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बुधवार, 26 फ़रवरी 2020

समीक्षा - काव्य कालिंदी - मोहन शशि

कृति चर्चा :
''काव्य कालिंदी'' : एक पठनीय कृति 
मोहन शशि 
*
साहित्य के स्वनामधन्य हस्ताक्षर स्मृतिशेष भवानी प्रसाद मिश्र जी ने कहा है - "कुछ लिख के सो / कुछ पढ़ के सो / जिस जगह जागा सवेरे / उस जगह से बढ़ के सो"। 'काव्य कालिंदी  की स्वनामधन्य रचनाकार डॉ. संतोष शुक्ला के रचना संसार में झाँकने पर ऐसा आभास होता है कि वे मिश्र जी की पंक्तियों को सूजन धर्म में बड़ी गंभीरता के साथ सार्थकता प्रदान करने साधनारत हैं। बृज भूमि में जन्म पाने का सौभाग्य सँजोये, कालिंदी तीर से चंबल का परिभ्रमण कर, पतित पावनी मातेश्वरी नर्मदा के पवन तट की यात्रा में हिमालयी विसंगतियों में भी धैर्य के साथ सृजन और लगातार सृजन का संकल्प साधुवाद का अधिकारी है। 

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' ने इस कृति की भूमिका में डॉ. संतोष शुक्ला के व्यक्तित्व और कृतित्व पर घरे डूबकर जो शब्द-चित्र उकेरे हैं, उनके पश्चात् कुछ कहने को शेष नहीं तथापि  'अभिमात्यार्थ' स्नेहानुरोध की रक्षा के लिए पढ़ने पर संतोष जी और दोहा का अभिन्न नाता सामने आया-
दोहे ऐसे सर चढ़े, अन्य न भाती बात।  
साथ निभाते हर समय, दिन हो चाहे रात।। 
दोहा दे संतोष, गुरु वंदन, गोविन्द वंदन, भारत-भारती, कालिंदी तीर, पितर, उसकी आये याद जब, शुभ प्रभात, बसंत, नीति के दोहे, नारी, आँखें, दोहा, मुहावरे, उत्सव, महाबलीपुरम  आदि शीर्षक से दोहों ने मेरे मन -प्राण को बहुत प्रभावित किया। संतोष जी के दोहों में सहजता, सरलता, 'देखन में छोटे लगें, घाव करें गंभीर"की ऐसी बांकी प्रस्तुति है कि "इस सादगी पर कौन न मर जाए ऐ खुदा!' समझने की कहीं कोई आवश्यकता नहीं, पढ़ते ही सरे अर्थ पंखुरी-पंखुरी सामने आ जाते हैं। बानगी देखें- 
दुनिया धोखेबाज है, सद्गुण जाते हार। 
दाँव लगाकर छल-कपट, लेते बाजी मार।। 

चलती चक्की अब नहीं, हुआ मशीनी काज। 
महिलाओं की मौज है, पति पर करतीं राज।।

बाल नाक के थे कभी, अब करते हैं घात। 
कैसे अब उनसे निभे, बने न बिगड़ी बात।।

चंचल मन भगा फायर, बस में रखकर योग। 
योग-भोग विनियोग ही, उन्नति का संयोग।।

कवयित्री जी आठवें दशक के करीब हैं किन्तु देखें यह उड़ान- 
वृद्ध न मन होता कभी, नित नव भरे उड़ान। 
जी भर पूर्ण प्रयास कर, मंज़िल पाना ठान।।

व्यक्ति समाज, सड़क, संसद, और टी.व्ही. चैनल्स पर जो दंगल हो रहे हैं, उन्हें ध्यान में रखकर सुनें -
कौन किसी की सुन रहा, सभी रहे हैं बोल। 
दुःख केवल इतना हमें, बोल रहे बिन तोल।।

निम्न दोहा सुनकर हर पाठक को लगेगा कि उसके मन की बात है- 
जग में अपना कौन है, सच्ची किसकी प्रीत। 
अपने धोखा दे रहे, बहुत निराली रीत।।

'काव्य कालिंदी'  में दोहों की दमक भले ही अधिक है तथापि कुण्डलिया, सवैया, मुक्तिका, मुक्तक आदि भी अपनी आभा बिखेर रहे हैं। यही नहीं अंत में परिशिष्ट में लघु कथा, संस्मरण, यात्रा वृत्तांत आदि विधाओं का समावेश कर संतोष जी ने बहुआयामी सृजन सामर्थ्य का परिचय दिया है। एक मुक्तक का आनंद लें- 
दौड़ भाग के जीवन में, सुख-चैन सभी की चाहत है। 
मिल जाए थोड़ा सा भी तो, मिलती मन को राहत है।।
अजब आदमी है दुनिया का और अजब उसकी दुनिया-
अपने दुःख से दुखी नहीं , औरों के सुख से आहत है।।

नवगीतकार बसंत शर्मा के अनुसार "संतोष शुक्ल जी की जिजीविषा असाधारण, सीखने की ललक अनुकरणीय और सृजन सामर्थ्य अपराजेय है।" 
***
संपर्क : ९४२४६५८९१९ 



    
    

दोहा, ममता, सरस्वती, सावरकर

वंदना
हे हंसवाहिनी! वीणा के तारों से झट झंकार करो
जो मतिभ्रम फैला वह हर, सद्भाव सलिल संचार करो
हो शरद पूर्णिमा की झिलमिल, दिल से दिल मिल खिल पाएँ
टकराव न हो, अलगाव न हो, मिल सुर से सुर सरगम गाएँ
*
दोहा सलिला
*
उन सा वर कर पंथ हम, करें देश की भक्ति
सावरकर को प्रिय नहीं, रही स्वार्थ अनुरक्ति
वीर विनायक ने किया, विहँस आत्म बलिदान
डिगे नहीं संकल्प से, कब चाहा प्रतिदान?
भक्तों! तजकर स्वार्थ हों, नीर-क्षीर वत एक
दोषारोपण बंद कर, हों जनगण मिल एक
मोटी-छोटी अँगुलियाँ, मिल मुट्ठी हों आज
गले लगा-मिल साधिए, सबके सारे काज
***
संजीव
२६-२-२०२०
दोहा
ममता
*
माँ गुरुवर ममता नहीं, भिन्न मानिए एक।
गौ भाषा माटी नदी, पूजें सहित विवेक।।
*
ममता की समता नहीं, जिसे मिले वह धन्य।
जो दे वह जगपूज्य है, गुरु की कृपा अनन्य।।
*
ममता में आश्वस्ति है, निहित सुरक्षा भाव।
पीर घटा; संतोष दे, मेटे सकल अभाव।।
*
ममता में कर्तव्य का, सदा समाहित बोध।
अंधा लाड़ न मानिए, बिगड़े नहीं अबोध।।
*
प्यार गंग के साथ में, दंड जमुन की धार।
रीति-नीति सुरसति अदृश, ममता अपरंपार।।
*
दीन हीन असहाय क्यों, सहें उपेक्षा मात्र।
मूक अपंग निबल सदा, चाहें ममता मात्र।।
*
संजीव
२५-२-२०२०

मंगलवार, 25 फ़रवरी 2020

लेख: भारत की लोक सम्पदा: फागुन की फागें


लेख:
भारत की लोक सम्पदा: फागुन की फागें
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
.


भारत विविधवर्णी लोक संस्कृति से संपन्न- समृद्ध परम्पराओं का देश है। इन परम्पराओं में से एक लोकगीतों की है। ऋतु परिवर्तन पर उत्सवधर्मी भारतीय जन गायन-वादन और नर्तन की त्रिवेणी प्रवाहित कर आनंदित होते हैं। फागुन वर्षांत तथा चैत्र वर्षारम्भ के साथ-साथ फसलों के पकने के समय के सूचक भी हैं। दक्षिणायनी सूर्य जैसे ही मकर राशि में प्रवेश कर उत्तरायणी होते हैं इस महाद्वीप में दिन की लम्बाई और तापमान दोनों की वृद्धि होने की लोकमान्यता है। सूर्य पूजन, गुड़-तिल से निर्मित पक्वान्नों का सेवन और पतंगबाजी के माध्यम से गगनचुम्बी लोकांनंद की अभिव्यक्ति सर्वत्र देख जा सकती है।मकर संक्रांति, खिचड़ी, बैसाखी, पोंगल आदि विविध नामों से यह लोकपर्व सकल देश में मनाया जाता है।
पर्वराज होली से ही मध्योत्तर भारत में फागों की बयार बहने लगती है। बुंदेलखंड में फागें, बृजभूमि में नटनागर की लीलाएँ चित्रित करते रसिया और बधाई गीत, अवध में राम-सिया की जुगल जोड़ी की होली-क्रीड़ा जन सामान्य से लेकर विशिष्ट जनों तक को रसानंद में आपादमस्तक डुबा देते हैं। राम अवध से निकाकर बुंदेली माटी पर अपनी लीलाओं को विस्तार देते हुए लम्बे समय तक विचरते रहे इसलिए बुंदेली मानस उनसे एकाकार होकर हर पर्व-त्यौहार पर ही नहीं हर दिन उन्हें याद कर 'जय राम जी की' कहता है। कृष्ण का नागों से संघर्ष और पांडवों का अज्ञातवास नर्मदांचली बुन्देल भूमि पर हुआ। गौरा-बौरा तो बुंदेलखंड के अपने हैं, शिवजा, शिवात्मजा, शिवसुता, शिवप्रिया, शिव स्वेदोभवा आदि संज्ञाओं से सम्बोधित आनन्ददायिनी नर्मदा तट पर बम्बुलियों के साथ-साथ शिव-शिवा की लीलाओं से युक्त फागें गयी जाना स्वाभाविक है।
बुंदेली फागों के एकछत्र सम्राट हैं लोककवि ईसुरी। ईसुरी ने अपनी प्रेमिका 'रजउ' को अपने कृतित्व में अमर कर दिया। ईसुरी ने फागों की एक विशिष्ट शैली 'चौघड़िया फाग' को जन्म दिया। हम अपनी फाग चर्चा चौघड़िया फागों से ही आरम्भ करते हैं। ईसुरी ने अपनी प्राकृत प्रतिभा से ग्रामीण मानव मन के उच्छ्वासों को सुर-ताल के साथ समन्वित कर उपेक्षित और अनचीन्ही लोक भावनाओं को इन फागों में पिरोया है। रसराज श्रृंगार के संयोग और वियोग दोनों पक्ष इन फागों में अद्भुत माधुर्य के साथ वर्णित हैं। सद्यस्नाता युवती की केशराशि पर मुग्ध ईसुरी गा उठते हैं:
ईसुरी राधा जी के कानों में झूल रहे तरकुला को उन दो तारों की तरह बताते हैं जो राधा जी के मुख चन्द्र के सौंदर्य के आगे फीके फड़ गए हैं:
कानन डुलें राधिका जी के, लगें तरकुला नीके
आनंदकंद चंद के ऊपर, तो तारागण फीके

ईसुरी की आराध्या राधिका जी सुंदरी होने के साथ-साथ दीनों-दुखियों के दुखहर्ता भी हैं:
मुय बल रात राधिका जी को, करें आसरा की कौ
दीनदयाल दीन दुःख देखन, जिनको मुख है नीकौ

पटियाँ कौन सुगर ने पारी, लगी देहतन प्यारी
रंचक घटी-बड़ी है नैयाँ, साँसे कैसी ढारी
तन रईं आन सीस के ऊपर, श्याम घटा सी कारी
'ईसुर' प्राण खान जे पटियाँ, जब सें तकी उघारी

कवि पूछता है कि नायिका की मोहक चोटियाँ किस सुघड़ ने बनायी हैं? चोटियाँ जरा भी छोटी-बड़ी नहीं हैं और आती-जाती साँसों की तरह हिल-डुल रहीं हैं। वे नायिका के शीश के ऊपर श्यामल मेघों की तरह छाईं हैं। ईसुरी ने जब से इस अनावृत्त केशराशि की सुनदरता को देखा है उनकी जान निकली जा रही है।
ईसुर की नायिका नैनों से तलवार चलाती है:
दोई नैनन की तरवारें, प्यारी फिरें उबारें
अलेपान गुजरान सिरोही, सुलेमान झख मारें
ऐंच बाण म्यान घूंघट की, दे काजर की धारें
'ईसुर' श्याम बरकते रहियो, अँधियारे उजियारे

तलवार का वार तो निकट से ही किया जा सकता है नायक दूर हो तो क्या किया जाए? क्या नायिका उसे यूँ ही जाने देगी? यह तो हो ही नहीं सकता। नायिका निगाहों को बरछी से भी अधिक पैने तीर बनाकर नायक का ह्रदय भेदती है:
छूटे नैन-बाण इन खोरन, तिरछी भौंह मरोरन
नोंकदार बरछी से पैंने, चलत करेजे फोरन

नायक बेचारा बचता फिर रहा है पर नायिका उसे जाने देने के मूड में नहीं है। तलवार और तीर के बाद वह अपनी कातिल निगाहों को पिस्तौल बना लेती है:
अँखियाँ पिस्तौलें सी करके, मारन चात समर के
गोली बाज दरद की दारू, गज कर देत नज़र के

इतने पर भी ईसुरी जान हथेली पर लेकर नवयौवना नायिका का गुबखान करते नहीं अघाते:
जुबना कड़ आये कर गलियाँ, बेला कैसी कलियाँ
ना हम देखें जमत जमीं में, ना माली की बगियाँ
सोने कैसे तबक चढ़े हैं, बरछी कैसी भलियाँ
'ईसुर' हाथ सँभारे धरियो फुट न जावें गदियाँ

लोक ईसुरी की फाग-रचना के मूल में उनकी प्रेमिका रजऊ को मानती है। रजऊ ने जिस दिन गारो के साथ गले में काली काँच की गुरियों की लड़ियों से बने ४ छूँटा और बिचौली काँच के मोतियों का तिदाने जैसा आभूषण और चोली पहिनी, उसके रूप को देखकर दीवाना होकर हार झूलने लगा। ईसुरी कहते हैं कि रजऊ के सौंदर्य पर मुग्ध हुए बिना कोई नहीं रह सकता।
जियना रजऊ ने पैनो गारो, हरनी जिया बिरानो
छूँटा चार बिचौली पैंरे, भरे फिरे गरदानो
जुबनन ऊपर चोली पैरें, लटके हार दिवानो
'ईसुर' कान बटकने नइयाँ, देख लेव चह ज्वानो

ईसुरी को रजऊ की हेरन (चितवन) और हँसन (हँसी) नहीं भूलती। विशाल यौवन, मतवाली चाल, इकहरी पतली कमर, बाण की तरह तानी भौंह, तिरछी नज़र भुलाये नहीं भूलती। वे नज़र के बाण से मरने तक को तैयार हैं, इसी बहाने रजऊ एक बार उनकी ओर देख तो ले। ऐसा समर्पण ईसुरी के अलावा और कौन कर सकता है?
हमख़ाँ बिसरत नहीं बिसारी, हेरन-हँसन तुमारी
जुबन विशाल चाल मतवारी, पतरी कमर इकारी
भौंह कमान बान से तानें, नज़र तिरीछी मारी
'ईसुर' कान हमारी कोदी, तनक हरे लो प्यारी

ईसुरी के लिये रजऊ ही सर्वस्व है। उनका जीवन-मरण सब कुछ रजऊ ही है। वे प्रभु-स्मरण की ही तरह रजऊ का नाम जपते हुए मरने की कामना करते हैं, इसलिए कुछ विद्वान रजऊ की सांसारिक प्रेमिका नहीं, आद्या मातृ शक्ति को उनके द्वारा दिया गया सम्बोधन मानते हैं:
जौ जी रजऊ रजऊ के लाने, का काऊ से कानें
जौलों रहने रहत जिंदगी, रजऊ के हेत कमाने
पैलां भोजन करैं रजौआ, पाछूं के मोय खाने
रजऊ रजऊ कौ नाम ईसुरी, लेत-लेत मर जाने

ईसुरी रचित सहस्त्रों फागें चार कड़ियों (पंक्तियों) में बँधी होने के कारन चौकड़िया फागें कही जाती हैं। इनमें सौंदर्य को पाने के साथ-साथ पूजने और उसके प्रति मन-प्राण से समर्पित होने के आध्यात्मजनित भावों की सलिला प्रवाहित है।
रचना विधान:
ये फागें ४ पंक्तियों में निबद्ध हैं। हर पंक्ति में २ चरण हैं। विषम चरण (१, ३, ५, ७ ) में १६ तथा सम चरण (२, ४, ६, ८) में १२ मात्राएँ हैं। चरणांत में प्रायः गुरु मात्राएँ हैं किन्तु कहीं-कहीं २ लघु मात्राएँ भी मिलती हैं। ये फागें छंद प्रभाकर के अनुसार महाभागवत जातीय नरेंद्र छंद में निबद्ध हैं। इस छंद में खड़ी हिंदी में रचनाएँ मेरे पढ़ने में अब तक नहीं आयी हैं। ईसुरी की एक फाग का खड़ी हिंदी में रूपांतरण देखिए:
किस चतुरा ने छोटी गूँथी, लगतीं बेहद प्यारी
किंचित छोटी-बड़ी न उठ-गिर, रहीं सांस सम न्यारी
मुकुट समान शीश पर शोभित, कृष्ण मेघ सी कारी
लिये ले रही जान केश-छवि, जब से दिखी उघारी

नरेंद्र छंद में एक चतुष्पदी देखिए:
बात बनाई किसने कैसी, कौन निभाये वादे?
सब सच समझ रही है जनता, कहाँ फुदकते प्यादे?
राजा कौन? वज़ीर कौन?, किसके बद-नेक इरादे?
जिसको चाहे 'सलिल' जिता, मत चाहे उसे हरा दे
*

iei प्रस्ताव व्यक्तिगत

प्रस्ताव १

For use by Headquarters (Programme code):

Centre code Prog Type# Div Board Fin. Year* Prog. No.

Name of the Centre: जबलपुर लोकल सेंटर, जबलपुर।
Proposed Programme: अभियांत्रिकी शब्द कोष।
Title of the Programme: अभियांत्रिकी शब्द कोष। 
Under the aegis of which Divisional Board: Interdisciplinary Co-ordination Committee
Date: 10-11 मई 2020 Venue:जबलपुर लोकल सेंटर, जबलपुर
Associate organization (if any): विश्ववाणी हिंदी संस्थान जबलपुर।
Grant requested from HQrs: Rs. 300000/- (रु. तीन लाख)
Brief Write-up on the Theme in association with proposed foreign bodies
अभियांत्रिकी जन सामान्य के दैनंदिन जीवन से जुडी विधा है। भारत की राज भाषा हिंदी है। संविधान के प्रावधानों और शासकीय दिशा निर्देशिन के बाद भी हिंदी में उच्च तकनीकी शिक्षा न हो पाने का कारण तकनीकी और पारिभाषिक शब्दों का अभाव है। मध्य प्रद्रेश हिंदी में  तकनीकी शिक्षा देने के क्षेत्र में पूरे देश में प्रथम है। आई टी आई डिप्लोमा, पॉलिटेक्निक में त्रिवर्षीय डिप्लोमा की पढ़ाई और परीक्षा हिंदी में होती ही है। अब बी. ई. / बी. टेक. में मिश्रित भाषा में अध्यापन तथा हिंदी व अंग्रेजी दोनों भाषाओँ में प्रश्न पात्र आ रहे हैं। राजीव गाँधी विश्वविद्यालय के निर्देशिन के अनुसार विद्यार्थी हिंदी में उत्तर लिख सकते हैं। इन प्रश्न पत्रों में अंग्रेजी के एक शब्द के लिए हिंदी में भिन्न-भिन्न शब्दों का प्रयोग होने और कभी-कभी गलत शब्द का प्रयोग होने से परीक्षार्थी भ्रमित होते हैं।  
इंस्टीयूशन ऑफ़ इंजीनियर्स भारत की के मात्र संस्था हैजिसकी परीक्षा बी.ई. उपाधि के समकक्ष है और हिंदी में  दी जा सकती है। 
विसंगति यह है कि बाजार में अब तक हिंदी-अंग्रेजी या अंग्रेजी-हिंदी का अभियांत्रिकी शब्द कोष उपलब्ध नहीं है। विश्ववाणी हिंदी संस्थान जबलपुर ने सदाशयतापूर्वक  इन दोनों शब्दकोशों को तैयार करने का दायित्व वहन करने हेतु सहमति दी है। भारतीय अभियांत्रिकी संस्था के तत्वावधान में कोष प्रकाशित होने पर वह निर्विवाद तथा सर्वमान्य होगा। इससे विद्यार्थियों में शब्द के अर्थ में भ्रम न होगा।  

AREAS PROPOSED TO BE COVERED
01.नागरी अभियांत्रिकी। 
02. वैद्युत अभियांत्रिकी
03. यांत्रिकीय अभियांत्रिकी
04. दूरसंचार अभियांत्रिकी
05. संगणक अभियांत्रिकी
06. स्वचालित (ऑटोमोबाइल) अभियांत्रिकी। 
07. पर्यावरण अभियांत्रिकी।

राशि प्राप्त होने पर संस्थान एक वर्ष में न केवल शब्दकोष तैयार करने अपितु अनुदान मूल्य की प्रतियाँ इंस्टीट्यूशन को निशुल्क देने हेतु भी सहमत है।  

Proposals to be sent (a) 6 months prior to the proposed dates of National Convention, (b) 3 months prior to the proposed dates of
All India Seminar and (c) 1 months prior to the proposed dates of One Day Workshop/Seminar.
Grant available for (a) National Convention: Rs 1,50,000/-, (b) All India Seminar: Maxm. Rs.30,000/-, (c) One Day
Workshop/Seminar: Rs.10,000/-
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प्रस्ताव २

For use by Headquarters (Programme code):

Centre code Prog Type# Div Board Fin. Year* Prog. No.

Name of the Centre: जबलपुर लोकल सेंटर, जबलपुर।
Proposed Programme: बी. टेक. प्रथम सेमिस्टर हेतु पुस्तक लेखन ।
Title of the Programme: । 
Under the aegis of which Divisional Board: Interdisciplinary Co-ordination Committee
Date: 10-11 मई 2020 Venue:जबलपुर लोकल सेंटर, जबलपुर
Associate organization (if any): विश्ववाणी हिंदी संस्थान जबलपुर।
Grant requested from HQrs: Rs. 300000/- (रु. तीन लाख)
Brief Write-up on the Theme in association with proposed foreign bodies
अभियांत्रिकी जन सामान्य के दैनंदिन जीवन से जुडी विधा है। भारत की राज भाषा हिंदी है। संविधान के प्रावधानों और शासकीय दिशा निर्देशिन के बाद भी हिंदी में उच्च तकनीकी शिक्षा न हो पाने का कारण तकनीकी और पारिभाषिक शब्दों का अभाव है। मध्य प्रद्रेश हिंदी में  तकनीकी शिक्षा देने के क्षेत्र में पूरे देश में प्रथम है। आई टी आई डिप्लोमा, पॉलिटेक्निक में त्रिवर्षीय डिप्लोमा की पढ़ाई और परीक्षा हिंदी में होती ही है। अब बी. ई. / बी. टेक. में मिश्रित भाषा में अध्यापन तथा हिंदी व अंग्रेजी दोनों भाषाओँ में प्रश्न पात्र आ रहे हैं। राजीव गाँधी विश्वविद्यालय के निर्देशिन के अनुसार विद्यार्थी हिंदी में उत्तर लिख सकते हैं। इन प्रश्न पत्रों में अंग्रेजी के एक शब्द के लिए हिंदी में भिन्न-भिन्न शब्दों का प्रयोग होने और कभी-कभी गलत शब्द का प्रयोग होने से परीक्षार्थी भ्रमित होते हैं।  
इंस्टीयूशन ऑफ़ इंजीनियर्स भारत की के मात्र संस्था हैजिसकी परीक्षा बी.ई. उपाधि के समकक्ष है और हिंदी में  दी जा सकती है। 
विसंगति यह है कि बाजार में अब तक हिंदी-अंग्रेजी या अंग्रेजी-हिंदी का अभियांत्रिकी शब्द कोष उपलब्ध नहीं है। विश्ववाणी हिंदी संस्थान जबलपुर ने सदाशयतापूर्वक  इन दोनों शब्दकोशों को तैयार करने का दायित्व वहन करने हेतु सहमति दी है। भारतीय अभियांत्रिकी संस्था के तत्वावधान में कोष प्रकाशित होने पर वह निर्विवाद तथा सर्वमान्य होगा। इससे विद्यार्थियों में शब्द के अर्थ में भ्रम न होगा।  

AREAS PROPOSED TO BE COVERED
01.नागरी अभियांत्रिकी। 
02. वैद्युत अभियांत्रिकी
03. यांत्रिकीय अभियांत्रिकी
04. दूरसंचार अभियांत्रिकी
05. संगणक अभियांत्रिकी
06. स्वचालित (ऑटोमोबाइल) अभियांत्रिकी। 
07. पर्यावरण अभियांत्रिकी।

राशि प्राप्त होने पर संस्थान एक वर्ष में न केवल शब्दकोष तैयार करने अपितु अनुदान मूल्य की प्रतियाँ इंस्टीट्यूशन को निशुल्क देने हेतु भी सहमत है।  

Proposals to be sent (a) 6 months prior to the proposed dates of National Convention, (b) 3 months prior to the proposed dates of
All India Seminar and (c) 1 months prior to the proposed dates of One Day Workshop/Seminar.
Grant available for (a) National Convention: Rs 1,50,000/-, (b) All India Seminar: Maxm. Rs.30,000/-, (c) One Day
Workshop/Seminar: Rs.10,000/-
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प्रस्ताव ३

For use by Headquarters (Programme code):

Centre code Prog Type# Div Board Fin. Year* Prog. No.

Name of the Centre: जबलपुर लोकल सेंटर, जबलपुर
Proposed Programme: अखिल भारतीय अभियंता कवि सम्मेलन
Title of the Programme: अखिल भारतीय अभियंता कवि सम्मेलन
Under the aegis of which Divisional Board: Interdisciplinary Co-ordination Committee
Date: 10-11 मई 2020 Venue: जबलपुर लोकल सेंटर, जबलपुर
Associate organization (if any): नगर निगम जबलपुर, जबलपुर विकास प्राधिकरण जबलपुर।
Grant requested from HQrs: Rs. 30000/- (रु. तीस हजार)
Brief Write-up on the Theme in association with proposed foreign bodies

अभियंता संवर्ग बहुमुखी प्रतिभा का धनी है किन्तु कार्यस्थलियों की व्यस्तता तथा तकनीकी विभागों से प्रोत्साहन न मिलने के कारण 

AREAS PROPOSED TO BE COVERED
01. नगरीय विकास की संकल्पना : कल, आज और कल के संदर्भ में। 
02. नगर विकास के तत्व, उनका महत्त्व और उपादेयता। 
03. नगरीय अधोसंरचना : क्या, क्यों और कैसे? 
04. यातायात समस्या - निरंतर बढ़ती जनसंख्या, वाहन संख्या और जन सुरक्षा। 
05. ध्वनि प्रदूषण : कारण और निवारण।
06.धूम्र प्रदूषण : स्वास्थ्य समस्या और समाधान। 
07. अतिक्रमण की प्रवृत्ति : तकनीकी समस्याएँ और विधिक प्रावधान। 
08. वायु प्रदूषण, स्वास्थ्य समस्याएँ और उपचार।  
09. बढ़ता व्यवसायीकरण : नागरिक जीवन पर दुष्प्रभाव और निदान। 
10. पेय जल व्यवस्था : गिरता भूमि जल स्तर, बढ़ती आवश्यकता, अपव्यय। 
11. वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत और नगर विकास। 
12. उद्यानिकी, पादप रोग और उपचार। 
13. नगरीय यातायात : समस्या और समाधान। 
14. नगरों में औद्योगिक ईकाइयाँ, प्रदूषण और निवारण।           
15. नगरों पर बढ़ता जनसंख्या दबाव और विकास योजनाएँ। 
16. सार्वजनिक मल निकास प्रणाली : समस्याएँ और समाधान। 
17. नगरों में विद्युत् तथा वैकल्पिक प्रकाश व्यवस्था।
18. नगरों में नव निर्माण : नियम, प्रतिबंध, आवश्यकता में समन्वय। 
19. दूरसंचार व्यवस्था : समस्याएँ और समाधान। 
20. नगर नियोजन हुए विकास : हमारी विरासत। 

Proposals to be sent (a) 6 months prior to the proposed dates of National Convention, (b) 3 months prior to the proposed dates of
All India Seminar and (c) 1 months prior to the proposed dates of One Day Workshop/Seminar.
Grant available for (a) National Convention: Rs 1,50,000/-, (b) All India Seminar: Maxm. Rs.30,000/-, (c) One Day
Workshop/Seminar: Rs.10,000/-
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सोमवार, 24 फ़रवरी 2020

भाषा, काव्य और छंद २

                     -: विश्व वाणी हिंदी संस्थान - समन्वय प्रकाशन अभियान जबलपुर :- 
               ll हिंदी आटा माढ़िए, उर्दू मोयन डाल l 'सलिल' संस्कृत सान दे, पूड़ी बने कमाल ll  
        ll जन्म ब्याह राखी तिलक, गृह प्रवेश त्यौहार l  'सलिल' बचा पौधे लगा, दें पुस्तक उपहार ll
*
लेख: २ 
भाषा, काव्य और छंद 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल
*
[लेखमाला की पहली श्रृंखला में भाषा, व्याकरण, वर्ण, व्यंजन, शब्द, रस, भाव, अनुभूति, लय, छंद, शब्द योजना, तुक, अलंकार, मात्रा गणना नियमादि की प्राथमिक जानकारी के पश्चात् ख्यात छन्दशास्त्री साहित्यकार अभियंता आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' से प्राप्त करते हैं कुछ और जानकारियां - संपादक]

दग्ध अक्षर
डॉ. सतीश चंद्र सक्सेना 'शून्य' ग्वालियर - दग्ध अक्षर पर चर्चा छूट गई है।

पिंगल शास्त्र के पुराने नियमों के अनुसार १९ अक्षरों (ट, ठ, ढ, ण, प, फ, ब, भ, म, ङ्, ञ, त, थ, झ, र, ल व्, ष, ह) को  दग्धाक्षर मानते हुए इनसे काव्य पंक्तियों का प्रयोग निषिद्ध किया गया था। कालांतर में इन्हें घटाकर ५ अक्षरों (झ, ह, र, भ, ष) को दग्धाक्षर कहकर काव्य पंक्ति के आरम्भ रखा जाना वर्जित किया गया है। 

दीजो भूल न छंद के, आदि झ ह र भ ष कोइ। 
दग्धाक्षर के दोष तें, छंद दोष युत होइ।।

मंगल सूचक अथवा देवतावाचक शब्द में इनका प्रयोग हो तो दोष परिहार हो जाता है। 

देश, काल, परिस्थिति के अनुसार भाषा बदलती है। पानी और बानी बदलने की लोकोक्ति सब जानते हैं। व्याकरण और पिंगल के नियम भी निरंतर बदल रहे हैं।  आधुनिक समय में दग्धाक्षर की मान्यता के मूल में कोई तार्किक कारण नहीं है। १९ से घटकर ५ रह जाना ही संकेत करता है की भविष्य में इन्हें समाप्त होना है। 
वर्ण 
गिरेन्द्र सिंह भदौरिया 'प्राण' - आपके अनुसार हम वर्ण को अजर, अमर और अक्षर मानते हैं तो कहना चाहता हूँ कि वर्ण का आशय तो आकार, जाति, नस्ल, रू,प रंग, संकेत आदि से है। ये सब परिवर्तनशील व मरणधर्मा हैं। फिर ये अजर अक्षर अमर कैसे हो सकते हैं ? हाँ ध्वनि निश्चित ही अक्षर है। उसका संकेत कदापि अक्षर नहीं हो सकता । वह तो अरक्ष या वर्ण ही होगा।

वर्ण / अक्षर :
वर्ण के दो प्रकार स्वर (वोवेल्स) तथा व्यंजन (कोंसोनेंट्स) हैं।
अजर अमर अक्षर अजित, ध्वनि कहलाती वर्ण।
स्वर-व्यंजन दो रूप बिन, हो अभिव्यक्ति विवर्ण।।

आदरणीय कृपया ध्यान दें - अजर अमर अक्षर अजित, ध्वनि - कहलाती वर्ण। चरों विशेषण ध्वनि को दिए गए हैं जिसे चिन्ह विशेष द्वारा अंकित किये जाने पर उसे वर्ण कहा जाता है। ध्वनि के मूल रूप को लिपिबद्ध करने पर उसे संस्कृत और हिंदी में अक्षर या वर्ण कहा गया है। लिपि का आरम्भ होते समय ज्ञान की अन्य शाखाएँ नहीं थीं। युगों बाद समाजशास्त्र में समाज की ईकाई व्यक्ति के मूल उसके गुण या योग्यता जिससे आजीविका मिलती है, को वर्ण कहा गया। सामान्यतः वर्ण अर्थात् व्यक्ति का गुण, ज्ञान, या योग्यता उससे छीनी नहीं जा सकती इसलिए व्यक्ति के जीवनकाल तक स्थाई या अमर है। 
लिंग 
अरुण शर्मा - गुरु जी नमन। इस क्रम को आगे बढाते हुए लिंग पर भी विस्तृत जानकारी प्रदान करें सादर।

संस्कृत शब्द 'लिंग' का अर्थ निशान या पहचान है। लिंग से  जातक की जाति पहचानी जाती है की वह स्त्री है या पुरुष। हिन्दी भाषा में संज्ञा शब्दों के लिंग के अनुसार उनके विशेषणों तथा क्रियाओं का रूप निर्धारित होता है। इस दृष्टि से भाषा के शुद्ध प्रयोग के लिए संज्ञा शब्दों के लिंग-ज्ञान होना आवश्यक। हिंदी में दो लिंग पुल्लिंग तथा स्त्रीलिंग हैं। संस्कृत में ३ लिंग पुल्लिंग, स्त्रीलिंग तथा नपुंसकलिंग हैं। अंग्रेजी में ४ लिंग पुल्लिंग (मैस्क्युलाइन जेंडर), स्त्रीलिंग (फेमिनाइन जेंडर), नपुंसक लिंग (न्यूट्रल जेंडर) तथा उभय लिंग (कॉमन जेंडर) हैं।
पुल्लिंग 
वे संज्ञा या सर्वनाम शब्द जिनसे पुरुष होने का बोध होता है पुल्लिंग शब्द हैं। पुल्लिंग शब्दों का अंत बहुधा अ अथवा आ से होता है। सामान्यत: पेड़ (अनार, केला, चीकू, देवदार, पपीता, शीशम, सागौन आदि अपवाद नीम, बिही, इमली आदि), धातु (सोना, तांबा, सोना, लोहा अपवाद पीतल अपवाद चाँदी, पीतल, राँगा, गिलट आदि), द्रव (पानी, शर्बत, पनहा, तेल, दूध, दही, घी, शहद, पेट्रोल आदि अपवाद लस्सी, चाय, कॉफी आदि), गृह (सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि ), अनाज (गेहूं, चाँवल, चना, बाजरा, जौ, मक्का, अपवाद धान, कोदो, कुटकी), सागर (प्रशांत, हिन्द महासागर आदि अपवाद बंगाल की खाड़ी, खंभात की खाड़ी आदि), पर्वत (विंध्याचल, सतपुड़ा, हिमालय, कैलाश आदि), प्राणीवाचक शब्द (इंसान, मनुष्य, व्यक्ति, पशु, गो धन, सुर, असुर, वानर, साधु, शैतान अपवाद पक्षी, चिड़िया, कोयल, गौरैया आदि), देश (भारत, अमरीका, जापान, श्रीलंका आदि अपवाद इटली,जर्मनी आदि), माह (चैत्र, श्रावण, माघ, फागुन, मार्च, अप्रैल, जून, अगस्त आदि), दिन (सोमवार, मंगलवार, बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार, शनिवार, रविवार), समय (युग, वर्ष, साल, दिन, घंटा, मिनिट, सेकेण्ड, निमिष, पल आदि अपवाद घड़ी, ), अक्षर (अ, आ, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अ: अपवाद इ, ई ) 
 स्त्रीलिंग 
वे संज्ञा या सर्वनाम शब्द जो स्त्री होने का बोध कराएँ, उन्हें स्त्रीलिंग शब्द कहते हैं। स्त्रीलिंग शब्दों का अंत बहुधा इ या ई से होता है। सामान्यत: आहार (रोटी, दाल, कढ़ी, सब्जी, साग, पूड़ी, खीर, पकौड़ी, कचौड़ी, बड़ी, गजक आदि अपवाद पान, पापड़ आदि), पुस्तक ( रामायण, भगवद्गीता, रामचरित मानस, बाइबिल, कुरान, गीतांजलि आदि अपवाद वेद, पुराण, उपनिषद, सत्यर्थप्रकाश, गुरुग्रंथ साहिब), तिथि (प्रथमा, द्वितीया, प्रदोष, त्रयोदशी, अमावस्या, पूर्णिमा आदि), राशि (कर्क, मीन, तुला, सिंह, कुम्भ, मेष आदि), समूहवाचक शब्द (भीड़,सेना, सभा, कक्षा, समिति अपवाद हुजूम,दल, जमघट आदि), बोलियाँ (संस्कृत, पाली, प्राकृत, अपभृंश, हिंदी, बांगला, तमिल, असमिया, अंग्रेजी, रुसी, बुंदेली आदि), नदी (नर्मदा, गंगा, कावेरी, ब्रह्मपुत्र, सिंधु, वोल्गा, टेम्स आदि), मसाले (हल्दी, मिर्ची, लौंग, सौंफ, आजवाइन, अपवाद धनिया, जीरा आदि), वस्त्र (धोती, साड़ी, सलवार, टाई, शमीज, जाँघिया, बनियाइन, चोली  आदि अपवाद कोट, कुरता, पेंट, पायजामा, ब्लाउज आदि ), आभूषण (चूड़ी, पायल, बिछिया, बिंदिया, अंगूठी, नथ, करधनी अपवाद कंगन, बेंदा आदि)। 
अपवादों को छोड़ दें तो आकार में छोटी, स्त्रियों द्वारा प्रयोग की जानेवाली, कोमल, अथवा परावलंबी वस्तुएँ स्त्रीलिंग हैं जबकि अपेक्षाकृत बड़ी, पुरुषों द्वारा प्रयोग की जानेवाली, कठोर अथवा स्वावलंबी वस्तुतं पुल्लिंग हैं। सबसे बड़ा अपवाद 'मूँछ' है जो पौरुष का प्रतीक होते हुए भी स्त्रीलिंग है और घूँघट अथवा पर्दा स्त्रियों से सम्बद्ध होने के बाद भी पुल्लिंग है।  
लिंग परिवर्तन  
१. 'ई' प्रत्यय जोड़कर - देव - देवी, नर - नारी, जीजा - जीजी, दास - दासी, वानर - वानरी आदि। नाना - नानी, दादा - दादी, चाचा - चाची, मामा - मामी, मौसा - मौसी, लड़का - लड़की, मोड़ा - मोड़ी, लल्ला - लल्ली, पल्ला - पल्ली, निठल्ला - निठल्ली, काका - काकी, साला - साली, नाला - नाली, घोड़ा - घोड़ी, बकरा - बकरी, लकड़ा - लकड़ी, लट्ठा - लट्ठी आदि। 
२.  'इया' प्रत्यय जोड़कर -  बूढ़ा - बुढ़िया, खाट - खटिया, बंदर - बंदरिया, लोटा - लुटिया, बट्टा - बटिया आदि।  
३. 'इका' प्रत्यय जोड़कर -  बालक - बालिका, पालक - पालिका, चालक - चालिका, पाठक - पाठिका, संपादक - संपादिका, पत्र - पत्रिका। 
४. 'आनी' प्रत्यय जोड़कर - ठाकुर - ठकुरानी, सेठ - सेठानी, देवर - देवरानी, इंद्र - इंद्राणी, नौकर - नौकरानी,  मेहतर - मेहतरानी।  
५. 'आइन' प्रत्यय जोड़कर - गुरु - गुरुआइन, पंडित - पंडिताइन, चौधरी - चौधराइन, बाबू - बबुआइन, बनिया - बनियाइन, साहू - सहुआइन, साहब - सहबाइन आदि।
६. 'इन' प्रत्यय जोड़कर - माली - मालिन, लुहार - लुहारिन, कुम्हार - कुम्हारिन, दर्जी  - दर्जिन, सुनार सुनारिन, मजदूर - मजदूरिन, हलवाई - हलवाइन, चौकीदार - चौकीदारिन, चमार - चमारिन, धोबी - धोबिन, बाघ - बाघिन, सांप - साँपिन, नाग - नागिन। 
७. 'नी' प्रत्यय जोड़ कर - डॉक्टर - डॉक्टरनी, मास्टर - मास्टरनी, अफसर - अफसरनी, कलेक्टर - कलेक्टरनी, आदि।   
८. 'ता' के स्थान पर 'त्री' का प्रयोग कर - धाता - धात्री, वक्ता - वक्त्री, रचयिता - रचयित्री, नेता - नेत्री, अभिनेता - अभिनेत्री,  विधाता - विधात्री, कवि - कवयित्री।   
९. 'नई' प्रत्यय का प्रयोग कर -  हाथी - हथिनी, शेर - शेरनी, चाँद - चाँदनी, सिंह - सिंहनी, मोर - मोरनी, चोर - चोरनी, हंस - हंसनी, भील - भीलनी, ऊँट - ऊँटनी।  
१०. 'इनी' प्रत्यय का प्रयोग कर - मनस्वी - मनस्विनी, तपस्वी - तपस्विनी, सुहास - सुहासिनी, सुभाष - सुभाषिणी / सुभाषिनी, अभिमान अभिमानिनी, मान - मानिनी, नट - नटिनी, आदि। 
११. 'ति' / 'ती' प्रत्यय का प्रयोग कर -  भगवान - भगवती, श्रीमान - श्रीमती, पुत्रवान - पुत्रवती, आयुष्मान - आयुष्मति, बुद्धिमान - बुद्धिमति, चरित्रवान - चरित्रवती आदि। 
१२. 'आ' प्रत्यय जोड़कर - प्रिय - प्रिय, सुत - सुता, तनुज - तनुजा, तनय - तनया, पुष्प - पुष्पा, श्याम - श्यामा, आत्मज - आत्मजा, भेड़ - भेड़ा, चंचल - चंचला, पूज्य - पूज्या, भैंस - भैंसा आदि। 
१३. कोई नियम नहीं -  भाई - बहिन, सम्राट - साम्राज्ञी, बेटा - बहू, पति - पत्नी, पिता - माता, पुरुष  - स्त्री, बिल्ली - बिलौटा, वर - वधु, मर्द - औरत, राजा - रानी, बुआ  - फूफा, बैल - गाय आदि।  
१४. कोई परिवर्तन नहीं - किन्नर, हिजड़ा, श्रमिक, किसान, इंसान, व्यक्ति, विद्यार्थी, शिक्षार्थी, लाभार्थी, रसोइया आदि। 
आध्यात्म, धर्म और विज्ञान तीनों सृष्टि की उत्पत्ति नाद अथवा ध्वनि से मानते हैं। सदियों पूर्व वैदिक ऋषियों ने ॐ से सृष्टि की उत्पत्ति बताई, अब विज्ञान नवीनतम खोज के अनुसार सूर्य से नि:सृत ध्वनि तरंगों का रेखांकन कर उसे ॐ के आकार का पा रहे हैं। ऋषि परंपरा ने इस सत्य की प्रतीति कर सर्व ​सामान्य को बताया कि धार्मिक अनुष्ठानों में ध्वनि पर आधारित मंत्रपाठ या जप ॐ से आरम्भ हुए समाप्त करने पर ही फलता है। यह ॐ परब्रम्ह है, जिसका अंश हर जीव में जीवात्मा के रूप में है। नव जन्मे जातक की रुदन-ध्वनि बताती है कि नया प्राणी आ गया है जो आजीवन अपने सुख-दुःख की अभिव्यक्ति ध्वनि के माध्यम से करेगा। आदि मानव वर्तमान में प्रचलित भाषाओँ तथा लिपियों से अपरिचित था। प्राकृतिक घटनाओं तथा पशु-पक्षियों के माध्यम से सुनी ध्वनियों ने उसमें हर्ष, भय, शोक आदि भावों का संचार किया। शांत सलिल-प्रवाह की कलकल, कोयल की कूक, पंछियों की चहचहाहट, शांत समीरण, धीमी जलवृष्टि आदि ने सुख तथा मेघ व तङित्पात की गड़गड़ाहट, शेर आदि की गर्जना, तूफानी हवाओं व मूसलाधार वर्ष के स्वर ने उसमें भय का संचार किया। इन ध्वनियों को स्मृति में संचित कर, उनका दोहराव कर उसने अपने साथियों तक अपनी​ ​अनुभूतियाँ सम्प्रेषित कीं। यही आदिम भाषा का जन्म था। वर्षों पूर्व पकड़ा गया भेड़िया बालक भी ऐसी ही ध्वनियों से शांत, भयभीत, क्रोधित होता देखा गया था।
कालांतर में सभ्यता के बढ़ते चरणों के साथ करोड़ों वर्षों में ध्वनियों को सुनने-समझने, व्यक्त करने का कोष संपन्न होता गया। विविध भौगोलिक कारणों से मनुष्य समूह पृथ्वी के विभिन्न भागों में गये और उनमें अलग-अलग ध्वनि संकेत विकसित और प्रचलित हुए जिनसे विविध भाषाओँ तथा बोलिओं का विकास हुआ। सुनने-कहने की यह परंपरा ही श्रुति-स्मृति के रूप में सहस्त्रों वर्षों तक भारत में फली-फूली। भारत में मानव कंठ में ध्वनि के उच्चारण स्थानों की पहचान कर उनसे उच्चरित हो सकनेवाली ध्वनियों को वर्गीकृत कर शुद्ध ध्वनि पर विशेष ध्यान दिया गया। इन्हें हम स्वर के तीन वर्ग हृस्व, दीर्घ व् संयुक्त तथा व्यंजन के ६ वर्गों क वर्ग, च वर्ग, ट वर्ग, त वर्ग, प वर्ग, य वर्ग आदि के रूप में जानते हैं। अब समस्या इस मौखिक ज्ञान को सुरक्षित रखने की थी ताकि पीढ़ी दर पीढ़ी उसे सही तरीके से पढ़ा-सुना तथा सही अर्थों में समझा-समझाया जा सके। निराकार ध्वनियों का आकार या चित्र नहीं था, जिस शक्ति के माध्यम से इन ध्वनियों के लिये अलग-अलग संकेत मिले उसे आकार या चित्र से परे मानते हुए चित्र​ ​गुप्त संज्ञा दी जाकर ॐ से अभिव्यक्त कर ध्वन्यांकन के अपरिहार्य उपादानों असि-मसि तथा लिपि का अधिष्ठाता कहा गया। इसीलिए वैदिक काल से मुग़ल काल तक धर्म ग्रंथों में चित्रगुप्त का उल्लेख होने पर भी उनका कोई मंदिर, पुराण, उपनिषद, व्रत, कथा, चालीसा, त्यौहार आदि नहीं बनाये गये।
निराकार का साकार होना, अव्यक्त का व्यक्त होना, ध्वनि का लिपि, लेखनी, शिलापट के माध्यम से ​स्थायित्व पाना और सर्व साधारण तक पहुँचना मानव सभ्यता ​का ​सर्वाधिक महत्वपूर्ण चरण है। किसी भी नयी पद्धति का परंपरावादियों द्वारा विरोध किया ही जाता है। लिपि द्वारा ज्ञान को संचित करने का विरोध हुआ ही होगा और तब ऐसी-मसि-लिपि के अधिष्ठाता को कर्म देवता कहकर विरोध का शमन किया गया। लिपि का विरोध अर्थात अंत समय में पाप-पुण्य का ले​खा रखनेवाले का विरोध कौन करता? आरम्भ में वनस्पतियों की टहनियों को पैना कर वनस्पतियों के रस में डुबाकर शिलाओं पर संकेत अंकित-चित्रित किये गये। ये शैल-चित्र तत्कालीन मनुष्य की शिकारादि क्रियाओं, पशु-पक्षी​, सहचरों ​आदि ​से संबंधित हैं। इनमें प्रयुक्त संकेत क्रमश: रुढ़, सर्वमान्य और सर्वज्ञात हुए। इस प्रकार भाषा के लिखित रूप लिपि (स्क्रिप्ट) का उद्भव हुआ। लिप्यांकन में प्रवीणता प्राप्त कायस्थ वर्ग को समाज, शासन तथा प्रशासन में सर्वोच्च स्थान सहस्त्रों वर्षों तक प्राप्त ​होता रहा जबकि ब्राम्हण वर्ग शिक्षा प्रदाय हेतु जिम्मेदार था। ध्वनि के उच्चारण तथा अंकन का ​शास्त्र विकसित होने से शब्द-भंडार का समृद्ध होना, शब्दों से भावों की अभिव्यक्ति कर सकना तथा इसके समानांतर लिपि का विकास होने से ज्ञान का आदान-प्रदान, नव शोध और सकल मानव जीवन व संस्कृति का विकास संभव हो सका।
रोचक तथ्य यह भी है कि मौसम, पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों, तथा वनस्पति ने भी भाषा और लिपि के विकास में योगदान किया। जिस अंचल में पत्तों से भोजपत्र और टहनियों या पक्षियों के पंखों कलम बनायीं जा सकी वहाँ मुड्ढे (अक्षर पर आड़ी रेखा) युक्त लिपि विकसित हुई जबकि जहाँ ताड़पत्र पर लिखा जाता था वहाँ मुड्ढा खींचने पर उसके चिर जाने के कारण बिना मुड्ढे वाली लिपियाँ विकसित हुईं। क्रमश: उत्तर व दक्षिण भारत में इस तरह की लिपियों का अस्तित्व आज भी है। मुड्ढे हीन लिपियों के अनेक प्रकार कागज़ और कलम की किस्म तथा लिखनेवालों की अँगुलियों क्षमता के आधार पर बने। जिन क्षेत्रों के निवासी वृत्ताकार बनाने में निपुण थे वहाँ की लिपियाँ तेलुगु, कन्नड़ , बांग्ला, उड़िया आदि की तरह हैं जिनके अक्षर किसी बच्चे को जलेबी-इमरती की तरह लग सकते हैं। यहाँ बनायी जानेवाली अल्पना, रंगोली, चौक आदि में भी गोलाकृतियाँ अधिक हैं। यहाँ के बर्तन थाली, परात, कटोरी, तवा, बटलोई आदि और खाद्य रोटी, पूड़ी, डोसा, इडली, रसगुल्ला आदि भी वृत्त या गोल आकार के हैं। बर्फ, ठंड और नमी वाले अंचलों में विपरीत पर्यावरणीय परिस्थितियों के कारण हाथों की अंगुलिया कड़ी हो गईं, वहाँ के निवासी वृत्ताकार बनाने में असुविधा अनुभव करते थे। वहाँ सीधी-छोटी रेखाओं और बिंदुओं का समायोजन कर रोमन लिपि का विकास हुआ। रेगिस्तानों में पत्तों का उपचार कर उन पर लिखने की मजबूरी थी इसलिए छोटी-छोटी रेखाओं से निर्मित अरबी, फ़ारसी जैसी लिपियाँ विकसित हुईं। चित्र अंकन करने की रुचि ने चित्रात्मक लिपि​यों​ के विकास का पथ प्रशस्त किया। इसी तरह ​ वातावरण तथा ​खान-पान के कारण विविध अंचल के निवासियों में विविध ध्वनियों के उच्चारण की क्षमता भी अलग-अलग होने से वहाँ विकसित भाषाओँ में वैसी ध्वनियुक्त शब्द बने। जिन अंचलों में जीवन संघर्ष कड़ा था वहाँ की भाषाओँ में कठोर ध्वनियाँ अधिक हैं, जबकि अपेक्षाकृत शांत और सरल जीवन वाले क्षेत्रों की भाषाओँ में कोमल ध्वनियाँ अधिक हैं। यह अंतर हरयाणवी, राजस्थानी, काठियावाड़ी और बांग्ला, बृज, अव​धी भाषाओँ में अनुभव किया जा सकता है।
सार यह कि भाषा और लिपि के विकास में ध्वनि का योगदान सर्वाधिक है। भावनाओं और अनुभूतियों को व्यक्त करने में सक्षम मानव ने गद्य और पद्य दो शैलियों का विकास किया। इसका उत्स पशु-पक्षियों और प्रकृति से प्राप्त ध्वनियाँ ही बनीं। अलग-अलग रुक-रुक कर हुई ध्वनियों ने गद्य विधा को जन्म दिया जबकि नदी के कलकल प्रवाह या निरंतर कूकती कोयल की सी ध्वनियों से पद्य का जन्म हुआ। पद्य के सतत विकास ने गीति काव्य का रूप लिया जिसे गाया जा सके। गीतिकाव्य के मूल तत्व ध्वनियों का नियमित अंतराल पर दुहराव, बीच-बीच में ठहराव और किसी अन्य ध्वनि खंड के प्रवेश से हुआ। किसी नदी तट के किनारे कलकल प्रवाह के साथ निरंतर कूकती कोयल को सुनें तो एक ध्वनि आदि से अंत तक, दूसरी के बीच-बीच में प्रवेश से गीत के मुखड़े और अँतरे की प्रतीति होगी। मैथुनरत क्रौंच युगल में से ​व्याध द्वारा ​​नर का ​वध, मादा का आर्तनाद और आदिकवि वाल्मिकी के मुख से प्रथम कविता का प्रागट्य इसी सत्य की पुष्टि करता है​​। ​हो इस प्रसंग से प्रेरित होकर​​ ​हिरण शावक के वध के पश्चात अश्रुपात करती हिरणी के रोदन से ग़ज़ल की उत्पत्ति ​जैसी मान्यताएँ गीति काव्य की उत्पत्ति में प्रकृति​-पर्यावरण का योगदान इंगित करते हैं​।
व्याकरण और पिंगल का विकास-
भारत में गुरुकुल परम्परा में साहित्य की सारस्वत आराधना का जैसा वातावरण रहा वैसा अन्यत्र कहीं नहीं रह सका​​।​​ इसलिये भारत में हर मनुष्य हेतु आवश्यक सोलह संस्कारों में अक्षरारम्भ को विशेष महत्त्व प्राप्त हुआ। भारत में विश्व की पहली कविता का जन्म ही नहीं हुआ पाणिनि व पिंगल ने विश्व के सर्वाधिक व्यवस्थित, विस्तृत और समृद्ध व्याकरण और पिंगल शास्त्रों का सृजन किया जिनका कमोबेश अनुकरण और प्रयोग विश्व की अधिकांश भाषाओँ में हुआ। जिस तरह व्याकरण के अंतर्गत स्वर-व्यंजन का अध्ययन ध्वनि विज्ञान के आधारभूत तत्वों के आधार पर हुआ वैसे ही ​ छंद शास्त्र के अंतर्गत छंदों का निर्माण ध्वनि खण्डों की आवृत्तिकाल के आधार पर हुआ। पिंगल ने लय या गीतात्मकता के दो मूल तत्वों गति-यति को पहचान कर उनके मध्य प्रयुक्त की जा रही लघु-दीर्घ ध्वनियों को वर्ण या अक्षर ​मात्रा ​के माध्यम से पहचाना तथा उन्हें क्रमश: १-२ मात्रा भार देकर उनके उच्चारण काल की गणना बिना किसी यंत्र या विधि न विशेष का प्रयोग किये संभव बना दी। ध्वनि खंड विशेष के प्रयोग और आवृत्ति के आधार पर छंद पहचाने गये। छंद में प्रयुक्त वर्ण तथा मात्रा के आधार पर छंद के दो वर्ग वर्णिक तथा मात्रिक बनाये गये। मात्रिक छंदों के अध्ययन को सरल करने के लिये ८ लयखंड (गण) प्रयोग में लाये गये सहज बनाने के लिए एक सूत्र 'यमाताराजभानसलगा' बनाया गया।
गीति काव्य में छंद-
गणित के समुच्चय सिद्धांत (सेट थ्योरी) तथा क्रमचय और समुच्चय (परमुटेशन-कॉम्बिनेशन) का प्रयोग कर दोनों वर्गों में छंदों की संख्या का निर्धारण किया गया। वर्ण तथा मात्रा संख्या के आधार पर छंदों का नामकरण गणितीय आधार पर किया गया। मात्रिक छंद के लगभग एक करोड़ तथा वर्णिक छंदों के लगभग डेढ़ करोड़ प्रकार गणितीय आधार पर ही बताये गये हैं। इसका परोक्षार्थ यह है कि वर्णों या मात्राओं का उपयोग कर जब भी कुछ कहा जाता है वह किसी न किसी ज्ञात या अज्ञात छंद का छोटा-बड़ा अंश होता है। इसे इस तरह समझें कि जब भी कुछ कहा जाता है वह अक्षर होता है। संस्कृत के अतिरिक्त विश्व की किसी अन्य भाषा में गीति काव्य का इतना विशद और व्यवस्थित अध्ययन नहीं हो सका। संस्कृत से यह विरासत हिंदी को प्राप्त हुई तथा संस्कृत से कुछ अंश अरबी, फ़ारसी, अंग्रेजी , चीनी, जापानी आदि तक भी गया। यह अलग बात है कि व्यावहारिक दृष्टि से हिंदी में भी वर्णिक और मात्रिक दोनों वर्गों के लगभग पच्चीस-तीस छंद ही मुख्यतः: प्रयोग हो रहे हैं। रचनाओं के गेय और अगेय वर्गों का अंतर लय होने और न होने पर ही है। गद्य गीत और अगीत ऐसे वर्ग हैं जो दोनों वर्गों की सीमा रेखा पर हैं अर्थात जिनमें भाषिक प्रवाह यत्किंचित गेयता की प्रतीति कराता है। यह निर्विवाद है कि समस्त गीति काव्य ऋचा, मन्त्र, श्लोक, लोक गीत, भजन, आरती आदि किसी भी देश रची गयी हों छंदाधारित है। यह हो सकता है कि उस छंद से अपरिचय, छंद के आंशिक प्रयोग अथवा एकाधिक छंदों के मिश्रण के कारण छंद की पहचान न की जा सके।
वैदिक साहित्य में ऋग्वेद एवं सामवेद की ऋचाएँ गीत का आदि रूप हैं। गीत की दो अनिवार्य शर्तें विशिष्ट सांगीतिक लय तथा आरोह-अवरोह अथवा गायन शैली हैं। कालांतर में 'लय' के निर्वहन हेतु छंद विधान और अंत्यानुप्रास (तुकांत-पदांत) का अनुपालन संस्कृत काव्य की वार्णिक छंद परंपरा तक किया जाता रहा। संस्कृत काव्य के समान्तर प्राकृत, अपभ्रंश आदि में भी 'लय' का महत्व यथावत रहा। सधुक्कड़ी में शब्दों के सामान्य रूप का विरूपण सहज स्वीकार्य हुआ किन्तु 'लय' का नहीं। शब्दों के रूप विरूपण और प्रचलित से हटकर भिन्नार्थ में प्रयोग करने पर कबीर को आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने 'भाषा का डिक्टेटर' कहा।
अंग्रेजों और अंगरेजी के आगमन और प्रभुत्व-स्थापन की प्रतिक्रिया स्वरूप सामान्य जन अंग्रेजी साहित्य से जुड़ नहीं सका और स्थानीय देशज साहित्य की सृजन धारा क्रमशः खड़ी हिंदी का बाना धारण करती गयी जिसकी शैलियाँ उससे अधिक पुरानी होते हुए भी उससे जुड़ती गयीं। छंद, तुकांत और लय आधृत काव्य रचनाएँ और महाकाव्य लोक में प्रतिष्ठित और लोकप्रिय हुए। आल्हा, रासो, राई, कजरी, होरी, कबीर आदि गीत रूपों में लय तथा तुकांत-पदांत सहज साध्य रहे। यह अवश्य हुआ कि सीमित शिक्षा तथा शब्द-भण्डार के कारण शब्दों के संकुचन या दीर्घता से लय बनाये रखा गया या शब्दों के देशज भदेसी रूप का व्यवहार किया गया। विविध छंद प्रकारों यथा छप्पय, घनाक्षरी, सवैया आदि में यह समन्वय सहज दृष्टव्य है।खड़ी हिंदी जैसे-जैसे वर्तमान रूप में आती गयी शिक्षा के प्रचार-प्रसार के साथ कवियों में छंद-शुद्धता के समर्थन या विरोध की प्रवृत्ति बढ़ी जो पारम्परिक और प्रगतिवादी दो खेमों में बँट गयी।
छंदमुक्तता और छंद हीनता-
लम्बे काल खंड के पश्चात हिंदी पिंगल को महाप्राण निराला ने कालजयी अवदान छंदमुक्त गीति रचनाओं के रूप में दिया। उत्तर भारत के लोककाव्य व संगीत तथा रवींद्र संगीत में असाधारण पैठ के कारण निराला की छंद पर पकड़ समय से आगे की थी। उनकी प्रयोगधर्मिता ने पारम्परिक छंदों के स्थान पर सांगीतिक राग-ताल को वरीयता देते हुए जो रचनाएँ उन्हें प्रस्तुत कीं उन्हें भ्रम-वश छंद विहीन समझ लिया गया, जबकि उनकी गेयता ही इस बात का प्रमाण है कि उनमें लय अर्थात छंद अन्तर्निहित है। निराला ने पारम्परिक छंदों के साथ अप्रचलित छंदों का मिश्रण कर अपनी काव्य रचनाओं को अन्यों के लिए गूढ़ बना दिया। निराला की रचनाओं और तथाकथित प्रगतिशील कवियों की रचनाओं के सस्वर पाठ से छंदमुक्तता और छंदहीनता के अंतर को सहज ही समझा जा सकता है।
दूसरी ओर पारम्परिक काव्यधारा के पक्षधर रचनाकार छंदविधान की पूर्ण जानकारी और उस पर अधिकार न होने के कारण उर्दू काव्यरूपों के प्रति आकृष्ट हुए अथवा मात्रिक-वार्णिक छंद के रूढ़ रूपों को साधने के प्रयास में लालित्य, चारुत्व आदि काव्य गुणों को नहीं साध सके। इस खींच-तान और ऊहापोह के वातावरण में हिंदी काव्य विशेषकर गीत 'रस' तथा 'लय' से दूर होकर जिन्दा तो रहा किन्तु जीवनशक्ति गँवा बैठा। निराला के बाद प्रगतिवादी धारा के कवि छंद को कथ्य की सटीक अभिव्यक्ति में बाधक मानते हुए छंदहीनता के पक्षधर हो गये। इनमें से कुछ समर्थ कवि छंद के पारम्परिक ढाँचे को परिवर्तित कर या छोड़कर 'लय' तथा 'रस' आधारित रचनाओं से सार्थक रचना कर्मकार सके किन्तु अधिकांश कविगण नीरस-क्लिष्ट प्रयोगवादी कवितायेँ रचकर जनमानस में काव्य के प्रति वितृष्णा उत्पन्न करने का कारण बने। विश्वविद्यालयों में हिंदी की किताबी शोधोपाधियाँ प्राप्त किन्तु छंद रचना हेतु आवश्यक प्रतिभा व् समझ से हीन प्राध्यापकों का एक नया वर्ग पैदा हो गया जिसने अमरता की चाह में अगीत, प्रगीत, गद्यगीत, अनुगीत, प्रलंब गीत जैसे न जाने कितने प्रयोग किये पर बात नहीं बनी। प्रारंभिक आकर्षण, सत्तासीन राजनेताओं और शिक्षा संस्थानों, पत्रिकाओं और समीक्षकों के समर्थन के बाद भी नयी कविता अपनी नीरसता और जटिलता के कारण जन-मन से दूर होती गयी। गीत के मरने की घोषणा करनेवाले प्रगतिवादी कवि और समीक्षक स्वयं काल के गाल में समा गये पर गीत लोक मानस में न केवल जीवित रहा अपितु सामयिक देश-काल-परिस्थितियों से ताल-मेल बैठाते हुए जनानुभूतियों का प्रवक्ता बन गया। हिंदी छंदों को कालातीत अथवा अप्रासंगिक मानने की मिथ्या अवधारणा पाल रहे रचनाकार जाने-अनजाने में उन्हीं छंदों का प्रयोग बहर का नाम देकर करते हैं।     
    


नवगीत

नवगीत
सुनो शहरियों!
संजीव वर्मा 'सलिल'
*
सुनो शहरियों!
पिघल ग्लेशियर
सागर का जल उठा रहे हैं
जल्दी भागो।

माया नगरी नहीं टिकेगी
विनाश लीला नहीं रुकेगी
कोशिश पार्थ पराजित होगा
श्वास गोपिका पुन: लुटेगी
बुनो शहरियों !
अब मत सपने
खुद से खुद ही ठगा रहे हो
मत अनुरागो

संबंधों के लाक्षागृह में
कब तक खैर मनाओगे रे!
प्रतिबंधों का, अनुबंधों का
कैसे क़र्ज़ चुकाओगे रे!
उठो शहरियों !
बेढब नपने
बना-बना निज श्वास घोंटते
यह लत त्यागो

साँपिन छिप निज बच्चे सेती
झाड़ी हो या पत्थर-रेती
खेत हो रहे खेत सिसकते
इमारतों की होती खेती
धुनो शहरियों !
खुद अपना सिर
निज ख्वाबों का खून करो
सोओ, मत जागो
***
संजीव
१५-११-२०१९

बरनाली'- डाॅ. राजलक्ष्मी शिवहरे, डाॅ.छाया त्रिवेदी

  
दृढ संकल्प, विश्वास और शिक्षा की पर्याय 'बरनाली'- डाॅ.छाया त्रिवेदी
[बरनाली, उपन्यास, प्रथम संस्करण, २० से.मी. x १४ से.मी., आवरण बहुरंगी पेपरबैक, पृष्ठ १०८, मूल्य १००/-, निर्देशिका- डाॅ. राजलक्ष्मी शिवहरे, साहित्य संगम इंदौर]
*   
उपन्यास 'बरनाली' पाठक मन को अंत तक जिज्ञासु बनाये रखने में सक्षम है। २५ लेखिकाओं की अभिनव समन्वित प्रस्तुति ने आदर्श का ऊँचा मापदंड स्थापित किया है । असम्भव कुछ भी नहीं, दृढ़ निश्चय से संहावना एयर सफलता का द्वार खुलता है। मनोविज्ञान कहता है कि दिव्यांगजनों को ईश्वर विशिष्ट शक्ति प्रदान करता है। नायिका 'बरनाली' दिव्यांग होते हुये भी संघर्षो कर डाॅक्टर बन मानव सेवा में लीन हो जाती है। जन्म से विकलांग-दुर्बल बरनाली, सुख-दुख के सागर में थपेड़े खाती, डूबती-उतराती, अपनी जीवन नैया अपने संकल्प व् प्रयास के सहारे पार लगाती है। असम के सौंदर्य, भाषा, संस्कार आदि की संवाहिका बनी २५ लेखिकाएँ साधुवाद की पात्र हैं।
सेवानिवृत्त प्राचार्य, शिक्षा विभाग, सलाहकार हिंदी लेखिका संघ जबलपुर, चलभाष ९४७९६४४९०९
*
अभिनव प्रयोग बरनाली - राजवीर सिंह, अध्यक्ष साहित्य संगम 
*
पहले सोचता था कि उपन्यासकार इतनी लम्बी कथा कैसे लिखता होगा? डॉ. राजलक्ष्मी जी से मिलकर जान सका कि ऐसे मानवों में संवेदनाएं सामान्य से अधिक होती हैं।  एक बैठक में तो इतनी लंबी रचना की नहीं जा सकती। जब समय मिले तब लिखना और कथा की माँग से  तारतम्य बनाये रखते हुए लिखना, वस्तुत: विशेष योग्यता है।  राजलक्ष्मी जी द्वारा निर्देशित हुए २५ लेखिकाओं द्वारा लिखित उपन्यास बरनाली का लेखन वाकई कबीले-तारीफ है। 
*
परगुणग्राही राजलक्ष्मी शिवहरे जी - सूचि संदीप "शुचिता" 
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राज लक्ष्मी जी में मुझे स्नेह और संवेदना से सराबोर बड़ी बहिन की छवि नज़र आती है। एक बार मैंने कहा कि मैं आप जैसी प्रसिद्ध साहित्यकार नहीं हूँ तो उनहोंने तुरंत कहा 'मैं आप की तरह गीताजी का मधुर गायन नहीं कर सकती।' दूसरों की खूबियों को पहचान कर उनकी सराहना करना, मनोबल बढ़ाना कोई उनसे सीखे। वे कम से कम शब्दों में अधिक से अधिक अभिव्यक्त करने में माहिर हैं। उनकी आवाज़ में बच्चों की तरह निश्छलता, है।
*
    

     

नवगीत : शिव - गौरा

नवगीत:
संजीव
.
शिव के मन मांहि
बसी गौरा
.
भाँग भवानी कूट-छान के
मिला दूध में हँस घोला
शिव के मन मांहि
बसी गौरा
.
पेड़ा गटकें, सुना कबीरा
चिलम-धतूरा धर झोला
शिव के मन मांहि
बसी गौरा
.
भसम-गुलाल मलन को मचलें
डगमग डगमग दिल डोला
शिव के मन मांहि
बसी गौरा
.
आग लगाये टेसू मन में
झुलस रहे चुप बम भोला
शिव के मन मांहि
बसी गौरा
.
विरह-आग पे पिचकारी की
पड़ी धार, बुझ गै शोला
शिव के मन मांहि
बसी गौरा
.

व्यंग्य चित्र

व्यंग्य चित्र

मंगलवार, 18 फ़रवरी 2020

शब्द समिधा २१- ४०


  कृति सलिला: 
जीवन के झंझावातों से जूझता "अधूरा मन "
संजीव 
[अधूरा मन, उपन्यास।, प्रथम संस्करण २००९, आकार २२ से.मी. x १४ से.मी., आवरण बहुरंगी, सजिल्द जैकेट सहित, पृष्ठ १७९, मूल्य १५०/-, तिवारी ग्राफिक्स एन्ड पब्लिकेशंस भोपाल]
हिंदी साहित्य की समकालिक सारस्वत कारयित्री प्रतिभाओं में अग्रगण्य डॉ. राजलक्ष्मी शिवहरे रचित औपन्यासिक कृति अधूरा मन जीवन सागर के झंझावातों से निरंतर जूझती उपन्यास नायिका रत्ना की जयकथा है। 
कथाक्रम यह कि वस्त्र व्यवसायी रत्ना दूकान पर दीपक नामक युवक को बिना पूरी जानकारी लिए नौकरी देती है। दीपक अपनी कार्यकुशलता व वाक्चातुर्य से रत्ना के निकट आ जाता है। वह रुग्ण होने पर रत्ना की देखभाल करता है। चिकित्सक से रत्ना को विदित होता है कि दीपक उसके पूर्व प्रेमी प्रदीप का चचेरा भाई और समृद्ध परिवार से है। माता-पिता के न रहने पर रत्ना पिता का व्यवसाय सम्हाल कर छोटी तीन बहिनों में से दो का विवाह करा चुकी है और अब तीसरी बहिन वत्सा के विवाह की चिंता से परेशान है। पूर्व स्मृति
में रत्ना पूर्व अपने पारिवारिक परिचित युवक प्रदीप की मंगेतर थी। सहेली मीरा के सजग करने के बाद भी रत्ना प्रदीप के साथ दैहिक संबंध बनने से रोक नहीं पाती। विवाह पूर्व ही प्रदीप अमेरिका चला जाता है। वह गर्भवती रत्ना को गर्भ गिराने की सलाह देता है, फिर संपर्क भंग हो जाता है। असहमत रत्ना को पिता अपनी परिचिता के पास ले जाकर प्रसव कराते हैं। नवजात शिशु को वहीं छोड़ दोनों लौट आए थे।
पिता के न रहने पर रत्ना ने साहस के साथ वस्त्र व्यवसाय सँभाला जिसे दीपक मंदी से निकालकर कुशलतापूर्वक बढ़ा रहा था। न चाहते हुए भी रत्ना दीपक को अपने निकट आने से रोक नहीं पा रही थी जबकि दीपक को चाहनेवाली अाशा उसे पाने के लिए अंधाधुंध खरीदी कर रही थी। रत्ना अपनी दूकान के कर्मचारियों की समस्याओं का समाधान करती रही। अपर्णा उन्हीं में से एक है जो प्राणप्रण से दूकान को सँभालती और रत्ना को परामर्श देती है। दीपक के आज और प्रदीप के कल के मध्य भटकती रत्ना क्षणे रुष्टा क्षणे तुष्टा की मनस्थिति में डूबती-उतराती अपने बच्चे से मिलने पासी आंटी (उसके पिता की पारसी प्रेमिका जिनसे जाति वैविध्य के कारण विवाह न हो सका और वे आजीवन अविवाहित रहीं।) के पास जाती है। वत्सा के विवाह पर आया छोटा बहनोई द्वारा रत्ना-दीपक के संबंध में लांछन लगाने से दुखी रत्ना को दीपक से ग्यात होता है कि प्रदीप दुर्घटना में पंगु होने के कारण रत्ना के जीवन से निकल गया था। रत्ना प्रदीप से विवाह करने और बेटे को साथ रखने का निर्णय कर दीपक को आशा से विवाह करने के लिए कहती है।
उपन्यास के पात्र आदर्श और यथार्थ के बीच भूल-भुलैंया में फँसे प्रतीत होते हैं। वे कोई एक दिशा ग्राहण नहीं कर पाते। नायिका रत्ना प्रेम प्रसंग में दुर्बल होकर प्रेमी से संबंध बना बैठती है, फिर पुत्र को जन्म देकर भी दूर रखती है। पिता के न रहने पर परिवार को सँभाल कर पिता के कर्तव्य निभाती है पर दीपक के प्रति अनुराग भाव उसके चरित्र की कमजोरी है। दीपक के कथाप्रवेश का उद्देश्य अस्पष्ट है। यदि वह रत्ना की मदद करने आया तो प्रेम पथ पर पग रखना भटकाव है, यदि वह रत्ना से विवाह करने आया तो असफल रहा। रत्ना के पिता पारिवारिक दबाव में अपनी प्रेमिका से विवाह नहीं करते पर जीवन के सबसे बड़ी संकट में उसी की शरण में जाते हैं। रत्ना का बहनोई तथा प्रतिस्पर्धी व्यापारी मिलानी समाज के दुर्बल चेहरे हैं जो मलिनता के पर्याय हैं। अपर्णा की कर्मठता, मीरा का सत्परामर्श पासी आंटी का निस्वार्थ प्रेम अनुकरणीय है।
मनुष्य के जीवन में आदर्श-यथार्थ, सुख-दुख की गंगो-जमुनी धारा सतत प्रवाहित होती है, उपन्यास अधूरा मन के मुख्य पात्र और घटनाएँ यही प्रतिपादित करती हैं। कृतिकार ने चरित्रों और घटनाओं का नियामक नहीं, सहभागी बनकर उन्हें विकसित होने दिया है। इससे कथा शैथिल्य तथा विभ्रम की प्रतीति होती है पर रोचक संवादों व आकस्मिक घटनाओं में पाठक मन बँधा रहता है। डॉ. राजलक्ष्मी शिवहरे वरिष्ठ और समग्र जीवनदृष्टि में विश्वास रखनेवाली लेखिका हैं। वे वैचारिक प्रतिबद्धता, स्त्री-दलित विमर्शादि राजनैतिक दिशाहीन एकांगी लेखन की पक्षधर नहीं हैं। अपने वैयक्तिक जीवन में परोपकार वृत्ति को जी रही लेखिका के पात्र पासी आंटी, मीरा, अपर्णा, रत्ना, प्रदीप, दीपक आदि के क्रिया कलाप बहुधा परोपकार भावना से संचालित होते हैं। सतसाहित्य वही है जो समाज में असत्-अशिव-असुंदर के सरोवर में सत्-शिव-सुंदर कमल पुष्प खिलाते रहे। अधूरा मन इसी दिशा में उठाया गया रचनात्मक कदम है जो समीक्षकों को कम, पाठक को अधिक पसंद आयेगा।
*
(२१)
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कृति सलिला:   
'मणिदीप'  काव्य सलिला में मुक्त - सीप  

[मणिदीप, काव्य संग्रह, प्रथम संस्करण २०१० , आकार २२ से.मी. X १४.५ से.मी., आवरण बहुरंगी सजिल्द जैकेट सहित, पृष्ठ १४४, मूल्य २५० रु., पाथेय प्रकाशन जबलपुर]

मानवीय अनुभूतियों की एकांतिक अभिव्यक्ति का नाम कविता है। उपन्यास और कहानी के क्षेत्र में पताका फहरा चुकने के बाद डॉ. राजलक्ष्मी शिवहरे ने १२४ कविताओं के साथ काव्य के क्षेत्र में प्रवेश किया है। इन कविताओं में कथ्य को शिल्प पर वरीयता दी गयी है। पारम्परिक राष्ट्रीय भावधारा (भारत देश हमारा, आज का भारत), प्रकृति-पर्यावरण विमर्श (मैं नदी हूँ, सूरज, पहाड़ी आज खामोश है, आकाश), विसंगति और विषमता (गाँधी का भारत, ,एक घर बना रहा हूँ, अविश्वास की मिट्टी खोदे, रिश्ते नाज़ुक होते हैं, धुआँ आँख को धुंधवाता है), श्रद्धा सुमन (मानस के तुलसी, नमन पिताश्री, महादेवी की अनंत पथ यात्रा), स्वतंत्र चिंतन (कलाकार की सामर्थ्य, मैं हिंदी हूँ, यादों की बस्ती, शबनम, रंगमंच, सच्ची सार्थकता, निष्काम कर्म, बहूरानी, कविता एक पहेली, छीलो, कर्मपथ, सुनामी और मानव, रिश्ते नाज़ुक होते हैं). माधुर्य प्रधान रचनाएँ (गीत मुझे गुनगुनाने दो, प्यार नहीं हुआ स्वीकार, मेघ बरस जाते हो), करुणा (मेघ तुम किसे खोजते, कुछ लोग रह जाते हैं, सपना मेरा झूठा था, बहुत कुछ कहते हैं लोग, घर चीखता है), बाल कवितायेँ (बेबी गुड़िया तेरी संदर है, टूटे हीरे को तराशना, तुम उऋण हो जाओगे, वह कौन है) मिलकर इस काव्य संकलन को वैचारिक पुष्पों के उद्यान का रूप देती हैं।
वरिष्ठ साहित्यकार-पत्रकार डॉ. राजकुमार सुमित्र के अनुसार "काव्य के स्वरूपों, प्रयोजनों, प्रकारों, यात्राओं और आंदोलनों से परिचित पाठकों ने गद्य में ढलती कविता को देखा, जाना और परखा है। राजलक्ष्मी की कविता साँचे में ढली है किन्तु गुण धर्म और प्रभाव भिन्न है। डॉ. राजलक्ष्मी शिवहरे की कवितायें गद्यात्मक हैं किन्तु वे भाषा की सरलता। सहजता और सम्प्रेषणीयता की शक्ति से संपन्न हैं। ये कवितायेँ पाठकों को भगाती नहीं जगाती हैं। उनके मन को तोड़ती नहीं, जोड़ती हैं। कवयित्री के सामने भी 'क्यों लिखूं?' का प्रश्न उपस्थित हुआ। मन ने उत्तर दिया - "उनके कष्ट अपना लूँ, उनके सुख में हँस लूँ। यह 'उनके' कोई नहीं सामान्य जन है। कवयित्री के लिये साहित्य सृजन नहीं साधना है।"

संकलन की कविताओं को पढ़ते हुए व्यष्टि से समष्टि तक विविध आयामों में वैचारिक यात्रा करते चैतन्य मानस से साक्षात होता है। इन काव्य रचनाओं का वैशिष्ट्य जन सामान्य की तरह सर्व जन हिताय, सर्व जन सुखाय चिंतन-मनन जनित विचारमृत से सराबोर होना है। इनमें कहीं भी कोई वैचारिक प्रतिबद्धता, राजनैतिक पक्षधरता नहीं है। इसलिए ये कविताएँ सही अर्थ में कवितायेँ कही जा सकती हैं। 'कर्म पथ' शीर्षक कविता में में कवयित्री सरमदेव की उपासना करने का संदेश देती है- " तुम अधीर मत हो / श्रम करो निरंतर" । जिंदगी शीर्षक कविता के अनुसार "जिंदगी सहने का नाम है"। वर्तमान यांत्रिक जीवन में उपेक्षित होता 'घर' कवयित्री को विचलित करता है। वह पूछती है "दीवारें बोलती हैं / लेकिन सुनता कौन है? / घर चीखता है / लेकिन सुनता कौन है?"। घर की अनदेखी करता मानव घर के बिना रह भी नहीं पाता- "लोग कहते हैं / पृथ्वी पर मानव / ने जन्म लिया है / तो कुछ कर जाओ / इसलिए एक घर / बनाने की कोशिश कर रहा हूँ"। देश की माटी की सौंधी महक सब विसंगतियों और अभावों को विस्मृत कर, अपने सौभाग्य पर गर्व करने की भावना उत्पन्न करती है- "भारत देश की माटी चंदन / तन-मन से लिपटी है / पानी की बूँदें जब गिरतीं / सोंधी सी महकी हैं।"   
(२२)

*
कृति सलिला:
जीवन में बदलती भूमिकाओं सा 'दूसरा कैनवास'
सुरेंद्र सिंह पवार
[दूसरा केनवास, उपन्यास, प्रथम संस्करण २०१०, पृष्ठ ९६, सजिल्द, बहुरंगी जैकेट सहित, मूल्य-२००रु।, पाथेय प्रकाशन, जबलपुर]
*
‘दूसरा केनवास’ कवियित्री एवं कथा लेखिका डॉ राजलक्ष्मी शिवहरे का तीसरा उपन्यास है। वैसे साहित्य व कला के क्षेत्र में किसी सिध्दांत या अवधारणा की समाज के सन्दर्भ में स्थिति, वैचारिक परिदृश्य को केनवास कहते हैं. परन्तु, उपन्यास-लेखिका ने केनवास का शाब्दिक अर्थ वह सफेद कपडा या पटल लिया है जिस पर उनकी नायिका (सौम्या) चित्र बनाती है, रंग भरती है। हाँ! यह अवश्य है कि उस नायिका के जीवन की परिस्थितियाँ बदलने से भूमिकाएँ बदलती दिखाई गयीं हैं और बदला है, केनवास। तलाक (सम्बन्ध-विच्छेद) के बाद निराश-हताश सौम्या ने परिस्थितियों के अनुसार जब साहस भरा कदम उठाया तभी वह एक सफल जीवन जी सकी। एक तरह से जीवन के अलग-अलग सोपानों से गुजरती आज की स्त्री के अथक संघर्ष और अदम्य साहस की कहानी है यह उपन्यास-गाथा।

यह एक सामाजिक उपन्यास है, जिसमें समाज की चिर-लांछिता, चिर-वंचिता, चिर-वंदनी नारी को नई दीप्त के साथ हमारे सामने प्रस्तुत किया है। इसमें आदर्शोंन्मुखी यथार्थवाद नहीं है, बल्कि स्थान, समय और स्थितियों के अनुरूप जो वातावरण निर्मित हुआ या होता जा रहा है, उसकी खुली चर्चा है। सौम्या और मोहन उपन्यास के केंद्र में हैं परन्तु अन्य पात्र यथा; अमित, डाली, नीलिमा, पीयूष, सौरभ, आंटी और अंकल की भूमिकाएँ भी अप्रासंगिक नहीं हैं। उपन्यास में फ्लेश बैक का प्रभावी-प्रयोग है, बिलकुल बड़े या छोटे परदे पर चलती मसाला फिल्मों या सास-बहू सीरियल्स की तरह। आज के दौर की घटनाओं तथा उसमें जीते-जागते लोगों की पसंद/ नापसंद का पूरा-पूरा ध्यान रखा गया है। सौम्या और अमित का तलाक, डाली से अमित और सौम्या का मोहन से विवाह, कम उम्र के पीयूष की नीलिमा से शादी, अंकल और आंटी के रहस्यमयी सम्बन्ध, अमित की मृत्यु के बाद डाली का अपने विधुर बॉस से पुनर्विवाह, अपाहिज मोहन के प्रति सौम्या का समर्पण सभी कुछ तो है इस उपन्यास में। डॉ. राजलक्ष्मी शिवहरे जागरूक उपन्यासकार हैं। वे न केवल हृदयधर्मी हैं, न बुध्दिविलासी। उन्हें समाज की समस्याओं को हल करने की चिंता है। अपने उपन्यास में उन्होंने परम्परागत मूल्यों को कुछ सीमा तक अस्वीकार किया है, परन्तु जो नये मूल्य उपस्थित किये हैं वे भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। अत: आश्वस्ति है कि ध्वंस से निर्माण की सम्भावनाओं को बल मिलता है---जैसा डॉ राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’ ने प्रस्तावना में लिखा है। कुल मिलाकर इस ९६ पृष्ठीय उपन्यासिका में जीवन दर्शन के सम्बन्ध में निर्व्दंद भाव से तर्क-वितर्क हैं,सौन्दर्य और कला की अपेक्षा उपयोगितावाद के तराजू पर तुलते मानव-मूल्य है।
(२७)
कहानी के अन्दर गुँथी हुई कहानियों से इस लघु-उपन्यास का ताना-बाना रचा गया है, ठीक किस्सागोई की शैली में, जहाँ कहानियाँ कभी ख़त्म नहीं होतीं। हर पात्र की अपनी कहानी है, हर कहानी के अपने ट्विस्ट और टर्न हैं, परन्तु वे सभी नायिका सौम्या के इर्द-गिर्द घूमती है। उपन्यास की भाषा घरेलू है, लम्बे और ऊब भरे संभाषणों का नितान्त अभाव है। पात्र नपे-तुले शब्दों में अपनी बात कहते हैं—सटीक और प्रभावशाली, जैसे -
“और मौसी ने जब मोहन को खाना खिलाया पूरे बारह बज चुके थे. इतना बढ़िया खाना और इतने प्यार से खिलाती हो तभी तुम्हारी बिटिया बार-बार यहाँ चली आती है''।
‘नहीं’, बस इस बार गहरी नजर से उन्होंने मोहन को देखा था’, जब ससुराल में पूरी सुरक्षा नहीं मिलती तभी उसे मायका याद आता है’।”
कुछ नीति/सूत्र वाक्य इतने सुन्दर हैं कि उनमें मन डूब जाता है, यथा-
”कैसा चक्रव्यूह है जीवन, जिसमें व्यक्ति अभिमन्यु जैसा प्रवेश तो कर जाता है पर उससे निकल नहीं पाता।”
“हम कैसे कह दें कि बिटिया मायके में चार दिन ही भली होती है।”
“समय स्वयं एक वैद्य है पर कुछ घाव ऐसे होते हैं जो धीरे-धीरे भर भले जाएँ पर याद आयें तो टीसते अवश्य है।”
“प्रेम में वासना नहीं होती, केवल समर्पण होता है, प्रिय के प्रति।”
“प्रशंसा में क्या होता है कि हर कोई खुश हो जाता है।”
"हँसनेवालों का साथ सभी देते है परन्तु रोना तो अकेले ही पड़ता है।”

उपन्यास-लेखिका एक गृहणी हैं। अपने उपन्यास के कलेवर में उन्होंने अपनी घर-गृहस्थी को विस्तार देने की पुरजोर कोशिश की है। जैसे, ‘अमित को करेले पसंद नहीं, माताजी को घुइंया, पर बनेंगे दोनों’, ‘सब चाँवल एक से नहीं होते, कोई लुचई होता है तो चिन्नौर और कोई बासमती’, ‘माँ जी के सिर में तेल लगाना’, ‘वेणी में गजरा गूंथना’ इत्यादि, इत्यादि। बावजूद इसके, उनकी नायिका क्लब/पार्टियों में जाती है, ऑफिस संचालित करती है, अपनी समस्याओं से उभरकर आगे पढाई करती है, दोबारा केनवास पर ब्रश चलाती है, रंग भरती है। वास्तविक जीवन की सजीवता और विशदता इस उपन्यास की विशेषता है। नायिका के तौर पर सौम्या का चरित्र उत्तम है। मोहन भी ठीक-ठाक है परन्तु पूर्वान्ह में अमित की भूमिका प्रतिनायक की सी दिखाई गई है। मध्यान्तर के बाद अमित का पुन:प्रवेश होता है, उसे अपने कृत्यों पर पछतावा होता है और अंत में सद्गति को प्राप्त होता है। कथानक के क्लाइमेक्स(चरमोत्कर्ष) पर सौम्या अपने बेटे सौरभ के समक्ष रहस्योद्घाटन करती है और उसे बीमार अमित की तीमारदारी के लिए भेजती है। अमित की मृत्यु के बाद सौरभ ही उसका अंतिम-संस्कार करता है। ऐसे सुखान्त का सृजन सिर्फ और सिर्फ श्रीमती शिवहरे जैसी समर्थ और संवेदनशील कथाकारा के लिए ही संभव है।

उपन्यास में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की मानव बम से हत्या और कश्मीर में आतंकवादियों से मुठभेड़ जैसे समाचारों को प्राथमिकता मिली है, जो इस रचनाकाल की प्राथमिक सूचना है। एक बात और, नायिका के चरित्र में अतिरिक्त सहिष्णुता दिखने के चक्कर में उसे कुछ सोशल वर्क करते दिखाया गया है, रामदयाल दम्पत्ति जैसे असहाय लोगों की मदद परन्तु वहाँ वह (सौम्या) अपराधिक प्रकरण में फँसती दिखाई देती है। यह घटनाक्रम “हार की जीत”(सुदर्शन की ख्यात कहानी) के बाबा भारती की सीख का सहज स्मरण करा देता है कि इस घटना का उल्लेख किसी से न करना वर्ना लोग जरूरत मंदों की मदद करना बंद कर देंगे।

प्रिन्टिंग और प्रूफ की गलतियों को अनदेखा किया जाए तो पाथेय प्रकाशन की यह सजिल्द सुंदर आवरण युक्त प्रस्तुति स्वागतेय है। भाषा-विन्यास, संयोजना, पात्रों का चयन, घटनाओं का क्रम, कथानक की कसावट ने इस उपन्यास को स्तरीय और संग्रहणीय बना दिया है। उनके ही पूर्व-प्रकाशित दो उपन्यास क्रमशः “धूनी” और “अधूरा मन” की तरह, या यूँ कहें, इस उपन्यास से उनकी ख्याति तीन गुना हो गई है।
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(२८)
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कृति सलिला:

 लोकोपयोगी संकलन ग्यारहवें रूद्र श्री हनुमान जी - आशा वर्मा 
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[ग्यारहवें रूद्र श्री हनुमान जी, धार्मिक, प्रथम संस्करण २०१०,आकार २२ से.मी. X १४.५ से.मी., आवरण बहुरंगी सजिल्द जैकेट सहित, पृष्ठ ५६, मूल्य १०० रु., पाथेय प्रकाशन जबलपुर]
भारत धर्म प्रधान देश है। अनेकता में एकता भारतीय जान जीवन की विशेषता है। विश्व के सभी प्रमुख धर्मावलंबी भारत में न केवल  मिलते हैं अपितु मिल-जुलकर रहते हैं। इन धर्मावलम्बियों की आस्था विविध इष्ट देवों में होना स्वाभाविक है। हनुमान जी एक ऐसे ही देवता हैं जिनके प्रति आदिवासियों से लेकर सुसंस्कृत जनों की, निर्बल-दीन जनों से लेकर संपन्न-समृद्ध जनों की, संयस्तों से लेकर गृहस्थों तक की अगाध श्रद्धा है। हनुमान लोक देवता हैं। उनकी उपासना हेतु किसी देवालय, विग्रह, पूजन सामग्री आदि के नहीं ह्रदय में श्रद्धा मात्र की आवश्यकता होती है। हनुमान की प्रतिष्ठा भक्त जनों के संकटहर्ता के रूप में है। डॉ. राजलक्ष्मी शिवहरे की कृति ग्यारहवें रूद्र श्री हनुमान वस्तुत:  मौलिक कृति नहीं हनुमान जी विषयक सामग्री का संकलन है। श्री हनुमत यंत्र साधना,मारुती  स्तोत्र, द्वादश नाम, ग्यारहवें रूद्र, सीताराम-भक्त हनुमान, सिन्दूर समर्पण मंत्र, भक्ति गीत पूजन विधि १०८ नामावली, द्वादश लिंग, यात्रा संस्मरण, आरती, हनुमान चालीसा आदि  लोकोपयोगी सामग्री का संकलन-संपादन सराहनीय है। हनुमद्भक्तों के लिये श्री अमरेंद्र नारायण कृत प्रबंध काव्य  श्री हनुमत श्रद्धा सुमन,  डॉ. ओमप्रकाश शर्मा रचित राम सखा हनुमान, सुदर्शन सिंह 'चक्र' कृत आंजनेय की आत्मकथा, सीताराम मक्खनलाल पोद्दार रचित श्री हनुमत लीला विलास, डॉ. मुनवा सिंह चौहान कृत आंजनेय हनुमान आदि कृतियाँ उपयोगी हैं। 
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पुस्तक सलिला
गीता दिव्य दर्शन : करें पठन मनन - संतोष शुक्ला
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(गीता दिव्य दर्शन, डॉ.राजलक्ष्मी शिवहरे, प्रथम संस्करण, २०१६, आवरण बहुरंगी पेपरबैक, पृष्ठ ७२, मूल्य १०० रु., पाथेय प्रकाशन जबलपुर)
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सनातन धर्मावलंबियों ही नहीं, तत्व चिंतकों, दार्शनिकों और चिंतकों में चिरकाल से सर्वाधिक लोकप्रिय ग्रंथ श्रीमद्भगवद्गीता का सार जन सामान्य तक पहुँचाने की लोकोपकारी भावना को अपने विवाह की ५० वीं वर्ष ग्रंथि पर मूर्त रूप देकर डॉ. आर.एल.शिवहरे और डॉ. राजलक्ष्मी शिवहरे ने अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया है। गीता में वर्णित समस्त प्रसंगों को जान सामान्य की दृष्टि से सरल सहज भाषा में समझाने में लेखिका को सफलता मिली है। जटिल और गूढ़ विषयों को आत्मसात कर अन्य पाठकों के लिए सहज ग्राह्य बनाने के साथ साथ मौलिक व्याख्या और व्यावहारिक दृष्टिकोण सोने में सुहागे की तरह है। गागर में सागर की तरह यह कृति पठनीय, मननीय है।
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कृति सलिला:
एक सरल और प्रामाणिक परिचय : श्रीमद्भागवत प्रकाश - आचार्य कृष्णकांत चतुर्वेदी   
[श्रीमद्भागवत प्रकाश १, प्रथम संस्करण २०१२, आकार २२ से.मी. X १४.५ से.मी., आवरण बहुरंगी सजिल्द जैकेट सहित, पृष्ठ ११२, मूल्य १५० रु., श्रीमद्भागवत प्रकाश २ , प्रथम संस्करण २०१४, पृष्ठ १६०, मूल्य १५० रु., पाथेय प्रकाशन जबलपुर]
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श्रीमद्भागवत महापुराण पुराण-परंपरा में ग्रंथराज के रूप में विख्यात है। सामाजिक जीवन में इसका महत्व न केवल सभी पुराणों की तुलना में अपितु वाल्मीकि रामायण और महाभारत से भी अधिक मात्रा में स्वीकृत है। पुराण शैली में उपलब्ध यह कृति साहित्य और दार्शनिक सिद्धांतों की दृष्टी से भी बहुत संग्राहक कोटि का है। भारतीय कथा परंपरा, ऋषि एवं राजवंशों का विवरण, इसमें बहुत विस्तार से दिया गया है। इसका प्रारंभ महाभारत के अंत से होता है, जहाँ द्रौपदी के पुत्रों का अश्वत्थामा के द्वारा वध कर दिया जाता है। उसे दंड देते समय द्रौपदी अपने पुत्रों के हत्यारे को जननी की दृष्टि से देखकर क्षमा करना चाहती है। *

महाभारत के प्रमुख पात्र पितामह भीष्म और कुंती की मार्मिक स्तुति, महर्षि व्यास के खेद व्यक्त करने से कथा प्रारंभ होती है। ये स्थितियाँ जितनी महाभारत काल में प्रासंगिक थीं, आज भी उतनी ही सत्य हैं। नृशंस हत्यायें एवं ऋषि की अपने कृतित्व की व्यर्थता की अनुभूति से उपजा दुःख भगवत महापुराण का पीठिकाभूत वक़्तव्य है। दूसरा महत्वपूर्ण तथ्य परीक्षित के व्यवहार में विस्खलन और परिमार्जन है। भगवान श्रीकृष्ण का भागिनेय, पाण्डु पुत्रों का वंशज, भीष्म तथा कुरुवंश का अंतिम दीपक, शारीरिक क्षुधा और पिपासा से व्याकुल एक ऋषि का अपमान उसके गले में मृत सर्प डालकर कर देता है। बड़े से बड़ा व्यक्ति कैसे विचलित हो सकता है, कैसा निंदनीय आचरण कर बैठता है, यह उसका उल्लेखनीय उदाहरण है। यहाँ के बाद से भागवत प्रारम्भ होती है। नए स्वर केसाथ, नये समाधान के साथ। अत: जीवन के दुर्गुणों व नृशंस कार्यों के समाहित उत्तर के लिए भागवत का सृजन हुआ और वह न केवल भारत अपितु विश्व का कंठहार बना हुआ है।


श्रीमद्भागवत पर भारत के मनीषी विचारकों ने नई-नई दृष्टि एवं उपयोगिया के साथ व्याख्यान किया है। वे व्याख्याएँ और उनके अनुवाद इतने बड़े और दुर्लभ हो गए हैं कि उनकी रसानुभूति तक पहुँच पाना असंभव हो गया है। परिणामत: अनेक लोगों ने उसके सारांश को प्रस्तुत करने का पर्यटन किया है। इसकी लोकप्रियता भगवतगीता की तरह इतनी इतनी विपुल है कि सहृदय बुद्धिजीवी उसे पढ़ना, उस पर लिखना अपने जीवन का महत्वपूर्ण कार्य मानते हैं। डॉ. राजलक्ष्मी शिवहरे का वर्तमान प्रयास भी इसी श्रेणी में आता है। इस सफल कवयित्री और लेखिका का भारतीय मन अपने इस महत्वपूर्ण स्रोत को सबके सामने लाने और स्वयं आस्वाद लेने व्याकुल हो उठा। परिणामत: श्रीमद्भागवत प्रकाश हमारे सामने है। उनहोंने संपूर्ण भागवत का संक्षिप्तीकरण करते समय इस बात की सावधानी बरती है कि महत्वपूर्ण बातें उसमें ठीक से आ जाएँ और इसको पढ़नेवाले पूरी कथा का आनंद ले सकें। लेखिका ने सभी महत्वपूर्ण आख्यानों का सहज-सरल एवं संक्षिप्त विवरण प्रदान किया है। महापुराण का प्राण दशम स्कंध है जो भगवान कृष्ण की लीलाओं का उत्कृष्ट एवं मनोरम संचय है। डॉ. शिवहरे ने उस अंश को अधिक विस्तृत रूप से प्रस्तुत किया है। ५ से ९ स्कंध तक जिसमें अन्य अवतारों और राम की कथा भी सम्मिलित है, एकादश स्कंध ज्ञान, चिंतन, साधना और समाज व्यवहार के सिद्धांतों एवं नियमों का, भगवान श्रीकृष्ण का उद्धव के द्वारा उपदेश के रूप में प्राप्त है। द्वादश स्कंध कथा का उपसंहार है। इस सबके द्वारा भगवत वर्तमान संत्रास, खेद, निराशा, अपराध और यहाँ तक कि असमय मृत्यु से उबरने का एकमात्र रसमय साधन और मार्ग है। श्रीमती राजलक्ष्मी शिवहरे की यह कृति इस सभी प्रश्नों को उजागर करने में सफल सिद्ध हुई है। उन्होंने एक सराहनीय प्रयास किया है। आज के साहित्यकारों में जहाँ कम लोग ही अपनी पुरानी कथा परम्परा को आश्रय बनाने में रूचि लेते हैं वहां एक साहित्यिक सृजनधर्मी महिला ने न केवल पुराण कथा को महत्व दिया अपितु दूसरों के उपयोग के लिए उसे सुलभ भी करा दिया। उनका यह प्रयास भाषा, अर्थ व्यक्ति और रोचकता की दृष्टि से सुंदर बन पड़ा है। एतदर्थ मैं उन्हें शुभाशीष और बढ़ाई देता हूँ कि उन्होंने एक महत्वपूर्ण अभाव की पूर्ति की है।
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कृति सलिला:  वीथी विहार 
वीथि विहार : नर पर भारी नार - संजीव 

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[वीथि विहार, उपन्यास, प्रथम संस्करण २०१२,आकार २३ से.मी. X १५ से.मी., आवरण बहुरंगी सजिल्द जैकेट सहित, पृष्ठ ९६, मूल्य २०० रु., पाथेय प्रकाशन जबलपुर]

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उपन्यास जीवन की तरह घटना बहुल होता है। उपन्यास का कथानक अनेक पात्रों को प्रभावित कर रहे कारकों और कारणों के कदमों और करवटों का लेखा-जोखा ही नहीं रखता, उनके परिणामों और प्रभावों का विश्लेषण भी करता है। श्वासों की वीथि पर विहार करती आसों की व्यथा-कथा कहने में महारथ हासिल कर चुकी डॉ. राजलक्ष्मी शिवहरे ने इस उपन्यास में पात्रों की जिस मानसिकता को उकेरा है वह बांग्ला साहित्य का देवदास प्रभाव है। कथा नायिका अपने पति के डगमगाते कदमों को रोकती नहीं अपितु कदमों की संख्या और गति अधिकतम करने की हरसंभव कोशिश करती है। हैरत की बात है कि ऐसा करते समय उसे कोई पछतावा नहीं होता, वह खुद को पति की हितैषी मानकर उसका अधिकतम अहित उसी प्रकार करती है, जैसे गांधारी ने धृतराष्ट्र का किया था।

कथा नायिका सौदामिनी अपने वकील पति सुरेंद्रमोहन को तवायफ चंपा के कोठे पर भेजती है। रुपया-पैसा ही नहीं, कार और घर भी दाँव पर लगा देती है। घर फूँक तमाशा देखने का अंत यहीं नहीं होता, वह तवायफ चंपा को ही घर ले आती है। तथाकथित स्वामिभक्त सुगृहणी सौदामिनी यही नहीं समझ पाती कि पति, पत्नि और गृहस्थी के लिये क्या अच्छा है क्या बुरा? उसकी तुलना में चंपा दृढ़ निश्चयी है, वह तवायफ के नाते ग्राहक को लूटने में कोई कसर नहीं छोड़ती। अनकिए अपराध की सजा पाकर भी टूटती नहीं और अवसर मिलने पर पंकिल पथ छोड़कर प्रेमी के साथ गृहस्थी बसा लेती है। नायिका सुविधाभौगी पराश्रिता और खलनायिका दृढ़ संकल्पी।
नायक सुरेंद्रमोहन मिट्टी के माधो की तरह न केवल कोठे पर चले जाते हैं, वहाँ पंक में लिपट भी जाते हैं। जब दूर होना चाहते हैं तो बुराई घर लाकर गले मढ़ जाती है। अंतत:, उनका जमीर जागता है, संकल्प जयी होता है और वे जीवन में पुनर्प्रतिष्ठा पाते हैं।
सौदामिनी की वैचारिक दुर्बलता मिटाती है उसकी परदेसिन इला भाभी। उपन्यास में यह भाभी रामदीन काका और चंपा का बाल प्रेमी देवेंद्र तीनों सही दिशा में पग उठाते हैं। भाभी विदेशी होकर भी भारतीय रीति-रिवाज, परंपराओं और जीवन दर्शन को आत्मार्पित कर पाती है। वही सौदामिनी को उसकी भूलों से परिचित कराती है- "ऐसा भूल कर भी न करना सदू, कितनी गल्तियाँ तो तुम कर चुकीं और एक संख्या को उसमें मत जोड़ो, सुरेंद्रमोहन की आत्मा उठने का प्रयास कर रही होगी और तुम उसे फिर से नीचे गिरा देना चाहती हो" वस्तुत: कथारंभ से ही सौदामिनी पति का पतन रोकने के स्थान पर पतन में सहायक ही होती आई थी। कहावत है अंत भला सो सब भला।
उपन्यास की कथा को संवादों में ढाल दिया जाए तो फिल्म या सीरियल के लिए उपयुक्त पटकथा बन जाएगी। उपन्यासकार राजलक्ष्मी जी कथा के शुष्क गद्य में पद्य की सरसता और तरलता का मिश्रण करने में महारथ रखती हैं। सहज ग्राह्य चुटीली भाषा पाठक को आदि से अंत तक बाँधे रखती है। घटनाक्रम सुचिंतित अधिक है, स्वाभाविक कम। "हमारा हृदय तो बड़ा मोम का है न, जो तुम्हारे कहने से ही दुख गया", "जो खुद खाएगा, दूसरे को भी देगा... नहीं तो भूखा रखेगा", "जब तक तुम्हारे प्रेम की अनुभूति इतनी गहरी हो जाए कि तुम मेरे बिना न रह सको, तब सब संकोच छोड़कर मेरे पास आना", "दरार होती नहीं पैदा कर दी जाती है", "उनके मन को कितनी चोट लगी होगी कि एक अनजान नितांत नई लड़की के ऊपर उन्होंने अपने पुत्र से अधिक विश्वास किया", "सच्चा प्यार मोती सा निश्छल होता है, पाने पर सारे संसार की संपदा उस पर लुटाई जा सकती है", "क्या गणिका नारी नहीं होती?" जैसे संवाद पाठक के साथ रह जाते हैं, यह लेखिका की सफलता है। अपनी बात में वह कहती है "नारी कोई हांडी नहीं कि एक बार छू देने पर उसे अस्पृश्य माना जाए।" इसे प्रतिपादित करने के लिए लिखे गए उपन्यास में प्रकारांतर से यह भी प्रतिपादित हो गया कि पुरुष वासना का दास मात्र नहीं है जो अवसर पाने पर सुधर और सुधार न सके।
सारत: वीथि विहार लगभग ७ दशक पूर्व के शिल्प को पुनर्जीवित करता उपन्यास है, जिसमें वर्तमान परिप्रेक्ष्य, संदर्भ, भाषा, घटनाक्रम या विमर्श तलाशना कृति के साथ अन्याय और खस के इत्र में फ्रेगरेंस सूँघने की तरह बेमानी होगा। लेखिका की सफलता बुराई में छिपी भलाई को सामने लाने के मूल विचार के इर्द-गिर्द रोचक घटनाक्रम, संवाद और पात्रों का ताना-बाना बुनकर पाठक को जोड़े रखने में है।
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कृति सलिला:
तिमिर में छिपा उजास उजियारती "साधना" - डॉ. दयाकृष्णविजय,
[साधना, उपन्यास, प्रथम संस्करण २०१३, आकार २२.५ से.मी. x १४.५ से.मी. आवरण सजिल्द बहुरंगी जैकेट सहित, पृष्ठ १४४, मूल्य ३००/-, पाथेय प्रकाशन जबलपुर]
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डॉ. राजलक्ष्मी शिवहरे प्रणीत उपन्यास "साधना" में मैंने श्रेष्ठता के तीन करक ज्ञानात्मक कथ्य, विवेचन की शैलीगत मौलिकता और समाज निर्माण की सामर्थ्यवती भूमिका तीनों का प्राचुर्य पाया है। कथा जिस स्थान से आरंभ होती है वहीं समाप्त होती है यह अनूठी बात नहीं है। बड़ी बात है कि उपन्यास नायक तिमिर अपने नाम के विपरीत श्रेष्ठ चारित्रिक गुणात्मकता के साथ प्रारंभ से अंत तक खड़ा मिलता है। पग-पग पर मिलते आकर्षणों को नकार कर वह अपने स्वीकृत सिद्धांतों पर अड़ा ही नहीं रहता अपितु परिस्थितियों को अपनी अनुकूलता में ढालता भी है। तिमिर को पूरी गीता कंठस्थ है। वह पुराणों तथा निष्णात अध्येता विद्वान भी है। प्रतिदिन प्रात: त्रिकाल बेला में संध्या-हवन जिसका नियम है। सादा भोजन, भूमि शयन तथा आत्म मीमांसा जिसके दैनिक कर्म हैं। अपने आचरण से जिसने प्रारंभ से अंत तक आदर्श की प्रस्तुति कर आत्म को आध्यात्मिकता व् श्रेष्ठ सांसारिकता से जोड़ दिया है। शिष्य तिमिर अपने पालनहार गुरुदेव के दत्तक पुत्री तन्वी के विवाह प्रस्ताव से बचने के लिए संसार देखने के बहाने शहर आकर गुरुदेव के अनुयायी से मिलकर उनके मंदिर में पुजारी नियुक्त हो जाता है किन्तु भेंट राशि, चढ़ावे, सेठ को युवा पुत्री आदि के प्रति आकृष्ट न हो, कार्य के प्रति समर्पण से सम्मान का पात्र बनता है। एक दिन ज्वर ग्रस्त होने पर सामान्यत: पर्दे में रहनेवाली सेठ की युवा पत्नि मुक्ता उसे दवा दे रही होती है, तभी सेठ आ जाता है और उनके आचरण पर संदेह व्यक्त करता है। तिमिर ज्वर मवन ही वह स्थान छोड़ का निकल पड़ता है तथा मार्ग में ठोकर खाकर गिर जाता है। श्मशान में लकड़ी बेच कर पेट पालती किशोरी चिंतामणि उसे उठाकर अपने घर ले आती है। वह तिमिर के सदाचरण से प्रभावित हो विवाह प्रस्ताव रखती है। सेठ का माली तिमिर को सेठानी का पत्र व् पैसे देता है जिसमें संदेह से व्यथित हो घर छोड़कर अपनी मौसी के घर हरिद्वार जा चुकी सेठानी ने खुद को उसकी बहन लिखते हुए उसे हरिद्वार बुलाया था। हरिद्वार में मौसी उसे सुहासिनी के मंदिर में पुजारी रखा देती है।
विलासिनी सुवासिनी की प्रताड़ना कर तिमिर उसे सत्पथ पर लाकर अवैध गर्भजनित बदनामी से बचाने के लिए अपने मित्र की दादी के पास पति-पत्नी के रूप में ठहरता है। केदारनाथ के दर्शन कर लौटने पर तिमिर सुवासिनी, उसके पुत्र वैरागी को लेकर तिमिर चिंतामणि के आस आता है। अविवाहित चिन्तामणि ने श्मशान में मिली नवजात कन्या राधिका को अपना लिया था। निस्संतान मुक्ता को राधिका सौंपकर चिंतामणि, सुवासिनी व् वैरागी के साथ तिमिर गुरुदेव के आश्रम में आता है। तिमिर का गुरुभाई प्रकाश तन्वी द्वारा विवाह प्रस्ताव ठुकरा दिए जाने पर आश्रम छोड़ गया था। आश्रम में अकेली तन्वी ही गुरुदेव की सेवा कर रही थी। गुरुदेव को गंभीर पाकर तिमिर उनकी चिकित्सा करता है। लेखिका ने सदाचरण की श्रेष्ठता, बेमेल विवाहजनित क्लेश, संयम से सम्मान, निराश्रित को अपनाने, मंदिरों में व्याप्त अनैतिकता, श्रम की महत्ता, संस्कारों व मर्यादित आचरण से सफलता, भोग विलास पर परोपकार व् संतोष वृत्ति की वरीयता प्रतिपादित करता उपन्यास साधना लेखिका की नवाचारी प्रवृत्ति इंगित करता है। निस्वार्थ प्रेम की गरिमा प्रतिपादित करती यह औपन्यासिक कृति इच्छाओं को नियंत्रित कर संयं और साधना को पूर्णता हेतु आवश्यक निरूपित करता है। तिमिर समक्ष तन्वी, चिंतामणि और सुवासिनी विवाह प्रस्ताव लाती हैं पर वह स्वीकार नहीं पाता। अंतत: वह अनुभव करता है कि जब तक बंधन था, तभी तक इच्छाएँ थीं, निर्बंध होते इच्छाएँ समाप्त हो गईं।
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कृति सलिला:
मानवीय रिश्ते परिभाषित करती ‘‘गाथा’’ - डाॅ. अनामिका तिवारी
[गाथा, उपन्यास, प्रथम संस्करण २०१४, आकार २२.५ से.मी. x १४.५ से.मी. आवरण सजिल्द बहुरंगी जैकेट सहित, पृष्ठ ७२, मूल्य २२५/-, पाथेय प्रकाशन जबलपुर]
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उपन्यास का नायक क्षितिज लेखक अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं करता, उसके पिता नहीं है। माँ ने ही उसे पाला - पोसा, पढ़ाया - लिखाया है।बेरोजगारी में हीे उसका विवाह पढ़ी-लिखी सुंदर, सरकारी नौकरी प्राप्त रूपम से हो जाता है। वह एक बेटा आकाश और एक बेटी गरिमा का पिता बनता है। बच्चों की शादी भी उनकी पसंद के अनुसार हो जाती है। इतनी घटनाऐं हो चुकने के बाद पात्रों की परिपक्व वय से उपन्यास का प्रारम्भ होता है। क्षितिज नौकरी न होने से आत्मग्लानि से भरा है। पत्नि रूपम अपनी नौकरी में व्यस्त है। बेटी अपने घर और बेटा अपनी नौकरी पर दूसरे शहर में है। माँ नौकरीशुदा बहू की घर गृहस्थी सम्हालने में व्यस्त है। इस प्रकार जीवन एक धुरी पर चल रहा होता है।

एकाएक मंत्री जी के घर आने से बहुत बड़ा परिवर्तन होता है। मंत्री जी की पत्नि निकिता क्षितिज काॅलेज के जमाने से ही उसको चाहती है। यहाँ लेखिका मंत्री जी और मंत्री जी की पत्नि की प्रभुता को दर्शाती है। उनके आगमन से न केवल रूपम की पदोन्न्ति हो जाती है वरन क्षितिज की पुस्तक को ‘भारत-भारती-संस्था’ से इक्कीस हजार का पुरस्कार मिलता है। संस्थाओं द्वारा व्यक्तिगत रूप से साहित्यकारों के सम्मान का जो दौर चल रहा है, उपन्यासकार क्षितिज भी इससे अछूता नहीं है। किसी संस्था से उसे ‘तुलसी सम्मान’ और किसी से 'ज्ञानदीप सम्मान' मिलता है। कार्यक्रमों में उसे बतौर अध्यक्ष बुलाया जाने लगता है। मंत्री पत्नि निकिता काॅलेज के समय से ही उसके लेखन की भी प्रशंसिका रही है। वह कहती भी है कि आज की सांस्कृतिक फूहड़ता के बीच तुम जैसे लेखकों को छपना ही चाहिये। वो उसके पाँच उपन्यास छपवाती ही नहीं, रायल्टी भी दिलवाती है। हरिद्वार में उसका अपना आध्यात्म का आश्रम है जहाँ वो क्षितिज को बुलाती है।

निकिता के आश्रम में क्षितिज की मुलाकात काॅलेज की सहपाठी, निकिता की सहेली आभा से होती है जिसे वह वास्तव में बहुत चाहता था लेकिन उसकी गरीबी के कारण आभा के पिता ने अपनी बेटी का विवाह एक अमीर घर में कर दिया था। हरिद्वार में आभा, क्षितिज को अपनी सहेली नैनी से मिलवाती है। नैनी के रूप-रंग से वह बहुत प्रभावित होता है। निकिता के सहयोग से क्षितिज प्रसिद्ध लेखक हो गया और आर्थिक रूप से सुदृढ़ भी। वह निकिता के सौजन्य से अमेरिका, इंग्लैंड, दुबई की विदेश यात्राऐं करता है। उपन्यास में यहाँ यह बिडम्बना उजागर होती है कि मात्र अच्छा लेखक होना ही प्रसिद्ध और समृद्धि का कारण नहीं हो सकता जब तक कि किसी बड़ी हस्ती का वरद हस्त सर पर न हो। उपन्यास के नायक के पास बहुत कुछ है, अच्छी सुन्दर पढ़ी-लिखी सरकारी नौकरी प्राप्त पत्नि रूपम है,एक बेटा और बेटी है, उसके जीवन में जितनी महिलाऐं हैं उसको मान देनेवाली हैं जबकि उनकी स्वयं की गाथाऐं बड़ी करुण हैं। एक निकिता है जिसकी शादी जिन मंत्री जी से होती है वे पहले से ही तीन बच्चों के पिता हैं, बच्चों की देखभाल के लिये ही वे निकिता से शादी करते हैं। बच्चे सम्हल जाने पर वे उसके जीवन के लिये हरिद्वार में एक आश्रम बनवा देते हैं। जिस आभा से क्षितिज की शादी नहीं हो पाती, उसके संतान न होने से उसका पति उसको छोड़कर दूसरा विवाह कर लेता है। आभा एक काॅलेज में प्रोफेसरी कर अपना जीवन काट रही है। आभा की जिस सहेली नैनी के रूप पर वह मुग्ध हो जाता है वह कश्मीरी ब्राम्हण है उसके माता-पिता को आतंकवादियों ने मार डाला है।
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उपन्यास के स्त्री पात्रों के बीच क्षितिज की पत्नि रूपम का चरित्र श्रेष्ठतम ऊँचाइयों को छू रहा है। वह क्षितिज को उसकी बेरोजगारी का उलाहना नहीं देती। उसकी रचना प्रकाशित होने पर गर्व से अपने मित्रों को, अपने साहित्कार पति के बारे में बताती है। उसकी मेज पर इतने रूपये रख देती है कि क्षितिज को उससे माँगने की आवश्यकता न पड़े। वह अपने दम-खम से क्षितिज की नौकरी लगवाती है लेकिन पत्नि के कार्यालय में, मातहती में नौकरी करने से वह साफ इंकार कर देता है। स्कूल में भी जब उसको छः पीरियड के बाद सातवाँ पीरिएड और पढ़ाने के लिये कहा जाता है तो शोषण मानकर वह नौकरी छोड़ देता है। पुरूष को अपने स्वाभिमान के आगे अपना परिवार नहीं दिख पाता है लेकिन औरत को अपने घर-परिवार की आवश्यकता के आगे और सबसे बड़ी बात एक ‘माँ’ होने नाते अपना स्वाभिमान, अपना अपमान या शोषण नहीं दिखता। सातवाँ क्या आठवाँ पीरियड भी उसको पढ़ाने कहा जायेगा तो वो नौकरी बचाने नौवाँ पीरिएड पढ़ाने को भी तैयार हो जायेगी। कभी किसी सिद्धांत पर, ज्यादती पर, मैनेजमेन्ट से झगड़ा कर, बार - बार क्षितिज के नौकरी छोड़ने पर, रूपम सोच कर रह जाती है - ''ये लेखक अपने पात्रों को तो अपने नियंत्रण में रखते हैं पर स्वयं किसी के नियंत्रण में नहीं रहते। रूपम की नौकरी में भी भाग-दौड़ बहुत है। वह थक जाती है लेकिन नौकरी नहीं छोड़ सकती। वह नौकरी की अहमियत जानती है। घर, साहित्य से नहीं पैसे से चलता है । कहानी, कविता से रोटी नहीं खरीदी जा सकती, उसे ही सब सम्हलना है, घर का आर्थिक स्तर बढ़ाने के लिये वह सोचती है उसकी पदोन्नति हो जाये। इस उद्देश्य से वह मंत्री जी को घर पर खाने पर बुलाती है। इस पर पुरूष की मानसिकता क्षितिज के माध्यम से व्यक्त होती है - ‘‘मंत्री जी आज आ रहे हैं, तभी रूपम चौके में काम करती दिखाई दे रही है।’’

इसके विपरीत रूपम, क्षितिज की महिला मित्रों के बुलाने पर स्वयं उसको उनके पास जाने के लिये कहती है, घर में उनके आने पर भली - भाँति उनका स्वागत सत्कार करती है, खाना बनाकर खिलाती है। यहाँ तक कि क्षितिज द्वारा कश्मीर में आतंकवादियों पर बम पटकने के आरोप में पकड़ी गयी नैनी की जमानत लेने के बाद रूपम उसे अपने घर में रखती है। यह जानकर भी कि सम्मान के अलावा और भी बहुत कुछ है उन दोनों के मन में, रूपम सबसे ऊपर उठकर सब पर अपना स्नेह-प्रेम लुटाती है। यह रूपम के चरित्र की अति दुर्लभ विशिष्टता है। रूपम की बड़ी बेटी गरिमा भी नैनी की जमानत कराकर आदर्श उपस्थित करती है। उपन्यास के सभी पात्रों की अपनी-अपनी गाथाऐं हैं। एक - एक गाथा, एक - उपन्यास हो सकती थी लेकिन राजलक्ष्मी जी ने कुल ७२ पृष्ठों में सबकी गाथाओं को समेट लिया है। उनके लिखने का है कि विपरीत परिस्थियों से घबराकर भागें नहीं, जो है उसे सहेजें, गिलास आधा खाली नहीं, आधा गिलास भरा देखें। जीवन में उतार - चढ़ाव के बाद भी उनके पात्र एक दूसरे को सम्हालने-सराहने में जिस अनाम रिश्ते के साथ एक दूसरे से जुड़े हैं, उसके लिये बस यही कहा जा सकता है- ‘‘ हाथ से छू के इन्हें रिश्तों का कोई नाम न दो ’’। पुरूष की महिला मित्र होना या महिला का पुरूष मित्र होने का एक ही रिश्ता नहीं होता । विपरीत परिस्थितियों में मानवीयता दर्शाने और सम्हालने की ‘गाथा’ है राजलक्ष्मी जी का उपन्यास ‘गाथा’।
चिंतन एवं चेतना से परिपूर्ण ''गाथा'' - डॉ.ज्योति शुक्ला
'गाथा' उपन्यास का हर पात्र पीड़ा से दो-चार होकर निखरता है और समाज में सम्मान पाता है। कई पात्रों और अनेक त्रासद भावनाओं के बाद भी कथानक इतना लघु है कि पाठक के तन्मय होते होते उपन्यास ही समाप्त हो जाता है। घटनाओं का विस्तार होता तो पाठक उनसे अधिक गहराई से जुड़ पाता। उपन्यास का केंद्रीय भाव 'थमना नहीं, बढ़ते रहना' है। लघु-प्रभावी उपन्यास हेतु साधुवाद।
भावनाओं की पराकाष्ठा ''गाथा'' - विजय तिवारी 'किसलय'
संपूर्ण उपन्यास भावों के प्रवाह में बहता गया है.... धर्म, आध्यात्म, प्रकृति, साहित्य, पर्यटन, स्नेह संबंध तथा सहज स्नेह का बहुरंगी गुलदस्ता 'गाथा' पाठकों के ह्रदय को सुनिश्चित स्पर्श करेगा साथ ही 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' की भावना मानव समाज में प्रस्फुटित करेगा।
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कृति सलिला: 
मनोवैज्ञानिक विश्लेषण व् चेतना प्रवाही उपन्यास ''समाधि'' - शिवकुमार आर्य 
[समाधि, उपन्यास, प्रथम संस्करण २०१४, आकार २२.५ से.मी. x १४.५ से.मी. आवरण सजिल्द बहुरंगी जैकेट सहित, पृष्ठ ८८, मूल्य २७५/-, पाथेय प्रकाशन जबलपुर]
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आधुनिक युग में उपन्यास का अर्थ है "गद्यबद्ध लंबी कथा।'' उपन्यास उस विचार को प्रदर्शित करने की कला है जिसे कलाकार जीवन के रूप में स्वीकार करता है। वह पाठकों को वही वास्तविकता दिखाकर आनंदित करता है जो उसने अनुभव की है। डॉ. राजलक्ष्मी शिवहरे कृत उपन्यास 'समाधि' विवाह पूर्व संबंधों से स्त्री, पुरुष व् बच्चे पर पड़े प्रतिकूल सामाजिक आर्थिक सामाजिक प्रभावों की ओर ध्यानाकृष्ट करता है। यह सामाजिक विषमताओं, कुप्रथाओं, वैयक्तिक कुंठाओं व् आक्रोश का विश्लेषण करने के साथ - साथ उसका मनोवैज्ञानिक विश्लेषण कर चेतना प्रवाह बनाये रखता है। महान मूर्तिकार रुद्रधीर के पुत्र श्रेष्ठ मूर्तिकार चेतनानंद की क्षणिक भूल उनके जीवन की विडंबना बन जाती है। वे शहर से दूर आश्रम बनाकर मूर्तिकला का प्रशिक्षण देने में समर्पित हैं। सहृदयता, मैत्री भाव और कठोर अनुशासन के पर्याय बनाकर वे आश्रम में नारियों का प्रवेश निषेध कर देते हैं। उनके अनुसार कला का सत्य 'कष्ट' जीवन की रागिनी बन जाता है हुए कला स्वयं अपनी राह ढूंढती हुई अपने स्तर को प्राप्त करती है। - पृष्ठ ३० 
कला साधना की समाधि की आड़ में अपनी आत्म ग्लानि को छिपाते चेतनानंद का पट्टशिष्य और पुत्र पंकज ही उनके नारी निषेध के संकल्प को भंग करता है। आश्रम में नंदिता का प्रवेश ही उनके  भंग कर देता है। पट्ट शिष्य पंकज द्वारा शिशु का चुम्बन करती माँ, राजस्थानी बाला वेणु और बंगाली युवती नंदिता की मूर्ति बनान मणि नियति का संकेत है कि नारी के बिना जीवन नहीं है। एक अति की प्रतिक्रिया दूसरी अति जब पंकज केवल नारी मूर्ति बनाने का निश्चय करता है। स्त्री के प्रति अपराध का प्रायश्चित्य स्त्री नंदिता के समक्ष ही करते हैं चेतनानंद, खुद को बहुरूपिया कहते  सराहते हैं उस मणि को जिसने उनके द्वारा ठुकराई गयी वेणु को अपनाया।   
उपन्यास में  अकेलेपन की मूक वेदना है। कोलाहल में भी एकाकी पात्र एकान्त का ही वरण करते हैं। वे सामाजिक परम्पराओं, मान्यताओं की छद्म स्वीकार्यता के नाम पर अनैतिक और आर्थिक स्थितियों में उलझकर भी जिजीविषा बनाये रखते हैं। आचार्य चेतन अपनी प्रेयसी वेणु के गर्भवती हो जाने पर उससे मिलने का साहस नहीं जुटा पाते। वेणु के विचारों में डूबे रहते हुए भी वे अपने पुत्र पंकज को शिष्य रूप में निकट पाते हुए भी अपना नहीं पाते। पंकज सच जानते हुए भी उन्हें पिता नहीं कह पाता है। अन्यत्र विवाही जा चुकी वेणु सास के भय से पंकज को नहीं अपना पाती और पंकज  को लिखे पत्र में स्वकारती है- "तुम पीटने पर रोते किन्तु मैं कभी स्नेह से तुम्हें गले नहीं लगाती। मेरा दिल जार-जार रोता किन्तु तुम्हें माँ का प्यार न दे सकी। पंकज मैं बहुत दुखी हूँ। इसके लिए तुमसे कितनी भी क्षमा मांगूं , मेरे दिल को शांति  नहीं मिल सकती, कभी नहीं।" पृष्ठ ४०।
उपन्यासकार पाश्चात्य संस्कृति के प्रादुर्भाव से बढ़ते भोगवाद पर चिंता व्यक्त करते हुए स्त्री को भोग सामग्री माने  जाने पर चिंतित है।  श्रमिक वर्ग के लिए सम्मानजनक परिस्थितियों की तलाश करती कथा श्रमिकों और मालिकों के बीच स्वस्थ संबंधों के माध्यम से कल्याण के नए क्षितिज तलाशे जाने की रह सुझाती है। पंकज के शब्दों में "उस परमात्मा को देखो, उसे इस सृष्टि की रचना के बदले में क्या मिला? अपने जीवन को व्यर्थ मत बिताओ, एक-एक पल को जिओ, परिश्रम और हँसी ख़ुशी के साथ, बीता हुआ क्षण कभी वापिस नहीं मिलेगा।" पृष्ठ ३७

ठेकेदार रामसिंह पत्नी को अपरिचित पंकज पर विश्वास करने का कारण बताता है - " यदि नींव मजबूत हो तो उस पर खड़ी इमारत हमेशा बुलंद होगी किन्तु यदि नीव कमजोर हो और उस पर खड़ी इमारत को हम बुलंद करें तो यह हमारा भ्रम होगा।" इस प्रकार मानव चरित्रों का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया गया है। उपन्यास में मरुभूमि के प्राकृतिक सौंदर्य तथा सामाजिक विसंगतियों की पृष्ठभूमि है। राजस्थानी नारी सौंदर्य - "मूर्ति एक राजस्थानी बाला की  नजर आ रही है। गोट लगा लँहगा घुटनों तक लहरा रहा है, पैरों में पायल है, लहरों के ऊपर गोठ लगी लाल चोली, बोरल में फंसी लाल चुनरी बड़े आकर्षक ढंग से कंधों पर लहरा रही है",  राजस्थानी पुरुष सौंदर्य " उसके चौड़े कंधे, ऊंचा कद, सांवला रंग, पुष्ट शरीर, घुंघराले केश, आकर्षक नासिका, आँखें छोटी पर सुंदर... "  और राजस्थानी लोकगीत "दूर दूर कुआं को पाणी।  म्हारी माथनी बींदिया ला दो जी / म्हारो बोरलो रतन ज्यादा दो जी " आदि में राजस्थान जीवंत हो उठा है। लेखिका की गहरी और सूक्ष्म पर्यवेक्षण दृष्टि ने पात्रों को कर्तव्य, त्याग, समर्पण, ग्लानि, गौरव, और आदर्श के ताने बाने में गूँथकर अविस्मरणीय बना दिया है। उपन्यास के कथाक्रम में कसावट है। आरम्भ से अंत तक पाठक रूचि बनी रहती है। 
                                                                                                                                                                                     (३५)        
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कृति सलिला: बातचीत

समाज से प्राप्त प्रेरणा ही "पाषाण पिघल रहा है" - राजलक्ष्मी शिवहरे से बातचीत
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[पाषाण पिघल रहा है, उपन्यास, प्रथम संस्करण २०१४, आकार २२.५ से.मी. x १४.५ से.मी. आवरण सजिल्द बहुरंगी जैकेट सहित, पृष्ठ १२८, मूल्य २७५/-, पाथेय प्रकाशन जबलपुर]
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प्र - 'पाषाण पिघल रहा है' के पात्र आपके ध्यान में कहाँ से आये?
उ - हमारे समाज में सभी तरह के व्यक्ति होते हैं। पाषाण पिघल रहा है के पात्र भी समाज से ही हैं। समाज में भर्ती, स्वप्निल व् निशिकांत जैसे सहिष्णु, समझदार लोग भी हियँ और सुनीता जैसी जिद्दी प्रवृत्ति के लोग भी हैं।
प्र उपन्यासों के पात्रों का चयन सामान्य जान जीवन से ही करती हैं या पूरी तरह कल्पना से?
उ मैं पत्रों का चयन समाज के बीच से ही करती हूँ किन्तु उसमें कल्पना का मिश्रण भी होता है।
प्र पाषाण पिघल रहा है' तथा अन्य उपन्यास लिखने के मूल में आपके निजी अनुभव हैं की?
उ यह या अन्य उपन्यास या कहानी पूरी तरह केवल अनुभव पर आधारित हैं कहना असत्य होगा। लेखन का अनुभूत सत्य कहीं कहीं कृति में झलकता अवश्य है। यही उसे अन्य लेखकों से पृथक करता है। इसी से उसकी पहचान बनती है।
प्र- उपन्यास में स्वप्निल का चरित्र दब्बू और समझौतावादी है। क्या वास्तविक जीवन में ऐसे लोग मिलते और सफल होते हैं?
उ- जबरदस्ती कुछ पाना स्वप्निल को पसंद नहीं है। इसलिए वह सुनीता पर भी अपनी इच्छा नहीं लादता, उसे स्वतंत्र कर देता है।सरसरी तौर पर भले ही यह अस्वाभाविक लगे पर व्यावहारिक तौर यह असंभव नहीं है।वस्तुत: स्वप्निल दब्बू नहीं, नीलकंठ की तरह अपने दुःख रूपी गरल को अपने तक सीमित रखनेवाला महानायक है। उसके होठों की मुस्कान बड़े से बड़े संकट में भी बनी रहती है।
प्र - सुनीता के साथ विवाह करने का फैसला क्या स्वप्निल की कोरी भावुकता नहीं है? उपन्यास में कहीं भी यह व्यक्त नहीं किया गया है कि स्वप्निल को सुनीता से प्रेम था? सुनीता से विवाह करने का स्वप्निल का फैसला क्या माँ की इच्छापूर्ति मात्र के लिए था?
उ- माँ की इच्छा मात्र नहीं, स्वप्निल स्वयं भी सुनीता के प्रति आकर्षित है, भले ही खुलकर अभिव्यक्ति न करे, माँ की इच्छा उत्प्रेरक का कार्य करती है।
प्र. सुनीता के मन में पुरुषों के प्रति घृणा का भाव है इसलिए वह स्वप्निल के साथ विवाह करने में हिचकती है किन्तु देवेंद्र से विवाह के लिए वह कहती है कि उसकी प्रतिशोध भावना प्रेम में बदल चुकी है। क्या यह विरोधाभास नहीं है?
उ नहीं, इसमें विरोधाभास नहीं है। सुनीता ही क्या, हममें से कोई भी अंतिम निर्णय एकदम से नहीं लेता। सुनीता भी खुद को ठीक से समझ नहीं पाती। वह माँ का प्रतिकार लेने और स्वप्निल को चिढ़ाने के लिए देवेंद्र की और बढ़ती है और देवेंद्र के प्रति रूपाकर्षण को प्रेम की संज्ञा दे देती है।
प्र - देवेंद्र से अपनी माँ का प्रतिशोध लेने की भावना, पति के प्रति प्रेम और बेटी के प्रति ममता को समाप्त कैसे कर सकती है?
उ प्रतिशोध की अग्नि जन्म जन्मांतर तक भी ठंडी नहीं होती। यह महाभारत भी कहता है। सुनीता के मन में अपनी माँ के प्रति हुए अन्याय के कारण प्रतिशोध की जो आग भड़की उसे पममता भी ठंडा नहीं कर सकी। यह अस्वाभाविक नहीं है अन्यथा अनेक बच्चे इसका शिकार नहीं बनते।
प्र - क्या जीवन की छोटी - छोटी घटनाओं का विस्तार, कहानी में अवरोध पैदा नहीं करता?
उ - नहीं, उपन्यास बगीचे की तरह होता है। क्यारियों की तरह छोटी - छोटी घटनाएँ व्यवधान नहीं पैदा करतीं अपितु कथावस्तु को नया मोड़ देकर नया रंग भर जाती हैं।
प्र - इस उपन्यास को लिखने के पीछे आपका उद्देश्य क्या है? क्या आप पाठकों को कोई संदेश देना चाहती हैं?
उ - विवाहेतर प्रेम संबंध कितनी त्रासदियों को जन्म दे सकता है? अपने मन की भावनाओं पर नियंत्रण और सबके हित की चाह ही हमें मनुष्य और परिवार मंदिर बनाती है। यही बात पाठकों तक पहुँचाने के लिए यह उपन्यास लिखा गया है।
(३६)
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कृति सलिला:  
तीन कथाओं का ताना बाना बुनता 'विषपाई' - अर्चना मलैया 
[विषपायी , उपन्यास, प्रथम संस्करण २०१९, आकार २२.५ से.मी. x १४ से.मी. आवरण सजिल्द बहुरंगी जैकेट सहित, पृष्ठ ९६, मूल्य २५०/-, पाथेय प्रकाशन जबलपुर]
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समीक्षित उपन्यास विषपाई तीन कथाओं को एक साथ लेकर चलता है। समीक्षित उपन्यास विषपाई तीन कथाओं को एक साथ लेकर चलता है। विषपाई के आदि प्रतीक  गरल पीनेवाले नीलकंठ भगवान शिव हैं। लौकिक रूप में नारी विषपायी के रूप में सर्वस्वीकृत है। विवेच्य उपन्यास में वरिष्ठ उपन्यासकार डॉ. राजलक्ष्मी शिवहरे का दृष्टिकोण एकांगी नहीं है वरन समूचे पारिवारिक, सामाजिक परिवेश को विवेचित करता चलता है। इस कृति में यह भी दृष्टव्य है कि कभी कभी नारी से अधिक विष का पान पुरुष करता है पर उसकी पीड़ा मुखरित नहीं मौन रह जाती है। इसलिए मन को कहीं गहरे स्पंदित करती है। उपन्यास शिक्षिका राधा, उसके पत्रकार पति नलिन, नलिन की मित्र मोहिनी, राधा की बहिन मनीषा, मनीषा के पति पुनीत और राधा के विद्यार्थी प्रदीप के जीवन में घट रही घटनाओं के इर्द-गिर्द घूमता है। निस्संतान दंपति राधा-नलिन के सुखी विवहित जीवन में नलिनी का आगमन झंझावात की तरह दस्तक देता है किन्तु मोहिनी के मतलबपरस्त रवैये को भाँपकर नलिन शीघ्र ही स्वयं को इस क्षणिक इंद्रजाल से मुक्त कर लेता है। मनीषा पिता द्वारा परिवार की अवहेलना व् पुत्र की कामना हेतु परिवार का त्याग कर दूसरा ब्याह रचाने के कारन संपूर्ण पुरुष जाती के प्रति पूर्वाग्रहग्रस्त हो शादी ही नाहने करना चाहती। उसके कथन "स्त्री को विषपाई नहीं विषधर बनना चाहिए" में उसके विद्रोही व्यक्तित्व की झलक है। मनीषा के जीवन में आया राधा का पूर्व विद्यार्थी पुनीत  एक आदर्श, सहनशील, सहयोगी पुरुष है। मनीषा देर से ही सही उसका आकलन कर पूरी निष्ठा के साथ परिवार और मातृत्व के प्रति समर्पित होती है।

विषपाई में सर्वाधिक स्तब्ध करनेवाला पक्ष राधा के विद्यालय में पढ़ रहे छात्र प्रदीप का है जिसने बाल्यावस्था में ही अपने घर में अपनी माँ, दादी, भाई और दीदी के दर्दनाक अंत को अपनी आँखों से देखा है। दीदी का कसूर बस इतना था कि उसने छेड़छाड़ करनेवाले लड़कों की शिकायत प्राचार्य से कर दी थी। सरगना रसूखदार हत्यारे को वह पहचानता भी था पर वह उसकी पहुँच से बहुत दूर था। इस धधकती ज्वाला को अपने भीतर जलाये हुए प्रदीप एक खंडित व्यक्तित्व को जी रहा था। नलिन के अख़बार सांध्य साक्षी के जरिए उसकी व्यथा कथा प्रकाशित होकर नगर में हलचल मचा देती है। प्रबल राजनैतिक दबाव के बाद समय अंतत: न्याय करता है। कातिलों को उनके कर्मों की सजा ईश्वरीय दंड के रूप में मिलती है। इस बार सजा देने में अहम् भूमिका मनीषा की रहती है। वह अपने कथन को साकार करती है कि समय आने पर नारी को काली और विषधर बनना चाहिए। 
सरल संवाद शैली में लिखित उपन्यास के घटनाक्रम से पाठक सहज ही जुड़ता चला जाता है। नि:संदेह उपन्यास कथा रोचक एवं बनावटहीन है। मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि पर बने गए तीनों कथानकों का ताना बाना कुछ अधिक गहराई और बारीकी से बुना जा सकता तो यह उपन्यास हिंदी के श्रेष्ठ उपन्यासों में गणनीय होता।   
विषपाई का अमृत कलश - महेश महदेल 
डॉ. राजलक्ष्मी शिवहरे  कृत उपन्यास विषपाई मूल्यों की तपिश में रच-बसकर मन को तृप्ति का गहरी अनुभूति दे जाता है। पत्रों को जीते हुए बहुआयामी लेखन की धनी साहित्य साधिका ने अनकही मार्मिकता को स्वर दिया, विचार दिया। बाहुबलियों के आतंक का प्रतिकार करती जिजीविषा को न्याय की भाषा दी। लेखन कला, शब्द  चयन,अर्थवत्ता पूर्ण शैली, पाठक को बांधकर रखती कथा का समन्वय है विषपाई। सरोकारों के समर्थन और भटकाव वाले इस युग में समुद्र बीच दीपस्तंभ जैसा यह उपन्यास अपना स्थान बनाएगा। पत्रकरिता का कंटकाकीर्ण मार्ग, राजनैतिक भ्रष्टाचार, विष से विष का उपचार करना, अमृतमंथन का सा संघर्ष और अंतत: अमृत कलश की प्राप्ति। स्वनामधर्मिकता के लेखनः के दौर में यह कृति वजनदारी में यथेष्ट है। 
(३७) 
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कृति सलिला:
श्रद्धा और भक्ति समन्वय -रामायण दर्शिका - जयप्रकाश श्रीवास्तव  
[विषपायी , उपन्यास, प्रथम संस्करण २०१९, आकार २२.५ से.मी. x १४ से.मी. आवरण सजिल्द बहुरंगी जैकेट सहित, पृष्ठ ९६, मूल्य २५०/-, पाथेय प्रकाशन जबलपुर]
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कृति में राजलक्ष्मी जी ने राम को एक पात्र के रूप में प्रस्तुत किया है। राम के मानवीय रूप को उद्घाटित करने के मूल में लेखिका का उद्देश्य राम के जीवन को आदर्श रूप में प्रस्तुत करना है। पुस्तक में आत्मकथ्य के पश्चात भगवान राम और रामायण की आरती से शुभारंभ कृति के प्रति श्रद्धा जगाता है। सूची में बालकाण्ड, अयोध्याकाण्ड, अरण्यकाण्ड, सुंदरकाण्ड, युद्धकाण्ड के पश्चात् रामनवमी का एक विशेष खण्ड है। बालकांड में रामायण और समाज के संदर्भ से लेखिका ने राम के अटूट विश्वास, श्रद्धा तथा आज्ञा-पालन के साथ-साथ अनाचार दूर करने के प्रण को सामने रखा है। राम-जन्म, शिक्षा-दीक्षा व विवाह तक की कथा रामायण और तुलसीकृत मानस के अनुसार है। बीच-बीच में इन्ही ग्रंथों की पंक्तियाँ देकर कथा-क्रम को आगे बढा़या गया है। अयोध्या कांड में राजलक्ष्मी जी ने राम के राजा योग्य गुण, पितृ भक्ति, निषाद प्रसंग, श्रवण कथा, भरत द्वारा शपथ एवं भातृ-भक्ति के माध्यम से राम के अनेक रूपों को उकेरा है। अरण्यकांड में अगस्त आश्रम, सूर्पणखा आगमन, खरदूषण वध, एवं सीता-हरण के बारे में लिखा है। सुंदर कांड में सीता की खोज का सम्पूर्ण घटनाक्रम रोचक है। अंतिम युद्ध कांड में रावण वध, लंका विजय और विभीषण राज्याभिषेक, राम का अयोध्या आगमन और राजतिलक का वर्णन है। क्षेपक में रामनवमी का महत्व वर्णित है। रामायण दर्शिका में राम के मानवीय मूल्यों की चर्चा प्रयुक्त उद्धरण वाल्मीकि रामायण, एवं रामचरित मानस से ही लिये गये हैं। बीच बीच में राम-सीता के मनोरम चित्र पुस्तक को गरिमा प्रदान करते हैं। अंत में इस पुस्तक के विषय में इतना ही कि यह एक श्रद्धा और भक्ति समन्वय और राम के प्रति लेखिका की आस्था का द्योतक है।
संपर्क - आई.सी.५ सैनिक सोसायटी, शक्ति नगर, जबलपुर ४८२००१ चलभाष - ७८६९१९३९२७।
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कृति सलिला:
मानवीय जिजीविषा की जयगाथा : 'बरनाली' - छाया त्रिवेदी, राजवीर सिंह  
[विषपायी , उपन्यास, प्रथम संस्करण २०१९, आकार २२.५ से.मी. x १४ से.मी. आवरण सजिल्द बहुरंगी जैकेट सहित, पृष्ठ ९६, मूल्य २५०/-, पाथेय प्रकाशन जबलपुर]
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 बुंदेलखंड में लोकगीत बम्बुलिया गायन की परंपरा है। खेतों  में मचानों पर करने किसान अकेलेपन को मिटाने के लिए एक  गीत पंक्ति  हैं, दूर किसी अन्य खेत में कोई अन्य सुनकर अगली पंक्ति जोड़ देता और यह क्रम निरंतर चलता रहता है। गायक अपरिचित होने पर भी लय मिलाकर गीत की कड़ी जोड़ते रहते हैं। कुछ इसी तरह का प्रयोग डॉ. राजलक्ष्मी शिवहरे के निर्देशन, छाया सक्सेना व् ऋतु गोयल के संपादन में साहित्य संगम संस्था के तत्वावधान में संभवत: पहली बार २५  अपरिचित लेखिकाओं ने दूर-दूर रहते हुए कड़ी-कड़ी जोड़कर उपन्यास पूरा किया। नायिका बरनाली जन्मजात पंगु है। अदम्य जिजीविषा से संघर्ष कर वह असाधारण सफलता पाकर वह औरों के कष्ट दूर करती है, सुयोग्य जीवनसाथी  पाती है। बरनाली का संघर्ष मर्मस्पर्शी है, सहृदय पाठक की आँखों में अश्रु आये बिना नहीं रहते। असम की लोक संस्कृति का  चित्रण स्वाभाविक है।  अस्मि लोकगीतों की पंक्तियों का हिंदी काव्यानुवाद या अर्थ दिया जाता तो पाठक उनके अर्थ ग्रहण कर पाता। 
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काव्यमेध : सरस काव्य संग्रह - मीना भट्ट
चित्र में ये शामिल हो सकता है: Krishna Rajput, बाहर और क्लोज़अप[काव्य मेध, काव्य संग्रह, राजलक्ष्मी शिवहरे, २०१९, २१.५ से.मी. x १४ से.मी.  बहुरंगी पेपरबैक, पृष्ठ २४ साहित्य संगम इंदौर]
राजलक्ष्मी शिवहरे की १७ कविताओं वंदना, पर्यावरण, पूस की रात, सोना, मकर संक्रांति, सहारा कोइ नहीं देता, सैनिक, परिणाम, फरेब, बेटी, भारत की आन, चंचल, परिवर्तन, ऐसी अमर कहानी हो, अक्स, महादेवी वर्मा तथा जंगल में राष्ट्रीय भावधारा, पर्यावरण चेतना, सामाजिक विसंगतियों आदि को केंद्र में रखा गया है। संकलन के आरंभ में शक्ति वंदना भारतीय काव्य परम्परा का निर्वहन है। कविताओं का भाव पक्ष और  कला पक्ष संतुलित,शब्द सौष्ठव मोहक और विषय सम सामयिक हैं।  शिव कुमारी शिवहरे के अनुसार कविताओं में मानवीय संवेदनाओं को बारीकी से उकेरा गया है। आरती अश्वमेध की परंपरा से काव्यमेध से जोड़ती हैं। डॉ. महालक्ष्मी सक्सेना 'मेधा' रचनाओं की परिपक्वता तथा विषय वैविध्य  की प्रशंसा  हैं। छगन लाल गर्ग भावों की एकाग्रता पर मुग्ध हैं। (मँहगे कागज, हर पृष्ठ पर अनावश्यक चित्रों तथा रंगों की तड़क-भड़क खलती है। गंभीर रचनाओं की प्रस्तुति सादगीपूर्ण होनी चाहिए। -सं) 
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हिंदी और गाँधी दर्शन : गागर में सागर - बसंत शर्मा   
[हिंदी और गाँधी दर्शन, गद्य, प्रथम संस्करण २०१८, आकार २०.५ से.मी. x १४.२ से.मी. आवरण पेपरबैक बहुरंगी, पृष्ठ ३२, मूल्य ५५ /-, अंतरा प्रकाशन बालाघाट।]
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हिंदी साहित्य की प्रतिष्ठित हस्ताक्षर डॉ. राजलक्ष्मी शिवहरे लेखन के विधा वैविध्य, गुणवत्ता तथा मात्रा तीनों में अपनी मिसाल आप हैं। 'हिंदी और गाँधी दर्शन' आपके गंभीर निबंधात्मक गद्य लेखन की बानगी प्रस्तुत करता है। गांधी जी के उद्धरण "वह राष्ट्र गूंगा होता है जिसकी राष्ट्रभाषा नहीं होती" तथा "मेरा विरोध अंग्रेजी से नहीं अंग्रेजियत से है'' से आरंभ यह कृति भारत की भाषा समस्या पर गंभीर मनन करती है। १४ सितंबर १९४९ को हिंदी का भारत की राजभाषा घोषित किये जाने के बाद भी राजभाषा न बन पाना तथापि १०२२० लाख हिंदी भाषियों के बल पर विश्व में सर्वाधिक बोली जानेवाली भाषा बनना, १९१८ में ८ वें हिंदी साहित्य सम्मेलन इंदौर में बापू द्वारा हिंदी का समर्थन आदि ऐतिहासिक तथ्यों, भारतेन्दु, दद्दा, पंत आदि के काव्य उद्धरण आदि प्रस्तुत करते हुए लेखिका ने गागर में सागर समाहित करने में सफलता पायी है। गुरुदेव रविंद्रनाथ का उद्धरण "जिस हिंदी भाषा के खेत में ऐसी सुनहरी फसल फली है, वह भाषा भले ही कुछ दिन वैसी ही पडी रहे तो भी उसकी स्वाभविक उर्वरता नहीं मर सकती। वहाँ फिर खेती के सुदिन आएंगे और पौष मॉस में नवान्न उत्पन्न होगा" में हिंदी है स्वर्णिम भविष्य प्रतिबिंबित है। केवल ३२ पृष्ठ की पुस्तिका का मूल्य ५५ रु. अत्यधिक है। 
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'सृजन समीक्षा' उपयोगी परिचय पुस्तिका - मिथलेश बड़गैयां   
चित्र में ये शामिल हो सकता है: 1 व्यक्तिचित्र में ये शामिल हो सकता है: Mithlesh Badgainya, क्लोज़अप[हिंदी और गाँधी दर्शन, गद्य, प्रथम संस्करण २०१८, आकार २०.५ से.मी. x १४.२ से.मी. आवरण पेपरबैक बहुरंगी, पृष्ठ १६, मूल्य ४०/-, अंतरा प्रकाशन बालाघाट।]
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प्रस्तुत पुस्तिका में संस्कारधानी जबलपुर की सुपरिचित लेखिका डॉ. राजलक्ष्मी शिवहरे का संक्षिप्त जीवन परिचय, आत्मकथ्य, ५ कवितायें (सृजक का सृजन, मैं हिंदी हूँ, माँ, जिंदगी के मेले तथा बारिश की फुहार) और उनके कुछ पाठकों (राजीव थेपरा, नीरजा मेहता, शैलेन्द्र सोम, कृष्ण कुमार सिसोदिया, अवदेश अवध, तेजराम गहलोत, प्रमोद जैन, रजनी कोठरी व् प्रीती सुराणा के अभिमत सम्मिलित हैं। ऐसी परिचयात्मक पुस्तिका की उपयोगिता असंदिग्ध है किन्तु तब जब इन्हें साहित्यिक आयोजनों में निशुल्क वितरित किया जाए। मात्र १६ पृष्ठ की पुस्तिका का मूल्य ४०/- रख जाना औचित्यहीन है। 
(३९)
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'घरौंदे'   - विनीता श्रीवास्तव   
चित्र में ये शामिल हो सकता है: 1 व्यक्तिफ़ोटो का कोई वर्णन उपलब्ध नहीं है.[घरौंदे, गद्य, प्रथम संस्करण २०१९, आकार २०.५ से.मी. x १४.२ से.मी. आवरण पेपरबैक बहुरंगी, पृष्ठ ३२, मूल्य ५५/-, अंतरा प्रकाशन बालाघाट।]
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कहानी और उपन्यास लेखन में प्रवीण डॉ. राजलक्ष्मी शिवहरे के ७ कहानियों का यह संग्रह पठनीय है। 'घरौंदे' में विधवा विवाह, 'सारांश' में दिवंगत की दो विधवाओं द्वारा ताल-मेल, 'थोड़ा सा पुण्य' में पिता की संपत्ति हेतु चिंतित समृद्ध बेटे और सेवा के लिए तत्पर कम समृद्ध बेटी-बेटे, 'समझदार' में विधुर से विवाह कर उनके बच्चों के अपनाती कुँवारी डॉक्टर, 'चेतना के क्षण' में नगरीय व्यस्तता के बीच भी अपनी जिंदगी जीते पति-पत्नी, 'विभूति' में विवाह बिना भी जीवन का आनंद लेती जिम्मेदार डॉक्टर युवती तथा 'परिष्कार' में दो पीढ़ियों के बीच अंतर को केंद्र में रखा गया है। कहानियाँ रोचक, पठनीय और उद्देश्य पूर्ण हैं।
(४०)
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'अभिसारिका' सरस कहानी संग्रह - डॉ. दिनेश कुमार गुप्ता 

चित्र में ये शामिल हो सकता है: बाहर, प्रकृति और पानी[अभिसारिका, कहानियाँ, प्रथम संस्करण २०१८, आकार २०.५ से.मी. x १४.२ से.मी. आवरण पेपरबैक बहुरंगी, पृष्ठ ३२, मूल्य ६०/-, अंतरा प्रकाशन बालाघाट।]
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डॉ. राजलक्ष्मी शिवहरे की १२ कहानियों का ३२ पृष्ठीय अति मँहगा लघु कहानी संग्रह अभिसारिका अंतरा प्रकाशन बालाघाट से प्रकाशित हुआ है। अभिसारिका तीन अंकों में लिखी गयी कहानी है जिसकी समृद्ध नायिका जो प्रकाशक है अपने अधीन काम कर रहे विवाहित युवक की और आकर्षित है। कहानी 'रूपकिरण' में छोटे परिवार तथा पुत्रियों को पुत्र समान समझने का, कहानी 'कोपलें' बालशिक्षा से उज्जवल भविष्य का, 'सुप्रिया' में महिलाओं के आर्थिक स्वावलंबन, 'प्रेम' में निस्वार्थ-निश्छल लगाव, सूझ बूझ में व्यावहारिकता, 'डिब्बी का मोती' में सत्कार्यों से सत्फल, बेताबी में दिशाहीन संबंध, 'बंदगी' में प्रेम पर सामाजिक दायित्व को वरीयता, 'कंदरा में गैर जिम्मेदार पुत्र और माँ की जिम्मेदारी उठाती पुत्री तथा संगम में जल प्रदूषण संबंधी कथानक है। कुछ कहानियाँ लघु कथा की तरह हैं। मात्र ३२ पृष्ठ की पुस्तिका की कीमत ६०/- अत्यधिक है। ऐसे प्रकाशन पाठकों की पहुँच से बाहर होते हैं।
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चित्र में ये शामिल हो सकता है: पौधा, फूल, प्रकृति और पाठ'वो खूबसूरत है' एक सरस कहानी  - डॉ. दिनेश कुमार गुप्ता 


[वो खूबसूरत है, एक कहानी, प्रथम संस्करण २०१८, आकार २०.५ से.मी. x १४.२ से.मी. आवरण पेपरबैक बहुरंगी, पृष्ठ १६, मूल्य ४०/-, अंतरा प्रकाशन बालाघाट।]
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डॉ. राजलक्ष्मी शिवहरे ने इस कहानी में एक कर्तव्यनिष्ठ युवती जानकी का चरित्र उकेरा है जो वैयक्तिक ख़ुशी पर सामाजिक मान्यता को वरीयता देती है। जानकी अपने प्रेमी राम से सामाजिक रूढ़ियों के कारण विवाह न कर पाने पर भी उसके हर दायित्व निर्वहन में सहायक होती है। भारतीय समाज से जाति प्रथा समाप्त हो तो युवाओं को अपनी खुशियों की बलि न देनी पड़े। अत्यधिक छोटे आकार के अक्षरों में मात्र १६ पृष्ठ की इस पुस्तिका का मूल्य ४०/- उचित प्रतीत नहीं होता। डॉ. राजलक्ष्मी जी प्रतिष्ठित लेखिका हैं। ऐसी छोटी और मँहगी पुस्तिकायें उनकी कीर्ति के अनुकूल प्रतीत नहीं होतीं।
*

टूट-टूट कर जुड़ता : 'बंधन' - अविनाश ब्योहार

चित्र में ये शामिल हो सकता है: एक या अधिक लोग और बाहर[बंधन, कहानी, डॉ.राजलक्ष्मी शिवहरे, आवरण बहुरंगी पेपरबैक, पृष्ठ ३२, मूल्य ६०रु., अंतरा प्रकाशन बालाघाट]
*
संबंधों को सुविधानुसार ओढ़ने-बिछाने, मन टूटने पर आत्मघात, अपंगता पर विजय आदि समेटे, घटना बहुल रोचक कहानी। लघ्वाकारी मँहगी पुस्तिका छाप कर हिंदी का अहित करता प्रकाशन। 'बंधन' में दो कहानियाँ, कहानियों के विषय समसामयिक तथा वर्तमान भोगप्रधान जीवन शैली से उपजी विसंगतियों और टकराव-समायोजन के मध्य बंधन में  'शादी  पवित्र बंधन है' तथा  'दो साल' में 'पारस को छूकर लोहा भी सोना हो जाता है का' सर्वकालिक निष्कर्ष।  कहानी कहने की कला में  राजलक्ष्मी जी सिद्धहस्त हैं, कम शब्दों में अधिक कहने का फन उनमें है।
(४०)
 *
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बृजेश शर्मा 'विफल' - राजलक्ष्मी शिवहरे जी की रचनाओं को बतौर पाठक अपने दिल के बेहद करीब पाता हूँ।अपनी लोकप्रिय औपन्यासिक रचनाओं में वे जिस तिलिस्म को रचती हैं उससे सहज ही अभिभूत हो जाता है। बेहद साढ़े कथ्य के साथ सरल भाषा सीढ़ी जेहन में उतरती जाती है। उपन्यास और कहानियों में वे अपने फन की उस्ताद हैं। लघुकथाओं में रोजमर्रा की ज़िंदगी से जो उठती हियँ, सहजता से कह देती हैं। उनकी कविताओं में कविताई एक सरल रेखा की मानिंद है, शिल्प लुप्तप्राय है, कथ्य की गहनता कम हे मिलती है। उनका उपन्यास विषपायी नारी मन की कोमलतम अभिव्यक्ति से लबरेज है। एक सृजनकार जो लिखता है वह आपबीती, जगबीती और कल्पनाओं का कोलाज होता है। जितने वसीह तरिके से आप दुनिया को देखते हैं लेखन उतना ही प्रभावी होता है। बिषपायी में लेखिका नारी मन के द्वन्द को उकेरने में सफल है। सनातन सत्य की सार रूप में प्रस्तुति "हर प्रश्न का उत्तर नहीं होता और यदि है तो वह उत्तर समय देता है।" इसी तरह "आत्मीयता बिना किसी रिश्ते के भी कायम हो जाती है" कितना वर्स्टाइल वाक्य है। उपन्यास के गौड़ अंतर्कथाएं मुख कथा के विकास में सहायक हैं। उपन्यास का हर पात्र अपने हिस्से का विष पीकर विषपाई है मगर यह विष अंतस की हीलिंग करता है। सुखांत परक उपन्यास का संदेश सर्वकालिक है कि छोटी छोटी खुशियां जीवन में अमृत का काम करती हैं, जीवन के प्रति आस्था जगाती हैं और मनुष्य खुश रहता है।
 (४१)
                                                                                                       *
संस्कारधानी की लोकप्रिय कवियत्रि और लेखिका डाॅ. राजलक्ष्मी शिवहरे की अनेक प्रकाशित कृतियों को मैने अध्ययन किया है और अब उनकी नवीनतम कृति ‘‘श्रीमदभागवत प्रकाश भाग-2’’ भी पढ़ने मिली, जो लेखिका के आध्यात्मिक ज्ञान और विद्वत्ता का परिचायक है। श्रीमद्भागवत पर देश के अनेक विद्वानों ने अपने विचार अभिव्यक्त करते हुए इस महापुराण को मोक्ष प्राप्ति में समर्थ निरूपित किया है। डाॅ. राजलक्ष्मी शिवहरे ने अत्यंत सरल भाषा का उपयोग किया है ताकि आम आदमी भी इस कृति का अध्ययन, मनन कर सके। इस दृष्टि से यह कृति महत्वपूर्ण है। वस्तुतः नर, नारायण का ही अंश है। नर को नारायण से मिलाने का कार्य श्रीमद्भागवत करती है। मानव-आत्मा को 84 लाख योनियों में भटकने से रोकने का उपाय बताती है श्रीमद्भागवत। मानव-जीवन संसार-सागर में भटकती हुई नौका के समान है। श्रीमद्भागवत एक पतवार है, जिसके सहारे मनुष्य यह भवसागर पार कर सकता है। इसके अध्ययन से हमें ‘भद्रं कर्णेभिः श्रणुयाम’ अर्थात् मंगलकारी वचन सुनने, ‘मित्रस्य चक्षुषा समिक्षामहे’, सबको परस्पर मित्र भाव से देखने की प्रेरणा मिलती है। श्रीमद्भागवत आपके प्रत्येक व्यवहार को भक्तिमय बना देती है। आध्यात्मिक, अधिदैविक तथा अधिभौतिक तीनों प्रकार के ताप नष्ट करने वाली संजीवनी वूटी है श्रीमद्भागवत। इसीलिए भागवत परायण को ज्ञान यज्ञ कहा जाता है। पाठकगण इस कृति का अध्ययन कर सद्ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। इस महत्वपूर्ण कृति की रचियता डाॅ. राजलक्ष्मी  शिवहरे का हार्दिक अभिनन्दन। अनंत मंगल कामनाएँ...।
 कृष्णकुमार शुक्ल (कवि, लेखक, पत्रकार) त्रिमूर्ति नगर, जबलपुर (म.प्र.) 



विषपाई का अमृत कलश
समीक्षक - महेश महदेल, वरिष्ठ पत्रकार और अध्यक्ष

आठ- दस दिन से टेबिल पर पड़ी किताब, लगता रहा कि वह कुछ कह रही है। बिना पढ़े अक्षरों का शीषर्क शायद कराण रहा। ‘‘औरत ऐसी ही होती है मनीषा । ऐसे कथानक उपन्यास कहानी में सिलसिलेवार चले हैं। लेकिन ‘‘विषपाई’’ की उपन्यासिका डाॅ. राजलक्ष्मी शिवहरे ने गहरे डूबकर समाज में डुबकी लगाई भारतीय शहरी जीवन की दैनंदिनी में सुहास की गंध के लिए उपन्यास प्रेरित करता है। औरत के दिल-दिमाग की राजधानी में वह खुद नहीं बसाती, उसका अक्श वहां कहीं नहीं होता , उसकी  सल्तनत सभी स्वीकारते है; लेकिन उसका जीवन परिवार की छांह देने में ही गुजरता है। डाॅ. राजलक्ष्मी का नवीनतम उपन्यास ‘‘विषपाई मूल्यों की तपिश में रच - बस कर मन की गहरा अहसास दे जाता है। कृति का कथ्य, कहन के करिश्मा के कमतर कैसे कहैंगे? पात्रों को जीते हुए बहुआयामी लेखन की धनी साहित्य साधिका ने अनकही मार्मिकता को स्वर दिया, विचार दिया उसकी मजबूरियों को, न्याय की भाषा दी । नारी मन की थाह पार्थ उलीचा , पुरूष की चंचलता भर नहीं उसकी गहराई में रचनाधर्मिता की उंचाई पाई । लेखन की कला , शब्द चयन, संयोजक अर्थविता उनकी अपनी शैली है, जिसमें पाठक को न केवल अपने साथ बांध लेती है बल्कि उसे चिन्तन की डगर पर लाकर गलियों - सड़कों से लेकर नीरव सन्नाटे का भी अहसास करा देती है। एकांत को चाहत वाले नारी या पुरूष मन के आंतरिक सृजन के रूप में ‘‘विषपाई’’ हृदयान्वेशी , मानवीय साहित्य में अपना स्थान बनाएगा, यह उम्मीद आदि से अंत तक पाठक अनुभूत करता है। सरोकारों के समर्थक और भटकाव वाले  कलयुग में समुद्र के दीप स्तम्भ जैसा बना यह उपन्यास साहित्य में स्थान पायेगा । ‘‘नीलकंठी’’ भी प्रासंगिक है। पत्रकारिता के मार्ग का निर्वाह , कलम की बेबाकी कितनी कठिन है, उसकी झलक, चरित्र चित्रण का व्याकरण बन बेठा है। राजनैतिक भ्रष्टाचार और उसकी ‘‘परिचित ताकत’’ संदेशबाहक है। ‘‘ अमृत मंथन’’  का संघर्ष जेहन में आ जाता है। ‘‘विषपाई’’ में भी अमृत कलश है। स्वनामधर्मिकता के लेखन के दौर में यह कृति वजनदारी में यथेष्ट है। समिक्षा मांगलिक वचन के निर्वाह में इतना ही श्रेयस्कार हैं । 

                  समीक्षक - महेश महदेल

                                  (वरिष्ठ पत्रकार और अध्यक्ष)
          
         
     


डॉ. राजलक्ष्मी शिवहरे 
*
ब्रजेश शर्मा 'विफल', झाँसी

डॉ. राजलक्ष्मी शिवहरे की रचनाओं को बतौर पाठक, अपने दिल के बेहद करीब पाता हूँ। समाधि, धूनी, पिघलते पाषाण, दूसरा कैनवास आदि लोकप्रिय औपन्यासिक रचनाओं में वे जिस तिलिस्म को रचती हैं, उससे पाठक सहज ही अभिभूत होता जाता है। बेहद सधे कथ्य के साथ सरल भाषा, सीधी ज़ेहन में उतरती जाती है । रचनाओं को समझने के लिए किसी अतिरिक्त मशक़्क़त की ज़रूरत नहीं होती । ये उनकी बड़ी सफलता है । उपन्यास या बड़ी कहानियों में वे अपने फन की उस्ताद हैं । लघु कथाओं में रोजमर्रा की ज़िन्दगी से जो वो उठाती हैं, सहज और सपाट बयानी से कह देती हैं । कहानियों का अनिवार्य तत्व, जिस ट्विस्ट या औचकता की , पाठक मन चाह करता है, वह अक्सर उपलब्ध रहता है मगर उनकी कविताएँ एक सरल रेखा जैसी हैं जिनमें शिल्प लुप्तप्राय है। कथ्य की जिस गहनता की माँग, एक कविता करती है वह कम ही मिलती है । उपन्यास की ही सी शक़्ल, पा जाती हैं उनकी कविताएँ । उनके विशिष्ट और नये उपन्यास विषपाई के बारे में••••• औरत की ज़िन्दगी ऐसी ही होती है मनीषा । अपने बारे में उसे सोचने का समय ही कहाँ मिलता है ।हमारी माँ भी ऐसी
ही थी नारीमन के कोमलतम पक्षों की अभिव्यक्ति से लबरेज़, विषपाई उपन्यास,, अपनी थीम् पंक्तियों से ही आकृष्ट करता है । दरअसल एक सृजन कार जो भी लिखता है, वो आपबीती, जगबीती और कल्पनाओं का कोलाज़ होता है । जितना वसीह तऱीके से आप दुनिया को देखते समझते हैं,, लेखन उतना ही प्रभावी होता है । आ डॉ राजलक्ष्मी शिवहरे जी के उपन्यास की बात करूँ तो, उस का तानाबाना और सामाजिक परिवेश हर किसी का देखा सुना या भोगा हो सकता है । नारी मन के द्वंद को उकेरने में, उपन्यास पूर्णतः सफल है । और कितनी शाश्वत बात, एक माँ की और से बाल नायिका को समझा दी जाती है कि हर प्रश्न का उत्तर नहीं होता ।
और यदि है तो वो उत्तर समय देता है । नायक नलिन का पत्नि के प्रति लगाव के, बावजूद किसी और महिला के प्रति झुकाव, नायिका एक अंतर्द्वंद के बावजूद सहजता से स्वीकार कर
लेती है ।

राधा सुनो विचलित मत होना। धैर्य बनाकर रखो, कोई भी पुरुष बाहर चाहे जो करे, पर अपने घर को साफ सुथरा ही पसन्द करता है,, सहेली दीपा का ये कथन नायिका अनुराधा को सहज ही तमाम द्वन्दों से उबार लेता है । तभी तो वह नलिन को अपनी मित्र मोहिनी के साथ, जाने की , अनुमति सहजता से दे देती है । और नलिन का वापस लौटना, उसके सहज विश्वास की ही जीत है । आत्मीयता बिना किसी रिश्ते के भी कायम हो जाती है।
कितना गहरा और वर्सेटाइल वाक्य है ।
मनीषा और पुनीत की नोंक झोंक, उपन्यास के भीतर की अंतर्कथाएँ, छात्र प्रदीप पटेल की दहशत और उसे उससे उबारकर, दोषियों को सजा दिलाने का काम , वसीम रुखसार की खूबसूरत जोड़ी , रुखसार को नलिन द्वारा अवसाद से उबारना, शिक्षक अनुराधा का लेखक अनुराधा में रूपांतरण , हर पात्र अपने अपने हिस्से का विष पीकर विषपायी तो है ,, मगर ये विष अंतस् की हीलिंग करता है । जो लेखिका की कलम की बड़ी उपलब्धि है । सुखान्त उपन्यास अंत में जो सन्देश देता है वो सर्वकालिक है। छोटी छोटी खुशियाँ जीवन में अमृत की बूंदों का काम करती है। जीवन के प्रति आस्था जगाती हैं और मनुष्य विषपाई होकर भी खुश प्रतीत होता है ।

छोटे कलेवर का उपन्यास बेहद पठनीय है । नलिन की उम्र का 40 बताया जाना टँकण त्रुटि है । अगले संस्करण में इस त्रुटि पर संज्ञान लिया जाना चाहिए । पाथेय प्रकाशन जबलपुर से प्रकाशित, हार्ड बॉउण्ड, 250 रूपये मूल्य का खूबसूरत ,, उपन्यास बढ़िया कागज़ पर मुद्रित है । समस्त टीम साधुवाद की पात्र है । और एक खूबसूरत उपन्यास के लिए,जहाँ प्रवाह बेहद सरल और अनायास ही है,वहाँ सायास कुछ नहीं, लेखिका भी बधाई की पात्र हैं

***




राजलक्ष्मी रचनाएँ 
आधुनिक संस्कृति
डॉण्राजलक्ष्मी शिवहरे

आज आधुनिकता का जमाना है।सभी के हाथ में मोबाइल होता है।यहाँ तक कि बाइयों के पास भी।घरों में टीवी फोन सब होता है। गुगल का जमाना है जो जानकारी चाहिए मिल जाती है।इलेक्ट्रॉनिक काजमाना है।वायुयान की यात्रा अब सुलभ है।
यदि हम इन सबका उपयोग करते हैं तो आधुनिक कहलाते हैं आधुनिक होना बुरा भी नहीं है।पर अति हर चीज की बुरी होती है।चालीस पचास साल में ह्दयरोग से पीडित होकर कालकवलित होना क्या आधुनिकता की निशानी है।छोटे छोटे बच्चों की आँखों पर चश्मा चढ गया है। स्पेंडोलाइटिस ने गले पर पट्टा चढा दिया है।
आइये आधुनिकता का अंधानुकरण छोड कर भारतीय संस्कृति को अपनाइये।सुबह उठकर घूमिए।आराम देह कपडे पहनिए।
आधुनिक बनना बुरा नहीं पर दूसरों को फूहड समझना कि वो जिन्स नहीं पहनता हिंदी बोलता है कमतर आँकना गलत है छप्पन इंच की चौडी छाती ने  हिला दिया हिन्दुस्तान।लोग दाँतो तले ऊँगली दबायेंगे। और कहेंगे जय श्री राम। अच्छे दिन आ गये।हर घाट पर सिंह छा गये। बकरे दुम दबा कर भाग गये। सियार कहीं मुँह छिपाये पडें होंगे। जय श्री राम।
*
एक व्यक्ति बुद्ध के पास आया। उसने कहा मुझे शिष्य बना लीजिए। पहले
तुम कुछ सीख कर आओ। उसने संगीत
सीखा। हर कलाकारी सीखी। फिर वह तथागत के पास आया। कल जरूर तुम्हें
दीक्षा दुंगा। दुसरे दिन बुद्ध के
एक शिष्य ने उसे बहुत गाली दी। उस व्यक्ति को बहुत
क्रोध आया उसने भी गाली दी। वह बुद्ध के पास गया।

तुम्हें क्रोध आया।
हाँ।

तो अभी दीक्षा देना असंभव है।
चोरीए झूठ बोलनाए हिंसा है उसी प्रकार क्रोध भी हिंसा है।
यह मत सोचो तुम मेरे शिष्य नहीं। पर पहले इस लायक बनो।
वह बुद्ध का अनुयायी हुआ।
बुद्धं शरणं गच्छामि।
संघं शरणं गच्छामि
बुद्ध का जन्म नेपाल के लुम्बनी शहर में हुआ। बचपन में ही माता महामाया का
निधन हो गया। राजा शुद्धोधन ने दासियों के सहारे उनका पालन पोषण किया।
ज्योतिष ने कहा था या तो यह बालक सम्राट बनेगा या संत।
एक दिन वे कपिलवस्तु के मार्ग पर जा रहे थे तो एक रोगी दिखाए एक बूढ़ा फिर अर्थी
देखी। उसी
समय उनके मन में यह भावना आई कि मनुष्य की नियती यही है। राजा ने
उनका विवाह यशोधरा से किया। सात दिन के पुत्र को छोड़कर वे वनगामी हुये। आइये
बुद्ध की जीवनी पर हम सब मिलकर मीमांसा करें।
यद्यपि उन्होंने कठिन मार्ग चुना राजपाट छोड़ा। घर द्वार छोड़ा। सुन्दर सी पत्नी
छोड़ी। नवजात शिशु छोड़ा। मोह का त्याग ज्ञान की प्राप्ति के लिये किया। ये
तथागत के लिये ही संभव था।

बुद्ध तो बुद्ध हैं
समय समय की बात है। सांझ ढल गई थी। सामने पेड़ पर बहुत से जुगनु सितारों
की तरह चमक रहे थे। तभी
अंधेरे में एक परछाईं दिखी। अक्सर
अकेले रहती हूँ। डर लगा फिर पूछा.. कौन हैं क्या चाहिए। मैं
बुद्ध हूँ।
बुद्ध या उनके अनुयायी हैं आप मैं कुर्सी से उठ गयी थी।
तुम लेखिका हो इसलिए दर्द बाँटने आया हूँ। आइये
बैठिये। पानी लाती हूँ। पानी पीकर
वो बोले.. बहुत सारे आक्षेप हैं मुझ पर पत्नी को छोड़कर चला गया। बच्चे की देखभाल
नहीं की। वो तो मैं
भी सोचती हूँ। इतना बड़ा राजपाट था आपका फिर क्योंघ् मैं
बैचेन था। सारे सुख थे मेरे पास। पर लगता था मुझे कुछ खोजना है यह संसार किस
चीज के पीछे भाग रहा हैघ्
तथागत पैसे के लिये तो। उदरपूर्ति के बाद भी और और के पीछे।
बस यही संदेश देने गया था। हम जो हिंसा करते हैं पाप है ये। दुराचार नहीं करना।
वो तो ठीक है पर आम्रपाली को दिक्षा देने का मतलब।
आम्रपाली नगरवधू थी। बुद्ध की शरण में वह स्वेच्छा से आई थी। उसका उद्धार
मेरा कर्तव्य था।
वो तो ठीक है तथागत। पर आप सा बनना बेहद मुश्किल है।
वो चले गये। मैं रो रही थी। दुख सहकर फांसी पर ईसा चढ़े। जिसने भी इससे
बचाने की कोशिश की उसे ही जवाब देने पड़े। जहां
उनके चरण पड़े थे मेरा शीश उस जगह पर था। मैं
कितनी सौभाग्यशाली ।
*
गुरु महिमा
डॉण् राजलक्ष्मी शिवहरे
सूरज बिना सृष्टि नहीं।
गुरु बिन दृष्टि नहीं।
ज्ञान बिन जग में अंधेरा।
सतत प्रवाह बहे ज्ञान
की धारा।
ऊँगली उनको सौंप कर
मैं हो गई हूँ निहाल।
बचपन से लेकर अब तक
सीखा उनसे विनम्र
करना सबसे व्यवहार।
कुछ लाये नहीं कुछ लेकर
जाना नहीं।
छल एकपट से रहना दूर।
सीधा साधा जीवन
रखना ।
तुमसे कहना इतना मेरा
बस नाम को रखना
अपने गंगाजल जैसा
निर्मल पावन।
जीवन के बाद भी नाम
शेष रह जाता है।
*
विषय..हे अवधपति करुणा निधान
��������
हे अवधपति करुणा निधान।
भारत का हाल सुनाते हैं।
हर जगह दशशीश रावण
हम पाते हैं।
सीता सुरक्षित नहीं ए हर ली
जाती है।
पापी की कामवासना का
शिकार हो जाती है।
क्या कहें आपसे अपनी
दुर्दशा का हाल।
कन्याओं को भी भेडिये
कामवृति की भूख
का आहार बनाते हैं।
पशू से भी बत्तर ये
समाज में खुले आम
घूमते हैं।
हमारी दुर्दशा पर हम
खून के आँसू से
यह कहानी सुनाते हैं।
देर मत करो अवधपति
सुन लो समारी करुण पुकार।
*
नहीं मतलब नहीं

डॉण्राजलक्ष्मी शिवहरे

कुछ लोग समझते नहीं
बारबार समझाने पर
नहीं का मतलब है नहीं।
पर वे इन्तजार करते हैं।
और फिर बदलता है ना
हाँ मैं और हमसफर
साथ चल पडे बात बात में।
फिर हाँ क्यों की समय
बदलते देखा है कोफ्त
होती है हाँ क्यों की थी।
यही जीवन के दो पहलू
जो कभी चित कभी
पट होते हैं।
इसलिए ना मतलब ना है।
*
आमदनी

डॉण्राजलक्ष्मी शिवहरे

वह लडकी देखने गया था।
लडकी ने पूछा पगार क्या है
यही तीस हजार।
बस ये महीने भर की
आमदनी।
ओह फिर तो होगी खींचातानी।।
कभी इस खर्च में कटौति
कभी उस खर्च में।
नहीं मैनैज होगा मुझसे।
वह सरकारी डाक्टर है।
प्रायवेट प्रैक्टिस कर लेगा।
नहीं माँ इतने से में बिजली
का बिल ही पे नहीं होगा।
राशन फिर किटी फिर पार्लर
कैसे ये सब होगा।
माँ हैरत में थी। तेरे पापा को
मात्र तीन सौ मिलते थे।
हमने घर चलाया।
हाँ आपके सीले कपडे
पहन कर स्कूल में

सखियों ने माखौल उडाया।
वो मेरे बच्चे नहीं सहेंगे।
हर चीज ब्रांडेड होगी उनकी।
और आज भी वो कुमारी
ही रह गई है।
आमदनी पूछते पूछते
अकेली रह गई है।
*
रुप चौदसध्आस्था

डॉण्राजलक्ष्मी शिवहरे

भारत में यदि कुछ है तो आस्था ही है।
हमारे बुजुर्ग जो हमें बताते हैं हम उस पर विश्वास करते
हैं।ये परम्परा बन जाती है।
त्योहार हममें उत्साह प्रेम और विश्वास जगाने के लिये आते हैं।
रुप तो एक बार जैसा मिल गया।साँवले हों गोरे हों या मोटे या पतले
हो फिर रूपचौदस की पूजा करके हम सुन्दर कैसे हो जायेंगे ये प्रश्न
बच्चे पूछते हैं।
यम हमारा रुप नहीं देखते हमारे कर्म देखते हैं।कर्म सुन्दर करो
तो लक्ष्मी तो आपके घर जरुर पधारेंगी।
और आप समाज के लिये उपयोगी हो जायेंगे।समाज आपका
सम्मान करेगा।और आप गोरे हो या काले सभी के लिये वांछनीय
होंगे।
यही आस्था हमको रुप के साथ गुण की ओर प्रेरित करती है।
सुंदर तो डाकू भी होता है पर सभी उससे दूर भागते हैं।
सुंदर तो शराबी भी होता है पर कोई उसे पास नहीं बिठाता।
सुंदर तो आम्रपाली भी थी पर थी नगरवधू।
मुझे इसलिए लगता है भीतरी रुप को सजाना सँवारना चाहिए
वरना पार्लर वाली सुंदर बना ही देगी।
हमारी जागरुकता हमारे चरित्र निर्माण को लेकर हो आज इस
आस्था को जगाने की है।
रुपचौदस तभी सच्चे मायने में रुपचौदस होगा।
*
सीख
डॉण् राजलक्ष्मी शिवहरे
मैं बता रही हूँ तुझे जब आत्मा इस शरीर से अलग होती है तो वह बहुत शक्तिशाली हो जाती है।सीमा ने कहा।
मैं क्या करुँ। मेरी कुछ समझ नहीं पड रहा।
कितना समझाया था उसे हमारा मेल हो ही नहीं सकता। न तो जाति एक है।उम्र में भारी अंतर है।पर वह समझना ही नहीं चाहता
।राखी ने कहा।
सीख देते देते तू कब उससे प्रेम कर बैठी।
पता नहीं पर मेरी माँ मुझे कहती है तू बदनाम हो जायेगी।
मौसी तो जाने कब से इस संसार में नहीं।
बीस साल हुये।पर हर पल मैं क्या सोचती हूँ इसकी तक खबर है उन्हें।
सीमा लगता है ये दुनिया प्रेम के लिये बनी ही नहीं।
अब उसकी माँ...
क्याघ्
हाँ तीन दिन हुये उनकी रुख्सती को।
जिद पकडे हैं तू जल जायेगी।
राखी सही है। बडे सीख भले के लिये देते हैं पर मानता कौन है।
ये आत्माओं का संसार है। वो शरीर से अलग होने पर भी हमारा भला चाहते हैं।
जाती हूँ भोर होने वाली है।
सीमा रुक ना।
नहीं।मैंने भी शरीर छोड दिया है।कल तुझे खबर मिल जायेगी।
राखी को लगा वह कोई सपना देख रही थी।
लेकिन सुबह ही पेपर में पढा बीण्ई की छात्रा ने तिलवारा से कूद कर आत्महत्या कर ली।
प्रेमी ने धोखा दिया था।
*
हे लक्ष्मी माता

हे लक्ष्मी माता
मैंने अन्तर्मन
साफ किया है।
पर फिर भी
वह मुझे भरमाता।
हे लक्ष्मी माता।
उसका मन कैसे
साफ करुँ
कोई मार्ग दिखाओ
हे लक्ष्मी माता।
दहशत से भरा
जीवन है।
और राह अंधेरी।
मन में रोशनी
कैसेण्हो माता।
हे लक्ष्मी माता।
अपने दिमाग का
कूडा करकट
मेरे दिमाग में

फेंक कर जाता।
महोब्बत का
झाँसा देकर
मुझे उलझाता।
कैसे दिमाग
साफ करुँ
बडी उलझन
में जान फँसी माता।
कोई राह सुझावों
माता।
हे लक्ष्मी माता।
*


शब्द सुमन
रूचि शिवहै  'पूनम'
उज्वला निर्मला, ज्ञान की मूरत
शारदा की सुता, आन की सूरत
ज्ञान की बानी, लेखनी वरदानी
दिल को  छूती सदा, कविता कहानी
है अधर पर धरी





मधुर मुस्कान, स्वरों में जिनके विश्वास की जान,
दया, करूणा, प्रेम और रचनात्मकता की  है खान।
आपके लेखन का जादू मन में हर जजबात जगाता है,
आपका कलात्मक लेखन एक इतिहास बनाता है।
समाज में साकारत्मक चिंतन कुछ ऐसे ही होते हैं निर्मित,
आपकी है जैसे रचनायें इस हिन्दी साहित्य को अर्पित।
हिन्दी साहित्य को चरमोत्कर्ष में ले जाने में जो है आपका योगदान,
हमारे दिल में आपके प्रति श्रद्धा से करते हम सब आपका सम्मान।
जीवन स्वरूप का दर्पण,
महान बनाता है, आपको आपके लेखन का समर्पण।
शंाति प्रिय, शिक्षा प्रिय आपके लेखन का आह्ावान,
साहित्य में  उदित हो रहा है एक नव विहान।।
द्वारा समर्पित
रूचि शिवहरे
(पूनम)