मंगलवार, 22 जनवरी 2019

गीत: सबरी माला

एक रचना 
सबरीमाला 
*
सबरीमाला केंद्र है, 
जनगण के विश्वास का। 
नर-नारी के साम्य का,
ईश्वर के अहसास का
*
जो पतितों को तारता,
उससे दूर न कोई रहे-
आयु-रंग प्रतिबंध न हो,
हर जन हरिजन व्यथा कहे।।
अन्धकार में देवालय
स्रोत अनंताभास का
*
बना-बदलता परंपरा,
मानव जड़ता ठीक नहीं।
लिंग-भेद हो पूजा में,
सत्य ठीक यह लीक नहीं।
राजनीति ही कारन है,
मानव के संत्रास का
*
पोंगापंथी दूर करें,
एक समान सभी संतान।
अन्धी श्रद्धा त्याज्य सखे!
समता ईश्वर का वरदान।।
आरक्षण कारण बनता
सदा विरोधाभास का
***
२०-१-२०१९
संजीव, ७९९९५५९६१८

मुक्तक

मुक्तक
*
देश है पहले सियासत बाद में।
शत्रु मारें; हो इनायत बाद में।।
बगावत को कुचल दें हम साथ मिल-
वार्ता की हो रवायत बाद में।।
*
जगह दहशत के लिये कुछ है नहीं।
जगह वहशत के लिए कुछ है नहीं।।
पत्थरों को मिले उत्तर गनों से -
जगह रहमत के लिए कुछ है नहीं।।
*
सैनिकों को टोंकना अपराध है।
फ़ौज के पग रोकना अपराध है।।
पठारों को फूल मत दें शूल दें-
देश से विद्रोह भी अपराध है।।
*
२२.१.२०१९

समीक्षा: सड़क पर -संतोष शुक्ल

पुस्तक चर्चा
*
''सडक़ पर'' नवगीत संग्रह, गीतकार-आचार्य संजीव वर्मा ' सलिल '
संतोष शुक्ल
*

आचार्य संजीव वर्मा ' सलिल ' जी का नाम नवीन छंदों के निर्माण तथा उनपर गहनता से कये गए कार्यों के लिए प्रबुद्ध जगत में बड़े गौरव से लिया जाता है। माँ भारती के वरदपुत्र आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल 'जी को अथस्रोतञान का भण्डार मानो उन्हें विरासत में मिला हो। स्वयं आचार्य सलिल जी अपनी बुआश्री महादेवी वर्मा और अपनी माँ कवियत्री शांति देवी को साहित्य और भाषा के प्रति अटूट स्नेह का प्रेरणा श्रोत मानते हैं। जिनकी रग-रग में संस्कारों के बीज बचपन से ही अंकुरित, प्रस्फुटित और पल्लवित हुए हों उनकी प्रतिभा का आकलन करना सरल काम नहीं।

सलिल जी आभासी जगत में भी अपनी निरंतर साहित्यिक उपलब्धियों से साहित्य प्रमियों को लाभान्वित कर रहे हैं। अभियंता और अधिवक्ता होते हुए भी हिंदी की कोई भी विधा नहीं है जिस पर आचार्य जी ने गहनता से कार्य न किया हो। रस, अलंकार और छंद का गहन ज्ञान उनकी कृतियों में स्पष्ट दिखाई देता है। विषय वस्तु की दृष्टि से कोई विषय उनकी लेखनी से बचा नहीं है। रचनाओं पर उनकी पकड़ गहरी है। हर क्षेत्र का अनुभव उसी रूप में बोलता है जिससे पाठक और श्रोता उसी परिवेश में पहुंच जाता है। हिन्दी के साथ साथ बुन्देली, पचेली, भोजपुरी, ब्रजभाषा, अवधी, राजस्थानी, मालवी, छत्तीसगढ़ी, हरियाणवी तथा अंग्रेजी भाषा में भी आपने लेखन कार्य किया है।

उनकी पूर्व प्रकाशित नवगीत कृति 'काल है संक्रांति की 'उद्भट समीक्षकों द्वारा की गई समीक्षाओं को पढ़कर ही पता चलता है कि आचार्य सलिल जी ज्ञान के अक्षय भण्डार हैं अनन्त सागर हैं। आचार्य सलिल जी की सद्य प्रकाशित 'सड़क पर' मैंने अभी-अभी पढ़ी है। 'सड़क पर' नवगीत संग्रह में गीतकार सलिल जी ने देश में हो रहे राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक परिवर्तनों को स्पष्ट रूप से दर्शाया है। उनके नवगीतों में भाग्य के सहारे न रहकर परिश्रम द्वारा लक्ष्य प्राप्त करने पर सदैव जोर दिया है।छोटे छोटे शब्दों द्वारा बड़े बड़े संदेश दिये हैं और चेतावनी भी दी है। कहीं अभावग्रसित होने के कारण तो कहीं अत्याधुनिक होने पर प्यार की खरीद फरोख्त को भी उन्होंने सृजन में उकेरा है।आजकल शादी कम और तलाक ज्यादा होते हैं, यह भी आधुनिकता का एक चोला है।

इसके अतिरिक्त सलिल जी ने एक और डाइवोर्स की बात लिखी है-
निष्ठा ने मेहनत से
डाइवोर्स चाहा है।

आगे भी-
मलिन बिंब देख -देख
मन दर्पण
चटका है

आजकल बिना रिश्वत के कोई काम नहीं होता। सलिल जी के शब्दों में-
पद -मद ने रिश्वत का
टैक्स फिर उगाहा है ।

पाश्चात्य के प्रभाव में लोगों को ग्रसित देख गीतकार का हृदय व्यथित है-
देह को दिखाना ही
प्रगति परिचायक है
मानो लगी होड़
कौन कितना सकता है छोड़।

प्रभाव के कारण ही लोग अपने माता-पिता को वृद्धाश्रम में असहाय छोड़ कर अपनी जिम्मेदारियों से मुँह मोड़ लेते हैं। अपने पुराने स्वास्थ्य वर्धक खान-पान को भूलकर हानिकारक चीजों को शौक से खाते हैं। एक शब्द-चित्र देखिए-

ब्रेड बटर बिस्कुट
मन उन्मन ने
गटका है।
अब
लोरी को राइम ने
औंधे मुँह पटका है

इसी क्रम में-
नाक बहा,टाई बाँध
अंग्रेजी बोलेंगे
कब कान्हा गोकुल में
शायद ही डोलेंगे।

आजकल शिक्षा बहुत मँहगी हो गई है।उच्च शिक्षा प्राप्त युवक नौकरी की तलाश इधर- उधर भटकते हैं। बढ़ती बेरोजगारी पर भी आचार्य जी ने चिंता व्यक्त की है।शायद ही कोई ऐसा विषय है जिस पर सलिल जी की पैनी दृष्टि न पड़ी हो।

आचार्य जी के नवगीतों के केंद्र में श्रमजीवी श्रमिक है। चाहे वह खेतों में काम करनेवाला किसान हो,फैक्ट्रियों में काम करनेवाला श्रमिक या दिनभर पसीना बहाने वाला कोई मजदूर जो अथक परिश्रम के बाद भी उचित पारिश्रमिक नहीं पाता तो दूसरी ओर मिल मालिक, सेठों,सूदखोरों की तोंद बढ़ती रहती है। देखिए-
चूहा झाँक रहा हंडी में
लेकिन पाई
सिर्फ हताशा

यह भी देखने में आता है
जो नही हासिल
वही चाहिए
जितनी आँखें
उतने सपने

समाज के विभिन्न पहलुओं पर बड़ी बरीकी से कलम चलाई है। घर में काम वाली बाइयों, ऑफिस में सहकर्मियों तथा पास पड़ोस में रहने वाली महिलाओं के प्रति पुरुषों की कुदृष्टि को भी आपने पैनी कलम का शिकार बनाया है।

आज भले ही लगभग सभी क्षेत्रों में अपना वर्चस्व स्थापित कर रही हैं फिर भी मध्यम और सामान्य वर्ग की महिलाओं की स्थिति अभी भी बहुत अच्छी नहीं है। कार्यरत महिलाओं को दोहरी भूमिका निभाने के बाद भी ताने, प्रताड़ना और उपेक्षा का सामना करना पड़ता है।

सलिल जी के शब्दों में-

मैंने पाए कर कमल,तुमने पाए हाथ
मेरा सर ऊँचा रहे झुके तुम्हारा माथ

सलिल जी ने नवगीतों में विसंगतियों को खूब उकेरा है।कुछ उदाहरण देखते हैं-

आँखें रहते सूर हो गए
जब हम खुद से दूर हो गए

मन की मछली तन की तितली
हाथ न आई पल में फिसली
जब तक कुर्सी तब तक ठाट
नाच जमूरा नाच मदारी

मँहगाई आई
दीवाली दीवाला है
नेता हैं अफसर हैं
पग-पग घोटाला है

आजादी के इतने वर्षों बाद भी गाँव और गरीबी का अभी भी बुरा हाल है लेकिन गीतकार का कहना है-

अब तक जो बीता सो बीता
अब न आस घट होगा रीता
मिल कर काटें तम की कारा
उजियारे के हों पौ बारा
बहुत झुकाया अब तक तूने
अब तो अपना भाल उठा

मनभावन सावन के माध्यम से जहाँ किसानों की खुशी का अंकन किया है वहीं बरसात में होने वाली समस्याओं को भी चित्रित किया है। आचार्य जी ने नये नये छंदों की रचना कर अभिनव प्रयोग किया है। सलिल जी ने नवगीतों में परिवेश की सजीवता बनाए रखने के लिए उन्होंने घरों में उपयोग में आने वाली वस्तुओं, रिश्तों के सम्बोधनों आदि का ही प्रयोग किया है। संचार क्रांति के आने से लोगों में कितना बदलाव आया है उसकी चिंता भी गीतकार को है-

हलो हाय मोबाइल ने
दिया न हाय गले मिलने
नातों को जीता छलने

आचार्य ' सलिल 'जी ने गीतों-नवगीतों में लयबद्धता पर विशेष जोर दिया है। लोकगीतों में गाये जाने वाले शब्दों, छंदों, अन्य भाषाओं के शब्दों, नये-नये बिंबों तथा प्रतीकों का निर्माण कर लोगों के लिए सड़क पर भी फुटपाथ बनाये हैं। जो बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। 'सड़क पर' गीत नवगीत संग्रह में अनेकानेक छोटे-छोटे बिंदुओं को अंकित किया है, उन सब को इंगित करना असंभव है। सलिल जी ने ' सड़क पर ' गीत-नवगीत संग्रह में सड़क को केंद्र बिंदु बनाकर जीवन के अनेकानेक पहलुओं को बड़ी कुशलता से चित्रित किया है-

सड़क पर जनम है
सड़क पर मरण है
सड़क पर शरम है
सड़क बेशरम है
सड़क पर सियासत
सड़क पर भजन है
सड़क सख्त लेकिन
सड़क ही नरम है
सड़क पर सड़क से
सड़क मिल रही है।

आचार्य संजीव वर्मा ' सलिल 'जी ने अपनी सभी रचनाओं में माँ नर्मदा के वर्चस्व को सदा वर्णित किया है तथा 'सलिल' को अपनी रचनाओं में भी यथासंभव प्रयुक्त किया है। माँ नर्मदा के पावन निर्मल सलिल की तरह आचार्य 'सलिल 'जी भी सदा प्रवहमान हैं और सदा रहेंगे। उनकी इस कृति को पाठकों का भरपूर मान, सम्मान और प्यार मिलेगा ऐसा मेरा विश्वास है।
**********

सोमवार, 21 जनवरी 2019

समीक्षा- हाइकु संग्रह -मंजूषा मन

कृति परिचय:
अभिनव प्रयोग: हाइकु संग्रह की हाइकु समीक्षा
''मैं सागर सी'' हाइकु-ताँका लहरों की मंजूषा
चर्चाकार: आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
[कृति विवरण: मैं सागर सी, हाइकु-टांका संग्रह, मंजूषा मन, प्रथम संस्करण, २०१७, आकर डिमाई, आवरण सजिल्द बहुरंगी जैकेट सहित, पृष्ठ ९५, मूल्य १४०/-, प्रकाशक पोएट्री बुक बाजार, एफ एफ १६७९ लेखराज तौर, इंदिर नगर लखनऊ २२६०१६, कृतिकार संपर्क- कार्यक्रम अधिकारी, अंबुजा सीमेंट फाउंडेशन, ग्राम खान,  बाजार छत्तीसगढ़ ४९३३३१]
*
जापानी छंद / पाँच साथ औ' पाँच / वर्ण हाइकु।
"मैं सागर सी" / रुचिकर संग्रह / पठनीय भी।
प्रकृति नटी / छवियाँ अनुपम / मन मोहित।
निहित लय / संगीत की धुन सी / लगती प्रिय।
भाव-सागर / मंथन नवनीत / हाइकु - ताँका।
"करूँ वंदन" / प्रभु का सुमिरन / सह नमन।
मन की व्यथा / किए है समाहित / "पीर हमारी"।
हाइकु रचे / गागर में सागर / प्रिय मंजूषा।
जीवनानुभव / माला  के पुष्प सम / हुए शब्दित।
"शीशे का दिल / करें चकनाचूर / कड़वे बोल।" -पृष्ठ २९
"शोर मचाती / अधूरी कामनाएँ / चाहें पूर्णता।" -पृष्ठ ३१
"आँसुओं सींची / ये धरती बंजर / फूटा अंकुर।" -पृष्ठ ३४
मंजूषा मन / सम्यक शब्द-धनी / हुईं सफल।
"मन-साँकल / तुम खोलो आकर / सुख के पल।" -पृष्ठ ३५
निकलते हैं / अब नहीं गुलाब / पुस्तिकाओं से।
चलभाष का / बढ़ता प्रचलन / न भाए उन्हें।
लिखतीं तभी / हो दुखी हाइकु में / मंजूषा मन-
"किताब मेरी / लौटाई, थी उसमें / याद तेरी।" -पृष्ठ ३८
"मन न रँगा / रँग-रँग हारे तो / घरौंदा रँगा।" -पृष्ठ ४०
अनुभूतियाँ / सघन पिघलकर / बनीं हाइकु।
"साँस धौंकनी / चले अनवरत / आस झुलसे। -पृष्ठ ४५
"मन के भाव / कविता का रूप ले / बने लगाव।" -पृष्ठ ४८
गहराई है / विस्तार-ऊँचाई भी / हाइकुओं में।
जीवन दृष्टि / किए हैं समाहित / ये त्रिपदियाँ।
"फेंक आये हैं / सपनों की गठरी / बोझ बड़ा था।" -पृष्ठ ४८
"प्रकृति-रूप" / हाइकुकार को ही / बनाता भूप।
"नन्हीं गौरैया / तिनका चुनकर / संसार रचे।" -पृष्ठ ५७
"गुलमोहर / मन-बगिया फूला / जीवन झूला।'-पृष्ठ ६२
भारतीयता / भावनाओं का सिंधु / नवता घोले।
हाइकु पढ़े / उन्मन मन शांत / होकर डोले।
"अनजाने ही / जुड़ा मन का नाता / आपके संग।" -पृष्ठ ७१
हैं अनुभवी / आँखों ने पढ़ लिया / मन का दर्द।
नहीं बिसरी / स्वच्छता भारत की / हाइकुकार को।
सामाजिकता / सामयिकता भी है / नव आभा ले।
"अभियान ये / स्वच्छ भारत चला / हँसी धरती।' -पृष्ठ ८४
पढ़-गुनिए / ताँका छंद दे रहे / खूब आनंद।
"पगडंडी पे / मन झूमता जाए / खुशियाँ पाए।
और ये अचानक / दुःख कहाँ से आए?"         --पृष्ठ ८९
भाषा शैली है / यथोचित ही / हाइकुओं की।
शब्द-चयन / सम्यक-सटीक है / आनंद मिला।
आँसू-मुस्कान / छाँव-धूप सरीखी / है घुली-मिली।
 पठनीयता / सहज-सरलता / विशेषता है।
अपनापन / लुटा रहा है हर / हाइकु-ताँका।
जैसे बृज में / लीला कर रहा हो / कन्हैया बाँका।
"मैं सागर सी" / है सरस-सफल / आस जगाती।
मंजूषा मन / हिंदी काव्य भंडार / समृद्ध करें।


***
समीक्षाकार संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१, अनुडाक: salil.sanjiv@gmail.com, चलभाष: ७९९९५५९६१८, ९४२५१८३२४४।
***


रविवार, 20 जनवरी 2019

sabari mala

एक रचना 
सबरीमाला 
*
सबरीमाला केंद्र है, 
जनगण के विश्वास का। 
नर-नारी के साम्य का,
ईश्वर के अहसास का
*
जो पतितों को तारता,
उससे दूर न कोई रहे-
आयु-रंग प्रतिबंध न हो,
हर जन हरिजन व्यथा कहे।।
अन्धकार में देवालय
स्रोत अनंताभास का
*
बना-बदलता परंपरा,
मानव जड़ता ठीक नहीं।
लिंग-भेद हो पूजा में,
सत्य ठीक यह लीक नहीं।
राजनीति ही कारन है,
मानव के संत्रास का
*
पोंगापंथी दूर करें,
एक समान सभी संतान।
अन्धी श्रद्धा त्याज्य सखे!
समता ईश्वर का वरदान।।
आरक्षण कारण बनता
सदा विरोधाभास का
***
२०-१-२०१९
संजीव, ७९९९५५९६१८

गुरुवार, 17 जनवरी 2019

समीक्षा: सड़क पर 'शांत'

समीक्षा:
आश्वस्त करता नवगीत संग्रह 'सड़क पर'
देवकीनंदन 'शांत'
*
[कृति विववरण: सड़क पर, गीत-नवगीत संग्रह, आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', प्रथम संस्करण २०१८, आकार २१ x  १४ से.मी., आवरण पेपरबैक बहुरंगी, कलाकार मयंक वर्मा, पृष्ठ ९६, मूल्य २५०/-, समन्वय प्रकाशन अभियान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१, चलभाष ७९९९५५९६१८, ९४२५१८३२४४, ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com]
*

बुधवार, 16 जनवरी 2019

tripadika muktika

त्रिपदिक मुक्तिका 
*
निर्झर कलकल बहता 
किलकिल न करो मानव 
कहता, न तनिक सुनता। 
*
नाहक ही सिर धुनता
सच बात न कह मानव
मिथ्या सपने बुनता।
*
जो सुन नहीं माना
सच कल ने बतलाया
जो आज नहीं गुनता।
*
जिसकी जैसी क्षमता
वह लूट खा रहा है
कह कैसे हो समता?
*
बढ़ता न कभी कमता
बिन मिल मिल रहा है
माँ का दुलार-ममता।
***
संजीव, ७९९९५५९६१८
२-१२-२०१८

doha muktika

दोहा मुक्तिका
संजीव 

दोहा दर्पण में दिखे, साधो सच्चा रूप। 
पक्षपात करता नहीं, भिक्षुक हो या भूप।।
*
सार-सार को गह रखो, थोथा देना फेंक।
मनुज स्वभाव सदा रखो, जैसे रखता सूप।।
*
प्यासा दर पर देखकर, द्वार न करना बंद।
जल देने से कब करे, मना बताएँ कूप।।
*
बिसरा गौतम-सीख दी, तज अचार-विचार।
निर्मल चीवर मलिन मन, नित प्रति पूजें स्तूप।।
*
खोट न अपनी देखती, कानी सबको टोंक।
सब को कहे कुरूप ज्यों, खुद हो परी अनूप।।
***
१६-१२-२०१८

muktika

मुक्तिका:
संजीव
.
अपने क़द से बड़ा हमारा साया है 
छिपा बीज में वृक्ष समझ अब आया है
खड़ा जमीं पर नन्हे पैर जमाये मैं
मत रुक, चलता रह रवि ने समझाया है
साया-साथी साथ उजाले में रहते
आँख मुँदे पर किसने साथ निभाया है?
'मैं' को 'मैं' से जुदा कर सका कब कोई
सब में रब को देखा गले लगाया है?
है अजीब संजीव मनुज जड़ पत्थर सा
अश्रु बहाता लेकिन पोंछ न पाया है
===

geet vatsalya ka kambal

अभिनव प्रयोग:
गीत
वात्सल्य का कंबल
संजीव
*
गॉड मेरे! सुनो प्रेयर है बहुत हंबल
कोई तो दे दे हमें वात्सल्य का कंबल....
*
अब मिले सरदार सा सरदार भारत को
अ-सरदारों से नहीं अब देश गारत हो
असरदारों की जरूरत आज ज़्यादा है
करे फुलफिल किया वोटर से जो वादा है
एनिमी को पटकनी दे, फ्रेंड को फ्लॉवर
समर में भी यूँ लगे, चल रहा है शॉवर
हग करें क़ृष्णा से गंगा नर्मदा चंबल
गॉड मेरे! सुनो प्रेयर है बहुत हंबल
कोई तो दे दे हमें वात्सल्य का कंबल....
*
मनी फॉरेन में जमा यू टर्न ले आये
लाहौर से ढाका ये कंट्री एक हो जाए
दहशतों को जीत ले इस्लाम, हो इस्लाह
हेट के मन में भरो लव, ​शाह के भी शाह    
कमाई से खर्च कम हो, हो न सिर पर कर्ज
यूथ-प्रायरटी न हो मस्ती, मिटे यह मर्ज
एबिलिटी ही हो हमारा, ओनली संबल
गॉड मेरे! सुनो प्रेयर है बहुत हंबल
कोई तो दे दे हमें वात्सल्य का कंबल....
*

कलरफुल लाइफ हो, वाइफ पीसफुल हे नाथ!
राजमार्गों से मिलाये हाथ हँस फुटपाथ
रिच-पुअर को क्लोद्स पूरे गॉड! पहनाना
चर्च-मस्जिद को गले, मंदिर के लगवाना  
फ़िक्र नेचर की बने नेचर , न भूलें अर्थ 
भूल मंगल अर्थ का जाएँ न मंगल व्यर्थ
करें लेबर पर भरोसा, छोड़ दें गैंबल 
गॉड मेरे! सुनो प्रेयर है बहुत हंबल
कोई तो दे दे हमें वात्सल्य का कंबल....
*     
(इस्लाम = शांति की चाह, इस्लाह = सुधार)

कृति चर्चा: चिप्पू -गीता गीत

कृति चर्चा:
'चिप्पू' क़िस्सागोई को ज़िंदा करती कहानियाँ
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
(कृति विवरण: चिप्पू, कहानी संग्रह, गीता गीत, प्रथम संस्करण २०१२, आवरण पेपरबैक बहुरंगी, पृष्ठ ९६, मूल्य १२० रु., कहानीकार  संपर्क- १०५० सरस्वती निवास, शक्ति नगर,  गुप्तेश्वर, जबलपुर।)
*
वाक् शक्ति के विकास के साथ कहने-सुनने का क्रम मानव सभ्यता को भाषा की भेंट से समृद्ध कर अन्य प्रभारियों से बेहतर बना सका। 'अनुभूत' की 'अनुभूति' को 'अभिव्यक्त' करने की कला साहित्य रचना है। 'साहित्य' वह जिसमें सबका हित समाहित हो। 'कहानी' तभी जन्म लेती है जब कहानीकार के पास कुछ कहने के लिए हो। 'किस्सा गोई' किस सा बनना चाहिए को वर्ण्य बनाती है। 'गप्प' मारने की कला की 'गल्प' है जो कल्पना को विश्वसनीय बनाकर प्रस्तुत करती है। कथनीय को सामने लाकर उसके प्रति आदर और अनुकरण वृत्ति के विकास हेतु 'कथा' कही जाती है। कथ्य को बातचीत की तरह प्रश्नोत्तर शैली में प्रस्तुत किया जाए तो 'वार्ता' जन्म लेती है। वर्तमान शिक्षा प्रणाली ने 'टीच' करने को लक्ष्य बनाकर 'ग्रास्प' करने पर ध्यान नहीं दिया। शिक्षक वही है जो शिक्षार्थी को शिक्षा दे सके। शिक्षा देनेवाला निरक्षर और शिक्षा पानेवाला ग्यानी भी हो सकता है। ऐसा न होता तो 'साखी' न होती। साखी कहनेवाले प्राय: निरक्षर रहे हैं जबकि साखी से सीख लेने वाले विद्वान।

शिक्षका गीता गीत के कहानी संग्रह चिप्पू' पर चर्चा के पूर्व यह पृष्ठ भूमि इसलिए कि गीता पेशेवर या आदतन कलमघिस्सू नहीं हैं। वे सिर्फ लिखने के लिए नहीं लिखतीं। समाजशास्त्र तथा हिंदी साहित्य से स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त गीता रे सृजन पर विधिस्नातक होने की छाप न होने से रचनाएँ आम आदमी की दृष्टि से सहज ग्राह्य बन सकी हैं। गीता को 'बंगाली हिंदी कथाकार' कहना गलत है। वास्तव में वह 'हिंदीभाषी बंगाली सृजनशिल्पी' हैं। 'कर्म' का महत्व 'जन्म' से अधिक होता है। जब समाज में 'जन्म' को अधिक और 'कर्म' को कम महत्व दिया जाता है  तो चिप्पू' का जन्म ही नहीं, असामयिक मृत्यु भी होती है। गीता की संवेदनशील कलम 'चिप्पू' को न केवल पहचानती है अपितु उसे कथानायक बनाकर उसकी व्यथा-कथा सबके सामने भी लाती है।

गीता का जीवन संघर्ष उन्हें समाज के हाशिए पर रह रहे लोगों से जोड़ता है। उनकी कहानियाँ न तो साम्यवादी चिंतनधारा प्रणीत दिशा-हीन सर्वहारा की व्यथा-कथाएँ हैं, न ही अंध स्त्री-विमर्श की एकांगी अतिरेकी कहानियाँ। तथापि ये कहानियाँ विसंगतियों को इंगित, समाहित और उपचारित करने की कोशिश करने में कसर नहीं छोड़तीं। अनु,  शुभा,  उपमा,  प्रीता, नीरू,  शर्मा जी आदि गढ़े गए पात्र गढ़ा हुए न लगना गीता के कहानीकार की सफलता है। पाठक इन कहानियों को अपने निकट घटता हुआ अनुभव करता है।
शिल्प की दृष्टि से चिप्पू की कहानियाँ 'गत' को 'आगत' तक पहुँचाती हैं। इनमें कहीं संस्मरण की झलक है, कहीं आत्मकथा की। प्रायः गीता की शिक्षिका कहानी में अपनी झलक दिखा देती है। पर्यायवाची शब्दों का प्रयोग, घटनाक्रम का परिवेश और पर्यावरण, प्रकृति चित्रण, शालेय छात्रों को अनुकूल सहज-सरल भाषा आदि इन कहानियों का वैशिष्ट्य है। गीता की कवयित्री भी यत्र-तत्र उपस्थित होकर 'कथा' को 'गीत' से संयुक्त करती है।

अंतर्दृष्टि कहानी में आँखों का वर्णन सरस निबंध की तरह है। यहाँ आँख के पर्यायवाची, आँख की उपयोगिता, दृष्टि के प्रकार आदि की विस्तृत चर्चा भी कहानी के विकास या रोचकता में बाधक नहीं होती। ग्यारह कहानियों साहस, प्रीता,  रुचिका, तलाश एक दिल की, चिप्पू, अंतर्दृष्टि, दर्द,  खुशियों के दीप, टुकू, उपमा तथा आत्मा में से टुकू पूरी तरह संस्मरण है।

कृति की साहित्यिकता को वैयक्तिक संबंधपरक अनुभूतियों से क्षति पहुँचती है। बेहतर हो कि शुभेच्छु जन श्रेय लेने या आशीष देने के स्थान पर रचना कर्म की समीक्षा करें, कहानियों पर बात करें । पाठ्य अशुद्धियाँ, बिंदी-चंद्रबिंदी के गलत प्रयोग खटकते हैं। चिप्पू गीता गीत का पहला कहानी संग्रह है, संभावना की दृष्टि से आश्वस्त हुआ जा सकता है कि आगामी कहानी संकलन में परिपक्व कहानियाँ मिलेंगी। अभिव्यक्ति सामर्थ्य, शब्द भंडार तथा घटित होते में कहानी खोजकर कहने की कला गीता में है। गीता के आगामी कहानी संकलन में कहानी कला का उत्कर्ष देखने की पूरी-पूरी संभावना है।
***
समीक्षक संपर्क: आचार्य संजीव वर्मा सलिल, विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, चलभाष: ७९९९५५९६१८।
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रविवार, 13 जनवरी 2019

व्यंग्य लेख माया महाठगिनी हम जानी

व्यंग्य लेख::
माया महाठगिनी हम जानी
संजीव
*
तथाकथित लोकतंत्र का राजनैतिक महापर्व संपन्न हुआ। सत्य नारायण कथा में जिस तरह सत्यनारायण को छोड़कर सब कुछ मिलता है, उसी तरह लोकतंत्र में लोक को छोड़कर सब कुछ प्राप्य है। यहाँ पल-पल 'लोक' का मान-मर्दन करने में निष्णात 'तंत्र की तूती बोलती है। कहा जाता है कि यह 'लोक का, लोक के द्वारा, लोक के लिए' है लेकिन लोक का प्रतिनिधि 'लोक' नहीं 'दल' का बंधुआ मजदूर होता है। लोकतंत्र के मूल 'लोक मत' को गरीब की लुगाई, गाँव की भौजाई मुहावरे की तरह जब-तब अपहृत और रेपित करना हर दल अपना जन्म सिद्ध अधिकार मानता है। ये दल राजनैतिक ही नहीं धार्मिक, आर्थिक, सामाजिक भी हो सकते हैं। जो दल जितना अधिक दलदल मचने में माहिर होता है, उसे खबरिया जगत में उतनी ही अधिक जगह मिलती है।
हाँ, तो खबरिया जगत के अनुसार 'लोक' ने 'सेवक' चुन लिए हैं। 'लोक' ने न तो 'रिक्त स्थान की विज्ञप्ति प्रसारित की, न चीन्ह-चीन्ह कर विज्ञापन दिए, न करोड़ों रूपए आवेदन पत्रों के साथ बटोरे, न परीक्षा के प्रश्न-पत्र लीक कर वारे-न्यारे किए, न साक्षात्कार में चयन के नाम पर कोमलांगियों के साथ शयन कक्ष को गुलजार किया, न किसी का चयन किया, न किसी को ख़ारिज किया और 'सेवक' चुन लिए। अब ये तथाकथित लोकसेवक-देशसेवक 'लोक' और 'देश' की छाती पर दाल दलते हुए, ऐश-आराम, सत्तारोहण, कमीशन, घपलों, घोटालों की पंचवर्षीय पटकथाएँ लिखेंगे। उनको राह दिखाएँगे खरबूजे को देखकर खरबूजे की तरह रंग बदलने में माहिर प्रशासनिक सेवा के धुरंधर, उनकी रक्षा करेंगा देश का 'सर्वाधिक सुसंगठित खाकी वर्दीधारी गुंडातंत्र (बकौल सर्वोच्च न्यायालय), उनका गुणगान करेगा तवायफ की तरह चंद टकों और सुविधाओं के बदले अस्मत का सौदा करनेवाला खबरॉय संसार और इस सबके बाद भी कोई जेपी या अन्ना सामने आ गया तो उसके आंदोलन को गैर कानूनी बताने में न चूकनेवाला काले कोटधारी बाहुबलियों का समूह।
'लोकतंत्र' को 'लोभतंत्र' में परिवर्तित करने की चिरकालिक प्रक्रिया में चारों स्तंभों में घनघोर स्पर्धा होती रहती है। इस स्पर्धा के प्रति समर्पण और निष्ठां इतनी है की यदि इसे ओलंपिक में सम्मिलित कर लिया जाए तो स्वर्णपदक तो क्या तीनों पदकों में एक भी हमारे सिवा किसी अन्य को मिल ही नहीं सकता। दुनिया के बड़े से बड़े देश के बजट से कहीं अधिक राशि तो हमारे देश में इस अघोषित व्यवसाय में लगी हुई है। लोकतंत्र के चार खंबे ही नहीं हमारे देश के सर्वस्व तीजी साधु-संत भी इस व्यवसाय को भगवदपूजन से अह्दिक महत्व देते हैं। तभी तो घंटो से पंक्तिबद्ध खड़े भक्त खड़े ही रह जाते हैं और पुजारी की अंटी गरम करनेवाले चाट मंगनी और पैट ब्याह से भाई अधिक तेजी से दर्शन कर बाहर पहुँच जाते हैं।
लोकतंत्र में असीम संभावनाएं होती है। इसे 'कोकतंत्र' में भी सहजता से बदला जाता रहा है। टिकिट लेने, काम करने, परीक्षा उत्तीर्ण करने, शोधोपाधि पाने, नियुक्ति पाने, चुनावी टिकिट लेने, मंत्री पद पाने, न्याय पाने या कर्ज लेने में कैसी भी अनियमितता या बाधा हो, बिस्तर गरम करते ही दूर हो जाती है। और तो और नवग्रहों की बाधा, देवताओं का कोप और किस्मत की मार भी पंडित, मुल्ला या पादरी के शयनागार को आबाद कर दूर की जा सकती है। जिस तरह आप के बदले कोई और जाप कर दे तो आपके संकट दूर हो जाते हैं, वैसे ही आप किसी और को भी इस गंगा में डुबकी लगाने भेज सकते हैं। देव लोक में तो एक ही इंद्र है पर इस नर लोक में जितने भी 'काम' करनेवाले हैं वे सब 'काम' करने के बदले 'काम' होने के पहले 'काम की आराधना कर भवसागर पार उतरने का कोी मौका नहीं गँवाते।धर्म हो या दर्शन दोनों में कामिनी के बिना काम नहीं बनता।
हमारी विरासत है कि पहले 'काम' को भस्म कर दो फिर विवाह कर 'काम' के उपासक बन जाओ या 'पहले काम' को साध लो फिर संत कहलाओं। कोई-कोई पुरुषोत्तम आश्रम और मजारों की छाया में माया से ममता करने का पुरुषार्थ करते हुए भी 'रमता जोगी, बहता पानी' की तरह संग रहते हुए भी निस्संग और दागित होते हुए भी बेदाग़ रहा आता है। एक कलिकाल समानता का युग है। यहाँ नर से नारी किसी भी प्रकार पीछे रहना नहीं चाहती। सर्वोच्च न्यायालय और कुछ करे न करे, ७० साल में राम मंदिर पर निर्णय न दे सके किन्तु 'लिव इन' और 'विवाहेतर संबंधों' पर फ़ौरन से पेश्तर फैसलाकुन होने में अतिदक्ष है।
'लोक' भी 'तंत्र' बिना रह नहीं सकता। 'काम' को कामख्या से जोड़े या काम सूत्र से, 'तंत्र' को व्यवस्था से जोड़े या 'मंत्र' से, कमल उठाए या पंजा दिखाए, कही एक को रोकने के लिए, कही दूसरे को साधने के लिए 'माया' की शरण लेना ही होती है, लाख निर्मोही बनने का दवा करो, सत्ता की चौखट पर 'ममता' के दामन की आवश्यकता पड़ ही जाती है। 'लोभ' के रास्ते 'लोक' को 'तंत्र' के राह पर धकेलना हो या 'तंत्र' के द्वारा 'लोक' को रौंदना हो ममता और माया न तो साथ छोड़ती हैं, न कोई उनसे पीछा छुड़ाना चाहता है। अति संभ्रांत, संपन्न और भद्र लोक जानता है कि उसका बस अपनों को अपने तक रोकने पर न चले तो वह औरों के अपनों को अपने तक पहुँचने की राह बनाने से क्यों चूके? हवन करते हाथ जले तो खुद को दोषी न मानकर सूर हो या कबीर कहते रहे हैं 'माया महाठगिनी हम जानी।'
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संपर्क: विश्व वाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, salil.sanjiv@gmail.com ।

शनिवार, 12 जनवरी 2019

अंग्रेजी - छत्तीसगढ़ी

अंग्रेजी से छत्तीसगढ़ी सीखें:

छत्तीसगढ़ी ENGLISH 

स्पीकिंग कोर्स – मोर डहार ले…

Excuse me – एक कन सुन  तो

Let him go – जान दे किरहा ला

Fast – लकर धकर

Smooth – चिक्कन

Father – ददा ग

Resolved – निपट गे

Slapping – तान के राहपट म दे रोगहा ला

Let’s go – चलना बेटखई चल

Go – त ले रेंग ,

Wife – डौकी

Come here – एक्कनिक आतो

Same to same – दाई किरिया एकदम डीक्टो रे

Sunlight – घाम

Raining – रद रदा के गिरही

Go There – ओती जा

Very- खबखब ले, अब्बड़

Bed – गोदरी खटिया के दसना

Gate – कपाट ,राचर, फइरका

Neck – घेंच, नरी

Knee – माड़ी

Finger – अंगठी

Rat – मूसवा

Cat -बिलई

Dog- कुकुर

Cow- गरुआ

Sleep on- चल सुतना रे भोकवा

Good night- सुतना रे किरहा

Good morning- उठना रे अजरहा

Oh my god- हत रे निपोर

Quiet- कलेचुप

Pray- जोजियाना

Tail- पूछी

Acacia- बमरी रुक

Mango- आमा

Axe- कुदारी

Aunty – काकी

Boy- टुरा 

Girl- टुरी

Women- माईलोगिन

Man- बाबूपिला

Bed stead- खटिया

Broom- बहरी

Bone- हाडा

Face- थोथना

Liver- करेजा

Ayelash- बिरइन

Juice – झोर

Pigeon peas- राहेरदार

Honey- मंदरस

Wheat- गहू

Rise- चाउर

Betterment- परछी

Courtyard- अंगना

Cottage- खदर

Doorstill- देहरौठी

Eaves – छानही

Bathroom- नाहनी खोली

Kitchen- रंधनी खोली

Don’t worry -मोर रहत ले ते चिंता झन कर।

शुक्रवार, 11 जनवरी 2019

laghukatha

लघुकथा:
निपूती भली थी
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बापू के निर्वाण दिवस पर देश के नेताओं, चमचों एवं अधिकारियों ने उनके आदर्शों का अनुकरण करने की शपथ ली. अख़बारों और दूरदर्शनी चैनलों ने इसे प्रमुखता से प्रचारित किया.

अगले दिन एक तिहाई अर्थात नेताओं और चमचों ने अपनी आँखों पर हाथ रख कर कर्तव्य की इति श्री कर ली. उसके बाद दूसरे तिहाई अर्थात अधिकारियों ने कानों पर हाथ रख लिए, तीसरे दिन शेष तिहाई अर्थात पत्रकारों ने मुँह पर हाथ रखे तो भारत माता प्रसन्न हुई कि देर से ही सही इन्हे सदबुद्धि तो आई.

उत्सुकतावश भारत माता ने नेताओं के नयनों पर से हाथ हटाया तो देखा वे आँखें मूंदे जनगण के दुःख-दर्दों से दूर सता और सम्पत्ति जुटाने में लीन थे. दुखी होकर भारत माता ने दूसरे बेटे अर्थात अधिकारियों के कानों पर रखे हाथों को हटाया तो देखा वे आम आदमी की पीडाओं की अनसुनी कर पद के मद में मनमानी कर रहे थे. नाराज भारत माता ने तीसरे पुत्र अर्थात पत्रकारों के मुँह पर रखे हाथ हटाये तो देखा नेताओं और अधिकारियों से मिले विज्ञापनों से उसका मुँह बंद था और वह दोनों की मिथ्या महिमा गा कर ख़ुद को धन्य मान रहा था.

अपनी सामान्य संतानों के प्रति तीनों की लापरवाही से क्षुब्ध भारत माता के मुँह से निकला- 'ऐसे पूतों से तो मैं निपूती ही भली थी.

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प्रख्यात साहित्यकार माहेश्वर तिवारी जी का चर्चित नवगीत -एक तुम्हारा होन...

लावणी मुक्तिका

लावणी 
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छंद विधान: यति १६-१४, समपदांती द्विपदिक मात्रिक छंद, पदांत नियम मुक्त

पुस्तक मेले में पुस्तक पर, पाठक-क्रेता गायब हैं। 
थानेदार प्रकाशक कड़ियल, विक्रेतागण नायब हैं।।

जहाँ भीड़ है वहाँ विमोचन, फोटो ताली माला है। 
इंची भर मुस्कान अधर पर, भाषण घंटों वाला है।। 

इधर-उधर ताके श्रोता, मीठा-नमकीन कहाँ कितना?
जितना मिलना माल मुफ्त का, उतना ही हमको सुनना।।

फोटो-सेल्फी सुंदरियों के, साथ खिंचा लो चिपक-चिपक। 
गुस्सा हो तो सॉरी कह दो, खोज अन्य को बिना हिचक।।

मुफ्त किताबें लो झोला भर, मगर खरीदो एक नहीं। 
जो पढ़ने को कहे समझ लो, कतई इरादे नेक नहीं।।

हुई देश में व्याप्त आजकल, लिख-छपने की बीमारी।
बने मियाँ मिट्ठू आपन मुँह, कविगण करते झखमारी।।

खुद अभिनंदन पत्र लिखा लो, ले मोमेंटो श्रीफल शाल। 
स्वल्पाहार हरिद्रा रोली, भूल न जाना मल थाल।।

करतल ध्वनि कर चित्र खींच ले, छपवा दे अख़बारों में। 
वह फोटोग्राफर खरीद लो, सज सोलह सिंगारों में।। 

जिम्मेदारी झोंक भाड़ में, भूलो घर की चिंता फ़िक्र। 
धन्य हुए दो ताली पाकर, तरे खबर में पाकर ज़िक्र।।
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११.१.२०१९