बुधवार, 22 नवंबर 2017

kundaliya

कार्यशाला- विधा - कुण्डलिया छंद
कवि- भाऊ राव महंत ०१ सड़कों पर हो हादसे, जितने वाहन तेज उन सबको तब शीघ्र ही, मिले मौत की सेज। मिले मौत की सेज, बुलावा यम का आता जीवन का तब वेग, हमेशा थम ही जाता। कह महंत कविराय, आजकल के लड़कों पर चढ़ा हुआ है भूत, तेज चलते सड़कों पर।।
१. जितने वाहन तेज होते हैं सबके हादसे नहीं होते, यह तथ्य दोष है. 'हो' एक वचन, हादसे बहुवचन, वचन दोष. 'हों' का उपयोग कर वचन दोष दूर किया जा सकता है।
२. तब के साथ जब का प्रयोग उपयुक्त होता है, सड़कों पर हों हादसे, जब हों वाहन तेज।
३. सबको मौत की सेज नहीं मिलती, यह भी तथ्य दोष है। हाथ-पैर टूटें कभी, मिले मौत की सेज
४. मौत की सेज मिलने के बाद यम का बुलावा या यम का बुलावा आने पर मौत की सेज?
५. जीवन का वेग थमता है या जीवन (साँसों) की गति थमती है?
६. आजकल के लड़कों पर अर्थात पहले के लड़कों पर नहीं था,
७. चढ़ा हुआ है भूत... किसका भूत चढ़ा है?
सुझाव
सड़कों पर हों हादसे, जब हों वाहन तेज हाथ-पैर टूटें कभी, मिले मौत की सेज। मिले मौत की सेज, बुलावा यम का आता जीवन का रथचक्र, अचानक थम सा जाता। कह महंत कविराय, चढ़ा करता लड़कों पर जब भी गति का भूत, भागते तब सड़कों पर।।
०२ बन जाता है हादसा, थोड़ी-सी भी चूक जीवन की गाड़ी सदा, हो जाती है मूक। हो जाती है मूक, मौत आती है उनको सड़कों पर जो मीत, चलें इतराकर जिनको। कह महंत कविराय, सुरक्षित रखिए जीवन चलकर चाल कुचाल, मौत का भागी मत बन।।
१. हादसा होता है, बनता नहीं। चूक पहले होती है, हादसा बाद में क्रम दोष
२. सड़कों पर जो मीत, चलें इतराकर जिनको- अभिव्यक्ति दोष
३. रखिए, मत बन संबोधन में एकरूपता नहीं
हो जाता है हादसा, यदि हो थोड़ी चूक जीवन की गाड़ी कभी, हो जाती है मूक। हो जाती है मूक, मौत आती है उनको सड़कों पर देखा चलते इतराकर जिनको। कह महंत कवि धीरे चल जीवन रक्षित हो चलकर चाल कुचाल, मौत का भागी मत हो। *

मंगलवार, 21 नवंबर 2017

doha-yamak

गले मिले दोहा यमक
.
बिल्ली जाती राह निज, वह न काटती राह
होते हैं गुमराह हम, छोड़ तर्क की थाह
.
जो जगमग-जगमग करे, उसे न सोना जान 
जो जग मग का तम हरे, छिड़क उसी पर जान
.
किस मिस किस मिस को किया, किस बतलाए कौन?
तिल-तिल कर तिल जल रहा, बैठ अधर पर मौन
.
समय सूचिका का करे, जो निर्माण-सुधार 
समय न अपना वह सका, किंचित कभी सुधार
.
वह बोली आदाब पर, वह समझा आ दाब 
लपक-सरकने में गए, रौंदे सुर्ख गुलाब
गले मिले दोहा-यमक, गले बर्फ मतभेद 
इतनी देरी क्यों करी?, दोनों को है खेद 
>>>

hindi sahitya men hasya ras

हिंदी साहित्य में हास्य रस
मेघना राठी, भोपाल  
*
हास्य यानि नवरस में से एक। डॉ गणेश दत्त सारस्वत के अनुसार , " हास्य जीवन की वह शैली है, जिससे मनुष्य के मन के भावों की सुंदरता झलक उठती है।" हास्य वास्तव में निच्छल मन से निकला, मानव मन का वह कवच है जो उद्दात्त भावों को नियंत्रण कर हमें पृथ्वी पर रहने योग्य बनाता है।
श्रंगार रस के द्वारा हास्य का जन्म कई लेखको और विचारको द्वारा माना जाता है। लेकिन हास्य रस का विस्तार मात्र श्रंगार रस तक नहीं है अपितु अनेक रसों के परिपाक में इसकी उपयोगिता को महत्व दिया गया है।
आचार्य भरत मुनि के अनुसार केवल आठ रस ही माने गए हैं, जिसमे हास्य रस का एक विशेष स्थान है।
विश्वप्रसिद्ध लेखक "वाल्तेयर" ने साहित्यकारों की एक सभा में कहा था," जो हँसता नहीं वो लेखक नहीं हो सकता।"
हिंदी साहित्य में हास्य रस की परम्परा पुरातन काल से समृद्ध रूप में देखी जा सकती है। भारितीय आख्यायिकाएं , नाटक, गीत, महाकाव्य, पंचतंत्र, जातक कथाएँ, अभिज्ञान शाकुन्तलम् आदि इस बात का प्रमाण हैं कि हिंदी साहित्य में हास्य आरम्भ से ही विद्यमान रहा है।
सूरदास जी द्वारा रचित बाललीलाओ में शुद्ध हास्य के बहुत सुन्दर उदाहरण देखने को मिल जायेगें।
हिंदी साहित्य में वीरगाथा काल में ओजपूर्ण रचनाएं ज्यादा लिखी गईं पर पूर्णतः हास्यविहीन काल नहीं था। पृथ्वीराज रासो में चंदरबरदाई और जयचंद की वार्ता हास्य व्यंग्य का अच्छा उदाहरण है।
भक्तिकाल में भी कुछ संतों के द्वारा जब विभिन्न धर्मानुयायियों के ढोंग को प्रदर्शित किया गया तब अनायास ही चरित्रगत विद्रूपता से उत्पन्न हास्य उतपन्न होता दीखता है।
आधुनिक हिंदी साहित्य की बात करें तो ' भारतेंदु हरिश्चंद' द्वारा ' अंधेर नगरी'और ' ताजीराते शौहर' जैसे प्रसिद्ध हास्य व्यंग्य ग्रन्थ लिखे गए। इसी समय ' प्रताप नारायण मिश्र' और ' बालमुकुंद गुप्त' द्वारा भी कई हास्य व्यंग्य लिखे गए।
बालकृष्ण भट्ट, शिवपूजनसहाय, विश्वभरनाथ शर्मा 'कौशिक', बाबू गुलाबराय ने हिंदी साहित्य को श्रेष्ठ हास्य व्यंग्य रचनाएं दीं।
मुंशी प्रेमचन्द की रचनाओं में भी हास्य भरपूर है। हरिशंकर परसाई, शरद जोशी, रवीन्द्र नाथ त्यागी ने हास्य व्यंग्य की श्रेष्ठ रचनाओं के द्वारा हिंदी साहित्य को और समृद्ध किया।
हिंदी पत्रकारिता ने भी हास्य- व्यंग्य विधा को स्थापित करने में भरपूर योगदान दिया। कवि वचनसुधा, ब्राह्मण ये समाचारपत्र हास्य - व्यंग्य से भरपूर थे। प्रयाग समाचारपत्र में 'गोपालराम गहमरी ' हास्य - व्यंग्य का नियमित कॉलम लिखते थे। आज भी कई प्रसिद्ध समाचारपत्र हास्य- व्यंग्य के कॉलम को नियमित स्थान देते हैं।
" मार्क ट्वेन" के शब्दों में," समाज की सही तस्वीर उतारने की सबसे ज्यादा जिम्मेदारी व्यंगकार पर ही है"।
एक व्यंगकार हँसते- हँसते सब कुछ कह जाता है और सुनने वाले भी बिना बुरा माने हँसते- हँसते सुनते हैं और फिर सोचने के लिए बाध्य भी होते हैं कि हम खुद की कारस्तानियों , खुद के द्वारा उत्पन्न की हुई परिस्थिति पर स्वयं ही हँस रहे हैं।
वास्तव में जो बात क्रोध से, शांति से कहने में समझ नहीं आती वो इंसान हँसी -हँसी में समझ लेता है। कारण यहाँ उसका " अहं" आहात नहीं होता है। यही कारण है कि सामान्यजन द्वारा हास्य- व्यंग्य आधारित विधाएँ ज्यादा लोकप्रिय होती हैं।
काका हाथरसी के कुण्डलियाँ छंद हो या सुरेन्द्र शर्मा का चार लाइना, अशोक चक्रधर की कवितायेँ, इन सभी में एक बात सामान है, वह है " हास्य रस का प्रवाह"।
आज साहित्यकारों का एक वर्ग " हास्य" को सहित्यानुरूप नहीं मानता। हास्य से उन्हें साहित्य का स्तर हल्का होता हुआ लगता है।
ये सही है कि आज हास्य के नाम ओअर फूहड़ता परोसी जा रही है पर मात्र इस आधार पर हास्य को साहित्य से विलग करना सही नहीं है। सुधि पाठकजन , श्रोतागण समझते हैं शुद्ध हास्य और फूहड़ता के फर्क को।
हास्य को साहित्य की धारा से अलग मानने वाले लोगों को साहित्य के इतिहास में मील का पत्थर माने जाने वाले हास्य व्यंगकारों को अवश्य ही ध्यान में रखते हुए हास्य व्यंग्य में लिख रहे रचनाकारों का उत्साहवर्धन करना चाहिए, जिससे सहित्यकोष अच्छी हास्य व्यंग्य रचनाओं से समृद्ध हो सके साथ ही नई पीढ़ी भी शुद्ध हास्य से परिचित हो सके।
हास्य आदिकाल से ही मानव से जुदा है और हँसने हँसाने की ये विशेषता केवल मनुष्य को ही मिली है। साहित्य मानव स्वभाव को ही परिलक्षित करता है। इसलिए साहित्य की धारा से हास्य न कभी अलग हुआ है और न ही कभी होगा। केवल जरुरत है सही व सार्थक दिशा में लिखने- पढ़ने और साथ ही प्रोत्साहन की।

kshanika

क्षणिकाएँ
१. क्षितिज
.
क्षितिज
यदि  हाथ आता तो
बनाते हम तवा उसको
जला सूरज का नित चूल्हा
बनाते समय की रोटी
मिटाते भूख दुनिया की,
क्षितिज
यदि  हाथ आता तो
*
२. हुकुम
.
हुकुम
देना अगर होता
विधाता को हुकुम देते
मिटा दे भूख दुनिया से,
न बाकी स्वार्थ ही छोड़े.
भले पूजे न कोई भी
उसे तब,
हम तभी पूजें.
*
३.

doha

दोहा द्विपदी ही नहीं-
दोहा द्विपदी ही नहीं, चरण न केवल चार
गौ-भाषा दुह अर्थ दे सम्यक, विविध प्रकार
*
तेरह-ग्यारह विषम-सम, चरण पदी हो एक
दो पद मिल दोहा बने, रचते कवि सविवेक
*
गुरु-लघु रखें पदांत में, जग पदादि न मीत
लय रस भाव प्रतीक मिल, गढ़ते दोहा रीत
*
कहे बात संक्षेप में, दोहा तज विस्तार
गागर में सागर भरे, ज्यों असार में सार
*
तनिक नहीं अस्पष्टता, दोहे को स्वीकार्य
एक शब्द बहु अर्थ दे, दोहे का औदार्य
*
मर्म बेध दोहा कहे, दिल को छूती बात
पाठक-श्रोता सराहे, दोहा-कवि विख्यात
*
अमिधा मन भाती इसे, रुचे लक्षणा खूब
शक्ति व्यंजना सहेली, मुक्ता गहती डूब
*
आधा सम मात्रिक बना, है दोहे का रूप
छंदों के दरबार में, दोहा भूप अनूप
*
गति-यति दोहा-श्वास है, रस बिन तन बेजान
अलंकार सज्जित करें, पड़े जान में जान
*
बिंब प्रतीक मिथक हुए, दोहा का गणवेश
रहें कथ्य-अनुकूल तो, हों जीवंत हमेश
*
कहन-कथन का मेल हो, शब्द-भाव अनुकूल
तो दोहा हो फूल सम, अगर नहीं हो शूल
***

रविवार, 19 नवंबर 2017

chanchareek

स्मरणांजलि:
महाकवि जगमोहन प्रसाद सक्सेना 'चंचरीक'
   आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'   
*
ॐ परात्पर ब्रम्ह ही, रचते हैं सब सृष्टि 
हर काया में व्याप्त हों, कायथ सम्यक दृष्टि


कर्मयोग की साधना, उपदेशें कर्मेश 
कर्म-धर्म ही वर्ण है, बतलाएँ मथुरेश

महाकवि जगमोहन प्रसाद सक्सेना का सरल स्वभाव, सनातन मूल्यों के प्रति लगाव, मौन एकाकी सारस्वत साधना, अछूते और अनूठे आयामों का चिंतन, शिल्प पर कथ्य को वरीयता देता सृजन, मौलिक उद्भावनाएँ, छांदस प्रतिबद्धता, सादा रहन-सहन, खाँटी राजस्थानी बोली, छरहरी-गौर काया, मन को सहलाती सी प्रेमिल दृष्टि और 'स्व' पर 'सर्व' को वरीयता देती आत्मगोपन की प्रवृत्ति उन्हें चिरस्मरणीय बनाती है। 'चंचरीक' साधु प्रवृत्ति के ऐसे शब्दब्रम्होपासक रहे जिनकी पहचान और मूल्यांकन समय नहीं कर सका। मणिकांचनी सद्गुणों का ऐसा समुच्चय देह में बस कर देहवासी होते हुए भी देह समाप्त होने पर विदेही होकर लुप्त नहीं होता अपितु देहातीत होकर भी स्मृतियों में प्रेरणापुंज बनकर चिरजीवित रहता है।  वह एक से अनेक में चर्चित होकर नव कायाओं में अंकुरित, पल्लवित, पुष्पित और फलित होता है।

ब्रम्ह आप ही प्रगट हो, करते रचना कर्म  
चंचरीक प्रभु-भक्ति को, पाते जीवन-मर्म 


सात्विक प्रवृत्ति के दम्पति श्रीमती वासुदेवी तथा श्री सूर्यनारायण ने कार्तिक कृष्ण १४ संवत् १९८० विक्रम (७ नवंबर १९२३ ई.) की पुनीत तिथि में मनमोहन की कृपा से प्राप्त पुत्र का नामकरण जगमोहन कर प्रभु को नित्य पुकारने का साधन उत्पन्न कर लिया। लीलाविहारी आनंदकंद गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण की भक्ति विरासत में प्राप्त कर चंचरीक ने शैशव से ही सन १८९८ में पूर्वजों द्वारा स्थापित उत्तरमुखी श्री मथुरेश राधा-कृष्ण मंदिर में कृष्ण-भक्ति का अमृत पिया। साँझ-सकारे आरती-पूजन, ज्येष्ठ शुक्ल २ को पाटोत्सव, भाद्र कृष्ण १३ को श्रीकृष्ण छठी तथा भाद्र शुक्ल १३ को श्री राधा छठी आदि पर्वों ने शिशु जगमोहन को भगवत-भक्ति के रंग में रंग दिया।  
सूर्य-वासुदेवी हँसे, लख जगमोहन रूप 
शाकुंतल-सौभाग्य से, मिला भक्ति का भूप
*
'चंचरीक' प्रभु चरण के, दैव कृपा के पात्र 
काव्य सृजन सामर्थ्य के, नित्य-सनातन पात्र 
*
'नारायण' सा 'रूप' पा, 'जगमोहन' शुभ नाम 
कर्म कुशल कायस्थ हो, हरि को हुए प्रणाम
*
'नारायण' ने 'सूर्य' हो, प्रगटाया निज अंश 
कुक्षि 'वासुदेवी' विमल, प्रमुदित पा अवतंश 
*
सात नवंबर का दिवस, उन्निस-तेइस वर्ष 
पुत्र-रुदन का स्वर सुना, खूब मनाया हर्ष 
*
जन्म चक्र के चतुर्थ भाव में विराजित सूर्य-चंद्र-बुध-शनि की युति ने नवजात को असाधारण भागवत्भक्ति और अखंड सारस्वत साधना का वर दिया जो २८ दिसंबर २०१३ ई. को देहपात तक  मिलता रहा।

बैठे चौथे भाव में, रवि शशि बुध शनि साथ 
भक्ति-सृजन पथ-पथिक से, कहें न नत हो माथ 
*
रवि उजास, शशि विमलता, बुध दे भक्ति प्रणम्य 
शनि बाधा-संकट हरे, लक्ष्य न रहे अगम्य 
*
'विष्णु-प्रकाश-स्वरूप' से, अनुज हो गए धन्य 
राखी बाँधें 'बसंती', तुलसी' स्नेह अनन्य  
*
बालक जगमोहन को शिक्षागुरु स्व. मथुराप्रसाद सक्सेना 'मथुरेश', विद्यागुरु स्व. भवदत्त ओझा तथा दीक्षागुरु सोहनलाल पाठक ने सांसारिकता के पंक में शतदल कमल की तरह निर्लिप्त रहकर न केवल कहलाना अपितु सुरभि बिखराना भी सिखाया। 

विद्या गुरु भवदत्त से, मिली एक ही सीख 
कीचड़ में भी कमलवत, निर्मल ही तू दीख 
*
रथखाना में प्राथमिक, शिक्षा के पढ़ पाठ 
दरबार हाइ स्कूल में, पढ़े हो सकें ठाठ 
*
भक्तरत्न 'मथुरा' मुदित, पाया पुत्र विनीत 
भक्ति-भाव स्वाध्याय में, लीन निभाई रीत
*
'मंदिर डिग्गी कल्याण' में, जमकर बँटा प्रसाद 
भोज सहस्त्रों ने किया, पा श्री फल उपहार 
*
'गोविंदी' विधवा बहिन, भुला सकें निज शोक 
'जगमोहन' ने भक्ति का, फैलाया आलोक 
*
पाठक सोहनलाल से, ली दीक्षा सविवेक 
धीरज से संकट सहो, तजना मूल्य न नेक 
*
चित्र गुप्त है ईश का, निराकार सच मान 
हो साकार जगत रचे, निर्विकार ले जान 
*
काया स्थित ब्रम्ह ही, है कायस्थ सुजान 
माया की छाया गहे, लेकिन नहीं अजान 
*
पूज किसी भी रूप में, परमशक्ति है एक 
भक्ति-भाव, व्रत-कथाएँ, कहें राह चल नेक 
*
१९४१ में हाईस्कूल, १९४३ में इंटर, १९४५ में बी.ए. तथा १९५२ में एलएल. बी. परीक्षाएँ उत्तीर्ण कर इष्ट श्रीकृष्ण के पथ पर चलकर अन्याय से लड़कर न्याय की प्रतिष्ठा पर चल पड़े जगमोहन। युवा जगमोहन का विवाह रामकिशोरी के साथ हुआ किंतु वे एक कन्या रत्न  को जन्म देकर इहलोक से प्रस्थान कर गईं।         

'रामकिशोरी' चंद दिन, ही दे पाईं साथ 
दे पुत्री इहलोक से, गईं थामकर हाथ 
*
महाराज कॉलेज से, इंटर-बी. ए. पास 
किया, मिले आजीविका, पूरी हो हर आस 
*
धर्म-पिता भव त्याग कर, चले गए सुर लोक 
धैर्य-मूर्ति बन दुःख सहा, कोई सका न टोंक 
*
रचा पिता की याद में, 'मथुरेश जीवनी' ग्रंथ 
'गोविंदी' ने साथ दे, गहा सृजन का पंथ 
*
'विद्यावती' सुसंगिनी, दो सुत पुत्री एक 
दे, असमय सुरपुर गयीं, खोया नहीं विवेक 
*
महाराजा कॉलेज से, एल-एल. बी. उत्तीर्ण 
कर आभा करने लगे, अपनी आप विकीर्ण 
*
मिली नौकरी किंतु वह, तनिक न आयी रास 
जुड़े वकालत से किये, अनथक सतत प्रयास 
*
प्रगटीं माता शारदा, स्वप्न दिखाया एक 
करो काव्य रचना सतत, कर्म यही है नेक 
*
'एकादशी महात्म्य' रच, किया पत्नि को याद 
व्यथा-कथा मन में राखी, भंग न हो मर्याद 
*
रच कर 'माधव-माधवी', 'रुक्मिणी मंगल' काव्य 
बता दिया था कलम ने, क्या भावी संभाव्य 
*
जीवनसंगिनी शकुंतला देवी के साहचर्य ने उनमें अदालती दाँव-पेंचों के प्रति वितृष्णा तथा भागवत ग्रंथों और मनन-चिंतन की प्रवृत्ति को गहरा कर निवृत्ति मार्ग पर चलाने के लिये सृजन-पथ का ऐसा पथिक बना दिया जिसके कदमों ने रुकना नहीं सीखा। पतिपरायणा पत्नी और प्रभु परायण पति की गोद में आकर गायत्री स्वयं विराजमान हो गयीं और सुता की किलकारियाँ देखते-सुनते जगमोहन की कलम ने उन्हें 'चंचरीक' बना दिया, वे अपने इष्ट पद्मों के 'चंचरीक' (भ्रमर) हो गये।

संतानों-हित तीसरा, करना पड़ा विवाह 
संस्कार शुभ दे सकें, निज दायित्व निबाह 
*
पा 'शकुंतला' हो गया, घर ममता-भंडार 
पाँच सुताएँ चार सुत, जुड़े हँसा परिवार 
*
सावित्री सी सुता पा, पितृ-ह्रदय था मुग्ध 
पाप-ताप सब हो गए, अगले पल ही दग्ध 
*
अधिवक्ता के रूप में, अपराधी का साथ 
नहीं दिया, सच्चाई हित, लड़े उठाकर माथ 
*
दर्शन 'गलता तीर्थ' के, कर भूले निज राह 
'पयहारी' ने हो प्रगट, राह दिखाई चाह 
*
महाकाव्य त्रयी का सृजन:
चंचरीक प्रभु-कृपा से, रचें नित्य नव काव्य 
न्यायदेव से सत्य की, जय पायें संभाव्य

राम-कृष्ण-श्रीकल्कि पर, महाकाव्य रच तीन 
दोहा दुनिया में हुए, भक्ति-भाव तल्लीन
चंचरीककृत प्रथम महाकाव्य 'ॐ श्री कृष्णलीला चरित' में २१५२ दोहों में कृष्णजन्म से लेकर रुक्मिणी मंगल तक सभी प्रसंग सरसता, सरलता तथा रोचकता से वर्णित हैं। ओम श्री पुरुषोत्तम श्रीरामचरित वाल्मीकि रामायण के आधार पर १०५३ दोहों में रामकथा का गायन है। तृतीय तथा अंतिम महाकाव्य 'ओम पुरुषोत्तम श्री विष्णुकलकीचरित' में अल्पज्ञात तथा प्रायः अविदित कल्कि अवतार की दिव्य कथा का उद्घाटन ५ भागों में प्रकाशित १०६७ दोहों में किया गया है। 
'संतदास'-संपर्क से, पा आध्यात्म रुझान 
मन वृंदावन हो चला, भरकर भक्ति-उड़ान 
*
'पुरुषोत्तम श्री राम चरित', रामायण-अनुवाद 
कर 'श्री कृष्ण चरित' रचा, सुना अनाहद नाद 
*
'कल्कि विष्णु के चरित' को, किया कलम ने व्यक्त 
पुलकित थे मन-प्राण-चित, आत्मोल्लास अव्यक्त 
*
प्रथम कृति में कथा विकास सहायक पदों तृतीय कृति में तनया डॉ. सावित्री रायजादा कृत दोहों की टीका को सम्मिलित कर चंचरीक जी ने शोधछात्रों का कार्य आसान कर दिया है। 
सावित्री ही सुता बन, प्रगटीं, ले आशीष 
जयपुर में जय-जय हुई, वंदन करें मनीष

राजस्थान की मरुभूमि में चराचर के कर्मदेवता परात्पर परब्रम्ह चित्रगुप्त (ॐ) के आराधक कायस्थ कुल में जन्में चंचरीक का शब्दाक्षरों से अभिन्न नाता होना और हर कृति का आरम्भ 'ॐ' से करना सहज स्वाभाविक है। कायस्थ [कायास्थितः सः कायस्थः अर्थात वह (परमात्मा) में स्थित (अंश रूप आत्मा) होता है तो कायस्थ कहा जाता है] चंचरीक ने कायस्थ राम-कृष्ण पर महाकाव्य साथ-साथ अकायस्थ कल्कि ( अवतार हुआ नहीं है) से मानस मिलन कर उनपर भी महाकाव्य रच दिया, यह उनके सामर्थ्य का शिखर है।

चंचरीक मधुरेश थे, मंजुल मृदुल मराल 
शंकर सम अमृत लुटा, पिया गरल विकराल 
*
मोहन सोहन विमल या, वृन्दावन रत्नेश 
मधुकर सरस उमेश या , थे मुचुकुंद उमेश 
*
प्रेमी गुरु प्रणयी वही, अंबु सुनहरी लाल 
थे भगवती प्रसाद वे, भगवद्भक्त रसाल
*
सत्ताईस तारीख थी, और दिसंबर माह 
दो हजार तेरह बरस, त्यागा श्वास-प्रवाह 
*
चंचरीक भू लोक तज, चित्रगुप्त के धाम 
जा बैठे दे विरासत, अभिनव ललित ललाम 
*
उनमें प्रभु संजीव थे, भक्ति-सलिल में डूब 
सफल साधना कर तजा, जग दे रचना खूब 
*
निर्मल तुहिना दूब पर, मुक्तामणि सी देख 
मन्वन्तर कर कल्पना, करे आपका लेख 
*
जगमोहन काया नहीं, हैं हरि के वरदान 
कलम और कवि धन्य हो, करें कीर्ति का गान  
देश के विविध प्रांतों की अनेक संस्थाएँ चंचरीक सम्मानित कर गौरवान्वित हुई हैं। सनातन सलिला नर्मदा तट पर स्थित संस्कारधानी जबलपुर में साहित्यिक संस्था अभियान के तत्वावधान में संपन्न अखिल भारतीय दिव्य नर्मदा अलंकरण में अध्यक्ष होने के नाते मुझे श्री चंचरीक जी की द्वितीय कृति 'ॐ पुरुषोत्तम श्रीरामचरित' को नागपुर महाराष्ट्र निवासी जगन्नाथप्रसाद वर्मा-लीलादेवी वर्मा स्मृति जगलीला अलंकरण' से तथा अखिल भारतीय कायस्थ महासभा व चित्राशीष के संयुक्त तत्वावधान में शांतिदेवी-राजबहादुर वर्मा स्मृति 'शान्तिराज हिंदी रत्न' अलंकरण से समादृत करने का सौभाग्य मिला। राष्ट्रीय कायस्थ महापरिषद के जयपुर सम्मेलन में चंचरीक जी से भेंट, अंतरंग चर्चा तथा शकुंतला जी व डॉ. सावित्री रायजादा से नैकट्य सौभाग्य मिला।
कायथ कुल गौरव! हुए, हिंदी गौरव-नाज़ 
गर्वित सकल समाज है, तुमको पाकर आज

सतत सृजन अभियान यह, चले कीर्ति दे खूब 

चित्रगुप्त आशीष दें, हर्ष मिलेगा खूब

चंचरीक जी के महत्वपूर्ण अवदान को देखते हुए राजस्थान साहित्य अकादमी को आपके व्यक्तित्व-कृतित्व पर समग्र ग्रंथ का प्रकाशन कर, उन्हें सर्वोच्च पुरस्कार से सम्मानित करना चाहिए। भारत सरकार को उन पर डाक टिकिट निकालना चाहिए। जयपुर स्थित विश्व विद्यालय में चंचरीक जी पर पीठ स्थापित की जाना चाहिए। वैष्णव मंदिरों में संतों को चंचरीक साहित्य क्रय कर पठन-पाठन तथा शोध हेतु मार्ग दर्शन की व्यवस्था बनानी चाहिए। चंचरीक जी की सभी संतानें प्रभु-कृपा से समर्थ और सम्पन्न हैं। पितृ ऋण चुकाना संतान का कर्तव्य है। सभी संतानें मिलकर एकमुश्त राशि बैंक में जमाकर उसके ब्याज से प्रति वर्ष ''चंचरीक अलंकरण'' किसी श्रेष्ठ साहित्यकार अथवा कृति को देने की व्यवस्था कर सकते हैं। चंचरीक जि जिस मंदिर में ईशाराधना करते थे, वहाँ कृष्ण लीला गायन प्रतिस्पर्धा का आयोजन कर श्रेष्ठ स्पर्धियों को पुरस्कृत कर स्वस्थ परंपरा स्थापित की जा सकती है।                    
चंचरीक से प्रेरणा, लें हिंदी के पूत 
बना विश्ववाणी इसे, घूमें बनकर दूत


दोहा के दरबार में, सबसे ऊंचा नाम
चंचरीक ने कर लिया, करता 'सलिल' प्रणाम


चित्रगुप्त के धाम में, महाकाव्य रच नव्य 
चंचरीक नवकीर्ति पा, गीत गुँजाएँ दिव्य


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संपर्क: विश्व वाणी हिंदी शोध-साहित्य संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, salil.sanjiv@gmail.com, ९४२५१८३२४४ / ७९९९५५९६१८, www.divyanarmada.in  

pad

एक पद-
अभी न दिन उठने के आये 
चार लोग जुट पायें देनें कंधा तब उठना है 
तब तक शब्द-सुमन शारद-पग में नित ही धरना है 
मिले प्रेरणा करूँ कल्पना ज्योति तिमिर सब हर ले 
मन मिथिलेश कभी हो पाए, सिया सुता बन वर ले
कांता हो कैकेयी सरीखी रण में प्राण बचाए
अपयश सहकर भी माया से मुक्त प्राण करवाए
श्वास-श्वास जय शब्द ब्रम्ह की हिंदी में गुंजाये
अभी न दिन उठने के आये

doha

एक दोहा 
शब्द-सुमन शत गूंथिए, ले भावों की डोर 
गीत माल तब ही बने, जब जुड़ जाएँ छोर

kundlini

एक कुण्डलिनी 
मन मनमानी करे यदि, कस संकल्प नकेल 
मन को वश में कीजिए, खेल-खिलाएँ खेल 
खेल-खिलाएँ खेल, मेल बेमेल न करिए 
व्यर्थ न भरिए तेल, वर्तिका पहले धरिए 
तभी जलेगा दीप, भरेगा तम भी पानी
कसी नकेल न अगर, करेगा मन मनमानी

doha

दोहा दुनिया 
ज्योति बिना चलता नहीं, कभी किसी का काम
प्राण-ज्योति बिन शिव हुए, शव फिर काम तमाम 
*
बहिर्ज्योति जग दिखाती, ठोकर लगे न एक 
अंतर्ज्योति जगे 'सलिल', मिलता बुद्धि-विवेक
*
आत्मज्योति जगती अगर, मिल जाते परमात्म
दीप-ज्योति तम-नाशकर, करे प्रकाशित आत्म
*
फूटे तेरे भाग यदि, हुई ज्योति नाराज
हो प्रसन्न तो समझ ले, 'सलिल' मिल गया राज
*
स्वर्णप्रभा सी ज्योति में, रहे रमा का वास
श्वेत-शारदा, श्याम में काली करें प्रवास
*
रक्त-नयन हों ज्योति के, तो हो क्रांति-विनाश
लपलप करती जिव्हा से, काटे भव के पाश
*
ज्योति कल्पना-प्रेरणा, कांता, सखी समान
भगिनी, जननी, सुता भी, आखिर मिले मसान
*
नमन ज्योति को कीजिए, ज्योतित हो दिन-रात
नमन ज्योति से लीजिए, संध्या और प्रभात
*
कहें किस समय था नहीं, दिव्य ज्योति का राज?
शामत उसकी ज्योति से, होता जो नाराज
***

काव्य वार्ता 
नाम से, काम से प्यार कीजै सदा 
प्यार बिन जिंदगी-बंदगी कब हुई? -संजीव 
*
बन्दगी कब हुई प्यार बिन जिंदगी 
दिल्लगी बन गई आज दिल की लगी
रंग तितली के जब रँग गयीं बेटियाँ
जा छुपी शर्म से आड़ में सादगी -मिथलेश
*
छोड़ घर मंडियों में गयी सादगी
भेड़िये मिल गए तो सिसकने लगी
याद कर शक्ति निज जब लगी जूझने
भीड़ तब दुम दबाकर खिसकने लगी -संजीव
*

ghanaksharee salila

घनाक्षरी सलिला  
आठ-आठ-आठ-सात, पर यति रखकर,
मनहर घनाक्षरी, छंद कवि रचिए।
लघु-गुरु रखकर, चरण के आखिर में,
'सलिल'-प्रवाह-गति, वेग भी परखिए।।
अश्व-पदचाप सम, मेघ-जलधार सम,
गति अवरोध न हो, यह भी निरखिए।
करतल ध्वनि कर, प्रमुदित श्रोतागण-
'एक बार और' कहें, सुनिए-हरषिए।।
*
लक्ष्य जो भी वरना हो, धाम जहाँ चलना हो,
काम जो भी करना हो, झटपट करिए।
तोड़ना नियम नहीं, छोड़ना शरम नहीं,
मोड़ना धरम नहीं, सच पर चलिए।।
आम आदमी हैं आप, सोच मत चुप रहें,
खास बन आगे बढ़, देशभक्त बनिए।।
गलत जो होता दिखे, उसका विरोध करें,
'सलिल' न आँख मूँद, चुपचाप सहिये।।
*
फेस 'बुक' हो ना पाए, गुरु यह बेहतर,
फेस 'बुक' हुआ है तो, छुडाना ही होगा। फेस की लिपाई या पुताई चाहे जितनी हो, फेस की असलियत, जानना जरूरी है।। फेस रेस करेगा तो, पोल खुल जाएगी ही, फेस फेस ना करे तैयारी जो अधूरी है। फ़ेस देख दे रहे हैं, लाइक पे लाइक जो, हीरो जीरो, फ्रेंडशिप सिर्फ मगरूरी है।
*
संसद के मंच पर, लोक-मत तोड़े दम,
राजनीति सत्ता-नीति, दल-नीति कारा है ।
नेताओं को निजी हित, साध्य- देश साधन है,
मतदाता घोटालों में, घिर बेसहारा है ।
'सलिल' कसौटी पर, कंचन की लीक है कि,
अन्ना-रामदेव युति, उगा ध्रुवतारा है।
स्विस बैंक में जमा जो, धन आये भारत में ,
देर न करो भारत, माता ने पुकारा है।
*
फूँकता कवित्त प्राण, डाल मुरदों में जान, दीप बाल अंधकार, ज़िंदगी का हरता। नर्मदा निनाद सुनो,सच की ही राह चुनो, जीतता सुधीर धर, धीर पीर सहता।। 'सलिल'-प्रवाह पैठ, आगे बढ़ नहीं बैठ, सागर है दूर पूर, दूरी हो निकटता। आना-जाना खाली हाथ, कौन कभी देता साथ, हो अनाथ भी सनाथ, प्रभु दे निकटता।।
*
घन अक्षरी गाइये, डूबकर सुनाइए, त्रुटि नहीं छिपाइये, सीखिये-सिखाइए। शिल्प-नियम सीखिए, कथ्य समझ रीझिए, भाव भरे शब्द चुन, लय भी बनाइए।। बिंब नव सजाइये, प्रतीक भी लगाइये, अलंकार कुछ नये, प्रेम से सजाइए।। वचन-लिंग, क्रिया रूप, दोष न हों देखकर, आप गुनगुनाइए, वाह-वाह पाइए।।
*
न चाहतें, न राहतें, न फैसले, न फासले, दर्द-हर्ष मिल सहें, साथ-साथ हाथ हों। न मित्रता, न शत्रुता, न वायदे, न कायदे, कर्म-धर्म नित करें, उठे हुए माथ हों।। न दायरे, न दूरियाँ, रहें न मजबूरियाँ, फूल-शूल, धूप-छाँव, नेह नर्मदा बनें।। गिर-उठें, बढ़े चलें, काल से विहँस लड़ें, दंभ-द्वेष-छल मिटें, कोशिशें कथा बुनें।।
*
संकट में लाज थी, गिरी सिर पे गाज थी, शत्रु-दृष्टि बाज थी, नैया कैसे पार हो? करनावती महारानी, पूजतीं माता भवानी, शत्रु है बली बहुत, देश की न हार हो।। राखी हुमायूँ को भेजी, बादशाह ने सहेजी, बहिन की पत राखी, नेह का करार हो। शत्रु को खदेड़ दिया, बहिना को मान दिया, नेह का जलाया दिया, भेंट स्वीकार हो।।
*
महाबली बलि को था, गर्व हुआ संपदा का, तीन लोक में नहीं है, मुझ सा कोई धनी। मनमानी करूँ भी तो, रोक सकता न कोई, हूँ सुरेश से अधिक, शक्तिवान औ' गुनी।। महायज्ञ कर दिया, कीर्ति यश बल लिया, हरि को दे तीन पग, धरा मौन था गुनी। सभी कुछ छिन गया, मुख न मलिन हुआ, हरि की शरण गया, सेवा व्रत ले धुनी।।
*
बाधा दनु-गुरु बने, विपद मेघ थे घने, एक नेत्र गँवा भगे, थी व्यथा अनसुनी। रक्षा सूत्र बाँधे बलि, हरि से अभय मिली, हृदय की कली खिली, पटकथा यूँ बनी।। विप्र जब द्वार आये, राखी बाँध मान पाये, शुभाशीष बरसाये, फिर न हो ठनाठनी। कोई किसी से न लड़े, हाथ रहें मिले-जुड़े, साथ-साथ हों खड़े, राखी मने सावनी।।
*
सावन में झूम-झूम, डालों से लूम-लूम, झूला झूल दुःख भूल, हँसिए हँसाइए । एक दूसरे की बाँह, गहें बँधें रहे चाह, एक दूसरे को चाह, कजरी सुनाइए।। दिल में रहे न दाह, तन्नक पले न डाह, मन में भरे उछाह, पेंग को बढ़ाइए। राखी की है साखी यही, पले प्रेम-पाखी यहीं, भाई-भगिनी का नाता, जन्म भर निभाइए।। *
बागी थे हों अनुरागी, विरागी थे हों सुहागी, कोई भी न हो अभागी, दैव से मनाइए। सभी के माथे हो टीका, किसी का न पर्व फीका, बहनों का नेह नीका, राखी-गीत गाइए।। कलाई रहे न सूनी, राखी बाँध शोभा दूनी, आरती की ज्वाल धूनी, अशुभ मिटाइए। मीठा खाएँ मीठा बोलें, जीवन में रस घोलें, बहना के पाँव छूलें, शुभाशीष पाइए।। *
बंधन न रास आए, बँधना न मन भाए, स्वतंत्रता ही सुहाए, सहज स्वभाव है। निर्बंध अगर रहें, मर्याद को न गहें, कोई किसी को न सहें, चैन का अभाव है।। मना राखी नेह पर्व, करिए नातों पे गर्व, निभायें संबंध सर्व, नेह का निभाव है। बंधन जो प्रेम का हो, कुशल का क्षेम का हो, धरम का नेम हो, 'सलिल' सत्प्रभाव है।। *
न चाहतें, न राहतें, न फैसले, न फासले, दर्द-हर्ष मिल सहें, साथ-साथ हाथ हों। न मित्रता, न शत्रुता, न वायदे, न कायदे, कर्म-धर्म नित करें, उठे हुए माथ हों।। न दायरे, न दूरियाँ, रहें न मजबूरियाँ, फूल-शूल, धूप-छाँव, नेह नर्मदा बनें। गिर-उठें, बढ़े-चलें, काल से विहँस लड़ें, दंभ-द्वेष-छल मिटें,कोशिशें कथा बुनें।। *
लाख़ मतभेद रहें, पर मनभेद न हों, भाई को हमेशा गले, हँस के लगाइए लात मार दूर करें, दशमुख सा अनुज, शत्रुओं को न्योत घर, कभी भी न लाइए भाई नहीं दुश्मन जो, इंच भर भूमि न दें, नारि-अपमान कर, नाश न बुलाइए छल-छद्म, दाँव-पेंच, द्वंद-फंद अपना के, राजनीति का अखाड़ा घर न बनाइये जिसका जो जोड़ीदार, करे उसे वही प्यार, कभी फूल कभी खार, मन-मन भाया है पास आये सुख मिले, दूर जाये दुःख मिले, साथ रहे पूर्ण करे, जिया हरषाया है चाह-वाह-आह-दाह, नेह नदिया अथाह, कल-कल हो प्रवाह, डूबा-उतराया है गर्दभ कहे गधी से, आँख मूँद - कर - जोड़, देख तेरी सुन्दरता चाँद भी लजाया है (श्रृंगार तथा हास्य रस का मिश्रण) *
शहनाई गूँज रही, नाच रहा मन मोर, जल्दी से हल्दी लेकर, करी मनुहार है आकुल हैं-व्याकुल हैं, दोनों एक-दूजे बिन, नया-नया प्रेम रंग, शीश पे सवार है चन्द्रमुखी, सूर्यमुखी, ज्वालामुखी रूप धरे, सासू की समधन पे, जग बलिहार है गेंद जैसा या है ढोल, बन्ना तो है अनमोल, बन्नो का बदन जैसे, क़ुतुब मीनार है *
ये तो सब जानते हैं, जान के न मानते हैं, जग है असार पर, सार बिन चले ना मायका सभी को लगे - भला, किन्तु ये है सच, काम किसी का भी, ससुरार बिन चले ना मनुहार इनकार, इकरार इज़हार, भुजहार, अभिसार, प्यार बिन चले ना रागी हो, विरागी हो या हतभागी बड़भागी, दुनिया में काम कभी, 'नार' बिन चले ना (अंतिम पंक्ति में श्लेष अलंकार 'नार' = ज्ञान, पानी, स्त्री)
*
बुन्देली जाके कर बीना सजे, बाके दर सीस नवे, मन के विकार मिटे, नित गुनगाइए ज्ञान, बुधि, भासा, भाव, तन्नक न हो अभाव, बिनत रहे सुभाव, गुनन सराहिए किसी से नाता लें जोड़, कब्बो जाएँ नहीं तोड़, फालतू न करें होड़, नेह सों निबाहिए
हाथन तिरंगा थाम, करें सदा राम-राम, 'सलिल' से हों न वाम, देस-वारी जाइए
*
छत्तीसगढ़ी अँचरा मा भरे धान, टूरा गाँव का किसान, धरती मा फूँक प्राण, पसीनाबहाव थे। बोबरा-फार बनाव, बासी-पसिया सुहाव, महुआ-अचार खाव, पंडवानीभाव थे।। बारी-बिजुरी बनाय, उरदा के पीठी भाय, थोरको न ओतियाय, टूरीइठलाव थे। भारत के जय बोल, माटी मा करे किलोल, घोटुल मा रस घोल, मुटियारीभाव थे
*
निमाड़ी गधा का माथा का सिंग, जसो नेता गुम हुयो, गाँव खs बटोsर वोsट,उल्लूs की दुम हुयो। मनखs को सुभाsव छे, नहीं सहे अभाव छे, हमेसs खांव-खांव छे, आपsसे तुम हुयो।। टीला पाणी झाड़s नद्दी, हाय खोद रएs पिद्दी, भ्रष्टs सरsकारs रद्दी, पतानामालुम हुयो। 'सलिल' आँसू वादsला, धsरा कहे खाद ला, मिहsनतs का स्वाद पा, दूरsमाsतम हुयो
*
मालवी: दोहा: भणि ले म्हारा देस की, सबसे राम-रहीम। जल ढारे पीपल तले, अँगना चावे नीम।
कवित्त शरद की चांदणी से, रात सिनगार करे, बिजुरी गिरे धरा पे, फूल नभ सेझरे। आधी राती भाँग बाटी, दिया की बुझाई बाती, मिसरी-बरफ़ घोल्यो,नैना हैं भरे-भरे।। भाभीनी जेठानी रंगे, काकीनी मामीनी भीजें, सासू-जाया नहीं आया,दिल धीर न धरे। रंग घोल्यो हौद भर, बैठी हूँ गुलाल धर, राह में रोके हैं यार, हाय! टारे नटरे
*
राजस्थानी जीवण का काचा गेला, जहाँ-तहाँ मेला-ठेला, भीड़-भाड़ ठेलं-ठेला, मोड़तरां-तरां का। ठूँठ सरी बैठो काईं?, चहरे पे आई झाईं, खोयी-खोयी परछाईं, जोड़ तरां-तरां का।। चाल्यो बीज बजारा रे?, आवारा बनजारा रे?, फिरता मारा-मारा रे?,होड़ तरां-तरां का। नाव कनारे लागैगी, सोई किस्मत जागैगी, मंजिल पीछे भागेगी, तोड़तरां-तरां का
*
भोजपुरी चमचम चमकल, चाँदनी सी झलकल, झपटल लपकल, नयन कटरिया| तड़पल फड़कल, धक्-धक् धड़कल, दिल से जुड़ल दिल, गिरलबिजुरिया।। निरखल परखल, रुक-रुक चल-चल, सम्हल-सम्हल पग, धरलगुजरिया। छिन-छिन पल-पल, पड़त नहीं रे कल, मचल-मचल चल, चपल संवरिया
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हिन्दी+उर्दू दर्दे-दिल पीरो-गम, किसी को दिखाएँ मत, दिल में छिपाए रखें, हँस-मुस्कुराइए। हुस्न के न ऐब देखें, देखें भी तो नहीं लेखें, दिल पे लुटा के दिल, वारी-वारी जाइए।। नाज़ो-अदा नाज़नीं के, देख परेशान न हों, आशिकी की रस्म है कि, सिर भी मुड़ाइए। चलिए न ऐसी चाल, फालतू मचे बवाल, कोई न करें सवाल, नखरे उठाइए
*


संजीव


संजीव

संजीव

संजीव

संजीव

संजीव

संजीव

संजीव

संजीव

संजीव

संजीव

संजीव

संजीव

संजीव

संजीव