गुरुवार, 20 जून 2019

व्यंग्य रचना: अभिनंदन लो

व्यंग्य रचना:
अभिनंदन लो 
*
युग-कवयित्री! अभिनंदन लो....
*
सब जग अपना, कुछ न पराया
शुभ सिद्धांत तुम्हें यह भाया.
गैर नहीं कुछ भी है जग में-
'विश्व एक' अपना सरमाया.
जहाँ मिले झट झपट वहीं से
अपने माथे यश-चंदन लो
युग-कवयित्री अभिनंदन लो....
*
मेरा-तेरा मिथ्या माया
दास कबीरा ने बतलाया.
भुला परायेपन को तुमने
गैर लिखे को कंठ बसाया.
पर उपकारी अन्य न तुमसा
जहाँ रुचे कविता कुंदन लो
युग-कवयित्री अभिनंदन लो....
*
हिमगिरी-जय सा किया यत्न है
तुम सी प्रतिभा काव्य रत्न है.
चोरी-डाका-लूट कहे जग
निशा तस्करी मुदित-मग्न है.
अग्र वाल पर रचना मेरी
तेरी हुई, महान लग्न है.
तुमने कवि को धन्य किया है
खुद का खुद कर मूल्यांकन लो
युग-कवयित्री अभिनंदन लो....
*
कवि का क्या? 'बेचैन' बहुत वह
तुमने चैन गले में धारी.
'कुँवर' पंक्ति में खड़ा रहे पर
हो न सके सत्ता अधिकारी.
करी कृपा उसकी रचना ले
नभ-वाणी पर पढ़कर धन लो
युग-कवयित्री अभिनंदन लो....
*
तुम जग-जननी, कविता तनया
जब जी चाहा कर ली मृगया.
किसकी है औकात रोक ले-
हो स्वतंत्र तुम सचमुच अभया.
दुस्साहस प्रति जग नतमस्तक
'छद्म-रत्न' हो, अलंकरण लो
युग-कवयित्री अभिनंदन लो....
***
टीप: श्रेष्ठ कवि की रचना को अपनी बताकर २३-५-२०१८ को प्रात: ६.४० बजे काव्य धारा कार्यक्रम में आकाशवाणी पर प्रस्तुत कर धनार्जन का अद्भुत पराक्रम करने के उपलक्ष्य में यह रचना समर्पित उसे ही जो इसका सुपात्र है)

मुक्तिका मिट्टी मेरी

मुक्तिका
मिट्टी मेरी...
*
मोम बनकर थी पिघलती रही मिट्टी मेरी.
मौन रहकर भी सुलगती रही मिट्टी मेरी..
बाग़ के फूल से पूछो तो कहेगा वह भी -
कूकती, नाच-चहकती रही मिट्टी मेरी..
पैर से रौंदी गयी, सानी गयी, कूटी गयी-
चाक-चढ़कर भी, सँवरती रही मिट्टी मेरी..
ढाई आखर न पढ़े, पोथियाँ रट लीं, लिख दीं.
रही अनपढ़ ही, सिसकती रही मिट्टी मेरी..
कभी चंदा, कभी तारों से लड़ायी आखें.
कभी सूरज सी दमकती रही मिट्टी मेरी..
खता लम्हों की, सजा पाती रही सदियों तक.
पाक-नापाक दहकती रही मिट्टी मेरी..
खेत-खलिहान में, पनघट में, रसोई में भी.
मैंने देखा है, खनकती रही मिट्टी मेरी..
गोद में खेल, खिलाया है सबको गोदी में.
फिर भी बाज़ार में बिकती रही मिट्टी मेरी..
राह चुप देखती है और समय आने पर-
सूरमाओं को पटकती रही मिट्टी मेरी..
कभी थमती नहीं, रुकती नहीं, न झुकती है.
नर्मदा नेह की, बहती रही मिट्टी मेरी..
*******

प्रभु जी! हम जनता,

एक रचना 
प्रभु जी! हम जनता,
*
प्रभु जी! हम जनता, तुम नेता
हम हारे, तुम भए विजेता।।
प्रभु जी! सत्ता तुमरी चेरी 
हमें यातना-पीर घनेरी ।।
प्रभु जी! तुम घपला-घोटाला
हमखों मुस्किल भयो निवाला।।
प्रभु जी! तुम छत्तीसी छाती
तुम दुलहा, हम महज घराती।।
प्रभु जी! तुम जुमला हम ताली
भरी तिजोरी, जेबें खाली।।
प्रभु जी! हाथी, हँसिया, पंजा
कंघी बाँटें, कर खें गंजा।।
प्रभु जी! भोग और हम अनशन
लेंय खनाखन, देंय दनादन।।
प्रभु जी! मधुवन, हम तरु सूखा
तुम हलुआ, हम रोटा रूखा।।
प्रभु जी! वक्ता, हम हैं श्रोता
कटे सुपारी, काट सरोता।।
(रैदास से क्षमा प्रार्थना सहित)
***
२०-११-२०१५
चित्रकूट एक्सप्रेस, उन्नाव-कानपूर

कुछ दोहे श्रृंगार के

दोहा सलिला
*
जूही-चमेली देखकर, हुआ मोगरा मस्त 
सदा सुहागिन ने बिगड़, किया हौसला पस्त 
*
नैन मटक्का कर रहे, महुआ-सरसों झूम
बरगद बब्बा खाँसते। क्यों? किसको मालूम?
*
अमलतास ने झूमकर, किया प्रेम-संकेत
नीम षोडशी लजाई, महका पनघट-खेत
*
अमरबेल के मोह में, फँसकर सूखे आम
कहे वंशलोचन सम्हल, हो न विधाता वाम
*
शेफाली के हाथ पर, नाम लिखा कचनार
सुर्ख हिना के भेद ने, खोदे भेद हजार
*
गुलबकावली ने किया, इन्तिज़ार हर शाम
अमन-चैन कर दिया है,पारिजात के नाम
*
गौरा हेरें आम को, बौरा हुईं उदास
मिले निकट आ क्यों नहीं, बौरा रहे उदास?
*
बौरा कर हो गया है, आम आम से ख़ास
बौरा बौराये, करे दुनिया नहक हास
***
२०-६-२०१६
lnct jabalpur

लघु कथा राष्ट्रीय एकता

 लघु कथा 
राष्ट्रीय एकता 
संजीव 
*
'माँ! दो भारतीयों के तीन मत क्यों होते हैं?'
''क्यों क्या हुआ?''
'संसद और विधायिकाओं में जितने जन प्रतिनिधि होते हैं उनसे अधिक मत व्यक्त किये जाते हैं.'
''बेटा! वे अलग-अलग दलों के होते हैं न.''
'अच्छा, फिर दूरदर्शनी परिचर्चाओं में किसी बात पर सहमति क्यों नहीं बनती?'
''वहाँ बैठे वक्ता अलग-अलग विचारधाराओं के होते हैं न?''
'वे किसी और बात पर नहीं तो असहमत होने के लिये ही सहमत हो जाएँ।
''ऐसा नहीं है कि भारतीय कभी सहमत ही नहीं होते।''
'मुझे तो भारतीय कभी सहमत होते नहीं दीखते। भाषा, भूषा, धर्म, प्रांत, दल, नीति, कर, शिक्षा यहाँ तक कि पानी पर भी विवाद करते हैं।'
''लेकिन जन प्रतिनिधियों की भत्ता वृद्धि, अधिकारियों-कर्मचारियों के वेतन बढ़ाने, व्यापारियों के कर घटाने, विद्यार्थियों के कक्षा से भागने, पंडितों के चढोत्री माँगने, समाचारों को सनसनीखेज बनाकर दिखाने, नृत्य के नाम पर काम से काम कपड़ों में फूहड़ उछल-कूद दिखाने और कमजोरों के शोषण पर कोई मतभेद देखा तुमने? भारतीय पक्के राष्ट्रवादी और आस्तिक हैं, अन्नदेवता के सच्चे पुजारी, छप्पन भोग की परंपरा का पूरी ईमानदारी से पालन करते हैं। मद्रास का इडली-डोसा, पंजाब का छोला-भटूरा, गुजरात का पोहा, बंगाल का रसगुल्ला और मध्यप्रदेश की जलेबी खिलाकर देखो, पूरा देश एक नज़र आयेगा।''
और बेटा निरुत्तर हो गया...
*

स्मृति गीत: पिता

पुण्य स्मृति:
गीत 
हर दिन पिता याद आते हैं...
*
जान रहे हम अब न मिलेंगे. 
यादों में आ, गले लगेंगे.
आँख खुलेगी तो उदास हो-
हम अपने ही हाथ मलेंगे. 
पर मिथ्या सपने भाते हैं.हर
दिन पिता याद आते हैं...
*
लाड, डाँट, झिड़की, समझाइश
कर न सकूँ इनकी पैमाइश. 
ले पहचान गैर-अपनों को-
कर न दर्द की कभी नुमाइश.
अब न गोद में बिठलाते हैं.
हर दिन पिता याद आते हैं...
*
अक्षर-शब्द सिखाये तुमने.
नित घर-घाट दिखाए तुमने.
जब-जब मन कोशिश कर हारा-
फल साफल्य चखाए तुमने.
पग थमते, कर जुड़ जाते हैं 
हर दिन पिता याद आते हैं...
*

विमर्श : नागरिक अधिकारों का हनन

विमर्श
निर्बल नागरिकों के अधिकारों का हनन
*
लोकतंत्र में निर्बल नागरिकों की जीवन रक्षा का भर जिन पर है वे उसका जीना मुश्किल कर दें और जब कोई असामाजिक तत्व ऐसी स्थिति में उग्र हो जाए तो पूरे देश में हड़ताल कर असंख्य बेगुनाहों को मरने के लिए विवश कर दिया जाए।
शर्म आनी चाहिए कि बिना इलाज मरे मरीजों के कत्ल का मुकदमा आई एम् ए के
पदाधिकारियों पर क्यों नहीं चलाती सरकार?
आम मरीजोंजीवन रक्षा के लिए कोर्ट में जनहित याचिका क्यों नहीं लाई जाती ?
मरीजों के मरने के बाद भी जो अस्पताल इलाज के नाम पर लाखों का बिल बनाते हैं,
और लाश तक रोक लेते हैं उनके खिलाफ क्यों नहीं लाते पिटीशन?
दुर्घटना के बाद घायलों को बिना इलाज भगा देनेवाले डाक्टरों के खिलाफ क्यों नहीं
होती पिटीशन?
राजस्थान में डॉक्टर ने मरीज को अस्पताल में सबके साबके मारा, उसके खिलाफ
आई एम् ए ने क्या किया?
यही बदतमीजी वकील भी कर रहे हैं। एक वकील दूसरे वकील को मारे और पूरे देश में हड़ताल कर दो। न्याय की आस में घर, जमीन बेच चुके मुवक्किदिलाने ल की न्याय की चिंता नहीं है किसी वकील को।
आम आदमी को ब्लैक मेल कर रहे पत्रकारों के साथ पूरा मीडिया जुट जाता है।
कैसा लोकतंत्र बना रहे हैं हम। निर्बल और गरीब की जान बचानेवाला, न्याय
दिलाने वाला, उसकी आवाज उठाने वाला, उसके जीवन भर की कमाई देने का सपना दिखानेवाला सब संगठन बनाकर खड़े हैं। उन्हें समर्थन को संरक्षण चाहिए, और ये सब असहायकी जान लेते रहें उनके खिलाफ कुछ नहीं हो रहा।
शर्मनाक।
***

शनिवार, 15 जून 2019

दोहा ब्रह्मा

दोहा सलिला- 
ब्रम्ह अनादि-अनन्त है, रचता है सब सृष्टि 
निराकार आकार रच, करे कृपा की वृष्टि 
*
परम सत्य है ब्रम्ह ही, चित्र न उसका प्राप्त 
परम सत्य है ब्रम्ह ही, वेद-वचन है आप्त
*
ब्रम्ह-सत्य जो जानता, ब्राम्हण वह इंसान
हर काया है ब्रम्ह का, अंश सके वह मान
*
भेद-भाव करता नहीं, माने ऊँच न नीच
है समान हर आत्म को, प्रेम भाव से सींच
*
काया-स्थित ब्रम्ह ही, 'कायस्थ' ले जो जान
छुआछूत को भूलकर, करता सबका मान
*
राम श्याम रहमान हरि, ईसा मूसा एक
ईश्वर को प्यारा वही, जिसकी करनी नेक
*
निर्बल की रक्षा करे, क्षत्रिय तजकर स्वार्थ
तभी मुक्ति वह पा सके, करे नित्य परमार्थ
*
कर आदान-प्रदान जो, मेटे सकल अभाव
भाव ह्रदय में प्रेम का, होता वैश्य स्वभाव
*
पल-पल रस का पान कर, मनुज बने रस-खान
ईश तत्व से रास कर, करे 'सलिल' गुणगान
*
सेवा करता स्वार्थ बिन, सचमुच शूद्र महान
आत्मा सो परमात्मा, सेवे सकल जहान
*
चार वर्ण हैं धर्म के, हाथ-पैर लें जान
चारों का पालन करें, नर-नारी है आन
*
हर काया है शूद्र ही, करती सेवा नित्य
स्नेह-प्रेम ले-दे बने, वैश्य बात है सत्य
*
रक्षा करते निबल की, तब क्षत्रिय हों आप
ज्ञान-दान, कुछ सीख दे, ब्राम्हण हों जग व्याप
*
काया में रहकर करें, चारों कार्य सहर्ष
जो वे ही कायस्थ हैं, तजकर सकल अमर्ष
*
विधि-हरि-हर ही राम हैं, विधि-हरि-हर ही श्याम
जो न सत्य यह मानते, उनसे प्रभु हों वाम
*

नवगीत

नवगीत 
एक-दूसरे को 
*
एक दूसरे को छलते हम 
बिना उगे ही 
नित ढलते हम।
*
तुम मुझको 'माया' कहते हो,
मेरी ही 'छाया' गहते हो।
अवसर पाकर नहीं चूकते-
सहलाते, 'काया' तहते हो।
'साया' नहीं 'शक्ति' भूले तुम
मुझे न मालूम
सृष्टि बीज तुम।
चिर परिचित लेकिन अनजाने
एक-दूसरे से
लड़ते हम।
*
मैंने तुम्हें कह दिया स्वामी,
किंतु न अंतर्मन अनुगामी।
तुम प्रयास कर खुद से हारे-
संग न 'शक्ति' रही परिणामी।
साथ न तुमसे मिला अगर तो
हुई नाक में
मेरी भी दम।
हैं अभिन्न, स्पर्धी बनकर
एक-दूसरे को
खलते हम।
*
मैं-तुम, तुम-मैं, तू-तू मैं-मैं,
हँसना भूले करते पैं-पैं।
नहीं सुहाता संग-साथ भी-
अलग-अलग करते हैं ढैं-ढैं।
अपने सपने चूर हो रहे
दिल दुखते हैं
नयन हुए नम।
फेर लिए मुंह अश्रु न पोंछें
एक-दूसरे बिन
ढलते हम।
*
तुम मुझको 'माया' कहते हो,
मेरी ही 'छाया' गहते हो।
अवसर पाकर नहीं चूकते-
सहलाते, 'काया' तहते हो।
'साया' नहीं 'शक्ति' भूले तुम
मुझे न मालूम
सृष्टि बीज तुम।
चिर परिचित लेकिन अनजाने
एक-दूसरे से
लड़ते हम।
*
जब तक 'देवी' तुमने माना
तुम्हें 'देवता' मैंने जाना।
जब तुम 'दासी' कह इतराए
तुम्हें 'दास' मैंने पहचाना।
बाँट सकें जब-जब आपस में
थोड़ी खुशियाँ,
थोड़े से गम
तब-तब एक-दूजे के पूरक
धूप-छाँव संग-
संग सहते हम।
*
'मैं-तुम' जब 'तुम-मैं' हो जाते ,
'हम' होकर नवगीत गुञ्जाते ।
आपद-विपदा हँस सह जाते-
'हम' हो मरकर भी जी जाते।
स्वर्ग उतरता तब धरती पर
जब मैं-तुम
होते हैं हमदम।
दो से एक, अनेक हुए हैं
एक-दूसरे में
खो-पा हम।
*****
१०-६-२०१६
TIET JABALPUR

धारा छंद

छंद सलिला:
धारा छंद
संजीव
*
छंद लक्षण: जाति महायौगिक, प्रति पद २९ मात्रा, यति १५ - १४, विषम चरणांत गुरु लघु सम चरणांत गुरु।
लक्षण छंद:
दे आनंद, न जिसका अंत , छंदों की अमृत धारा
रचें-पढ़ें, सुन-गुन सानंद , सुख पाया जब उच्चारा
पंद्रह-चौदह कला रखें, रेवा-धारा सदृश बहे
गुरु-लघु विषम चरण अंत, गुरु सम चरण सुअंत रहे
उदाहरण:
१. पूज्य पिता को करूँ प्रणाम , भाग्य जगा आशीष मिला
तुम बिन सूने सुबहो-शाम , 'सलिल' न मन का कमल खिला
रहा शीश पर जब तक हाथ , ईश-कृपा ने सतत छुआ
छाँह गयी जब छूटा साथ , तत्क्षण ही कंगाल हुआ
२. सघन तिमिर हो शीघ्र निशांत , प्राची पर लालिमा खिले
सूरज लेकर आये उजास , श्वास-श्वास को आस मिले
हो प्रयास के अधरों हास , तन के लगे सुवास गले
पल में मिट जाए संत्रास , मन राधा को रास मिले
३. सतत प्रवाहित हो रस-धार, दस दिश प्यार अपार रहे
आओ! कर सोलह सिंगार , तुम पर जान निसार रहे
मिली जीत दिल हमको हार , हार ह्रदय तुम जीत गये
बाँटो तो बढ़ता है प्यार , जोड़-जोड़ हम रीत गये
__________
*********
(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अनुगीत, अरुण, अवतार, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उड़ियाना, उपमान, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, कुकुभ, कज्जल, कामरूप, कामिनीमोहन, काव्य, कीर्ति, कुण्डल, कुडंली, गीता, गीतिका, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, चंद्रायण, छवि, जग, जाया, तांडव, तोमर, त्रिलोकी, दिक्पाल, दीप, दीपकी, दोधक, दृढ़पद, धारा, नित, निधि, निश्चल, प्लवंगम्, प्रतिभा, प्रदोष, प्रभाती, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदनअवतार, मदनाग, मधुभार, मधुमालती, मनहरण घनाक्षरी, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली, माया, माला, मोहन, मृदुगति, योग, ऋद्धि, रसामृत, रसाल, राजीव, राधिका, रामा, रूपमाला, रोला, लीला, वस्तुवदनक, वाणी, विद्या, विधाता, विरहणी, विशेषिका, विष्णुपद, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शास्त्र, शिव, शुभगति, शोभन, शुद्धगा, शंकर, सरस, सार, सारस, सिद्धि, सिंहिका, सुखदा, सुगति, सुजान, सुमित्र, संपदा, हरि, हरिगीतिका, हेमंत, हंसगति, हंसी)

दोहे पिता

पितृ दिवस पर- 
पिता सूर्य सम प्रकाशक :
संजीव 

पिता सूर्य सम प्रकाशक, जगा कहें कर कर्म 
कर्म-धर्म से महत्तम, अन्य न कोई मर्म
*

गृहस्वामी मार्तण्ड हैं, पिता जानिए सत्य
सुखकर्ता भर्ता पिता, रवि श्रीमान अनित्य
*
भास्कर-शशि माता-पिता, तारे हैं संतान
भू अम्बर गृह मेघ सम, दिक् दीवार समान
*
आपद-विपदा तम हरें, पिता चक्षु दें खोल
हाथ थाम कंधे बिठा, दिखा रहे भूगोल
*
विवस्वान सम जनक भी, हैं प्रकाश का रूप
हैं विदेह मन-प्राण का, सम्बल देव अनूप
*
छाया थे पितु ताप में, और शीत में ताप
छाता बारिश में रहे, हारकर हर संताप
*
बीज नाम कुल तन दिया, तुमने मुझको तात
अन्धकार की कोख से, लाकर दिया प्रभात
*
गोदी आँचल लोरियाँ, उँगली कंधा बाँह
माँ-पापा जब तक रहे, रही शीश पर छाँह
*
शुभाशीष से भरा था, जब तक जीवन पात्र
जान न पाया रिक्तता, अब हूँ याचक मात्र
*
पितृ-चरण स्पर्श बिन, कैसे हो त्यौहार
चित्र देख मन विकल हो, करता हाहाकार
*
तन-मन की दृढ़ता अतुल, खुद से बेपरवाह
सबकी चिंता-पीर हर, ढाढ़स दिया अथाह
*
श्वास पिता की धरोहर, माँ की थाती आस
हास बंधु, तिय लास है, सुता-पुत्र मृदु हास
*

बुधवार, 12 जून 2019

साधना-संजीव इंदौर में

चित्र में ये शामिल हो सकता है: 2 लोग, Sonali Saxena सहित, मुस्कुराते लोग, लोग खड़े हैं और अंदर

मुक्तक

मुक्तक 
नेह नर्मदा में अवगाहो, तन-मन निर्मल हो जाएगा।
रोम-रोम पुलकित होगा प्रिय!, अपनेपन की जय गाएगा।। 
हर अभिलाषा क्षिप्रा होगी, कुंभ लगेगा संकल्पों का, 
कोशिश का जनगण तट आकर, फल पा-देकर तर जाएगा।।
७-६-२०१६

समन्वय प्रकाशन अभियान

समन्वय प्रकाशन अभियान जबलपुर द्वारा प्रकाशित 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' द्वारा लिखित - संपादित साहित्य 
०१. कलम के देव, भक्ति गीत, वर्ष १९९७, ISBN ८१-८७७२७-००-४, अनुपलब्ध 
०२. भूकंप के साथ जीना सीखें, १९९७, ISBN ८१-८७७२७-००-४ लोकोपयोगी, अनुपलब्ध
०३. लोकतंत्र का मक़बरा, कवितायेँ, २००१, ISBN ८१-८७७२७-०७-१अनुपलब्ध
०४. मीत मेरे, कवितायेँ, २००३, ISBN ८१-८७७२७-११-x, १५०/-, सीमित प्रतियाँ
०५. काल है संक्रांति का, नवगीत, २०१६, ISBN ८१-७७६१-०००-७, ३००/-
०६. राम नाम सुखदाई, भक्तिगीत, शांति देवी वर्मा, १९९९, ISBN ८१-८७७२७-००-४, २००८ ISBN ८१-८७७२७-००-४, अनुपलब्ध
०७. मता-ए-परवीन, ग़ज़ल संग्रह, परवीन हक़, १९९९, ISBN ८१-८७७२७-००-४, ८०/-, अनुपलब्ध
०८. उमर की पगडंडियों पर, गीत, राजेंद्र श्रीवास्तव, २०००, ISBN ८१-८७७२७-००-४१२०/-, अनुपलब्ध
९. पहला कदम, कविताएँ, डॉ. अनूप निगम, २००२, ISBN ८१-८७७२७-०८-x, १००/-, सीमित प्रतियाँ
१०. कदाचित, कवितायेँ, सुभाष पांडेय, २००२, ISBN ८१-८७७२७-१०-१,
११. Off and On, अंग्रेजी ग़ज़ल,अनिल जैन,२००१, ISBN ८१-८७७२७-१९-५, ८०/-
१२. यदा-कदा, उक्त ११ का हिंदी काव्यानुवाद, डॉ. बाबू जोसेफ-स्टीव विंसेंट, २००५, ISBN ८१-८७७२७-१५-२, ८०/-,
१३. नीरव का संगीत, कविताएँ, अग्निभ, २००८, ISBN ६१-८७७२९-१९-s, ८०/-,
१४. समयजयी सहितयशिल्पी भागवत प्रसाद मिश्र 'नियाज़'- व्यक्तित्व-कृतित्व, २००५, ISBN SI-७७६१-०४०-६०, ५००/-,
१५. निर्माण के नूपुर, सामूहिक काव्य संग्रह,१९८३, ५/-, अनुपलब्ध,
१६. नींव के पत्थर, सामूहिक काव्य संग्रह,१९८५, १०/-, अनुपलब्ध,
१७. तिनका-तिनका नीड़, सामूहिक काव्य संग्रह,२०००, ISBN ६१-८७७२९-१९-s,२५०/-, सीमित प्रतियाँ,
१८. काल है संक्रांति का, २०१६, ISBN ८१-७७६१-०००-७, ३००/-,
१९. कुरुक्षेत्र गाथा, प्रबंध काव्य, २०१६, ISBN ८१-७७६१-००२-३, ३००/-
२०. सड़क पर, नवगीत संग्रह, २०१८, ISBN ८१-७७६१-०१०-४ 

२१. दोहा-दोहा नर्मदा, सं. सलिल - साधना वर्मा, २०१८, ISBN ८१-७७६१-००७-५ 
२२. दोहा सलिला निर्मला, सं. सलिल - साधना वर्मा, २०१८, ISBN ८१-७७६१-०००-२  
२३. दोहा दीप्त दिनेश, सं. सलिल - साधना वर्मा, २०१८, ISBN ८१-७७६१-००९-० 
२४. The Second Thought, Poetry Dr. Anil Jain , २०१९, ISBN ८१-७७६१-०११-२   

विधाता/शुद्धगा छंद

छंद सलिला:
विधाता/शुद्धगा छंद
संजीव
*
छंद लक्षण: जाति यौगिक, प्रति पद २८ मात्रा, 
यति ७-७-७-७ / १४-१४ , ८ वीं - १५ वीं मात्रा लघु
विशेष: उर्दू बहर हज़ज सालिम 'मुफाईलुन मुफाईलुन मुफाईलुन मुफाईलुन' इसी छंद पर आधारित है.
लक्षण छंद:
विधाता को / नमन कर ले , प्रयासों को / गगन कर ले
रंग नभ पर / सिंधु में जल , साज पर सुर / अचल कर ले
सिद्धि-तिथि लघु / नहीं कोई , दिखा कंकर / मिला शंकर
न रुक, चल गिर / न डर, उठ बढ़ , सीकरों को / सलिल कर ले
संकेत: रंग =७, सिंधु = ७, सुर/स्वर = ७, अचल/पर्वत = ७
सिद्धि = ८, तिथि = १५
उदाहरण:
१. न बोलें हम न बोलो तुम , सुनें कैसे बात मन की?
न तोलें हम न तोलो तुम , गुनें कैसे जात तन की ?
न डोलें हम न डोलो तुम , मिलें कैसे श्वास-वन में?
न घोलें हम न घोलो तुम, जियें कैसे प्रेम धुन में?
जात = असलियत, पानी केरा बुदबुदा अस मानुस की जात
२. ज़माने की निगाहों से , न कोई बच सका अब तक
निगाहों ने कहा अपना , दिखा सपना लिया ठग तक
गिले - शिकवे करें किससे? , कहें किसको पराया हम?
न कोई है यहाँ अपना , रहें जिससे नुमायाँ हम
३. है हक़ीक़त कुछ न अपना , खुदा की है ज़िंदगानी
बुन रहा तू हसीं सपना , बुजुर्गों की निगहबानी
सीखता जब तक न तपना , सफलता क्यों हाथ आनी?
कोशिशों में खपा खुदको , तब बने तेरी कहानी
४. जिएंगे हम, मरेंगे हम, नहीं है गम, न सोचो तुम
जलेंगे हम, बुझेंगे हम, नहीं है तम, न सोचो तुम
कहीं हैं हम, कहीं हो तुम, कहीं हैं गम, न सोचो तुम
यहीं हैं हम, यहीं हो तुम, नहीं हमदम, न सोचो तुम
*********
१२-६-२०१४
(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अनुगीत, अरुण, अवतार, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उड़ियाना, उपमान, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, कुकुभ, कज्जल, कामरूप, कामिनीमोहन, काव्य, कीर्ति, कुण्डल, कुडंली, गीता, गीतिका, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, चंद्रायण, छवि, जग, जाया, तांडव, तोमर, त्रिलोकी, दिक्पाल, दीप, दीपकी, दोधक, दृढ़पद, नित, निधि, निश्चल, प्लवंगम्, प्रतिभा, प्रदोष, प्रभाती, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदनअवतार, मदनाग, मधुभार, मधुमालती, मनहरण घनाक्षरी, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली, माया, माला, मोहन, मृदुगति, योग, ऋद्धि, रसामृत, रसाल, राजीव, राधिका, रामा, रूपमाला, रोला, लीला, वस्तुवदनक, वाणी, विधाता, विरहणी, विशेषिका, विष्णुपद, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शास्त्र, शिव, शुभगति, शोभन, शुद्धगा, शंकर, सरस, सार, सारस, सिद्धि, सिंहिका, सुखदा, सुगति, सुजान, सुमित्र, संपदा, हरि, हेमंत, हंसगति, हंसी)

नवगीत शिरीष के फूल

एक रचना
शिरीष के फूल
*
फूल-फूल कर बजा रहे हैं 
बीहड़ में रमतूल,
धूप-रूप पर मुग्ध, पेंग भर
छेड़ें झूला झूल
न सुधरेंगे
शिरीष के फूल।
*
तापमान का पान कर रहे
किन्तु न बहता स्वेद,
असरहीन करते सूरज को
तनिक नहीं है खेद।
थर्मामीटर नाप न पाये
ताप, गर्व निर्मूल
कर रहे हँस
शिरीष के फूल।।
*
भारत की जनसँख्या जैसे
खिल-झरते हैं खूब,
अनगिन दुःख, हँस सहे न लेकिन
है किंचित भी ऊब।
माथे लग चन्दन सी सोहे
तप्त जेठ की धूल
तार देंगे
शिरीष के फूल।।
*
हो हताश एकाकी रहकर
वन में कभी पलाश,
मार पालथी, तुरत फेंट-गिन
बाँटे-खेले ताश।
भंग-ठंडाई छान फली संग
पीकर रहते कूल,
हमेशा ही
शिरीष के फूल।।
*
जंगल में मंगल करते हैं
दंगल नहीं पसंद,
फाग, बटोही, राई भाते
छन्नपकैया छंद।
ताल-थाप, गति-यति-लय साधें
करें न किंचित भूल,
नाचते सँग
शिरीष के फूल।।
*
संसद में भेजो हल कर दें
पल में सभी सवाल,
भ्रमर-तितलियाँ गीत रचें नव
मेटें सभी बबाल।
चीन-पाक को रोज चुभायें
पैने शूल-बबूल
बदल रँग-ढँग
शिरीष के फूल।।
*****

एक रचना ठेंगा

एक रचना
ठेंगा
*
ठेंगे में 'ठ', ठाकुर में 'ठ', ठठा हँसा जो वह ही जीता 
कौन ठठेरा?, कौन जुलाहा?, कौन कहाँ कब जूते सीता?
बिन ठेंगे कब काम चला है?, लगा, दिखा, चूसो या पकड़ो
चार अँगुलियों पर भारी है ठेंगा एक, न उससे अकड़ो
ठेंगे की महिमा भारी है, पूछो ठकुरानी से जाकर
ठेंगे के संग जीभ चिढ़ा दें, हो जाते बेबस करुणाकर
ठेंगा हाथों-लट्ठ थामता, पैरों में हो तो बेनामी
ठेंगा लगता, इसकी दौलत उसको दे देता है दामी
लोक देखता आया ठेंगा, नेता दिखा-दिखा है जीता
सीता-गीता हैं संसद में, लोकतंत्र को लगा पलीता
राम बाग़ में लंका जैसा दृश्य हुआ अभिनीत, ध्वंस भी
कान्हा गायब, यादव करनी देख अचंभित हुआ कंस भी
ठेंगा नितीश मुलायम लालू, ममता माया जया सोनिया
मौनी बाबा गुमसुम-अण्णा, आप बने तो मिले ना ठिया
चाय बेचकर छप्पन इंची, सीना बन जाता है ठेंगा
वादों को जुमला कहता है, अंधे को कहता है भेंगा
लोकतंत्र को लोभतंत्र कर, ठगता ठेंगा खुद अपने को
ढपली-राग हो गया ठेंगा, बेच रहा जन के सपने को
ठेंगे के आगे नतमस्तक, चतुर अँगुलियाँ चले न कुछ बस
ठेंगे ठाकुर को अर्पित कर भोग लगाओ, 'सलिल' मिले जस 
१२.६.२०१६
***

सोमवार, 3 जून 2019

मुक्तिका

छंद बहर का मूल है १६ 
वार्णिक अनुष्टुप छंद 
मात्रिक दैशिक शशिवदना छंद 
मुक्तिका
*
सूर्य ऊगा तो सवेरा ८/१४
सूर्य डूबा तो अँधेरा
.
प्रीत की जादूगरी है
नूर ऊषा ने बिखेरा
.
नींद तू भी जाग जा रे!
मुर्ग ने दे बाँग टेरा
.
भू न जाती सासरे को
सूर्य लेता संग फेरा
.
साँझ बाँधे रोज राखी
माँग तारे टाँक धीरा
.
है निशा बाँकी सहेली
बाँध-तोड़े मोह-घेरा
.
चाँदनी-चंदा लगाए
आसमां में प्रीत डेरा
***

मुक्तक, मुक्तिका

छंद बहर का मूल है: १४
*
दस वार्णिक पंक्ति जातीय 
सत्रह मात्रिक महासंस्कारी जातीय, चन्द्र छंद 
छंद संरचना:२१२ २१२ २१२ २ 
सूत्र: र र र गा.
*
मुक्तक
*
आपका नूर है आसमानी
रूह है आपका शादमानी
आपका ही रहा बोलबाला
आपका रूप है जाफरानी
*
मुक्तिका- १
आसमां छू रहीं कामनाएँ
आप ही खो रहीं भावनाएँ
.
कौन है जो नहीं चाहता है
शांत हों, जागती वासनाएँ
.
खूब हालात ने आजमाया
आज हालात को आजमाएँ
.
कोशिशों को मिली कामयाबी
हौसले ही सदा काम आएँ
.
आदमी के नहीं पास जाएँ
हैं विषैले न वो काट खाएँ
***
मुक्तिका- २
आप जो हैं वही तो नहीं हैं
दीखते हैं वही जो नहीं हैं
.
खोजते हैं खुदी को जहाँ पे
जानते हैं वहाँ तो नहीं हैं
.
जो न बोला वही बोलते हैं
बोलते, बोलते जो नहीं हैं
.
तौल को तौलते ही रहे जो
तौल को तौलते वो नहीं हैं
.
देश का वेश क्या हो बताएँ?
दश में शेष क्या जो नहीं है
.
आदमी देवता क्या बनेगा?
आदमी आदमी ही नहीं है
.
जोश में होश ही खो न देना
होश में जोश हो, क्यां नहीं है?
***
२०-४-२०१७

दोहा

दोहा सलिला:
संजीव
*
भँवरे की अनुगूँज को, सुनता है उद्यान 
शर्त न थककर मौन हो, लाती रात विहान 
*
धूप जलाती है बदन, धूल रही हैं ढांक
सलिल-चाँदनी साथ मिल, करते निर्मल-पाक
*
जाकर आना मोद दे, आकर जाना शोक
होनी होकर ही रहे, पूरक तम-आलोक
*
अब नालंदा अभय हो, ज्ञान-रश्मि हो खूब
'सलिल' मिटा अज्ञान निज, सके सत्य में डूब
३०-५-२०१५
*

मुक्तिका

मुक्तिका
*
नित इबादत करो
मत अदावत करो
.
मौन बैठो न तुम
कुछ शरारत करो
.
सो लिए हो बहुत
उठ बगावत करो
.
अब न फेरो नज़र
मिल इनायत करो
.
आज शिकवे भुला
कल शिकायत करो
.
बेहतरी का 'सलिल'
पग रवायत करो
.
छोड़ चलभाष प्रिय!
खत-किताबत करो
.
(दैशिक जातीय छंद)
२४-४-२०१६
सी २५६ आवास-विकास हरदोई
***

सोमवार, 27 मई 2019

तीन नवगीत

तीन नवगीत 
*
१. 
दोष गैर के 
करते इंगित 
पथ भूले नवगीत.
देखें, खुद की कमी
सुधारें तो
रच दें नव रीत.
*
अँगुली एक उठी गैरों पर
खुद पर उठतीं तीन.
अनदेखी कर
रहे बजाते
सुर साधे बिन बीन.
काला चश्मा चढ़ा
आज की
आँखों पर ऐसा-
धवन श्वेत
हंसा भी दिखता
करिया काग अतीत.
*
सब कुछ बुरा
न कभी रहा है,
भला न हो सकता.
नहीं बचाया
शुभ-उजियारा
तो वह खो सकता.
नव आशा का
सूर्य उगाएँ
तब निशांत होगा-
अमावसी तं
अमर हुआ, भ्रम
अब हो नहीं प्रतीत.
११.००
***
२.
सिसक रही क्यों कविता?
बोलो क्यों रोता नवगीत?
*
प्रगतिवाद ने
छीनी खुशियाँ
थोप दिया दुःख-दर्द.
ठूँस-ठूँस
कृत्रिम विडम्बना
खून कर दिया सर्द.
हँसी-ख़ुशी की
अनदेखी से
हार गयी है जीत.
*
महलों में बैठे
कुटियों का
दर्द बखान रहे.
नर को छल
नारी-शोषण का
कर यशगान रहे.
लेश न मतलब
लोक-देश से
हैं वैचारिक क्रीत.
*
नहीं लोक का
मंगल चाहें
करा रहे मत-भेद.
एक्य भुलाकर
फूट दिखाते
ताकि बढ़े मन-भेद.
नकली संत्रासों
को जय गा
करते सबको भीत.
११.४०
***
३.
मैं हूँ नवगीत
आइना दिल का,
दर्द-पीड़ा की कैद दो न मुझे.
*
मैं नहीं देह का
बाज़ार महज.
मैं नहीं दर्द की
मीनार महज.
मैं नया ख्वाब
एक बगीचा
रौंद नियमों से, खेद दो न मुझे.
*
अब भी
अरमान-हौसले बाकी.
कौतुकी हूँ
न हो टोका-टाकी.
मैं हूँ कोशिश
की केसरी क्यारी
शूल नफरत के, छेद दो न मुझे.
*
मैं हूँ गर मर्द
दोष दो न मुझे.
मैंने कविता से
मुहब्बत की है.
चाहकर भी न
न सँग रह पाए
कैसे मुमकिन है, खेद हो न मुझे?
*
जिंदगी मुझको
अपनी जीने दो.
थोड़ा हँसने दो
खिलखिलाने दो.
राग या त्याग
एक ही हैं मुझे
सुख या दुःख में भी भेद है न मुझे.
१२.३५
सरस्वती इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंजीनियरिंग एंड टेकनोलोजी जबलपुर.
***

नवगीत

नवगीत:
संजीव
*
अंधड़-तूफां आया
बिजली पल में 
गोल हुई
*
निष्ठा की कमजोर जड़ें
विश्वासों के तरु उखड़े
आशाओं के नीड़ गिरे
मेघों ने धमकाया
खलिहानों में
दौड़ हुई.
*
नुक्कड़ पर आपाधापी
शेफाली थर-थर काँपी
थे ध्वज भगवा, नील, हरे
दोनों को थर्राया
गिरने की भी
होड़ हुई.
*
उखड़ी जड़ खापों की भी
निकली दम पापों की भी
गलती करते बिना डरे
शैतां भी शर्माया
घर खुद का तो
छोड़ मुई!.
*
२६-५-२००१५: जबलपुर में ५० कि.मी. की गति से चक्रवातजनित आंधी-तूफ़ान, भारी तबाही के बाद रचित.

नवगीत

नवगीत:
संजीव 
*
मुस्कानें विष बुझी 
निगाहें पैनी तीर हुईं 
*
कौए मन्दिर में बैठे हैं
गीध सिंहासन पा ऐंठे हैं
मन्त्र पढ़ रहे गर्दभगण मिल
करतल ध्वनि करते जेठे हैं.
पुस्तक लिख-छपते उलूक नित
चीलें पीर भईं
मुस्कानें विष बुझी
निगाहें पैनी तीर हुईं
*
चूहे खलिहानों के रक्षक
हैं सियार शेरों के भक्षक
दूध पिलाकर पाल रहे हैं
अगिन नेवले वासुकि तक्षक
आश्वासन हैं खंबे
वादों की शहतीर नईं
*
न्याय तौलते हैं परजीवी
रट्टू तोते हुए मनीषी
कामशास्त्र पढ़ रहीं साध्वियाँ
सुन प्रवचन वैताल पचीसी
धुल धूसरित संयम
भोगों की प्राचीर मुईं
27-5-2015
***

नवगीत

नवगीत:
संजीव
*
ध्वस्त हुए विश्वास किले 
*
जूही-चमेली
बगिया तजकर
वन-वन भटकें
गोदी खेली
कलियाँ ही
फूलों को खटकें
भँवरे करते मौज
समय के अधर सिले
ध्वस्त हुए विश्वास किले
*
चटक-मटक पर
ठहरें नज़रें
फिर फिर अटकें
श्रम के दर की
चढ़ें न सीढ़ी
युव मन ठिठकें
शाखों से क्यों
वल्लरियों के वदन छिले
ध्वस्त हुए विश्वास किले
27-5-2015
*

नवगीत: संजीव * पूज रहे हैं खोखले आधार * संसद में बातें ही बातें हैं उठ-पटक, छीन-झपट मातें हैं अपने ही अपनों को छलते हैं- अपने-सपने करते घातें हैं अवमूल्यन का गरम बाज़ार पूज रहे हैं खोखले आधार * तिमिराये दिन, गुमसुम रातें हैं सबब फूट का बनती जातें हैं न्यायालय दुराचार का कैदी- सर पर चढ़, बैठ रही लातें हैं मनमानी की बनी मीनार पूज रहे हैं खोखले आधार * असमय ही शुभ अवसर आते हैं अक्सर बिन आये ही जाते हैं पक्षपात होना ही होना है- बारिश में डूब गये छाते हैं डोक्टर ही हो रहे बीमार पूज रहे हैं खोखले आधार * 27-5-2015

नवगीत:
संजीव
*
पूज रहे हैं 
खोखले आधार 
*
संसद में बातें ही बातें हैं
उठ-पटक, छीन-झपट मातें हैं
अपने ही अपनों को छलते हैं-
अपने-सपने करते घातें हैं
अवमूल्यन
का गरम बाज़ार
पूज रहे हैं
खोखले आधार
*
तिमिराये दिन, गुमसुम रातें हैं
सबब फूट का बनती जातें हैं
न्यायालय दुराचार का कैदी-
सर पर चढ़, बैठ रही लातें हैं
मनमानी
की बनी मीनार
पूज रहे हैं
खोखले आधार
*
असमय ही शुभ अवसर आते हैं
अक्सर बिन आये ही जाते हैं
पक्षपात होना ही होना है-
बारिश में डूब गये छाते हैं
डोक्टर ही
हो रहे बीमार
पूज रहे हैं
खोखले आधार
*
27-5-2015

नवगीत

नवगीत:
संजीव 
*
चलो मिल सूरज उगायें 
*
सघनतम तिमिर हो जब
उज्ज्वलतम कल हो तब
जब निराश अंतर्मन-
नव आशा फल हो तब
विघ्न-बाधा मिल भगायें
चलो मिल सूरज उगायें
*
पत्थर का वक्ष फोड़
भूतल को दें झिंझोड़
अमिय धार प्रवहित हो
कालकूट जाल तोड़
मरकर भी जी जाएँ
चलो मिल सूरज उगायें
*
अपनापन अपनों का
धंधा हो सपनों का
बंधन मत तोड़ 'सलिल'
अपने ही नपनों का
भूसुर-भुसुत बनायें
चलो मिल सूरज उगायें
*
27-5-2015

मुक्तक

मुक्तक:
संजीव
*
भाषण देते उपन्यास सा, है प्रयास लघुकथा हमारा 
आश्वासन वह महाकाव्य है, जिसे लिखा बिन पढ़े बिसारा
मत देकर मत करो अपेक्षा, नेताजी कुछ काम करेंगे-
भूल न करते मतदाता को चेहरा दिखलायें दोबारा
*
27-5-2015

गीत

एक रचना 
*
सभ्य-श्रेष्ठ 
खुद को कहता नर 
करता अत्याचार। 
पालन-पोसें वृक्ष
उन्हीं को क्यों
काटे? धिक्कार।
*
बोये बीज, लगाईं कलमें
पानी सींच बढ़ाया।
पत्ते, काली, पुष्प, फल पाकर
मनुज अधिक ललचाया।
सोने के
अंडे पाने
मुर्गी को डाला मार।
पालन-पोसें वृक्ष
उन्हीं को नित
काटें? धिक्कार।
*
शाखा तोड़ी, तना काटकर
जड़ भी दी है खोद।
हरी-भरी भू मरुस्थली कर
बोनसाई ले गोद।
स्वार्थ साधता क्रूर दनुज सम
मानव बारम्बार।
पालन-पोसें वृक्ष
उन्हीं को क्यों
काटें? धिक्कार।
*
ताप बढ़ा, बरसात घट रही
सूखे नदी-सरोवर।
गलती पर गलती, फिर गलती
करता मानव जोकर।
दण्ड दे रही कुदरत क्रोधित
सम्हलो करो सुधार।
पालें-पोसें वृक्ष
उन्हीं को हम
काटें? धिक्कार।
*

गीत

गीत 
*
इतना बड़ा हमारा देश
नहीं बड़प्पन हममें शेष। 
*
पैर तले से भूमि छिन गयी
हाथों में आकाश नहीं।
किसे दोष दूँ?, कौन कर रहा
मेरा सत्यानाश नहीं।
मानव-हाथ छ्ल जाकर नित
नोच रहा हूँ अपने केश।
इतना बड़ा हमारा देश
नहीं बड़प्पन हममें शेष।
*
छाँह, फूल.पत्ते,लकड़ी ले
कभी नहीं आभार किया।
जड़ें खोद, मेरे जीवन का
स्वार्थ हेतु व्यापार किया।
मुझको जीने नहीं दिया, खुद
मानव भी कर सका न ऐश।
इतना बड़ा हमारा देश
नहीं बड़प्पन हममें शेष।
*
मेरे आँसू की अनदेखी
करी काटकर बोटी-बोटी।
निष्ठुर-निर्मम दानव बनकर
मुझे जलाकर सेंकी रोटी।
कोेेई नहीं अदालत जिसमें
करून वृक्ष मैं, अर्जी पेश
इतना बड़ा हमारा देश
नहीं बड़प्पन हममें शेष
*

गीत : तुम

गीत सलिला:
तुमको देखा 
तो मरुथल मन 
हरा हो गया। 
*
चंचल चितवन मृगया करती
मीठी वाणी थकन मिटाती।
रूप माधुरी मन ललचाकर -
संतों से वैराग छुड़ाती।
खोटा सिक्का
दरस-परस पा
खरा हो गया।
तुमको देखा
तो मरुथल मन
हरा हो गया।
*
उषा गाल पर, माथे सूरज
अधर कमल-दल, रद मणि-मुक्ता।
चिबुक चंदनी, व्याल केश-लट
शारद-रमा-उमा संयुक्ता।
ध्यान किया तो
रीता मन-घट
भरा हो गया।
तुमको देखा
तो मरुथल मन
हरा हो गया।
*
सदा सुहागन, तुलसी चौरा
बिना तुम्हारे आँगन सूना।
तुम जितना हो मुझे सुमिरतीं
तुम्हें सुमिरता है मन दूना।
साथ तुम्हारे गगन
हुआ मन, दूर हुईं तो
धरा हो गया।
तुमको देखा
तो मरुथल मन
हरा हो गया।
*
तक्षशिला इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंजीनियरिंग एन्ड टेक्नोलॉजी
जबलपुर, २६.५.२०१६

गीत

गीत  
*
सभ्य-श्रेष्ठ 
खुद को कहता नर 
करता अत्याचार। 
पालन-पोसें वृक्ष
उन्हीं को क्यों
काटे? धिक्कार।
*
बोये बीज, लगाईं कलमें
पानी सींच बढ़ाया।
पत्ते, काली, पुष्प, फल पाकर
मनुज अधिक ललचाया।
सोने के
अंडे पाने
मुर्गी को डाला मार।
पालन-पोसें वृक्ष
उन्हीं को नित
काटें? धिक्कार।
*
शाखा तोड़ी, तना काटकर
जड़ भी दी है खोद।
हरी-भरी भू मरुस्थली कर
बोनसाई ले गोद।
स्वार्थ साधता क्रूर दनुज सम
मानव बारम्बार।
पालन-पोसें वृक्ष
उन्हीं को क्यों
काटें? धिक्कार।
*
ताप बढ़ा, बरसात घट रही
सूखे नदी-सरोवर।
गलती पर गलती, फिर गलती
करता मानव जोकर।
दण्ड दे रही कुदरत क्रोधित
सम्हलो करो सुधार।
पालें-पोसें वृक्ष
उन्हीं को हम
काटें? धिक्कार।
*

शुक्रवार, 24 मई 2019

गीत

एक रचना
*
अधर पर मुस्कान १०
नयनों में निमंत्रण, ११
हाथ में हैं पुष्प, १०
मन में शूल चुभते, ११
बढ़ गए पेट्रोल के फिर भाव, १७
जीवन हुआ दूभर। ११
*
ओ अमित शाही इरादों! १४
ओ जुमलिया जूठ-वादों! १४
लूटते हो चैन जन का १४
नीरवों के छिपे प्यादों! १४
जिस तरह भी हो न सत्ता १४
हाथ से जाए। ९
कुर्सियों में जान १०
संसाधन स्व-अर्पण, ११
बात में टकराव, १०
धमकी खुली देते, ११
धर्म का ले नाम, कर अलगाव, १७
खुद को थोप ऊपर। ११
बढ़ गए पेट्रोल के फिर भाव, १७
जीवन हुआ दूभर। ११
*
रक्तरंजित सरहदें क्यों? १४
खोलते हो मैकदे क्यों? १४
जीविका अवसर न बढ़ते १४
हौसलों को रोकते क्यों? १४
बात मन की, ध्वज न दल का १४
उतर-छिन जाए। ९
लिया मन में ठान १०
तोड़े आप दर्पण, ११
दे रहे हो घाव, १०
नफरत रोज सेते, ११
और की गलती गिनाकर मुक्त, १७
ज्यों संतुष्ट शूकर। ११
बढ़ गए पेट्रोल के फिर भाव, १७
जीवन हुआ दूभर। ११
*
२३-५-२०१८

​मुक्तिका

​मुक्तिका ​:
*
अंधे देख रहे हैं, गूंगे बोल रहे 
पोल​ उजालों की अँधियारे खोल रहे 
*
लोभतंत्र की जय-जयकार करेगा जो
निष्ठाओं का उसके निकट न मोल रहे
*
बाँध बनाती है संसद संयम के जो
नहीं देखती छिपे नींव में होल रहे ​
​*
हैं विपक्ष जो धरती को चौकोर कहें
सत्ता दल कह रहा अगर भू गोल रहे
*
कौन सियासत में नियमों की बात करे?
कुछ भी कहिए, पर बातों में झोल रहे
*

२४.५.२०१७ 

गीत

गीत:
संजीव 'सलिल'
*
*
तन-मन, जग-जीवन झुलसाता काला कूट धुआँ.
सच का शंकर हँस पी जाता, सारा झूट धुआँ....
आशा तरसी, आँखें बरसीं,
श्वासा करती जंग.
गायन कर गीतों का, पाती
हर पल नवल उमंग.
रागी अंतस ओढ़े चोला भगवा-जूट धुआँ.....
पंडित हुए प्रवीण, ढाई
आखर से अनजाने.
अर्थ-अनर्थ कर रहे
श्रोता सुनें- नहीं माने.
धर्म-मर्म पर रहा भरोसा, जाता छूट धुआँ.....
आस्था-निष्ठां की नीलामी
खुले आम होती.
बेगैरत हँसते हैं, गैरत
सुबह-शाम रोती.
अनजाने-अनचाहे जाता धीरज टूट धुआँ...
************

काव्यानुवाद बीनू भटनागर

अंग्रेजी-हिंदी सेतु
इंगलिश की यादगार कविताओं का हिन्दी में अनुवादकी श्रंखला में पहला अुनुवाद
काव्यानुवाद बीनू भटनागर 
A Dream Within A Dream
by Edgar Allan Poe
Take this kiss upon the brow!
And, in parting from you now,
Thus much let me avow--
You are not wrong, who deem
That my days have been a dream;
Yet if hope has flown away
In a night, or in a day,
In a vision, or in none,
Is it therefore the less gone?
All that we see or seem
Is but a dream within a dream.
I stand amid the roar
Of a surf-tormented shore,
And I hold within my hand
Grains of the golden sand--
How few! yet how they creep
Through my fingers to the deep,
While I weep--while I weep!
O God! can I not grasp
Them with a tighter clasp?
O God! can I not save
One from the pitiless wave?
Is all that we see or seem
But a dream within a dream?
स्वप्न में स्वप्न
अनुवाद-बीनू भटनागर
तुम्हारा माथा चूमकर
मैं विदा ले रहा हूँ,
इसलिये खुलकर कहूँगा कि
तुम ग़लत नहीं थी,जो सोचती थीं,
मेरे दिन ,दिवास्प्न हैं, स्वपन!
दिन हो या रात
आशायें धूमिल हो चुकी हैं
जो सोचा नहीं था, जो था ही नहीं
इसलिये बहुत खोया भी नहीं?
जो हम देखते हैं
या महसूस करते हैं वहतो बस
स्वप्न में स्वप्न है।
मैं लहरों के शोर में खड़ा हूँ
संतप्त सागर के तट पर
रेत के कण हाथ में लेता हूँ
इतने कम हैं
फिरभी फिसल रहे हैं
मेरी उंगलियां गहराई में हैं
मैं रोता हूँ, बहुत रोता हूँ
हे प्रभु! क्या मैं इन्हे पकड़े रह सकता हूँ।
क्या मुट्ठी में बाँध सकता हूँ
हे प्रभु!क्या मैं इन्हे निर्दयी लहरों से बचा सकता हूँ।
यही मैं देखता रहता हूँ।
सपनो में सपने...,
स्वप्न मे स्वप्न

मुक्तिका

मुक्तिका 
*
बँधी नीलाकाश में 
मुक्तता भी पाश में 
.
प्रस्फुटित संभावना
अगिन केवल 'काश' में
.
समय का अवमूल्यन
हो रहा है ताश में
.
अचेतन है ज़िंदगी
शेष जीवन लाश में
.
दिख रहे निर्माण के
चिन्ह व्यापक नाश में
.
मुखौटों की कुंडली
मिली पर्दाफाश में
.
कला का अस्तित्व है
निहित संगतराश में
***
[बारह मात्रिक आदित्य जातीय छन्द}
११.५.२०१६, ६.४५
सी २५६ आवास-विकास, हरदोई

दोहा

दोहा सलिला 

लहर-लहर लहर रहे, नागिन जैसे केश। 
कटि-नितम्ब से होड़ ले, थकित न होते लेश।।
*
वक्र भृकुटि ने कर दिए, खड़े भीत के केश।
नयन मिलाये रह सके, साहस रहा न शेष।।
*
मनुज-भाल पर स्वेद सम, केश सजाये फूल।
लट षोडशी कुमारिका, रूप निहारे फूल।।
*
मदिर मोगरा गंध पा, केश हुए मगरूर।
जुड़े ने मर्याद में, बाँधा झपट हुज़ूर।।
*
केश-प्रभा ने जब किया, अनुपम रूप-सिंगार।
कैद केश-कारा हुए, विनत सजन बलिहार।।
*
पलक झपक अलसा रही, बिखर गये हैं केश।
रजनी-गाथा अनकही, कहतीं लटें हमेश।।
*
केश-पाश में जो बँधा, उसे न भाती मुक्ति।
केशवती को पा सकें, अधर खोजते युक्ति।।
*
'सलिल' बाल बाँका न हो, रोज गूँथिये बाल।
किन्तु निकालें मत कभी, आप बाल की खाल।।
*
बाल खड़े हो जाएँ तो, झुका लीजिए शीश।
रुष्ट रूप से भीत ही, रहते भूप-मनीष।।
***

24-5-2016 

साक्षात्कार आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' से- ओमप्रकाश प्रजापति

साक्षात्कार के प्रश्न
 (१)    आप साहित्य की इस दुनिया में कैसे आए? कब से आए? क्या परिवार में कोई और सदस्य भी साहित्य सेवा से जुड़ा रहा है?
मैं बौद्धिक संपदा संपन्न कायस्थ परिवार में जन्मा हूँ। शैशव से ही माँ की लोरी के रूप में साहित्य मेरे व्यक्तित्व का अंश बना गया। पिताश्री स्व. राजबहादुर वर्मा, कारापाल (जेलर) के पद पर नियुक्त थे। बंगला ड्यूटी पर आनेवाले सिपाही और कैदी अलग-अलग प्रदेशों के ग्रामीण अंचल से होते थे। उनसे मुझे लोक भाषाओँ और लोक साहित्य निरंतर सुनने को मिलता था। अधिकारियों और विद्वज्जनों का आना-जाना लगा रहता था। उनसे हिंदी और अंगरेजी का शब्द ज्ञान होता गया। बचपन से तुकबंदी के रूप में काव्य सृजन आरम्भ हुआ। मेरी मातुश्री स्व. शांति देवी स्वयं भजन रचती-गाती थीं। अग्रजा आशा वर्मा हिंदी सहती की गंभीर अध्येता रहीं। उनहोंने प्राथमिक शालाओं में मेरे लिए व्याख्यान लिखे, कवितायेँ बोलना सिखाईं, जबकि वे स्वयं उच्चतर माध्यमिक विद्यालय की श्रेष्ठ वक्ता थीं। माध्यमिक शाला में मुझे अग्रजवत सुरेश उपाध्याय जी गुरु के रूप में मिले। मुझे अपने जन्म दिन का प्रथम स्मरणीय उपहार उन्हें से मिला वह था पराग, नंदन और चम्पक पत्रिका के रूप में। तब मैं सेठ नन्हेलाल घासीराम उ. मा. विद्यालय होशंगाबाद में ७ वीं का छात्र था। मुझे अपने से वरिष्ठ छात्र राधेश्याम साकल्ले ने एक पुस्तक 'हिमालय के वीर' स्वाधीनता दिवस पर व्याख्यान प्रतियोगिता में पुरस्कारवत दी। यह १९६२ के भारत-चीन युद्ध के शहीदों की जीवनियाँ हैं जिन्हें श्यामलाल 'मधुप 'ने लिखा है। इस तरह साहित्यांगन में मेरा प्रवेश हुआ।  
(२)    आपको कब महसूस हुआ कि आपके भीतर कोई रचनाकार है?
सच कहूँ तो रचनाकर्म करते समय 'रचनाकार' जैसा गुरु गंभीर शब्द ही मुझे ज्ञात नहीं था। मेरे एक बाल मित्र रहे अनिल धूपर। वे सिविल सर्जन स्व. हीरालाल धूपर के चिरंजीव थे। विद्यालय के निकट ही जिला चिकित्सालय था। हमारा दोपहर का भोजन एक साथ ही आता था और हम दोपहर को रोज साथ में भोजन करते थे। वह अंगरेजी में मेरी मदद करता था मैं गणित में उसकी। एक दिन कक्षा में किसी शरारत पर उसे एक चपत पड़ी। तब मेरे मुँह से अनायास निकला 
'सुन मेरे भाई / तूने ऊधम मचाई / तेरी हो गयी पिटाई / सुर्रू सर ने तुझे एक चपत लगाई' कर उसे एक और चपत जमाकर मैं भाग लिया। 
(३)    हर रचनाकार का कोई-न-कोई आदर्श होता है जिससे कि वह लिखने की प्रेरणा लेता है। आपका भी कोई आदर्श ज़रूर रहा होगा। आप का आदर्श कौन रहा है? और क्यों रहा है? क्या अब भी आप उसे अपना आदर्श मानते हैं या समय के बहाव के साथ आदर्श प्रतीकों में बदलाव आया है?
सुरेश उपाध्याय जी धर्मयुग में सहसंपादक होकर चले गए तो श्री सुरेंद्र कुमार मेहता ने मुझे पढ़ाया। वे भी सुकवि थे। मैं अपनी बड़ी बहिनों की हिंदी की किताबें पढ़ता रहता था। पिताजी भी साहित्य प्रेमी थे। उनके में कई सामाजिक पुस्तकें थीं, माँ के पास धार्मिक साहित्य था। हमें पाठ्यक्रम पढ़ने को कहा जाता। ये पुस्तकें हमें नहीं दी जाती थीं कि फाड़ दोगे। मैं लुक-छिपकर पढ़ा लेता था। कल्याण, धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, सारिका, दिनमान, कादम्बिनी, नवनीत, हिंदी डाइजेस्ट और माधुरी मेरी प्रिय पत्रिकाएँ थीं। इनके कई वर्षों के अंक आज भी जिल्द कराए हुए मेरे संकलन में हैं। महादेवी, सुभद्रा, निराला, माखनलाल, मैथिली शरण जी, पंत जी, बच्चन जी, दिनकर जी, गुरुदेव रवीन्द्रनाथ, बंकिम चंद्र, शरत चंद्र, बिमल मित्र, प्रेमचंद्र, शिवानी, यशपाल, अमृतलाल नागर जी, भगवतीचरण वर्मा, शिव वर्मा, वैशम्पायन, श्रीकृष्ण 'सरल', देवेंद्र सत्यार्थी, रेणु, हरिशंकर परसाई, इलाचंद्र जोशी, डॉ. रामकुमार वर्मा,  जवाहर लाल नेहरू, गाँधी जी, सरदार पटेल, लेनिन, गोर्की, पुश्किन, चेखव, सावरकर, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, विनोबा भावे, ओशो, नीरज, फैज़, साहिर, अर्श, नियाज़, डॉ. राम विलास शर्मा, डॉ. नागेंद्र, डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी, धर्मवीर भारती जी, राजेंद्र यादव, मन्नू भंडारी, नागार्जुन, त्रिलोचन, शंकर, अनंत गोपाल शेवडेकर, शिवाजी सावंत, अम्बिका प्रसाद दिव्य, काका हाथरसी, ओमप्रकाश शर्मा, कर्नल रंजीत, स्वेड मार्टिन, कुशवाहा कांत, गुलशन नंदा, गुरुदत्त, नरेंद्र कोहली, रामकुमार भ्रमर, चंद्रसेन विराट,  आदि आदि को कई बरसों खूब पढ़ा। आदर्श तो तब से अब तक तुलसीदास ही हैं।  
(४)    आज के रचनाकारों की पीढ़ी में आप के आदर्श कौन हैं?
 मुझे स्व. भगवती प्रसाद देवपुरा से निरंतर कर्मरत रहने की प्रेरणा मिलती रही है। डॉ. किशोर काबरा, डॉ. चित्रा चतुर्वेदी, डॉ. इला घोष, डॉ. सुमन श्रीवास्तव, पूर्णिमा बर्मन, निर्मल शुक्ल, अशोक जमनानी आदि का सृजन मन भाता है। 
(५)    लेखन को आप स्वांतः-सुखाय कृत्य मानते हैं या सामाजिक परिवर्तन का माध्यम मानते हैं?
लेखन निरुद्देश्य हो तो विलासिता के अलावा कुछ नहीं है किन्तु वैचारिक प्रतिबद्धता लेखक को गुलाम बना देती है। लेखन एक सारस्वत साधना है जो मानसिक-आत्मिक विकास का करक होती है, सामाजिक प्रभाव तो उसका उप उत्पाद है। 
(६)    जनमानस को प्रभावित करने के लिए आप साहित्य की किस विधा को ज्यादा सशक्त मानते हैं? गद्य को या पद्य को?
जनमानस विधा से नहीं कथ्य और शिल्प से प्रभावित होता है। कथा हो या कविता दोनों के पाठक और श्रोता हर काल में खूब रहे हैं। प्रवचन हों या कवि सम्मेलन दोनों में भीड़ जुटती है। बोझिल विचारपरकता को जनगण नकार देता है।  
(७)    आज जो आपकी पहचान बन रही है उसमें आप एक छांदस रचनाकार के रूप में उभर रहे हैं। गीतमुक्तकग़ज़ल आप लिख रहे हैं। क्या आपने छंदमुक्त कविताएं भी लिखी हैं? अगर नहीं तो क्यों? क्या आप इस शैली को कम प्रभावी मानते हैं? या छंदमुक्त लिखने में आप अपने को असहज महसूस करते हैं?
मैं कुछ कहने के लिए लिखता हूँ। विचार ही न हो तो क्यों लिखा जाए? कथ्य अपना माध्यम खुद चुन लेता है। गद्य हो या पद्य, छांदस हो या अछांदस, लघुकथा हो या कहानी, लेख हो या निबंध यह पूर्व निर्धारित तभी होता है जब उस विधा की रचना या उस विषय की रचना भेजना हो। मैंने मुक्त छंद की कवितायेँ खूब लिखी हैं। दो कविता संकलन लोकतंत्र का मकबरा व मीत मेरे चर्चित भी हुए हैं। एक कविता का आनंद लें-
कौन कहता है 
कि चीता मर गया है?
हिंस्र वृत्ति 
जहाँ देखो बढ़ रही है,
धूर्तता 
किस्से नए नित गढ़ रही है। 
शक्ति के नाखून पैने 
चोट असहायों पे करते,
स्वाद लेकर रक्त पीते 
मारकर औरों को जीते। 
और तुम...?
और तुम कहते हो- 
'चीता मर गया है।'
नहीं वह तो आदमी की
खाल में कर घर गया है। 
कौन कहता है कि 
चीता मर गया है।  


(९)    क्या आप भी यह मानते हैं कि गीत विदा हो रहा है और ग़ज़ल तेज़ी से आगे आ रही है? क्या इसका कारण ग़ज़ल का अधिक संप्रेषणीय होना है? या फिर कोई और कारण आप समझते हैं?
गीत अमर है। गीत के मरने की घोषणा प्रगतिवादियों ने की, घोषणा करने वाले मर गए, गीत फल-फूल रहा है। ग़ज़ल गीत का ही एक प्रकार है। भारतीयों की मानसिकता अभी ेभी  स्वतंत्र चेता नहीं हो सकी है। सिन्दूर पुता पाषाण हो, अधिकारहीन पूर्व राजा हों या कोई अल्पज्ञ पुजारी हमें पैर छूने में एक क्षण नहीं लगता, भले ही घर में माता-पिता को सम्मान न दें। उर्दू और अंग्रेजी हमारे पूर्व मालिकों की भाषाएँ रही हैं। इसलिए उनके प्रति अंध मोह हैं। ग़ज़ल के तत्वों और विधान को जाने बिना, उसमें महारत पाए बिना तथाकथित गज़लकार कागज़ काले करते रहते हैं। जानकार ऐसी ग़ज़लों को ग़ज़ल ही नहीं मानते। गीतकार गीत को समझकर लिखता है इसलिए गीत के श्रोता और पाठक न घटे हैं, न घटेंगे।   
(९)    हिंदी के रचनाकार ग़ज़ल खूब लिख रहे हैं। उर्दू के शायर ग़ज़ल खूब कह रहे हैं। क्या यह सोच और नज़रिए का फर्क़ है? क्या आप हिंदी और उर्दू ग़ज़ल को अलग-अलग देखने के हामी है? अगर हाँ तो क्यों?
संस्कृत और अपभ्रंश साहित्य से मुक्तक काव्य परंपरा हिंदी ने ग्रहण की है। मुक्तक में सभी पंक्तियाँ समान पदभार की होती है। पहली, दूसरी तथा चौथी पंक्ति का तुकांत-पदांत समान रखा जाता है जबकि तीसरी पंक्ति का भिन्न। तीसरी चौथी पंक्ति की तरह पंक्तियाँ बढ़ाने से मुक्तिका (हिंदी ग़ज़ल) की रचना हो जाती है। यह शिल्प भारत से फारस में गया और उसे ग़ज़ल नाम मिला। संस्कृत छंदों के 'गण' यत्किंचित परिवर्तन कर 'रुक्न' बन दिए गए। आदिकवि वाल्मीकि और क्रौंच वध प्रसंग में नर क्रौंच के मारे जाने पर मादा क्रौंच के आर्तनाद की करुण कथा की नकल मृग-शिशु को शिकारी के तीर से मारे जाने पर मृगी के आर्तनाद का किस्सा गढ़कर की गई। 'गज़ाला चश्म' अर्थात मृगनयना रूपसियों से प्रेम वार्ता 'गज़ल' का अर्थ है। ग़ज़ल फ़ारसी की विधा है जो उर्दू ने ग्रहण की है। ग़ज़ल के विधान और व्याकरण फ़ारसी से आते हैं। फारसी जाने बिना ग़ज़ल 'कहना' बिना नींव का भवन खड़ा करने की तरह है। उर्दू एक भाषा नहीं, कुछ भाषाओँ से  लिये गए शब्दों का संकलन मात्रा है। उर्दू शब्द कोष में कोई शब्द उर्दू का नहीं है, हर शब्द किसी दूसरी भाषा से लिया गया है।  हम जानते हैं कि भाषा और छंद का जन्म लोक में होता है। वाचिक परंपरा में गद्य और पद्य 'कहा' जाता है। मानव संस्कृति के विकास के साथ कागल, कलम और लिपि का विकास होने पर हिंदी में साहित्य गद्य हो या पद्य 'लिखा' जाने लगा। उर्दू में मौलिक चिंतन परंपरा न होने से वह अब भी 'कहने' की स्थिति में अटकी हुई है और 'जज़ल कही जा रहे है जबकि सच यही है की हर शायर कागज़-कलम से लिखता है, दुरुस्त करता है। 'लिखना' और 'कहना' किसी सोच और नज़रिए नहीं विकास और जड़ता के परिचायक हैं। 
हिंदी अपभ्रंश और संस्कृत से विरासत ग्रहण करती है, उर्दू फारसी से। फारसी स्वयं संस्कृत से ग्रहण करती है। जिस तरह एक माटी से उपजने पर भी दो भिन्न जाति के वृक्ष भिन्न होते हैं वैसे ही, एक मूल से होने के बाद भी फ़ारसी और हिंदी भिन्न-भिन्न हैं। दोनों की वर्णमाला, उच्चार व्यवस्था और व्याकरण भिन्न है। हिंदी वर्ण वर्ग की पंचम ध्वनि फ़ारसी में नहीं है। इसलिए फारसी में 'ब्राम्हण' को 'बिरहमन' लिखना-बोलना होता है जी हिंदी व्याकरण की दृष्टि से गलत है। फारसी की 'हे और 'हम्जा'  दो ध्वनियों के लिए हिंदी में एकमात्र ध्वनि 'ह' है। हिंदी का कवि 'ह' को लेकर पदांत-तुकांत बनाये तो हिंदी व्याकरण की दृष्टि से सही है पर 'हे' और 'हम्जा' होने पर उर्दूवाला गलत कहेगा। पदभार गणना पद्धति भी हिंदी और फारसी में भिन्न-भिन्न हैं। हिंदी में वर्ण के पूर्ण उच्चार के अनुसार पदभार होता है। उर्दू में लय प्रधानता के कारण मात्रा गिराने-बढ़ाने का रिवाज है जो हिंदी में नहीं है। इसलिए हिंदी ग़ज़ल या मुक्तिका उर्दू ग़ज़ल से कई मायनों में भिन्न है। उर्दू ग़ज़ल इश्किया शायरी है, हिंदी ग़ज़ल सामाजिक परिवर्तन की साक्षी है। भारतीय प्रभाव को ग्रहण कर उर्दू ग़ज़ल ने भी कथ्य को बदला है पर लिपि और व्याकरण-पिंगल के मामले में वह परिवर्तन को पचा नहीं पाती। यह भी एक सच है कि उर्दू शायरों की लोकप्रियता और आय दोनों हिंदी की डैम पर है। सिर्फ उर्दू लिपि में छपें तो दिन में तारे नज़र आ जाएँ। हिंदी के बल पर जिन्दा रहने के बाद भी हिंदी के व्याकरण के अनुसार लिखित ग़ज़ल को गलत कहने की हिमाकत गलत है। 
(१०) आज लोग लेखन से इसलिए जुड़ रहे हैं क्योंकि यह एक प्रभावी विजिटिंग कार्ड की तरह काम आ जाता है और यशपुरस्कार विदेश यात्राओं के तमाम अवसर उसे इसके जरिए सहज उपलब्ध होने लगते हैं।
आज ही नहीं आदि से लेखन और कला को तपस्या और मन-रंजन माननेवाले दो तरह के रचनाकार रहे हैं। साहित्यकार को सम्मान नहीं मिलता। विचारधारा विशेष के प्रति प्रतिबद्ध साहित्यकार अपनी वैचारिक गुलामी के लिए सम्मानित किये जाते हैं तो धनदाता साहित्यकार सम्मान खरीदता है। सम्मान के लिए आवेदन करना ही साहित्यकार को प्रार्थी बना देता है। मैं न तो सम्मान के लिए धन देने के पक्ष में हूँ, न आवेदन करने के। सम्मान के लिए संपर्क किये जाने पर मेरा पहला प्रश्न यही होता है कि सम्मान क्यों करना चाहते हैं? यदि मेरे लिखे को पढ़ने के बाद सम्मान करें तो ही स्वीकारता हूँ। जिसने मुझे पढ़ा ही नहीं, मेरे काम को जनता ही नहीं वह सम्मान के नाम पर अपमान ही है। 
आजकल साहित्यकार लेखन को समय बिताने का माध्यम मान रहा है। बच्चों को धंधा सौंप चुके या सेवानिवृत्त हो चुके लोग, घर के दायित्व से बचनेवाली या बहुओं के आ जाने से अप्रासंगिक हो चुकी महिलायें जिन्हें धनाभाव नहीं है, बड़ी संख्या में लेखन में प्रवेश कर सम्मान हेतु लालायित रहती हैं। वे पैसे देकर प्रकाशित व सम्मानित होती हैं। उनका रचा साहित्य प्राय: सतही होता है पर महिला होने के नाते मुखपोथी (फेसबुक) आदि पर खूब सराहा जाता है। यह भी सत्य है कि अनेक गंभीर श्रेष्ठ महिला रचनाकार भी हैं।
(११) कविसम्मेलनों के मंच पर तो लोग धन कमाने के लिए ही आते हैं। और वही उनकी आजन्म प्राथमिकता बनी रहती है। आज के संदर्भ में कविसम्मेलनों को आप कितना प्रासंगिक मानते हैं? और क्यों?
जब 'सादा जीवन उच्च विचार' के आदर्श को हटाकर समाज विशेषकर बच्चों, किशोरों, तरुणों हुए युवाओं के सम्मुख 'मौज. मजा और मस्ती' को आदर्श के रूप में स्थापित कर दिया जाए तो कला बिकाऊ हो ही जाएगी। कवि सम्मलेन में गलाबाजी या अदायगी का चलन पहले भी था किंतु प्रबुद्ध श्रोता देवराज दिनेश, शेरजंग गर्ग, शमशेर बहादुर सिंह आदि से गंभीर रचनाएँ भी सुनते थे। आजकल फूहड़ता हुए भौंडापन कविसम्मेलनों पर हावी है। 
कवि सम्मेलन सामाजिक परिवर्तन का बहुत प्रभावी अस्त्र है। सामाजिक समरसता, सहिष्णुता, समन्वय, सामंजस्य, शासकीय योजनाओं के प्रचार-प्रसार आदि के लिए दूरदर्शनी और अखबारी विज्ञापन के स्थान पर कविसम्मेलन का सहारा लिया जाए तो सकारात्मक परिणाम मिलेंगे।  
(१२) आज कागज़ के कवि और मंच के कवि दो अलग-अलग वर्ग में बँट गए हैं। क्या आप इस वर्गीकरण को उचित मानते हैं?
ऐसा वर्गीकरण कहा भले ही जाए किन्तु किया नहीं जा सकता। कवि सम्मेलन के आयोजक दलाल हो गए हैं। उन्हें स्तर से नहीं, कमाई से मतलब है। गुटबाजी हावी है। प्राय: कवि भाषा के व्याकरण और छंद के पिंगल से अनभिज्ञ हैं। यह समाज और साहित्य दोनों का दुर्भाग्य है कि सरस्वती पर लक्ष्मी हावी है। 
(१३) राजनैतिक दृष्टि से भी वाम और दक्षिण लेखकों-रचनाकारों के दो धड़े बन गए हैं। जिनमें कभी सहमति नहीं बनती क्या साहित्य के लिए यह उचित है?
साहित्य को उन्मुक्त और स्वतंत्र होना चाहिए। वैचारिक प्रतिबद्धता राजनीतिक पराधीनता के अलावा कुछ नहीं है। वाम और दक्षिण तो पाखण्ड और मुखौटा है। क्या किसी प्रगतिवादी साहित्यकार को मैथिलीशरण पुरस्कार लेने से मन करते देखा है? क्या कोई दक्षिणपंथी रचनाकर मुक्तिबोध पुरस्कार लेने से परहेज करता है? 
साहित्य को अपने विषय, विधा और कथ्य के साथ न्याय करना चाहिए। कोई रचनाकार घनश्यामदास बिड़ला और लेनिन, गाँधी और सुभाष, दीवाली और ईद परस्पर विरोधी विषयों पर महाकाव्य या उपन्यास क्यों न लिखे? मैंने भजन, हम्द और प्रेयर तीनों लिखे हैं। मेरे पुस्तकालय में सेठ गोविंददास, सावरकर, लोहिया और कामरेड शिवदास घोष एक साथ रहते हैं। ऐसे विभाजन अपने-अपने स्वार्थ साधने के लिए ही किये जाते हैं। 
(१४) लेखन के लिए पुरस्कार की क्या उपयोगिता है? आजकल अचीन्हें लोग गुमनाम लोगों को पुरस्कार देते रहते हैं इससे किसका भला होता है?रचनाकार का या पुरस्कार देनेवाले का? क्या यह लेखक में गलतफहमियाँ नहीं पैदा कर देता?
अर्थशास्त्र का नियम है कि बाजार माँग और पूर्ति के नियमों से संचालित होता है। अँधा बाँटे रेवड़ी चीन्ह-चीन्ह कर देय। जब तक सुधी और समझदार संस्थाएँ और लोग सही साहित्यकार और रचना का चयन कर प्रकाशित-सम्मानित नहीं करते तब तक अवसरवादी हावी रहेंगे।  
(१५) सरकारों द्वारा साहित्य के प्रकाशन और पुरस्कार दिए जाने के संबंध में आपके क्या विचार है?
सरकार जनगण के प्रतिनिधियों से बनती और जनता द्वारा कर के रूप में दिए गए धन से संचालित होती हैं। समाज में श्रेष्ठ मूल्यों का विकास और सच्चरित्र नागरिकों के लिए उपादेय साहित्य का प्रकाशन और पुरस्करण सरकार करे यह सिद्धांतत: ठीक है किन्तु  व्यवहार में सरकारें निष्पक्ष न होकर दलीय आचरण कर अपने लोगों को पुरस्कृत करती हैं। अकादमियों की भी यही दशा है।  विश्वविद्यालय तक नेताओं और अधिकारियों को पालने  का जरिया बन गए हैं। इन्हें स्वतंत्र और प्रशासनिक-राजनैतिक प्रतिबद्धता से मुक्त किया जा सके तो बेहतर परिणाम दिखेंगे। लोकतंत्र में कुछ कार्य लोक को  चाहिए। मैं और आप भी लोक हैं। हम और आप क्यों न एक साहित्य को हर साल व्यक्तिगत संसाधनों से पुरस्कृत करें? 
(१६ )आपकी अभी तक कितनी कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं? और किन-किन विधाओं में? आप अपने को मूलतः क्या मानते हैं-गीतकार या ग़ज़लकार
मेरी १० पुस्तकें प्रकाशित हैं- १. कलम के देव भक्ति गीत संग्रह, २. लोकतंत्र का मक़बरा लंबी कवितायेँ, ३. मीत मेरे छोटी कवितायेँ, ४. काल है संक्रांति का गीत-नवगीत संग्रह, ५. सड़क पर गीत-नवगीत संग्रह, ६.जंगल में जनतंत्र लघुकथाएँ, ७. दिव्य गृह काव्यनुवादित खंड काव्य, सहलेखन ८. सौरभ:, ९. कुरुक्षेत्र गाथा खंड काव्य तथा १०. भूकंप के साथ जीना सीखें -लोकोपयोगी तकनीक। ४ पुस्तकें यंत्रस्थ हैं। 
मैंने हिंदी गद्य व् पद्य की लगभग सभी प्रमुख विधाओं में लेखन किया है। नाटक, उपन्यास तथा महाकाव्य पर काम करना शेष है। 
मैं मूलत: खुद को विद्यार्थी मानता हूँ।  नित्य प्रति पढ़ता-लिखता-सीखता हूँ। 
(१७) आप अभियंता हैं। क्या अपने व्यवसाय से जुड़ा लेखन भी अपने किया है? 
हाँ, मैं विभागीय यांत्रिकी कार्य प्राक्कलन बनाना, मापन-मूल्यांकन करना आदि १९७३ से हिंदी में करता रहा हूँ और इसके लिए तिरस्कार, उपेक्षा और धनद भी भोगा है। मैंने २५ तकनीकी लेख लिखे हैं जो प्रकाशित भी हुए हैं। 'वैश्वीकरण के निकष पर भारतीय यांत्रिकी संरचनाएं' शीर्षक लेख को इंस्टीयूषन ऑफ़ इंजीनियर्स कोलकाता द्वारा २०१८ में राष्ट्रीय स्तर पर द्वितीय श्रेष्ठ आलेख का पुरस्कार महामहिम राष्ट्रपति जी के करकमलों से प्राप्त हुआ। मैंने अभियांत्रिकी विषयों को हिंदी माध्यम से पढ़ाया भी है। मैंने अभियांत्रिकी पत्रिकाओं व् स्मारिकाओं का हिंदी में संपादन भी किया है।  
(१८) आप संपादन कार्य से कब और कैसे जुड़े? संपादन के क्षेत्र में क्या-क्या कार्य किया? 
जब मैं शालेय छात्र था तभी गुरुवर सुरेश उपाध्याय जी धर्मयुग में उपसंपादक होकर गए तो यह विचार मन में पैठ गया कि संपादन एक श्रेष्ठ कार्य है। पारिवारिक दायित्वों के निर्वहन हेतु १९७२ में डिप्लोमा सिविल इंजीनियरिंग करने के बाद मैं फरवरी १९७३ में मध्य प्रदेश लोक निर्माण विभाग में उप अभियंता हो गया किन्तु आगे पढ़ने और बढ़ने का मन था। नौकरी करते हुए मैंने  १९७४ में विशारद, १९७६ में बी. ए., १९७८ में एम. ए. अर्थशास्त्र, १९८८० में विधि-स्नातक, १९८१ में स्नातकोत्तर डिप्लोमा पत्रकारिता, १९८३ में एम. ए. दर्शन शास्त्र, १९८५ में बी.ई. की परीक्षाएं उत्तीर्ण कीं। १९८० से १९९५ तक सामाजिक पत्रिका चित्रशीष,  १९८२ से १९८७ तक मुझे मध्य प्रदेश डिप्लोमा इंजीनियर्स संघ की मासिक पत्रिका, १९८६ से १९९० तक तकनीकी पत्रिका यांत्रिकी समय, १९९६ से १९९८ तक इंजीनियर्स टाइम्स, १९८८ से १९९० तक अखिल भारतीय डिप्लोमा इंजीनियर्स जर्नल तथा २००२ से २००८ तक साहित्यिक पत्रिका नर्मदा का मानद संपादन मैंने किया है। इसके अतिरिक्त १९ स्मारिकाओं, १४ साहित्यिक पुस्तकों का संपादन किया है। 
(१९) आपने सिविल इंजीनियरिंग के साथ कुछ और तकनीकी कार्य भी किया है? 
हाँ, मैंने वास्तु शास्त्र का भी अध्ययन किया है। वर्ष २००२ में जबलपुर अखिल भारतीय वास्तुशास्त्र सम्मलेन की स्मारिका 'वास्तुदीप' का संपादन किया इसका विमोचन सरसंघचालक श्री कूप. श्री सुदर्शन जी, राज्यपाल मध्य प्रदेश भाई महावीर तथा महापौर जबलपुट विश्वनाथ दुबे जी ने किया था। अभियंता दिवस स्मारिकाओं, इंडियन जिओटेक्नीकल सोसायटी जबलपुर चैप्टर की स्मारिकाओं तथा इंस्टीट्यूशन ऑफ़ इंजीनियर्स की राष्ट्रीय तकनीकी हिंदी पत्रिका अभियंता बंधु का संपादन मैंने किया है। जटिल तकनीकी विषयों को हिंदी भाषा में सरलता पूर्वक प्रस्तुत करने के प्रति मैं सचेत रहा हूँ। 
(२०) आप अंतरजाल पर छंद लेखन की दिशा में भी सक्रिय रहे हैं। अभियंता होते हुए भी आप यह कार्य कैसे कर सके? 
वर्ष १९९४ में सड़क दुर्घटना के पश्चात् अस्थि शल्य क्रिया में डॉ. प्रमोद बाजपेई की असावधानी के कारण मुझे अपने बाएं पैर के कूल्हे का जोड़ निकलवा देना पड़ा। कई महीनों तक शैयाशायी रहने के पश्चात् चल सका। अभियंता के नाते मेरा कैरियर समापन की और था। निराशा के उस दौर में दर्शन शास्त्र की गुरु डॉ. छाया रॉय ने मनोबल बढ़ाया और मैंने कंप्यूटर एप्लिकेशन का प्रमाणपत्र पाठ्यक्रम किया। अंतरजाल तब नया-नया ही था। मैंने हिन्दयुग्म दिल्ली के पटल पर लगभग ३ वर्ष तक हिंदी छंद शिक्षण किया। तत्पश्चात साहित्य शिल्पी पर २ वर्ष तक ८० से अधिक अलंकारों की लेखमाला पूर्ण हुई। साहित्य शिल्पी पर छंद शिक्षण का कार्य किया। भारत और विदेशों में सैकड़ों साहित्य प्रेमियों ने छंद लेखन सीखा। छंद शास्त्र के अध्ययन से विदित हुआ की इस दिशा में शोध और नव लेखन का काम नहीं हुआ है। हिंदी के अधिकांश शिक्षा और प्राध्यापक अंग्रेजी प्रेमी और छंद विधान से अनभिज्ञ हैं। नई पीढ़ी को छंद ज्ञान मिला ही नहीं है। तब मैंने अंतरजाल पर दिव्यनर्मदा पत्रिका, ब्लॉग, ऑरकुट, मुखपोथी (फेसबुक), वाट्स ऐप समूह 'अभियान' आदि के माध्यम से साहित्य और पिङग्ल सीखने कक्रम आगे बढ़ाया। हिंदी में आज तक छंद कोष नहीं बना है। मैं लगभग ढाई दशक से इस कार्य में जुटा हूँ। पारम्परिक रूप से २० सवैये उपलब्ध हैं. मैं १८० सवैये बना चुका हूँ। छंद प्रभाकर में भानु जी ने ७१५ छंद दिए हैं। मेरा प्रयास छंद कोष में १५०० छंद देने का है। प्रभु चित्रगुप्त जी और माँ सरस्वती की कृपा से यह महत्कार्य २०२० में पूर्ण करने की योजना है।  
(२१) आप पर्यावरण सुधार के क्षेत्र में भी सक्रिय रहे हैं?
समन्वय तथा अभियान संस्था के माध्यम से हमने जबलपुर नगर में पौधारोपण, बाल शिक्षा, प्रौढ़ शिक्षा, महिला शिक्षा, कचरा निस्तारण, व्यर्थ पदार्थों के पुनरुपयोग, नर्मदा नदी शुद्धिकरण, जल संरक्षण आदि क्षेत्रों में यथासंभव योगदान किया है।  
(२२) आप अभियंता हैं। क्या आपका तकनीकी ज्ञान कभी समाज सेवा का माध्यम बना ?
शासकीय सेवा में रहते हुए लगभग ४ दशकों तक मैंने भवन, सड़क, सेतु आदि के निर्माण व् संधारण में योगदान किया है। जबलपुर में भूकंप आने पर पद्मश्री आनंद स्वरुप आर्य में मार्गदर्शन में भूकंपरोधी भवन निर्माण तथा क्षतिग्रस्त भवन की मरम्मत के कार्य में योगदान किया। निकट के गाँवों में जा-जाकर अपने संसाधनों से मैंने कच्चे मकानों और झोपड़ियों को लोहा-सीमेंट के बिना भूकंप से सुरक्षित बनाने की तकनीकी जानकारी ग्रामवासियों को दी। 'भूकंप  जीना सींखें' पुस्तिका की १००० प्रतियाँ गाँवों में निशुल्क वितरित की। मिस्त्री, बढ़ई आदि को मरम्मत की प्रविधियाँ समझाईं। नर्मदा घाट पर स्नानोपरांत महिलाओं के वस्त्र बदलने के लिए स्नानागार बनवाने, गरीब जनों को वनों और गाँवों में प्राप्त सामग्री का प्रयोग कर सुरक्षित मकान बनाने की तकनीक दी। झोपड़ी-झुग्गी वासियों को पॉलिथीन की खाली थैलियों और पुरानी साड़ियों, चादरों आदि को काटकर उसके पट्टियों को ऊन की तरह बुनकर उससे आसन, दरी, चटाई, परदा आदि बनाने की कला सीखने, गाजर घास और बेशरम जैसे खरपतवार को नष्ट कर चर्म रोगों से बचने का तरीक सीखने, तेरहीं भोज की कुप्रथा समाप्त करने, दहेज़ रहित आदर्श सामूहिक विवाह करने, पुस्तक मेला का आयोजन करने आदि-आदि अनेक कार्य मैंने समय-समय पर करता रहा हूँ।   
(२३)लेखन संबंधी आपकी भविष्य की क्या योजनाएं हैं?
हम विविध संस्थाओं के माध्यम से तकनीकी शिक्षा का माध्यम हिंदी बनवाने के लिए सक्रिय रहे हैं। इसमें कुछ सफलता मिली है, कुछ कार्य शेष है। इंस्टीट्यूशन ऑफ़ इंजीनियर्स प्रति वर्ष एक पत्रिका तकनीकी विषयों पर हिंदी में राष्ट्रीय स्टार पर निकाल रहा है। परीक्षा का मध्यान हिंदी भी हो गया है। शासकीय पॉलीटेक्निक में इंजीयरिंग का डिप्लोमा पाठ्यक्रम हिंदी में पढ़ाया जाने लगा है। बी.ई. तथा एम.बी.बी.एस. की पढ़ाई हिंदी में कराने का प्रयास है। इसमें आप का सहयोग भी चाहिए। हिंदी को विश्ववाणी बनाने की दिशा में यह कदम आवश्यक है। 
मैं अगले वर्ष दोहा, लघुकथा, हाइकू, मुक्तक, मुक्तिका, तहा गीत-नवगीत के संकलन प्रकाशित करने के विचार में हूँ। 
(२४)आज हिंदी भाषा बाजारवाद की चुनौतियों को झेल रही है। उसका रूप भी बदल रहा है। आप इसे विकृति मानते हैं या समय की जरूरत?
वसुधैव कुटुम्बकम और वैश्विक नीड़म की सनातन भारतीय मान्यता अब ग्लोबलाइजेशन हो गयी है। इसके दो पहलू हैं। हमें जिस देश में व्यापार करना है उसकी भाषा सीखनी होगी और जिस देश को भारत का बाजार चाहिए उसे हिंदी सीखना होगी। विदेशों में प्रति वर्ष २-३ विश्वविद्यालयों में हिंदी शिक्षण विभाग खुल रहे हैं। हमें अपने उन युवाओं को विदेश जाना चाहते हैं उनकी स्नातक शिक्षा के साथ उस देश की भाषा सिखाने की व्यवस्था करना चाहिए। इसी तरह जो विद्यार्थी विदेश से भारत में आते हैं उन्हें पहले हिंदी सिखाना चाहिए। 
(२५) समकालीन रचनाकारों में आप किन्हें महत्वपूर्ण मानते हैं?
हर रचनाकार जो समाज से जुड़कर समाज के लिए लिखता है, महत्वपूर्ण होता है। अगंभीर किस्म के जो रचनाकार हर विधा में टूटा-फूटा लिखकर, ले-देकर सम्मानित हो रहे हैं, वे ही भाषा और साहित्य की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार हैं। हालत यह है कि लिखने वाले कुकुरमुत्ते की तरह बढ़ रहे हैं, पढ़नेवालों का अकाल हो रहा है। 
(२६) पत्रकारिता और साहित्य में कभी घनिष्ठ संबंध रहा करता था। अच्छा साहित्यकार ही संपादक होता था। आज जो संपादक होता है लोग उसका नाम तक नहीं जानते। यह स्थिति क्यों आई?
पत्रकारिता अब सेवा या साधन नहीं पेशा हो गयी है। अब गणेश शंकर विद्यार्थी, माखनलाल चतुर्वेदी, रघुवीर सहाय, बांकेबिहारी भटनागर, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, कमलेश्वर, धर्मवीर भारती जैसे पत्रकार कहाँ हैं? अति व्यावसायिकता, राजनीति का अत्यधिक हस्तक्षेप तथा पत्रकारों में येन-केन-प्रकारेण धनार्जन की लालसा ही पत्रकारों की दुर्दशा का कारण है। अंतर्जालीय पत्रकारिता सनसनी और टीआरपी को सर्वस्व समझ रही है, पता-दर्शक का उसके लिए कोई महत्व नहीं है। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की यह दुर्दशा चिंतानीय है। जब तक समाज और देश की सेवा की भावना को लेकर कुछ छोटे-छोटे समूह पत्रकारिता को पवित्रता के साथ नहीं करेंगे सुधार नहीं होगा।   
(२७) लेखन के माध्यम से आप समाज को क्या संदेश देना चाहते हैं?
वर्तमान परिवेश में सबसे अधिक आवश्यक कार्य ईमानदारी और श्रम की प्रतिष्ठा करना है। सरकारें और पत्रकारिता अपनी विश्वसनीयता गँवा चुकी हैं। न्यायालय पर भी छींटे पड़े हैं। धार्मिक-सामाजिक क्षेत्र में या तो अंध विश्वास है या अविश्वास। सेना ही एकमात्र प्रतिष्ठान है जो अपेक्षाकृत रूप से कम संदेह में है। लेखन का एक ही उद्देश्य है समाज में विश्वास का दीपक जलाये रखना। 'अप्प दीपो भव' और 'तत्तु समन्वयात' के बुद्ध सूत्र  हम सबके लिए आवश्यक हैं। मेरे लेखन का यही सन्देश और उद्देश्य है 'जागते रहो' 
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