स्तम्भ menu

Drop Down MenusCSS Drop Down MenuPure CSS Dropdown Menu

बुधवार, 18 अक्तूबर 2017

हिन्दी के नये छंद 12

कृष्णमोहन छन्द
विधान-
1. प्रति पंक्ति 7 मात्रा
2. प्रति पंक्ति मात्रा क्रम गुरु लघु गुरु लघु लघु
गीत
रूपचौदस
.
रूप चौदस
दे सदा जस
.
साफ़ हो तन
साफ़ हो मन
हों सभी खुश
स्वास्थ्य है धन
बो रहा जस
काटता तस
बोलती सच
रूप चौदस.
.
है नहीं धन
तो न निर्धन
हैं नहीं गुण
तो न सज्जन
ईश को भज
आत्म ले कस
मौन तापस
रूप चौदस.
.
बोलना तब
तोलना जब
राज को मत
खोलना अब
पूर्णिमा कह
है न 'मावस
रूप चौदस
.
मैल दे तज
रूप जा सज
सत्य को वर
ईश को भज
हो प्रशंसित
रूप चौदस
.
वासना मर
याचना मर
साथ हो नित
साधना भर
हो न सीमित
हर्ष-पावस
साथ हो नित
रूप चौदस
.......
salil.sanjiv@gmail.com
http://divyanarmada@gmail.com
#hindi_blogger

मंगलवार, 17 अक्तूबर 2017

dhan teras

धन तेरस पर नव छंद 
गीत 
*
छंद: रविशंकर
विधान:
१. प्रति पंक्ति ६ मात्रा 
२. मात्रा क्रम लघु लघु गुरु लघु लघु
***
धन तेरस
बरसे रस... 
*
मत निन्दित
बन वन्दित।
कर ले श्रम
मन चंदित।
रचना कर
बरसे रस।
मनती तब
धन तेरस ... 
*
कर साहस
पा ले यश। 
ठुकरा मत
प्रभु हों खुश।
मन की सुन
तन को कस।
असली तब
धन तेरस ...  
 *
सब की सुन
कुछ की गुन।
नित ही नव
सपने बुन। 
रख चादर
जस की तस। 
उजली तब
धन तेरस
***
divyanarmada.blogspot.com
salil.sanjiv@gmail.com, ९४२५१८३२४४
#हिंदी_ब्लॉगर

geet

धनतेरसपर विशेष गीत...

प्रभु धन दे...

संजीव 'सलिल'




*
प्रभु धन दे निर्धन मत करना.
माटी को कंचन मत करना.....
*
निर्बल के बल रहो राम जी,
निर्धन के धन रहो राम जी.
मात्र न तन, मन रहो राम जी-
धूल न, चंदन रहो राम जी..

भूमि-सुता तज राजसूय में-
प्रतिमा रख वंदन मत करना.....
*
मृदुल कीर्ति प्रतिभा सुनाम जी.
देना सम सुख-दुःख अनाम जी.
हो अकाम-निष्काम काम जी- 
आरक्षण बिन भू सुधाम जी..

वन, गिरि, ताल, नदी, पशु-पक्षी-
सिसक रहे क्रंदन मत करना.....
*
बिन रमेश क्यों रमा राम जी,
चोरों के आ रहीं काम जी?
श्री गणेश को लिये वाम जी.
पाती हैं जग के प्रणाम जी..

माटी मस्तक तिलक बने पर-
आँखों का अंजन मत करना.....
*
साध्य न केवल रहे चाम जी,
अधिक न मोहे टीम-टाम जी.
जब देना हो दो विराम जी-
लेकिन लेना तनिक थाम जी..

कुछ रच पाए कलम सार्थक-
निरुद्देश्य मंचन मत करना..
*
अब न सुनामी हो सुनाम जी,
शांति-राज दे, लो प्रणाम जी.
'सलिल' सभी के सदा काम जी-
आये, चल दे कर सलाम जी..

निठुर-काल के व्याल-जाल का
मोह-पाश व्यंजन मत करना.....
*
salil.sanjivg@mail.com
http://divyanarmada.blogspot.com '
#हिंदी_ब्लॉगर

doha

दोहा सलिला
*
प्रभु सारे जग का रखे, बिन चूके नित ध्यान। 
मैं जग से बाहर नहीं, इतना तो हैं भान।। 
*
कौन किसी को कर रहा, कहें जगत में याद?
जिसने सब जग रचा है, बिसरा जग बर्बाद
*
जिसके मन में जो बसा वही रहे बस याद
उसकी ही मुस्कान से सदा रहे दिलशाद
*
दिल दिलवर दिलदार का, नाता जाने कौन?
दुनिया कब समझी इसे?, बेहतर रहिए मौन
*
स्नेह न कांता से किया, समझो फूटे भाग
सावन की बरसात भी, बुझा न पाए आग
*
होती करवा चौथ यदि, कांता हो नाराज
करे कृपा तो फाँकिये, चूरन जिस-तिस व्याज
*

प्रभु सारे जग का रखें, बिन चूके नित ध्यान।
मैं जग से बाहर नहीं, इतना तो हैं भान।।
*
कौन किसी को कर रहा, कहें जगत में याद?
जिसने सब जग रचा है, बिसरा जग बर्बाद
*
जिसके मन में जो बसा वही रहे बस याद
उसकी ही मुस्कान से सदा रहे दिलशाद
*
दिल दिलवर दिलदार का, नाता जाने कौन?
दुनिया कब समझी इसे?, बेहतर रहिए मौन
*
स्नेह न कांता से किया, समझो फूटे भाग
सावन की बरसात भी, बुझा न पाए आग
*
होती करवा चौथ यदि, कांता हो नाराज
करे कृपा तो फाँकिये, चूरन जिस-तिस व्याज
*

http://divyanarmadablogspotcom
salil.sanjiv@gmail.com
#hindi_blogger

laghukatha

लघुकथा:
बाल चन्द्रमा
*
वह कचरे के ढेर में रोज की तरह कुछ बीन रहा था, बुलाया तो चला आया। त्यौहार के दिन भी इस गंदगी में? घर कहाँ है? वहाँ साफ़-सफाई क्यों नहीं करते? त्यौहार नहीं मनाओगे? मैंने पूछा।
'क्यों नहीं मनाऊँगा?, प्लास्टिक बटोरकर सेठ को दूँगा जो पैसे मिलेंगे उससे लाई और दिया लूँगा।' उसने कहा।
'मैं लाई और दिया दूँ तो मेरा काम करोगे?' कुछ पल सोचकर उसने हामी भर दी और मेरे कहे अनुसार सड़क पर नलके से नहाकर घर आ गया। मैंने बच्चे के एक जोड़ी कपड़े उसे पहनने को दिए, दो रोटी खाने को दी और सामान लेने बाजार चल दी। रास्ते में उसने बताया नाले किनारे झोपड़ी में रहता है, माँ बुखार के कारण काम नहीं कर पा रही, पिता नहीं है।
ख़रीदे सामान की थैली उठाये हुए वह मेरे साथ घर लौटा, कुछ रूपए, दिए, लाई, मिठाई और साबुन की एक बट्टी दी तो वह प्रश्नवाचक निगाहों से मुझे देखते हुए पूछा: 'ये मेरे लिए?' मैंने हाँ कहा तो उसके चहरे पर ख़ुशी की हल्की सी रेखा दिखी। 'मैं जाऊं?' शीघ्रता से पूछ उसने कि कहीं मैं सामान वापिस न ले लूँ। 'जाकर अपनी झोपडी, कपडे और माँ के कपड़े साफ़ करना, माँ से पूछकर दिए जलाना और कल से यहाँ काम करने आना, बाक़ी बात मैं तुम्हारी माँ से कर लूँगी।
'क्या कर रही हो, ये गंदे बच्चे चोर होते हैं, भगा दो' पड़ोसन ने मुझे चेताया। गंदे तो ये हमारे द्वारा फेंगा गया कचरा बीनने से होते हैं। ये कचरा न उठायें तो हमारे चारों तरफ कचरा ही कचरा हो जाए। हमारे बच्चों की तरह उसका भी मन करता होगा त्यौहार मनाने का।
'हाँ, तुम ठीक कह रही हो। हम तो मनायेंगे ही, इस बरस उसकी भी मन सकेगी धनतेरस। ' कहते हुए ये घर में आ रहे थे और बच्चे के चहरे पर चमक रहा था बाल चन्द्रमा।
**********
salil.sanjiv@gmail.com
http://divyanarmada.blogspot.com
#हिंदी_ब्लोगर 

सोमवार, 16 अक्तूबर 2017

Book Review
Showers to the Bowers : Poetry full of emotions
(Particulars of the book _ Showers to Bowers, poetry collection, N. Marthymayam 'Osho', pages 72, Price Rs 100, Multycolour Paperback covr, Amrit Prakashan Gwalior )
Poetry is the expression of inner most feelings of the poet. Every human being has emotions but the sestivity, depth and realization of a poet differs from others. that's why every one can'nt be a poet. Shri N. Marthimayam Osho is a mechanical engineer by profession but by heart he has a different metal in him. He finds the material world very attractive, beautiful and full of joy inspite of it's darkness and peshability. He has full faith in Almighty.
The poems published in this collection are ful of gratitudes and love, love to every one and all of us. In a poem titled 'Lending Labour' Osho says- ' Love is life's spirit / love is lamp which lit / Our onus pale room / Born all resplendor light / under grace, underpeace / It's time for Divine's room / who weave our soul bright. / Admire our Aur, Wafting breez.'
'Lord of love, / I love thy world / pure to cure, no sword / can scan of slain the word / The full of fragrance. I feel / so charming the wing along the wind/ carry my heart, wchih meet falt and blend' the poem ' We are one' expresses the the poet's viewpoint in the above quoted lines.
According to famous English poet Shelly ' Our sweetest songs are those that tell of saddest thought.' Osho's poetry is full of sweetness. He feels that to forgive & forget is the best policy in life. He is a worshiper of piece. In poem 'Purity to unity' the poet say's- 'Poems thine eternal verse / To serve and save the mind / Bringing new twilight to find / Pray for the soul's peace to acquire.'
Osho prays to God 'Light my life,/ Light my thought,/ WhichI sought.' 'Infinite light' is the prayer of each and every wise human being. The speciality of Osho's poetry is the flow of emotions, Words form a wave of feelings. Reader not only read it but becomes indifferent part of the poem. That's why Osho's feeliongs becomes the feelings of his reader.
Bliss Buddha, The Truth, High as heaven, Ode to nature, Journey to Gnesis, Flowing singing music, Ending ebbing etc. are the few of the remarkable poems included in this collection. Osho is fond of using proper words at proper place. He is more effective in shorter poems as they contain ocean of thoughts in drop of words. The eternal values of Indian philosophy are the inner most instict and spirit of Osho's poetry. The karmyoga of Geeta, Vasudhaiv kutumbakam, sarve bhavantu sukhinah, etc. can be easily seen at various places. The poet says- 'Beings are the owner of their action, heirs of their action" and 'O' eternal love to devine / Becomes the remedy.'
In brief the poems of this collection are apable of touching heart and take the reader in a delighted world of kindness and broadness. The poet prefers spirituality over materialism.
.....................................................................................
Contact Acharya Sanjiv Verma 'Salil', email : salil.sanjiv@gmail.com / blog:sanjivsalil.blogspot.com
salil.sanjiv@gmail.com 
http://divyanarmada.blogspot.com
#hindi_blogger

समीक्षा

Book Review
Showers to the Bowers : Poetry full of emotions
(Particulars of the book _ Showers to Bowers, poetry collection, N. Marthymayam 'Osho', pages 72, Price Rs 100, Multycolour Paperback covr, Amrit Prakashan Gwalior )
Poetry is the expression of inner most feelings of the poet. Every human being has emotions but the sestivity, depth and realization of a poet differs from others. that's why every one can'nt be a poet. Shri N. Marthimayam Osho is a mechanical engineer by profession but by heart he has a different metal in him. He finds the material world very attractive, beautiful and full of joy inspite of it's darkness and peshability. He has full faith in Almighty.
The poems published in this collection are ful of gratitudes and love, love to every one and all of us. In a poem titled 'Lending Labour' Osho says- ' Love is life's spirit / love is lamp which lit / Our onus pale room / Born all resplendor light / under grace, underpeace / It's time for Divine's room / who weave our soul bright. / Admire our Aur, Wafting breez.'
'Lord of love, / I love thy world / pure to cure, no sword / can scan of slain the word / The full of fragrance. I feel / so charming the wing along the wind/ carry my heart, wchih meet falt and blend' the poem ' We are one' expresses the the poet's viewpoint in the above quoted lines.
According to famous English poet Shelly ' Our sweetest songs are those that tell of saddest thought.' Osho's poetry is full of sweetness. He feels that to forgive & forget is the best policy in life. He is a worshiper of piece. In poem 'Purity to unity' the poet say's- 'Poems thine eternal verse / To serve and save the mind / Bringing new twilight to find / Pray for the soul's peace to acquire.'
Osho prays to God 'Light my life,/ Light my thought,/ WhichI sought.' 'Infinite light' is the prayer of each and every wise human being. The speciality of Osho's poetry is the flow of emotions, Words form a wave of feelings. Reader not only read it but becomes indifferent part of the poem. That's why Osho's feeliongs becomes the feelings of his reader.
Bliss Buddha, The Truth, High as heaven, Ode to nature, Journey to Gnesis, Flowing singing music, Ending ebbing etc. are the few of the remarkable poems included in this collection. Osho is fond of using proper words at proper place. He is more effective in shorter poems as they contain ocean of thoughts in drop of words. The eternal values of Indian philosophy are the inner most instict and spirit of Osho's poetry. The karmyoga of Geeta, Vasudhaiv kutumbakam, sarve bhavantu sukhinah, etc. can be easily seen at various places. The poet says- 'Beings are the owner of their action, heirs of their action" and 'O' eternal love to devine / Becomes the remedy.'
In brief the poems of this collection are apable of touching heart and take the reader in a delighted world of kindness and broadness. The poet prefers spirituality over materialism.
.....................................................................................
Contact Acharya Sanjiv Verma 'Salil', email : salil.sanjiv@gmail.com / blog:sanjivsalil.blogspot.com
salil.sanjiv@gmail.com 
http://divyanarmada.blogspot.com
#hindi_blogger

doha

दोहा 
पहले खुद को परख लूँ, तब देखूँ अन्यत्र 
अपना खत खोला नहीं, पा औरों का पत्र
*
salil.sanjiv@gmail.com 
http://divyanarmada.blogspot.com
#hindi_blogger

geet

गीत:
 

अरे मन !
  
संजीव 'सलिल'


*
सहज हो ले रे अरे मन !
*
मत विगत को सच समझ रे.
फिर न आगत से उलझ रे.
झूमकर ले आज को जी-
स्वप्न सच करले सुलझ रे.
 
प्रश्न मत कर, कौन बूझे?
उत्तरों से कौन जूझे?
भुलाकर संदेह, कर-
विश्वास का नित आचमन.
सहज हो ले रे अरे मन !
*
उत्तरों का क्या करेगा?
अनुत्तर पथ तू वरेगा?
फूल-फलकर जब झुकेगा-
धरा से मिलने झरेगा.

बने मिटकर, मिटे बनकर.
तने झुककर, झुके तनकर.
तितलियाँ-कलियाँ हँसे,
ऋतुराज का हो आगमन.
सहज हो ले रे अरे मन !
*
स्वेद-सीकर से नहा ले.
सरलता सलिला बहा ले.
दिखावे के वसन मैले-
धो-सुखा, फैला-तहा ले.

जो पराया वही अपना.
सच दिखे जो वही सपना.
फेंक नपना जड़ जगत का-
चित करे सत आकलन.
सहज हो ले रे अरे मन !
*
 सारिका-शुक श्वास-आसें.
देह पिंजरा घेर-फांसे.
गेह है यह नहीं तेरा-
नेह-नाते मधुर झाँसे.
भग्न मंदिर का पुजारी
आरती-पूजा बिसारी.
भारती के चरण धो, 
कर -
निज नियति का आसवन.
सहज हो ले रे अरे मन !
*

कैक्टस सी मान्यताएँ.
शूल कलियों को चुभाएँ.
फूल भरते मौन आहें-
तितलियाँ नाचें-लुभाएँ.

चेतना तेरी न हुलसी.
क्यों न कर ले माल-तुलसी?
व्याल मस्तक पर तिलक है-
काल का है आ-गमन.
सहज हो ले रे अरे मन !
salil.sanjiv@gmail.com 
http://divyanarmada.blogspot.com
#hindi_blogger

muktak

मुक्तक:
कुसुम कली जब भी खिली विहँस बिखेरी गंध
रश्मिरथी तम हर हँसा दूर हट गयी धुंध
मधुकर नतमस्तक करे पा परिमल गुणगान 
आँख मूँद संजीव मत सोना होकर अंध
*
salil.sanjiv@gmail.com 
http://divyanarmada.blogspot.com
#hindi_blogger

navgeet

नवगीत: 
रोगों से
मत डरो
दम रहने तक लड़ो
आपद-विपद
न रहे
हमेशा आते-जाते हैं
संयम-धैर्य
परखते हैं
तुमको आजमाते हैं
औषध-पथ्य
बनेंगे सबल
अवरोधों से भिड़ो
जाँच परीक्षण
शल्य क्रियाएँ
योगासन व्यायाम न भायें
मन करता है
कुछ मत खायें
दवा गोलियाँ आग लगायें
खूब खिजाएँ
लगे चिढ़ाएँ
शांत चित्त रख अड़ो
*
salil.sanjiv@gmail.com 
http://divyanarmada.blogspot.com
#hindi_blogger

nazm

sankalan@anjumanpublication.com
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
चलभाष: ९४२५१८३२४४ / ७९९९५५९६१८
ई मेल: salil.sanjiv@gmail.com
प्रकाशित पुस्तकें:
१. कलम के देव
२. भूकंप के साथ जीना सीखें
३. लोकतंत्र का मक़बरा
४. मीत मेरे
५. काल है संक्रांति का
६. कुरुक्षेत्र गाथा
पता:
विश्ववाणी हिंदी संस्थान
२०४ विजय अपार्टमेंट,
नेपियर टाउन,
जबलपुर ४८२००१। 
***
नज़्म
१. आम आदमी  
*
मुझे, तुम्हें या उसे
किसे फ़िक्र है?
मरे या जिए
हमारी बलाय से।
मैं अपनी कहूँगा,
तुम अपनी
और वह
वक़्त का मारा
आम आदमी
भूखे पेट
सुनेगा बिना समझे
इस उम्मीद में कि
शायद
आखिर में कुछ हाथ आए
जिससे वह
पेट की भूख मिटा पाए।
लेकिन मैं और तुम
शातिराना चालबाज़ियों से
उसे उलझाए रखेंगे।
जब तक वह
मुझे या तुम्हें
न दे दे मत,
न बैठाल दे कुर्सी पर।
कुर्सी कोई न कोई तो पाएगा 
दूसरा दौड़ में पीछे रह जाएगा
मगर आम आदमी
मत दे, न दे
बद  से बदतर होते हालात में 
जम्हूरियत की तलाश में
मेरे और तुम्हारे आगे-पीछे
एड़ियाँ रगड़ते हुए
न मर पायेगा,
न जी पाएगा,
अपने मुकद्दर को कोसते हुए
ऊपरवाले के हाथ जोड़ते हुए
थककर सो जाएगा।
***
२.काश
*
बकर ईद पर
जिबह जानेवाले बकरे!
तुम बेहतर हो मुझसे।
यह हकीकत है कि
तुम हलाल किये जाओगे।
ऊपरवाले का शुक्र मनाओ
और नीचेवाले का करो शुक्रिया
कि  तुम्हें जिबह करने के पहले
पेट भरने का मौक़ा तो आता किया। 
तुम किस्मतवाले हो कि
जिबह होने के बाद भी
किसी की भूख मिटाकर
सबाब पाओगे।
मैं क्या कहूँ?
क्या करूँ?
जानता हूँ कि 
चंद रोज का मेहमान हूँ,
लेकिन कसाई ने
मुझे खाना-पीना मना कर रखा है।
मेरे जिस्म में जगह-जगह
पैबस्ता है सुइयाँ और नलियाँ। 
मेरे हाल पर तरस खाने
और हमदर्दी जताने आते हैं वे सब
जिन्होंने ज़िन्दगी में
भूल कर भी मेरा कुछ भला नहीं किया।
बिना बुलाए चले आते हैं
तमाशबीनों की तरह कुछ लोग
पकड़ते हैं हाथ,
लगाते हैं आला,
लिख जाते हैं कुछ जाँचें,
गोलियाँ और सुइयाँ
बिना यह पूछे कि
मुझे तकलीफ क्या है?
कुछ को फ़िक्र है कि
यह किस्सा तमाम न हो पाए
कि उनका बिल बढ़ना न रुक जाए।
कुछ दीगर यह सोचकर
दुबले हुए जा रहे हैं कि
यह कहानी ज्यादा लम्बी न हो जाए
की बिल चुकाने में उनकी नानी मर जाए।
ऊपरवाला परेशान है कि 
दोनों में से किसकी सुने,
किसकी न सुने?
रह गया मैं तो
हर कोई दिखाता है कि
उसे मेरी
सबसे ज्यादह फ़िक्र है
लेकिन यह हक़ीक़त मैं जानता हूँ कि
मेरी फ़िक्र किसी को नहीं है।
तुम जैसी किस्मत
मैं भी पा सकता
काश ।
*****
३. आदतन
*
आदतन लिखा
पढ़े जाते हैं।
जानते हैं न कोई सुनता है,
सुन भी ले
तो न कभी गुनता है।
सुनने आता न कोई
सब पढ़ने,
अपना पढ़कर
तुरत आगे बढ़ने।
साथ देने का
करें वादा जो,
आए हैं आपसे आगे बढ़ने।
जानकर सच
न हम बताते है।
आदतन लिखा
पढ़े जाते हैं।
*****
४. माटी
*
मैं,
तुम,
यह,
वह
याने हम सब।
आदम जात ही नहीं,
ढोर-डंगर, झाड़-फूल
और ईंट-पत्थर भी,
माटी हैं।
मानो या न मानो,
जानो या न जानो,
कोई फर्क नहीं पड़ता।
याद करो
जब तुम बच्चे थे
तुमने कई बड़ों को देखा था।
बड़े जो सयाने थे,
बड़े जो अक्लमंद थे,
बड़े तो तीसमारखां थे,
बड़े जो सिकंदर थे, कलंदर थे।
आज कहाँ हैं?
माटी में मिल गए न?
मैं और तुम
या और कोई
चाहे या न चाहे
आज या कल
मिल ही जाएगा माटी में।
ये झगड़े, ये फसाद,
ये सियासत, ये बवाल
ये शह, ये मात,
ये शाह, ये फकीर
कोई भी नहीं रहेगा।
यह हकीकत है तो
क्यों न चार दिन गुजार लें
चैनो-अमन के साथ
लेकर हाथ में हाथ
या मिलकर गले
अलस्सुबह से शाम ढले
जब तक हो न जाएँ माटी।
*****
५. झंडे
*
भगवा, हरा, नीला, सफ़ेद या और कोई
झंडा हाथ में लेते ही
बदल क्यों जाती है आदमी की फितरत?
पढ़ाई-लिखाई, अदब-तहजीब,
नाते-रिश्ते, भाई-चारा-लगावट
हो जाती है दूर,
पलने लगती है
गैरियत और अदावत।
क्यों 
हम, हम न रहकर
हो जाते हैं कोई और 
एक-दूसरे के लिए अनजाने और गैर ?
हाथ से छुडा जाती है कलम-किताब,
थमा दिए जाते हैं डंडे।
क्यों हम बेजुबान की तरह
कुछ नहीं बोलते?
क्यों नहीं आदमी बने रहकर
दूर, बहुत दूर
फेंक देते हैं फाड़कर झंडे।
*****
६.  नज़्म
आ भी जाओ, सूनी न रहे बज़्म
सुनाओ और सुनो एक दूसरे की नज़्म
नज़्म सिर्फ बहर का ज़खीरा नहीं है 
नज़्म कंकर या हीरा हीरा नहीं है
नज़्म है दिल से दिल की बात
नज़्म है यादों की बारात
आओ! शरीक हो जाओ
झूमो, नाचो और गाओ
बहुत जी लिए औरों की शर्तों पर
अब जीकर देखो खुद की शर्तों पर
बहुत जी लिए गैरों के लिए
अब तो जी लो खुद के लिए
इसके पहले कि ख़त्म हो जाए सांसों की बज़्म
सुनाओ और सुनो एक दूसरे की नज़्म
*****
७. क्यों?
अगर बिछुड़ना था तो मिले ही क्यों थे?
मेरे अपने करते रहे हैं शिकवा।
लेकिन उनमें से कोई कभी नहीं पूछ्ता सूरज से
अगली सुबह ऊगना था तो ढले ही क्यों थे?
क्या कभी माता-पिता पूछते हैं औलादों से
जो छोड़ जाना था तो पले ही क्यों थे?
क्या दरख्त पूछते हैं पत्तियों, फूलों और फलों से
अगरचे गिरना था तो लगे ही क्यों थे?
पूछो या न पूछो फर्क ही क्या पड़ता है?
जब जहाँ जो जैसा होना है
वह वहाँ वैसा ही होगा 
यह जानते हुए भी आदमी बाख नहीं पाता 
घेर ही लेते हैं कब कहाँ कैसे और क्यों?
*****
८. कोलाहल
आदमी जब असभ्य था
उसने सुना कलरव और कलकल 
जैसे-जैसे होता गया सभ्य
बढ़ता गया कोलाहल और किलकिल
अब आ रहा है वक्त जब
गायब होने लगें हैं सभ्यता और इनसान
हावी होने लगे हैं आत्मकेंद्रित हैवान
बदलाव की हवाएँ लाने लगी हैं
बबंडर और तूफान
अब भी सब कुछ समाप्त नहीं हुआ है 
अगर बचाना है आदमी और आदमीयत
तो सुनो समझो और सुनाओ कलरव
भुलाओ और हटाओ कोलाहल।
*****
९.  स्त्री-विमर्श
औरतों पर सदियों से होते रहे हैं ज़ुल्म
औरतों को चाहिए आज़ादी
औरतें नहीं हैं आदमी से कमतर
औरतें क्यों नहीं हैं आदमी के बराबर
औरतें हैं आदमी से बहुत बेहतर
औरतें क्या नहीं कर सकतीं?
माँगें, माँगें और माँगें
औरतें क्यों करें चौका-बर्तन?
औरतें क्यों रहें कोमल बदन
औरतें क्यों न हों अफसर और साइंसदां
औरतें क्यों न करें सियासत और तिजारत
औरतें क्यों करें शादी?
औरतें क्यों जनें बच्चा?
सवाल, सवाल और सवाल
औरतों को नहीं चाहिए सास-ननद
औरतों को चाहिए बेटी और बहू
वह भी अपने जैसी हू-ब-हू
परेशान है ऊपरवाला
है बराबरी का तकाजा
आधी नौकरियों पर है औरतों का हक
औरत को नहीं चाहिए कम कमाऊ पति
कमाऊ आदमी से शादी करे कमाऊ औरत
बिना कमाई की औरत के लिए
बचे रहे बिना कमाई के आदमी
कैसे बसे घर?
कैसे चले परिवार?
इससे औरत को नहीं सरोकार
औरत ने जो चाहा उसे चाहिए।
*****
१०. हमें चाहिए
हमें चाहिए मौक़ा
देश को बनाने का
हम करेंगे देश को भ्रष्टाचार से मुक्त
हम लायेंगे विदेश से काला धन
हम रोकेंगे परिवारवाद
हम बनायेंगे वह जो आक्रान्ताओं ने तोड़ दिया
हम हटायेंगे गैरबराबरी वाले कानून
कहावत है 'घूरे के भी बदलते हैं दिन'
हमें चाहिए विपक्ष मुक्त भारत
हमें चाहिए विरोध मुक्त देश
हमें चाहिए हम ही हम
हमें नहीं चाहिए तुम
हम जो कहें सही
तुम्हारी गलती तुमने बात क्यों कहीं?
तुम होगे प्रजा,
तुम होगे लोक,
तुम होगे गण
इससे क्या?
हम हैं तंत्र
हम जानते हैं मंत्र
हमारे हाथ में है यंत्र।
हम नए-नए कर लगाते जाएँगे 
हम मँहगाई बढ़ाते जाएँगे
हम विपक्ष मिटाते जाएँगे
हम खुद का कहा भुलाते जाएँगे
हाँ में हाँ मिलानेवाले 
येन-केन जितानेवाले 
खुद को मिटानेवाले 
सच को भुलानेवाले 
हमें चाहिए
***** 











रविवार, 15 अक्तूबर 2017

muktak

छंद चर्चा:
अधर पर धर अधर, कर आधार, बन आधार प्रिय तू!
नजर पर रख नजर, कर स्वीकार, बन सिंगार प्रिय तू!!
सृजन-पथ कर वरण, गति-लय-भाव, हो झंकार प्रिय तू!
डगर पर रख चरण, भव-भय हरण, है ओंकार प्रिय तू!!

इस रचना के छंद का नाम, विधान, विधा का नाम आदि बताइए।
***
salil.sanjiv@gmail.com, ९४२५१८३२४४
http://divyanarmada.blogspot.com
#hindi_blogger

शनिवार, 14 अक्तूबर 2017

doha

दोहा सलिला 
*
कर अव्यक्त को व्यक्त हम, रचते नव 'साहित्य' 
भगवद-मूल्यों का भजन, बने भाव-आदित्य 
.
मन से मन सेतु बन, 'भाषा' गहती भाव
कहे कहानी ज़िंदगी, रचकर नये रचाव
.
भाव-सुमन शत गूँथते, पात्र शब्द कर डोर
पाठक पढ़-सुन रो-हँसे, मन में भाव अँजोर
.
किस सा कौन कहाँ-कहाँ, 'किस्सा'-किस्सागोई
कहती-सुनती पीढ़ियाँ, फसल मूल्य की बोई
.
कहने-सुनने योग्य ही, कहे 'कहानी' बात
गुनने लायक कुछ कहीं, कह होती विख्यात
.
कथ्य प्रधान 'कथा' कहें, ज्ञानी-पंडित नित्य
किन्तु आचरण में नहीं, दीखते हैं सदकृत्य
.
व्यथा-कथाओं ने किया, निश-दिन ही आगाह
सावधान रहना 'सलिल', मत हो लापरवाह
.
'गल्प' गप्प मन को रुचे, प्रचुर कल्पना रम्य
मन-रंजन कर सफल हो, मन से मन तक गम्य
.
जब हो देना-पावना, नातों की सौगात
ताने-बाने तब बनें, मानव के ज़ज़्बात 

***
salil.sanjiv@gmail.com
http://divyanarmada.blogspot.com
#http://hindi_blogger

hindi ke naye chhand १०: satpuda chhand

हिंदी के नए छंद १०  
पाँच मात्रिक याज्ञिक जातीय सतपुडा छंद  
*
हिंदी में पहली बार पञ्च मात्रिक छंदों का सृजन कर विधान और उदहारण सहित प्रस्तुत किया गया है। आप भी इन छंदों के आधार पर रचना करें । शीघ्र ही हिंदी छंद कोष प्रकाशित करने का प्रयास है जिसमें सभी पूर्व प्रचलित छंद और नए छंद एक साथ रचनाविधान सहित उपलब्ध होंगे।
छंद रचना सीखने के इच्छुक रचनाकार इन्हें रचते चलें तो सहज ही कठिन छंदों को रचने की सामर्थ्य पा सकेंगे। भवानी, राजीव, साधना, हिमालय, आचमन, ककहरा, तुहिनकण, अभियान व नर्मदा छंद के पश्चात प्रस्तुत है- 

सतपुडा छंद 
*
विधान:
प्रति पद ५ मात्राएँ।
पदादि, पदांत, गति, यति संबंधी बंधन नहीं। पूर्व में वर्णित पाँच मात्रिक आठों छंदों में से किसी भी छंद की पंक्तियों का बिना निश्चित क्रम के उपयोग। 

उदाहरण:
एक रचना -

हर कदम 
संग उठा। 
मंजिलें 
कर वरण। 
काफिले 
क्यों थमे?
थक न रुक  
चुक न झुक। 
सतत बढ़ 
भाग्य गढ़।
रोकतीं 
रीतियाँ। 
टोंकतीं
प्रीत भी। 
भूलकर 
भय 'सलिल' 
कर चलो 
प्रेत भी। 
वर चलो 
जीत भी     
*************************
salil.sanjiv@gmail.com, ९४२५१८३२४४
http://divyanarmada.blogspot.com
#हिंदी_ब्लॉगर

hindi ke naye chhand 9: narmada chhand

हिंदी के नए छंद ९ 
पाँच मात्रिक याज्ञिक जातीय  नर्मदा छंद  
*
हिंदी में पहली बार पञ्च मात्रिक छंदों का सृजन कर विधान और उदहारण सहित प्रस्तुत किया गया है। आप भी इन छंदों के आधार पर रचना करें । शीघ्र ही हिंदी छंद कोष प्रकाशित करने का प्रयास है जिसमें सभी पूर्व प्रचलित छंद और नए छंद एक साथ रचनाविधान सहित उपलब्ध होंगे।
छंद रचना सीखने के इच्छुक रचनाकार इन्हें रचते चलें तो सहज ही कठिन छंदों को रचने की सामर्थ्य पा सकेंगे। भवानी, राजीव, साधना, हिमालय, आचमन, ककहरा, तुहिनकण व अभियान छंद के पश्चात प्रस्तुत है- 

नर्मदा छंद 
*
विधान:
प्रति पद ५ मात्राएँ।
पदादि, पदांत, गति, यति संबंधी बंधन नहीं। पूर्व में वर्णित पाँच मात्रिक आठों छंदों में से किसी भी ह्ह्न्द की पंक्तियों का निश्चित क्रम में उपयोग। 

उदाहरण:
गीत-
नर्मदा! 

शत नमन। 
वर्मदा! 
नित नमन। 
*
आइए! 
पूजिए। 
गीत भी 
गाइए। 
धार को 
साफ़ रख 
शांति भी 
पाइए। 
शर्मदा! 
शत नमन। 
धर्मदा 
नित नमन। 
*
घाट आ 
बैठिए। 
रूप भी 
देखिए। 
रूपसी 
सी सजी। 
माँ सदा 
लेखिए। 
कर्मदा! 
शत नमन। 
हर्म्यदा 
नित नमन।  
*************************
salil.sanjiv@gmail.com, ९४२५१८३२४४
http://divyanarmada.blogspot.com
#हिंदी_ब्लॉगर

kundaliya

कविता दीप
*
पहला कविता-दीप है छाया तेरे नाम
हर काया के साथ तू पाकर माया नाम
पाकर माया नाम न कोई  विलग रह सका
गैर न तुझको कोई किंचित कभी कह सका
दूर न पाया कोई भी तुझको बहला
जन्म-जन्म का बंधन यही जीव का पहला

दीप-छाया
*
छाया ले आयी दिया, शुक्ला हुआ प्रकाश
पूँछ दबा भागा तिमिर, जगह न दे आकाश
जगह न दे आकाश, धरा के हाथ जोड़ता
'मैया! जो देखे मुखड़ा क्यों कहो मोड़ता?
कहाँ बसूँ? क्या तूने भी तज दी है माया?'
मैया बोली 'दीप तले बस ले निज छाया
***
salil.sanjiv@gmail.com, ९४२५१८३२४४
http:/divyanarmada.blogspot.com
#हिंदी_ब्लॉगर 

शुक्रवार, 13 अक्तूबर 2017

muktika

मुक्तिका
*
ख़त ही न रहे, किस तरह पैगाम हम करें
आगाज़ ही नहीं किया, अंजाम हम करें
*
यकीन पर यकीन नहीं, रह गया 'सलिल'
बेहतर है बिन यकीन ही कुछ काम हम करें.
*
गुमनाम हों, बदनाम हों तो हर्ज़ कुछ नहीं
कुछ ना करें से बेहतर है काम हम करें.
*
हो दोस्ती या दुश्मनी, कुछ तो कभी तो हो
जो कुछ न हो तो, क्यों न राम-राम हम करें
*
मिल लें गले, भले ही ईद हो या दिवाली
बस हेलो-हाय का न ताम-झाम हम करे
*
क्यों ख़ास की तलाश करे कल्पना कहो
जो हमसफ़र हो साथ उसे आम हम करें
*
 salil.sanjiv@gmail.com
http://divyanarmada.blogspot.com
#हिंदी_ब्लॉगर



दोहा, नवगीत, मुक्तक, ग़ज़ल

दोहा सलिला 
बिन अपनों के हो सलिल' पल-पल समय पहाड़ 
जेठ-दुपहरी मिले ज्यों, बिन पाती का झाड़
*
विरह-व्यथा को कहें तो, कौन सका है नाप?
जैसे बरखा का सलिल, या गर्मी का ताप
*
कंधे हों मजबूत तो, कहें आप 'आ भार'
उठा सकें जब बोझ तो, हम बोलें 'आभार'
*
कविता करना यज्ञ है, पढ़ना रेवा-स्नान
सुनना कथा-प्रसाद है, गुनना प्रभु का ध्यान
*
कांता-सम्मति मानिए, हो घर में सुख-चैन
अधरों पर मुस्कान संग, गुंजित मीठे बैन 

*
सुधियों के संसार में, है शताब्दि क्षण मात्र
श्वास-श्वास हो शोभना, आस सुधीर सुपात्र
*
मृदुला भाषा-काव्य की, धारा, बहे अबाध
'सलिल' साधना कर सतत, हो प्रधान हर साध
*
अनिल अनल भू नभ सलिल, पंचतत्वमय देह
ईश्वर का उपहार है, पूजा करें सनेह
*
हिंदी आटा माढ़िए, उर्दू मोयन डाल
'सलिल'संस्कृत सान दे,पुड़ी बने कमाल
*
जन्म ब्याह राखी तिलक,गृह प्रवेश त्यौहार
हर अवसर पर दे 'सलिल', पुस्तक ही उपहार
*

***

हिंदी वंदना
हिन्द और हिंदी की जय-जयकार करें हम
भारत की माटी, हिंदी से प्यार करें हम
*
भाषा सहोदरी होती है हर प्राणी की
अक्षर-शब्द बसी छवि शारद कल्याणी की
नाद-ताल, रस-छंद, व्याकरण शुद्ध सरलतम
जो बोले वह लिखें-पढ़ें विधि जगवाणी की
संस्कृत-पुत्री को अपना गलहार करें हम
हिन्द और हिंदी की जय-जयकार करें हम
भारत की माटी, हिंदी से प्यार करें हम
*
अवधी, असमी, कन्नड़, गढ़वाली, गुजराती
बुन्देली, बांगला, मराठी, बृज मुस्काती
छतीसगढ़ी, तेलुगू, भोजपुरी, मलयालम
तमिल, डोगरी, राजस्थानी, उर्दू भाती
उड़िया, सिंधी, पंजाबी गलहार करें हम
हिन्द और हिंदी की जय-जयकार करें हम
भारत की माटी, हिंदी से प्यार करें हम
*
देवनागरी लिपि, स्वर-व्यंजन, अलंकार पढ़
शब्द-शक्तियाँ, तत्सम-तद्भव, संधि, बिंब गढ़
गीत, कहानी, लेख, समीक्षा, नाटक रचकर
समय, समाज, मूल्य मानव के नए सकें मढ़
देश, विश्व, मानव, प्रकृति-उद्धार करें हम
हिन्द और हिंदी की जय-जयकार करें हम
भारत की माटी, हिंदी से प्यार करें हम
****
हिंदी ग़ज़ल -
बहर --- २२-२२ २२-२२ २२२१ १२२२
*
है वह ही सारी दुनिया में, किसको गैर कहूँ बोलो?
औरों के क्यों दोष दिखाऊँ?, मन बोले 'खुद को तोलो'
*
​खोया-पाया, पाया-खोया, कर्म-कथानक अपना है
क्यों चंदा के दाग दिखाते?, मन के दाग प्रथम धो लो
*
जो बोया है काटोगे भी, चाहो या मत चाहो रे!
तम में, गम में, सम जी पाओ, पीड़ा में कुछ सुख घोलो
*
जो होना है वह होगा ही, जग को सत्य नहीं भाता
छोडो भी दुनिया की चिंता, गाँठें निज मन की खोलो
*
राजभवन-शमशान न देखो, पल-पल याद करो उसको
आग लगे बस्ती में चाहे, तुम हो मगन 'सलिल' डोलो
***
मुक्तक
वन्दना प्रार्थना साधना अर्चना
हिंद-हिंदी की करिये, रहे सर तना
विश्व-भाषा बने भारती हम 'सलिल'
पा सकें हर्ष-आनंद नित नव घना 
*
नवगीत:
हार गया
लहरों का शोर
जीत रहा
बाँहों का जोर
तांडव कर
सागर है शांत
तूफां ज्यों
यौवन उद्भ्रांत
कोशिश यह
बदलावों की
दिशाहीन
बहसें मुँहजोर
छोड़ गया
नाशों का दंश
असुरों का
बाकी है वंश
मनुजों में
सुर का है अंश
जाग उठो
फिर लाओ भोर
पीड़ा से
कर लो पहचान
फिर पालो
मन में अरमान
फूँक दो
निराशा में जान
साथ चलो
फिर उगाओ भोर
***
divyanarmada.blogspot.com
salil.sanjiv@gmail.com
#हिंदी_ब्लॉगर