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शुक्रवार, 13 दिसंबर 2019

गीत

गीत:
मन से मन के तार जोड़ती.....
संजीव 'सलिल'
*
*
मन से मन के तार जोड़ती कविता की पहुनाई का.
जिसने अवसर पाया वंदन उसकी चिर तरुणाई का.....
*
जहाँ न पहुँचे रवि पहुँचे वह, तम् को पिए उजास बने.
अक्षर-अक्षर, शब्द-शब्द को जोड़, सरस मधुमास बने..
बने ज्येष्ठ फागुन में देवर, अधर-कमल का हास बने.
कभी नवोढ़ा की लज्जा हो, प्रिय की कभी हुलास बने..
होरी, गारी, चैती, सोहर, आल्हा, पंथी, राई का
मन से मन के तार जोड़ती कविता की पहुनाई का.
जिसने अवसर पाया वंदन उसकी चिर तरुणाई का.....
*
सुख में दुःख की, दुःख में सुख की झलक दिखाकर कहती है.
सलिला बारिश शीत ग्रीष्म में कभी न रूकती, बहती है.
पछुआ-पुरवैया होनी-अनहोनी गुपचुप सहती है.
सिकता ठिठुरे नहीं शीत में, नहीं धूप में दहती है.
हेर रहा है क्यों पथ मानव, हर घटना मन भाई का?
मन से मन के तार जोड़ती कविता की पहुनाई का.
जिसने अवसर पाया वंदन उसकी चिर तरुणाई का.....
*
हर शंका को हरकर शंकर, पियें हलाहल अमर हुए.
विष-अणु पचा विष्णु जीते, जब-जब असुरों से समर हुए.
विधि की निधि है प्रविधि, नाश से निर्माणों की डगर छुए.
चाह रहे क्यों अमृत पाना, कभी न मरना मनुज मुए?
करें मौत का अब अभिनन्दन, सँग जन्म के आई का.
मन से मन के तार जोड़ती कविता की पहुनाई का.
जिसने अवसर पाया वंदन उसकी चिर तरुणाई का.....
**********************
१२-१२-२०१३

सामयिक दोहा गीत

सामयिक दोहा गीत
*
अहंकार की हार
*
समय कह रहा: 'आँक ले
तू अपनी औकात।
मत औरों की फ़िक्र कर,
भुला न बोली बात।।
जीत नम्रता की हुई,
अहंकार की हार...
*
जनता ने प्रतिनिधि चुने,
दूर करें जन-कष्ट।
मुक्त कराओ किसी से,
नहीं घोषणा शिष्ट।।
बड़बोले का सिर झुका,
सही नियति का न्याय।
रोजी छन गरीब की,
हो न सेठ-पर्याय।।
शाह समझ मत कर कभी,
जन-हित पर आघात।
समय कह रहा आँक ले
तू अपनी औकात।।
लौटी आकर लक्ष्मी
देख बंद है द्वार,
जीत नम्रता की हुई,
अहंकार की हार...
*
जोड़-तोड़कर मत बना,
जहाँ-तहाँ सरकार।
छुटभैये गुंडइ करें,
बिना बात हुंकार।।
सेठ-हितों की नीतियाँ,
अफसर हुए दबंग।
श्रमिक-कृषक क्रंदन करें,
आम आदमी तंग।
दाम बढ़ा पेट्रोल के,
खुद लिख ली निज मात।
समय कह रहा आँक ले
तू अपनी औकात।।
किया गैर पर; पलटकर
खुद ही झेला वार,
जीत नम्रता की हुई,
अहंकार की हार...
*
लघु उद्योगों का हुआ,
दिन-दिन बंटाढार।
भूमि किसानों की छिनी,
युवा फिरें बेकार।
दलित कहा हनुमंत को,
कैसे खुश हों राम?
गरज प्रवक्ता कर रहे,
खुद ही जनमत वाम।
दोष अन्य के गिनाकर,
अपने मिटें न तात।
समय कह रहा आँक ले
तू अपनी औकात।।
औरों खातिर बोए थे,
खुद को चुभते खार,
जीत नम्रता की हुई,
अहंकार की हार...
***
१२.१२.२०१८
(३ राज्यों में भाजपा की हार पर)

नवगीत

नवगीत:
लेटा हूँ
मखमल गादी पर
लेकिन
नींद नहीं आती है
.
इस करवट में पड़े दिखाई
कमसिन बर्तनवाली बाई
देह सांवरी नयन कटीले
अभी न हो पाई कुड़माई
मलते-मलते बर्तन
खनके चूड़ी
जाने क्या गाती है
मुझ जैसे
लक्ष्मी पुत्र को
बना भिखारी वह जाती है
.
उस करवट ने साफ़-सफाई
करनेवाली छवि दिखलाई
आहा! उलझी लट नागिन सी
नर्तित कटि ने नींद उड़ाई
कर ने झाड़ू जरा उठाई
धक-धक धड़कन
बढ़ जाती है
मुझ अफसर को
भुला अफसरी
अपना दास बना जाती है
.
चित सोया क्यों नींद उड़ाई?
ओ पाकीज़ा! तू क्यों आई?
राधे-राधे रास रचाने
प्रवचन में लीला करवाई
करदे अर्पित
सब कुछ
गुरु को
जो
वह शिष्या
मन भाती है
.
हुआ परेशां नींद गँवाई
जहँ बैठूं तहँ थी मुस्काई
मलिन भिखारिन, युवा, किशोरी
कवयित्री, नेत्री तरुणाई
संसद में
चलभाष देखकर
आत्मा तृप्त न हो पाती है
मुझ नेता को
भुला सियासत
गले लगाना सिखलाती है
.

सामयिक नवगीत

सामयिक नवगीत 
खाट खड़ी है
*
बड़े-बड़ों की खाट खड़ी है
मोल बढ़ गया है छोटों का.
हल्ला-गुल्ला,शोर-शराबा
है बिन पेंदी के लोटों का.
*
नकली नोट छपे थे जितने
पल भर में बेकार हो गए.
आम आदमी को डँसने से
पहले विषधर क्षार हो गए.
ऐसी हवा चली है यारो!
उतर गया है मुँह खोटों का
बड़े-बड़ों की खाट खड़ी है
मोल बढ़ गया है छोटों का.
*
नाग कालिया काले धन का
बिन मरे बेमौत मर गया.
जल, बहा, फेंका घबराकर
जान-धन खाता कहीं भर गया.
करचोरो! हर दिन होना है
वार धर-पकड़ के सोटों का
बड़े-बड़ों की खाट खड़ी है
मोल बढ़ गया है छोटों का.
*
बिना परिश्रम जोड़ लिया धन
रिश्वत और कमीशन खाकर
सेठों के हित साधे मिलकर
निज चुनाव हित चंदे पाकर
अब हर राज उजागर होगा
नेता-अफसर की ओटों का
बड़े-बड़ों की खाट खड़ी है
मोल बढ़ गया है छोटों का.
*
१३-१२-२०१६

मुक्तिका

मुक्तिका
*
मैं समय हूँ, सत्य बोलूँगा.
जो छिपा है राज खोलूँगा.
*
अनतुले अब तक रहे हैं जो
बिना हिचके उन्हें तोलूँगा.
*
कालिया है नाग काला धन
नाच फन पर नहीं डोलूँगा.
*
रूपए नकली हैं गरल उसको
मिटा, अमृत आज घोलूँगा
*
कमीशनखोरी न बच पाए
मिटाकर मैं हाथ धो लूँगा
*
क्यों अकेली रहे सच्चाई?
सत्य के मैं साथ हो लूँगा
*
ध्वजा भारत की उठाये मैं
हिन्द की जय 'सलिल' बोलूँगा
***

नवगीत

नवगीत 
कोई बताए?
*
उगा सूरज कहाँ से
कोई बताए?
*
खबर है
सच बोलता है एक नेता।
मिला है अफसर
नहीं जो घूस लेता।
आधुनिक महिला
मिली दीपक जलाए।
उगा सूरज कहाँ से
कोई बताए?
*
एक ठेकेदार
पूरा काम करता।
एक जज जो
न्याय देने में न डरता।
दिखा विज्ञापन
न जो मिथ्या दिखाए।
उगा सूरज कहाँ से
कोई बताए?
*
परीक्षा जिसमें
नकल किंचित न होती।
नदी कोई जो
न गंदी; सूख रोती।
एक अधिवक्ता
न जो पेशी बढ़ाए।
उगा सूरज कहाँ से
कोई बताए?
*
एक नारी जो
न नर को दोष देती।
देश-उन्नति
साथ जिसके बढ़े खेती।
पुजारी जो
भोग प्रभु का खुद न खाए।
उगा सूरज कहाँ से
कोई बताए?
*
संजीव
१३-१२-२०१८

व्यंग्य लेख:: माया महाठगिनी हम जानी

व्यंग्य लेख::
माया महाठगिनी हम जानी
संजीव
*
तथाकथित लोकतंत्र का राजनैतिक महापर्व संपन्न हुआ। सत्य नारायण कथा में जिस तरह सत्यनारायण को छोड़कर सब कुछ मिलता है, उसी तरह लोकतंत्र में लोक को छोड़कर सब कुछ प्राप्य है। यहाँ पल-पल 'लोक' का मान-मर्दन करने में निष्णात 'तंत्र की तूती बोलती है। कहा जाता है कि यह 'लोक का, लोक के द्वारा, लोक के लिए' है लेकिन लोक का प्रतिनिधि 'लोक' नहीं 'दल' का बंधुआ मजदूर होता है। लोकतंत्र के मूल 'लोक मत' को गरीब की लुगाई, गाँव की भौजाई मुहावरे की तरह जब-तब अपहृत और रेपित करना हर दल अपना जन्म सिद्ध अधिकार मानता है। ये दल राजनैतिक ही नहीं धार्मिक, आर्थिक, सामाजिक भी हो सकते हैं। जो दल जितना अधिक दलदल मचने में माहिर होता है, उसे खबरिया जगत में उतनी ही अधिक जगह मिलती है।

हाँ, तो खबरिया जगत के अनुसार 'लोक' ने 'सेवक' चुन लिए हैं। 'लोक' ने न तो 'रिक्त स्थान की विज्ञप्ति प्रसारित की, न चीन्ह-चीन्ह कर विज्ञापन दिए, न करोड़ों रूपए आवेदन पत्रों के साथ बटोरे, न परीक्षा के प्रश्न-पत्र लीक कर वारे-न्यारे किए, न साक्षात्कार में चयन के नाम पर कोमलांगियों के साथ शयन कक्ष को गुलजार किया, न किसी का चयन किया, न किसी को ख़ारिज किया और 'सेवक' चुन लिए। अब ये तथाकथित लोकसेवक-देशसेवक 'लोक' और 'देश' की छाती पर दाल दलते हुए, ऐश-आराम, सत्तारोहण, कमीशन, घपलों, घोटालों की पंचवर्षीय पटकथाएँ लिखेंगे। उनको राह दिखाएँगे खरबूजे को देखकर खरबूजे की तरह रंग बदलने में माहिर प्रशासनिक सेवा के धुरंधर, उनकी रक्षा करेंगा देश का 'सर्वाधिक सुसंगठित खाकी वर्दीधारी गुंडातंत्र (बकौल सर्वोच्च न्यायालय), उनका गुणगान करेगा तवायफ की तरह चंद टकों और सुविधाओं के बदले अस्मत का सौदा करनेवाला खबरॉय संसार और इस सबके बाद भी कोई जेपी या अन्ना सामने आ गया तो उसके आंदोलन को गैर कानूनी बताने में न चूकनेवाला काले कोटधारी बाहुबलियों का समूह।
'लोकतंत्र' को 'लोभतंत्र' में परिवर्तित करने की चिरकालिक प्रक्रिया में चारों स्तंभों में घनघोर स्पर्धा होती रहती है। इस स्पर्धा के प्रति समर्पण और निष्ठां इतनी है की यदि इसे ओलंपिक में सम्मिलित कर लिया जाए तो स्वर्णपदक तो क्या तीनों पदकों में एक भी हमारे सिवा किसी अन्य को मिल ही नहीं सकता। दुनिया के बड़े से बड़े देश के बजट से कहीं अधिक राशि तो हमारे देश में इस अघोषित व्यवसाय में लगी हुई है। लोकतंत्र के चार खंबे ही नहीं हमारे देश के सर्वस्व तीजी साधु-संत भी इस व्यवसाय को भगवदपूजन से अह्दिक महत्व देते हैं। तभी तो घंटो से पंक्तिबद्ध खड़े भक्त खड़े ही रह जाते हैं और पुजारी की अंटी गरम करनेवाले चाट मंगनी और पैट ब्याह से भाई अधिक तेजी से दर्शन कर बाहर पहुँच जाते हैं।
लोकतंत्र में असीम संभावनाएं होती है। इसे 'कोकतंत्र' में भी सहजता से बदला जाता रहा है। टिकिट लेने, काम करने, परीक्षा उत्तीर्ण करने, शोधोपाधि पाने, नियुक्ति पाने, चुनावी टिकिट लेने, मंत्री पद पाने, न्याय पाने या कर्ज लेने में कैसी भी अनियमितता या बाधा हो, बिस्तर गरम करते ही दूर हो जाती है। और तो और नवग्रहों की बाधा, देवताओं का कोप और किस्मत की मार भी पंडित, मुल्ला या पादरी के शयनागार को आबाद कर दूर की जा सकती है। जिस तरह आप के बदले कोई और जाप कर दे तो आपके संकट दूर हो जाते हैं, वैसे ही आप किसी और को भी इस गंगा में डुबकी लगाने भेज सकते हैं। देव लोक में तो एक ही इंद्र है पर इस नर लोक में जितने भी 'काम' करनेवाले हैं वे सब 'काम' करने के बदले 'काम' होने के पहले 'काम की आराधना कर भवसागर पार उतरने का कोी मौका नहीं गँवाते।धर्म हो या दर्शन दोनों में कामिनी के बिना काम नहीं बनता।
हमारी विरासत है कि पहले 'काम' को भस्म कर दो फिर विवाह कर 'काम' के उपासक बन जाओ या 'पहले काम' को साध लो फिर संत कहलाओं। कोई-कोई पुरुषोत्तम आश्रम और मजारों की छाया में माया से ममता करने का पुरुषार्थ करते हुए भी 'रमता जोगी, बहता पानी' की तरह संग रहते हुए भी निस्संग और दागित होते हुए भी बेदाग़ रहा आता है। एक कलिकाल समानता का युग है। यहाँ नर से नारी किसी भी प्रकार पीछे रहना नहीं चाहती। सर्वोच्च न्यायालय और कुछ करे न करे, ७० साल में राम मंदिर पर निर्णय न दे सके किन्तु 'लिव इन' और 'विवाहेतर संबंधों' पर फ़ौरन से पेश्तर फैसलाकुन होने में अतिदक्ष है।
'लोक' भी 'तंत्र' बिना रह नहीं सकता। 'काम' को कामख्या से जोड़े या काम सूत्र से, 'तंत्र' को व्यवस्था से जोड़े या 'मंत्र' से, कमल उठाए या पंजा दिखाए, कही एक को रोकने के लिए, कही दूसरे को साधने के लिए 'माया' की शरण लेना ही होती है, लाख निर्मोही बनने का दवा करो, सत्ता की चौखट पर 'ममता' के दामन की आवश्यकता पड़ ही जाती है। 'लोभ' के रास्ते 'लोक' को 'तंत्र' के राह पर धकेलना हो या 'तंत्र' के द्वारा 'लोक' को रौंदना हो ममता और माया न तो साथ छोड़ती हैं, न कोई उनसे पीछा छुड़ाना चाहता है। अति संभ्रांत, संपन्न और भद्र लोक जानता है कि उसका बस अपनों को अपने तक रोकने पर न चले तो वह औरों के अपनों को अपने तक पहुँचने की राह बनाने से क्यों चूके? हवन करते हाथ जले तो खुद को दोषी न मानकर सूर हो या कबीर कहते रहे हैं 'माया महाठगिनी हम जानी।'
***
संपर्क: विश्व वाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, salil.sanjiv@gmail.com ।

गुरुवार, 12 दिसंबर 2019

सरस्वती स्तवन - आदर्शिनी

आदर्शिनी श्रीवास्तव 
















जन्म - २६ जून १९६४, गोंडा उत्तर प्रदेश। 
आत्मजा - श्रीमती सिद्धेश्वरी - डॉ. कृष्ण प्रसाद श्रीवास्तव। 
जीवन साथी- श्री अभय कुमार श्रीवास्तव। 
शिक्षा - स्नाकोत्तर हिंदी साहित्य।  
प्रकाशन - कवितायेँ तपस्विनी, गीत नाद और झंकार, पत्र-पत्रिकाओं में। 
संपर्क - १/८१ श्रद्धापुरी, फेज-१, कंकरखेड़ा, मेरठ २५०००१ उत्तर प्रदेश।
चलभाष - ९४१०८८७७९४, ८७५५९६७५६७ । ईमेल - srivastava.adarshini@gmail.com    
*
मोबाइल- 9410887794सरस्वती वंदना १ 
वागेश्वरी पर नत नयन शिर पुष्प और संदल दिया
नैवेद्य भी अर्पित किया और भावना का जल दिया
ना भूलवश या दम्भ से हो आपकी अवहेलना
हो भक्तिपूरित प्राण मन जबतक रहे ये चेतना
हूँ दण्डवत सौंपी है जो निधि सूझ की और बुद्धि की
माँ प्रेरणा से आपकी इसमे है भरसक वृद्धि की
मै गीत लिख दूँ छंद लिख दूँ ताल पर संगत करूँ
आभार है माँ शारदे जो आपने संबल दिया
सुखदायिनी, भुवनेश्वरी उज्ज्वल वसन मे शोभती
कोमल-हृदय हेमांगिनी वसु आपकी जय बोलती
आकर हमारी इस सभा में वन्दना स्वीकारिये
हम है प्रतीक्षारत यहाँ वरदान देकर तारिये
हम गीत गाते ही रहे माँ आपकी स्तुति गान के
माँ आपकी आराधना और प्रार्थना पर बल दिया
सरस्वती वंदना १
शारदे घर मे हमारे आइये शुभ स्वागतम्
कंठ में कवि की उतर कर गाइये शुभ स्वागतम्
भाव, लय, शब्दों की मन मे धार जबसे है बही
सच कहूँ माँ इस हृदय में ध्यान मे हैं आपही
बस इसी तरह मनस पर छाइये शुभ स्वागतम्
आपने जो भी दिया माँ शारदे अभिभूत हूँ
धैर्य, संयम, गुण क्षमा का पाके ही मजबूत हूँ
दे के आशीर्वाद सबको तारिए शुभ स्वागतम्
*
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डॉ. ब्रह्मजीत गौतम

डॉ. ब्रह्मजीत गौतम














आत्मज - स्व. गोपिका - स्व. रोशनलाल गौतम।
जीवन संगिनी - स्व. विरमादेवी गौतम।
जन्म - २८ अक्टूबर १९४०, गढ़ी नन्दू, जिला – मथुरा (उ.प्र.)।
शिक्षा - एम. ए., पी-एच. डी.।
संप्रति - से.नि. प्राध्यापक हिंदी  उच्च शिक्षा विभाग  म.प्र. शासन, स्वतंत्र लेखन।
प्रकाशन - १. कबीर-काव्य में प्रतीक-विधान (शोध ग्रंथ), २. कबीर-प्रतीक-कोश (कोश ग्रंथ), ३. अंजुरी (काव्य-संग्रह) पुरस्कृत, ४ जनक छन्दः एक शोधपरक विवेचन (शोध पुस्तक) पुरस्कृत, ५. वक़्त के मंज़र (ग़ज़ल-संग्रह), ६. जनक छन्द की साधना (जनक छन्द संग्रह), ७. दोहा-मुक्तक-माल (मुक्तक-संग्रह), ८. दृष्टिकोण (समीक्षा- संग्रह), ९. एक बह्र पर एक ग़ज़ल (ग़ज़ल-संग्रह) पुरस्कृत, १०. दोहे पानीदार (दोहा-संग्रह), रेडिओ नाटक वार्ता, झलकी आदि।
उपलब्धि - अनेक साहित्यिक सम्मान।
सम्पर्क - युक्का २०६, पैरामाउण्ट सिम्फनी, क्रॉसिंग रिपब्लिक, ग़ाज़ियाबाद २०१०१६ उ. प्र.।
चलभाष ०९७६०००७८३८, ०९४२५१०२१५४०, ई-मेल bjgautam2007@gmail.com ।
*
जय माँ देवि सरस्वती! नत है मेरा भाल
अर्पित है तेरे लिए, यह पूजा का थाल
तूने ही मुझको दिए, यह बहु भाव प्रसून
जिन्हें पिरोकर शुचि बनी, दोहा मुक्तक माल

हे माँ देवि सरस्वती! दे ऐसा वरदान
सबको सुख यश तृप्ति दे, मेरा काव्य-स्नान
अक्षर-अक्षर पूत हो, शब्द-शब्द हो स्निग्ध
हो मेरे कवी-कर्म से राष्ट्र-धर्म-उत्थान

नहीं चाहिए विभव बल, नहीं कीर्ति अवदान
दान-पुण्य कर मुक्ति का, नहीं तनिक भी ध्यान
मेरे रचनाकर्म को, दे माँ ऐसी शक्ति
सर्व धर्म समभाव का, गूँजे मंगल गान

वर दे वीणावादिनी! कुछ ऐसा अनुकूल
मेरी कविता से झरें, राष्ट्रवाद के फूल
ऊँच-नीच अलगाव के, दूर सभी हों भाव
बच्चा-बच्चा देश-हित, बन जाए शार्दूल

हे माता ममतामयी! तेरी कृपा अतर्क
तू चाहे तो मूढ़ में, उगे ज्ञान का अर्क
अंश मात्र तेरी कृपा, मिले मुझे हे देवि!
मेरे खारे बोल भी, हो जाएँ मधुपर्क

अंब पद्म की गंध दे, वीणा की झंकार
अपने श्वेत दुकूल की, दे दे मंद बयार
तेरे उज्ज्वल हार की, मिल जाए यदि कांति
माँ मेरी कविता बने, रसिकों का श्रृंगार
*
==========================

सरस्वती स्तवन वीरेंद्र आस्तिक

सरस्वती स्तवन
वीरेंद्र आस्तिक











जन्म - १५ जुलाई १९४७, रूरवाहार, कानपूर, उत्तर प्रदेश।
आत्मज - स्व. रामकुमारी - स्व. घनश्याम सिंह सेंगर, स्वतंत्रता सत्याग्रही।
शिक्षा - एम.ए. हिंदी।
संप्रति - स्वतंत्र लेखन।
प्रकाशन - गीत-ग़ज़ल परछाईं के पाँव, गीत संग्रह - आनंद तेरी हार है, तारीखों के हस्ताक्षर, आकाश तो जीने नाहने देता, दिन क्या बुरे थे, गीत अपने ही सुनें।
संपादन - समीक्षा धार पर हम १-२, कई पत्रिकाएँ।
उपलब्धि -  धरर पर हम एम.ए. उत्तरार्ध बड़ोदा विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में।
संपर्क - एल ६० गंगा विहार, कानपूर २०८०१०।
चलभाष - ९४१५४७४७५५, ईमेल vsastik@gmail.com ।
*
मातु कृपा कर दे
अँधियारा घिरने से पहले
दृग दीया कर दे

देखा तेज सभी में तेरा
सबके वंदन में हिय मेरा
मेरे ह्रदय-चक्षु में अपनी
दुनिया माँ कर दे

ज्ञान-तुला सा यदि मैं पाता
नाप-तौलकर शब्द लुटाता
खाली कोष पड़ा शब्दों का
भर रत्नाकर कर दे

सात सुरों का ज्ञाता होकर
कंठ न गा पाया मीठा स्वर
मातु! आठवाँ स्वर अधरों पर
करुणा का धार दे    

सोमवार, 9 दिसंबर 2019

समीक्षा दोहे पानीदार

कृति चर्चा :
दोहे पानीदार
चर्चाकार - आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’
*
[कृति विवरण: दोहे पानीदार, दोहा संकलन, डॉ. ब्रह्मजीत गौतम, प्रथम संस्करण २०१९, आईएसबीएन ९७८-९३-८८९४६-८०-३, आकार २२.से.मी. x १३.५ से.मी., आवरण बहुरंगी पेपरबैक, पृष्ठ २००, मूल्य १५० रु., बेस्ट बुक बडीज टेक्नोलॉजीस, नई दिल्ली, दोहाकार संपर्क - युक्का २०६, पैरामाउण्ट सिम्फनी, क्रॉसिंग रिपब्लिक, ग़ाज़ियाबाद २०१०१६ उ. प्र., चलभाष - ०९७६०००७८३८, ०९४२५१०२१५४०, ई-मेल bjgautam2007@gmail.com ।]
*
भारत में किसी कार्य का श्री गणेश ईश वंदना से करने की परंपरा है। वरिष्ठ दोहाकार डॉ. ब्रह्मजीत गौतम ने एक नयी रीति का आरंभ ‘ध्यातव्य बातें’ शीर्षक के अंतर्गत दोहा-लेखन के दोषों की चर्चा से किया है। कबीर काव्य में प्रतीक विधान पर शोध और कबीर प्रतीक कोष की रचना करनेवाला दोषों को चुन-चुन कर चोट करने की कबीरी राह पर चले यह स्वाभाविक है। गौतम जी बहुआयामी रचनाकार हैं। शोधपरक कृति जनक छंद - एक विवेचन, काव्य संग्रह अंजुरी, ग़ज़ल संग्रह वक़्त के मंजर व एक बह्र पर एक ग़ज़ल, जनक छंद संग्रह जनक छंद की साधना, मुक्तक संग्रह दोहा मुक्तक माल तथा समीक्षा संग्रह दृष्टिकोण के रचनाकार सेवानिवृत्त हिंदी प्राध्यापक डॉ. गौतम ने दोहराव, अस्पष्टता तथा पूर्वापर संबंध को दोहा लेखन का कथ्यदोष तथा अनूठापन, धार और संदेशपरकता को दोहा लेखन का गुण ठीक ही बताया है। ‘शिल्प’ उपशीर्षक के अंतर्गत मात्रा गणना, अधिक मात्रा दोष, न्यून मात्रा दोष, ग्यारहवीं मात्रा लघु न होना, वाक्य भंजक दोष, लय दोष, मात्रा विभाजन दोष, तुक विधान दोष, अनुस्वार दोष, अवांछित व्यंजनागम की चर्चा है। भाषा रूप उपशीर्षक के अंतर्गत पुनरक्ति दोष, एक शब्द दो उच्चारण, शब्दों के मध्य अनावश्यक दूरी, पर का प्रयोग, अवैध संधि, लिंग, वचन, पुरुष, काल, अमानक शब्द-प्रयोग आदि पर विमर्श है तथा अंत में दोहा के २३ प्रकारों की निरर्थकता का संकेत है। डॉ. गौतम ने छंदप्रभाकरकार जगन्नाथ प्रसाद ‘भानु’ द्वारा उल्लिखित नियमों का संदर्भ दिया है किन्तु पदारंभ में दग्धाक्षर व् जगण निषेध की चर्चा नहीं है। भाषा और नदी सतत परिवर्तित होकर निर्मल बनी रहती हैं। भानु जी ने ग्यारहवीं मात्रा को लघु रखे जाने का संकेत किया है किन्तु उनके पूर्व और पश्चात् के अनेक दोहाकारों (जिनमें कबीर, खुसरो, जायसी, तुलसी, बिहारी जैसे अमर दोहाकार भी हैं) ने इस नियम को अनुल्लंघनीय न मानकर दोहे रचे हैं।

अब वंदना के प्रथम दोहे से गौतम जी ने परंपरा-पालन किया है। दोहा मुक्तक छंद है। वह पूर्व या पश्चात् के दोहों से पूरी तरह मुक्त, अपने आप में पूर्ण होता है। आजकल एक विषय पर दोहों को एकत्र कर अध्यायों में विभक्त करने का चलन होने पर भी गौतम जी ने ५२० दोहे क्रमानुसार प्रकाशित कर लीक को ठीक ही तोडा है। सामान्य रचनाकार ‘स्वांत: सुखाय’ लिखता है जबकि गौतम जी जैसा रचनाकार इसके समानांतर श्रोता और पाठक में सत्साहित्य की समझ भी विकसित करते हैं। गौतम जी कबीर की तरह भाषा को शाब्दिक संस्कृतनिष्ठता का कुआँ न बनाकर कथ्यानुकूल विविध भाषाओँ से शब्द चयन कर ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ के वैदिक आदर्श को मूर्त करते हैं। यह आदर्श धार्मिक समानता और समरसता की जननी है -

अल्ला या ईसा कहो, या फिर कह लो राम।
करता ‘वही’ सहायता, जब पड़ता है काम।।

गौतम जी ‘तत्तु समन्वयात’ के बौद्ध सूत्र को जीवन में अनिवार्य मानते हैं-

आत्मिक-भौतिक उन्नयन, दोनों हैं अनिवार्य।
यदि इनमें हो संतुलन, जीवन हो कृतकार्य।।

दोहों में लोकोक्तियों का प्रयोग करने की परंपरा गौतम जी को भाती है। लोकोक्ति दोहे को मुहावरेदार और लोक ग्राह्य बनाती है। ‘आप भले तो जग भला’ लोकोक्ति का सार्थक प्रयोग देखिए -

आप भले तो जग भला, कहें पुराने लोग।
जिसने समझा सूत्र यह, खुद पर करे प्रयोग।।

हिंदी व्याकरण के अनुसार ‘एक’ के स्थान पर ‘इक’ का प्रयोग गलत है किंतु गौतम जी ने ‘इक’ का प्रयोग किया है। भाषिक शुद्धता के पक्षधर विद्वान दोहाकार के लिए इससे बचना कठिन नहीं है पर संभवत: उर्दू ग़ज़ल से जुड़ाव के कारण उन्हें इसमें आपत्ति नहीं हुई।

इक तो आलस दूसरे, बात-बात में क्रोध।
कैसे ठहरे अनुज में, फिर विवेक या बोध।।

इक विरहानल दूसरे, सूरज का आतंक।
दो-दो ज्वालाएँ सहे, कैसे मुखी मयंक।।

महानगरीय स्वार्थपरक जीवन दृष्टि प्रकृति को भोग्य मानकर उसका शोषण कर विनाश को आमंत्रित कर रही है। दोहाकार उस जीवन पद्धति को अपनाने का गृह करता है जो प्रकृति के अनुकूल हो-

इस सीमा तक हो सहज, अपने जीवन-ढंग।
हो जाए जो प्रकृति से, एक रूप-रस-रंग।।

‘कर्म’ को महत्त्व देना भारतीय जन-जीवन का वैशिष्ट्य है. गीता ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते” कहती है तो तुलसी ‘कर्म प्रधान बिस्व करि राखा’ कहकर कर्म की महत्ता प्रतिपादित करते हैं। गौतम जी कर्मव्रती खद्योत को प्रणाम कर कर्म-पथ का महत्ता प्रतिपादित करते हैं-

उस नन्हें खद्योत को, बारंबार प्रणाम।
जो करता है रात में, तम का काम तमाम।।

कबीर ‘गुरु’ और ‘गोबिंद’ में से गुरु को पहले प्रणाम करते हैं चूँकि ‘गुरु’ ही ‘गोबिंद’ से मिलवाता है। कबीर के अनुयायी गौतम जी गुरु को कृपानिधान कहकर प्रणाम करते हैं-

उस सद्गुरु को है नमन, जो है कृपा-निधान।
ज्ञान-ज्योति से शिष्य का, जो हरता अज्ञान।।

शिक्षा जगत से जुड़े गौतम जी को भाषा की उपेक्षा और गलत प्रयोग व्यथित करे, यह स्वाभाविक है. वे स्वतंत्र देश में विदेशी सम्प्रभुओं की भाषा के बढ़ते वर्चस्व को देखकर हिंदी के प्रति चिंतित हैं-

ए बी सी आये नहीं, पर अंग्रेजी बोल।
हिंदी की है देश में, नैया डाँवाडोल।।

अमिधा के साथ-साथ लक्षणा और व्यंजना का प्रयोग जगह-जगह बखूबी किया गया है है इस दोहा संग्रह में।

ओ पानी के बुलबुले!, करता क्यों अभिमान?
हवा चली हो जाएगा, पल में अंतर्ध्यान।।

नश्वर ज़िंदगी को ओस बूँद बताते इस दोहे में पापजनित ताप को नाशक ठीक ही बताया गया है-

ओस-बूँद सी ज़िंदगी, इसे सहेजें आप।
ताप लगा यदि पाप का, बन जाएगी भाप।।

‘बनने’ के लिए प्रयत्न करना होता है। नष्ट होने के लिए कोई प्रयत्न नहीं करता। दोहाकार आप ही प्रथम पंक्ति में ज़िंदगी को सहेजने का संदेश देता है। ‘होना’ बिना प्रयास के होता है। ‘बन’ के स्थान पर ‘हो’ का प्रयोग अधिक स्वाभाविक होगा।

कब से यह मन रट रहा, सतत एक ही नाम।
कब यह मंज़िल पायगा, तू जाने या राम।।

यहाँ प्रयोग किया गया ‘पायगा’ शब्दकोशीय ‘पायेगा’ का अपभृंश है। इससे बच जाना उचित होता।

इस संग्रह का स्मरणीय दोहा शिव-निवासस्थली काशी और कबीर की इहलीला संवरणस्थली मगहर के मध्य सेतु स्थापित करने के साथ-साथ गौतम जी के दोहाकार की सामर्थ्य का भी परिचायक है -

कर दे मुझ पर भी कृपा, कुछ तो कृपा-निकेत।
तू काशी का देवता, मैं मगहर का प्रेत।।

‘आस्तीन में साँप’ मुहावरे का उपयोग कर गौतम जी ने एक और जानदार दोहा रचा है -

करते हैं अब साँप सब, आस्तीन में वास।
बांबी से बढ़कर उन्हें, यहाँ सुरक्षा ख़ास।।

काव्य रचना केवल मनोविलास या वाग्विलास नहीं है। यह सामान्यत: प्रसांगिक रहकर शांति और विशेष परिस्थितियों में क्रांति की वाहक होकर परिवर्तन लाती है -

कविता का उद्देश्य है, स्वांत: सुख औ’ शांति।
लेकिन वही समाज में, ला देती है क्रांति।।

कविता में यदि है नहीं, जन जीवन की पीर।
समझो सागर में भरा, केवल खारा नीर।।

सामाजिक विसंगतियों पर गौतम जी के दोहा-प्रहार सटीक हैं-

काम करना हो अगर, रखिये पेपरवेट।
जितना भारी काम हो, उतना भारी रेट।।

कुर्सी जिसको मिल गयी, हो जाता सर्वज्ञ।
कक्षा में जी उम्र भर, रहा भले हो अज्ञ।।

कोई चारा खा रहा, कोई खाता खाद।
नेताओं के स्वाद की, देनी होगी दाद।।

चाहे दिल्ली में रहो, या कि देहरादून।
पाओगे सर्वत्र ही, अंध-बधिर कानून।।

चिड़ियाँ चहकें किस तरह, किसे दिखाएँ नाज़।
मँडराते हैं जब निडर, नीड़-नीड़ पर बाज।।

जंगल काटे स्वार्थवश, बनकर वीर प्रचंड
पर्यावरण विनाश का, धरा भोगती दंड।।

जो भू पर न बना सके, एक प्रेम का सेतु।
जा पहुँचे वे चाँद पर, शहर बसाने हेतु।।

इन दोहों में अलंकारों (अनुप्रास, पुनरुक्ति प्रकाश, यमक, श्लेष, उपमा, रूपक, वक्रोक्ति, विरोधाभास, असंगति, अतिशयोक्ति आदि) के प्रचुर प्रयोग हैं-

पति पंचानन पुत्र हैं, गजमुख षड्मुख नाम।
देवि अन्नपूर्णा करें, उदर-पूर्ति अविराम।। -वक्रोक्ति

पत्ता हिले न ग्रीष्म में, हवा जेल में बंद।
कर्फ्यू में ज्यों गूँजते, सन्नाटों के छंद।। - अतिशयोक्ति

पीते हैं घी-दूध नित, पत्थर के भगवान्।
शिल्पकार उसके मगर, तजें भूख से प्राण।।

सारत: दोहे पानीदार के दोहे नवोदितों के लिए पाठ्य पुस्तक, स्थापितों के लिए प्रेरणा तथा सिद्धहस्तों के लिए संतोषकारक हैं। गौतम जी जैसे वरिष्ठ दोहाकार अपने मानक आप ही निर्धारित करते हैं -

भाषा-भाव समृद्ध हों, हो सुंदर अभिव्यक्ति।
कविता रस निष्पत्ति की, तब पाती है शक्ति।।

पाठक बेकली से गौतम जी के इस दोहा संग्रह कर काव्यानंद की जयकार करते हुए अगले दोहा संग्रह की प्रतीक्षा करेंगे।
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संपर्क - आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’, विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, चलभाष - ९४२५१८३२४४, ईमेल - salil.sanjiv@gmail.com

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द्विपदी - दोहा


द्विपदी दुनिया 
शिखर पर रहो सूर्य जैसे सदा तुम
हटा दो तिमिर, रौशनी दो जरा तुम
*
खुशी हो या गम देन है उस पिता की
जिसे चाहते हम, जिसे पूजते तुम
*

जितने भी दाना हैं, स्वार्थ घिरे बैठे हैं 
नादां ही बेहतर जो, अहं से न ऐंठे हैं.
*

दोहा सलिला  


लोकतंत्र का हो रहा, भरी दुपहरी खून.
सद्भावों का निगलते, नेता भर्ता भून.
*


मन में का? के से कहें? सुन हँस लैहें लोग.
मन की मन में ही धरी, नदी-नाव संजोग.
*


पौधों, पत्तों, फूल को, निगल गया इंसान
मैं तितली निज पीर का, कैसे करूँ बखान?
*

करें वंदना शब्द की ले अक्षर के हार 
सलिल-नाद सम छंद हो, जैसे मंत्रोच्चार
*

सबखों कुरसी चाइए, बिन कुरसी जग सून.
राजनीति खा रई रे, आदर्सन खें भून.
*