शनिवार, 26 मई 2018

साहित्य त्रिवेणी- डॉ. वसुंधरा उपाध्याय -कुमाऊँ लोकगीतों में छंद

कुमाऊनी लोकगीत में छंद : एक विमर्श

डाॅ0 वसुंधरा उपाध्याय
सहा. प्राध्यापक हिंदी विभाग
  एल.एस.एम.रा.स्ना.महा. पिथौरागढ़ 
भारत के अन्य भागों के इतरह कुमाऊँ में लोक साहित्य की परंपरा उतनी ही पुरानी है जितनी पुरानी मानव जाति है। लोकगीत, लोक कथा, लोकोक्ति, पहेली आदि की परपंरा सनातन से मौखिक रही है। लिपिबद्ध किए जाने के कारण शिष्ट साहित्य की परपंरा हर देश में क्रमबद्ध रूप में मिलती है, लेकिन लोकसाहित्य की नहीं। लोकसाहित्य की उत्पत्ति तथा विकास की कथा बहुत रोचक है। लोकगीतों का बीज सबसे प्राचीन-पवित्र ग्रंथ ऋग्वेद में मिलता है। जिन गाथाओं का उल्लेख स्थान-स्थान पर प्राचीन साहित्य में उपलब्ध है। ये गाथाएँ लोकगीतों की पूर्व प्रतिनिधि हैं। पद्य / गीत के अर्थ में 'गाथा' शब्द का प्रयोग ऋग्वेद में अनेक स्थलों पर है।१
लोकसाहित्य की परिधि में मानव के समस्त आचार-विचार की विरासत आ जाती है। इसमें मानव का पारंपरिक रूप प्रत्यक्ष हो उठता है। इसका प्रमुख स्रोत लोक मानस होता है। इनमें संस्कार एवं परिमार्जन की चेतना कार्य नहीं करती। लौकिक-धार्मिक विश्वास, धार्मिक गाथाएँ व कथाएँ, कहावतें, पहेलियाँ आदि लोक साहित्य के अंग हैं। हम लोकवार्ता (फोक लोर) का अर्थ जन-साहित्य / ग्रामीण कहानी  इसका अर्थ हम जन की वार्ता करते हैं।२
'लोक' शब्द अपनी परिसीमा में अत्यंत व्यापक और सम है। ‘यह ब्रह्म की ही तरह अनंत, अक्षर और असीम है। जीवन का प्रतीक और पर्याय है। 'लोक' की सीमा केवल ग्राम या साधारण जनता तक सीमित नहीं है। ऐसा संकीर्ण अर्थ बहुत बड़ी साहित्यिक,सामाजिक और सांस्कृतिक भूल का द्योतक है। समस्त चराचर में लोक की अलंकृति ही परम उपादेय और मांगलिक है। लोकसाहित्य का आशय है जन साहित्य। लोकसाहित्य के सुंदर रूप को जड़ विज्ञान ने कृत्रिम तथा नरिस कर डाला है। फलस्वरूप इसका आध्यात्मिक स्रोत सूखता जा रहा है। जड़ विज्ञान के कारण पंचतत्व निर्मित मानव पशु ने अपने मूल स्रोत आत्मा और संस्कृति के हिमालय का परित्याग कर पाशविशता का वरण किया है। लोक साहित्य विकृत हो चला है। लोकसाहित्य के आत्मवाद द्वारा ही बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय की परिकल्पना सम्भव है। भारतीय जीवन दर्शन में अन्तर्निहित शालीन गौरव प्रिय-अप्रिय, सुख-दुख से कभी पराजित नहीं होता था। भारतीय जीवन दर्शन ने हृदय से अपराजित होकर अविचल जीवन दृष्टि और 'अकुतोभवमय' के भाव से जीवन को ग्रहण किया है -‘सुख वा यदि वा दुःख, प्रियं वा यदि वाडप्रियं प्राप्तं प्राप्त मुपासीत हृदये न पराजितः। - महाभारत शांति पर्व।
इसीलिए वह मृत्यु की ओर से निर्भय था। जीवनरस की मादकता प्राप्त करने वाले को मृत्यु से डर कहाँ? एक लोकगीत में हृदय के समस्त उल्लास ओर घुमड़ते दर्द को दुनिया में बाँटकर, दर्द को दवा में परिणत कर विश्व के कण-कण में जीवन-रस को सहेजकर सभी प्राणियों में दीप्ति एवं तृप्ति देने की महती सदिच्छा रखने वाले लोक गीतकार की दतन्नी फूट पड़ती है-  'उचय रसवा को भेजली भवरवां के संगियाॅ / रसवा ले अइले हो थोर / एतना ही रसवा में केकरा के बॅटबों / सगरी नगरिया हित मोर।
लोकसाहित्य का यही मधु हमें तन्मय कर देता है। इससे हमें अलौकिक आनंद की प्राप्ति होती है। अचल अनुरक्ति मिलती है और मिलती है हमें 'जीजिविषा की अदम्य शक्ति'।३
परंपरा और प्रयोग की दृष्टि से कुमाऊँनी साहित्य को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है। मौखिक और लिखित। हिमालय के उपकंठ में स्थित कुमाऊॅंनी बोली के उद्भव के साथ ही उसका लोक साहित्य भी परंपरित हुआ। क्षेत्रीय विस्तार की दृष्टि से वर्तमान में अल्मोड़ा, नैनीताल और पिथौरागढ़-सजय़ जनपद के अंतर्गत कुमाऊँनी भाषा/बोली में प्रचलित लोकसाहित्य कुमाऊँनी लोक साहित्य कहलायेगा। अन्य भारतीय लोक साहित्यों की तरह  कुमाऊँ के लोकसाहित्य का अपना विशिष्ट महत्व है। कुमाऊँनी लोक साहित्य की परंपरा प्राचीन समृद्ध और व्यापक है। यह आज तक कंठानुकंठ ‘श्रुति’ रूप में अजस्र रूप से प्रवाहित है। यहाॅं की प्रकृति जलवायु एवं विशिष्ट भौगोलिक परिस्थितियों का यहाॅं के लोक जीवन पर अत्यंत गहरा प्रभाव पड़ा है। कुमाऊँनी लोकसाहित्य की कई विधाओं में श्रव्य और दृश्य के गुण एक साथ पाए जाते है। कुमाऊँनी के हजयोड़ा, चाँचरी, छपेली आदि गीत प्रमुख रूप से सुने और देखे जाते हैं। लोक की अधिकांश साहित्यिक अभिव्यक्ति गेय होती है। गीत में कविता का एक स्फुट भावशाली मनोभाव दृश्य या जीवन को लेकर उसकी समस्याओं में केंद्रित हो जाता है। गीतों में माधुर्य की प्रधानता रहती है। इसमें मानसिक स्वरूपों सूक्ष्म मनोभावों और मनोगतियों की सुषमा व संगीत्मकता की प्रधानता रहती है। गीतों में ध्वन्यात्मकता या नाद सौंदर्य पर रचनाकार का ध्यान केंद्रित रहता है। जिस रचना में छोटी-छोटी भावनाएॅं एकरूप होकर गेय हो जाती हैं, उसे गीत कहते हैं। अपने लघु कलेवर में गीत पूर्ण तथा मार्मिक होता है। इसमें भावनाएँ इतनी घनीभूत हो जाती हैं कि प्रत्येक शब्द की अपनी निजी व्यंजना पाठकों तथा श्रोताओं के मन को अपनी ओर खींच लेती है। गाँव के प्रायः निरक्षर लोग नीतिशास्त्र, धर्मशास्त्र या व्यवहारिक ज्ञान पुस्तकों को पढ़कर नहीं पा सकते थे। घर-गृहस्थी के कार्यों में संलिप्ततता के कारण वे किसी विद्वान या उपदेशक के पास बैठने का समय भी पा सकते थे। इस कमी को दूर करने के लिए वाक् द्वारा सरल शब्दों में कही गयी गूढ़ार्थ युक्त वार्ताएँ ही उनकी गुरु हैं।४ लोकगीत लोकमानस की सुख-दुखात्मक अनुभूति ही अगेय़, गेय और वाचिक लोकगीत के रूप में फूट पड़ती है। गेयता ही लोकगीत को जनसामान्य तक पहुँचाती है। लोकगीतों की प्रकृति सामाजिक है।समाज से प्राप्त और समाज के लिए अर्पित लोकगीत का मूल प्रेरक समाज है। सामाजिक प्रकृति और परिवेश के प्रभाव में लोकगीतों का सृजन होता है। अपनी रचना विधि में समाज सापेक्ष कल्पना का सार्थक हस्तक्षेप ही लोकगीत का उत्स है, जहाँ समाज की उपेक्षा का प्रश्न ही नहीं उठता। लोकगीतों का सहज विकास जीवन की व्यापक परिस्थितियों के प्रभाव के कारण हुआ है। सभी सामाजिक गतिविधियाँ, पर्व, प्रकाश, उत्साह, उछाह का प्रेरक लोकगीत ही है।
लोकगीत मूलतः सामाजिक स्थितियों का पुनर्सृजन है। सामाजिक आदर्श, नियम-संयम, जीवन-मूल्य, रीति-नीति, संस्कृति-सभ्यता के अनुरूप इसकी गूँज होती है। इस गूँज में अंतर भी होता है। विविध सामाजिक सभ्यता के आचार-विचार,  परंपराओं, परिवेश और परिप्रेक्ष्य स्तरों के अनुसार ‘यह मानवीय सुख-दुख की जमीन में उगा हुआ वह पौधा है जो निरंतर खुली धूप, ताजी हवा व स्वच्छ पानी से पुष्ट होता हुआ मानव मात्र को
छाँह और फल देने वाला विशाल वट वृक्ष बन गया है।1लोकगीतों का विकास प्रत्येक देश की सामाजिक सरंचना के अनुरूप होता है। सामाजिक परिवर्तन का पूरा असर इन लोकगीतों पर पड़ा है। साहित्यिक दृष्टि से काव्यात्मक गुणों की अभिजात्यता के अभाव में भी इनका अपना अलग ही नैसर्गिक सौंदर्य होता है। यह लोकजीवन की धरती से स्वतः स्फूर्त जलधार की तरह होते है। इनमें लोकमानस का आदिम और जातीय संगीत सन्निहित रहता है। अतः, लोकभाषा अथवा बोली में लोक हृदय से प्रकृत सहज और स्वाभाविक रूप से प्रस्फुटित भावमय मौखिक और गेय उद्गार ही लोकगीत हैं। लोकगीतों में किसी प्रकार का प्रयत्नज अलंकरण एवं उक्ति वैचिञ्य नहीं होता, न ही उनमें इस रूढ़ कल्पना और दुर्बोधता होती है। ये गीत धरती से उगते हैं। प्रकृति इन्हें पल्लवित, पुष्पित और सुरभित करती है। किसी एक व्यक्ति द्वारा रचित होने पर भी इनमें निर्वैयक्तिकता होती है। लोकगीत आंचलिक संस्कृति के मुँहबोले चित्र हैं। इनमें रागात्मकता, लयात्मकता, स्वतः स्फूर्तता, अनुभूति प्रवणता, गतिशीलता, वस्तु तथ्यता और लोकमानस की सहजता मिलती है।
कुमाऊॅंनी लोकगीत 
हमारे समाज में अनेक अवसरों पर अलग-अलग गीत गाए जाते हैं। इनके वर्गीकरण हेतु समग्र रूप से पहचान आवश्यक है।लोक साहित्य के विद्वान अध्येताओं ने कुमाऊँनी लोकगीत के वर्गीकरण का विषयगत आधार ही अपनाया है। लोकगीतों का तात्पर्य सामान्यतः लघु कलेवर वाले मुक्तक गीतों से ही समझा जाता है।  लोकगीतों के अंतर्गत कुमाऊँ की मुक्तक गीत पद्धतियों का परिचय इस प्रकार है-
१.न्यौली
न्यौली कुमाऊँनी गीतों की एक गायन पद्धति है। न्यौली की उत्पत्ति ‘नबल’ या ‘नवेली’ शब्द से है। ‘न्यौली’ का  में नवेली को आलंबन मानकर या संबोधित कर गाए जानेवाले ५ प्रकार के प्रेमपरक गीतों का प्रतिपाद्य विषय श्रृंगार है। न्यौली में श्रृंगार की चारों स्थितियों पूर्वराग, मान, प्रवास और करूण में से प्रवास का आधिक्य है। संयोग में प्रिय-मिलन की आकुलता छेड़-छाड़, हास-परिहास, उत्कंठा, उपालंभ, सुख-कामना आदि दशाओं का चित्रण होता है। वियोग में प्रोषित पतिका की अतलस्पर्शी पीड़ा हिलोर लेती है। विरह की संपूर्ण अंतदर्शाओं -अभिलाषा, चिंता, स्मृति, गुणकथन, उद्वेग, उन्माद, प्रलाप, अश्रु व जड़ता का मार्मिक अंकन न्यौली गीतों में है।
संयोग श्रृंगार
सिल्गड़ी का / पाल चाल, कलूॅं फुल्या लाल।
छोड़ सड़ी पिछोड़ी चाल, फल्जू माया जाल।२
विप्रलंभ श्रृंगार 
यह विरह लोकगीतों का प्राण है। न्योली गीतों की नायिका प्रोषित पतिका है। प्रिय प्रवासी है
ऊॅंचा धुरा सुको डाण, पानी की तुडुक। /  अगास बादल रिट्यो, रवे ऊॅंछी धुडुक।६४ 
सौंदर्य वर्णन
कालि धमेली का बीच टसर को फुंद। / इसी ठसक ले हिट टुटि पड़ो छंद।६७० 
प्रेम निरूपण 
तु है जाली माता सुवा, मै है जू जोगी / काली बाकरी बन लैछ, बन की बनै छ।
कै थे कयो क्या हुन्या हो, म नही मनै छ।३३४ 
ऋतु वर्णन और बारहमासा 
अगास को दल बादल घुड़ घुड़ घुड़ कुँछ। / छिया मै नासूर है गो, सुड़ सुड़ सुट कुँछ।११
प्रकृति वर्णन 
सर्ग भरी तारा छिया बीच में जुनु लागी। / तेरि सुवा मैलं भेटी, बाटै मे रून लागी।
अलंकार योजना 
के कालो कलेजी रंग, के कालो क्वीचन। / के दुख हलि का बल्द, के दुख मै छन।१०-१२ 
२.जोड़ 
जोड़ का शाब्दिक अर्थ है योग या संधि।  अपने व्यापक अर्थ में गेयता की दृष्टि से जोड़ का तात्पर्य हुआ 'वह लय अथवा पंक्ति जो एक भाव, लय अथवा पंक्ति को दूसरे जोड़ती है। कुमाऊॅंनी गीतों में ध्रुवक, टेक या स्थायी के पश्चात पल्लव, संपद या अंतररे  के रूप में आने वाली पक्तियों को जोड़ कहा जाता है। गीतों में टेक पद के पश्चात पक्तियाँ निर्मित करने की प्रक्रिया 'जोड़ मारना' कहा जाता है। जोड़ों का सिलसिला अटूट-अबाध रहता है। जोड़ अपने कलेवर व अर्थवत्ता में हिंदी के दोहा-चौपाई, उर्दू के शेर तथा अंग्रेंजी के कपलेट से समानता रखता है।७
जोड़ और न्यौली 
टेक के बाद गीत की पंक्तियों को जोड़ने की प्रवृत्ति के आधार पर सामान्यतः न्यौली को जोड़ लिया जाता है पर न्यौली और जोड़ में लयात्मक अंतर है। न्यौलि सम मुक्तक वर्णिक छंद है और जोड़ विषय मुक्तक वर्णिक। न्यौलि को लयात्मक आधार पर जोड़ में नहीं बदला जा सकता, जबकि जोड़ को बड़ी सुगमता से न्यौली में परिवर्तित किया जा सकता है।
जोड़
पाखै की दन्यार। / भूलि जूॅलो दाॅतपाटी, नि भुलूॅ अन्वार।
पाखै की दन्यार, सुवा, पाखै की दन्यार। भू / लि जूॅलो दाॅतपाॅटी, नि भूलि अनवार।
प्रेमिका जिस पर्वत शिखर पर है प्रेमी को वह पर्वत प्रांतर ही रसमय लगता है
था काटो ओसिलो। / जै धुरा छू मेरि सुवा, ऊ धुरो रसिलो।
सौंदर्य वर्णन में कवि के उपमान इतने सहज है कि पाठक को कल्पना में बिंब बांधने का प्रयत्न नहीं करना पड़ता हेलसि को घोल। / चुव जसी मसिणि छै पुव जसी गोल।
कुमाऊॅंनी लोकसाहित्य के डाॅ0 त्रिलोचन पाण्डे, डाॅ0 केशवदत्त रूवाली, डाॅ कृष्णानंद जोशी, डाॅ0 भवानीदत्त उप्रेती, डाॅ. नारायणदत्त पालीवाल आदि विद्वानों ने जोड़ को 'भग्नौल' नाम से भी निरूपित किया है।७ लयारंभ कर बीच में गद्य प्रयोग की स्वतंत्रता लेकर गद्यांत में वह प्रारंभिक पंक्तियों की तुक पकड़ता है तथा छंदांत में सहगायक भाग लगाते है: हजयुमुरा की जान/  धोइनि लुकुड़ि रैगे, / खैचीयूॅं कमान, / काॅं उसा मानिख रैगे / काॅ उसे इमान। 
कुमाऊॅंनी के लिखित साहित्य में ‘गोर्दा’ ने जोड़ छंद का प्रयोग ६-८-६ वर्णों की यति के आधार पर किया है-
मडुवा को बालो देखुलो स्वराज्य जवै तव दुख जालो।
सानण की पाई मुलुक गारत -हजययो लड़ि लड़ि भाई।
३. चाँचरी 
'चाँचरी',चाँचरिया चाँचुड़ी शब्द संस्कृत ‘चर्चरी’ शब्द से विकसित है। जिसका अर्थ है ' नृत्य ताल समन्वित गीत'। डाॅ0 त्रिलोचन पाण्डे चाँचरी की उत्पत्ति चंचरीक से मानते है। चंचरीक की भांति वृत्ताकार घेरे में क्रमशः आगे ब-सजय़ते हुए लोग घेरे को कम करते जाते हैं या पीछे की ओर हटते हुए और हटते हुए उसे ब-सजय़ाते जाते है।८ 
कालिदास के विक्रमोर्वशीयम और श्री हर्ष के नाटकों में चर्चरी का उल्लेख मिलता है। प्राकृत पैंगलम् में चर्चरी छंद का उल्लेख है। अपभ्रंश में जिनदत्त सूरि ने ‘चर्चरी’ की रचना की थी। हिंदी के भक्तिकालीन कवियों कबीर जायसी आदि के काव्य में भी चाँचरी का वर्णन हुआ है। जायसी ने अपने काव्य में लिखा है -ंहोई फाग भलि चाँचरी जोरी। ९ 
चाँचरी नृत्यगान शैली भी है। यह मेलों में किया जानेवाला सामूहिक नृत्यगीत है। विविध उत्सवों, त्योहारों और मांगलिक अवसरों पर भी इनका आयोजन होता है। चाँचरी में वाद्ययंत्र के रूप में प्रायः हुड़का बजता है जो मुख्य गायकों द्वारा बजाया जाता है। मुख्य गायक गीत की पंक्ति गाता है, दूसरा उसे दुहराता है: पुरूष- सुब्दारै की चेलि बसती, द्यो लागो नैनिताला। / स्त्री- रामलाल का च्याल दीवाना, ये बाटा कब आला।
चाँचरी घास काटते, लकड़ी काटते, जंगल जाते-जाते, कृषि कार्य करते, पशुचारण करते एकाकी रूप से गाई जाती है। पूजा, नवरात्रि आदि के अवसर पर देवी-देवताओं के मंदिरों में भक्तिभाव से परिपूर्ण मर्यादित चाॅंचरी गाई जाती है- छमा पिनुरी का धुरा देवी छम / छमा पड़ि गो बरफ देवी छम / छमा दैण हये भग्वती देवी छमा / छमा सब की तरफ देवी छम ....
उद्दाम प्रेम एक ऐसी अवस्था होती जब प्रेमी-प्रेमिका दोनों को ही किसी भी प्रकार का बंधन स्वीकार नहीं होता, दुनिया का डर नहीं होता। प्रेमी कहता है- स्यारघाट की नंदी बाना चैजा मेरो घर, / कालि टोपी घुंगरवाली जुल्फी कैकि कंछै डर।
४. हजयोड़ा -ं
'हजयोड़ा', इवाड़ा या इवाड का मूल हिंदी 'जोड़ा' शब्द है। कुमाऊॅंनी में 'ज' ध्वनि सुगमता से 'हजय' ध्वनि में परिवर्तित हो जाती है। चाँचरी की भाॅति हजयोड़ा भी कुमाऊॅं की प्रसिद्ध सामहिक नृत्यगान शैली है। 'हजयोड़ा' को नेपाल में 'हथज्वाड़' या 'हथजोड़ा' कहा जाता है। देवी-देवताओं के मंदिरों में हजयोड़े गाये जाते हैं। इनमें दैवीय शक्ति का गुणगान कर उनके कार्यों को स्मरण किया जाता है। यह मुक्तक और प्रबंध दोनों प्रकार से गाए जाते हैं। सोमेश्वर, अल्मोड़ा और द्वाराहाट आदि क्षेत्रों में मुक्तक हजयोड़ा का प्रयोग होता है। पिथौरागढ़-सजय़ जनपद के सोर, सीरा, मुनस्यारी, अस्कोट और चंपावत क्षेत्र में चाँचरी और हजयोड़ा के समान ही खेल या हथजोड़ा नृत्यगीत प्रचलित है। यह खेल भादों के महीने में गौरा-ंउमा-महेश्वर के आगमन, जन्मोत्सव, विवाह, विसर्जन आदि अवसरों पर आयोजित होते हैं। ''(ओहो) गोरी गंगा भागरथी को क्या भलो रेवाड़ा / (ओहो) खोलि दे माता खोलि भवानी धरम केबाड़ा / (ओहो) के लै रैछै भेट बैना म्यारा दरबारा / (ओहो) द्धी जौयां बाकरा लायूॅं त्यारा दरबारा...... खोलि दे''
५. छपेली 
'छपेली' का अर्थ है 'क्षेपण', 'क्षिप्र गति' या त्वरा'। इस नृत्य-गान शैली में नृत्य और गायन दोनों में क्षिप्रता रहती है। छपेली कुमाऊँनी लोकगीतों की एक मुक्तक नृत्यगान शैली है। विवाह, मेलों, उत्सवों, आदि के अवसर पर अनेक गायकों और नर्तकों द्वारा छपेली का मंचन किया जाता है। इसमें नृत्य और गायन दोनों का समावेश होने के कारण इसमें दृश्य और श्रृव्य दोनों में ही आनंद आता है। मुख्य एक गायक और एक नर्तक होता है।'बिर्ति ख्याला पानी बगौ उकाला। / तेरो मेरो जोड़ों हुछ पगाला।' १
६. बैर 
'बैर' से तात्पर्य है द्वंद या संघर्ष। यह प्रश्नोत्तर शैली में होने वाले गीतात्मक प्रतिद्वन्द्विता है। गायकों में एक दूसरों को पराजित करने की होड़ रहती है। अनेक अवसरों पर इस गीत शैली का प्रयोग होता है। एक गायक गीत शुरू कर प्रश्न पूछता है, दूसरा गायक उत्तर देकर प्रति प्रश्न पूछता है। यह क्रम अबाध गति से चलता है। जो गायक प्रश्न का उत्तर नहीं दे पाता, हार जाता है। ये प्रश्न गूढ़, दुरूह, बिंबात्मक, प्रतीकात्मक तथा उक्ति वैचित्र्यपूर्ण होते हैं।इनका समापन मंगलकामना के साथ होता है।
७. शकुनाखर/फाग 
'शकुनाखर' कुमाऊँ में विभिन्न संस्कारों के अवसर पर गाये जानेवाले मंगलगीत हैं। संस्कारों से जुड़े होने के कारण इन्हें संस्कार गीत भी कहा जाता है। कुमाऊॅं में इन्हें ‘शकुनाखर’ भी कहते है। औद्यान (गर्भाधान), पुत्र जन्म, षष्ठी, नामकरण, व्रतबंध, विवाह आदि संस्कारों के अवसरों पर फाग और शकुनाखर गाये जाते है।धार्मिक उत्सव, देवी-देवताओं की गाथाओं के ‘फाग’ फालगुन के महीने में गाए जानेवाले गीतों से भिन्न है। अन्य प्रदेशों के सोहर, बना-बनही, सगुन आदि गीतों की ही भाँति कुमाऊँ में कुछ शगुन गीत कुमाऊँनी भाषा में भी मिलते हैं। इन गीतों में लोक-वेद की रीति का अभूतपूर्ण समन्वय होता है। इनका प्रारंभताल, पृथ्वी आदि के देवी-देवताओं की वंदना से होता है। इनमें गणेश-पूजन, मातृ-पूजन कलश-स्थापन आदि गीतों के साथ परिवार व उसके उसके सदस्यों-संबंधियों के प्रति मंगलकामना निहित रहती है। कामनापरक ओछन गीत में गर्भिणी की स्थिति का मनोवैज्ञानिक चित्रण मिलता है। ''खै लियो बोज्यू, मनै की इछिया जो, / खै लिया बोज्यू, बासमती को भात,
उड़द की दाल, घिरत भुटारो, दाख दाड़ीमा / छोलिड. बिजौरा, कैली कचैरी, लाखी की सीकारा।''
कन्या की विदाई पर गाया जानेवाले गीत इतने व्यथापूर्ण, करूण व हृदयद्रावक होते हैं कि श्रोता के मानस की सीपी अपने दृगद्वार खोलकर मुक्त अश्रुओं से रोती बालिका का अभिषेक करती जान पड़ती है। ''छोडू यो छोडू यो बाली त्वीले, / धुलमाटी को खेल, छोड़या बाली माणूनी का खाजा। / किलै छोड़ि, बाली त्वीले, मायूड़ी की कोख / किलै छोड़, यो, बाबा ज्यू के घौर।।''
फाग गीतों में वाक्यांश और पद़ों की पुनरावृत्ति होती है। फाग गायन पद्धति भी है और छंद रूप भी। यह कुमाऊँनी का अर्द्धसम मुक्तक वर्णिक अतुंकात छंद है।
८.होली 
मूलतः बृजशैली का गीत 'होली' समस्त भारत में समान रूप से लोकप्रिय है। पहाड़ की होली का तो ठाठ ही निराला है। संपूर्ण कुमाऊँ में पूस के प्रथम रविवार से होली का गायन आरंभ हो जाता है। शिवरात्रि के दिन रस रंग और श्रृंगारपरक होली गायी जाती है। इससे पूर्व धार्मिक होली गायी जाती है। 'छलड़ी' के दिन सब बेलगाम हो जाते है। चार दिनों तक होली चलती है। होलियों का मूल स्वर श्रृंगारी है। सीता-राम, राधा-कृष्ण आदि के साथ रंग में डूबते हुये होली गीत मस्ती का समा बना देते हैं। भोलेनाथ बाबा भी अपने गणों के साथ होली खेलते नृत्य भी करते हैं। देवर-भाभी के गीत स्नेहादि की दृष्टि से मधुर है। 'तू करिले अपनो ब्याह देवर हमरो भरोसो / न करिये। / मैलै बुलाये एकलो हो एकले। /तू ल्याये जन चार देवर हमरो भरोसो / न करिये।''
 किसी गोरी के रस भरे, मद भरे नैनों में रम जाने की कामना करती होली की बात ही निराली है- 'अच्छा हाँ, गोरी नैना तुमारे रसा भरे। / कहो तो ये रमि जाय गोरी नैना तुम्हारे रसा भरे।''
होली वसंतोत्सव की श्रेष्ठ-सशक्त लोक परंपरा है। यह फाल्गुनी रंगों में मानव-मन की उल्लास और उन्मादमयी चिरंतन अभिव्यक्ति है। होली के बाद एक दूसरे घर जा जाकर सारे परिवारी जनों के प्रति मंगल कामनाएँ प्रकट की जाती है और अगली फाल्गुन में फिर मिलेंगे ऐसी आकांक्षा भी प्रकट की जाती है। ''आज की होली न्हेगैछ / फागुन ऊॅंलो कैगैछ / गावै खौले देवे असीस हो हो होलकारे / बरस दीवाली बरसै फाग हो हो होलकारे / जोनर जीवेम खेलें फाग हो हो होलकारे / आजक बसंत कैका घरा, हो हो होलकारे / जीरौ लाख नरीस हो हो होलकारे''
'बैठकी होली' शास्त्रीय संगीत के मूलभूत रागों को लेकर गायी जाती है।
९. बालगीत 
कुमाऊँ में बालगीतों की संख्या बहुत कम है। जब माँ बच्चे को सुलाती है, तब कुमाऊँनी स्त्रियाँ यह गीत गाती हैं-  'हल्लोरी बाला हल्लोरी / तेरी इजा पालुरी का घास जै रैछ / चुचि भरि ल्याली, चाड़े मारि ल्याली / चुचि खाप लालै / चड़ि खेल लगालै / हल्लोरी बाला हल्लोरी' 
बच्चे को अपने पावों पर बैठाकर पीठ के बल लेटकर मुड़े हुए घुटनों को ऊपर उठाते हुए प्रश्नोत्तर शैली में ‘‘घुगति बासूति’’ नामक गीत गाया जाता है- 'घुघुति बासूति, आॅम काॅ छड़ भाड़ में छ। / कि करनैछ खाट हाल नैछ / कि लालि खाट लालि / को खाल दिदि खालि मामा खाल..... / नै नै नै मैं खूल''
ये बालगीत समाप्ति के कगार पर हैं। शहरी अपसंस्कृति गरमी संकृति का भक्षण कर रही है। आज कल उत्सवों में भौंडे फिल्मी गीतों पर थिरकने का चलन है। लोग अपनी संस्कृति, अपनी पहचान भुला रहे हैं। कुछ पुराने, लोग जिन्हें शहर का पानी नहीं लगा है, अपनी धरोहर से प्रेम है इन गीतों को गाते-गुनगुनाते हैं। यही हाल रहा तो धीरे-धीरे गीतों की गायन परंपरा किताबों में ही सिमटकर रह जाएगी। स्वतंत्रता के बाद शासकीय, संस्थागत स्तर पर आकाशवाणी दूरदर्शन, अन्य संचार माध्यम, विदेशों में आयोजित लोकगीतों के प्रचार-प्रसार में सांस्कृतिक आदान-प्रदान तथा अर्थोपार्जन हुआ है किंतु समस्याओं का अंत नहीं हुआ।  लोकगीत के अस्तित्व एवं भविष्य का संकट तभी समाप्त हो सकता है जब ऊपरी चमक-दमक से बचे। 
संदर्भ ग्रंथ: १. डा.श्रीराम, लोक साहित्य स्वरूप और मूल्यांकन पृ0१-ं२, २. डा. सुधाकर तिवारी, हिंदी लोकसाहित्य पृ. ५२, ३. डॉ. सुधाकर तिवारी, हिंदी लोकसाहित्य पृ. ५३, ४. डा. सुधाकर तिवारी, हिंदी लोकसाहित्य पृ. ६३,  ५. डॉ. त्रिलोचन पांडे, कुमाऊॅं का लोक-साहित्य पृ. ९४,  ६. न्यौली संग्रह, न्यौली संख्या ६० संग्रहकर्ता देवसिंह पोखरिया, ७. न्यौली संग्रह, न्यौली संख्या ६४ संग्रहकर्ता देवसिंह पोखरिया, ८. पुरवासी: रामलीला स्मारिका १९९०, पर्वतीय अंक, जोड़ और जोड्यूण एक वृहद रचना प्रक्रिया, - जगदीश जोशी का लेख पृ.सं. २६-ं२७, १०. डॉ. देवसिंह पोखरिया: कुमाऊॅंनी भाषा साहित्य एवं संस्कृति पृ.३१, ११. कुमाऊॅं का लोक साहित्य पृ.८७, १२. जायसी ग्रंथावली पृ. १२०, १३. कुमाऊॅंनी भाषा साहित्य एवं संस्कृति: देवसिंह पोखरिया पृ. ४६।  

गुरुवार, 24 मई 2018

महाराणा प्रताप

“प्रताप! हमारे देश का प्रताप! हमारी जाति का प्रताप! दृढ़ता और उदारता का प्रताप! आज तू नहीं है लेकिन तेरा यश और कीर्ति है. जब तक यह देश है और जब तक संसार में दृढ़ता.उदारता, स्वतंत्रता और तपस्या का आदर है, तब तक हम ही नहीं, सारा संसार तुझे आदर की दृष्टि से देखेगा.” ---गणेश शंकर विद्यार्थी
प्रेरक प्रसंग, 
जिन्होंने कीका की प्रताप यात्रा को महाराणा तक पहुंचाया
- सुरेन्द्र सिंह पंवार
मेदपाट की गद्दी पर बैठने के पूर्व महाराणा प्रताप को ‘कीका’ नाम से संबोधित किया जाता था. मेवाड़ की पहाड़ी भीली-भाषा(बांगडी) में कीका, शब्द लाड़-प्यार में लड़के के लिए प्रयुक्त होता है.कीका से महाराणा प्रताप तक की यात्रा में बहुत-से प्रसंग है, जिन्हें प्रताप का पर्याय माना जाता है, कुछ हैं---
झुके न तुम प्रताप प्यारे---मेदपाट के सभी राजा “एकलिंग के दीवान” कहलाये.इसी क्रम में प्रताप ने भी एकलिंग शासन के प्रतिनिधि बनकर राज्य किया उनका सिर अपने राजा यानि एकलिंग को छोड़कर कभी किसी के सामने नहीं झुका. दिल्ली- दरबार में एक विरुदावली गायक भाट ने अपने सर पर बंधी पगड़ी हाथ में लेकर बादशाह अकबर को मुजरा(प्रणाम) किया. पगड़ी उतारने का कारण पूछे जाने पर उसने उत्तर दिया,-‘वह पगड़ी महाराणा प्रताप ने बाँधी थी, वह न झुके, महाराणा का मान बना रहे, इसलिए उतार ली.’ बादशाह, उत्तर सुनकर प्रसन्न हुआ परन्तु उसके दिल में एक कसक रह गई—
“सूर्य झुके, झुक गये कलाधर, झुके गगन के तारे.
अखिल विश्व के शीश झुके, पर झुके न तुम प्रताप प्यारे.
हल्दीघाटी रंगी खून ज्यों, नालो बहतो जाये-----हल्दीघाटी की पीली मिटटी चन्दन सदृश्य है, जहाँ मातृभूमि की रक्षा करते सुभक्तों ने अपना रक्त मिलाकर उसके रंग को और गहरा कर दिया है. महाराणा प्रताप की गौरव-गाथाओं से जुड़कर महातीर्थ बनी वह जड़-स्थली जन-जन में चेतना का संचार कर रही है. बकौल श्याम नारायण पांडे---
यह सम्मानित अधिराजों से,अर्चित है राज समाजों से.
इसके पदरज पौंछे जाते, भूपों के सर के ताजों से.
अकबरनामा में लिखा है कि, ‘हल्दीघाटी का मुख्य युध्द खामनौर में हुआ, उस रणक्षेत्र को रक्ततलाई के नाम से जाना जाता है. युध्द हुआ, 18 जून 1576 को वह भी मात्र 4 घंटे,’----किसी लोक कवि ने कहा है, “हल्दीघाटी रंगी खून ज्यों,नालो बहतो जावे.” बदायूँनी, जो उस युध्द क्षेत्र में मौजूद रहा के शब्दों में-‘यह सच है कि शाही पक्ष को बड़ी कठिनता से सफलता मिली थी जिसका श्रेय भी राजपूतों को जाता है.’इस घाटी के विषय में किंवदन्ती चली आ रही है कि मरे हुए सैनिक रात्रि की नीरवता में अब भी युध्द करते हैं और उनके मुँह से ‘मारो-काटो’ के भयद शब्द पहाड़ों के चक्कर खाते, टकराते, गूंजते हुये आकाश में विलीन हो जाते हैं. जौहर सूर पठानी का—हाकिम खां सूर,जो शेरशाह सूरी का वंशज था और महाराणा प्रताप की सेना का प्रधान सेनापति, ने युध्द के प्रारम्भ में महाराणा से प्रार्थना की कि,--“हे मेवाड़ी मालिक! मुझे और मेरे जान्वाज जवानों को को हरावल(अग्रिम पंक्ति) में लड़ने की इज्जत बक्शें. फिर देखें, यह मुसलमान पठान अपने कौल पर किस तरह मिटता है. जहाँ आपका पसीना गिरेगा, उस मिटटी को पठान अपने खून से लाल कर देगा.कसम उस खुदा की मरने पर ये पठान शमशीर नहीं छोड़ेगा.महाराणा जी, यह पठान जान हार सकता है परन्तु कौल नहीं.” महाराणा मुस्लिम विरोधी नहीं थे; उन्हें राष्ट्रीय एकात्मता और अखंडता में गहरा विश्वास रहा, उन्होंने हाकिम खां को युध्द की कमान सौंपी. उल्लेख्य है कि हल्दी घाटी के युध्द-यज्ञ में हाकिम खां पठान की पहली आहुति चढ़ी. मरने के बाद भी पठान सख्ती से तलवार की मूंठ थामे हुए था, जिसे छुड़ाने में असफल होने पर उसे तलवार सहित दफनाया गया.
नीला घोडा रा सवार—
घोड़े तो कई हैं, परन्तु चेतक सबसे भिन्न था. ‘वह कैसा था?’--- यह तो प्रताप के पर्यायवाची सम्बोधन “ओ नीला घोडा रा सवार” से ज्ञात हो जाता है, श्याम नारायण पांडे ने “हल्दीघाटी” महाकाव्य में चेतक का परिचय इस प्रकार दिया---
लड़ता था वह बाजि,लगाकर बाजी अपने प्राणों की.
करता था परवाह नहीं वह, भाला-बरछी-वाणों की.
लड़ते-लड़ते रख देता था,टाप कूद कर गैरों पर.
हो जाता था खड़ा कभी, अपने चंचल पैरों पर.
आगे-आगे बढ़ता था वह, भूल न पीछे मुड़ता था.
बाज नहीं,खगराज नहीं,पर आसमान में उड़ता था.
वाकयानवीस बदायूँनी लिखता है, “राणा एक नाले के निकट घाटी को पार कर पहुंच गया. लंगड़े घोड़े को नाला पार कराना कठिन था. उसका वहीं दम टूट गया और उसके प्राण-पखेरू उड़ गये.” हल्दी घाटी के युध्द में प्रताप के जीवन में दो अहम घटनाएँ घटीं- एक, बिछड़े भाई शक्ति सिंह का मिलन और दूसरी, स्वामी भक्त चेतक का निधन. विषम से विषमतर परिस्थितियों में भी न घबराने वाला महाराणा, चेतक के धराशाही होने पर फूट-फूट कर रोया था.
भुज उठाय प्रण कीन्ह—
महाराणा के चरित्र में जो बात सर्वाधिक आकर्षित करती है; वह है,स्वाधीनता-संघर्ष के लिए उनका भुजा उठाकर प्रण करना. चारण कहते हैं उदयपुर से 19 मील दूर गोंगुदा नामका स्थान पर सिंहासनारूढ होते समय महाराणा ने कसम खाई मैं तब तक संघर्ष करता रहूँगा जब तक सरे मेवाड़ को यवनों से मुक्त नहीं करा लूँगा.इस कृत्य में उन्होंने अपनी कुल रीति का अक्षरशः पालन किया जो कभी उनके पूर्वज भगवान श्रीराम ने इस धरा को “निश्चिर हीन” करने के लिए शपथ लेकर प्रारंभ किया था. प्रताप की इस सिंह-गर्जना का क्या असर हुआ? एक स्फुट रचना में देवी सिंह चौहान लिखते हैं-
प्रण किया जब तक मातृभूमि आजाद नहीं होगी.
उजड़े खण्डों की हर बस्ती,जब तक आजाद नहीं होगी.
तब तक जूझेंगे रण में बलिपथ पर बढ़ते जायेंगे.
दुश्मन की लाशों के टीलों पर निर्भय चढ़ते जायेंगे.
महलों का सुख,कोमल शैय्या. छोड़ भूमि पर सोयेंगे.
पत्तल पर सादा भोजन कर, दासत्व कालिमा धोंयेंगे.
राणा ने भुजा उठा ज्यों ही ऐसा ऐलान किया .
जनता के जय-जय कारों ने उसको वीरोचित मान दिया.
महाराणा ने अपने परिजनों सहित कठिन पर्वतीय जीवन जिया. काव्य में यमक का श्रेष्ठ उदाहरण-‘तीन बेर खाती थी सो तीन बेर खाती है’, उसी सिसोदिया कुल की रानियों की स्थिति पर केन्द्रित है. इतिहास गवाह है कि महाराणा ने एक-एक कर अपने हारे हुए सभी किले वापिस जीते, चित्तौडगढ और मान्दलगढ़ को छोड़कर. घास की रोटी का सच—राजस्थानी कवि कन्हैया लाल सेठिया की एक कविता का अंश है –
अरे घास की रोटी भी जद, बन बिलावडो ले भागो.
नानो सो अमरियो चीख पडियो,राणा रो सोयो दुःख जाग्यो. 
इस कल्पना की प्रधानता है. गोपाल सिंह राठौड़, ‘हमारे गौरव’ में लिखते हैं कि प्रताप का संघर्ष 1580 के आसपास चरम था.और कवि ने जिन परिस्थितियों का वर्णन किया है तब अमरसिंह 18-20 साल के युवा थे, और इतने बलिष्ट कि शेर को भी निहत्थे पछाड़ सकते थे. कवितांश केवल एक मिथक माना जाना चाहिए, जिसमें भावात्मक अतिरेक के सिवाय कुछ नहीं. ‘पीथल और पातल’ कविता के विस्तार में कवि सेठिया की कल्पना है कि तत्कालीन स्थितियों से घबरा कर महाराणा ने अकबर से समझौता का प्रस्ताव भेज दिया, परन्तु वह पत्र महराज
पृथ्वीराज(बीकानेर) के हाथ लग गया और उन्होंने समझौता-पत्र की पुष्टि के लिए दो सोरठ लिख भेजे—जिनका आशय रहा कि ‘हे वीर प्रताप! लिख भेजिए, यह सत्य नहीं है.अन्यथा की स्थिति में मैं अपनी मूंछों को ख़म कैसे दूंगा और तब यही होगा की मैं ग्रीवा पर खंग रखकर मौन सो जाऊँ.’ कहते है, महाराणा को अपनी गलती का अहसास हुआ और उत्तर में तीन दोहे लिखे जिनमें मेवाड़ का स्वभिमान यथावत रहने/रखने का बचन दिया.
धरम रहसी रहसी धरा---
शेरपुर में कुँवर अमरसिंह ने खानखाना के शिविर पर अप्रत्याशित हमला कर मुगल टुकड़ी को तितर-बितर कर दिया और लूट के माल के साथ खंखानके परिवार को भी बंदी बनाकर ले गया.जब प्रताप को इसकी सूचना मिली तो उन्होंने मिर्जा की बेगमों और बच्चों को ससम्मान वापिस भिजवा दिया.खानखाना महाराणा की इस उदारता एवं म्हणता से बड़ा प्रभावित हुआ और उनकी शान में यह दोहा पढ़ा—
धरम रहसी,रहसी धरा,खप जनि खुरसाण.
अमर विशम्भर ऊपरे,रख निहच्चो राण.
दानी भामाशाह –एक जनश्रुति है कि जब प्रताप भीषण संकट और आर्थिक अभावों से घबरा गये तो उन्होंने मेवाड़ छोड़कर सिंध जाने का मन बना लिया तब भामाशाह एक बड़ी धनराशी और अशर्फियाँ लेकर उपस्थित हुए, यह उनके परिजनों की संग्रहित सम्पत्ति थी. इसमें कितनी सच्चाई है? नहीं कहा जा सकता. हाँ! हल्दी घाटी के युध्द में भामाशाह के मौजूद होने का स्पष्ट उल्लेख तवारीखों में मिलता है. हल्दी घाटी युध्द के बाद जब प्रताप ने मेवाड़ की स्वतंत्रता के लिए लम्बे समय तक कठिन छापामार लड़ाई लड़ने तथा मेवाड़ के सम्पूर्ण जन- जीवन,अर्थव्यवस्था तथा प्रशासनिक ढांचे को संचालित करने का निर्णय लिया उस समय भामाशाह को 1578 के लगभग पूर्व प्रधान राम महासाणी के स्थान पर दीवान का उत्तरदायित्व दिया.
भामो परधानो करे, रामो कीड़ो रद्द.
धरची बाहर करण नूं, मिलियो आय मरद्द.
महाराणा प्रताप व्दारा भामाशाह की नियुक्ति एक राजनैतिक सूझ-बूझ और कूटनीति थी. भामाशाह को दीवान बनाकर उनके माध्यम से देश के उस संपन्न धनिक वर्ग एवं पड़ोसी रियासतों से संपर्क साधा, जिसमें देशप्रेम का जज्बा था, जो
मेवाड़ के स्वतंत्रता अभियान में सहयोग करना चाहते थे परन्तु मुग़ल सल्तनत की सीधी नाराजी से डरते थे. जब महाराणा प्रताप छापामार कर मुग़ल ठिकानों को तबाह कर रहे थे तब भामाशाह, अमरसिंह को साथ लेकर सीमांत राज्यों और चौकियों पर प्रायोजित हमले कर यथेष्ट धन, सैन्य-बल और उनका भावनात्मक सहयोग बटोर रहे थे.
यायावर-लोहडिया—
महाराणा ने जब महलों का परित्याग किया तब लोहार जाति के हजारों लोगों ने भी उनका अनुगमन किया. वे प्रताप के साथ रहते हुए तलवार, भाले और तीर गढ़ते रहे ताकि मेवाड़ी सेना को हथियारों की कमी न पडे. और आवश्यकता होने पर छापामार युध्द का भी हिस्सा बने.चूंकि सुरक्षा की दृष्टि से महाराणा के ठिकाने बदलते रहे इसलिए लुहार/लोहाणा क्षत्रिय संवर्ग का भी स्थायी ठिकाना न रहा. वे आज भी यायावरी जीवन जीते हैं.
छापामार(गुरिल्ला)युध्द प्रणाली—
महाराणा प्रताप ने पर्वतीय जीवन में वहां की जन- जातियों को अपने विश्वास में लिया. उनकी युध्द प्रणाली सीखी,उन्हें अपनी सेना में महत्वपूर्ण दायित्व सौंपे. प्रताप ने अपनी सेना को कई टुकड़ियों में विभाजित कर अलग-अलग स्थानों पर नियुक्त कर छापामार प्रणाली अपनाई.इसमें मुग़ल सेना से सीधा सामना नहीं किया जाता था.सैनिक टुकड़ी गुप्त स्थानों से निकलकर मुग़ल चौकियों पर यकायक हमला करती,सैनिकों को मरती,रसद ,शस्त्र आदि लूटकर तेजी से गायब हो जाती. प्रताप ने ‘जमीन-फूंको’ नीति( scorched earth policy) का अनुसरण किया.यानि जिस भूभाग पर मुग़ल आधिपत्य जमा लेते, वहां के लोग अपना मॉल-असबाब लेकर पर्वतों पर चले जाते, साथ ही कृषि आदि बर्वाद कर जाते,और कुछ भी उपयोगी सामग्री शत्रु के लिए नही छोड़ते. आज भारतीय सेना में छोड़ी हुई चौकियों के आस-पास आवागमन के साधन नष्ट करना और पानी के स्त्रोतों को विषेला कर देना उसी नीति का हिस्सा है.यही छापामार पध्दति
परवर्ती पीढ़ी के छत्रपति शिवाजी और बुंदेला छत्रसालने सीखी और सफलतापूर्वक प्रयोग की.------ महाराणा के आदर्शों पर चलकर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों ने देश को आजादी दिलाई. वे सच्चे अर्थों में एक संस्कारित क्षत्रिय
थे—शौर्य, तेज, वीरता, उदारता जैसे गुणों से अभिषिक्त कालजयी योध्दा.
और चलते-चलते दो अल्पख्यात प्रताप-पुजारियों का उल्लेख करना सामयिक होगा -
एक,अमेरिकी राष्टपति अब्राहिम लिंकन की माँ,जिन्होंने लिंकन के तत्कालीन भारत प्रवास से लौटते हुए हल्दीघाटी की माटी मंगवाई थी.वे प्रताप की प्रजा वत्सलता और स्वाधीनता के लिए सतत संघर्ष जैसे गुणों से प्रभवित रहीं और उस मिटटी को माथे से लगाना चाहतीं थीं.दुसरे.जलगाँव के विद्याधर पानत (दैनिक सकल के संपादक)जो प्रताप साहिर थे,यानि उन्हें भाव(भाल)में महाराणा प्रताप आते थे.उन्होंने महाराष्ट्र और गोवा में एक करोड़ स्कूली बच्चों को महाराणा प्रताप की कथा सुनाने का संकल्प पूरा किया.


201,शास्त्री नगर गढ़ा,जबलपुर,म.प्र.
9300104296/7000 388 332
email--- pawarss2506@gmail.com

बुधवार, 23 मई 2018

नवगीत

एक रचना
*
अधर पर मुस्कान   १०
नयनों में निमंत्रण,  ११
हाथ में हैं पुष्प,         १०
मन में शूल चुभते,    ११
बढ़ गए पेट्रोल के फिर भाव,   १७
जीवन हुआ दूभर।     ११
*
ओ अमित शाही इरादों!  १४
ओ जुमलिया जूठ-वादों! १४
लूटते हो चैन जन का      १४
नीरवों के छिपे प्यादों!     १४
जिस तरह भी हो न सत्ता  १४
हाथ से जाए।          ९
कुर्सियों में जान    १०
संसाधन स्व-अर्पण,  ११
बात में टकराव,         १०
धमकी खुली देते,    ११
धर्म का ले नाम, कर अलगाव,   १७
खुद को थोप ऊपर।     ११
बढ़ गए पेट्रोल के फिर भाव,   १७
जीवन हुआ दूभर।     ११
*
रक्तरंजित सरहदें क्यों?   १४
खोलते हो मैकदे क्यों?    १४
जीविका अवसर न बढ़ते १४
हौसलों को रोकते क्यों?   १४
बात मन की, ध्वज न दल का १४
उतर-छिन जाए।     ९
लिया मन में ठान    १०
तोड़े आप दर्पण,      ११
दे रहे हो घाव,         १०
नफरत रोज सेते,    ११
और की गलती गिनाकर मुक्त,   १७
ज्यों संतुष्ट शूकर।     ११
बढ़ गए पेट्रोल के फिर भाव,   १७
जीवन हुआ दूभर।     ११
*
२३-५-२०१८

ॐ सूचना: दोहा शतक एकादशी संकलन

विश्ववाणी हिंदी संस्थान जबलपुर
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निम्न दोहाकारों ने सहभागिता हेतु सहमति देते हुए दोहा को गति देना आरम्भ कर दिया है । सर्व श्री / सुश्री / श्रीमती अपूर्व श्रीवास्तव, अंकिता निगम, गरिमा अरोरा, हेअमंत पटेल। संकलन में जुड़ने के इच्छुक दोहाकार दोहे व निधि एक साथ भेज दें। विलंब न करें।
*
दोहा लेखन विधान
१. दोहा द्विपदिक छंद है। दोहा में दो पंक्तियाँ (पद) होती हैं। हर पद में दो चरण होते हैं।
२. दोहा मुक्तक छंद है। कथ्य (जो बात कहना चाहें वह) एक दोहे में पूर्ण हो जाना चाहिए। सामान्यत: प्रथम चरण में उद्भव, द्वितीय-तृतीय चरण में विस्तार तथा चतुर्थ चरण में उत्कर्ष या समाहार होता है।
३. विषम (पहला, तीसरा) चरण में १३-१३ तथा सम (दूसरा, चौथा) चरण में ११-११ मात्राएँ होती हैं।
४. तेरह मात्रिक पहले तथा तीसरे चरण के आरंभ में एक शब्द में जगण (लघु गुरु लघु) वर्जित होता है।
५. विषम चरणान्त में 'सरन' तथा सम चरणान्त में 'जात' वरीयता दें। विषम चरणान्त में अन्य गण हो तो लय के प्रति सजग हों
६. विषम कला से आरंभ दोहे के विषम चरण में में कल-बाँट ३ ३ २ ३ २ तथा सम कला से आरम्भ दोहे के विषम चरण में में कल बाँट ४ ४ ३ २ तथा सम चरणों की कल-बाँट ४ ४.३ या ३३ ३ २ ३ होने पर ले सहजता से सध जाती है।
७. हिंदी दोहाकार हिंदी के व्याकरण तथा मात्रा गणना नियमों का पालन करें। दोहा में वर्णिक छंद की तरह लघु को गुरु या गुरु को लघु पढ़ने की छूट नहीं होती।
८. हिंदी में खाय, मुस्काय, आत, भात, आब, जाब, डारि, मुस्कानि, हओ, भओ जैसे देशज / आंचलिक शब्द-रूपों का उपयोग न करें। बोलियों में दोहा रचना करते समय उस बोली का यथासंभव शुद्ध रूप व्यवहार में लाएँ।
९. श्रेष्ठ दोहे में लाक्षणिकता, संक्षिप्तता, मार्मिकता (मर्मबेधकता), आलंकारिकता, स्पष्टता, पूर्णता, सरलता तथा सरसता होना चाहिए।
१०. दोहे में संयोजक शब्दों और, तथा, एवं आदि का प्रयोग यथासंभव न करें। औ' वर्जित 'अरु' स्वीकार्य। 'न' सही, 'ना' गलत। 'इक' गलत।
११. दोहे में कोई भी शब्द अनावश्यक न हो। शब्द-चयन ऐसा हो जिसके निकालने या बदलने पर दोहा अधूरा सा लगे।
१२. दोहा में विराम चिन्हों का प्रयोग यथास्थान अवश्य करें।
१३. दोहे में कारक (ने, को, से, के लिए, का, के, की, में, पर आदि) का प्रयोग कम से कम हो।
१४. दोहा सम तुकांती छंद है। सम चरण के अंत में समान तुक आवश्यक है।
१५. दोहा में लय का महत्वपूर्ण स्थान है। लय के बिना दोहा नहीं कहा जा सकता।
*
मात्रा गणना नियम
१. किसी ध्वनि-खंड को बोलने में लगनेवाले समय के आधार पर मात्रा गिनी जाती है।
२. कम समय में बोले जानेवाले वर्ण या अक्षर की एक तथा अधिक समय में बोले जानेवाले वर्ण या अक्षर की दो मात्राएँ गिनी जाती हैंं। तीन मात्रा के शब्द ॐ, ग्वं आदि संस्कृत में हैं, हिंदी में नहीं।
३. अ, इ, उ, ऋ तथा इन मात्राओं से युक्त वर्ण की एक मात्रा गिनें। उदाहरण- अब = ११ = २, इस = ११ = २, उधर = १११ = ३, ऋषि = ११= २, उऋण १११ = ३ आदि।
४. शेष वर्णों की दो-दो मात्रा गिनें। जैसे- आम = २१ = ३, काकी = २२ = ४, फूले २२ = ४, कैकेई = २२२ = ६, कोकिला २१२ = ५, और २१ = ३आदि।
५. शब्द के आरंभ में आधा या संयुक्त अक्षर हो तो उसका कोई प्रभाव नहीं होगा। जैसे गृह = ११ = २, प्रिया = १२ =३ आदि।
६. शब्द के मध्य में आधा अक्षर हो तो उसे पहले के अक्षर के साथ गिनें। जैसे- क्षमा १+२, वक्ष २+१, विप्र २+१, उक्त २+१, प्रयुक्त = १२१ = ४ आदि।
७. रेफ को आधे अक्षर की तरह गिनें। बर्रैया २+२+२आदि।
८. अपवाद स्वरूप कुछ शब्दों के मध्य में आनेवाला आधा अक्षर बादवाले अक्षर के साथ गिना जाता है। जैसे- कन्हैया = क+न्है+या = १२२ = ५आदि।
९. अनुस्वर (आधे म या आधे न के उच्चारण वाले शब्द) के पहले लघु वर्ण हो तो गुरु हो जाता है, पहले गुरु होता तो कोई अंतर नहीं होता। यथा- अंश = अन्श = अं+श = २१ = ३. कुंभ = कुम्भ = २१ = ३, झंडा = झन्डा = झण्डा = २२ = ४आदि।
१०. अनुनासिक (चंद्र बिंदी) से मात्रा में कोई अंतर नहीं होता। धँस = ११ = २आदि। हँस = ११ =२, हंस = २१ = ३ आदि।
मात्रा गणना करते समय शब्द का उच्चारण करने से लघु-गुरु निर्धारण में सुविधा होती है। इस सारस्वत अनुष्ठान में आपका स्वागत है। कोई शंका होने पर संपर्क करें।
*

मंगलवार, 22 मई 2018

साहित्य त्रिवेणी: छाया सक्सेना -बघेली लोकगीतों में छंद

बघेली लोकगीतों में छंद
 छाया सक्सेना ' प्रभु '
परिचय: जन्म १५.८.१९७१, रीवा (म.प्र.)। शिक्षा: बी.एससी. बी.एड., एम.ए. राजनीति विज्ञान, एम.फिल.), संपर्क: १२ माँ नर्मदे नगर, फेज़ १, बिलहरी, जबलपुर म.प्र., चलभाष ९४०६०३४७०३ ईमेल: chhayasaxena2508@gmail.com

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वर्णों  का ऐसा संयोजन जो मन को आह्लादित करे तथा जिससे रचनाओँ को एक लय में निरूपित किया जा सके छंद कहलाता है 'छन्दनासि  छादनात' सभी उत्कृष्ट पद्य रचनाओँ का आधार छंद होता है। बघेली काव्य साहित्य छंदों से समृद्ध है, काव्य जब छंद के आधार पर सृजित होता है तो हृदय में सौंदर्यबोध, स्थायित्व, सरस, मानवीय भावनाओं को उजागर करने की शाक्ति, नियमों के अनुसार धारा प्रवाह, लय आदि द्रष्टव्य होते हैं। लोक साहित्य, लोकगीतों में ही दृष्टव्य  होते हैं इनका स्वरूप विश्लेषण करने पर हम पाते हैं कि ये लोक कल्याण की भावना से सृजित किये गए हैं । इनका सृजन तो एक व्यक्ति करता है किंतु उसका दूरगामी प्रभाव विस्तृत होता है। अपने परंपरागत रूप में यह सामान्य व्यक्तियों द्वारा उनकी भावनाएँ व्यक्त करने का माध्यम बनता है। लोक-साहित्य पांडित्य की दृष्टि से परिपूर्ण भेले ही न रहा हो पर इनके सृजनकार भावनात्मक रूप से  सुदृढ़ रहे इसलिए ये गीत जनगण के मन में अपनी गहरी पैठ बनाने में समर्थ और कालजयी हो सके।
लोकगीत
लोकगीत लोक के गीत हैं जिन्हें कोई एक व्यक्ति नहीं बल्कि पूरा स्थानीय समाज अपनाता, गुनगुनाता है, गाता हैै। सामान्यतः लोक में प्रचलित, लोक द्वारा रचित एवं लोक के  लिए लिखे गए गीतों को लोकगीत कहते हैं । डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल के अनुसार “लोकगीत किसी संस्कृति के मुख बोलते चित्र हैं ।“ 
लोकगीतों में छंदों के स्वरूप के साथ-साथ मुहावरे, कहावतें व सकारात्मक संदेश भी अन्तर्निहित होते हैं जिनका उद्देश्य मनोरंजन मात्र नहीं अपितु भावी पीढ़ियों को सहृदय बनाना भी रहता है। अपनी बोली में सृजन करने पर भावों में अधिक स्पष्टता होती है। सामान्यत: लोकगीत मानव के विकास के साथ ही विकसित होते गए, अपने परंपरागत रूप में अनपढ़ किंतु लोक कल्याण की भावना रखनेवाले  लोगों द्वारा ये संप्रेषित हुए हैं। लोगों ने जो समाज में देखा-समझा उसे ही भावी पीढ़ी को बताया। आत्मानुभूत होने के कारण लोकसाहित्य की जड़ें बहुत गहरी हैं। हम कह सकते हैं कि हमारे संस्कारों को बचाने में  लोक साहित्य का बहुत बड़ा योगदान है ।

बघेली
बघेली बघेलखंड (मध्य प्रदेश के रीवा,सतना,सीधी, शहडोल ज़िले) में बोली जाती है। यहाँ के निवासी को 'बघेलखण्डी', 'बघेल', 'रिमही' या 'रिवई' कहे जाते हैं। बघेली में ‘व’ के स्थान पर ‘ब’ का अत्यधिक प्रयोग होता है। कर्म और संप्रदान कारकों के लिये ‘कः’ तथा करण व अपादान कारकों के लिये ‘कार’ परसर्गों का प्रयोग किया जाता है। ‘ए’ और ‘ओ’ ध्वनियों का उच्चारण करते हुए बघेली में ‘य’ और ‘व’ ध्वनियों का मिश्रण करने की प्रवृत्ति है।  सामान्य जन बोलते समय  'श' और 'स' में भी ज्यादा भेद नहीं मानते हैं। बघेली जन लोकपरंपरा में प्रचलित सभी संस्कारों को संपन्न करते समय ही नहीं ऋतु परिवर्तन, पर्व-त्यौहार आदि हर अवसर पर गीत गाते हैं। बघेलखंडी लोकगीतों में सोहर , कुंवा पूजा, मुंडन, बरुआ, विवाह, सोहाग, बेलनहाई, ढ़िमरहाई, धुबियाई, गारी गीत, परछन, बारहमासी, दादरा, कजरी, हिंडोले का गीत, बाबा फाग, खड़ा डग्गा, डग्गा तीन ताला आदि प्रमुख हैं। ये लोकगीत न केवल मनोरंजन करते हैं वरन जीने की कला भी सिखलाते हैं ।
सोहर
बच्चे के जन्मोत्सव पर  गाए जानेवाले गीत को सोहर कहते हैं। सभी महिलाएँ प्रसन्नतापूर्वक एक लय में सोहर गीत गाती है। सोहर गीत केवल महिलाएँ गाती हैं, पुरुष इन्हें नहीं गाते।  
तिथि नउमी चइत सुदी आई हो, राम धरती पधरिहीं।      १८-१२ 
बाजइ मने शहनाई हो,  राम धरती  पधरिहीं।।                  १४-१२ 

धरिहीं रूप सुघर पुनि रघुवर, खेलिहिं अज अँगनइया।       १६-१२ 
बड़भागी दसरथ पुनि बनिहीं, कोखि कौसिला मइया ।।      १६-१२ 

मनबा न फूला समाई हो, राम .....                                १६-१२ 
इस बघेली लोक गीत में शब्द-संयोजन का लालित्य और स्वाभाविकता देखते ही बनती है। लोकगीत छंद-विधान का कडाई से पालन न कर उनमें छूट ले लेते हैं। लोकगायक अपने गायन-क्षमता, अवसरानुकूलता, कथ्य की आवश्यकता और श्रोताओं की रूचि के अनुकूल शब्द जोड़-घटा लेते हैं। मुख्य ध्यान कथ्य पर दिया जाता है जबकि मात्राओं / वर्णों की घट-बढ़ सहज स्वीकार्य होती है। इस कारण इन्हें मानक छंदानुसार वर्गीकृत करना सहज नहीं है।   
जौने दिना राम जनम भे हैं                               १७ / ११ 
धरती अनंद भई-धरती अनंद भई हैं हो              २६ / १८ 
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गउवन लुटि भई-गउवन लुटि भई हो                 २० / १७ 
आवा गउवन के नाते एक कपिला                      २१ / १४ 
रमइयां मुँह दूध पियें- रमइया मुँह दूध पिये हो    २८ /२१   
जौने दिना राम जनम भे हैं हो                             १९ / १२                  
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सोनवन लुटि भई- सोनवन लुटि भई हो                २० / १७ 
आवा सोनवा के नाते एक बेसरिया                       २३ / १४ 
कौशिला नाके सोहै- कौशिला नाके सोहइ हो         २८ /  १६ 
जौने दिना राम जनम भे हैं हो                              १९ / १२
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रुपवन लुटि भई- रुपवन लुटि भई हो                    २०/ १७ 
आवा रुपवा के नाते एक जेहरिया                         २३ / १४  
कौशिला पायें सोहै, कौशिला पायें सोहइ हो            २८ / १६ 
जौने दिना राम जनम भे हैं हो                                १९  / १२ 

अधिकतर सोहर गीत राम-जन्म पर ही आधारित हैं।  इनकी बाहुल्यता यहाँ देखी जा सकती है ।
सोहर 
कारै पिअर घुनघुनवा तौ हटिया बिकायं आये / हटिया बिकाय आये हो
साहेब हमही घुनघुनवा कै साधि / घुनघुनवा हम लैबे-घुनघुनवा हम लेबई हो
नहि तुम्हरे भइया भतिजवा / न कोरवा बलकवा-न कोरवा बलकवउ हो
घुनघुनवा किन खेलइं हो / 
हंकरउ नगर केर पंडित हंकरि वेगि लावा / हंकरि वेगि लायउ हो
पंडित ऐसेन सुदिन बनावा नेहर चली जाबई हो / नैहर चली जाबई हो
हंकरहु नगर केर कहरा-हंकरि वेगि आवा / हंकर वेगि लावहु हो
रामा चन्दन डड़िया सजावा नैहर पहुंचावा / नेहरि पहुंचावहु हो
जातइ माया का मेटबै बैठतइ ओरहन देबई / बैठतइ आरहन देबई हो
माया तिरिया जनम काहे दीन्ह्या ब / बझिन कहवाया-बझिनि कहवायउ हो
जातइ काकी का मेटबई बैठतइ ओरहन देबई / बैठतइ ओरहन देबई हो
काकी धेरिया जनम काहे दीन्ह्या / बझिनि कहवाया बझिनि कहवायउ हो
जातइ भौजी का भटबै बैठतइ ओरहन देबई / बैठतइ ओरहन देबई हो
ऐसेन ननंदी जो पाया बझिन कहवाया / बझिनि कहवायउ हो।
बेटी तुहिनि मोर बेटी तुहिनि मोर सब कुछ हो
बेटी थर भर लेहु तुम मोतिया उपर धरा नरियर / उपर धरौ नरियर हो
बेटी उतै का सुरिज मनावा / सुरिज पूत देइहैं सुरिज पूत देइहै हो
होत विहान पही फाटत लालन भेहंइ होरिल में हइं हो
आवा बजई लागीं अनंद बघइया गवैं सखि सोहर / गवैं सखि सोहर हो
हंकरहु नगर केर सोनरा हंकरि वेगि लावा / हंकरि वेगि लावहु हो
सोनरा सोने रूपे गढ़ा घुनघुनवा तो धना का मनाय लई / धना का मनाय लई हो
हंकरहु नगर केरि कहरा हंकरि वेगि आवा / हंकरि वेगि लावउ हो
कहरा चन्दन डड़िया सजावां / तो धना का मनाई लई-धना का मनाई लई हो
एक बन गै हैं दुसर बन तिसरे ब्रिन्दाबन / तिसरे ब्रिन्दाबन हो
रामा पैठि परे गजओबरी तौ धना का मनाबै / तौ धना का मनावई हो
धनिया तुहिनि मोर धनिया तुहिनि मोर सब कुछ हो
धनिया छाड़ि देहु मन का विरोग घुनघुनवा तुम खेलहु / घुनघुनवा तुम खेलहु हो
नहि मारे भइया भतिजवा नहि कोरवा बलकवा घुनघुनवा किन खेलई
घुनघुनवा किन खेलई हो
घुनघुनवा तो खेलई तुम्हारी माया बहिनिउ तुम्हारिउ हो
रामा और तौ खेलई परोसिन जउन भिरूवाइसि हो
जउन भिरूवाइसि हो 

*
माघै केरी दुइजिया तौ भौजी नहाइनि
भौजी नहाइनि हो
रामा परि गा कनैरि का फूल मनै मुसकानी
मनै मुसक्यानी है हो

माया गनैदस मास बहिनी दस आंगुरि
बहिनी दस आंगुरि हो
भइया भउजी के दिन निचकानि तौ भउजी लइ आवा
भउजी लेवाय लावा हो
सोवत रहिउं अंटरिया सपन एक देखेउं हो
सपन एक देखेउं हो
माया जिन प्रभु घोड़े असवार डड़िया चंदन केरी
डड़िया चन्दन केरी हो
बेटी तुहिनि मोर बेटी तुहिनि मोर सब कुछ हो
बेटी खाय लेती नरियर चिरौंजी
तौ डड़िया चन्दन केरी-डड़िया चंदन केरी हो
एक बन नाकि- दुई बन तिसरे ब्रिन्दाबन
तिसरे ब्रिन्दाबन हो
आवा पैठि परे हैं गज ओबरी तौ माया निहारै
तौ माया निहारै हो
मचियन बैठी है सासु तौ हरफ- दरफ करैं
हरफ दरफ करैं हो
बहुआ एक बेरी वेदन निवारा तौ लाला जनम होइहीं
तो लाला जनम होईहीं हो
आपन माया जो होती वेदन हरि लेती
वेदन हरि लेतियं हो
रामा प्रभु जी की माया निठमोहिल
तौ ललन ललन करै होरिल होरिल करैं
ललन ललन करैं होरिल होरिल करैं हो। 

*
कुआं पूजन 
ऊपर बदरा घहरायं रे तरी गोरी पानी का निकरी
ऊपर बदरा घहरायं रे तरी गोरी पानी का निकरी
जाइ कह्या मोरे राजा सुसुर से
द्वारे माँ कुंअना खोदावैं
तौ गोरी धना पानी का निकरीं
ऊपर बदरा घहरायं रे तरी गोरी पानी का निकरी
जाइ कह्या मोरे राजा जेठ से
कुंअना मा जगत बंधावैं तौ गोरी धना पानी का निकरीं
ऊपर बदरा घहरायं रे तरी गोरी पानी का निकरी
जाइ कह्या मोरे बारे देवर जी
रेशम रसरी मंगावैं तौ गोरी धना पानी का निकरीं
ऊपर बदरा घहरायं रे तरी गोरी पानी का निकरी
जाइ कह्या मोरे राजा बलम से
सोने घइलना भंगावैं तौ गोरी धना पानी का निकरीं
ऊपर बदरा घहरायं रे तरी गोरी पानी का निकरी। 
मुंडन
बच्चे के मुंडन संस्कार के समय बुआ अपने भेतीजे के जन्म के समय की झालर (बाल) अपने हाथों में लेती है। सभी सखियाँ  प्रेमपूर्वक गीत गाती हैं-

झलरिया मोरी उलरू झलरिया मोरी झुलरू
झलरिया शिर झुकइं लिलार
अंगन मोरे झाल विरवा
सभवा मा बैठे हैं बाबा कउन सिंह
गोदी बइठे नतिया अरज करैं लाग
हो बव्बा झलरिया मोरी उलरू झलरिया मोरी झुलरू
झलरिया शिर झुकइं लिलार
नतिया से बव्बा अरज सुनावन लाग
सुना भइया आवें देउ बसंत बहार
झलरिया हम देबइ मुड़ाय
फुफुवा जो अइहैं मोहर पांच देबई
झलरिया शिर देबइ मुड़ाय
सभवा भा बैइठे हैं दाऊ कउन सिंह

बधाई गीत
शुभ कार्यों के अवसर पर  शुभकामनाएं प्रेरित करने हेतु बधाई गीत गाए जाते हैं।
धज पताका  घर-घर फहरइहीं,
सजहीं  तोरण  द्वार।
सदावर्त मन खोलि  लुटइहीं,
राजा  परम  उदार।।
देउता  साधू  सुखीं  सब होइहीं,
सरयू  मन हरसइहीं।
वेद पुराण गऊ  गुरु बाम्हन, 
सब मिल जय- जय  गइहीं।।
सुख गंगा  बही हरसाई हो, 
राम जनम  सुखदाई हो।।

शिक्षा गीत 
सीख देते हुए हुए लोककाव्य भी इस अंचल में प्रचलित हैं।  इस रचना में किरीट सवैया द्वारा कीर्ति व अपकीर्ति के कारणों पर प्रकाश डाला गया है:
कीर्ती
पाहन से फल मीठ झरै तरु राह सदा नित छाँव करै कछु ।
झूठ प्रपंचहि दूर रहै सत काम सदा नित   थाम करै कछु । 
हो हिय निर्मल प्रेम दया अभिमान नही तब नाम करै कछु - 
सो नर कीर्ति सदा फलती जब दीनन के हित काम करै कछु ।।

(2) अपकीर्ती 
कंटक राह बिछाइ सदा जग में ब्यभिचार सुलीन रहै जब ।
श्राप सदा हिय में धरता पर का अधिकार कुलीन हरै जब । 
वो बधिता बनिके हर जीव चराचर कष्टहि कार करै  तब - 
सो नरकी अपकीर्ति सदा घट पाप सुरेश सुनीर भरै जब ।।

सुरेश तिवारी खरहरी रीवा
*बरुआ  गीत*
विद्यालय जाने से पूर्व बच्चे से पाटी पूजा करवायी जाती है । बालक जब बड़ा हो जाता है तब उसका बरुआ होता है जनेऊ संस्कार की परंपरा यहाँ बहुत प्रचलित है ।
हरे हरे पर्वत सुअना नेउत दइ आवउ हो
गाँव का नाव न जान्यौं ठकुर नहि चीन्ह्योउ हो
गाँव का नाव अजुध्या ठकुर राजा दशरथ हो
हरे हरे सुअना नेउत दइ आवउ हो
पहिला नेउत राजा दशरथ दुसर कौशिला रानी
तिसरा नेउत रामचन्द्र तौ तीनौ दल आवइं हो।

*दैनिक कार्यों में भी लोग उत्साहित होकर अपने भावों को व्यक्त करते हैं - *
*जनसामान्य द्वारा महुआ बीनते समय गाए जाने वाला गीत--*
*  महुआ केर महातिम  *   
       ॥ कुंडलिया॥  
(1)महुआ केर महातिम गाबइ जुग -जुग बीत जहान , 
ई विशाल बिरछा केर अँग -अँग उपयोगी गुणवान , 
उपयोगी गुणवान , बहुत महुआ का फूल व डोरी , 
बुँकबा , लाटा , चुरा , सुरा , महुआ केर फूल ,महुअरी , 
कह घायल कविराय, गुलग़ुला खाय  लाल भा गलुआ, 
आमजनेन का साल भरे का रोजी -रोटी महुआ । 
,   
(2)नाना औषधि देय महौषधि, महुआ तरु हर अंग , 
झूरा , दारू ,अलकोहल, ई मादक देय तरंग , 
मादक देय तरंग , हराबइरोग बचाबइ जान , 
महुआ रस लाली लसइ, हाली हरय  थकान , 
कह घायल कविराय , कुबुद्धी ! करइ नशा मनमाना' , 
दारू भा बदनाम, तऊ गुन महुआ माही नाना ।

(3)फागुन माही फूलय महुआ बहुत परय भिनसारे , 
छोरा -छोरी , बूढ़ , बहोरिया-
छोड़इं खाट सकारे, 
छोँड़इं खाट सकारे , 
दउड़इं लइ डलिया महुअरिया,
चूसइं महुआफूलमजेसे, बिनइंचिल्ल दुपहरिया , 
कह घायल कविराय ,अन्न से     महंगा महुआ चउगुन  , 
चइत पूर बइशाख, जेठ की चून चढ़ाबइ फागुन ।

(4)धुआँ खरी का साँप भगाबइ हरय रोग चमड़ी का , 
ई चरचरी मा काम बनाबइ , हइ जुगाढिं दमड़ी का , 
हइ जुगाढिं दमड़ी का, महुआ ई गरीब का सोना , 
हरछठि ललहीजिउ! चाहइं -महुआ -दहिउ का दोना , 
कह घायल कविराय जियाबइ खुर , पर , पांउ ई महुआ , 
डोरी तेल बनाबइ साबुन  खरय खरी का धुआँ ।    -घायल-
                              

बघेली जन मानस धार्मिक प्रवत्ति के हैं  हर घर में तुलसी का पौधा, राम कृष्ण के चरित्र का गुणगान करते हुए गीत गाने वाले लोग मिलेंगे, अपनी बोली में  ह्रदय की अभिव्यक्ति और सहज लगती है ....
*बघेली सुंदर काण्ड*
गोड़ लइ परें सीतय जिउ के,पुन घुसें बगइचा जाय।
फर खाईंन अउ बिरबा टोरिंन,दंउ दंहनय दिहिंन मचाय।।
करत रहें तकबारी होंईंन,रामंन के जोधा बहुतेर।
कुछंन का मारिंन हनमानय पुन,रामन लघे भगें कुछफेर।।
एकठे आबा बाँदर सोमीं!,दीन्हिस बाग़ असोक उजारि।
फर खाइस अउ बिरबउ टोरिस,पीटिस सब रखबारि।।
तकबारंन का पसधुर कीन्हिस,पटक पटक दइ मारि।
रामन सुनि सँदेस जोधंन का,भेजिस कइ तइआरि।।
गरजें देखतय जोधंन कांहीं,रामभगत हनमानय।
देखतय देखत जिउ लइ लीन्हिन,महा बली हनमानय।।
पुनि के मिला संदेस रामनय,भेजिस अछय कुमार।
देखतय बड़े जोर चिल्लानें,हनमत मारि दहार।।
एक ठे बिरबा का उखारि के,दउरि परें हनमांन।
अछय कुमार के जिउ लइ लीन्हिन,महयबलिंन हनमांन।।
मुरघेटिआईंन कुछय जनेंन का,कुछंन के जिउलइ लीन्हिन।
पटकि पटकिके धूर चटाईंन,कुछंन क हनमत दइ मारिंन।।
जाय पुकारिंन कुछय जनें पुन,हे रामंन सरकार!।
इआ,बहुतय बलमानीं है बाँदर,रच्छा करी हमार।।

(अठरहमं दोहा),अरुण पयासी
।।
*बघेली महाबानीं*
*राम की महिमा*
"सब कुछु बिसर जाय चाहे मन,या की सुधय पूर आ जाय।
मन ता मधबय के देखे मां, चिन्ता से मुकुती पा जाय।।
मधबय के निहारि दीन्हें मन,पूर सुफल होइ जाय।
फेर का कहैं का आँगू केरे,सबय काम बनिं जाँय।।
अरुण पयासी

*कृष्ण महिमा*
जब कीन्ह राधिका गौर ,  कदम के डाली ।
उत कान्हा बइठा  ठौर,   बजावे  ताली ।।
बाहर आ के ल्या चीर,  सुना  मधुबाला ।
उत  आवत  माखन चोर सुबह नंद लाला ।।

सुरेश तिवारी रीवा
राधिका छंद, 13, 9

बघेलखण्ड में अधिकांश लोग किसानी का कार्य करते  हुए भी साहित्य साधना में लीन रहते हैं उनको लय का ज्ञान भी बहुत है जिससे उनके गीतों में छंद का प्रभाव अनायास ही उभर कर आता है जो मनभावक व कर्ण प्रिय हो जाता है ।
फसल काटते समय का गीत:
अरहरि  कटि खरिहाने  आई, / मसूरी  अँगने  लोटी रही ।
गेहूं  कटे  हमय  खेतन म, / बिटिया  मटरन  क  खरभोटि  रही ।।
गारी
विवाह उत्सव के समय समधियों व मान रिश्तेदारों को चिढ़ाते हुए हँसी ,ठिठोली करने में लिए गारी गयी जाती है ।
झुल्लूर  गुल्ली, बब्बू  मुन्ना, रानिया टेटबन  काटैं।
पढ़े लिखै मा छाती फाटिगे, यहै  चोखैती चाटैं।
हम काहे का मसका मारी, चला फलाने  सोई।
तीस साल के वर अब बागैं, काज कहाँ  से होई।।

अंगने मोरे नीम लहरिया लेय / अंगने मोरे हो
जहना कउन सिंह गाड़े हिडोलना / गाड़े हिडोलना
अरे उन कर दिद्दा हरसिया झूलि झूलि जायं
अंगने मोरे नीम लहरिया लेय अंगने मां
जहना कउन सिंह गाडे हिडोलना गाड़े हिडोलना
उन कर फूफू हरसिया झूलि झूलि जायं
अंगने मां नीम लहरिया लेय-अंगने मां

माँ की महिमा
केखे तार ही महतारी अस, तारिउ होय कहाँ से?।
महतारी हय जबर बिस्स मां, अउरउ सबय जंहाँ से।।
हिरदंय के चाहत,राहत के, परम आसरा आय।
महतारी के माँन करब ता, इस्सर पूजा आय।।    -अरुण पयासी  

परछन
सास द्वारा परछन करते समय उपस्थित सभी महिलाओं द्वारा गाया जाने वाला गीत -

लाला खोला खोला केमरिया हो / मैं देखौं तोरी धना
धौं सांवरि हैं धौं गोरि / देखौं मैं तोरी धना
लाला खोला केमरिया हो / मैं देखौं तोरी धना

मनोरंजन हेतु दादरा का प्रचलन भी यहाँ देखने को मिलता है-
डग्गा तीन ताला
सुरति रहे तो सुअना ले गा / बोल के अमृत बोल
नटई रहै तो कोइली लै गे / चढ़ि बोलइ लखराम

एतनी देर भय आये रैन न एकौ लाग
कोइली न लेय बसेरा न करन सुआ खहराय....

बघेली साहित्य न केवल मनोरंजन कर रहा है वरन सामाजिक मूल्यों के संरक्षण एवं विकास की दिशा में चेतना जागृत कर  व्यक्ति के जीवन को सुखी व अमूल्य बना रहा है । यहाँ के गीतों की एक विशिष्ट लय है जिसका आधार छंद है,  अधिकांश गीत धार्मिक परिवेश से प्रभावित  हैं ।
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भूकंपीय याद

गर्जा था भूकंप ज्यों, शत गज रहे चिंघाड़।
लज्जित हो वनराज भी, भूला आप दहाड़।।
*

रविवार, 20 मई 2018

मुक्तिका: जिंदगी की इमारत

जिंदगी की इमारत में,  नींव हो विश्वास की।
प्रयासों की दिवालें हों,  छत्र हों नव आस की।
*
बीम संयम की सुदृढ़,  मजबूत  कॉलम नियम के।
करें प्रबलीकरण रिश्ते, खिड़कियाँ हों हास की।।
*
कर तराई प्रेम से नित, छपाई कर नीति से।
ध्यान  धरना दरारें बिलकुल न हों संत्रास की।।
*
रेत कसरत, गिट्टियाँ शिक्षा, कला सीमेंट हो।
फर्श श्रम का,  मोगरा सी गंध हो वातास की।।
*
उजाला शुभकामना का,  द्वार हो सद्भाव का।
हौसला विद्युतिकरण हो, रौशनी सुमिठास की।।
*
फेंसिंग व्यायाम, लिंटल मित्रता के हों 'सलिल'।
बालकनियाँ पड़ोसी अपनत्व के अहसास की।।
*
वरांडे हो मित्र, स्नानागार सलिला सरोवर।
पाकशाला तृप्ति, पूजास्थली हो सन्यास की।।
***
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दोहा

दोहा दुनिया आज की:
*
छीन रहे थे और के, मुँह से रोटी-कौर.
अपने मुँह से छिन गया, आया ऐसा दौर.
*
कर्नाटक में गिर गए,  औंधे मुँह खो लाज।
शाह लबारी हारकर, जीती बाजी-ताज।।

*
कर्नाटक में गिर गए,  औंधे मुँह खो लाज।
शाह लबारी हारकर, जीती बाजी-ताज।।

*
समय छोड़ पाया नहीं, अपना तनिक प्रभाव
तब सा अब भी चेहरा, आदत, मृदुल स्वभाव

*
मार पड़े जब समय की, बढ़ता अनुभव-तेज।
तब करते थे जंग, रंग जमा हुए रंगरेज
मन बच्चा-सच्चा रहे, कच्चा तन बदनाम।  
बिन टूटे बादाम हो, टूटे तो बेदाम।। 
*
कैसे हैं? क्या होएँगे?, सोच न आती काम। 
जैसा चाहे विधि रखे, करे न बस बेकाम।
*
कांता जैसी चाँदनी, लिये हाथ में हाथ।
कांत चाँद सा सोहता, सदा उठाए माथ।।
*  
मिल कर भी मिलती नहीं, मंजिल खेले खेल। 
यात्रा होती रहे तो, हर मुश्किल लें झेल।।  
*

बाल बाल बच रहे हम, बाल-बाल 

शिव सूत्र: श्री श्री रविशंकर

दोहांतरण
श्री श्री रविशंकर:शिवसूत्र
प्रथम खंड: चैतन्य आत्मा
*
शुभ जीवन में घट रहा, पर मन जाता भूल।
अशुभ नकारात्मक पकड़, नाहक देते तूल।।
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यही नकारात्मक अशुभ, अपना हुआ स्वभाव।
मुक्ति मिले शिवसूत्र से, शुभ का बढ़े प्रभाव।।
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शिव शुभ सुंदर सत्य से, कर सकते भव पार।
है उपाय शिव सूत्र ही, भव से तारणहार।।
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शिव कहते: चैतन्य है, आत्मा; करो तलाश।
वस्तु नहीं; वह दूर भी, नहीं; पा सको काश।।
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सकल सृष्टि जिससे बनी, आत्मा वह चैतन्य।
अपना अनुभव भी हमें, करा रहा अन-अन्य।।
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बढ़ता जब चैतन्य तब, बढ़ जाता है होश।
सोया खुद को जानकर, भी रहता बेहोश।।
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मनु सोया या जागता, दोनों में चैतन्य।
सोया जान न पा रहा, जागा जाने, धन्य।।
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संजीव, 20.5.2018
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