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रविवार, 5 जुलाई 2026

जुलाई ५, गुरु, दोहा, चोका, गीत, बरसात, रस, अलंकार, हाइकु, घनाक्षरी, अचल, छंद, अलंकार, दोहा समीक्षा

सलिल सृजन जुलाई ५
नवगीत 
खिला अफीम धर्म की
जनगण को मद मस्त करो 
शहर-गाँव मंदिर बनवाओ 
आपस में फसाद करवाओ 
लड़ें बिल्लियाँ बंदर मामा 
तोड़-तोड़कर रोटी खाओ 
बैल तोड़कर बाड़, फसल चर
प्रभु को पस्त करो
खिला अफीम धर्म की
जनगण को मद मस्त करो 
मल-मल मैल बहाओ नदी में   
फूलो-फलो कुटैव बदी में
चुरा चढ़ावा तान लो महल
पा प्रसाद गर्राओ खुदी में 
सोना चाँदी हीरे मोती  
खुद निज हस्त करो
खिला अफीम धर्म की
जनगण को मद मस्त करो 
जनमत को भरमाओ मिले जय 
संविधान का रोज करो क्षय 
हर पद पर चमचे बैठाओ
मानो मत कानूनों का भय
छप्पन इंची सीने में  
लालच पैबस्त करो 
खिला अफीम धर्म की
जनगण को मद मस्त करो 
५-७-२०२६ 
०००  
    
गुरुवंदन
गुरु को नित वंदन करो, हर पल है गुरुवार.
गुरु ही देता शिष्य को, निज आचार-विचार..
*
विधि-हरि-हर, परब्रम्ह भी, गुरु-सम्मुख लघुकाय.
अगम अमित है गुरु कृपा, अन्य नहीं पर्याय..
*
गुरु है गंगा ज्ञान की, करे पाप का नाश.
ब्रम्हा-विष्णु-महेश सम, काटे भव का पाश..
*
गुरु भास्कर अज्ञान तम, ज्ञान सुमंगल भोर.
शिष्य पखेरू कर्म कर, गहे सफलता कोर..
*
गुरु-चरणों में बैठकर, गुर जीवन के जान.
ज्ञान गहे एकाग्र मन, चंचल चित अज्ञान..
*
गुरुता जिसमें वही गुरु, शत-शत नम्र प्रणाम.
कंकर से शंकर गढ़े, कर्म करे निष्काम..
*
गुरु पल में ले शिष्य के, गुण-अवगुण पहचान.
दोष मिटाकर बना दे, आदम से इंसान..
*
गुरु-चरणों में स्वर्ग है, गुरु-सेवा में मुक्ति.
भव सागर-उद्धार की, गुरु-पूजन ही युक्ति..
*
माटी शिष्य कुम्हार गुरु, करे न कुछ संकोच.
कूटे-साने रात-दिन, तब पैदा हो लोच..
*
कथनी-करनी एक हो, गुरु उसको ही मान.
चिन्तन चरखा पठन रुई, सूत आचरण जान..
*
शिष्यों के गुरु एक है, गुरु को शिष्य अनेक.
भक्तों को हरि एक ज्यों, हरि को भक्त अनेक..
*
गुरु तो गिरिवर उच्च हो, शिष्य 'सलिल' सम दीन.
गुरु-पद-रज बिन विकल हो, जैसे जल बिन मीन..
*
ज्ञान-ज्योति गुरु दीप ही, तम का करे विनाश.
लगन-परिश्रम दीप-घृत, श्रृद्धा प्रखर प्रकाश..
*
गुरु दुनिया में कम मिलें, मिलते गुरु-घंटाल.
पाठ पढ़ाकर त्याग का, स्वयं उड़ाते माल..
*
गुरु-गरिमा-गायन करे, पाप-ताप का नाश.
गुरु-अनुकम्पा काटती, महाकाल का पाश..
*
विश्वामित्र-वशिष्ठ बिन, शिष्य न होता राम.
गुरु गुण दे, अवगुण हरे, अनथक आठों याम..
*
गुरु खुद गुड़ रह शिष्य को, शक्कर सदृश निखार.
माटी से मूरत गढ़े, पूजे सब संसार..
*
गुरु की महिमा है अगम, गाकर तरता शिष्य.
गुरु कल का अनुमान कर, गढ़ता आज भविष्य..
*
मुँह देखी कहता नहीं, गुरु बतलाता दोष.
कमियाँ दूर किये बिना, गुरु न करे संतोष..
*
शिष्य बिना गुरु अधूरा, गुरु बिन शिष्य अपूर्ण.
सिन्धु-बिंदु, रवि-किरण सम, गुरु गिरि चेला चूर्ण..
*
गुरु अनुकम्पा नर्मदा, रुके न नेह-निनाद.
अविचल श्रृद्धा रहे तो, भंग न हो संवाद..
*
गुरु की जय-जयकार कर, रसना होती धन्य.
गुरु पग-रज पाकर तरें, कामी क्रोधी वन्य..
*
गुरुवर जिस पर सदय हों, उसके जागें भाग्य.
लोभ-मोह से मुक्ति पा, शिष्य वरे वैराग्य..
*
गुरु को पारस जानिए, करे लौह को स्वर्ण.
शिष्य और गुरु जगत में, केवल दो ही वर्ण..
*
संस्कार की सान पर, गुरु धरता है धार.
नीर-क्षीर सम शिष्य के, कर आचार-विचार..
*
माटी से मूरत गढ़े, सद्गुरु फूंके प्राण.
कर अपूर्ण को पूर्ण गुरु, भव से देता त्राण..
*
गुरु से भेद न मानिये, गुरु से रहें न दूर.
गुरु बिन 'सलिल' मनुष्य है, आँखें रहते सूर.
*
टीचर-प्रीचर गुरु नहीं, ना मास्टर-उस्ताद.
गुरु-पूजा ही प्रथम कर, प्रभु की पूजा बाद..
***
अभिनव प्रयोग
एक चोका गीत
बरसात
*
वसुधा हेरे
मेघदूत की राह।
कौन पा सके
व्यथा-दर्द की थाह?
*
विरह अग्नि
झुलसाती बदन
नीर बहाते
निश-दिन नयन
तरु भैया ने
पात गिराए हाय!
पवन पिता के
टूटे सभी सपन।
नंद चाँदनी
बैरन देती दाह
वसुधा हेरे
मेघदूत की राह।।
*
टेर विधाता
सुनो न सूखे पानी
आँख न रोए
होए धरती धानी
दादुर बोले
झींगुर नाचे झूम
टिमकी बाजे
गूँजे छप्पर-छानी
मादल पाले
ढोलकिया की चाह
वसुधा हेरे
मेघदूत की राह।।
*
बजा नगाड़ा
बिजली बैरन सास
डाँट लगाती
बुझा न पाये प्यास
देवर रवि
दे वर; ले वर आ
दो पल तो हों
भू-नभ दोनों पास
क्षितिज हँसा
मिली चाह ले चाह
लिए बाँह में बाँह
५-७-२०१९
***
भाषा व्याकरण ३
*
*रस*
स्वाद भोज्य का सार है, गंध सुमन का सार।
रस कविता का सार है, नीरस बेरस खार।।
*
*रस महिमा*
गो-रस मध-ुरस आम्र-रस,
गन्ना रस कर पान।
जौ-रस अंगूरी चढ़़े, सिर पर बच मतिमान।।
बतरस, गपरस दे मजा, नेतागण अनजान।
निंदारस में लीन हों, कभी नहीं गुणवान।।
पी लबरस प्रेमी हुए, धन्य कभी कुर्बान।
संजीवित कर काव्य-रस, फूँके सबमें प्राण।।
***
*अलंकार*
पत्र-पुष्प हरितिमा है, वसुधा का श्रृंगार।
शील मनुज का; शौर्य है, वीरों का आचार।।
आभूषण प्रिय नारियाँ, चला रहीं संसार।
गह ना गहना मात्र ही, गहना भाव उदार।।
शब्द भाव रस बिंब लय, अर्थ बिना बेकार।
काव्य कामिनी पा रही, अलंकार सज प्यार।।
शब्द-अर्थ संयोग से, अलंकार साकार।
मम कलियों का मोहकर, हरे चित्त हर बार।।
५-७-२०१९
***
हाइकु सलिला:
*
रेशमी बूटी
घास चादर पर
वीर बहूटी
*
मेंहदी रची
घास हथेली पर
मखमली सी.
*
घास दुलहन
माथे पर बिंदिया
बीरबहूटी
*
हाइकु पर
लगा है जी एस टी
कविता पर.
*
कहें नाकाफी
लगाए नए कर
पूछें: 'है कोफी?'
*
भाजपाई हैं
बड़े जुमलेबाज
तमाशाई हैं.
*
जीत न हार
दोनों की जय-जय
हुआ है निर्णय ..
*
कजरी नहीं
स्वच्छ करो दीवाल
केजरीवाल.
***
रचना - प्रति रचना:
समुच्चय और आक्षेप अलंकार
घनाक्षरी छंद
*
गुरु सक्सेना नरसिंहपुर मध्य प्रदेश
*
दुर्गा गणेश ब्रह्मा विष्णु महेश
पांच देव मेरे भाग्य के सितारे चमकाइये
पांचों का भी जोर भाग्य चमकाने कम पड़े
रामकृष्ण जी को इस कार्य में लगाइए।
रामकृष्ण जी के बाद भाग्य ना चमक सके
लगे हाथ हनुमान जी को आजमाइए।
सभी मिलकर एक साथ मुझे कॉलोनी में
तीस बाई साठ का प्लाट दिलवाइए।
*
संजीव वर्मा 'सलिल'
*
देव! कवि 'गुरु' प्लाट माँगते हैं आपसे
गुरु गुड, चेले को शुगर आप मानिए.
प्लाट ऐसा दे दें धाँसू कवितायें हो सकें,
चेले को भूखंड दे भवन एक तानिए.
प्रार्थना है आपसे कि खाली मन-मंदिर है,,
सिया-उमा-भोले जी के संग आ विराजिए.
सियासत हो रही अवध में न आप रुकें,
नर्मदा किनारे 'सलिल' सँग पंजीरी फांकिये.
५-७-२०१८
***
दोहा मुक्तक सलिला:
अमरनाथ
*
अमरनाथ! रहिए सदय, करिए दैव निहाल।
करूँ विनय संकट हरें, प्रभु! तव ह्रदय विशाल।।
अमरनाथ की कृपा से, विजय-तिलक वर भाल।
करतल में करताल ले, भजन करे हर हाल।।
*
अमर नाथ; सेवक नहीं, पल में हो निर्जीव।
प्रभु संप्राणित करें तो, शव भी हो संजीव।।
भोले पल में तुष्ट हो, बनते करुणासींव।
रुष्ट हुए तो खैरियत, मन न सकता जीव।।
*
अमर नाथ जिसके न वह, रहे कभी भयभीत।
शब्द-सुमन अर्पित करे, अक्षर-अक्षर प्रीत।।
भाव-सलिल साथी बने, नव रस का हो मीत।
समर सत्य-हित कर सदा, निश्चय मिलना जीत।।
*
अमरनाथ-जयकार कर, शंका का हो अंत।
कंकर शंकर-दास हो, कोशिश कर-कर कंत।।
आनंदित हैं भू-गगन, नर्तित दिशा-दिगंत।
शून्य-सांत हैं जो वही, हैं सर्वस्व अनंत।।
*
अमर नाथ बसते वहीं, जहाँ 'सलिल' की धार।
यह पद-प्रक्षालन करे, वे रखते सिर-धार।।
गरल-अमिय सम भाव से, ईश करें स्वीकार।
निराकार हैं जो वही, हैं कण-कण साकार।।
*
अमरनाथ ही आस हो, शकुंतला सी श्वास।
प्रगति-योजना हर सके, जीवन का संत्रास।।
मन-दीपक जलता रहे, ले अधरों पर हास।
स्वेद खिले साफल्य का, सुमन बिखेर सुवास।।
*
अमरनाथ जो ठान लें, तत्क्षण करते काम।
राम मिल सकें जप 'मरा', सीधी हो विधि वाम।।
सुर-नर-असुरों से पूजें, करते काम तमाम।
दुराचार के नाश हित करते काम तमाम। ।
**
५.७.२०१८
***
एक षट्पदी:
*
ब्रह्मा-विष्णु-सदाशिव को जप, पी ब्रांडी-व्हिस्की-शैम्पेन,
रम पी राम-राम जप प्यारे, भाँग छान ले भोले मैन।
चिलम धतूरा चंचल चित ले, चिन्मय से साक्षात् करे-
चकित-भ्रमित या थकित अगर तू, खुद में डूब न हो बेचैन।
सुर-नर-असुर सुरा पीने हित, तज मतभेद एक होते
पी स्कोच चढ़ा ठर्रा सँग दीन-धनी दूरी खोते।।
५-७-२०१७
***
रसानंद दे छंद नर्मदा ३८ : छन्द
दोहा, सोरठा, रोला, आल्हा, सार, ताटंक, रूपमाला (मदन), चौपाई, हरिगीतिका, उल्लाला,गीतिका,घनाक्षरी, बरवै, त्रिभंगी, सरसी, छप्पय, भुजंगप्रयात, कुंडलिनी, सवैया, शोभन या सिंहिका, सुमित्र, सुगीतिका, शंकर, मनहरण (कवित्त/घनाक्षरी), उपेन्द्रवज्रा, इंद्रवज्रा, सखी, वासव, अचल धृति छंदों से साक्षात के पश्चात् मिलिए अचल छंद से
अचल छंद
*
अपने नाम के अनुरूप इस छंद में निर्धारित से विचलन की सम्भावना नहीं है. यह मात्रिक सह वर्णिक छंद है। इस चतुष्पदिक छंद का हर पद २७ मात्राओं तथा १८ वर्णों का होता है। हर पद (पंक्ति) में ५-६-७ वर्णों पर यति इस प्रकार है कि यह यति क्रमशः ८-८-११ मात्राओं पर भी होती है। मात्रिक तथा वार्णिक विचलन न होने के कारण इसे अचल छंद कहा गया है। छंद प्रभाकर तथा छंद क्षीरधि में दिए गए उदाहरणों में मात्रा बाँट १२१२२/१२१११२/२११२२२१ रखी गयी है। तदनुसार
उदाहरण -
१.
सुपात्र खोजे, तभी समय दे, मौन पताका हाथ।
कुपात्र पाये, कभी न पद- दे, शोक सभी को नाथ।।
कभी नवायें, न शीश अपना, छूट रहा हो साथ-
करें विदा क्यों, सदा सजल हो, नैन- न छोड़ें हाथ।।
*
वर्ण तथा मात्रा बंधन यथावत रखते हुए मात्रा बाँट में परिवर्तन करने से इस छंद में प्रयोग की विपुल सम्भावनाएँ हैं.
उदाहरण-
१.
मौन पियेगा, ऊग सूर्य जब, आ अँधियारा नित्य।
तभी पुजेगा, शिवशंकर सा, युगों युगों आदित्य।।
चन्द्र न पाये, मान सूर्य सम, ले उजियारा दान-
इसीलिये तारक भी नभ में, करें न उसका मान।।
इस तरह के परिवर्तन किये जाएं या नहीं? विद्वज्जनों के अभिमत आमंत्रित हैं।
***
***
एक दोहा
रमा रमा में मन रहा, किसको याद रमेश।
छोड़ विष्णु पुज रहीं हैं, लछमी सहित गणेश।।
५-७-२०१६
***
दोहा संग्रह की दोहा समीक्षा
(कृति विवरण: होते ही अंतर्मुखी, दोहा संग्रह, दोःकर: स्वामी श्यामानंद सरस्वती 'रौशन', पृष्ठ ११२, सजिल्द, बहुरंगी आकर्षक आवरण, १५० रु., आकार डिमाई, विद्या भगत प्रकाशन, रानी बाग, दिल्ली ३४.)
विश्व वांग्मय में नहीं, दोहा जैसा छंद.
छंदराज यह सूर्य सम, हरता तिमिर अमंद..
जन-जीवन पर्याय यह, जन-मानस का मित्र.
अंकित करता शब्दशः आँखों देखे चित्र..
होते ही अंतर्मुखी, दोहा रचिए आप.
बहिर्मुखी हो देखिये, शांति गयी मन-व्याप..
स्वामी श्यामानंद ने, रौशन शारद-कोष.
यह कृति देकर किया है, फिर दोहा- जयघोष..
सारस्वत वरदान सम, दोहा अद्भुत छंद.
समय सारथी सनातन, पथ दर्शक निर्द्वंद..
गीति-गगन में सोहता, दोहा दिव्य दिनेश.
अन्य छंद सुर किन्तु यह, है सुर-राज सुरेश..
सत्-चित-आनंद मन बसे, सत्-शिव-सुन्दर देह.
शेष अशेष विशेष है, दोहा निस्संदेह..
दो पद शशि-रवि, रात-दिन, इडा-पिंगला जान.
बना स्वार्थ परमार्थ को, बन जा मन मतिमान..
स्वामी श्यामानंद को है सरस्वती सिद्ध.
हर दोहा-शर कर रहा, अंतर्मन को बिद्ध..
होते ही अंतर्मुखी, रौशन हुआ जहान.
दीखता हर इन्सान में बसा हुआ भगवान्..
हिंदी उर्दू संस्कृत पिंगल में निष्णात.
शब्द-ब्रम्ह आराधना, हुई साध्य दिन-रात..
दोहा-लेखन साधना, करें ध्यान में डूब.
हर दोहा दिल को छुए, करे प्रभावित खूब..
पढिये-गुनिये-समझिये, कवि के दोहे चंद.
हर दोहे की है अलग, दीप्ति-उजास अखंड..
''दोहा कहना कठिन है, दुष्कर है कवि-कर्म.
कितनों को आया समझ, दोहे का जो मर्म..''--पृष्ठ १७
''दोहा कहने की कला, मत समझो आसान.
धोखा खाते हैं यहाँ, बड़े-बड़े विद्वान्..'' -''--पृष्ठ १७
सरल-शुद्ध शब्दावली, सरस उक्ति-माधुर्य.
भाव, बिम्ब, लय, कथ्य का, दोहों में प्राचुर्य..
''दोहे में मात्रा गिरे, है भारी अपराध.
यति-गति हो अपनी जगह, दोहा हो निर्बाध..''--पृष्ठ १७
प्रेम-प्यार को मानते, हैं जीवन का सार.
स्वामी जी दे-पा रहे, प्यार बिना तकरार..
''प्यार हमारा धर्म है, प्यार दीन-ईमान.
हमने समझा प्यार को, ईश्वर का वरदान..''--पृष्ठ २२
''उपमा सच्चे प्रेम की, किससे दें श्रीमान?
प्रेम स्वयं उपमेय है, प्रेम स्वयं उपमान..''--पृष्ठ २१
दिखता रूप अरूप में, है अरूप खुद रूप.
द्वैताद्वैत भरम मिटा, भिक्ष्क लगता भूप..
''रूप कभी है छाँव तो, रूप कभी है धूप.
जिससे प्रगत रूप है, उसका रूप अनूप''--पृष्ठ २४
स्वामी जी की संपदा, सत्य-शांति-संतोष.
देशप्रेम, सत् आचरण, संयम सुख का घोष..
देख विसंगति-विषमता, कवि करता संकेत.
सोचें-समझें-सुधारें, खुद को खुद अभिप्रेत..
''लोकतंत्र में भी हुआ, कैसा यह उपहास?
इंग्लिश को कुर्सी मिली, हिंदी को वनवास..''--पृष्ठ २७
''राजनीति के क्षेत्र में सबके अपने स्वार्थ.
अपने-अपने कृष्ण हैं, अपने-अपने पार्थ..''--पृष्ठ ३८
''ले आया किस मोड़ पर सुन्दरता का रोग.
देह प्रदर्शन देखते आंखें फाड़े लोग..''--पृष्ठ ४३
''कैसे इनको मिल गया, जनसेवक का नाम?
खून चूसना ही अगर, ठहरा इनका काम..''--पृष्ठ ५३
शायर सिंह सपूत ही, चलें तोड़कर लीक.
स्वामी जी काव्य पढ़, उक्ति लगे यह ठीक..
''रोती रहती है सदा, रात-रात भर रात,
दिन से होती ही नहीं, मुलाकात की बात..''--पृष्ठ ६२
कवि कहता है- ''व्यर्थ है, सिर्फ किताबी ज्ञान.
करना अपने ढंग से, सच का सदा बखान..'
''भौंचक्के से रह गए द्वैत और अद्वैत.
दोनों पर भारी पड़ा, केवल एक लठैत..''--पृष्ठ ६४
''मँहगा पड़ता है सदा, माटी का अपमान.
माटी ने माटी किया, कितनों का अभिमान..''--पृष्ठ ८३
'गंता औ' गन्तव्य का, जब मिट जाता द्वैत.
बने आत्म परमात्म तब, शेष रहे अद्वैत..
''चलते-चलते ही मिला, मुझको यह मन्तव्य.
गंता भी हूँ मैं स्वयम, और स्वयं गन्तव्य..''--पृष्ठ ११०
दोहे श्यामानंद के, 'सलिल' स्नेह की धार.
जो पड़ता वह डूबता, डूबा लगता पार..
अलंकार, रस, बिम्ब, लय, भाव भरे भरपूर.
दोहों को पढ़ सीखिए, दोहा छंद जरूर..
दोहा-दर्पण दिखाता, 'सलिल'-स्नेह ही सत्य.
होते ही अंतर्मुखी, मिटता बाह्य असत्य..
रचिए दोहे और भी, रसिक देखते राह.
'सलिल' न बूडन से डरे, बूडे हो भव-पार..
*
***
मुक्तिका:
*
नित नयी आशा मुखर हो साल भर
अब न नेता जी बजायें गाल भर
मिले हिंदी को प्रमुखता शोध श्री
तोड़कर अंग्रेजियत का जाल भर
सनेही है राम का जो लाल वह
चाहता धरती रहे खुशहाल भर
करेगा उद्यान में तब पुष्प राज
जब सुनीता हो हमारी चाल भर
हों खरे आचार अपने यदि सदा
ज्योति को तम में मिलेगा काल भर
हसरतों पर कस लगामें रे मनुज!
मत भुलाना बाढ़ और भूचाल भर
मिटेगी गड़बड़ सभी कानून यदि
खींच ले बिन पेशियों के खाल भर
सुरक्षित कन्या हमेशा ही रहे
संयमित जीवन जियें यदि लाल भर
तंत्र सुधरेगा 'सलिल' केवल तभी
सम रहें सबके हमेशा हाल भर
५-७-२०१५
***
आइये, सोचें-विचारें
*
जिन्हें हमारी फ़िक्र, उन्हें हम रहे रुलाते.
रोये उनके लिए, न जिनके मन हम भाते..
करते उनकी फ़िक्र, न जिनको फ़िक्र हमारी-
है अजीब, पर सत्य समझ-स्वीकार न पाते..
'सलिल' समझ सच को, बदलें हम खुद को फ़ौरन.
कभी नहीं से देर भली, कहते विद्वज्जन..
५-७-२०१०
***

शुक्रवार, 5 दिसंबर 2025

दिसंबर ५, सॉनेट, कबीर, जयललिता, हुर्रेमारा, अलंकार, अतिशयोक्ति, नवगीत, कचनार

 सलिल सृजन दिसंबर ५

*
सॉनेट
कबीर
*
ज्यों की त्यों चादर धर भाई
जिसने दी वह आएगा।
क्यों तैंने मैली कर दी है?
पूछे; क्या बतलायेगा?
काँकर-पाथर जोड़ बनाई
मस्जिद चढ़कर बांग दे।
पाथर पूज ईश कब मिलता?
नाहक रचता स्वांग रे!
दो पाटन के बीच न बचता
कोई सोच मत हो दुखी।
कीली लगा न किंचित पिसता
सत्य सीखकर हो सुखी।
फेंक, जोड़ मत; तभी अमीर
सत्य बोलता सदा कबीर।।
५-१२-२०२१
***
सॉनेट
भोर
*
भोर भई जागो रे भाई!
उठो न आलस करना।
कलरव करती चिड़िया आई।।
ईश-नमन कर हँसना।
खिड़की खोल, हवा का झोंका।
कमरे में आकर यह बोले।
चल बाहर हम घूमें थोड़ा।।
दाँत साफकर हल्का हो ले।।
लौट नहा कर, गोरस पी ले।
फिर कर ले कुछ देर पढ़ाई।
जी भर नए दिवस को जी ले।।
बाँटे अरुण विहँस अरुणाई।।
कोरोना से बचकर रहना।
पहन मुखौटा जैसे गहना।।
५-१२-२०२१
***
कचनार
हाँगकाँग का राष्ट्रीय, फूल बना कचनार।
बवासीर खाँसी दमा, हरकर दे उपहार।।
कचनार (काँचनार, कराली, बौहिनिया वेरिएगाटा) एक पर्णपाती वृक्ष है जिसमें विशिष्ट तितली के आकार के पत्ते और दिखावटी आर्किड जैसे फूल होते हैं। दक्षिण एशिया का मूल निवासी, यह वृक्ष १२ मीटर की ऊँचाई तक बढ़ता है, जिसमें फैला हुआ मुकुट और हरी-भूरी छाल होती है। इसके सफेद फ़ेद, पीले, लाल रंग के फूल, गुलाबी रंग की धारियों के साथ बेहद खूबसूरत दिखाई देते हैं। संस्कृत में कचनार शब्द का अर्थ है 'एक सुंदर चमकती हुई महिला', जो इस तरह के सुंदर वृक्ष के लिए एक उपयुक्त नाम है। इसे बगीचों और पार्कों में लगाया जाता है। फूलने पर इसका सौंदर्य देखने लायक होता है। दो-लोब वाली पत्तियों की विशेषता के कारण इस वृक्ष को इसका लैटिन नाम बौहिनिया मिला। इसकी पत्तियों के आकार के कारण इसे 'ऊँट के पैर का पेड़' भी कहा जाता है। कचनार मार्च-अप्रैल महीनों में फूलता है। मई-जून में इसकी फलियों में बीज पकते हैं जिन्हें इकट्ठा कर नए पौधे पाए जा सकते हैं। कचनार के पौधे में हेनट्रीकॉन्टेन, ऑक्टाकोसानॉल, साइटोस्टेरॉल और स्टिगमास्टरोल जैसे फाइटोकोन्स्टिट्यूएंट्स होते हैं जो पौधे की एंटीएलर्जिक गुणों में सहायक होते हैं। कचनार की दो प्रजातियाँ होती हैं। एक में सफेद कलर की पुष्प कालिकाएँ आती हैं जबकि दूसरी पर लाल रंग के फूल खिलते हैं। सर्दियों में यह पेड़ गुलाबी रंग के बहुत प्यारे प्यारे फूलों से लद जाता है। कचनार का पेड़ भारत, पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका, म्यांमार, थाईलैंड, चीन, वियतनाम, कंबोडिया, लाओस, और इंडोनेशिया आदि देशों में पाया जाता है। भारत में विशेष रूप से उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, और ओडिशा राज्यों में अधिक पाया जाता है।
कचनार एंटीऑक्सीडेंट, एंटी-हेल्मिंटिक, एस्ट्रिंजेंट, एंटी-लेप्रोटिक, एंटी-डायबिटिक, एंटी-हाइपरग्लाइसेमिक और एंटी-माइक्रोबियल है। यह रक्त शर्करा स्तर को नियंत्रित करने में मदद कर मधुमेह (डायबिटीज) को प्रभावी रूप से प्रबंधित करने में मदद करते हैं। यह क्षय रोग, खाँसी, कफ में रामबाण औषधि का काम करता है। कचनार (बौहिनिया वेरिएगाटा) चयापचय में सुधार करस्टेम वजन घटाने में सहायक होता है। 'ग्रोथ हर्ब' के नाम से प्रसिद्ध कचनार घावों को ठीक कर नई कोशिकाओं के निर्माण को तेज करता है। आयुर्वेद के अनुसार कचनार-चूर्ण का गुनगुने पानी और शहद के साथ सेवन करें तो यह हाइपोथायरॉइड-प्रबंधन में मदद करता है। इस में त्रिदोष संतुलन और दीपन (क्षुधावर्धक) गुण होते हैं। अपने शीत और कसैले गुणों के कारण कचनार त्वचा की समस्याओं जैसे कि कील, मुँहासे आदि के इलाज में बहुत उपयोगी है। कचनार पौधे के यौगिक शरीर में इंसुलिन तंत्र को नियंत्रित कर बढ़ते रक्त शर्करा का स्तर कम करते हैं। मुँह में छाले, मसूड़े में कीड़े सहित जख्म या दुर्गंध हो तो दिन में तीन बार कचनार के पेड़ की छाल का काढ़ा बनाकर, छान कर गरारे करने से राहत मिलती है। कचनार की छाल को अच्छे से पीसकर बना चूर्ण रोज सुबह २ ग्राम पानी के साथ सेवन करने से पेट से संबंधित बीमारियों से भी राहत मिलती है। कचनार की पत्तियों का काढ़ा बनाकर पिएँ तो लिवर से संबंधित समस्याएँ, मधुमेह, रक्तचाप आदि नियंत्रित रहेगा। कचनार-चूर्ण शहद यागुनगुने पानी के साथ सेवन करें, तो उससे थायरायड का समाधान होता है।
कचनार का उपयोग हाइपोथायरायडिज्म के उपचार में किया जाता है। एक क्लासिकल आयुर्वेदिक पॉलीहर्बल औषधि 'कचनार गुग्गुल' हैत्वचा रोग, घाव, सूजन, पेचिश और अल्सर जैसी विभिन्न बीमारियों के इलाज में मदद करता है। यह फ्री रेडिकल्स से लड़ने में मदद करता है, इम्यूनिटी को बढ़ाता है, एंटी-इंफ्लेमेटरी गुणों के कारण सूजन कम करता है। आयुर्वेद के अनुसार, जब शहद के साथ मिलाया जाता है तो यह त्वचा के लिए एक क्लींजिंग एजेंट के रूप में काम कर खुजली, मुँहासे (पिंपल्स) आदि समस्याओं से राहत देता है। इसके कसैले गुणों के कारण त्वचा पर इसका कूलिंग प्रभाव पड़ता है। कचनार गुग्गुल गोली (टैबलेट) का उपयोग थायरॉयड डिसऑर्डर, पीसीओएस, सिस्ट, कैंसर, लिपोमा, फाइब्रॉएड, बाहरी और आंतरिक वृद्धि, त्वचा रोग आदि के लिए किया जाता है। कचनार अपने कषाय (कसैला) और सीत (ठंडा) स्वभाव के कारण प्रभावित क्षेत्र पर लगाने से दाँत दर्द कम करने में मदद करता है। यह बैक्टीरिया के विकास को भी रोकता है जो दाँत दर्द और मुँह से दुर्गंध का कारण बनते हैं। कचनार की पत्तियों में अल्सर रोधी गुण होते हैं और ये लीवर, किडनी की रक्षा करने के साथ ही जीवाणुरोधी गुण भी रखती हैं। मलेरिया बुखार में सिरदर्द से राहत पाने के लिए भारतीय लोग कचनार-पत्तियों के काढ़े का इस्तेमाल करते हैं।
दक्षिण भारत, सिक्किम, बंगाल, बिहार और ओडिशा में इसकी पत्तियों का उपयोग पीलिया के इलाज तथा पेट में घाव और ट्यूमर को ठीक करने के लिए किया जाता है।
संस्कृति और परंपरा: कचनार प्रेम और पर्वोल्लास का पर्याय है। इसके फूलों का उपयोग पारंपरिक समारोहों और सजावट में किया जाता है। कला, साहित्य और धार्मिक प्रतीकवाद में इस पेड़ का सांस्कृतिक महत्व है। बच्चों को इसकी दो खंडीय पत्तियाँ बहुत रोचक लगती हैं और वे इसे अपने खेलों में पुस्तक के रूप में प्रयोग करते हैं। यह पौधा हिंदुओं के लिए पवित्र है, दशहरा पर इसकी पूजा की जाती है। कचनार के सफेद फूलों का उपयोग धन की देवी लक्ष्मी और ज्ञान की देवी सरस्वती की पूजा के लिए किया जाता है। इसकी पत्तियों में १०-१६ प्रतिशत प्रोटीन होने के कारण टहनियों और फलियों का उपयोग पशुओं के चारे के रूप में किया जाता है। हिमाचल प्रदेश के लोकगीतों में कचनार का स्थान महत्वपूर्ण और कालजयी है।
कचनार के फूल को हांगकांग के झंडे और सिक्कों पर दर्शाया गया है।
पर्यावरणीय प्रभाव: यह पेड़ फलीदार परिवार से संबंधित है और राइजोबियम बैक्टीरिया के साथ सहजीवी संबंध में रहता है, जो वायुमंडलीय नाइट्रोजन को ठीक करने और मिट्टी की उर्वरता में सुधार करने में मदद करता है। आर्किड के पेड़ परागणकों के लिए उच्च मूल्य प्रदान करते हैं। लंबी पूँछ वाली स्किपर तितली के लिए मेजबान कचनार के फूल का रस अन्य तितलियों, मधुमक्खियों और पक्षियों सहित कई अन्य परागणकों को आकर्षित करता है। यह चिलाडेस पांडवा - प्लेन्स क्यूपिड के लिए लार्वा मेजबान पौधा है।
भोजन और पाककला में उपयोग : हल्के तीखे स्वाद के कचनार के फूल पारंपरिक व्यंजनों तथा सलाद, स्टर-फ्राई या अचार जैसे व्यंजनों में शामिल किए जाते हैं। झारखंड के आदिवासी समुदाय इस बहुउद्देशीय पेड़ के हर हिस्से का सेवन करते हैं। कचनार के फूल, फल और पत्ते खाने योग्य और पोषण का एक महत्वपूर्ण स्रोत होते हैं। भोजन के बारहमासी स्रोत पत्तियों को करी के रूप में, तलकर या उन्हें थोड़े से नमक के साथ उबालकर चावल के साथ खाया जा सकता है।
मुंडा जनजातीय समुदाय सूखी पत्तियों को कई तरीकों से पकाते हैं। वे इसे गर्म पानी में भिगोकर मिर्च, लहसुन या सूखी मछली या सूखे झींगे या बाँस के अंकुर के साथ चटनी बनाकर या पके हुए चावल के पानी में मसालों के साथ पकाकर भूनते हैं। पत्तियों के चूर्ण (पाउडर) को इडली और कचौरी में भी मिलाया जा सकता है। सूप, चीला और उत्तपम में भी ताज़ी पत्तियों को मिलाया है। इससे व्यंजनों का पोषण मूल्य बढ़ जाता है। उत्तर भारत और नेपाल में "कचनार की काली की सब्जी" बनाने के लिए नई कचनार कलियों का उपयोग किया जाता है। कचनार के फूल और कलियाँ कच्चे होने पर कड़वे लगते हैं। इसका उपयोग अचार में किया जाता है।
गुण - लघु (पचाने में हल्का), रूक्ष (सूखापन), रस (स्वाद) - कषाय (कसैला), विपाक (पाचन के बाद का प्रभाव) - कटु (तीखा), वीर्य - शीतल (शीत), प्रभाव (विशेष प्रभाव) - गंडमाला नशा - सर्वाइकल लिम्फैडेनाइटिस और सभी प्रकार की थायरॉयड जटिलताओं में उपयोगी। त्रिदोष पर प्रभाव - कफ और पित्त से राहत दिलाता है।सोफहारा - सूजन से राहत दिलाता है। स्वराहार - अस्थमा से राहत दिलाता है। रसायन - कायाकल्प। कृमिघ्न - कीड़ों के संक्रमण में उपयोगी। कंदुघ्न- खुजली से राहत दिलाता है।। विशघ्न - विषहरण में उपयोगी। वृनहारा - घावों में उपयोगी। कसहारा-खांसी से राहत दिलाता है। कचनार के एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण बवासीर के कारण होने वाली सूजन और दर्द को कम करने में मदद करते हैं। इससे मल का मार्ग आसान हो जाता है। कचनार की छाल शरीर में कफ दोष की समस्या को ठीक करने में मदद करती है। यह थायरॉयड से हार्मोन के स्तर के संतुलन में असंतुलन को ठीक करने में मदद करता है। ऐसा इसलिए क्योंकि कचनार शरीर से कफ को बाहर निकालने में मदद करती है। कचनार की छाल डाइजेस्टिव सिस्टम को बेहतर बनाने में मदद करती है, यह पेट की समस्याओं को दूर करती है। कचनार के कसैले गुणों का पाचन तंत्र पर ठंडा प्रभाव पड़ता है। कचनार कैंसर कोशिकाओं के विकास को धीमा कर देता है और इस प्रकार कैंसर को रोकता है। कचनार के अर्क में इंसुलिन जैसे केमिकल्स होते हैं जो शुगर लेवल को कम करने और कंट्रोल में लाने में मदद करते हैं। कचनार के फूल शरीर के अंदरुनी घाव को भरने में काफी कारगर होते हैं। कचनार के पेड़ की छाल का पाउडर मुंह में बैक्टीरिया और कीटाणुओं से लड़ने में मदद करता है। यह बैक्टीरिया को मारने और मुँह में पीएच संतुलन बहाल करने में बहुत प्रभावी है। यह मुँह को सांसों की दुर्गंध से प्राकृतिक रूप से मुक्त रखता है। कचनार के कड़वे फूल रक्त शोधक का काम करते हैं। यह महिलाओं के लिए बेहद फायदेमंद है क्योंकि यह पीरियड्स को कंट्रोल करने में मदद करता है। यह ब्लड को साफ करता है और इसलिए शरीर के अन्य आवश्यक अंग, जैसे लिवर को भी साफ करता है। कचनार के फूल खाँसी को ठीक करते हैं और अपने एंटी-बैक्टीरियल गुणों से श्वसन पथ को साफ करते हैं। इसकी कलियाँ व फूल सब्जी, पत्तियाँ पशुओं के चारे के और लकड़ी ईंधन (जलावन) के रूप में प्रयोग होती है। तासीर ठंडी होने के कारण इसे सुखाकर गर्मी में सब्जी, अचार, पकौड़े बनाते हैं। कचनार की कली और फूल वात,रक्त पित, फोड़े, फुंसियों से निजात दिलाती हैं। पहाड़ी गीतों में भी है कराली (कचनार) को पिरोया गया है। १९९३ में बने हिंदी चलचित्र 'वक्त हमारा है' में अक्षय कुमार व आयशा जुल्का पर गीत 'कच्ची कली कचनार की तोड़ी नहीं जाती' का फिल्मांकन है।
इस्तेमाल का तरीका
कचनार की छाल का चूर्ण ३-६ ग्राम,फूलों का रस १०-२० मिलीलीटर और छाल का काढ़ा ४०-८० मिलीलीटर की मात्रा में प्रयोग किया जाता है। इसकी छाल का महीन पिसा-छना चूर्ण ३-६ ग्राम (आधा से एक चम्मच) ठंडे पानी के साथ सुबह-शाम लेना लाभकारी होता है। इसका काढ़ा बनाकर भी सुबह-शाम ४-४ चम्मच मात्रा में (ठंडा करके) एक चम्मच शहद मिलाकर लेना फायदेमंद होता है।
- सूजन: कचनार की जड़ को पानी में घिसकर बनाया लेप गर्म कर सूजन वाली जगह पर लगाए, जल्दी ही आराम मिलेगा।
- मुँह के छाले: कचनार की छाल के काढ़े में थोड़ा-सा कत्था मिलाकार लगाएँ तुरंत आराम मिलता है और छाले जल्दी ठीक हो जाते हैं।
- बवासीर: कचनार की एक चम्मच छाल को एक कप मट्ठा (छाछ) के साथ दिन में ३ बार सेवन करने से बवासीर में खून गिरना बंद हो जाएगा। कचनार की कलियों के पाउडर को मक्खन और शक्कर मिलाकर ११ दिन खाने से पेट के कीड़े साफ हो जाते हैं।
- भूख न लगना: कचनार की फूल की कलियाँ घी में भूनकर सुबह-शाम खाएँ, भूख बढ़ जाएगी।
- वायु( गैस) विकार: कचनार की छाल का काढ़ा बनाकर, इसके २० मिलीलीटर काढ़े में आधा चम्मच पिसी अजवायन मिलाकर नियमित रूप से सुबह-शाम भोजन करने बाद पिएं, पेट फूलने की समस्या और गैस की तकलीफ दूर होती है।
-खांसी-दमा : शहद के साथ कचनार की छाल का काढ़ा २ चम्मच, दिन में ३ बार सेवन करने से खाँसी और दमा में आराम मिलता है।
- दांतों का दर्द: कचनार के पेड़ की छाल जलाकर उसकी राख से सुबह एवं रात को खाना खाने के बाद मंजन करने से दाँत-दर्द तथा मसूढ़ों से खून निकलना बंद होता है। इसकी छाल को उबालने के बाद ५०-५० मिलीलीटर गर्म पसनी से रोजाना ३-४ बार कुल्ला करें, दांतों का हिलना, दर्द, खून निकलना, मसूढों की सूजन और पायरिया खत्म हो जाता है।
- कब्ज: कचनार के फूलों को चीनी के साथ घोटकर शर्बत की तरह बनाकर सुबह-शाम पीने से कब्ज दूर होती है और पेट साफ रहता है। कचनार के फूलों का गुलकन्द रात में सोने से पहले २ चम्मच की मात्रा में कुछ दिनों तक सेवन करने से कब्ज दूर होती है।
- कैंसर: कचनार की छाल का काढ़ा बनाकर पीने से पेट का कैंसर ठीक होता है।
- दस्त: कचनार की छाल का काढ़ा दिन में २ बार पीने से दस्त रोग में ठीक होता है।
- पेशाब के साथ खून आना: कचनार के फूलों का काढ़ा बनाकर सुबह-शाम पीने से पेशाब में खून का आना बंद होता है। इसके सेवन से रक्त प्रदर एवं रक्तस्राव आदि भी ठीक होता है।
- बवासीर: कचनार की छाल का ३ ग्राम चूर्णएक गिलास छाछ के साथ प्रति दिन सुबह-शाम पीने से बवासीर एवं खूनी बवासीर में लाभ मिलता है। कचनार का ५ ग्राम चूर्ण प्रतिदिन सुबह पानी के साथ खाने से बवासीर ठीक होता है।
- खूनी दस्त: कचनार के फूल का काढ़ा सुबह-शाम पीने से खूनी दस्त (रक्तातिसार) में जल्दी लाभ मिलता है।
- कुबड़ापन: पीठ के नीचे कचनार का फूल बिछाकर सुलाने से, लगभग १ ग्राम का चौथाई भाग कचनार और गुग्गुल को शहद के साथ मिलाकर सेवन करने व कचनार का काढ़ा पीने से कुबड़ापन दूर होता है।
- घाव: कचनार की छाल का काढ़ा बनाकर सुबह-शाम पीने से घाव ठीक होता है। इसके काढ़े से घाव को धोना भी चाहिए।
- स्तन-गाँठ: कचनार की छाल पीसकर बना चूर्ण आधे ग्राम की मात्रा में सौंठ और चावल के पानी (धोवन) के साथ मिलाकर पीने और स्तनों पर लेप करने से गाँठ ठीक होती है।
- थायराइड: कचनार के फूल थायराइड की सबसे अच्छी दवा हैं। लिवर में किसी भी तरह की तकलीफ हो तो कचनार की जड़ का काढ़ा पीना बेहद लाभकारी होता है।
ध्यान रखें-
कचनार देर से हजम होती है और इसका सेवन करने से कब्ज हो सकता है। इसलिए जब तक कचनार का सेवन करें, तब तक पपीता खाएँ।
***
दोहांजलि
*
जयललिता-लालित्य को
भूल सकेगा कौन?
शून्य एक उपजा,
भरे कौन?
छा गया मौन.
*
जननेत्री थीं लोकप्रिय,
अभिनेत्री संपूर्ण.
जयललिता
सौन्दर्य की
मूर्ति, शिष्ट-शालीन.
*
दीन जनों को राहतें,
दीं
जन-धन से खूब
समर्थकी जयकार में
हँसीं हमेशा डूब
*
भारी रहीं विपक्ष पर,
समर्थकों की इष्ट
स्वामिभक्ति
पाली प्रबल
भोगें शेष अनिष्ट
*
कर विपदा का सामना
पाई विजय विशेष
अंकित हैं
इतिहास में
'सलिल' न संशय लेश
***
दो द्विपदियाँ - दो स्थितियाँ
*
साथ थे तन न मन 'सलिल' पल भर
शेष शैया पे करवटें कितनी
*
संग थे तुम नहीं रहे पल भर
हैं मगर मन में चाहतें कितनी
***
दोहा सलिला-
कवि-कविता
*
जन कवि जन की बात को, करता है अभिव्यक्त
सुख-दुःख से जुड़ता रहे, शुभ में हो अनुरक्त
*
हो न लोक को पीर यह, जिस कवि का हो साध्य
घाघ-वृंद सम लोक कवि, रीति-नीति आराध्य
*
राग तजे वैराग को, भक्ति-भाव से जोड़
सूर-कबीरा भक्त कवि, दें समाज को मोड़
*
आल्हा-रासो रच किया, कलम-पराक्रम खूब
कविपुंगव बलिदान के, रंग गए थे डूब
*
जिसके मन को मोहती, थी पायल-झंकार
श्रंगारी कवि पर गया, देश-काल बलिहार
*
हँसा-हँसाकर भुलाई, जिसने युग की पीर
मंचों पर ताली मिली, वह हो गया अमीर
*
पीर-दर्द को शब्द दे, भर नयनों में नीर
जो कवि वह होता अमर, कविता बने नज़ीर
*
बच्चन, सुमन, नवीन से, कवि लूटें हर मंच
कविता-प्रस्तुति सौ टका, रही हमेशा टंच
*
महीयसी की श्रेष्ठता, निर्विवाद लें मान
प्रस्तुति गहन गंभीर थी, थीं न मंच की जान
*
काका की कविता सकी, हँसा हमें तत्काल
कथ्य-छंद की भूल पर, हुआ न किन्तु बवाल
*
समय-समय की बात है, समय-समय के लोग
सतहीपन का लग गया, मित्र आजकल रोग
५.१२.२०१६
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देवी दंतेश्वरी के दामाद - हुर्रेमारा
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            दंतेश्वरी देवी और आदिवासी संयोजन की अनेक कहानियों में से एक है उनके दामाद हुर्रेमारा की। आदिवासी मान्यतायें न केवल उन्हें अपने परिवार के स्तर तक जोड़ती हैं अपितु वे देवी के भी बेटे-बेटियों, नाती-पोतों की पूरी दुनिया स्थापित कर देते हैं। देवी के ये परिजन आपस में लड़ते-झगड़ते भी हैं तथा प्रेम-मनुहार भी करते हैं।
            कहते हैं देवी दंतेश्वरी की पुत्री मावोलिंगो को देख कर जनजातीय देव हुर्रेमारा आसक्त हो गए। उन्होंने मावोलिंगो से अपना प्रेम व्यक्त किया। यह प्यार अपनी परिणति तक पहुँचता इससे पहले ही लड़की की माँ अर्थात देवी दंतेश्वरी को इसकी जानकारी मिल गई और उन्होंने अपनी असहमति व्यक्त कर दी। हुर्रेमारा भी कोई साधारण देव तो थे नहीं, उन्होंने कुछ समय तक प्रयास किया कि दंतेश्वरी मान जाएँ और अपनी पुत्री से उनके विवाह को स्वीकारोक्ति प्रदान कर दें। बात न बनते देख वे क्रोधित हो गए। उन्होंने अपनी बात मनवाने की जिद में शंखिनी-डंकिनी नदियों के पानी को ही संगम के निकट रोक दिया। अब जलस्तर बढ़ने लगा और धीरे धीरे देवी दंतेश्वरी का मंदिर डूब जाने की स्थिति निर्मित हो गई। दंतेश्वरी को हार कर हुर्रेमारा की जिद माननी पड़ी। उनकी पुत्री मावोलिंगो से हुर्रेमारा का विवाह सम्पन्न हो गया।
            दामाद हुर्रेमारा जब ससुराल पहुँचे तो उनके अपने ही नखरे थे, तुनक मुजाज हुर्रेमारा हर रोज नई माँग रखते, अपने स्वागत की नई-नई अपेक्षाएँ प्रदर्शित करते और किसी न किसी बात पर झगड़ लेते। एक दिन सास-दामाद अर्थात दंतेश्वरी और हुर्रेमारा में ऐसी बिगड़ी कि दोनों ने एक दूसरे से मिलना बंद कर दिया। यद्यपि देवी के स्थान में हुर्रेमारा की और हुर्रेमारा के स्थान में देवी दंतेश्वरी की विशेष व्यवस्था की जाती है। दंतेवाड़ा से कुछ ही दूर भांसी गाँव के पास एक पहाड़ी तलहटी में हुर्रेमारा का स्थान है जहाँ वे अपनी पत्नी मावोलिंगो व अपने एक पुत्र के साथ रह रहे हैं। इस देव परिवार की अनेक संततियाँ हैं जो निकटस्थ अनेक गाँवों में निवासरत हैं और वहाँ के निवासियों द्वारा सम्मान पाती हैं।
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अलंकार सलिला ३९
अतिशयोक्ति सीमा हनें
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जब सीमा को तोड़कर, होते सीमाहीन
अतिशयोक्ति तब जनमती, सुनिए दीन-अदीन..
बढा-चढ़ाकर जब कहें, बातें सीमा तोड़.
अतिशयोक्ति तब जानिए, सारी शंका छोड़..
जहाँ लोक-सीमा का अतिक्रमण करते हुए किसी बात को अत्यधिक बढा-चढाकर कहा गया हो, वहाँ अतिशयोक्ति अलंकार होता है।
जहाँ पर प्रस्तुत या उपमेय को बढा-चढाकर शब्दांकित किया जाये वहाँ अतिशयोक्ति अलंकार होता है।
उदाहरण:
१. परवल पाक, फाट हिय गोहूँ।
यहाँ प्रसिद्ध कवि मालिक मोहम्मद जायसी ने नायिका नागमती के विरह का वर्णन करते हुए कहा है कि उसके विरह के ताप के कारण परवल पक गये तथा गेहूँ का ह्रदय फट गया।
२. मैं तो राम विरह की मारी, मोरी मुंदरी हो गयी कँगना।
इन पंक्तियों में श्री राम के विरह में दुर्बल सीताजी की अँगूठी कंगन हो जाने का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन है।
३. ऐसे बेहाल बेबाइन सों, पग कंटक-जल लगे पुनि जोये।
हाय! महादुख पायो सखा, तुम आये न इतै कितै दिन खोये।।
देखि सुदामा की दीन दसा, करुना करि के करुनानिधि रोये।
पानी परात को हाथ छुओ नहिं, नैनन के जल सौं पग धोये।।
४. बूँद-बूँद मँह जानहू।
५. कहुकी-कहुकी जस कोइलि रोई।
६. रकत आँसु घुंघुची बन बोई।
७. कुंजा गुन्जि करहिं पिऊ पीऊ।
८. तेहि दुःख भये परास निपाते।
९. हनुमान की पूँछ में, लगन न पाई आग।
लंका सारी जल गयी, गए निसाचर भाग।। -तुलसी
१०. देख लो साकेत नगरी है यही।
स्वर्ग से मिलने गगन को जा रही।। -मैथिलीशरण गुप्त
११. प्रिय-प्रवास की बात चलत ही, सूखी गया तिय कोमल गात।
१२. दसन जोति बरनी नहिं जाई. चौंधे दिष्टि देखि चमकाई.
१३. आगे नदिया पडी अपार, घोड़ा कैसे उतरे पार।
राणा ने सोचा इस पार, तब तक था चेतक उस पार।।
१४. भूषण भनत नाद विहद नगारन के, नदी नाद मद गैबरन के रलत है।
१५. ये दुनिया भर के झगडे, घर के किस्से, काम की बातें।
बला हर एक टल जाए, अगर तुम मिलने आ जाओ।। -जावेद अख्तर
१६. मैं रोया परदेस में, भीगा माँ का प्यार।
दुःख ने दुःख से बात की, बिन चिट्ठी बिन तार।। -निदा फाज़ली
अतिशयोक्ति अलंकार के निम्न ८ प्रकार (भेद) हैं।
१. संबंधातिशयोक्ति-
जब दो वस्तुओं में संबंध न होने पर भी संबंध दिखाया जाए अथवा जब अयोग्यता में योग्यता प्रदर्शित की जाए तब संबंधातिशयोक्ति अलंकार होता है।
उदाहरण-
१. फबि फहरहिं अति उच्च निसाना।
जिन्ह मँह अटकहिं बिबुध बिमाना।।
फबि = शोभा देना, निसाना = ध्वज, बिबुध = देवता।
यहाँ झंडे और विमानों में अटकने का संबंध न होने पर भी बताया गया है।
२. पँखुरी लगे गुलाब की, परिहै गात खरोंच
गुलाब की पँखुरी और गात में खरोंच का संबंध न होने पर भी बता दिया गया है।
३. भूलि गयो भोज, बलि विक्रम बिसर गए, जाके आगे और तन दौरत न दीदे हैं।
राजा-राइ राने, उमराइ उनमाने उन, माने निज गुन के गरब गिरबी दे हैं।।
सुजस बजाज जाके सौदागर सुकबि, चलेई आवै दसहूँ दिशान ते उनींदे हैं।
भोगी लाल भूप लाख पाखर ले बलैया जिन, लाखन खरचि रूचि आखर ख़रीदे हैं।।
यहाँ भुला देने अयोग्य भोग आदि भोगीलाल के आगे भुला देने योग्य ठहराये गये हैं।
४. जटित जवाहर सौ दोहरे देवानखाने, दूज्जा छति आँगन हौज सर फेरे के।
करी औ किवार देवदारु के लगाए लखो, लह्यो है सुदामा फल हरि फल हेरे के।।
पल में महल बिस्व करमै तयार कीन्हों, कहै रघुनाथ कइयो योजन के घेरे में।
अति ही बुलंद जहाँ चंद मे ते अमी चारु चूसत चकोर बैठे ऊपर मुंडेरे के।।
५. आपुन के बिछुरे मनमोहन बीती अबै घरी एक कि द्वै है।
ऐसी दसा इतने भई रघुनाथ सुने भय ते मन भ्वै है।।
गोपिन के अँसुवान को सागर बाढ़त जात मनो नभ छ्वै है।
बात कहा कहिए ब्रज की अब बूड़ोई व्है है कि बूडत व्है हैं।।
२. असम्बन्धातिशयोक्ति-
जब दो वस्तुओं में संबंध होने पर भी संबंध न दिखाया जाए अथवा जब योग्यता में अयोग्यता प्रदर्शित की जाए तब असंबंधातिशयोक्ति अलंकार होता है।
उदाहरण-
१. जेहि वर वाजि राम असवारा। तेहि सारदा न बरनै पारा।।
वाजि = घोडा, न बरनै पारा = वर्णन नहीं कर सकीं।
२. अति सुन्दर लखि सिय! मुख तेरो। आदर हम न करहिं ससि केरो।।
करो = का। चन्द्रमा में मुख- सौदर्य की समानता के योग्यता होने पर भी अस्वीकार गया है।
३. देखि गति भासन ते शासन न मानै सखी
कहिबै को चहत गहत गरो परि जाय
कौन भाँति उनको संदेशो आवै रघुनाथ
आइबे को न यो न उपाय कछू करि जाय
विरह विथा की बात लिख्यो जब चाहे तब
ऐसे दशा होति आँच आखर में भरि जाय
हरि जाय चेत चित्त सूखि स्याही छरि जाय
३. चपलातिशयोक्ति-
जब कारण के होते ही तुरंत कार्य हो जाए।
उदाहरण-
१. तव सिव तीसर नैन उघारा। चितवत काम भयऊ जरि छारा।।
शिव के नेत्र खुलते ही कामदेव जलकर राख हो गया।
२. आयो-आयो सुनत ही सिव सरजा तव नाँव।
बैरि नारि दृग जलन सौं बूडिजात अरिगाँव।।
४. अक्रमातिशयोक्ति-
जब कारण और कार्य एक साथ हों।
उदाहरण-
१. बाणन के साथ छूटे प्राण दनुजन के।
सामान्यत: बाण छूटने और लगने के बाद प्राण निकालेंगे पर यहाँ दोनों क्रियाएं एक साथ होना बताया गया है।
२. पाँव के धरत, अति भार के परत, भयो एक ही परत, मिली सपत पताल को।
३. सन्ध्यानों प्रभु विशिख कराला, उठी उदधि उर अंतर ज्वाला।
४. क्षण भर उसे संधानने में वे यथा शोभित हुए।
है भाल नेत्र जवाल हर, ज्यों छोड़ते शोभित हुए।।
वह शर इधर गांडीव गुण से भिन्न जैसे ही हुआ।
धड से जयद्रथ का उधर सिर छिन्न वैसे ही हुआ।।
५. अत्यंतातिशयोक्ति-
जब कारण के पहले ही कार्य संपन्न हो जाए।
उदाहरण:
१. हनूमान की पूँछ में, लगन न पाई आग।
लंका सगरी जर गयी, गये निसाचर भाग।।
२. धूमधाम ऐसी रामचद्र-वीरता की मची, लछि राम रावन सरोश सरकस तें।
बैरी मिले गरद मरोरत कमान गोसे, पीछे काढ़े बाण तेजमान तरकस तें।।
६. भेदकातिशयोक्ति-
जहाँ उपमेय या प्रस्तुत का अन्यत्व वर्णन किया जाए, अभेद में भी भेद दिखाया जाए अथवा जब और ही, निराला, न्यारा, अनोखा आदि शब्दों का प्रयोग कर किसी की अत्यधिक या अतिरेकी प्रशंसा की जाए।
उदाहरण-
१. न्यारी रीति भूतल, निहारी सिवराज की।
२. औरे कछु चितवनि चलनि, औरे मृदु मुसकान।
औरे कछु सुख देत हैं, सकें न नैन बखान।।
अनियारे दीरघ दृगनि, किती न तरुनि समान।
वह चितवन औरे कछू, जेहि बस होत सुजान।।
७. रूपकातिशयोक्ति-
उदाहरण-
१. जब केवल उपमान या अप्रस्तुत का कथन कर उसी से उपमेय या प्रस्तुत का बोध कराया जाए अथवा उपमेय का लोप कर उपमान मात्र का कथा किया जाए अर्थात उपमान से ही अपमान का भी अर्थ अभीष्ट हो तब रूपकातिशयोक्ति होता है। रूपकातिशयोक्ति का अधिक विक्सित और रूढ़ रूप प्रतिक योजना है।
उदाहरण-
१. कनकलता पर चंद्रमा, धरे धनुष दो बान।
कनकलता = स्वर्ण जैसी आभामय शरीर, चंद्रमा = मुख, धनुष = भ्रकुटी, बाण = नेत्र, कटाक्षकनकलता यहाँ नायिका के सौन्दर्य का वर्णन है। शरीर, मुख, भ्रकुटी, कटाक्ष आदि उप्मेयों का लोप कर केवल लता, चन्द्र, धनुष, बाण आदि का कथन किया गया है किन्तु प्रसंग से अर्थ ज्ञात हो जाता है।
२. गुरुदेव! देखो तो नया यह सिंह सोते से जगा।
यहाँ उपमेय अभिमानु का उल्लेख न कर उपमान सिंह मात्र का उल्लेख है जिससे अर्थ ग्रहण किया जा सकता है।
३.विद्रुम सीपी संपुट में, मोती के दाने कैसे।
है हंस न शुक यह फिर क्यों, चुगने को मुक्त ऐसे।।
४. पन्नग पंकज मुख गाहे, खंजन तहाँ बईठ।
छत्र सिंहासन राजधन, ताकहँ होइ जू दीठ।।
८. सापन्हवातिशयोक्ति-
यह अपन्हुति और रूपकातिशयोक्ति का सम्मिलित रूप है। जहाँ रूपकातिशयोक्ति प्रतिषेधगर्भित रूप में आती है वहाँ सापन्हवातिशयोक्ति होता है।
उदाहरण-
१. अली कमल तेरे तनहिं, सर में कहत अयान।
यहाँ सर में कमल का निषेध कर उन्हें मुख और नेत्र के रूप में केवल उपमान द्वारा शरीर में वर्णित किया गया है।
टिप्पणी: उक्त ३, ४, ५ अर्थात चपलातिशयोक्ति, अक्रमातिशयोक्ति तथा अत्यंतातिशयोक्ति का भेद कारण के आधार पर होने के कारण कुछ विद्वान् इन्हें कारणातिशयोक्ति के भेद-रूप में वर्णित करते हैं।
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गीत -
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महाकाल के पूजक हैं हम
पाश काल के नहीं सुहाते
नहीं समय-असमय की चिंता
कब विलंब से हम घबराते?
*
खुद की ओर उठीं त्रै ऊँगली
अनदेखी ही रहीं हमेशा
एक उठी जो औरों पर ही
देख उसी को ख़ुशी मनाते
*
कथनी-करनी एक न करते
द्वैत हमारी श्वासों में है
प्यासों की कतार में आगे
आसों पर कब रोक लगाते?
*
अपनी दोनों आँख फोड़ लें
अगर तुम्हें काना कर पायें
संसद में आचरण दुरंगा
हो निलज्ज हम रहे दिखाते
*
आम आदमी की ताकत ही
रखे देश को ज़िंदा अब तक
नेता अफसर सेठ बेचकर
वरना भारत भी खा जाते
५.१२.२०१५
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नवगीत :
*
या तो वो देता नहीं
या देता छप्पर फाड़ के
*
मर्जी हो तो पंगु को
गिरि पर देता है चढ़ा
अंधे को देता दिखा
निर्धन को कर दे धनी
भक्तों को लेता बचा
वो खुले-आम, बिन आड़ के
या तो वो देता नहीं
या देता छप्पर फाड़ के
*
पानी बिन सूखा कहीं
पानी-पानी है कहीं
उसका कुछ सानी नहीं
रहे न कुछ उससे छिपा
मनमानी करता सदा
फिर पत्ते चलता ताड़ के
या तो वो देता नहीं
या देता छप्पर फाड़ के
*
अपनी बीबी छुड़ाने
औरों को देता लड़ा
और कभी बंसी बजा
करता डेटिंग रास कह
चने फोड़ता हो सलिल
ज्यों भड़भूंजा भाड़ बिन
या तो वो देता नहीं
या देता छप्पर फाड़ के
३-१२-२०१५
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