बुधवार, 15 अगस्त 2018

ॐ दोहा शतक विशम्भर दयाल शुक्ल


दोहा शतक
आनंदित होकर जिएँ
प्रो. विशम्भर दयाल शुक्ल
















जन्म: २०.२.१९४७, ग्राम रहरिया, लखीमपुर खीरी। 
आत्मज: स्व. विद्यावती-स्व.बनवारीलाल शुक्ल। 
जीवनसंगिनी: श्रीमती सरला शुक्ल। 
काव्यगुरु:
शिक्षा: स्नातकोत्तर अर्थशास्त्र लखनऊ विश्वविद्यालय। 
लेखन विधा:गद्य-पद्य, शोध लेख आदि। 
प्रकाशन:दृगों में इक समंदर है, मृग कस्तूरी हो जाना, कई साझा संकलन। 
संपादन: विहाग प्रीति के, गीतिका है मनोरम सभी के लिए, तन दोहा मन मुक्तिका। 
उपलब्धि: विश्वनाथ गहमरी स्मृति सम्मान, गीतिका शिरोमणि  सम्मान, जीवनोपलब्धि सम्मान, सुप्रभात साहित्य शिरोमणि सम्मान, लोम विभूषण सम्मान, साहित्य श्री सम्मान आदि अनेक सम्मान। अनेक साहित्यिक आयोजनों की अध्यक्षता।  
संप्रति: पूर्व प्राध्यापक, विभागाध्यक्ष व प्राचार्य। संस्थापक-संचालक सार्थक सृजन मंच। 
संपर्क: ८४ ट्रांस गोमती, त्रिवेणी नगर प्रथम, समीप डोलीगंज रेलवे क्रोसिंग, लखनऊ २२६०२०
चलभाष ०९४१५३२५२४६ 
ईमेल: vdshukla01@gmail.com
*

प्रो. विश्वंभर दयाल शुक्ल आधुनिक हिंदी काव्य साहित्य के बहुचर्चित हस्ताक्षर हैं। गेयता, सघन आत्मानुभूति और शैल्पिक प्रयोगधर्मिता आपका वैशिष्ट्य है। सतत शिक्षा जगत से जुड़ाव, अध्यापन के प्रति समर्पण, सेवानिवृत्ति पश्चात् हिंदी मैया की सेवार्थ तन-मन-धन समर्पित कर नयी पीढ़ी को साहित्य-सृजन में दीक्षित करने का सारस्वत यज्ञ आपके नाम को सार्थक करता है। आपके दोहों में कल्पना की प्रचुरता होने पर भी वह कपोल कल्पना से दूर यथार्थ पर आधारित है। सौंदर्य-सृष्टि की सूक्ष्मता शुक्ल जी के दोहों में सहज-सुलभ है-
सुन किलकारी भोर की, विहँसी निशि की कोख। 
तिमिर गया, मुखरित हुआ, जीवन में आलोक।।
श्रेष्ठ-ज्येष्ठ होते हुए भी, तरुणोचित उत्साह से बहु आयामों में सक्रिय शुक्ल जी की ऊर्जा का रहस्य चिंतन को चिंता  न बनने देने में है-  जब विलुप्त होने लगे, हृदय पटल से हास।
चिंतन को दे दीजिए, बिन सोचे बनवास।।
जीवन में उमंग और उत्साह के लिए प्रिय-प्रिया का साथ रहना अपरिहार्य है। शुक्ल जी इस जीवन सूत्र को मौसम के साथ सम्बद्ध कर दोहंकित करते हैं-मौसम ने चिट्ठी लिखीलो संज्ञान तुरंत।
काम-काज किस काम केरहो संग प्रिय कंत।।
भारतीय संस्कृति की विशेषता अनेकता में एकता है। धर्म, पंथ, वाद, जाति, दर्शन, दल, भूष-भाषा हर क्षेत्र में विविधता के बावजूद मतभेद को मनभेद न बनने देना ही एकता का सूत्र है। भाषा के संबंध में सूकल जी का स्पष्ट मत है कि दैनंदिन व्यवहार में आ रहे सभी भाषा-बोलीओं के शांदों का सम्मिश्रण ही हिंदी है-
तरह तरह की बोलियाँ, बहु भाषा उपलब्ध।
आत्मसात कर लीजिए, बोल-चाल के शब्द।।
राजनीति में नेताओं के साथ पल रही चमचा संस्कृति के वर्चस्व पर शुक्ल जी का कटाक्ष देखें-तब धरती के लाल अब, रुतबा, बत्ती-लाल।                                                                                                      राजनीति की ढाल है, चमचा-तंत्र,कमाल।।
लयात्मकता और माधुर्य को शब्द-शब्द में ढालकर शुक्ल जी सारगर्भित दोहे कहते हैं। नव दोहाकारों के लिए ये दोहे पाठ्य की तरह हैं जिनसे सरल-सहज अभिव्यक्ति का अनुकरण किया जा सकता है। 
***  
शैल-सुता दुर्गा हरें, दैहिक-भौतिक ताप।                                                                                                          महालक्ष्मी-सरस्वती, आद्य -शक्ति हैं आप।।
धर्म; वेद; तप; आचरण, ब्रह्म-स्वरूपा नव्य।
जप की माला हाथ में, गहे कमंडल भव्य।।
शस्त्र गदा औ चक्र हैं भक्ति -शक्ति के तीर।
चन्द्र-घंट विश्रुता माँ हरे मनुज की पीर।।
कूष्मांडा का रूप है सूर्य-लोक विख्यात।
गहे आत्म-विश्वास मन ,करें स्मरण प्रात।।
हे स्कन्द माँ दो हमें अहंकार से मुक्ति।
बढे आत्म-बल,शुचित मन,ऐसी कर दो युक्ति।।
ऋषि-पुत्री कात्यायनी ,तेजोमयी अपार।
भक्ति-शक्ति संजीवनी ,खुला मातु का द्वार।।
कालरात्रि माँ शुभकरी, गर्दभ पर असवार।
दिव्य-स्वरूपा देवि तुम करो ज्योति संचार।।
श्वेत -वृषे आरूढ़ माँ ,श्वेताम्बर है गात।
अष्टवर्ष गौरी करे जीवन सुखद प्रभात।।
सिद्धिदात्री,सिंहवाहिनी,प्रसन्नवदना,चतुर्भुजा।
उपासक शिव,अर्धनारीश्वर हैं लहराकर ध्वजा।।
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मन सिहरा, ठहरा तनिक, देखा अप्रतिम रूप।
भोर सुहानी, सहचरी, पसर गई लोधूप।।  
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सुन किलकारी भोर की, विहँसी  निशि की कोख।
तिमिर गया, मुखरित हुआ, जीवन में आलोक।।
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उगा भाल पर बिंदु सम, शिशु सूरज अरुणाभ।
अब निंदिया की गोद में, रहा कौन सा लाभ।।
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मिलता सज्जन से सदा, स्नेहसिक्त मधुपर्क।
किन्तु भाग्य को क्या कहें, बाधित है संपर्क।।
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शब्द-शब्द भारी लगें, अगर न पाए तोल।
दीर्घ मौन के बाद हों, बोल बहुत अनमोल।।
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नीर सहेजा नयन में, अद्भुत स्नेह अकूत।
ऊर्जस्वित हो महकता, मन-चंदन अभिभूत।।
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लगें अखरने बोल जब, करिए मृदुल प्रयास।
वाणी से कहिये करे, कुछ दिन का उपवास।।
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जब विलुप्त होने लगे, हृदय पटल से हास।
चिंतन को दे दीजिए, बिन सोचे बनवास।।
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स्वस्थ रहें सानंद हों, चिंता करें न रंच।
मुस्काते सब दिन रहें, भूलें व्यर्थ प्रपंच।।
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सदियों से सहता रहा लहरों का उपहास।
सागर है गहरा-अगम, रंच न हुआ उदास।।
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निहित स्वार्थमय हो रहे, अब चर्चित अनुबंध।
टँगे अरगनी पर सभी, आत्मीय सबंध।।
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भृकुटि चढ़ाए रवि उगा, पल-पल बढ़ता ताप।
उर सिंचित मृदु नीर से, रहिए शीतल आप।।
*
अहंकार जिसके ह्रदयदेना नहीं सुझाव।
जो अभिमानी जनम काक्या जाने सद्भाव?
*
आनंदित होकर जिएँ, पढ़ें नेह के छंद।
जीवन सुखकारी सदाहर्ष संग अनुबंध।।
*
हिंदी से अनुराग तो, व्यर्थ न पालें झोल।
तजें कठिन शब्दावली, सरल-सहज हों बोल।
*
तरह तरह की बोलियाँ, बहु भाषा उपलब्ध।
आत्मसात कर लीजिए, बोलचाल के शब्द।।
*
शब्द गढ़ें, साहित्य हो, धनी बढ़े लालित्य।
सकल विश्व में दीप्त हो, हिंदी का आदित्य।।
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हँसिये,खुश रहिये सदा, कभी न हो अवसाद।
इस जीवन को चाहिए, मुस्कानों की खाद।।
*
अधरों पर मृदु बोल हों, मन के भीतर भेद।
जितनी मीठी बाँसुरी, उतने ही हैं छेद।।
*
नारी है तो सृष्टि है, नारी से संसार।
अद्भुत है सन्नारि तू, नमन तुझे सौ बार।।
*
नारी बिंदी भाल कीहै चंदन अभिषेक।
भार्या, भगिनी, सुता, वधु, जननी रूप अनेक।।
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नर -नारी दो चक्र से, जीवन रथ गतिमान।
सहज सुगम समरस सदा, करे संचरित यान।।
*
नारी सैनिक की तरह, सीख युद्ध के ढंग।
अपना सुख बलिदान, कर लड़े त्याग की जंग।।
*
नारी के शत हाथ हैं, सब में दस हथियार।
नारी कोमल फूल है, नारी है अंगार।।
*
बदल गई है भूमिका, शोक करें या हर्ष।
नारी का उत्कर्ष-हित, पुरुषों से संघर्ष।।
*
वाट्स एप पर संगिनीकम्प्यूटर का खेल।
चिंतन-मंथन मियाँ का, किचन, कढाही, तेल।। 
*
प्रिया फेसबुक व्यस्त है, पति परमेश्वर पस्त।
हे सन्नारीआपका, होगा सूर्य न अस्त।।
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फोटो बदला है मगर, वही पुराना फ्रेम।
युगों-युगों तक युगल का, चर्चित अद्भुत प्रेम।।
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लो घिर आए निठुर घन, ऐसा चढ़ा सुरूर।
प्रिय के पग की चाप सुन, मन हो गया मयूर।
*
हिरनी भरे कुलांच ज्यों, उमगा प्यार अनंत।
मेंहदी सूखी हाथ की, कब आयेंगे कंत?
*
तन-मन खूब भिगो गई, सावन की बौछार।
प्रिय संग झूला झूलते, सपनिल रंग हज़ार।
*
सैनन से ही कह गई, गोरी घूंघट ओट।
पिय बिन सावन की झरी, हिय में करे कचोट।।
*
पावस की महफिल सजी, बजते मेह-मृदंग।
बिजुरी, बादर, बावरी, झूमें, नाचें संग।।
*  
आए बादल जोर से, गए मचाकर शोर।
उमस भरी फिर रात है, चटक धूप की भोर।।
*
बारिश होगी झमककर, आ जायेगी बाढ़।
ऐसा तो कुछ भी नहीं, यह कैसा आषाढ़?
*
मौसम के तेवर हुए, तल्ख़-चटक तलवार।
बदरा बरसें जोर से, तन-मन करे पुकार।।
*
चलते-चलते थक गए, कड़ी धूप में पाँव।
पीपल की छैंया नहीं, अभी दूर है गाँव।।
*
मौसम मनमानी करे, उपजाए संदेह।
बूँद सहेजे नेह की, कब आयेंगे मेह?
*
आस जगाता मित्र का, अद्भुत सुना उवाच।
भीड़ लगी हर बैंक में, नाच जमूरे नाच।।
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कोहरा ठंडक झेलती, लंबी लाइन देख।
चिंतातुर इस भीड़ का, कहीं नहीं उल्लेख।।
*
काम-काज रुकने लगे, हुए किवारे बंद।
असंतुष्ट चिल्ला रहे, पढ़ें समर्थक छंद।।
*
मान रहे हम नियति में, कहीं नहीं कुछ खोट।
किन्तु व्यथा है कहाँ से, लहराएँ अब नोट।।
*
विदा यामिनी कह रही, आए भोर अनूप।
शुभ्र-रजत सी चंद्रिका, सोने सी हो धूप।।
*
रश्मि-प्रखर देकर करे, सबका स्वागत नित्य।
कर परिभाषित कर्म को, उगे मित्र आदित्य।।
*
वे बरगद के पेड़ हैंहम निमिया की डाल।
हम गाजर-मूली हुए, वे अरहर की दाल।।
*
मित्र हमारे आजकल, बहुत प्रसन्न-विभोर।
सोच सार्थक सृजक खुदअन्य कलम के चोर।।
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जबसे मुखिया हो गए, लगे हाँकने भेड़।
खेत दूसरे का चरेंकहें- कहाँ की मेड़?
*
आए दिन चर्चा करें, बिन खर्चा, बिन दाम।
नारायण का नाम लो, भली करेंगे राम।।
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इतनी गरमी, लू-लपट, बरस रही है आग।
पल भर की फुर्सत नहीं, भाग जिंदगी भाग।।
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कूलर, पंखा डोलते, खसखसवाली घास।
हुई चिपचिपी ज़िंदगी, गरम-गरम अहसास।।
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हाँफ रहे कूचे-गली, धूल फाँकते गाँव।
पसरी निंदिया चैन से, मिली नीम की छाँव।।
*
सोया छप्पर के तले, बचपन लिए दुलार।
शिशु को आँचल प्यार का, माँ तेरा आभार।।
*
गरम पसीना दुपहरी, और खेत में काम।
मेहनतकश रुकते कहाँ, क्या छैंया, क्या घाम।।
*
कभी न थमती ज़िंदगी, नरम-गरम हैं रूप।
छाँव तनिक ठंडी मिले, बहुत कड़ी है धूप।।  
*
मौसम ने यह क्या किया, उमड़ा नेह अनंत।
प्रियतम के मन में खिला, सुरभित पुष्प बसंत।।
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मदिरगंध से बहकते, दिखे भद्र, श्रीमंत।
लगे चहकने देखिए, क्या जोगीक्या संत।।
*
मौसम ने चिट्ठी लिखीलो संज्ञान तुरंत।
काम-काज किस काम केरहो संग प्रिय कंत।।
*
पथ निहार आँखें थकीं, कब आयेंगे कंत।
हँसी धूप तो हो गई, संभावना अनंत।।
 *
कहीं तृषा बाक़ी अभी, कहीं दे गया बाढ़।
खेत हँसे, धरती मुदितहुआ विदा आषाढ़।।
*
अब आए सावन घटा, हो झूलों की बात।
मृदुल फुहारें प्यार से, सहलाती हों गात।।
*
करे मनुजता आपसे, जब कोई फरियाद।
ह्रदय आपका तब रहे, करुणा से आबाद।।
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चलें लीक से पृथक ही, रहे न रंच प्रमाद।
एक शुभ्र मन्तव्य होजीवन सुफल प्रसाद।।
*
औरों के दुख में सुखीस्वार्थ कुसंग विवाद।
सोचो उनको क्या कभी, धरा करेगी याद।।
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घावों पर मरहम मलेंसुनें सुजन फ़रियाद।
स्नेह, दयाममता करें, आजीवन संवाद।।
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राजनीति के खेल में, फिर से होंगे दाँव।
फिर नेता सहलाएँगे, रमदिनवा के पाँव।।
*
'वफादारको मिल गया, बढ़िया खूब इनाम।
आगे का प्रोग्राम है, अब कुर्सी के नाम।।
*
काम-धाम आगे कभी, फिर देखेंगे यार।
अपना घर भरती सदा, पहले पहले हर सरकार।।
*
चुनी सियासत इसलिए, मिले चकाचक माल।
तर जाएँ सब पीढ़ियाँ, ऐसा करो कमाल।।
*
तब धरती के लाल अब, रुतबा, बत्ती-लाल।
राजनीति की ढाल है, चमचा-तंत्र,कमाल।।
*
वादे-सूर्य उगाइएआश्वासन की धूप।
लूट-बूट की छूट है, क्या उपलब्धि अनूप।।
*
राजनीति के मौर हैं, आप हुए सरपंच।
प्रलय मची हो भले ही, चिंता करें न रंच।।
* 
बबुआ को निबुआ दिखा, रस ले गया निचोड़।
एक फटा कुरता यहाँ, गया निखट्टा छोड़।।
*
औंधे मुँह जब गिरी तो, बोली हुआ बवाल।
खिसियायी गज-गामिनी, शीश चढ़ा वैताल।।
*
करने को है कुछ नहीं, अब आमोद-प्रमोद।
होली पर आनंद लें, बैठ बुआ की गोद।।
*
ये हुड़दंगी जनम के, भाषण के लफ्फाज।
बेनकाब होने लगे, झूठों के सरताज।।
*
हल्ला,धरना मंच परकर नौटंकी पेश।
झूठी कसमें खा रहेनाश करेंगे देश।।
*
सबकी रोज उछाल दें, इनकी टोपी टाप।
कब किसको डसने लगें, आस्तीन के सांप।।
*
बारिश कहीं फुहार है, कहीं कड़ी है धूप।
कैसी लीला राम जीकैसे-कैसे रूप।।
*
कमियाँ ढूँढें गैर की, बड़े शौक से मित्र।
किंतु कभी देखें नहीं, दर्पण में निज-चित्र।।
*
स्वार्थ-लिप्त,मधु-आवरण, गिद्ध-दृष्टि अविराम।
सम्बन्धों को दें सदा, निज-संदर्भ ललाम।।
*
चापलूस, लंपट, चतुर, छद्म स्नेह का खोल।
इनसे दूरी ही भली, चाहे मीठे बोल।।
*
शुभ्र-सौम्य बनकर करें, आत्मीय पहचान।
सिद्ध-हस्त निज लक्ष्य हित, निंदा-निपुण-पुराण।।  
*
लक्ष्य साधते प्यार से, करते शर-संधान।
गली-गली मिल जाएँगे, ऐसे जंतु महान।।
*
लोकतंत्र का मंत्र नव धर्म बिरादर जाति।
चादर मैली हो गई, मिली गज़ब की 'ख्याति'।।
*
दलगत दलदल में हुआ, फलित दलित उपनाम।
धन्य विपक्षी दाँव हैधन्य-धन्य हुक्काम।।
*
जाति -धर्म के डंक से, डसें देश को नोच।
जितने ऊँचे लोग हैं, उतनी ओछी सोच।।
*
सर्वश्रेष्ठ पद देश के, सर्वमान्य हो खोज।
हर विवाद से दूर होलगे न बिलकुल बोझ।।  
*
सत्ता मिलती देखकर, छोड़ न पायें मोह।
कुरसी का सहते नहीं नेता सजग विछोह।।    
*
रश्मि-रश्मि में ऊर्जा, दिव्य सुनहरा घाम।
बिखर गया है स्वर्ण-सुख, लो समेट बिन दाम।।
*
खारा जल, निर्मल ह्रदय, अमृत-विष भरपूर।
पिये अमिय, बाँटे मनुज गरल, खूब दस्तूर।।   
*
जीवन ऐसे घूमता, ज्यों कुम्हार का चाक
नित नूतन निर्माण को, सक्रिय सब दिन हाथ
*
सृजन सृष्टि का अंग, है इसके रूप अनंत
जब हाथों ने छुआ तो, मनुज हो गया संत
*
कच्ची माटी गूंधता, देने को आकार
किसी रँगीले स्वप्न सी, कहता कथा कुम्हार
*
इन हाथों मे छुपी है, सृजन; शमन की शक्ति
इनके ही तो सुफल हैं, नेह; भक्ति; अनुरक्ति।   
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नव ऊर्जा, साहस अमित, मिले कष्ट से त्राण।
प्रबल-शक्ति के पुंज हैं, रघुबर-प्रिय हनुमान।।
दर्शन कर-कर धन्य हैं, कोटिक मन अभिभूत।
सबकी भव-बाधा हरो, हे रघुबर के दूत!।। .
मुदित चित्त है अहर्निश, चित्र नवल अभिराम।
वंदन कोटिक आपका, पुरुषोत्तम श्रीराम।।
मर्यादा श्री राम की, संचेतना अनूप।
सब मनुजों के ह्रदय में, अंकित अभिनव रूप।।
दुर-आग्रह, दुर्गुण हरें, तीक्ष्ण राम के तीर।
अहंकार ,मद ,लोभ से, हो निष्कलुष शरीर।।
छल, अपवंचन, कपट तज, त्याग क्रोध अभिशाप।
हों कृपालु श्रीराम तो, हो जीवन निष्पाप।।
सिया प्रिया से राम का, था अद्भुत अनुराग।
मिली साँच की आँच को, अविश्वास की आग।।
सहन नहीं जब हुआ तो, उपजा हिय बैराग।
शरणागत धरणी हुई ,मातु गई बेदाग़।।
भ्राता से था अनुज को, मोह नेह अनुराग।
सीय-राम सँग वन गए, लक्ष्मण प्रिय को त्याग।।
दंड दिया क्यों प्रिया को,  जिसकी कहीं न लाग।
वृथा उर्मिला ने सहा, चौदह वर्ष विराग।।१०
*
माँ-मुख-मंडल दीप्त है, अप्रतिम श्वेत-स्वरूप।
कमल-पुष्प दुर्गुण-हरण, वृषारूढ़ अभिरूप।।
कलुष-मुक्त करतीं सदा, श्वेत-स्वरूपा भव्य,
मातु वृषभ आरूढ़ हैं,पूरित हों कर्तव्य !
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दैविक ,दैहिक और सब हर लें भौतिक ताप ,
देवि दाहिने हाथ में रखे त्रिशूल त्रिताप !
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वाम-हस्त वारिज गहे,निहित प्रखर सन्देश,
काम,क्रोध अरु लोभ को तज,लो पुण्य-अशेष ! 
*
माँ ब्रह्मचारिणी ~
मन हो जाय पवित्र माँ, सार्थक हो भवितव्य,
शुचित वन्दना,अनुकरण,हो सार्थक कर्तव्य !
*
माँ चंद्रघंटा~
-
दसों हाथ में शस्त्र हैं , चंद्र -घंट है भाल,
आलोकित माँ स्वर्ण सी दैत्य-दुष्ट की काल !
~
चंद्र-घंट की ध्वनि सुनी असुर हुए भयभीत,
मानव के सद्गुण करें दुर्गुण-मन पर जीत !
~
माँ असुरों से युद्ध कर रहती सदा अजेय ,
दस इन्द्रिय का नियंत्रण,लक्ष्य प्राप्ति का ध्येय !
~
*
माँ कुष्मांडा ~
-
अष्ट-भुजा कूष्मांडा, कर्म-योग का तेज,
जीवन को प्रेरित करे, मृदु मुस्कान सहेज !
-
उत्सर्जित ब्रह्मांड है ,माँ का अनुपम हास ,
सूर्य-चक्र में मातु का अप्रतिम शुभ्र निवास !
-
कठिन मार्ग भी सहज हो, किंचित हो न थकान,
संवर्धन की शक्ति है माँ की मृदु मुस्कान !

*
स्कंदमाता ~ 
-
माँ ममता की मूर्ति हैं,कोमल मन के भाव,
शुभ्र-वर्ण तेजस्विनी हरें कष्ट,दुःख,घाव !
-
मातु सिंह आरूढ़ है पद्मासन अभिरूप.
ज्योतित है ब्रह्माण्ड तक माँ की छटा अनूप !
-
आध्यात्मिक मन,जड़ हुए अहंकार औ लोभ,
माँ की छवि तो दर्शना , है विलुप्त विक्षोभ !

-
माँ कात्यायनी ~
महिषासुर संहारिणी ,कात्यायनी स्वरुप ,
करे नष्ट दुर्गुण सभी ,मेधा -शक्ति अनूप !
-
शक्ति-संचरित माँ गहे हाथों में तलवार ,
चंद्र-हास उज्ज्वल करे बुद्धि ,तीक्ष्ण हो धार !
-
निर्मलता, उत्साह दे , तपश्चर्य -मुख-तेज ,
स्वाध्याय,विद्याध्ययन गुण लें सभी सहेज !

*
माँ कालरात्रि ~
~
घोर तिमिर-सा गात है,ग्रीवा विद्युत-माल ,
तीन नेत्र ब्रह्माण्ड से,श्वांस-श्वांस में ज्वाल !
`
रूप भयावह किन्तु माँ सदा करे कल्याण ,
अन्धकार से मुक्ति दे ,करे जीव गतिमान !
`
लोभ,मोह,मद दूर हों,जो हों माँ का ध्यान ,
दुर्गुण भस्मीभूत हों काम,क्रोध ,अभिमान ! 
*
महागौरी ~
कठिन तपस्या में मलिन हुआ मातु का वर्ण,
महादेव ने छुआ फिर गंग नीर उपकर्ण !
~
गौर हुआ विद्दयुत सदृश माँ का उज्ज्वल गात,
तब गौरी के नाम से देवि हुई विख्यात !
~
कान्ति अलौकिक,आस्था,श्रद्धा औ विश्वास ,
शंख,चन्द्र और कुंद सा माँ का तेज उजास !
*सिद्धिदात्री माँ ~
मातु दो कर्तव्यनिष्ठा ,उत्साह दो स्वाध्याय माँ ,
वासना ,तृष्णा नियंत्रित हो शुचित अंतरात्मा !
*
मन सिहरा ,ठहरा तनिक ,देखा अप्रतिम रूप ,
भोर सुहानी ,सहचरी ,पसर गई लो, धूप !
*
रश्मि-रश्मि मे ऊर्जा और सुनहरा घाम,
बिखर गया है स्वर्ण-सुख लो समेट बिन दाम !
*
सुन किलकारी भोर की विहंसी निशि की कोख ,
तिमिर गया ,मुखरित हुआ जीवन में आलोक !
*
उगा भाल पर बिंदु सा लो सूरज अरुणाभ ,
अब निंदिया की गोद में रहा कौन सा लाभ !
*
मिलता सज्जन से सदा स्नेहसिक्त मधुपर्क,
किन्तु भाग्य को क्या कहें बाधित है सम्पर्क ।
*
शब्द शब्द भारी लगें अगर न पाए तोल,
दीर्घ मौन के बाद के बोल बहुत अनमोल ।
¤
नीर सहेजा नयन में अद्भुत स्नेह अकूत,
ऊर्ज्वस्वित होकर खिला मन चन्दन अभिभूत।
°
लगें अखरने बोल जब,करिये मृदुल प्रयास ।
वाणी से कहिये करे,कुछ दिन का उपवास।।
*
जब विलुप्त होने लगे हृदय पटल से हास,
चिन्तन को दे दीजिये बिन सोचे बनवास।
¤
स्वस्थ रहें सानन्द हों चिन्ता करें न रंच ,
मुस्काते सब दिन रहें भूलें व्यर्थ प्रपंच ।
*------------------------------------------------10
सदियों से सहता रहा लहरों का उपहास,
सागर है गहरा,अगम,रंच न हुआ उदास।।
*
निहित स्वार्थ के हो रहे अब चर्चित अनुबंध,
टँगे अरगनी पर सभी आत्मीय सबंध !
*
भृकुटि चढ़ाए रवि उगा पल पल बढ़ता ताप,
उर संचित मृदु नीर से होना शीतल आप !
*
खारा जल,निर्मल ह्रदय,अमृत,विष भरपूर ,
पिये अमिय,बाँटे मनुज गरल,खूब दस्तूर !
*
अहंकार जिसके ह्रदय, देना नहीं सुझाव ,
जो अभिमानी जनम का, जाने क्या सद्भाव ?
*
आनंदित होकर जियें ,पढ़ें नेह के छंद,
जीवन सुखकारी सदा, हर्ष संग अनुबंध !
*
बाबा, अद्भुत लेखनी का कृतज्ञ संसार I
जन 'मानस ' का दे गए तुम अनुपम उपहार II
*
हिन्दी से अनुराग तो व्यर्थ न पालें झोल ,
तजें कठिन शब्दावली ,सरल,सहज हों बोल !
~
हिन्दी की सेवा यही क्लिष्ट उतारें खोल,
आत्मीय लगने लगें ऐसे बोलें बोल !
~
तरह तरह की बोलियां,हर भाषा उपलब्ध ,
आत्मसात कर लीजिए बोलचाल के शब्द !
--------------------------------------------------20
~
शब्द बढ़ें,समृद्धि हो और दिखे लालित्य,
सकल विश्व के शीर्ष पर हिन्दी का आदित्य !
*
हँसिये,खुश रहिये सदा,कभी न हो अवसाद,
इस जीवन को चाहिए,मुस्कानों की खाद !
*
अधरों पर मृदु बोल हों मन के भीतर भेद ,
जितनी मीठी बाँसुरी उतने ही हैं छेद ।
*
नारी है तो सृष्टि है नारी से संसार,
अद्भुत है सन्नारि तू नमन तुझे सौ बार !
*
नारी बिंदी भाल की , चन्दन है ,अभिषेक ,
भार्या ,भगिनी,सुता,वधु जननी रूप अनेक !
*
नर -नारी दो चक्र से जीवन रथ गतिमान,
सहज सुगम समरस सदा करे संचरित यान !
*
नारी सैनिक की तरह विविध युद्ध के ढंग ,
अपना सुख बलिदान कर लड़े त्याग की जंग !
*
नारी के दस हाथ हैं सब में दस हथियार,
नारी कोमल फूल है ,नारी है अंगार I
*
बदल गई है भूमिका शोक करें या हर्ष,
नारी का उत्कर्ष अब पुरुषों का संघर्ष !
*
वाट्स एप पर संगिनी, कम्प्यूटर का खेल ,
चिंतन-मंथन मियाँ का - किचन ,कढाही ,तेल !
----------------------------------------------------- 30
*
प्रिया फेसबुक व्यस्त है ,पति परमेश्वर पस्त ,
हे सन्नारी, आपका कभी न सूरज अस्त !
*
फोटो बदला है मगर वही पुराना फ्रेम,
युगों युगों तक युगल का चर्चित अद्भुत प्रेम !
*
दोहे पावस के
--------------------
घिर आये लो,निठुर घन ,ऐसा चढ़ा सुरूर ,
प्रिय के पग की चाप सुन मन हो गया मयूर !
~
हिरनी भरे कुलांच ज्यों ,उमगा प्यार अनंत,
मेंहदी सूखी हाथ की कब आयेंगे कंत ?
~
तन-मन खूब भिगो गई सावन की बौछार,
प्रिय संग झूला झूलते सपनिल रंग हज़ार !
~
सैनन से ही कह गई गोरी घूंघट ओट ,
पिय बिन सावन की झरी हिय में करे कचोट !
~
पावस की महफिल सजी बजते मेह-मृदंग,
बिजुरी,बादर,बावरी झूमें,नाचें संग !
*
दोहे मौसम के ~
~
आये बादल जोर से गए मचाकर शोर ,
उमस भरी फिर रात है,चटक धूप की भोर !
`
बारिश होगी झमक कर आ जायेगी बाढ़ ,
ऐसा तो कुछ भी नहीं यह कैसा आषाढ़ ?
`
मौसम के तेवर हुए तल्ख़ -चटक तलवार ,
बदरा बरसें जोर से तन -मन करे पुकार !
---------------------------------------------------- 40
`
चलते-चलते थक गए कड़ी धूप में पाँव,
पीपल की छैंया कहे अभी दूर है गाँव !
`
मौसम मनमानी करे उपजाए संदेह ,
बूँद सहेजे नेह की कब आयेंगे मेह ?
*
दोहावली~
```````````````````````````

मानस का चन्दन लगा हुआ सुशुभ्र ललाट ,
तुलसी का व्यक्तित्व है अनुपम,गहन ,विराट !
~
बाबा ने जो रच दिया ,अमिट शिला पर लेख,
बात -बात में देख लो,मानस का उल्लेख !
~
तन-मन पुलकित राममय हैं सिंचित घर ,द्वार,
जो तुलसी होते नही बहती कैसे धार !
~
तुलसी प्रासंगिक बहुत और सार्थक आज ,
राम -चरित का अनुसरण कर ले अगर समाज !
~
ब्रह्म-वाक्य चौपाइयां,दोहे ,छंद ललाम ,
ऐसे रचनाकार को कोटिक नमन,प्रणाम !
*
आस जगाता मित्र का अद्भुत सुना उवाच ,
भीड़ लगी हर बैंक में नाच जमूरे नाच I
~
कोहरा ठंडक झेलती लंबी लाइन देख ,
चिंतातुर इस भीड़ का कहीं नहीं उल्लेख I
~
काम-काज रुकने लगे हुए किवारे बंद ,
असंतुष्ट चिल्ला रहे पढ़ें समर्थक छंद I
----------------------------------------------- 50
~
मान रहे हम नियति में कहीं नहीं कुछ खोट ,
किन्तु व्यथा है कहाँ से लहराएं अब नोट I
*
विदा यामिनी कह रही ,आये भोर अनूप ,
शुभ्र-रजत सी चंद्रिका ,ऐसी फैले धूप !
~
रश्मि-प्रखर देकर करे सबका स्वागत नित्य,
कर परिभाषित कर्म को उगे मित्र आदित्य !
*
वे बरगद के पेड़ हैं, हम निबिया की डाल,
हम गाजर-मूली हुए,वे अरहर की दाल !
*
मित्र हमारे आजकल बहुत प्रसन्न,विभोर ,
वही सार्थक सृजन हैं, अन्य कलम के चोर !
*
जबसे मुखिया हो गए लगे हाँकने भेड,
खेत दूसरे का चरें, कहें - कहाँ की मेड ?
*
आये दिन चर्चा करें बिन खर्चा ,बिन दाम
नारायण का नाम लो भली करेंगे राम !
*
*
बेशरम दोहे गरमी के
-
इतनी गरमी ,लू-लपट ,बरस रही है आग ,
फिर भी तो फुर्सत नहीं,भाग ज़िन्दगी भाग l
कूलर,पंखा डोलते,खसखस वाली घास ,
हुई चिपचिपी ज़िंदगी गरम गरम अहसास l
हाँफ रहे कूचे-गली ,धूल फाँकते गाँव ,
पसरी निदिया चैन से मिली नीम की छाँव l
सोया छप्पर के तले बचपन लिए दुलार,
शिशु को आँचल प्यार का ,माँ तेरा आभार l
------------------------------------------------------------- 60
गरम पसीना दुपहरी और खेत में काम,
मेहनतकश रुकते कहाँ ,क्या छैंया ,क्या घाम l
कभी न थमती ज़िंदगी नरम-गरम हैं रूप ,
छाँव तनिक ठंडी मिले बहुत कड़ी है धूप l
*
दोहे बसंत के -
*
मौसम ने यह क्या किया उमडा नेह अनंत ,
प्रियतम के मन में खिला सुरभित पुष्प बसंत !
*
मदिर, गंध से बहकते दिखे भद्र ,श्रीमंत ,
लगे चहकने देखिये क्या जोगी, क्या संत !
*
मौसम ने चिट्ठी लिखी, लो,संज्ञान तुरंत,
काम-काज किस काम के, आओ प्रिय-संग कंत !
*
पथ निहार आँखें थकीं ,कब आयेंगे कंत,
हँसी धूप तो हो गई संभावना अनंत !
*
कहीं तृषा बाक़ी अभी ,कहीं दे गया बाढ़,
खेत हँसे,धरती मुदित, हुआ विदा आषाढ़ !
*
अब आये सावन घटा हो झूलों की बात,
मृदुल फुहारें प्यार से सहलाती हों गात !
*
करे मनुजता आपसे जब कोई फरियाद ,
ह्रदय आपका तब दिखे करुणा से आबाद I
*
चलें लीक से पृथक ही रहे न रंच प्रमाद,
एक शुभ्र मन्तव्य हो, जीवन सुफल प्रसाद I
................................................................... 70
*
औरों के दुख में सुखी, स्वार्थ ,कुसंग , विवाद,
सोचो उनको क्या कभी धरा करेगी याद I
*
घावों पर मरहम मलें, सुनें सुजन फ़रियाद
स्नेह ,दया, ममता करें जीवन भर संवाद !
*
इक गरीब की मेहनत, खाए रोटी-नून,
उसका जो शोषण करे देखेगा क़ानून !
*
सुन चुनाव की घोषणा शोक करें या हर्ष,
उनके आगे कुर्सियां , अपने आगे फर्श !
*
राजनीति के खेल में फिर से होंगे दांव,
फिर से ये सहलायेंगे रमदिनवा के पाँव !
*
नारों ,वादों की हुई फिर से गर्म बजार ,
सुविधाओं के नाम पर दुविधा का अम्बार !
*
आज नकद का काम है,कल का रहा उधार ,
कुर्सी किसके नाम हो जपिये बारम्बार !
*
सबको रेबड़ी बट गई ,शोक करें या हर्ष,
इनके आगे कुर्सियां ,उनके आगे फर्श !
*
'वफादार' को मिल गया बढ़िया खूब इनाम ,
आगे का प्रोग्राम है अब कुर्सी के नाम !
*
काम धाम आगे कभी फिर देखेंगे यार,
अपना घर भर लीजिये पहले अबकी बार I
--------------------------------------------------- 80
*
चुनी सियासत इसलिए मिले चकाचक माल,
तर जायें सब पीढ़ियाँ ऐसा करो कमाल !
*
तब धरती के लाल, अब रुतबा,बत्ती-लाल ,
राजनीति की ढाल है चमचा -तंत्र,कमाल !
*
वादे लादे जाइये, आश्वासन की धूप ,
लूट,बूट की छूट है ,क्या उपलब्धि अनूप !
*
राजनीति के मौर हैं आप हुए सरपंच
प्रलय मची हो भले ही चिंता करें न रंच !
*
व्यंग्य ~
````````
गई हनक,कुरसी छिनी ,उड़े ठाठ औ वाट,
यारी ने ऐसा किया खड़ी हो गई खाट l
*
बबुआ को निबुआ दिखा रस ले गया निचोड़,
एक फटा कुरता यहाँ गया निखट्टा छोड़ l
*
औंधे मुँह जब गिरी तो बोली हुआ बवाल ,
खिसियायी गज-गामिनी के सिर पर वैताल l
*
करने को है कुछ नहीं अब आमोद-प्रमोद,
होली पर आनंद लें बैठ बुआ की गोद l
*
ये हुडदंगी जनम के भाषण के लफ्फाज,
बेनकाब होने लगे झूठों के सरताज !
*
हल्ला,धरना मंच पर, कर नौटंकी पेश,
झूठी कसमें खा गए , नाश करेंगे देश !
---------------------------------------------- 90
*
सबकी रोज उछाल दें ,इनकी टोपी टाप ,
कब किसको डसने लगें आस्तीन के सांप !
*
बारिश कहीं फुहार है कहीं कड़ी है धूप,
तेरी लीला राम जी, कैसे कैसे रूप !
*
कमियाँ ढूँढें गैर की बड़े शौक से मित्र,
किन्तु कभी देखें नहीं दर्पण में निज-चित्र !
*
स्वार्थ-लिप्त,मधु-आवरण,गिद्ध-दृष्टि अविराम,
सम्बन्धों को दें सदा निज-सन्दर्भ ललाम !
*
चापलूस ,लम्पट,चतुर छद्म - स्नेह का खोल,
इनसे दूरी ही भली मीठे इनके बोल !
*
शुभ्र,सौम्य बनकर करें आत्मीय पहचान,
सिद्ध-हस्त निज लक्ष्य हित,निंदा-निपुण-पुराण !
*
लक्ष्य साधते प्यार से,करते शर-संधान,
गली-गली मिल जायेंगे ऐसे जंतु महान !
*
ये दोहे , सोहे न सोहे !
````````````````````````
लोकतंत्र का मन्त्र नव धर्म,बिरादर,जाति,
चादर मैली हो गई मिली गज़ब की 'ख्याति' I
*
दलगत दलदल में हुआ फलित दलित उपनाम,
धन्य विपक्षी दाँव है, धन्य-धन्य हुक्काम I
*
जाति -धर्म के डंक से डसें देश को नोच ,
जितने ऊँचे लोग हैं उतनी ओछी सोच I
---------------------------------------------- ----100
*
सर्वश्रेष्ठ पद देश के सर्वमान्य हो खोज,
हर विवाद से दूर हो, लगे न बिलकुल बोझ I
*
सत्ता मिलती देखकर छोड़ न पायें मोह,
कुरसी का सहते नहीं नेता सजग विछोह !
*
दोहे बसंत के -
*
मौसम ने यह क्या किया उमडा नेह अनंत ,
प्रियतम के मन में खिला सुरभित पुष्प बसंत !
*
मदिर, गंध से बहकते दिखे भद्र ,श्रीमंत ,
लगे चहकने देखिये क्या जोगी, क्या संत !
*
मौसम ने चिट्ठी लिखी, लो,संज्ञान तुरंत,
काम-काज किस काम के, आओ प्रिय-संग कंत !
*
पथ निहार आँखें थकीं ,कब आयेंगे कंत,
हँसी धूप तो हो गई संभावना अनंत !
*
कहीं तृषा बाक़ी अभी ,कहीं दे गया बाढ़,
खेत हँसे,धरती मुदित, हुआ विदा आषाढ़ !
*
अब आये सावन घटा हो झूलों की बात,
मृदुल फुहारें प्यार से सहलाती हों गात !


*
करे मनुजता आपसे जब कोई फरियाद ,
ह्रदय आपका तब दिखे करुणा से आबाद I
*
चलें लीक से पृथक ही रहे न रंच प्रमाद,
एक शुभ्र मन्तव्य हो, जीवन सुफल प्रसाद I
*
औरों के दुख में सुख, स्वार्थ ,कुसंग , विवाद,
सोचो उनको क्या कभी धरा करेगी याद I
*
घावों पर मरहम मलें, सुनें सुजन फ़रियाद
स्नेह ,दया, ममता करें जीवन भर संवाद !
-----------------------------------------------------112

  
*
बाबा, अद्भुत लेखनी, का कृतज्ञ संसार I
जन 'मानस ' का दे गए तुम अनुपम उपहारII 
*
हिंदी की सेवा यही, क्लिष्ट उतारें खोल।
आत्मीय लगने लगें ऐसे बोलें बोल।।
*    
मानस का चंदन लगा, हुआ सुशुभ्र ललाट।
तुलसी का व्यक्तित्व है, अनुपम, गहन, विराट।।    
*
बाबा ने जो रच दिया, समय-शिला पर लेख।
बात-बात में देख लो, मानस का उल्लेख।।
*
तन-मन पुलकित राममय, हैं सिंचित घर-द्वार।   
जो तुलसी होते नहीं, बहती कैसे धार।।
*
तुलसी प्रासंगिक बहुत और सार्थक आज।
राम -चरित का अनुसरण कर ले अगर समाज।। 
~
ब्रह्म-वाक्य चौपाइयाँ, दोहे, छंद ललाम।
ऐसे रचनाकार को, कोटिक नमन, प्रणाम।।  
*
इक गरीब की मेहनत, खाए रोटी-नून।
उसका जो शोषण करे, देखेगा क़ानून।।
*
सुन चुनाव की घोषणा, शोक करें या हर्ष?
उनकी खातिर कुर्सियाँ, जनता खातिर फर्श।।
*
नारों-वादों का हुआ, फिर से गर्म बजार।
सुविधाओं के नाम पर दुविधा का अंबार।।  
*
आज नकद का काम है, कल का रहा उधार।
कुर्सी किसके नाम हो, जपिये बारंबार।।     
सबको रेबड़ी बट गई ,शोक करें या हर्ष,
इनके आगे कुर्सियां ,उनके आगे फर्श !
*
गई हनक, कुरसी छिनी, उड़े ठाठ औ वाट।
यारी ने ऐसा किया, खड़ी हो गई खाट।।    
*

navgeet avinash beohar

नवगीत 
अविनाश ब्यौहार 
*
पंख दिये हैं
कुदरत ने पर
कैसे भरूं उड़ान!
*
अब खतरे में
परवाजें हैं!
गूंगी गूंगी
आवाजें हैं!!
इतने पर भी
आसमान सोया
है चादर तान!
*
चुप्पी ढोते
हुये ठहाके!
खेत कर रहे
हैं अब फांके!!
कष्टों का है
खड़ा हिमालय
चढ़ जा रे इंसान!
*
रायल एस्टेट कटंगी रोड
जबलपुर-9826795372

मंगलवार, 14 अगस्त 2018

navgeet on internet

अंतरजाल पर नवगीत-स्थल   

प्रस्तुति: आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल 
१, दिव्य नर्मदा हिंदी पत्रिका 
https://www.blogger.com/blogger.g?blogID=5874853459355966443, 
संपादक आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' ७०९ नवगीत तथा अनेक आलेख, नवगीत संकलनों की समीक्षा, नवगीतकारों का साक्षात आदि।  
२. www.abhivyakti-hindi.org / https://sangrahaursankalan.blogspot.com/
११७ संग्रहों की समीक्षा. आलेख आदि.   
३. http://navgeetkipathshala.blogspot.com/ कार्यशाला 
४. पूर्वाभास 
http://www.poorvabhas.in/2012/04/blog-post.html
नवगीत, आलेख
५ .विकिपीडिया 
https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%A8%E0%A4%B5%E0%A4%97%E0%A5 %80%E0%A4%A4 
  • गीत और नवगीत में अन्तर, नवगीत क्या है, नवगीत कैसे लिखें, नवगीत की म, हत्वपूर्ण पुस्तकेंमात्राओं की गणना। 
  • ६ . कविताकोश
 http://kavitakosh.org/kk/%E0%A4%A8%E0%A4%B5%E0%A4%97%E0%A5%80
नवगीत की शर्तें व मर्यादायें, नवगीत, नवगीतकार 
%E0%A4%A4 
७ . ओपन बुक्स ऑनलाइन http://www.openbooksonline.com/group/chhand/forum/topics/5170231:Topic:358338
शिल्प, सावधानियां, नियम 
८. हिंदी समय 
http://www.hindisamay.com/content/7319/1/%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%96%E0%A4%95-%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A5%87%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%
A5%8D%E0%A4%B0-%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0% A4%BE%E0%A4%A6-%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%B9-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%96-%E0%A4%97%E0%A5%80%E0%A4%A4-%E0%A4%B0%E0%A4%9A%E0%A4%A8%E0%A4%BE-%E0%A4%94%E0%A4%B0-%E0%A4%A8%E0%A4%B5%E0%A4%97%E0%A5%80%E0%A4%A4.cspx
९. अनहद कृति 
https://www.anhadkriti.com/sanjiv-verma-salil-KUU1415-navgeet
आलेख, नवगीत, संग्रह सूची 
१०. यू ट्यूब 
https://www.youtube.com/watch?v=v4mWRQkLI-s
११. संवदिया नवगीत विशेषांक 
https://www.amarujala.com/kavya/book-review/patrika-samvadiya-navgeet-visheshank
१२. बीबीसी हिंदी.कॉम
https://www.bbc.com/hindi/entertainment/story/2006/10/061019_poem_yash_malviya.shtml
१३. शोधगंधा 
http://shodhganga.inflibnet.ac.in/handle/10603/101181
१४. उत्कर्ष एक्सप्रेस रोटी का अनुलोम विलोम 
http://utkarshexpress.com/2018/06/22/%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%9F%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%AE-%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%AE%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A7%E0%A4%BE/ 
फेसबुक:
१.गीत-नवगीत सलिला  आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' 
 https://www.facebook.com/groups/geet.navgeetsalila/ नवगीत, समीक्षा, साक्षात्कार आदि 
२. नवगीत वार्ता रामकिशोर दहिया 
 https://www.facebook.com/search/top/?q=%E0%A4%A8%E0%A4%B5%E0%A4%97%E0%A5%80%E0%A4%A4%20%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE
३.नवगीत विमर्श- अवनीश सिंह चौहान 
 https://www.facebook.com/search/top/?q=%E0%A4%A8%E0%A4%B5%E0%A4%97%E0%A5%80%E0%A4%A4%20%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%AE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B6
४. नवगीत कविता राजा अवस्थी 
 https://www.facebook.com/groups/738137052954419/about/
५. नवगीत चर्चा 
https://www.facebook.com/groups/1652951964974111/



गीत नवगीत

एक रचना-
गीत और
नवगीत नहीं हैं
भारत इंग्लिस्तान।
बने मसीहा
खींचें सरहद
मठाधीश हैरान।
पकड़ न आती
गति-यति जैसे
हों बच्चे शैतान।
अनुप्रासों के
मधुमासों का
करते अनुसंधान।
साठ साल
पहले की बातें
थोपें, कहें विधान।
गीत और
नवगीत नहीं हैं
दुश्मन सच पहचान।
लगे दूर से
बेहद सुंदर
पहले हर मुखड़ा।
निकट हुए तो
फेर लिया मुख
यही रहा दुखड़ा।
कर-कर हारे
कोशिश फिर भी
सुर न सधा सुखड़ा।
तुक तलाशने
अटक-भटककर
निकली हाए! जान।
गीत और
नवगीत नहीं हैं
सच से तनिक अजान।
कभी लक्षणा
कभी व्यंजना
खेल रहीं भॅंगड़ा।
थोप विसंगति
हाय! हो रहा
भाव पक्ष लॅंगड़ा।
बिम्ब-प्रतीकों
ने, मारा है
टॅंगड़ी को टॅंगड़ा।
बन विडंबना
मिथक कर गये
नव रस रेगिस्तान।
गीत और
नवगीत नहीं हैं
आपस में अनजान।
दाल-भात
हो रहे अंतरा
मुखड़ा मूसरचंद।
नवता का
ले नाम मरोड़े
जोड़-तोड़कर छंद।
मनमानी
मात्रा की, जैसे
झगड़ें भौजी-नंद।
छोटी-बड़ी
पंक्तियाॅं करते
बन उस्ताद महान।
गीत और
नवगीत नहीं हैं
भारत पाकिस्तान।
काव्य वृक्ष की
गीति शाख पर
खिला पुहुप नवगीत।
कुछ नवीनता,
कुछ परंपरा
विहॅंस रचे नवरीत।
जो जैसा है
वह वैसा ही
कहे, झूठ को जीत।
कथन-कहन का
दे तराश जब
झूम उठे इंसान।
गीत और
नवगीत मानिए
भारत हिंदुस्तान।
-----------

lekh navgeet aur desh

विशेष लेख
नवगीत और देश 
आचार्य संजीव 'सलिल'
*
विश्व की पुरातनतम संस्कृति, मानव सभ्यता के उत्कृष्टतम मानव मूल्यों, समृद्धतम जनमानस, श्रेष्ठतम साहित्य तथा उदात्ततम दर्शन के धनी देश भारत वर्तमान में संक्रमणकाल से गुजर रहा है।पुरातन श्रेष्ठता, विगत पराधीनता, स्वतंत्रता पश्चात संघर्ष और विकास के चरण, सामयिक भूमंडलीकरण, उदारीकरण, उपभोक्तावाद, बाजारवाद, दिशाहीन मीडिया के वर्चस्व, विदेशों के प्रभाव, सत्तोन्मुख दलवादी राजनैतिक टकराव, आतंकी गतिविधियों, प्रदूषित होते पर्यावरण, विरूपित होते लोकतंत्र, प्रशासनिक विफलताओं तथा घटती आस्थाओं के इस दौर में साहित्य भी सतत परिवर्तित हुआ।छायावाद के अंतिम चरण के साथ ही साम्यवाद-समाजवाद प्रणीत नयी कविता ने पारम्परिक गीत के समक्ष जो चुनौती प्रस्तुत की उसका मुकाबला करते हुए गीत ने खुद को कलेवर और शिल्प में समुचित परिवर्तन कर नवगीत के रूप में ढालकर जनता जनार्दन की आवाज़ बनकर खुद को सार्थक किया ।

किसी देश को उसकी सभ्यता, संस्कृति, लोकमूल्यों, धन-धान्य, जनसामान्य, शिक्षा स्तर, आर्थिक ढाँचे, सैन्यशक्ति, धार्मिक-राजनैतिक-सामाजिक संरचना से जाना जाता है। अपने उद्भव से ही नवगीत ने सामयिक समस्याओं से दो-चार होते हुए, आम आदमी के दर्द, संघर्ष, हौसले और संकल्पों को वाणी दी। कथ्य और शिल्प दोनों स्तर पर नवगीत ने वैशिष्ट्य पर सामान्यता को वरीयता देते हुए खुद को साग्रह जमीन से जोड़े रखा प्रेम, सौंदर्य, श्रृंगार, ममता, करुणा, सामाजिक टकराव, चेतना, दलित-नारी विमर्श, सांप्रदायिक सद्भाव, राजनैतिक सामंजस्य, पीढ़ी के अंतर, राजनैतिक विसंगति, प्रशासनिक अन्याय आदि सब कुछ को समेटते हुइ नवगीत ने नयी पीढ़ी के लिये आशा, आस्था, विश्वास और सपने सुरक्षित रखने में सफलता पायी है।
पुरातन विरासत: 
किसी देश की नींव उसके अतीत में होती है। नवगीत ने भारत के वैदिक, पौराणिक, औपनिषदिक काल से लेकर अधिक समय तक के कालक्रम, घटना चक्र और मिथकों को अपनी ताकत बनाये रखा है। वर्तमान परिस्थितियों और विसंगतियों का विश्लेषण और समाधान करता नवगीत पुरातन चरित्रों और मिथकों का उपयोग करते नहीं हिचकता। (जागकर करेंगे हम क्या? / सोना भी हो गया हराम / रावण को सौंपकर सिया / जपता मारीच राम-राम - मधुकर अष्ठाना, वक़्त आदमखोर), अंधों के आदेश / रात-दिन ढोता राजमहल / मिला हस्तिनापुर को / जाने किस करनी का फल (जय चक्रवर्ती, थोड़ा लिखा समझना ज्यादा) में देश की पुरातन विरासत पर गर्वित नवगीत सहज दृष्टव्य है।

संवैधानिक अधिकार: 
भारत का संविधान देश के नागरिकों को अधिकार देता है किन्तु यथार्थ इसके विपरीत है- मौलिक अधिकारों से वंचित है / भारत यह स्वतंत्र नागरिक / वैचारिक क्रांति अगर आये तो / ढल सकती दोपहरी कारुणिक (आनंद तिवारी, धरती तपती है), क्यों व्यवस्था / अनसुना करते हुए यों / एकलव्यों को / नहीं अपना रही है? (जगदीश पंकज, सुनो मुझे भी), तंत्र घुमाता लाठियाँ / जन खाता है मार / उजियारे की हो रही अन्धकार से हार / सरहद पर बम फट रहे / सैनिक हैं निरुपाय / रण जीतें तो सियासत / हारें, भूल बताँय / बाँट रहे हैं रेवाड़ी / अंधे तनिक न गम / क्या सचमुच स्वाधीन हम? (आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', सड़क पर) आदि में नवगीत देश के आम नागरिक के प्रति चिंतित है।

गणतंत्र: 
देश के संविधान, ध्वज हर नागरिक के लिये बहुमूल्य हैं। गणतंत्र की महिमा गायन कर हर नागरिक का सर गर्व से उठ जाता है - गणतंत्र हर तूफ़ान से गुजर हुआ है / पर प्यार से फहरा हुआ है ताल दो मिलकर / की कलियुग में / नया भारत बनाना है (पूर्णिमा बर्मन, चोंच में आकाश)। नवगीत केवक विसंकटी और विडम्बना का चित्रण नहीं है, वह देश के प्रति गर्वानुभूति भी करता है - पेट से बटुए तलक का / सफर तय करते मुसाफिर / बात तू माने न माने / देश पर अभिमान करने / के अभी लाखों बहाने (रामशंकर वर्मा, चार दिन फागुन के), मुक्ति-गान गूँजे, जब / मातृ-चरण पूजें जब / मुक्त धरा-अम्बर से / चिर कृतज्ञ अंतर से / बरबस हिल्लोल उठें / भावाकुल बोल उठें / स्वतंत्रता- संगरो नमन / हुंकृत मन्वन्तरों नमन (जवाहर लाल चौरसिया 'तरुण', तमसा के दिन करो नमन) आदि में देश के गणतंत्र और शहीदों को नमन कर रहा है नवगीत।

वर्ग संघर्ष-शोषण: 
कोई देश जब परिवर्तन और विकास की राह पर चलता है तो वर्ग संघर्ष होना स्वाभाविक है. नवगीत ने इस टकराव को मुखर होकर बयान किया है- हम हैं खर-पतवार / सड़कर खाद बनते हैं / हम जले / ईंटे पकाने / महल तनते हैं (आचार्य भगवत दुबे, हिरन सुगंधों के), धूप का रथ / दूर आगे बढ़ गया / सिर्फ पहियों की / लकीरें रह गयीं (प्रो. देवेंद्र शर्मा 'इंद्र'), सड़क-दर-सड़क / भटक रहे तुम / लोग चकित हैं / सधे हुए जो अस्त्र-शास्त्र / वे अभिमंत्रित हैं (कुमार रवीन्द्र), व्यर्थ निष्फल / तीर और कमान / राजा रामजी / क्या करे लक्षमण बड़ा हैरान / राजा राम जी (स्व. डॉ. विष्णु विराट) आदि में नवगीत देश में स्थापित होते दो वर्गों का स्पष्ट संकेत करता है।

विकासशील देश में बदलते जीवन मूल्य शोषण के विविध आयामों को जन्म देता है. स्त्री शोषण के लिए सहज-सुलभ है. नवगीत इस शोषण के विरुद्ध बार-बार खड़ा होता है- विधवा हुई रमोली की भी / किस्मत कैसी फूटी / जेठ-ससुर की मैली नजरें / अब टूटीं, तब टूटीं (राजा अवस्थी, जिस जगह यह नाव है), कहीं खड़ी चौराहे कोई / कृष्ण नहीं आया / बनी अहल्या लेकिन कोई राम नहीं पाया / कहीं मांडवी थी लाचार घुटने टेक पड़ी (गीता पंडित, अब और नहीं बस), होरी दिन भर बोझ ढोता / एक तगाड़ी से / पत्नी भूखी, बच्चे भूखे / जब सो जाते हैं / पत्थर की दुनिया में आँसू तक खो जाते हैं (जगदीश श्रीवास्तव) कहते हुए नवगीत देश में बढ़ रहे शोषण के प्रति सचेत करता है।
परिवर्तन-विस्थापन: 
देश के नवनिर्माण की कीमत विस्थापित को चुकानी पड़ती है. विकास के साथ सुरसाकार होते शहर गाँवों को निगलते जाते हैं- खेतों को मुखिया ने लूटा / काका लुटे कचहरी में / चौका सूना भूखी गैया / प्यासी खड़ी दुपहरी में (राधेश्याम /बंधु', एक गुमसुम धूप), सन्नाटों में गाँव / छिपी-छिपी सी छाँव / तपते सारे खेत / भट्टी बनी है रेत / नदियां हैं बेहाल / लू-लपटों के जाल (अशोक गीते, धुप है मुंडेर की), अंतहीन जलने की पीड़ा / मैं बिन तेल दिया की बाती / मन भीतर जलप्रपात है / धुआँधार की मोहक वादी / सलिल कणों में दिन उगते ही / माचिस की तीली टपका दी (रामकिशोर दाहिया, अल्लाखोह मची), प्रतिद्वंदी हो रहे शहर के / आसपास के गाँव / गाये गीत गये ठूंठों के / जीत गये कंटक / ज़हर नदी अपना उद्भव / कह रही अमरकंटक / मुझे नर्मदा कहो कह रहा / एक सूखा तालाब (गिरिमोहन गुरु, मुझे नर्मदा कहो), बने बाँध / नदियों पर / उजड़े हैं गाँव / विस्थापित हुए / और मिट्टी से कटे / बच रहे तन / पर अभागे मन बँटे / पथरीली राहों पर / फिसले हैं पाँव (जयप्रकाश श्रीवास्तव, परिंदे संवेदना के) आदि भाव मुद्राओं में देश विकास के की कीमत चुकाते वर्ग को व्यथा-कथा शब्दित कर उनके साथ खड़ा है नवगीत।

पर्यावरण प्रदूषण: 
देश के विकास साथ-साथ की समस्या सिर उठाने लगाती है। नवगीत ने पर्यावरण असंतुलन को अपना कथ्य बनाने से गुरेज नहीं किया- इस पृथ्वी ने पहन लिए क्यों / विष डूबे परिधान? / धुआँ मंत्र सा उगल रही है / चिमनी पीकर आग / भटक गया है चौराहे पर / प्राणवायु का राग / रहे खाँसते ऋतुएँ, मौसम / दमा करे हलकान (निर्मल शुक्ल, एक और अरण्य काल), पेड़ कब से तक रहा / पंछी घरों को लौट आएं / और फिर / अपनी उड़ानों की खबर / हमको सुनाएँ / अनकहे से शब्द में / फिर कर रही आगाह / क्या सारी दिशाएँ (रोहित रूसिया, नदी की धार सी संवेदनाएँ) कहते हुए नवगीत देश ही नहीं विश्व के लिए खतरा बन रहे पर्यावरण प्रदूषण को काम करने के प्रति अपनी चिंता व्यक्त करता है।

भ्रष्टाचार: 
देश में पदों और अधिकारों का का दुरुपयोग करनेवाले काम नहीं हैं। नवगीत उनकी पोल खोलने में पीछे नहीं रहता- लोकतंत्र में / गाली देना / है अपना अधिकार / अपना काम पड़े तो देना / टेबिल के नीचे से लेना (ओमप्रकाश तिवारी, खिड़कियाँ खोलो) स्वर्णाक्षर सम्मान पत्र / नकली गुलदस्ते हैं / चतुराई के मोल ख़रीदे / कितने सस्ते हैं (महेश अनघ), आत्माएँ गिरवी रख / सुविधाएँ ले आये / लोथड़ा कलेजे का, वनबिलाव चीलों में / गंगा की गोदी में या की ताल-झीलों में / क्वाँरी माँ जैसे, अपना बच्चा दे आये (नईम), अंधी नगरी चौपट राजा / शासन सिक्के का / हर बाज़ी पर कब्जा दिखता / जालिम इक्के का (शीलेन्द्र सिंह चौहान) आदि में नवगीत देश में शिष्टाचार बन चुके भ्रष्टाचार को उद्घाटित कर समाप्ति हेतु प्रेरणा देता है।

उन्नति और विकास: 
नवगीत विसंगति और विडम्बनाओं तक सीमित नहीं रहता, वह आशा-विश्वास और विकास की गाथा भी कहता है- देखते ही देखते बिटिया / सयानी हो गयी / उच्च शिक्षा प्राप्त कर वह नौकरी करने चली / कल तलक थी साथ में / अब कर्म पथ वरने चली (ब्रजेश श्रीवास्तव, बाँसों के झुरमुट से), मुश्किलों को मीत मानो / जीत तय होगी / हौसलों के पंख हों तो।/ चिर विजय होगी (कल्पना रामानी, हौसलों के पंख) कहते हुए नवगीत देश की युवा पीढ़ी को आश्वस्त करता है की विसंगतियों और विडम्बनाओं की काली रात के बाद उन्नति और विकास का स्वर्णिम विहान निकट है।

प्यार : 
किसी देश का निर्माण सहयोग, सद्भाव और प्यार से हो होता है. टकराव से सिर्फ बिखराव होता है. नवगीत ने प्यार की महत्ता को भी स्वर दिया है- प्यार है / तो ज़िंदगी महका / हुआ एक फूल है / अन्यथा हर क्षण / ह्रदय में / तीव्र चुभता शूल है / ज़िंदगी में / प्यार से दुष्कर / कहीं कुछ भी नहीं (महेंद्र भटनागर, दृष्टि और सृष्टि), रातरानी से मधुर / उन्वान हम / फिर से लिखेंगे / बस चलो उस और सँग तुम / प्रीत बंधन है जहाँ (सीमा अग्रवाल, खुशबू सीली गलियों की) में नवगीत जीवन में प्यार और श्रृंगार की महक बिखेरता है।

आव्हान : 
सपनों से नाता जोड़ो पर / जाग्रति से नाता मत तोड़ो तथा यह जीवन / कितना सुन्दर है / जी कर देखो... शिव समान / संसार हेतु / विष पीकर देखो (राजेंद्र वर्मा, कागज़ की नाव), सबके हाथ / बराबर रोटी बाँटो मेरे भाई (जयकृष्ण तुषार), गूंज रहा मेरे अंतर में / ऋषियों का यह गान / अपनी धरती, अपना अम्बर / अपना देश महान (मधु प्रसाद, साँस-साँस वृन्दावन) आदि अभिव्यक्तियाँ नवगीत के अंतर में देश के नव निर्माण की आकुलता की अभव्यक्ति करते हुई आश्वस्त करती हैं की देश का भविष्य उज्जवल है और युवाओं को विषमता का अंत कर समता-ममता के बीज बोने होंगे।

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barawai chhand

बरवै गीत :
संसद में हुल्लड़ कर, बैठ न मौन।
क्या करता-क्यों? पूछे, तुझसे कौन?
*
घर पर बोले तो पड़, जाती मार।
घरवाली बैठी है, खाकर खार।।
मतदाता भी समझा, सारी पोल।
राजनीति है केवल, पोलमपोल।।
वाद कर, झट जुमला कह दे जौन
संसद में हुल्लड़ कर, बैठ न मौन।
क्या करता-क्यों? पूछे, तुझसे कौन?
*
बात न करते भेजें, मैसेज रोज।
बीबी छोड़ पड़ोसन, की है खोज।।
नाती लेते नानी, का अब नाम।
दक्षिणपंथी सोच हो, गयी वाम।।
टेबल रटें भूलकर, अद्धा-पौन
संसद में हुल्लड़ कर, बैठ न मौन।
क्या करता-क्यों? पूछे, तुझसे कौन?
*
संयम को समझें यम, का कानून।
हरिश्चंद्र नित करता, सच का खून।।
दिखा-दिखा कर प्रभु को, खाता आप।
कहे रास-लीला है, कैसे पाप?
मस्जिद-गिरजा-मंदिर सबमें यौन
संसद में हुल्लड़ कर, बैठ न मौन।
क्या करता-क्यों? पूछे, तुझसे कौन?
*

barwai doha geet

बरवै-दोहा गीत:
*
मेघा गरजे बरसे,
है आतंक
*
कल तक आए नहीं तो,
रहे जोड़ते हाथ.
आज आ गए बरसने,
जोड़ रहा जग हाथ.
करें भरोसा किसका
हो निश्शंक?
मेघा गरजे बरसे,
है आतंक
*
अनावृष्टि से काँपती,
कहीं मनुज की जान.
अधिक वृष्टि ले रही है,
कहीं निकाले जान.
निष्ठुर नियति चुभाती
जैसे डंक
मेघा गरजे बरसे,
है आतंक
*
बादल-सांसद गरजते,
एक साथ मिल आज.
बंटाढार हुआ 'सलिल'
बिगड़े सबके काज.
घर का भेदी ढाता
जैसे लंक
मेघा गरजे बरसे,
है आतंक
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