शुक्रवार, 20 अप्रैल 2018

निमाड़ी लघु कथाएँ

निमाड़ी लघुकथाएँ:
१. दो भाई 
पद्म श्री स्व. राम नारायणजी उपाध्याय.  
साहित्य वाचस्पति  

विचार तथा आचार  दोनों सगे भाई थे, दोनों एक ही दिन पैदा हुए, विचार पहले आचार उसके बाद में। उम्र में बड़ा होने पर भी विचार चंचल स्वभाव का था। वह कभी एक जगह टिकता नहीं था, हमेशा दूर-दूर की सोचता रहता था। आयु में छोटा होने पर भी आचार गंभीर स्वभाव का था। उसके मुखमण्डल पर सदा शालीनता उभरती थी, वह हमेशा कुछ न कुछ करता रहता था। शरीर से भारी-भरकम और सदा काम-धंधे से लदे  होने के कारण वह मन होने के बाद भी विचार के साथ खेल-कूद नहीं पाता था।    
एक दिन न जाने किस बात पर दोनों भाइयों में कहा-सुनी और मन-मुटाव हो गया। विचार गुस्सा होकर अपने घर से इतनी दूर निकल गया कि आचार उसे खोज ही नहीं सका। विचार के अभाव में आचार सूखने लगा, बहुत दुबला हो गया। अब उसका मन किसी काम में नहीं लगता था। वह करना कुछ चाहता हो और हो कुछ जाता। लोगों की निगाह में उसका कोई महत्व नहीं रह गया, वह एकदम भावशून्य हो गया।
घर से भागकर विचार ने सीधा रास्ता पकड़ा किन्तु बाद में वह तर्क-कुतर्क के आड़े-टेढ़े रास्ते पर भटकता रहा। आचार का घर छोड़ने के बाद से कोई विचार की बात का भरोसा नहीं करता था। वह जहाँ भी जाता लोग उसे आचारहीन कहकर उसकी उपेक्षा करते थे। आखिर में एक दिन अपने उजड्डपन से थक-हार कर विचार अपने घर वापिस आ गया। 
आचार ने दौड़कर उसकी आवभगत की। तब दोनों भाइयों में समझौता हुआ कि विचार जहाँ भी जाएगा अपने छोटे भाई आचार को भी साथ ले जाएगा। आचार जो भी करेगा अपने बड़े भाई विचार को साथ में लेकर करेगा। इस तरह मिल-जुलकर दोनों भाई सुखी-संपन्न हो गए। 
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संपर्क: साहित्य कुटीर  पं . राम नारायण उपाध्याय वार्ड, खण्डवा म.प्र. 
चलभाष: ९४२५० ८६२४६, ९४२४९४९८३९,  ७९९९७४९१२५ gangourknw@gmail.com lekhakhemant17@gmail.com 
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२. खिलौने 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
दिन भर कार्यालय में व्यस्त रहने के बाद थका-हारा घर पहुँचा तो पत्नी ने किराना न लाने का उलाहना दिया। उलटे पैर बाजार भागा, किराना लेकर लौटा तो बिटिया रानी शिकायत लेकर आ गई "मम्मी पिकनिक नहीं जाने दे रही।" जैसे-तैसे  श्रीमती जी को मनाकर अनुमति दिलवाई तो मुँह लटकाए बेटे ने बताया: "कोचिंग जाना है,  फीस चाहिए।" जेब खाली देख, अगले माह से जाने के लिए कहा और सोचने लगा कि धन कहाँ से जुटाए? माँ के खाँसने और पिता के कराहने की आवाज़ सुनकर उनसे हाल-चाल पूछा तो पता चला कि दवाई  खत्म हो गई और शाम की चाय भी नहीं मिली। बिटिया को चाय बनाने के लिए कहकर बेटे को दवाई लाने भेजा ही था कि मोबाइल बजा। जीवन बीमा एजेंट बोला: "किस्त तुरंत न चुकाई तो पॉलिसी लैप्स हो जाएगी।" एजेंट से शिक्षा ऋण पॉलिसी की बात कर कपड़े बदलने जा ही रहा था कि दृष्टि आलमारी में रखे,  बचपन के खिलौनों पर पड़ी।
पल भर ठिठककर उन पर हाथ फेरा तो लगा खिलौने कहने लगे: "तुम्हरे चहरे से मुस्कान क्यों गायब है? तुम्हें ही जल्दी पड़ी थी बड़ा होने की, अब भुगतो। छोटे थे तो हम तुम्हारे हाथों के खिलौने थे,  बड़े होकर तुम हो गए हो दूसरों के हाथों के खिलौने।
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संपर्क: विश्व वाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१ 
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३. किस्मत 
सुरेश कुशवाहा 'तन्मय' 
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रात के १० बजे ठेकेदार के चंगुल से छूटकर घर की ओर लौटते हुए दिहाड़ी मजदूर रास्ते में खड़े एक सब्जी वाले से सब्जी के भाव कम करने की मिन्नतें कर रहे थे: "भैया! थोड़ा कम दाम लगा लो न, हम सबको मिल कर ज्यादा भी तो लेना है।"
सब्जीवाले द्वारा भाव कम नहीं करने पर अंतिम कोशिश  के रूप में पुनः मजदूर आग्रह के स्वर में कहने लगे: "भैया! वैसे भी सब्जी बासी हो कर सड़ने-गलने लगी है, सुबह तक तो ये किसी के खाने लायक भी नहीं रहेगी। अब इतनी रात को दूसरे ग्राहक तुम्हें कहाँ मिलेंगे?"
"देखो भाई लोगो! जैसे आप लोग अपने परिवार का पेट पालने के लिए इतनी रात तक काम करते रहे हो, वैसे ही मैं भी यहाँ किसी उम्मीद से ही खड़ा हूँ और ये तो कहो मत कि सब्जियाँ खराब हो गई तो फेंकने में जाएगी। वे चमचमाती होटलें दिख रही हैं न, थोड़ी देर बाद सुनसान होने पर मेरी और मेरे जैसे ठेलों की पूरी सब्जियाँ खुशी-खुशी वहाँ खप जाएँगी। रात भर उनके फ़्रिज में आराम कर, चटपटे मसलों के साथ यही सब्जियाँ  फिर से ताजी हो कर मँहगी प्लेटों में सज कर बड़े-बड़े रईस लोगों को परोस दी जाएगी।
यह जानने के बाद जरूरत की सब्जी लेकर मजदूर आपस में बातें करते अपने मुकाम की ओर लौट चले: "यार! हम तो अभी तक सोचते थे कि, तंगी की वजह से हमारी किस्मत में ही ताजी सब्जियाँ नहीं है, पर आज पता चला कि पैसे वाले इन बड़े लोगों की किस्मत भी इस मामले में अपने से अच्छी नहीं है।"
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४.  सही कौन? 
हेमंत उपाध्याय
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एक दावत में बहुत स्वादिष्ट पकवान बने थे। 
नगर सेठ से पूछा कि भोजन कैसा बना है तो उसने कहा: 'दाल में नमक अधिक है।'                        
कालेज के  प्राचार्य साहब से पूछा तो वे बोले: 'भात में नमक काम है।'     
गाँव के मुखिया से पूछा तो उन्होंने दाल-भात मिलाकर खाते हुए कहा: 'सब एकदम बढ़िया बना है, अन्नपूर्णा माँ की साक्षात कृपा है तुम पर।'                                   
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संपर्क: साहित्य कुटीर  पं . राम नारायण उपाध्याय वार्ड, खण्डवा म.प्र. 
चलभाष: ९४२५० ८६२४६, ९४२४९४९८३९,  ७९९९७४९१२५ gangourknw@gmail.com lekhakhemant17@gmail.com 
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५. बीच सड़क पर
-मोहन परमार मोहन
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खरगोन शहर, तपती दुपहरी,  आती-जाती भीड़ पर कोई असर नहीं,  न जाने कहाँ से आते इतने लोग और न जाने कहाँ जाते,  डाकघर चौराहे पर दो चौड़े रास्ते एक दूसरे को काटकर सँकरी राह में बदल जाते हैं। दिन भर लगा रहता जाम, आठ-आठ घंटे खड़े यातायात पुलिसवालों की कड़ी परीक्षा होती हर समय, जब लोग यातायात  नियमों की धज्जियाँ उड़ाते। चौराहे के बीच में लगी छतरी की छाया कभी पुलिसकर्मी को नहीं मिलती। धूप असह्य होने पर पुलिसकर्मी किनारे पर पान की दूकान पर जा खड़ा हुआ।
उसी समय तेजी से साइकिल चलाकर आता एक लड़का अधेड़ महिला से टकरा गया। पुलिसवाला जोर से चिल्लाया- "क्यों बे! सड़क पर चलना नहीं आता? बाएँ हाथ से चलने का नियम नहीं जानता क्या?"
लड़के ने उठते हुए उत्तर  दिया- "तू वहाँ क्यों खड़ा है?, तू भी नियम नहीं जानता क्या?" भीड़ ठठाकर हँस पड़ी, पुलिसवाला कभी भागता हुए लड़के को देखता,  कभी हँसी हुई भीड़ को। उसे लगा वह छत्री भी उसकी हँसी उड़ी रही है।
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संपर्क: ए २२ गौरीधाम,  खरगोन ४४५००१. चलभाष: ९८२६७४४८३७ 
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६. रोटियाँ
अशोक  गर्ग "असर"
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माँ-बाप ने शहर में पढ़ रही बेटी के पास जाने का सोचा। बेटी को शहर में ढंग का खाना नहीं मिलता होगा सोचकर माँ ने जल्दी-जल्दी रोटी-सब्जी बनाकर, बाप ने जरूरी सामान समेटा और सुबह ६ बजे वाली बस से लंबा सफर तयकर बेटी के पास पहुँचे। सफर की थकान मिटाकर माँ-बाप, बेचारा साथ खाना खाने बैठे। थाली पर नजर पड़ते ही बेटी गुस्सा कर माँ से बोली "यह क्या ले आई? ठंडी रोटियाँ और बेस्वाद सब्जी,  कौन खाएगा?" 
बेटी तनतनाते हुए बगैर रोटी खाए अपने कमरे में चली गई। माँ को अपनी माँ याद आ गई,  जब वह शहर में पढ़ती थी तो अपनी माँ की दी रोटियाँ २-३ दिन तक बचा-बचाकर खाती थी, उसे उन रोटियों में अपनी माँ की असीम ममता नजर आती थी। माँ की आँखें डबडबा रही थीं और पिता की भी।
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द्वारा: आर. के. महाजन, २६ विवेकानंद कॉलोनी,  खरगोन। चलभाष: ९४२५९ ८१२१३ 
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७. फोर जी
शरदचंद्र त्रिवेदी 
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"मम्मी! हम छुट्टियों में कहाँ जाएंगे?"
"बेटा! हम नाना जी के घर चलेंगे।"
"वहाँ क्या है?" चिंटू ने मम्मी से पूछा।
"वहाँ नाना - नानी हैं,  मामा-मामी और उनके बच्चे हैं। नाना जी की बड़ी सी बखरी है,  आम का बाग, खेलने के लिए खलिहान, तैरने के लिए तालाब सब कुछ है। नानी बता रही थीं इस साल आमों पर बहार आई है। हम पूरी गर्मी वहीं रहेंगे,  खूब मजे करेंगे।"
"मम्मी मुझे नहीं जाना वहाँ।"
माँ ने चौंकते हुए पूछा "क्यों?"
"क्योंकि वहाँ फोर जी नहीं मिलता।
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संपर्क: ए ४५ गौरी धाम,  खरगौन, चलभाष:९४०६८१६४११   
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८. वापसी
ब्रजेश बड़ोले
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पति-पत्नी के बीच घरेलू काम-काज को लेकर आए दिन झगड़े होते रहते थे। पत्नी चूल्हा-चौका कर जताती कि वह पूरे परिवार पर अहसान कर रही है। वह अकसर कहती- "मैं यदि घर छोड़कर चली जाऊँ तो सबको मालूम पड़ जाए, सुबह से उठकर चाय भी नहीं मिल पाएगी।"
पत्नी आखिर एक दिन अपना बोरिया-बिस्तर बाँधकर मायके चली गई। माता-पिता,  भाई-भाभी, भरा-पूरा परिवार था उसका,  सबने उसका स्वागत किया। आठ-दस दिनों तक तो सब ठीक  चलता रहा,  फिर गड़बड़ होने लगी। उसका बैठे-बैठे खाना सबको अखरने लगा, खासकर भाभियों को। सबका लाड़-प्यार कुछ ही दिनों में काफूर हो गया। अब उसे भी काम करना पड़ता था। परिवार बड़ा होने के कारण काम भी अधिक था, भाभियाँ आए दिन मायके जाने लगीं। जिस काम से बचने के लिए वह भागता यहाँ आई थी,  उसने यहाँ भी  पीछा नहीं छोड़ा था। 
अब वह पुन: घर जाने की तैयारी कर रही थी।
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संपर्क: ए १३ गौरीधाम, खरगोन चलभाष: ९९७७०७२८६४ 
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९. मोक्ष

सुनील गीते
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ससुर के श्राद्ध दिवस पर ब्रम्हभोज का आयोजन चल रहा था। वृद्ध सास स्वयं अपने हाथों से ब्राह्मणों को परोसने के उद्देश्य से खड़ी हुई तो पानी के गिलास से टकरा गई।
बिखरा पानी देख बहू बिफरी- "मांजी! आप चुपचाप एक जगह बैठी क्यों नहीं रहती?" फिर  बुदबुदाई, " न जाने कब इनसे मुक्ति मिलेगी?"
मकान की छत पर बैठे एक कौवे ने यह बात सुनी और अपना हिस्सा लिए बिना, दूर आकाश में उड़ गया।
संपर्क: वयम, १०२ आदर्श नगर, खंडवा रोड़, खरगोन ४५१००१, चलभाष ९८२७२३१३१६  
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१०. जीवन डोर
कुंवर उदय सिंह ‘अनुज’
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एक गाँव में भारुड नाम का एक व्यक्ति रहता था। एकदम सीधा-सादा, अँगूठा छाप, स्वभाव से भोला। काम के नाम पर रोज बकरी चराने जाना और शाम को आकर रूखा-सूखा खाकर सो जाना। 
बकरी चराने के रास्ते के बीच में एक श्मशान था. रोज दो-चार मुर्दों को जलते हुए टकटकी लगाकर देखता था। मुर्दे का साथ आये लोगों से पूछता इस व्यक्ति को क्या हो गया? लोग बताते कि जीवन डोर कट गई तो यह आदमी मर गया। 
रोज-रोज जीवन डोर टूटने की बात सुनकर भारुड मन ही मन हँसता और सोचता कि ये कैसे मूर्ख लोग हैं कि जीवन की डोर मजबूती से नहीं भाँजते। यदि जीवन डोर मजबूत होती तो फिर मरने का सवाल ही नहीं है. इस विचार के साथ उसने अपने लिए एक मोटी और मजबूत रस्सी बाँट ली और उस रस्सी को अपनी जीवन डोर समझ एक पेटी में बंद कर ताला लगा दिया। इस निश्चिन्तता के साथ कि इस मजबूत और सुरक्षित जीवन डोर के रहते हुए मेरी मृत्यु कैसे होगी?
बकरी चराते-चराते कई दिनों बाद उसे जीवन-डोर की याद आए. उत्सुकतावश उसने पेटी खोली, देखा तो उसका यह देखकर दिल धक् से रह गया कि रस्सी में दीमक लग गयी गई और पूरी रस्सी तुकडे-तुकडे में बदल गयी है।   
भारुड को बोध हुआ आदमी कुछ भी कर ले जीवन रस्सी को टूटना है तो टूटेगी ही।   

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ॐ doha shatak: ram kumar chaturvedi


करते बंदर बाट
दोहा शतक
रामकुमार चतुर्वेदी 





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जन्म: १८-८-१९६७सिवनी।
आत्मज: श्रीमती सरस्वती चतुर्वेदी- श्री डी.पी.चतुर्वेदी।
जीवनसंगिनी:
काव्य गुरु:
शिक्षा: एम.एससी., एम.ए.(हिंदी, भूगोल) एलएल.एम.(पीएच.डी)।
लेखन विधा: दोहा, हास्य-व्यंग्य गद्य-पद्य।
प्रकाशित: हिन्दी वर्णमाला व्यंग्यपरक खण्डकाव्यभारत के सपूत व्यंग्य संग्रह।
प्रकाशनाधीन: चले हैं.. व्यंग्य खण्डकाव्यव्यंग्य लेख संग्रह टारगेट।
संपादन: ज्ञानबोध पत्रिका प्रकाशन-सिवनी(म.प्र.) Email: gyanbodh17@gmail.com
उपलब्धि: हरिशंकर परसाई सम्मान, सारस्वत सम्मानसाहित्य गौरव, हिंदी गौरव, राष्ट्रभाषा गौरव सम्मान, साहित्य शिरोमणि आदि।  
संप्रति: प्रबंधक डी.पी.चतुर्वेदी विधि महाविद्यालय सिवनी, संरक्षक जन चेतना समिति सिवनी।
संपर्क: श्री राम आदर्श विद्यालय, शहीद वार्ड सिवनी ४८०६६१ म.प्र.।
चलभाष: ०९४२५८८८८७६, ७००००४१६१०, ईमेल: rkchatai@gmail
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      राम कुमार चतुर्वेदी जीवट और संघर्ष की मशाल और मिसाल दोनों हैं। ३४ वर्ष की युवावस्था में सड़क दुर्घटना में रीढ़ की हड्डी, कमर की हड्डी, पसली, कोलर बोन, हाथ-पैर आदि को गंभीर क्षति, दो वर्ष तक पीड़ादायक शल्य क्रिया और सतत के बाद भी वे न केवल उठ खड़े हुए अपितु पूर्वापेक्षा अधिक आत्मविश्वास से शैक्षणिक-साहित्यिक उपलब्धियाँ प्राप्त कीं। महाकवि शैली के अनुसार ‘अवर स्वीटैस्ट सोंग्स आर दोज विच टैल ऑफ़ सैडेस्ट थोट, कवि शैलेंद्र के शब्दों में ‘हैं सबसे मधुर वे गीत जिन्हें हम दर्द के सुर में गाते हैं’ को राम कुमार ने चरितार्थ कर दिखाया है और दुनिया को हँसाने के लिए कलम थाम ली है। चमचावली के दोहे लक्षणा और व्यंजन के माध्यम से देश और समाज में व्याप्त विसंगतियों पर चोट करते हैं-  
पढ़कर ये चमचावली, जाने चम्मच ज्ञान।
सफल काज चम्मच करे, कहते संत सुजान।।
      साधु-संतों की कथनी-करनी और भोग-विलास चमचों की दम पर फलते-फूलते हैं किंतु ‘बुरे काम का बुरा नतीजा’ मिल ही जाता है-
बाबा बेबी छेड़कर, पहुँच गये हैं जेल।
कैसे तीरंदाज को, मिल जाती है बेल।।
      चम्मच अपने मालिक को सौ गुनाहों के बाद भी मुक्त कराकर ही दम लेता है-
अपने मालिक के लिए, चम्मच करे उपाय।
हिरन मारकर भी उन्हें, मिल जाता है न्याय।।
      राजनीति चमचों की चारागाह है-
मंत्री का दर्जा मिला, चहके साधु-संत।
डूबे भोग विलास में, चम्मच बने महंत।।
      चमचे सब का हिसाब-किताब माँगते हैं किंतु अपनी बारी आते ही गोलमाल करने से नहीं चूकते-
अपनी पूँजी का कभी, देते नहीं हिसाब।
दूजे के हर टके का, माँगें चीख जवाब।।
       राम कुमार की भाषा सरल, सहज, प्रसंगानुकूल चुटीली और विनोदपूर्ण है। हास्य-व्यंग्य की चासनी में घोलकर कुनैन खिआल देना उनके लिए सहज-साध्य है।
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जीवन चम्मच संग है, चम्मच से पय पान।
चम्मच देता अंत में, गंगा जल का पान।।
*
चम्मच जिनके पास है, चम्मच उनके खास।
जिनसे चम्मच दूर है, उनको मिलता त्रास।।
*
नित चम्मच सेवा करे, मिलता अंर्तज्ञान।
हिय चम्मच जिनके बसे, रहता अंर्तध्यान।।
*
जिनके काम न हो सके, चम्मच करे उपाय।
बदले में मिलती रहे, ऊपर की कुछ आय।।
*
आय कमीशन श्रोत है, चम्मच करते पास।
जिसे कमीशन न मिले, घूमें फिरे उदास।।
*
चरण पड़ें थक हारकर, मन्नत माँगे भीख।
बैर न चम्मच से,  देते हमको सीख।।
*
चम्मच ने चम्मच चुने, जो धरते बहु रूप।
लेकर चम्मच हाथ में, पीते रहते सूप।।
*
कामचोर के राज में, चम्मच करते काम।
अपना उल्लू साधते, चम्मच लेकर दाम।।
*
घर ही मयखाना बना, पीकर खेले दाँव।
दाँव-पेंच सब जानते, पड़ते रहते पाँव।।
राज
पाँव पकड़ विनती करें, सिद्ध करो सब काम।
अपना हिस्सा तुम रखो, कुछ अपने भी नाम।।
*
बिगड़े तो कुछ सोच लो, काम बिगाडे़ आप।
नागों के हम नाग है, बिषधर के भी बाप।।
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चम्मच कोई काम लें, करना मत इंकार।
बैठें पाँव पसारकर, सज जाते दरबार।।
*
नेता संग अवार्ड ले, चम्मच खेलें दाँव।
अगर-मगर होता नहीं, हो जाता अलगाव।।
*
भैयाजी के दाम पर, लगती बोली बोल।
चम्मच मुँह जब खोलता, खोले सबकी पोल।।
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राज रखे सब पेट में, नहीं खोलता राज।
राज कर रहे राज से, नेता-चमचे आज।।
*
पोल खोलता जब कभी, हो जाती हड़कंप।
कुर्सी डोले डोलती, हो जाता भूकंप।।
*
सेवा में सरकार के, करते बंदर बाट।
अच्छे पद की चाह में, देश बाँटकर चाट।। 
*
राजनीति के मंच से, चम्मच चलते चाल।
लक्ष्मी पूजा-पाठ की, सजती रहती थाल।।
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चम्मच बदले भेष को, बदले बेचे देश।
बस उसको मिलता रहे, बदले में कुछ कैश।।
व्यापम
चम्मच वश चलता रहे, काम करे भरपूर।
उसके बदले नोट से, करें सदा दस्तूर।।
*
चम्मच इस संसार में, बाँट लिए हैं क्षेत्र।
अपने कौशल काम से, खोलें सबके नेत्र।।
*
शिक्षा पूरी है नहीं, रखते पूरा ज्ञान।
चम्मच अपनी पैठ से, करवाता सम्मान।।
*
डिग्री धारी सोचते, पद पाते हैं चोर।
कैसे चम्मच के बिना, लगे न कोई जोर।।
*
साथ साधु सेवक रहे, फल पाओ श्रीमान्।
चम्मच नेकी कर्म में, रमा हुआ तू जान।।
*
साक्षर करते देश में, शिक्षा के अभियान।
चम्मच भी भर्ती करें, व्यापम का संज्ञान।।
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कितने तो मरकर हुए, राजनीति के खेल।
कुछ चम्मच की शरण, कुछ को होती जेल।।
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पास-फेल के खेल में, दाँव-पेंच की जंग।
कला कुशलता के धनी, चम्मच जिनके संग।।
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विषय परक के क्षेत्र में, गाए अपनी राग।
कौआ छीने कान को, कहते भागमभाग।।
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ठेका है जनतंत्र का, ठेके की सरकार।
चम्मच तेरे देश में, होता हिरण शिकार।।  
न्याय
बाबा बेबी छेड़कर, पहुँच गये हैं जेल।
कैसे तीरंदाज को, मिल जाती है बेल।।
*
चम्मच ने सौदा करे, न्याय तंत्र है मौन।
जज की बदली कर रहा, देर रात में कौन।।
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हसरत उनकी साफ थी, साफ हुआ है देश।
चम्मच साहब ठाट से, बदल चुके हैं भेष।।
*
अपने मालिक के लिए, चम्मच करे उपाय।
हिरन मारकर भी उन्हें, मिल जाता है न्याय।।
*
भेदभाव से दूर रह, चम्मच करता काम।
सेवा करे समाज की, रहे बॉस के धाम।।
*
आबंटन के काम में, चम्मच दें आवास।
उद्घाटन करते समय, करता है उल्लास।।
*
न्याय किसी को चाहिए, पकड़ो चम्मच हाथ।
बन जाता है सारथी, लक्ष्य साधते पार्थ।।
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चम्मच प्रिय इस देश में, रिश्वत है आहार।
न्याय माँगने दुखी भी, आते चम्मच द्वार।। 
*
चम्मच अपने साथ है, मानो अपना भाग्य।
पुरखा उनको मानकर, धन्य हुए सौभाग्य।।
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चम्मच से चम्मच जलें,रखते मन में क्लेष।
चम्मच देते फोन से, मिलने का संदेश।।  
वैद्य
धमकी पाकर आपके, उड़ जाएँगे केश।
चम्मच संत सामान हैं, देते नित उपदेश।।
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भेष बदलकर आजकल, रौब जमाते खूब।
चम्मच फर्जी लोन लें, बैंक गए हैं डूब।।
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वैद्य विशारद जानिए, चम्मच हरता रोग।
काजू पिस्ता सूँघकर, करवाता है भोग।।
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नब्ज पकड़ना जानता, हरता मनोविकार।
जटि समस्या जटिल है बहुत, कैसे हो उपचार।।
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चम्मच नेता सूरमा, देते है संदेश।
लिंक करें आधार से, पूँजी करें निवेश।।
*
मंत्री का दर्जा मिला, चहके साधु-संत।
डूबे भोग विलास में, चम्मच बने महंत।।
*
संत समागम जब करें, चम्मच देते संग।
ले प्रसाद पत्रक चले, डूबे अपने रंग।।
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बीच-बीच में नाचते, भजन बीच उपदेश। 
ढ़ोंगी बाबा-साध्वियाँ, बदल-बदल परिवेश।।
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चेहरा देख प्रसाद दें, कहें पुण्य का काम।
संत चरण-चम्मच बसे, रहते चारों धाम।।
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भक्ति भाव में रमें हैं, मंदिर के बलधाम।
चंदा पुण्य प्रताप से, चम्मच करते काम।।
धर्म
मौला चंदा मांगते, जब मस्जिद के नाम।
चम्मच मौला साथ में, चलें साधते काम।।
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कौमी कहते कौम में, दंगा हो न फसाद।
उनके अपने धर्म में, कहीं नहीं अवसाद।।
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मजहब में आतंक का, डाल जिहादी जंग।
नेता चम्मच बताते, अलग धर्म के रंग।।
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विषय वासना में फँसे, मुल्ला साधू संत।
जनता इस अंधेर का, कर देती है अंत।।
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बेटी घर में लुट रही, होती है हैरान।
राजा जी लेते शरण, बन जाते हैवान।।
*
सिसक रही इंसानियत, देते गजब बयान।
चम्मच अपनी धौंस से, बनते रहे महान।।
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चम्मच अपने पक्ष में, करे सभी को दक्ष।
खाली करना जेब हर, एकमात्र है लक्ष्य।।
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समझ बड़ी है भाँपते, चम्मच उनके दूत।
बिना मोल अनमोल है, कहते उनके पूत।।
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जल्दी भारत स्वच्छ हो, चला रहे अभियान।
चम्मच झाड़ू थामकर, मार रहे मैदान।। 
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गंग-सफाई नाम से, हुआ बड़ा व्यापार।
नीलामी की कोट की, बिके सभी उपहार।।
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चम्मच अपने बॉस का, करते है गुणगान ।
बदले में उनको मिले, समय समय पर मान।।
धर्म
साधू चम्मच साथ हैं, नेता चम्मच साथ।
अधिकारी चम्मच बिना, देंगे थामें हाथ।।
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बाबू पान दुकान में, देता चम्मच साथ।
फाईल बढ़ती है तभी, मिलते दोनों हाथ।।
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हाथों हाथ कार रहे, काम करे सरकार।
चम्मच काज रुकें नहीं, कितनी हो दरकार।।
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जनता बेबस है नहीं, चम्मच कहें महान।
धर्म जाति की बात से, लेते हैं संज्ञान।।
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धरम करम के भेद को, देते जमकर तूल।
मतभेदों की मौत में, चढ़ते रहते फूल।।
*
भेंट दरिंदो की चढ़ी, मानवता निरुपाय।
चम्मच जी रच दिए, ढाढस के अध्याय।।
*
हर विपदा में साथ है, चम्मच जैसा वीर।
देखें चम्मच त्याग को, होते बहुत अधीर।।
*
समय बदलते देर क्या, चम्मच बदलें बॉस।
बॉस बदलकर संग में, करते हैं उपवास।।
*
दलाल
अपनी पूँजी का कभी, देते नहीं हिसाब।
दूजे के हर टेक का, माँगें चीख जवाब।। 
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रखते हैं तीखी नजर, चम्मच देखे माल।
अपना हक के वास्ते, घूमें रोज दलाल।।
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चम्मच शेयर बेचते, बैठे खेलें खेल।
लुढ़के शेयर धडाधड, बिगड़े सारे खेल।।
*
घर से शोभा आपकी, संसद तक है पैठ।
मन-मंथन करते यही, कैसे हो घुसपैठ।।
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नीलामी के बोल में, टेंडर मिलते साफ।
चम्मच की बोली लगी, चम्मच का इंसाफ।।
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जल पानी की धार को,  देखे बैठे मौन।
गहराई क्या नापते, चम्मच जैसा कौन।।
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टेंडर मिलते उन्हीं को, देयक होते पास।
चम्मच उनके पालतू, रुपया उनको घास।।
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शूरवीर चम्मच जहाँ, धमक पड़े खुद आप।
आनन फानन में खड़े, सुनते ही पदचाप।।
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आम आदमी जी रहे, हो बेबस मजबूर।
होती चम्मच की कृपा, हो जाते मशहूर।।
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गधे भर रहे चौकड़ी, कुत्ते मारे लात।
दबी फाईलें खोल दे, चम्मच में औकात।।
चम्मच के रूप
चम्मच के इस देश में, बहुतेरे हैं नाम।  
कहलाते पीए कहीं, कहीं सचिव का काम।।
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कहते इन्हें दलाल भी, चम्मच हैं ऐजेंट।
शेयर होल्डर नाम के, लगा रहे हैं टैंट।।
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रहते है गुमनाम पर, नजर रखे सब ओर।
जाम उठाकर शाम को, करते चम्मच शोर।।
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नित चम्मच पूजा करो, जोड़ो दोनों हाथ।
सेवा खुद की कर सफल, कहे किया परमार्थ।।
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भाषण दें तैयार कर, पढ़ते नेता मंच।
ताली सुनकर भाँपते, चम्मच उनका टंच।।
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हँसी उड़े यदि बॉस की, चम्मच देते तूल।
चाल विपक्षी कह गलत, भूले अपनी भूल।।
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भूल-चूक की देन का, दोष मढ़े उस ओर।
श्री लेन का आप लें, कहें विपक्षी चोर।।
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दूजे का भाषण पढ़े, मंत्री थे नाराज।
अपनी पर्ची छोड़कर,पढ़े और की आज।।
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मंत्री की सेवा लगे, संत्री दाबे पाँव।
चम्मच से चम्मच लड़े, चले दाँव पे दाँव।।
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शिक्षा
शिक्षा कैसे बिक रही, चम्मच बेचें खास।
पेपर अब बिकने लगे, क्रय कर हो जा पास।।
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साथ-साथ में मिल गए, चम्मच संग दलाल।
ट्यूशन में कैसे पके, देखो इनकी दाल।।
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कोचिंग सेंटर नाम के, लुटते है माँ-बाप।
करते है सेटिंग सभी, नाम कमाये आप।।
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खोले बंद जुबान तो, माने उनकी कौन।
सत्ता में मदचूर हैं,चम्मच बाबा मौन ।।
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पेपर देता कौन हैं ,पत्रक किसके नाम।
चम्मच इन सबके लिए, लेते ऊँचे दाम।।
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इसमें भी कोटा लिए, पाते है कम अंक।
उनको पहले पद मिले, डसते तीखे डंक।।
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दूषित शिक्षा ही नहीं, दूषित सकल समाज।
आरक्षण के नाम से, नाकाबिल का राज।।
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मेहनत करना भूलकर, पूतें-खा बिन तोल।
बिना चबाए निगलते, मुँह तक रहे न खोल।।
वोट
वादा कर जुमला कहे, चमचों की सरकार।
वोट पिटारा खोलते, जनजन में गद्दार।।
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धरना देते बैठकर,चम्मच उनके पास।
भोजन करके बाद में, रखते हैं उपवास।।
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धरना में शामिल हुए, चम्मच जैसे वीर।
घड़ियाली आँसू बहा, कहें नर्मदा नीर।।
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बंदर कुर्सी ताकते , चम्मच है बैचेन।
हथियाने की होड़ में,अपलक देखें नैन।। १०१
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