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शनिवार, 19 अगस्त 2017

geet

गीत:
मंजिल मिलने तक चल अविचल.....
संजीव 'सलिल'
*
लिखें गीत हम नित्य न भूलें, है कोई लिखवानेवाला.
कौन मौन रह मुखर हो रहा?, वह मन्वन्तर और वही पल.....























*
दुविधाओं से दूर रही है, प्रणय कथा कलियों-गंधों की.
भँवरों की गुन-गुन पर हँसतीं, प्रतिबंधों की व्यथा-कथाएँ.
सत्य-तथ्य से नहीं कथ्य ने तनिक निभाया रिश्ता-नाता
पुजे सत्य नारायण लेकिन, सत्भाषी सीता वन जाएँ.
धोबी ने ही निर्मलता को लांछित किया, पंक को पाला
तब भी, अब भी सच-साँचे में असच न जाने क्यों पाया ढल.....
*
रीत-नीत को बिना प्रीत के, निभते देख हुआ उन्मन जो
वही गीत मनमीत-जीतकर, हार गया ज्यों साँझ हो ढली.
रजनी के आँसू समेटकर, तुहिन-कणों की भेंट उषा को-
दे मुस्का श्रम करे दिवस भर, संध्या हँसती पुलक मनचली.
मेघदूत के पूत पूछते, मोबाइल क्यों नहीं कर दिया?
यक्ष-यक्षिणी बैकवर्ड थे, चैट न क्यों करते थे पल-पल?.....
*
कविता-गीत पराये लगते, पोयम-राइम जिनको भाते.
ब्रेक डांस के उन दीवानों को अनजानी लचक नृत्य की.
सिक्कों की खन-खन में खोये, नहीं मंजीरे सुने-बजाये
वे क्या जानें कल से कल तक चले श्रंखला आज-कृत्य की.
मानक अगर अमानक हैं तो, चालक अगर कुचालक हैं तो
मति-गति, देश-दिशा को साधे, मंजिल मिलने तक चल अविचल.....
*******
salil.sanjiv@gmail.com
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geet

गीत :                                                                      
मैं अकेली लड़ रही थी
- संजीव 'सलिल'



*
मैं अकेली लड़ रही थी 
पर न तुम पहचान पाये.....
*
सामने सागर मिला तो, थम गये थे पग तुम्हारे.
सिया को खोकर कहो सच, हुए थे कितने बिचारे?
जो मिला सब खो दिया, जब रजक का आरोप माना-
डूब सरयू में गये, क्यों रुक न पाये पग किनारे?
छूट मर्यादा गयी कब
क्यों नहीं अनुमान पाये???.....
*
समय को तुमने सदा, निज प्रशंसा ही सुनाई है.
जान यह पाये नहीं कि, हुई जग में हँसाई है..
सामने तव द्रुपदसुत थे, किन्तु पीछे थे धनञ्जय.
विधिनियंता थे-न थे पर, राह तुमने दिखायी है..
जानते थे सच न क्यों
सच का कभी कर गान पाये???.....
*
हथेली पर जान लेकर, क्रांति जो नित रहे करते.
विदेशी आक्रान्ता को मारकर जो रहे मरते..
नींव उनकी थी, इमारत तुमने अपनी है बनायी-
हाय! होकर बागबां खेती रहे खुद आप चरते..
श्रम-समर्पण का न प्रण क्यों
देश के हित ठान पाये.....
*
'आम' के प्रतिनिधि बने पर, 'खास' की खातिर जिए हो.
चीन्ह् कर बाँटी हमेशा, रेवड़ी- पद-मद पिए हो..
सत्य कर नीलाम सत्ता वरी, धन आराध्य माना.
झूठ हर पल बोलते हो, सच की खातिर लब सिये हो..
बन मियाँ मिट्ठू प्रशंसा के
स्वयं ही गान गाये......
*
मैं तुम्हारी अस्मिता हूँ, आस्था-निष्ठा अजय हूँ.
आत्मा हूँ अमर-अक्षय, सृजन संधारण प्रलय हूँ.
पवन धरती अग्नि नभ हूँ, 'सलिल' हूँ संचेतना मैं-
द्वैत मैं, अद्वैत मैं, परमात्म में होती विलय हूँ..
कर सके साक्षात् मुझसे
तीर कब संधान पाए?.....
*
मैं अकेली लड़ रही थी
पर न तुम पहचान पाये.....
*

****
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muktak

मुक्तक:
*
जागे बहुत चलो अब सोएँ
किसका कितना रोना रोएँ?
पाए जोड़े की क्या चिंता?
खुद को पाएँ, पाया खोएँ
*
अभी न जाता,अभी न रोएँ
नाहक नैना नहीं भिगोएँ
अधरों पर मुस्कान सजाकर
स्वप्न देखी जब भी सोएँ
*
जिसने सपने में देखा, उसने ही पाया
जिसने पाया, स्वप्न मानकर तुरत भुलाया
भुला रहा जो, याद उसी को फिर-फिर आया
आया बाँहों-चाहों में जो वह मन भाया
*
पल-पल नया जन्म होता है, क्षण-क्षण करे मृत्यु आलिंगन
सीधी रेखा में पग रखकर, बढ़े सदा यह सलिल अकिंचन
दें आशीष 'फेस' जब भी यम, 'बुक' में दर्ज करें हो उज्जवल
'सलिल' सींच कुछ पौधे कर दे, तनिक सुवासित कविता उपवन
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muktika

मुक्तिका
कजलियाँ
*
जोड़ती हैं मन को मन से कजलियाँ
मिटाती हैं अपरिचय को कजलियाँ
*
सुनातीं हैं हौसलों के गीत भी
मुश्किलों को जीत जातीं कजलियाँ
*
उदासी हावी न होने दो कभी
कहें बम्बुलियाँ सुनातीं कजलियाँ
*
तृषित धरती की मिटे जब प्यास तो
अंकुरित हो मुस्कुराती कजलियाँ
*
कान में खोंसे बड़े आशीष दे
विरासत को हँस जिलातीं कजलियाँ
*
धरा को रखना हरा सन्देश दे
सेतु रिश्तों का बनातीं कजलियाँ
*
'सलिल' माटी में मिले हो अंकुरित
बीज को उगना सिखातीं कजलियाँ
*
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शुक्रवार, 18 अगस्त 2017

osho

ओशो का अंतिम प्रवचन : 
"सम्मासति"
१०  अप्रैल १९८९ 
बुद्धा सभागार
ओशो आश्रम, पुणे
भारत।
अपने अंतिम प्रवचन में भगवान् श्री ने कहा-
"परम्परावादी झेन का मार्ग रहित मार्ग बहुत कठिन या दुरूह है। २०-३० वर्षों तक, घर परिवार छोड़कर मठ में गुरु के सानिध्य में निरंतर ध्यान करते रहना और सभी स्थानों से अपनी उर्जा हटाकर केवल ध्यान में लगाना बहुत मुश्किल है। यह परम्परा गौतम बुद्ध से प्रारम्भ हुई जो बारह वर्ष तक निरंतर कठोर तप करते रहे और एक दिन सब छोडकर परम विश्राम में लेट गये और घटना घट गई। पर आज के युग में न तो किसी के पास इतना धैर्य और समय है और न सुविधा।
मैं इस परम्परा को पूर्णतया बदल रहा हूं। इसी परम्परा के कारण झेन चीन से समाप्त हुआ और अब वह जापान से समाप्त हो रहा है। इसका प्रारम्भ गौतम बुद्ध द्वारा महाकाश्यप को कमल का फूल देने से हुआ था जब उन्होंने मौन की संपदा का महाकाश्यप को हस्तांतरण किया था। बुद्ध के ५०० वर्षों बाद तक यह परम्परा भारत में रही। फिर भारत में इस सम्पदा के लेवनहार न होने से बोधिधर्म इसे चीन ले गया। भारत से चीन, चीन से जापान और अब इस परम्परा को अपने नूतन स्वरुप में मैं फिर जापान से भारत ले आया हूं।
जापान के झेन सदगुरु पत्र लिखकर मुझे बताते हैं कि जापान में बढ़ती वैज्ञानिक प्रगति और टेक्नोलोजी से झेन जापान से मिट रहा है और वह झेन मठों में मेरी प्रवचन पुस्तकों से शिष्यों को शिक्षा दे रहें हैं। यही स्थिति भारत में भी है।
यह परम्परा तभी जीवित रह सकती है जब यह सरल, सहज और विश्राम पूर्ण हो। यह उबाऊ न होकर उत्सवपूर्ण हो। यह वर्षों की साधना न होकर समझ विकसित होते ही कम समय ले।
जब उर्जा अंदर जाती है तो वही उर्जा विचारों, भावों और अनुभवों में रूपांतरित हो जाती है। जब वही उर्जा बाहर गतिशील होती है तो वह व्यक्तियों से, वस्तुओं से या प्रकृति से संबंध जोड़ती है। अब एक तीसरी स्थिति भी है कि उर्जा न अंदर जाये और न बाहर, वह नाड़ियों में धड़कती हुई अस्तित्व से एकाकार हो जाये।
पूरे समाज का यही मानना है कि उर्जा खोपड़ी में गतिशील है, पर झेन कहता है कि खोपड़ी से निकल कर अपने हारा केंद्र पर पहुंचो। वह तुम्हारा ही नहीं पूरे अस्तित्व का केंद्र है। वहां पहुंचकर अंदर और बाहर का आकाश एक हो जाता है, जहां तुम स्वतंत्रता से मुक्ताकाश में पंखों को थिर किये चील की भांति उड़ते हो। झेन का अर्थ है- इसी केंद्र पर थिर होकर पहुंचना। यह प्रयास से नहीं, यह होता है परम विश्रामपूर्ण स्थिति में।
सबसे पहले शांत बैठकर अपने अंदर सरक जाओ। अपनी खोपड़ी के अंदर समस्त उर्जा को भृकुटी या त्रिनेत्र पर ले आओ। गहन भाव करो कि सिर की सारी उर्जा भुकुटि पर आ गई है। थोड़ी ही देर में भृकुटी पर उर्जा के संवेदनों को महसूस करोगे।फिर गहन भाव करते हुये इस उर्जा को हृदय की ओर ले आओ। हृदय चक्र पर तुम्हें जब उर्जा के स्पंदनों का अनुभव होने लगे तो समग्रता से केंद्र की ओर गतिशील करना है। पर यह बिंदु बहुत नाज़ुक है। हृदय चक्र से उर्जा से सीधे सहस्त्रधार की ओर फिर से वापस लौट सकती है। पर गहन भाव से तुम्हें अपनी गहराई में उतरना है। अपने केंद्र तक अपनी समग्र उर्जा को लाये बिना उसे जानने का अन्य कोई उपाय नहीं।
'हू मंत्र की चोट से, सूफी नृत्य के बाद नाभि के बल लेटकर, चक्रा ब्रीदिंग, चक्रा साउंड अथवा मिस्टिक रोज़ ध्यान से जिनका हारा चक्र सक्रिय हो गया है, वह गहन भाव करते ही स्वयं समस्त उर्जा को अपनी ओर खीँच लेते हैं। मैं इसीलिये पिछले एक वर्ष से प्रवचन के बाद तुम्हें सरदार गुरुदयाल सिंह के जोक्स सुनाकर ठहाके लगाने को विवश करता हूं, जिससे तुम्हारा हारा चक्र सक्रिय हो। उसके द्वारा नो माइंड ध्यान द्वारा मैं तुम्हें निर्विचार में ले जाता रहा हूं जिससे विचारों भावों में लगी उर्जा रूपांतरित होकर नाड़ियों में गतिशील हो जाये।"
इतना कहकर भगवान् श्री कुछ देर के लिये मौन में चले गये। बोलते-बोलते उनके अचानक मौन हो जाने से, सभी संन्यासी भी प्रस्तर प्रतिमा की भांति अपनी दो श्वांसों के अन्तराल में थिर हो गये। उन्होंने ओशो से यही सीखा था कि दो शब्दों या आती जाती श्वांस के अंतराल में थिर हो जाना ही मौन में गहरे सरक जाना है, जहाँ विचार और भाव सभी विलीन हो जाते हैं। इस गहन मौन में ओशो उस अमूल्य संपदा को अपने शिष्यों को हस्तांतरित कर रहे थे जिसे शब्दों द्वारा अभिव्यक्त करने का कोई उपाय नहीं।पर यह अमूल्य सम्पदा केवल थोड़े से ही संन्यासी ही ग्रहण कर सके जो मौन की भाषा समझने लगे थे।
कुछ मिनट बाद भगवान् ने काफी देर से थिर पलकों को झपकाया। उनके हाथों की मुद्रा परवर्तित हुई। उनके होठ हिले।
उन्होंने कहा-" सम्मासति "
"स्मरण करो। तुम भी एक बुद्ध हो।"

bundeli muktika

बुन्देली मुक्तिका
*
कओ बाद में, सोचो पैले।
मन झकास रख, कपड़े मैले।।
*
रैदासों सें कर लई यारी।
रुचें नें मंदिर पंडित थैले।।
*
शीश नबा लओ, हो गओ पूजन।
तिलक चढ़ोत्री?, ठेंगा लै ले।।
*
चाहत हो पीतम सें मिलना?
उठो! समेटो, नाते फैले।।
*
जोड़ मरे, जा रए  छोड़कर
लिए मनुज तन, बे थे बैले।।
***
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shuddhgeeta chhand

छंद सलिला: पहले एक पसेरी पढ़ / फिर तोला लिख... 
पाठ १०४
नव प्रयोग: शुद्धगीता छंद
*
छंद सलिला सतत प्रवहित, मीत अवगाहन करें।
शारदा का भारती सँग, विहँस आराधन करें।।  
*
जन्म ब्याह राखी तिलक, गृह-प्रवेश त्यौहार।  
सलिल बचा पौधे लगा, दें पुस्तक उपहार
।। 
*
लक्षण:
१. ४ पंक्ति।
२. प्रति पंक्ति २७ मात्रा।
३. १४-१३ मात्राओं पर यति।
४. हर पंक्ति के अंत में गुरु-लघु मात्रा।
५. हर २ पंक्ति में सम तुकांत। 
लक्षण छंद:
शुद्धगीता छंद रचना, सत्य कहना कवि न भूल। 
सम प्रशंसा या कि निंदा, फूल दे जग या कि शूल।।
कला चौदह संग तेरह, रहें गुरु-लघु ही पदांत। 
गगनचुंबी गिरे बरगद, दूब सह तूफ़ान शांत।। 
उदाहरण:
कौन है किसका सगा कह, साथ जो देता न छोड़? 
गैर क्यों मानें उसे जो, साथ लेता बोल होड़।।
दे चुनौती, शक्ति तेरी बढ़ाता है वह सदैव। 
आलसी तू हो न पाए, गर्व की तज दे कुटैव।।
***
हिंदी आटा माढ़िये, उर्दू मोयन डाल
सलिल संस्कृत सान दे, पूड़ी बने कमाल
*
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shubhgeeta chhand

छंद सलिला: पहले एक पसेरी पढ़ / फिर तोला लिख... 
पाठ १०३ 
नव प्रयोग: शुभगीता छंद
*
छंद सलिला सतत प्रवहित, मीत अवगाहन करें।
शारदा का भारती सँग, विहँस आराधन करें।।  
*
जन्म ब्याह राखी तिलक, गृह-प्रवेश त्यौहार।  
सलिल बचा पौधे लगा, दें पुस्तक उपहार
।। 
*
लक्षण:
१. ४ पंक्ति।
२. प्रति पंक्ति २७ मात्रा।
३. १५-१२ मात्राओं पर यति।
४. हर पंक्ति के अंत में गुरु-लघु-गुरु मात्रा।
५. हर २ पंक्ति में सम तुकांत। 
लक्षण छंद:
पन्द्रह-बारह रखो मात्रा, गुरु-लघु-गुरु पदांत हो। 
शुभगीता को पढ़-समझ लो, विकल मन भी शांत हो।।
करो काम निष्काम सारे, चित न पल भर भ्रांत हो। 
उगे, तपे या ढले दिनकर, बोल कब वह क्लांत हो?
उदाहरण:
शुभ गीता में मन रमाओ, करो अर्जुन! वायदा। 
करो काम निष्काम सारे, तोड़ना मत कायदा।।
धनुष उठाओ शर चढ़ाओ, शत्रु का उर-भेद दो। 
रुको नहीं तुम गदाधारी!, दुश्मनों को खेद हो।।
***
हिंदी आटा माढ़िये, उर्दू मोयन डाल
सलिल संस्कृत सान दे, पूड़ी बने कमाल
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गीत

एक रचना:
संजीव
*
अरमानों की फसलें हर दिन ही कुदरत बोती है
कुछ करने के लिए कभी भी देर नहीं होती है
*
उठ आशीष दीजिए छोटों को महके फुलवारी
नमन ईश को करें दूर हों चिंता पल में सारी
गीत ग़ज़ल कवितायेँ पोयम मंत्र श्लोक कुछ गा लें
मन की दुनिया जब जैसी चाहें रच खूब मजा लें
धरती हर दुःख सह देती है खूब न पर रोती है
कुछ करने के लिए कभी भी देर नहीं होती है
*
देश-विदेश कहाँ कैसा क्या भला-बुरा बतलायें
हम न जहाँ जा पाये पढ़कर ही आनंद मनायें
मौसम लोग, रीतियाँ कैसी? कैसा ताना-बाना
भारत की छवि कैसी? क्या वे चाहें भारत आना?
हरे अँधेरा मौन चाँदनी, नील गगन धोती है
कुछ करने के लिए कभी भी देर नहीं होती है
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dwipadiyaan

द्विपदियाँ जन्माष्टमी पर:
संजीव 
*
हो चुका अवतार, अब हम याद करते हैं मगर 
अनुकरण करते नहीं, क्यों यह विरोधाभास है?
*
कल्पना इतनी मिला दी, सत्य ही दिखता नहीं
पंडितों ने धर्म का, हर दिन किया उपहास है
*
गढ़ दिया राधा-चरित, शत मूर्तियाँ कर दीं खड़ी
हिल गयी जड़ सत्य की, क्या तनिक भी अहसास है?
*
शत विभाजन मिटा, ताकतवर बनाया देश को
कृष्ण ने पर भक्त तोड़ें, रो रहा इतिहास है
*
रूढ़ियों से जूझ गढ़ दें कुछ प्रथाएँ स्वस्थ्य हम
देश हो मजबूत, कहते कृष्ण- 'हर जन खास है'
*
भ्रष्ट शासक आज भी हैं, करें उनका अंत मिल
सत्य जीतेगा न जन को हो सका आभास है
*
फ़र्ज़ पहले बाद में हक़, फल न अपना साध्य हो
चित्र जिसका गुप्त उसका देह यह आवास है.
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muktak

मुक्तक
ढाले- दिल को छेदकर तीरे-नज़र जब चुभ गयी,
सांस तो चलती रही पर ज़िन्दगी ही रुक गयी।
तरकशे-अरमान में शर-हौसले भी कम न थे -
मिल गयी ज्यों ही नज़र से नज़र त्यों ही झुक गयी।।
*
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