सोमवार, 18 फ़रवरी 2019

नवगीत: अंदाज अपना-अपना

नवगीत:
अंदाज अपना-अपना
आओ! तोड़ दें नपना
*
चोर लूट खाएंगे
देश की तिजोरी पर
पहला ऐसा देंगे
अच्छे दिन आएंगे
.
भूखे मर जाएंगे
अन्नदाता किसान
आवारा फिरें युवा
रोजी ना पाएंगे
तोड़ रहे हर सपना
अंदाज अपना-अपना
*
निज यश खुद गाएंगे
हमीं विश्व के नेता
वायदों को जुमला कह
ठेंगा दिखलाएंगे
.
खूब जुल्म ढाएंगे
सांस, आस, कविता पर
आय घटा, टैक्स बढ़ा
बांसुरी बजाएंगे
कवि! चुप माला जपना
अंदाज अपना-अपना
***
१८.२.२०१८

चित्रलंकार पर्वत

चित्रालंकार:पर्वत 

गाएंगे
अनवरत
प्रणय गीत
सुर साधकर।
जी पाएंगे दूर हो
प्रिये! तुझे यादकर।

नवगीत- पड़ा मावठा

नवगीत-
पड़ा मावठा 
*
पड़ा मावठा 
घिरा कोहरा
जला अँगीठी
आगी ताप
*
सिकुड़-घुसड़कर बैठ बावले
थर-थर मत कँप, गरम चाय ले
सुट्टा मार चिलम का जी भर
उठा टिमकिया, दे दे थाप
पड़ा मावठा
घिरा कोहरा
जला अँगीठी
आगी ताप
*
आल्हा-ऊदल बड़े लड़ैया
टेर जोर से,भगा लड़ैया
गारे राई,सुना सवैया
घाघ-भड्डरी
बन जा आप
पड़ा मावठा
घिरा कोहरा
जला अँगीठी
आगी ताप
*
कुछ अपनी, कुछ जग की कह ले
ढाई आखर चादर तह ले
सुख-दुःख, हँस-मसोस जी सह ले
चिंता-फिकिर
बना दे भाप
पड़ा मावठा
घिरा कोहरा
जला अँगीठी
आगी ताप
*
बाप न भैया, भला रुपैया
मेरा-तेरा करें न लगैया
सींग मारती मरखन गैया
उठ, नुक्कड़ का
रस्ता नाप
पड़ा मावठा
घिरा कोहरा
जला अँगीठी
आगी ताप
*
जाकी मोंड़ी, बाका मोंड़ा
नैन मटक्का थोडा-थोडा
हम-तुम ने नाहक सर फोड़ा
पर निंदा का
मर कर पाप
पड़ा मावठा
घिरा कोहरा
जला अँगीठी
आगी ताप
***

दोहा दुनिया

दोहा दुनिया 
*
राजनीति है बेरहम, सगा न कोई गैर 
कुर्सी जिसके हाथ में, मात्र उसी की खैर 
*
कुर्सी पर काबिज़ हुए, चेन्नम्मा के खास
चारों खाने चित हुए, अम्मा जी के दास
*
दोहा देहरादून में, मिला मचाता धूम
जितने मतदाता बने, सब है अफलातून
*
वाह वाह क्या बात है?, केर-बेर का संग
खाट नहीं बाकी बची, हुई साइकिल तंग
*
आया भाषणवीर है, छाया भाषणवीर
किसी काम का है नहीं, छोड़े भाषण-तीर
*
मत मत का सौदा करो, मत हो मत नीलाम
कीमत मत की समझ लो, तभी बनेगा काम
*
एक मरा दूजा बना, तीजा था तैयार
जेल हुई चौथा बढ़ा, दो कुर्सी-गल हार
*
१८-२- २०१७

लघुकथा सबक

लघुकथा
सबक
*
'तुम कैसे वेलेंटाइन हो जो टॉफी ही नहीं लाये?'
''अरे उस दिन लाया तो था, अपने हाथों से खिलाई भी थी. भूल गयीं?''
'भूली तो नहीं पर मुझे बचपन में पढ़ा सबक आज भी याद है. तुमने कुछ पढ़ा-लिखा होता तो तुम्हें भी याद होता.'
''अच्छा, तो मैं अनपढ़ हूँ क्या?''
'मुझे क्या पता? कुछ पढ़ा होता तो सबक याद न होता?'
''कौन सा सबक?''
'वही मुँह पर माखन लगा होने के बाद भी मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो कहने वाला सूर का पद. जब मेरे आराध्य को रोज-रोज खाने के बाद भी माखन खाना याद नहीं रहा तो एक बार खाई टॉफी कैसे??? चलो माफ़ किया अब आगे से याद रखना सबक '
***

प्रेम गीत में संगीत चेतना

प्रेम गीत में संगीत चेतना
संजीव
*
साहित्य और संगीत की स्वतंत्र सत्ता और अस्तित्व असंदिग्ध है किन्तु दोनों के समन्वय और सम्मिलन से अलौकिक सौंदर्य सृष्टि-वृष्टि होती है जो मानव मन को सच्चिदानंद की अनुभूति और सत-शिव-सुन्दर की प्रतीति कराती है. साहित्य जिसमें सबका हित समाहित हो और संगीत जिसे अनेक कंठों द्वारा सम्मिलित-समन्वित गायन१।
वाराहोपनिषद में अनुसार संगीत 'सम्यक गीत' है. भागवत पुराण 'नृत्य तथा वाद्य यंत्रों के साथ प्रस्तुत गायन' को संगीत कहता है तथा संगीत का लक्ष्य 'आनंद प्रदान करना' मानता है, यही उद्देश्य साहित्य का भी होता है.
संगीत के लिये आवश्यक है गीत, गीत के लिये छंद. छंद के लिये शब्द समूह की आवृत्ति चाहिए जबकि संगीत में भी लयखंड की आवृत्ति चाहिए। वैदिक तालीय छंद साहित्य और संगीत के समन्वय का ही उदाहरण है.
अक्षर ब्रम्ह और शब्द ब्रम्ह से साक्षात् साहित्य करता है तो नाद ब्रम्ह और ताल ब्रम्ह से संगीत। ब्रम्ह की
मतंग के अनुसार सकल सृष्टि नादात्मक है. साहित्य के छंद और संगीत के राग दोनों ब्रम्ह के दो रूपों का प्रतिनिधित्व करते हैं.
साहित्य और संगीत का साथ चोली-दामन का सा है. 'वीणा-पुस्तक धारिणीं भगवतीं जाड्यंधकारापहाम्' - वीणापाणी शारदा के कर में पुस्तक भी है.
'संगीत साहित्य कलाविहीन: साक्षात पशु: पुच्छ विषाणहीनः' में भी साहित्य और संगीत के सह अस्तित्व को स्वीकार किया गया है.
स्वर के बिना शब्द और शब्द के बिना स्वर अपूर्ण है, दोनों का सम्मिलन ही उन्हें पूर्ण करता है.
ग्रीक चिंतक और गणितज्ञ पायथागोरस के अनुसार 'संगीत विश्व की अणु-रेणु में परिव्याप्त है. प्लेटो के अनुसार 'संगीत समस्त विज्ञानों का मूल है जिसका निर्माण ईश्वर द्वारा सृष्टि की विसंवादी प्रवृत्तियों के निराकरण हेतु किया गया है. हर्मीस के अनुसार 'प्राकृतिक रचनाक्रम का प्रतिफलन ही संगीत है.
नाट्य शास्त्र के जनक भरत मुनि के अनुसार 'संगीत की सार्थकता गीत की प्रधानता में है. गीत, वाद्य तथा नृत्य में गीत ही अग्रगामी है, शेष अनुगामी.
गीत के एक रूप प्रगीत (लिरिक) का नामकरण यूनानी वाद्य ल्यूरा के साथ गाये जाने के अधर पर ही हुआ है. हिंदी साहित्य की दृष्टि से गीत और प्रगीत का अंतर आकारगत व्यापकता तथा संक्षिप्तता ही है.
गीत शब्दप्रधान संगीत और संगीत नाद प्रधान गीत है. अरस्तू ने ध्वनि और लय को काव्य का संगीत कहा है. गीत में शब्द साधना (वर्ण अथवा मात्रा की गणना) होती है, संगीत में स्वर और ताल की साधना श्लाघ्य है. गीत को शब्द रूप में संगीत और संगीत को स्वर रूप में गीत कहा जा सकता है.
प्रेम के दो रूप संयोग तथा वियोग श्रृंगार तथा करुण रस के कारक हैं.
प्रेम गीत इन दोनों रूपों की प्रस्तुति करते हैं. आदिकवि वाल्मीकि के कंठ से नि:सृत प्रथम काव्य क्रौंचवध की प्रतिक्रिया था. पंत जी के नौसर: 'वियोगी होगा पहला कवि / आह से उपजा होगा गान'
लव-कुश द्वारा रामायण का सस्वर पाठ सम्भवतः गीति काव्य और संगीत की प्रथम सार्वजनिक समन्वित प्रस्तुति थी.
लालित्य सम्राट जयदेव, मैथिलकोकिल विद्यापति, वात्सल्य शिरोमणि सूरदास, चैतन्य महाप्रभु, प्रेमदीवानी मीरा आदि ने प्रेमगीत और संगीत को श्वास-श्वास जिया, भले ही उनका प्रेम सांसारिक न होकर दिव्य आध्यात्मिक रहा हो.
आधुनिक हिंदी साहित्य में भारतेन्दु हरिश्चंद्र, मैथिलीशरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला', महादेवी वर्मा, सुमित्रानंदन पंत, बालकृष्ण शर्मा 'नवीन', हरिवंश राय बच्चन आदि कवियों की दृष्टि और सृष्टि में सकल सृष्टि संगीतमय होने की अनुभूति और प्रतीति उनकी रचनाओं की भाषा में अन्तर्निहित संगीतात्मकता व्यक्त करती है.
निराला कहते हैं- "मैंने अपनी शब्दावली को छोड़कर अन्यत्र सभी जगह संगीत के छंदशास्त्र की अनुवर्तिता की है.… जो संगीत कोमल, मधुर और उच्च भाव तदनुकूल भाषा और प्रकाशन से व्यक्त होता है, उसके साफल्य की मैंने कोशिश की है.''
पंत के अनुसार- "संस्कृत का संगीत जिस तरह हिल्लोलाकार मालोपमा से प्रवाहित होता है, उस तरह हिंदी का नहीं। वह लोल लहरों का चंचल कलरव, बाल झंकारों का छेकानुप्रास है.''
लोक में आल्हा, रासो, रास, कबीर, राई आदि परम्पराएं गीत और संगीत को समन्वित कर आत्मसात करती रहीं और कालजयी हो गयीं।
गीत और संगीत में प्रेम सर्वदा अन्तर्निहित रहा. नव गति, नव लय, ताल छंद नव (निराला), विमल वाणी ने वीणा ली (प्रसाद), बीन भी हूँ मैं तुम्हारी रागिनी भी हूँ (महादेवी), स्वर्ण भृंग तारावलि वेष्ठित / गुंजित पुंजित तरल रसाल (पंत) से प्रेरित समकालीन और पश्चात्वर्ती रचनाकारों की रचनाओं में यह सर्वत्र देखा जा सकता है.
छायावादोत्तर काल में गोपालदास सक्सेना 'नीरज', सोम ठाकुर, भारत भूषण, कुंवर बेचैन आदि के गीतों और मुक्तिकाओं (गज़लों) में प्रेम के दोनों रूपों की सरस सांगीतिक प्रस्तुति की परंपरा अब भी जीवित है.

द्विपदियाँ और दोहे

सामयिक द्विपदियाँ और दोहे
संजीव
*
मिलाकर हाथ खासों ने, किया है आम को बाहर
नहीं लेना न देना ख़ास से, हम आम इन्सां हैं
*
इनके पंजे में कमल, उनका भगवा हाथ
आम आदमी देखकर, नत दोनों का माथ
*
'राज्य बनाया है' कहो या 'तोडा है राज्य'
तोड़ रही है सियासत, कैसे हों अविभाज्य?
*
भाग्य विधाता आम है, शोषण करता ख़ास
जो खासों का साथ दे, उसको मानो दास
*
साथ उसी का दो सलिल, जिस पर हो विश्वास
साथ ख़ास के जो रहे, वह पाये संत्रास
*

१८-२-२०१४ 

बासंती दोहा ग़ज़ल:

बासंती दोहा ग़ज़ल:
संजीव
*
स्वागत में ऋतुराज के, पुष्पित हैं कचनार
किंशुक कुसुम दहक रहे, या दहके अंगार?
*
पर्ण-पर्ण पर छा गया, मादक रूप निखार
पवन खो रहा होश निज, लख वनश्री-श्रृंगार
*
महुआ महका देखकर, चहका-बहका प्यार
मधुशाला में बिन पिये, सिर पर नशा सवार
*
नहीं निशाना चूकती, पञ्चशरों की मार
पनघट-पनघट हो रहा, इंगित का व्यापार
*
नैन मिले लड़ झुक उठे, करने को इंकार
देख नैन में बिम्ब निज, कर बैठे इकरार
*
मैं-तुम, यह-वह ही नहीं, बौराया संसार
सब पर बासंती नशा, मिल लें गले खुमार
*
ढोलक, टिमकी, मंजीरा, करें ठुमक इसरार
दुनियावी चिंता भुला, नाचो-झूमो यार
*
घर आँगन तन धो दिया, तन का रूप निखार
अंतर्मन का मेल भी, प्रियवर! कभी बुहार।
*
बासंती दोहा-गज़ल, मन्मथ की मनुहार
सीरत-सूरत रख 'सलिल', निर्मल सहज सँवार
*
Sanjiv verma 'Salil'
salil.sanjiv@gmail.com
http://divyanarmada.blogspot.in
facebook: sahiyta salila / sanjiv verma 'salil'

रविवार, 17 फ़रवरी 2019

लघु कथा संगम

कृति परिचय:
लघु कथा संगम: भावनाओं का परचम 
-डॉ. साधना वर्मा 
[कृति विवरण; लघुकथा संगम, लघुकथा संकलन, मुख्य संपादक छाया सक्सेना, आईएसबीएन प्रथम संस्करण २०१९, २१.५ सेमी x १३ सेमी, आवरण बहुरंगी पेपरबैक, पृष्ठ १९२, मूल्य ३००/-, साहित्य संगम प्रकाशन इंदौर , संपादक संपर्क: १२ फेज १, माँ नर्मदे नगर, बिलहरी, जबलपुर]
*
लघुकथा वर्तमान साहित्य की मुख्य धारा में स्वतंत्र विधा के रूप में स्थापित हो गयी है। देखा जा रहा है कि गृहणियों में इस विधा की लोकप्रियता निरंतर वृद्धि पर है। संभवत: इसका कारण लघुकथा लेखन में लगने वाला कम समय और क्षणिक अनुभूति का कलेवर होना है। अन्य गद्य विधाओं कहानी, उपन्यास, निबंध, लेख आदि को तैयार करने में जितना मनन-चिंतन, और लेखन में समय लगता है वह सहज साध्य नहीं हो पाने पर लघुकथा ही एकमात्र विकल्प रह जाता है। पद्य विधाओं में छंद, ले, बिम्ब, प्रतीक, शब्द चयन की जो कठिनाई होती है, लघुकथा उससे भी निजात दिला देती है। कारण जो भी हो, लघुकथाकरों के गुल-गोत्र की वृद्धि होना शुभ संकेत और हर्ष का कारक है। विवेच्य लघुकथा संकलन ऐसे सारस्वत अनुष्ठान का परिणाम है जो नवोदितों को निखारने का लक्ष्य लेकर किया गया है।    

चार खण्डों में विभक्र इस कृति के प्रथम खंड में लघुकथा के सशक्त हस्ताक्षर शीर्षक से आचार्य संजीव 'सलिल', डॉ. जमुना कृष्ण राज, डॉ. सुरेश तन्मय, डॉ. अनिल शूर, मुकेश शर्मा, राजेश कुमारी, कांता रॉय तथा रजनी रंजना का परिचय व् एक-एक लघुकथा संकलित कर कृति की गरिमा वृद्धि की सफल चेष्टा की गयी है। द्वितीय खंड लघुकथा के रचनाकार में २७ लघुकथाकारों ऊषा सेठी, मेहा मिश्रा, अर्चना राय, डॉ. मीना भट्ट, सुशीला सिंह, शकुंतला अग्रवाल, कंचन पांडेय, राजेश पुरोहित, डॉ. आनंद किशोर, छाया सक्सेना 'प्रभु', मधु मिश्रा, दीपा संजय 'दीप', मनीषा जोबन देसाई, सुचि संदीप, डॉ. राजलक्ष्मी शिवहरे, रवि रश्मि अनुभूति, शिव कुमारी शिवहरे, सौम्या मिश्रा, भावना शिवहरे, रानी सोनी चंदा, इंदु शर्मा शची, अनीता मंदिलवार, प्रतिभा गर्ग, सुनीता विश्लोनिया, राजीव प्रखर, पूनम शर्मा, शावर भकत तथा राहत बरेलवी का सचित्र परिचय व लघुकथाएँ हैं। 

खंड ३ कहानी संस्मरण के अंतर्गत मनोरमा पाखी, कुमुद श्रीवास्तव, किशन लाल अग्रवाल, राजवीर सिंह 'मंत्र', कविराज तरुण सक्षम तथा आशीष पांडेय 'जिद्दी' हैं। भाग ४ लघुकथा मेरी नज़र में के अंतर्गत अर्चना राय, मनोरमा पाखी, सुचि संदीप शुचिता व प्रतिभा गर्ग 'प्रीति' ने लघुकथा विधा के संबंध में अपनी बात कही है। 

अनुष्ठान निस्संदेह उपयोगी है किन्तु उस ऊँचाई को स्पर्श नहीं कर सका जहाँ यह संदर्भ ग्रंथ की तरह उपयोगी होता। खाद ४ में ऐसे हस्ताक्षर होते जो वर्तमान लघुकथा लेखन में शीर्ष पर है और विधा के तकनीकी पक्ष के जानकर हैं तो यह खंड अन्य लघुकथाकारों के लिए उपयोगी हो जाता। विधागत मानकों पर नवोदित चर्चा करें तो प्रोत्साहन की दृष्टि से भले ही उचित प्रतीत हो पर प्रामाणिकता की दृष्टि से उपयोगिता संदिग्ध रहती है। मनोरमा जी ने लघुकथा के जो १५ तत्व बताये हैं उन पर इस संकलन की अधिकांश लघुकथाएं खरी नहीं उतरतीं। अर्चना राय लघुकथा के ५ तत्व बताती हैं। सुचि दीप शुचिता के अनुसार लघुकथा को शब्दों की संख्या में नहीं बाँधा जा सकता किन्तु प्रतिभा गर्ग प्रीती के अनुसार लघुकथा में ३०० शब्दों से अधिक नहीं होना चाहिए। संपादक जी इन बिंदुओं पर मौन हैं।  ऐसी स्थिति में नए लघुकथाकार मार्दर्शन पा सकेंगे या भ्रमित होंगे, विचारणीय है।  बेहतर होता कि जिन्हें सशक्त हस्ताक्षर कहा गया है उनसे इन बिंदुओं पर मार्गदर्शन लिया गया होता। 

सामूहिक लघुकथा संकलन का प्रकाशन श्रम-समय और धन तीनों की माँग करता है। संभवत: आर्थिक अंशदान के आधार पर पृष्ठ संख्या व रचनाएँ रखी गई हैं। मुख्य संपादक जी का श्रम सराहनीय है। सात सदस्यीय लम्बा संपादक मंडल अपने दायित्व से विमुख रहा प्रतीत होता है, चूँकि पाठ्य अशुद्धियाँ दूर नहीं की जा सकी हैं। आवरण तथा मुद्रण सुरुचिपूर्ण है। ऐसे संकलन में अन्य चित्र उसे विरूपित करते हैं। पृष्ठों पर कुछ स्थान रिक्त हो तो उसे भरने की चेष्टा आकर्षण घटाती है। खालीपन का भी सौंदर्य होता है। अस्तु साहित्य संगम संस्थान का यह प्रयास प्रशंसनीय है, आगामी संकलन अधिक उपयोगी होगा। 
***
- अर्थशास्त्र विभाग, शासकीय मानकुंवर बाई महाविद्यालय, नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१।  
     

मौसम अंगार है- अविनाश ब्यौहार

मौसम अंगार है,  नवगीत संग्रह
*
नवगीत सामयिक विसंगतियों और विद्रूपताओं की खबर लेते हुए आम आदमी की पीड़ा और उसके संघर्ष व संकल्प को अपनी विषय वस्तु बनाता है।
नवगीत की शक्ति को पहचानते हुए अविनाश ब्यौहार ने अपने आस-पास घटते अघट को कभी समेटा है, कभी बिखेर कर दर्द को भी हँसना सिखाया है। अविनाश ब्यौहार के नवगीत रुदाली मात्र नहीं, सोहर भी हैं। इन नवगीतों में अंधानुकरण नहीं, अपनी राह आप बनाने की कसक है। युगीन विसंगतियों को शब्द का आवरण पहनाकर नवगीत मरती हुई नदी में सदी को धूसरित होते देखता है।
मृतप्राय पड़ी हुई / रेत की नदी
धूसरित होती / इक्कीसवीं सदी
पंछी कास कलरव / अहेरी का जाल
सूरज ने ताना / धूप का तिरपाल

यहाँ विसंगति में विसंगति यह कि तिरपाल सिर के ऊपर ताना जाता है, जबकि धूप सूरज के नीचे होती है।

अविनाश के गीत गगन विहारी ही नहीं, धरती के लाल भी हैं। वे गोबर से लिपे आँगन में उजालों के छौनों को लाते हैं।
उजियारे के / छौने लाए / पर्व दिवाली
आँगन लिपे / हुए हैं / गोबर से
पुरसा करे / दिवाली / पोखर से
खुलते में हैं / गौएँ बैठे / करें जुगाली

इन नवगीतों को नवाशा से घुटन नहीं होती। वे दिन तो दिन, रात के लिए भी सूरज उगाना चाहते हैं-
रात्रि के लिए / एक नया सा / सूर्य उगायें
जो अँधियारा / धो डालेगा
उजला किरनें / बो डालेगा
दुर्गम राहों / की भी कटी / सभी बाधाएँ

कविता का आनंद तब ही है, जब कवि का कहने का तरीका किसी और से सादृश्य न रखता हो। इसीलिए ग़ालिब के बारे में कहा जाता है 'कहते हैं  कि ग़ालिब का है अंदाज़े-बयां और'। इन नवगीतों की कहन बोलचाल के साधारण शब्दों में असाधारण अर्थ भर देती है।
मौसम अंगार है / सुआ कुतरे आम
कुत्ते सा हाँफ रहे / हैं आठों याम
रातों का / सुरमा है / आँजती हवाएँ

अविनाश कल्पना के कपोल कल्पना न होने देकर उसे यथार्थ जोड़े रखते हैं-
सुख दुख / दूर खड़े
सब कुछ / मोबाइल है
कब किस पर / क्या गाज गिरी है
बहरों से आवाज / गिरी है

अविनाश के लिए शब्द अर्थ की अभिव्यक्ति की साधन मात्र है, वह किसी भी भाषा-नदिया बोली का हो। वे पचेली, बुंदेली, उर्दू, अंग्रेजी के शब्दों को हिंदी के शब्दों की तरह बिना किसी भेदभाव के वापरते हैं। मोबाइल, फर्टाइल, फाइल, नेचर, फ्लर्ट, पैट्रोलिंग, रोलिंग जैसे अंग्रेज़ी शब्द, एहतियात, फ़ितरत, बदहवास, दहशत, महसूल जैसे उर्दू लफ्ज, लबरी,  घिनौची, बिरवा, अमुआ, लुनाई  जैसे देशज शब्द गले मिलकर इन नवगीतों में चार चाँद लगाते हैं पर  पाठ्य-त्रुटियाँ केसर की खीर में कंकर की तरह है। बिंदी और चंद्र बिंदी का अंतर न समझा जाए तो रंग में भंग हो जाता है।

नवगीत का वैशिष्ट्य लाक्षणिकता है। इन नवगीतों में बिंब, प्रतीक अनूठे और मौलिक हैं। कम से कम शब्दों में अधिक से अधिक कह सकने का माद्दा नवगीतकार को असीम संभावनाओं का पथ दिखाता है।
***
संजीव
१६-२-२०१९

शनिवार, 16 फ़रवरी 2019

कृति परिचय: 
"मौसम अंगार है" अणु गीतों की बहार है 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' 
*
[कृति परिचय: मौसम अंगार है, काव्य संग्रह, अविनाश ब्योहार, प्रथम संस्करण, आईएसबीएन   ९७८-९३-८८२५६-४१-४, २० सेमी x १७.५ सेमी, आवरण बहुरंगी, पेपरबैक, पृष्ठ ९३, मूल्य १६०/-, काव्य पब्लिकेशन.कॉम, रचनाकार संपर्क रॉयल एस्टेट कॉलोनी, माढ़ोताल, जबलपुर] 
*

समन्वय: अभियान : विश्व वाणी हिंदी संस्थान जबलपुर


संस्था परिचय
समन्वय: अभियान : विश्व वाणी हिंदी संस्थान जबलपुर
* स्थापना २० अगस्त १९७४। प्रथम गोष्ठी अध्यक्ष ब्योहार राजेंद्र सिंह, मुख्य अतिथि रामेश्वर शुक्ल अंचल। नवलेखन गोष्ठियों में भारतीय संस्कृति व् राष्ट्रीय भावधारा के संवर्धन हेतु गद्य-पद्य लेखन। 
२५ जून १९७५ से २१ मार्च १९७७ तक आपात काल के दौरान सदस्यों ने लोकतांत्रिक चेतना जगाने के लिए निरंतर गोष्ठियाँ कीं।  सर्व श्री दादा धर्माधिकारी, द्वारका प्रसाद मिश्र, सत्येंद्र मिश्र, रामेश्वर प्रसाद गुरु, गणेश प्रसाद नायक, ब्योहार राजेंद्र सिंह, कालिका प्रसाद दीक्षित 'कुसुमाकर, वल्लभ दास जैन, बद्रीनाथ गुप्ता आदि के मार्गदर्शन व् आशीष मिला। 
* डॉ. रामजी सिंह भागलपुर के मार्गदर्शन में लोकनायक व्याख्यान माला (गांधी जयंती २ अक्टूबर से जयप्रकाश जयंती ८ अक्टूबर) का वार्षिक आयोजन शहीद स्मारक में किया। इस रचनात्मक आंदोलन को नई दिशा मिली डॉ. रामजी सिंह भागलपुर, श्रीमती इंदुमती केलकर तथा यदुनाथ थत्ते से।  आपातकाल के समापन के बाद हुए आम चुनाव  सदस्यों ने सर्व दलीय प्रत्याशी श्री शरद यादव की विजय पश्चात्  अपनी भूमिका साहित्य सृजन तक सीमित कर ली। 
* १९८० से १९९६  सामाजिक त्रैमासिक पत्रिका चित्राशीष का प्रकाशन किया गया।
* १५-९-१९८१ से अभियान जबलपुर के अन्तर्गत साहित्यिक-सामाजिक गतिविधियों तथा समन्वय प्रकाशन के अंतर्गत को प्रकाशन  संबंधी गतिविधियाँ संचालित की जाने लगीं। 
* अभियंता दिवस १९८३ पर सामूहिक काव्य संकलन 'निर्माण के नूपुर' तथा १९८५ में 'नींव के पत्थर' का प्रकाशन किया गया। 
* १९८६ से १९९० तक पत्रिका यांत्रिकी समय का प्रकाशन श्री कुलदेव मिश्रा के साथ मिलकर किया गया। नवलेखन गोष्ठियों के माध्यम से सदस्यों के लेखन को परिमार्जित करने के प्रयास चलते रहे। 
* वर्ष १९९६ से १९९८ तक पत्रिका इंजीनियर्स टाइम्स का प्रकाशन किया गया। वर्ष २००० में समन्वय अभियान की प्रतिष्ठापरक प्रस्तुति तिनका-तिनका नीड़ को व्यापक सराहना मिली। 
* वर्ष २००२ से २००८ तक नर्मदा साहित्यिक पत्रिका का प्रकाशन किया गया।
* दिव्य नर्मदा अलंकरण: वर्ष १९९७ से २००७ तक प्रतिवर्ष राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी साहित्य की विविध विधाओं  की कृतियाँ आमंत्रित कर श्रेष्ठ लेखन को प्रोत्साहित करने के लिए महान सहत्यकारों के नाम पर अलंकरण दिए गए। ये कार्यकरण जबलपुर, मंडला, नैनपुर,लखनऊ, श्रीनाथ द्वारा कोट्टायम केरल तथा खंडवा में आयोजित किये गए। सर्व श्री पद्मभूषण आचार्य विष्णुकांत शास्त्री राज्यपाल उ.प्र., पद्म श्री के. पी. सक्सेना, पद्म श्री डॉ. एम्. सी. राय,  शायरी आज़म कृष्णबिहारी नूर, स्वामी रामचंद्र शास्त्री, महामंडलेश्वर श्यामानन्द जी, श्री नाथद्वारा मंदिर के मुखिया नरहर ठाकर जी, केदारनाथ साहनी राज्यपाल गोवा, नरेंद्र कोहली साहित्यकार दिल्ली, शिव कुमार श्रीवास्तव कुलपति सागर वि.वि., जगदीश प्रसाद शुक्ल कुलपति जबलपुर वि.वि., न्यायमूर्ति अजित कब्बिन कर्णाटक उच्च न्यायालय, ॐ प्रकाश पुलिस महानिरीक्षक कर्नाटक, अनेक सांसदों, विधायकों आदि ने इन समारोहों की गरिमा वृद्धि की। देश के कोने-कोने से श्रेष्ठ साहित्यकारों के समादृत कर संस्था धन्य हुई। कृतियों के मूल्यांकन व् निर्णयन में आचार्य कृष्णकान्त शास्त्री, ज्ञान रंजन जी, प्रो. जवाहरलाल चौरसिया 'तरुण', हरिकृष्ण त्रिपाठी, डॉ. सत्य नारायण सिंह, स्व. के. बी. सक्सेना, डॉ. सुरेश कुमार वर्मा, राज कुमार तिवारी सुमित्र, मोहन शशि, साज जबलपुरी, ओंकार श्रीवास्तव, प्रो. दिनेश खरे, डॉ. गार्गीशरण मिश्र 'मराल', वीणा तिवारी, आचार्य भगवत दुबे, आशा वर्मा, आशा रिछारिया, डॉ. साधना वर्मा, छाया त्रिवेदी साधना उपाध्याय, अनामिका तिवारी, आशा जड़े, उषा नावलेकर आदि का बहुमूल्य सहयोग प्राप्त हुआ।     
* पुस्तक मेला: १ से १० जनवरी २००० तक नगर में प्रथम पुस्तक मेले का आयोजन समय प्रकाशन दिल्ली के सहयोग से कराया गया जिसका उद्घाटन महापौर विश्वनाथ दुबे ने किया, मुख्य अतिथि विधान सभा उपाध्यक्ष  ईश्वर दास रोहाणी  थे। 
* २९-९-२००१ से ५-१०-२००१ तक नगर में पहली बार ग्रामीण तकनीकी विकास व्यापार मेला कृषि उपज मंडी में आयोजित किया गया। 
* वास्तु विद्या सम्मेलन: १२-१४ जनवरी २००२ को मानस भवन में वास्तु विद्या सम्मेलन का आयोजन वास्तु विज्ञान संस्थान के साथ किया गया। इस अवसर पर प्रकाशित स्मारिका का विमोचन श्री सुदर्शन सरसंघ चालक, भाई महावीर राज्यपाल म.प्र. व महापौर विश्वनाथ दुबे के कर कमलों से हुआ। 
* इस मध्य समन्वय प्रकाशन से नगर प्रदेश व् अन्य प्रदेशों के रचनाकारों की लग भाग ५० पुस्तकों का न्यूनतम लागत मूल्य पर प्रकाशन कराया जाता रहा। 
* छंद शिक्षण: वर्ष १९९४ से अंतरजाल पर ब्लॉग, तथा वेब साइट्स पर छंद शिक्षण का कार्य आरंभ किया गया। हिन्द युग्म, रचनाकार,साहित्य शिल्पी, ईकविता, मुखपोथी (फेस बुक), ओबीओ आदि अनेक जाल स्थलों पर निरंतर हिंदी व्याकरण, छंद, गद्य-पद्य की विविध विधाओं और तकनीकी लेखन को गति दी जा रही है। 
* वर्ष २०१७ से विश्ववाणी हिंदी संस्थान का गठन कर देश-विदेश में छंद लेखन व् शिक्षण को प्रत्साहित करने के लिए ईकाईयां प्रारंभ की जा रही हैं।   
* छंद सृजन: जबलपुर में साहित्य संगान संस्थान दिल्ली के सहयोग से सर्व आदरणीय बसंत शर्मा, मिथलेश बड़गैंया, छाया सक्सेना, मीना भट्ट, राजलक्ष्मी शिवहरे, जय प्रकाश श्रीवास्तव, इंद्र बहादुर श्रीवास्तव, सुरेश कुशवाहा तन्मय, शोभित वर्मा,  अविनाश ब्योहार आदि नित नए छंद सीख रहे हैं। 
* छंद कोष: हिंदी में छंद कोष के अभाव को देखते हुए, ध्वनि विज्ञानं और गणित के आधार पर छंद-वर्गीकरण  और नव छंद सृजन की ओर कार्य कर लगभग ३०० नए मात्रिक छंद और ६० सवैयों की रचना कर ली गई है। 
* अभिव्यक्ति विश्वम लखनऊ के साथ संस्था निरंतर सहयोग कर रही है। संजीव सलिल रचित नवगीत संग्रह 'काल है संक्रांति का' को ११,००० रु. नगद पुरस्कार प्राप्त हुआ है। इस वर्ष नर्मदांचल के ३ नवगीतकारों के संकलनों का लखनऊ में विमोचन हुआ है। अविनाश ब्योहार ने नवगीत संकलन 'मौसम अंगार है' के साथ प्रवेश कर लिया है। बसंत शर्मा का नवगीत संग्रह 'बुधिया लेता टोह' मुद्रणाधीन है। ग्वालियर की ७५ वर्षीय कवयित्री संतोष शुक्ल जी हमारे लिए प्रेरणा स्रोत हैं जिन्होंने गत  कुछ माहों में दोहा लेखन में खुद को स्थापित किया है और शीघ्र ही उनकी प्रथम काव्य कृति प्रकाशित हो रही है। दोहा शतक मंजूषा के माध्यम से ४५ दोहाकारों के ४५०० दोहे तथा अन्य लगभग १५०० दोहे मिलकर कुल ६००० दोहे हिंदी के भंडार में जुड़े हैं। अब तक किसी भी छंद पर हुआ यह महत्तम प्रयास है। वातायन उमरिया, नव लेखन कटनी तथा संगम करौंदी अदि संस्थाओं के साथ मिलकर साहित्यिक अनुष्ठानों को गति दी जा रही है। 
* जबलपुर में मासिक बैठकों में प्रचार-प्रसार पर रचनात्मक शिक्षण को वरीयता देने का परिणाम हम सब के लेखन में उन्नति के रूप में सामने आ रहा है। 
* शांति-राज पुस्तकालय योजना: कॉन्वेंट विद्यालयों तथा पुस्तकालय विहीन शासकीय विद्यालयों को इस योजनान्तर्गत २०,००० रु. मूल्य की पुस्तकें निशुल्क प्रदान की जाती हैं। एकमात्र शर्त यह है कि पुस्तकें विद्यार्थियों को पढ़ने के लिए सुलभ कराई जाएँ। २०१८ में वैदिक इंटरनेशनल स्कूल भीलवाड़ा राजस्थान को पुस्तकें भेजी गयीं। इस वर्ष शहडोल के ग्रामीण पुस्तकालय को पुस्तकें भेंट की जा रही हैं।  
* साहित्य संगम संस्थान दिल्ली के सहयोग से शीघ्र ही राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी भाषा, व्याकरण व् पिंगल शिक्षण की दिशा में नए कार्यक्रमों का आरंभ अरुण श्रीवास्तव 'अर्णव', राजवीर सिंह आदि साथियों से विमर्श कर किया जाएगा। 
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सृजन पर्व २०२९

सृजन पर्व २०२९

२.००   - सरस्वती पूजन -  अतिथि गण
२.०५ - सरस्वती वंदना -  अर्चना गोस्वामी
२.१० - हिंदी आरती -  हरिसहाय पांडे
२.१५ - अतिथि परिचय - मिथलेश बड़गैंया
अध्यक्ष - आचार्य कृष्णकांत चतुर्वेदी - संजीव वर्मा 'सलिल'
मुख्य अतिथि- श्री राजेंद्र तिवारी, महाधिवक्ता, अरुण श्रीवास्तव ‘अर्णव’
विशिष्ट वक्ता: डॉ. सुरेश कुमार वर्मा - बसंत शर्मा
डॉ. इला घोष - छाया सक्सेना
समीक्षक:
डॉ. अरुण मिश्र - इंद्र बहादुर श्रीवास्तव
डॉ. स्मृति शुक्ल -
डॉ. नीना उपाध्याय - मिथलेश बड़गैंया
                  डॉ. उषा कैली -

२.२५ - संस्था परिचय
विश्ववाणी हिंदी संस्थान अभियान, जबलपुर संजीव वर्मा 'सलिल'
साहित्य संगम संस्थान दिल्ली  - अरुण श्रीवास्तव ‘अर्णव’

२.४० लोकार्पण /कृति चर्चा / कृतिकार सम्मान
२.४५ सड़क पर-             - संजीव वर्मा 'सलिल' - बसंत कुमार शर्मा
२.५० मौसम अंगार है       - अविनाश ब्योहार - संजीव वर्मा 'सलिल' 
२.५५          Second thought - डॉ. अनिल जैन   - शोभित वर्मा
३.०० दोहा दोहा नर्मदा       - डॉ स्मृति शुक्ल - छाया सक्सेना
३.०५          दोहा सलिला निर्मला  - अरुण मिश्र -
३.१० दोहा दिव्य दिनेश      - नीना उपाध्याय -
३.१५ लघुकथा संगम -        - जयप्रकाश श्रीवास्तव
३.२० - ४. ०० सम्बोधन -
आचार्य कृष्णकांत चतुर्वेदी - संजीव वर्मा सलिल
श्री राजेंद्र तिवारी, महाधिवक्ता - अरुण श्रीवास्तव ‘अर्णव’
डॉ. सुरेश कुमार वर्मा - बसंत शर्मा
डॉ. इला घोष - छाया सक्सेना
४.०० - ४.१५ स्वल्पाहार
४.१५ काव्यपाठ प्रत्येक सहभागी ३ मिनट
५.४५ सम्मान - दोहा / लघुकथा संकलन सहभागी
६.०० आभार प्रदर्शन - अविनाश ब्यौहार
कवियों की सूची

  1. आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
  2. राजेंद्र तिवारी
  3. विजय बागरी
  4. जयप्रकाश श्रीवास्तव
  5. बसंत कुमार शर्मा
  6. मिथलेश बड़गैयाँ
  7. छाया सक्सेना
  8. अखिलेश खरे
  9. राजकुमार महोबिया
  10. शोभित वर्मा
  11. अविनाश ब्यौहार
  12. इंद्र बहादुर श्रीवास्तव
  13. हरिसहाय पांडेय
  14. विवेकरंजन श्रीवास्तव
  15. मनोज कुमार शुक्ल
  16. डॉ. अरुण श्रीवास्तव ‘अर्णव’
  17. डॉ. राजलक्ष्मी शिवहरे
  18. डॉ. मीना भट्ट जी
  19. आशीष पांडेय जिद्दी
  20. छाया सक्सेना ' प्रभु '
  21. मंजूषा मोहन
  22. अतुल द्विवेदी
  23. हरि प्रसाद गुप्ता
  24. अनन्त राम चौबे
  25. भावना शिवहरे
  26. अर्चना राय
  27. मंजूषा मोहन
  28. सुश्री अनुराधा
  29. सुनील अवधिया 'मुक्तानिल'
  30. राजकुमारी मिश्रा