मंगलवार, 31 मार्च 2009

साहित्य जगत: काव्य मन्दाकिनी २००८ प्रकाशित

सामान्यतः आरोपित किया जाता है कि भारतीय रचनाकारों में राष्ट्रीयता की भावना कम है पर पीठ का अनुभव इसके विपरीत रहा. योजना लगभग सौ रचनाओं का संकलन निकलने की थी किन्तु सहभागी बहुत बड़ी संख्या में सम्मिलित हुए. फलतः, इसे दो भागों में प्रकाशित किया जाना तय किया गया. 'नमामि मातु भारतीम' शीर्षक से प्रथम भाग का प्रकाशन गत दिनों पूर्ण हो गया.

इस संकलन में देश के विविध प्रान्तों से सवा सौ से अधिक कवियों की राष्ट्रीय भावपरक रचनाएँ, चित्र तथा संक्षिप्त परिचय दो पृष्ठों में प्रकाशित किया गया है. पाठ्य-शुद्धि के प्रति पर्याप्त सजगता राखी जाने पर भी अहिंदीभाषी प्रदेश से मुद्रण होने पर कुछ त्रुटियां होना स्वाभाविक है. संपादन की छाप प्रायः हर पृष्ठ पर अनुभबव की जा सकती है.
संकलन के आदि में श्री सलिल द्वारा लिखित सारगर्भित अग्रालेख राष्ट्रीयता पर समग्रता से चिंतन को प्रेरित करता है. इस भावधारा के पूर्व प्रकाशित संकलनों का उल्लेख व् संक्षिप्त चर्चा शोधार्थियों के लिए उपयोगी होगी. इस सकल योजना के संयोजक प्रो. श्यामलाल उपाध्याय का अहर्निश श्रम श्लाघनीय है. यह सुमुद्रित संकलन कड़े सादे किन्तु आकर्षक जिल्द में मेट २९९ रु. में पीठ के कार्यालय में उपलब्ध है.
पीठ का पता- प्रो. श्यामलाल उपाध्याय, भारतीय वांग्मय पीठ, लोकनाथ कुञ्ज, १२७ / ए / ज्योतिष राय मार्ग, नया अलीपुर, कोलकाता ७०००५३.
: प्रेषक - मन्वंतर.

दोहे लोकतंत्र के - चंद्रसेन 'विराट'

लोकतंत्र का नाम है. कहाँ लोक का तंत्र?
भीड़-तंत्र कहना उचित, इसमें भीड़ स्वतंत्र.

सधे लोकहित लोक से, तभी लोक का तंत्र.
पर कुछ चतुरों ने किया, इसे वोट का यंत्र.

राजनीति जनतंत्र की, है कापालिक तंत्र.
शाखाओं को सीचती, भूल मूल का मन्त्र.

यह भेड़ों की भीड़ है, यह भेड़ों की चल.
अर्ध शती बीती मगर, वही हाल बेहाल.

भेडें हैं भोली बहुत, समझ न पातीं चाल.
रहते इनमें भेडिये, ओढ़ भेड़ की खाल.

भेड़जनों के भेडिये, बनकर पहरेदार,
लोकतंत्र के नाम पर, करते स्वेच्छाचार.

भेडचाल छूटी नहीं, रहे भेड़ के भेड़.
यही चाहते भेडिये, खाएं खाल उधेड़.

भेड़ों में वह भेडिया, शामिल बनकर भेड़.
रोज भेड़ कम हो रहीं, खून रँगी है मेड.

यह भेड़ों की भीड़ जो, सबसे अधिक विशाल.
उसे हाँकते भेडिये, बदल-बदलकर खाल.

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व्यंग लेख हवाई सर्वेक्षण डॉ. रमेश चन्द्र खरे.

आजकल सर्वेक्षण की सर्वत्र चर्चा है.वह हर समस्या का तात्कालिक, सर्व हितकारी, सर्वोपलब्ध, सर्व विदित निदान हैकि उसे समय के साथ सरकाया जा सके. ऊपर से हवाई सर्वेक्षण हो तो कहना ही क्या? नेताजी बड़े अधिकारियों और पत्रकारों के साथ परिवार का भी दिल संवेदना प्रदर्शन को लालच जाता है. काश सभी को अवसर मिलता.

आजकल हर ओर बाढ़ के समाचार चर्चित हैं, जो अनावृष्टि को रोते यहे, अतिवृष्टि कको रो रहे हैं.कुछ सर्वेक्षक खुश भी हो रहे हैं. राहत कार्य शुरू होंगे. नदियाँ उफनती हैं. छोटे-मोटे बाँध और पुल टूट रहे हैं, झोपडियाँ बह रही हैं. बाढ़ के सम्भावना है और नदियों के किनारे घर बने हैं. उन्हें क्यों हटाया जाए? फिर समस्या और निदान कहाँ रहेंगे?
सर्वत्र हाहाकार है. संवेदनशील हवाई सर्वेक्षण पर निकले हैं. सदलबल प्रति वर्षानुसार स्वस्थ परंपरा का निर्वाह हो रहा है. कैमरे साक्ष्य हैं. सनद रहे वक्त पर काम आये. कहीं तो उपाय, योजना और बजट स्वीकृति में प्रमाण होगा- चुनावों में जन-सेवा का भी प्रमाण पात्र. रातों से रहत्दाताओं को भी कुछ राहत मिलेगी जो सूके की क्षतिपूर्ति होगी. देखिये, विरोधी दल कृपया इस पर राजनीति न करें. यह राष्ट्रीय संकट है.

देश में गरीबी की भी बाढ़ आयी हुई है. इतना बड़ा गरीबों का अमीर देश.उसकी बाढ़ में घिरे कंक्रीट के कुछ बहुमंजिले टापू भी अवश्य नजर आते हैं पर बाढ़ का पानी अभी उनके खतरे के निशान से नीचे है. सावधानीपूर्वक इसका हवाई सर्वेक्षण होते रहना चाहिए. वैसे चुनाव इसके लिए सर्वोत्तम समय होता है. जब 'गरीबी हटाओ' के लोक लुभावन नारे हर दल के डंडों और झंडों के साथ लहराते हैं क्योंकि बड़ी हमदर्दी है हमारे नेताओं की उनके प्रति., वर्षों से रही है और रहेगी., हम इसका वचन देते हैं. बदले में उनके तुच्छ मतदान के सिवा हमें कुछ नहीं चाहिए.

नहीं, नहीं नगण्य क्यों?, राष्ट्र के लिए वह बहुत महत्वपूर्ण है. उनका एक-एक रूपया लाखों के बराबर है. हवाई सर्वेक्षण में ऐसी ही अकूत राशि बिखरी पडी है.यह भूमि रत्नगर्भा है. उसका हवाई सर्वेक्षण जरूरी है की महत्वपूर्ण नेताओं के लिए आरक्षित क्षेत्र पूर्व निश्चित हों. हवाई सर्वेक्षण तो जैसे अपार खनिज संपदा का, अनंत हरित वनों का, अनगिनत स्रोतों दोहन की कुंजी है. लोग कहते हैं हवाई बातें हैं, लेकिन नेताजी के अनुसार हवाई सपने देखना भी जरूरी है. जैसे पिछडे बुंदेलखंड विकास की संभावनाओं का सर्वेक्षण किया जा रहा है वैसे ही अगडे क्षेत्रों के और आधिक विकास का भी सर्वेक्षण किया जाना चाहिए. तभी सर्वेक्षकों का विकास होगा.

शिक्षा क्षेत्र के सर्वेक्षण पर तो स्थानाभाव है. वर्षों से पिछडे बुंदेलखंड के विकास के लिए रेल लाइनें बिछाने का सर्वेक्षण किया जा रहा है. एक पंचम नगर बाँध बनाने का सर्वेक्षण हो रहा है. अन्य औद्योगिक संभावनाओं की भावनाएँ सर्वेक्षित हैं. बड़ी अच्छी बातें हैं. एक नेता सर्वेक्षण करता है, दूसरा अपना स्वार्थ आदे आते ही उसे रद्द करा देता है. एक सरकार चुनाव आने पर कहती hai सर्वेक्षण कार्य समाप्ति पर है, अगली पारी में शुरू हो जायेगा. सरकार बदलते ही वह अनावश्यक हो जाता है. नए तेलशोधक कारखाने का शिलान्यास होने पर भी वह शिलावत हो जाता है. स्वर्णिम चतुय्र्भुज योजना, गति धीमी कर देने से ही चारों खाने चित्त हो जाती है. शेरी का सवाल है. कोई दुर्घटना-मामला शांत हो गया तो उसे नए सिरे से सर्वेक्षित कराओ क्योंकि उसकी अशांति में ही तो हमारी परम शांति है.

हवाई जहाज का युग है इसलिए हर क्षेत्र में कई हवाई सर्वेक्षणों की श्रृंखला जरूरी है, तभे एहम प्रगतिशील-विकसित देश होने की ओर बढ़ेंगे. वैसे घर बैठे मानसिक रूप से भी हवाई सर्वेक्षण किया जा सकता है, पिछली गलतियों का भी और आगामी उज्जवल संभावनाओं का भी. हमारी शुभ कामनाएँ हैं.

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लेखक परिचय: जन्म: १९-७-१९३७, होशंगाबाद.शिक्षा: एम्.ए., दीप. टी., पी-एच. डी., शोध- अम्बिका प्रसाद 'दिव्य' : व्यक्तित्व और कृतित्व. प्रकाशित कृतियाँ: महाकाव्य- विरागी-अनुरागी, व्यंग संग्रह- अधबीच में लटके, शेष कुशल है, काव्य- संवेदनाओं के सोपान, बाल साहित्य- आओ, गायें शाला शाला में पढ़ते-पढ़ते, आओ सीखें मैदान में गाते-गाते, कहानियां बुद्धि और विवेक की, प्रकृति से पहचान, अनेक सम्मान. संपर्क: श्यामायन एम्.आई.जी. बी ७३ विवेकानंद नगर, दमोह ४७०६६१ / ०९८९३३४०६०४ / ०७८१२२२१९२८.

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सोमवार, 30 मार्च 2009

कविता वर दो दुर्गा माता... डॉ. कमल जौहरी डोगरा, भोपाल


हे दुगा माँ! शक्तिरूपिणी!
बना दे भारत की हर नारीको
दुरगा चांदी का रूप.
जो करे सामना साहस से
शोषण, उत्पीडन. बलात्कार का
जले न जीवित अग्नि दाह में
करे न आत्म हत्या फांसी से
माँ-बाप करें न भेदभाव
दें शिक्षा और दिलासा
समझें भार न कन्या को
ब्याही हो चाहे अनब्याही
कन्या देवी दुर्गा का रूप
बने रणचंडी जब हो उत्पीडन.
शिक्षा-समाज के रखवालों
उसे सिखाओ आज कराटे.
एन. सी. सी. कर दो अनिवार्य
खेल-कूद के क्षेत्र में भी
उसे बनाओ भागीदार.
गौरव से सीना तान चले वह
सर न झुकाए लज्जा से,
अपनी रक्षा आप करे वह,
निर्भर नहीं पुरुष पर हो.
ऐसा वर दो माता तुम
भारत की हर नारी को.

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गीत

वीर प्रसूता माँ के उदगार

डॉ. महाश्वेता चतुर्वेदी, बरेली

चलो, देश के काम आ गया, अपना प्यारा लाल...

जिसकी अर्थी ने जीवन का अर्थ हमें समझाया.
दुनिया के माया-जालों में कभी नहीं उलझाया.
जिसे तिरंगे में पाकर, उन्नत है मेरा भाल....

सीमा के उस प्रहरी ने मातृत्व सफल कर डाला.
मृत्युंजय बनकर जिसने सारा विषाद हर डाला.
अनुरागी नब गया उसी का, निष्ठुर चाहे काल...

बलिदानी सूत एक अकेला, बना मुझे वरदान.
सौंप गया है, भारत माँ को अमृतमय मुस्कान.
और पुत्र ऐसे पाकर हो, माता सदा निहाल...

वीर-प्रसूता रह्हों, सदा जब-जब मैं जीवन पाऊँ.
विदुला और कभी जीजाबाई बनकर हरषाऊँ.
हो बन्दूक खिलौना, उसकी वीरोचित हो चाल...

हर माँ अपने बालक को मानव बनना सिखलाये.
अर्थवान जीवन हो, ऐसा काम देश के आये.
रुद्र और दुर्गा सी सन्तति, करती सदा कमाल...

देश-धर्म पर मिटानेवाले ही जिंदा कहलाते हैं.
चट्टानों औ' गिरिश्रृंगों को, वे पल में दहलाते हैं.
हस शहीद के मेले पर, हृदयों में उठा, उबाल...

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राष्ट्र वन्दना

मेरा आज नमन

प्रो. श्यामलाल उपाध्याय, कोलकाता


भारत! तेरी शक्ति चिरंतन, मेरा आज नमन.

देश-विरोधी दीमक बनकर, देश चाटते जाते.
धंधों में काला-सफ़ेद कर, मस्ती-मौज मानते.

कौन लादे इन तूफानों से?, कैसे राह बनाये?
कौन जुटाए सहस कैसे?, ऐसे मन के पाए.

चिंता बहुत अधिक हम करते, मानव अधिकारों की.
उन्हें खोज रखते सहेजकर, थाती व्यापारों की.

काश! कहीं चिंता होती, हैं क्या करणीय हमारे.
कभी नहीं कर्त्तव्य विमुख, होते ये प्राणि सारे.

शासन को है सदा अपेक्षा, बल की-अनुशासन की.
बिना विवेक और अनुशासन, कहाँ चली शासन की.

इव्घतन है विनाश का सूचक, घातक एक कुमंत्र.
नहें बचोगे अपनेको औ' अपना जनतंत्र.

बनकर तुम स्वायत्त देश को नहीं बचा पाओगे.
प्रेम, शांति, भ्रातत्व-bhav से दूर चले jaaoge.

एकनिष्ठ-निरपेक्ष राष्ट्र, संप्रभु-स्वायत्त रहेगा.
विघटन से बच, सार्वभौम सत्ता के भर सहेगा.

राष्ट्र सोच हो, राष्ट्र कर्म हो, राष्ट्र-धर्म सेवा हो.
जन-मन अर्पित राष्ट्र भाव हो, शांति-प्रेम-श्रद्धा हो.

नयी सोच के अंखुवे तनकर नए प्राण विकसायें.
अंधकार-निर्धनता-शोस्गन आप स्वयं सर जाएँ.

लो संकल्प उठाओ! खर्षर, अपने तन=मन-धन.
भारत तेरी भक्ति चिरंतन, मेरा आज नमन.

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चिन्तन-सलिला

महात्मा सच्च्चे


डॉ. रामकृष्ण सराफ, भोपाल

एक जंगल में एक महात्मा रहा करते थे. जंगल में रहते हुए वे सदा त्यागमय जीवन व्यतीत करते थे. संसार की किसी भी वस्तु के प्रति उनके मन में कोई आकांक्षा नहीं थी. उनका सारा समय हरी नाम स्मरण तथा दूसरों के कल्याण कार्य में व्यतीत होता था.

महात्मा जे प्रतिदिन दिन में तीन बार प्रातः काल, मध्यान्ह तथा संध्या समय गंगा में स्नान करने जाते थे. मार्ग में एक गणिका का निवास स्थान पड़ता था. जब भी महात्मा जी वहां से निकलते, गणिका अपने घर से निकलती और महात्मा जी को प्रणाम करती. महात्मा जी उसे आशीर्वाद देते. उसके बाद गणिका उनसे एक ही प्रश्न किया करती थी- 'महात्मा जी सच्चे की झूठे?' महात्मा जी प्रतिदिन गणिका के इस प्रश्न को सुनते और बिना कुछ कहे आगे बढ़ जाते. यही क्रम बराबर चलता रहा.

कुछ समय बीता, महात्मा जी बीमार पड़े. उनका स्वास्थ्य निरंतर गिरता गया. वे मरणासन्न हो गए. तब उनहोंने भक्तों से गणिका को बुलाने के लिए कहा. गणिका आयी. उसने देखा की महात्मा जी अपने जीवन की अंतिम घडियां गिन रहे थे. वह स्तब्ध अवाक् रह गयी. उसने महात्मा जी को प्रणाम किया. इस बार गणिका ने कोई प्रश्न नहीं किया किन्तु महात्मा जी ने आज गणिका के दीर्घकालीन अनुत्त्ररित प्रश्न का उत्तर स्वयं दिया और कहा- 'महात्मा जी सच्चे'. इस उत्तर को सुनकर गणिका की आँखें खुलीं और महात्मा जी ने अपनी आँखें सदा के लिए मूँद लीं.

महात्मा जी और गणिका के इस वृत्त में सच्चाई जो भी हो किन्तु एक महत्त्वपूर्ण तथ्य निश्चित रूप से यहाँ उद्घाटित होता है. अपने चरित्र को यावज्जीवन निर्मल बनाये रखना वास्तव में एक महान और कठिन कार्य है.

कोई भी मनुष्य कितने ही प्रतिष्ठित , उच्च अथवा महत्त्वपूर्ण पद पर क्यों न हो, उसका उस पद पर विद्यमान होना मात्र, उसके चरित्र के विषय में कोई संकेत नहीं देता. उसका चरित्र निर्मल भी हो सकता है और अन्यथा भी हो सकता है. किसी भी व्यक्ति के चरित्र के विषय में बाहर से कोई भी निश्चित धरना नहीं बनाई जा सकती.

हमारा सारा जीवन चुनौतियों से भरा हुआ है. इन चुनौतियों के बीच चरित्र रक्षा एक बहुत बड़ा और कठिन कार्य है. पग-पग पर हमारे सामने विभिन्न प्रकार के आकर्षण और प्रलोभन हैं, जिनके बीच हमारे चरित्र की परीक्षा हो रही है. हमें अपने चरित्र से डिगने की परिस्थितियां हमारे चारों और विद्यमान हैं. इनसे अपने को बचाते हुए आगे बढ़ते जाना ही हमारे विवेक को चुनौती है. ऐसे उदाहरण हमारे सामने अनेक हैं जहाँ हमने बड़े-बड़े महर्षियों को नीचे गिरते और डूबते देखा है. उनके सारे जीवन की उपलब्धियों को धूल में मिलते देखा है.

अपने सारे जीवन को बिना किसी प्रकार की आँच आये निष्कलंक बचा ले जाना वास्तव में एक दुष्कर कार्य है. इस कार्य में हमारी सतत परीक्षा होती रहती है. कभी भी हम इधर-उधर गए कि सारे जीवन के सब किये कराये पर पानी फिर गया. इसीलिये इसके सम्बन्ध में हमें सतत सचेष्ट रहना पड़ता है. अपने चरित्र की परीक्षा में हम जीवन के प्रत्येक क्षण में सतत जागरूक रहकर ही उत्तीर्ण हो सकते हैं इसीलिये महात्मा जी ने अपने जीवन के अंतिम क्षण में ही गणिका के उस प्रश्न का उत्तर देना उचित समझा. भले ही इस प्रश्न का उत्तर देना उनके लिए कभी भी कोई कठिन कार्य नहीं था किन्तु अपने उत्तर को जीवन के अंतिम क्षण तक तलने के पीछे महात्मा जी का उद्देश्य संभवतः यही बताना था कि संसत यही समझ ले कि अपने चरित्र की जीवन भर मर्यादा में रहते हुए रक्षा करना सामान्य काम नहीं है.

ससार में विभिन्न आकर्षणों एवं चुनौतियों के बीच अपने चंचल मन को वश में रखते हुए अपने चरित्र कि जो रक्षा कर सके वही सच्चा महात्मा है, फिर चाहे वह वन में रहे या महल में.

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Book Review

Showers to the Bowers : Poetry full of emotions

(Particulars of the book _ Showers to Bowers, poetry collection, N. Marthymayam 'Osho', pages 72, Price Rs 100, Multycolour Paperback covr, Amrit Prakashan Gwalior )

Poetry is the expression of inner most feelings of the poet. Every human being has emotions but the sestivity, depth and realization of a poet differs from others. that's why every one can'nt be a poet. Shri N. Marthimayam Osho is a mechanical engineer by profession but by heart he has a different metal in him. He finds the material world very attractive, beautiful and full of joy inspite of it's darkness and peshability. He has full faith in Almighty.

The poems published in this collection are ful of gratitudes and love, love to every one and all of us. In a poem titled 'Lending Labour' Osho says- ' Love is life's spirit / love is lamp which lit / Our onus pale room / Born all resplendor light / under grace, underpeace / It's time for Divine's room / who weave our soul bright. / Admire our Aur, Wafting breez.'

'Lord of love, / I love thy world / pure to cure, no sword / can scan of slain the word / The full of fragrance. I feel / so charming the wing along the wind/ carry my heart, wchih meet falt and blend' the poem ' We are one' expresses the the poet's viewpoint in the above quoted lines.

According to famous English poet Shelly ' Our sweetest songs are those that tell of saddest thought.' Osho's poetry is full of sweetness. He feels that to forgive & forget is the best policy in life. He is a worshiper of piece. In poem 'Purity to unity' the poet say's- 'Poems thine eternal verse / To serve and save the mind / Bringing new twilight to find / Pray for the soul's peace to acquire.'

Osho prays to God 'Light my life,/ Light my thought,/ WhichI sought.' 'Infinite light' is the prayer of each and every wise human being. The speciality of Osho's poetry is the flow of emotions, Words form a wave of feelings. Reader not only read it but becomes indifferent part of the poem. That's why Osho's feeliongs becomes the feelings of his reader.

Bliss Buddha, The Truth, High as heaven, Ode to nature, Journey to Gnesis, Flowing singing music, Ending ebbing etc. are the few of the remarkable poems included in this collection. Osho is fond of using proper words at proper place. He is more effective in shorter poems as they contain ocean of thoughts in drop of words. The eternal values of Indian philosophy are the inner most instict and spirit of Osho's poetry. The karmyoga of Geeta, Vasudhaiv kutumbakam, sarve bhavantu sukhinah, etc. can be easily seen at various places. The poet says- 'Beings are the owner of their action, heirs of their action" and 'O' eternal love to devine / Becomes the remedy.'

In brief the poems of this collection are apable of touching heart and take the reader in a delighted world of kindness and broadness. The poet prefers spirituality over materialism.

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Contact Acharya Sanjiv Verma 'Salil', email : salil.sanjiv@gmail.com / blog: sanjivsalil.blogspot.com

रविवार, 29 मार्च 2009

लघु कथा

शब्द और अर्थ

सलिल

शब्द कोशकार ने अपना कार्य समाप्त किया...कमर सीधी कर लूँ , सोचते हुए लेटा कि काम की मेज पर कुछ खटपट सुनायी दी... मन मसोसते हुए उठा और देखा कि यथास्थान रखे शब्दों के समूह में से निकल कर कुछ शब्द बाहर आ गए थे। चश्मा लगाकर पढ़ा , वे शब्द 'लोकतंत्र', प्रजातंत्र', 'गणतंत्र' और 'जनतंत्र' थे।
शब्द कोशकार चौका - ' अरे! अभी कुछ देर पहले ही तो मैंने इन्हें यथास्थान रखा रखा था, फ़िर ये बाहर कैसे...?'
'चौंको मत...तुमने हमारे जो अर्थ लिखे हैं वे अब हमें अनर्थ लगते हैं। दुनिया का सबसे बड़ा लोक तंत्र लोभ तंत्र में बदल गया है। प्रजा तंत्र में तंत्र के लिए प्रजा की कोई अहमियत ही नहीं है। गन विहीन गन तंत्र का अस्तित्व ही सम्भव नहीं है। जन गन मन गाकर जनतंत्र की दुहाई देने वाला देश सारे संसाधनों को तंत्र के सुख के लिए जुटा रहा है। -शब्दों ने एक के बाद एक मुखर होते हुए कहा।

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कविता


परायों के घर
विजय कुमार सप्पत्ति, सिकंदराबाद
कल रात
दिल के दरवाजे पर
दस्तक हुई।
उनींदी आंखों से देखा तो
तुम थीं।
तुम मुझसे
मेरी नज़्म माग रहीं थीं।
उन नज्मों को
जिन्हें मैंने सम्हाल रखा था
तुम्हारे लिए
एक उम्र तक,
आज कहीं खो गयीं थीं,
वक़्त के धूल भरे रास्तों में
शायद उन्हीं रास्तों में
जिन पर चल कर
तुम यहाँ तक आयी हो।
क्या तुम्हें किसी ने नहीं बताया
की परायों के घर
भीगी आंखों से नहीं जाते।

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लेख

वर्तमान शिक्षा में नवाचार

अनुपमा सूर्यवंशी, छिंदवाडा

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में शिक्षा का अर्थ सिर्फ़ संस्कारवान बनाना या ज्ञान विकसित करना ही नहीं है, अपितु बालक के ज्ञान को नवीन तकनीकों के साथ परिपूर्ण करना भी है। इस लक्ष्य की प्राप्ति हेतु शिक्षा में नवाचार (इनोवेशन ) की महती आवश्यकता है।
नवाचार अर्थात उन प्रविधियों का समायोजन जो सर्वान्गीण विकास में योगदान दे। वर्तमान समय में अत्यधिक प्रतिस्पर्धा के कारण हर बालक का सम्पूर्ण बौद्धिक विकास होंना चाहिए।
नवाचार में नवीन पद्धतियों अर्थात दृश्य-श्रव्य सामग्री (मल्टीमीडिया रिच लर्निंग टैक्निक) जैसे प्रोजेक्टर, कंप्यूटर, टेली-कोंफ्रेंसिंग तथा सैटेलाइट आदि का प्रयोग प्रमुखता से किया जाता है।
आज-कल विज्ञानं तथा प्रौद्योगिकी में इतना विकास हो चुका है कि विद्यालय गए बिना भी पूरी शिक्षा ग्रहण की जा सकती है। दूरस्थ शिक्षा की इस अवधारणा को इंदिरा गाँधी मुक्त विश्व विद्यालय, भोज विश्व विद्यालय आदि ने सम्भव कर दिखाया है।
शैक्षणिक अथवा किताबी शिक्षा के विश्व विद्यालय स्टार तक हो चुके इस विकास को अब तकनीकी प्राविधि तक भी ले जाना जरूरी है। इस लक्ष्य की प्राप्ति में शिक्षक की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। प्रविधियों के उचित समन्वय में दक्ष तथा प्रबंधन में कुशल शिक्षक ही विद्यार्थियों में नए ज्ञान के अंकुर आरोपित कर सकता है। पुरानों में समयानुकूल विद्या प्राप्ति को मनुष्य का तीसरा नेत्र कहा गया है- 'ज्ञानं मनुजस्य तृतीय नेत्रं"। ज्ञान को अनंत तथा असीम भी कहा गया है- 'स्काई इज द लिमिट।'
बालक का केवल बौद्धिक विकास करना ही ज्ञान नहीं हो सकता। ज्ञान तो वह है जो बौद्दिक विकास के साथ-साथ चारित्रिक, नैतिक, सामाजिक, शारीरिक तथा मनोवैज्ञानिक विकास भी करे।

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कविता

शर्म नहीं आती

देवेन्द्र कुमार मिश्रा, छिंदवाडा

शर्म नहीं आती उन्हें
मर चुका हो जिनकी
आंखों का पानी
बचते-भागते फिरते हों जो
धिक्कार है उनकी जवानी।
दो कौडी का तुम्हारा अभिमान
कुटिल खल कामी।
तुम्हें है
किस बात का गुमान?
अपना हित देखा
अपनी खातिर जिया
दूसरों को भाद में झोंकता
तू कहाँ रहा
मनुज की सन्तान?
बचपन में मिट्टी से खेला
जवानी में उसी की
कर दी मट्टीपलीद
बुढापे में भी
रोता रहा अपना रोना
तुझसे भली है
जानवरों की संतान।
न बुद्धि बल,
न हृदय बल,
न बांहों में जोर।
कपटी-कायर
तेरी नियत में खोट,
तेरे मं में चोर।
कुत्ते भी भौंकते हैं,
चोर की रह रोकते हैं।
मालिक के प्रति
होते हैं वफादार।
तू?
अपनों का नहीं,
गैरों का क्या होगा?
नीच, नराधम
अहसान फरामोश
नाली के कीडे
बता कहाँ से तुझमें
आदम का जोर ?

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कविता

निशानी

जयसिंह अल्वरी

कल के लिए
हम पास तुम्हारे
कोई निशानी छोडेंगे।
पल-पल तुम
जगाओ-मुस्काओ
दर्द तुम्हारे ओढेंगे।
रहें, न रहें
लेकिन दिल को
दिल से गहरे जोडेंगे।
दिल में दीपक
जले प्यार का
सब दीवारें तोडेंगे।
हर सीने में याद फफकती
आज नहीएँ,
कल छोडेंगे।

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शनिवार, 28 मार्च 2009

डॉ. श्यामानंद सरस्वती 'रौशन' के श्रेष्ठ दोहे

दोहे में अनिवार्य हैं, कथ्य-शिल्प-लय-छंद।
ज्यों गुलाब में रूप-रस। गंध और मकरंद॥

चार चाँद देगा लगा दोहों में लालित्य।
जिसमें कुछ लालित्य है, अमर वही साहित्य॥

दोहे में मात्रा गिरे, यह भारी अपराध।
यति-गति हो अपनी जगह, दोहा हो निर्बाध॥

चलते-चलते ही मिला, मुझको यह मंतव्य।
गन्ता भी हूँ मैं स्वयं, और स्वयं गंतव्य॥

टूट रहे हैं आजकल, उसके बने मकान।
खंडित-खंडित हो गए, क्या दिल क्या इन्सान॥

जितनी छोटी बात हो, उतना अधिक प्रभाव।
ले जाती उस पार है, ज्यों छोटी सी नाव॥

कैसा है गणतंत्र यह, कैसा है संयोग?
हंस यहाँ भूखा मरे, काग उडावे भोग॥

बहरों के इस गाव में क्या चुप्पी, क्या शोर।
ज्यों अंधों के गाव में, क्या रजनी, क्या भोर॥

जीवन भर पड़ता रहा, वह औरों के माथ।
उसकी बेटी के मगर, हुए न पीले हाथ॥

तेरे अजग विचार हैं, मेरे अलग विचार।
तू फैलता जा घृणा, मैं बाँटूंगा प्यार॥

शुद्ध कहाँ परिणाम हो, साधन अगर अशुद्ध।
साधन रखते शुद्ध जो, जानो उन्हें प्रबुद्ध॥

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शुक्रवार, 27 मार्च 2009

लघुकथा ; वह गरीब है ना... -- अवनीश तिवारी, मुम्बई

वह गरीब है ना...

आज फ़िर दफ्तर के कामों में उलझे होने और बचे कामों को पूरा करने की तंग अवधि के कारण, दोपहर के खाने से दूर रहना पड़ा सुबह का वह बैग शाम जाते समय भी उतना ही वजनदार था काम पूरा हो जाने की खुशी पेट के भूख को भुला कर रह रह संतोष का पुट मष्तिष्क में छोड़ जा रही थी यह संतोष मेरी चाल की तेजी में बदल मुझे अपने घर की ओर ले जा रही थी एकाएक पास के चाट की दूकान पर नज़र पड़ी और भूक ने अपना मुंह उढा लिया मन चाट का स्वाद लेने ललच पड़ा और मैं चाट की दूकान पर आ जमा मै चाट के लिए कह कर खडा रहा ४-६ जनों की मांग पहले से होने के कारण मेरा नंबर अभी नहीं आया था इस बीच एक फटे हाल , कुछ अधिक उम्र का दुबला सा आदमी, पैरों के टूटते हुए चप्पलो को खींचते धीरे - धीरे बढ़ा आ रहा था उसकी दीनता दूर से ही अपना परिचय दे रही थी गहरे रंग के इस आदमी ने भी चाट के लिए कहा और मेरे समीप रूक मुंह लटका कर खड़ा हुआ पास फेंकें गए चाट के जुठे पत्तलों को चाटने कई कुत्ते जमें थे उनमें एक पिल्ला किसी ज्यादा भरे जुठे पत्तल को पा उसे तूफानी गति से चाटे जा रहा था कोई दूसरा तंदुरुस्त कुत्ता उस पिल्लै को पत्तल चाटते देख उसकी तरफ़ झपटा और उसे काट भगाया पिल्लै को पत्तल चाटने के लिए मिली इस सजा से हुए हल्ले से चौक और यह सब देख उस गरीब के ह्रदय की पीड़ा उसके मुंह तक आ गयी वह कुत्ते की ओर अपने दाहिने हाथ की तर्जनी से निशाना लगा झुंझलाहट में बोल पड़ा - " ये उसे क्यों मारता है, वह गरीब है ना " गरीबी की व्यथा से निकला यह दर्द सुन मैं सन्न सा रह गया और लोग यह सब देख सुन उसे अनदेखा कर अपने अपने चाट में मस्त हो गए दीनता की पुकार हर कोई नहीं समझ सकता मै भी अपना चाट खा वहां से निकल पडा वह क्षणिक घटना बार बार दिमाग में चोट करे जा रही थी, जिससे आहत मैं अब मंद गति से, किसी सोच में खो चला जा रहा था

भाषा सेतु -- संजीव 'सलिल' : भगवत प्रसाद मिश्रा 'निआज़'


हिन्दी कविता
दिया
आचार्य संजीव 'सलिल'
ज़िंदगी भर
तिल-तिलकर जला,
फ़िर भी कभी
हाथों को नहीं मला।
न शिकवा,
न गिला।
लबों को रखा सिला।
जितनी क्षमता
उतना तिमिर पिया।
अपनी नहीं
औरों की खातिर जिया।
अंधेरे के विष का
नीलकंठ बन पान किया।
इसलिए,
बस इसलिए ही
मरकर भी अम्र हो गया
मिट्टी का दिया।

********************

अंगरेजी काव्यानुवाद-

प्रो भागवत प्रसाद मिश्रा 'निआज़'
अहमदाबाद

LAMP

Throughout the life
itburn itself
bit by bit
yet it never
felt sorry,
No complaint
stayed light-lipped,
drank the darkness
as much as it could,
lived not for itself
but for others,
drank the poison of darkness
like 'shiva'
but distributed light
to all the sundry.
It is for this reason-
this only,
that the mortal earthen lamp
became immortal.।

******************



गुरुवार, 26 मार्च 2009

खरीदे से नहीं मिलते,बड़े अनमोल हैं रिश्ते v.r.shrivastava

मुलायम दूब पर,
शबनमी अहसास हैं रिश्ते
निभें तो सात जन्मों का,
अटल विश्वास हैं रिश्ते
जिस बरतन में रख्खा हो,
वैसी शक्ल ले पानी
कुछ ऐसा ही,
प्यार का अहसास हैं रिश्ते
कभी सिंदूर चुटकी भर,
कहीं बस काँच की चूड़ी
किसी रिश्ते में धागे सूत के,
इक इकरार हैं रिश्ते
कभी बेवजह रूठें,
कभी खुद ही मना भी लें
नया ही रंग हैं हर बार ,
प्यार का मनुहार हैं रिश्ते
अदालत में
बहुत तोड़ो,
कानूनी दाँव पेंचों से लेकिन
पुरानी
याद के झकोरों में, बसा संसार हैं रिश्ते
किसी को चोट पहुँचे तो ,
किसी को दर्द होता है
लगीं हैं जान की बाजी,
बचाने को महज रिश्ते
हमीं को हम ज्यादा तुम,
समझती हो मेरी हमदम
तुम्हीं बंधन तुम्हीं मुक्ती,
अजब विस्तार हैं रिश्ते
रिश्ते दिल का दर्पण हैं ,
बिना शर्तों समर्पण हैं
खरीदे से नहीं मिलते,
बड़े अनमोल हैं रिश्ते
जो
टूटे तो बिखर जाते हैं,
फूलों के परागों से
पँखुरी पँखुरी सहेजे गये,
सतत व्यवहार हैं रिश्ते

--विवेक रंजन श्रीवास्तव

कुण्डली : हार न मानो --संजीव 'सलिल'

प्यारी बिटिया! यही है दुनिया का दस्तूर।
हर दीपक के तले है, अँधियारा भरपूर।
अँधियारा भरपूर मगर उजियारे की जय।
बाद अमावस के फिर सूरज ऊगे निर्भय।
हार न मानो, लडो, कहे चाचा की चिठिया।
जय पा अत्याचार मिटाओ, प्यारी बिटिया।

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लोकतंत्र में लोक ही, होता जिम्मेवार।
वही बनाता देश की भली-बुरी सरकार।
छोटे-छोटे स्वार्थ हित, जब तोडे कानून।
तभी समझ लो कर रहा, आजादी का खून।
भारत माँ को पूजकर, हुआ न पूरा फ़र्ज़।
प्रकृति माँ को स्वच्छ रख, तब उतरे कुछ क़र्ज़।

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ग़ज़ल

तू न होकर भी यहीं है मुझको सच समझा गई ।
ओ मेरी माँ! बनके बेटी, फिर से जीने आ गई ।।

रात भर तम् से लड़ा, जब टूटने को दम हुई।
दिए के बुझने से पहले, धूप आकर छा गई ।।

नींव के पत्थर का जब, उपहास कलशों ने किया।
ज़मीं काँपी असलियत सबको समझ में आ गई ।।

सिंह-कुल-कुलवंत कवि कविता करे तो जग कहे।
दिल पे बीती आ जुबां पर ज़माने पर छा गई

बनाती कंकर को शंकर नित निनादित नर्मदा।
ज्यों की त्यों धर दे चदरिया 'सलिल' को सिखला गई ।।

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दोहे

जो सबको हितकर वही, होता है साहित्य।
कालजयी होता अमर, जैसे हो आदित्य.

सबको हितकर सीख दे, कविता पाठक धन्य।
बडभागी हैं कलम-कवि, कविता सत्य अनन्य।

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बुधवार, 25 मार्च 2009

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव का रचना संसार

समाचार: सर्वश्रेष्ठ न्यूज़ एंकर अलका सक्सेना, ज़ी न्यूज़ --ग्लैमरस महिला एंकर श्वेता सिंह, आजतक




ज़ी न्यूज़ की अलका सक्सेना सर्वश्रेष्ठ न्यूज़ एंकर




आजतक की श्वेता सिंह सबसे ग्लैमरस महिला एंकर-मीडिया खबर, मार्च, २००९










हिंदी समाचार चैनलों में कार्यरत महिला पत्रकारों पर केंद्रित सर्वे का परिणाम :

हिंदी के समाचार चैनलों में कार्यरत महिलाओं को केंद्र में रखकर मीडिया खबर.कॉम ने अपने प्रिंट पार्टनर मीडिया मंत्र (मीडिया पर केंद्रित हिंदी की मासिक पत्रिका) के साथ मिलकर पिछले दिनों एक ऑनलाइन सर्वे करवाया। सर्वश्रेष्ठ महिला एंकर और सबसे ग्लैमरस एंकर के अलावा कुल १२ सवाल सर्वे में पूछे गए। यह सर्वे १५ फरवरी से ६ मार्च के बीच हुआ।


सर्वे के प्रति लोगों ने काफी रूचि दिखाई और कुल ४१२५ लोगों ने सर्वे में भाग लिया। सर्वे में मीडिया और पत्रकारिता से जुड़े लोगों ने भी भाग लिया और इनकी संख्या ६५० के करीब रही। इन्हें व्यक्तिगत स्तर पर मीडिया का ऑनलाइन सर्वे फॉर्म भेजा गया। सर्वे में कुछ सवाल सिर्फ पत्रकारों के लिए थे मसलन महिलाओं के लिए किस चैनल का माहौल सबसे अच्छा है?


प्रक्रिया ऐसी थी कि एक बार मत देने के बाद उसी कंप्यूटर या आईपी एड्रेस से दुबारा वोट नहीं किया जा सके । १२ घंटे के बाद ही वोट कर चुका व्यक्ति दुबारा वोट कर सकता था।
ऑनलाइन सर्वे में सर्वश्रेष्ठ महिला न्यूज़ एंकर के लिए सबसे ज्यादा वोट जी न्यूज़ की कंसल्टिंग एडिटर अल्का सक्सेना को मिला। कुल २५.९८% लोगों ने उनके पक्ष में मतदान किया। एनडीटीवी की निधि कुलपति कुछ प्रतिशत के अंतर से दूसरे स्थान पर पिछड़ गयीं। उन्हें २३.०६% मत मिले। तीसरे स्थान पर एनडीटीवी की नगमा सेहर को ९.५०% मत मिले।
दूसरी तरफ न्यूज़ चैनलों की सबसे ग्लैमरस महिला एंकर के लिए मुख्य प्रतिस्पर्धा एनडीटीवी की अफसां अंजुम और आजतक की श्वेता सिंह के रही। इन दोनों को खेल पत्रकरिता में विशेषज्ञता हासिल है। प्रतिस्पर्धा के बाद चंद वोटों के फासले से आजतक की श्वेता सिंह को २२.९५% मत मिले जबकि अफसां अंजुम को २२.०७ % मत मिले। इन दोनों को सर्वश्रेष्ठ महिला न्यूज़ एंकर वाले श्रेणी में प्रथम दस में भी जगह मिली। तीसरा स्थान एनडीटीवी की अमृता राय को मिला। उनके पक्ष में ८% लोगों ने मतदान किया। चौथे , पांचवें और छठवें स्थान पर नगमा सेहर, सिक्ता देव और अंजना कश्यप रही। विविध चैनलों में काम करने वाली कुल ३५ महिला एंकरों के नाम सर्वे के दौरान वोटिंग में हिस्सा लेने वाले लोगों ने सुझाये और अपनी पसंद के विकल्प में उनका नाम देने के साथ-साथ उनके पक्ष में वोट भी किया।


सर्वे का परिणाम आने के बाद मीडिया मंत्र ने सर्वश्रेष्ठ एंकर अल्का सक्सेना ने खुशी जाहिर करते हुए कहा- ‘‘यह जानकर मुझे बहुत खुशी मिल रही है कि इतने नए और ग्लैमरस एंकरों के बीच अभी भी लोग मुझे याद रखते हैं। मैं उनलोगों को धन्यवाद करना चाहूंगी जिन्होंने मुझे वोट किया है। मैं मूलतः अपने आप को पत्रकार मानती हूँ और जब मैं एंकरिंग भी करती हूँ तो यह बात मेरे जेहन में रहती है और शायद लोग इस बात को नोटिस करते हैं। शायद यह ध्यान में रखकर मेरे पक्ष में लोगों ने वोट किया है और मुझे इस बात की खुशी है।’’

सर्वे में ४४.७२% लोगों ने न्यूज़ चैनलों में स्त्रियों के चयन के aadhaar को अपीयरेंस माना। दूसरी तरफ चैनल के ब्रांड इमेज में महिला पत्रकारों के योगदान को ६५.८५% लोगों ने अपीयरेंस तक ही सीमित माना। जबकि शिफ्ट और वर्किंग आवर को स्त्री पत्रकारों को सबसे बड़ी समस्या माना गया। और इसके पक्ष में ३७.४०% लोगों ने वोट किया। ४६.३४% लोगों ने महिला पत्रकारों के लिहाज से एनडीटीवी इंडिया को सबसे बेहतर माना। चैनलों की स्त्रियों से समाज में सबसे ज्यादा किसका प्रसार होता है, सर्वे के इस सवाल का परिणाम अप्रत्याशित रहा और ४४७२ % लोगों ने यह माना कि चैनलों की स्त्रियों से समाज में महिला जागरूकता और आत्मविश्वास का प्रसार होता है।
सर्वे का पूरा परिणाम इस तरह से रहा :

क्रम एंकर चैनल प्रतिशत


१ . हिंदी के महिला न्यूज़ एंकरों में आप किसे सर्वश्रेष्ठ न्यूज़ एंकर मानते हैं ?

१ अल्का सक्सेना जी २५.९८ %

२ निधि कुलपति एनडीटीवी इंडिया २३.०६%

३ नगमा सेहर एनडीटीवी इंडिया ९.५०%


४ अफसां अंजुम एनडीटीवी इंडिया ७.५० %

५ ऋचा अनिरुद्ध आईबीएन-७ ७ .००%

६ श्वेता सिंह आजतक ६ .००%

७ मीमांसा मलिक जी न्यूज़ ३.७५%

८ सोनिया सिंह आजतक ३.००%

९ शाजिया इल्मी स्टार न्यूज़ २.२५%

१० शीतल राजपूत जी न्यूज़ २.००%

२. हिन्दी न्यूज चैनल की सबसे ग्लैमरस एंकर आप किसे मानते हैं?

१. श्वेता सिंह आजतक २२.९५ %

२. अफसां अंजुम एनडीटीवी इंडिया २२.०७%

३. अमृता राय एनडीटीवी इंडिया ८.००%

४. नगमा सेहर एनडीटीवी इंडिया ७.५० %

५. सिक्ता देव एनडीटीवी इंडिया ७.००%

६. अंजना कश्यप न्यूज़ २४ ६ .०० %

७. सोनिया सिंह आजतक ४ .०० %


8.
राधिका कौशिक

स्टार न्यूज़
3.00%
9.
शीतल राजपूत

जी न्यूज़
2.50%
10.
अदिति सावंत

स्टार न्यूज़
1.98%

3. आमतौर पर न्यूज चैनलों में स्त्रियों के चयन का आधार होता है..
अपीयरेंस
44.72%

खबरों की समझ
6.50%

लिखने और बोलने की क्षमता
25.20%

स्वयं स्त्री होना
18.70%

अन्य
4.88%

कुछ प्रतिक्रियाएं :@सुंदरता के अलावा चयन का कोई और आधार नहीं होता. @चयन का कोई आधार ही नहीं होता. @चयन का आधार खुबसूरत होना और दिमाग से गायब होना @बस महिला होना ही काफी है. @चयन के बहुत सारे आधार होते हैं.
@पुरुष पत्रकारों के लिए चयन की जो प्रक्रिया अपनाई जाती है वही प्रक्रिया महिला पत्रकार के चयन में भी अपनाई जाती है.
4. किसी भी चैनल में सबसे ज्यादा महिला पत्रकार किस काम पर लगाए जाते हैं-.
एकरिंग औऱ रिपोर्टिंग
84.55%

स्क्रिप्ट राइटिंग
1.63%


एडीटिंग,इन्जस्टिंग और एसाइन्मेंट
8.94%

तकनीकी

0.81%
अन्य

4.07%
5. चैनल की ब्रांड इमेज में महिला पत्रकारों का योगदान किस स्तर पर माना जाता है
अपीयरेंस

65.85%
रिपोर्टिंग

15.45%
रिवन्यू जेनरेटिंग और मार्केटिंग

12.20%
मैनेजमेंट

1.63%
अन्य

4.87%
6. मौजूदा हालत में स्त्री पत्रकारों की समस्या है-
सुरक्षा के स्तर पर

24.39%
शिफ्ट और वर्किंग आवर के स्तर पर

37.40%
एडजस्मेंट के स्तर पर

14.63%
जेंड़र भेदभाव के स्तर पर

19.51%
अन्य

4.07 %
7. स्त्रियों का मीडिया के प्रति बढ़ते रुझान की वजह है-
ग्लैमर और स्टेटस
73.98%

बदलाव की इच्छा
3.25%

चैलेजिंग प्रोफेशन
15.45%

सामाजिक भागीदारी
6.50%

अन्य
0.82%

8. ज्यादातर महिला पत्रकार किस फील्ड की रिपोर्टिंग पसंद करती है..
फिल्म,मनोरंजन और फैशन

89.43%
स्पोर्ट्स

0.81%
क्राइम और सोशल इश्यू

3.25%
बिजनेस और फाइनेंस

2.44%
अन्य

4.07%

9. महिला पत्रकारों के लिहाज से किस चैनल का महौल सबसे बेहतर है-
एनडीटीवी इंडिया
46.34%

आजतक
8.13%

न्यूज 24
9.76%

जी न्यूज
8.94%

सहारा
9.76%

स्टार न्यूज़
1.63%

अन्य
13.64%

10. चैनल की स्त्रियों से समाज में सबसे ज्यादा प्रसार होता है-
ग्लैमर का

37.40%
महिला जागरुकता और आत्मविश्वास का

44.72%
सामाजिक बराबरी का

8.94%
जिम्मेदारी का

6.50%
महिलाओं में टीवी पर आने का

2.44%
11. महिला एंकरों से ऑडिएंस के जुड़ने की वजह होती है-
खबरों की प्रस्तुति का अंदाज और आवाज
30.08%

प्रजेंस ऑफ माइंड और बोल्डनेस
10.57%

ग्लैमरस लुक
43.90%

फैमिलियर एप्रोच
13.01%

ग्लैमरस लुक और खबरों की प्रस्तुति का अंदाज़
0.81%


जेंडर आकर्षण
0.81%

अन्य
0.82%

12. टीवी पत्रकार के तौर पर ज्यादातर स्त्रियां अपने को किस रुप में देखना पसंद करती हैं-
एंकर
87.80%

रिपोर्टर
5.69%

प्रोड्यूसर
2.44%

स्क्रिप्ट राइटर
1.63%

अन्य
2.34 %

प्रतिक्रिया :एंकर रिपोर्टर प्रोड्यूसर स्क्रिप्ट राइटर मुझे लगता है....कि इनके अलावा प्रबंधन में भी शामिल किया जाए .

चपला , चंचला ,द्रुतगामिनी , विद्युत ,को हमने आसमान से धरती पर क्या उतारा बिजली ने इंसान की समूची जीवन शैली ही बदल दी

चपला , चंचला ,द्रुतगामिनी , विद्युत ,को हमने आसमान से धरती पर क्या उतारा बिजली ने इंसान की समूची जीवन शैली ही बदल दी .
vivek ranjan shrivastava
बिजली के प्रकाश में रातें भी दिन मेँ परिर्वतित सी हो गई हैं . सोते जागते , रात दिन , प्रत्यक्छ या परोक्छ , हम सब आज बिजली पर आश्रित हैं . प्रकाश , ऊर्जा ,शीतलीकरण, गति, मशीनों के लिये ईंधन ,प्रत्येक कार्य के लिये एक बटन सबाते ही ,बिजली अपना रूप बदलकर तुरंत आपकी सेवा में हाजिर हो जाती है . प्रति व्यक्ति बिजली की खपत विकास का मापदण्ड बन गया है . यदि आज कुछ शत प्रतिशत शुद्ध है तो वह बिजली ही है . वर्तमान उपभोक्ता प्रधान युग में अभी भी यदि कुछ मोनोपाली सप्लाई मार्केट में है तो वह भी बिजली ही है . बिजली की मांग ज्यादा और उपलब्धता कम है . बिजली को बडे व्यवसायिक स्तर पर भण्डारण करके नहीं रखा जा सकता . इसका उत्पादन व उपभोग साथ साथ ही होता है . शाम के समय जब सारे देश में एक साथ प्रकाश के लिये बिजली का उपयोग बढ़ता है , मांग व आपूर्ति का अंतर सबसे ज्यादा हो जाता है . तब पनबिजली का उत्पादन ,जिसे त्वरित रूप से बढ़ाया घटाया जा सकता है , उसे बढ़ाकर उपभोक्ताओं की सेवा में, इस अंतर को कम करने के लिये विद्युत कर्मी जुटे रहते हैं . आज समय की मांग है कि सामाजिक संस्थायें जनजागरण कर ऐसा वातावरण बनायें कि हममें से जिन लोगों के पास जनरेटर , इनवर्टर आदि विद्युत उपकरण हैं वे शाम के पीकिंग अवर्स में बिना हानि लाभ की गणना किये उनका पूरा उपयोग करें . इस समय हम सबको न्यूनतम विद्युत उपकरणों का प्रयोग करना चाहिये . बूंद बूंद से ही घट भरता है .बिजली बिल जमा करने मात्र से हम इसके दुरुपयोग करने के अधिकारी नहीं बन जाते , क्योंकि अब तक बिजली की दरें सब्सिडी आधारित हैं . हमारे देश में बिजली का उत्पादन मुख्य रूप से ताप विद्युत गृहों से होता है, जिनमें कोयले को ईंधन के रूप में प्रयुक्त किया जाता है ,और कोयले के भण्डार सीमित हैं . बिजली उत्पादन का दूसरा बडा तरीका बांध बनाकर , जल संग्रहण कर पानी की स्थितिज ऊर्जा को विद्युत में बदलना है .परमाणु विद्युत , अपारम्परिक ऊर्जा स्त्रोतों जैसे सौर्य ऊर्जा , विंड पावर, टाइडल पावर आदि से भी व्यवसायिक विद्युत के उत्पादन के व्यापक प्रयास हो रहे हैं . राजनैतिक कारणों से बिना दूरदर्शी दृष्तटकोण अपनाये १९९० के दशक में कुछ राजनेताओं ने खुले हाथों मुफ्त बिजली बांटी . इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि एक समूची पीढ़ी को मुफ्त विद्युत उपयोग की आदत पड गई है . लोग बिजली को हवा , पानी की तरह ही मुफ्त का माल समझने लगे हैं . विद्युत प्रणाली के साथ बुफे डिनर सा मनमाना व्यवहार होने लगा है . जिसे जब जहाँ जरूरत हुई स्वयं ही लंगर ,हुक ,आंकडा डालकर तार जोड कर लोग अपना काम निकालने में माहिर हो गये हैं . खेतों में पम्प , थ्रेशर गावों में घरों में उजाले के लिये , सामाजिक , धार्मिक आयोजनों , निर्माण कार्यों के लिये अवैधानिक कनेक्शन से विद्युत के उपयोग को सामाजिक मान्यता मिल चुकी है . ऐसा करने में लोगों को अपराध बोध नहीं होता . यह दुखद स्थिति है . बिजली घर से उपयोग स्थल तक बिजली के सफर में यह स्टेप अप ट्रांसफारमर , अतिउच्चदाब बिजली की लाइनों , उपकेंद्रों में स्टेप डाउन होते हुये निम्नदाब बिजली लाइनों पर सवार होकर आप तक पहुँचती है . नये परिदृश्य में देश के बिजली बोर्डों को उत्पादन ,पारेषण , व वितरण कम्पनियों में विखण्डित कर बेहतर बिजली व्यवस्था बनाने के प्रयास जारी हैं . हमारी संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार बिजली केंद्र व राज्य की संयुक्त व्यवस्था का विषय है . विद्युत प्रदाय अधिनियम १९१० व १९४८ को एकीकृत कर संशोधित करते हुये वर्ष २००३ में एक नया कानून विद्युत अधिनियम के रूप में लागू किया गया है . इसके पीछे आधार भूत सोच बिजली कम्पनियों को ज्यादा जबाबदेह , उपभोक्ता उन्मुखी , स्पर्धात्मक बनाकर , वैश्विक वित्त संस्थाओं से ॠण लेकर बिजली के छेत्र में निवेश बढ़ाना है . रोटी ,कपडा व मकान जिस तरह जीवन के लिये आधारभूत आवश्यकतायें हैं , उसी तरह बिजली , पानी ,व संचार अर्थात सडक व कम्युनिकेशन देश के औद्योगिक विकास की मूलभूत इंफ्रास्ट्रक्चरल जरूरतें है . इन तीनों में भी बिजली की उपलब्धता आज सबसे महत्व पूर्ण है . उत्पादन के स्तर से उपभोग तक तकनीकी दछता ५० प्रतिशत है , इसका मतलब एक यूनिट बिजली चोरी रोक पाने का अर्थ २ यूनिट बिजली का उत्पादन है . नये विद्युत अधिनियम के अनुसार विद्युत नियामक आयोग राज्य स्तर पर विद्युत उपभोग की दरें तय कर रहे हैं . ये दरें शुद्ध व्यवसायिक आकलन पर आधारित न होकर कृषि , घरेलू , व्यवसायिक , औद्योगिक आदि अलग अलग उपभोक्ता वर्गों हेतु विभिन्न नीतियों के आधार पर तय की जाती हैं . विद्युत उत्पादन हेतु प्रकृतिदत्त कोयले के भण्डार तेजी से प्रयुक्त हो रहे हैं , ताप विद्युत गृह से होता प्रदूषण , या पनबिजली के लिये बनाये गये बांधों से जंगलों के डूबने से पर्यावरण को जो अपूरणीय छति हो रही है , उसके चलते बिजली का दुरुपयोग सामाजिक अपराध निरूपित किया जा सकता है . ऐसी स्थिति में बिजली चोरी कितना संगीन अपराध है , यह समझना बहुत सरल है . बिजली के मुफ्त उपयोग को बढ़ावा देकर , दी गई सुविधायें वापस लेने के नियम तो सरकारों ने बिजली व्यवस्था के सुधार हेतु बना दिये हैं पर अब तक बिजली चोरी के विरूद्ध कोई बडा जन शिक्छा अभियान किसी ने नहीं चलाया है . सर्व शिक्छा अभियान , पल्स पोलियो , आयोडीन नमक , एड्स , परिवार नियोजन , भूजल संवर्धन आदि राष्टीय कार्यक्रमों के लिये व्यापक जन जागरण , रैली , विग्यापन , भाषण , लेख , फिल्म आदि द्वारा जनचेतना जगाने के प्रयास हम सब ने देखे हैं . इनका महत्व निर्विवाद है . वर्तमान परिदृश्य में अनिवार्य आवश्यकता है कि बिजली चोरी के विरुद्ध भी गांव गांव , शहर शहर , स्कूल कालेज , समाज के प्रत्येक स्तर पर बृहद आयोजन हों . आम आदमी के मन में बिजली चोरी को एक सामाजिक अपराध के रूप में प्रतिष्ठित किया जावे . इस कार्य के लिये गैर शासकीय सामाजिक संस्थाओं की भागीदारी भी तय की जानी चाहिये . केवल कानून बना देने से , और उसके सीधे इस्तेमाल से बिजली चोरी की विकराल समस्या हल नहीं हो सकती . कानूनी रूप से तो भीख मांगना भी अपराध है पर स्वयं न्यायालयों के सामने ही भिखारियों को सहजता से देखा जा सकता है . हमारे जैसे लोकतांत्रिक जन कल्याणी देश में वही कानून प्रभावी हो सकता है जिसे जन समर्थन प्राप्त हो . आंध्रप्रदेश के मुख्य मंत्री चँद्रबाबू नायडु ने ढ़ृड इच्छा शक्ति से बिजली चोरी के विरूद्ध देश में सर्व प्रथम कशे कदम उठाये पर इससे किंचित बिजली चोरी भले ही रुकी हो पर उन्हें सत्ता गंवानी पडी . मध्य प्रदेश सहित प्रायः राज्यों में विद्युत वितरण कम्पनियों ने विद्युत अधिनियम २००३ की धारा १३५ के अंर्तगत बिजली चोरी के अपराध कायम करने के लिये उडनदस्तों का गठन किया है . पर विभिन्न शासकीय सीमाओं के चलते , इन दलों में विशेष बिजली चोरी रोकने के विशेषग्यों की नई भर्ती की अपेछा कम्पनी में ही अन्य कार्यों में कार्यरत कर्मचारियों का उपयोग किया जा रहा है .किसी और कार्य में दछ कर्मचारियों से , बेमन से , विवशता में उडनदस्ता कार्य करवाये जाने से अनुकूल परिणाम नहीं मिल पा रहे हैं .बिजली चोरी पर जन शिछा के अभाव में इन उडनदस्तों को जगह जगह नागरिकों के गहन प्रतिरोध का सामना करना पड रहा है .मारपीट , गाली गलौच , झूठे आरोप एक आम समस्या है . बिजली चोरी के खिलाफ जन जागरण से बिजली चोरी करते हुये भी लोग एक दूसरे से वैसे ही डरेंगे जैसे अन्य किसी चोरी के प्रति उनमें अपराध भाव होता है . ऐसा सामाजिक वातावरण बन जाने पर लोग बिजली चोरी करने वाले को हिकारत की दृष्टि से देखेंगे . तब बिजली चोरी रोकने में लगे अमले को जन सहयोग मिल सकेगा . बिजली देश के विकास की सतत प्रवाही ऊर्जा है . बिजली लिंग , जाति , धर्म , राज्य , प्रत्येक कुत्सित सीमा से परे सबके प्रति समदर्शी है . इसका मितव्ययी , विवेक पूर्ण , सदुपयोग समय की जरूरत है . आइये बिजली चोरी के विरूद्ध जनजागरण में अपना योगदान दें . बच्चों के पाठ्यक्रम में इस विषय पर सामग्री शामिल की जानी चाहिये . अशासकीय समाजसेवी संस्थायें बिजली को अपना विषय बनायें . केंद्र व राज्यों की उत्पादन ,पारेषण ,वितरण से जुडी सभी संस्थायें , ब्यूरो आफ इनर्जी एफिसियेंशी आदि संस्थान बिजली चोरी के विरुद्ध ठोस ,रचनात्मक ,जागरूखता अभियान मीडिया के माध्यम से प्रारंभ करें . पहले लोगों को बिजली चोरी कानून की पूरी जानकारी दी जाये , तभी उसके परिपालन की प्रभावी कार्यवाही हो सकती है . इंजी. विवेक रंजन श्रीवास्तव

मंगलवार, 24 मार्च 2009

काव्य नर्मदा

किसने मेरी नींदें चुराईं

प्रदीप पाठक

किसने मेरी नींदें चुराईं,
किसने मुझे व्यथा सुनाई,
वो लोरी के बहाने आई -
लो फ़िर मौत दबे पाओं आई.

शिकार पर तो हम गए थे उसके,
साकार हुए थे सपने, हताश हुए थे जिसके,
वो ग़ज़ल में शेर के बहाने
आई,लो फ़िर मौत दबे पाओं आई.

हरे जख्मों को दफना दिया था हमने,
बर्बादी में भी सुकून दिखा दिया था हमने,
वो आंगन में मुस्कराहट के बहाने आई,
लो फ़िर मौत दबे पाओं आई.

समंदर के मांझियों ने किनारा दिखा दिया था,
सूरज ने भी चंदा को छुपा दिया था,
वो सावन में बरखा के बहाने आई,
लो फ़िर मौत दबे पाओं आई.

बेटे के कद को पिता ने ऊँचा पाया,
माँ ने भी उठ कर तिलक चंदन लगाया,
वो जवानी में नाकामी के बहाने आई,
लो फ़िर मौत दबे पाओं आई.

कब तक यूँ सेहेमता रहूँगा मैं,
कब तक रोज़ मरता रहूँगा मैं,
जाने कब ज़िन्दगी मेरे गर्व को सहारा देगी,
न जाने कब मौत को हरा सकूँगा मैं

***************

* POETRY

Delicious

mehak

Today on the road

While I was passing by

Saw u there

Thro corner of my eye

Since long we r not in touch

My fault I had forgoten u as such

Now all emotions,

Overwhelmed inside

Logging into old memories

Seeing u beside

Remembered ur cold touch

And ur kiss on my lips

Loved the way u drooled on my neck

And sometimes u on my nose tips

Couldn't control myself

To feel the same u again

So am near there u

Please come in my hands

The feel is so good

With u this world I forgot

Together we make good seen

Love always being with u

Ohh my delicious icecream.

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गीतिका

ताज़ा-ताज़ा दिल के घाव।
सस्ता हुआ नमक का भाव।

मंझधारों-भंवरों को पार
किया किनारे डूबी नाव।

सौ चूहे खाने के बाद
सत्य-अहिंसा का है चाव।

ताक़तवर के चूम कदम
निर्बल को दिखलाया ताव।

ठण्ड भगाई नेता ने
जला झोपडी, बना अलाव।

डाकू तस्कर चोर खड़े
मतदाता क्या करे चुनाव?

नेता रावण, जन सीता
कैसे होगा सलिल निभाव?

*******

जबलपुर में पीपल के एक पुरातन वृक्ष को विस्थापित कर पुनः रोपने का अद्भुत सफल प्रयोग हुआ

जबलपुर में पीपल के एक पुरातन वृक्ष को विस्थापित कर पुनः रोपने का अद्भुत सफल प्रयोग हुआ , मेरी साहित्यिक शब्दांजली , इस सुप्रयास को ....

विस्थापन

विवेक रंजन श्रीवास्तव
ओ. सी ..६ , विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर , जबलपुर म.प्र.
फोन ०७६१ २६६२०५२ ,
सदा साथ ०९४२५८०६२५२
vivek1959@yahoo.co.in

बाबा कस्बे की शान हैं . वे उनके जमाने के कस्बे के पहले ग्रेजुएट हैं . बाबा ने आजादी के आंदोलन का जमाना जिया है , उनके पास गाँधी जी और सुभाष बाबू की कस्बे की यात्राओं के आंखों देखे हाल के कथानक हैं . बाबा ने कस्बे के कच्चे मकानों को दोमंजिला पक्की इमारतों में बदलते और धूल भरी गलियों को पक्की सीमेंटेड सड़कों में परिवर्तित होते देखा है.पूरा कस्बा ही जैसे बाबा का अपना परिवार है . स्कूल में निबंध प्रतियोगिता हो या कस्बे के किसी युवा को बाहर पढ़ने या नौकरी पर जाना हो , किसी की शादी तय हो रही हो या कोई पारिवारिक विवाद हो , बाबा हर मसले पर निस्वार्थ भाव से सबकी सुनते हैं , अपनेपन से मश्विरा देते हैं . वे अपने हर परिचित की बराबरी से चिंता करते हैं . उन्होंने दुनियां देखी है , वे जैसे चलते फिरते इनसाइक्लोपीडिया हैं . समय के साथ समन्वय बाबा की विषेशता है . वे हर पीढ़ी के साथ ऐसे घुल मिल जाते हैं मानो उनके समवयस्क हों . शायद इसी लिये बाबा "बाबा " हैं .

बाबा का एक ही बेटा है और एक ही नातिन अनु, जो उनकी हर पल की साथिन है . अनु के बचपन में बाबा स्वयं को फिर से जीते हुये लगते हैं . वे और अनु एक दूसरे को बेहद बेहद प्यार करते हैं .शायद अनु के बाबा बनने के बाद से ही वे कस्बे में हर एक के बाबा बन गये हैं . बाबा स्त्री शिक्षा के प्रबल समर्थक हैं . बाबा को घर के सामने चौराहे के किनारे लगे बरगद से बहुत लगाव है . लगता है बरगद बाबा का समकालीन है . बरगद और बाबा अनेक घटनाओं के समानांतर साक्ष्य हैं . दोनों में कई अद्भुत साम्य हैं , अंतर केवल इतना है कि एक मौन की भाषा बोलता है दूसरा मुखर है . बरगद पर ढ़ेरों पक्षियों का आश्रय है , प्रत्यक्ष या परोक्ष बाबा पर भी गांव के नेतृत्व और अनेकानेक ढ़ंग से जैसे कस्बा ही आश्रित है . अनु की दादी के दुखद अनायास देहांत के बाद , जब से बाबा ने डाढ़ी बनाना छोड़ दिया है , उनकी श्वेत लंबी डाढ़ी भी मानो बरगद की लम्बी हवा में झूलती जड़ों से साम्य उत्पन्न करती हैं , जो चौराहे पर एक दूसरे को काटती दोनों सड़कों पर राहगीरों के सिरों को स्पर्श करने लगी हैं . बच्चे इन जड़ों को पकड़कर झूला झूलते हैं . बरगद कस्बे का आस्था केंद्र बन चुका है . उसके नीचे एक छोटा सा शिवालय है . लोग सुबह शिवपिंडी पर जल चढ़ाते सहज ही देखे जा सकते हैं . तपती गर्मियों मे बरगदाही के त्यौहार पर स्त्रियाँ बरगद के फेरे लगाकर पति की लम्बी उम्र के लिये पूजन करती हैं , बरगद के तने पर बंधा कच्चा सूत सालों साल स्त्रियों की उन भावना पूर्ण परिक्रमाओ का उद्घोष करता नही थकता .

अनु , बाबा की नातिन पढ़ने में कुशाग्र है . बाबा के पल पल के साथ ने उसे सर्वांगीण विकास की परवरिश दी है . कस्बे के स्कूल से अव्वल दर्जे में दसवी पास करने के बाद अब वह शहर जाकर पढ़ना चाहती है . पर इसके लिये जरूरी हो गया है परिवार का कस्बे से शहर को विस्थापन .. क्योंकि बाबा की ढ़ृड़ प्रतिज्ञ अनु ने दो टूक घोषणा कर दी है कि वह तभी शहर पढ़ने जायेगी जब बाबा भी साथ चलेंगे . बाबा किंकर्तव्यविमूढ़ , पशोपेश में हैं .

विकास के क्रम में कस्बे से होकर निकलने वाली सड़क को नेशनल हाईवे घोषित कर दिया गया है . सड़क के दोनो ओर भवनों के सामने के हिस्से शासन ने अधिगृहित कर लिये हैं बुल्डोजर चल रहा है , सड़क चौड़ी हो रही है . बरगद इस विकास में आड़े आ रहा है . वह नई चौड़ी सड़क के बीचों बीच पड़ रहा है . ठेकेदार बरगद को उखाड़ फेंकना चाहता है . बाबा ने शायद पहली बार स्पष्ट उग्र प्रतिरोध जाहिर कर दिया है , कलेक्टर साहब को लिखित रूप से बता दिया गया है कि बरगद नहीं कटेगा सड़क का मार्ग बदलना हो तो बदल लें . कस्बे का जन समूह एकमतेन बाबा के साथ है .
गतिरोध को हल करने अंततोगत्वा युवा जिलाधीश ने युक्ति ढ़ूढ़ निकाली , उन्होंने बरगद को समूल निकालकर , कस्बे में ही मंदिर के किनारे खाली पड़े मैदान में पुनर्स्थापित करने की योजना ही नहीं बनाई उसे क्रियांवित भी कर दिखाया . विशेषज्ञो की टीम बुलाई गई , क्रेन की मदद से बरगद को निकाला गया , और नये स्थान पर पहले से किये गये गड्ढ़े में बरगद का वृक्ष पुनः रोपा गया है . लोगों के लिये यह सब एक अजूबा था . अखबारों में सुर्खिया थी . सबको संशय था कि बरगद फिर से लग पायेगा या नहीं ? बरगद के नये स्थान पर पक्का चबूतरा बना दिया गया है , जल्दी ही बरगद ने फिर से नई जगह पर जड़ें जमा लीं , उसकी हरियाली से बाबा की आँखों में अश्रुजल छलक आये . बरगद ने विस्थापन स्वीकार कर लिया था .बाबा ने भी अनु के आग्रह को मान लिया था और अनु की पढ़ाई के लिये आज बाबा सपरिवार सामान सहित शहर की ओर जा रहे थे , बाबा ने देखा कि बरगद में नई कोंपले फूट रही थीं .

लहरों से किनारे तक

हौसलों की कसर है बस लहरों से किनारे तक
रात भर का फासला है अँधेरे से उजाले तक

दूर बहुत लगती हो खुद में ही उलझी उलझी
हाथ भर का फासला है हमारे से तुम्हारे तक

मोहब्बत लेती है इम्तिहान कई कई मुश्किल
पहुँचती है तब जाकर अँखियों के इशारे तक

घुली हुई हो गंध हवन की पवन में जैसे
वैसी ही तू बसी हुई है घर के द्वारे द्वारे तक

कौन है जिसके आगे हमसब हरदम बेबस होते है
कैद नहीं ताकत वो कोई मस्जिद और दिवाले तक

घोटालों की शकलें बदलीं वही कहानी पर हर बार
कभी है मंदी कभी है तेजी हर्षद और हवाले तक

शब्दों की सीमा असीम है शब्द ब्रह्म है शाश्वत हैं
शब्द ज्ञान हैँ शब्द शक्ति हैं पोथी और रिसाले तक

- विवेक रंजन श्रीवास्तव

रविवार, 22 मार्च 2009

कविता एक पुडिया - मौत का समान : प्रदीप पाठक


शोख हसीं बचपन,
और अब ताज़ा जवानी,
सब खत्म हो गया,
वह जो झील का पानी था,
फिर बेरंग हो गया,
सँभलते हुवे सपने,
सँवरते हुए अरमां,
फिर ओझल थे,
कोडियों को तरसते नैनां,
अब आँसुओं से बोझिल थे,
मैं तड़पता रहा,
एक लौ की गुजारिश करता रहा,
पर बेईमान सा हर एक कोई-
चोर नज़र आया,
मेरी जिंद जो पुडिया मे बंद थी,
उसे नोच आया,
मै सुबकता रहा,
रोता रहा,
हर पीडा में,
आज़ादी खोजता रहा,
कशमकश सी थी,
ज़िन्दगी औ' मौत के बीच,
हर अंगडाई में अपनी,
नई खामोशी सहेजता रहा,
अब क्या करूँ,
किसे कहूँ!
बहुत चुभन है,
कोई संभाले तड़पती तस्वीर को,
नहीं कोई लगन है।
मर रहा हूँ अब,
जल रहा हूँ अब,
शायद अब यही प्रायाश्चित्य है,
हर सांस मर्म पर आश्रित है।
( यह कविता मेरे उन नौजवान दोस्तों के लिए है जो ड्रग्स के शिकार हो रहे हैं... हम सब की गुजारिश है
इस ज़हर को मत अपनायें... यह सब कुछ ख़तम करता है.... सब कुछ...!! .... ज़िन्दगी बहुत ख़ूबसूरत है,
इसे हमारे साथ मिल कर आगे बढाइये... ग़म, नाउम्मीदी कभी आपके सपनों को नहीं डगमगायेगी....!!)

दोहे समय 'सलिल'

दोहे :

समय न होता है सगा, समय न होता गैर।
'सलिल' सभी की मांगता, है ईश्वर से खैर।

समय बड़ा बलवान है, चलें सम्हलकर मीत।
बैर न नाहक ही करें, बाँटें सबको प्रीत।

समय-समय पर कीजिये, यथा-उचित व्यवहार।
सदा न कोई जीतता, सदा न होती हार।

समय-समय की बात है, राजा होता रंक।
कभी रंक राजा बने, सदा रहें निश्शंक।

समय-समय का फेर है, आज धूप कल छाँव।
'सलिल' रह पर रख सदा, भटक न पायें पाँव।

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ग़ज़ल

अक्स लखनवी

जिसकी आँखों में अक्स उतरा नहीं।
बस वही सामने मेरे चेहरा नहीं।

मेरे बारे में इतना भी सोचा नहीं।
वक्ते-रुखसत पलटकर भी देखा नहीं।

जब से देखी हैं रानाइयाँ आपकी।
दिल मेरे पास पल भर भी ठहरा नहीं।

दाग दिखाते न हों ये अलग बात है।
आज दामन किसी का भी उजला नहीं।

वुसअते आरजू पूछिए मत अभी।
आसमां भी कभी इतना फैला नहीं।

खिल्वतों में तो तुम मिलते हो रात-दिन।
जल्वतों में मगर कोई जलवा नहीं।

कौन दरिया की मानिंद देगा पनाह?
दर कोई मछलियों के लिए वा नहीं।

दूसरों के घरों में न झाँका करो।
जब निगाहों में ऐ अक्स! पर्दा नहीं.

- अक्स = प्रतिबिम्ब, वक्ते-रुखसत = बिदाई का समय, रानाइयाँ = सुन्दरता, वुसअते आरजू = इच्छाओं का विस्तार, खिल्वतों = एकांत, जल्वतों = खुले-आम, वा = खुला हुआ.
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मुक्तक संजीव 'सलिल'

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खन-खन, छम-छम तेरी आहट, हर पल चुप रह सुनता हूँ।
आँख मूँदकर, अनजाने ही तेरे सपने बुनता हूँ।
छिपी कहाँ है मंजिल मेरी, आकर झलक दिखा दे तू-
'सलिल' नशेमन तेरा, तेरी खातिर तिनके चुनता हूँ।
*************************
बादलों की ओट में महताब लगता इस तरह
छिपी हो घूँघट में ज्यों संकुचाई शर्मीली दुल्हन।
पवन सैयां आ उठाये हौले-हौले आवरण-
'सलिल' में प्रतिबिम्ब देखे, निष्पलक होकर मगन।
*******************

शनिवार, 21 मार्च 2009

कम्प्यूटर पीडित।

व्यंग्य
कम्प्यूटर पीडित।
विवेक रंजन श्रीवास्तव
सी.-6, एम.पी.एस.ई.बी. कालोनी,
रामपुर, जबलपुर.

हमारा समय कम्प्यूटर का है, इधर उधर जहॉ देखें, कम्प्यूटर ही नजर आते है, हर पढा लिखा युवा कम्प्यूटर इंजीनियर है, और विदेश यात्रा करता दिखता है। अपने समय की सर्वश्रेष्ठ शिक्षा पाकर, श्रेष्ठतम सरकारी नौकरी पर लगने के बाद भी आज के प्रौढ पिता वेतन के जिस मुकाम पर पहुंच पाए है, उससे कही अधिक से ही, उनके युवा बच्चे निजी संस्थानों में अपनी नौकरी प्रारंभ कर रहे हैं, यह सब कम्प्यूटर का प्रभाव ही है।
कम्प्यूटर ने भ्रष्टाचार निवारण के क्षेत्र में वो कर दिखाखा है, जो बडी से बडी सामाजिक क्रांति नही कर सकती थी। पुराने समय में कितने मजे थे, मेरे जैसे जुगाडू लोग, काले कोट वाले टी. सी से गुपचुप बातें करते थे, और सीधे रिजर्वेशन पा जाते थे। अब हम कम्प्यूटर पीडितों की श्रेणी में आ गए है - दो महीने पहले से रिजर्वेशन करवा लो तो ठीक, वरना कोई जुगाड नही। कोई दाल नही गलने वाली, भला यह भी कोई बात हुई। यह सब मुए कम्प्यूटर के कारण ही हुआ है।
कितना अच्छा समय था, कलेक्द्रेट के बाबू साहब शाम को जब घर लौटते थे तो उनकी जेबें भरी रहती थीं अब तो कम्प्यूटरीकरण नें `` सिंगल विंडो प्रणाली बना दी है, जब लोगों से मेल मुलाकात ही नही होगी, तो भला कोई किसी को `ओबलाइज कैसे करेगा, हुये ना बडे बाबू कम्प्यूटर पीडित।
दाल में नमक बराबर, हेराफेरी करने की इजाजत तो हमारी पुरातन परंपरा तक देती है, तभी तो ऐसे प्यारे प्यारे मुहावरे बने हैं, पर यह असंवेदनशील कम्प्यूटर भला इंसानी जज्बातों को क्या समझे ? यहॉ तो ``एंटर´´ का बटन दबा नही कि चटपट सब कुछ रजिस्टर हो गया, कहीं कोई मौका ही नही।
वैसे कम्प्यूटर दो नंबरी पीडा भर नही देता सच्ची बात तो यह है कि इस कम्प्यूटर युग में नंबर दो पर रहना ही कौन चाहता है, मैं तो आजन्म एक नंबरी हूं, मेरी राशि ही बारह राशियों में पहली है, मै कक्षा पहली से अब तक लगातार नंबर एक पर पास होता रहा हूंं । जो पहली नौकरी मिली , आज तक उसी में लगा हुआ हूंं यद्यपि मेरी प्रतिभा को देखकर, मित्र कहते रहते हैं, कि मैं कोई दूसरी नौकरी क्यों नही करता `` नौकरी डॉट कॉम की मदद से,पर अपने को दो नंबर का कोई काम पसंद ही नही है, सो पहली नौकरी को ही बाकायदा लैटर पैड और विजिटिंग कार्ड पर चिपकाए घूम रहे हैं। आज के पीडित युवाओं की तरह नही कि सगाई के समय किसी कंपनी में , शादी के समय किसी और में , एवं हनीमून से लौटकर किसी तीसरी कंपनी में , ये लोग तो इतनी नौकरियॉं बदलते हैं कि जब तक मॉं बाप इनकी पहली कंपनी का सही- सही नाम बोलना सीख पाते है, ये फट से और बडे पे पैकेज के साथ, दूसरी कंपनी में शिफ्ट कर जाते हैं, इन्हें केाई सेंटीमेंटल लगाव ही नही होता अपने जॉब से। मैं तो उस समय का प्राणी हूं, जब सेंटीमेंटस का इतना महत्व था कि पहली पत्नी को जीवन भर ढोने का संकल्प, यदि उंंघते- उंंघते भी ले लिया तो बस ले लिया। पटे न पटे, कितनी भी नोंकझोंक हो पर निभाना तो है, निभाने में कठिनाई हो तो खुद निभो।
आज के कम्प्यूटर पीडितों की तरह नही कि इंटरनेट पर चैटिंग करते हुए प्यार हो गया और चीटिंग करते हुए शादी,फिर बीटिंग करते हुए तलाक।
हॉं हम कम्प्यूटर की एक नंबरी पीडाओं की चर्चा कर रहे थ्ेा, अब तो `` पैन ³ªाइव´´ का जमाना है, पहले फ्लॉपी होती थी, जो चाहे जब धोखा दे देती थी, एक कम्प्यूटर से कॉपी करके ले जाओ, तो दूसरे पर खुलने से ही इंकार कर देती थी। आज भी कभी साफ्टवेयर मैच नही करता, कभी फोंन्टस मैच नही करते, अक्सर कम्प्यूटर, मौके पर ऐसा धोखा देते हैं कि सारी मेहनत पर पानी फिर जाता है, फिर बैकअप से निकालने की कोशिश करते रहो। कभी जल्दबाजी में पासवर्ड याद नही आता, तो कभी सर्वर डाउन रहता है। कभी साइट नही खुलती तो कभी पॉप अप खुल जाता है, कभी वायरस आ जाते हैं तो कभी हैर्कस आपकी जरुरी जानकारी ले भागते हैं, अथाZत कम्प्यूटर ने जितना आराम दिया है, उससे ज्यादा पीडायें भी दी हैं। हर दिन एक नई डिवाइस बाजार में आ जाती है, ``सेलरॉन´´ से ``पी-5´´ के कम्प्यूटर बदलते- बदलते और सी.डी. ड्राइव से डी.वी.डी. राईटर तक का सफर , डाट मैट्रिक्स से लेजर प्रिंटर तक बदलाव, अपडेट रहने के चक्कर में मेरा तो बजट ही बिगड रहा है। पायरेटेड साफ्टवेयर न खरीदने के अपने एक नंबरी आदशोZं के चलते मेरी कम्प्यूटर पीडित होने की समस्यांए अनंत हैं, आप की आप जानें। अजब दुनिया है इंटरनेट की कहॉं तो हम अपनी एक-एक जानकारी छिपा कर रखते हैं, और कहॉं इंटरनेट पर सब कुछ खुला- खुला है, वैब कैम से तो लोंगों के बैडरुम तक सार्वजनिक है, तो हैं ना हम सब किसी न किसी तरह कम्प्यूटर पीडित।





विवेक रंजन श्रीवास्तव
रामपुर, जबलपुर.

बिजली है तो ही इस जग की, हर गतिविधि आसान है

अग्नि , वायु , जल गगन, पवन ये जीवन का आधान है
इनके किसी एक के बिन भी , सृष्टि सकल निष्प्राण है !

अग्नि , ताप , ऊर्जा प्रकाश का एक अनुपम समवाय है
बिजली उसी अग्नि तत्व का , आविष्कृत पर्याय है !

बिजली है तो ही इस जग की, हर गतिविधि आसान है
जीना खाना , हँसना गाना , वैभव , सुख , सम्मान है !

बिजली बिन है बड़ी उदासी , अँधियारा संसार है ,
खो जाता हरेक क्रिया का , सहज सुगम आधार है !

हाथ पैर ठंडे हो जाते , मन होता निष्चेष्ट है ,
यह समझाता विद्युत का उपयोग महान यथेष्ट है !

यह देती प्रकाश , गति , बल , विस्तार हरेक निर्माण को
घर , कृषि , कार्यालय, बाजारों को भी ,तथा शमशान को !

बिजली ने ही किया , समूची दुनियाँ का श्रंगार है ,
सुविधा संवर्धक यह , इससे बनी गले का हार है !

मानव जीवन को दुनियाँ में , बिजली एक वरदान है
वर्तमान युग में बिजली ही, इस जग का भगवान है !

कण कण में परिव्याप्त , जगत में विद्युत का आवेश है
विद्युत ही जग में , ईश्वर का , लगता रूप विशेष है !!


- प्रो सी बी श्रीवास्तव

शुक्रवार, 20 मार्च 2009

गीतिका

तुम

आचार्य संजीव 'सलिल'

सारी रात जगाते हो तुम।
नज़र न फिर भी आते हो तुम.

थक कर आँखें बंद करुँ तो-
सपनों में मिल जाते हो तुम.

पहले मुझ से आँख चुराते,
फिर क्यों आँख मिलाते हो तुम?

रूठ मौन हो कभी छिप रहे,
कभी गीत नव गाते हो तुम

'सलिल' बांह में कभी लजाते,
कभी दूर हो जाते हो तुम.

नटवर नटनागर छलिया से,
नचते नाच नचाते हो तुम

****************************
ग़ज़ल

डॉ. महेंद्र अग्रवाल, शिवपुरी

मुसीबत पीठ पर कोई लदी वो मुस्कुराता है
उठाकर सर खडी हो त्रासदी वो मुस्कुराता है

विरासत में मिली है शानो-शौकत राजवंशी है
कभी करवट बदलती है सदी वो मुस्कुराता है

महाजन गाँव से आकर शहर में और लापरवाह
उफनती है वहाँ जब भी नदी वो मुस्कुराता है

हमारे बीच का, हमने चुना सरदार अपना ही
कबीले में खिली जब भी बदी वो मुस्कुराता है

शहर जलता रहा फिर भी मगन वो बाँसुरी में था
मुसीबत में अगर हो द्रौपदी वो मुस्कुराता है

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भक्ति गीत

प्रो भागवत प्रसाद मिश्र 'नियाज़'

राममय जीवन बनाओ,
राम से ही काम रखो,
राम का ही नाम गाओ...

राम पुरुषोत्तम पुरुष हैं,
राम मर्यादा पुरुष हैं।
अनुकरण उनका करो तुम-
सृष्टि के वे युग पुरुष हैं।

राम के आदर्श धारणकर
सफल जीवन बनाओ...

कौन ऐसा है जिसे पथ में
न बाधाएँ सतायें?
कौन ऐसा है न जिसको
घेरती काली घटायें?

उठो! गोवर्धन उठाकर
कृष्ण का सा बल दिखाओ...

कृष्णमय जीवन बनाओ।
राममय जीवन बनाओ..

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ग्वारीघाट (गौरीघाट) जबलपुर जहाँ सती ने शिव को पाने के लिए तप किया था

ग्वारीघाट

दोहे डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र, देहरादून

नदियों के इस देश में, अपना यही वजूद।
पहले डूबा टेहरी, अब डूबा हरसूद।

चाहे वह हो सीकरी, चाहे वह हो ताज।
खाली घर में गूँजती, है भरी आवाज।

मन का रिश्ता भूलकर, तन का रिश्ता जोड़।
इस परदेसी शहर में, गंवई बातें छोड़।

पवन बसन्ती रात-दिन, मारे सूखी मार।
फिर भी लौटाए नहीं, मन जो लिया उधार।

सुधियों में फागुन गया, दुविधा गया सनेह।
भीगे मन की छाँव में, सगुन मनाती देह.

रूपाजीवी-साधू में, सदा रही तकरार।
कान्चीमठ से है खफा, इसीलिये सरकार।

आँगन में ही नीम था, किन्तु न समझा मोल।
रोगी था मधुमेह का, मरा खुली तब पोल।

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कविता

ईसा और मैं

डॉ।किशोर काबरा, अहमदाबाद

क्रूस पर लटका
ड्राइंग रूम की शोभा बढाता
ईसा का खिलौना, बड़ा सलौना।
बच्चे आखिर बच्चे,
बच्चों ने ईसा को सूली से उतार दिया।
पूछा तो बोले-
सदियों से लटका है।
तकलीफ बड़ी होती थी।
भड़क उठा मैं-
ये क्या जानेंगे कल के छोकरे
बड़ों की इज्जत करना?
अरे! ईसा तकलीफ सहेगा, या न सहेगा,
पर यहाँ आकर कोई देखेगा तो क्या कहेगा?
और मैंने ईसा को फिर से सूली पर चढा दिया।
मेरा ड्राइंग रूम चमक उठा।

**************************************

हाइकु नलिनीकांत

हाइकु

नलिनीकांत
खांचे का पंछी
चिल्लाया करता है
मुक्ति के लिए।

राम-राम है
रट रहा, बाहर
होने के लिए।

फडफडाया
करता पंख, खुले
व्योम के लिए.

अक्सर वह
रहता है गुस्से में
हवा के लिए.

गाता नहीं है,
रोया करता, उड़
जाने के लिए.

तरस रहीं
आँखें उसकी, हरे
दृश्य के लिए.

किया करता
प्रार्थना प्रभु जी की
मुक्ति के लिए.

**************************

kavita samay khatm devendra mishra

कविता

समय ख़त्म

देवेन्द्र कुमार मिश्रा

खेल शुरू होने से पहले की
जिज्ञासा और तैयारी
चलते खेल पैर भरी
कोशिश जीतने की
दोनों पक्ष पसीने से तरबतर
भरपूर प्रयास
जी तोड़ कोशिश
दर्शक दीर्घ में बैठे
अपने-अपने खिलाड़ियों की
जीत के प्रति प्रार्थना
भरोसा और
हौसला अफजाई भी
जीत लक्ष्य है।
जीतना चाहते हैं दोंनों ही
पर
जीतता कोई एक ही है
किसी को तो हारना भी है।
कौन जीता?
अधिक मेहनती,
अधिक लगनवाला,
या किस्मतवाला?
जीत-हार न हो तब भी
सीटी बजी- खेल ख़त्म
समय तो सीमित ही है
समय ख़त्म...खेल ख़त्म...
ऐसे ही चलता है जीवन
खेलो..हारो...जीतो...
समय पर सब ख़त्म।

*******************

गुरुवार, 19 मार्च 2009

क्षणिका

बेटियाँ भगवान् की देन
फिर विवाह में
कैसा लेन-देन ?
- सोनी जर्मनी से
दोहे पर्यावरण के

कैलाश त्रिपाठी

ज़हर हवा में छोड़ते, तनिक नहीं संकोच।
जीवन दूभर हो रहा, बदलो अपनी सोच.

प्रतिदिन बढ़ता जा रहा, भूमंडल का ताप।
अनियोजित उद्योग है, जीवन का अभिशाप.

क्षरण हुआ ओजोन का, अन्तरिक्ष तक घात।
सागर में भी जा रही, ज़हरीली सौघात.

कविताओं में रह गया, शीतल सुखद समीर।
वन काटे, छोडा धूंआ, वायु मलिन गंभीर।

--शिव कुटी, आर्य नगर, अजीतमल, औरैया।

***************************************

बुधवार, 18 मार्च 2009

कविता

जीवन का सत्य

--सलिल

मुझे 'मैं' ने, तुझे 'तू' ने, हमेशा ही दिया झाँसा.
खुदी ने खुद को मकडी की तरह जाले में है फांसा. .
निकलना चाहते हैं हम नहीं, बस बात करते हैं.
खुदी को दे रहे शह फिर खुदी की मात करते हैं.
चहकते जो, महकते जो वही तो जिन्दगी जीते.
बहकते जो 'सलिल' निज स्वार्थ में वे रह गए रीते.
भरेगा उतना जीवन घट करोगे जितना तुम खाली.
सिखाती सत्य जीवन का हमेशा खिलती शेफाली.

कविता :

ऋतुराज बसंत

अवनीश तिवारी

जब धरती करवट लेती है ,
और अम्बर का जी भर देती है ,

जब गोरी पर नैन टिकती है ,
और बेचैनी में रैन कटती है ,

जब तन प्रेम रुधिर बहता है ,
और मन अस्थिर कर जाता है ,

जब छुअन , चुम्बन के दृश्य होते हैं,
और इर्द - गिर्द के परिदृश्य बदलते हैं,

जब प्रेम - पूर्ण ह्रदय इतराता है,
और प्रेम - रिक्त दिल पछताता है,

जब नव दुल्हन अक्सर हंसती है ,
और कुंवारी कोई तरसती है,

जब सारी सीमायें टूटती है,
और मिलन योजनायें बनती है,

जब गाँव के गाँव महकते है,
और शहर के शहर संवरते है,

तब ऋतुराज बसंत आता है,
और मधुमास, बहार दे जाता है

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स्तुति: नमन नर्मदा मातु...

स्तुति:

नमन नर्मदा मातु...

आचार्य संजीव 'सलिल'

नमन नर्मदा मातु को, नित्य निनादित धार।

भव-भय-भंजन कर रहीं, कर भव सागर पार।

कर भव सागर पार, हरें दुःख सबके मैया।

जो डूबे हो पार, किनारे डूबे नैया।

कल-कल में अनहद सुनो, किल-किल का हो अंत।

अम्ल विमल निर्मल 'सलिल', व्यापे दिशा-दिगंत।

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मंगलवार, 17 मार्च 2009

विशेष लेख :
‘जा घट प्रेम न संचरै...’-
डॉ.सी. जय शंकर बाबु
‘प्रेम’ ढ़ाई अक्षरों का अप्रतिम शब्द है । ‘ढ़ाई आखर प्रेम का पढ़े सुपंडित होय’ – उक्ति कोई निरर्थक कथन नहीं है । एक दार्शनिक कवि के अनुभव के सार के रूप में ही यह व्याख्या निसृत हुई है । वास्तव में प्रेम एक ऐसी अनूठी भावना है, जिसे समझे बिना संसार में कोई कवि नहीं बन पाया है ।
प्रेम-भावना अथवा प्रेम की अवधारणा को समझे बिना संसार में कोई दार्शनिक भी नहीं बन पाया है । प्रेम ईश्वरीय भावना का प्रतीक है । असीम प्रेम की अलौकिक शक्ति की संज्ञा ही ‘ईश्वर’ है । आधुनिक विज्ञान के सिद्धांत भले ही ईश्वरीय तत्व को नहीं मानते हैं, किंतु मनोवैज्ञानिक अध्ययनों में एक विशेष मनोविकार के रूप में अवश्य ही मान्यता है ।
प्रेम व्यापक अर्थ वाला शब्द है, जिसकी सीमित शब्दों में कोई सर्वमान्य परिभाषा देना अथवा सीमित वाक्यों में विश्लेषण करना कठिन कार्य है । प्रेम भावना में एक चमत्कारी शक्ति है । प्रेम का इतना महत्व है कि प्रेम के बिना संसार का अस्तित्व अकल्पनीय है । प्रेम अस्तित्व का एवं अमूर्त शक्ति स्रोत का प्रतिरूप है। प्रेम एक विशिष्ट एवं अनूठा दैवी गुण है ।
मानव की संज्ञा मनुष्य के साथ जुड़ने का मुख्य कारण यह है कि वह अन्य प्राणियों की तुलना में गुण-संपन्न एवं बुद्धि-कुशल है । हिंदी में प्रेम भावना को अभिव्यक्त करने के लिए कई शब्द प्रयुक्त होते हैं – जैसे अनुराग, प्यार, प्रीति, स्नेह, इश्क़, मुहब्बत आदि । इन तमाम शब्दों में जो भी उत्कृष्ट आयाम हैं, वे सब ‘प्रेम’ में समाविष्ट हैं । ऐसे अनूठे प्रेम तत्व के विभिन्न आयामों के संदर्भ में कई विद्वानों ने अध्ययन किया है । ऐसे अध्ययनों से कई तथ्य उजागर हुए हैं । प्रेम भावना संबंधी संकल्पना, विवेचन, विश्लेषण एवं चिंतन – ये सब किसी रूप में प्रेम का गुणगान ही है ।
प्रेम में कई श्रेष्ठ तत्व मौज़ूद हैं जो असाध्य को सुसाध्य में परिवर्तित करने में सक्षम हैं । इन तमाम सुगुणों को ध्यान में रखते हुए प्रेम को ‘गुणों की खान’ कहना भी उचित ही लगता है । प्रेम को सांसारिक, असांसारिक (लौकिक – अलौकिक), दैवी, मानवीय आदि कई रूपों में मानते हैं । भले ही जितने भी उसके रूप हम मानते हैं, प्रेम की मूल भावना एक ही है, वह अतुलनीय है, अप्रतिम है ।प्रेम भावना को धारण करने वाले जीव से बढ़कर न कोई पंडित है, न कोई वीर, न कोई साहसी, न संत, न कोई योगी, न मानव, न कोई दैवी शक्ति ही है । तमाम उत्कृष्टताओं के कारण प्रेम तत्व के संदर्भ में विवेचन, विश्लेषण, चिंतन एवं अनुचिंतन के आधार पर कई विद्वान पुरुष, चिंतक, दार्शनिक एवं संत महात्माओं ने अपने उदगार प्रकट किए हैं ।
हिंदी के संत एवं दार्शनिक कवि कबीरदास जी ने प्रेम का मार्मिक विवेचन प्रस्तुत किया है । कबीर के विचार में बृहत ग्रंथ पढ़कर संसार में कोई पंडित नहीं बन पाए हैं, ढ़ाई अक्षरों के ‘प्रेम’ शब्द के समूचे तत्वों को समझनेवाले निश्चय ही अच्छे पंडित साबित हुए हैं । कबीरदास जी ने कहा है –
“पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ पंडित भया न कोय ।
ढ़ाई आखर प्रेम का पढ़े सुपंडित होय ।।”
उन्होंने यह भी कहा है –
“प्रेम न बाड़ी ऊपजौ, प्रेम न हाट बिकाय ।
राजा परजा जेहि रुचै, सीस देइ लै जाय ।।”
कबीरदास जी की राय में प्रेम न तो बगीचे में पैदा होता है और न वह बाज़ार में बिकता है । राजा और प्रजा जो किसी भी स्तर का क्यों न हो, जिसको यह प्रेम अच्छा लगे वही अपना सिर देकर अर्थात अहंकार छोड़कर उसे ले जा सकता है और प्रेम का एक साथ पनपना संभव नहीं है । अहंकार रहित हृदय में ही प्रेम का दर्शन संभव है ।
इस संदर्भ को कबीरदास की एक और उक्ति स्पष्ट करती है –“प्रेम गली अति साँकरी, तामें दो न समाहिं....”इसी विचार को कबीरदास जी ने एक और ढंग से कहा है –
“पीया चाहे प्रेम रस, राखा चाहे मान ।
एक म्यान में दो खड्ग, देखा सुना न कान ।।”
अर्थात् जो व्यक्ति प्रेम रस पीना चाहता है, वह यदि अभिमान भी रखना चाहता है – ये दोनों एक साथ निभाना कैसा संभव है ? एक म्यान में दो खड्ग रहने की बात न तो कानों से सुनी है और न उसे आँकों से देखा है । अहंकार प्रेम का शत्रु है । प्रेम और अहंकार को एक ही हृदय में स्थान नहीं मिलता है ।मानव को सृष्टि में उत्कृष्ट प्राणी के रूप में मान्यता है । प्रेम मानवीयता का एक महत्वपूर्ण आयाम है ।
यदि मनुष्य को सृष्टि का शृंगार कहा जाए तो अवश्य ही प्रेम को मानवीयता का शृंगार कहा जा सकता है । इसलिए यहाँ तक कहा गया है –
“प्रेम भाव एक चाहिए, भेष अनेक बनाय ।
चाहे घर में बास कर, चाहे बन को जाय ।।”
अर्थात् चाहे लाख तरह के भेष बदलें, घर पर रहें, चाहे वन में जाएं परंतु प्रेम-भाव ज़रूर होना चाहिए । अर्थात् संसार में किसी भी स्थान पर, किसी भी स्थिति में रहें, मगर प्रेम भाव से रहना चाहिए ।
प्रायः कबीरदास की तुलना तमिल के संत कवि तुरुवल्लुवर से की जाती है । इन दोनों संत कवियों के विचारों में कई आयामों में समानता नज़र आती है । संत तिरुवल्लुवर ने तो कबीरदास जी से लगभग हजार वर्ष पूर्व ही अपने श्रेष्ठतम विचारों को ‘तिरुक्कुरल’ में अक्षरबद्ध किया था । संत तिरुवल्लुवर की अनन्य कृति ‘तिरुक्कुरल’ को तमिल वेद के रूप में विशिष्ट मान्यता है ।संत तिरुवल्लुवर ने भी प्रेम को सर्वश्रेष्ठ गुण का दर्जा दिया है । उत्तम गुणों की सूची में उन्होंने प्रेम को प्रथम स्थान पर रखा है । उन्होंने गुण-संपन्नता के आधारों के संबंध में लिखित ‘कुरल’ (तमिल का एक प्रसिद्ध दोहा-छंद, जिसमें प्रथम पंक्ति में चार शब्द एवं दूसरी पंक्ति में तीन शब्द होते हैं
यहाँ उद्धृत है –“अंबुनाण् ऑप्पुरवु कण्णोट्टम् वाय्मैयॉडुऐंदुशाल्पु ऊनरिय तूण ।”प्रेम, पाप-भीती, उदारता, करुणा तथा सत्यभाषिता – ये पांचों श्रेष्ठ गुण आचरण के आधार-स्तंभ हैं । संत तिरुवल्लुवर ने अपने इस कुरल में प्रेम को प्रथम स्थान पर रखा है । तिरुवल्लुवर जी के विचार में इन गुणों से वंचित मनुष्य संसार के लिए भार है और संसार उनके भार-वहन करने में असमर्थ हो जाएगा । प्रेम के संबंध में संत तिरुवल्लुवर के विचार मननीय एवं आचरणीय हैं । उनके विचार में अनभिज्ञ लोग अक्सर यह कहते नज़र आते हैं कि प्रेम धर्म की चीज़ है, मगर वास्तविकता यह है कि प्रेम हमें दुष्टता से बचानेवाला रक्षक है । प्रेम से संसार में स्नेह बढ़ जाता है, जो सब कुछ मंगलमय बना देता है । जिनका जीवन प्रेममय होता है उन्हें सच्चा सुख और समृद्धि सुलभ हो जाते हैं ।
सूरज की तेज धूप से जिस भांति अस्तिहीन कीटादि झुलस जाते हैं, वैसे ही प्रेम रहित लोगों को धर्म लील लेता है । प्रेम-रहित प्राणी स्वार्थी होते हैं । प्रेम से भरपूर प्राणी अपने सर्वस्व अर्पित करने के लिए तत्पर रहते हैं ।
इस प्रकार संत तिरुल्लुवर ने ‘तिरुक्कुरल’ में प्रेम के संबंध कई जगह अपनी सुंदरतम भावनाएँ प्रकट की हैं । उनके अनुसार प्रेम ही जीवन है और प्रेम-रहित तन केवल अस्थि-पंजर है । उन्होंने प्रेम रहित जीवन को मरुभूमि में पुष्पित होनेवाले फूल के बराबर माना है । प्रेम केवल बहिरंग की ही नहीं, अंतरंग की भी शोभा है । प्रेम रहित सुंदरता की कल्पना करना निरर्थक है ।
तिरुवल्लुर जी यह प्रश्न करते हैं कि क्या प्रेम-द्वार का कोई ताला होता है ... इसका समाधान स्वयं वे ही देते हैं – “प्रिय के नयन-सिंधु से जनित अश्रु-बिंदुओं से ही हृदय का प्रेम प्रकट हो जाता है ।” उनके विचार में अस्तिमय देह से आत्मा के बार-बार जुड़ने का कारण भी यही है कि वह प्रेमानंद का फ़ायदा उठाना चाहती है ।प्रेम सृष्टि का महत्वपूर्ण तत्व है । पवित्र हृदय में प्रेम भाव अवश्य रहता है । जहाँ तिरुवल्लुवर ने प्रेम रहित देह को अस्ति-पंजर की संज्ञा दी है, वहीं कबीरदास जी प्रेम रहित हृदय को श्मशान तुल्य मानते हैं ।
संत कबीर ने एक मार्मिक उदाहरण से इस विचार को प्रकट करने का प्रयास किया है –
“जा घट प्रेम न संचरै, सो घट जान मसान ।
जैसे खाल लोहार की, साँस लेत बिनु प्रान ।”
अर्थात् जिस हृदय में प्रेम का संचार नहीं होता, उस हृदय को श्मशान समझना चाहिए । वह व्यक्ति जिसके हृदय में प्रेम का संचार नहीं होता है, लोहार की धौंकनी की तरह प्राण के बिना ही साँस लेता है ।हृदय में प्रेम भाव को स्थान न देकर अपने हृदय को श्मशान साबित करना कौन चाहता है ?
मानव मात्र के हृदयों में प्रेम तत्व भर जाने से अवश्य ही सारा संसार प्रेममय बन जाएगा । संसार में अशांति का सवाल ही नहीं उठता है । आधुनिक समय के आध्यात्मिक विचारक ओशो की इन पंक्तियों में प्रेम तत्व के महत्व की झांकी मिल जाती है – “प्रेम का जीवन ही सृजनात्मक जीवन है । प्रेम का हाथ जहाँ भी छू देता है, वहाँ क्रांति हो जाती है, वहाँ मिट्टी सोना हो जाती है । प्रेम का हाथ जहाँ स्पर्श देता है, वहाँ अमृत की वर्षा शुरू हो जाती है । जरूरी है हम प्रेमल बने रहे, तभी यह दुनिया प्रेमपूर्ण होगी ।”संसार में शांति पनपने के लिए आज प्रेम भावना को फैलाने की बड़ी ज़रूरत है ।
अतिवाद के जितने भी भयानक रूप उभर रहे हैं तथा उनके जितने भी अमानवीय कृत्यों से यह संसार पीड़ित है, वे सब मानवीयता पर न मिटने वाले दाग़ हैं । तथाकथित अतिवादियों में रंच मात्र भी प्रेम भरने में हम सफल हो जाएंगे तो दुनिया में शांति का साम्राज्य सुस्थापित हो पाएगा । प्रेम में निश्चय ही वह अजस्र शक्ति है ।आज हम कहीं तथाकथित धर्म के पीछे भी पागल होते जा रहे हैं और प्रेम से नाता तोड़ रहे हैं । जिसमें प्रेम नहीं, वह कोई धर्म नहीं है । स्वामी विवेकानंद ने कहा था – “दूसरों से प्रेम करना धर्म है, द्वेष करना पाप ।” मेरे विचार में सभी धर्मों का तत्व सार ही ‘प्रेम’ है । ‘जियो और जीने दो’ की संकल्पना को साकर बनाने के लिए संसार को प्रेममय बनाने की नितांत आवश्यकता है ।
आइए हम सब ढ़ाई अक्षरों के ‘प्रेम' को पढ़ें और बड़े प्रेमी-स्वभाव के बन जाएं ।
संपादक, ‘युग मानस’,18/795/एफ़/8-ए, तिलक नगर,गुंतकल (आं।प्र।) – ५१५ ८०१
ई-मेल – yugmanas@जीमेल.com
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पुस्तक समीक्षा :समयजयी साहित्यशिल्पी भगवतप्रसाद मिश्र 'नियाज़' : व्यक्तित्व-कृतित्व - एक अद्बुत कृति


पुस्तक समीक्षा :
समयजयी साहित्यशिल्पी भगवतप्रसाद मिश्र 'नियाज़' : व्यक्तित्व-कृतित्व - एक अद्बुत कृति

समीक्षक : प्रो. अर्चना श्रीवास्तव,
d 105 shilendra nagar रायपुर
( कृति विवरण : नाम- समयजयी साहित्यशिल्पी भगवतप्रसाद मिश्र 'नियाज़' : व्यक्तित्व-कृतित्व, विधा- समालोचना, संपादक : संजीव 'सलिल', आकार- डिमाई, बहुरंगी सजिल्द आवरण, पृष्ठ ४५५, मूल्य- ५०० रु., प्रकाशक- समन्वय प्रतिष्ठान, २०४ विजय अपार्टमेन्ट, नेपिअर टाऊन, जबलपुर ४८२००१ )
समयजयी साहित्यशिल्पी भगवदप्रसाद मिश्र 'नियाज़' : व्यक्तित्व - कृतित्व एक अद्बुत कृति है जिसमें हिन्दी के इस वरिष्ठतम तथा प्रतिष्ठित साहित्यकार के इन्द्रधनुषी साहित्यिक-शैक्षणिक योगदान का निष्पक्ष मूल्यांकन किया गया है. प्रस्तुत ग्रन्थ को हिन्दी स्वरों के आधार पर अ से अः तक १२ सर्गों में विभक्त किया गया है.
'चित्र-चित्र स्मृतियाँ अनुपम' के अंतर्गत श्री मिश्र की चित्रमय जीवन झांकी ८ शीर्षकों में विभक्त कर संजोई गयी है. 'सांसों का सफर' में ९० वर्षीय चरितनायक का संक्षिप्त शाब्दिक जीवन वृत्त है. 'कुछ अपनी कुछ अपनों की' के २२ आलेख मिश्र जी के स्वजनों-परिजनों, मित्रों, स्नेहियों, वरिष्ठ व समकालिक रचनाकारों द्वारा लिखे गए हैं जिनमें ३ पीढियों की भावांजलियाँ हैं. 'कलकल निनादिनी नर्मदा' शीर्षक अध्याय नियाज़ की कम लम्बी काव्य रचनाओं के संग्रहों तरंगिणी, गीत रश्मि, अजस्रा, व जननी जन्मभूमिश्च पर केंद्रित समालोचनात्मक आलेखों से समृद्ध हुआ है. 'नील नीरनिधि नील नभ' नामक सर्ग में खंड काव्य कारा, दीर्घ कविताओं के संग्रह कस्मै देवाय, दीर्घा, अनुवादित खंड काव्य धाविका का आकलन विद्वदजनों ने किया है. शायर नियाज़ के कलाम को 'भँवरे की गुनगुन' अध्याय में १६ पारखियों ने परखा है. गजल संग्रहों तलाश, आखिरी दौर, खामुशी व अहसास तथा कता संग्रह ज़रा सुनते जाइए को १६ जानकारों ने कसौटी पर कसकर खरा पाया है.
बहुमुखी प्रतिभा के धनि मिश्रजी ने बल साहित्य के सारस्वत कोष को शिशुगीत, चाचा नेहरू, क्या तुम जानते हो? तथा सूक्ति संग्रह नामक कृतियों से नवाजा है. 'डगमग पग धर च्कोओ लें नभ' के अंतर्गत बाल साहित्य निकष पर है. अंग्रेज़ी के प्राध्यापक रहे मिश्रजी अंग्रेज़ी में सृजन न करें यह नामुमकिन है. 'भाव शब्द ले काव्य है' नामक अध्याय में द ब्रोकन मिरर एंड अदर पोयम्स एवं पेटल्स ऑफ़ लव दो संग्रहों की विवेचना की गयी है.
'गोमती से साबरमती तक' शीर्षक अध्याय में मिश्रजी के गद्य साहित्य कथा संग्रह त्रयोदशी व संस्मरण संग्रह अतीत इक झलकियाँ पर विवेचनात्मक आलेख हैं. आदर्श शिक्षक और शिक्षाविद के रूप में मिश्र जी के अवदान को परखा गया है 'सघन तिमिर हर भोर उगायें' शीर्षक सर्ग में.
विश्व वाणी हिन्दी व सम्पर्क भाषा अंग्रेज़ी के मध्य संपर्क सेतु बने मिश्र जी द्वारा ३१ देशों में प्रचलित १८ भाषाओँ के १११ कवियों की कविताओं का हिन्दी काव्यानुवाद किया है. 'विश्व कविता' शीर्षक इस कृति तथा डॉ अम्बाशंकर नगर के काव्य संग्रह 'चाँद चांदनी और कैक्टस' के मिश्र जी कृत अंग्रेज़ी अनुवाद 'मून मूंलित एंड कैक्टस' की समीक्षा 'दिल को दिल से जोड़े भाषा' अध्याय में है.
समीक्षक के रूप में मिश्र जी द्वारा समकालिक साहित्यकारों की कृतियों का सतत मूल्यांकन किया जाता रहा. 'कौन कैसा कसौटी पर' सर्ग में समीक्ष कर्म को परखा गया है.'बात निकलेगी तो फ़िर' में मिश्रजी के दो लम्बे साक्षात्कार हैं जिनमें उनकी रचनाधर्मिता से जुड़े विविध पक्षों पर प्रकाश डाला गया है. अन्तिम पर महत्वपूर्ण अध्याय 'साईं भजे भाव पार हो' में मिश्रजी के आध्यात्मिक-धार्मिक कृतित्व का आकलन है. सुमनांजलि, भक्त संह भगवान, साईं चालीसा, साईं बाबा द इटरनल कम्पेनियन, रिलेशनशिप विथ गोड, मैं हरि पतित पवन सुने, वेद पुरूष वाणी, ॐ साईं बाबा और नर नारायण गुफा आश्रम, साईत्री, ॐ श्री साईश्वर, श्री साईं यंत्र-मन्त्र, आध्यात्मिक अनुभूतियाँ, तथा श्री साईं गीतांजली संकीर्तनम आदि कृतियों पर १६ आलेख इस अध्याय में हैं.
श्री नियाज जी जैसे वरिष्ठ साहित्यकार के ७० वर्षीय बहु आयामी योगदान के लगभग हर पहलू का सम्यक-संतुलित मूल्यांकन कराकर शताधिक शोधपरक आलेखों को एक ही जगह सुव्यवस्थित सुनियोजित करने दे दुष्कर सम्पादकीय कार्य को संजीव सलिल ने निपुणता के साथ करने में सफलता पाई है. शोध छात्रों के लिए अत्यावश्यक ४५५ पृष्ठीय सजिल्द डिमाई आकार की यह कृति केवल ५०० रु. में समन्वय प्रकाशन, २०४ विजय अपार्टमेन्ट, नेपिअर टाऊन, जबलपुर ४८२००१ से प्राप्त की जा सकती है. समकालिक हिन्दी साहित्य के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर निआजजी के सकल साहित्य कर्म के निष्पक्ष विवेचन का यह श्रेष्ठ प्रयास वाकई अपनी मिसाल आप है.

मुक्तक : सन्दर्भ चाँद-फिजा प्रकरण

दिल लिया दिल बिन दिए ही, दिल दिया बिन दिल लिए।
देखकर यह खेल रोते दिल बिचारे लब सिए।
फिजा जहरीली कलंकित चाँद पर लानत 'सलिल'-
तुम्हें क्या मालूम तुमने तोड़ कितने दिल दिए।

कभी दिलवर -दिलरुबा थे, आज क्या हो क्या कहें?
यह बताओ तुम्हारी बेहूदगी हम क्यों सहें?
भाड़ में दे झोंक तुमको, तमाशा तुम ख़ुद बने।
तुम हवस के हो पुजारी, दूर तुम से हम रहें।

देह बनकर तुम मिले थे, देह तक सीमित रहे।
आज लगता भाव सारे, तुम्हारे बीमित रहे।
रोज चर्चाओं का बोनस, मिल रहा है मुफ्त में-
ठगे जन के मन गए हैं, दर्द असीमित रहे।

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गीत

श्वास गीत आस-प्यास अंतरा।
सनातन है रास की परम्परा । ।

तन का नही, मन का मेल जिंदगी।
स्नेह-सलिल-स्नान ईश- बन्दगी।
नित सृजन ही सभ्यता औ' संस्कृति।
सृजन हेतु सृष्टि नित स्वयंवरा। ।

आदि-अंतहीन चक्र काल का।
सादि-सांत लेख मनुज-भाल का।
समर्पण घमंड, क्रोध, स्वार्थ का।
भावनाविहीन ज्ञान कोहरा । ।

राग-त्याग नहीं सत्य-साधना।
अनुराग औ' आसक्ति पूत भावना।
पुरातन है प्रकृति-पुरूष का मिलन।
निरावरण गगन, धारा दिगंबरा। ।

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रविवार, 15 मार्च 2009

जब -जब भी तुम तनहा होगे

तब साथ मुझे ही पाओगे .

जब याद मेरी आ जायेगी.

तब ख़ुद से ही शरमाओगे.

हर कोशिश कर के देख लो तुम

पल भर भी भूल न पाओगे .

जैसे ही कुछ आहट होगी .

बाहों में 'सलिल' की आओगे।


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गुरु अर्थात अज्ञान के अंधकार को हटाकर ज्ञान के प्रकाश से पथ को आलोकित करने वलाप्रो. सी. बी . श्रीवास्तव "विदग्ध"

गुरु ...रघुवंश के संदर्भ में
प्रो. सी. बी . श्रीवास्तव "विदग्ध"

गुरु अर्थात अज्ञान के अंधकार को हटाकर ज्ञान के प्रकाश से पथ को आलोकित करने वाला , अर्थात समस्या का समाधान करने वाला या मार्ग दर्शन करने वाला ...जीवन को प्रकाशित करने वाला . विशेषतः अध्यात्म के क्षेत्र में .यही कारण है कि अतीत में गुरू का स्थान बहुत उँचा था .
गुरू को ईश्वर से प्रथम पूज्य मानने का कारण यही है कि वही ईश्वर का दर्शन कराता है . इसीलिये प्राचीन राजा महाराजाओ को गुरू के मार्गदर्शन का महत्व था और कठिनाई के समय समाधान का सहारा .
राजा दिलीप के संतान नहीं थी इसी लिये पुत्र की कामनापूर्ति हेतु वे गुरु से मिलकर कष्ट निवारण का उपाय जानने वन में गुरु के पास गये . गुरुवर ने उन्हें स्वर्ग लोक कामधेनु गाय की पुत्री नन्दिनी की सेवा करने की सलाह दी . निष्ठा पूर्वक वैसा करने पर राजा को पुत्र की प्राप्ति हुई , ...... रघुवंश के संदर्भ में
अथाभ्यच्र्य विधातारं प्रयतौ पुत्रकाम्यया ।
तौ दंपती वसिष्ठस्य गुरोर्जग्मतुराश्रमम् ।।
ब्रह्म की कर अर्चना , रख मन में विश्वास
दोनो पति पत्नी गये गुरू वशिष्ठ के पास ।। 35।।सर्ग १

नलिनीकांत के हाइकु गीत

नलिनीकांत के हाइकु गीत

तितली

तितली तुम
इन्द्रधनुषी रानी
रंग बिरंगी।

नाचा करतीं
ता-ता-थैया, तुम तो
भोंरे की संगी।

लाली फूलों की
मुस्कान कलियों की
तुम अप्सरी।

नीलाम्बरी हो
कभी हो पीताम्बरी
चंचला अरी।

क्षण यहाँ तो
क्षण वहां, आतीं न
हाथ में कभी।

भटक रही
सुरभि में, कैसी हो
चमक रही?

विवाहिता या
कुंवारी हो, बताती
क्यों न सुन्दरी?
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विलुप्त प्रजातियाँ

चहचहाती थीं
कितनी चिडियां
इस वन में।

गाते थे
गीत दल के दल पंछी ,
मधुवन में।

किंतु न रह
सके चैन से इस
प्रदूषण में।

फुर्र हो गए
जाने पंछी किधर
किस क्षण में?

विलुप्त ईन
प्रजातियाँ अनेक
संक्रमण में।

बढ़ी है संख्या
नर व बन्दर की
किंतु रण में।

प्रभु! विज्ञानं
नहीं, ज्ञान बढाओ
जन-जन में।
*************

फूल व बच्चे

क्यों लगते हैं
इतने प्यारे-प्यारे
फूल व बच्चे?

खिलखिलाना
हँसना, दोनों के
लगते सच्चे।

कलियों और
नन्हों के आधे बोल
मधुर कच्चे।

रूप माधुर्य
फूलों-बच्चों के कभी
न खाते गच्चे।

प्रभु क्या तुम्हीं
हो परम प्रसन्न
फूल व बच्चे?
****************

हाइकु काव्य

सबसे बड़ा
प्रश्न और उत्तर
मधुर मौन।

गाछ-गाछ के
पत्ते-पत्ते पर लिखा
प्रभु का पत्र।

सही शख्स को
मिलती है ज़िंदगी
मौत के बाद।

मुस्काया मुन्ना
तो खुशियों से भरा
आँचल माँ का।

बूंदों की चोट
tee पर, गोलियाँ ,
ज्यों पीठ पर।

मेघ मल्हार
गा रही रसवंती
वधु श्रावणी।

फूल बेचता
हूँ मैं taja, faav men
detaa khushboo।

लहरों का क्या?
विश्वास, किनारे को
मरता धक्का।

-अंदाल ७१३३२१, प बंगाल।

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