रविवार, 17 फ़रवरी 2019

मौसम अंगार है- अविनाश ब्यौहार

मौसम अंगार है,  नवगीत संग्रह
*
नवगीत सामयिक विसंगतियों और विद्रूपताओं की खबर लेते हुए आम आदमी की पीड़ा और उसके संघर्ष व संकल्प को अपनी विषय वस्तु बनाता है।
नवगीत की शक्ति को पहचानते हुए अविनाश ब्यौहार ने अपने आस-पास घटते अघट को कभी समेटा है, कभी बिखेर कर दर्द को भी हँसना सिखाया है। अविनाश ब्यौहार के नवगीत रुदाली मात्र नहीं, सोहर भी हैं। इन नवगीतों में अंधानुकरण नहीं, अपनी राह आप बनाने की कसक है। युगीन विसंगतियों को शब्द का आवरण पहनाकर नवगीत मरती हुई नदी में सदी को धूसरित होते देखता है।
मृतप्राय पड़ी हुई / रेत की नदी
धूसरित होती / इक्कीसवीं सदी
पंछी कास कलरव / अहेरी का जाल
सूरज ने ताना / धूप का तिरपाल

यहाँ विसंगति में विसंगति यह कि तिरपाल सिर के ऊपर ताना जाता है, जबकि धूप सूरज के नीचे होती है।

अविनाश के गीत गगन विहारी ही नहीं, धरती के लाल भी हैं। वे गोबर से लिपे आँगन में उजालों के छौनों को लाते हैं।
उजियारे के / छौने लाए / पर्व दिवाली
आँगन लिपे / हुए हैं / गोबर से
पुरसा करे / दिवाली / पोखर से
खुलते में हैं / गौएँ बैठे / करें जुगाली

इन नवगीतों को नवाशा से घुटन नहीं होती। वे दिन तो दिन, रात के लिए भी सूरज उगाना चाहते हैं-
रात्रि के लिए / एक नया सा / सूर्य उगायें
जो अँधियारा / धो डालेगा
उजला किरनें / बो डालेगा
दुर्गम राहों / की भी कटी / सभी बाधाएँ

कविता का आनंद तब ही है, जब कवि का कहने का तरीका किसी और से सादृश्य न रखता हो। इसीलिए ग़ालिब के बारे में कहा जाता है 'कहते हैं  कि ग़ालिब का है अंदाज़े-बयां और'। इन नवगीतों की कहन बोलचाल के साधारण शब्दों में असाधारण अर्थ भर देती है।
मौसम अंगार है / सुआ कुतरे आम
कुत्ते सा हाँफ रहे / हैं आठों याम
रातों का / सुरमा है / आँजती हवाएँ

अविनाश कल्पना के कपोल कल्पना न होने देकर उसे यथार्थ जोड़े रखते हैं-
सुख दुख / दूर खड़े
सब कुछ / मोबाइल है
कब किस पर / क्या गाज गिरी है
बहरों से आवाज / गिरी है

अविनाश के लिए शब्द अर्थ की अभिव्यक्ति की साधन मात्र है, वह किसी भी भाषा-नदिया बोली का हो। वे पचेली, बुंदेली, उर्दू, अंग्रेजी के शब्दों को हिंदी के शब्दों की तरह बिना किसी भेदभाव के वापरते हैं। मोबाइल, फर्टाइल, फाइल, नेचर, फ्लर्ट, पैट्रोलिंग, रोलिंग जैसे अंग्रेज़ी शब्द, एहतियात, फ़ितरत, बदहवास, दहशत, महसूल जैसे उर्दू लफ्ज, लबरी,  घिनौची, बिरवा, अमुआ, लुनाई  जैसे देशज शब्द गले मिलकर इन नवगीतों में चार चाँद लगाते हैं पर  पाठ्य-त्रुटियाँ केसर की खीर में कंकर की तरह है। बिंदी और चंद्र बिंदी का अंतर न समझा जाए तो रंग में भंग हो जाता है।

नवगीत का वैशिष्ट्य लाक्षणिकता है। इन नवगीतों में बिंब, प्रतीक अनूठे और मौलिक हैं। कम से कम शब्दों में अधिक से अधिक कह सकने का माद्दा नवगीतकार को असीम संभावनाओं का पथ दिखाता है।
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संजीव
१६-२-२०१९

शनिवार, 16 फ़रवरी 2019

कृति परिचय: 
"मौसम अंगार है" अणु गीतों की बहार है 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' 
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[कृति परिचय: मौसम अंगार है, काव्य संग्रह, अविनाश ब्योहार, प्रथम संस्करण, आईएसबीएन   ९७८-९३-८८२५६-४१-४, २० सेमी x १७.५ सेमी, आवरण बहुरंगी, पेपरबैक, पृष्ठ ९३, मूल्य १६०/-, काव्य पब्लिकेशन.कॉम, रचनाकार संपर्क रॉयल एस्टेट कॉलोनी, माढ़ोताल, जबलपुर] 
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समन्वय: अभियान : विश्व वाणी हिंदी संस्थान जबलपुर


संस्था परिचय
समन्वय: अभियान : विश्व वाणी हिंदी संस्थान जबलपुर
* स्थापना २० अगस्त १९७४। प्रथम गोष्ठी अध्यक्ष ब्योहार राजेंद्र सिंह, मुख्य अतिथि रामेश्वर शुक्ल अंचल। नवलेखन गोष्ठियों में भारतीय संस्कृति व् राष्ट्रीय भावधारा के संवर्धन हेतु गद्य-पद्य लेखन। 
२५ जून १९७५ से २१ मार्च १९७७ तक आपात काल के दौरान सदस्यों ने लोकतांत्रिक चेतना जगाने के लिए निरंतर गोष्ठियाँ कीं।  सर्व श्री दादा धर्माधिकारी, द्वारका प्रसाद मिश्र, सत्येंद्र मिश्र, रामेश्वर प्रसाद गुरु, गणेश प्रसाद नायक, ब्योहार राजेंद्र सिंह, कालिका प्रसाद दीक्षित 'कुसुमाकर, वल्लभ दास जैन, बद्रीनाथ गुप्ता आदि के मार्गदर्शन व् आशीष मिला। 
* डॉ. रामजी सिंह भागलपुर के मार्गदर्शन में लोकनायक व्याख्यान माला (गांधी जयंती २ अक्टूबर से जयप्रकाश जयंती ८ अक्टूबर) का वार्षिक आयोजन शहीद स्मारक में किया। इस रचनात्मक आंदोलन को नई दिशा मिली डॉ. रामजी सिंह भागलपुर, श्रीमती इंदुमती केलकर तथा यदुनाथ थत्ते से।  आपातकाल के समापन के बाद हुए आम चुनाव  सदस्यों ने सर्व दलीय प्रत्याशी श्री शरद यादव की विजय पश्चात्  अपनी भूमिका साहित्य सृजन तक सीमित कर ली। 
* १९८० से १९९६  सामाजिक त्रैमासिक पत्रिका चित्राशीष का प्रकाशन किया गया।
* १५-९-१९८१ से अभियान जबलपुर के अन्तर्गत साहित्यिक-सामाजिक गतिविधियों तथा समन्वय प्रकाशन के अंतर्गत को प्रकाशन  संबंधी गतिविधियाँ संचालित की जाने लगीं। 
* अभियंता दिवस १९८३ पर सामूहिक काव्य संकलन 'निर्माण के नूपुर' तथा १९८५ में 'नींव के पत्थर' का प्रकाशन किया गया। 
* १९८६ से १९९० तक पत्रिका यांत्रिकी समय का प्रकाशन श्री कुलदेव मिश्रा के साथ मिलकर किया गया। नवलेखन गोष्ठियों के माध्यम से सदस्यों के लेखन को परिमार्जित करने के प्रयास चलते रहे। 
* वर्ष १९९६ से १९९८ तक पत्रिका इंजीनियर्स टाइम्स का प्रकाशन किया गया। वर्ष २००० में समन्वय अभियान की प्रतिष्ठापरक प्रस्तुति तिनका-तिनका नीड़ को व्यापक सराहना मिली। 
* वर्ष २००२ से २००८ तक नर्मदा साहित्यिक पत्रिका का प्रकाशन किया गया।
* दिव्य नर्मदा अलंकरण: वर्ष १९९७ से २००७ तक प्रतिवर्ष राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी साहित्य की विविध विधाओं  की कृतियाँ आमंत्रित कर श्रेष्ठ लेखन को प्रोत्साहित करने के लिए महान सहत्यकारों के नाम पर अलंकरण दिए गए। ये कार्यकरण जबलपुर, मंडला, नैनपुर,लखनऊ, श्रीनाथ द्वारा कोट्टायम केरल तथा खंडवा में आयोजित किये गए। सर्व श्री पद्मभूषण आचार्य विष्णुकांत शास्त्री राज्यपाल उ.प्र., पद्म श्री के. पी. सक्सेना, पद्म श्री डॉ. एम्. सी. राय,  शायरी आज़म कृष्णबिहारी नूर, स्वामी रामचंद्र शास्त्री, महामंडलेश्वर श्यामानन्द जी, श्री नाथद्वारा मंदिर के मुखिया नरहर ठाकर जी, केदारनाथ साहनी राज्यपाल गोवा, नरेंद्र कोहली साहित्यकार दिल्ली, शिव कुमार श्रीवास्तव कुलपति सागर वि.वि., जगदीश प्रसाद शुक्ल कुलपति जबलपुर वि.वि., न्यायमूर्ति अजित कब्बिन कर्णाटक उच्च न्यायालय, ॐ प्रकाश पुलिस महानिरीक्षक कर्नाटक, अनेक सांसदों, विधायकों आदि ने इन समारोहों की गरिमा वृद्धि की। देश के कोने-कोने से श्रेष्ठ साहित्यकारों के समादृत कर संस्था धन्य हुई। कृतियों के मूल्यांकन व् निर्णयन में आचार्य कृष्णकान्त शास्त्री, ज्ञान रंजन जी, प्रो. जवाहरलाल चौरसिया 'तरुण', हरिकृष्ण त्रिपाठी, डॉ. सत्य नारायण सिंह, स्व. के. बी. सक्सेना, डॉ. सुरेश कुमार वर्मा, राज कुमार तिवारी सुमित्र, मोहन शशि, साज जबलपुरी, ओंकार श्रीवास्तव, प्रो. दिनेश खरे, डॉ. गार्गीशरण मिश्र 'मराल', वीणा तिवारी, आचार्य भगवत दुबे, आशा वर्मा, आशा रिछारिया, डॉ. साधना वर्मा, छाया त्रिवेदी साधना उपाध्याय, अनामिका तिवारी, आशा जड़े, उषा नावलेकर आदि का बहुमूल्य सहयोग प्राप्त हुआ।     
* पुस्तक मेला: १ से १० जनवरी २००० तक नगर में प्रथम पुस्तक मेले का आयोजन समय प्रकाशन दिल्ली के सहयोग से कराया गया जिसका उद्घाटन महापौर विश्वनाथ दुबे ने किया, मुख्य अतिथि विधान सभा उपाध्यक्ष  ईश्वर दास रोहाणी  थे। 
* २९-९-२००१ से ५-१०-२००१ तक नगर में पहली बार ग्रामीण तकनीकी विकास व्यापार मेला कृषि उपज मंडी में आयोजित किया गया। 
* वास्तु विद्या सम्मेलन: १२-१४ जनवरी २००२ को मानस भवन में वास्तु विद्या सम्मेलन का आयोजन वास्तु विज्ञान संस्थान के साथ किया गया। इस अवसर पर प्रकाशित स्मारिका का विमोचन श्री सुदर्शन सरसंघ चालक, भाई महावीर राज्यपाल म.प्र. व महापौर विश्वनाथ दुबे के कर कमलों से हुआ। 
* इस मध्य समन्वय प्रकाशन से नगर प्रदेश व् अन्य प्रदेशों के रचनाकारों की लग भाग ५० पुस्तकों का न्यूनतम लागत मूल्य पर प्रकाशन कराया जाता रहा। 
* छंद शिक्षण: वर्ष १९९४ से अंतरजाल पर ब्लॉग, तथा वेब साइट्स पर छंद शिक्षण का कार्य आरंभ किया गया। हिन्द युग्म, रचनाकार,साहित्य शिल्पी, ईकविता, मुखपोथी (फेस बुक), ओबीओ आदि अनेक जाल स्थलों पर निरंतर हिंदी व्याकरण, छंद, गद्य-पद्य की विविध विधाओं और तकनीकी लेखन को गति दी जा रही है। 
* वर्ष २०१७ से विश्ववाणी हिंदी संस्थान का गठन कर देश-विदेश में छंद लेखन व् शिक्षण को प्रत्साहित करने के लिए ईकाईयां प्रारंभ की जा रही हैं।   
* छंद सृजन: जबलपुर में साहित्य संगान संस्थान दिल्ली के सहयोग से सर्व आदरणीय बसंत शर्मा, मिथलेश बड़गैंया, छाया सक्सेना, मीना भट्ट, राजलक्ष्मी शिवहरे, जय प्रकाश श्रीवास्तव, इंद्र बहादुर श्रीवास्तव, सुरेश कुशवाहा तन्मय, शोभित वर्मा,  अविनाश ब्योहार आदि नित नए छंद सीख रहे हैं। 
* छंद कोष: हिंदी में छंद कोष के अभाव को देखते हुए, ध्वनि विज्ञानं और गणित के आधार पर छंद-वर्गीकरण  और नव छंद सृजन की ओर कार्य कर लगभग ३०० नए मात्रिक छंद और ६० सवैयों की रचना कर ली गई है। 
* अभिव्यक्ति विश्वम लखनऊ के साथ संस्था निरंतर सहयोग कर रही है। संजीव सलिल रचित नवगीत संग्रह 'काल है संक्रांति का' को ११,००० रु. नगद पुरस्कार प्राप्त हुआ है। इस वर्ष नर्मदांचल के ३ नवगीतकारों के संकलनों का लखनऊ में विमोचन हुआ है। अविनाश ब्योहार ने नवगीत संकलन 'मौसम अंगार है' के साथ प्रवेश कर लिया है। बसंत शर्मा का नवगीत संग्रह 'बुधिया लेता टोह' मुद्रणाधीन है। ग्वालियर की ७५ वर्षीय कवयित्री संतोष शुक्ल जी हमारे लिए प्रेरणा स्रोत हैं जिन्होंने गत  कुछ माहों में दोहा लेखन में खुद को स्थापित किया है और शीघ्र ही उनकी प्रथम काव्य कृति प्रकाशित हो रही है। दोहा शतक मंजूषा के माध्यम से ४५ दोहाकारों के ४५०० दोहे तथा अन्य लगभग १५०० दोहे मिलकर कुल ६००० दोहे हिंदी के भंडार में जुड़े हैं। अब तक किसी भी छंद पर हुआ यह महत्तम प्रयास है। वातायन उमरिया, नव लेखन कटनी तथा संगम करौंदी अदि संस्थाओं के साथ मिलकर साहित्यिक अनुष्ठानों को गति दी जा रही है। 
* जबलपुर में मासिक बैठकों में प्रचार-प्रसार पर रचनात्मक शिक्षण को वरीयता देने का परिणाम हम सब के लेखन में उन्नति के रूप में सामने आ रहा है। 
* शांति-राज पुस्तकालय योजना: कॉन्वेंट विद्यालयों तथा पुस्तकालय विहीन शासकीय विद्यालयों को इस योजनान्तर्गत २०,००० रु. मूल्य की पुस्तकें निशुल्क प्रदान की जाती हैं। एकमात्र शर्त यह है कि पुस्तकें विद्यार्थियों को पढ़ने के लिए सुलभ कराई जाएँ। २०१८ में वैदिक इंटरनेशनल स्कूल भीलवाड़ा राजस्थान को पुस्तकें भेजी गयीं। इस वर्ष शहडोल के ग्रामीण पुस्तकालय को पुस्तकें भेंट की जा रही हैं।  
* साहित्य संगम संस्थान दिल्ली के सहयोग से शीघ्र ही राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी भाषा, व्याकरण व् पिंगल शिक्षण की दिशा में नए कार्यक्रमों का आरंभ अरुण श्रीवास्तव 'अर्णव', राजवीर सिंह आदि साथियों से विमर्श कर किया जाएगा। 
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सृजन पर्व २०२९

सृजन पर्व २०२९

२.००   - सरस्वती पूजन -  अतिथि गण
२.०५ - सरस्वती वंदना -  अर्चना गोस्वामी
२.१० - हिंदी आरती -  हरिसहाय पांडे
२.१५ - अतिथि परिचय - मिथलेश बड़गैंया
अध्यक्ष - आचार्य कृष्णकांत चतुर्वेदी - संजीव वर्मा 'सलिल'
मुख्य अतिथि- श्री राजेंद्र तिवारी, महाधिवक्ता, अरुण श्रीवास्तव ‘अर्णव’
विशिष्ट वक्ता: डॉ. सुरेश कुमार वर्मा - बसंत शर्मा
डॉ. इला घोष - छाया सक्सेना
समीक्षक:
डॉ. अरुण मिश्र - इंद्र बहादुर श्रीवास्तव
डॉ. स्मृति शुक्ल -
डॉ. नीना उपाध्याय - मिथलेश बड़गैंया
                  डॉ. उषा कैली -

२.२५ - संस्था परिचय
विश्ववाणी हिंदी संस्थान अभियान, जबलपुर संजीव वर्मा 'सलिल'
साहित्य संगम संस्थान दिल्ली  - अरुण श्रीवास्तव ‘अर्णव’

२.४० लोकार्पण /कृति चर्चा / कृतिकार सम्मान
२.४५ सड़क पर-             - संजीव वर्मा 'सलिल' - बसंत कुमार शर्मा
२.५० मौसम अंगार है       - अविनाश ब्योहार - संजीव वर्मा 'सलिल' 
२.५५          Second thought - डॉ. अनिल जैन   - शोभित वर्मा
३.०० दोहा दोहा नर्मदा       - डॉ स्मृति शुक्ल - छाया सक्सेना
३.०५          दोहा सलिला निर्मला  - अरुण मिश्र -
३.१० दोहा दिव्य दिनेश      - नीना उपाध्याय -
३.१५ लघुकथा संगम -        - जयप्रकाश श्रीवास्तव
३.२० - ४. ०० सम्बोधन -
आचार्य कृष्णकांत चतुर्वेदी - संजीव वर्मा सलिल
श्री राजेंद्र तिवारी, महाधिवक्ता - अरुण श्रीवास्तव ‘अर्णव’
डॉ. सुरेश कुमार वर्मा - बसंत शर्मा
डॉ. इला घोष - छाया सक्सेना
४.०० - ४.१५ स्वल्पाहार
४.१५ काव्यपाठ प्रत्येक सहभागी ३ मिनट
५.४५ सम्मान - दोहा / लघुकथा संकलन सहभागी
६.०० आभार प्रदर्शन - अविनाश ब्यौहार
कवियों की सूची

  1. आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
  2. राजेंद्र तिवारी
  3. विजय बागरी
  4. जयप्रकाश श्रीवास्तव
  5. बसंत कुमार शर्मा
  6. मिथलेश बड़गैयाँ
  7. छाया सक्सेना
  8. अखिलेश खरे
  9. राजकुमार महोबिया
  10. शोभित वर्मा
  11. अविनाश ब्यौहार
  12. इंद्र बहादुर श्रीवास्तव
  13. हरिसहाय पांडेय
  14. विवेकरंजन श्रीवास्तव
  15. मनोज कुमार शुक्ल
  16. डॉ. अरुण श्रीवास्तव ‘अर्णव’
  17. डॉ. राजलक्ष्मी शिवहरे
  18. डॉ. मीना भट्ट जी
  19. आशीष पांडेय जिद्दी
  20. छाया सक्सेना ' प्रभु '
  21. मंजूषा मोहन
  22. अतुल द्विवेदी
  23. हरि प्रसाद गुप्ता
  24. अनन्त राम चौबे
  25. भावना शिवहरे
  26. अर्चना राय
  27. मंजूषा मोहन
  28. सुश्री अनुराधा
  29. सुनील अवधिया 'मुक्तानिल'
  30. राजकुमारी मिश्रा
संस्था परिचय
*
विश्ववाणी हिंदी संस्थान
समन्वय अभियान जबलपुर
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२० अगस्त १९७४ को समन्वय संस्था को हिंदी भाषा-साहित्य तथा राष्ट्रीय भाव के संवर्धन हेतु आरंभ किया गया। प्रथम गोष्ठी में अध्यक्ष श्रद्धेय ब्योहार राजेंद्र सिंह जी तथा मुख्य अतिथि ख्यात कवि रामेश्वर शुक्ल 'अञ्चल' ने आशीष प्रदान किया। २५ जून १९७५ को आपातकाल लगने से २१ मार्च १९७७ को आपात काल के समापन के मध्य सदस्यों ने लोकतांत्रिक चेतना जगाने के लिए निरंतर गोष्ठियाँ कीं।  सर्व श्री दादा धर्माधिकारी, द्वारका प्रसाद मिश्र, सत्येंद्र मिश्र, गणेश प्रसाद नायक, कालिका प्रसाद दीक्षित 'कुसुमाकर, वल्लभ दास जैन, बद्रीनाथ गुप्ता आदि के मार्गदर्शन में कुमार संजीव, राजेश जैन 'वत्सल', श्रीकांत पटेरिया अनूप सोलहा आदि ने प्रशासनिक दमन के विरोध में निरंतर लेखन किया तथा जन जागरण का लक्ष्य लेकर लोकनायक व्याख्यानमाला (गांधी जयंती २ अक्टूबर से जयप्रकाश जयंती ८ अक्टूबर) का वार्षिक आयोजन शहीद स्मारक में किया। इस रचनात्मक आंदोलन को नई दिशा मिली डॉ. रामजी सिंह भागलपुर, श्रीमती इंदुमती केलकर तथा यदुनाथ थत्ते से।  आपातकाल के समापन के बाद हुए आम चुनाव  सदस्यों ने सर्व दलीय प्रत्याशी श्री शरद यादव की विजय सुनिश्चित कर अपनी भूमिका साहित्य सृजन तक सीमित कर ली। 
१९८० में अनियतकालीन सामाजिक पत्रिका चित्राशीष का प्रकाशन आरंभ हुआ। १५-९-१९८१ को अभियान जबलपुर के अन्तर्गत साहित्यिक-सामाजिक गतिविधियों तथा समन्वय प्रकाशन के अंतर्गत को प्रकाशन  संबंधी गतिविधियां संचालित की जाने लगीं। अभियंता दिवस १९८३ पर सामूहिक काव्य संकलन निर्माण के नूपुर तथा १९८५ में नींव के पत्थर का प्रकाशन किया गया। १९८६ से १९९० तक पत्रिका यांत्रिकी समय का प्रकाशन श्री कुलदेव मिश्रा के साथ मिलकर किया गया। नवलेखन गोष्ठियों के माध्यम से सदस्यों के लेखन को परिमार्जित करने के प्रयास चलते रहे। वर्ष १९९६ से १९९८ तक पत्रिका इंजीनियर्स टाइम्स का प्रकाशन किया गया। वर्ष २००० में समन्वय अभियान की प्रतिष्ठापरक प्रस्तुति तिनका-तिनक नीड़ को व्यापक सराहना मिली। वर्ष २००२ से २००८ तक नर्मदा पत्रिका का प्रकाशन किया गया। 
दिव्य नर्मदा अलंकरण:
१७ मार्च १९९७ को अखिल भारतीय दिव्य नर्मदा अलंकरण समारोह के के मुख्य अतिथि श्री शिवकुमार श्रीवास्तव कुलपति सागर विश्व विद्यालय रहे। श्री चंद्र सेन विराट इंदौर, स्व. शंभूरत्न दुबे तथा श्री प्रबोध गोविल जयपुर को उत्कृष्ट लेखन हेतु पाँच-पाँच हजार रुपये के पुरस्कार भेंट किये गए। १० अगस्त १९९८ को दिव्य नर्मदा अलंकरण समारोह में श्री अनंत राम मिश्र गोला गोकर्ण नाथ, श्री भगवान दास श्रीवास्तव इंदौर,  श्रीमती सुधा रानी श्रीवास्तव जबलपुर, राजेश अरोरा 'शलभ' लखनऊ, श्री मनोहर काजल दमोह, डॉ, सुशीला टाकभौरे नागपुर, ओमप्रकाश यति सोनभद्र, शांति शेठ अहमदाबाद, डॉ. रमेश खरे दमोह, डॉ. ए. जे अब्राहम कुरुविल्ला केरल, आचार्य भगवद दुबे जबलपुर तथा डॉ. शकुंतला चौधरी जबलपुर  को विविध विधाओं में श्रेष्ठ लेखन हेतु ५-५ हजार रूपए के तीन पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।  बसंत पंचमी १० फरवरी २००० के अवसर पर दिव्य नर्मदा अलंकरण समारोह का आयोजन मंडला में किया गया। आचार्य भगवद दुबे जबलपुर, डॉ. चंद्रपाल चेन्नई, शिवानंद कंडे दुर्ग, चन्द्रसेन विराट ीांडौर, गिरिमोहन गुरु होशंगाबाद, रामप्रताप खरे भोपाल। शिव गुलाम केहरि हरदोई, चित्रभूषण श्रीवास्तव 'विदग्ध' मंडला, रत्न लाल वर्मा जमीरपुर हिमाचल प्रदेश, गोमती प्रसाद 'विकल' रीवा, विजय जोशी कोटा, केदारनाथ मुजफ्फरपुर, सुमन जेतली मुरादाबाद पुरस्कृत किये गए। ३० जनवरी २००१ को नैनपुर में संपन्न समारोह में डॉ. श्यामनन्द सरस्वती 'रोशन' दिल्ली, डॉ. एन. चंद्रशेखरन नायर तिरुवनंतपुरम, चन्द्रसेन विराट इंदौर, जसपाल सिंह 'संप्राण' अम्बाला, अनंत राम मिश्र गोला गोकर्णनाथ, वीरेंद्र खरे अकेला 'छतरपुर, प्रो देवी सिंह चौहान रायपुर, रसिक लाल परमार करेली, डॉ. गार्गी शरण मिश्र 'मारआल जबलपुर, राम गोपाल भावुक डबरा, रजनी सक्सेना छतरपुर, मेजर मुनवा सिंह चौहान लखनऊ, चेतन भारती रायपुर को पुरस्कृत किया गया। उम्र की पगडंडियों पर स्व. राजेंद्र श्रीवास्तव तथा माता-ए-परवीन परवीन हक़ का विमोचन संपन्न हुआ।
७ नवंबर २००२ को दिव्य नर्मदा अलंकरण का प्रतिष्ठा परक आयोजन लखनऊ में महामहिम राज्यपाल आचार्य विष्णुकांत शास्त्री के मुख्यातिथ्य, विधान सभाध्यक्ष श्री केशरी नाथ त्रिपाठी, व्यंग्यकार पद्म श्री के. पी. सक्सेना,  ग़ज़ल सम्राट श्री कृष्ण बिहारी 'नूर',  नरेश सक्सेना अध्यक्ष मुक्तिबोध सृजन पीठ व सीमा रिज़वी राज्य मंत्री सूचना प्रौद्योगिकी के विशिष्टातिथ्य तथा महापौर पद्म श्री डॉ. एम्. सी. राय की अध्यक्षता में संपन्न हुआ। आचार्य पूनम चंद्र तिवारी ग्वालियर, आचार्य भगवत प्रसाद मिश्र अहमदाबाद, राजेश अरोरा 'शलभ' लखनऊ, चंद्र सेन विराट इंदौर, गिरीश सिन्हा 'जीवन' जौनपुर, अशोक गीते खंडवा, रसूल अहमद सागर बकाई जालौन, राम प्रसाद विमोही रायपुर, संध्या जैन 'श्रुति' जबलपुर, गोपीनाथ कालभोर खंडवा, राज सागरी जबलपुर, डॉ. गार्गी शरण मिश्र जबलपुर, वंश बहादुर यादव धनबाद, आर्य प्रहलाद गिरी आसनसोल सम्मनित किये गए। मीत मेरे संजीव 'सलिल', सौरभ: डॉ. श्याम सुन्दर हेमकार, कदाचित सुभाष पांडेय, ऑफ़ एन्ड ऑन अनिल जैन, तथा पहला कदम डॉ. अनूप निगम का विमोचन शास्त्री जी के कर कमलों से हुआ।
वर्ष २००३ में श्री मनमोहन दुबे जबलपुर, डॉ. रजनीकांत जोशी अहमदाबाद, जसपाल 'संप्राण' अंबाला, मनोज श्रीवास्तव लखनऊ, राजेंद्र नागदेव दिल्ली, डॉ. शरद मिश्र शहडोल, श्री कृष्णवल्लभ पौराणिक इंदौर, मेजाओ राहुल शर्मा बेलगाम, डॉ. शेषपाल सिंह 'शेष' आगरा, डॉ. रमेश खरे दमोह, श्री रविशंकर परसाई पिपरिया, डॉ. बाबू जोसफ कोट्टायम केरल, डॉ. कृष्ण गोपाल मिश्र होशंगाबाद, डॉ. रामनारायण पटेल भुक्ता उड़ीसा, सदाशिव कौतुक इंदौर, ज्ञानेंद्र साज़ अलीगढ, विजय राठौड़ जांजगीर, डॉ. ब्रम्हजीत गौतम भोपाल, देवीसिंह चौहान रायपुर, खिश्ना मणि चतुर्वेदी गौसे सिनसपुर, श्री बद्री प्रसाद परसाई पिपरिया, श्रीमती रत्न ओझा जबलपुर, महेश जोशी खरगोन,. डॉ. ओमप्रकाश हयारण झांसी, महेंद्र सिंह 'नीलम' वाराणसी, उमेश अग्रवाल कोरबा, जितेंद्र प्रसाद 'भिखारी' वाराणसी, गिरिजा शंकर पाठक 'गिरिजेश' बीकानेर, कल्पना शील बड़ौदा, जयनारायण वैरागी झांबा, सत्या पूरी नाहन, अमृत लाल मालवीय होशंगाबाद, अरुम इंग्ले भोपाल तथा तोमर सिंह साहू कुरुद पुरस्कृत किये गए। समारोह २९.३.२००३ को महामहिम केदारनाथ साहनी राज्यपाल गोवा के मुख्यातिथ्य तथा न्यायमूर्ति अजित कब्बिन कर्णाटक उच्च न्यायालय व ओमप्रकाश पुलिस महानिरीक्षक कर्णाटक  के विशेषातिथ्य व वीर राजेंद्र सिंह 'बाफना' अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष महावीर इंटरनेशनल की अध्यक्षता में हुआ। 
१४.९.२००४ को साहित्य मंडल नाथद्वारा में चंद्र सेन विराट इंदौर, डॉ. सुशीला कपूर भोपाल, रुद्रदत्त दुबे जबलपुर, सरिता अग्निहोत्री मंडला, महाकवि जगमोहन प्रसाद चंचरीक जयपुर, डॉ. बी. इस. जौहरी - डॉ. पुष्प जौहरी मुम्बई, आचार्य भगवत दुबे जबलपुर, अज़ीज़ अंसारी इंदौर, श्याम विद्यार्थी डिब्रूगढ़, रामेश्वर हरिद मंडला, करुणा श्रीवास्तव जयपुर, प्रूराम साहू धमतरी, गजानन सिंह चौहान मंडलेश्वर, महेश सक्सेना भोपाल, रमेश बेल बालाघाट, ममता सिंह बीकानेर, त्रिभुवन सिंह चौहान लखनऊ, सुगन चंद जैन 'नलिन' गुना, विजय राठौर जांजगीर, शशिकांत पशीने 'शाकिर' अमरावती, रमेश चौरसिया 'राही' कोरबा, कैलाश त्रिपाठी ओरैया, दयाराम गुप्त पथिक ब्योहारी, गिरिमोहन गुरु होशंगाबाद, लक्ष्मी शर्मा जबलपुर, जगदीश जोशीला खरगौन, प्रभा पन्द्र 'पुरनम' जबलपुर, मणि मुकुल जबलपुर, ओमप्रकाश हयारण झांसी तथा डॉ. ओमप्रकाश लखनऊ को सम्मानित किया गया। मुख्या अतिथि प्रसिद्ध  साहित्यकार नरेंद्र कोहली दिल्ली तथा अध्यक्ष श्री नरहर ठाकर मुख्य पुजारी श्री नाथद्वारा मन्दिर रहे।
वर्ष २००६ में दिव्य नर्मदा अलंकरणों का आयोजन खंडवा में किया गया।
पुस्तक मेला:
१ से १० जनवरी २००० तक नगर में प्रथम पुस्तक मेले का आयोजन समय प्रकाशन दिल्ली के सहयोग से कराया गया जिसका उद्घाटन महापौर विश्वनथ दुबे ने किया, मुख्य अतिथि विधान सभा उपाध्यक्ष  ईश्वर दास रोहाणी  थे। २९-९-२००१ से ५-१०-२००१ तक नगर में पहली बार ग्रामीण तकनीकी विकास व्यापार मेला कृषि उपज मंडी में आयोजित किया गया।
वास्तु विद्या सम्मेलन:
१२-१४ जनवरी २००२ को मानस भवन में वास्तु विद्या सम्मेलन का आयोजन वास्तु विज्ञान संस्थान के साथ किया गया। इस अवसर पर प्रकाशित स्मारिका का विमोचन श्री सुदर्शन सरसंघ चालक, भाई महावीर राज्यपाल म.प्र. व् महापौर विश्वनाथ दुबे के कर कमलों से हुआ।
      

राजेंद्र तिवारी, कृष्णकांत चतुर्वेदी, सुरेश कुमार वर्मा, इला घोष

मुख्य अतिथि
माननीय राजेंद्र तिवारी जी 
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साहित्य और संस्कृति को श्वास-श्वास जीने जीने और  सनातन मूल्यों की मशाल थामकर न्याय व्यवस्था को देश हुए समाज के प्रति संवेदनशील और सजग बनाये रखने के लिए गत ५५ वर्षों से सतत सक्रिय माननीय राजेंद्र तिवारी जी संस्कारधानी के ऐसे सपूत हैं जो अपनी विद्वता, वाग्वैदग्ध्य, विश्लेषण सामर्थ्य, अन्वेषण दृष्टि तथा प्रभावी भाषावली के लिए जाने जाते हैं।  १४ अप्रैल १९३६ को जन्में तिवारी जी ने शिक्षक, पत्रकार व् अधिवक्ता के रूप में अपनी कार्य शैली, समर्पण, निपुणता  तथा नवोन्मेषपरक दृष्टि की छाप समाज पर छोड़ी है। वरिष्ठ अधिवक्ता, सदस्य नियम निर्माण समिति तथा उपमहाधिवक्ता के रूप में आपकी कार्य कुशलता से प्रभावित मध्य प्रदेश शासन ने महाधिवक्ता के रूप में आपका चयन कर दूरदृष्टि का परिचय दिया है। 
बहुमुखी प्रतिभा तथा बहु आयामी सक्रियता के धनी माननीय तिवारी जी ने संगीत समाज जबलपुर के अध्यक्ष, जबलपुर शिक्षा समिति के अध्यक्ष, इंटेक के आजीवन सदस्य, परिवार नियोजन संघ के सचिव, अमृत बाजार पत्रिका के संवाददाता, रोटरी क्लब के अध्यक्ष व् सह प्रांतपाल के रूप में ख्याति अर्जित की। आपने विश्व विख्यात दार्शनिक आचार्य रजनीश के साथ अखिल भारतीय डिबेटर के रूप में पुरस्कृत होकर अपनी प्रतिभा का परिचय विद्यार्थी काल में ही दे दिया था। 
'योग: कर्मसु कौशलम' के आदर्श को जीते तिवारी जी नई पीढ़ी के आदर्श हैं। वे नर्मदा को मैया और जबलपुर को अपना घर मानते हुए सबके भले के लिए कर्मरत रहते हैं। साहित्य तथा संस्कृति जगत को आपका मार्गदर्शन सतत प्राप्त होता है। आपके पास संस्मरणों का अगाध भण्डार है। हमारा अनुरोध है की आप अपनी आत्मकथा और संस्मरण लिखकर हिंदी वांग्मय को समृद्ध करें। 
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अध्यक्ष 
आचार्य कृष्णकान्त चतुर्वेदी जी 
भारतीय मनीषा के श्रेष्ठ प्रतिनिधि, विद्वता के पर्याय, सरलता के सागर, वाग्विदग्धता के शिखर आचार्य कृष्णकांत चतुर्वेदी जी का जन्म १९ दिसंबर १९३७ को हुआ। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी की निम्न पंक्तियाँ आपके व्यक्तित्व पर सटीक बैठती हैं- 
जितने कष्ट-कंटकों में है जिसका जीवन सुमन खिला  
गौरव गंध उसे उतना ही यत्र-तत्र-सर्वत्र मिला।।
कालिदास अकादमी उज्जैन के निदेशक, रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय जबलपुर में संस्कृत, पाली, प्रकृत विभाग के अध्यक्ष व् आचार्य पदों की गौरव वृद्धि कर चुके, भारत सरकार द्वारा शास्त्र-चूड़ामणि मनोनीत किये जा चुके, अखिल भारतीय प्राच्य विद्या परिषद् के सर्वाध्यक्ष निर्वाचित किये जा चुके, महामहिम राष्ट्रपति जी द्वारा प्राच्य विद्या के विशिष्ट विद्वान के रूप में सम्मानित, राजशेखर अकादमी के निदेशन आदि अनेक पदों की शोभा वृद्धि कर चुके आचार्य जी ने ४० छात्रों को पी एच डी, तथा २ छात्रों को डी.लिट् करने में मार्गदर्शन दिया है। राधा भाव सूत्र, आगत का स्वागत, अनुवाक, अथातो ब्रम्ह जिज्ञासा, ड्वायर वेदांत तत्व समीक्षा, आगत का स्वागत, बृज गंधा, पिबत भागवतम, आदि अबहुमूल्य कृतियों की रच कर आचार्य जी ने भारती के वांग्मय कोष की वृद्धि की है। 
जगद्गुरु रामानंदाचार्य सम्मान, पद्मश्री श्रीधर वाकणकर सम्मान, अखिल भारतीय कला सम्मान, ज्योतिष रत्न सम्मान, विद्वत मार्तण्ड, विद्वत रत्न, सम्मान, स्वामी अखंडानंद सामान, युगतुलसी रामकिंकर सम्मान, ललित कला सम्मान, अदि से सम्मानित किये जा चुके आचार्य श्री संस्कारधानी ही नहीं देश के गौरव पुत्र हैं। आप अफ्रीका, केन्या, वेबुये आदि देशों में भारतीय वांग्मय व् संस्कृति की पताका फहरा चुके हैं। आपकी उपस्थिति व आशीष हमारा सौभाग्य है। 
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विशिष्ट वक्ता 
डॉ. सुरेश कुमार वर्मा 
श्रद्धेय डॉ. सुरेश कुमार वर्मा नर्मदांचल की साधनास्थली संस्कारधानी जबलपुर के गौरव हैं। "सदा जीवन उच्च विचार" के सूत्र को जीवन में मूर्त करने वाले डॉ. वर्मा अपनी विद्वता के सूर्य को सरलता व् विनम्रता के श्वेत-श्याम मेघों से आवृत्त किये रहते हैं। २० दिसंबर १९३८ को जन्मे डॉ. वर्मा ने प्राध्यापक हिंदी, विभागाध्यक्ष हिंदी, प्राचार्य तथा अतिरिक्त संचालक उच्च शिक्षा के पदों पर रहकर शुचिता और समर्पण का इतिहास रचा है। आपके शिष्य आपको ऋषि परंपरा का आधुनिक प्रतिनिधि मानते हैं। 
शिक्षण तथा  सृजन राजपथ-जनपथ पर कदम-डर-कदम बढ़ते हुए आपने मुजताज महल, रेसमान, सबका मालिक एक, तथा महाराज छत्रसाल औपन्यासिक कृतियोन की रचना की है। निम्न मार्गी व दिशाहीन आपकी  नाट्य कृतियाँ हैं। जंग के बारजे पर तथा मंदिर एवं अन्य कहानियाँ कहानी संग्रह तथा करमन की गति न्यारी, मैं तुम्हारे हाथ का लीला कमल हूँ आपके निबंध संग्रह हैं। डॉ. राम कुमार वर्मा की नाट्यकला आलोचना तथा हिंदी अर्थान्तर भाषा विज्ञान का ग्रन्थ है। इन ग्रंथों से आपने बहुआयामी रचनाधर्मिता व् सृजन सामर्थ्य की पताका फहराई है। 
डॉ. सुरेश कुमार वर्मा हिंदी समालोचना के क्षेत्र में व्याप्त शून्यता को दूर करने में सक्षम और समर्थ हैं। सामाजिक विषमता, विसंगति, बिखराब एयर टकराव के दिशाहीन मानक तय कर समाज में अराजकता बढ़ाने की दुष्प्रवृत्ति को रोकन ेमें जिस सात्विक और कल्याणकारी दृष्टि की आवश्यकता है, आप उससे संपन्न हैं। 
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विशिष्ट वक्ता डॉ. इला घोष  
वैदिक-पौराणिक काल  की विदुषी महिलाओं गार्गी, मैत्रेयी, लोपामुद्रा, रोमशा, पार्वती, घोषवती की परंपरा को इस काल में महीयसी महादेवी जी व चित्रा चतुर्वेदी जी के पश्चात् आदरणीया िला घोष जी ने निरंतरता दी है। ४३ वर्षों तक महाविद्यालयों में शिक्षण तथा प्राचार्य के रूप में दिशा-दर्शन करने के साथ ७५ शोधपत्रों का लेखन-प्रकाशन व १३० शोध संगोष्ठियों को अपनी कारयित्री प्रतिभा से प्रकाशित करने वाली इला जी संस्कारधानी की गौरव हैं। 
संस्कृत वांग्मय में शिल्प कलाएँ, संस्कृत वांग्मये कृषि विज्ञानं, ऋग्वैदिक ऋषिकाएँ: जीवन एवं दर्शन, वैदिक संस्कृति संरचना, नारी योगदान विभूषित, सफलता के सूत्र- वैदिक दृष्टि, व्यक्तित्व विकास में वैदिक वांग्मय का योगदान, तमसा तीरे तथा महीयसी आदि कृतियां आपके पांडित्य तथा सृजन-सामर्थ्य का जीवंत प्रमाण हैं। 
दिल्ली संस्कृत साहित्य अकादमी, द्वारा वर्ष २००३ में 'संस्कृत साहित्ये जल विग्यानम व् 'ऋग्वैदिक ऋषिकाएँ: जीवन एवं दर्शन' को तथा वर्ष २००४ में 'वैदिक संस्कृति संरचना'  को कालिदास अकादमी उज्जैन द्वारा भोज पुरस्कार से सामंत्रित किया जाना आपके सृजन की श्रेष्ठता का प्रमाण है। संस्कृत, हिंदी, बांग्ला  के मध्य भाषिक सृजन सेतु की दिशा में आपकी सक्रियता स्तुत्य है। वेद-विज्ञान को वर्तमान विज्ञान के प्रकाश में परिभाषित-विश्लेषित करने की दिशा में आपके सत्प्रयाह सराहनीय हैं। हिंदी छंद के प्रति आपका आकर्षण और उनमें रचना की अभिलाष आपके व्यक्तित्व का अनुकरणीय पहलू है। 
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दोहा सलिला निर्मला डॉ. अरुण मिश्र

पुस्तक चर्चा:
नई उम्र की नई फसल: दोहा सलिला निर्मला
डॉ. अरुण मिश्र
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प्रतिभा कवित्व का बीज है जिसके बिना काव्य रचना संभव नहीं है। 'कवित्तं दुर्लभं लोके' काव्य रचना सृष्टि में सर्वाधिक दुर्लभ कार्य है। आचार्यों के अनुसार काव्य के ३ हेतु हैं।

' नैसर्गिकी च प्रतिभा, श्रुतञ्च बहु निर्मलं।
अमंदश्चाभियोगश्च, कारणं काव्य संपद:।।' दंडी काव्यादर्श १ / १०३

निसर्गजात प्रतिभा, निर्भ्रांत लोक-शास्त्र ज्ञान और अमंद अभियोग यही काव्य के लक्षण हैं। कावय की रचना शक्ति, निपुणता और अभ्यास द्वारा ही संभव है। काव्य छंद-विधान से युक्त सरस वाणी है जिसका सीधा संबंध लोक मंगल से होता है। आचार्य शुक्ल भी यही स्वीकार करते हैं कि जिस काव्य में लोक के प्रति अधिक भावना होगी, वही उत्तम है। छंद-शास्त्र का ज्ञान सभी को प्राप्त नहीं है, वाग्देवी की कृपा ही छंद-युक्त काव्य के लिए प्रेरित करती है।
आचार्य श्री संजीव वर्मा 'सलिल' एवं डॉ. साधना वर्मा के संपादन में विश्ववाणी हिंदी संस्थान जबलपुर द्वारा शांतिराज पुस्तक माला के अंतर्गत प्रकाशित दोहा शतक मञ्जूषा २ 'दोहा सलिला निर्मला' कृति का प्रकाशन हुआ है। आज के दौर में साहित्य-लेखन में छंदों का प्रयोग नगण्य होता जा रहा है तथापि कुछ रचनाकार ऐसे हैं जिन्होंने छंदों के प्रति असीम निष्ठा का भाव अपनाकर छंद-रचना से खुद को अलग नहीं किया है। वे छंद-विधान में निष्णात हैं। संपादक द्वय ने इनकी प्रतिभा का आकलन कर पंद्रह-पंद्रह दोहाकारों द्वारा रचित सौ-सौ दोहों को इस कृति में संग्रहित किया है। यह संग्रह उपयुक्त व सटीक है। इस संग्रह की विशेष बात यह है कि हर दोहाकार के दोहों पर पहले संपादक द्वारा समीक्षकीय टिप्पणी करने के साथ-साथ पाद टिप्पणी में दोहा में ही दोहा विषयक जानकारी दी गई है।
संग्रह के पहले रचनाकार अखिलेश खरे 'अखिल' के दोहों में ग्राम्य जीवन की सुवास महकती है-
खेतों से डोली चली, खलिहानों में शोर।
पिता-गेह से ज्यों बिदा, पिया गेह की ओर।।

निम्न दोहे में ग्राम्य व नगर जीवन की सटीक तुलना की गई है-
शहर-शहर सा सुघर है, उससे सुंदर गाँव।
सुदिन बांचता भोर से, कागा कर-कर काँव।।

श्रृंगार रस से भरपूर दोहे भी अखिल जी द्वारा लिखे गए हैं-
नैना खुली किताब से, छुपा राज कह मौन।
महक छिपे कब इत्र की, कहो लगाए कौन।।

प्रेम की भाषा मौन रहती है पर प्रेम छिपाये नहीं छिपता। यह प्रेम स्वर्गीय ज्योति से प्रकाशित रहता है।
दोहाकार अरुण शर्मा की चिंता गंगा-शुद्धि को लेकर है। निर्मल पतित पावनी, राम की गंगा को मैली होते देख कवि ने अनायास यह दोहा कहा होगा-
गंगा नद सा नद नहीं, ना गंगे सा नीर।
दर्जा पाया मातु का, फिर भी गंदे तीर।।

करते गंगा आरती, लेकर मन-संताप।
मन-मैला धोया नहीं, कहाँ मिटेंगे पाप।।

बरही कटनी निवासी श्री उदयभानु तिवारी के दोहों में भक्ति और प्रेम की रसधारा प्रवाहित है। महारास लीला शीर्षक उनके दोहों में मधुरा भक्ति का प्राकट्य हुआ है। मन को आल्हादित करने वाले एक-एक दोहे में पाठक का मन रमता जाता है और वह ब्रम्हानंद सहोदर का आनंद उठाता है-
गोपी जीवन प्रेम है, कान्हा परमानंद।
मोहे खग नर नाग सब, फैला सर्वानंद।।

श्री कृष्ण योगिराज हैं। 'वासुदेव पुरोज्ञानं वासुदेव पराङ्गति।' इन दोहों को हृदयंगम कर बरबस ही स्मरण हो आते हैं ये दोहे-
कित मुरली कित चंद्रिका, कित गोपियन के साथ। 
अपने जन के कारने, कृष्ण भये यदुनाथ।।

महारास में 'मैं-'तुम' का विभेद नहीं रहता, सब प्रेम-पयोधि में डूब जाते हैं। बिहारी कहते हैं-
गिरि वे ऊँचै रसिक मन, बूड़ै जहाँ हजार।
वहै सदा पशु नरन को, प्रेम पयोधि पगार।।

बरौंसा, सुल्तानपुर के ओमप्रकाश शुक्ल गाँधीवादी विचारधारा के पोषक हैं। समसामयिक परिवेश में जो घटित है, उसके प्रति उनकी चिंता स्वाभाविक है-
भरे खज़ाना देश का, पर अद्भुत दुर्योग।
निर्धन हित त्यागें; करें, चोर-लुटेरे भोग।।

समानता, न्याय का सभी को अधिकार प्राप्त हो कवि की यही कामना है-
सबको सबका हक मिले, बिंदु-बिंदु हो न्याय।
ऐसा हो कानून जो, रहे धर्म-पर्याय।।

जीवन में सहजता और सारल्य ही शक्ति देता है, इसलिए दोहाकार ने संतोष व्यक्त किया है। उसकी इच्छा है कि सब प्रेम से रहें, सन्मार्ग पर चलें-
सत का पथ मत छोड़ना, हे भारत के लाल।
राजभोग क्यों लालसा, जब है रोटी दाल।।

नरसिंहपुर निवासी जयप्रकाश श्रीवास्तव गीत-नवगीत के रचनाकार हैं। वे निसर्ग से संवाद करते नज़र आते हैं-
यूँ तो सूरज नापता, धरती का भूगोल।
पर कोइ सुनता नहीं गौरैया के बोल।।

पेड़ हुए फिर से नए, पहन धुले परिधान।
फूलों ने हँसकर किया, मौसम का सम्मान।।

हिंदी में प्रारंभ से ही नीतिपरक दोहों का चलन रहा है। इसी परंपरा में नीता सैनी के दोहों का सृजन हुआ है-
नैतिकता कायम रहे, करिए चरित-विकास।
कोरे भाषण नीति के, तनिक न आते रास।।

उनके इस दोहे में गंगा के प्रति असीम निष्ठा का भाव अभिव्यक्त हुआ है-
युगों-युगों से धो रहीं, गंगा मैया पाप।
निर्मल मन करतीं सदा, हरतीं पीड़ा-पाप।।

सोहागपुर, शहडोल निवासी डॉ. नीलमणि दुबे का व्यक्तित्व ही काव्यमय है। छंदविधान उनकी बाल्य जीवन की कविताओं में दृष्टव्य है। वे हिंदी प्रध्यापाल होने के पहले काव्य-रचयिता हैं। कविता उनके आस-पास विचरती है। संस्कृतनिष्ठ पदावली में उनकी गीत-रचना पाठकों को सहज ही लुभाती है। वर्तमान समय में बेमानी होते संबंधों को वे दोहे के माध्यम से उजागर करते हैं-
आग-आग सब शहर हैं, जहर हुए संबंध। 
फूल-फूल पर लग गए, मौसम के अनुबंध।।

प्रकृति के प्रति असीम लगाव है उन्हें। खेतों की हरियाली, वासंतिक प्रभा उन्हें विमोहित करती है। प्रकृति के पल-पल बदलते परिवेश का वे स्वागत करती हैं-
आम्र-मंजरी मिस मधुर, देते अमृत घोल।
हिय में गहरे उतरते, पिक के मीठे बोल।।

सरसों सँकुचाई खड़ी, खिला-खिला कचनार। 
कर सिंगार सँकुचा गई, हरसिंगार की डार।।

धौलपुर, राजस्थान के कवि बसंत कुमार शर्मा राजस्थान की वीरभूमि व् टैग-बलिदान की माटी की सुवास लेकर दोहे रचते हैं। उन्हें छंदों के प्रति विशेष लगाव है। शोष्हित वर्ग के प्रति उनके मन में विशेष करुणा है। हमारे कृषि प्रधान देश में किसान प्रकृति के रूठ जाने से लचर हो जाता है-
रामू हरिया खेत में, बैठा मौन उदास।
सूखा गया असाढ़ तो, अब सावन से आस।.
सिवनी मध्य प्रदेश के रहनेवाले डॉ. रामकुमार चतुर्वेदी वर्तमान व्यवस्था से आक्रोशित हैं। वे अपने परिवेश को व्यंग्य-धार से समझाते हैं-
पाँव पकड़ विनती करैं, सिद्ध करो सब काम। 
अपना हिस्सा तुम रखो, कुछ अपने भी नाम।।

विषय चयन के क्षेत्र में, गाए अपना राग। 
कौआ छीने कान को, कहते भागमभाग।।

सिवान, बिहार की रीता सिवानी युवा कवयित्री हैं। वे समतामूलक समाज में पूर्ण आस्था रखती हैं-
धरा जगत के एक है, अंबर सबका एक। 
मनुज एक मिट्टी बने, रंगत रूप अनेक।।

रिश्ते में जब प्रीत हो, तभी बने वह खास। 
प्रीत बिना रिश्ते लगें, बोझिल मूक उदास।।

प्रेम जहाँ है, वहाँ तर्क नहीं है क्योंकि तर्क से विद्वेष बढ़ता है। जहाँ प्रेम हो, निष्ठां हो, वहां कुतर्कों का स्थान नहीं है, प्रेम के बिना जीवन सूना है। अहंकार को त्यगना ही सच्चा प्रेम है। कबीर की वाणी में- 'जब मैं था तब हरि नहिं, अब हरि है मैं नाहिँ'। ईश्वर को पाना है, अच्छा इंसान बनना है तो अहंकार का त्याग आवश्यक है-
गर्व नहीं करना कभी, धन पर ऐ इंसान! 
कर जाता पल में प्रलय, छोटा सा तूफ़ान।।

शुचि भवि भिलाई (छत्तीसगढ़)निवासी हैं। विरोधाभास की जिंदगी उनहोंने देखी है। परिवार-समाज से वे कुछ चाहती हैं। समाज में विश्वास नहीं रहा है। सहज-सरल लोगों का आज जीना दुश्वार हो गया है। भवि को समाज से सिर्फ निराशा ही नहीं है अपितु कहीं न कहीं वह आशान्वित भी हैं।भवि जीवन में सरलता के साथ ही विनम्रता को प्रश्रय देते हुए कहती हैं-
कटु वचनों से क्या कहीं, बनती है कुछ बात? 
बोलो मीठे वचन तो, सुधरेंगे हालात।।

तुलसीदास जी भी यही कहते हैं-
लसी मीठे वचन ते, सुख उपजत चहुँ ओर। 
बसीकरन इक मंत्र है, परिहरु बचन कठोर।।

'भवानी शंकरौ वजनदे, श्रद्धा विश्वास रूपिणौ' की अनुगूँज भवि के इस दोहे में व्यंजित है-
बूँद-बूँद विश्वास से, बनती है पहचान। 
पल भर में कोई कभी, होता नहीं महान।।

दिल्ली में जन्में शोभित वर्मा में एक अभियांत्रिकी महाविद्यालय में विभागाध्यक्ष होने के बाद भी पारिवारिक संस्कार के कारण हिंदी के प्रति रूचि है। सलिल जी से जुड़ाव ने उनमें और छंद के प्रति लगाव उत्पन्न कर दिया। उनका कवि पर्यावरण के प्रति जागरूक है-
काट रहे नित पेड़ हम, करते नहीं विचार। 
आपने पाँव कुल्हाड़ पर, आप रहे हैं मार।।

अभियंता होने के नाते वे जानते हैं की किसी निर्णय का समय पर होना कितना आवश्यक है-
यदि न समय पर लिया तो निर्णय हो बेअर्थ। 
समय बीतने पर लिया निर्णय करे अनर्थ।।

सुदूर ईटानगर अरुणांचल में पेशे से शिक्षिका सरस्वती कुमारी ने अपने दोहों में सामाजिक विसंगतियों को उद्घाटित किया है। वे नारी शक्ति की समर्थक और राधा-कृष्ण के प्रेम की उपासिका हैं-
रंग-रँगीली राधिका, छैल छबीला श्याम। 
रास रचाते जमुन-तट, दोनों आठों याम।।

गीता का कर्म योग भी उनके दोहों में व्याप्त है-
ढूँढ जरा ऐ ज़िंदगी!, तू अपनी पहचान। 
भाग्य बदल दे कर्म कर, लिख अपना उन्वान।।

हिंदी प्राध्यापक फैज़ाबाद निवासी हरी फ़ैज़ाबादी अवधि के कवि हैं। वे कविता की पारम्परिकता को बरकरार रखे हुआ माँ को श्रेष्ठ मानते हैं-
कर देती नौ रात में, जीवन का उद्धार। 
माँ की महिमा यूँ नहीं, गाता है संसार।।

स्वच्छता अभियान के लिए वे जागरूक हैं। उनकी पीड़ा यह कि स्वच्छ रहने के लिए भी अभियान चलना पड़ रहा है-
आखिर चमके किस तरह मेरा हिंदुस्तान। 
यहाँ सफाई भी नहीं, होती बिन अभियान।।

सारण बिहार में जन्मे, रांची में कार्यरत हिमकर श्याम इस दोहा संग्रह के अंतिम रचनाकार हैं। पत्रकारिता में स्नातक होने के साथ ही वे दोहा, ग़ज़ल, रिपोर्ताज लिखने में सिद्धहस्त हैं। सहज व्यक्तित्व होने के कारण ही वे पर्यावरणीय विक्षोभ से चिंतित हैं। प्रकृति के प्रति असीम अनुराग उनके लेखन में व्याप्त है-
झूमे सरसों खेत में, बौराए हैं आम। 
दहके फूल पलाश के, है सिंदूरी शाम।।

वृक्षों की अंधाधुंध कटाई उन्हें चिंतित करती है। आँगन में लगे तुलसी के पौधे के नीचे रखे दीपक अब ध्यान में नहीं है-
आँगन की तुलसी कहाँ, दिखे नहीं अब नीम। 
जामुन-पीपल कट गए, ढूँढे कहाँ हकीम।।

आचार्य संजीव सलिल तथा प्रो। साधना वर्मा द्वारा 'शान्तिराज पुस्तक मालांतर्गत संपादित 'दोहा शतक मञ्जूषा २ "दोहा सलिला निर्मला" छंद विधान की परंपरा को सुदृढ़ बना सकी है। स्वतंत्रता के बाद विशेषकर नवें-दसवें दशक से छंद यत्र-तत्र ही दिखते हैं। छंद लेखन कठिन कार्य है। आचार्य संजीव सलिल जी ने अथक श्रम कर दोहाकारों को तैयार कर उनके प्रतिनिधि दोहों का चयन कर यह दोहा शतक मंजूषा श्रृंखला बनाई है जो वर्तमान परिवेश और सामयिक समस्याओं के अनुकूल है। ये रचनाकार अपने परिवेश से सुपरिचित हैं। अत; उसे अभिव्यक्त करने में वे संकोच नहीं करते हैं। कुल मिलाकर सभी दृष्टियों से संग्रहीत कवियों के दोहे छंद-विधान के उपयुक्त व् सटीक हैं। संपादक द्वय को ढेर सीबधाई और शुभकानाएँ। विश्वास है कि भविष्य में ये दोहे पाठकों को दिशा-सोची बना सकेंगे। 
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संपर्क: विभागाध्यक्ष हिंदी, शासकीय मानकुँवर बाई स्नातकोत्तर स्वशासी महिला महाविद्यालय, जबलपुर ४८२००१