गुरुवार, 17 अक्तूबर 2019

राष्ट्रीय शिक्षा नीति

Posted: 03 Aug 2019 06:15 AM PDT
विमर्श
माननीय मानव संसाधन विकास मंत्री,
मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार
नई दिल्ली – 110001 
विषय: राष्ट्रीय शिक्षा नीति
मान्यवर! 
           वंदे मातरम। 
० १. प्रकृति गर्भ से ही जीव को शिक्षित करना प्रारम्भ कर देती है। माता प्रथम गुरु होती है अत:,   माँ द्वारा उपयोग की जाती भाषा जातक की मातृभाषा होती जिसके शब्दों और उनके साथ जुडी संवेदना को शिशु गर्भ से ही पहचानने लगता है। विश्व के सभी शिक्षा-शास्त्री और मनोवैज्ञानिक एकमत हैं कि शिशु का शिक्षण मातृ भाषा में होना चाहिए। दुर्योगवश भारत में राजनैतिक स्वतंत्रता मिलने के तुरंत बाद अंग्रेजभक्त नेता, दल और प्रशासनिक अधिकारी सत्ता पर आ गए और मातृभाषा तथा राजभाषा उपेक्षित होकर पूर्व संप्रभुओं की आंग्ल भाषा शिक्षा पर थोप दी गयी। वर्तमान में सबसे पहली प्राथमिकता शिक्षा के माध्यम के रूप में पहला स्थान मातृभाषा फिर राज भाषा हिंदी को देना ही हो सकता है। अंग्रेजी का भाषिक आतंक यदि अब भी बना रहा तो वह भविष्य के लिए घातक और त्रासद होगा।

 ०२. शिक्षा की दो प्रणालियाँ शैशव से ही समाज को विभक्त कर देती हैं। अत:, निजी शिक्षण व्यवस्था को हतोत्साहित कर क्रमश; समाप्त किया जाए। राष्ट्रीय एकात्मकता के लिये भाषा, धर्म, क्षेत्र, लिंग या अभिभावक की आर्थिक स्थिति कुछ भी हो हर शिशु को एक समान शिक्षा प्राथमिक स्तर पर दी जाना अपरिहार्य है। इस स्तर पर मातृ भाषा, राजभाषा, गणित, सामान्य विज्ञान (प्रकृति, पर्यावरण, भौतिकी, रसायन आदि), सामान्य समाज शास्त्र (संविधान प्रदत्त अधिकारों व् कर्तव्यों की जानकारी, भारत की सभ्यता, संस्कृति, सर्व धर्म समभाव, राष्ट्रीयता, मानवता, वैश्विकता आदि), मनोरंजन (साहित्य, संगीत, नृत्य, खेल, योग, व्यायाम आदि), सामाजिक सहभागिता व समानता (परिवार, विद्यालय, ग्राम, नगर, राष्ट्र, विश्व के प्रति कर्तव्य) को केंद्र में रखकर दी जाए। बच्चे में शैशव से ही उत्तरदायित्व व् लैंगिक समानता का भाव विकसित हो तो बड़े होने पर उसका आचरण अनुशासित होगा और अनेक समस्याएँ जन्म ही न लेंगीं। 

०३. माध्यमिक शिक्षा का केंद्र बच्चे के प्रतिभा, रूचि, योग्यता, आवश्यकता और संसाधनों का आकलन कर उसे शिक्षा ग्रहण करने के क्षेत्र विशेष का चयन करने के लिए किया जाना चाहिए। प्राथमिक शिक्षा के विषयों में कुछ अधिक ज्ञान देने के साथ-साथ शारीरिक-मानसिक सबलता बढ़े तथा अभीष्ट दिशा का निर्धारण इसी स्तर पर हो तो कैशोर्य समाप्त होने तक बच्चे में उत्तरदायित्व के प्रति जागरूकता व् उत्सुकता होगी, साथ ही सामने एक लक्ष्य भी होगा। जिस बच्चे में किसी खेल विशेष की प्रतिभा हो उसे उस खेल विशेष का नियमित तथा विशिष्ट प्रशिक्षण उपलब्ध करा सकनेवाली संस्था में प्रवेश दे कर अन्य विषय पढ़ाए जाए। इसी तरह संगीत, कला, साहित्य, समाजसेवा, विज्ञान आदि की प्रतिभा पहचान कर स्वभाषा में शिक्षण दिया जाए। हर विद्यालय में स्काउट / गाइड हो ताकि बच्चों में चारित्रिक गुणों का विकास हो।  

०४. उच्चतर माध्यमिक स्तर पर हर बच्चे की प्रतिभा के अनुरूप क्षेत्र में उसे विशेष शिक्षण मिले। इस स्तर पर यह भी पहचान जाए कि किस विद्यार्थी में उच्च शिक्षा ग्रहण करने की पात्रता और चाहत है तथा कौन आजीविका अर्जन को प्राथमिकता देता है? जिन विद्यार्थियों में व्यावहारिक समझ अधिक और किताबी ज्ञान में रूचि कम हो उन्हें रोजगारपरक शिक्षा हेतु पॉलिटेक्निक और आई. आई. टी. में भेजा जाए जबकि किताबी ज्ञान में अधिक रूचि रखनेवाले विद्यार्थी स्नातक शिक्षा हेतु आगे जाएँ। हर विद्यार्थी में चारित्रिक विकास के लिए स्काउट / गाइड अनिवार्य हो।  

०५. विद्यार्थी स्नातक पाठ्यक्रम हेतु खुद विषय न चुने अपितु मनोवैज्ञानिक परीक्षण कर उसकी सामर्थ्य और उसमें छिपी सम्भावना का पूर्वानुमान कर उसे दिशा-दर्शन देकर उसके लिये सर्वाधिक उपयुक्त विषय, उस विषय के योग्यतम शिक्षक जिस संस्थान में हों वहाँ उसे प्रवेश दिया जाए। हर विद्यार्थी को एन. सी. सी. लेना अनिवार्य हो ताकि उसमें आत्मरक्षण, अनुशासन तथा चारित्रिक गुण विकसित हों।  आपदा अथवा संकट काल में वह अपनी और अन्यों की रक्षा करने के प्रति सजग हो।  

०६. शालेय शिक्षा की अंतिम परीक्षा में प्राप्त अंकों के आधार पर ही स्नातक कक्षाओं में प्रवेश हो। सभी चयन परीक्षाएँ तत्काल बंद कर दी जाएँ तो इन के आयोजन में व्यर्थ खर्च होनेवाली विशाल धनराशि, स्टेशनरी, कार्य घंटे, इनके आयोजन में हो रहा भ्रष्टाचार (उदाहरण व्यापम, बिहार का फर्जीवाड़ा आदि) अपने आप समाप्त हो जायेगा तथा अभिभावक को पैसों की दम पर अयोग्य को बढ़ाने का अवसर न मिलेगा। इससे शालेय स्तर पर गंभीरता से पढ़ने और अनुशासित रहने की प्रवृत्ति भी होगी।

०७. स्नातक स्तर पर विषय का अद्यतन ज्ञान देने के साथ-साथ विद्यार्थी की शोध क्षमता का आकलन हो। जिनकी रुचि व्यवसाय में हों वे इसी स्तर पर संबंधित विषय के प्रबंधन, कानूनों, बाज़ार, अवसरों और सामग्रियों आदि पर केंद्रित डिप्लोमा कर व्यवसाय में आ सकेंगे। इससे उच्च शिक्षा स्तर पर अयोग्य विद्यार्थियों की भीड़ कम होगी और योग्य विद्यार्थियों पर अधिक ध्यान दिया जा सकेगा।

०८. स्नातकोत्तर कक्षाओं में वही विद्यार्थी प्रवेश पायें जिन्हें शिक्षण अथवा शोध कार्य में रूचि हो। प्राथमिक, माध्यमिक, उच्चतर माध्यमिक, स्तर तक अध्यापन हेतु स्नातक शिक्षा तथा अध्यापन शास्त्र में विशेष शिक्षा आवश्यक हो। स्नातकोत्तर कक्षाओं में अध्यापन हेतु शोध उपाधि अपरिहार्य हो। 

०९ शोध निदेशक बनने हेतु शोध उपाधि के साथ पाँच वर्षीय अध्यापन अनुभव अनिवार्य हो जिसमें ७५% विद्यार्थी उच्च श्रेणी में उत्तीर्ण हुए हों।  

१०. तकनीकी (अभियांत्रिकी / चिकित्सा / कृषि ) शिक्षा- इन क्षेत्रों में उच्चतर माध्यमिक परीक्षा में प्राप्तांकों के आधार पर विद्यार्थी को प्रवेश दिया जाय। प्रतियोगिता परीक्षाएँ समाप्त की जाएँ ताकि विशाल धनराशि, लेखा सामग्री एवं ऊर्जा का अपव्यय और भ्रष्टाचार समाप्त हो। विद्यार्थियों को उपलब्ध स्थान के अनुसार  मनपसन्द शाखा तथा स्थान समाप्त होने पर उपलब्ध शाखा में प्रवेश लेना होगा। निजी अभियांत्रिकी महाविद्यालयों को शासन ने रियायती दर पर बहुमूल्य भूमि और अन्य सुविधाएँ उपलब्ध कराई हैं। इनके प्रबंधक प्राध्यापकों को न्यूनतम से काम पारिश्रमिक देकर उनका शोषण कर रहे हैं।  कम वेतन के कारण विषय के विद्वान् शिक्षक यहाँ नहीं हैं। औसत अंक लेकर उत्तीर्ण हुआ विषय का पूरा ज्ञान नहीं रखता तो वह विद्यार्थी को पूरा विषय कैसे पढ़ा सकता है? फलत: सा; दर साल अभियांत्रिकी उपाधिधारकों का स्तर निचे गिर रहा है। माननीय प्रधानमंत्री जी इस सन्दर्भ में कई बार चिंता व्यक्त कर चुके हैं। जिन निजी शैक्षणिक संस्थाओं के विद्यालय / महाविद्यालय घाटे में बताये जा रहे हैं उनसे शासन मूल कीमत देकर भूमि तथा वर्तमान मूल्यांकन के आधार पर भवन वापिस लेकर वहाँ अभियांत्रिकी या अन्य विषयों के शिक्षण संस्थान चलाए या भवनों का कार्यालय आदि के लिए उपयोग कर ले।   

१ १. तकनीकी शिक्षा का स्तर उठाने के लिये सभी परीक्षाएँ ऑन लाइन हों। प्रश्नों की संख्या अधिक रखी जाए ताकि नकल करना या प्रश्नोत्तरी किताबों से पढ़ने की प्रवृत्ति घटे और विषय की मुख्य पाठ्यपुस्तक से पूरी तरह पढ़े बिना उत्तीर्ण होना संभव न रहे। किसी विषय में शिक्षा प्राप्त युवा उसी क्षेत्र में सेवा या व्यापार कार्य करें। किसी पद के लिए निर्धारित से काम या अधिक योग्यता के उम्मीदवार विचारणीय न हों क्यों कि ऐसा न होने पर सामान योग्यताधारकों को समान अवसर के नैसर्गिक सिद्धांत का पालन नहीं हो पाता।  

१२. प्रशासनिक सेवाओं के अधिकारी तकनीकी क्षेत्र के कार्यों का प्रबंधन, मार्गदर्शन और नियंत्रण करते हैं इसलिए इन पदों के लिए तकनीकी शिक्षाधारी ही सुपात्र हैं। तकनीकी शिक्षा के पाठ्यक्रम में सम्बंधित विषय से जुड़े अथवा कार्यक्षेत्र में प्रयुक्त होनेवाले कानूनों, प्रबंधन शास्त्र, लेखा शास्त्र तथा प्रशासन कला से जुड़े प्रश्न पत्र जोड़े जाएँ ताकि तकनीकी स्नातक कार्य क्षेत्र में इनसे जुडी जिम्मेदारियों को सुचारू रूप से वहन कर सकें। तकनीकी उपाधि के समान्तर प्रबंधन और प्रशासन की उपाधि का अध्ययन कराया जा सकें तो ५ वर्ष की समयावधि में दो उपाधिधार युवक को अवसर प्राप्ति अधिक होगी।  

१३. शासकीय कार्य विभागों में ठेकेदारी हेतु अभियांत्रिकी में स्नातक होना अनिवार्य हो ताकि गैर तकनीकी ठरकेदारों से कार्य की गुणवत्ता न गिरे।

१४. अभियांत्रिकी पाठ्यक्रमों में मानक संहिताओं को सम्मिलित किया जाए। नेशनल बिल्डिंग कोड आदि विद्यार्थियों को रियायती मूल्य पर अनिवार्यत: दिए जाएँ।

१५. अभियंताओं की सर्वोच्च संस्थाओं इंस्टीट्यूशन ऑफ़ इंजीनियर्स, इन्डियन जियोटेक्निकल सोसायटी, इंडियन अर्थक्वैक सोसायटी आदि की मदद से पाठ्यक्रमों का पुनर्निर्धारण हो।  पूरे देश में एक समान पाठ्यक्रम हो। 

१६. इंस्टीट्यूशन ऑफ़ इंजीनियर्स के केंद्रों में सदस्य अनुभवी अभियंता होते हैं उनके कौशल और ज्ञान का उपयोग शासकीय योजनाओं के प्रस्ताव बनाने, कार्यों के पर्यवेक्षण, मूल्यांकन, संधारण आदि में किया जा सकता है। सेवानिवृत्त अभियंताओं की योग्यता का लाभ देश और समाज के लिये लिया जा सकता है। 

१७. प्राकृतिक आपदाओं तथा संकट काल का सामना करने  विशेष प्रविधियों की आवश्यकता होती है।  ऐसे समय में हर नागरिक की भूमिका महत्वपूर्ण तथा अन्यों की जीवन बचने में महत्वपूर्ण होती है। सभी पाठ्यक्रमों में आपदा प्रबंधन  तथा सामान्य स्वास्थ्य रक्षा सम्बन्धी सामग्री जोड़ी जाए। 

१८. सभी पाठ्यक्रमों में शिक्षा का माध्यम हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाएँ हों। अंग्रेजी की भूमिका क्रमश: समाप्त की जाए। 

मुझे आशा ही  विश्वास है की सुझावों पर विचार कर समुचित निर्णय लिए जायेंगे। इस सम्बन्ध में किसी भी प्रकार का सहयोग कर प्रसन्नता होगी।    
                                                                                         एक नागरिक 
                                                       अभियंता संजीव वर्मा 'सलिल'
                                                                  अधिवक्ता उच्च न्यायालय मध्य प्रदेश 
समन्वयम २०४ विजय अपार्टमेंट,  नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१
salil.sanjiv@gmail.com -चलभाष ९४२५१८३२४४

मुक्तिका आपकी मर्जी

मुक्तिका
आपकी मर्जी
*
आपकी मर्जी नमन लें या न लें
आपकी मर्जी नहीं तो हम चलें
*
आपकी मर्जी हुई रोका हमें
आपकी मर्जी हँसीं, दीपक जलें
*
आपकी मर्जी न फर्जी जानते
आपकी मर्जी सुबह सूरज ढलें
*
आपकी मर्जी दिया दिल तोड़ फिर
आपकी मर्जी बनें दर्जी सिलें
*
आपकी मर्जी हँसा दे हँसी को
आपकी मर्जी रुला बोले 'टलें'
*
आपकी मर्जी, बिना मर्जी बुला
आपकी मर्जी दिखा ठेंगा छ्लें
*
आपकी मर्जी पराठे बन गयी
आपकी मर्जी चलो पापड़ तलें
*
आपकी मर्जी बसा लें नैन में
आपकी मर्जी बनें सपना पलें
*
आपकी मर्जी, न मर्जी आपकी
आपकी मर्जी कहें कलियाँ खिलें
***
संजीव, १६.१०.२०१८
७९९९५५९६१८

मंगलवार, 15 अक्तूबर 2019

दोहा शतक एकादशी शशि त्यागी

1
मन में तू ही तू रमा, लागी मन में टेर।
मुझमें मैं मरता गया, लगी नहीं कुछ देर।।
2
धीरज धारण कीजिए, धर मन में संतोष।
सहज ही भर जाएगा, जीवन रूपी कोष।।
3
सच को धारण कीजिए,सच है ईश समान।
भव सिंधु तर जाएगा,बाकी ईश विधान।।
4
झूठ कभी मत बोलना,झूठ है पाप समान।
अपने मन में तोलना,करना विष का पान।।
5
झूठ न मन को सोहता,झूठ का न कुछ काम।
कलयुग के बाजार में, बिकता है बिन दाम।।
शशि त्यागी
02-06-2018
भोले बालक चिन दिए,मुगल काल बतलाय। 
धर्म की रक्षा कीजिए,गुरु गोविंद सहाय।। 7 
पञ्च प्यारे साधते,हाथों में तलवार। 
सिक्ख समर्पण झलकता,धर्म हेतु हर बार।। 8 
सदा गवाही दे रहा, जलियाँवाला बाग। 
आज़ादी की बलि चढ़ा, देश धर्म अनुराग।। 9 
निर्दयी वह डायर था,दिन था बहुत विशेष। 
सत्य प्रमाणित कर रहे,गोलिन के अवशेष।। 10 
आजादी नींव गड़ा, नर-नारी बलिदान। 
आजादी तब ही मिली,भारत यह तू जान।। 
11 घोर कलयुगी काल में,हीरे-मोती मान। 
मनभावन सुख देत है,अविकारी संतान।। 12 
नोंक-झोंक लगती भली, जीवन साथी-साथ। 
इक दूजे को छेड़ते,ले हाथों में हाथ।। 13 
हँसी ठिठोली हो भली, बिखरे हों सब रंग। 
कुछ पल सभी बिताइए,अनमोल मीत संग।। 14 
घर आए अतिथि का, खूब कीजिए मान। 
यश-कीर्ति घर से चले, यही लीजिए जान।। 15 
जीवन में उल्लास हो,रख मन में विश्वास। 
मिलेगा फल निश्चित ही , जिसको जिसकी आस।। 
16 अंग-अंग में प्रभु रमा,शुचि गंगा माँ गाय। 
नित इनकी सेवा करो,मन कोमल हो जाए।। 17 
जून माह घर यूँ लगे,हो शीतल जल कूप। 
तन को शीतलता मिले,मन के हो अनुरूप।। 18 
धरा-अंबर डोल रहा,अंधड़ रहयो डरा। 
मानव के दुष्कर्म का, भरन लगा है घड़ा।। 19 
पढ़ा-लिखा संतान को, भेज दिया परदेस। 
सेवा करने के लिए, किसको दें आदेश।। 20 
पढ़-लिखकर उन्नति करे,करे देश हित काम। 
हर क्षेत्र विकसित करे,करे देश का नाम।।

शनिवार, 12 अक्तूबर 2019

सरस्वती वंदना शिखा

शिखा स्वरूप 



आत्मजा - श्रीमती अनीता - श्री विजय शुक्ल।
शिक्षा - एम. ए. अंग्रेजी।  
ईमेल - shikha.shikhaswaroop.swaroop8@gmail.com
*
हे माँ! तुझे प्रणाम

हे माँ! तुझे प्रणाम

स्वर दे, वर दे वरदे!
विद्या-ज्ञान ह्रिदय में भर दे 
दे नव जीवन-उत्थान 
हे माँ! तुझे प्रणाम

कल दे , बल दे , दल दे  
बुद्धिदात्री हे! कलरव कर दे 
जीवन घट में भर दे ज्ञान 
हे माँ! तुझे प्रणाम

उच्च शिखर तक जाऊँ मैं 
अमर मृत्यु कर जाऊँ मैं 
विन्ध्येश्वरी! दो वरदान 
हे माँ! तुझे प्रणाम

वेदत्रयी, ओ कालजयी! 
सकल विश्व की महामयी 
हर संकट; दो त्राण 
हे माँ! तुझे प्रणाम

चरण शरण हूँ मातु तुम्हारी 
नित सविनय आरती उतारी  
करूँ मातु जय गान 
हे माँ! तुझे प्रणाम
*
सरस्वती महामाया

सरस्वती महामाया महायोगिन्यधीश्वरी
विद्येश्वरीं नमस्तुभ्यं प्रज्ञांदात्री नमो नम:
महा गौरी महाकाली महालक्ष्मी द्विजप्रिया:
विश्वेश्वरी कालजयी ब्रह्मेश्वरी नमो नम:
विद्युन्माला महोत्साहा दिव्यांका कमलासनी
शुभ्रवस्त्रा धवलप्रिया सिद्धिदात्री नमो नम:
नमो द्वि जगद्धात्री वाग्धिष्ठातृ देवताम्
शुक्लवर्णां सुपूजितां परमेश्वरी नमो नम:
वैष्णवी सावित्री सौदामिनी सुवासिनी
ब्राह्मी विश्वा वाग्देवी महाभागा नमो नम:
नमस्तुभ्यं जया जटिला ब्रह्मजाया त्रिकालजा
वेदमाता ब्रह्मविद्या तमविनाशा नमो नम:
नादरूपा तालदात्री गायत्री सर्वमंगला
विशालाक्षी कमलनयना चतुराननी नमो नम:
***
  

सरस्वती वंदना प्रीति डिमरी

सरस्वती वंदना
प्रीति डिमरी


















जन्म - २१ अगस्त १९७८, देहरादून। 
आत्मजा - श्रीमती विनीता - श्री रमेश चंद्र नौटियाल। 
जीवन साथी - श्री हरीश डिमरी। 
शिक्षा - एम.ए. (अंग्रेजी, गृह विज्ञान), बी.एड.
संप्रति - अध्यापन
प्रकाशन - पत्र - पत्रिकाओं में। 
उपलब्धि - मातृ गौरव सम्मान। 
विश्व हिंदी रचनाकार मंच द्वारा सर्वश्रेष्ठ कवयित्री सम्मान 2019
संपर्क - पायस डेल स्कूल ए ब्लॉक, सरस्वती विहार, अजबपुर खुर्द, देहरादून। 
चलभाष - ९४५८११९७४९। ई-मेल- pritidimripd@gmail.com 
*

गढ़वाली
दैंणी ह्ववै जे,दैंणी ह्ववै जे

दैंणी ह्ववै जे,दैंणी ह्ववै जे
जै माँ सरस्वती।
विद्या की तू देवी च
बुद्धि दे जानी तू।
भलु, बुरु का अंतर 
सीखे जानी तू।

दैंणी ह्ववै जे,दैंणी ह्ववै जे
जै माँ सरस्वती।
उजली साड़ी तेरी
हंसे की च सवारी।
वीणा धारी तू
ब्रह्मा की च नारी तू।

दैंणी ह्ववै जे,दैंणी ह्ववै जे
जै माँ सरस्वती।
अंधकार नाशिनी तू
ज्ञान कु उजाला दे जानी तू।
कुबुद्धि दूर के कै
सुबुद्धि दे जानी तू।

दैंणी ह्ववै जे,दैंणी ह्ववै जे
जै माँ सरस्वती।
तेरी शरण मा, मी च
अपडूँ हाथ धेर जा।
मेरी कलम बणें मेरी ताकत
यन आशीर्वाद दे जा।

दैंणी ह्ववै जे,दैंणी ह्ववै जे
जै माँ सरस्वती।
*

हिंदी भावानुवाद 

कृपा कर,कृपा कर
जय माँ सरस्वती।
विद्या की तू देवी 
बुध्दि प्रदायनी है।
भले-बुरे का अंतर
तू सिखलाती है।

कृपा कर,कृपा कर
जय माँ सरस्वती।
धवल वस्त्रधारिणी
हंस की सवारी है।
तू वीणाधारणी 
ब्रह्मा की प्यारी है।

कृपा कर,कृपा कर
जय माँ सरस्वती।
अंधकार नाशिनी तू
ज्ञान का उजाला दे।
कुबुद्धि दूर करके
सुबुद्धि दे जाती है।

कृपा कर ,कृपा कर
जय माँ सरस्वती।
तेरी शरण में आई हूँ
वरद हस्त रख दे।
मेरी कलम बने मेरी ताकत 
यह वरदान दे जा

कृपा कर,कृपा कर
जय माँ सरस्वती।
*

शुक्रवार, 11 अक्तूबर 2019

सरस्वती वंदना नीता कुकरेती

नीता कुकरेती

















जन्म  - ७ सितंबर १९५२,  नरेन्द्रनगर, टिहरी गढ़वाल, उत्तराखण्ड। 
जीवन साथी - श्री हेमवती नन्दन कुकरेती। 
शिक्षा - एम.ए. (अर्थशास्त्र, राजनीति विज्ञान), एम.एड. 
संप्रति - सेवा निवृत्त प्रधानाचार्या। 
प्रकाशन - गढ़वाली - मेरी अग्याल, हिन्दी - शब्द बन गये गीत, गढ़वाली गद्य-पद्य संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित। 
कैसेट - गढ़वाली गीत - भुम्याल। 
उपलब्धि - आकाशवाणी नजीबाबाद /देहरादून की उच्च श्रेणी की कलाकार,  गढ़वाली पारम्परिक व स्वरचित गीतों का प्रसारण। सदस्य 

राज्य गीत निर्माण समिति, अनेक साहित्यिक सम्मान। 
*

तेरी शरण मा  

द्वी हत्थुं तैं जोड़ी माता, वंदना करुणु छौं मी
विद्या, बुद्धि देण वली माँ, तेरी शरण मा अयुं मी  

आखरों कु ज्ञान दें माँ, मान दे सम्मान माँ
कण्ठ मा सुर ताल दे माँ, अर्चना का गान मा  
तू दया की देवी भगवती, छौं सरल मतिहीन मी....


बाटो सौगौं हो न हो, पर विकट बाटो कभी न हो
हिम्मत बणैकि रखी माँ, हार मा ना होश खौं  
ऊँगली पकड़ी दिखै बाटू, छौं निर्बुद्ध अबोध मी....

कर्म का बाटा मा काण्डा, संगति मिलदन सच्चि ही
आँखों छौंदा अन्धा बणदा, यू अज्ञान च अभिशाप भी  
ये अन्धेरा तैं छाँटू करदी, खौरी लगौणु त्वेमु मी....

कर्म पथ बटि विरत ना होवां, हमतैं इन वरदान दे
नवल गति नव रंग दगड़ी, भाव मा उपकार दे 
वीणा वादिनी बुद्धिदायिनी, विनति करणु त्वै मु मी....
*
हिंदी : तुम्हारी शरण में

दोनों हाथ जोड़कर माता, वंदना करती हूँ मैं 
विद्या-बुद्धि दात्री मैया, शरण तेरी आई हूँ मैं 

अक्षरों का ज्ञान दो माँ, मान दो, सम्मान दो 
कंठ में सुर-ताल दो माँ, अर्चना का गान हो 
तू दया की देवी अंबे, अति सरल मतिहीन हूँ मैं....  

राह सीधी हो न हो, पर विकट राहें माँ न हों 
रहे हिम्मत बनी मैया!, हार में गुम होश न हो   
पकड़ अंगुली दिखा दे पथ, सुत अबुद्धि अबोध हूँ मैं....

कर्म-पथ में मिलें काँटें, साथ मिलता सच नहीं 
आँख रहते बने अंधे, अज्ञान है अभिशाप भी 
यह अँधेरा दूर कर दे, व्यथा कहने आई हूँ मैं....

कर्म-पथ से विरत मत हों, हमें यह वरदान दे 
नवल गति नव रंग भरदे, भाव में उपकार दे 
वीणावादिनि! बुद्धिदायनी!, विनय यही करती हूँ मैं....   
*
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रविवार, 6 अक्तूबर 2019

नवगीत

एक रचना
*
महरी पर गड़ती
गृद्ध-दृष्टि सा
हो रहा पर्यावरण
*
दोष अपना और पर मढ़
सभी परिभाषा गलत पढ़
जिस तरह हो सीढ़ियाँ चढ़  
देहरी के दूर
मिट्टी गंदगी सा
कर रहे हैं आचरण
*
हवस के बनकर पुजारी
आरती तन की उतारी
दियति अपनी खुद बिगाड़ी
चीयर डाला
असुर बनकर
माँ धरा का आवरण
***  

THE SECOND THOUGHT

PREFACE
"THE SECOND THOUGHT" - Portrait of real life
Acharya Sanjiv Verma 'Salil'
*
A commoner relates Poetry with imagination rather than the realities of life but in his second poetry collection titled "the Second Thought" Pro. Anil Jain contradict it by giving poems related with day to day life. He has successfully and very beautifully used the famous lines by notable western poets Becon, Wordsworth, Shelley, James Hadley Chase, Irving Washington, Irving Wallace etc. in Present Indian contexts proving that poetry is eternal and can't be imprisoned in the cages of nations, colour or creeds.
We are all worried about position of women in the Indian society as well as exploitation and crimes against women. According to Anil ji the reason behind this scenario is that every man wants a woman of his dreams, see her through the eyes of his imagination and try to fix her in the casing. It is really sad that in a society where women are termed goddess saying "yatra naaryastu poojyante ramante tatra devata" i.e. God live there where women are worshiped, they are suffering beyond limits. None can appreciate this. It is miserable that women are bound to say "I am ashamed of myself." This ugly and unwanted social scenario gives birth to so called "stree vimarsh" (clash between men and women).
Anil ji being a profesor, is closely connected with our education system. He rightly raise finger on the system saying "You are breeding only servants / You have no enterpreneurship."
In another poem Anil ji describes about lives of maid servants- "She came every morning / And worked hard / From dawn to dusk / She never complained / And sing all along / While she works."But what she got in receprocation? Only hatrat and exploitation by all her husband, society ant master, Ultimately resulting in "She does / Neither work / Nor sing." This is the real picture of our society and we all have to change it. ee
All these poems look the life with a different angel and give a healthy thought to make it better. We are rapidly getting alchohalic to web world and our routine is disturbed, Anil ji is worried looking the ill effects increasing day by day. He correctly warns- "We had our line crossed / While surfing / And caught in the web."
Sometimes we are made bound to face the so called "swadeshi" instinct when mob compel us not to use foreign made material though it is permitted by the government. Anil ji condem such activity saying- "they have stopped using electricity / For it was invented by an infidal / And living in the dark." Anil ji correctly warns us to be practical and broad minded.
Acharya Chatursen a prominent Hindi novelist critisised narrow nationalism as an evil as it killed numberless people on borders. Anil ji take one step forward saying " The globe is defining itself / A new.... Nations internationalized / No discrimination of cultures." just following Vedik ideal "Vasudhaiv kutumbakam and Vishvaik needam" etc.
In all the four parts titled Pal, Fantasy, Harmony and Passing away Anil ji used the notable lines of great poets in such a way that they became indifferent and integral part of the poems.
In the age when we are being divided on the name of languages by the narrow minded, power oriented politicians, it is really courageous to take a step forward in the interest of man kaind as a whole. I'm sure that the poems of "The Second tThought" wiill be admired by the readers.
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सलिल की लघुकथाएं

सलिल की लघुकथाएं
लघुकथा
टुकड़े स्पात के
*
धाँय धाँय धाँय
भारी गोलाबारी ने काली रात को और अधिक भयावह बना दिया था किन्तु वे रेगिस्तान की रेत के बगुलों से भरी अंधी में भी अविचलित दुश्मन की गोलियों का जवाब दे रहे थे। अन्तिम पहर में दहशत फैलाती भरी आवाज़ सुनकर एक ने झरोखे से झाँका और घुटी आवाज़ में चीखा 'उठो, टैंक दस्ता'। पल भर में वे सब अपनी मशीन गनें और स्टेन गनें थामे हमले के लिये तैयार थे। चौकी प्रभारी ने कमांडर से सम्पर्क कर स्थिति की जानकारी दी, सवेरे के पहले मदद मिलना असम्भव था।
कमांडर ने चौकी खाली करने को कहा लेकिन चौकी पर तैनात टुकड़ी के हर सदस्य ने मना करते हुए आखिरी सांस और खून की आखिरी बूँद तक संघर्ष का निश्चय किया। प्रभारी ने दोपहर तह मुट्ठी भर जवानों के साथ दुश्मन की टैंक रेजमेंट का सामना करने की रणनीति के तहत सबको खाई और बंकरों में छिपने और टैंकों के सुरक्षित दूरी तक आने के पहले के आदेश दिए।
पैदल सैनिकों को संरक्षण (कवर) देते टैंक सीमा के समीप तक आ गये। एक भी गोली न चलने से दुश्मन चकित और हर्षित था कि बिना कोई संघर्ष किये फतह मिल गयी। अचानक 'जो बोले सो निहाल' की सिंह गर्जना के साथ टुकड़ी के आधे सैनिक शत्रु के जवानों पर टूट पड़े, टैंक इतने समीप आ चुके थे कि उनके गोले टुकड़ी के बहुत पीछे गिर रहे थे। दुश्मन सच जान पाता इसके पहले ही टुकड़ी के बाकी जवान हथगोले लिए टैंकों के बिलकुल निकट पहुँच गए और जान की बाजी लगाकर टैंक चालकों पर दे मारे। धू-धू कर जलते टैंकों ने शत्रु के फौजियों का हौसला तोड़ दिया। प्राची में उषा की पहली किरण के साथ वायुयानों ने उड़ान भरी और उनकी सटीक निशानेबाजी से एक भी टैंक न बच सका। आसमान में सूर्य चमका तो उसे भी मुट्ठी भर जवानों को सलाम करना पड़ा जिनके अद्भुत पराक्रम की साक्षी दे रहे थे मरे हुए शत्रु जवान और जलते टैंकों के इर्द-गिर्द फैले स्पात के टुकड़े।
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लघुकथा
सियाह लहरें
*
दस नौ आठ सात
उलटी गिनती आरम्भ होते ही सबके हृदयों की धड़कनें तेज हो गयीं। अनेक आँखें स्क्रीन पर गड गयीं। कुछ परदे पर दुःख रही नयी रेखा को देख रहे थे तो कुछ हाथों में कागज़ पकड़े परदे पर बदलते आंकड़ों के साथ मिलान कर रहे थे। कुछ अन्य कक्ष में बैठे अति महत्वपूर्ण व्यक्तियों को कुछ बता रहे थे।
दूरदर्शन के परदे पर अग्निपुंज के बीच से निकलता रॉकेट। नील गगन के चीरता बढ़ता गया और पृथ्वी के परिपथ के समीप दूसरा इंजिन आरम्भ होते ही परिपथ में प्रविष्ट हो गया। आनंद से उछल पड़े वे सब।

प्रधान मंत्री, रक्षा मंत्री आदि ने प्रमुख वैज्ञानिक, उनके पूरे दल और सभी कर्मचारियों को बधाई देते हुए अल्प साधनों, निर्धारित से कम समय तथा पहले प्रयास में यह उपलन्धि पाने को देश का गौरव बताया। आसमान पर इस उपलब्धि का डंका पीट रही थीं रहीं थीं रॉकेट के जले ईंधन से बनी फैलती जा रही सियाह लहरें।
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गीत: आराम चाहिए...

गीत:
आराम चाहिए...
संजीव 'सलिल'
*
हम भारत के जन-प्रतिनिधि हैं
हमको हर आराम चाहिए.....
*
प्रजातंत्र के बादशाह हम,
शाहों में भी शहंशाह हम.
दुष्कर्मों से काले चेहरे
करते खुद पर वाह-वाह हम.
सेवा तज मेवा के पीछे-
दौड़ें, ऊँचा दाम चाहिए.
हम भारत के जन-प्रतिनिधि हैं
हमको हर आराम चाहिए.....
*
पुरखे श्रमिक-किसान रहे हैं,
मेहनतकश इन्सान रहे हैं.
हम तिकड़मी,घोर छल-छंदी-
धन-दौलत अरमान रहे हैं.
देश भाड़ में जाए हमें क्या?
सुविधाओं संग काम चाहिए.
हम भारत के जन-प्रतिनिधि हैं
हमको हर आराम चाहिए.....
*
स्वार्थ साधते सदा प्रशासक.
शांति-व्यवस्था के खुद नाशक.
अधिनायक हैं लोकतंत्र के-
हम-वे दुश्मन से भी घातक.
अवसरवादी हैं हम पक्के
लेन-देन बेनाम चाहिए.
हम भारत के जन-प्रतिनिधि हैं
हमको हर आराम चाहिए.....
*
सौदे करते बेच देश-हित,
घपले-घोटाले करते नित.
जो चाहो वह काम कराओ-
पट भी अपनी, अपनी ही चित.
गिरगिट जैसे रंग बदलते-
हमको ऐश तमाम चाहिए.
हम भारत के जन-प्रतिनिधि हैं
हमको हर आराम चाहिए.....
*
वादे करते, तुरत भुलाते.
हर अवसर को लपक भुनाते.
हो चुनाव तो जनता ईश्वर-
जीत उन्हें ठेंगा दिखलाते.
जन्म-सिद्ध अधिकार लूटना
'सलिल' स्वर्ग सुख-धाम चाहिए.
हम भारत के जन-प्रतिनिधि हैं
हमको हर आराम चाहिए.....
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दुर्गा सप्तशती प्राधानिकं रहस्यं

दुर्गा सप्तशती प्राधानिकं रहस्यं
सृष्टि उत्पत्ति और सरस्वती जी
*
ॐ अस्य श्री सप्तशतीरहस्यत्रयस्य नारायण
ऋषिरनुष्टुप छंद:, महाकाली-महालक्ष्मी-महा
सरस्वती देवता यथोक्त फला वाप्यर्थं जपे विनियोग:।
ॐ सतशती के रहस्य त्रय, ऋषिवर श्री नारायण हैं।
देव महा काली-रमा-शारद, छंद अनुष्टुप धारण है।
मिले यथोचित फल इस हेतु करें जप में विनियोग सदा।
राजोवाच
भगवन्नवतारा में चंडीकायास्त्वयोदिता:।
एतेषां प्रकृतिं ब्रह्मन् प्रधानं वक्तुमर्हसि।।१।।
राजा बोले प्रभु! चण्डी के अवतारों की कथा कही।
अब इनकी प्रधान प्रकृति की ब्रह्मन्! मुझसे कथा कहें।।
आराध्यं यन्मया देव्या: स्वरूपं येन च द्विज।
विधिना ब्रूहि सकलं यथावत्प्रणतस्य मे।।२।।
देवी की आराधना किस छवि में द्विजश्रेष्ठ!
करूँ कहें उसकी विधि चरण-शरण मैं ज्येष्ठ!
ऋषिरुवाच
इदं रहस्यं परममनाख्येयं प्रचक्षते।
भक्तोsसीति न मे किञ्चत्तवावाच्यं नराधिप।।३।।
ऋषि बोले आख्यान यह परम गुप्त है भूप।
कह न सकूँ निज भक्त से, है कुछ नहीं अनूप।।
सर्वस्याद्या महालक्ष्मीस्त्रिगुणा परमेश्वरी।
लक्ष्यालक्ष्यस्वरूपा सा व्याप्य कृत्स्नं व्यवस्थिता।।४।।
सर्व मूल महालक्ष्मी त्रिगुणमयी जगदंब।
दिखें अदिख रह व्याप्त हैं सकल सृष्टि में अंब।।
मातुलिङ्ग गदां खेटं पानपात्रं च बिभ्रती।
नागं लिङ्गं च योनिं च बिभ्रती नृप मूर्द्धनी।।५।।
कर में सोहे मातुलिंग गदा, ढाल, पानदान।
नाग, लिंग, योनि करे शोभित दिव्य ललाट।।
तप्तकाञ्चन वर्णाभा तप्तकाञ्चनभूषणा।
शून्यं तदखिलं स्वेन पूरयामास तेजसा।।६।।
तप्त स्वर्ण सा रंग है, तप्त स्वर्ण श्रृंगार।
करतीं अपने तेज से, पूर्ण सकल संसार।।
शून्यं तदखिलं लोकं विलोक्य परमेश्वरी।
बभार परमं रूपं तमसा केवलेन हि।।७।।
शून्य सकल संसार को, देखें देवी आप।
तमोगुणी नव रूप ले प्रगटें सबमें व्याप।।
सा भिन्नाञ्जनसंकाशा दंष्ट्राङ्कित वरानना।
विशाललोचना नारी बभूव तनुमध्यमा।।८।।
श्यामल अंजन सदृश वह, मुख पर शोभित दंत।
मृगनयनी मध्यम बदन, नारी रूप अनंत।।
खड्गपात्रशिर:खेटैरलङ्कृत चतुर्भुजा।
कबंधहारं शिरसा बिभ्राणा हि शिर:स्रजम्।।९।।
खड्ग पात्र सिर ढाल ले, भुजा सुशोभित चार।
मुंड माल धारण किये, कर कबंध श्रृंगार।।
सा प्रोवाच महालक्ष्मीं तामसी प्रमदोत्तमा।
नाम कर्म च मे मातर्देहि तुभ्यं नमो नम:।।१०।।
तामसी प्रमदोत्तमा ने महालक्ष्मी से कहा।
माँ! मुझे दें नाम; कह दें काम भी; तुमको नमन।।
तां प्रोवाच महालक्ष्मीस्तामसीं प्रमादोत्तमाम्।
ददामि तव नामानि यानी कर्माणि तानि ते।।११।।
महालक्ष्मी ने कहा हे तामसी प्रमदोत्तमा!
नाम देती हूँ तुम्हें मैं, काम कहती तुम्हारा।।
महामाया महाकाली महामारी क्षुधा तृषा।
निद्रा तृष्णा चैकवीरा कालरात्रिर्दुरत्यया।।१२।।
महामाया महाकाली महामारी क्षुधा तृषा।
निद्रा तृष्णा व एकवीरा कालरात्रि दुरत्यया।।
इमानि तव नामानि प्रतिपाद्यानि कर्मभिः।
एभि: कर्माणि ते ज्ञात्वा योsधीते सोsश्नुते सुखं।।१३।।
ये हैं नाम तुम्हारे; जा कर्मों द्वारा चरितार्थ कर।
जो कर्मों को जान जपेंगे, सुख पाएँगे नारी-नर।।
तामित्युक्त्वा महालक्ष्मी: स्वरूपमपरं नृप।
सत्त्वाख्येनातिशुद्धेन गुणेनेंदुप्रभं दधौ।।१४।।
महालक्ष्मी ने यह कहकर, रूप दूसरा प्रगट किया।
सत्वगुणी अति शुद्ध शशि सदृश प्रभापूर्ण नव रूप लिया।।
अक्षमालाङ्कुशधरा वीणा पुस्तक धारिणी।
सा बभूव वरा नारी नामान्यस्यै च सा ददौ।।१५।।
अक्षमाल अंकुश सहित, वीणा पुस्तक थाम।
महीयसी को रमा ने, दिए अलौकिक नाम।।
महाविद्या महावाणी भारती वाक् सरस्वती।
आर्या ब्राह्मी कामधेनुर्वेदगर्भा च धीश्वरी।।१६।।
महाविद्या महावाणी, भारती वाक् सरस्वती।
आर्या ब्राह्मी कामधेनु, वेदगर्भा व धीश्वरी।।
अथोवाच महालक्ष्मीर्महाकालीं सरस्वतीं।
युवां जनयतां देव्यौ मिथुन स्वानुरूपत:।।१७।।
महाकाली सरस्वती से, महा लक्ष्मी ने कहा।
देवियों! दो जन्म निज, अनुरूप जोड़ों को अभी।।
इत्युक्त्वा ते महालक्ष्मी: ससर्ज मिथुनं स्वयं।
हिरण्यगर्भौ रुचिरौ स्त्रीपुंसौ कमलसानौ।।१८।।
महालक्ष्मी ने यह कहकर आप मिथुन कर सृजन किया।
कनकगर्भ प्रगटे नारी-नर, कमलासन आसीन किया।।
ब्रह्मन् विधे विरंचेति धातरित्याह तं नरं।
श्री: पद्मे कमले लक्षिमत्याह माता च तां स्त्रियं।।१९।।
ब्रह्मन विधे विरंचि धात:, दिए पुरुष को नाम।
श्री पद्मा कमला लक्ष्मी, नामित नारि ललाम।।
महाकाली भारती च मिथुन सृजत: सह।
एतयोरपि रूपाणि नामानि च वदामि ते।।२०।।
महाकाली भारती ने, भी युग्म दो पैदा किये।
रूप गुण उनके हुए कैसे, बताता हूँ तुम्हें।।
नीलकण्ठं रक्तबाहुं श्वेतांग चंद्रशेखरं।
जनयामास पुरुषं महाकाली सितां स्त्रियं।।२१।।
नील कंठ भुज लाल श्वेत तन चंद्र शीश पर।
जन्मा नर; माँ काली से गोरी नारी सँग।।
स रूद्र: शंकर: स्थाणुः कपर्दी च त्रिलोचन:।
त्रयी विद्या कामधेनु: सा स्त्री भाषाक्षरा स्वरा।।२२।।
पुरुष रूद्र शंकर स्थाणु कपर्दी त्रिलोचन।
स्त्री त्रयी विद्या कामधेनु भाषाक्षरा स्वरा।।
सरस्वती स्त्रियाँ गौरीन कृष्णं च पुरुषं नृप।
जनयामास नामानि तयोरपि वदामि ते।।२३।।
सरस्वती से गोरी नारी श्यामल पुरुष हुए राजन!।
उन दोनों को नाम मिले जो कहता हूँ, वे भी सुन लो।
विष्णु: कृष्णो हृषीकेशो वासुदेवो जनार्दन:।
उमा गौरी सती चंडी सुंदरी सुभगा शिवा।।२४।।
विष्णु कृष्ण हृषिकेश वासुदेव जनार्दन नाम पुरुष के।
उमा गौरी सती चंडी सुंदरी सुभगा शिवा स्त्री के।।
एवं युवतय: सद्य: पुरुषत्वं प्रपेदिरे।
चक्षुष्मंतो नु पश्यंति नेतरेsतद्विदो जना:।।२५।।
हुईं शीघ्र ही तीन नारियाँ तीनों पुरुष रूप को प्राप्त।
देख न सकते चर्म चक्षु यह, देखें ज्ञान नेत्र ही आप्त।।
ब्रह्मणे प्रददौ पत्नीं महालक्ष्मीर्नृप त्रयीम्।
रुद्राय गौरी वरदां वासुदेवाय च श्रियम्।।२६।।
महालक्ष्मी ने ब्रह्मा को सौंपी त्रयी पत्नि राजन!।
और रूद्र को गौरी दी, दी वासुदेव को श्री नृपवर!।।
स्वरया सह संभूय विरिंचोsण्डमजीजनत्।
विभेद भगवान् रुद्रस्तद् गौर्या सह वीर्यवान्।।२७।।
स्वर के साथ मिले ब्रह्मा जी, तब ब्रह्माण्ड यहाँ जन्मा।
वीर्यवान शिव ने गौरी के साथ किया भेदन उसका।।
अण्डमध्ये प्रधानादि कार्यजातमभून्नृप।
महाभूतात्मकं सर्वं जगत्स्थावरजंगमम्।।२८।।
अंड मध्य में मूल मुख्य कारज से भू जन्मी राजन।
महाभूतमय है समस्त जड़-जंगम कहते विद्वज्जन।।
पुपोष पालयामास तल्लक्षम्या सह केशव:।
संजहार जगत्सर्वं सह गौर्या महेश्वर:।।२९।।
पोषण-पालन किया जगत का साथ लक्ष्मी के केशव ने।
और किया संहार सर्व का गौरी साथ महेश्वर ने।।
महालक्ष्मीर्महाराज सर्वसत्वमयीश्वरी।
निराकारा च साकारा सैव नानाभिधानभृत।।३०।।
महाराज! है महालक्ष्मी तत्वमयी सर्वेश्वरी।
निराकार-साकार वही हैं नाना नाम उन्हीं के हैं।।
नामांतरैर्निरूप्यैषा नाम्ना नान्येन केनचित्।।३१।।
नाम भेद से करें निरूपण, एक नाम से हो न सके।।
(टीप - नामभेद सत्य, ज्ञान, चित्, महामाया आदि)
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