बुधवार, 12 दिसंबर 2018

व्यंग्य लेख अफसर, नेता, ओलंपिक

व्यंग्य लेख
अफसर, नेता और ओलंपिक 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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                               ओलंपिक दुनिया का सबसे बड़ा खेल कुंभ होता है। सामान्यत:, अफसरों और नेताओं की भूमिका गौड़ और खिलाडियों और कोचों की भूमिका प्रधान होना चाहिए। अन्य देशों में ऐसा होता भी है पर इंडिया में बात कुछ और है। यहाँ अफसरों और नेताओं के बिना कौआ भी पर नहीं मार सकता। अधिक से अधिक अफसर सरकारी अर्थात जनगण के पैसों पर विदेश यात्रा कर सैर-सपाट और मौज-मस्ती कर सकें इसलिए ज्यादा से ज्यादा खिलाड़ी और कोच चुने जाने चाहिए। मतलब यह कि खेल-खिलाडी साधन और अफसर-नेताओं की मौज साध्य और एकमेव अंतिम लक्ष्य होता है। खिलाडी ऑलंपिक स्तर के न भी हों तो कोच और अफसर फर्जी आँकड़ों से उन्हें ओलंपिक स्तर का बता देंगे, उनकी सुविधाओं के नाम भर राशि का प्रावधान कर बंदरबाँट कर लेंगे।

                               हमारी 'वसुधैव कुटुम्बकम' की मान्यता तभी पूरी होती है जब अफसर पूरी वसुधा पर सैर-सपाटा कर अपने कुटुंब के लिए खरीदी कर सकें, 'विश्वैक नीड़ं' का सिद्धांत तभी पूर्णता पाता है जब विश्व के हर देश को अपना नीड़ मानकर अफसर सुरा-सुंदरी पा सके। अपने दोनों लक्ष्यों की पूर्ति जरूरी होती है, साथ में गये खिलाड़ी उछल-कूद कर लें, चित्र खिंचा लें, दूरदर्शन और अखबार उनके चित्र और चटपटी ख़बरें परोस कर पेट पाल लें तो कोई हर्ज़ नहीं। रह गयी जनता जनार्दन तो पेट भरने से ही फुरसत नहीं है, जिन निकम्मों का समय नहीं काटता वे खिलाड़ियों पर छपी मनगढ़ंत खबरें चटखारे ले-लेकर पढ़ने और 'बाप न मारे मेंढकी बेटा तीरंदाज' का मुहावरा सच  करने में ज़िन्दगी सार्थक कर लेते हैं। धन और भूमि की आसुरी हवस को जी रहे धन्नासेठ और अभिनेता काली कमाई  को सफेद करने के उपाय खेल संघों के प्रमुख और प्रतियोगिताएं के प्रायोजक बनकर निकाल ही लेते हैं। यदि आप असहमत हों तो आप ही कहें कि इन सुयोग्य अफसरों और कोचों के मार्गदर्शन में जिला, प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर श्रेष्ठ प्रदर्शन और ओलंपिक मानकों से बेहतर प्रदर्शन कर चुके खेलवीर वह भी एक-दो नहीं सैंकड़ों  ओलंपिक में अपना प्रदर्शन दुहरा क्यों नहीं पाते?

                               खेल हमारा राष्ट्रीय उद्योग और कुटीर व्यवसाय दोनों है। संसद में बैठे खिलाडियों की कलाबाजी, मतदाताओं से किये वायदों को जुमलीबाजी, प्रवेश परीक्षाओं में फर्जीवाड़े, नौकरी देने से पेशी बढ़वाने तक में लेन-देन, धर्म के नाम पर आम आदमी के शोषण, त्याग और वैराग की महिमा बखानते आश्रमों, कौम की भलाई के ठेकेदार बनते मदरसों, खातूनों की फोकर में दुबले होकर मौलिक अधिकारों से वंचित कर तीन तलाकों के ताबूत में दफनाते धर्माचार्यों की प्रतियोगिता हो तो स्वर्ण, रजत और कांस्य तीनों ही पदक भारत की झोली में आना सुनिश्चित है।  

                               कोई खिलाड़ी ओलंपिक तक जाकर सर्वश्रेष्ठ न दे यह नहीं माना जा सकता। इसका एक ही अर्थ है कि अफसर अपनी विदेश यात्रा की योजना बनाकर खिलाडियों के फर्जी आँकड़े तैयार करते हैं जिसमें इन्डियन अफसरशाही को महारत हासिल है।  ऐसा करने से सबका लाभ है, अफसर, नेता, कोच और खिलाड़ी सबका कद बढ़ जाता है, घटता है केवल देश का कद। बिके हुई खबरिया चैनल किसी बात को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाते हैं ताकि उनकी टी आर पी बढ़े, विज्ञापन अधिक मिलें और कमाई हो। इस सारे उपक्रम में आहत होती हैं जनभावनाएँ, जिससे किसी को कोई मतलब नहीं है।    

                               रियो से लौटकर रिले रेस खिलाडी लाख कहें कि उन्हें पूरी दौड़ के दौरान कोई पेय नहीं दिया गया, वे किसी तरह दौड़ पूरी कर अचेत हो गईं। यह सच सारी दुनिया ने देखा लेकिन बेशर्म अफसरशाही आँखों देखे को भी झुठला रही है। यह तय है कि सच सामने लानेवाली खिलाड़ी अगली बार नहीं चुनी जाएगी। कोच अपना मुँह बंद रखेगा ताकि  अगली बार भी उसे ही रखा जाए। केर-बेर के संग का इससे बेहतर उदाहरण और कहाँ मिलेगा? अफसरों को भेजा इसलिए जाता है कि वे नियम-कायदे जानकर खिलाडियों को बता दें, आवश्यक व्यवस्थाएँ यथा समय कर दें ताकि कोच और खिलाडी सर्वश्रेष्ठ दे सकें पर इण्डिया की अफसरशाही आज भी खुद को खुदमुख्तार और शेष सब को गुलाम समझती है। अफसर खिलाडियों के सहायक हों तो उनकी बिरादरी में हेठी हो जाएगी। इसलिए, जाओ, खाओ, घूमो, फिरो, खरीदी करो और घरवाली को खुश रखो ताकि वह अन्य अफसरों की बीबियों पर रौब गांठ सके। 

                               रियो ओलंपिक में 'कोढ़ में खाज' खेल मंत्री जी ने कर दिया। एक राजनेता को ओलंपिक में क्यों जाना चाहिए? क्या अन्य देशों के मंत्री आते है? यदि नहीं, तो इंडियन मंत्री का वहाँ जाना, नियम तोडना, चेतावनी मिलना और बेशर्मी से खुद को सही बताना किसी और देश में नहीं हो सकता। व्यवस्था भंग कर खुद को गौरवान्वित अनुभव करने की दयनीय मानसिकता देश और खिलाड़ियों को नीचा दिखाती है पर मोटी चमड़ी के मंत्री को इस सबसे क्या मतलब?  

                               रियो ओलंपिक के मामले में प्रधानमंत्री जी को भी धोखे में रख गया। पहली बार किसी प्रधानमंत्री ने खिलाडियों का हौसला बढ़ाने के लिये उनसे खुद पहल कर भेंट की। यदि उन्हें बताया जाता कि इनमें से किसी के पदक जीतने की संभावना नहीं है तो शायद वे ऐसा नहीं करते किन्तु अफसरों और पत्रकारों ने ऐसा माहौल बनाया मानो भारत के खलाड़ी अब तक के सबसे अधिक पदक जीतनेवाले हैं। झूठ का महल कब तक टिकता? सारे इक्के एक-एक कर धराशायी होते रहे। 

                               अफसरों और कर्मचारियों की कारगुजारी सामने आई मल्ल नरसिह यादव के मामले में। दो ही बातें हो सकती हैं। या तो नरसिंह ने खुद प्रतिबंधित दवाई ली या वह षड्यन्त्र का शिकार हुआ। दोनों स्थितियों में व्यवस्थापकों की जिम्मेदारी कम नहीं होती किन्तु 'ढाक के तीन पात' किसी के विरुद्ध कोई कदम नहीं उठाया गया और देश शर्मसार हुआ। 

                               असाधारण लगन, परिश्रम और समर्पण का परिचय देते हुए सिंधु, साक्षी और दीपा ने देश की लाज बचाई। उनकी तैयारी में कोई योगदान न करने वाले नेताओं में होड़ लग गयी है पुरस्कार देने की। पुरस्कार देना है तो अपने निजी धन से दें, जनता के धन से क्यों? पिछले ओलंपिक के बाद भी यही नुमाइश लगायी गयी थी। बाद में पता चला कई घोषणावीरों ने खिलाड़ियों को घोषित पुरस्कार दिए ही नहीं। अत्यधिक धनवर्षा, विज्ञापन और प्रचार के चक्कर में गत ओलंपिक के सफल खिलाडी अपना पूर्व स्तर भी बनाये नहीं रख सके और चारों खाने चित हो गए।  बैडमिंटन खिलाडी का घुटना चोटिल था तो उन्हें भेजा ही क्यों गया? वे अच्छा प्रदर्शन तो नहीं ही कर सकीं लंबी शल्यक्रिया के लिये विवश भी हो गयीं। 

                               होना यह चाहिये कि अच्छा प्रदर्शन करनेवाले खिलाडी अगली बार और अच्छा प्रदर्शन कर सकें इसके लिए उन्हें खेल सुविधाएँ अधिक दी जानी चाहिए। भूखण्ड, धनराशि और फ़्लैट देने से खेल नहीं सुधरता। हमारा शासन-प्रशासन परिणामोन्मुखी नहीं है। उसे आत्मप्रचार, आत्मश्लाघा और व्यक्तिगत हित खेल से अधिक प्यारे हैं। आशा तो नहीं है किन्तु यदि पूर्ण स्थिति पर विचार कर राष्ट्रीय खेल-नीति बनाई जाए जिसमें अफसरों और नेताओं की भूमिका शून्य हो। हर खेल के श्रेष्ठ कोच और खिलाड़ी चार सालों तक प्रचार से दूर रहकर सिर्फ और सिर्फ अभ्यास करें तो अगले ओलंपिक में तस्वीर भिन्न नज़र आएगी।  हमारे खिलाड़ियों में प्रतिभा और कोचों में योग्यता है पर गुड़-गोबर एक करने में निपुण अफसरशाही और नेताओं को जब तक खेलों से बाहर नहीं किया जायेगा तब तक खेलों में कुछ बेहतर होने की उम्मीद आकाश कुसुम तोड़ने के समान ही है। मिशनरी भावना रहित खेल मिशन क्या-क्या गुल (खिलायेगा) यह देखने और ताली बजने के लिए दोल को दीवार की तरह मजबूत बना लीजिये क्योंकि रोटी मिले न मिले पदक की आस में निवाले छिनने का खेल कहलाने की माहिर नौकरशाही और नेतागिरी की पाँचों अँगुलियाँ घी और सिर कढ़ाई में रहना सुनिश्चित है।  

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दोहा गीत

सामयिक दोहा गीत 
*
अहंकार की हार 
*
समय कह रहा: 'आँक ले
तू अपनी औकात। 
मत औरों की फ़िक्र कर,
भुला न बोली बात।।
जीत नम्रता की हुई,
अहंकार की हार... 
*
जनता ने प्रतिनिधि चुने, 
दूर करें जन-कष्ट। 
मुक्त कराओ किसी से,
नहीं घोषणा शिष्ट।।
बड़बोले का सिर झुका,
सही नियति का न्याय। 
रोजी छीन गरीब की,
हो न सेठ-पर्याय।।
शाह समझ मत कर कभी,
जन-हित पर आघात।
समय कह रहा आँक ले 
तू अपनी औकात।। 
लौटी आकर लक्ष्मी 
देख बंद है द्वार, 
जीत नम्रता की हुई,
अहंकार की हार... 
*
जोड़-तोड़कर मत बना,
जहाँ-तहाँ सरकार। 
छुटभैये गुंडइ करें, 
बिना बात हुंकार।। 
सेठ-हितों की नीतियाँ,
अफसर हुए दबंग।
श्रमिक-कृषक क्रंदन करें, 
आम आदमी तंग। 
दाम बढ़ा पेट्रोल के, 
खुद लिख ली निज मात। 
समय कह रहा आँक ले 
तू अपनी औकात।। 
किया गैर पर; पलटकर 
खुद ही झेला वार,
जीत नम्रता की हुई,
अहंकार की हार... 
*
लघु उद्योगों का हुआ,
दिन-दिन बंटाढार। 
भूमि किसानों की छिनी,
युवा फिरें बेकार। 
दलित कहा हनुमंत को, 
कैसे खुश हों राम?
गरज प्रवक्ता कर रहे,
खुद ही जनमत वाम। 
दोष अन्य के गिनाकर, 
अपने मिटें न तात। 
समय कह रहा आँक ले 
तू अपनी औकात।। 
औरों खातिर बोए थे,
खुद को चुभते खार, 
जीत नम्रता की हुई,
अहंकार की हार... 
***
१२.१२.२०१८
(३ राज्यों में भाजपा की हार पर)

सूचना समग्र

ॐ 
विश्ववाणी हिंदी संस्थान 

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​इकाई स्थापना आमंत्रण 
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चयनित लघुकथाकारों की २-२ प्रतिनिधि लघु कथाएँ २ पृष्ठों पर चित्र, पते सहित सहयोगाधार पर प्रकाशित की जा रही हैं। संकलन पेपरबैक होगा। आवरण बहुरंगी, मुद्रण अच्छा होगा। सहभागिता के इच्छुक लघुकथाकार ४ लघुकथाएँ, चित्र, पता, चलभाष, ईमेल व सहमति ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com या roy. kanta@gmail.com पर अविलंब भेजें। यथोचित संपादन हेतु सहमत सहभागी रचनाएँ स्वीकृत होने के बाद मात्र ३००/- सहभागिता निधि पे टी एम द्वारा चलभाष क्रमांक ९४२५१८३२४४ में अथवा बैंक ऑफ़ इण्डिया, राइट टाउन शाखा जबलपुर IFSC- BKDN ०८११११९, लेखा क्रमांक १११९१०००२२४७  में जमाकर पावती salil.sanjiv@gmail.com तथा roy.kanta@gmail.com पर ईमेल करें। अब तक सम्मिलित लघुकथाकार अरुण अर्णव खरे, अरुण शर्मा, अर्चना मिश्र, अर्विना गहलोत, अविनाश ब्योहार, अशोक मनवानी, आशीष दलाल, इंद्रबहादुर श्रीवास्तव, उपमा शर्मा, ऊषा भदौरिया, ओमप्रकाश क्षत्रिय, कालीपद प्रसाद, घनश्याम मैथिल'अमृत', चंद्रा सायता, चंद्रेश छ्तलानी, चितरंजन मित्तल, ज्योति शर्मा, नीना छिब्बर, नेहा नाहटा जैन, पंकज जोशी, पदम गोधा, पवन जैन, प्रदीप कुमार शर्मा, प्रभात दुबे, प्रीति प्रवीण खरे, प्रेरणा गुप्ता, मार्टिन जॉन, बसंत शर्मा, मालती महावर बसंत, मिथिलेश बड़गैया, मिन्नी मिश्रा, मुक्ता अरोरा, मुज़फ़्फ़र इक़बाल सिद्दीकी, मौसमी परिहार, मृणाल आशुतोष, राजकुमार निजात, रुपाली भारद्वाज, रूपेंद्र राज, रेणु गुप्ता, वंदना गुप्ता, वंदना सहाय, वर्षा ढोबले, विनोद कुमार दवे, विभा रश्मि, शोभित वर्मा, संजय पठाडे़ 'शेष’, सदानंद कवीश्वर, सरिता बघेला, सविता मिश्रा, सीमा भाटिया, सुनीता यादव, सुनीता मिश्रा, सुमन त्रिपाठी, सुरेश तन्मय, संपादन: संजीव वर्मा 'सलिल' - कांता राय। सम्पादक संपर्क ९४२५१८३२४४ या ९५७५४६५१४७ अतिरिक्त प्रतियाँ ५०% रियायत पर डाक व्यय निशुल्क सुविधा सहित मिलेंगी।

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दोहा शतक मंजूषा
विश्ववाणी हिंदी संस्थान जबलपुर के तत्वावधान तथा आचार्य संजीव 'सलिल' व डॉ. साधना वर्मा के संपादन में दोहा शतक मंजूषा के ३ भाग दोहा-दोहा नर्मदा, दोहा सलिला निर्मला तथा दोहा दीप्त दिनेश का प्रकाशन कर सहयोगियों को भेजा जा चुका है। ८००/- मूल्य की ३ पुस्तकें (५००० से अधिक दोहे, दोहा-लेखन विधान, २५ भाषाओँ में दोहे तथा बहुमूल्य शोध-सामग्री) ५०% छूट पर पैकिंग-डाक व्यय निशुल्क सहित उपलब्ध हैं। इस कड़ी के भाग ४ "दोहा है आशा-किरण" में सहभागिता हेतु यथोचित संपादन हेतु सहमत दोहाकारों से १२० दोहे (चयनित १०० दोहे छपेंगे), चित्र, संक्षिप्त परिचय (जन्मतिथि-स्थान, माता-पिता, जीवन साथी, साहित्यिक गुरु व प्रकाशित पुस्तकों के नाम, शिक्षा, लेखन विधाएँ, अभिरुचि/आजीविका, डाक का पता, ईमेल, चलभाष क्रमांक आदि) ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com पर आमंत्रित हैं। सहभागिता निधि ३०००/- उक्तानुसार भेजें। प्रत्येक सहभागी को गत ३ संकलनों की एक-एक प्रति तथा भाग ४ की ८ प्रतियाँ कुल ११ पुस्तकें दी जाएँगी। भाग ४ के संभावित सहभागी- सर्व श्री/श्रीमती विनीता श्रीवास्तव, इंजी. सुरेंद्र सिंह पवार, इंजी. देवेंद्र गोंटिया, संतोष शुक्ल ग्वालियर, मेधा नारायण लखनऊ, लता यादव कैलिफोर्निया, सुमन श्रीवास्तव, पूजा अनिल स्पेन, सविता तिवारी मारीशस, डॉ. रमन चेन्नई, त्रिलोचना कौर आदि हैं। नव दोहाकारों को दोहा लेखन विधान, मात्रा गणना नियम व मार्गदर्शन उपलब्ध है।
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प्रतिनिधि नवगीत : २०१८ 

विश्ववाणी हिंदी संस्थान जबलपुर के तत्वावधान में 'प्रतिनिधि नवगीत: २०१८'' शीर्षक से प्रकाशनाधीन संकलन हेतु इच्छुक नवगीतकारों से एक पृष्ठीय ८ नवगीत चित्र, संक्षिप्त परिचय (जन्मतिथि-स्थान, माता-पिता, जीवन साथी, साहित्यिक गुरु व प्रकाशित पुस्तकों के नाम, शिक्षा, लेखन विधाएँ, अभिरुचि/आजीविका, डाक का पता, ईमेल, चलभाष क्रमांक) सहभागिता निधि ३०००/- सहित आमंत्रित है। यथोचित सम्पादन हेतु सहमत सहभागी ३०००/- सहभागिता निधि पे टी एम द्वारा चलभाष क्रमांक ९४२५१८३२४४ में अथवा बैंक ऑफ़ इण्डिया, राइट टाउन शाखा जबलपुर IFSC- BKDN ०८११११९, लेखा क्रमांक १११९१०००२२४७  में जमाकर पावती salil.sanjiv@gmail.com या roy.kanta@gmail.com पर ईमेल करें। । प्रत्येक सहभागी को ११ प्रतियाँ निशुल्क उपलब्ध कराई जाएँगी जिनका विक्रय या अन्य उपयोग करने हेतु वे स्वतंत्र होंगे। ग्रन्थ में नवगीत विषयक शोधपरक उपयोगी सूचनाएँ और सामग्री संकलित की जाएगी। देशज बोलिओं व हिंदीतर भारतीय भाषाओँ के नवगीत हिंदी अनुवाद सहित भेजें।  

शांति-राज स्व-पुस्तकालय योजना

विश्ववाणी हिंदी संस्थान जबलपुर के तत्वावधान में नई पीढ़ी के मन में हिंदी के प्रति प्रेम तथा भारतीय संस्कारों के प्रति लगाव तभी हो सकता है जब वे बचपन से सत्साहित्य पढ़ें। इस उद्देश्य से पारिवारिक पुस्तकालय योजना आरम्भ की जा रही है। इस योजना के अंतर्गत निम्न में से ५००/- से अधिक की पुस्तकें मँगाने पर मूल्य में ४०% छूट, पैकिंग व डाक व्यय निशुल्क की सुविधा उपलब्ध है। राशि अग्रिम पे टी एम द्वारा चलभाष क्रमांक ९४२५१८३२४४ में अथवा बैंक ऑफ़ इण्डिया, राइट टाउन शाखा जबलपुर IFSC- BKDN ०८११११९, लेखा क्रमांक १११९१०००२२४७  में जमाकर पावती salil.sanjiv@gmail.com या roy.kanta@gmail.com पर ईमेल करें। इस योजना में पुस्तक सम्मिलित करने हेतु salil.sanjiv@gmail.com या ७९९९५५९६१८/९४२५१८३२४४ पर संपर्क करें। 
पुस्तक सूची
०१. मीत मेरे कविताएँ -आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' १५०/-
०२. काल है संक्रांति का गीत-नवगीत संग्रह -आचार्य संजीव 'सलिल' १५०/-
०३. कुरुक्षेत्र गाथा खंड काव्य -स्व. डी.पी.खरे -आचार्य संजीव 'सलिल' ३००/-
०४. पहला कदम काव्य संग्रह -डॉ. अनूप निगम १००/-
०५. कदाचित काव्य संग्रह -स्व. सुभाष पांडे १२०/-
०६. Off And On -English Gazals -Dr. Anil Jain ८०/-
०७. यदा-कदा -उक्त का हिंदी काव्यानुवाद- डॉ. बाबू जोसफ-स्टीव विंसेंट
०८. Contemporary Hindi Poetry - B.P. Mishra 'Niyaz' ३००/-
०९. महामात्य महाकाव्य -दयाराम गुप्त 'पथिक' ३५०/-
१०. कालजयी महाकाव्य -दयाराम गुप्त 'पथिक' २२५/-
११. सूतपुत्र महाकाव्य -दयाराम गुप्त 'पथिक' १२५/-
१२. अंतर संवाद कहानियाँ -रजनी सक्सेना २००/-
१३. दोहा-दोहा नर्मदा दोहा संकलन -सं. सलिल-डॉ. साधना वर्मा २५०/-
१४. दोहा सलिला निर्मला दोहा संकलन -सं. सलिल-डॉ. साधना वर्मा २५०/-
१५. दोहा दिव्य दिनेश दोहा संकलन -सं. सलिल-डॉ. साधना वर्मा ३००/-
१६. सड़क पर गीत-नवगीत संग्रह आचार्य संजीव 'सलिल' ३००/-
१७. The Second Thought - English Poetry - Dr .Anil Jain​ १५०/-
१८. प्रतिनिधि लघुकथाएँ -सं. सलिल-संजीव सलिल-कांता रॉय प्रकाशनाधीन
१९. सार्थक लघुकथाएँ -सं. संजीव सलिल-कांता रॉय प्रकाशनाधीन 
२०. दोहा है आशा-किरण दोहा संकलन -सं. सलिल-डॉ. साधना वर्मा प्रकाशनाधीन  
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मंगलवार, 11 दिसंबर 2018

कुण्डलिया

कार्य शाला
*
तन की मनहर बाँसुरी, मन का मधुरिम राग।
नैनों से मुखरित हुआ, प्रियतम का अनुराग।।  -मिथिलेश बड़गैयाँ
प्रियतम का अनुराग, सलिल सम प्रवहित होता।
श्वास-श्वास में प्रवह,  सतत नव आशा बोता।।
जान रहे मिथिलेश, चाह सिय-रघुवर-मन की। 
तज सिंहासन राह, गहेंगे हँसकर वन की।।     - संजीव
*** 

kahani kahani ki 1

कहानी कहानी की १ 
संजीव 
*
मनुष्य ने बोलना सीखने के साथ अपने जीवनानुभवों को एक-दूसरे से कहना आरंभ किया तो कहानी विधा का जन्म हुआ। सामान्यत: किसी घटना, अनुभव या प्रतिक्रिया को आपस में कहा-सुना गया। इसीलिये पुरातन साहित्य में कहानी को वार्ता कहा गया, जैसे 'चौरासी वैष्णवन की वार्ता'। कहानी कही जाए तो किससे कही जाए? उपयुक्त पात्र आवश्यक है, 'किससे' की तलाश ने 'कहानी' को 'किस्सा' बन दिया और तमाम किस्से कहे गए। कहानी में केवल सच कहना न तो रोचक होता है, न  हमेशा उपयुक्त, इसलिए उसमें बात घुमा-फिराकर कल्पना का पुट देते हुए कही गई। कल्पना के आधिक्य ने 'गप्प' का रूप धारण किया तो कहानी को एक और नाम मिला 'गल्प'। कहानी रचना किसी नायक की महानता, किसी जीवन मूल्य स्थापना को 'कथ्य' बनाकर कहा गया तो वह 'कथा' हो गई जैसे 'सत्य नारायण की कथा'। कहानी के नामकरण का आधार उसकी अंतर्वस्तु बना। 

सामाजिक उपचार: 
कहानी को कहने की क्रिया निरुद्देश्य नहीं है। कहानी समय बिताने का माध्यम मात्र कभी नहीं रही। कहानी रचने-कहने के उद्देश्य के आधार पर कहानी को अनेक नाम मिले। लोक कथा वह जो लोक मूल्यों, लोक की जीवन शैली, लोक के संघर्षों, लोक की आकांक्षाओं कहे। लोक को पेट भरने से ही अवकाश न मिले तो कहानी क्या खाक कहे? कहानी न कही जाए तो सुख-दुःख कैसे व्यक्त हो? सामाजिक असंतोष का प्रेशर कुकर फट न जाए इसलिए कहानियों के माध्यम से असंतोष की वाष्प बाहर की जाती रही। मनोरंजन के आधुनिक साधन विकसित न होने तक चौपालें, पनघट, नुक्कड़ और चबूतरे कहानी के केंद्र होते थे। हर गाँव या मोहल्ले में कोई न कोई किस्सेबाज अपनी वाक्पटुता से जन-मन का रंजन करता रहता और दर्द-पीड़ा या भावों का शमन होता रहता। इसलिए भारत में क्रांति की भ्रांति नहीं हुई। कहानीकार या श्रोताओं को सामाजिक कथा-वार्ता ने एकसूत्र में बाँधा।  प्रशासनिक अत्याचार, विदेशी आक्रमण, मौसम की मार, साधनाभाव आदि सभी को एक साथ, एक समान झेलनी होती थी।  इसलिए वर्ण, जाति और आर्थिक विभाजन के बाद भी भारतीय समाज एक सूत्र में बँधा रहा। इस सामाजिक संगठन का श्रेय 'कहानी को है।  

धार्मिक नैतिकता 
लोक ने तमाम व्यस्तता और उत्पीड़न के बाद भी अपनी जिजीविषा को धर्म के साथ मिश्रित कर जीवन शक्ति पाने के साथ विविध पीढ़ियों को जोड़कर परिवार संस्था को मजबूत किया। ऐसी लोककथाएँ विविध पर्वों पर माँ-बेटी, सास-बहू, ननद-भौजाई, भाई-बहिन के संबंधों को आधार बनाकर सदियों तक कही-सुनी जाती रहीं। ऐसी अनेक कथाएँ आज भी कही-सुनी या पढ़ी जाती हैं। इन्हें 'धार्मिक कथा कहा जाता है। इनके बिना कोई पर्व संपन्न नहीं होता। करवाचौथ, छठ, अन्नकूट, पूर्णिमा आदि की कहानियाँ तो अधिकाँश जनों को स्मरण हैं। इन कहानियों में अधिकतर किसी देवी-देवता का विधिवत पूजन न होने पर उसके रुष्ट होने के कारन स्वजनों को कष्ट, धन-संपत्ति का नाश, कारावास, लापता होने और संयोग जुटने पर उस दैवीय शक्ति की उपासना करने पर प्रसन्न होकर उपाय बताने या वर देने के वर्णन हैं जिससे कष्ट होकर सब प्रसन्न हो सकें।

शंका नाशक कहानी 
आदिमानव वनवासी था। उसने प्रकृति के विविध उपादानों को जिनसे उसे जीवन यापन के साधन मिलते थे को दैवीय शक्ति का आगार मानकर देवता कहा, पूजा और उसकी महिमा की कथाएँ कहीं। सूर्या, चंद्र, धरती, पवन, अग्नि, आकाश, वृक्ष, नदियाँ, पशु-पक्षी आदि संबंधी कहानियाँ निंजा देव, बड़ा देव, महादेव तक आ गईं। इस कहानियों में जीवन-सत्य ही मूल था। आदिवासियों के कुलों, कबीलों के उद्भव और प्रलय तथा सृष्टि के पुनरारंभ की कहानियाँ तात्कालिक सत्य ही कह रही थीं, जिसे कालांतर में विज्ञान ने भी सत्य प्रमाणित किया। विस्मय यह कि दुनिया के हर क्षेत्र में एक सी अनुभूतियाँ और अभिव्यक्तियाँ हैं। इन कहानियों में शंकाएं भी हैं और उनके समाधान भी। इसलिये लोक देवता को शंकर (शंकारि = शंका का शत्रु) कहकर उसके कंकर में वास करने की बात  कही गई। 'कंकर-कंकर में शंकर' जीवन सूत्र बन गया। ये शंकर सामान्य जन की तरह वन और पर्वतवासी थे, अपनी पत्नी के साथ लोक का सुख-दुःख जानने-समझने के लिए वेश बदलकर घूमते थे। उनकी कथाएँ 'हारे को हरिनाम' की तरह टूटे मन को जोड़ने की सामर्थ्य रखती थीं, हैं और रहेंगी। जन-गण के साथ कदम से कदम, कंधे से कन्धा मिलाकर चलनेवाला, उलझनों के सर्प, बाधाओं के विष और उपलब्धियों के चन्द्रमा को सम भाव से धारणकर सर्व सुलभ वृषभ पर न केवल घूमने वाला अपितु जान-भय कारक सिंह की स्वामिनी को जीवन संगिनी बनाकर जन सामान्य को भीत करने वाले दैत्यों का संहार करने-करनेवाला लोक देव न हो तो कौन हो? कहने उसका यह न कहे तो किसका कहे? शंका का अंत होने पर जन्म होता है विश्वास का। विश्वास एक पल में नहीं होता। जीवन मूल्यों की वाहक प्रथाओं को लोभ का गज और अविश्वास का मूषक कुतरने लगे तो श्रद्धा और शक्ति मिलकर जिस संतान को सामने लाती हैं उसके अंधविश्वासी शीश का कर्तन कर सत्यासत्य को जानने-माननेवाली मति युक्त मस्तिष्क से जोड़कर कहानी 'गणपति' को प्रतिष्ठित करती है। ये गणपति 'स्व' को 'सर्व' माननेवाले कार्तिकेय को 'श्रद्धा-विश्वास' की परिक्रमा कर पराजित करते हैं।शंका का अंत सत्य से ही होता है।
                                                                                                                                                        क्रमश: 

laghukatha

तीन काल खंड तीन लघु कथाएँ :

१. जंगल में जनतंत्र

जंगल में चुनाव होनेवाले थे।

मंत्री कौए जी एक जंगी आमसभा में सरकारी अमले द्वारा जुटाई गयी भीड़ के आगे भाषण दे रहे थे।- ' जंगल में मंगल के लिए आपस का दंगल बंद कर एक साथ मिलकर उन्नति की रह पर कदम रखिये। सिर्फ़ अपना नहीं सबका भला सोचिये।'


' मंत्री जी! लाइसेंस दिलाने के लिए धन्यवाद। आपके कागज़ घर पर दे आया हूँ। ' भाषण के बाद चतुर सियार ने बताया। मंत्री जी खुश हुए।

तभी उल्लू ने आकर कहा- 'अब तो बहुत धाँसू बोलने लगे हैं। हाऊसिंग सोसायटी वाले मामले को दबाने के लिएरखिए' और एक लिफाफा उन्हें सबकी नज़र बचाकर दे दिया।

विभिन्न महकमों के अफसरों उस अपना-अपना हिस्सा मंत्री जी के निजी सचिव गीध को देते हुए कामों की जानकारी मंत्री जी को दी।समाजवादी विचार धारा के मंत्री जी मिले उपहारों और लिफाफों को देखते हुए सोच रहे थे - 'जंगल में जनतंत्र जिंदाबाद। '

१९९४

***

२. समरसता
*
भृत्यों, सफाईकर्मियों और चौकीदारों द्वारा वेतन वृद्धि की माँग मंत्रिमंडल ने आर्थिक संसाधनों के अभाव में ठुकरा दी।
कुछ दिनों बाद जनप्रतिनिधियों ने प्रशासनिक अधिकारियों की कार्य कुशलता की प्रशंसा कर अपने वेतन भत्ते कई गुना अधिक बढ़ा लिये।
अगली बैठक में अभियंताओं और प्राध्यापकों पर हो रहे व्यय को अनावश्यक मानते हुए सेवा निवृत्ति से रिक्त पदों पर नियुक्तियाँ न कर दैनिक वेतन के आधार पर कार्य कराने का निर्णय सर्व सम्मति से लिया गया और स्थापित हो गयी समरसता।
७-१२-२०१५
***

३. मी टू

वे लगातार कई दिनों से कवी की रचनाओं की प्रशंसा कर रही थीं। आरंभ में अनदेखी करने करने के बाद कवि ने शालीनतावश उत्तर देना आवश्यक समझा। अब उन्होंने कवि से कविता लिखना सिखाने का आग्रह किया। कवि जब भी भाषा के व्याकरण या पिंगल की बात करता वे अपने नए चित्र के साथ अपनी उपेक्षा और शोषण की व्यथा-कथा बताने लगतीं।
एक दिन उन्होंने कविता सीखने स्वयं आने की इच्छा व्यक्त की। कवि ने कोई उत्तर नहीं दिया। इससे नाराज होकर उन्होंने कवि पर स्त्री की अवमानना करने का आरोप जड़ दिया। कवि फिर भी मौन रहा।

ब्रम्हास्त्र का प्रयोग करते हुए उन्होंने अपने निर्वसन चित्र भेजते हुए कवि को अपने निवास पर या कवि के चाहे स्थान पर रात गुजारने का आमंत्रण देते हुए कुछ गज़लें देने की माँग कर दी, जिन्हें वे मंचों पर पढ़ सकें।
कवि ने उन्हें प्रतिबंधित कर दिया। अब वे किसी अन्य द्वारा दी गयीं ३-४ गज़लें पढ़ते हुए मंचों पर धूम मचाए हुए हैं। कवि स्तब्ध जब एक साक्षात्कार में उन्होंने 'मी टू' का शिकार होने की बात कही। कवि समय की माँग पर लिख रहा है स्त्री-विमर्श की रचनाएँ पर उसका जमीर चीख-चीख कर कह रहा है 'मी टू'।
११.१२.२०१८
***

सोमवार, 10 दिसंबर 2018

muktak

मुक्तक सलिला:
नारी अबला हो या सबला, बला न उसको मानो रे
दो-दो मात्रा नर से भारी, नर से बेहतर जानो रे
जड़ हो बीज धरा निज रस से, सिंचन कर जीवन देती-
प्रगटे नारी से, नारी में हो विलीन तर-तारो रे
*
उषा दुपहरी संध्या रजनी जहाँ देखिए नारी है
शारद रमा शक्ति नारी ही नर नाहर पर भारी है
श्वास-आस मति-गति कविता की नारी ही चिंगारी हैं-
नर होता होता है लेकिन नारी तो अग्यारी है
*
नेकी-बदी रूप नारी के, धूप-छाँव भी नारी है                                                                                                                                     
गति-यति पगडंडी मंज़िल में नारी की छवि न्यारी है                                                                                                                            कृपा, क्षमा, ममता, करुणा, माया, काया या चैन बिना                                                                                                                      जननी, बहिना, सखी, भार्या, भौजी, बिटिया प्यारी है
*

muktika

मुक्तिका 
*
कौन सगा है? कौन पराया है?
ठेंगा सबने हमें बताया है 
*
पड़ी जरूरत याद किया हमको 
काम हुआ झट हमें भुलाया है
*
जिसका दामन पाक रहा दिखता
मिला पंक में हमें नहाया है
*
स्वर्ण महल में मिले इंद्र-रावण 
सीता को वनवास दिलाया है
*
प्राण रहे जिसमें संजीव वही
सत्य समय ने यही सिखाया है
***

अठारह मात्रिक पौराणिक जातीय छंद

muktak

मुक्तक 
शब्दों का जादू हिंदी में अमित सृजन कर देखो तो। 
छन्दों की महिमा अनंत है इसको भी तुम लेखो तो।  
पढ़ो सीख लिख आत्मानंदित होकर सबको सुख बाँटो-
मानव जीवन कि सार्थकता 'सलिल' पुलक अवरेखो तो । 
*

doha shiv

दोहा-दोहा शिव बसे  -
उदय भानु का जब हुआ,
तभी ही हुआ प्रभात.
नेह नर्मदा सलिल में,
क्रीड़ित हँस नवजात.
.
बुद्धि पुनीता विनीता,
शिविर की जय-जय बोल.
सत्-सुंदर की कामना,
मन में रहे टटोल.
.
शिव को गुप्तेश्वर कहो,
या नन्दीश्वर आप.
भव-मुक्तेश्वर भी वही,
क्षमा ने करते पाप.
.
चित्र गुप्त शिव का रहा,
कंकर-कंकर व्याप.
शिवा प्राण बन बस रहें
हरने बाधा-ताप.
.
शिव को पल-पल नमन कर,
तभी मिटेगा गर्व.
मति हो जब मिथलेश सी,
स्वजन लगेंगे सर्व.
.
शिवता जिसमें गुरु वही,
शेष करें पाखंड.
शिवा नहीं करतीं क्षमा,
देतीं निश्चय दंड.
.
शिव भज आँखें मून्द कर,
गणपति का करें ध्यान.
ममता देंगी भवानी,
कार्तिकेय दें मान.
.
संजीव

soratha

 एक सोरठा: 
उद्यम से हो सिद्ध, कार्य मनोरथ से नहीं।
'सलिल, लक्ष्य हो बिद्ध, सतत निशाना साधिए।।
*

छंद बह्र का मूल है

कार्यशाला 
छंद बह्र का मूल है  
रगण यगण गुरु = २१२ १२२ २ 
सात वार्णिक उष्णिक जातीय, बारह मात्रिक आदित्य जातीय मानवी अमानवी छंद 
*
मुक्तक
मेघ ने लुभाया है
मोर नाच-गाया है
जो सगा नहीं भाया
वह गया भुलाया है
*
मौन मौन होता है
शोर शोर बोटा है
साफ़-साफ़ बोले जो
जार-जार रोता है
*
राजनीति धंधा है
शीशहीन कंधा है
न्याय कौन कैसे दे?
क्यों प्रतीक अँधा है
*
सूर्य के उजाले हैं
सेठ के शिवाले हैं
काव्य के सभी प्रेमी
आदमी निराले हैं
*
आपने बिसरा है
या किया इशारा है?
होंठ तो नहीं बोला
नैन ने पुकारा है
*
कौन-कौन आएगा?
देश-राग गायेगा
शीश जो कटाएगा
कीर्ति खूब पायेगा
*

टीप: बहर- फाइलुं मुफाईलुं
*
नवगीत
क्यों नहीं कभी देखा?
क्यों नहीं किया लेखा??
*
वायवी हुए रिश्ते
कागज़ी हुए नाते
गैर बैर पाले जो
वो रहे सदा भाते
संसदीय तूफां की
है नहीं रही रेखा?
क्यों नहीं कभी देखा?
क्यों नहीं किया लेखा??
*
लोकतंत्र पूछेगा
तंत्र क्यों दरिंदा है?
जिंदगी रही जीती
क्यों मरी न जिंदा है?
आनुशासिनी कीला
क्यों यहाँ नहीं मेखा?
क्यों नहीं कभी देखा?
क्यों नहीं किया लेखा??
*
क्यारियाँ कभी सींचें
बागबान ही भूले
फूल को किया रुस्वा
शूल को मिले झूले
मौसमी किए वादे
फायदा सदा पेखा
क्यों नहीं कभी देखा?
क्यों नहीं किया लेखा??
***
मेखा = ठोंका, पेखा = देखा

रविवार, 9 दिसंबर 2018

कुण्डलिया

एक रचना
घुटना वंदन
*
घुटना वंदन कर सलिल, तभी रहे संजीव।
घुटने ने हड़ताल की, जीवित हो निर्जीव।।
जीवित हो निर्जीव, न बिस्तर से उठने दे।
गुड न रेस्ट; हो बैड, न चलने या झुकने दे।।
छौंक-बघारें छंद, न कवि जाए दम घुट ना।
घुटना वंदन करो, किसी पर रखो न घुटना।।
*
यायावर जी के घुटने को नमन
९.१२.२०१८


शनिवार, 8 दिसंबर 2018

सूचना 'सार्थक लघुकथाएँ' २०१८

-----विश्ववाणी हिंदी संस्थान - समन्वय प्रकाशन अभियान जबलपुर --------

------------------------- 'सार्थक लघुकथाएँ' २०१८ ------------------------------
चयनित लघुकथाकारों की २-२ प्रतिनिधि लघु कथाएँ २ पृष्ठों पर चित्र, पते सहित सहयोगाधार पर प्रकाशित की जा रही हैं। संकलन पेपरबैक होगा। आवरण बहुरंगी, मुद्रण अच्छा होगा। सहभागिता के इच्छुक लघुकथाकार ४ लघुकथाएं, चित्र, परिचय व् सहमति ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com या roy. kanta@gmail.com पर अविलम्ब भेजें।रचनाएँ स्वीकृत होने के बाद मात्र ३००/- का अंशदान पे टी एम् से ९४२५१८३२४४ पर भेज कर प्राप्त संदेश salil.sanjiv@gmail.com पर भेज दें। प्रत्येक सहभागी को २-२ प्रतियाँ तथा प्रमाणपत्र पंजीकृत डाक से भेजा जाएगा। अब तक सम्मिलित लघुकथाकार अशोक मनवानी, उषा भदौरिया, ओमप्रकाश क्षत्रिय, मार्टिन जॉन, डॉ. मौसमी परिहार, डॉ. नीना छिब्बर, सुमन त्रिपाठी, रेणु गुप्ता, सुनीता मिश्रा, वंदना सहाय, प्रेरणा गुप्ता, चन्द्रेश छ्तलानी, प्रभात दुबे, पंकज जोशी, सविता मिश्रा, अर्विना गहलोत, डॉ. उपमा शर्मा, ज्योति शर्मा, विनोद कुमार दवे, डॉ. प्रदीप कुमार शर्मा, अर्चना मिश्र, नेहा नाहटा जैन, डॉ.रुपाली भारद्वाज, कालीपद प्रसाद, पवन जैन, मुज़फ़्फ़र इक़बाल सिद्दीकी, डाॅ. मालती महावर बसंत, डाॅ. राजकुमार निजात, चंद्रा सायता, विभा रश्मि, चितरंजन मित्तल, पदम गोधा, डाॅ. प्रीति प्रवीण खरे, घनश्याम मैथिल'अमृत, ,अरुण अर्णव खरे, मिन्नी मिश्रा, आशीष दलाल, डॉ.वर्षा ढोबले, सीमा भाटिया, रूपेंद्र राज, संजय पठाडे़ 'शेष’, मृणाल आशुतोष, डॉ. वंदना गुप्ता, सरिता बघेला, बसंत शर्मा, मिथिलेश बड़गैया, सुरेश तन्मय, अविनाश ब्योहार, इंद्रबहादुर श्रीवास्तव, शोभित वर्मा मुक्ता अरोरा, अरुण शर्मा, भिवंडी, सुनीता यादव, कांता राय, संजीव वर्मा 'सलिल'। सम्पादक संपर्क ९४२५१८३२४४ या ९५७५४६५१४७
अतिरिक्त प्रतियाँ ५०% रियायत पर डाक व्यय निशुल्क सुविधा सहित मिलेंगी।
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आयुर्वेद

दोहा-दोहा चिकित्सा 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' 
*
खाँसी कफ टॉन्सिल अगर, करती हो हैरान। 
कच्ची हल्दी चूसिए, सस्ता, सरल निदान।।
*
खाँस-खाँस मुँह  हो रहा, अगर आपका लाल। 
पान शहद अदरक मिला, चूसें करे कमाल।। 
*
करिए गर्म अनार रस, पिएँ न खाँसें मीत। 
चूसें काली मिर्च तो, खाँसी हो भय-भीत।।
*
दमा ब्रोन्कियल अस्थमा, करे अगर बेचैन। 
सुबह पिएँ गो मूत्र नित, ताजा पाएँ चैन।।
*
पीस दालचीनी मिला, शहद पीजिए मीत।
पानी गरम सहित घटे, दमा न रहिए भीत।।
*
ग्रस्त तपेदिक से अगर, पिएँ आप छह माह। 
नित ताजा गोमूत्र तो, मिले स्वास्थ्य की राह।।
वात-पित्त-कफ दोष का, नीबू करता अंत
शक्ति बढ़ाता बदन की, सेवन करिये कंत
*
ए बी सी त्रय विटामिन, लौह वसा कार्बोज
फॉस्फोरस पोटेशियम, सेवन से दें ओज
*
मैग्निशियम प्रोटीन सँग, सोडियम तांबा प्राप्य
साथ मिले क्लोरीन भी, दे यौवन दुष्प्राप्य
*
नेत्र ज्योति की वृद्धि कर, करे अस्थि मजबूत
कब्ज मिटा, खाया-पचा, दे सुख-ख़ुशी अकूत
*
जल-नीबू-रस नमक लें, सुबह-शाम यदि छान
राहत दे गर्मियों में, फूँक जान में जान
*
नींबू-बीज न खाइये, करे बहुत नुकसान
भोजन में मत निचोड़ें, बाद करें रस-पान
*
कब्ज अपच उल्टियों से, लेता शीघ्र उबार
नीबू-सेंधा नमक सँग, अदरक है उपचार
*
नींबू अजवाइन शहद, चूना-जल लें साथ
वमन-दस्त में लाभ हो, हँसें उठकर माथ
*
जी मिचलाये जब कभी, तनिक न हों बेहाल
नीबू रस-पानी-शहद, आप पियें तत्काल
*
नींबू-रस सेंधा नमक, गंधक सोंठ समान
मिली गोलियाँ चूसिये, सुबह-शाम गुणवान
*
नींबू रस-पानी गरम, अम्ल पित्त कर दूर
हरता उदर विकार हर, नियमित पियें हुज़ूर
*
आधा सीसी दर्द से, परेशान-बेचैन
नींबू रस जा नाक में, देता पल में चैन
*
चार माह के गर्भ पर, करें शिकंजी पान
दिल-धड़कन नियमित रहे, प्रसव बने आसान
*
कृष्णा तुलसी पात ले, पाँच- चबायें खूब
नींबू-रस पी भगा दें, फ्लू को सुख में डूब
*
पियें शिकंजी, घाव पर, मलिए नींबू रीत
लाभ एक्जिमा में मिले, चर्म नर्म हो मीत
*
कान दर्द हो कान में, नींबू-अदरक अर्क
डाल साफ़ करिये मिले, शीघ्र आपको फर्क
*
नींबू-छिलका सुख कर, पीस फर्श पर डाल
दूर भगा दें तिलचटे, गंध करे खुशहाल
*
नीबू-छिलके जलाकर, गंधक दें यदि डाल
खटमल सेना नष्ट हो, खुद ही खुद तत्काल
*
पीत संखिया लौंग संग, बड़ी इलायची कूट
नींबू-रस मलहम लगा, करें कुष्ठ को हूट
*
नींबू-रस हल्दी मिला, उबटन मल कर स्नान
नर्म मखमली त्वचा पा, करे रूपसी मान
*
मिला नारियल-तेल में, नींबू-रस नित आध
मलें धूप में बदन पर, मिटे खाज की व्याध
*
खूनी दस्त अगर लगे, घोलें दूध-अफीम
नींबू-रस सँग मिला पी, सोयें बिना हकीम
*
बवासीर खूनी दुखद, करें दुग्ध का पान
नींबू-रस सँग-सँग पियें, बूँद-बूँद मतिमान
*
नींबू-रस जल मिला-पी, करें नित्य व्यायाम
क्रमश: गठिया दूर हो, पायेंगे आराम
*
गला बैठ जाए- करें, पानी हल्का गर्म
नींबू-अर्क नमक मिला, कुल्ला करना धर्म
*
लहसुन-नींबू रस मिला, सिर पर मल कर स्नान
मुक्त जुओं से हो सकें, महिलायें अम्लान
*
नींबू-एरंड बीज सम, पीस चाटिये रात
अधिक गर्भ संभावना, होती मानें बात
*
प्याज काट नीबू-नमक, डाल खाइये रोज
गर्मी में हो ताजगी, बढ़े देह का ओज
*
काली मिर्च-नमक मिली, पियें शिकंजी आप
मिट जाएँगी घमौरियाँ, लगे न गर्मी शाप
*
चेहरे पर नींबू मलें, फिर धो रखिये शांति
दाग मिटें आभा बढ़े, अम्ल-विमल हो कांति
*
नमक आजवाइन मिला, नीबू रस के संग। 
आधा कप पानी पिएँ, करती वायु न तंग।।
अदरक अजवाइन नमक, नीबू रस में डाल। 
हो जाए जब लाल तब, खाकर हों खुशहाल।।
घटे पीलिया नित्य लें, गहरी-गहरी श्वास।
सुबह-शाम उद्यान में, अधरों पर रख हास।।   
लहसुन अजवाइन मिला, लें सरसों का तेल।
गरम करें छानें मलें, जोड़-दर्द मत झेल।।
कान-दर्द खुजली करे, खाएँ कढ़ी न भात। 
खारिश दाद न रह सके, मिले रोग को मात।।  
*  
डालें बकरी-दूध में, मिसरी तिल का चूर्ण। 
रोग रक्त अतिसार हो, नष्ट शीघ्र ही पूर्ण।।

अजवायन का सत् २५ gram, कपूर २५ ग्राम, पिपरमेंट १० ग्राम, इलायची का तेल १० ग्राम, दालचीनी का तेल १० ग्राम, लौंग का तेल १० ग्राम, बादाम का तेल १० ग्राम- एक शीशी में डालकर १०-१५ मिनट हिलाएं। यह मिश्रण अनेक रोगों की राम बाण दावा 'अमृतधारा' है। इसके उपयोग से खाँसी, जुकाम, बदहजमी, पेट-दर्द, कई, दस्त, हैजा, दंत-दर्द, बिच्छू-दंश आदि में तुंरत आराम lहोता है।