रामदेव युति, उगा ध्रुवतारा है।
 

 

स्विस बैंक में जमा जो, धन आये भारत में, देर न करो भारत, माता ने पुकारा है।


 

लाख़ मतभेद रहें, पर मनभेद न हों, भाई को हमेशा गले, हँस के लगाइए|

लात मार दूर करें, दशमुख सा अनुज, शत्रुओं को न्योत घर, कभी भी न लाइए|

भाई नहीं दुश्मन जो, इंच भर भूमि न दें, नारि-अपमान कर, नाश न बुलाइए|

छल-छद्म, दाँव-पेंच, दन्द-फंद अपना के, राजनीति का अखाड़ा घर न बनाइये||
*
जिसका जो जोड़ीदार, करे उसे वही प्यार, कभी फूल कभी खार, मन-मन भाया है|

पास आये सुख मिले, दूर जाये दुःख मिले, साथ रहे पूर्ण करे, जिया हरषाया है|

चाह-वाह-आह-दाह, नेह नदिया अथाह, कल-कल हो प्रवाह, डूबा-उतराया है|

गर्दभ कहे गधी से, आँख मूँद - कर - जोड़, देख तेरी सुन्दरता चाँद भी लजाया है||
(श्रृंगार तथा हास्य रस का मिश्रण)
*
शहनाई गूँज रही, नाच रहा मन मोर, जल्दी से हल्दी लेकर, करी मनुहार है|

आकुल हैं-व्याकुल हैं, दोनों एक-दूजे बिन, नया-नया प्रेम रंग, शीश पे सवार है|

चन्द्रमुखी, सूर्यमुखी, ज्वालामुखी रूप धरे, सासू की समधन पे, जग बलिहार है|

गेंद जैसा या है ढोल, बन्ना तो है अनमोल, बन्नो का बदन जैसे, क़ुतुब मीनार है||
*
ये तो सब जानते हैं, जान के न मानते हैं, जग है असार पर, सार बिन चले ना|

मायका सभी को लगे - भला, किन्तु ये है सच, काम किसी का भी, ससुरार बिन चले ना|

मनुहार इनकार, इकरार इज़हार, भुजहार, अभिसार, प्यार बिन चले ना|

रागी हो, विरागी हो या हतभागी बड़भागी, दुनिया में काम कभी, 'नार' बिन चले ना||

(श्लेष अलंकार वाली अंतिम पंक्ति में 'नार' शब्द के तीन अर्थ ज्ञान, पानी और स्त्री लिये गये हैं.)
*
बुन्देली  


जाके कर बीना सजेबाके दर सीस नवे, मन के विकार मिटेनित गुनगाइए 


ज्ञानबुधिभासाभावतन्नक  हो अभावबिनत रहे सुभावगुननसराहिए|


किसी से नाता लें जोड़कब्बो जाएँ नहीं तोड़फालतू  करें होड़नेह सोंनिबाहिए 


हाथन तिरंगा थामकरें सदा राम-राम, 'सलिलसे हों  वामदेस-वारीजाइए||


छत्तीसगढ़ी


अँचरा मा भरे धानटूरा गाँव का किसानधरती मा फूँक प्राणपसीनाबहावथे 


बोबरा-फार बनावबासी-पसिया सुहाव,  महुआ-अचार खावपंडवानीभावथे|


बारी-बिजुरी बनायउरदा के पीठी भाय, थोरको  ओतियायटूरीइठलावथे 


भारत के जय बोलमाटी मा करे किलोलघोटुल मा रस घोलमुटियारीभावथे||  


निमाड़ी


गधा का माथा का सिंगजसो नेता गुम हुयोगाँव बटोs वोs,उल्लूकी दुम हुयो|  

मनखको सुभाsव छेनहीं सहे अभाव छे, हमेसs खांव-खांव छेआपsसे तुम हुयो|

टीला पाणी झाड़s नद्दीहाय खोद रएs पिद्दी, भ्रष्टसरsकाररद्दीपतानामालुम हुयो
 
'सलिलआँसू वादsलाधsरा कहे खाद ला, मिहsनतका स्वाद पादूरsमाsतम हुयो||

मालवी:
दोहा:

भणि ले म्हारा देस कीसबसे राम-रहीम|

जल ढारे पीपल तलेअँगना चावे नीम|| 

कवित्त

शरद की चांदणी सेरात सिनगार करे, बिजुरी गिरे धरा पेफूल नभ सेझरे|

आधी राती भाँग बाटीदिया की बुझाई बाती, मिसरी-बरफ़ घोल्यो,नैना हैं भरे-भरे|

भाभीनी जेठानी रंगेकाकीनी मामीनी भीजें, सासू-जाया नहीं आया,दिल धीर  धरे|

रंग घोल्यो हौद भरबैठी हूँ गुलाल धर, राह में रोके हैं यारहायटारे टरे||

 राजस्थानी
जीवण का काचा गेलाजहाँ-तहाँ मेला-ठेला, भीड़-भाड़ ठेलं-ठेलामोड़तरां-तरां का|

ठूँठ सरी बैठो काईं?, चहरे पे आई झाईं, खोयी-खोयी परछाईंजोड़ तरां-तरां का|

चाल्यो बीज बजारा रे?, आवारा बनजारा रे?, फिरता मारा-मारा रे?,होड़ तरां-तरां का||

नाव कनारे लागैगीसोई किस्मत जागैगी, मंजिल पीछे भागेगीतोड़तरां-तरां का||

हिन्दी+उर्दू

दर्दे-दिल पीरो-गमकिसी को दिखाएँ मत, दिल में छिपाए रखेंहँस-मुस्कुराइए|

हुस्न के  ऐब देखेंदेखें भी तो नहीं लेखें, दिल पे लुटा के दिलवारी-वारी जाइए|

नाज़ो-अदा नाज़नीं केदेख परेशान  हों, आशिकी की रस्म है किसिरभी मुड़ाइए|

चलिए  ऐसी चालफालतू मचे बवाल, कोई  करें सवालनखरेउठाइए||

भोजपुरी

चमचम चमकलचाँदनी सी झलकल, झपटल लपकलनयन कटरिया|

तड़पल फड़कलधक्-धक् धड़कल, दिल से जुड़ल दिलगिरलबिजुरिया|

निरखल परखलरुक-रुक चल-चल, सम्हल-सम्हल पगधरलगुजरिया|

छिन-छिन पल-पलपड़त नहीं रे कल, मचल-मचल चलचपलसंवरिया||

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घनाक्षरी: वर्णिक छंद, चतुष्पदी, हर पद- ३१ वर्ण, सोलह चरण- 
हर पद के प्रथम ३ चरण ८ वर्ण, अंतिम ४ चरण ७ वर्ण.  

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घनाक्षरी / मनहरण कवित्त
... झटपट करिए
संजीव 'सलिल'
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लक्ष्य जो भी वरना हो, धाम जहाँ चलना हो,
काम जो भी करना हो, झटपट करिए.
तोड़ना नियम नहीं, छोड़ना शरम नहीं,
मोड़ना धरम नहीं, सच पर चलिए.
आम आदमी हैं आप, सोच मत चुप रहें,
खास बन आगे बढ़, देशभक्त बनिए-
गलत जो होता दिखे, उसका विरोध करें,
'सलिल' न आँख मूँद, चुपचाप सहिये.
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छंद विधान: वर्णिक छंद, आठ चरण,
८-८-८-७ पर यति, चरणान्त लघु-गुरु.
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३०-५-२०११