गुरुवार, 21 मार्च 2019

कुण्डलिया

कुण्डलिया 
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हिंदू मरते हों मरें, नहीं कहीं भी जिक्र।
काँटा चुभे न अन्य को, सबको इसकी फ़िक्र।।

सबको इसकी फ़िक्र, किस तरह सत्ता पाएँ?
स्वार्थ साध लें अपना, लोग भाड़ में जाएँ।।
कैसे बचे घास जब रखवाले चरते हों?
नहीं किसी को फ़िक्र, अगर हिन्दू  मरते हों।।

कुण्डलिया

कुण्डलिया 
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रूठी राधा से कहें, इठलाकर घनश्याम 
मैंने अपना दिल किया, गोपी तेरे नाम 
गोपी तेरे नाम, राधिका बोली जा-जा 
काला दिल ले श्याम, निकट मेरे मत आ, जा
झूठा है तू ग्वाल, प्रीत भी तेरी झूठी
ठेंगा दिखा न भाग, खिजाती राधा रूठी
२१-३-२०१७ 

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विमर्श कविता और कारुण्य

विमर्श: 
कुछ सवाल-
१. मिथुनरत नर क्रौंच के वध पश्चात क्रौंची के आर्तनाद को सुनकर विश्व की पहली कविता कही गयी। क्या कविता में केवल विलाप और कारुण्य हो, शेष रसों या अनुभूतियाँ के लिये कोई जगह न हो?
२. यदि विलाप से उत्पन्न कविता में आनंद का स्थान हो सकता है तो अभाव और विसंगति प्रधान नवगीत में पर्वजनित अनुभूतियाँ क्यों नहीं हो सकतीं?
३. यदि नवगीत केवल और केवल पीड़ा, दर्द, अभाव की अभिव्यक्ति हेतु है तो क्यों ने उसे शोक गीत कहा जाए?
४. क्या इसका अर्थ यह है कि नवगीत में दर्द के अलावा अन्य अनुभूतियों के लिये कोई स्थान नहीं और उन्हें केंद्र में रखकर रची गयी गीति रचनाओं के लिये कोई नया नाम खोज जाए?
५. यदि नवगीत सिर्फ और सिर्फ दलित और दरिद्र वर्ग की विधा है तो उसमें उस वर्ग में प्रचलित गीति विधाओं कबीरा, ढिमरयाई, आल्हा, बटोही, कजरी, फाग, रास आदि तथा उस वर्ग विशेष में प्रचलित शब्दावली का स्थान क्यों नहीं है?
६. क्या समीक्षा करने का एकाधिकार विचारधारा विशेष के समीक्षकों का है?
७. समीक्षा व्यक्तिगत विचारधारा और आग्रहों के अनुसार हो या रचना के गुण-धर्म पर? क्या समीक्षक अपनी व्यक्तिगत विचारधारा से विपरीत विचारधारा की श्रेष्ठ कृति को सराहे या उसकी निंदा करे?
८. रचनाकार समीक्षक और समीक्षक रचनाकार हो सकता है या नहीं?
९. साहित्य समग्र समाज के कल्याण हेतु है या केवल सर्वहारा वर्ग के अधिकारों का घोषणापत्र है?

२१-३-२०१६ 

लेख गीति-काव्य में छंदों की उपयोगिता और प्रासंगिकता


आलेख:
गीति-काव्य में छंदों की उपयोगिता और प्रासंगिकता / गीत, नवगीत तथा नई कविता
संजीव 'सलिल' 
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[लेखक परिचय- आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' गत ३ दशकों से हिंदी साहित्य, भाषा के विकास के लिये सतत समर्पित और सक्रिय हैं। गद्य,-पद्य की लगभग सभी विधाओं, समीक्षा, तकनीकी लेखन, शोध लेख, संस्मरण, यात्रा वृत्त, साक्षात्कार आदि में आपने निरंतर सृजन कर अपनी पहचान स्थापित की है। १२ राज्यों की साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्थाओं द्वारा शताधिक अलंकरणों, पुरस्कारों आदि से सम्मानित किये जा चुके सलिल जी के ४ पुस्तकें (१. कलम के देव भक्ति गीत संग्रह, २ लोकतंत्र का मक़बरा कविता संग्रह, ३. मीत मेरे कविता संग्रह, ४. भूकम्प के साथ जीना सीखें तकनीकी लोकोपयोगी) प्रकाशित हैं जबकि लघुकथा, दोहा, गीत, नवगीत, मुक्तक, मुक्तिका, लेख, आदि की १० पांडुलिपियाँ प्रकाशन की प्रतीक्षा में हैं। हिंदी भाषा के व्याकरण तथा पिंगल अधिकारी विद्वान सलिल जी ने सिविल अभियंता तथा अधिवक्ता होते हुए भी हिंदी के समांतर बुंदेली, ब्रज, भोजपुरी, अवधी, छत्तीसगढ़ी, मालवी, निमाड़ी, राजस्थानी, हरयाणवी, सिरायकी तथा अंग्रेजी में भी लेखन किया है। मेकलसुता पत्रिका तथा साइट हिन्दयुग्म व् साहित्य शिल्पी पर भाषा, छंद, अलंकार आदि पर आपकी धारावाहिक लेखमालाएँ बहुचर्चित रही हैं। अपनी बुआ श्री महीयसी महादेवी जी तथा माताजी कवयित्री शांति देवी को साहित्य व भाषा प्रेम की प्रेरणा माननेवाले सलिल जी प्रस्तुत लेख में गीत, नवगीत, ग़ज़ल और कविता के लेखन में छंद की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला है।] 
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भूमिका: ध्वनि और भाषा
अध्यात्म, धर्म और विज्ञान तीनों सृष्टि की उत्पत्ति नाद अथवा ध्वनि से मानते हैं। सदियों पूर्व वैदिक ऋषियों ने ॐ से सृष्टि की उत्पत्ति बताई, अब विज्ञान नवीनतम खोज के अनुसार सूर्य से नि:सृत ध्वनि तरंगों का रेखांकन कर उसे ॐ के आकार का पा रहे हैं। ऋषि परंपरा ने इस सत्य की प्रतीति कर सर्व सामने को बताया कि धार्मिक अनुष्ठानों में ध्वनि पर आधारित मंत्रपाठ या जप ॐ से आरम्भ करने पर ही फलता है। यह ॐ परब्रम्ह है, जिसका अंश हर जीव में जीवात्मा के रूप में है। नव जन्मे जातक की रुदन-ध्वनि बताती है कि नया प्राणी आ गया है जो आजीवन अपने सुख-दुःख की अभिव्यक्ति ध्वनि के माध्यम से करेगा। आदि मानव वर्तमान में प्रचलित भाषाओँ तथा लिपियों से अपरिचित था। प्राकृतिक घटनाओं तथा पशु-पक्षियों के माध्यम से सुनी ध्वनियों ने उसमें हर्ष, भय, शोक आदि भावों का संचार किया। शांत सलिल-प्रवाह की कलकल, कोयल की कूक, पंछियों की चहचहाहट, शांत समीरण, धीमी जलवृष्टि आदि ने सुख तथा मेघ व तङित्पात की गड़गड़ाहट, शेर आदि की गर्जना, तूफानी हवाओं व मूसलाधार वर्ष के स्वर ने उसमें भय का संचार किया। इन ध्वनियों को स्मृति में संचित कर, उनका दोहराव कर उसने अपने साथियों तक अपनीअनुभूतियाँ सम्प्रेषित कीं। यही आदिम भाषा का जन्म था। वर्षों पूर्व पकड़ा गया भेड़िया बालक भी ऐसी ही ध्वनियों से शांत, भयभीत, क्रोधित होता देखा गया था।
कालांतर में सभ्यता के बढ़ते चरणों के साथ करोड़ों वर्षों में ध्वनियों को सुनने-समझने, व्यक्त करने का कोष संपन्न होता गया। विविध भौगोलिक कारणों से मनुष्य समूह पृथ्वी के विभिन्न भागों में गये और उनमें अलग-अलग ध्वनि संकेत विकसित और प्रचलित हुए जिनसे विविध भाषाओँ तथा बोलिओं का विकास हुआ। सुनने-कहने की यह परंपरा ही श्रुति-स्मृति के रूप में सहस्त्रों वर्षों तक भारत में फली-फूली। भारत में मानव कंठ में ध्वनि के उच्चारण स्थानों की पहचान कर उनसे उच्चरित हो सकनेवाली ध्वनियों को वर्गीकृत कर शुद्ध ध्वनि पर विशेष ध्यान दिया गया। इन्हें हम स्वर के तीन वर्ग हृस्व, दीर्घ व् संयुक्त तथा व्यंजन के ६ वर्गों क वर्ग, च वर्ग, ट वर्ग, त वर्ग, प वर्ग, य वर्ग आदि के रूप में जानते हैं। अब समस्या इस मौखिक ज्ञान को सुरक्षित रखने की थी ताकि पीढ़ी दर पीढ़ी उसे सही तरीके से पढ़ा-सुना तथा सही अर्थों में समझा-समझाया जा सके। निराकार ध्वनियों का आकार या चित्र नहीं था, जिस शक्ति के माध्यम से इन ध्वनियों के लिये अलग-अलग संकेत मिले उसे आकार या चित्र से परे मानते हुए चित्रगुप्त संज्ञा दी जाकर ॐ से अभिव्यक्त कर ध्वन्यांकन के अपरिहार्य उपादानों असि-मसि तथा लिपि का अधिष्ठाता कहा गया। इसीलिए वैदिक काल से मुग़ल काल तक धर्म ग्रंथों में चित्रगुप्त का उल्लेख होने पर भी उनका कोई मंदिर, पुराण, उपनिषद, व्रत, कथा, चालीसा, त्यौहार आदि नहीं बनाये गये।
निराकार का साकार होना, अव्यक्त का व्यक्त होना, ध्वनि का लिपि, लेखनी, शिलापट के माध्यम से स्थयित्व पाना और सर्व साधारण तक पहुँचना मानव सभ्यता सर्वाधिक महत्वपूर्ण चरण है। किसी भी नयी पद्धति का परंपरावादियों द्वारा विरोध किया ही जाता है। लिपि द्वारा ज्ञान को संचित करने का विरोध हुआ ही होगा और तब ऐसी-मसि-लिपि के अधिष्ठाता को कर्म देवता कहकर विरोध का शमन किया गया। लिपि का विरोध अर्थात अंत समय में पाप-पुण्य का लेख रखनेवाले का विरोध कौन करता? आरम्भ में वनस्पतियों की टहनियों को पैना कर वनस्पतियों के रस में डुबाकर शिलाओं पर संकेत अंकित-चित्रित किये गये। ये शैल-चित्र तत्कालीन मनुष्य की शिकारादि क्रियाओं, पशु-पक्षी आदि सहचरों से संबंधित हैं। इनमें प्रयुक्त संकेत क्रमश: रुढ़, सर्वमान्य और सर्वज्ञात हुए। इस प्रकार भाषा के लिखित रूप लिपि (स्क्रिप्ट) का उद्भव हुआ। लिप्यांकन में प्रवीणता प्राप्त ब्राम्हण-कायस्थ वर्ग को समाज, शासन तथा प्रशासन में सर्वोच्च स्थान सहस्त्रों वर्षों तक प्राप्त हुआ। ध्वनि के उच्चारण तथा अंकन का विज्ञानं विकसित होने से शब्द-भंडार का समृद्ध होना, शब्दों से भावों की अभिव्यक्ति कर सकना तथा इसके समानांतर लिपि का विकास होने से ज्ञान का आदान-प्रदान, नव शोध और सकल मानव जीवन व संस्कृति का विकास संभव हो सका।
रोचक तथ्य यह भी है कि मौसम, पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों, तथा वनस्पति ने भी भाषा और लिपि के विकास में योगदान किया। जिस अंचल में पत्तों से भोजपत्र और टहनियों या पक्षियों के पंखों कलम बनायीं जा सकी वहाँ मुड्ढे (अक्षर पर आड़ी रेखा) युक्त लिपि विकसित हुई जबकि जहाँ ताड़पत्र पर लिखा जाता था वहाँ मुड्ढा खींचने पर उसके चिर जाने के कारण बिना मुड्ढे वाली लिपियाँ विकसित हुईं। क्रमश: उत्तर व दक्षिण भारत में इस तरह की लिपियों का अस्तित्व आज भी है। मुड्ढे हीन लिपियों के अनेक प्रकार कागज़ और कलम की किस्म तथा लिखनेवालों की अँगुलियों क्षमता के आधार पर बने। जिन क्षेत्रों के निवासी वृत्ताकार बनाने में निपुण थे वहाँ की लिपियाँ तेलुगु, कन्नड़ , बांग्ला, उड़िया आदि की तरह हैं जिनके अक्षर किसी बच्चे को जलेबी-इमरती की तरह लग सकते हैं। यहाँ बनायी जानेवाली अल्पना, रंगोली, चौक आदि में भी गोलाकृतियाँ अधिक हैं। यहाँ के बर्तन थाली, परात, कटोरी, तवा, बटलोई आदि और खाद्य रोटी, पूड़ी, डोसा, इडली, रसगुल्ला आदि भी वृत्त या गोल आकार के हैं।
रेगिस्तानों में पत्तों का उपचार कर उन पर लिखने की मजबूरी थी इसलिए छोटी-छोटी रेखाओं से निर्मित अरबी, फ़ारसी जैसी लिपियाँ विकसित हुईं। बर्फ, ठंड और नमी वाले क्षेत्रों में रोमन लिपि का विकास हुआ। चित्र अंकन करने की रूचि ने चीनी जैसी चित्रात्मक लिपि के विकास का पथ प्रशस्त किया। इसी तरह खान-पान के कारण विविध अंचल के निवासियों में विविध ध्वनियों के उच्चारण की क्षमता भी अलग-अलग होने से वहाँ विकसित भाषाओँ में वैसी ध्वनियुक्त शब्द बने। जिन अंचलों में जीवन संघर्ष कड़ा था वहाँ की भाषाओँ में कठोर ध्वनियाँ अधिक हैं, जबकि अपेक्षाकृत शांत और सरल जीवन वाले क्षेत्रों की भाषाओँ में कोमल ध्वनियाँ अधिक हैं। यह अंतर हरयाणवी, राजस्थानी, काठियावाड़ी और बांग्ला., बृज, अवधि भाषाओँ में अनुभव किया जा सकता है।
सार यह कि भाषा और लिपि के विकास में ध्वनि का योगदान सर्वाधिक है। भावनाओं और अनुभूतियों को व्यक्त करने में सक्षम मानव ने गद्य और पद्य दो शैलियों का विकास किया। इसका उत्स पशु-पक्षियों और प्रकृति से प्राप्त ध्वनियाँ ही बनीं। अलग-अलग रुक-रुक कर हुई ध्वनियों ने गद्य विधा को जन्म दिया जबकि नदी के कलकल प्रवाह या निरंतर कूकती कोयल की सी ध्वनियों से पद्य का जन्म हुआ। पद्य के सतत विकास ने गीति काव्य का रूप लिया जिसे गाया जा सके। गीतिकाव्य के मूल तत्व ध्वनियों का नियमित अंतराल पर दुहराव, बीच-बीच में ठहराव और किसी अन्य ध्वनि खंड के प्रवेश से हुआ। किसी नदी तट के किनारे कलकल प्रवाह के साथ निरंतर कूकती कोयल को सुनें तो एक ध्वनि आदि से अंत तक, दूसरी के बीच-बीच में प्रवेश से गीत के मुखड़े और अँतरे की प्रतीति होगी। मैथुनरत क्रौंच युगल में से नर का व्याध द्वारा वध, मादा का आर्तनाद और आदिकवि वाल्मिकी के मुख से प्रथम कविता का प्रागट्य इसी सत्य की पुष्टि करता है। हिरण शावक के वध के पश्चात अश्रुपात करती हिरणी के रोदन से ग़ज़ल की उत्पत्ति की मान्यताएँ गीति काव्य की उत्पत्ति में प्रकृति और पर्यावरण का योगदान ही इंगित करते हैं।
व्याकरण और पिंगल का विकास-
भारत में गुरुकुल परम्परा में साहित्य की सारस्वत आराधना का जैसा वातावरण रहा वैसा अन्यत्र कहीं नहीं रह सका, इसलिये भारत में कविता का जन्म ही नहीं हुआ पाणिनि व पिंगल ने विश्व के सर्वाधिक व्यवस्थित, विस्तृत और समृद्ध व्याकरण और पिंगल शास्त्रों का सृजन किया जिनका कमोबेश अनुकरण और प्रयोग विश्व की अधिकांश भाषाओँ में हुआ। जिस तरह व्याकरण के अंतर्गत स्वर-व्यंजन का अध्ययन ध्वनि विज्ञानं के आधारभूत तत्वों के आधार पर हुआ वैसे ही पिंगल के अंतर्गत छंदों का निर्माण ध्वनि खण्डों की आवृत्तिकाल के आधार पर हुआ। पिंगल ने लय या गीतात्मकता के दो मूल तत्वों गति-यति को पहचान कर उनके मध्य प्रयुक्त की जा रही लघु-दीर्घ ध्वनियों को वर्ण या अक्षर के माध्यम से पहचाना तथा उन्हें क्रमश: १-२ मात्रा भार देकर उनके उच्चारण काल की गणना बिना किसी यंत्र या विधि न विशेष का प्रयोग किये संभव बना दी। ध्वनि खंड विशेष के प्रयोग और आवृत्ति के आधार पर छंद पहचाने गये। छंद में प्रयुक्त वर्ण तथा मात्रा के आधार पर छंद के दो वर्ग वर्णिक तथा मात्रिक बनाये गये। मात्रिक छंदों के अध्ययन को सरल करने के लिये ८ लयखंड (गण) प्रयोग में लाये गये सहज बनाने के लिए एक सूत्र 'यमाताराजभानसलगा' बनाया गया।
गीति काव्य में छंद-
गणित के समुच्चय सिद्धांत (सेट थ्योरी) तथा क्रमचय और समुच्चय (परमुटेशन-कॉम्बिनेशन) का प्रयोग कर दोनों वर्गों में छंदों की संख्या का निर्धारण किया गया। वर्ण तथा मात्रा संख्या के आधार पर छंदों का नामकरण गणितीय आधार पर किया गया। मात्रिक छंद के लगभग एक करोड़ तथा वर्णिक छंदों के लगभग डेढ़ करोड़ प्रकार गणितीय आधार पर ही बताये गये हैं। इसका परोक्षार्थ यह है कि वर्णों या मात्राओं का उपयोग कर जब भी कुछ कहा जाता है वह किसी न किसी ज्ञात या अज्ञात छंद का छोटा-बड़ा अंश होता है।इसे इस तरह समझें कि जब भी कुछ कहा जाता है वह अक्षर होता है। संस्कृत के अतिरिक्त विश्व की किसी अन्य भाषा में गीति काव्य का इतना विशद और व्यवस्थित अध्ययन नहीं हो सका। संस्कृत से यह विरासत हिंदी को प्राप्त हुई तथा संस्कृत से कुछ अंश अरबी, फ़ारसी, अंग्रेजी , चीनी, जापानी आदि तक भी गयी। यह अलग बात है कि व्यावहारिक दृष्टि से हिंदी में भी वर्णिक और मात्रिक दोनों वर्गों के लगभग पचास छंद ही मुख्यतः: प्रयोग हो रहे हैं। रचनाओं के गेय और अगेय वर्गों का अंतर लय होने और न होने पर ही है। गद्य गीत और अगीत ऐसे वर्ग हैं जो दोनों वर्गों की सीमा रेखा पर हैं अर्थात जिनमें भाषिक प्रवाह यत्किंचित गेयता की प्रतीति कराता है। यह निर्विवाद है कि समस्त गीति काव्य ऋचा, मन्त्र, श्लोक, लोक गीत, भजन, आरती आदि किसी भी देश रची गयी हों छंदाधारित है। यह हो सकता है कि उस छंद से अपरिचय, छंद के आंशिक प्रयोग अथवा एकाधिक छंदों के मिश्रण के कारण छंद की पहचान न की जा सके।
वैदिक साहित्य में ऋग्वेद एवं सामवेद की ऋचाएँ गीत का आदि रूप हैं। गीत की दो अनिवार्य शर्तें विशिष्ट सांगीतिक लय तथा आरोह-अवरोह अथवा गायन शैली हैं। कालांतर में 'लय' के निर्वहन हेतु छंद विधान और अंत्यानुप्रास (तुकांत-पदांत) का अनुपालन संस्कृत काव्य की वार्णिक छंद परंपरा तक किया जाता रहा। संस्कृत काव्य के समान्तर प्राकृत, अपभ्रंश आदि में भी 'लय' का महत्व यथावत रहा। सधुक्कड़ी में शब्दों के सामान्य रूप का विरूपण सहज स्वीकार्य हुआ किन्तु 'लय' का नहीं। शब्दों के रूप विरूपण और प्रचलित से हटकर भिन्नार्थ में प्रयोग करने पर कबीर को आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने 'भाषा का डिक्टेटर' कहा।
अंग्रेजों और अंगरेजी के आगमन और प्रभुत्व-स्थापन की प्रतिक्रिया स्वरूप सामान्य जन अंग्रेजी साहित्य से जुड़ नहीं सका और स्थानीय देशज साहित्य की सृजन धारा क्रमशः खड़ी हिंदी का बाना धारण करती गयी जिसकी शैलियाँ उससे अधिक पुरानी होते हुए भी उससे जुड़ती गयीं। छंद, तुकांत और लय आधृत काव्य रचनाएँ और महाकाव्य लोक में प्रतिष्ठित और लोकप्रिय हुए। आल्हा, रासो, राई, कजरी, होरी, कबीर आदि गीत रूपों में लय तथा तुकांत-पदांत सहज साध्य रहे। यह अवश्य हुआ कि सीमित शिक्षा तथा शब्द-भण्डार के कारण शब्दों के संकुचन या दीर्घता से लय बनाये रखा गया या शब्दों के देशज भदेसी रूप का व्यवहार किया गया। विविध छंद प्रकारों यथा छप्पय, घनाक्षरी, सवैया आदि में यह समन्वय सहज दृष्टव्य है।खड़ी हिंदी जैसे-जैसे वर्तमान रूप में आती गयी शिक्षा के प्रचार-प्रसार के साथ कवियों में छंद-शुद्धता के समर्थन या विरोध की प्रवृत्ति बढ़ी जो पारम्परिक और प्रगतिवादी दो खेमों में बँट गयी।
छंदमुक्तता और छंद हीनता-
लम्बे काल खंड के पश्चात हिंदी पिंगल को महाप्राण निराला ने कालजयी अवदान छंदमुक्त गीति रचनाओं के रूप में दिया। उत्तर भारत के लोककाव्य व संगीत तथा रवींद्र संगीत में असाधारण पैठ के कारण निराला की छंद पर पकड़ समय से आगे की थी। उनकी प्रयोगधर्मिता ने पारम्परिक छंदों के स्थान पर सांगीतिक राग-ताल को वरीयता देते हुए जो रचनाएँ उन्हें प्रस्तुत कीं उन्हें भ्रम-वश छंद विहीन समझ लिया गया, जबकि उनकी गेयता ही इस बात का प्रमाण है कि उनमें लय अर्थात छंद अन्तर्निहित है। निराला की रचनाओं और तथाकथित प्रगतिशील कवियों की रचनाओं के सस्वर पाठ से छंदमुक्तता और छंदहीनता के अंतर को सहज ही समझा जा सकता है।
दूसरी ओर पारम्परिक काव्यधारा के पक्षधर रचनाकार छंदविधान की पूर्ण जानकारी और उस पर अधिकार न होने के कारण उर्दू काव्यरूपों के प्रति आकृष्ट हुए अथवा मात्रिक-वार्णिक छंद के रूढ़ रूपों को साधने के प्रयास में लालित्य, चारुत्व आदि काव्य गुणों को नहीं साध सके। इस खींच-तान और ऊहापोह के वातावरण में हिंदी काव्य विशेषकर गीत 'रस' तथा 'लय' से दूर होकर जिन्दा तो रहा किन्तु जीवनशक्ति गँवा बैठा। निराला के बाद प्रगतिवादी धारा के कवि छंद को कथ्य की सटीक अभिव्यक्ति में बाधक मानते हुए छंदहीनता के पक्षधर हो गये। इनमें से कुछ समर्थ कवि छंद के पारम्परिक ढाँचे को परिवर्तित कर या छोड़कर 'लय' तथा 'रस' आधारित रचनाओं से सार्थक रचना कर्मकार सके किन्तु अधिकांश कविगण नीरस-क्लिष्ट प्रयोगवादी कवितायेँ रचकर जनमानस में काव्य के प्रति वितृष्णा उत्पन्न करने का कारण बने। विश्वविद्यालयों में हिंदी को शोधोपाधियां प्राप्त किन्तु छंद रचना हेतु आवश्यक प्रतिभा से हीं प्राध्यापकों का एक नया वर्ग पैदा हो गया जिसने अमरता की चाह ने अगीत, प्रगीत, गद्यगीत, अनुगीत, प्रलंब गीत जैसे न जाने कितने प्रयोग किये पर बात नहीं बनी। प्रारंभिक आकर्षण, सत्तासीन राजनेताओं और शिक्षा संस्थानों, पत्रिकाओं और समीक्षकों के समर्थन के बाद भी नयी कविता अपनी नीरसता और जटिलता के कारण जन-मन से दूर होती गयी। गीत के मरने की घोषणा करनेवाले प्रगतिवादी कवि और समीक्षक स्वयं काल के गाल में समा गये पर गीत लोक मानस में जीवित रहा। हिंदी छंदों को कालातीत अथवा अप्रासंगिक मानने की मिथ्या अवधारणा पाल रहे रचनाकार जाने-अनजाने में उन्हीं छंदों का प्रयोग बहर में करते हैं।
उर्दू काव्य विधाओं में छंद-
भारत के विविध भागों में विविध भाषाएँ तथा हिंदी के विविध रूप (शैलियाँ) प्रचलित हैं। उर्दू हिंदी का वह भाषिक रूप है जिसमें अरबी-फ़ारसी शब्दों के साथ-साथ मात्र गणना की पद्धति (तक़्ती) का प्रयोग किया जाता है जो अरबी लोगों द्वारा शब्द उच्चारण के समय पर आधारित हैं। पंक्ति भार गणना की भिन्न पद्धतियाँ, नुक्ते का प्रयोग, काफ़िया-रदीफ़ संबंधी नियम आदि ही हिंदी-उर्दू रचनाओं को वर्गीकृत करते हैं। हिंदी में मात्रिक छंद-लेखन को व्यवस्थित करने के लिये प्रयुक्त गण के समान, उर्दू बहर में रुक्न का प्रयोग किया जाता है। उर्दू गीतिकाव्य की विधा ग़ज़ल की ७ मुफ़र्रद (शुद्ध) तथा १२ मुरक्कब (मिश्रित) कुल १९ बहरें मूलत: २ पंच हर्फ़ी (फ़ऊलुन = यगण यमाता तथा फ़ाइलुन = रगण राजभा ) + ५ सात हर्फ़ी (मुस्तफ़इलुन = भगणनगण = भानसनसल, मफ़ाईलुन = जगणनगण = जभानसलगा, फ़ाइलातुन = भगणनगण = भानसनसल, मुतफ़ाइलुन = सगणनगण = सलगानसल तथा मफऊलात = नगणजगण = नसलजभान) कुल ७ रुक्न (बहुवचन इरकॉन) पर ही आधारित हैं जो गण का ही भिन्न रूप है। दृष्टव्य है कि हिंदी के गण त्रिअक्षरी होने के कारण उनका अधिकतम मात्र भार ६ है जबकि सप्तमात्रिक रुक्न दो गानों का योग कर बनाये गये हैं। संधिस्थल के दो लघु मिलाकर दीर्घ अक्षर लिखा जाता है। इसे गण का विकास कहा जा सकता है।
वर्णिक छंद मुनिशेखर - २० वर्ण = सगण जगण जगण भगण रगण सगण लघु गुरु
चल आज हम करते सुलह मिल बैर भाव भुला सकें
बहरे कामिल - मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन
पसे मर्ग मेरे मज़ार परजो दिया किसी ने जला दिया
उसे आह दामने-बाद ने सरे-शाम से ही बुझा दिया
उक्त वर्णित मुनिशेखर वर्णिक छंद और बहरे कामिल वस्तुत: एक ही हैं।
अट्ठाईस मात्रिक यौगिक जातीय विधाता (शुद्धगा) छंद में पहली, आठवीं और पंद्रहवीं मात्रा लघु तथा पंक्त्यांत में गुरु रखने का विधान है।
कहें हिंदी, लिखें हिंदी, पढ़ें हिंदी, गुनें हिंदी
न भूले थे, न भूलें हैं, न भूलेंगे, कभी हिंदी
हमारी थी, हमारी है, हमारी हो, सदा हिंदी
कभी सोहर, कभी गारी, बहुत प्यारी, लगे हिंदी - सलिल 
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हमें अपने वतन में आजकल अच्छा नहीं लगता
हमारा देश जैसा था हमें वैसा नहीं लगता
दिया विश्वास ने धोखा, भरोसा घात कर बैठा
हमारा खून भी 'सागर', हमने अपना नहीं लगता -रसूल अहमद 'सागर'
अरकान मफाईलुन मफाईलुन मफाईलुन मफाईलुन से बनी उर्दू बहर हज़ज मुसम्मन सालिम, विधाता छंद ही है। इसी तरह अन्य बहरें भी मूलत: छंद पर ही आधारित हैं।
रुबाई के २४ औज़ान जिन ४ मूल औज़ानों (१. मफ़ऊलु मफ़ाईलु मफ़ाईलु फ़अल, २. मफ़ऊलु मफ़ाइलुन् मफ़ाईलु फ़अल, ३. मफ़ऊलु मफ़ाईलु मफ़ाईलु फ़ऊल तथा ४. मफ़ऊलु मफ़ाइलुन् मफ़ाईलु फ़ऊल) से बने हैं उनमें ५ लय खण्डों (मफ़ऊलु, मफ़ाईलु, मफ़ाइलुन् , फ़अल तथा फ़ऊल) के विविध समायोजन हैं जो क्रमश: सगण लघु, यगण लघु, जगण २ लघु / जगण गुरु, नगण तथा जगण ही हैं। रुक्न और औज़ान का मूल आधार गण हैं जिनसे मात्रिक छंद बने हैं तो इनमें यत्किंचित परिवर्तन कर बनाये गये (रुक्नों) अरकान से निर्मित बहर और औज़ान छंदहीन कैसे हो सकती हैं?
औज़ान- मफ़ऊलु मफ़ाईलुन् मफ़ऊलु फ़अल
सगण लघु जगण २ लघु सगण लघु नगण
सलगा ल जभान ल ल सलगा ल नसल
इंसान बने मनुज भगवान नहीं
भगवान बने मनुज शैवान नहीं 
धरती न करे मना, पाले सबको-
दूषित न करो बनो हैवान नहीं -सलिल
गीत / नवगीत का शिल्प, कथ्य और छंद-
गीत और नवगीत शैल्पिक संरचना की दृष्टि से समगोत्रीय है। अन्य अनेक उपविधाओं की तरह यह दोनों भी कुछ समानता और कुछ असमानता रखते हैं। नवगीत नामकरण के पहले भी गीत और दोनों नवगीत रचे जाते रहे आज भी रहे जा रहे हैं और भविष्य में भी रचे जाते रहेंगे। अनेक गीति रचनाओं में गीत और नवगीत दोनों के तत्व देखे जा सकते हैं। इन्हें किसी वर्ग विशेष में रखे जाने या न रखे जाने संबंधी समीक्षकीय विवेचना बेसिर पैर की कवायद कही जा सकती है। इससे पाचनकाए या समीक्षक विशेष के अहं की तुष्टि भले हो विधा या भाषा का भला नहीं होता।
गीत - नवगीत दोनों में मुखड़े (स्थाई) और अंतरे का समायोजन होता है, दोनों को पढ़ा, गुनगुनाया और गाया जा सकता है। मुखड़ा अंतरा मुखड़ा अंतरा यह क्रम सामान्यत: चलता है। गीत में अंतरों की संख्या प्राय: विषम यदा-कदा सम भी होती है । अँतरे में पंक्ति संख्या तथा पंक्ति में शब्द संख्या आवश्यकतानुसार घटाई - बढ़ाई जा सकती है। नवगीत में सामान्यतः २-३ अँतरे तथा अंतरों में ४-६ पंक्ति होती हैं। बहुधा मुखड़ा दोहराने के पूर्व अंतरे के अंत में मुखड़े के समतुल्य मात्रिक / वर्णिक भार की पंक्ति, पंक्तियाँ या पंक्त्यांश रखा जाता है। अंतरा और मुखड़ा में प्रयुक्त छंद समान भी हो सकते हैं और भिन्न भी। गीत के प्रासाद में छंद विधान और अंतरे का आकार व संख्या उसका विस्तार करते हैं। नवगीत के भवन में स्थाई और अंतरों की सीमित संख्या और अपेक्षाकृत लघ्वाकार व्यवस्थित गृह का सा आभास कराते हैं। प्रयोगधर्मी रचनाकार इनमें एकाधिक छंदों, मुक्तक छंदों अथवा हिंदीतर भाषाओँ के छंदों का प्रयोग करते रहे हैं।गीत में पारम्परिक छंद चयन के कारण छंद विधान पूर्वनिर्धारित गति-यति को नियंत्रित करता है। नवगीत में छान्दस स्वतंत्रता होती है अर्थात मात्रा सन्तुलनजनित गेयता और लयबद्धता पर्याप्त है। दोहा, सोरठा, रोला, उल्लाला, त्रिभंगी, आल्हा, सखी, मानव, नरेंद्र छंद (फाग), जनक छंद, लावणी, हाइकु आदि का प्रयोग गीत-नवगीत में किया जाता रहा है।
गीत - नवगीत दोनों में कथ्य के अनुसार रस, प्रतीक और बिम्ब चुने जाते हैं। गेयता या लयबद्धता दोनों में होती है। गीत में शिल्प को वरीयता प्राप्त होती है जबकि नवगीत में कथ्य प्रधान होता है। गीत में कथ्य वर्णन के लिये प्रचुर मात्र में बिम्बों, प्रतीकों और उपमाओं के उपयोग का अवकाश होता है जबकि नवगीत में गागर में सागर, बिंदु में सिंधु की तरह इंगितों में बात कही जाती है। 'कम बोले से अधिक समझना' की उक्ति नवगीत पर पूरी तरह लागू होती है। नवगीत की विषय वस्तु सामायिक और प्रासंगिक होती है। तात्कालिकता नवगीत का प्रमुख लक्षण है जबकि सनातनता, निरंतरता गीत का। गीत रचना का उद्देश्य सत्य-शिव-सुंदर की प्रतीति तथा सत-चित-आनंद की प्राप्ति कही जा सकती है जबकि नवगीत रचना का उद्देश्य इसमें बाधक कारकों और स्थितियों का इंगित कर उन्हें परिवर्तित करने की सरचनात्मक प्रयास कहा जा सकता है। गीत महाकाल का विस्तार है तो नवगीत काल की सापेक्षता। गीत का कथ्य व्यक्ति को समष्टि से जोड़कर उदात्तता के पथ पर बढ़ाता है तो नवगीत कथ्य समष्टि की विरूपता पर व्यक्ति को केंद्रित कर परिष्कार की राह सुझाता है।
नवगीत का विशिष्ट लक्षण नवता बताया जाता है किन्तु यह तत्व गीत में भी हो सकता है और किसी नवगीत में अल्प या नहीं भी हो सकता है। जो विचार एक नवगीतकार के लिए पूर्व ज्ञात हो वह अन्य के लिये नया हो सकता है। अत:, नवता अनुल्लंघनीय मानक नहीं हो सकता। पारम्परिक तुलनाओं, उपमाओं, बिम्बों तथा कथ्यों को नवगीत में वर्ज्य कहनेवालों को उसके लोकस्वीकार्यता को भी ध्यान में रखना होगा। सामान्य पाठक या श्रोता को सामान्यत: पुस्तकीय मानकों से अधिक रास रंजकता आकर्षित करती है। अत: कथ्य की माँग पर मिथकों एवं पारम्परिक तत्वों के प्रयोग के संबंध में लचीला दृष्टिकोण आवश्यक है।
नवगीत में पारिस्थितिक शब्द चित्रण (विशेषकर वैषम्य और विडम्बना) मय कथ्य की अनिवार्यता, काल्पनिक रूमानियत और लिजलिजेपन से परहेज, यथार्थ की धरती पर 'है' और 'होना चाहिए' के ताने-बाने से विषमता के बेल-बूटे सामने लाना, आम आदमी के दर्द-पीड़ा, चीत्कार, असंतोष के वर्णन को साध्य मानने के पक्षधर नवगीत में प्रगतिवादी कवित्त के तत्वों का पिछले दरवाज़े से प्रवेश कराने का प्रयास करते है। यदि यह कुचेष्टा सफल हुई तो नवगीत भी शीघ्र ही प्रगतिशील कविता की सी मरणासन्न स्थिति में होगा। सौभाग्य से नवगीत रचना के क्षेत्र में प्रविष्ट नयी पीढ़ी एकांगी चिंतन को अमान्य कर, मानकों से हटकर सामायिक विषयों, घटनाओं, व्यक्तित्वों, जीवनमूल्यों, टकरावों, स्खलनों के समान्तर आदर्शों, उपलब्धियों, आकांक्षाओं, को नवगीत का विषय बना रही है।
फिर मुँडेरों पर सजे / कचनार के दिन
बैंगनी से श्वेत तक / खिलती हुई मोहक अदाएँ
शाम लेकर उड़ चलीं / रंगीन ध्वज सी ये छटाएँ
फूल गिन-गिन / मुदित भिन-भिन
फिर हवाओं में / बजे कचनार के दिन
खिड़कियाँ, खपरैल, घर, छत / डाल, पत्ते आँख मीचे
आरती सी दीप्त पँखुरी / उतरती है शांत नीचे
रूप झिलमिल / चाल स्वप्निल
फिर दिशाओं ने / भजे कचनार के दिन -पूर्णिमा बर्मन
नवगीत लिखते समय इन बातों का ध्यान रखें-१. संस्कृति व लोकतत्त्व का समावेश हो। २. तुकान्तता पर लयात्मकता को वरीयता दें। ३. नये प्रतीक व बिम्बों का प्रयोग करें। ४. दृष्टिकोण वैज्ञानिकतामय अथवा यथार्थपरक हो। ५. सकारात्मक सोच हो। ६. बात कहने का ढंग नया हो और प्रभावशाली ढंग हो। ७. प्रचुर शब्द-भंडार सम्यक शब्द-चयन में सहायक होता है। ८. नवगीत छन्द के रूढ़ बंधन से मुक्त किन्तु लय परक गति-यति से सज्जित होता है। ९. प्रकृति का सूक्ष्मता के साथ निरीक्षण, कथ्य की जानकारी, मौलिक विश्लेषण और लीक से हटकर अभिव्यक्ति नवगीत लेखन हेतु रचना सामग्री है। भाषा के स्तर पर गीत में संकेतन का महत्वपूर्ण स्थान होता है जबकि नवगीत में स्पष्टता आवश्यक है। गीत पारम्परिकता का पोषक होता है तो नवगीत नव्यता को महत्व देता है। गीत में छंद योजना को वरीयता होती है तो नवगीत में गेयता अथवा लयात्मकता को महत्व मिलता है।
हिंदी छंद और भाषा का वैशिष्ट्य-
हिंदी भाषा का वैशिष्ट्य संस्कृत से अन्य भाषाओँ की तुलना में अधिक प्रभावी तथा ध्वनि विज्ञानं सम्मत उच्चारण प्रणाली ग्रहण करना, सरल अक्षराकृतियाँ, स्वर-व्यंजन,उपयुक्त संयुक्ताक्षर, शब्द-भेद, सटीक संधि नियम, भाषिक शक्तियाँ (अमिधा, व्यंजना, लक्षणा), शताधिक अलंकार, करोड़ों छंद, अगणित मुहावरे तथा लोकोक्तियाँ, तत्सम-तद्भव शब्द, उपसर्ग-प्रत्यय, ५० से अधिक आंचलिक भाषा-रूप, विशव में किसी भी एनी भाषा की तुलना में अधिक समझने-बोलने-लिखनेवाला जनगण आदि के साथ महासागर की तरह निरंतर कुछ नया ग्रहण करने की प्रवृत्ति है। इस कारण हिंदी ने संस्कृत, पाली, प्राकृत, अपभ्रंश, ब्राम्ही की विरासत के साथ २० से अधिक भारतीय भाषाओँ के अरबी, फ़ारसी, अंग्रेजी, जापानी आदि से प्राप्त शब्दों, साहित्य की रचना विधाओं आदि को ग्रहण मात्र नहीं किया अपितु उनके मूल रूप को अपने भाषिक-देशिक संस्कार के अनुरूप परिवर्तित कर उनमें प्रचुर साहित्य रचना कर उसे अपना बना लिया। हिंदी ने मराठी के लावणी, अभंग आदि छंद, पंजाबी के माहिया छंद, अंग्रेजी के सोनेट, कप्लेट, बैलेड आदि छंद, जापानी के हाइकु, स्नैर्यु, ताँका, वांका आदि छंदों सहजता से अपना ही नहीं लिये अपितु उन्हें भारतीय संस्कृति, जनमानस, लोकप्रवृत्ति के नुरूप ढालकर उनका भारतीयकरण भी किया है। विश्व में सर्वाधिक बोली जा रही हिंदी ने भारत में राजनैतिक और आंचलिक विरोध द्वारा विकास-पथ रोकने की कोशिश के बावजूद विश्ववाणी का स्तर पाया है। हिंदी के छंद विश्व की कई भाषाओँ में अनूदित किये और रचे जा रहे हैं। सारत: यह निष्कर्ष निस्संकोच व्यक्त किया जा सकता है कि गीति रचनाओं का अस्तित्व ही छंद पर निर्भर है। छंदों के व्यापक, गहन और उच्च प्रभाव की अभिवृद्धि के लिये उन्हें सरलतम रूप में, स्पष्ट किन्तु लचीले रचना नियमों, मात्रा बाँट निर्धारण आदि सहित प्रस्तुत कृते रहा जाना चाहिए ताकि नयी पीढ़ी उन्हें ग्रहण कर सके और उनके विकास में अपना योगदान कर हिंदी को विश्ववाणी के पद पर आसीन करा सके।
संदर्भ ग्रन्थ-
१. छंद प्रभाकर, जगन्नाथ प्रसाद 'भानु'
२. छंद क्षीरधि राम देव लाल 'विभोर'
३. छ्न्दोलक्षण, नारायणदास 
४. छंद मंजरी, सौरभ पाण्डेय 
५. काव्य मनीषा, डॉ. भागीरथ मिश्र 
६. उर्दू कविता और छंद शास्त्र, नरेश नदीम 
७. गजल छंद चेतना, महावीर प्रसाद मूकेश 
८. गजल सृजन रामप्रसाद शर्मा 'महर्षि'
९. गजल ज्ञान, राम देव लाल 'विभोर'
१०. नव गजलपुर, सागर मीरज़ापुरी 
११. गीतिकायनम, सागर मीरज़ापुरी
१२. सत्यं शिवं सुन्दरं, स्वामी श्यामानंद सरस्वती 
१३. संवेदनाओं के क्षितिज, रसूल अहमद सागर 
१४. चोंच में आकाश, पूर्णिमा बर्मन 
१५. भारतीय काव्य शास्त्र, डॉ. कृष्णदेव शर्मा 
१६. उर्दू साहित्य का इतिहास, डॉ. सभापति मिश्र 
१७. हिंदी का सरल भाषा विज्ञान, गोपाल लाल खन्ना 
१८. समकालीन नवगीत की अवधारणा और जीवन मूल्य, डॉ. उर्वशी सिंह 
१९. नवगीत के नये प्रतिमान, राधेश्याम 'बंधु' 
२०. आलोचना शास्त्र, मोहनवल्लभ पन्त है.।
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२१.३.२०१६ 
-समन्वयम, २०४ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१, ९४२५१ ८३२४४

त्रिभंगी छंद फागुन

त्रिभंगी छंद:
संजीव 'सलिल'
*
ऋतु फागुन आये, मस्ती लाये, हर मन भाये, यह मौसम।
अमुआ बौराये, महुआ भाये, टेसू गाये, को मो सम।।
होलिका जलायें, फागें गायें, विधि-हर शारद-रमा मगन-
बौरा सँग गौरा, भूँजें होरा, डमरू बाजे, डिम डिम डम।।
२१.३.२०१३ 
*

मुक्तिका: भाल पर सूरज

मुक्तिका:                                                                                              
संजीव 'सलिल'
*
भाल पर सूरज चमकता, नयन आशा से भरे हैं.
मौन अधरों का कहे, हम प्रणयधर्मी पर खरे हैं..

श्वास ने की रास, अनकहनी कहे नथ कुछ कहे बिन.
लालिमा गालों की दहती, फागुनी किंशुक झरे हैं..

चिबुक पर तिल, दिल किसी दिलजले का कुर्बां हुआ है.
भौंह-धनु के नयन-बाणों से न हम आशिक डरे हैं?.

बाजुओं के बंधनों में कसो, जीवन दान दे दो.
केश वल्लरियों में गूथें कुसुम, भँवरे बावरे हैं..

सुर्ख लाल गाल, कुंतल श्याम, चितवन है गुलाबी.
नयन में डोरे नशीले, नयन-बाँके साँवरे हैं..

हुआ इंगित कुछ कहीं से, वर्जना तुमने करी है.
वह न माने लाज-बादल सिंदूरी फिर-फिर घिरे हैं..

पीत होती देह कम्पित, द्वैत पर अद्वैत की जय.
काम था निष्काम, रति की सुरती के पल माहुरे हैं..

हुई होली, हो रही, होगी हमेशा प्राण-मन की.
विदेहित हो देह ने, रंग-बिरंगे सपने करे हैं..

समर्पण की साधना दुष्कर, 'सलिल' होती सहज भी-
अबीरी-अँजुरी करे अर्पण बिना, हम कब टरे हैं..
२१-३-२०११  
**************

एक गीत: नदी मर रही है

एक गीत:
नदी मर रही है
*
नदी नीरधारी, नदी जीवधारी,
नदी मौन सहती उपेक्षा हमारी
नदी पेड़-पौधे, नदी जिंदगी है-
भुलाया है हमने नदी माँ हमारी
नदी ही मनुज का
सदा घर रही है।
नदी मर रही है
*
नदी वीर-दानी, नदी चीर-धानी
नदी ही पिलाती बिना मोल पानी,
नदी रौद्र-तनया, नदी शिव-सुता है-
नदी सर-सरोवर नहीं दीन, मानी
नदी निज सुतों पर सदय, डर रही है
नदी मर रही है
*
नदी है तो जल है, जल है तो कल है
नदी में नहाता जो वो बेअकल है
नदी में जहर घोलती देव-प्रतिमा
नदी में बहाता मनुज मैल-मल है
नदी अब सलिल का नहीं घर रही है
नदी मर रही है
*
नदी खोद गहरी, नदी को बचाओ
नदी के किनारे सघन वन लगाओ
नदी को नदी से मिला जल बचाओ
नदी का न पानी निरर्थक बहाओ
नदी ही नहीं, यह सदी मर रही है
नदी मर रही है
***
१२.३.२०१८

मुक्तक

मुक्तक 
नव वर्षोत्सव मंगलमय हो। 
माँ की कृपा अमित-अक्षय हो।।                                                                                                    
करें साधना सद्भावों की,
नित नव रचनाएँ निर्भय हों।।                                                                                                             *

बुधवार, 20 मार्च 2019

होली के दोहे

होली के दोहे
*
होली हो ली हो रही, होली हो ली हर्ष  
हा हा ही ही में सलिल, है सबका उत्कर्ष 
होली = पर्व, हो चुकी, पवित्र, लिए हो   
*
रंग रंग के रंग का, भले उतरता रंग 
प्रेम रंग यदि चढ़ गया कभी न उतरे रंग 
*
पड़ा भंग में रंग जब, हुआ रंग में भंग 
रंग बदलते देखता, रंग रंग को दंग 
*
शब्द-शब्द पर मल रहा, अर्थ अबीर गुलाल 
अर्थ-अनर्थ न हो कहीं, मन में करे ख़याल 
*
पिच् कारी दीवार पर, पिचकारी दी मार 
जीत गई झट गंदगी, गई सफाई हार 
*
दिखा सफाई हाथ की, कहें उठाकर माथ 
देश साफ़ कर रहे हैं,  बँटा रहे चुप हाथ 
*
अनुशासन जन में रहे, शासन हो उद्दंड 
दु:शासन तोड़े नियम, बना न मिलता दंड   
*
अलंकार चर्चा न कर, रह जाते नर मौन 
नारी सुन माँगे अगर, जान बचाए कौन?
*
गोरस मधुरस काव्य रस, नीरस नहीं सराह 
करतल ध्वनि कर सरस की, करें सभी जन वाह 
*
जला गंदगी स्वच्छ रख, मनु तन-मन-संसार  
मत तन मन रख स्वच्छ तू, हो आसार में सार 
*
आराधे राधे; कहे आ राधे! घनश्याम 
वाम न होकर वाम हो, क्यों मुझसे हो श्याम 
*
संवस 
होली २०१८ 

हुरहुरे

बुरा न मानो होली है
*
भंग चढ़ाकर बताते हैं पेड़ों को शिव हरे हरे!
देख शिवहरे जी मुस्काए, खाकर गूझे खरे-खरे।।
गुझिया ले मिथिलेश मंजरी के मुँह में हँस डाल रहीं।
गीता लिए गुलाल गाल मीना के कर दे लाल रहीं।।
ले इलायचीवाले पेडे़, इला-सुमन छाया खाएँ।
अंजू-वसुधा भंग चढ़ाकर
झूम कबीरा मिल गाएँ।
भय से भागीं दूर विनीता, मुकुल खोजतीं गईं कहाँ?
आज न छोड़ूँ झट से रँग दूँ मिले माधुरी मुझे जहाँ।

संत बसंत दिख रहे, गुपचुप भाँग गटककर लोटा भर।
रंजन करें विवेक ढोल ले, शोभित नैना मटकाकर।
अमरनाथ बैला पर बैठे, पान चबाएँ लखनौआ।
राजिंदर ठेंगा दिखलाते,  उड़ा रहे हैं कनकौआ।।
अतुल दौड़ते आगे, पीछे हैं अविनाश गुलाल लिए।
इंद्र-सुरेश कबीरा गाते,  जयप्रकाश ठंडाई पिए।
राजकुमार न पीछे रसिया सुना रहे राजा को संग।
श्रीधर दाएँ झूम कबीरा, विजय नाचते लेकर चंग।
सलिल लगाए सबको टीका ले अबीर, हँस गले मिले।
स्नेह साधना नव आशा ले फले सुबह से साँझ ढले।
***
संवस

शुक्रवार, 15 मार्च 2019

समीक्षा: शिखर पर जिजीविषा -कुमार मनीष अरविन्द

कृति चर्चा:
शिखर पर जिजीविषा : कैंसरजयी की संघर्ष कथा 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
[कृति विवरण: शिखर पर जिजीविषा, आई एस बी एन ९७८-८१-९३९९२६-६-१, संस्मरण, कुमार मनीष अरविन्द, प्रथम संस्करण, २०१९, आकार २२.५ से.मी. x १५ से.मी., आवरण बहुरंगी पेपरबैक, पृष्ठ १८४, मूल्य २५०/-, अंतिका प्रकाशन गाज़ियाबाद, रचनाकार संपर्क ३०१ आश्रेया, साईं विहार अपार्टमेंट, अशोक आश्रम डिबडीह, राँची ८३४००२ झारखंड]
*
माटी से माटी मिली, उपजी माटी देह।  
माटी में माटी मिले, बाँट सभी को स्नेह।। 
                मनन-चिंतन के स्तर पर देह को माटी कह देना बहुत आसान है किन्तु यही माटी की देह जब दरकती है, चटकती है तब अच्छे-अच्छों के छक्के छूट जाते हैं। सामान्य मनुष्य जीवन को सुख-दुःख की धूप-छाँव में हँस-रोकर इस आशा में व्यतीत कर लेता है कि इसके बाद 'अच्छे दिन आएँगे किंतु जब 'अच्छे दिन' आने का भरोसा ही न रहे तो छोटी सी तकलीफ भी बड़ी लगने लगती है। रहीम कहते हैं- 
रहिमन विपदाहू भली, जो थोरे दिन होय।
हित अनहित या जगत में, जान परत सब कोय।।
                अत्यधिक शारीरिक श्रम के कारण १९९४ में 'प्लुरल इफ्यूजन', सड़क दुर्घटनाओं में  १९९४, १९९६ व २००० में लंबे समय तक शैयाशायी होने के कारण जानता हूँ कि तुलसी बाबा ठीक ही कह गए हैं -
'धीरज धरम मित्र अरु नारी, आपातकाल परिखहहिं चारी' 
                इन सभी विपदा कालों में मेरी जीवनसंगिनी प्रो. (डॉ.) साधना वर्मा चट्टान की तरह मेरे और यम के बीच खड़ी रहीं। विषम स्थिति तब आई जब साधना कर्क (कैंसर) रोग की चपेट में आईं और मुझे पैरों तले से जमीन खिसकती लगी। तब समझ सका कि अबला से अधिक सबल कोई नहीं होता और खुद को सबल माननेवाला कितना अधिक निर्बल होता है। परमपिता को कोटि-कोटि धन्यवाद कि येन-केन-प्रकारेण शल्यक्रिया, कीमो- थिरेपी और रेडियोथिरैपी की त्रासद पीड़ा झेलने के बाद साधना को नवजीवन मिला। जब साधना चिकित्सकीय प्रक्रियाओं से गुजराती होतीं, तब मेरी कलम और जेब में पड़े कागज़  मेरे सम्बल होते। ईश्वर से साधना को निरोग करने की प्रार्थना करता मैं कातरता से बचने के लिए कागज-कलम की शरण में जाता और गीत, मुक्तिका, मुक्तक या कविता मेरे एकांतिक प्रतीक्षा पलों की साक्षी देती। 
                समीक्ष्य कृति की चर्चा आरंभ करने के पहले यह पृष्ठ भूमि इसलिए कि  यह पुस्तक भी कर्क रोग की विभीषिका से जूझते इंसान के अविजित मनोबल और अकथनीय पीड़ा की भाव कथा है। अंतर मात्र यह कि यह रचना रोगी के संगी ने नहीं रोगी ने स्वयं की है यह पद्य नहीं गद्य में है। इन कारणों से कथ्य पूरी तरह तथ्य परक बन पड़ा है। रोगी भारतीय वन सेवा का सजग, कर्मठ अधिकारी है इसलिए वह विषम परिस्थिति का आकलन कर मनोबल को दृढ़ रखने और रोग तथा चिकित्सा की प्रक्रिया व प्रभावों को बेहतर तरीके से समझ सका। कर्क रोग से संघर्ष की यह व्यथा-कथा वस्तुत: मनोबल और जिजीविषा की जय कथा है। रोग शरीर से बाहर, पूर्व की भिड़ंतें, कीमो, रांची में स्वास्थ्य लाभ और बैडमिंटन कोर्ट में वापसी  शीर्षक चार अध्यायों तथा योग की भूमिका, कैंसर मेरी समझ में व कवितायें शीर्षक तीन परिशिष्टों में लेखक कुमार मनीष अरविन्द ने बेबाक और प्रवाहपूर्ण भाषा शैली में मानवीय जिजीविषा की पराक्रम कथा कही है। 
                श्री केदार कानन ने ठीक ही लिखा है "शिखर पर जिजीविषा को पढ़ते हुए आप सिहारेंगे, व्यथित होंगे, आप पीड़ान्तक क्षण को भोगेंगे, कहीं आँखें डबडबा जाएँगी, कहीं आप रुक जाएँगे, क्षणभर के लिए स्तब्ध हो जाएँगे, कहीं दुःख की गहरी अभेद्य और अंधेरी सुरंग में भटकेंगे यह सब होता रहेगा परन्तु आप पुस्तक पढ़ना बंद नहीं कर पाएँगे।" यह सब हुआ मेरे साथ भी। डाल्टनगंज में अखिल भारतीय साहित्य समागम में सहभागिता करते समय उपहार में मिली यह पुस्तक लौटते समय शक्तिपुंज एक्सप्रेस के वातानुकूलित डब्बे में सवेरा होते ही पढ़ना आरंभ किया तो समाप्त किये बिना छोड़ ही नहीं सका। 
                क्या?, क्यों?, कहाँ?, कैसे? जैसे सवाल मन को मथते रहे और झूले की पेंग की तरह आशा-निराशा के पल आते-जाते रहे। कहीं नायिका के करुण गीत, कहीं जीवटी नायक की जय कथा, कहीं अनपेक्षित बाधा,  कहीं अयाचित सहायता, कहीं प्रार्थना, कहीं संभावना, कहीं रुकती श्वास, कहीं जगती आस क्या नहीं है इस संस्मरण कथा में। जिन्हें 'आह से उपजा होगा गान' पर विश्वास न होता हो वे शब्द-शब्द में संकल्प और संघर्ष की जय-जयकार करती इस गद्य कृति को पढ़ें जिसमें पंक्ति-पंक्ति में गद्य गीत की तरह प्रवाह और भाव सलिला की प्रतीति होती है। यह सत्य है की पीड़ा के पलों में अनूठा साहित्य रचना जाता है। स्वराज्य द्वीप की काल कोठरियों में एकांत के पलों में असह्य पीड़ा भोगते अदम्य साहसी क्रांतिधर्मियों की रचनाएँ जिन्होंने पढ़ी हैं, वे भली भांति जानते हैं कि सुख और शांति में रचे साहित्य में आनुभूतिक सघनता और भाव प्रवणता का घनत्व कम हो जाता है। 
                दशकों बाद इस कृति ने अंतर्मन को झकझोर दिया है। निबिड़ अन्धकार में चट्टानों से टकराती डूबती नौका के नाविक द्वारा किसी ध्रुव तारे को टकटकी लगाकर ताकते हुए किनारे तक लाने की अविश्वनीय साहस-कथा की तरह यह कृति भी चिरस्मरणीय है। प्रति वर्ष लगभग २०० से अधिक पुस्तकें पढ़ने और शताधिक पुस्तकों पर भूमिका व समीक्षा देने के बाद उन्हें याद रखना कठिन होता जाता है किन्तु इस पुस्तक ने मुश्किल यह खड़ी कर दी है कि इसे भुलाना कठिन ही नहीं नामुमकिन है। पुस्तक चर्चा अधूरी रहेगी यदि राजश्री जी के अहर्निश समर्पण, जिम्मी की अवरुद्ध श्वासों, अक्षय पल्लव के पत्र, तन्नू (आस्था) के कर्म योग माँ-पापा की आस्था और मेदांता के चिकित्सकों की कुशलता का संकेत न किया जाए। इन सब के बारे में लिख तो सकता हूँ पर बेहतर होगी कि  आप खुद पढ़ें और जानें। 
                हिंदी वांग्मय में संस्मरण साहित्य अपेक्षाकृत कम लिखा और पढ़ा गया है। दूरभाष, चलभाष, मुखपोथी (फेसबुक), वाट्स ऐप आदि के क्षणजीवी आभासी काल में जब खतो-किताबत ही डीएम तोड़ रही है तब संस्मरण  लिखने और पढ़ने का अवकाश ही किसे है। ऐसी सोच को गलत सिद्ध करते है यह जीवनपयोगी पुस्तक। होना तो यह चाहिए कि हर असाध्य रोग चिकित्सालय में यह पुस्तक रोगियों और स्वजनों के हाथों में रहे और संकट काल में उनका मनोबल और जिजीविषा बढ़ाती रहे। कुमार मनीष अरविन्द कृत इस कृति का बशीर अहमद द्वारा निर्मित आवरण चित्र वह सब अभिव्यक्त कर सका है जिसके लिए इस कृति के रचना हुई है। 
***
संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१, ९४२५१८३२४४।      
  
    

गुरुवार, 14 मार्च 2019

दोहे आनुप्रासिक

दोहा-सलिला रंग भरी 
*
लहर-लहर पर कमल दल, सुरभित-प्रवहित देख 
मन-मधुकर प्रमुदित अमित, कर अविकल सुख-लेख 
*
कर वट प्रति झुक नमन झट, कर-सर मिल नत-धन्य
बरगद तरु-तल मिल विहँस, करवट-करवट अन्य
*
कण-कण क्षण-क्षण प्रभु बसे, मनहर मन हर शांत
हरि-जन हरि-मन बस मगन, लग्न मिलन कर कांत
*
मल-मल कर मलमल पहन, नित प्रति तन कर स्वच्छ
पहन-पहन खुश हो 'सलिल', मन रह गया अस्वच्छ
*
रख थकित अनगिनत जन, नत शिर तज विश्वास
जनप्रतिनिधि जन-हित बिसर, स्वहित वरें हर श्वास
*
उछल-उछल कपि हँस रहा, उपवन सकल उजाड़
किटकिट-किटकिट दंत कर, तरुवर विपुल उखाड़
*
सर! गम बिन सरगम सरस, सुन धुन सतत सराह
बेगम बे-गम चुप विहँस, हर पल कहतीं वाह
*
सरहद पर सर! हद भुला, लुक-छिप गुपचुप वार
कर-कर छिप-छिप प्रगट हों, हम सैनिक हर बार
*
कलकल छलछल बह सलिल, करे मलिनता दूर
अमल-विमल जल तुहिन सम, निर्मलता भरपूर
*

सामयिक दोहा

दोहा दुनिया 
*
भाई-भतीजावाद के, हारे ठेकेदार 
चचा-भतीजे ने किया, घर का बंटाढार 
*
दुर्योधन-धृतराष्ट्र का, हुआ नया अवतार
नाव डुबाकर रो रहे, तोड़-फेंक पतवार
*
माया महाठगिनी पर, ठगी गयी इस बार
जातिवाद के दनुज सँग, मिली पटकनी यार
*
लग्न-परिश्रम की विजय, स्वार्थ-मोह की हार
अवसरवादी सियासत, डूब मरे मक्कार
*
बादल गरजे पर नहीं, बरस सके धिक्कार
जो बोया काटा वही, कौन बचावनहार?
*
नर-नरेंद्र मिल हो सके, जन से एकाकार
सर-आँखों बैठा किया, जन-जन ने सत्कार
*
जन-गण को समझें नहीं, नेतागण लाचार
सौ सुनार पर पड़ गया,भारी एक लुहार
*
गलती से सीखें सबक, बाँटें-पाएँ प्यार
देश-दीन का द्वेष तज, करें तनिक उपकार
*
दल का दलदल भुलाकर, असरदार सरदार
जनसेवा का लक्ष्य ले, बढ़े बना सरकार
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होली छंद

: होली के रंग छंदों के संग :
संजीव वर्मा ‘सलिल’
*
हुरियारों पे शारद मात सदय हों, जाग्रत सदा विवेक रहे
हैं चित्र जो गुप्त रहे मन में, साकार हों कवि की टेक रहे
हर भाल पे, गाल पे लाल गुलाल हो शोभित अंग अनंग बसे
मुॅंह काला हो नापाकों का, जो राहें खुशी की छेंक रहे
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चले आओ गले मिल लो, पुलक इस साल होली में
भुला शिकवे-शिकायत, लाल कर दें गाल होली में
बहाकर छंद की सलिला, भिगा दें स्नेह से तुमको
खिला लें मन कमल अपने, हुलस इस साल होली में
0
करो जब कल्पना कवि जी रॅंगीली ध्यान यह रखना
पियो ठंडाई, खा गुझिया नशीली होश मत तजना
सखी, साली, सहेली या कि कवयित्री सुना कविता
बुलाती लाख हो, सॅंग सजनि के साजन सदा सजना
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नहीं माया की गल पाई है अबकी दाल होली में
नहीं अखिलेश-राहुल का सजा है भाल होली में
अमित पा जन-समर्थन, ले कमल खिल रहे हैं मोदी
लिखो कविता बने जो प्रेम की टकसाल होली में
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ईंट पर ईंट हो सहयोग की इस बार होली में
लगा सरिए सुदृढ़ कुछ स्नेह के मिल यार होली में
मिला सीमेंट सद्भावों की, बिजली प्रीत की देना
रचे निर्माण हर सुख का नया संसार होली में
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न छीनो चैन मन का ऐ मेरी सरकार होली में
न रूठो यार लगने दो कवित-दरबार होली मे
मिलाकर नैन सारी रैन मन बेचैन फागुन में
गले मिल, बाॅंह में भरकर करो सत्कार होली में
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नैन पिचकारी तान-तान बान मार रही, देख पिचकारी मोहे बरजो न राधिका
आस-प्यास रास की न फागुन में पूरी हो तो मुॅंह ही न फेर ले साॅंसों की साधिका
गोरी-गोरी देह लाल-लाल हो गुलाल सी, बाॅंवरे से साॅंवरे की कामना भी बाॅंवरी
बैन से मना करे, सैन से न ना कहे, नायक के आस-पास घूम-घूम नायिका
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होली फाग

फाग-नवगीत
संजीव
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राधे! आओ, कान्हा टेरें
लगा रहे पग-फेरे,
राधे! आओ कान्हा टेरें
.
मंद-मंद मुस्कायें सखियाँ
मंद-मंद मुस्कायें
मंद-मंद मुस्कायें,
राधे बाँकें नैन तरेरें
.
गूझा खांय, दिखायें ठेंगा,
गूझा खांय दिखायें
गूझा खांय दिखायें,
सब मिल रास रचायें घेरें
.
विजया घोल पिलायें छिप-छिप
विजया घोल पिलायें
विजया घोल पिलायें,
छिप-छिप खिला भंग के पेड़े
.
मलें अबीर कन्हैया चाहें
मलें अबीर कन्हैया
मलें अबीर कन्हैया चाहें
राधे रंग बिखेरें
ऊँच-नीच गए भूल सबै जन
ऊँच-नीच गए भूल
ऊँच-नीच गए भूल
गले मिल नचें जमुन माँ तीरे
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होरी के जे हुरहुरे

होरी के जे हुरहुरे
संजीव 'सलिल'

होरी के जे हुरहुरे, लिये स्नेह-सौगात।
कौनऊ पढ़ मुसक्या रहे, कौनऊ दिल सहलात।। 
कौनऊ दिल सहलात, किन्हऊ खों चढ़ि गओ पारा,
जिन खों पारा चढ़े, होय उनखों मूं कारा।।
*
मुठिया भरे गुलाल से, लै पिचकारी रंग।
रंग कांता खों मले, सत्यजीत भई जंग।।
कि बोलो सा रा रा रा.....
*
बिरह-ब्यथा मिथलेस की, बिनसे सही न जाय।
छोड़ मुंगेली जबलपुर, आखें धुनी रमांय।।
कि बोलो सा रा रा रा.....
*
गायें संग प्रमोद के, विहँस कल्पना फाग।
पहन प्रेरणा घूमतीं, फूल-धतूरा पाग।।
कि बोलो सा रा रा रा.....
*
मुग्ध मंजरी देखकर, भूला राह बसंत।
मधु हाथों मधु पानकर, पवन बं रहे संत।।
कि बोलो सा रा रा रा.....
*
विनिता की महिमा 'सलिल', मो सें बरनि न जाय।
दोहा-पिचकारी चला, घर छिप धता बतांय।।
कि बोलो सा रा रा रा.....
*
नीला-पीला रंग सुमन, चेहरे-छाया खूब।
श्याम घटा में चाँदनी, जैसे जाए डूब।।
कि बोलो सा रा रा रा.....
*
गूझों का आनंद लें, लुक-छिप मृदुला माँग।
अनिल बीच में रोककरकर, अडा रहे हैं टाँग।।
कि बोलो सा रा रा रा.....
*
लाल गाल कर उषा के, अरुण हुआ मदमस्त।
सेव-पपडिया खा हुईं, मुदित सुनीता पस्त।।
कि बोलो सा रा रा रा.....
*
काट लिए वनकोटि फिर, चाहें पुष्प पलाश।
माया-ममता बिन 'सलिल', फगुआ हुआ हताश।।
कि बोलो सा रा रा रा.....
*

सामयिक दोहे-सोरठे

सामयिक दोहे * वादों को जुमला कहें, जुमले बिसरा चौंक धूल आज कल झौंकते, आँखों में वे भौंक * देशभक्ति के नाम पर, सेना का उपयोग हाय! सियासत कर रही, रोको बढ़े न रोग * जो मुखिया उसको नहीं, उचित रखे मन बैर है सबका सबके लिए, माँगे सबकी खैर * इसने उसकी बात की, उसने इसकी बात बात न कर्म करते रहे दोनों ही आघात * मुखिया जो परिवार का, वही करे यदि भेद उसकी गलती के लिए, कौन करेगा खेद? सामयिक सोरठे * एक न अगर विपक्ष, तब समझ सूपड़ा साफ़ सत्ताधारी दक्ष, पटक-कुचल देगा सम्हल * दली जा रही दाल, छाती छप्पन इंच पर बिगड़ रहे हैं हाल, हार सन्निकट देखकर * कहिए जिनपिंग संग, झूला झूले क्या मिला? दावत खाने आप, गए पाक हारा किला * बजा रहा है बीन, पाकिस्तानी आजकल भूल गया है चीन, डँसता सर्प न छोड़ता * नष्ट हुआ शिवराज, घोटाले नव नित्य कर खोज रहा है ताज, जुमलेबाजी कर नयी * उनकी है यह चाह, हो विपक्ष बाकी नहीं तज देंगे वह राह, जहाँ सुरा-साकी नहीं? * उसके जैसा दीन, दुनिया में कोई नहीं। भ्रमवश वह है चीन महाशक्ति कहते जिसे।। *

पत्र- गुरु की सीख

पत्र
*
प्रिय मित्र
मधुर स्मृति।
- तुमसे मिले अरसा हो गया। तुम्हें स्मरण होगा कि हम दोनों माध्यमिक विद्यालय में पहली बार मिले थे।

- तुम्हारे अग्रज अपने प्रिय शिष्य याने मुझे अनुजवत स्नेह देते थे, तुम तो अनुज थे ही। हममें स्पर्धा हो सकती थी अग्रज का नैकट्य पाने की किंतु इसके विपरीत हम स्नेह-सूत्र में आबद्ध हो गए।

यह नैकट्य और अधिक हो गया जब गाँधी जयंती पर हम दोनों को अग्रज से गरमागरम ताजा-ताजा डाँट का उपहार मिला, वह भी तब जब हमारी प्रस्तुतियों के बाद सभागार करतल ध्वनि से गूँजता रहा था।

वह डाँट अकारण तो नहीं थी पर सच कहूँ तो उसका अर्थ शिक्षा काल समाप्त होने के बाद दिन-ब-दिन अधिकाधिक समझ में आता रहा।

दूरभाष, चलभाष, दूरलेख और दूरवार्ता के इस काल में खतो-किताबत करना भले ही अजीब लगे, मुझे अतीत में डूबते-उतराते सुधियों की माला में शब्दों के मोती पिरोना ही भाता रहा है। बच्चों को भले ही मेरे पत्र और कागजात रद्दी का ढेर लगें, मेरे लिए तो वह सब कल से कल को जोड़ते हुए आज को जीने के माध्यम है। आज यह सब याद आने का का कारण दो अन्य मित्र बन गए हैं जिनका मानना है कि इस पटल पर साहित्यिक अधिनायकवाद और व्यक्तिगत तानाशाही को प्रश्रय दिया जा रहा है। एक कहते हैं दिन भर इंजीनियरिंग में मगज खपाने के बाद इस पटल पर आता हूँ तो मनोरंजन चाहता हूँ। वे बहुत आसानी से भूल जाते हैं कि पटल का उद्देश्य ही हिंदी भाषा व साहित्य का अध्ययन करना तथा अपनी सृजन सामर्थ्य को बढ़ाना है। उन्हें केवल एक नियम चाहिए कि कोई नियम न हो किंतु उनके अपने पटल पर विषयेतर सामग्री की प्रस्तुति उन्हें सह्य नहीं है। पटलानुशासन को भंग करने को अपना अधिकार माननेवाले इन मित्र को कोई अग्रजवत गुरु मिला होता और उसने वैसी फटकार लगाई होती जैसी हमारे अग्रज गुरु ने लगाई थी तो शायद बेहतर होता।

एक अन्य अग्रजवत सुकवि मित्र हैं। इन्हें देश के संविधान को बदलने की माँग से आरंभ कर नया दल बनाने का प्रयास करते, उम्मीदवार तय करते, उच्च प्रशासनिक पद पर रहे साहित्यकार मित्र के साथ-साथ वर्तमान नेतृत्व के प्रचार की लत है। अपने साहित्यिक अनुभव से नवोदितों को लाभ देने के स्थान पर ये उन्हें राजनैतिक दीक्षा देने हेतु तत्पर हैं। इनके पास पटल पर साहित्य चर्चा हेतु समयाभाव है किंतु राजनीति की बातों के लिए समय ही समय है। इन्हें भी पटल के उद्देश्य व नियम फूटी आँखों नहीं सुहाते। वे यह भी नहीं समझना चाहते कि नव संविधान चाहते तथा सत्ता पर बैठे लोग परस्पर विरोधी विचार रखते हैं और वे कभी एक साथ नहीं आ सकते।

आज गुरु जी बहुत याद रहे हैं। साप्ताहिक धर्मयुग में सहसंपादक होकर जाने के बाद भी वे पत्रों के माध्यम से भाषा-साहित्य सिखाते-बताते रहते थे। दो सौ से अधिक सहभागियों के इस पटल को चंद असहमतियों के कारण बंद करना तो ठीक न होगा। समय और शब्द के अनुशासन को भंग करने की प्रवृत्ति को बढ़ाकर गुरु से मिली सीख की अवमानना कर नहीं सकता। पटल के उद्देश्यों और नियमों का यथावश्यक यथाशक्ति पालन करते हुए कार्य करना ही उचित लगता है। मुझे मालूम है तुम्हें भी यही सही लगेगा क्योंकि उस दिन डाँट-प्रसाद हम दोनों ने ही पाया था, मैंने कुछ अधिक तुमने कुछ कम। पैट्रिस लुमुंबा यूनिवर्सिटी मास्को में पढ़ते समय और उसके बाद भी मेरी ही तरह तुम भी उस दिन मिली  सीख को भूल नहीं सके होगे।

तुम्हारा वर्तमान पता नहीं जानता इसलिए यह पत्र तुम तक नहीं पहुँचा सकता किंतु जिस तरह भूमि पर जल गिराकर हम सूर्य को जलांजलि दे लेते हैं, उसी तरह पटल पर पत्र रखकर तुम तक पहुँच गया मान लेता हूँ।

पटल पर पत्र है तो सदस्य पढ़ेंगे ही। उस दिन तो हम तीनों के अलावा कोई था नहीं जो गुरु जी की सीख और उसकी पृष्ठभूमि बता सके। तुम और गुरु जी से पटल की शोभा-वृद्धि हो नहीं सकी है इसलिए यह दायित्व भी मैं ही निभा देता हूँ।

उस दिन गाँधी जयंती थी, वर्ष १९६६, सेठ नन्हेंलाल घासीराम उच्चतर माध्यमिक विद्यालय होशंगाबाद का सभागार, मुख्य अतिथि श्री रामनाथ सिंह जिलाध्यक्ष, अध्यक्ष श्री गोपाल प्रसाद पाठक प्राचार्य (राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त), संचालक गुरु जी। सभागार माननीय शिक्षक वृंद (सुरेंद्र कुमार मेहता, के. सी. दुबे, शंकर लाल तिवारी, जी. एस. शर्मा, पाटनकर, जी. एस. ठाकुर, अग्रवाल आदि) तथा विद्यार्थियों से खचाखच भरा हुआ था। विद्यालय के श्रेष्ठ छात्र वक्ता राधेश्याम साँकल्ले व सुषमा खंडेलवाल अध्ययन पूर्ण कर चुके थे, हम दोनों से अपेक्षा की जा रही थी कि हम जिला और संभागीय भाषण,  वादविवाद आदि प्रतियोगिताओं में विद्यालय को विजयी बना सकें। अपेक्षा का यह दबाव हम दोनों को प्रभावित कर रहा होगा, यह तब तो नहीं समझ सका था, अब अनुमान होता है। कुछ वक्ताओं के बाद तुम्हारा नाम पुकारा गया। सभी के चेहरों पर उत्सुकता थी, तुम्हारा सुदर्शन व्यक्तित्व, गुरु जी का अनुज होना तथा मेधावी होना इसका कारण था। तुम मंच पर आए, मुट्ठी में कागज जिसे तुमने खोला नहीं था, यथोचित संबोधन के बाद जैसे ही तुमने भाषण आरंभ किया जोरदार ठहाके से सभागार गूँज उठा, संभवतः तुम्हें भी कुछ भूल हो जाने का अनुमान हुआ हो,  तुमने दुबारा आरंभ किया फिर वही ठहाका, तुम हतप्रभ हुए पर हार नहीं मानी, एक पल रुककर कुछ सोचा और फिर बिना किसी भूल-चूक के बिना कागज की सहायता लिए भाषण पूर्ण किया, सभागार करतल ध्वनि से गूँज उठा।

उच्चतर माध्यमिक वर्ग के कुछ वक्ताओं के बाद मेरे नाम की घोषणा हुई। माध्यमिक वर्ग को बापू का जीवनी तथा उच्चतर माध्यमिक वर्ग को बापू के संस्मरण सुनाना थे। अंत में दोनों वर्गों से कुछ अन्य विद्यार्थी काव्य पाठ करने वाले थे। मैंने पूर्व वक्ताओं द्वारा बापू का जीवनी के कुछ अनुल्लिखित पक्षों के साथ कुछ संस्मरण, गरम दल-नरम दल के टकराव आदि की चर्चा कर एक कविता सुनाकर हुए समापन किया,  सभागार में देर तक करतल ध्वनि गूँजती रही। मुख्य अतिथि ने अपने वक्तव्य में हम दोनों की विशेष प्रशंसा की।

समारोह के पश्चात सभी से अच्छी प्रस्तुति के लिए बधाई मिल रही थी किंतु गुरु जी के चरण स्पर्श करने पर उन्होंने एक शब्द भी न कहा, मेरे मन को ठेस लगी, मैं सिर झुकाए सोचता रहा गुरु जी का आशीष क्यों नहीं मिला?,  क्या गल्ती हुई? गल्ती हुई तो इतनी तालियाँ और प्रशंसा क्यों मिली? सच कहूँ तो एक पल के लिए यह भी लगा कि तुम उनके 'अनुज' हो, तुमसे चूक हुई, तुम दो बार 'गाँधी जी का जन्मदिन' के स्थान पर 'गणेश जी का जन्मदिन' कह गए पर तीसरी बार सुधारकर पूरा भाषण प्रभावी ढँग से- दिया। शायद इसलिए गुरु जी नाराज हैं लेकिन तुम्हारी गलती के कारण मुझसे नाराज क्यों हैं? ऐसा लगा वे पक्षपात कर रहे हैं, मुझे मेरा श्रेय नहीं दे रहे। मन आहत हुआ, कुछ देर बाद सबके चले जाने पर गुरु जी बोले 'तुम दोनों से सबसे अधिक आशा थी,  तुम्हीं दोनों ने निराश किया। इसने एक नहीं दो-दो बार गलती की।'
'पर बाद सुधार भी तो ली थी' मैंने धीरे से कहा कि उनकी नाराजी कम हो।
'बाद में सुधारने से- पहले का गलत मिट जाता है क्या? टूटे धागे को जोड़ देने पर भी गाँठ तो पड़ जाती है न?'

तुमने माफी माँगी और कहा 'संजीव तो बहुत अच्छा बोले।'

गुरु जी ने तीखी निगाह से- मुझे देखा फिर कहा 'यह तो पहली बार बोल रहा था, गल्ती की फिर सुधारी पर तुम तो कई बार बोल चुके हो,  अच्छा बोलते हो फिर क्यों गलती की?'

'इसने गलती की? कब? क्या?  इसे तो सबसे अधिक तालियाँ मिलीं, ईनाम भी।' तुम्हारे मुँह से निकला।

मैं मुँह लटकाए-सिर झुकाए हाथ में पकड़े पुरस्कार को देखते हुए अपना गलती कोशिश करने पर भी समझ नहीं पा रहा था।

'ताली और ईनाम से क्या होता है? गलत तो गलत ही रहेगा। तुम्हें बापू के संस्मरण सुनाना थे तुमने जीवनी क्यों सुनाई? इतने पर भी रुके नहीं, कविता भी सुना दी। क्यों?, क्या तुम्हें पता है कितनी बड़ी गलती का है तुमने? तुम्हारे कारण ३ बच्चे तैयारी करने के बाद भी कुछ नहीं सुना सके क्योंकि अतिथियों ने जो समय दिया था, वह समाप्त हो गया था।
तुम अकेले ४ वक्ताओं का समय खा गए।

अगर तुमसे पहलेवाले वह सब सुना देते जो तुमने कहा और तुम्हें मौका न मिलता तो कैसा लगता?  क्या तुम्हारे ईनाम से उन बच्चों को अवसर न मिलने की भरपाई हो जाएगी?

मैं निरुत्तर था। तुम्हें शब्दानुशासन तोड़ने और मुझे विषयानुशासन व समयानुशासन तोड़ने के लिए प्रताड़ित कर रहे गुरु ने जो सीख दी, उसे कैसे और क्यों भुला दूँ? गुरु से घात क्यों करूँ?

समय, विषय और शब्द का अनुशासन जिन्हें स्वीकार्य न हो वे स्वीकार करें या पटल छोड़ दें। मुझे पटल भंग करना स्वीकार्य है, अनुशासन भंग करना नहीं। जिन्हें उच्छृंखलता  पसंद हो, वे स्वतंत्र पटल बना लें।

गुरु पूर्णिमा हो, न हो, गुरु जी और उनकी सीख जीवन का पाथेय बनकर मेरे साथ है,  तुम्हारे साथ भी होगी, जिन्हें यह सीख देनेवाले गुरु नहीं मिले उनके लिए अफसोस ही किया जा सकता है। गुरु-चरणों में नमन।
तुम्हारा बालमित्र