शुक्रवार, 20 जुलाई 2018

क्षणिका सलिला

क्षणिका सलिला
अविनाश ब्योहार 
*
चारा

जब कोई चारा
नहीं रहा तो
देना पड़ा प्रलोभन!
नैतिकता से
कार्य करवाना
सिद्ध हुआ
अरण्य रोदन!!

रस्म

पैसा खाना
दफ्तर की
हो गई
है रस्म!
लोग हो
गये हैं
चार चश्म!!

पस्त

लगता है
सूर्य हो गया
है अस्त!
प्रजातंत्र की
हालत पस्त!!

***
रायल एस्टेट
कटंगी रोड जबलपुर।

मुक्तक

मुक्तक:
जन्म दिन 
​समय ग्रन्थ के एक पृष्ठ को संजीवित कर आप रहे 
बिंदु सिंधु में, सिंधु बिंदु में होकर नित प्रति व्याप रहे 
हर दिन जन्म नया होना है, रात्रि मूँदना आँख सखे!
पैर धरा पर जमा, गगन छू आप सफलता नाप रहे 
*
मन सागर, मन सलिला भी है, नमन अंजुमन विहँस कहें
प्रश्न करे यह उत्तर भी दे, मन की मन में रखेँ-कहें?
शमन दमन का कर महकाएँ चमन, गमन हो शंका का-
बेमन से कुछ काम न करिए, अमन में चमन 'सलिल' रहे
*
तेरी निंदिया सुख की निंदिया, मेरी निंदिया करवट-करवट
मेरा टीका चौखट-चौखट, तेरी बिंदिया पनघट-पनघट
तेरी आसें-मेरी श्वासें, साथ मिलें रच बृज की रासें-
तेरी चितवन मेरी धड़कन, हैं हम दोनों सलवट-सलवट
*
बोरे में पैसे ले जाएँ, सब्जी लायें मुट्ठी में
मोबाइल से वक़्त कहाँ है, जो रुचि ले युग चिट्ठी में
कुट्टी करते घूम रहे हैं सभी सियासत के मारे-
चले गये वे दिन जब गले मिले हैं संगा मिट्ठी में
*
नहीं जेब में बचीं छदाम, खास दिखें पर हम हैँ आम
कोई तो कविता सुनकर, तनिक दाद दे करे सलाम
खोज रहीं तन्मय नज़रें, कहाँ वक़्त का मारा है?
जिसकी गर्दन पकड़ें हम फ़िर चुकवा दें बिल बेदाम
***

गीत:फ़िक्र मत करो

एक रचना-
फ़िक्र मत करो
*
फ़िक्र मत करो 
सब चलता है 
*
सूरज डूबा उगते-उगते
क्षुब्ध उषा को ठगते-ठगते
अचल धरा हो चंचल धँसती
लुटी दुपहरी बचते-फँसते
सिंदूरी संध्या है श्यामा
रजनी को
चंदा छलता है
फ़िक्र मत करो
सब चलता है
*
गिरि-चट्टानें दरक रही हैं
उथली नदियाँ सिसक रही हैं
घायल पेड़-पत्तियाँ रोते
गुमसुम चिड़ियाँ हिचक रही हैं
पशु को खा
मानव पलता है
फ़िक्र मत करो
सब चलता है
*
मनमर्जी कानून हुआ है
विधि-नियमों का खून हुआ है
रीति-प्रथाएँ विवश बलात्कृत
तीन-पाँच दो दून हुआ है
हाथ तोड़ पग
कर मलता है
***
१८. १२. २०१५

नवगीत महोत्सव २०१५ लखनऊ

यादें न जाएँ:
नवगीत महोत्सव २०१५ लखनऊ के पूर्ण होने पर
एक रचना:
फिर-फिर होगा गीत पर्व यह
*
दूर डाल पर बैठे पंछी
नीड़ छोड़ मिलने आए हैं
कलरव, चें-चें, टें-टें, कुहू
गीत नये फिर गुंजाए हैं
कुछ परंपरा,कुछ नवीनता
कुछ अनगढ़पन,कुछ प्रवीणता
कुछ मीठा,कुछ खट्टा-तीता
शीत-गरम, अब-भावी-बीता
ॐ-व्योम का योग सनातन
खूब सुहाना मीत पर्व यह
फिर-फिर होगा गीत पर्व यह
*
सुख-दुःख, राग-द्वेष बिसराकर
नव आशा-दाने बिखराकर
बोएँ-काटें नेह-फसल मिल
ह्रदय-कमल भी जाएँ कुछ खिल
आखर-सबद, अंतरा-मुखड़ा
सुख थोड़ा सा, थोड़ा दुखड़ा
अपनी-अपनी राम कहानी
समय-परिस्थिति में अनुमानी
कलम-सिपाही ह्रदय बसाएँ
चिर समृद्ध हो रीत, पर्व यह
फिर-फिर होगा गीत पर्व यह
*
मैं-तुम आकर हम बन पाएँ
मतभेदों को विहँस पचाएँ
कथ्य शिल्प रस भाव शैलियाँ
चिंतन-मणि से भरी थैलियाँ
नव कोंपल, नव पल्लव सरसे
नव-रस मेघा गरजे-बरसे
आत्म-प्रशंसा-मोह छोड़कर
परनिंदा को पीठ दिखाकर
नये-नये आयाम छू रहे
मना रहे हैं प्रीत-पर्व यह
फिर-फिर होगा गीत पर्व यह
*

नवगीत: नौटंकियाँ

नवगीत:
नौटंकियाँ 
*
नित नयी नौटंकियाँ 
हो रहीं मंचित 
*
पटखनी खाई
हुए चित
दाँव चूके
दिन दहाड़े।
छिन गयी कुर्सी
बहुत गम
पढ़ें उलटे
मिल पहाड़े।
अब कहो कैसे
जियें हम?
बीफ तजकर
खायें चारा?
बना तो सकते
नहीं कुछ
बन सके जो
वह बिगाडें।
न्याय-संटी पड़ी
पर सुधरे न दंभित
*
'सहनशीली
हो नहीं
तुम' दागते
आरोप भारी।
भगतसिंह, आज़ाद को
कब सहा तुमने?
स्वार्थ साधे
चला आरी।
बाँट-रौंदों
नीति अपना
सवर्णों को
कर उपेक्षित-
लगाया आपात
बापू को
भुलाया
ढोंगधारी।
वाममार्गी नाग से
थे रहे दंशित
*
सह सके
सुभाष को क्या?
क्यों छिपाया
सच बताओ?
शास्त्री जी के
निधन को
जाँच बिन
तत्क्षण जलाओ।
कामराजी योजना
जो असहमत
उनको हटाओ।
सिक्ख-हत्या,
पंडितों के पलायन
को भी पचाओ।
सह रहे क्यों नहीं जनगण ने
किया जब तुम्हें दंडित?
*

बांग्ला हिंदी: रवीन्द्रनाथ ठाकुर

एक सुंदर बांग्ला गीत: सावन गगने घोर घनघटा
गर्मी से हाल बेहाल है। इंतजार है कब बादल आएँ और बरसें जिससे तन-मन को शीतलता मिले। कुदरत के खेल कुदरत जाने, जब इंद्र देव की मर्जी होगी तभी बरसेंगे। गर्मी से परेशान तन को शीतलता तब ही मिल पाएगी लेकिन मन की शीतलता का इलाज है हमारे पास। सरस गीत सुनकर भी मन को शीतलता दी जा सकती है ना? आईए, आज एक सुंदर गीत सुनकर आनंद लें जिसे रचा है भानु सिंह ने। अरे! आप भानुसिंह को नहीं जानते? अब जान लीजिए, गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर अपनी 'प्रेम कवितायेँ' भानुसिंह के छद्म नाम से लिखते थे। यह 'भानु सिंहेर पदावली' का हिस्सा है। इसे स्वर दिया है कालजयी कोकिलकंठी गायिका लता जी ने, हिंदी काव्यानुवाद किया है आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' ने.

बांगला गीत
*
सावन गगने घोर घन घटा; निशीथ यामिनी रे!
कुञ्ज पथे सखि कैसे जावब; अबला कामिनी रे!!
उन्मद पवने जमुना तर्जित; घन-घन गर्जित मेह
दमकत बिद्युत पथ तरु लुंठित; थरहर कम्पित देह
घन-घन रिमझिम-रिमझिम-रिमझिम; बरखत नीरद पुंज
शाल-पियाले ताल-तमाले; निविड़ तिमिरमय कुञ्‍ज।

कह रे सजनी! ये दुर्योगे; कुंजी निर्दय कान्ह
दारुण बाँसी काहे बजावत; सकरुण राधा नाम
मोती महारे वेश बना दे; टीप लगा दे भाले
उरहि बिलुंठित लोल चिकुर मम; बाँध ह चंपक माले।
गहन रैन में न जाओ, बाला! नवल किशोर क' पास
गरजे घन-घन बहु डरपाव;ब कहे 'भानु' तव दास।

हिंदी काव्यानुवाद

श्रावण नभ में बदरा छाए; आधी रतिया रे!
बाग़ डगर किस विधि जाएगी?; निर्बल गुइयाँ रे!!
मत्त हवा यमुना फुँफकारे; गरज बरसते मेघ
दीप्त अशनि; मग-वृक्ष लोटते; थर-थर कँपे शरीर
घन-घन रिमझिम-रिमझिम-रिमझिम बरसे जलद समूह
शाल-चिरौजी ताड़-तेज तरु; घोर अंध-तरु व्यूह

सखी बोल रे!, यह अति दुष्कर; कितना निष्ठुर कृष्ण
तीव्र वेणु क्यों बजा नाम ले; 'राधा' कातर तृष्ण
मुक्ता मणि सम रूप सजा दे; लगा डिठौना माथ
हृदय क्षुब्ध है, गूँथ चपल लट-चंपा बाँध सुहाथ
रात घनेरी जाना मत; तज कान्ह मिलन की आस
रव करते 'सलिलज' भय भारी, 'भानु' तिहारा दास
***
भावार्थ
सावन की घनी अँधेरी रात है, गगन घटाओं से भरा है और राधा ने ठान लिया है कि कुंजवन में कान्हा से मिलने जाएगी। सखी समझा रही है, मार्ग की सारी कठिनाइयाँ गिना रही है: देख कैसी उन्मत्त पवन चल रही है, राह में कितने पेड़ टूटे पड़े हैं, देह थर-थर काँप रही है। राधा कहती हैं: हाँ, मानती हूँ कि बड़ा कठिन समय है लेकिन उस निर्दय कान्हा का क्या करूँ जो ऐसी दारुण बाँसुरी बजाकर मेरा ही नाम पुकार रहा है। जल्दी से मुझे सजा दे। कवि भानु प्रार्थना करते हैं ऐसी गहन रैन में नवलकिशोर के पास मत जाओ, बाला।
***

मुक्तक

मुक्तक:
आँखों से बरसात हो, अधर झराते फूल
मन मुकुलित हो जूही सम, विरह चुभे ज्यों शूल
तस्वीरों को देखकर, फेर रहे तस्बीह
ऊपर वाला कब कहे: 'ठंडा-ठंडा कूल'
***

माँ के प्रति प्रणतांजलि

माँ के प्रति प्रणतांजलि:
तन पुलकित, मन सुरभित करतीं, माँ की सुधियाँ पुरवाई सी.
दोहा गीत गजल कुण्डलिनी, मुक्तक छप्पय रूबाई सी..
मन को हुलसित-पुलकित करतीं, यादें 'सलिल' डुबातीं दुख में-
होरी गारी बन्ना बन्नी, सोहर चैती शहनाई सी.. 
*
मानस पट पर अंकित नित नव छवियाँ ऊषा अरुणाई सी.
तन पुलकित, मन सुरभित करतीं, माँ की सुधियाँ पुरवाई सी..
प्यार हौसला थपकी घुड़की, आशीर्वाद दिलासा देतीं-
नश्वर जगती पर अविनश्वर विधि-विधना की परछांई सी..
*
उँगली पकड़ सहारा देती, गिरा उठा गोदी में लेती.
चोट मुझे तो दर्द उसे हो, सुखी देखकर मुस्का देती.
तन पुलकित, मन सुरभित करतीं, माँ की सुधियाँ पुरवाई सी-
'सलिल' अभागा माँ बिन रोता, श्वास -श्वास है रुसवाई सी..
*
जन्म-जन्म तुमको माँ पाऊँ, तब हो क्षति की भरपाई सी.
दूर हुईं जबसे माँ तबसे घेरे रहती तन्हाई सी.
अंतर्मन की पीर छिपाकर, कविता लिख मन बहला लेता-
तन पुलकित, मन सुरभित करतीं, माँ की सुधियाँ पुरवाई सी
*
कौशल्या सी ममता तुममें, पर मैं राम नहीं बन पाया.
लाड़ दिया जसुदा सा लेकिन, नहीं कृष्ण की मुझमें छाया.
मूढ़ अधम मुझको दामन में लिए रहीं तुम निधि पाई सी.
तन पुलकित, मन सुरभित करतीं, माँ की सुधियाँ पुरवाई सी
*

मुक्तिका: किस्सा नहीं हूँ

मुक्तिका:
संजीव
.
आप मानें या न मानें, सत्य हूँ ;किस्सा नहीं हूँ
कौन कह सकता है, हूँ इस सरीखा; उस सा नहीं हूँ
मुझे भी मालुम नहीं है, क्या बता सकता है कोई?
पूछता हूँ आजिजी से, कहें; मैं किस सा नहीं हूँ
साफगोई ने अदावत, का दिया है दंड हरदम
फिर भी मुझको फख्र है, मैं छल रहा घिस्सा नहीं हूँ
हाथ थामो या न थामो, फैसला-मर्जी तुम्हारी
कस नहीं सकता गले में, आदमी- रस्सा नहीं हूँ
अधर पर तिल समझ मुझको, दूर अपने से न करना
हनु न रवि को निगल लेना, हाथ में गस्सा नहीं हूँ
निकट हो या दूर हो तुम, नूर हो तुम; हूर हो तुम
पर बहुत मगरूर हो तुम, सच कहा; गुस्सा नहीं हूँ
***
खामियाँ कम, खूबियाँ ज्यादा, तुम्हें तब तक दिखेंगी
मान जब तक यह न लोगे, तुम्हारा हिस्सा नहीं हूँ
.

नवगीत: खों-खों करते

नवगीत: 
संजीव 

खों-खों करते 
बादल बब्बा 
तापें सूरज सिगड़ी
.
आसमान का आँगन चौड़ा
चंदा नापे दौड़ा-दौड़ा
ऊधम करते नटखट तारे
बदरी दादी 'रुको' पुकारें
पछुआ अम्मा
बड़बड़ करती
डाँट लगातीं तगड़ी
.
धरती बहिना राह हेरती
दिशा सहेली चाह घेरती
ऊषा-संध्या बहुएँ गुमसुम
रात और दिन बेटे अनुपम
पाला-शीत न
आये घर में
खोल न खिड़की अगड़ी
.
सूर बनाता सबको कोहरा
ओस बढ़ाती संकट दोहरा
कोस न मौसम को नाहक ही
फसल लाएगी राहत को ही
हँसकर खेलें
चुन्ना-मुन्ना
मिल चीटी-धप, लँगड़ी
....

दोहा सलिला:

नीरज के प्रति
*
कंठ विराजीं शारदा, वाचिक शक्ति अनंत।
शब्द-ब्रम्ह के दूत हे!, गीति काव्य कवि-कंत।।
गीति काव्य कवि-कंत, भाव लय रस के साधक।
चित्र गुप्त साकार, किए हिंदी-आराधक।।
इंसां को इंसान, बनाने ही की कविता।
करे तुम्हारा मान, रक्त-नत होकर सविता।।
*
नीर नर्मदा-धार सा, निर्मल पावन काव्य।
नीरज कवि लें जन्म, फिर हिंदी-हित संभाव्य।
हिंदी हित संभाव्य, कारवां फिर-फिर गुजरे।
गंगो-जमनी मूल्य, काव्य में सँवरे-निखरे।।
दिल की कविता सुने, कहे दिल हुआ प्यार सा।
नीरज काव्य महान, बहा नर्मदा-धार सा।।
*
केवल देह नहीं रहने से, नीरज नहीं मरा करता है।
नेह-नर्मदा काव्य नहाकर, व्याकुल मनुज तरा करता है।।
.
नीरज है हर एक कारवां, जो रोतों को मुस्कानें दे।
पीर-गरल पी; अमिय लुटाए, गूँगे कंठों को तानें दे।।
हों बदनाम भले ही आँसू, बहे दर्द का दर्द देखकर।
भरती रहीं आह गजलें भी, रोज सियासत सर्द देखकर।।
जैसी की तैसी निज चादर, शब्द-सारथी ही धरता है।।
केवल देह नहीं रहने से, नीरज नहीं मरा करता है..
.

बुधवार, 18 जुलाई 2018

लहर पर दोहा

१८.७.२०१८
विषय पर दोहे:
लहर, उर्मि, तरंग, वेव
*
नेह नर्मदा घाट पर, पटकें शीश तरंग.
लहर-लहर लहरा रहीं, सिकता-कण के संग.
*
सलिल-धार में कूदतीं, भोर उर्मियाँ झाँक.
टहल रेत में बैठकर, चित्र अनूठे आँक.
*
ओज-जोश-उत्साह भर, कूदें छप्प-छपाक.
वेव लेंग्थ को ताक पर, धरें वेव ही ताक.
*
मन में उठी उमंग या, उमड़ा भाटा-ज्वार.
हाथ थाम संजीव का, कूद पडीं मँझधार.
*
लहँगा लहराती रहीं, लहरें करें किलोल.
संयम टूटा घाट का, गया बाट-दिल डोल.
*
घहर-घहर कर बह चली, हहर-हहर जलधार.
जो बौरा डूबन डरा, कैसे उतरे पार.
*
नागिन सम फण पटकती, फेंके मुख से झाग.
बारिश में उफना लहर, बुझे न दिल की आग.
*
निर्मल थी पंकिल हुई, जल-तरंग किस व्याज.
मर्यादा-तट तोड़कर, करती काज अकाज.
*
कर्म-लहर पर बैठकर, कर भवसागर पार.
सीमा नहीं असीम की, ले विश्वास उबार.
***
१८,७,२०१८, ७९९९५५९६१८

दोहा सलिला: शब्द

'शब्द' पर दोहे
*
अक्षर मिलकर शब्द हों, शब्द-शब्द में अर्थ।
शब्द मिलें तो वाक्य हों, पढ़ समझें निहितार्थ।।
*
करें शब्द से मित्रता, तभी रच सकें काव्य।
शब्द असर कर कर सकें, असंभाव्य संभाव्य।।
*
भाषा-संस्कृति शब्द से, बनती अधिक समृद्ध।
सम्यक् शब्द-प्रयोग कर, मनुज बने मतिवृद्ध।।
*
सीमित शब्दों में भरें, आप असीमित भाव।
चोटिल करते शब्द ही, शब्द मिटाते घाव।।आद्या
*
दें शब्दों का तोहफा, दूरी कर दें दूर।
मिले शब्द-उपहार लें, बनकर मित्र हुजूर।।
*
निराकार हैं शब्द पर, व्यक्त करें आकार।
खुद ईश्वर भी शब्द में, हो जाता साकार।।
*
जो जड़ वे जानें नहीं, क्या होता है शब्द।
जीव-जंतु ध्वनि से करें, भाव व्यक्त बेशब्द।।
*
बेहतर नागर सभ्यता, शब्द-शक्ति के साथ।
सुर नर वानर असुर के,  शब्द बन गए हाथ।।
*
पीढ़ी-दर-पीढ़ी बढ़ें, मिट-घट सकें न शब्द।
कहें, लिखें, पढ़िए सतत, कभी न रहें निशब्द।।
*
शब्द भाव-भंडार हैं, सरस शब्द रस-धार।
शब्द नए नित सीखिए, सबसे सब साभार।।
*
शब्द विरासत; प्रथा भी, परंपरा लें जान।
रीति-नीति; व्यवहार है, करें शब्द का मान।।
*
शब्द न अपना-गैर हो, बोलें बिन संकोच।
लें-दें कर लगता नहीं, घूस न यह उत्कोच।।
*
शब्द सभ्यता-दूत हैं, शब्द संस्कृति पूत।
शब्द-शक्ति सामर्थ्य है, मानें सत्य अकूत।।
*
शब्द न देशी-विदेशी, शब्द न अपने-गैर।
व्यक्त करें अनुभूति हर, भाव-रसों के पैर।।
*
शब्द-शब्द में प्राण है,  मत मानें निर्जीव।
सही प्रयोग करें सभी, शब्द बने संजीव।।
*
शब्द-सिद्धि कर सृजन के, पथ पर चलें सुजान।
शब्द-वृद्धि कर ही बने, रचनाकार महान।।
*
शब्द न नाहक बोलिए, हो जाएंगे शोर।
मत अनचाहे शब्द कह, काटें स्नेहिल डोर।।
*
समझ शऊर तमीज सच, सिखा बनाते बुद्ध।
युद्घ कराते-रोकते, करते शब्द प्रबुद्ध।।
*
शब्द जुबां को जुबां दें, दिल को दिल से जोड़।
व्यर्थ होड़ मत कीजिए, शब्द न दें दिल तोड़।।
*
बातचीत संवाद गप, गोष्ठी वार्ता शब्द।
बतरस गपशप चुगलियाँ, होती नहीं निशब्द।।
*
दोधारी तलवार सम, करें शब्द भी वार।
सिलें-तुरप; करते रफू, शब्द न रखें उधार।।
*
शब्दों से व्यापार है, शब्दों से बाजार।
भाव-रस रहित मत करें, व्यर्थ शब्द-व्यापार।।
*
शब्द आरती भजन जस, प्रेयर हम्द अजान।
लोरी गारी बंदिशें, हुक्म कभी फरमान।।
*
विनय प्रार्थना वंदना, झिड़क डाँट-फटकार।
ऑर्डर विधि आदेश हैं, शब्द दंड की मार।।
*
शब्द-साधना दूत बन, करें शब्द से प्यार।
शब्द जिव्हा-शोभा बढ़ा, हो जाए गलहार।।
***
salil.sanjiv@gmail.com
18.7.2018, 7999559618

मंगलवार, 17 जुलाई 2018

पुस्तक समीक्षा: काल है संक्रांति का, डा. श्याम गुप्त


पुस्तक समीक्षा

[समीक्ष्य कृति: काल है संक्रांति का,रचनाकार: आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', प्रथम संस्करण २०१६, मूल्य: २००/-, आवरण: मयंक वर्मा, रेखांकन: अनुप्रिया, प्रकाशक-समन्वय प्रकाशन अभियान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर, चलभाष: ७९९९५५९६१८, समीक्षक: डा. श्याम गुप्त, लखनऊ] 
साहित्य जगत में समन्वय के साहित्यकार, कवि हैं आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'।प्रस्तुत कृति ‘काल है संक्रांति का’ की सार्थकता का प्राकट्य मुखपृष्ठ एवं शीर्षक से ही हो जाता है। वास्तव में ही यह संक्रांति-काल है, जब सभी जन व वर्ग भ्रमित अवस्था में हैं। एक और अंग्रेज़ी का वर्चस्व जहाँ चमक-दमक वाली विदेशी संस्कृति दूर से सुहानी लगती है; दूसरी और हिंदी–हिंदुस्तान का, भारतीय स्व संस्कृति का प्रसार जो विदेश बसे को भी अपनी मिट्टी की ओर खींचता है। या तो अँगरेज़ हो जाओ या भारतीय किंतु समन्वय ही उचित पंथ होता है, जो हर युग में विद्वानों, साहित्यकारों को ही करना होता है। सलिल जी की साहित्यिक समन्वयक दृष्टि का एक उदाहरण प्रस्तुत है: 'गीत अगीत प्रगीत न जानें / अशुभ भुला शुभ को पहचानें ।' माँ शारदा से पहले, ब्रह्म रूप में चित्रगुप्त की वंदना भी नवीनता है। कवि की हिंदी भक्ति वंदना में भी छलकती है: हिंदी हो भावी जग वाणी / जय जय वीणापाणी’।
यह कृति लगभग १४ वर्षों के लंबे अंतराल में प्रस्तुत हुई है। इस काल में कितनी विधाएँ आईं–गईं, कितनी साहित्यिक गुटबाजी रही, सलिल मौन दृष्टा की भाँति गहन दृष्टि से देखने के साथ-साथ उसकी जड़ों को, विभिन्न विभागों को अपने काव्य व साहित्य-शास्त्रीय कृतित्वों से पोषण दे रहे थे, जिसका प्रतिफल है यह कृति। 
कितना दुष्कर है बहते सलिल को पन्ने पर रोकना-उकेरना। समीक्षा लिखते समय मेरा यही भाव बनता था जिसे मैंने संक्षिप्त में काव्य-रूपी समीक्षा में इस प्रकार व्यक्त किया है-
“शब्द सा है मर्म जिसमें, अर्थ सा शुचि कर्म जिसमें 
साहित्य की शुचि साधना जो, भाव का नव धर्म जिसमें 
उस सलिल को चाहता है, चार शब्दों में पिरोना।।” 
सूर्य है प्रतीक संक्रांति का, आशा के प्रकाश का, काल की गति का, प्रगति का। अतः, सूर्य के प्रतीक पर कई रचनाएँ हैं | ‘जगो सूर्य लेकर आता है अच्छे दिन’ ( जगो सूर्य आता है ) में आशावाद है, नवोन्मेष है जो उन्नायकी समस्त साहित्य में व इस कृति में सर्वत्र परिलक्षित है। ‘मानव की आशा तुम, कोशिश की भाषा तुम’ (उगना नित) ‘छँट गए हैं फूट के बादल, पतंगें एकता की उड़ाओ”(-आओ भी सूरज)।
पुरुषार्थ युक्त मानव, शौर्य के प्रतीक सूर्य की भाँति प्रत्येक स्थित में सम रहता है। ‘उग रहे या ढल रहे तुम, कांत प्रतिपल रहे सूरज’ तथा ‘आस का दीपक जला हम, पूजते हैं उठ सवेरे, पालते या पल रहे तुम ‘(-उग रहे या ढल रहे ) से प्रकृति के पोषण-चक्र, देव-मनुज नाते का कवि हमें ज्ञान कराता है | शिक्षा की महत्ता ‘सूरज बबुआ’ में, संपाती व हनुमान की पौराणिक कथाओं के संज्ञान से इतिहास की भूलों को सुधारकर लगातार उद्योग व हार न मानने की प्रेरणा दी गई है ‘छुएँ सूरज’ रचना में। शीर्षक रचना ‘काल है संक्रांति का’ प्रयाण गीत है, ‘काल है संक्रांति का, तुम मत थको सूरज’ सूर्य व्यंजनात्मक भाव में मानवता के पौरुष का, ज्ञान का व प्रगति का प्रतीक है जिसमें 'चरैवेति-चरैवेति' का संदेश निहित है। यह सूर्य स्वयं कवि भी हो सकता है।“
युवा पीढ़ी को स्व-संस्कृति का ज्ञान नहीं है, कवि व्यथित हो स्पष्टोक्ति में कह उठता है:
‘जड़ गँवा जड़ युवा पीढ़ी, काटती है झाड़, प्रथा की चूनर न भाती, फेंकती है फाड़ /
स्वभाषा को भूल इंग्लिश से लड़ाती लाड़।’
 
यदि हम शुभ चाहते हैं तो सभी जीवों पर दया करें एवं सामाजिक एकता व परमार्थ भाव अपनाएँ। कवि व्यंजनात्मक भाव में कहता है: ‘शहद चाहें, पाल माखी |’ (उठो पाखी )| देश में भिन्न-भिन्न नीतियों की राजनीति पर भी कवि स्पष्ट रूप से तंज करता है: ’धारा ३७० बनी रहेगी क्या’/ काशी मथुरा अवध विवाद मिटेंगे क्या’? ‘ओबामा आते’ में आज के राजनीतिक-व्यवहार पर प्रहार है | 
अंतरिक्ष में तो मानव जा रहा है परंतु क्या वह पृथ्वी की समस्याओं का समाधान कर पाया है? यह प्रश्न उठाते हुए सलिल जी कहते हैं..’मंगल छू / भू के मंगल का क्या होगा?’ ’पंजाबी  गीत ‘सुंदरिये मुंदरिये ’ तथा बुंदेली लोकगीत ‘मिलती कायं नें’ में कवि के समन्वयता भाव की ही अभिव्यक्ति है।
प्रकृति, पर्यावरण, नदी-प्रदूषण, मानव आचरण से चिंतित कवि कह उठता है:
‘कर पूजा पाखण्ड हम / कचरा देते डाल । मैली होकर माँ नदी / कैसे हो खुशहाल?’
‘जब लौं आग’ में कवि 'उत्तिष्ठ जागृत' का संदेश देता है कि हमारी अज्ञानता ही हमारे दुखों का कारण है:
‘गोड़-तोड़ हम फसल उगा रए/ लूट रहे व्योपारी। जागो बनो मशाल नहीं तो / घेरे तुमें अँधेरा।
धन व शक्ति के दुरुपयोग एवं वे दुरुपयोग क्यों कर पा रहे हैं, ज्ञानी पुरुषों की अकर्मण्यता के कारण।सलिल जी कहते हैं: -‘रुपया जिसके पास है / उद्धव का संन्यास है / सूर्य ग्रहण खग्रास है |’ (-खासों में ख़ास है )
पेशावर के नरपिशाच, तुम बन्दूक चलाओ तो, मैं लडूँगा आदि रचनाओं में शौर्य के स्वर हैं।छद्म समाजवाद की भी खबर ली गयी है –‘लड़वाकर / मसला सुलझाए समाजवादी’।
पुरखों-पूर्वजों के स्मरण बिना कौन उन्नत हो पाया है? अतः, सभी पूर्व, वर्त्तमान, प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष पुरखों, पितृजनों के एवं उनकी सीख का स्मरण में नवता का एक और पृष्ठ है ‘स्मरण’ रचना में:
‘काया माया छाया धारी / जिन्हें जपें विधि हरि त्रिपुरारी’
‘कलम थमाकर कर में बोले / धन यश नहीं सृजन तव पथ हो।’ क्योंकि यश व पुरस्कार की आकांक्षा श्रेष्ठ सृजन से वंचित रखती है। नारी-शक्ति का समर्पण का वर्णन करते हुए सलिल जी का कथन है:
‘बनी अग्रजा या अनुजा तुम / तुमने जीवन सरस बनाया ‘ (-समर्पण)।
'मिली दिहाड़ी' रचना में दैनिक वेतन-भोगी की व्यथा उत्कीर्णित है |
‘लेटा हूँ‘ रचना में श्रृंगार की झलक के साथ पुरुष मन की विभिन्न भावनाओं, विकृत इच्छाओं का वर्णन है। इस बहाने झाडूवाली से लेकर धार्मिक स्थल, राजनीति, कलाक्षेत्र, दफ्तर प्रत्येक स्थल पर नारी-शोषण की संभावना का चित्र उकेरा गया है। ‘राम बचाए‘ में जन मानस के व्यवहार की भेड़चाल का वर्णन है: ‘मॉल जारहे माल लुटाने / क्यों न भीड़ से भिन्न हुए हम’| अनियंत्रित विकास की आपदाएँ ‘हाथ में मोबाइल’ में स्पष्ट की गयी हैं।
‘मंजिल आकर’ एवं ‘खुशियों की मछली’ नवगीत के मूल दोष भाव-संप्रेषण की अस्पष्टता के उदाहरण हैं | वहीं आजकल समय बिताने हेतु, कुछ हो रहा है यह दिखाने हेतु, साहित्य एवं हर संस्था में होने वाले विभिन्न विषयों पर सम्मेलनों, वक्तव्यों, गोष्ठियों, चर्चाओं की निरर्थकता पर कटाक्ष है ‘दिशा न दर्शन’ रचना में:  
‘क्यों आये हैं? / क्या करना है? / ज्ञात न पर / चर्चा करना है |’
राजनैतिक गुलामी से मुक्त होने पर भी अभी हम सांस्कृतिक रूप से स्वतंत्र नहीं हुए हैं। वह वास्तविक आजादी कब मिलेगी, कृतिकार के अनुसार, इसके लिए मानव बनना अत्यावश्यक है:  
‘सुर न असुर हम आदम यदि बन जायेंगे इंसान, स्वर्ग तभी हो पायेगा धरती पर आबाद।’
सार्वजनिक जीवन व मानव आचरण में सौम्यता, समन्वयता, मध्यम मार्ग की आशा की गई है ताकि अतिरेकता, अति-विकास, अति-भौतिक उन्नति के कारण प्रकृति, व्यक्ति व समाज का व्यबहार घातक न हो जाए:
‘पर्वत गरजे, सागर डोले / टूट न जाएँ दीवारें / दरक न पायें दीवारें।’ 
इस प्रकार कृति का भाव पक्ष सबल है | कला पक्ष की दृष्टि से देखें तो जैसा कवि ने स्वयं कहा है ‘गीत-नवगीत‘ अर्थात सभी गीत ही हैं। कई रचनाएँ तो अगीत-विधा की हैं:‘अगीत-गीत’ हैं। वस्तुतः, इस कृति को ‘गीत-अगीत-नवगीत संग्रह’ कहना चाहिए। सलिल जी काव्य में इन सब छंदों-विभेदों के द्वंद नहीं मानते अपितु एक समन्वयक दृष्टि रखते हैं, जैसा उन्होंने स्वयम कहा है ‘कथन’ रचना में:
‘गीत अगीत प्रगीत न जानें / अशुभ भुला, शुभ को पहचाने।’
‘छंद से अनुबंध दिखता या न दिखता / किन्तु बन आरोह या अवरोह पलता।’
‘विरामों से पंक्तियाँ नव बना / मत कह, छंद हीना / नयी कविता है सिरजनी।’
सलिल जी लक्षण शास्त्री हैं। साहित्य, छंद आदि के प्रत्येक भाव, भाग-विभाग का व्यापक ज्ञान व वर्णन कृति में प्रस्तुत किया गया है। विभिन्न छंदों, मूलतः सनातन छंदों दोहा, सोरठा, हरिगीतिका, आल्हा छंद तथा लोकधुनों के आधार पर नवगीत रचना दुष्कर कार्य है। वस्तुतः, ये विशिष्ट नवगीत हैं, प्रायः रचे जाने वाले अस्पष्ट संदेश वाले, तोड़-मरोड़कर लिखे जाने वाले नवगीत नहीं हैं। सोरठा पर आधारित एक गीत देखें:
‘आप न कहता हाल, भले रहे दिल सिसकता।
करता नहीं ख़याल, नयन कौन सा फड़कता।।’
कृति की भाषा सरल, सुग्राह्य, शुद्ध खड़ी बोली हिंदी है। विषय, स्थान व आवश्यकतानुसार भाव-सम्प्रेषण हेतु देशज व बुंदेली का भी प्रयोग किया गया है: यथा ‘मिलती कायं नें ऊंची वारी/ कुरसी हमकों गुइयाँ।|’ उर्दू के गज़लात्मक गीत का एक उदाहरण देखें:
‘ख़त्म करना अदावत है / बदल देना रवायत है / ज़िंदगी गर नफासत है / दीन-दुनिया सलामत है।’
अधिकाँश रचनाओं में प्रायः उपदेशात्मक शैली का प्रयोग किया गया है। वर्णानात्मक व व्यंगात्मक शैली का भी यथास्थान प्रयोग है। कथ्य-शैली मूलतः अभिधात्मक शब्द भाव होते हुए भी अर्थ-व्यंजना युक्त है। एक व्यंजना देखिए: ‘अर्पित शब्द हार उनको / जिनमें मुस्काता रक्षाबंधन।’ एक लक्षणा का भाव देखें:
‘राधा या आराधा सत शिव / उषा सदृश्य कल्पना सुंदर।’
विविध अलंकारों की छटा सर्वत्र विकिरित है: ‘अनहद अक्षय अजर अमर है / अमित अभय अविजित अविनाशी।’ में अनुप्रास का सौंदर्य है।| ‘प्रथा की चूनर न भाती’ व 'उनके पद सरोज में अर्पित / कुमुद कमल सम आखर मनका।’ में उपमा दर्शनीय है। ‘नेता अफसर दुर्योधन, जज वकील धृतराष्ट्र’ में रूपक की छटा है, तो ‘कुमुद कमल सम आखर मनका’ में श्लेष अलंकार है।उपदेशात्मक शैली में रसों की संभावना कम ही रहती है तथापि ओबामा आते, मिलती कायं नें, लेटा हूँ में हास्य व श्रृंगार का प्रयोग है। ‘कलश नहीं आधार बनें हम’ में प्रतीक व ‘आखें रहते भी हैं सूर’ व ‘पौ बारह’ कहावतों के उदाहरण हैं। ‘गोदी चढ़ा उंगलियाँ थामी / दौड़ा गिरा उठाया तत्क्षण ‘ में चित्रमय बिंब-विधान का सौंदर्य दृष्टिगत है। 
पुस्तक आवरण के मोड़-पृष्ठ पर सलिल जी के प्रति विद्वानों की राय एवं आवरण व सज्जाकारों के चित्र, आचार्य राजशेखर की काव्य-मीमांसा का उद्धरण एवं स्वरचित दोहे भी अभिनव प्रयोग हैं। अतः, वस्तुपरक व शिल्प सौंदर्य के समन्वित दृष्टि भाव से ‘काल है संक्रांति का’ एक सफल कृति है। इसके लिए श्री संजीव वर्मा सलिल जी बधाई के पात्र हैं।
लखनऊ, दि.११.१०.२०१६                                                                                                            - डा. श्याम गुप्त
विजय दशमी सुश्यानिदी, के-३४८, आशियाना, लखनऊ-२२६०१२, चलभाष: ९४१५१५६४६४ ।

ओ तुम!

एक रचना:
ओ तुम!
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ओ तुम! मेरे गीत-गीत में बहती रस की धारा हो.
लगता हर पल जैसे तुमको पहली बार निहारा हो.
दोहा बनकर मोहा तुमने, हाथ थमाया हाथों में-
कुछ न अधर बोले पर लगता तुमने अभी पुकारा हो.
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ओ तुम! ही छंदों की लय हो, विलय तुम्हीं में भाव हुए.
दूर अगर तुम तो सुख सारे, मुझको असह अभाव हुए.
अपने सपने में केवल तुम ही तुम हो अभिसारों में-
मन-मंदिर में तुम्हीं विराजित, चौपड़ की पौ बारा हो.
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ओ तुम! मात्रा-वर्ण के परे, कथ्य-कथानक भाषा हो.
अलंकार का अलंकार तुम, जीवन की परिभाषा हो.
नयनों में सागर, माथे पर सूरज, दृढ़संकल्पमयी-
तुम्हीं पूर्णिमा का चंदा हो, और तुम्हीं ध्रुव तारा हो.
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तुम्हीं लावणी, कजरी, राई, रास, तुम्हीं चौपाई हो.
सावन की हरियाली हो तुम, फागों की अरुणाई हो.
कथा-वार्ता, व्रत, मेला तुम, भजन, आरती की घंटी -
नेह-नर्मदा नित्य निनादित, तुम्हीं सलिल की धारा हो.
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salil.sanjiv@gmail.com
१७.७.२०१८, ७९९९५५९६१८