शनिवार, 6 जनवरी 2018

2018 ki laghu katahyen 3

२०१८ की लघुकथाएँ: ३
चुपचाप
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समाज की परंपरा और कुलाचार के अनुसार बड़ों ने तय कर दिया हमारा विवाह। निर्धारित कार्यक्रमानुसार संबंधी जुटे, बरात गयी, फेरे पड़े और 'वह' आ गई हमारे घर, मेरे कमरे में। पहले तो उसका आना अच्छा ही नहीं बहुत अच्छा लगा। उसकी असुविधा देख कुछ कहता-करता तो 'जोरू का गुलाम' विशेषण से नवाज़ा जाकर उपहास का पात्र बनता। वह मेरी सुविधा के लिए कुछ करती तो उसे शाबाशी मिलती। 
धीरे-धीरे वन सहज होती गयी और मैं असहज हो खुद में सिमटता गया। स्वजन मुझसे पहले उसका ध्यान रखते। फिर आ गए बच्चे, वह उनमें रमती गयी और मैं अन्यों से पहले ही दूर सा हो गया था, अब उससे भी दूरी हो गई तो अकेलेपन में घिरता गया। बच्चे उस पर निर्भर थे, मुझसे अपेक्षाकृत कम सहज थे।
माह में एक बार वेतन आता तो सबसे पहले बच्चों, फिर बड़ों, फिर उसकी और अंत में मेरी जरूरतों का ध्यान रखा जाता। प्राय: मेरि आवश्यकताओं का क्रम आते-आते वेतन ही समाप्त होने लगता। यह भी सच है कि उसकी आवश्यकताएँ भी कम ही पूरी हो पाती हैं किंतु उसके हिस्से में बच्चों का प्रेम, बड़ों का आशीष, संबंधियों के प्रशंसा और मेरा सहयोग पूरा-पूरा आता है, जबकि मेरे हिस्से में अन्यों की तो छोडिए उसकी प्रशंसा औए सहयोग भी पूरी तरह नहीं आ पाता क्योंकि अन्यों को संतुष्ट करते-करते ही वह चुकने लगती है तो मैं शिकायत भी कैसे करूँ? मन मसोस कर रह जाता हूँ। 
बड़े होते बच्चों के अनुसार उनके पिता को अधिक धनी होना चाहिए था कि उनकी सब जरूरतें पोरी करने के साथ मोटा जेब खर्च दे पाता, माता-पिता का उलाहना कि बचपन में और अधिक पढ़ा होता तो बड़ा फसर बन पाटा, उन्हें सुख-सुविधा, नौकर-चाकर दे पाता, वह सीधे-सीधे तो कुछ नहीं कहती पर बहुधा सुनाती है सहेलियों की सम्पन्नता के किस्से। मुझे हर दिन पल-पल लगता है कि मेरा कद बौना होता जा रहा है, मैं अपने ही घर में अजनबी होता जा रहा हूँ विडम्बना यह कि किसी से कुछ कह भी नहीं सकता, इसलिए रहा आता हूँ चुपचाप।  
६-१-२०१८ -------------------
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