शनिवार, 20 जनवरी 2018

सरस्वती वंदना

स्तवन
*
सरस्वती शारद ब्रम्हाणी!
जय-जय वीणा पाणी!!
*
अमल-धवल शुचि,
विमल सनातन मैया!
बुद्धि-ज्ञान-विज्ञान
प्रदायिनी छैंया।
तिमिरहारिणी,
भयनिवारिणी सुखदा,
नाद-ताल, गति-यति
खेलें तव कैंया।
अनहद सुनवाई दो कल्याणी!
जय-जय वीणापाणी!!
*
स्वर, व्यंजन, गण,
शब्द-शक्तियां अनुपम।
वार्णिक-मात्रिक छंद
अनगिनत उत्तम।
अलंकार, रस, भाव,
बिंब तव चारण।
उक्ति-कहावत, रीति-
नीति शुभ परचम।
कर्मठ विराजित करते प्राणी
जय-जय वीणापाणी!!
*
कीर्ति-गान कर,
कलरव धन्य हुआ है।
यश गुंजाता गीत,
अनन्य हुआ है।
कल-कल नाद प्रार्थना,
अगणित रूपा,
सनन-सनन-सन वंदन
पवन बहा है।
हिंदी हो भावी जगवाणी
जय-जय वीणापाणी!!
***

doha shatak: arun arnav khare


दोहा शतक: अरुण अर्णव खरे
अरुण अर्णव खरे















आत्मज: स्व. गयाप्रसाद खरे
शिक्षा: बी.ई. यांत्रिकी
संप्रति: सेवा निवृत्त मुख्य अभियंता, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग मध्य प्रदेश।


संपर्क: डी-१/३५ दानिश नगर, होशंगाबाद मार्ग, भोपाल म०प्र० ४६२०२६
चलभाष: ९८९३००७७४४ , ई मेल: arunarnaw@gmail.com
*
पता नहीं किस देव का, ऐसा है अभिशाप। खेल करोड़ों में रहे, नेता पैसा छाप
* असंतुष्ट हैं सब यहाँ, क्या किसान, क्या छात्र संवेदी सरकार है, करती वादे मात्र * पुत्र हुआ सरपंच का, फिर दसवीं में फेल
ख़ास योग्यता खेलता, राजनीति के खेल * टिकट उसे ही मिल गया, देखा-समझ रिज्यूम रेप, घूस का अनुभवी, खाते में दो खून * गया रामलीला किया, लछमन जी का रोल था अपात्र अब हो गया, वह नेता अनमोल | * जनमेजय के यज्ञ से, बचे रहे जो नाग अब कुर्सी पर बैठकर, उगल रहे हैं आग * बिगुल चुनावी क्या बजा, लगें नित्य आरोप मन व्याकुल है देखकर, मर्यादा का लोप * लाई है ऋतु चुनावी, आरोपों की बाढ़ झूठ बोलते ना दुखे, नेताओं की दाढ़ * नेता जी हैरान हैं, सख्त बड़ा आयोग। कम्बल, दारू सब रखे, कैसे हो उपयोग? * जनसेवा चर्चित हुई, मंत्री की श्रीमान। साले जी को मिल गईं, सारी रेत खदान
* पूस-अंत की सुबह के, अलबेले हैं ढंग। सूरज है निस्तेज सा, कुहरा हुआ दबंग।। * सूरज काँपर ठण्ड से, कुहरा ओढ़े भोर। हवा तीर जैसी रही, अंदर तक झकझोर।। * शरद हमेशा की तरह, लाया है सौगात। जलतरंग सी नासिका, किट-किट करते दाँत।। * आँखें मलता रवि उगा, ले अलसाई धूप। ठिठुर-ठिठुर छाया हुई, कुबड़ी और कुरूप।। * दूभर सूरज का दरस, पारा जीरो पास। हम अपने घर ही सिमट, भोग रहे बनवास।। * कहो कहाँ प्रियतम खड़े, कुहरा है घनघोर। आँखें मल-मल देखते, चले नहीं कछु जोर।। * जलती रही अलाव में, ठण्डी-ठण्डी आग। जाड़ा-जाड़ा मन जपे, तन ने लिया बिराग।। * प्रियतम दूर, न आ रहे, आती उनकी याद। धुआँ-धुआँ सब शब्द हैं, कैसे हो संवाद।। * पूस अंत की सुबह का, धूसर-धूसर रंग। पाखी बैठे घोंसले, कैसे हो सत्संग।। * सहमा सूरज झाँकता, नभ से कम्बल ओढ़। सर्द हवाओं से किया, उसने ज्यों गठजोड़
* आभासी रिश्ते हुए, अपनेपन से दूर। लाइक गिन दिन कट रहे, हैं इतने मजबूर।। * जलता रावण कह रहा, सुन लो मेरा हाल। क़द मेरा दो चार फ़ुट, बढ़ जाता हर साल
* राम नाम रखकर करें, रावण जैसे काम। चाहे रामरहीम हों, चाहे आसाराम
* जलता रावण पूछता, बतलाओ हे राम! क्या कलयुग में फूँकना, पुतले केवल काम।। * अटारियाँ ऊँची हुईं, फक्कड़ रहे कबीर। लेशमात्र बदली नहीं, होरी की तक़दीर।। * काला धन आया नहीं, इसका सबको खेद। माल्या लेकर उड़ गया, सारा माल सफ़ेद
* संत कलंकित कर रहे, हम सबका संसार। त्याग-तपस्ता भूलकर, करते यौनाचार।। * समरसता के पथ चले, ना विकास के पाँव। होरी की है झोपड़ी, अब तक बाहर-गाँव।। * विनती राजन आपसे, करो निरंकुश राज। बस हमको मिलती रहे, सूखी-रोटी प्याज।। * चौंसठ खानों में छुपा, राजनीति का सार। नेताओं ने सीख लीं, चालें कई हजार
* रँगने को लाया तुम्हें, भाँति-भाँति के रंग। बचा सको तो लो बचा, अपने अंग अनंग
* अंदर-बाहर रँग दिया, होली में इस बार। मन बस से बाहर हुआ, कौन करे उपचार
* मुट्ठी लगे गुलाल ने, जोड़े मन के तार। बाँध गया सत जन्म को, होली का त्योहार
* पाती लिखी बसंत ने, जब गुलशन के नाम। माली को करने लगे, भौंरे भी परनाम
* पहली-पहली फाग का, अनुपम है उल्लास। नैन हुए कचनार से, अधरों खिले पलास।।
* फूलों की वेणी पहिन, पायल बाँधे पाँव। पूछे पता बसंत का, फागुन आकर गाँव
* रितु बसंत प्रिय दूर तो, मन है बड़ा उदास। हरसिंगार खिल यों लगे, उड़ा रहा उपहास।। * फूलों के घर आ गई, खुशबू लेकर डाक। लगीं तितलियाँ झूमने, बदल-बदल कर फ्रॉक।। * बाँचें गीत गोविंद जू, ढोलक देती थाप। फागुन लेकर आ गया, घर उमंग चुपचाप। * पोर-पोर खुशबू लिए, भीनी-भीनी छाँव। सिर महुए के घट धरे, फागुन आया गाँव।। *
होरी-धनिया हैं दुखी, बिटिया हुई सयान। घात लगाकर हैं खड़े, लोमड़, गीदड़, श्वान।। * पटवारिन की छोकरी, मिर्ची तीखी-लाल। चर्चा उसकी हर तरफ, गाँव, गली, चौपाल
*
दिल में करुणा प्रेम है, अधरों पर मुस्कान
मेरी इस संसार में, बस इतनी पहिचान
*
शेर लिखे मैंने बहुत, हो मस्ती में चूर
तुम्हें देखकर जो लिखे, हुए वही मशहूर
*
वेद-पुराण पढ़े मगर, रहा अधूरा ज्ञान
तुमसे मिलकर ही मिली, दुनिया में पहिचान
*
भावहीन सब शब्द हैं, बुझे-बुझे से गीत
इसका कारण एक ही, तुमसे दूरी मीत
*
बिन बोले मनुहार का, ऐसे दिया जवाब
नजर चुराई लाज से, गालों खिले गुलाब
*
साँस-साँस केसर घुली, अंग-अंग मकरंद
अनपढ़ मन कहने लगा, गीत, गजल, नव छंद
*
अधिक और भी खिल गई, पूनम की वह रात
होंठ दबा जब बोल दी, उनने मन की बात
*
केन नदी के तट मिला, अनुपम उनका साथ
बिन बोले बस देखते, बीती सारी रात
*
कहो इसे दीवानगी, या सच्चा अनुराग
उनकी मृदु मुस्कान पर, हमने लिखी किताब
*
सुंदर सारा जग लगे, मन में जागे प्रीत
हारे दिल फिर भी लगे, मिली निराली जीत
*
उपवन, मौसम, चाँदनी, तुमसे मेरे छंद
तुमसे अधरों पर हँसी, तुमसे सब आनंद
*
सात समंदर पार वे, करो सखी उपचार
होरी-फागें बाँचता, फागुन आया द्वार
*
साँस-साँस केसर घुली, अंग-अंग मकरंद
अनपढ़ मन की बात भी, लगती है गुलकंद
*
जवाकुसुम सा रूप है, वाणी घुली मिठास।
तन चंदन-तरु सुवासित, मन में हुआ उजास
*
बारिश की पहली झड़ी, हुआ विरोधाभास
धरती का ज्वर कम करे, देह तपे आभास
*
पानी लेकर आ गए, कारे-कारे मेघ
खेतों में हलधर लिखें, ले हल नव आलेख
*
सबको बारिश कर गई, इतना मालामाल
सूखी नदिया बाह चली, हुए लबालब ताल
*
जेठ माह में देखिये, कैसा है अंधेर
लगे सुबह से घूरने, सूरज आँख तरेर
*
भ्रमर, सुरभि, कोयल, कुसुम, हैं ये सभी गवाह
तुम मस्ती में जब चलीं, मौसम भटका राह
*
सूरज पानी ले उड़ा, किया नहीं संकोच
पानी हमसे माँगती, गौरैया की चोंच
*

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शुक्रवार, 19 जनवरी 2018

दोहा दुनिया

शिव अक्रिय, सक्रिय शिवा,
ऊर्जा पुंज अनंत।
कहे गए भगवान ये,
वे भगवती न अंत।।
*
धन-ऋण ऊर्जाएं मिलें,
जन्में अगणित रूप।
कण-कण, तृण-तृण तरंगित,
बनती सृष्टि अनूप।।
*
रूप-अरूप बनें-मिटें,
शिवा सुरूपा सोह।
शिव कुरूप को शुभ करें,
सकें शिवा-मन मोह।।
*
शिव शंका का अंत कर,
गुंजा रहे हैं शंख।
शिवा कल्पना सच करें,
उड़ें लगाकर पंख।।
*
हैं श्रद्धा-विश्वास ये,
सृष्टि रचें कर अंत।
सदा-सदा पूजे गए,
जो जाने वह संत।।
*
प्रगट करें शिव तीन गुण,
करें आप में लीन।
गगन आत्मिका प्रकृति है,
माया परम प्रवीण।।
*
जान न सकते जिसे, जो
होता खुद उत्पन्न।
व्यक्त-लीन सब कार्यकर,
लिंगराज संपन्न।।
*
तीन मेखमय वेदिका,
जग धात्री भग शक्ति।
लिंग चिन्ह आधार भग,
मिल जग रच दें मुक्ति।।
*
बिंदु अण्ड ही पिण्ड हो,
शून्य सिंधु आधार।
षड् समृद्धि 'भग' नाम पा,
करें जगत-व्यापार।।
*
शिव हरि रवि गणपति शिवा,
पंच देव मय वृत्त।
चित्र गुप्त कर प्रगट विधि,
होते आप निवृत्त।।
*
निराकार साकार हो,
प्रगटें नाना रूप।
नाद तरंगें कण बनें,
गहरा श्यामल कूप।।
***
१८-१-२०१८, जबलपुर।

तकनीकी लेख

 
इन्स्टीट्यूशन ऑफ़ इंजीनियर्स कोलकाता द्वारा   पुरस्कृत द्वितीय श्रेष्ठ तकनीकी लेख  
वैश्विकता के निकष पर भारतीय यांत्रिकी संरचनाएँ 
अभियंता संजीव वर्मा 'सलिल' 
*
भारतीय परिवेश में अभियांत्रिकी संरचनाओं को 'वास्तु' कहा गया है। छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी प्रत्येक संरचना को अपने आपमें स्वतंत्र और पूर्ण व्यक्ति के रूप में  'वास्तु पुरुष' कहा गया है। भारतीय परंपरा प्रकृति को मातृवत पूज्य मानकर उपयोग करती है, पाश्चात्य पद्धति प्रकृति को निष्प्राण पदार्थ मानकर उसका उपभोग (दोहन-शोषण) कर और फेंक देती हैं। भारतीय यांत्रिक संरचनाओं के दो वर्ग वैदिक-पौराणिक काल की संरचनाओं और आधुनिक संरचनाओं के रूप में किये जा सकते हैं और तब उनको वैश्विक गुणवत्ता, उपयोगिता और दीर्घता के मानकों पर परखा जा सकता है। 

शिव की कालजयी अभियांत्रिकी: 

पौराणिक साहित्य में सबसे अधिक समर्थ अभियंता शिव हैं। शिव नागरिक यांत्रिकी (सिविल इंजीनियरिग), पर्यावरण यांत्रिकी, शल्य यांत्रिकी,  शस्त्र यांत्रिकी, चिकित्सा यांत्रिकी,  के साथ परमाण्विक यांत्रिकी में भी निष्णात हैं। वे इतने समर्थ यंत्री है कि पदार्थ और प्रकृति के मूल स्वभाव को भी परिवर्तित कर सके, प्राकृतिक परिवर्तनों के कारण जनगण की सुनिश्चित मृत्यु को भी टाल सके। उन्हें मृत्युंजय और महाकाल विशेषण प्राप्त हुए। 
शिव की अभियांत्रिकी का प्रथम ज्ञात नमूना ६ करोड़ से अधिक वर्ष पूर्व का है जब उन्होंने टैथीज़ महासागर के सूखने से निकली धरा पर मानव सभ्यता के प्रसार हेतु अपरिहार्य मीठे पेय जल प्राप्ति हेतु सर्वोच्च अमरकंटक पर्वत पर दुर्लभ आयुर्वेदिक औषधियों के सघन वन के बीच में अपने निवास स्थान के समीप बांस-कुञ्ज से घिरे सरोवर से प्रबल जलधार निकालकर गुजरात समुद्र तट तक प्रवाहित की जिसे आज सनातन सलिला नर्मदा के नाम से जाना जाता है। यह नर्मदा करोड़ों वर्षों से लेकर अब तक तक मानव सभ्यता केंद्र रही है।  नागलोक और गोंडवाना के नाम से यह अंचल पुरातत्व और इतिहास में विख्यात रहा है। नर्मदा को शिवात्मजा, शिवतनया, शिवसुता, शिवप्रिया, शिव स्वेदोद्भवा, शिवंगिनी आदि नाम इसी सन्दर्भ में दिये गये हैं। अमरकंटक में बांस-वन से निर्गमित होने के कारण वंशलोचनी, तीव्र जलप्रवाह से उत्पन्न कलकल ध्वनि के कारण रेवा, शिलाओं को चूर्ण कर रेत बनाने-बहाने के कारण बालुकावाहिनी, सुंदरता तथा आनंद देने के कारण नर्मदा, अकाल से रक्षा करने के कारण वर्मदा, तीव्र गति से बहने के कारण क्षिप्रा,  मैदान में मंथर गति के कारन मंदाकिनी, काल से बचने के कारण कालिंदी, स्वास्थ्य प्रदान कर हृष्ट-पुष्ट करने के कारण जगजननी जैसे विशेषण नर्मदा को मिले।

जीवनदायी नर्मदा पर अधिकार के लिए भीषण युद्ध हुए। नाग, ऋक्ष, देव, किन्नर, गन्धर्व, वानर, उलूक दनुज, असुर आदि अनेक सभ्यताएं सदियों तक लड़ती रहीं। अन्य कुशल परमाणुयांत्रिकीविद दैत्यराज त्रिपुर ने परमाण्विक ऊर्जा संपन्न ३ नगर 'त्रिपुरी' बनाकर नर्मदा पर कब्जा किया तो शिव ने परमाण्विक विस्फोट कर उसे नष्ट कर दिया जिससे नि:सृत ऊर्जा ने ज्वालामुखी को जन्म दिया।  लावा के जमने से बनी चट्टानें लौह तत्व की अधिकता के कारण जाना हो गयी। यह स्थल लम्हेटाघाट के  नाम से ख्यात है। कालांतर में चट्टानों पर धूल-मिट्टी जमने से पर्वत-पहाड़ियाँ और उनके बीच में तालाब बने। जबलपुर से ३२ किलोमीटर दूर ऐसी ही एक पहाड़ी पर ज्वालादेवी मंदिर मूलतः ऐसी ही चट्टान को पूजने से बना। जबलपुर के ५२ तालाब इसी समय बने थे जो अब नष्टप्राय हैं। टेथीज़ महासागर के पूरी तरह सूख्नने और वर्तमान भूगोल के बेबी माउंटेन कहे जानेवाले हिमालय पर्वत के बनने पर शिव ने मानसरोवर को अपना आवास बनाकर भगीरथ के माध्यम से नयी जलधारा प्रवाहित की जिसे गंगा कहा गया।

महर्षि अगस्त्य के अभियांत्रिकी कार्य:

महर्षि अगस्त्य अपने समय के कुशल परमाणु शक्ति विशेषज्ञ थे। विंध्याचल पर्वत की ऊँचाई और दुर्गमता उत्तर से दक्षिण जाने के मार्ग में  बाधक हुई तो महर्षि ने परमाणु शक्ति का प्रयोग कर पर्वत को ध्वस्त कर मार्ग बनाया। साहित्यिक भाषा में इसे मानवीकरण कर पौराणिक गाथा में लिखा गया कि अपनी ऊंचाई पर गर्व कर विंध्याचल सूर्य का पथ अवरुद्ध करने लगा तो  सृष्टि में अंधकार छाने लगा। देवताओं ने महर्षि अगस्त्य से समाधान हेतु प्रार्थना की। महर्षि को देखकर विंध्याचल प्रणाम करने झुका तो महर्षि ने आदेश दिया कि दक्षिण से मेरे लौटने तक ऐसे ही झुके रहना और वह आज तक झुका है। 
दस्युओं द्वारा आतंक फैलाकर समुद्र में छिप जाने की घटनाएँ बढ़ने पर अगस्त्य ने परमाणु शक्ति का प्रयोग कर समुद्र का जल सुखाया और राक्षसों का संहार किया। पौराणिक कथा में कहा गया की अगस्त्य ने चुल्लू में समुद्र का जल पी लिया। राक्षसों से आर्य ऋषियों की रक्षा के लिए अगस्त्य ने नर्मदा के दक्षिण में  अपना आश्रम (परमाणु अस्त्रागार तथा शोधकेन्द्र) स्थापित किया। किसी समय नर्मदा घाटी के एकछत्र सम्राट रहे डायनासौर राजसौरस नर्मदेंसिस  खोज लिए जाने के बाद इस क्षेत्र की प्राचीनता और उक्त कथाएँ अंतर्संबन्धित और  प्रामाणिकता होना असंदिग्ध है।
रामकालीन अभियांत्रिकी:  


रावण द्वारा परमाण्विक शस्त्र  विकसित कर देवों तथा मानवों पर अत्याचार किये जाने  को सुदृढ़ दुर्ग के रूप में बनाना यांत्रिकी का अद्भुत नमूना था। रावण की सैन्य यांत्रिकी विद्या और कला अद्वितीय थी।  स्वयंवर के समय राम ने शिव का एक परमाण्वास्त्र जो जनक के पास था  पास था,  रावण हस्तगत करना चाहता था नष्ट किया। सीताहरण  में प्रयुक्त रथ जो भूमार्ग और नभमार्ग पर चल सकता था वाहन यांत्रिकी की मिसाल था। राम-रावण  परमाण्विक युद्ध के समय शस्त्रों से निकले यूरेनियम-थोरियम के कारण सहस्त्रों वर्षों तक लंका  दुर्दशा रही जो हिरोशिमा नागासाकी की हुई थी। श्री राम के लिये नल-नील द्वारा लगभग १३ लाख वर्ष पूर्व निर्मित रामेश्वरम सेतु अभियांत्रिकी की अनोखी मिसाल है। सुषेण वैद्य द्वारा बायोमेडिकल इंजीनियरिंग का प्रयोग युद्ध अवधि में प्रतिदिन घायलों का इस तरह उपचार किया गया की वे अगले दिन पुनः युद्ध कर सके।   

कृष्णकालीन अभियांत्रिकी:

लाक्षाग्रह, इंद्रप्रस्थ तथा द्वारिका कृष्णकाल की अद्वितीय अभियांत्रिकी संरचनाएँ हैं। सुदर्शन चक्र, पाञ्चजन्य शंख, गांडीव धनुष आदि शस्त्र निर्माण कला के श्रेष्ठ उदाहरण हैं। महाभारत पश्चात अश्वत्थामा द्वारा उत्तरा के गर्भस्थ शिशु पर प्रहार, श्रीकृष्ण द्वारा सुरक्षापूर्वक शिशु जन्म कराना बायो मेडिकल इंजीनियरिंग का अद्भुत उदाहरण है। गुजरात में समुद्रतट पर कृष्ण द्वारा बसाई गयी द्वारिका नगरी उनकी मृत्यु पश्चात जलमग्न हो गयी। २००५ से भारतीय नौसेना के सहयोग से इसके अन्वेषण का कार्य प्रगति पर है। वैज्ञानिक स्कूबा डाइविंग से इसके रहस्य जानने  में लगे हैं। 

श्रेष्ठ अभियांत्रिकी के ऐतिहासिक उदाहरण :

श्रेष्ठ भारतीय संरचनाओं में से कुछ इतनी प्रसिद्ध हुईं कि  उनका रूपांतरण कर निर्माण का श्रेय  सुनियोजित प्रयास शासकों द्वारा किया गया। उनमें से कुछ निम्न  निम्न हैं:   
तेजोमहालय (ताजमहल) आगरा: 

हिन्दू राजा परमार देव द्वारा ११९६ में बनवाया गया तेजोमहालय  (शिव के पाँचवे  रूप अग्रेश्वर महादेव नाग नाथेश्वर का उपासना गृह तथा राजा का आवास) भवन यांत्रिकी कला का अद्भुत उदाहरण है जिसे विश्व के  सात आश्चर्यों में गिना जाता है

तेजो महालय के रेखांकन  

 १०८ कमल पुष्पों तथा १०८ कलशों से सज्जित संगमरमरी जालियों से सज्जित यह भवन ४०० से अधिक कक्ष तथा तहखाने हैं। इसके गुम्बद निर्माण के समय यह व्यवस्था भी की  गयी है कि बूँद-बूँद वर्षा टपकने से शिवलिंग का जलाभिषेक अपने आप होता रहे

विष्णु स्तम्भ (क़ुतुब मीनार) दिल्ली : 
युनेस्को द्वारा विश्व धरोहर घोषित, ​दक्षिण दिल्ली के विष्णुपद गिरि में राजा विक्रमादित्य के नवरत्नों में से एक प्रख्यात ज्योतिर्विद आचार्य मिहिर की शोध तथा निवासस्थली मिहिरा अवली (महरौली) में ​दिन-रात के प्रतीक 12 त्रिभुजाका​रों - 12 कमल पत्रों ​और 27 
नक्षत्रों
​ के प्रतीक 27 पैवेलियनों सहित निर्मित मंज़िली ​विश्व की सबसे ऊँची 
 
मीनार ​(72.7 मीटर
 ​, 
आधार 
 व्यास 14.3 
 मीटरशिखर व्यास 2.75 मीटर
 ,​379 सीढियाँनिर्माण काल सन 1193 पूर्वविष्णु ध्वज/स्तंभ (क़ुतुब मीनार) भारतीय अभियांत्रिकी संरचनाओं के श्रेष्ठता का उदाहरण है। इस पर सनातन धर्म के देवों, मांगलिक प्रतीकों तथा संस्कृत उद्धरणों का अंकन है

  
​​इन पर मुग़लकाल में समीपस्थ जैन मंदिर तोड़कर उस सामग्री से पत्थर लगाकर आयतें लिखाकर मुग़ल इमारत का रूप देने का प्रयास कुतुबुद्दीन ऐबक व् इलततमिश द्वारा 1199-1368 में किया गया ।   निकट ही ​चन्द्रगुप्त द्विती द्वारा विष्णुपद गिरि पर स्थापित और विष्णु भगवान को समर्पित 
गिरि पर स्थापित और विष्णु भगवान को समर्पितमीटर ऊंचा 6 टन वज़न का ध्रुव/गरुड़स्तंभ (लौह स्तंभ) स्तम्भ ​चंद्रगुप्त  विक्रमादित्य ने बाल्हिक युद्ध में विजय पश्चात बनवाया। इस पर अंकित लेख में सन 1052  के राजा अंनगपाल द्वितीय का उल्लेख हैतोमर नरेश विग्रह ने इसे खड़ा करवाया जिस पर सैकड़ों वर्षों बाद भी जंग नहीं लगी। फॉस्फोरस मिश्रित लोहे से निर्मित यह स्तंभ भारतीय धात्विक यांत्रिकी की श्रेष्ठता का अनुपम उदाहरण हैआई. आई. टी. कानपूर के प्रो. बालासुब्रमण्यम  के अनुसार हाइड्रोजन फॉस्फेट हाइड्रेट (FePO4-H3PO4-4H2O) जंगनिरोधी ​सतह है का निर्माण करता है

जंतर मंतर :
Samrat Yantra New Delhi.jpgसवाई जयसिंह द्वितीयद्वारा 1724 में दिल्ली जयपुर, उज्जैन, मथुरा और वाराणसी में ​निर्मित जंतर मंतर प्राचीन भारत की वैज्ञानिक उन्नति की मिसाल है।यहाँ​ सम्राट यंत्र सूर्य की सहायता से समय और ग्रहों की स्थितिमिस्र यंत्र वर्ष से सबसे छोटे ओर सबसे बड़े दिनराम यंत्र और जय प्रकाश यंत्र से खगोलीय पिंडों की गति जानी जा सकती ​है इनके अतिरिक्त दिल्ली, आगरा, ग्वालियर, जयपुर, चित्तौरगढ़, गोलकुंडा आदि के किले अपनी मजबूती, उपयोगिता और श्रेष्ठता की मिसाल हैं।​

आधुनिक अभियांत्रिकी संरचनाएँ:

भारतीय अभियांत्रिकी  संरचनाओं को शकों-हूणों और मुगलों के आक्रमणों के कारण पडी। मुगलों ने पुराने निर्माणों को बेरहमी से तोडा और  किये। अंग्रेजों ने भारत को एक इकाई बनाने के साथ अपनी प्रशासनिक पकड़ बनाने के लिये किये। स्वतंत्रता के पश्चात  सर मोक्षगुंडम विश्वेस्वरैया, डॉ. चन्द्रशेखर वेंकट रमण, डॉ. मेघनाद साहा आदि ने विविध परियोजनाओं को मूर्त किया। भाखरानागल, हीराकुड, नागार्जुन सागर, बरगी, सरदार सरोवर, टिहरी आदि जल परियोजनाओं ने कृषि  उत्पादन से भारतीय अभियांत्रिकी को गति दी।
जबलपुर, कानपूर, तिरुचिरापल्ली, शाहजहाँपुर, इटारसी आदि में  सीमा सुरक्षा बल हेतु अस्त्र-शास्त्र और सैन्य वाहन गुणवत्ता और मितव्ययिता के साथ बनाने में भारतीय संयंत्र किसी विदेशी संस्थान से पीछे नहीं हैं। 

परमाणु ऊर्जा संयंत्र निर्माण, परिचालन और दुर्घटना नियंत्रण में भारत के प्रतिष्ठानों ने विदेशी प्रतिष्ठानों की तुलना में बेहतर काम किया है।  कम सञ्चालन व्यय, अधिक रोजगार और उत्पादन के साथ कम दुर्घटनाओं ने परमाणु वैज्ञानिकों को प्रतिशत दिलाई है जिसका श्रेय डॉ. होमी जहांगीर भाभा को जाता है।

भारत की अंतरिक्ष परियोजनाएं और उपग्रह तकनालॉजी दुनिया में श्रेष्ठता, मितव्ययिता और सटीकता के लिए ख्यात हैं। सीमित संसाधनों के बावजूद भारत ने कीर्तिमान स्थापित किये हैं और खुद को प्रमाणित किया है। डॉ. विक्रम साराभाई का योगदान विस्मृत नहीं किया जा सकता।

भारत के अभियंता पूरी दुनिया में अपनी लगन, परिश्रम और योग्यता के लिए जाने जाते हैं ।  देश में प्रशासनिक सेवाओं की तुलना में  वेतन, पदोन्नति, सुविधाएँ और सामाजिक प्रतिष्ठा अत्यल्प होने के बावजूद भारतीय अभियांत्रिकी परियोजनाओं ने कीर्तिमान स्थापित किये हैं।

अग्निपुरुष डॉ. कलाम के नेतृत्व में भारतीय मिसाइल अभियांत्रिकी की  विश्व्यापी ख्याति प्राप्त की है। 
सारत: भारत की महत्वकांक्षी अभियांत्रिकी संरचनाएँ मेट्रो ट्रैन, दक्षिण रेल, वैष्णव देवी रेल परियोजना हो या बुलेट ट्रैन की भावी  योजना,राष्ट्रीय राजमार्ग चतुर्भुज हो या नदियों को जोड़ने की योजना भारतीय अभियंताओं ने हर चुनौती को स्वीकारा है। विश्व के किसी भी देश की तुलना में भारतीय संरचनाएँ और परियोजनाएं श्रेष्ठ सिद्ध हुई हैं। 
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संपर्क: अभियंता संजीव वर्मा 'सलिल', विश्व वाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर, ४८२००१.
ई मेल: salil.sanjiv@gmail.com, चलभाष ९४२५१८३२४४, ७९९९५५९६१८। 


दोहा दुनिया

शिव ही शिव जैसे रहें,
विधि-हरि बदलें रूप।
चित्र गुप्त हो त्रयी का,
उपमा नहीं अनूप।।
*
अणु विरंचि का व्यक्त हो,
बनकर पवन अदृश्य।
शालिग्राम हरि, शिव गगन,
कहें काल-दिक् दृश्य।।
*
सृष्टि उपजती तिमिर से,
श्यामल पिण्ड प्रतीक।
रवि मण्डल निष्काम है,
उजियारा ही लीक।।
*
गोबर पिण्ड गणेश है,
संग सुपारी साथ।
रवि-ग्रहपथ इंगित करें,
पूजे झुकाकर माथ।।
*
लिंग-पिण्ड, भग-गोमती,
हर-हरि होते पूर्ण।
शक्तिवान बिन शक्ति के,
रहता सुप्त अपूर्ण।।
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दो तत्त्वों के मेल से,
बनती काया मीत।
पुरुष-प्रकृति समझें इन्हें,
सत्य-सनातन रीत।।
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लिंग-योनि देहांग कह,
पूजे वामाचार।
निर्गुण-सगुण न भिन्न हैं,
ज्यों आचार-विचार।।
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दो होकर भी एक हैं,
एक दिखें दो भिन्न।
जैसे चाहें समझिए,
चित्त न करिए खिन्न।।
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सत्-शिव-सुंदर सृष्टि है,
देख सके तो देख।
सत्-चित्-आनंद ईश को,
कोई न सकता लेख।।
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१९.१.२०११, जबलपुर।