सोमवार, 16 जुलाई 2018

व्यंग्य गीत

व्यंग्य गीत:
अभिनंदन लो
*
युग-कवयित्री! अभिनंदन लो....
*
सब जग अपना, कुछ न पराया
शुभ सिद्धांत तुम्हें यह भाया.
गैर नहीं कुछ भी है जग में-
'विश्व एक' अपना सरमाया.
जहाँ मिले झट झपट वहीं से
अपने माथे यश-चंदन लो
युग-कवयित्री अभिनंदन लो....
*
मेरा-तेरा मिथ्या माया
दास कबीरा ने बतलाया.
भुला परायेपन को तुमने
गैर लिखे को कंठ बसाया.
पर उपकारी अन्य न तुमसा
जहाँ रुचे कविता कुंदन लो
युग-कवयित्री अभिनंदन लो....
*
हिमगिरी-जय सा किया यत्न है
तुम सी प्रतिभा काव्य रत्न है.
चोरी-डाका-लूट कहे जग
निशा तस्करी मुदित-मग्न है.
अग्र वाल पर रचना मेरी
तेरी हुई, महान लग्न है.
तुमने कवि को धन्य किया है
खुद का खुद कर मूल्यांकन लो
युग-कवयित्री अभिनंदन लो....
*
कवि का क्या? 'बेचैन' बहुत वह
तुमने चैन गले में धारी.
'कुँवर' पंक्ति में खड़ा रहे पर
हो न सके सत्ता अधिकारी.
करी कृपा उसकी रचना ले
नभ-वाणी पर पढ़कर धन लो
युग-कवयित्री अभिनंदन लो....
*
तुम जग-जननी, कविता तनया
जब जी चाहा कर ली मृगया.
किसकी है औकात रोक ले-
हो स्वतंत्र तुम सचमुच अभया.
दुस्साहस प्रति जग नतमस्तक
'छद्म-रत्न' हो, अलंकरण लो
युग-कवयित्री अभिनंदन लो....
*
(टीप: एक श्रेष्ठ कवि की रचना कुछ उलट-फेर के साथ २३-५-२०१८ को प्रात: ६.४० बजे काव्य धारा कार्यक्रम में आकाशवाणी पर प्रस्तुत कर धनार्जन का अद्भुत पराक्रम करने के उपलक्ष्य में यह रचना समर्पित उसे ही जो इसका सुपात्र है)

बालगीत

बाल गीत:
धानू बिटिया
*
धानू बिटिया रानी है। 
सच्ची बहुत सयानी है।।
यह हरदम मुस्काती है।
खुशियाँ खूब लुटाती है।।
है परियों की शहजादी।
तनिक न करती बर्बादी।।
आँखों में अनगिन सपने।
इसने पाले हैं अपने।।
पढ़-लिख कभी न हारेगी।
हर दुश्मन को मारेगी।।
हर बाधा कर लेगी पार।
होगी इसकी जय-जयकार।।
**

भाषा गीत

भारत का भाषा गीत 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
हिंद और हिंदी की जय-जयकार करें हम 
भारत की माटी, हिंदी से प्यार करें हम 
*
भाषा सहोदरा होती है, हर प्राणी की 
अक्षर-शब्द बसी छवि, शारद कल्याणी की 
नाद-ताल, रस-छंद, व्याकरण शुद्ध सरलतम 
जो बोले वह लिखें-पढ़ें, विधि जगवाणी की 
संस्कृत सुरवाणी अपना, गलहार करें हम 
हिंद और हिंदी की, जय-जयकार करें हम 
भारत की माटी, हिंदी से प्यार करें हम 
*
असमी, उड़िया, कश्मीरी, डोगरी, कोंकणी,
कन्नड़, तमिल, तेलुगु, गुजराती, नेपाली,
मलयालम, मणिपुरी, मैथिली, बोडो, उर्दू 
पंजाबी, बांगला, मराठी सह संथाली 
​'सलिल' पचेली, सिंधी व्यवहार करें हम 
हिंद और हिंदी की, जय-जयकार करें हम 
भारत की माटी, हिंदी से प्यार करें हम 

ब्राम्ही, प्राकृत, पाली, बृज, अपभ्रंश, बघेली,
अवधी, कैथी, गढ़वाली, गोंडी, बुन्देली, 
राजस्थानी, हल्बी, छत्तीसगढ़ी, मालवी, 
भोजपुरी, मारिया, कोरकू, मुड़िया, नहली,
परजा, गड़वा, कोलमी से सत्कार करें हम 
हिंद और हिंदी की, जय-जयकार करें हम 
भारत की माटी, हिंदी से प्यार करें हम 

शेखावाटी, डिंगल, हाड़ौती, मेवाड़ी 
कन्नौजी, मागधी, खोंड, सादरी, निमाड़ी, 
सरायकी, डिंगल, खासी, अंगिका, बज्जिका, 
जटकी, हरयाणवी, बैंसवाड़ी, मारवाड़ी,
मीज़ो, मुंडारी, गारो मनुहार करें हम 
हिन्द और हिंदी की जय-जयकार करें हम 
भारत की माटी, हिंदी से प्यार करें हम 
*
देवनागरी लिपि, स्वर-व्यंजन, अलंकार पढ़ 
शब्द-शक्तियाँ, तत्सम-तद्भव, संधि, बिंब गढ़ 
गीत, कहानी, लेख, समीक्षा, नाटक रचकर 
समय, समाज, मूल्य मानव के नए सकें मढ़ 
'सलिल' विश्व, मानव, प्रकृति-उद्धार करें हम 
हिन्द और हिंदी की जय-जयकार करें हम 
भारत की माटी, हिंदी से प्यार करें हम 
**** 
-विश्ववाणी हिंदी संस्थान, २०४ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१.
चलभाष: ९४२५१८३२४४, ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

व्यंग्य कविता: मेरी श्वास-श्वास में कविता

हास्य रचना:
मेरी श्वास-श्वास में कविता 
*
मेरी श्वास-श्वास में कविता 
छींक-खाँस दूँ तो हो गीत। 
युग क्या जाने खर्राटों में
मेरे व्याप्त मधुर संगीत।
पल-पल में कविता कर देता
पहर-पहर में लिखूँ निबंध।
मुक्तक-क्षणिका क्षण-क्षण होते
चुटकी बजती काव्य प्रबंध।
रस-लय-छंद-अलंकारों से
लेना-देना मुझे नहीं।
बिंब-प्रतीक बिना शब्दों की
नौका खेना मुझे यहीं।
धुंआधार को नाम मिला है
कविता-लेखन की गति से।
शारद भी चकराया करतीं
हैं; मेरी अद्भुत मति से।
खुद गणपति भी हार गए
कविता सुन लिख सके नहीं।
खोजे-खोजे अर्थ न पाया
पंक्ति एक बढ़ सके नहीं।
एक साल में इतनी कविता
जितने सर पर बाल नहीं।
लिखने को कागज़ इतना हो
जितनी भू पर खाल नहीं।
वाट्स एप को पूरा भर दूँ
अगर जागकर लिख दूँ रात।
गूगल का स्पेस कम पड़े,
मुखपोथी की क्या औकात?
ट्विटर, वाट्स एप, मेसेंजर
मुझे देख डर जाते हैं।
वेदव्यास भी मेरे सम्मुख
फीके से पड़ जाते हैं।
वाल्मीकि भी पानी भरते
मेरी प्रतिभा के आगे।
जगनिक और ईसुरी सम्मुख
जाऊँ तो पानी माँगे।
तुलसी सूर निराला बच्चन
से मेरी कैसी समता?
अब के कवि खद्योत सरीखा
हर मेरे सम्मुख नमता।
किस्में क्षमता है जो मेरी
प्रतिभा का गुणगान करे?
इसीलिये मैं खुद करता हूँ,
धन्य वही जो मान करे.
विन्ध्याचल से ज्यादा भारी
अभिनंदन के पत्र हुए।
स्मृति-चिन्ह अमरकंटक सम
जी से प्यारे लगें मुए।
करो न चिता जो व्यय; देकर
मान पत्र ले, करूँ कृतार्थ।
लक्ष्य एक अभिनंदित होना,
इस युग का मैं ही हूँ पार्थ।
***
१४.६.२०१८, ७९९९५५९६१८
salil.sanjiv@gmail.com

सूचना: दोहा शतक मंजूषा

- : दोहा शतक मंजूषा: -
विश्ववाणी हिंदी संस्थान जबलपुर के तत्वावधान में दोहा-लेखन तथा दोहाकारों को प्रोत्साहित तथा प्रतिष्ठित करने का उद्देश्य लेकर समकालिक वरिष्ठ तथा नवोदित दोहाकारों के दोहा-शतकों का संकलन शीघ्र ही प्रकाशित किया जा रहा है। १५-१५ दोहकारों को एक-एक भाग में सम्मिलित किया जा रहा है। भाग १ व २ का मुद्रण प्रगति पर है। भाग ३ का संपादन कार्य आधा हो चुका है। दोहा को लेकर इतना विराट अनुष्ठान पहली बार हो रहा है। ये संकलन दोहा का अजायबघर नहीं, क्यारी और उद्यान हैं।  
संकलन में सम्मिलित प्रत्येक दोहाकार के १०० दोहे, चित्र, संक्षिप्त परिचय (नाम, जन्म तिथि व स्थान, माता-पिता, जीवनसाथी व काव्य गुरु के नाम, शिक्षा, लेखन विधा, प्रकाशित कृतियाँ, उपलब्धि, पूरा पता, चलभाष, ईमेल आदि) १० पृष्ठों में प्रकाशित किए जाएँगे। हर सहभागी के दोहों पर संक्षिप्त विमर्शात्मक टीप तथा दोहा पर आलेख भी होगा। संपादन वरिष्ठ दोहाकार आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' द्वारा किया जा रहा है, संपादकीय संशोधन स्वीकार्य हों तो आप सादर आमंत्रित हैं। प्रत्येक सहभागी ३०००/- अग्रिम सहयोग राशि देना बैंक, राइट टाउन शाखा जबलपुर IFAC: BKDN ०८११११९ में संजीव वर्मा के खाता क्रमांक १११९१०००२२४७ में अथवा नकद जमा करें। संकलन प्रकाशित होने पर हर सहभागी को सहभागिता-सम्मान पत्र तथा पुस्तक की ११ प्रतियाँ निशुल्क भेंट की/भेजी जाएँगी। प्राप्त दोहों में आवश्यकतानुसार संशोधन का अधिकार संपादक को होगा। दोहे unicode में भेजने हेतु ईमेल- salil.sanjiv@gmail.com, चलभाष ७९९९५५९६१८, ९४२५१८३२४४ । भारतीय बोलियों / अहिंदी भाषाओँ के दोहे देवनागरी लिपि में आंचलिक शब्दों के अर्थ पाद टिप्पणी में देते हुए भेजें।
अब तक निम्न दोहाकारों के दोहे के दोहे यथावश्यक संशोधित / संपादित तथा सहभागिता निधि प्राप्त हो जाने पर प्रकाशनार्थ अनुमोदित किए जा चुके हैं। वर्ण क्रमानुसार नाम - सर्व श्री / सुश्री / श्रीमती १. अखिलेश खरे 'अखिल', २. अनिल कुमार मिश्र, ३. अरुण शर्मा, ४. आभा सक्सेना 'दूनवी', ५. इंद्रकुमार श्रीवास्तव, ६उदयभानु तिवारी 'मधुकर', ७. ॐ प्रकाश शुक्ल, ८. कांति शुक्ल 'उर्मि', ९. कालिपद प्रसाद, १०. डॉ. गोपालकृष्ण भट्ट 'आकुल', ११. चंद्रकांता अग्निहोत्री', १२. छगनलाल गर्ग 'विज्ञ', १३. छाया सक्सेना 'प्रभु', १४. जयप्रकाश श्रीवास्तव, १५. त्रिभुवन कौल, १६. नीता सैनी, १७. डॉ. नीलमणि दुबे, १८. प्रेमबिहारी मिश्र, १९. बसंत शर्मा, २०. मनोजकुमार शुक्ल, २१. मिथिलेश बड़गैया, २२. रामकुमार चतुर्वेदी, २३. रामलखन सिंह चौहान, २४. रामेश्वरप्रसाद सारस्वत, २५. रीता सिवानी, २६. विजय बागरी, २७. विनोद जैन 'वाग्वर', २८. विश्वंभर शुक्ल २९. श्यामल सिन्हा, ३०. शशि त्यागी, ३१. शुचि भवि, ३२. शोभित वर्मा, ३३. श्रीधर प्रसाद द्विवेदी, ३४. सरस्वती कुमारी, ३५. सुरेश कुशवाहा 'तन्मय', ३६. संतोष नेमा, ३७. डॉ. हरि फैजाबादी, ३८. हिमकर श्याम। निम्न सहयोगियों से प्राप्त दोहे स्वीकृत किये जा चुके हैं, सहभागिता राशि अविलंब जमा करें ताकि प्रकाशनार्थ स्थान आरक्षित  हो सके: १. अरुण अर्णव खरे, २. डॉ. चित्रभूषण श्रीवास्तव 'विदग्ध',  ३. डॉ. जगन्नाथ प्रसाद बघेल, ४महातम मिश्र, ५राजकुमार महोबिया, ६. लता यादव, ७. विनीता श्रीवास्तव, ८. साहबलाल दशरिये। सहभागिता हेतु सहमति व्यक्त कर चुके निम्न दोहाकार १२० दोहे, चित्र, परिचय व सहभागिता निधि शीघ्रादिशीघ्र भेजें। सर्व श्री / सुश्री / श्रीमती १. गोपकुमार मिश्र, २. डॉ. रमन चेन्नई, ३. कृष्णा राजपूत, ४. प्रो. अपूर्व श्रीवास्तव, ५. प्रो. हेमंत पटेल, ६. रमेश विनोदी, ७. सविता तिवारी मारीशस, ८. सुमन श्रीवास्तव. ९. तृप्ति नेमा माहुले, १२. डॉ. वसुंधरा उपाध्याय, १३. पूजा अनिल स्पेन आदि। 
*
दोहा लेखन विधान:

१. दोहा का सर्वाधिक महत्वपूर्ण तत्व है कथ्य। कथ्य से समझौता न करें। कथ्य या विषय को सर्वोत्तम रूप में प्रस्तुत करने के लिए विधा (गद्य-पद्य, छंद आदि) का चयन किया जाता है। कथ्य को 'लय' में प्रस्तुत किया जाने पर 'लय'के अनुसार छंद-निर्धारण होता है। छंद-लेखन हेतु विधान से सहायता मिलती है। रस तथा अलंकार लालित्यवर्धन हेतु है। उनका पालन किया जाना चाहिए किंतु कथ्य की कीमत पर नहीं। दोहाकार कथ्य, लय और विधान तीनों को साधने पर ही सफल होता है। 
२. दोहा द्विपदिक छंद है। दोहा में दो पंक्तियाँ (पद) होती हैं। हर पद में दो चरण होते हैं। 
३. दोहा मुक्तक छंद है। कथ्य (जो बात कहना चाहें वह) एक दोहे में पूर्ण हो जाना चाहिए। सामान्यत: प्रथम चरण में उद्भव, द्वितीय-तृतीय चरण में विस्तार तथा चतुर्थ चरण में उत्कर्ष या समाहार होता है। 
४. विषम (पहला, तीसरा) चरण में १३-१३ तथा सम (दूसरा, चौथा) चरण में ११-११ मात्राएँ होती हैं।
५. तेरह मात्रिक पहले तथा तीसरे चरण के आरंभ में एक शब्द में जगण (लघु गुरु लघु) वर्जित होता है। पदारंभ में 'इसीलिए' वर्जित, 'इसी लिए' मान्य। 
६. विषम चरणांत में 'सरन' तथा सम चरणांत में 'जात' से लय साधना सरल होता है है किंतु अन्य गण-संयोग वर्जित नहीं हैं। 
७. विषम कला से आरंभ दोहे के विषम चरण मेंकल-बाँट ३ ३ २ ३ २ तथा सम कला से आरंभ दोहे के विषम चरण में में कल बाँट ४ ४ ३ २ तथा सम चरणों की कल-बाँट ४ ४.३ या ३३ ३ २ ३ होने पर लय सहजता से सध सकती है।
८. हिंदी दोहाकार हिंदी के व्याकरण तथा मात्रा गणना नियमों का पालन करें। दोहा में वर्णिक छंद की तरह लघु को गुरु या गुरु को लघु पढ़ने की छूट नहीं होती।
९. आधुनिक हिंदी / खड़ी बोली में खाय, मुस्काय, आत, भात, आब, जाब, डारि, मुस्कानि, हओ, भओ जैसे देशज / आंचलिक शब्द-रूपों का उपयोग न करें। बोलियों में दोहा रचना करते समय उस बोली का यथासंभव शुद्ध रूप व्यवहार में लाएँ।
१०. श्रेष्ठ दोहे में अर्थवत्ता, लाक्षणिकता, संक्षिप्तता, मार्मिकता (मर्मबेधकता), आलंकारिकता, स्पष्टता, पूर्णता, सरलता तथा सरसता होना चाहिए।
११. दोहे में संयोजक शब्दों और, तथा, एवं आदि का प्रयोग यथासंभव न करें। औ' वर्जित 'अरु' स्वीकार्य। 'न' सही, 'ना' गलत। 'इक' गलत।
१२. दोहे में यथासंभव अनावश्यक शब्द का प्रयोग न हो। शब्द-चयन ऐसा हो जिसके निकालने या बदलने पर दोहा अधूरा सा लगे।
१३. दोहा में विराम चिन्हों का प्रयोग यथास्थान अवश्य करें।
१४. दोहे में कारक (ने, को, से, के लिए, का, के, की, में, पर आदि) का प्रयोग कम से कम हो।
१५. दोहा सम तुकांती छंद है। सम चरण के अंत में सामान्यत: वार्णिक समान तुक आवश्यक है। संगीत की बंदिशों, श्लोकों आदि में मात्रिक समान्त्तता भी राखी जाती रही है। 
१६. दोहा में लय का महत्वपूर्ण स्थान है। लय के बिना दोहा नहीं कहा जा सकता। लयभिन्नता स्वीकार्य है लयभंगता नहीं 
*
मात्रा गणना नियम
१. किसी ध्वनि-खंड को बोलने में लगनेवाले समय के आधार पर मात्रा गिनी जाती है।
२. कम समय में बोले जानेवाले वर्ण या अक्षर की एक तथा अधिक समय में बोले जानेवाले वर्ण या अक्षर की दो मात्राएँ गिनी जाती हैंं। तीन मात्रा के शब्द ॐ, ग्वं आदि संस्कृत में हैं, हिंदी में नहीं।
३. अ, इ, उ, ऋ तथा इन मात्राओं से युक्त वर्ण की एक मात्रा गिनें। उदाहरण- अब = ११ = २, इस = ११ = २, उधर = १११ = ३, ऋषि = ११= २, उऋण १११ = ३ आदि।
४. शेष वर्णों की दो-दो मात्रा गिनें। जैसे- आम = २१ = ३, काकी = २२ = ४, फूले २२ = ४, कैकेई = २२२ = ६, कोकिला २१२ = ५, और २१ = ३आदि।
५. शब्द के आरंभ में आधा या संयुक्त अक्षर हो तो उसका कोई प्रभाव नहीं होगा। जैसे गृह = ११ = २, प्रिया = १२ =३ आदि।
६. शब्द के मध्य में आधा अक्षर हो तो उसे पहले के अक्षर के साथ गिनें। जैसे- क्षमा १+२, वक्ष २+१, विप्र २+१, उक्त २+१, प्रयुक्त = १२१ = ४ आदि।
७. रेफ को आधे अक्षर की तरह गिनें। बर्रैया २+२+२आदि।
८. अपवाद स्वरूप कुछ शब्दों के मध्य में आनेवाला आधा अक्षर बादवाले अक्षर के साथ गिना जाता है। जैसे- कन्हैया = क+न्है+या = १२२ = ५आदि।
९. अनुस्वर (आधे म या आधे न के उच्चारण वाले शब्द) के पहले लघु वर्ण हो तो गुरु हो जाता है, पहले गुरु होता तो कोई अंतर नहीं होता। यथा- अंश = अन्श = अं+श = २१ = ३. कुंभ = कुम्भ = २१ = ३, झंडा = झन्डा = झण्डा = २२ = ४आदि।
१०. अनुनासिक (चंद्र बिंदी) से मात्रा में कोई अंतर नहीं होता। धँस = ११ = २आदि। हँस = ११ =२, हंस = २१ = ३ आदि।
मात्रा गणना करते समय शब्द का उच्चारण करने से लघु-गुरु निर्धारण में सुविधा होती है। इस सारस्वत अनुष्ठान में आपका स्वागत है। कोई शंका होने पर संपर्क करें। ***

दोहा सलिला: भोर

भोर पर दोहे
*
भोर भई, पौ फट गई, स्वर्ण-रश्मि ले साथ।
भुवन भास्कर आ रहे, अभिनंदन दिन-नाथ।।
*
नीलाभित अंबर हुआ, रक्त-पीत; रतनार।
निरख रूप-छवि; मुग्ध है, हृदय हार कचनार।।
*
पारिजात शीरीष मिल, अर्पित करते फूल।
कलरव कर स्वागत करें, पंछी आलस भूल।।
*
अभिनंदन करता पवन, नमित दिशाएँ मग्न।
तरुवर ताली बजाते, पुनर्जागरण-लग्न।।
*
छत्र छा रहे मेघ गण, दमक दामिनी संग।
आतिशबाजी कर रही, तिमिरासुर है तंग।।
*
दादुर पंडित मंत्र पढ़, पुलक करें अभिषेक।
उषा पुत्र-वधु से मिली, धरा सास सविवेक।।
*
कर पल्लव पल्लव हुए, ननदी तितली झूम।
देवर भँवरों सँग करे, स्वागत मचती धूम।।
*
नव वधु जब गृहणी हुई, निखरा-बिखरा तेज।
खिला विटामिन डी कहे,  करो योग-परहेज।।
*
प्रात-सांध्य नियमित भ्रमण, यथासमय हर काम।
जाग अधिक सोना तनिक, शुभ-सुख हो परिणाम।।
*
स्वेद-सलिल से कर सतत, निज मस्तक-अभिषेक।
हो जाएँ संजीव हम, थककर तजें न टेक।।
*
नव आशा बन मंजरी, अँगना लाए बसंत।
मन-मनोज हो मग्न बन, कीर्ति-सफलता कंत।।
*
दशरथ दस इंद्रिय रखें, सिया-राम अनुकूल।
निष्ठा-श्रम हों दूर तो, निश्चय फल प्रतिकूल।।
*
इंद्र बहादुर हो अगर, रहे न शासक मात्र।
जय पा आसुर वृत्ति पर, कर पाए दशगात्र।।
*
धूप शांत प्रौढ़ा हुई, श्रांत-क्लांत निस्तेज।
तनया संध्या ने कहा, खुद को रखो सहेज।।
*
दिनकर को ले कक्ष में, जा करिए विश्राम।
निशा-नाथ सुत वधु सहित, कर ले बाकी काम।।
*
वानप्रस्थ-सन्यास दे, गौरव करे न दीन।
बहुत किया पुरुषार्थ हों, ईश-भजन में लीन।।
***
salil.sanjiv@gmail.com
16.7.2018, 7999559618.

रविवार, 15 जुलाई 2018

ॐ दोहा शतक शशि त्यागी

ॐ दोहा शतक शशि त्यागी 

नाम - शशि त्यागी शिक्षा-एम. ए. हिन्दी, बी. एड, गायन प्रभाकर, बोम्बे आर्ट संप्रति -अध्यापिका दिल्ली पब्लिक स्कूल, मुरादाबाद निवास - 38 अमरोहा ग्रीन जोया रोड अमरोहा पिन कोड 244221 उत्तर प्रदेश साहित्यिक परिचय - प्रकाशित साहित्य -साझा संकलन 1 • वर्ण पिरामिड- अथ से इति 2 • शत हाइकुकार -शताब्दी वर्ष 3 • ताँका की महक 4• अंतर्राष्ट्रीय ई मैगजी़न "प्रयास" कनाडा से प्रकाशित पत्रिका में रचनाएँ प्रकाशित



















भोले बालक चीन दिए, मुग़ल-काल बतलाय। 
दर्म के रक्षा कीजिए, गुरु गोबिंद सहाय। 
पंच प्यारे साधते, हाथों में तलवार।
सिक्ख समर्पण झलकता धर्म हेतु हर बार। 
सदा गवाही दे रहा, जलियाँवाला बाग़। 
आज़ादी कि बली चढ़ा, देश-धर्म अनुराग. 
निर्दयी वह दायर था, दिन था बहुत विशेष। 
सत्य प्रमाणित कर रहे, गोलिन के अवशेष. 
आज़ादी की नीव गड, नर-नारी बलिदान।
आज़ादी तब ही मिली, भारत तू यह जान. 
भोले बालक चिन दिए,मुगल काल बतलाय। 
धर्म की रक्षा कीजिए,गुरु गोविंद सहाय।। 7 
पञ्च प्यारे साधते,हाथों में तलवार। 
सिक्ख समर्पण झलकता,धर्म हेतु हर बार।। 8 
सदा गवाही दे रहा, जलियाँवाला बाग। 
आज़ादी की बलि चढ़ा, देश धर्म अनुराग।। 9 
निर्दयी वह डायर था,दिन था बहुत विशेष। 
सत्य प्रमाणित कर रहे,गोलिन के अवशेष।। 10 
आजादी नींव गड़ा, नर-नारी बलिदान। 
आजादी तब ही मिली,भारत यह तू जान।।11 
घोर कलयुगी काल में,हीरे-मोती मान। 
मनभावन सुख देत है,अविकारी संतान।। 12 
नोंक-झोंक लगती भली, जीवन साथी-साथ। 
इक दूजे को छेड़ते,ले हाथों में हाथ।। 13 
हँसी ठिठोली हो भली, बिखरे हों सब रंग। 
कुछ पल सभी बिताइए,अनमोल मीत संग।। 14 
घर आए अतिथि का, खूब कीजिए मान। 
यश-कीर्ति घर से चले, यही लीजिए जान।। 15 
जीवन में उल्लास हो,रख मन में विश्वास। 
मिलेगा फल निश्चित ही , जिसको जिसकी आस।।16 
अंग-अंग में प्रभु रमा,शुचि गंगा माँ गाय। 
नित इनकी सेवा करो,मन कोमल हो जाए।। 17 
जून माह घर यूँ लगे,हो शीतल जल कूप। 
तन को शीतलता मिले,मन के हो अनुरूप।। 18 
धरा-अंबर डोल रहा,अंधड़ रहयो डरा। 
मानव के दुष्कर्म का, भरन लगा है घड़ा।। 19 
पढ़ा-लिखा संतान को, भेज दिया परदेस। 
सेवा करने के लिए, किसको दें आदेश।। 20 
पढ़-लिखकर उन्नति करे,करे देश हित काम। 
र क्षेत्र विकसित करे,करे देश का नाम।।२१ 






31 
निशिदिन सुमिरन कीजिए,लीजै हरि का नाम। 
हरख-हरख जस गाइए,सुघरें बिगड़े काम।। 32 
खड़े प्रतीक्षा कर रहे, अमलतास के पेड़। 
कब लाओगे घट भरे, काले काले मेघ।। 33 
भगवन अब तो खेंच दे, इंद्र धनुष की रेख। 
मानव मन पुलकित हुआ,अंबर मेघा देख।। 34 
रूठे सुजन मनाइए,बढ़े प्रीत दिन रैन। 
तम में दीप जलाइए,भरे ज्ञान से नैन।। 34 
मीठी वाणी जग सुने,सुनकर हर्षित होय। 
बालकपन में जो गुने,वही कोकिला होय।। 35 
प्रात:शीतल पवन चली,
36
कन्या भ्रूण बचाइए, बेटी घर की  शान।
घर खुशहाली लाइए,समृद्धि की पहचान।।
37
वधू सुता सम जानिए,इनको दो सम्मान।
देहरी सेतु मानिए, मत कीजै अपमान।।
38
मात-पिता बेटी जनी, सदा देत सम्मान।
देस पराई हो चली,रखती सदा ध्यान।।
39
मुगलों ने घूंघट दिया,शिक्षा का किया नाश।
तब नारी अनपढ़ बनी,हुआ विकास विनाश।।
40
झाँसी की लक्ष्मीबाई, घूँघट कोसों दूर।
लम्बा सा घूँघट ओढ़े, नही चाहिए हूर।।
41
लम्बा घूँघट काढ़ के, नैनन को मटकाय।
निशिदिन ताना मार के,घूमन को लठियाय।।
42
कपटी को क्या देखता,अपने मन को देख।
कपट यदि हृदय छा गया,खींच लक्ष्मण रेख।।
43
मानव जब क्रोधित हुआ,बुद्धि भ्रष्ट हो जाय।
मनवा इसको साध ले,जीवन सफल बनाय।।
44
नया जमाना आ गया,नारी करती काम।
नव युग में है छा गया,अब नारी का नाम।।
45
चक्कर धिन्नी से दिन कटे, दुखिया  रोती रात।
जोहे बाट सखियन की,हो मन की ही बात।।
46
इकलौती संतान को,बहुत लड़ाया लाड।
ज्ञानी हो वह इसलिए ,माँ ने तोड़े हाड।।
47
मीठा जल वहीं मिले, जहाँ हो गहरा कूप।
मन गहराई राखिए,बनना हो यदि भूप।।
48
सब जन मिलकर बैठिए,खुश रहिए दिन-रात।
हँस बोल कह दीजिए,करिए मन की बात।।
49
सुख में सब साथी मिले,है यह जग की रीत।
बुरे समय में साथ दे,सो ही सच्चा मीत।।
50
भूलवश कभी मत करो ,नारी का अपमान।
मान हानि दावा सही,तब ही मिले सम्मान।।
51
अमरोहा के आम भी, होते हैं कुछ खास।
विशेष प्रजाति के सभी,आते सबको रास।।
52
मुँह छुट दावत में सभी,छबड़े में थे आम।
खास-खास पहले चखे,खास हुए फिर आम।।
53
मंडी में थे बिक रहे ,आम जो न थे खास।
विदेश को भेजे गए ,जो थे खासम-खास।।
54
लँगड़ा खासा बिक रहा,चौंसा बिकता आम।
आम की दावत में रखे,खास सभी थे आम।।
55
आम-आम चिल्ला रहा,जन-मन भाता खास।
खास सभी को सोहता,आम ही बिकता खास।।
56
मुंबई के अल्फाँसो, ठेले सजते खास।
चाकू से कटते रहे, जो थे खासम खास।।
57
शहर का तालाब पटा,बने अनेक मकान।
बरसाती पानी भरा, डूबी सभी दुकान ।।
58
हाथ जोड़ जग कर रहा, अच्छे दिन की आस।
राम राज इक दिन बने,रखो अटल विश्वास।।
59
आया समय प्रयास का,भारत बने अखण्ड।
बन जाएगा विश्व गुरू, बहु मत मिले प्रचण्ड।।
60
घने मेघ की छाँव में,झिलमिल करता ताल।
खिले कमल पुलकित हुए, हर्षाया वह काल।।
61
मुख से फेन निकालता,सागर तट तक धाय।
कण बालू के सोखता,अपनी प्यास बुझाय।।
62
जीवन को खा जात है,तन-मन होत खराब।
अपना दुश्मन मान ले,गुटका, नशा शराब।।
63
आतंकी ही खेलते, खूनी होली रोज़।
कैसे इनका नाश हो,इसका हल अब खोज।।
64
दुश्मन हैं अब कर रहे,हरदम भीतर घात।
हे प्रभु जल्दी से बिता, विकट अँधेरी रात।।
65
बचपन वाले खेल भी, खो गए सब आज।
घर के अंदर खेलते,वायु को मोहताज।।
65
भोला बचपन खेलता, माटी में मुस्काय।/मुस्कात।
रज स्वदेश की चूमता, तनिक युवा हो जाय/जात।।
घने मेघ की  छाँव में, झिलमिल करता ताल।
खिले कमल पुलकित हुए,पुलक उठा वह काल।।
बैठ अकेला ताकता, भौंकत रहे श्वान।
चोरों से रक्षा करता,रखे घर का ध्यान।।
67
जीव की रक्षा कीजिए , रखिए सभी ध्यान।
स्वामी भक्त सब कहें ,जबकि योनी श्वान।।
68
झूठ बिना गाड़ी चला, जाना यद्यपि दूर।
भरम टूट ही जाएगा,होकर चकनाचूर।।
69
शांत मन से वह मिलता, मन में जिसका वास।
निशिदिन उसे पुकारता,ईश मिलन की आस।।
70 (कुछ दोहे -एक दिव्यांग जिसके हाथ कटे हुए हैं)
प्यासा व्याकुल हुआ, करता सोच विचार।
हाथ बिना दुख भोगता, है अपंग लाचार।।
71
मुख डुबोय जल पी रहा,करके सोच विचार।
हाथ जल में डुबो रहा, अंजुलि को लाचार।। 
72
भोला बालक कर रहा,पशुवत है लाचार।
खुद ही अनुभव कर रहा,पशुओं का आचार।।
73
बचपन भोला न रहा,सरल नहीं आचार।
दुर्व्यसन में पड़ रहा,पशु समान व्यवहार।।
74
देखकर मन द्रवित हुआ,रोग का कर उपचार।
पर पीड़ा अवगत हुआ,कर उस पर उपकार।।
75
दया क्षमा न बिसारिए, होती जन से भूल।
ईश मगन हो जाइए,कट जाएंगे शूल।।
76
शहरों की मत बूझिए,जो जल है अनमोल।
ईश्वर ने सबै दिया, वह जल बिकता मोल।।
77
जैसी संगति बैठिए, वैसा ही मन होय।
संतन के ढिग बैठिए,प्रभु के दर्शन होय।।
78
सबसे अग्रिम प्रेम है,जिससे सृष्टि बसाय।
जीवन के इस चक्र में,इस विध ईश समाय।।
79
राम-नाम रसना रटे,हिय लगन लग जाय।
राम नाम की नाव से, यह जीवन तर जाय।।
80
माया के इस फेर में,मन को मत भटकाय।
राम ही राम फेर ले,भव सागर तर जाय।।
81
हर पल हरि का भजन कर,मन को मत भटकाय।
राम नाम जो जन जपे,भव सागर तर जाय।।
82
ब्रज की शोभा श्याम से, श्यामा प्रिय घनश्याम।
अधर मधुर मुरली धरी,सुने धेनु अविराम।।
83
मेरे देश का बच्चा, रोज़ करेगा योग।
तन बलवान मन सच्चा, पास न आए रोग।।
84
झर-झर नैना बरसते,बढे़ ईश की आस।
होंगे दर्शन राम के,हृदय गली हरि वास।।
85
मन को हल्का राखिए,भजे राम ही राम।
भव सागर तर जाइए,हिय धर हरि का नाम।।
86
मुरली सुन राधा चली,बैठी यमुना तीर।
कान्हा छवि निहारती ,कालिंदी के  नीर।।
87
पल-पल गाय पुकारती,हे गिरिधारी श्याम।
अपलक धेनु निहारती,जित लखै तित श्याम।।
88
लकुटि कमरिया लै चले,दौड़े ग्वाल-बाल।
मधुर मुरलिया हाथ में,हिय पहनी बनमाल।।
89
सिर पर धर मटकी धरी,दधि लिए चली नार।
कंकड़ से फोड़ मटकी, भीगे चुनरी हार।।
90
यशोदा के घर-आँगना,घुटरुनि चले श्याम।
कंचन सी चमके धरा,सजा नंद कौ धाम।।



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सामयिक दोहे:

दोहा सलिला:
धरती का मंगल न कर
संजीव वर्मा 'सलिल'
इधर भुखमरी; पेट में 
लगी हुई है आग.
उधर न वे खा पा रहे,
इतना पाया भाग.

खूं के आँसू रोय हम, 
वे ले लाल गुलाब.
कहते हुआ विकास अब,
हँस लो जरा जनाब.

धरती का मंगल न कर,
मंगल भेजें यान.
करें अमंगल लड़-झगड़ 
दंगल कर इंसान.


पत्ता-पत्ता चीखकर 
कहता: काट न वृक्ष.
निज पैरों पर कुल्हाड़ी 
चला रहे हम दक्ष.

टिप्पणियाँ

आवश्यकता से अधिक 
पा न कहें: पर्याप्त
जो वे दनुज, मनुज नहीं 
सत्य वचन है आप्त
सादा जीवन अब नहीं
रहा हमारा साध्य.
उच्च विचार न रुच रहे 
स्वार्थ कर रहा बाध्य.

पौध लगा मत; पेड़ जो 
काट सके तो काट.
मानव कर ले तू खड़ी
खुद ही अपनी खाट.
दूब नहीं असली बची,
नकली है मैदान.
गायब होंगे शीघ्र ही,
धरती से इंसान.
नाले सँकरे कर दिए,
जमीं दबाई खूब.
धरती टाइल से पटी,
खाक उगेगी दूब.
चीन्ह-चीन्ह कर रेवड़ी,
बाँटें अंधे रोज.
देते सिर्फ अपात्र को,
क्यों इसकी हो खोज.
नित्य नई कर घोषणा,
जीत न सको चुनाव.
गर न पेंशनर का मिटा,
सकता तंत्र अभाव.
नहीं पेंशनर को मिले,
सप्तम वेतनमान.
सत्ता सुख में चूर जो,
पीड़ा से अनजान.
गगरी कहीं उलट रहे,
कहीं न बूँद-प्रसाद.
शिवराजी सरकार सम,
बादल करें प्रमाद.
मन में क्या है!; क्यों कहें?,
आप करें अनुमान.
सच यह है खुद ही हमें.
पता नहीं श्रीमान
    झलक दिखा बादल गए,
    दूर क्षितिज के पार.
    जैसे अच्छे दिन हमें ,
    दिखा रही सरकार.