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बुधवार, 8 फ़रवरी 2023

भोजपुरी दोहा, मुक्तिका, मुक्तक, नवगीत, जाया छंद, बुंदेली गीत, क्रिकेट, विद्या छंद, सॉनेट, सेठ रामदास

सॉनेट 
प्रस्ताव दिवस
मना रहा प्रस्ताव दिवस जग
हमें रहे नेता मिलकर ठग
राहत देते जब चुनाव हो
चार बरस देते अभाव वो

संसद में नित नूराकुश्ती 
जब देखो तब करते मस्ती
ताव दिखाने का क्यों चाव?
क्यों न पेश करते प्रस्ताव?

मिलकर नीचे लाएँ भाव
खे पाए घरवाली नाव
आधे कर निज वेतन-भत्ते
घूमें नित्य लगाकर लत्ते 

जनगण कहे न जनहित भूल
तज गुलाब ला गोभी फूल
८-२-२०२३
•••
विमर्श
प्रश्न- कैसे मालूम हो कि वेन्टीलेटर पर रह रहा मरीज जीवित है या नहीं?
उत्तर- शरीर की ३ मुख्य प्रक्रियाएँ फेफड़ों द्वारा सांस लेना, हृदय द्वारा शरीर के सभी अंगों तक रक्त पहुँचाना और मस्तिष्क का काम करना हैं। इन तीनों मैं से एक भी रुक जाए तो एक तरह की मृत्यु ही है। वेंटिलेटर पर तभी रखा जाता है जब मरीज का हृदय और दिमाग का कर रहा हो। वेंटिलेटर से कार्डियक मॉनिटर जुड़ा रहता है। वेंटिलेटर फेफड़ों मैं हवा या ऑक्सिजन भरने का काम करता है। किसी रोगी की मृत्यु हो गई हो और उसका दिल भी रुक गया हो तो फेफड़ों मैं हवा या ऑक्सीजन भरना निरर्थक होगा क्योंकि खून तो जम चुका होगा, दिमाग भी ऑक्सिजन न मिलने से मृत हो चुका होगा। ऐसे मैं आप कितनी ऑक्सिजन देते रहो, शरीर सड़ने लगेगा। जब ब्रेन डेड हो और दिल चल रहा हो तब वेंटिलेटर शरीर के आंतरिक अंगों को प्रत्यारोपण के लिए जीवित रखने हेतु इस्तेमाल किया जा सकता है। अगर मरीज वेंटिलेटर पर है तो मॉनिटर में दिल की धड़कनें और खून का ऑक्सिजन स्तर देखें। अगर यह दिख रहा है तो इसका मतलब दिल चल रहा है, अगर आँखों की पुतलियां फैली नहीं है तो इसका मतलब उसका ब्रेन काम कर रहा है।
***
अमर शहीद सेठ रामदास गुड़वाले

सेठ रामदास जी गुड़वाले - 1857 के महान क्रांतिकारी, दानवीर जिन्हें फांसी पर चढ़ाने से पहले अंग्रेजों ने उनपर शिकारी कुत्ते छोड़े जिन्होंने जीवित ही उनके शरीर को नोच खाया

सेठ रामदास जी गुड़वाला (दिल्ली के अरबपति सेठ और बैंकर) अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के गहरे दोस्त थे। इनका जन्म दिल्ली में एक अग्रवाल परिवार में हुआ था। इनके परिवार ने दिल्ली में पहली कपड़े की मिल की स्थापना की थी। उनकी अमीरी की एक कहावत थी “रामदास जी गुड़वाले के पास इतना सोना, चाँदी जवाहरात है कि उनकी दीवारों से गंगा जी का पानी भी रोक सकते हैं”।

सन १८५७ में मेरठ से आरंभ क्रांति की चिंगारी दिल्ली पहुँची तो मुगल सम्राट बहादुरशाह जफर को क्रांति का नायक घोषित कर दिया गया। दिल्ली से अंग्रेजों की हार के बाद अनेक रियासतों की भारतीय सेनाओं ने दिल्ली में डेरा डाल दिया। उनके भोजन और वेतन की समस्या पैदा हो गई। बादशाह का खजाना खाली था। फिर एक दिन बादशाह ने अपनी रानियों के गहने, मंत्रियों के सामने रख दिए। रामजीदास गुड़वाले बादशाह के गहरे मित्र थे |

रामदास जी को बादशाह की यह अवस्था देखी नहीं गई। उन्होंने अपनी करोड़ों की सम्पत्ति बादशाह के हवाले कर दी कि "मातृभूमि की रक्षा होगी तो धन फिर कमा लिया जाएगा। रामजीदास ने केवल धन ही नहीं दिया, सैनिकों को सत्तू, आटा, अनाज, और बैलों, ऊँटों व घोड़ों के लिए चारे की व्यवस्था भी की। उन्होंने अभी तक केवल व्यापार ही किया था, सेना व खुफिया विभाग के संघठन का कार्य भी प्रारंभ कर दिया उनकी संगठन शक्ति को देखकर अंग्रेज़ सेनापति भी हैरान हो गए। सारे उत्तर भारत में सेठ जी ने जासूसों का जाल बिछा दिया, अनेक सैनिक छावनियों से गुप्त संपर्क किया। उन्होंने भीतर ही भीतर एक शक्तिशाली सेना व गुप्तचर संघठन का निर्माण किया। देश के कोने कोने में गुप्तचर भेजे व छोटे से छोटे मनसबदार और राजाओं से प्रार्थना की। इस संकट काल में बहादुर शाह जफर की मदद कर, देश को स्वतंत्र करवाने का बेमिसाल प्रयास किया।

रामदास जी की इस प्रकार की क्रांतिकारी गतिविधयिओं से अंग्रेज़ शासन व अधिकारी बहुत परेशान होने लगे। कुछ कारणों से दिल्ली पर अंग्रेजों का पुनः कब्जा होने लगा। दुखी होकर, एक दिन सेठ जी ने, चाँदनी चौक की दुकानों के आगे जगह-जगह ज़हर मिश्रित, शराब की बोतलों की पेटियाँ रखवा दीं, अंग्रेज सेना उनसे प्यास बुझाती और वही लेट जाती। अंग्रेजों को समझ आ गया कि भारत पर शासन करना है तो रामदास जी का अंत बहुत ज़रूरी है। सेठ रामदास जी गुड़वाले को धोखे से पकड़ लिया गया और जिस तरह से मारा गया, वो तो क्रूरता की जीती जागती मिसाल है।

सेठ रामदास जी को पहले रस्सियों से खम्बे के साथ बाँधा गया, फिर उन पर शिकारी कुत्ते छोड़कर कटवाया गया। उसके बाद उन्हें अधमरी अवस्था में दिल्ली के चांदनीचाँदनी चौक की कोतवाली के सामने फांसी पर लटका दिया गया। सुप्रसिद्ध इतिहासकार ताराचंद ने अपनी पुस्तक 'हिस्ट्री ऑफ फ्रीडम मूवमेंट' में लिखा है - "सेठ रामदास गुड़वाला उत्तर भारत के सबसे धनी सेठ थे।अंग्रेजों के विचार से उनके पास असंख्य मोती, हीरे व जवाहरात व अकूत संपत्ति थी। वह मुग़ल बादशाहों से भी अधिक धनी थे। यूरोप के बाजारों में भी उनकी अमीरी की चर्चा होती थी"।

भारत के इतिहास में उनका जो नाम है, वो उनकी अतुलनीय संपत्ति की वजह से नहीं बल्कि स्वतंत्रता संग्राम में अपना सर्वस्व न्योछावर करने की वजह से है। क्या हम सेठ रामदास जी को याद कर श्रद्धा से सर नवाते हैं, यदि नहीं तो?
८-२-२०२३ 
***
सॉनेट
ज्ञान
*
सुमति-कुमति हर हृदय बसी हैं।
सुमति ज्ञान की राह दिखाती।
कुमति सत्य-पथ से भटकाती।।
अपरा-परा न दूर रही हैं।।

परा मूल है, छाया अपरा।
पुरुष-प्रकृति सम हैं यह मानो।
अपरा नश्वर है सच मानो।।
अविनाशी अक्षरा है परा।।

उपज परा से मिले परा में।
जीव न जाने जा अपरा में।
मिले परात्पर आप परा में।।

अपरा राह साध्य यह जानो।
परा लक्ष्य अक्षर पहचानो।
भूलो भेद, ऐक्य अनुमानो।।
८-२-२०२२
***
कार्यशाला
अंग्रेजी- हिंदी में समान उच्चारण, भिन्नार्थ वाले कुछ शब्द
१. गम / Gum = दुःख / adhesive, paste , fleshy tissue enveloping neck of teeth ( मसूड़ा)
२. दंग/Dung = हैरान/ Animal waste (गोबर)
३. सन /Son , Sun = पौधा जिसके रेशे से बोरे आदि बनते हैं/ Male offspring , Sol (सूरज )
४. हट /Hut = हटाना के अर्थ में / small house (झोपड़ी)
५. शोर/Shore = हल्ला / Beach (किनारा )
५. पट/ Putt = पेट के बल लेटना, तुरंत /Type of shot in golf
६. पेट/Pet= अंग / tamed animal for company (पालतू जानवर)
७. मिल / mill = भेंट होना / machine for crushing solid grains (आटा मिल )
८. हिल / hill हिलना के अर्थ में / elevation smaller than mountain (पहाड़ी )
९. मेल/Mail मैत्री / Postal mail or E mail
१०. रट/Rut : रटना के अर्थ में / furrow or track made on the ground especially by passing of vehicle (रेलवे को शुरू में रट वे भी कहा जाता था )
***
स्वास्थ्य चर्चा
नमकीन पानी से स्नान के लाभ
*
बाथ सॉल्ट यानी एप्सम या सी साल्ट में २१ अलग-अलग तरह के मिनरल्स होते हैं जिनमें मैग्नीशियम, पोटैशियम, सोडियम, सल्फर, जिंक, कैल्शियम, क्लोराइड, आयोडाइड और ब्रोमाइड शामिल हैं जो शरीर को पोषण प्रदान करते हैं।
इसलिए थोड़ा सा नमक पानी में मिलाकर उसमें नहाने से शरीर को कई फायदे हो सकते हैं।खारे पानी से नहाने के अपने स्वास्थ्य लाभ हैं जो सामान्य पानी आपको प्रदान नहीं करते हैं।
नमक के पानी से स्नान करने के लाभ-।
उपचार और आराम:
हिमालयन बाथ सॉल्ट का उपयोग परिसंचरण को प्रोत्साहित करने, त्वचा को हाइड्रेट करने, नमी बनाए रखने को बढ़ाने और सेलुलर पुनर्जनन को बढ़ावा देने के लिए जाना जाता है। इसके अलावा, वे त्वचा को डिटॉक्सीफाई और हीलिंग करने में भी सहायक होते हैं। नमक-पानी से नहाने से मांसपेशियों और जोड़ों की सूजन कम होती है, मांसपेशियों को आराम मिलता है और दर्द और खराश से राहत मिलती है।
त्वचा के लिए अच्छा:
नमक-पानी के स्नान अपने प्राकृतिक रूप में कई खनिज और पोषक तत्व होते हैं जो त्वचा को फिर से जीवंत करने में मदद करते हैं।
मैग्नीशियम, कैल्शियम, ब्रोमाइड, सोडियम और पोटेशियम जैसे खनिज त्वचा के छिद्रों में अवशोषित हो जाते हैं, त्वचा की सतह को साफ और शुद्ध करते हैं, जिससे त्वचा स्वस्थ और चमकती रहती है।
डिटॉक्सिफिकेशन:
बाथ सॉल्ट त्वचा को डिटॉक्सीफाई करने में भी मदद करते हैं।गर्म पानी त्वचा के छिद्रों को खोलता है जिससे नमक के खनिज त्वचा में गहराई से अवशोषित हो जाते हैं, जिससे पूरी सफाई सुनिश्चित हो जाती है।
ये लवण दिन भर त्वचा द्वारा अवशोषित हानिकारक विषाक्त पदार्थों और बैक्टीरिया को बाहर निकालने में मदद करते हैं, जिससे आपकी त्वचा स्वस्थ और साफ दिखती है।
युवा चमक:
जवान दिखना और महसूस करना कौन नहीं चाहता। चेहरे पर झुर्रियों और महीन रेखाओं की उपस्थिति को कम करने के लिए नियमित रूप से नहाने के नमक का प्रयोग करें। ये आपकी त्वचा को कोमल और कोमल बनाते हैं। स्नान नमक त्वचा को मोटा करके और त्वचा की नमी को संतुलित करके इसे प्राप्त करते हैं। वे त्वचा को वह प्राकृतिक चमक भी देते हैं जो नियमित जीवन में खो जाती है।
विभिन्न समस्याओं का उपचार:
स्नान नमक न केवल आपकी त्वचा के लिए फायदेमंद होते हैं बल्कि ऑस्टियोआर्थराइटिस और टेंडिनाइटिस जैसी कुछ गंभीर स्वास्थ्य स्थितियों के इलाज में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसके अलावा, नहाने के नमक खुजली और अनिद्रा को कम करने में भी प्रभावी होते हैं।
८-२-२०२२
***
दोहा सलिला 
संग सलिल के तैरतीं, शशि किरणें चिद्रूप
जैसे ही होतीं बिदा, बाँह जकड़ती धूप
बाँह जकड़ती धूप, छाँह भी रहे न पीछे
अवसर पाकर स्नेह, उड़ेले भुज भर भींचे
रवि हेरे हो तप्त, ईर्ष्या लपट घेरतीं
शशि किरणें चिद्रूप, संग सलिल के तैरतीं
८२-२०२०
***
गीतः
सुग्गा बोलो
जय सिया राम...
सन्जीव
*
सुग्गा बोलो
जय सिया राम...
*
काने कौए कुर्सी को
पकड़ सयाने बन बैठे
भूल गये रुकना-झुकना
देख आईना हँस एँठे
खिसकी पाँव तले धरती
नाम हुआ बेहद बदनाम...
*
मोहन ने फिर व्यूह रचा
किया पार्थ ने शर-सन्धान
कौरव हुए धराशायी
जनगण सिद्‍ध हुआ मतिमान
खुश मत हो, सच याद रखो
जन-हित बिन होगे गुमनाम...
*
हर चूल्हे में आग जले
गौ-भिक्षुक रोटी पाये
सांझ-सकारे गली-गली
दाता की जय-जय गाये
मौका पाये काबलियत
मेहनत पाये अपना दाम...
*
१३-७-२०१४
दोहा 
बरगद पीपल कहें आ, आँख मिचौली खेल.
इमली नीम न मानतीं, हो न सका है मेल.
८-२-२०१८
एक मुक्तिका
छंद- यौगिक जातीय विद्या छंद
मापनी- २१२२ २१२२ २१२२ २१२२
बहर- फाइलातुन x ४
*
फूलने दो बाग़ में गुंचे मिलेगी खूब खुश्बू
गीत गायेंगे ख़ुशी से झूम भौंरे देख जादू
कौन बोलेगा न झूमो? कौन चाहेगा न गाओ?
राह में राही मिलेंगे, थाम लेना हाथ ही तू
उम्र का ही है तकाजा लोग मानें या न मानें
जोश में होता कहाँ है होश?, होता है न काबू
आप नेता हैं, नहीं तो आपका कोई न चर्चा
आपकी पीड़ा न पीड़ा, फेंक एसिड, मार चाकू
सांसदों को खूब भत्ते और भूखों को न दाना
वाह रे आजाद लोगो! है न आज़ादी गुड़ाखू
***
क्रिकेट के दोहे
*
चहल-पहल कर चहल ने, खड़ी करी है खाट
कम गेंदें ज्यादा विकेट, मारा धोबीपाट
*
धोनी ने धो ही दिया, सब अंग्रजी ठाठ
बल्ले-बल्ले कर रहा, बल्ला पढ़ लो पाठ
*
रैना चैना छीनकर, नैना रहा तरेर
ढेर हो गए सर झुका, सब अंग्रेजी शेर
*
है विराट के नाम की, है विराट ही धाक
कुक ने स्तीफा दिया, हाय कट गयी नाक
*
अंग्रेजों से छिन गया, ट्वंटी का भी ताज
गोरी बाला वर जयी, हुए विहँस युवराज
*
नेहरा गहरा वार कर, पहरा देता खूब
विकट नहीं या रन नहीं, गए विपक्षी डूब
***
दस मात्रिक छंद
९. पदांत यगण
मनुआ! जग गा रे!
प्राची रवि लाई
ऊषा मुसकाई
रहा टेर कागा
पहुना सुधि आई
विधना झट ला रे!
कुण्डी खटकाई
गोरी झट आई
अँखियाँ टकराईं
झुक-उठ शरमाईं
मुड़कर मात जारे!
हुई मन मिलाई
सुध-बुध बिसराई
गयी खनक चूड़ी
ननदी झट आई
चट-पट छिप जा रे!
*
१०. पदांत मगण
मन क्यों आवारा?
जैसे बंजारा
हर दम चाहे हो
केवल पौबारा
*
११. पदांत तगण
ख्वाब में हैं आप
साथ में हैं आप
हम जहाँ मौजूद
न हों पर हैं आप
*
१२. पदांत रगण
बात जब कीजिए
साथ चल दीजिए
सच नहीं भी रुचे
तो नहीं खीजिए
कर मिलें, ना मिलें
मन मिला लीजिए
आँख से भी कभी
कुछ लगा पीजिए
नेह के नीर में
सँग नहा भीजिए
*
१३. पदांत जगण ६+१२१
किसे कहें अनाथ?
सभी मनुज सनाथ
सबका ईश एक
झुकाएँ नित माथ
*
१४. पदांत भगण
लाया है सावन
त्यौहार सुपावन
मिल इसे मनायें
राखी मन भावन
.
सीमा पर दुर्जन
दें मार सैन्य जन
अरि के घर मातम
बोयेगा सावन
*
१५, पदांत नगण
जब से गए सजन
बेसुध सा तन-मन
दस दिश चहल-पहल
सूना मन-मधुवन
किया सतत सुमिरन
हर दिन, हर पल-छिन
पौधारोपण कर
जी पायें फिर वन
वह दिखता रहबर
हो न कहीं रहजन
*
१६. पदांत सगण
हमको है कहना
दूर नहीं रहना
चुप, कब तक पहनें
सुधियों का गहना?
मजबूरी अपनी
विरह व्यथा तहना
सलिला कब कहती
मुझे नहीं बहना?
मंगल मन रही
क्यों केवल बहना?
*
१७. २ यगण
निहारो-निहारो
सितारों निहारो
सदा भारती की
करो आरती ही
हसीं चाँदनी को
धरा पर उतारो
सँवारो-सँवारो
धरा को सँवारो
१८. २ तगण
सीता वरें राम
सीता तजें राम
छोड़ें नहीं राग
सीता भजें राम
१९. २ रगण
आपसे काम ना
हो, यही कामना
गर्व का वास ना
हो, नहीं वासना
स्वार्थ को साध ना
छंद को साधना
माप की नाप ना
नाप ही नापना
उच्च हो भाव ना
शुद्ध हो भावना
*
२०. यगण तगण
कहीं है नीलाभ
कहीं है पीताभ
कपासी भी मेघ
कहीं क्यों रक्ताभ?
कड़े हो या नर्म
रहो जैसे डाभ
सहेगा जो हानि
कमाएगा लाभ
२१. तगण यगण
वादा न निभाया
कर्जा न चुकाया
जोड़ा धन थोड़ा
मोहे मत माया
जो पुन्य कमाया
आ अंत भुनाया
ठानो न करोगे
जो काम न भाया
२१. यगण रगण
किये जाओ मजा
चली आती क़ज़ा
किया तो भोग भी
यही दैवी रजा
कहो तो स्वार्थ को
कभी क्या है तजा?
रही है सत्य की
सदा ऊँची ध्वजा
न बोले प्रेयसी
'मुझे क्या जा-न जा'
*
२२. रगण यगण
आपका सहारा
दे रहा इशारा
हैं यही मुरादें
साथ हो हमारा
दूर जा पुकारा
पास आ निहारा
याद है न वादा?
प्यार हो न कारा?
आँख में बसा है
रूप ये तुम्हारा
*
२३. तगण रगण २२१ २१२
आओ! कहीं चलें
बोलो कहाँ मिलें?
माँगें यही दुआ
कोई नहीं छले
*
२४. रगण तगण
आज का पैगाम
जीत पाए लाम
आपका सौभाग्य
आप आये काम
सोचते हैं लोग
है विधाता वाम
चाहिए क्यों पुण्य
कर्म है निष्काम
खूब पाया नाम
बात है ये ख़ास
प्रेरणा लें आम
*
दोहा
दिनकर प्रिय सुधि रश्मि से, करे प्रणय शुरुआत।
विरह तिमिर का अंत कर, जगा रहा जज्बात।।
*
रोज, प्रप्रोज पठा रहा, नाती कैसा काल।
पोता हो लव बर्ड तो, आ जाए भूचाल।।
***
मैथिली हाइकु
*
स्नेह करब
हमर मंत्र अछि
गरा लागब.
८-२-२०१७
***
बुंदेली गीत -
भुन्सारे चिरैया
*
नई आई,
बब्बा! नई आई
भुन्सारे चरैया नई आई
*
पीपर पै बैठत थी, काट दओ कैंने?
काट दओ कैंने? रे काट दओ कैंने?
डारी नें पाई तो भरमाई
भुन्सारे चरैया नई आई
नई आई,
सैयां! नई आई
*
टला में पीयत ती, घूँट-घूँट पानी
घूँट-घूँट पानी रे घूँट-घूँट पानी
टला खों पूरो तो रिरयाई
भुन्सारे चरैया नई आई
नई आई,
गुइयाँ! नई आई
*
फटकन सें टूंगत ती बेर-बेर दाना
बेर-बेर दाना रे बेर-बेर दाना
सूपा खों फेंका तो पछताई
भुन्सारे चरैया नई आई
नई आई,
लल्ला! नई आई
*
८-२-२०१६
***
नवगीत-
महाकुम्भ
*
मन प्राणों के
सेतुबन्ध का
महाकुंभ है।
*
आशाओं की
वल्लरियों पर
सुमन खिले हैं।
बिन श्रम, सीकर
बिंदु, वदन पर
आप सजे हैं।
पलक उठाने में
भारी श्रम
किया न जाए-
रूपगर्विता
सम्मुख अवनत
प्रणय-दंभ है।
मन प्राणों के
सेतुबन्ध का
महाकुंभ है।
*
रति से रति कर
बौराई हैं
केश लताएँ।
अलक-पलक पर
अंकित मादक
मिलन घटाएँ।
आती-जाती
श्वास और प्रश्वास
कहें चुप-
अनहोनी होनी
होते लख
जग अचंभ है।
मन प्राणों के
सेतुबन्ध का
महाकुंभ है।
*
एच ए ७ अमरकंटक एक्सप्रेस
३. ४२, ६-२-२०१६
***
श्रृंगार गीत -
ओ मेरी तुम
*
ओ मृगनयनी!
ओ पिकबयनी!
ओ मेरी तुम!!
*
भोर भयी
बाँके सूरज ने
अँखियाँ खोलीं।
बैठ मुँडेरे
चहक-चहक
गौरैया बोली।
बाहुबंध में
बँधी हुई श्लथ-
अलस देह पर-
शत-शत इंद्र-
धनुष अंकित
दमिनियाँ डोलीं।
सदा सुहागन
दृष्टि कह रही
कुछ अनकहनी।
ओ मृगनयनी!
ओ पिकबयनी!
ओ मेरी तुम!!
*
चिबुक निशानी
लिये, नेह की
इठलाया है।
बिखरी लट,
फैला काजल भी
इतराया है।
टूटा बाजूबंद
प्राण-पल
जोड़ गया रे!
कँगना खनका
प्रणय राग गा
मुस्काया है।
बुझी पिपासा
तनिक, देह भई
कुसुमित टहनी
ओ मृगनयनी!
ओ पिकबयनी!
ओ मेरी तुम!!
*
कुण्डी बैरन
ननदी सी खटके
कुछ मत कह।
पवैया सासू सी
बहके बहके
चुप रह।
दूध गिराकर
भगा बिलौटा
नटखट देवरा
सूरज ससुरा
दे आसीसें
दामन में गह
पटक न दे
बचना जेठानी
भैंस मरखनी
ओ मृगनयनी!
ओ पिकबयनी!
ओ मेरी तुम!!
*
५-२-२०१६
HA ७ अमरकंटक एक्सप्रेस
२१. १२
***
बुंदेली नवगीत -
*
हम का कर रए?
जे मत पूछो,
तुम का कर रए
जे बतलाओ?
*
हमरो स्याह सुफेद सरीखो
तुमरो धौला कारो दीखो
पंडज्जी ने नोंचो-खाओ
हेर सनिस्चर भी सरमाओ
घना बाज रओ थोथा दाना
ठोस पका
हिल-मिल खा जाओ
हम का कर रए?
जे मत पूछो,
तुम का कर रए
जे बतलाओ?
*
हमरो पाप पुन्न सें बेहतर
तुमरो पुन्न पाप सें बदतर
होते दिख रओ जा जादातर
ऊपर जा रो जो बो कमतर
रोन न दे मारे भी जबरा
खूं कहें आँसू
चुप पी जाओ
हम का कर रए?
जे मत पूछो,
तुम का कर रए
जे बतलाओ?
८-२-२०१६
***
नवगीत:
.
तह करके
रख दिये ख्वाब सब
धूप दिखाकर
मर्तबान में
.
कोशिश-फाँकें
बाधा-राई-नोन
समय ने रखा अथाना
धूप सफलता
मिल न सकी तो
कैसा गलना, किसे गलाना?
कल ही
कल को कल गिरवी रख
मोल पा रहा वर्तमान में
.
सत्ता सूप
उठाये घूमे
कह जनगण से 'करो सफाई'
पंजा-झाड़ू
संग नहीं तो
किसने बाती कहो मिलायी?
सबने चुना
हो गया दल का
पान गया ज्यों पीकदान में.
.
८-२-२०१५
***
छंद सलिला:
जाया छंद
*
(अब तक प्रस्तुत छंद: अग्र, अचल, अचल धृति, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, एकावली, कीर्ति, घनाक्षरी, छवि, जाया, तांडव, तोमर, दीप, दोधक, निधि, प्रेमा, बाला, मधुभार, माया, माला, रामा, लीला, वाणी, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शिव, शुभगति, सार, सुगति, सुजान, हंसी)
*
दो पदी, चार चरणीय, ४ वर्ण, ६९ मात्राओं के मात्रिक जाया छंद में प्रथम- द्वितीय-तृतीय चरण उपेन्द्र वज्रा छंद के तथा चतुर्थ चरण इंद्र वज्रा छंद के होते हैं.
उदाहरण:
१. अनाम नाता न निभा सकोगी, प्रणाम माता न डिगा सकोगी
दिया सहारा जिसने मुझे था, बोलो उसे भी अपना सकोगी?
२. कभी न कोई उपकार भूले, कहीं न कोई प्रतिकार यूँ ले
नदी तरंगोंवत झूल झूले, तौलो न बोलो कडुआ कभी भी
३. हमें लुभातीं छवियाँ तुम्हारी, प्रिये! न जाओ नज़दीक आओ
यही तुम्हारी मनकामना है, जानूं! हमीं से सच ना छिपाओ
८-२-२०१४
***
भोजपुरी दोहा सलिला :
*
रउआ आपन देस में, हँसल छाँव सँग धूप।
किस्सा आपन देस का, इत खाई उत कूप।।
*
रखि दिहली झकझोर के, नेता भाषण बाँच।
चमचे बदे बधाई बा, 'सलिल' न देखल साँच।।
*
चिउड़ा-लिट्टी ना रुचे, बिरयानी की चाह।
चली बहुरिया मेम बन, घर फूंकन की राह।।
*
रोटी की खातिर 'सलिल', जिनगी भयल रखैल।
कुर्सी के खातिर भइल, हाय! सियासत गैल।।
*
आजु-काल्हि के रीत बा, कर औसर से प्यार।
कौनौ आपन देस में, नहीं किसी का यार।।
*
खाली चउका देखि के, दिहले मूषक भागि।
चौंकि परा चूल्हा निरख, आपन मुँह में आगि।।
*
रउआ रख संसार में, सबकी खातिर प्रेम।
हर पियास हर किसी की, हर से चाहल छेम।।
८-२-२०१३
***
दोहा

उषा दुपहरी सांझ से, पाल रहा जो प्रीत.

छलिया सूरज को कहे, जग क्यों 'सलिल' पुनीत?.

मुक्तक

साहित्य की आराधना आनंद ही आनंद है.

काव्य-रस की साधना आनंद ही आनंद है.

'सलिल' सा बहते रहो, सच की शिला को फोड़कर.

रहे सुन्दर भावना आनंद ही आनंद है.

८-२-२०१०

मंगलवार, 7 फ़रवरी 2023

लघुकथा, मुण्डकोपनिषद १, मुक्तिका, नवगीत, मुक्तक, तांडव छंद, कविता, कायस्थ

लघुकथा
बाज
.
नीम आसमान में परवाज भर रहा था बाज। समीप ही उड़ रहे रेवेन पक्षी ने बाज को ऊपर उठते देखा तो लपक कर बाज की गर्दन के ऊपर जा बैठा और लगा चोंच मारने। रेवेन सोच रहा था बाज उससे लड़ने के लिए नीचे उतरेगा और वह पल भर में आसमान में ऊपर जाकर बाज को नीचा दिखा देगा।  
बाज को आसमान का बादशाह कहा जाता है और यह रेवेन को बर्दाश्त नहीं होता था। 
बाज ने रेवेन के चंचु-प्रहार सहते हुए ऊपर उठना जारी रखा। बाज की सहनशीलता रंग लाई। जैसे जैसे बाज आसमान में ऊपर उठता गया, वायुमंडल में ओषजन वायु कम होती गई। हमेशा ऊँचाई पर उड़नेवाला बाज कम ओषजन में उड़ने का अभ्यस्त था किंतु रेवेन के लिए यह पहला अवसर था। बाज अपनी ऊँचाई और गति बढ़ाता गया। रेवेन के लिए बाज की गर्दन पर टिके रहना कठिन होता गया और अंतत: रेवेन धराशायी हो गया औरआसमान छूता रहा बाज ।
७-३-२०२३ 
***   
लघुकथा
अपराधी 
.
अपराधी के कटघरे में एक बालक खड़ा था। न्यायाधीश ने उस पर दृष्टि डाली, ऐसा प्रतीत हुआ बादलों में चंद्रमा छिपा हो। बालक उदास, नीची निगाह किए, चिंताग्रस्त दिख रहा था। न्यायाधीश अनुभवी थे, समझ गए कि यह आदतन अपराधी नहीं है।
सरकारी वकील ने बालक का अपराध बताया कि वह होटल से खाद्य सामग्री चुरा रहा था, तभी उसे पकड़ लिया गया। होटल मालिक ने बालक के जुर्म की तस्दीक करते हुए गर्व के साथ कहा कि उसीने अपने कर्मचारियों की मदद से बालक को पकड़ कर मरम्मत भी की थी ताकि फिर चोरी करने की हिम्मत न पड़े। 
न्यायाधीश के पूछने पर लड़के ने स्वीकार किया कि उसने डबलरोटी उठाई थी हुए बिस्कुट उठाने के पहले ही उसे दबोच लिया गया था। यह भी बताया कि वहाँ कई तरह की मिठाइयाँ भी थीं, उसे मिठाई बहुत अच्छी लगती है। 
'जब तुम्हें मिठाई बहुत अच्छी लगती है और वहां कई प्रकार की मिठाइयाँ रखी थीं तो तुमने मिठाई न उठकर डबलरोटी क्यों उठाई, पैसे क्यों नहीं दिए?' -न्यायाधीश ने पूछा। 
''घर पर माँ बीमार है, उसे डबलरोटी खिलानी थी, मेरे पास या घर में एक भी रुपया नहीं था।''
'तो किसी से माँग लेते, चोरी बुरी बात है न?'
"कई लोगों से रोटी या पैसे माँगे सबने दुतकार दिया, इनसे भी डबलरोटी माँगी थी और कहा था कि माँ को खिलाकर आकर होटल में काम कर दूँगा पर इन्होंने भी डाँटकर भगा दिया।" -होटलवाले की तरफ देखकर बालक बोला।  
मुकदमे के फैसला दोपहर भोजन काल के बाद सुनाने का आदेश देते हुए न्यायाधीश ने भूखे बालक को सरकारी व्यय पर भोजन कराए जाने का आदेश दिया। 
डफरबाद अदालत बैठी तो न्यायाधीश ने कहा- 'यह किसी सभ्य समाज के लिए शर्म की बात है कि लोककल्याणकारी गणराज्य में किसी असहाय स्त्री हुए बालक को रोटी भी नसीब न हो। सरकार, प्रशासन, समाज और नागरिक सभी इस परिस्थिति के लिए दोषी हैं कि हम अपने वर्तमान और भविष्य की समुचित देखभाल नहीं कर पा रहे और नौनिहालों को मजबूरन चोरी करने के लिए विवश होना पड़े, अगर हर चोरी दंडनीय होती तो माखन-मिसरी चुराने के लिए कन्हैया को भी दंड दिया जाता। लोकोक्ति है 'भूखे भजन न होय गुपाला'। 
इस बालक के अपराध के लिए हम सब दोषी हैं, स्वयं मैं भी। इसलिए मुझ समेत इस अदालत में उपस्थित हर व्यक्ति दस-दस रुपए जमा करे।  होटल मालिक को संवेदनहीनता तथा बालक को बिना अधिकार पीटने के लिए एक हजार रुपए जमा करने होंगे। यह राशि बालक की माँ को दे दी जाए जिससे वह स्वस्थ्य होने तकअपने तथा बालक के भोजन की व्यवस्था कर सके। जिलाधिकारी को निर्देश है कि बालक की निशुल्क शिक्षा का प्रबंध करें तथा माँ को गरीबी रेखा से नीचे होने का प्रमाणपत्र देकर शासकीय योजनाओं से मिलनेवाले लाभ दिलाकर इस न्यायालय को सूचित करें। न्याय देने का अर्थ केवल दंड देना नहीं होता, ऐसी परिस्थिति का निर्माण करना होता है ताकि भविष्य में कोई अन्य निर्दोष विवश होकर न बने अपराधी। 
७-२-२०२३ 
***
मुण्डकोपनिषद १
परा सत्य अव्यक्त जो, अपरा वह जो व्यक्त।
ग्राह्य परा-अपरा, नहीं कहें किसी को त्यक्त।।
परा पुरुष अपरा प्रकृति, दोनों भिन्न-अभिन्न।
जो जाने वह लीन हो, अनजाना है खिन्न।।
जो विदेह है देह में, उसे सकें हम जान।
भव सागर अज्ञान है, अक्षर जो वह ज्ञान।।
मन इंद्रिय अरु विषय को, मान रहा मनु सत्य।
ईश कृपा तप त्याग ही, बल दे तजो असत्य।।
भोले को भोले मिलें, असंतोष दुःख-कोष।
शिशु सम निश्छल मन रखें, करें सदा संतोष।।
पाना सुखकारक नहीं, खोना दुखद न मान।
पाकर खो, खोकर मिले, इस सच को पहचान।।
'कुछ होने' का छोड़ पथ, 'कुछ मत हो' कर चाह।
जो रीता वह भर सके, भरा रीत भर आह।।
तन को पहले जान ले, तब मन का हो ज्ञान।
अपरा बिना; न परा का, हो सकता अनुमान।।
सांसारिक विज्ञान है, अपरा माध्यम मान।
गुरु अपरा से परा की, करा सके पहचान।।
अक्षर अविनाशी परा, अपरा क्षर ले जान।
अपरा प्रगटे परा से, त्याग परा पहचान।।
मन्त्र हवन अपरा समझ, परा सत्य का भान।
इससे उसको पा सके, कर अभ्यास सुजान।।
अपरा पर्दा कर रही, दुनियावी आचार।
परा न पर्दा जानती, करे नहीं व्यापार।।
दृष्टा दृष्ट न दो रहें, अपरा-परा न भिन्न।
क्षर-अक्षर हों एक तो, सत्यासत्य अभिन्न।।
***
मुक्तिका
किसे दिखाएँ मन के छाले?
पिला रहे सब तन को प्याले
संयम मैखाने में मेहमां
सती बहकती कौन सम्हाले?
वेणु झूमती पीकर पब में
ब्रज की रेणु क्रशर के पाले
पचा न पाएँ इतना खाते
कुछ, कुछ को कौरों के लाले
आदम मन की देख कालिमा
शरमा रहे श्याम पट काले
***
मुक्तिका
घातक सपनों के लिए जीवन का यह दौर
फागुन से डर काँपती कोमल कमसिन बौर
महुआ मर ही गया है, हो बोतल में कैद
मस्ती को मिलती नहीं मानव मन में ठौर
नेता जुमलेबाज है, जनता पत्थरबाज
भूख-प्यास का राज है, नंगापन सिरमौर
सपने मोहनभोग के छपा घोषणा पत्र
छीन-खा रहे रात-दिन जन-हित का कागौर
'सलिल' सियासत मनचली मुई हुई निर्लज्ज
छलती जन विश्वास को, भुला तरीके-तौर
७-६-२०२०
***
मुक्तिका
जंगल जंगल
*
जंगल जंगल कहाँ रहे अब
नदी सरोवर पूर रहे अब
काटे तरु, बोई इमारतें
चंद ठूँठ बेनूर रहे अब
कली मुरझती असमय ही लख
कामुक भौंरे क्रूर हुए अब
होली हो ली, अनहोली अब
रंग तंग हो दूर हुए अब
शेष न शर्म रही नैनों में
स्नेहिल नाते सूर हुए अब
पुष्पा पुष्प कहें काँटों से
झुक खट्टे अंगूर हुए अब
मिटी न खुद से खुद की दूरी
सपने चकनाचूर हुए अब
***
मुक्तिका
*
मुक्त मन मुस्कान मंजुल मुक्तिका
नर्मदा का गान किलकिल मुक्तिका
मुक्तकों से पा रही विस्तार यह
षोडशी का भान खिलखिल मुक्तिका
बीज अंकुर कुसुम कंटक धूल सह
करे जीवन गान हिलमिल मुक्तिका
क्या कहे कैसे कहाँ कब, जानती
ज्योत्सना नभ-शान झिलमिल मुक्तिका
रूपसी अपरूप उज्वल धूपसी
मनुजता का मान प्रांजल मुक्तिका
नर्मदा रस-भाव-लय की गतिमयी
कथ्य की है जान, निश्छल मुक्तिका
सत्य-शिव-सुंदर सलिल आराध्य है
मीत गुरु गंभीर-चंचल मुक्तिका
७-२-२०२०
***
नवगीत
पकौड़ा-चाय
*
तलो पकौड़ा
बेचो चाय
*
हमने सबको साथ ले,
सबका किया विकास।
'बना देश में' का दिया,
नारा खासुलखास।
नव धंधा-आजीविका
रोजी का पर्याय
तलो पकौड़ा
बेचो चाय
*
सब मिल उत्पादन करो,
साधो लक्ष्य अचूक।
'भारत में ही बना है'
पीट ढिंढोरा मूक।।
हम कुर्सी तुम सड़क पर
बैठो यही उपाय
तलो पकौड़ा
बेचो चाय
*
लाइसेंस-जीएसटी,
बिना नोट व्यापार।
इनकम कम, कर दो अधिक,
बच्चे भूखे मार।।
तीन-पांच दो गुणित दो
देशभक्ति अध्याय
तलो पकौड़ा
बेचो चाय
***
छंद: दोहा
***
नवगीत
*
तू कल था
मैं आज हूं
*
उगते की जय बोलना
दुनिया का दस्तूर।
ढलते को सब भूलते,
यह है सत्य हुजूर।।
तू सिर तो
मैं ताज हूं
*
मुझको भी बिसराएंगे,
कहकर लोग अतीत।
हुआ न कोई भी यहां,
जो हो नहीं व्यतीत।।
तू है सुर
मैं साज हूं।।
*
नहीं धूप में किए हैं,
मैंने बाल सफेद।
कल बीता हो तजूंगा,
जगत न किंचित खेेद।।
क्या जाने
किस व्याज हूं?
***
७.२.२०१८
***
लघुकथा-
बेटा
*
गलत संगत के कारण उसे चोरी की लत लग गयी. समझाने-बुझाने का कोई प्रभाव नहीं हुआ तो उसे विद्यालय से निकाल दिया गया. अपने बेटे को जैसे-तैसे पढ़ा-लिखा कर भला आदमी बनाने का सपना जी रही बीमार माँ को समाचार मिला तो सदमे के कारण लकवा लग गया.
एक रात प्यास से बेचैन माँ को निकट रखे पानी का गिलास उठाने में भी असमर्थ देखकर बेटे से रहा नहीं गया. पानी पिलाकर वह माँ के समीप बैठ गया और बोला 'माँ! तेरे बिना मुझसे रोटी नहीं खाई जाती.' बेबस माँ को आँखों से बहते आँसू पोंछने के बाद बेटा सवेरे ही घर से चला जाता है.
दिन भर बेटे के घर न आने से चिंतित माँ ने आहत सुन दरवाजे से बेटे के साथ एक अजनबी को घर में घुसते हुए देखा तो उठने की कोशिश की किन्तु कमजोरी के कारण उठ न सकी. अजनबी ने अपना परिचय देते हुए बताया कि बेटे ने उनके गोदाम में चोरी करनेवाले चोरों को पकड़वाया है. इसलिए वे बेटे को चौकीदार रखेंगे. वह काम करने के साथ-साथ पढ़ भी सकेगा.
अजनबी के प्रति आभार व्यक्त करने की कोशिश में हाथ जोड़ने की कोशिश करती माँ के मुँह से निकला 'बेटा'
***
मुक्तक
मेटते रह गए कब मिटीं दूरियाँ?
पीटती ही रहीं, कब पिटी दूरियाँ?
द्वैत मिटता कहाँ, लाख अद्वैत हो
सच यही कुछ बढ़ीं, कुछ घटीं दूरियाँ
*
कुण्डलिया
जल-थल हो जब एक तो, कैसे करूँ निबाह
जल की, थल की मिल सके, कैसे-किसको थाह?
कैसे-किसको थाह?, सहायक अगर शारदे
संभव है पल भर में, भव से विहँस तार दे
कहत कवि संजीव, हरेक मुश्किल होती हल
करें देखकर पार, एक हो जब भी जल-थल
*
***
एक प्रश्न:
*
लिखता नहीं हूँ,
लिखाता है कोई
*
वियोगी होगा पहला कवि
आह से उपजा होगा गान
*
शब्द तो शोर हैं तमाशा हैं
भावना के सिंधु में बताशा हैं
मर्म की बात होंठ से न कहो
मौन ही भावना की भाषा है
*
हैं सबसे मधुर वो गीत जिन्हें हम दर्द के सुर में गाते हैं,
*
अवर स्वीटेस्ट सांग्स आर दोज विच टेल ऑफ़ सैडेस्ट थॉट.
*
जितने मुँह उतनी बातें के समान जितने कवि उतनी अभिव्यक्तियाँ
प्रश्न यह कि क्या मनुष्य का सृजन उसके विवाह अथवा प्रणय संबंधों से प्रभावित होता है? क्या अविवाहित, एकतरफा प्रणय, परस्पर प्रणय, वाग्दत्त (सम्बन्ध तय), सहजीवी (लिव इन), प्रेम में असफल, विवाहित, परित्यक्त, तलाकदाता, तलाकगृहीता, विधवा/विधुर, पुनर्विवाहित, बहुविवाहित, एक ही व्यक्ति से दोबारा विवाहित, निस्संतान, संतानवान जैसी स्थिति सृजन को प्रभावित करती है?
यह प्रभाव कब, कैसे, कितना और कैसा होता है? इस पर विचार दें.
आपके विचारों का स्वागत और प्रतीक्षा है.
७-२-२०१७
***
कविता
प्रश्नोत्तर
कल क्या होगा?
कौन बचेगा? कौन मरेगा?
कौन कहे?
.
आज न डरकर
कल की खातिर
शिव मस्तक से सतत बहे बहे
.
कल क्या थे?
यह सोच-सोचकर
कल कैसे गढ़ पाएँगे?
.
दादा चढ़े
हिमालय पर
क्या हम भी कदम बढ़ाएँगे?
.
समय
सवाल कर रहा
मिलकर उत्तर दें
.
चुप रहने से
प्रश्न न हल
हो पाएँगे।
७-२-२०१५
***
छंद सलिला :
ताण्डव छंद
*
(अब तक प्रस्तुत छंद: अग्र, अचल, अचल धृति, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, कीर्ति, घनाक्षरी, छवि, ताण्डव, तोमर, दीप, दोधक, निधि, प्रेमा, मधुभार,माला, वाणी, शक्तिपूजा, शाला, शिव, शुभगति, सार, सुगति, सुजान, हंसी)
*
तांडव रौद्र कुल का बारह मात्रीय छंद है जिसके हर चरण के आदि-अंत में लघु वर्ण अनिवार्य है.
उदाहरण:
१. भर जाता भव में रव, शिव करते जब ताण्डव
शिवा रहित शिव हों शव, आदि -अंत लघु अभिनव
बारह आदित्य मॉस राशि वर्ण 'सलिल' खास
अधरों पर रखें हास, अनथक करिए प्रयास
२. नाश करें प्रलयंकर, भय हरते अभ्यंकर
बसते कंकर शंकर, जगत्पिता बाधा हर
महादेव हर हर हर, नाश-सृजन अविनश्वर
त्रिपुरारी उमानाथ, 'सलिल' सके अब भव तर
३. जग चाहे रहे वाम, कठिनाई सह तमाम
कभी नहीं करें डाह, कभी नहीं भरें आह
मन न तजे कभी चाह, तन न तजे तनिक राह
जी भरकर करें काम, तभी भला करें राम
३०.१.२०१४
बिहार और कायस्थ
बंगाल से बिहार का अलग होना और राष्ट्र भाषा हिंदी के लिए आन्दोलन व हिंदी को राष्ट्र भाषा बनाने वाले कायस्थ ही हैं :-
राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम के आरंभिक बिहारी नेता यथा महेश नारायण, सच्चिदानन्द सिन्हा एवं अन्य सभी अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेतृत्व में चल रहे स्वतंत्रता आंदोलन के प्रति ‘सचेत’ उदासीन भाव रखते हुए बंगाल से बिहार को अलग करने के आंदोलन से गहरे जुड़े थे। बिहार के नवजागरण का एक अत्यंत रोचक तथ्य है कि सन् १९१२ से पहले प्रतिक्रियावादी जमींदार वर्ग कांग्रेस अर्थात् राष्ट्रीय आंदोलन के साथ है और बंगाल से बिहार के पृथक्करण के विरोध में है जबकि प्रगतिशील मध्यवर्ग पृथक्करण के तो पक्ष में है लेकिन राष्ट्रीय आंदोलन के प्रति उदासीन है। बल्कि कई बार यह प्रगतिशील तबका अपनी ‘राजभक्ति’ भी प्रदर्शित करता है।
हसन इमाम ने कहा कि महेश नारायण ‘बिहारी जनमत के जनक’ हैं तो सिन्हा ने उन्हें ‘बिहारी नवजागरण का जनक’ कहा। कहना न होगा कि यह नवजागरण बिहार के पृथक्करण की शक्ल में था। महेश नारायण के बड़े भाई गोविंद नारायण कलकत्ता विश्वविद्यालय में एम. ए. की डिग्री पानेवाले पहले बिहारी थे। उनके ही नेतृत्व में बिहार में सर्वप्रथम राष्ट्रभाषा का आंदोलन आरंभ किया गया था और यह उन्हीं की प्रेरणा का फल था कि हिंदी का प्रवेश उस समय स्कूलों और कचहरियों में हो सका।
बंगाल से बिहार के पृथक्करण में महेश नारायण, डा. सच्चिादानंद सिन्हा, नंदकिशोर लाल, परमेश्वर लाल, राम बहादुर कृष्ण सहाय, भगवती सहाय तथा आरा के हरवंश सहाय समेत लगभग तमाम लोग, जिनकी भूमिका महत्त्वपूर्ण कही जा सकती है, जाति से कायस्थ थे और अंग्रेजी पढ़े-लिखे लोगों में उनकी जाति अग्रणी थी। सुमित सरकार(बंगाली कायस्थ ) ने बंगालियों के प्रभुत्त्व को चुनौती देते बिहार की कायस्थ जाति के लोगों के द्वारा पृथक बिहार हेतु आंदोलन का नेतृत्त्व करने की बात पर प्रकाश डाला है। यह अकारण नहीं था कि १९०७ में महेश नारायण के निधन के बाद डा. सच्चिदानंद सिन्हा ने बंगालियों के प्रभुत्त्व को तोड़नेवाले नेतृत्त्व की अगुआई की और अंततः इस जाति ने बंगाली प्रभुत्त्व को समाप्त कर अपनी प्रभुता कायम कर ली। इस वर्ग की बढ़ती महत्त्वाकांक्षा ने एक बार पुनः बिहार से उड़ीसा को अलग करने का ‘साहसिक’ कार्य किया। डा. अखिलेश कुमार ने अन्यत्र डा. सच्चिदानंद सिन्हा की उस भूमिका को रेखांकित करने का प्रयास किया गया है जिससे इस बात की पुष्टि होती है कि वे उड़ीसा के पृथक्करण के भी प्रमुख हिमायती थे। शिक्षित बिहारी युवकों ने महसूस किया था कि अपना अलग प्रांत नहीं होगा तो उनका कोई भविष्य नहीं है। इन युवकों में अधिकतर कायस्थ थे। अतएव वे अलग बिहार प्रांत बनाने के आंदोलन में स्वाभाविक रूप से कायस्थ जाति के लोग ही आगे आए। जाहिर है, रोजगार एवं अवसर की तलाश की इस मध्यवर्गीय लड़ाई को सच्चिदानंद सिन्हा ने एक व्यापक आधार प्रदान करने हेतु ‘बिहारी पहचान’ एवं ‘बिहारी नवजागरण’ की बात ‘गढ़ी’। उन्होंने अपने संस्मरण में लिखा है, ‘सिर्फ खुद बिहारियों को छोड़कर बाकी लोगों में बिहार का नाम भी लगभग अनजान था।’ आगे उन्होंने लिखा, ‘पिछली सदी के ९० के दशक के प्रारंभ में मैं जब एक छात्र के रूप में लंदन में था, तब मुझे जबरन इस ओर ध्यान दिलाया गया। तभी मैंने यह दर्दनाक और शर्मनाक खोज की कि आम बर्तानवी के लिए तो बिहार एक अनजान जगह है ही, और यहां तक कि अवकाशप्राप्त आंग्ल-भारतीयों के बहुमत के लिए भी बिहार अनजाना ही है। …मेरे लिए आज के बिहारियों को यह बताना बड़ा कठिन है कि उस वक्त मुझे और कुछ दूसरे उतने ही संवेदनशील बिहारी मित्रों को कितनी शर्मिंदगी और हीनता महसूस हुई जब हमें महसूस हुआ कि हम ऐसे लोग हैं जिनकी अपनी कोई अलग पहचान नहीं है, कोई प्रांत नहीं है जिसको वे अपना होने का दावा करें, दरअसल उनकी कोई स्थानीय वासभूमि नहीं है जिसका कोई नाम हो। यह पीड़ादायक भावना उस वक्त और टीस बन गई जब सन् १८९३ में स्वदेश लौटने पर बिहार में प्रवेश करते-करते पहले ही रेलवे स्टेशन पर एक लंबे-तगड़े बिहारी सिपाही के बैज पर ‘बंगाल पुलिस’ अंकित देखा। घर लौटने की खुशियां गायब हो गईं और मन खट्टा हो गया। …पर सहसा ख्याल आया कि बिहार को एक अलग और सम्मानजनक इकाई का दर्जा दिलाने के लिए, जिसकी देश के अन्य महत्वपूर्ण प्रांतों की तरह अपनी एक अलग पहचान हो, मैं सब कुछ करने का संकल्प लूं जो करना मेरे बूते में है। एक शब्द में कहूं तो यही मेरे जीवन का मिशन बन गया और इसको हासिल करना मेरे सार्वजनिक क्रियाकलापों की प्रेरणा का सबसे बड़ा स्रोत।’
***
सामयिक कविता:
रंग-बिरंगे नेता करते बात चटपटी.
ठगते सबके सब जनता को बात अटपटी.
लोकतन्त्र को लोभतंत्र में बदल हँस रहे.
कभी फाँसते हैं औरों को कभी फँस रहे.
ढंग कहो, बेढंग कहो चल रही जंग है.
हर चहरे की अलग कहानी, अलग रंग है.
***
हर चेहरे की अलग कहानी, अलग रंग है.
अलग तरीका, अलग सलीका, अलग ढंग है...
यह नेता भैंसों को ब्लैक बोर्ड बनवाता.
कुर्सी पड़े छोड़ना, बीबी को बैठाता.
घर में रबड़ी रखे मगर खाता था चारा.
जनता ने ठुकराया अब तडपे बेचारा.
मोटा-ताज़ा लगे, अँधेरे में वह भालू.
जल्द पहेली बूझो नाम बताओ........?
*
भगवा कमल चढ़ा सत्ता पर जिसको लेकर
गया पाक बस में, आया हो बेबस होकर.
भाषण लच्छेदार सुनाये, काव्य सुहाये.
धोती कुरता गमछा धारे सबको भाये.
बरस-बरस उसकी छवि हमने विहँस निहारी.
ताली पीटो, नाम बताओ-...
*
गोरी परदेसिन की महिमा कही न जाए.
सास और पति के पथ पर चल सत्ता पाए.
बिखर गया परिवार मगर क्या खूब सम्हाला?
देवरानी से मन न मिला यह गड़बड़ झाला.
इटली में जन्मी, भारत का ढंग ले लिया.
बहू दुलारी भारत माँ की नाम? .........
*
छोटी दाढीवाला यह नेता तेजस्वी.
कम बोले करता ज्यादा है श्रमी-मनस्वी.
नष्ट प्रान्त को पुनः बनाया, जन-मन जीता.
मरू-गुर्जर प्रदेश सिंचित कर दिया सुभीता.
गोली को गोली दे, हिंसा की जड़ खोदी.
कर्मवीर नेता है भैया ...
*
माया की माया न छोड़ती है माया को.
बना रही निज मूर्ति, तको बेढब काया को.
सत्ता प्रेमी, कांसी-चेली, दलित नायिका.
नचा रही है एक इशारे पर विधायिका.
गुर्राना-गरियाना ही इसके मन भाया.
चलो पहेली बूझो, नाम बताओ...
*
मध्य प्रदेशी जनता के मन को जो भाया.
दोबारा सत्ता पाकर भी ना इतराया.
जिसे लाडली बेटी पर आता दुलार है.
करता नव निर्माण, कर रहा नित सुधार है.
दुपहर भोजन बाँट, बना जन-मन का तारा.
जल्दी नाम बताओ वह ............. हमारा.
*
बंगालिन बिल्ली जाने क्या सोच रही है?
भय से हँसिया पार्टी खम्बा नोच रही है.
हाथ लिए तृण-मूल, करारी दी है टक्कर.
दिल्ली-सत्ताधारी काटें इसके चक्कर.
दूर-दूर तक देखो इसका हुआ असर जी.
पहचानो तो कौन? नाम ...
*
तेजस्वी वाचाल साध्वी पथ भटकी है.
कौन बताये किस मरीचिका में अटकी है?
ढाँचा गिरा अवध में उसने नाम काया.
बनी मुख्य मंत्री, सत्ता सुख अधिक न भाया.
बड़बोलापन ले डूबा, अब है गुहारती.
शिव-संगिनी का नाम मिला, है ...
*
डर से डरकर बैठना सही न लगती राह.
हिम्मत गजब जवान की, मुँह से निकले वाह.
घूम रहा है प्रान्त-प्रान्त में नाम कमाता.
गाँधी कुल का दीपक, नव पीढी को भाता.
जन मत परिवर्तन करने की लाता आँधी.
बूझो-बूझो नाम बताओ ...
*
बूढा शेर बैठ मुम्बई में चीख रहा है.
देश बाँटता, हाय! भतीजा दीख रहा है.
पहलवान है नहीं मुलायम अब कठोर है.
धनपति नेता डूब गया है, कटी डोर है.
शुगर किंग मँहगाई अब तक रोक न पाया.
रबर किंग पगड़ी बाँधे, पहचानो भाया.
*
७-२-२०१०
***

सोमवार, 6 फ़रवरी 2023

सॉनेट, लता, सावित्री, लक्ष्मी शर्मा, गीत, तुम, तितली, दस मात्रिक छंद, बाल गीत, उल्लाला मुक्तक, दोहे, नवगीत

सोरठा सलिला
बन जाती है भार, गाड़ी पटरी से उतर।
ढोती रहती भार, रहे जब तक पटरी पर।
चुप रह सह लो पीर, दर्द न कोई बँटाता।
मत हो व्यर्थ अधीर, साथ सभी हों हर्ष में।।
मत करना उपहास, निर्धन-निर्बल का कभी।
मत हों आप उदास, लोग करें उपहास तो।।
तन के भरते घाव, मन के घाव न भर सकें।
व्यर्थ दिखाते ताव, जो वे मान न पा सकें।।
रखें जरा भी फर्क, कथनी-करनी में नहीं।
करिए नहीं कुतर्क, तर्क सम्मत सब मानें।।
६-२-२०२३
•••
सॉनेट
लता
लता ताल की मुरझ सूखती।
काल कलानिधि लूट ले गया।
साथ सुरों का छूट ही गया।।
रस धारा हो विकल कलपती।।

लय हो विलय, मलय हो चुप है।
गति-यति थमकर रुद्ध हुई है।
सुमिर सुमिर सुधि शुद्ध हुई है।।
अब गत आगत तव पग-नत है।।

शारदसुता शारदापुर जा।
शारद से आशीष रही पा।
शारद माँ को खूब रहीं भा।।

हुआ न होगा तुमसा कोई।
गीत सिसकते, ग़ज़लें रोई।
खोकर लता मौसिकी खोई।।
६-२-२०२२
•••
सॉनेट
सावित्री
सावित्री जीती या हारी?
काल कहे क्या?, शीश झुकाए।
सत्यवान को छोड़ न पाए।।
नियति विवशता की बलिहारी।।

प्रेम लगन निस्वार्थ समर्पण।
प्रिय पर खुद को वार दिया था।
निज इच्छा को मार दिया था।।
किया कामनाओं का तर्पण।।

श्वास श्वास के संग गुँथी थी।
आस आस के साथ बँधी थी।
धड़कन जैसे साथ नथी थी।।

अब प्रिय तुममें समा गए हैं।
जग को लगता बिला गए हैं।
तुम्हें पता दो, एक हुए हैं।।
•••
प्रिय बहिन डॉक्टर नीलमणि दुबे प्राण प्रण से तीन दशकीय सेवा करने के बाद भी, अपने सर्वस्व जीवनसाथी को बचा नहीं सकीं। जीवन का पल पल जीवनसाथी के प्रति समर्पित कर सावित्री को जीवन में उतारकर काल को रोके रखा। कल सायंकाल डॉक्टर दुबे नश्वर तन छोड़कर नीलमणि जी से एकाकार हो गए।
मेरा, मेरे परिवार और अभियान परिवार के शत शत प्रणाम।
ओ क्षणभंगुर भव राम राम
***
कृति चर्चा :
एक सूरज मेरे अंदर : भावनाओं का समंदर
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
[कृति विवरण : एक सूरज मेरे अंदर, कविता संग्रह, लक्ष्मी शर्मा, प्रथम संस्करण २००४, ISBN ८१-८१२९-९२५-९, अकार डिमाई, आवरण सजिल्द बहुरंगी, नमन प्रकाशन नई दिल्ली ]
*
मनुष्य संवेदनशील एवं चेतना सम्पन्न प्राणी है। मनुष्य का मन प्रकृति में हो रहे परिवर्तनों से भाव ग्रहण कर, आस-पास होने वाले दु:ख-सुख, आशा-निराशा, प्रेम-घृणा, दया-क्रोध से संवेदित होता है। अनुभूत को अभिव्यक्त करने की प्रवृत्ति सृजन, संचय एवं संवर्द्धन द्वारा साहित्य बनती है। साहित्य का एक अंग कविता है। सुख-दु:ख की भावावेशमयी लयात्मक रचना कविता है। काव्य वह वाक्य रचना है जिससे चित्त किसी रस या मनोवेग से पूर्ण हो अर्थात् वह जिसमें चुने हुए शब्दों के द्वारा कल्पना और मनोवेगों का प्रभाव डाला जाता है। रस गंगाधर में 'रमणीय' अर्थ के प्रतिपादक शब्दों को 'काव्य' कहा गया है। आचार्य कुन्तक ने ‘वक्रोक्ति काव्यजीवितम्’ कहकर कविता को परिभाषित किया है। आचार्य वामन ने रीतिरात्मा काव्यस्य’ रीति के अनुसार रचना को काव्य कहा है। आचार्य विश्वनाथ के अनुसार ‘वाक्यम् रसात्मकम् काव्यम्’ अर्थात् रस युक्त वाक्य ही काव्य है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के मत में “जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञानदशा कहलाती है, हृदय की इसी मुक्ति साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द-विधान करती आई है, उसे कविता कहते है।” मैथ्यू आर्नोल्ड के विचार में- “कविता के मूल में जीवन की आलोचना है।” शैले का मत है “कविता कल्पना की अभिव्यक्ति है।”
एक सूरज मेरे अंदर की कविताएँ भाव प्रधान कवयित्री की हृदयगत अनुभूतियाँ हैं। लक्ष्मी शर्मा जी ने कविता के माध्यम से यथार्थ और कल्पना का सम्यक सम्मिश्रण किया है। उनकी काव्य रचनाएँ छंद पर कथ्य को वरीयता देती हैं। वे समकालिक विसंगतियों और विडंबनाओं से आँखें चार करते हुए प्रश्न करती हैं-
हमने तो गाये थे /गीत प्यार के
नफरत और दुश्मननी के / राग कोई क्यों / आलाप रहा ?
कविता और प्रकृति का साथ चोली-दामन का सा है। कविता में मानविकीकरण मनुष्य के प्रकृति-पुत्र को जगाता है। कवयित्री नदी में अपने आप को रूपांतरित कर नदी की व्यथा-कथा की साक्षी बनती है-
मैं एक नदी हूँ / जब से जन्मी हों / लगातार बाह रही हूँ।
और बहना और बहते रहना / ताकत है मेरी / नियति है मेरी।
'राष्ट्र के आव्हान पर' शीर्षक कविता में सीमा की और जाते हुए सैनिक के मनोभावों का सटीक शब्दांकन है। 'सीमा पर जाते हुए' कविता सैनिक को देखकर देशवासी के मन में उठ रही भावनाओं से लबरेज है। काश होती मैं, आत्म विस्तार, सलाखें, लीक पर चलते हुए, गैस त्रासदी, अडिग आस्था, साथ देते जो मेरा, आतंकवाद, चुनाव आदि रचनाएँ समसामयिक परिवेश और जीवन के विविध प्रसंगों के ताने-बाने बुनते हुए सकारात्मक दृष्टिकोण को सामने रखती हैं।
'गांधारी' कविता में कवयित्री ने एक पौराणिक चरित्र पर प्रश्न उठाये हैं। महाभारत की विभीषिका के लिए गांधारी को जिम्मेदार मानते हुए कवयित्री, नेत्रहीन पति के नेत्र बनने के स्थान पर नेत्रों पर पाती बाँध कर स्वयं भी नेत्रहीनता की स्थिति आमंत्रित करनेवाली गांधारी की लाचारी और कौरवों के दुष्कृत्यों के अन्योन्याश्रित मानती है। उसका मत है की गांधारी खली आँखों देख पाती तो चीरहरण और उसके कारण हुआ युद्ध, न होता।
कितना दयनीय होता है / जो स्वयं दूसरे के / आश्रित हो जाता है
अपनी तीक्ष्ण आँखों से / उस साम्राज्य की / नींव को हिलते देख पातीं
तो सही और गलत का निर्णय ले सकती थीं।
इस संकलन में कवयित्री के विदेश प्रवास से संबंधित कविताएँ उनकी भाव प्रवणता और संवेदनशीलता की बानगी हैं। न्यूयार्क से शारलेट जाते हुए, लॉस बेगास, न्यूयार्क का समुद्री तट 'जॉन्स' आदि रचनाओं में उन स्थानों/स्थलों का मनोरम वर्ण पाठक को आनंदित करता और उन्हें देखने की उत्सुकता जगाता है।
अंतिम रचना 'जो नहीं बदला में' 'कम लिखे से अधिक समझना' की परंपरा का पालन है -
परिवर्तनशील युग में
गतिशील समय में
जो कुछ नहीं बदला
वह है
ईर्ष्या, द्वेष, दुश्मनी
अत्याचार, सामूहिक हत्याएँ
जो युगों युगों से चला आ रहा है
शासन और शोषण
देश बदल गए, शासक बदल गए
पर बेईमानी नहीं बदली
गरीब की गरीबी नहीं बदली।
एक सूरज मेरे अंतर की ये कविताएँ कवयित्री की कारयित्री और भावयित्री प्रतिभा को उद्घाटित कर उन्हें पाठक पंचायत में सशक्त हस्ताक्षर के रूप में स्थापित करती हैं।
***
***
गीत
एक कोना कहीं घर में, और होना चाहिए...
*
याद जब आये तुम्हारी, सुरभि-गंधित सुमन-क्यारी.
बने मुझको हौसला दे, क्षुब्ध मन को घोंसला दे.
निराशा में नवाशा की, फसल बोना चाहिए.
एक कोना कहीं घर में, और होना चाहिए...
*
हार का अवसाद हरकर, दे उठा उल्लास भरकर.
बाँह थामे दे सहारा, लगे मंजिल ने पुकारा.
कहे- अवसर सुनहरा, मुझको न खोना चाहिए.
एक कोना कहीं घर में, और होना चाहिए...
*
उषा की लाली में तुमको, चाय की प्याली में तुमको.
देख पाऊँ, लेख पाऊँ, दुपहरी में रेख पाऊँ.
स्वेद की हर बूँद में, टोना सा होना चाहिए.
एक कोना कहीं घर में और होना चाहिए...
*
साँझ के चुप झुटपुटे में, निशा के तम अटपटे में.
पाऊँ यदि एकांत के पल, सुनूँ तेरा हास कलकल.
याद प्रति पल करूँ पर, किंचित न रोना चाहिए.
एक कोना कहीं घर में और होना चाहिए...
*
जहाँ तुमको सुमिर पाऊँ, मौन रह तव गीत गाऊँ.
आरती सुधि की उतारूँ, ह्रदय से तुमको गुहारूँ.
स्वप्न में हेरूँ तुम्हें वह नींद सोना चाहिए.
एक कोना कहीं घर में और होना चाहिए...

***
गीतिका
तितलियाँ
*
यादों की बारात तितलियाँ.
कुदरत की सौगात तितलियाँ..

बिरले जिनके कद्रदान हैं.
दर्द भरे नग्मात तितलियाँ..

नाच रहीं हैं ये बिटियों सी
शोख-जवां ज़ज्बात तितलियाँ..

बद से बदतर होते जाते.
जो, हैं वे हालात तितलियाँ..

कली-कली का रस लेती पर
करें न धोखा-घात तितलियाँ..

हिल-मिल रहतीं नहीं जानतीं
क्या हैं शाह औ' मात तितलियाँ..

'सलिल' भरोसा कर ले इन पर
हुईं न आदम-जात तितलियाँ..
६-२-२०२१
***
कुण्डलिया
जगवाणी हिंदी नमन, नम न मातु कर नैन
न मन सुतों की जिह्वा है, आंग्ल हेतु बेचैन
आंग्ल हेतु बेचैन, नहीं जो तुझे चाहते
निज भविष्य को मातु, आप हो भ्रमित दाहते
ममी डैड सुन कुपित, न वर दें वीणापाणी
नमन मातु शत बार, उर बसो हे जगवाणी
*
६-२-२०२०
***
सोरठे 
दिल मिल हुआ गुलाल, हाथ मिला, ऑंखें मिलीं।
अनगिन किए सवाल, फूल-शूल से धूल ने।।
*
खूब लिख रहे छंद, चैन बिना बेचैन जी।
कल न कला स्वच्छंद , कलाकंद आनंद दे।।
*
कल पर पल-पल शेर, बेकल बे-कल लिख रहे।
करे देर अंधेर, आज कहे कल का पता।।
६-२-२०१८
***
दस मात्रिक छंद
१. पदादि यगण
सुनो हे धनन्जय!
हुआ है न यह जग
किसी का कभी भी।
तुम्हारा, न मेरा
करो मोह क्यों तुम?
तजो मोह तत्क्षण।
न रिश्ते, न नाते
हमेशा सुहाते।
उठाओ धनुष फिर
चढ़ा तीर मारो।
मरे हैं सभी वे
यहाँ हैं खड़े जो
उठो हे परन्तप!
*
२. पदादि मगण
सूनी चौपालें
सूना है पनघट
सूना है नुक्कड़
जैसे हो मरघट
पूछें तो किससे?
बूझें तो कैसे?
बोया है जैसा
काटेंगे वैसा
नाते ना पाले
चाहा है पैसा
*
३. पदादि तगण
चाहा न सायास
पाया अनायास
कैसे मिले श्वास?
कैसे मिले वास?
खोया कहाँ नेह?
खोया कहाँ हास?
बाकी रहा द्वेष
बाकी रहा त्रास
होगा न खग्रास
टूटी नहीं आस
ऊगी हरी घास
भौंरा-कली-रास
होता सुखाभास
मौका यही ख़ास
*
४. पदादि रगण
वायवी सियासत
शेष ना सिया-सत
वायदे भुलाकर
दे रहे नसीहत
हो रही प्रजा की
व्यर्थ ही फजीहत
कुद्ध हो रही है
रोकिए न, कुदरत
फेंकिए न जुमले
हो नहीं बगावत
भूलिए अदावत
बेच दे अदालत
कुश्तियाँ न असली
है छिपी सखावत
*
५. पदादि जगण
नसीब है अपना
सलीब का मिलना
न भोर में उगना
न साँझ में ढलना
हमें बदलना है
न काम का नपना
भुला दिया जिसको
उसे न तू जपना
हुआ वही सूरज
जिसे पड़ा तपना
नहीं 'सलिल' रुकना
तुझे सदा बहना
न स्नेह तज देना
न द्वेष को तहना
*
६. पदादि भगण
बोकर काट फसल
हो तब ख़ुशी प्रबल
भूल न जाना जड़
हो तब नयी नसल
पैर तले चीटी
नाहक तू न मसल
रूप नहीं शाश्वत
चाह न पाल, न ढल
रूह न मरती है
देह रही है छल
तू न 'सलिल' रुकना
निर्मल देह नवल
*
७. पदादि नगण
कलकल बहता जल
श्रमित न आज न कल
रवि उगता देखे
दिनकर-छवि लेखे
दिन भर तपता है
हँसकर संझा ढल
रहता है अविचल
रहता चुप अविकल
कलकल बहता जल
नभचर नित गाते
तनिक न अलसाते
चुगकर जो लाते
सुत-सुता-खिलाते
कल क्या? कब सोचें?
कलरव कर हर पल
कलरव सुन हर पल
कलकल बहता जल
नर न कभी रुकता
कह न सही झुकता
निज मन को ठगता
विवश अंत-चुकता
समय सदय हो तो
समझ रहा निज बल
समझ रहा निर्बल
कलकल बहता जल
*
८. पदादि सगण
चल पंछी उड़ जा
जब आये तूफां
जब पानी बरसे
मत नादानी कर
मत यूँ तू अड़ जा
पहचाने अवसर
फिर जाने क्षमता
जिद ठाने क्यों तू?
झट पीछे मुड़ जा
तज दे मत धीरज
निकलेगा सूरज
वरने निज मंजिल
चटपट हँस बढ़ जा
***
***
सामयिक गीत :
*
हम न चलने देंगे
लेकिन
काम तुम्हारा देश चलाना
*
हम जो जी चाहें करें
कोई न सकता रोक
पग-पग पर टोंकें तुम्हें
कोई न सकता टोंक
तुमसेइज्जत चाहते
तुम्हें भाड़ में झोंक
हम न निभाने देंगे
लेकिन
काम तुम्हारा साथ निभाना
*
बढ़ा रहे तुम हाथ या
झुका रहे हो माथ
वादा कर कर भुलाएँ
कभी न देंगे साथ
तुम बोलोगे 'पथ' अगर
हम बोलेंगे 'पाथ'
हम न बनाने देंगे
लेकिन काम तुम्हारा राह बनाना
*
सीधी होती है कभी
क्या कुत्ते की दुम?
क्या नादां यह मानता
अकल हुई है गुम?
हमें शत्रु से भी बड़े
शत्रु लग रह तुम
हम न उठाने देंगे
लेकिन
काम तुम्हारा देश उठाना
***
६-२-२०१६
***
बाल गीत:
"कितने अच्छे लगते हो तुम "
*
कितने अच्छे लगते हो तुम |
बिना जगाये जगते हो तुम ||
नहीं किसी को ठगते हो तुम |
सदा प्रेम में पगते हो तुम ||
दाना-चुग्गा मंगते हो तुम |
चूँ-चूँ-चूँ-चूँ चुगते हो तुम ||
आलस कैसे तजते हो तुम?
क्या प्रभु को भी भजते हो तुम?
चिड़िया माँ पा नचते हो तुम |
बिल्ली से डर बचते हो तुम ||
क्या माला भी जपते हो तुम?
शीत लगे तो कँपते हो तुम?
सुना न मैंने हँसते हो तुम |
चूजे भाई! रुचते हो तुम |
***
अभिनव प्रयोग-
उल्लाला मुक्तक:
*
उल्लाला है लहर सा,
किसी उनींदे शहर सा.
खुद को खुद दोहरा रहा-
दोपहरी के प्रहर सा.
*
झरते पीपल पात सा,
श्वेत कुमुदनी गात सा.
उल्लाला मन मोहता-
शरतचंद्र मय रात सा..
*
दीप तले अँधियार है,
ज्यों असार संसार है.
कोशिश प्रबल प्रहार है-
दीपशिखा उजियार है..
*
मौसम करवट बदलता,
ज्यों गुमसुम दिल मचलता.
प्रेमी की आहट सुने -
चुप प्रेयसी की विकलता..
*
दिल ने करी गुहार है,
दिल ने सुनी पुकार है.
दिल पर दिलकश वार या-
दिलवर की मनुहार है..
*
शीत सिसकती जा रही,
ग्रीष्म ठिठकती आ रही.
मन ही मन में नवोढ़ा-
संक्रांति कुछ गा रही..
*
श्वास-आस रसधार है,
हर प्रयास गुंजार है.
भ्रमरों की गुन्जार पर-
तितली हुई निसार है..
*
रचा पाँव में आलता,
कर-मेंहदी पूछे पता.
नाम लिखा छलिया हुआ-
कहो कहाँ-क्यों लापता?
*
वह प्रभु तारणहार है,
उस पर जग बलिहार है.
वह थामे पतवार है.
करता भव से पार है..
६-२-२०१३
***
नवगीत / भजन:
*
जाग जुलाहे!
भोर हो गई
*
आशा-पंछी चहक रहा है.
सुमन सुरभि ले महक रहा है..
समय बीतते समय न लगता.
कदम रोक, क्यों बहक रहा है?
संयम पहरेदार सो रहा-
सुविधा चतुरा चोर हो गयी.
जाग जुलाहे!
भोर हो गई
*
साँसों का चरखा तक-धिन-धिन.
आसों का धागा बुन पल-छिन..
ताना-बाना, कथनी-करनी-
बना नमूना खाने गिन-गिन.
ज्यों की त्यों उजली चादर ले-
मन पतंग, तन डोर हो गयी.
जाग जुलाहे!
भोर हो गई
*
रीते हाथों देख रहा जग.
अदना मुझको लेख रहा जग..
मन का मालिक, रब का चाकर.
शून्य भले अव्रेख रहा जग..
उषा उमंगों की लाली संग-
संध्या कज्जल-कोर हो गयी.
जाग जुलाहे!
भोर हो गई
***
नवगीत:
*
हर चहरे पर
नकली चहरा...
*
आँखें रहते
सूर हो गए.
क्यों हम खुद से
दूर हो गए?
हटा दिए जब
सभी आवरण
तब धरती के
नूर हो गए.
रोक न पाया
कोई पहरा.
हर चहरे पर
नकली चहरा...
*
भूत-अभूत
पूर्व की वर्चा.
भूल करें हम
अब की अर्चा.
चर्चा रोकें
निराधार सब.
हो न निरुपयोगी
कुछ खर्चा.
मलिन हुआ जल
जब भी ठहरा.
हर चहरे पर
नकली चहरा...
*
कथनी-करनी में
न भेद हो.
जब गलती हो
तुरत खेद हो.
लक्ष्य देवता के
पूजन हित-
अर्पित अपना
सतत स्वेद हो.
उथलापन तज
हो मन गहरा.
हर चहरे पर
नकली चहरा...
*
***
नवगीत:
*
काया माटी,
माया माटी,
माटी में-
मिलना परिपाटी...
*
बजा रहे
ढोलक-शहनाई,
होरी, कजरी,
फागें, राई,
सोहर गाते
उमर बिताई.
इमली कभी
चटाई-चाटी...
*
आडम्बर करना
मन भाया.
खुद को खुद से
खुदी छिपाया.
पाया-खोया,
खोया-पाया.
जब भी दूरी
पाई-पाटी...
*
मौज मनाना,
अपना सपना.
नहीं सुहाया
कोई नपना.
निजी हितों की
माला जपना.
'सलिल' न दांतों
रोटी काटी...
*
चाह बहुत पर
राह नहीं है.
डाह बहुत पर
वाह नहीं है.
पर पीड़ा लख
आह नहीं है.
देख सचाई
छाती फाटी...
*

मैं-तुम मिटकर
हम हो पाते.
खुशियाँ मिलतीं
गम खो जाते.
बिन मतलब भी
पलते नाते.
छाया लम्बी
काया नाटी...

***
सामयिक दोहे

रश्मि रथी की रश्मि के, दर्शन कर जग धन्य.
तुम्हीं चन्द्र की ज्योत्सना, सचमुच दिव्य अनन्य..

राज सियारों का हुआ, सिंह का मिटा भविष्य.
लोकतंत्र के यज्ञ में, काबिल हुआ हविष्य..

कहता है इतिहास यह, राक्षस थे बलवान.
जिसने उनको मिटाया, वे सब थे इंसान..

इस राक्षस राठोडड़ का होगा सत्यानाश.
साक्षी होंगे आप-हम, धरती जल आकाश..

नारायण के नाम पर, सचमुच लगा कलंक.
मैली चादर हो गई, चुभा कुयश का डंक..

फँसे वासना पंक में, श्री नारायण दत्त.
जैसे मरने जा रहा, कीचड़ में गज मत्त.

कीचड़ में गज मत्त, लाज क्यों इन्हें न आयी.
कभी उठाई थी चप्पल. अब चप्पल खाई..
***
: सामयिक गीत :

बिक रहा ईमान है
*
कौन कहता है कि...
मँहगाई अधिक है?
बहुत सस्ता
बिक रहा ईमान है.
जहाँ जाओगे
सहज ही देख लोगे.
बिक रहा
बेदाम ही इंसान है.
कहो जनमत का
यहाँ कुछ मोल है?
नहीं, देखो जहाँ
भारी पोल है.
कर रहा है न्याय
अंधा ले तराजू.
व्यवस्था में हर कहीं
बस झोल है
आँख का आँसू,
हृदय की भावनाएँ.
हौसला अरमान सपने
समर्पण की कामनाएँ.
देश-भक्ति, त्याग को
किस मोल लोगे?
कहो इबादत को
कैसे तौल लोगे?
आँख के आँसू,
हया लज्जा शरम.
मुफ्त बिकते
कहो सच है या भरम?
क्या कभी इससे सस्ते
बिक़े होंगे मूल्य
बिक रहे हैं
आज जो निर्मूल्य?
मौन हो अर्थात
सहमत बात से हो.
मान लेता हूँ कि
आदम जात से हो.
जात औ' औकात निज
बिकने न देना.
मुनाफाखोरों को
अब टिकने न देना.
भाव जिनके अधिक हैं
उनको घटाओ.
और जो बेभाव हैं
उनको बढ़ाओ.
***
नवगीत
चले श्वास-चौसर पर...
आसों का शकुनी नित दाँव.
मौन रो रही कोयल,
कागा हँसकर बोले काँव...
*
संबंधों को अनुबंधों ने
बना दिया बाज़ार.
प्रतिबंधों के धंधों के
आगे दुनिया लाचार.
कामनाओं ने भावनाओं को
करा दिया नीलम.
बद को अच्छा माने दुनिया
कहे बुरा बदनाम.
ठंडक देती धूप
तप रही बेहद कबसे छाँव...
*
सद्भावों की सती नहीं है,
राजनीति रथ्या.
हरिश्चंद्र ने त्याग सत्य
चुन लिया असत मिथ्या.
सत्ता शूर्पनखा हित लड़ते.
हाय! लक्ष्मण-राम.
खुद अपने दुश्मन बन बैठे
कहें विधाता वाम.
भूखे मरने शहर जा रहे
नित ही अपने गाँव...
*
'सलिल' समय पर
न्याय न मिलता,
देर करे अंधेर.
मार-मारकर बाज खा रहे
कुर्सी बैठ बटेर.
बेच रहे निष्ठाएँ अपनी
पल में लेकर दाम.
और कह रहे हैं संसद में
'भला करेंगे राम.'
अपने हाथों तोड़-खोजते
कहाँ खो गया ठाँव?...
***
खबरदार कविता
राज को पाती:

भारतीय सब एक हैं, राज कौन है गैर?
महाराष्ट्र क्यों राष्ट्र की, नहीं चाहता खैर?

कौन पराया तू बता?, और सगा है कौन?
राज हुआ नाराज क्यों ख़ुद से?रह अब मौन.

उत्तर-दक्षिण शीश-पग, पूरब-पश्चिम हाथ.
ह्रदय मध्य में ले बसा, सब हों तेरे साथ.

भारत माता कह रही, सबका बन तू मीत.
तज कुरीत, सबको बना अपना, दिल ले जीत.

सच्चा राजा वह करे जो हर दिल पर राज.
‘सलिल’ तभी चरणों झुकें, उसके सारे ताज.
६-२-२०१०