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मंगलवार, 14 अप्रैल 2026

अप्रैल १४, लघुकथा, गीत, दोहे, गीतिका, समानिका छंद, सवैया, कुण्डलिया, मुक्तक, सॉनेट लिली


सलिल सृजन अप्रैल १४
*
सॉनेट
लिली 
० 
लिली के लावण्य की जय 
मोह मन इठला रही है। 
नव युवा लालित्य की जय 
रूपसी मुस्का रही है।।
पर्ण कोमल दीर्घ चिकने  
हरितिमा में है निमज्जित। 
स्वप्न शत लगते विकसने 
चहुँमुखी पुष्पों सुसज्जित।। 
गुलाबी आभा अनोखी 
श्वेत छवि मन-ताप हरती। 
पीत रंजित बसंती भी 
रक्त वर्णी हँस विचरती। 
किशोरी खुद से लजाती   
चिरैया सी चहचहाती।। 
(शेक्सपीयरी शैली)
००० 
ग़ज़ल
दोस्ती की दास्तानें, गढ़ रहीं इतिहास हैं।
आम लगती हैं भले, ये सभी खासमखास हैं।।
.
नफरतें हैं चाहतें हैं, ठोकरें हैं कोशिशें
कशिश कम होती नहीं, मन में लिए हुलास हैं।।
.
मंजिलों से आशिकी की, गिने तारे रात भर।
सुबह को आँखें लगीं, जग उठ किए प्रयास हैं।।
.
अमावस के अँधेरे कब रोक पाए हैं कदम।
जले जुगनू की तरह मन में लिए उजास हैं।।
.
कदम छोटे ही सही, उठ बढ़े तो बढ़ते गए।
अब रुकेंगे औ' यहाँ, झूठे हुए कयास हैं।।
छंद शाला
दोहा - रोला - कुंडलिया
तीन लोक चौदह भुवन, नयन चले अवलोक।
सब लोकों में एक बस, नयन अलौकिक लोक।। - अशोक 'व्यग्र'
नयन अलौकिक लोक, खुलें तो सृष्टि निहारें।
नयन मुँदें तो मनस-लोक का रूप विचारें।।
नयन बंद हों मित्र, स्वजन रहें दुख में लीन।
नयन तजें तन मिलें, देवियाँ-देवता तीन।।
तीन लोक चौदह भुवन, नयन चले अवलोक।
सब लोकों में एक बस, नयन अलौकिक लोक।। - अशोक 'व्यग्र'
नयन अलौकिक लोक, विलोकें सारी दुनिया।
वृद्ध-युवा नर-नार, चपल मुन्ना अरु मुनिया।।
जीवन-मरण विधान, देखते सकें ना रोक।
एक लोक में वास, नयन में हैं तीन लोक।।
तीन लोक चौदह भुवन, नयन चले अवलोक।
सब लोकों में एक बस, नयन अलौकिक लोक।। - अशोक 'व्यग्र'
नयन अलौकिक लोक, विगत अब आगत देखें।
सकल सृष्टि व्यवहार, उचित अनुचित नित लेखें।।
भेदभाव से दूर, न अपने-गैर हों नयन।
सबसे रख सम भाव, तीन लोक चौदह भुवन।।
तीन लोक चौदह भुवन, नयन चले अवलोक।
सब लोकों में एक बस, नयन अलौकिक लोक।। - अशोक 'व्यग्र'
नयन अलौकिक लोक, शिवा-शिव मिलन कराएँ।
पुष्प वाटिका विचर, सिया से राम मिलाएँ।
राधा-कान्हा रास, नयन लखे हो तल्लीन।
जमुन लहर हो मग्न, बजा रहीं तालें तीन।।
१४.४.२०२६ 
०००
लघुकथा : कार्य शाला
इन्हें पढ़ें, मन में कोई प्रश्न हो तो पूछें या इन पर अपनी राय दें।
लघुकथाएँ
१. झूठी औरत : विष्णु नागर
"मैं तंग आ गयी हूँ इन बच्चों से। जान ले लूँगी इनकी।"
यह कहनेवाली माँ अभी-अभी अपने पति से झगड़ रही थी, "बिना बच्चों के अकेली कहीं नहीं जाऊँगी।" ३० शब्द
*
२.
क़ाज़ी का घर :
एक गरीब भूखा काज़ी के यहाँ गया, कहने लगा - 'मैं भूखा हूँ, कुछ मुझे दो तो मैं खाऊँ।'
काज़ी ने कहा - "यह काज़ी का घर है - कसम खा और चला जा।" ३१ शब्द
*
३.
कहूँ कहानी : रमेश बतरा
ऐ रफ़ीक़ भाई! सुनो। उत्पादन के सुख से भरपूर नींद की खुमारी लिए जब मैं घर पहुँचा तो मेरी बेटी ने एक कहानी कही - "एक लाजा था, वो बौत गलीब है।" ३१ शब्द
*
४.
एकलव्य : संजीव वर्मा 'सलिल'
दूरदर्शन पर नेताओं की बहस चल रही थी।
'बब्बा जी ! क्या एकलव्य भौंकते हुए कुत्ते का मुँह तीर चलाकर बंद कर देता था?'
"हाँ बेटा।"
'काश, वह आज भी होता।' पोते ने कहा। ३३ शब्द
*
५.
आज़ादी : खलील जिब्रान
वह मुझसे बोले - "किसी गुलाम को सोते देखो तो जगाओ मत; हो सकता है वह आज़ादी का सपना देख रहा हो।"
'अगर किसी गुलाम को सोते देखो तो उसे जगाओ और आज़ादी के बारे में बताओ। मैंने कहा।" ३८ शब्द
*
६.
मुँहतोड़ जवाब : भारतेन्दु हरिश्चंद्र
एक ने कहा - 'न जाने इसमें इतनी बुरी आदतें कहाँ से आईं? हमें यकीन है कि हमसे इसने कोई बुरी बातें नहीं सीखीं।'
लड़का सच से बोल उठा - "बहुत ठीक है क्योंकि हमने आपसे बुरी आदतें पाई होती तो आपमें बहुत सी काम हो जातीं।" ४५ शब्द
 ७ . 
एकलव्य : आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'  
- बब्बा! क्या एकलव्य भौंकते हुए कुत्ते का मुँह तीर चलाकर बंद कर देता था ?  
= हाँ ,  बेटा ! 
- काश वह आज भी होता?
दूरदर्शनी बहस से ऊबे पोते ने कहा।  २८ शब्द  
००० 
गीत
*
आओ! कुछ काम करें
वाम से इतर
लोक से जुड़े रहें
न मीत दूर हों
हाजमोला खा न भूख
लिखें सू़र हों
रेहड़ीवाले से करें
मोलभाव औ'
बारबालाओं पे लुटा
रुपै क्रूर क्यों?
मेहनत पैगाम करें
नाम से इतर
सार्थक भू धाम करें
वाम से इतर
खेतों में नहीं; जिम में
पसीना बहा रहे
पनहा न पिएँ कोक-
फैंटा; घर में ला रहे
चाट ठेले हँस रहे
रोती है अँगीठी
खेतों को राजमार्ग
निगलते ही जा रहे
जलजीरा पान करें
जाम से इतर
पनघटों का नाम करें
वाम से इतर
शहर में न लाज बिके
किसी गाँव की
क्रूज से रोटी न छिने
किसी नाव की
झोपड़ी उजाड़ दे न
सेठ की हवस
हो सके हत्या न नीम
तले छाँव की
सत्य का सम्मान करें
दाम से इतर
छोड़ खास, आम वरें
वाम से इतर
***
मानवता पर दोहे
*
मानवता के नाम पर, मजलिस बनी कलंक
शहर शहर को चुभ रहा, यह तबलीगी डंक
*
मानवता कह रही है, आज पुकार पुकार
एकाकी रहकर करो, कोरोना पर वार
*
मानवता लड़ रही है, अजब-अनूठी जंग
साधनहीनों की मदद, मानवता का रंग
*
मानवता के घाट पर, बैठे राम-रसूल
एक दूसरे की मदद, करें न लड़ते भूल
*
मानवता के बन गए, तबलीगी गद्दार
रहम न कर सख्ती करे, जेल भेज सरकार
*
मानवता लिख रही है, एक नया अध्याय
कोरोना से जीतकर, बनें ईश पर्याय
*
मानवता को बचाते, डॉक्टर पुलिस शहीद
मिल श्रद्धांजलि दें करें, अर्पित होली ईद
***
गीतिका 
*
जब बसंत हो, मुदित रहें राधे माधव
सुनें सभी की, कहें कभी राधे माधव
हीरा-लाल सदृश जोड़ी मनबसिया की
नारीभूषण पुरुषोत्तम राधे माधव
अमर स्नेह अमरेंद्र मिले हैं वसुधा पर
अमरावति बृज बना रहे राधे माधव
प्रभा किशोरी की; आलोक कन्हैया का
श्री श्रीधर द्वय मुकुलित मन राधे माधव
नत नारीश पगों में नरपति मुस्काते
अद्भुत मनोविनोद करें राधे माधव
***
विनय
हम भक्तों की पीर हरें राधे माधव
हम निज मन में धीर धरें राधे माधव
तबलीगी मजलिस जमात से दूर रहें
मुस्लिम भाई यही करें राधे माधव
समझदार मिल मुख्य धार में आ जाएँ
समय कहे सद्भाव वरें राधे माधव
बने रहे धर्मांध अगर वे तो तय है
बिन मारे खुद मार मरें राधे माधव
मरने का मकसद हो पाक जरूरी है
परहित कर मर; क्यों न तरें राधे माधव
लगा अकल पर ताला अल्ला ताला क्यों?
गलती मान खुदी सुधरें राधे माधव
१४-४-२०२०
***
एक गीत
*
दूर रहो नोटा से प्यारे!
*
इस-उस दल के यदि प्यादे हो
जिस-तिस नेता के वादे हो
पंडे की हो लिए पालकी
या झंडे सिर पर लादे हो
जाति-धर्म के दीवाने हो
या दल पर हो निज दिल हारे
दूर रहो नोटा से प्यारे!
*
आम आदमी से क्या लेना?
जी लेगा खा चना-चबेना
तुम अरबों के करो घोटाले
स्वार्थ नदी में नैया खेना
मंदिर-मस्जिद पर लड़वाकर
क्षेत्रवाद पर लड़ा-भिड़ा रे!
दूर रहो नोटा से प्यारे!
*
जा विपक्ष में रोको संसद
सत्ता पा बन जाओ अंगद०
भाषा की मर्यादा भूलो
निज हित हेतु तोड़ दो हर हद
जोड़-तोड़ बढ़ाकर भत्ते
बढ़ा टैक्स फिर गला दबा रे!
दूर रहो नोटा से प्यारे!
१४-४-२०१९
***
समय साक्षी गीत:
तुमने स्वर दे दिया
*
१.
तुमने स्वर दे दिया
चीखें, रोएँ, सिसकी भर ये,
वे गुर्राते हैं दहाड़कर।
चिंघाड़े कोई इस बाजू
फुफकारे कोई गुहारकर।
हाय रे! अमन-चैन ले लिया
तुमने स्वर दे दिया
*
२.
तुमने स्वर दे दिया
यह नेता बेहद धाँसू है
ठठा रहा देकर आँसू है
हँसता पीड़ित को लताड़कर।
तृप्त न होता फिर भी दानव
चाकर पुलिस लुकाती है शव
जाँच रपट देती सुधारकर।
न हो योगी को दर्द मिया
तुमने स्वर दे दिया
*
३.
तुमने स्वर दे दिया
वादा कह जुमला बतलाया
हो विपक्ष यह तनिक न भाया
रख देंगे सबको उजाड़कर।
सरहद पर सर हद से ज्यादा
कटें, न नेता-अफसर-सुत पर
हम बैठे हैं चुप निहारकर।
छप्पन इंची छाती है, न हिया
तुमने स्वर दे दिया
*
४.
तुमने स्वर दे दिया
खाला का घर है, घुस आओ
खूब पलीता यहाँ लगाओ
जनता को कूटो उभाड़कर।
अरबों-खरबों के घपले कर
मौज करो जाकर विदेश में
लड़ चुनाव लें, सच बिसारकर।
तीन-पाँच दो दूनी सदा किया
तुमने स्वर दे दिया
*
तुमने स्वर दे दिया
तोड़ तानपूरा फेंकेंगे
तबले पर रोटी सेकेंगे
संविधान बाँचें प्रहारकर।
सूरत नहीं सुधारेंगे हम
मूरत तोड़ बिगाड़ेंगे हम
मार-पीट, रोएँ गुहारकर
फर्जी हो प्यादे ने शोर किया
तुमने स्वर दे दिया
१४.४.२०१८
(टीप: जांच एजेंसियाँ ध्यान दें कि इस रचना का भारत से कुछ लेना-देना नहीं है।
***
नवलेखन कार्यशाला
*
आ. गुरूजी
एक प्रयास किया है । कृपया मार्गदर्शन दें । सादर ।
शारदे माँ ( मधुमालती छंद)
माँ शारदे वरदान दो
सद्बुद्धि दो संग ज्ञान दो
मन में नहीं अभिमान हों
अच्छे बुरे की पहचान दो ।
वाणी मधुर रसवान दो
मैं मैं का न गुणगान हों
बच्चे अभी नादान हम
निर्मल एक मुस्कान दो
न जाने कि हम कौन हैं
हमें अपनी पहचान दो
अल्प ज्ञानी मानो हमें
बस चरण में तुम स्थान दो ।।
कल्पना भट्ट
*
प्रिय कल्पना!
सदा खुश रहें।
मधुमालती १४-१४ के दो चरण, ७-७ पर यति, पदांत २१२ ।
शारदे माँ ( मधुमालती छंद)
माँ शारदे! वरदान दो
सदबुद्धि दो, सँग ज्ञान दो
मन में नहीं अभिमान हो
शुभ-अशुभ की पहचान दो।
वाणी मधुर रसवान दो
'मैं' का नहीं गुण गान हो
बच्चे अभी नादान हैं
निर्मल मधुर मुस्कान दो
किसको पता हम कौन हैं
अपनी हमें पहचान दो
हम अल्प ज्ञानी माँ! हमें
निज चरण में तुम स्थान दो ।।
१४-४-२०१७
***
छंद बहर का मूल है: २
*
छंद परिचय:
ग्यारह मात्रिक रौद्र जातीय छंद।
सप्तवार्णिक उष्णिक जातीय समानिका छंद।
संरचना: SIS ISI S
सूत्र: रगण जगण गुरु / रजग।
बहर: फ़ाइलुं मुफ़ाइलुं ।
*
सूर्य आप भी बने
*
सत्य को न मारना
झूठ से न हारना
गैर को न पूजना
दीन से न भागना
बात आत्म की सुनें
सूर्य आप भी बने
*
काम काम से रखें
राम-राम भी भजें
डूब राग-रंग में
धर्म-कर्म ना तजें
शुभ विचार कर गुनें
सूर्य आप भी बने
*
देव दैत्य आप हैं
पुण्य-पाप आप हैं
आप ही बुरे-भले
आप ही उगे-ढले
साक्ष्य भाव से जियें
सूर्य आप भी बने
१४.४.२०१७
***
रसानंद दे छंद नर्मदा २५ : १४-०४-२०१६
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
दोहा, सोरठा, रोला, आल्हा, सार, ताटंक, रूपमाला (मदन), चौपाई, हरिगीतिका, उल्लाला, गीतिका, घनाक्षरी, बरवै, त्रिभंगी, सरसी, छप्पय, भुजंगप्रयात तथा कुण्डलिनी छंदों से साक्षात के पश्चात् अब मिलिए सवैया छन्द से.
दोहा, सोरठा, रोला, आल्हा, सार, ताटंक, रूपमाला (मदन), चौपाई, हरिगीतिका, उल्लाला, गीतिका, घनाक्षरी, बरवै, त्रिभंगी, सरसी, छप्पय, भुजंगप्रयात तथा कुण्डलिनी छंदों से साक्षात के पश्चात् अब मिलिए सवैया छन्द से.
सरस सवैया रच पढ़ें
गण की आवृत्ति सात हों, दो गुरु रहें पदांत।
सरस सवैया नित पढो, 'सलिल' न तनिक रसांत।।
बाइस से छब्बीस वर्णों के (सामान्य वृत्तो से बड़े और दंडक छंदों से छोटे) छंदों को सवैया कहा जाता है। सवैया वार्णिक छंद हैं। विविध गणों में से किसी एक गण की सात बार आवृत्तियाँ तथा अंत में दो दीर्घ अक्षरों का प्रयोग कर सवैये की रचना की जाती है। यह एक वर्णिक छन्द है। सवैया को वार्णिक मुक्तक अर्थात वर्ण संख्या के आधार पर रचित मुक्तक भी कहा जाता है। इसका कारन यह है की सवैया में गुरु को लघु पढ़ने की छूट है। जानकी नाथ सिंह ने अपने शोध निबन्ध 'द कंट्रीब्युशन ऑफ़ हिंदी पोयेट्स टु प्राजोडी के चौथे अध्याय में सवैया को वार्णिक सम वृत्त मानने का कारण हिंदी में लय में गाते समय 'गुरु' का 'लघु' की तरह उच्चारण किये जाने की प्रवृत्ति को बताया है। हिंदी में 'ए' के लघु उच्चारण हेतु कोई वर्ण या संकेत चिन्ह नहीं है। रीति काल और भक्ति काल में कवित्त और सवैया बहुत लोकप्रिय रहे हैं. कवितावलि में तुलसी ने इन्हीं दो छंदों का अधिक प्रयोग किया है। कवित्त की ही तरह सवैया भी लय-आधारित छंद है।
विविध गणों के प्रयोग के आधार पर इस छन्द के कई प्रकार (भेद) हैं। यगण, तगण तथा रगण पर आधारित सवैये की गति धीमी होती है जबकि भगण, जगण तथा सगण पर आधारित सवैया तेज गति युक्त होता है। ले के साथ कथ्य के भावपूर्ण शब्द-चित्र अंकित होते हैं। श्रृंगार तथा भक्ति परक वर्ण में विभव, अनुभव, आलंबन, उद्दीपन, संचारी भाव, नायक-नायिका भेद आदि के शब्द-चित्रण में तुलसी, रसखान, घनानंद, आलम आदि ने भावोद्वेग की उत्तम अभिव्यक्ति के लिए सवैया को ही उपयुक्त पाया। भूषण ने वीर रस के लिए सवैये का प्रयोग किया किन्तु वह अपेक्षाकृत फीका रहा।
प्रकार-
सवैया के मुख्य १४ प्रकार हैं।
१. मदिरा, २. मत्तगयन्द, ३. सुमुखि, ४. दुर्मिल, ५. किरीट, ६. गंगोदक, ७. मुक्तहरा, ८. वाम, ९. अरसात, १०. सुन्दरी, ११. अरविन्द, १२. मानिनी, १३. महाभुजंगप्रयात, १४. सुखी सवैया।
मत्तगयंद (मालती) सवैया
इस वर्णिक छंद के चार चरण होते हैं। हर चरण में सात भगण (S I I) के पश्चात् अंत में दो गुरु (SS) वर्ण होते हैं।
उदाहरण:
१.
धूरि भरे अति सोभित स्यामजू, तैंसी बनी सिर सुन्दर चोटी।
खेलत-खात फिरें अँगना, पग पैंजनिया, कटी पीरि कछौटी।।
वा छवि को रसखान विलोकत, वारत काम कलानिधि कोटी।
काग के भाग बड़े सजनी, हरि हाथ सों ली गयो माखन-रोटी।।
२.
यौवन रूप त्रिया तन गोधन, भोग विनश्वर है जग भाई।
ज्यों चपला चमके नभ में, जिमि मंदर देखत जात बिलाई।।
देव खगादि नरेन्द्र हरी मरते न बचावत कोई सहाई।
ज्यों मृग को हरि दौड़ दले, वन-रक्षक ताहि न कोई लखाई।।
३.
मोर पखा सिर ऊपर राखिहौं, गुंज की माल गले पहिरौंगी।
ओढ़ी पीताम्बर लै लकुटी, वन गोधन गजधन संग फिरौंगी।।
भाव तो याहि कहो रसखान जो, तेरे कहे सब स्वांग करौंगी।
या मुरली मुरलीधर की अधरान धरी अधरा न धरौंगी।।
दुर्मिल (चन्द्रकला) सवैया
इस वर्णिक छंद के चार चरणों में से प्रत्येक में आठ सगण (I I S) और अंत में दो गुरु मिलाकर कुल २५ वर्ण होते हैं.
उदाहरण:
बरसा-बरसा कर प्रेम सुधा, वसुधा न सँवार सकी जिनको।
तरसा-तरसा कर वारि पिता, सु-रसा न सुधार सकी जिनको।।
सविता-कर सी कविता छवि ले, जनता न पुकार सकी जिनको।
नव तार सितार बजा करके, नरता न दुलार सकी जिनको।।
उपजाति सवैया (जिसमें दो भिन्न सवैया एक साथ प्रयुक्त हुए हों) तुलसी की देन है। सर्वप्रथम तुलसी ने 'कवितावली' में तथा बाद में रसखान व केशवदास ने इसका प्रयोग किया।
मत्तगयन्द - सुन्दरी
प्रथम पद मत्तगयन्द (७ भगण + २ गुरु) - "या लटुकी अरु कामरिया पर राज तिहूँ पुरको तजि डारौ"। तीसरा पद सुन्दरी (७ सगन + १ गुरु) - "रसखानि कबों इन आँखिनते, ब्रजके बन बाग़ तड़ाग निहारौ"।
मदिरा - दुर्मिल
तुलसी ने एक पद मदिरा का रखकर शेष दुर्मिल के पद रखे हैं। केशव ने भी इसका अनुसरण किया है। पहला मदिरा का पद (७ भगण + एक गुरु) - "ठाढ़े हैं नौ द्रम डार गहे, धनु काँधे धरे कर सायक लै"। दूसरा दुर्मिल का पद (८ सगण) - "बिकटी भृकुटी बड़री अँखियाँ, अनमोल कपोलन की छवि है"।
मत्तगयन्द-वाम और वाम-सुन्दरी की उपजातियाँ तुलसी (कवितावली) में तथा केशव (रसिकप्रिया) में सुप्राप्य है। कवियों ने भाव-चित्रण में अधिक सौन्दर्य तथा चमत्कार उत्पन्न करने हेतु ऐसे प्रयोग किये हैं।
आधुनिक कवियों में भारतेंदु हरिश्चन्द्र, लक्ष्मण सिंह, नाथूराम शंकर आदि ने इनका सुन्दर प्रयोग किया है। जगदीश गुप्त ने इस छन्द में आधुनिक लक्षणा शक्ति का समावेश किया है।
१४-४-२०१६
***
एक दोहा
जन्म ब्याह राखी तिलक, गृह प्रवेश त्यौहार
हर अवसर पर दे 'सलिल', पुस्तक शुभ उपहार
***
मुक्तक :
आपने आपको साथ में लेकर आपके साथ ही घात किया है
एक बनेंगे नेक बनेंगे वादा भुला अपराध किया है
मौक़ा न चूकें, न फिर पायेंगे, काम करें मिल-बाँट सभी जन
अन्ना के सँग बैठ मिटा मतभेद न क्यों मन एक किया है?
***
हिंदू देवी-देवता : ३३ कोटि (प्रकार)
१२ आदित्य(धाता, मित, आर्यमा, शक्र, वरुण, अंश, भाग, विवस्वान, पूष, सविता, तवास्था, विष्णु)
८ वसु (धर, ध्रुव, सोम, अह, अनिल, अनल, प्रत्युष, प्रभाष)
११ रूद्र (हर, बहुरूप, त्रयंबक, अपराजिता, बृषाकापि, शंभु, कपार्दी, रैवत, मृगव्याध, शर्वा, कपाली)
२ अश्विनी-कुमार
१४.४.२०१५
***
मुक्तक सलिला:
बोल जब भी जबान से निकले,
पान ज्यों पानदान से निकले।
कान में घोल दे गुलकंद 'सलिल-
ज्यों उजाला विहान से निकले।।
*
जो मिला उससे है संतोष नहीं,
छोड़ता है कुबेर कोष नहीं।
नाग पी दूध ज़हर देता है-
यही फितरत है, कहीं दोष नहीं।।
*
बाग़ पुष्पा है, महकती क्यारी,
गंध में गंध घुल रही न्यारी।
मन्त्र पढ़ते हैं भ्रमर पंडित जी-
तितलियाँ ला रही हैं अग्यारी।।
*
आज प्रियदर्शी बना है अम्बर,
शिव लपेटे हैं नाग- बाघम्बर।
नेह की भेंट आप लाई हैं-
चुप उमा छोड़ सकल आडम्बर।।
*
ये प्रभाकर ही योगराज रहा,
स्नेह-सलिला के साथ मौन बहा।
ऊषा-संध्या के साथ रास रचा-
हाथ रजनी का खुले-आम गहा।।
*
करी कल्पना सत्य हो रही,
कालिख कपड़े श्वेत धो रही।
कांति न कांता के चहरे पर-
कलिका पथ में शूल बो रही।।
१८-४-२०१४
***

सोमवार, 30 मार्च 2026

मार्च ३०, दुर्गा, रामकिंकर, सॉनेट, सवैया, सोरठा, लघुकथा, नवगीत, रैप सोंग, कुण्डलिया, मुक्तिका

 सलिल सृजन मार्च ३०

*
रैंप सौंग . धरा काँपती देख होते कुकर्म मनुज में नहीं लेश है शेष शर्म रहा काट जंगल, खोदे पहाड़ पाटे सरोवर, नदी दी बिगाड़ मिटे खेत, भवनों के जंगल खड़े आदम से आदम अकारण लड़े मानो अकल पे हैं पत्थर पड़े अहंकारवश देश सम्मुख अड़े रहे हाथ खाली न लाया था कुछ रहें हाथ खाली न जाएगा कुछ करे द्वेष इतना बिना बात क्यों? लड़ाई लगातार आघात क्यों? लड़े कट मरे गिद्ध दावत करें रहे देख मूरख न धीरज धरें धरा न किसी की अभी तक हुई मगर सत्य माने न ताकत मुई बना देश लड़ता जमीं के लिए बता चाहिए क्या दफन के लिए? कहे 'डीलमेकर' खुद को बड़ा सुनता किसी की न, नाहक अड़ा किया ट्रंप ने शक्ति का दुरुपयोग अहंकार घातक नाशक है रोग पुतिन-हठ से यूक्रेन परेशान हैं भोग मुसीबत में कब से पड़ी जान है चाइना पिंग का खौफ भारी हुआ परेशान ताइवान माँगे दुआ न्याहू है रोड़ा अमन-चैन का आँसू न देखे किसी नैन का जी जैन खतरे की घंटी बजी बदलो फि़जा माँग मिलकर करी तजो युद्ध, हथियार फेंको सभी मुश्किल मनुजता पे आई बड़ी बढ़ाएँ कदम मिल सभी साथ में बने जग नया हाथ में हाथ ले ३०.३.२०३६ ०००
छंद शाला दोहा-रोला-कुंडलिया ० पूर्व ब्याह के जो दिखे, नयन सुदर्शन वक्र। ब्याह हुआ तो हो गये, नयन सुदर्शन चक्र।। - अशोक व्यग्र नयन सुदर्शन चक्र, न चूकें कभी निशाना। वार करें बिन वार, बना नित नया बहाना।। नयन नहीं अब रहे, ढाल शुभ कुशल क्षेम के। वचन न मीठे रहे, न प्रेमिल पूर्व प्रेम के।। ३०.३.२०२६
०००
पद
अंबे! करिए कृपा अनंता
.
निश-दिन नाम जपे जो मन वह, हो तत्क्षण ही संता
.
पद रज दो माँ! पाप मिटें सब, बालक हो अरिहंता
.
जो निर्जीव उसे संजीवित करें विहँस भगवंता
.
नाम जप सकूँ ऐसा वर दो, हो पाऊँ हनुमंता
.
'सलिल' करे अभिषेक निरंतर, तुम ही दिश-दिगंता
३०.३.२०२५
***
स्मरण युगतुलसी
सॉनेट
युग तुलसी युग निर्माता थे,
वे मर्यादा उन्नायक थे,
युग मर्यादा उद्गाता थे,
प्रभु-लीन तपस्वी साधक थे।
वे सिया-राम जप जापक थे,
था धैर्य नर्मदा सम अथाह,
वे हनुमत के आराधक थे,
प्रभु पद में पाई थी पनाह।
मानस पर श्रद्धा थी असीम,
नित शब्दों के नव अर्थ खोज,
नैवेद्य समर्पित कर ससीम,
मीमांसा मौलिक बना भोज।
थे राम-दास हनुमंत-बंधु
युगतुलसी निर्मल कृपा-सिंधु।
३०.३.२०२४
•••
स्मरण युग तुलसी
सवैया
राम राम जप, यही एक तप, बतलाया है युग तुलसी ने।
सुबह-शाम भज, बिन विराम जप, गुण गाया है युग तुलसी ने।।
कर प्रभु दर्शन, त्याग प्रदर्शन, सिखलाया है युग तुलसी ने।
मर्यादा पर्याय किस तरह हों दिखलाया युग तुलसी ने।।
राम नाम नर्मदा धार में, नहा पवित्र हुए युग तुलसी।
माया-मोह बिसार राम भज, जीवन-इत्र हुए युग तुलसी।।
राम चरित मानस मीमांसा, करी आम जन सुन-गुन तरता-
वाल्मीकि जाबाली तुलसी, विश्वामित्र हुए युग तुलसी।।
सुनें राम महिमा गुन गाएँ, नीर-क्षीर मति रख युग तुलसी।
भक्ति-ज्ञान-वैराग्य पंथ पर, बढ़े सतत पग रख युग तुलसी।।
सुख-दुख ऊँच-नीच सम मानें, खास न कोई लख युग तुलसी।
स्वाद अमिय-विष को नहिं भावै, राम नाम रस चख युग तुलसी।।
३०.३.२०२४
•••
मुक्तिका
'शाम कितनी अनमनी है इस शहर में'
रात होगी अजनबी क्या इस शहर में?
बात मन की कर अँधेरा इस शहर में
बोल सकता- 'है उजाला इस शहर में'
सूर्य छल धोखा दगा दे जब उगेगा
भोर को ऊषा छलेगी इस शहर में
'ये कमल के फूल मुरझाने लगे हैं'
जो लिखे आफत बुलाए इस शहर में
जो असहमत हो वही अब जेल जाए
सिर्फ 'हाँ' ही 'हाँ' रहेगी इस शहर में
३०-३-२०२३
***
सोरठा सलिला
जी भरकर आराम, भक्त करें 'आ राम' कह।
राम न कर विश्राम, काम करें निष्काम रह।।
गहें राम पतवार, वाल्मीकि जपकर "मरा'।
राम नाम पतवार, जिसने थामी वह तरा।।
राम-नाम बन बाण, काल दशानन का बना।
राम आप संप्राण, पूजन शिवा-शिव को हुए।।
आप बने लंकेश, राम-नाम जप विभीषण।
नोच मरा निज केश, रावण लड़कर राम से।।
३०-३-२०२३
***
सॉनेट
श्वेत-श्याम
(१६-१५ मात्रा)
जन्म श्वेत का हुआ श्याम से,
श्याम श्वेत का दे उपहार।
हैं अभिन्न पर भिन्न नाम से,
पल पल करते मिल उपकार।।
श्याम विष्णु शिव पूजे जाते,
श्वेत ब्रह्म को भूला लोक।
गोरेपन की क्रीम बने क्यों?
क्यों न लग रही इस पर रोक??
जो जैसा है उसको वैसा
क्यों न सके हैं हम स्वीकार?
बेहतर-कमतर कहें व्यर्थ ही
आमंत्रित करते खुद हार।।
शांति छोड़ करते क्यों युद्ध?
क्यों न शांति वर बनें प्रबुद्ध??
३०-३-२०२२
•••
सॉनेट
(मात्रा १६-१४)
नमन सभी को, सबका वंदन,
विश्व समूचा एक बने।
सब के माथे रोली-चंदन।।
प्रभु! न कहीं भी समर ठने।।
ममता समता सम्मुख सब नत।
प्रभुता हेतु हो न प्रयास।
मानव हो उजास हित नित रत।।
हर नयन में रहे उजास।।
सीमा भूल असीम हो सकें।
तजे मन निज-पर का भाव।
युद्ध त्याग कर शांति बो सकें।।
रवि-धरा सम करें निभाव।।
सबका मन से कर अभिनंदन।
यह वसुधा हो नंदन वन।।
३०-३-२०२२
•••
लघु कथा
आँख मिचौली
*
कल तक अपने मुखर और परोपकारी स्वभाव के लिए चर्चित रहनेवाली 'वह' आज कुछ और अधिक मुखर थी। उसने कब सोचा था कि समाचारों में सुनी या चलचित्रों में देखी घटनाओं की तरह यह घटना उसके जीवन में घट जायेगी और उसे चाहे-अनचाहे, जाने-अनजाने लोगों के अप्रिय प्रश्नों के व्यूह में अभिमन्यु की तरह अकेले जूझना पड़ेगा।
कभी-कभी तो ऐसा प्रतीत होता मानो पुलिस अधिकारी, पत्रकार और वकील ही नहीं तथाकथित शुभ चिन्तक भी उसके कहे पर विश्वास न कर कुछ और सुनना चाहते हैं। कुछ ऐसा जो उनकी दबी हुई मनोवृत्ति को संतुष्ट कर सके, कुछ मजेदार जिस पर प्रगट में थू-थू करते हुए भी वे मन ही मन चटखारे लेता हुआ अनुभव कर सकें, कुछ ऐसा जो वे चाहकर भी देख या कर नहीं सके। उसका मन होता ऐसी गलीज मानसिकता के मुँह पर थप्पड़ जड़ दे किन्तु उसे खुद को संयत रखते हुए उनके अभद्रता की सीमा को स्पर्श करते प्रश्नों के उत्तर शालीनतापूर्वक देना था।
जिन लुच्चों ने उसे परेशान करने का प्रयास किया वे तो अपने पिता के राजनैतिक-आर्थिक असर के कारण कहीं छिपे हुए मौज कर रहे थे और वह निरपराध तथा प्रताड़ित किये जाने के बाद भी नाना प्रकार के अभियोग झेल रही थी।
वह समझ चुकी थी कि उसे परिस्थितियों से पार पाना है तो न केवल दुस्साहसी हो कर व्यवस्था से जूझते हुए छद्म हितैषी पुरुषों को मुँह तोड़ जवाब देना होगा बल्कि उसे कठिनाई में देखकर मन ही मन आनंदित होती महिलाओं के साथ भी लगातार खेलने होगी आँख मिचौली।
***
लघु कथा
मीरा
*
'ऐसा क्यों करें माँ? रिश्ता न जोड़ने का फैसला करने कोई कारण भी तो हो। दुर्घटना तो किसी के भी साथ हो सकती है। याद करो बड़की का रिश्ता तय हो जाने की बाद उसके पैर की हड्डी टूट गयी थी लेकिन उसके ससुरालवालों ने हमारे बिना कुछ कहे कितनी समझदारी से शादी की तारीख आगे बढ़ा दी थी, तभी तो वह ससुरालवालों पर जान छिड़कती है।.... वह बात और कैसे हो गई? वहाँ भी दुर्घटना हुई थी, यहाँ भी दुर्घटना हुई है। दुर्घटना पर किसका बस? आधी रात को क्यों गयी? यह नहीं मालुम, तुमने पूछा-जाना भी नहीं और उसे गलत मान लिया?
तुम्हीं ने हम दोनों का रिश्ता तय किया, जिद करके मुझे मनाया और अब तुम्हीं?.... बदनामी उसकी नहीं, गुनहगारों की हो रही है। इस समय हमें उसके साथ मजबूती से खड़ा होकर न्याय-प्राप्ति की राह में उसकी हिम्मत बढ़ानी है। हम सबंध तोड़ेंगे नहीं, जल्दी से जल्दी जोड़ेंगे ताकि उसे तंग करनेवाला कितने भी असरदार बापका बेटा हो, कितनी भी धमकियाँ दे, हम देखें कि सियासत न उड़ा सके उस सिया के सत का मजाक, प्रेस न ले सके चटखारे। कानून अपराधी को सजा दे और अब हमारी व्यवस्था की अपंगता का विष पीने को मजबूर न हो वह मीरा।
***
लघु कथा
काल्पनिक सुख
*
'दीदी! चलो बाँधो राखी' भाई की आवाज़ सुनते ही उछल पडी वह। बचपन से ही दोनों राखी के दिन खूब मस्ती करते, लड़ते का कोई न कोई कारण खोज लेते और फिर रूठने-मनाने का दौर।
'तू इतनी देर से आ रहा है? शर्म नहीं आती, जानता है मैं राखी बाँधे बिना कुछ खाती-पीती नहीं। फिर भी जल्दी नहीं आ सकता।'
"क्यों आऊँ जल्दी? किसने कहा है तुझे न खाने को? मोटी हो रही है तो डाइटिंग कर रही है, मुझ पर अहसान क्यों थोपती है?"
'मैं और मोटी? मुझे मिस स्लिम का खिताब मिला और तू मोटी कहता है.... रुक जरा बताती हूँ.'... वह मारने दौड़ती और भाई यह जा, वह जा, दोनों की धाम-चौकड़ी से परेशान होने का अभिनय करती माँ डांटती भी और मुस्कुराती भी।
उसे थकता-रुकता-हारता देख भाई खुद ही पकड़ में आ जाता और कान पकड़ते हुई माफ़ी माँगने लगता। वह भी शाहाना अंदाज़ में कहती- 'जाओ माफ़ किया, तुम भी क्या याद रखोगे?'
'अरे! हम भूले ही कहाँ हैं जो याद रखें और माफी किस बात की दे दी?' पति ने उसे जगाकर बाँहों में भरते हुए शरारत से कहा 'बताओ तो ताकि फिर से करूँ वह गलती'...
"हटो भी तुम्हें कुछ और सूझता ही नहीं'' कहती, पति को ठेलती उठ पडी वह। कैसे कहती कि अनजाने ही छीन गया है उसका काल्पनिक सुख।
***
लघु कथा
साधक की आत्मनिष्ठा
*
'बेटी! जल्दी आ, देख ये क्या खबर आ रही है?' सास की आवाज़ सुनते ही उसने दुधमुँहे बच्चे को उठाया और कमरे से बाहर निकलते हुए पूछा- 'क्या हुआ माँ जी?'
बैठक में पहुँची तो सभी को टकटकी लगाये समाचार सुनते-देखते पाया। दूरदर्शन पर दृष्टि पड़ी तो ठिठक कर रह गयी वह.... परदे पर भाई कह रहा था- "उस दिन दोस्तों की दबाव में कुछ ज्यादा ही पी गया था। घर लौट रहा था, रास्ते में एक लड़की दिखी अकेली। नशा सिर चढ़ा तो भले-बुरे का भेद ही मिट गया। मैं अपना दोष स्वीकारता हूँ। कानून जो भी सजा दगा, मुझे स्वीकार है। मुझे मालूम है कि मेरे माफी माँगने या सजा भोगने से उस निर्दोष लडकी तथा उसके परिवार के मन के घाव नहीं भरेंगे पर मेरी आत्म स्वीकृति से उन्हें सामाजिक प्रतिष्ठा मिल सकेगी। मैं शर्मिन्दा और कृतज्ञ हूँ अपनी उस बहन के प्रति जो मुझे राखी बाँधने आयी थी लेकिन तभी यह दुर्घटना घटने के कारण बिना राखी बाँधे अपने घर लौट गयी। उसने मुझे अपने मन में झाँकने के लिए मजबूर कर दिया। मैं उससे वादा करता हूँ कि अब ज़िंदगी में कभी कुछ ऐसा नहीं करूँगा कि उसे शर्मिन्दा होना पड़े। मुझे आत्मबोध कराने के लिए नमन करता हूँ उसे।" भाई ने हाथ जोड़े मानो वह सामने खड़ी हो।
दीवार पर लगे भगवान् के चित्र को निहारते हुए अनायास ही उसके हाथ जुड़ गए और वह बोल पडी 'प्रभु! कृपा करना, उसे सद्बुद्धि देना ताकि अडिग और जयी रहे उस साधक की आत्मनिष्ठा।
***
लघुकथा:
नीरव व्यथा
*
बहुत उत्साह से मायके गयी थी वह की वर्षों बाद भाई की कलाई पर राखी बाँधेगी, बचपन की यादें ताजा होंगी जब वे बच्चे थे और एक-दूसरे से बिना बात ही बात-बात पर उलझ पड़ते थे और माँ परेशान हो जाती थी।
उसे क्या पता था कि समय ऐसी करवट लेगा कि उसे जी से प्यारे भाई को न केवल राखी बिना बाँधे उलटे पैरों लौटना पडेगा अपितु उस माँ से भी जमकर बहस हो जायेगी जिसे बचपन से उसने दादी-बुआ आदि की बातें सुनते ही देखा है और अब यह सोचकर गयी थी कि सब कुछ माँ की मर्जी से ही करेगी।
बिना किसी पूर्व सूचना के अचानक, अकेले और असमय उसे घर के दरवाजे पर देखकर पति, सास-ससुर चौंके तो जरूर पर किसी ने कोई प्रश्न नहीं किया। ससुर जी ने लपककर उसके हाथ से बच्चे को लिया, पति ने रिक्शे से सामान उतारकर कमरे में रख दिया सासू जी उसे गले लगाकर अंदर ले आईं बोली 'तुम एकदम थक गयी हो, मुँह-हाथ धो लो, मैं चाय लाती हूँ, कुछ खा-पीकर आराम कर लो।'
'बेटी! दुनिया की बिल्कुल चिंता मत करना। हम सब एक थे, हैं और रहेंगे। तुम जब जैसा चाहो बताना, हम वैसा ही करेंगे।' ससुर जी का स्नेहिल स्वर सुनकर और पति की दृष्टि में अपने प्रति सदाशयता का भाव अनुभव कर उसे सांत्वना मिली।
सारे रास्ते वह आशंकित थी कि किन-किन सवालों का सामना करना पड़ेगा?, कैसे उत्तर दे सकेगी और कितना अपमानित अनुभव करेगी? अपनेपन के व्यवहार ने उसे मनोबल दिया, स्नान-ध्यान, जलपान के बाद अपने कमरे में खुद को स्थिर करती हुई वह सामना कर पा रही थी अपनी नीरव व्यथा का।
लघु कथा
अंतर्विरोध
*
कल तक पुलिस की वह वही हो रही थी कि उसने दो लड़कों द्वारा सताई जा रही लड़की को सुचना मिलते ही तत्काल जाकर न केवल बचाया अपितु दोनों अपराधियों को गिरफ्तार कर अगली सुबह अदालत में पेश करने की तैयारी भी कर ली। खबरची पत्रकार पुलिस अधिकारियों की प्रशंसा कर रहे थे।
खबर लेने गए किसी पत्रकार ने अपराधी लड़कों को पहचान लिया कि एक सता पक्ष के असरदार नेता का सपूत और दूसरा एक धनकुबेर का कुलदीपक है।
यह सुनते ही पुलिस अधिकारीयों के हाथ-पैर फूल गए। फ़ौरन से पेश्तर चलभाष खटखटाए जाने लगे। कचहरी भेजे जाने वाले कगाज़ फिर देखे जाने लगे, धाराओं में किया जाने लगा बदलाव, दोनों लुच्चों को बैरक से निकालकर ससम्मान कुर्सी पर बैठा कर चाय-पानी पेश किया जाने लगा, लापता बता दी गयी सी.सी.टी.वी. की फुटेज।
दिल्ली से प्रधान मंत्री गरीब से गरीब आदमी को बिना देर किया सस्ता और निष्पक्ष न्याय दिलाने की घोषणा आकार रहे ठे और उन्हीं के दल के लोग लोकतंत्र के कमल को दलदल में दफना की जुगत में लगे उद्घाटित कर रहे थे कथनी और करनी का अन्तर्विरोध।
***
लघुकथा
समाधि
*
विश्व पुस्तक दिवस पर विश्व विद्यालय के ग्रंथागार में पधारे छात्र नेताओं, प्राध्यापकों, अधिकारियों, कुलपति तथा जनप्रतिनिधियों ने क्रमश: पुस्तकों की महत्ता पर लंबे-लंबे व्याख्यान दिए।
द्वार पर खड़े एक चपरासी ने दूसरे से पूछा- 'क्या इनमें से किसी को कभी पुस्तकें लेते, पढ़ते या लौटाते देखा है?'
'चुप रह, सच उगलवा कर नौकरी से निकलवायेगा क्या? अब तो विद्यार्थी भी पुस्तकें लेने नहीं आते तो ये लोग क्यों आएंगे?'
'फिर ये किताबें खरीदी ही क्यों जाती हैं?
'सरकार से प्राप्त हुए धन का उपयोग होने की रपट भेजना जरूरी होता है तभी तो अगले साल के बजट में राशि मिलती है, दूसरे किताबों की खरीदी से कुलपति, विभागाध्यक्ष, पुस्तकालयाध्यक्ष आदि को कमीशन भी मिलता है।'
'अच्छा, इसीलिये हर साल सैंकड़ों किताबों को दे दी जाती है समाधि।'
***
लघुकथा
काँच का प्याला
*
हमेशा सुरापान से रोकने के लिए तत्पर पत्नी को बोतल और प्याले के साथ बैठा देखकर वह चौंका। पत्नी ने दूसरा प्याला दिखाते हुए कहा 'आओ, तुम भी एक पैग ले लो।'
वह कुछ कहने को हुआ कि कमरे से बेटी की आवाज़ आयी 'माँ! मेरे और भाभी के लिए भी बना दे। '
'क्या तमाशा लगा रखा है तुम लोगों ने? दिमाग तो ठीक है न?' वह चिल्लाया।
'अभी तक तो ठीक नहीं था, इसीलिए तो डाँट और कभी-कभी मार भी खाती थी, अब ठीक हो गया है तो सब साथ बैठकर पियेंगे। मूड मत खराब करो, आ भी जाओ। ' पत्नी ने मनुहार के स्वर में कहा।
वह बोतल-प्याले समेट कर फेंकने को बढ़ा ही था कि लड़ैती नातिन लिपट गयी- 'नानू! मुझे भी दो न।'
उसके सब्र का बाँध टूट गया, नातिन को गले से लगाकर फूट पड़ा वह 'नहीं, अब कभी हाथ भी नहीं लगाऊँगा। तुम सब ऐसा मत करो। हे भगवान्! मुझे माफ़ करों' और लपककर बोतल घर के बाहर फेंक दी। उसकी आँखों से बह रहे पछतावे के आँसू समेटकर मुस्कुरा रहा था काँच का प्याला।
***
सॉनेट
(मात्रा १६-१४)
नमन सभी को, सबका वंदन,
विश्व समूचा एक बने।
सब के माथे रोली-चंदन।।
प्रभु! न कहीं भी समर ठने।।
ममता समता सम्मुख सब नत।
प्रभुता हेतु हो न प्रयास।
मानव हो उजास हित नित रत।।
हर नयन में रहे उजास।।
सीमा भूल असीम हो सकें।
तजे मन निज-पर का भाव।
युद्ध त्याग कर शांति बो सकें।।
रवि-धरा सम करें निभाव।।
सबका मन से कर अभिनंदन।
यह वसुधा हो नंदन वन।।
३०-३-२०२२
•••
नवगीत
*
पीर ने पूछें
दोस दै रये
काय निकल रय?
कै तो दई 'घर बैठो भइया'
दवा गरीबी की कछु नइया
ढो लाये कछु कौन बिदेस सें
हम भोगें कोरोना दइया
रोजी-रोटी गई
राम रे! हांत सें
तोते उड़ रय
दो बचो-बचाओ खाओ
फिर उधार सें काम चलाओ
दो दिन भूखे बैठ बिता लए
जान बचाने, गाँव बुला रओ
रेल-बसें भईं बंद
राम रे! लट्ठ
फुकट में घल रय
खोदत-खाउत जिनगी बीती
बिकी कसेंड़ी, गुल्लक रीती
तकवारों की मौज भई रे
जनता हारी, रिस्वत जीती
कग्गज पै बँट रओ
धन-रासन, आसें
गिद्ध निगल रय
***
नवगीत:
*
गरियाए बिन
हजम न होता
खाना, किसको कोसें?
.
वैचारिक प्रतिबद्ध भौत हम
जो न साथ हो, करें फौत हम
झूठ - हकीकत क्या?
क्यों सोचें?
स्वार्थ जियें, सर्वार्थ-मौत हम
जुतियाए बिन
नींद न आती
बैर हमेसा पोसें
.
संसद हो या टी. व्ही. चरचा
जन-धन का लाखों हो खरचा
नकल मार या
धमकी देकर, रउआ
देते आये परचा
पास हुए जो
चाकर, उनको
फेल हुए हम धौंसें
.
हाय बिधाता! जे का कर दओ?
बुरो जमानो, ऐब इतै सौ
जिन्हें लड़ाओ, हांत मिलाए
राम दुहाई - जे कैसें भओ?
गोड़ तोड़ रये
टैक्स भरें पे
कुटें-पिटें मूँ झौंसे
३०-३-२०२०
***
एक दोहा
*
सुन पढ़ सीख समझ जिसे, लिखा साल-दर साल।
एक निमिष में पढ़ लिया?, सचमुच किया कमाल।।
***
ई मित्रता पर पैरोडी:
*
(बतर्ज़: अजीब दास्तां है ये,
कहाँ शुरू कहाँ ख़तम...)
*
हवाई दोस्ती है ये,
निभाई जाए किस तरह?
मिलें तो किस तरह मिलें-
मिली नहीं हो जब वज़ह?
हवाई दोस्ती है ये...
*
सवाल इससे कीजिए?
जवाब उससे लीजिए.
नहीं है जिनसे वास्ता-
उन्हीं पे आप रीझिए.
हवाई दोस्ती है ये...
*
जमीं से आसमां मिले,
कली बिना ही गुल खिले.
न जिसका अंत है कहीं-
शुरू हुए हैं सिलसिले.
हवाई दोस्ती है ये...
*
दुआ-सलाम कीजिए,
अनाम नाम लीजिए.
न पाइए न खोइए-
'सलिल' न न ख्वाब देखिए.
हवाई दोस्ती है ये...
***
मतदाता विवेकाधिकार मंच
*
त्रिपदिक छंद हाइकु
विषय: पलाश
विधा: गीत
*
लोकतंत्र का / निकट महापर्व / हावी है तंत्र
*
मूक है लोक / मुखर राजनीति / यही है शोक
पूछे पलाश / जनता क्यों हताश / कहाँ आलोक?
सत्ता की चाह / पाले हरेक नेता / दलों का यंत्र
*
योगी बेहाल / साइकिल है पंचर / हाथी बेकार
होता बबाल / बुझी है लालटेन / हँसिया फरार
रहता साथ / गरीबों के न हाथ / कैसा षड़्यंत्र?
*
दलों को भूलो / अपराधी हराओ / न हो निराश
जनसेवी ही / जनप्रतिनिधि हो / छुए आकाश
ईमानदारी/ श्रम सफलता का / असली मंत्र
***
मतदाता विवेकाधिकार मंच
*
अपराधी हो यदि खड़ा, मत करिए स्वीकार।
नोटा बटन दबाइए, खुद करिए उपचार।।
*
जन भूखा प्रतिनिधि करे, जन के धन पर मौज।
मतदाता की शक्ति है, नोटा मत की फौज।।
*
नेता बात न सुन रहा, शासन देता कष्ट।
नोटा ले संघर्ष कर, बाधा करिए नष्ट।
*
३०-३-२०१९
***
सामयिक गीत -
परिवर्तन
*
करें भिखारी भीड़ बढ़ाकर
आरक्षण की माँग
अगर न दे सरकार तोड़ दें
कानूनों की टाँग
*
पढ़े-लिखे हम, सुख समृद्धि भी
पाई है भरपूर
अकल-अजीर्ण हो गया, सारी
समझ गयी है दूर
स्वार्थ-साधने खापों में
फैसले किये अंधे
रहें न रहने देंगे सुख से
कर गोरखधंधे
अगड़े होकर भी करते हैं
पिछड़ों का सा स्वाँग
*
भूमि, भवन, उद्योग हमारे
किन्तु नहीं है चैन
लूटेंगे बाज़ार, निबल को
मारेंगे दिन-रैन
वाहन जला, उखाड़ पटरियाँ
लज्जा लूटेंगे
आर्तनाद का भोग लगाकर
आहें घूंटेंगे
बात होश की हमें न करना
घुली कुएँ में भाँग
*
मार रहे मरतों को मिलकर
बहुत वीर हैं हम
मातृभूमि की पीड़ा से भी
आँख न होती नम
कोस रहे जन-सरकारों को
पी-पीकर पानी
लाल करेंगे माँ की चूनर
चीर यही ठानी
सोने का अभिनय करते हम
जगा न सकती बाँग
*
नहीं शत्रु की तनिक जरूरत
काफी हैं हम ही
जीवनदात्री राष्ट्र एकता
खातिर हम यम ही
धृतराष्ट्री हम राष्ट्रप्रमुख को
देंगे केवल दोष
किन्तु न अपने कर्तव्यों का
हमें तनिक है होश
हँसें ठठा हम रावण, बहिना
की सुनी कर माँग
३०-३-२०१६
***
कृति चर्चा:
मुक्त उड़ान: कुमार गौरव अजितेंदु के हाइकु और सम्भावनाओं की आहट
*
[पुस्तक विवरण: मुक्त उड़ान, हाइकु संग्रह, कुमार गौरव अजितेंदु, आईएसबीएन ९७८-८१-९२५९४६-८-२ प्रथम संस्करण २०१४, पृष्ठ १०८, मूल्य १००रु., आवरण बहुरंगी, पेपरबैक, शुक्तिका प्रकाशन ५०८ मार्किट कॉम्प्लेक्स, न्यू अलीपुर कोलकाता ७०००५३, हाइकुकार संपर्क शाहपुर, ठाकुरबाड़ी मोड़, दाउदपुर, दानापुर कैंट, पटना ८०१५०२ चलभाष ९६३१६५५१२९]
*
विश्ववाणी हिंदी का छंदकोष इतना समृद्ध और विविधतापूर्ण है कि अन्य कोई भी भाषा उससे होड़ नहीं ले सकती। देवभाषा संस्कृत से प्राप्त छांदस विरासत को हिंदी ने न केवल बचाया-बढ़ाया अपितु अन्य भाषाओँ को छंदों का उपहार (उर्दू को बहरें/रुक्न) दिया और अन्य भाषाओं से छंद ग्रहण कर (पंजाबी से माहिया, अवधी से कजरी, बुंदेली से राई-बम्बुलिया, मराठी से लावणी, अंग्रेजी से आद्याक्षरी छंद, सोनेट, कपलेट, जापानी से हाइकु, बांका, तांका, स्नैर्यू आदि) उन्हें भारतीयता के ढाँचे और हिंदी के साँचे ढालकर अपना लिया।
द्विपदिक (द्विपदी, दोहा, रोला, सोरठा, दोसुखने आदि) तथा त्रिपदिक छंदों (कुकुभ, गायत्री, सलासी, माहिया, टप्पा, बंबुलियाँ आदि) की परंपरा संस्कृत व अन्य भारतीय भाषाओं में चिरकाल से रही है। एकाधिक भाषाओँ के जानकार कवियों ने संस्कृत के साथ पाली, प्राकृत, अपभ्रंश तथा लोकभाषाओं में भी इन छंदों का प्रयोग किया। विदेशों से लघ्वाकारी काव्य विधाओं में ३ पंक्ति के छंद (हाइकु, वाका, तांका, स्नैर्यू आदि) भारतीय भाषाओँ में विकसित हुए।
हिंदी में हाइकु का विकास स्वतंत्र वर्णिक छंद के साथ हाइकु-गीत, हाइकु-मुक्तिका, हाइकु खंड काव्य के रूप में भी हुआ है। वस्तुतः हाइकु ५-७-५ वर्णों नहीं, ध्वनि-घटकों (सिलेबल) से निर्मित है जिसे हिंदी भाषा में 'वर्ण' कहा जाता है।
कैनेथ यशुदा के अनुसार हाइकु का विकासक्रम 'रेंगा' से 'हाइकाइ' फिर 'होक्कु' और अंत में 'हाइकु' है। भारत में कवीन्द्र रवींद्रनाथ ठाकुर ने अपनी जापान यात्रा के पश्चात् 'जापान यात्री' में चोका, सदोका आदि शीर्षकों से जापानी छंदों के अनुवाद देकर वर्तमान 'हाइकु' के लिये द्वार खोला। द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात् लौटे अमरीकियों-अंग्रेजों के साथ हाइकु का अंग्रेजीकरण हुआ। छंद-शिल्प की दृष्टि से हाइकु त्रिपदिक, ५-७-५ में १७ अक्षरीय वर्णिक छंद है। उसे जापानी छंद तांका / वाका की प्रथम ३ पंक्तियाँ भी कहा गया है। जापानी समीक्षक कोजी कावामोटो के अनुसार कथ्य की दृष्टि से तांका, वाका या रेंगा से उत्पन्न हाइकु 'वाका' (दरबारी काव्य) के रूढ़, कड़े तथा आम जन-भावनाओं से दूर विषय-चयन (ऋतु परिवर्तन, प्रेम, शोक, यात्रा आदि से उपजा एकाकीपन), शब्द-साम्य को महत्व दिये जाने तथा स्थानीय-देशज शब्दों का करने की प्रवृत्ति के विरोध में 'हाइकाइ' (हास्यपरक पद्य) के रूप में आरंभ हुआ जिसे बाशो ने गहनता, विस्तार व ऊँचाइयाँ हास्य कविता को 'सैंर्यु' नाम से पृथक पहचान दी। बाशो के अनुसार संसार का कोई भी विषय हाइकु का विषय हो सकता है।
शुद्ध हाइकु रच पाना हर कवि के वश की बात नहीं है। यह सूत्र काव्य की तरह कम शब्दों में अधिक अभिव्यक्त करने की काव्य-साधना है। ३ अन्य जापानी छंदों तांका (५-७-५-७-७), सेदोका (५-७-७-५-७-७) तथा चोका (५-७, ५-७ पंक्तिसंख्या अनिश्चित) में भी ५-७-५ ध्वनिघटकों का संयोजन है किन्तु उनके आकारों में अंतर है।
छंद संवेदनाओं की प्रस्तुति का वाहक / माध्यम होता है। कवि को अपने वस्त्रों की तरह रचना के छंद-चयन की स्वतंत्रता होती है। हिंदी की छांदस विरासत को न केवल ग्रहण अपितु अधिक समृद्ध कर रहे हस्ताक्षरों में से एक कुमार गौरव अजितेंदु के हाइकु इस त्रिपदिक छंद के ५-७-५ वर्णिक रूप की रुक्ष प्रस्तुति मात्र नहीं हैं, वे मूल जापानी छंद का हिंदीकरण भी नहीं हैं, वे अपने परिवेश के प्रति सजग तरुण-कवि मन में उत्पन्न विचार तरंगों के आरोह-अवरोह की छंदानुशासन में बँधी-कसी प्रस्तुति हैं।
अजीतेंदु के हाइकु व्यक्ति, देश, समाज, काल के मध्य विचार-सेतु बनाते हैं। छंद की सीमा और कवि की अभिव्यक्ति-सामर्थ्य का ताल-मेल भावों और कथ्य के प्रस्तुतीकरण को सहज-सरस बनाता है। शिल्प की दृष्टि से अजीतेंदु ने ५-७-५ वर्णों का ढाँचा अपनाया है। जापानी में यह ढाँचा (फ्रेम) सामने तो है किन्तु अनिवार्य नहीं। बाशो ने १९ व २२ तथा उनके शिष्यों किकाकु ने २१, बुशोन ने २४ ध्वनि घटकों के हाइकु रचे हैं। जापानी भाषा पॉलीसिलेबिक है। इसकी दो ध्वनिमूलक लिपियाँ 'हीरागाना' तथा 'काताकाना' हैं। जापानी भाषा में चीनी भावाक्षरों का विशिष्ट अर्थ व महत्व है। हिंदी में हाइकु रचते समय हिंदी की भाषिक प्रकृति तथा शब्दों के भारतीय परिवेश में विशिष्ट अर्थ प्रयुक्त किये जाना सर्वथा उपयुक्त है। सामान्यतः ५-७-५ वर्ण-बंधन को मानने
अजितेन्दु के हाइकु प्राकृतिक सुषमा और मानवीय ममता के मनोरम चित्र प्रस्तुत करते हैं। इनमें सामयिक विसंगतियों के प्रति आक्रोश की अभिव्यक्ति है। ये पाठक को तृप्त न कर आगे पढ़ने की प्यास जगाते हैं। आप पायेंगे कि इन हाइकुओं में बहुत कुछ अनकहा है किन्तु जो-जितना कहा गया है वह अनकहे की ओर आपके चिंतन को ले जाता है। इनमें प्राकृतिक सौंदर्य- रात झरोखा / चंद्र खड़ा निहारे / तारों के दीप, पारिस्थितिक वैषम्य- जिम्मेदारियाँ / अपनी आकांक्षाएँ / कशमकश, तरुणोचित आक्रोश- बन चुके हैं / दिल में जमे आँसू / खौलता लावा, कैशोर्य की जिज्ञासा- जीवन-अर्थ / साँस-साँस का प्रश्न / क्या दूँ जवाब, युवकोचित परिवर्तन की आकांक्षा- लगे जो प्यास / माँगो न कहीं पानी / खोद लो कुँआ, गौरैया जैसे निरीह प्राणी के प्रति संवेदना- विषैली हवा / मोबाइल टावर / गौरैया लुप्त, राष्ट्रीय एकता- गाँव अग्रज / शहर छोटे भाई / बेटे देश के, राजनीति के प्रति क्षोभ- गिद्धों ने माँगी / चूहों की स्वतंत्रता / खुद के लिए, आस्था के स्वर- धुंध छँटेगी / मौसम बदलेगा / भरोसा रखो, आत्म-निरीक्षण, आव्हान- उठा लो शस्त्र / धर्मयुद्ध प्रारंभ / है निर्णायक, पर्यावरण प्रदूषण- रोक लेता है / कारखाने का धुँआ / साँसों का रास्ता, विदेशी हस्तक्षेप - देसी चोले में / विदेशी षडयंत्र / घुसे निर्भीक, निर्दोष बचपन- सहेजे हुए / मेरे बचपन को / मेरा ये गाँव, विडम्बना- सूखा जो पेड़ /जड़ों की थी साजिश / पत्तों का दोष, मानवीय निष्ठुरता- कौओं से बचा / इंसानों ने उजाड़ा / मैना का नीड़ अर्थात जीवन के अधिकांश क्षेत्रों से जुड़ी अभिव्यक्तियाँ हैं।
अजितेन्दु के हाइकु भारतीय परिवेश और समाज की समस्याओं, भावनाओं व चिंतन का प्रतिनिधित्व करते हैं. इनमें प्रयुक्त बिंब, प्रतीक और शब्द सामान्य जन के लिये सहज ग्रहणीय हैं। इन हाइकुओं के भाषा सटीक-शुद्ध है। अजितेन्दु का यह प्रथम हाइकु संकलन उनके आगामी रचनाकर्म के प्रति आश्वस्त करता है।
३०.३.२०१४
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मुक्तिका
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कद छोटा परछाईं बड़ी है.
कैसी मुश्किल आई घड़ी है.
चोर कर रहे चौकीदारी
सचमच ही रुसवाई बड़ी है..
बीबी बैठी कोष सम्हाले
खाली हाथों माई खड़ी है..
खुद पर खर्च रहे हैं लाखों
भिक्षुक हेतु न पाई पड़ी है..
'सलिल' सांस-सरहद पर चुप्पी
मौत शीश पर आई-अड़ी है..
३०-३-२०१०
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