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बुधवार, 1 अप्रैल 2020

देवी कवच

। अथ देव्या कवचं ।
। यह देवी कवच है ।

ॐ अस्य श्रीचण्डीकवचस्य ब्रह्मा ऋषि:, अनुष्टुप छंद: चामुंडा देवता,
अंगन्यासोक्तमातरो बीजं, दिग्बंधदेवतास्तत्त्वं ,
श्री जगदंबा प्रीत्यर्थे सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोग:।

। ॐ यह श्री चंडी कवच है, ब्रह्मा ऋषि ने गाया है।
। छंद अनुष्टुप, देव चामुंडा, अंग न्यास हित भाया है।

। मातृ-बीज दिग्बंध देव का, जगदंबा के हेतु करे।

। सप्तशती के पाठ जाप, विनियोग हेतु स्मरण करे।

।। ॐ नमश्चण्डिकायै ।।
।। ॐ चंडिका देवी नमन।।

मार्कण्डेय उवाच।।
मार्कण्डेय बोले।।

ॐ यद्गुह्यं परमं लोके सर्व रक्षाकरं नृणाम।
यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह।१।

ॐ लोक में परम गुप्त जो, सब प्रकार रक्षा करता।
नहीं कहा हो किसी अन्य से, कहें पितामह वह मुझसे।१।

ब्रम्होवाच

अस्तु गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकं।
देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व महामुने।२।

विधि बोले: हे विप्र! गुप्ततम, सब उपकारी साधन एक।
देवी कवच पवित्र दिवा है, उसको सुनिए महामुने।२।

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चंद्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकं।३।

पहली शैलपुत्री हैं, दूसरी ब्रह्मचारिणी।
चंद्रघंटा तीसरी हैं, कूष्माण्डा हैं चौथी।३।

पंचमं स्कंदमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम।४।

पाँचवी स्कन्द माता, छठी हैं कात्यायनी।
कालरात्रि सातवीं हैं, महागौरी हैं आठवीं।४।

नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा: प्रकीर्तिता:।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना।५।

नौवीं सिद्धिदात्री हैं, सुकीर्तिवान हैं नौ दुर्गा।
उक्त नामों को रखा है, ब्रह्म ने ही महात्मना।५।

अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे।
विश्मे दुर्गमें चैव भयार्ता: शरणं गता:।६।

जल रहा मनु अग्नि में या घिरा रण में शत्रुओं से।
विषम संकटग्रस्त हो भयभीत, आ मैया-शरण में ।६।

न तेषां जायते किंचिदशुभं रणसंकटे।
नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न हि।७।

बाल भी बाँका न होता, युद्ध खतरों संकटों में।
छू नहीं पाता उन्हें दुःख, शोक भय विपदा-क्षणों में।७।

यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धि: प्रजायते।
ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशय:।८।

भगवती को भक्तिपूर्वक याद जो करते निरंतर।

करें रक्षा अंब उनकी, अभ्युदय होता न संशय।८।

प्रेतसंस्था तु चामुंडा वाराही महिषासना।
ऐन्द्री गजसमारूढ़ा वैष्णवी गरुणासना।९।

प्रेतवाहनी हैं चामुंडा, वाराही महिषासनी।
ऐन्द्री ऐरावत आसीना, गरुण विराजीं वैष्णवी।९।

माहेश्वरी वृषारूढ़ा कौमारी शिखिवाहना।
लक्ष्मी: पद्मासना देवी पद्महस्ता हरिप्रिया।१०।

वृषारूढ़ माहेश्वरी, कौमारी हैं मोर पर।
विष्णुप्रिया कर-कमल ले, रमा विराजित कमल पर ।१०।

श्वेतरूपधरा देवी ईश्वरी वृषवाहना।
ब्राह्मी हंससमारूढ़ा सर्वाभरणभूषिता।११।

श्वेत रूप धरे देवी, ईश्वरी वृष पर विराजित।
हंस पर आरूढ़ ब्राह्मी, अलंकारों से अलंकृत।११।

इत्येता मातर: सर्वा: सर्वयोगसमन्विता:।
नानाभरणशोभाढ्या नानरत्नोपशोभिता।१२।

सब माताएँ योग की सर्व शक्ति से युक्त।
सब आभूषण सुसज्जित, रत्न न कोई त्यक्त।१२।

दृश्यन्ते रथमारूढ़ा देव्य: क्रोधसमाकुला।
शँखम् चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधं।१३।

सभी देवियाँ क्रोध से आकुल रथ आसीन।
शंख चक्र हल गदा सह, मूसल शक्ति प्रवीण।१३।

खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च।
कुन्तायुधं त्रिशूलं च शार्ङ्गायुधमुत्तमम्।१४।

खेटक तोमर परशु अरु पाश लिए निज हाथ।
कुंत - त्रिशूल लिए हुए, धनु शार्ङ्ग है साथ।१४।

दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च।
धारयन्तायुधानीत्थम् देवानां च हिताय वै।१५।

दैत्य-दलों का नाश कर, हरें भक्त की पीर।
धारण करतीं शस्त्र सब, देवहितार्थ अधीर।१५।

नमस्तेsस्तु महारौद्रे महाघोर पराक्रमी।
महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनी।१६।

तुम्हें नमन है महारौद्रा, महाघोरा पराक्रमी।
महा बल-उत्साहवली, तुम्हीं भय विनाशिनी।१६।

त्राहिमां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्धिनि।
प्राच्यां रक्षतु मामैंद्री आग्नेय्यामग्निदेवता।१७।

त्राहिमाम् है कठिन देखना, तुमको देवी अरिभयवर्धक।
पूर्व दिशा में ऐन्द्री रक्षें, अग्निदेवता आग्नेय में।१७।

दक्षिणेवतु वाराही नैऋत्यां खड्गधारिणी।
प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद् वायव्यां मृगवाहिनी।१८।

दक्षिण में वाराही देवी अरु नैऋत्य में खड्गधारिणी।
पश्चिम में वारुणी बचाएँ वायव्य में मृगवाहिनी।१८।

उदीच्यां पातु कौमारी, ऐशान्यां शूलधारिणी।
ऊर्ध्वं ब्रह्माणि में रक्षेदधस्ताद वैष्णवी तथा।१९।

उत्तर में कौमारी और ईशान में शूलधारिणी।
ऊपर से रक्षे ब्राह्मणी, नीचे से रक्षे वैष्णवी।१९।

एवं दस दिशो रक्षेच्चामुंडा शववाहना।
जया में चागत: पातु, विजय पातु पृष्ठत:।२०।

रक्षें दसों दिशाओं में चामुंडा शव वाहना।
जया करें रक्षा आगे से, पीछे से रक्षें विजया।२०।

अजिता वामपार्श्वे तु, दक्षिणे चापराजिता।
शिखामुद्योतिनि रक्षेदुमा मूर्घ्नि व्यवस्थिता।२१।

वाम पार्श्व में रक्षें अजिता, दक्षिण में अपराजिता।
उद्योतिनी शिखा रक्षें , मस्तक रक्षें सदा उमा।२१।

मालाधरी ललाटे च भ्रुवौ रक्षेद् यशस्विनी।
त्रिनेत्रा च भ्रुवोर्मध्ये, यमघण्टा च नासिके।२२।

मालाधरी ललाट रक्षें यशस्विनी जी भौंहों को।
भौंह-मध्य को त्रिनेत्रा, यमघण्टा रक्षें नाक को।२२।

शंखिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोतयोर्द्वारवासिनी।
कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले तु शांकरी ।२३।

नासिकायां सुगंधा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका।
अधरे चामृतकला, जिह्वायां च सरस्वती।२४।

नासिका को सुगंधा, ऊपरी अधर को चर्चिका।
अमृतकला निचला अधर, सरस्वती रक्षें जिह्वा।२४।

दंतान् रक्षतु कौमारी कण्ठदेशे तु चंडिका।
घंटिकां चित्रघंटा च महामाया च तालुके।२५।

दंत रक्षें कौमारी, कंठ भाग को चंडिका।
गलघंटिका चित्रघंटा, तालु रक्षें महामाया।२५।

कामाक्षी चिबुकं रक्षेद् वाच मे सर्वमंगला ।
ग्रीवायां भद्रकाली च, पृष्ठवंशे धनुर्धरी।२६।

कामाक्षी चिबुक रक्षें , सर्वमंगला जी वाणी।
गर्दन रक्षें भद्रकाली, मेरुदंड को धनुर्धारी।२६।

नीलग्रीवा बहि:कण्ठे नलिकां नलकूबरी।
स्कन्धयोः खड्गिनी रक्षेद् बाहू में वज्रधारिणी।२७।

नीलग्रीवा बाह्यकंठ को, कंठ नली नलकूबरी।
कंधों को खड्गिनी रक्षें, भुजाएँ वज्रधारिणी।२७।

हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदम्बिका चांगुलीषु च।
नखांछूलेश्वरी रक्षेत्कुक्षौ रक्षेत्कुलेश्वरी।२८।

कर द्वय रक्षें दण्डिनी, अँगुलियों को अम्बिका।
नखों को शूलेश्वरी, कुक्षि को कुल ईश्वरी।२८।

स्तनौ रक्षेन्महादेवी मन:शोक विनाशिनी।
हृदये ललिता देवी उदरे शूल धारिणी।२९।

स्तन रक्षें महादेवी, मन को शोक विनाशिनी।
ललितादेवी ह्रदय रक्षें, उदर को शूलधारिणी।२९।

नाभौ च कामिनी रक्षेद् गुह्यं गुह्येश्वरी तथा।
पूतना कामिका मेढं जुड़े महिषवाहिनी ।३०।

नाभि रक्षें कामिनी देवी, गुह्य भाग गुह्येश्वरी।
पूतना कामिका लिंग, गुदा महिषवाहिनी। ३०।

कट्यां भगवती रक्षेज्जानुनी विंध्यवासिनी।
जंघे महाबला रक्षेत्सर्वकाम प्रदायिनी। ३१।

भगवती रक्षें कमर घुटने विंध्यवासिनी।
पिंडली महाबला सर्व कामनादायिनी। ३१।

गुल्फयोर्नारसिंही च पादपृष्ठे तु तैजसी।
पादांगुलीषु श्री रक्षेत्पादाधस्तलवासिनी।३२

टखने रक्षें नारसिंही, चरण-पृष्ठ तैजसी।
श्री पैरों की अंगुलियाँ, तलवे द्वय तलवासिनी। ३२।

नखान् दंष्ट्राकराली च केशांश्चैवोर्ध्वकेशिनी।
रोमकूपेषु कौबेरी त्वचं वागीश्वरी तथा।३३।

पदनख दंष्ट्राकराली केश रक्षें ऊर्ध्वकेशिनी।
रोमावलियाँ कौबेरी, त्वचा रक्षें वागीश्वरी। ३३।

रक्तमज्जावसामांसान्यस्थिमेदांसि पार्वती।
अंत्राणिकालरात्रिश्च पित्तम् च मुकुटेश्वरी। ३४।

रक्त मज्जा वसा मांस, मेदास्थि रक्षें पार्वती।
आँतें रक्षें कालरात्रि, पित्त रक्षें मुकुटेश्वरी। ३४।

पद्मावती पद्मकोशे कफे चूड़ामणिस्तथा।
ज्वालामुखी नखज्वलमभेद्या सर्वसन्धिषु। ३५।

मूलाधार पद्मकोष पद्मावती, कफ चूड़ामणि।
नखज्वाल ज्वालामुखी, अभेदया रक्षें संधियां। ३५।

शुक्रं ब्रह्माणि मे रक्षेच्छायां छत्रेश्वरी तथा।
अहंकारं मनो बुद्धिं रक्षेन्मे धर्मधारिणी।३६।

ब्रह्माणी! मम वीर्य बचाएँ, छाया को छत्रेश्वरी।
स्वाभिमान मन बुद्धि बचाएँ, मैया धर्मधारिणी।३६।

प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं च समानकं।
वज्रहस्ता च मे रक्षेत्प्राणं कल्याणशोभना।३७।

प्राण-अपान व् व्यान-उदान बचायें वायु समान भी
वज्रहस्ता माँ, प्राण रक्षिये हे कल्याणशोभना। ३७।

रसे रूपे च गंधे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी।
सत्वं रजस्तमश्चैव रक्षेन्नारायणी सदा। ३८।

रस रूप गंध शब्दस्पर्श की, योगिनी रक्षा करें।
सत-रज-तम की सुरक्षा, नारायणी मैया करें। ३८।

आयू रक्षति वाराही धर्मं रक्षतु वैष्णवी।
यश: कीर्तिं च लक्ष्मी च धनं विद्यां च चक्रिणी। ३९।

आयु बचाएँ वाराही, धर्म बचाएँ वैष्णवी।
बचाएँ यश-कीर्ति-लक्ष्मी-धन-विद्या को चक्रिणी। ३९।

गोत्रमिन्द्राणि में रक्षेत्पशून्मे रक्ष चण्डिके।
पुत्रान् रक्षेन्महालक्ष्मीर्भार्यां रक्षतु भैरवी। ४०।

हे इन्द्राणि! गोत्र रक्षिए, पशु रक्षें हे चंडिका!
पुत्र रक्षें महालक्ष्मी, भार्या रक्षें भैरवी। ४०।

पंथानं सुपथा रक्षेन्मार्गं क्षेमकरी तथा।
राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सर्वत: स्थिति। ४१।

सुपथा रक्षा करें पंथ की और मार्ग में क्षेमकरी।
राजद्वार में महालक्ष्मी, हर भय से विजया देवी। ४१।

रक्षाहीनं तु यत्स्थानं वर्जितं कवचेन तु।
तत्सर्वं रक्ष में देवि, जयंती पापनाशिनी। ४२।

रक्षाहीन रहे जो स्थल, नहीं कवच में कहे गए।
वे सब रक्षें देवी जयंती!, तुम हो पाप नाशिनी। ४२।

पदमेकं न गच्छेत्तु यदीच्छेच्छुभमात्मन: .
कवचेनावृतो नित्यम् यत्र यत्रैव गच्छति। ४३।

जाएँ एक भी पग नहीं, यदि चाहें अपना भला।
रक्षित होकर कवच से, जहाँ जहाँ भी जाएँगे। ४३।

तत्र तत्रार्थ लाभश्च विजय: सर्वकामिक:।
यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितं।
परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान्।४४।


वहाँ वहाँ धन लाभ जय सब कामों में पाएँगे।
चिंतन जिस जिस काम का, करें वही हो जाएँगे।
पा ऐश्वर्य अतुल परम भूतल पर यश पाएँगे।४४।

निर्भयो जायते मर्त्य: संग्रामेष्वपराजित:।
त्रैलोक्ये तु भवेत्पूज्य: कवचनावृत: पुमान्। ४५।

मरणशील मनु भी निर्भय हो, हार न हो संग्राम में।
पूज्यनीय हो तीन लोक में, अगर सुरक्षित कवच से। ४५।

इदं तु देव्या: कवचं देवानामपि दुर्लभं।
य: पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धान्वित:। ४६।

यह जो देवी-कवच है, दुर्लभ देवों को रहा।
पाठ करे जो नित्य प्रति, त्रिसंध्या में सश्रद्धा। ४६।

दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्येष्वपराजित:।
जीवेद् वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जित:।४७।

दैवी कला मिले उसे, हारे नहीं त्रिलोक में।
हो शतायु, अपमृत्यु भय उसे नहीं होता कभी।४७।

नश्यन्ति व्याधय: सर्वे लूताविस्फोटकादय:।
स्थावरं जंगमं चैव कृत्रिमं चापि यद्विषम्।४८।

सकल व्याधियाँ नष्ट हों, मकरी चेचक कोढ़।
स्थावर जंगम कृत्रिम, विष का भय होता नहीं।४८।

अभिचाराणि सर्वाणि, मन्त्र-यन्त्राणि भूतले।
भूचरा: खेचराश्चैव, जलजाश्चोपदेशिका:।४९ ।

आभिचारिक प्रयोग सारे, मंत्र-यंत्र जो धरा पर।
भूचर खेचर जलज जो, उपदेशक हैं हानिप्रद।४९।

सहजा कुलजा माला, डाकिनी शाकिनी तथा।
अन्तरिक्षचरा घोरा, डाकिन्यश्च महाबला:।५०।

जन्मजा कुलजा माला, डाकिनी शाकिनी आदि।
अंतरिक्ष में विचरतीं, शक्तिशाली डाकिनी भी।५०।
ग्रहभूतपिशाचाश्च , यक्ष गन्धर्व - राक्षसा:।
ब्रह्मराक्षसवेताला: कुष्माण्डा भैरवादय:।५१।

ग्रह भूत पिशाच आदि, यक्ष गंधर्व राक्षस भी।
ब्रह्मराक्षस बैतालादि, कूष्माण्डा भैरवादि भी।५१।
नश्यन्ति दर्शनातस्य, कवचे हृदि संस्थिते।
मानोन्नतिर्भवेद् राज्ञस्तेजोवृद्धिकरं परम्।५२।

देखते ही नष्ट होते, कवच हो यदु हृदय में।
मान-उन्नति प्राप्त हो, सम्मान राजा से मिले।५२।

यशसा वर्धते सोsपि कीर्ति मण्डितभूतले।
जपेत्सप्तशतीं चण्डीं कृत्वा तु कवचं पुरा।५३।

यश सदा बढ़ता रहे, कीर्ति से मंडित धरा हो।
जो जपे सत शांति चंडी, पूर्व उसके कवच भी।५३।

यावद्भूमण्डलं धत्ते सशैल वनकाननम्।
तावत्तिष्ठति मेदिन्यां सन्तति: पुत्रपौत्रिकी।५४।

जब तक भूमण्डल टिका, पर्वत-कानन सहित यह।
तब तक धरती पर रहे, संतति पुत्र-पौत्र भी।५४।
देहान्ते परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम्।
प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामाया प्रसादत:।५५।

देह अंत हो तो मिले, सुरदुर्लभ परलोक।
मिलता नित्यपुरुष को ही प्रसाद महामाया का । ५५।

लभते परमं रूपं शिवेन सह मोदते।५६।
परम रूप पा भोगता, शिवानंद बड़भाग से। ५६।
***
संजीव
१.१.२०२०
९४२५१८३२४४