सोमवार, 22 जनवरी 2018

दोहा दुनिया

शिव अनंत ज्यों नील नभ,
मिलता ओर न छोर।
विष पी अमृत बांटते,
नील कण्ठ तमखोर।।
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घनगर्जन स्वर रुदन सम,
अश्रुपात बरसात।
रुद्र नाम दे भक्तगण,
सुमिरें कहकर तात।।
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सुबह-सांझ की लालिमा,
बने नेत्र का रंग।
मिला नीललोहित विरुद,
अनगिन तारे संग।।
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चंद्र शीशमणि सा सजा,
शशिशेखर दे नाम।
चंद्रनाथ शशिधर सदय,
हैं बालेंदु अकाम।।
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महादेव महनीय हैं,
असुरेश्वर निष्काम।
देवेश्वर कमनीय को,
करतीं उमा प्रणाम।।
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जलधर विषधर अमियधर,
ले त्रिशूल त्रिपुरारि।
डमरूधर नगनाथ ही,
काममुक्त कामारि।।
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विश्वनाथ समभाव से,
देखें सबकी ओर।
कथनी-करनी फलप्रदा,
अमिट कर्म की डोर।।
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जो बोया सो काट ले,
शिव का कर्म-विधान।
भेंट-चढ़ोत्री व्यर्थ है,
करते नजर नादान।।
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महाकाल निर्मम निठुर,
भूले माया-मोह।
नहीं सत्य-पथ से डिगें,
सहते सती-विछोह।।
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करें ओम् का जप सतत,
ओंकारेश्वर-भक्त।
सोमनाथ सौंदर्य प्रिय,
चिदानंद अनुरक्त।।
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शूलपाणि हर कष्ट सह,
हॅंसकर करते नष्ट।
आपद से डरते नहीं,
जीत करें निज इष्ट।।
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२२.१.२०१८, जबलपुर

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