सोमवार, 25 मार्च 2019

नवगीत तुम

नवगीत:
सरहद
*
तुम
स्वीकार सकीं मुझको
जब, सरहद पार
गया मैं लेने।
*
उठा हुआ सर
हद के पार
चला आया तब
अनजाने का
हाथ थाम कर।
मैं बहुतों के
साथ गया था
तुम आईं थीं
निपट अकेली।
किन्तु अकेली
कभी नहीं थीं,
सँग आईं
बचपन-यौवन की
यादें अनगिन।
तुम
स्वीकार सकीं मुझको
जब, पहुँच गया
मैं खुद को देने।
*
था दहेज भी
मैके की
शुभ परम्पराओं
शिक्षा, सद्गुण,
संस्कार का।
ले पतवारें
अपनेपन की
नाव हमें थी
मिलकर खेनी।
मतभेदों की
खाई, अंतरों के
पर्वत लँघ
मधुर मिलन के
सपने बुन-बुन।
तुम
स्वीकार सकीं मुझको
जब, संग हुए हम
अंतर खोने।
*
खुद को खोकर
खुद को पाकर
कही कहानी
मन से मन ने,
नित मन ही मन।
खन-खन कंगन
रुनझुन पायल
केश मोगरा
लटें चमेली।
शंख-प्रार्थना
दीप्ति-आरती
सांध्य-वंदना ,
भुवन भारती
हँसी कीर्ति बन।
तुम
स्वीकार सकीं मुझको
जब, मिली राजश्री
सार्थक होने।
*
भवसागर की
बाधाओं को
मिल-जुलकर
था हमने झेला
धैर्य धारकर।
सावन-फागुन
खुशियाँ लाये
सोहर गूँजे
बजी ढोलकी।
किलकारी
पट्टी पूजन कर,
धरा नापने
नभ को छूने
बढ़ी कदम बन।
तुम
स्वीकार सकीं मुझको
जब, अँगना खेले
मूर्त खिलौने।
*
देख आँख पर
चश्मे की
मोहिनी हँसे हम,
धवल केश की
आभा देखें।
नव पीढ़ी
दौड़े, हम थकते
शांति अंजुला
हुई सहेली।
अन्नपूर्णा
कम साधन से
अधिक लक्ष्य पा
अर्थशास्त्र को
करतीं सार्थक।
तुम
स्वीकार सकीं मुझको
जब, सपने देखे
संग सलोने।
***

व्यंग्य दोहा

व्यंग्य दोहावली:
*
व्यंग्य उठाता प्रश्न जो, उत्तर दें हम-आप. 
लक्ष्य नहीं आघात है, लक्ष्य सके सच व्याप.
*
भोग लगाखें कर रए, पंडज्जी आराम.
भूले से भी ना कहें, बे मूँ से "आ राम".
*
लिए आरती कह रहे, ठाकुर जी "जय राम".
ठाकुर जी मुसका रहे, आज पड़ा फिर काम.
*
रावण ज्यादा राम कम, हैं बनिए के इष्ट.
कपड़े सस्ते राम के, न्यून मुनाफा कष्ट.
*
वनवासी को याद कब, करें अवध जा राम.
सीता को वन भेजकर, मूरत रखते वाम.
*
शीश कटा शम्बूक का, पढ़ा ज्ञान का ग्रंथ.
आरक्षित सांसद कहाँ कहो, कहाँ खोजते पंथ?
*
जाति नहीं आधार हो, आरक्षण का मीत
यही सबक हम सीख लें, करें सत्य से प्रीत.
*
हुए असहमत शिवा से, शिव न भेजते दूर.
बिन सम्मति जातीं शिवा, पातीं कष्ट अपूर.
*
राम न सहमत थे मगर, सिय को दे वनवास.
रोक न पाए समय-गति, पाया देकर त्रास.
*
'सलिल' उपनिषद उठाते, रहे सवाल अनेक.
बूझ मनीषा तब सकी, उत्तर सहित विवेक.
*
'दर्शन' आँखें खोलकर, खोले सच की राह.
आँख मूँद विश्वास कर, मिले न सच की थाह.
*
मोह यतीश न पालता, चाहें सत्य सतीश.
शक-गिरि पर चढ़ तर्क को, मिलते सत्य-गिरीश.
*
राम न केवल अवध-नृप, राम सनातन लीक.
राम-चरित ही प्रश्न बन, शंका हरे सटीक.
*
नंगा ही दंगा करें, बुद्धि-ज्ञान से हीन.
नेता निज-हित साधता, दोनों वृत्ति मलीन.
*
'सलिल' राम का भक्त है, पूछे भक्त सवाल.
राम सुझा उत्तर उसे, मेटें सभी बवाल.
*
सिया न निर्बल थी कभी, मत कहिए असहाय.
लीला कर सच दिखाया, आरक्षण-अन्याय.
*
सबक न हम क्यों सीखते, आरक्षण दें त्याग.
मानव-हित से ही रखें, हम सच्चा अनुराग.
*
कल्प पूर्व कायस्थ थे, भगे न पाकर साथ.
तब बोया अब काटते, विप्र गँवा निज हाथ.
*
नंगों से डरकर नहीं, ले पाए कश्मीर.
दंगों से डर मौन हो, ब्राम्हण भगे अधीर.
*
हम सब 'मानव जाति' हैं, 'भारतीयता वंश'.
परमब्रम्ह सच इष्ट है, हम सब उसके अंश.
*
'पंथ अध्ययन-रीति' है, उसे न कहिए 'धर्म'.
जैन, बौद्ध, सिख, सनातन, एक सभी का मर्म.
*
आवश्यकता-हित कमाकर, मानव भरता पेट.
असुर लूट संचय करे, अंत बने आखेट.
*
दुर्बल-भोगी सुर लुटे, रक्षा करती शक्ति.
शक्ति तभी हो फलवती, जब निर्मल हो भक्ति.
*
'जाति' आत्म-गुण-योग्यता, का होती पर्याय.
जातक कर्म-कथा 'सलिल', कहे सत्य-अध्याय.
*
'जाति दिखा दी' लोक तब, कहे जब दिखे सत्य.
दुर्जन सज्जन बन करे, 'सलिल' अगर अपकृत्य.
*
धंधा या आजीविका, है केवल व्यवसाय.
'जाति' वर्ण है, आत्म का, संस्कार-पर्याय.
*
धंधे से रैदास को, कहिए भले चमार.
किंतु आत्म से विप्र थे, यह भी हो स्वीकार.
*
गति-यति लय का विलय कर, सच कह दे आनंद.
कलकल नाद करे 'सलिल', नेह नर्मदा छंद.
*
श्रीराम नवमी, २५.३.२०१८

दोहा

दोहा दुनिया 
*
रश्मि अभय रह कर करे, घोर तिमिर पर वार
खुद को करले अलग तो, कैसे हो भाव-पार?
*
बाती जग उजयारती , दीपक पाता नाम
रुके नहीं पर मदद से, सधता जल्दी काम
*
बाती सँग दीपक मिला, दिया पुलिस ने ठोंक
टीवी पर दो टाँग के, श्वान रहे हैं भौंक
*
यह बाती उस दीप को, देख जल उठी आप
किसका कितना दोष है?, कौन सकेगा नाप??
*
बाती-दीपक को रहा, भरमाता जो तेल
उसे न कोइ टोंकता, और न भेजे जेल
*
दोष न 'का'-'की' का कहें, यही समय की माँग
बिना पिए भी हो नशा,घुली कुएँ में भाँग
***

छप्पय छंद

रसानंद दे छंद नर्मदा २२ : 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
दोहा, सोरठा, रोला, आल्हा, सार , ताटंक, रूपमाला (मदन), चौपाई , हरिगीतिका, उल्लाला , गीतिका,घनाक्षरी, बरवै, त्रिभंगी तथा सरसी छंदों से साक्षात के पश्चात् अब मिलिए षट्पदिक छप्पय छन्द से.

रोला-उल्लाला मिले, बनता छप्पय छंद
*
छप्पय षट्पदिक (६ पंक्तियों का), संयुक्त (दो छन्दों के मेल से निर्मित), मात्रिक (मात्रा गणना के आधार पर रचित), विषम (विशन चरण ११ मात्रा, सम चरण१३ मात्रा ) छन्द हैं। इसमें पहली चार पंक्तियाँ चौबीस मात्रिक रोला छंद (११ + १३ =२४ मात्राओं) की तथा बाद में दो पंक्तियाँ उल्लाला छंद (१३+ १३ = २६ मात्राओं या १४ + १४ = २८मात्राओं) की होती हैं। उल्लाला में सामान्यत:: २६ तथा अपवाद स्वरूप २८ मात्राएँ होती हैं। छप्पय १४८ या १५२ मात्राओं का छंद है। संत नाभादास सिद्धहस्त छप्पयकार हुए हैं। 'प्राकृतपैंगलम्'[1] में इसका लक्षण और इसके भेद दिये गये हैं। 
छप्पय के भेद- छंद प्रभाकरकार जगन्नाथ प्रसाद भानु के अनुसार छप्पय के ७१ प्रकार हैं। छप्पय अपभ्रंश और हिन्दी में समान रूप से प्रिय रहा है। चन्द[2], तुलसी[3], केशव[4], नाभादास [5], भूषण [6], मतिराम [7], सूदन [8], पद्माकर [9] तथा जोधराज हम्मीर रासो कुशल छप्पयकार हुए हैं। इस छन्द का प्रयोग मुख्यत:वीर रस में चन्द से लेकर पद्माकर तक ने किया है। इस छन्द के प्रारम्भ में प्रयुक्त रोला में 'गीता' का चढ़ाव है और अन्त में उल्लाला में उतार है। इसी कारण युद्ध आदि के वर्णन में भावों के उतार-चढ़ाव का इसमें अच्छा वर्णन किया जाता है। नाभादास, तुलसीदास तथा हरिश्चन्द्र ने भक्ति-भावना के लिये छप्पय छन्द का प्रयोग किया है।

उदाहरण - "डिगति उर्वि अति गुर्वि, सर्व पब्बे समुद्रसर। ब्याल बधिर तेहि काल, बिकल दिगपाल चराचर। दिग्गयन्द लरखरत, परत दसकण्ठ मुक्खभर। सुर बिमान हिम भानु, भानु संघटित परस्पर। चौंकि बिरंचि शंकर सहित, कोल कमठ अहि कलमल्यौ। ब्रह्मण्ड खण्ड कियो चण्ड धुनि, जबहिं राम शिव धनु दल्यौ॥"[10] पन्ने की प्रगति अवस्था आधार प्रारम्भिक माध्यमिक पूर्णता शोध टीका टिप्पणी और संदर्भ ऊपर जायें ↑ प्राकृतपैंगलम् - 1|105 ऊपर जायें ↑ पृथ्वीराजरासो ऊपर जायें ↑ कवितावली ऊपर जायें ↑ रामचन्द्रिका ऊपर जायें ↑ भक्तमाल ऊपर जायें ↑ शिवराजभूषण ऊपर जायें ↑ ललितललाम ऊपर जायें ↑ सुजानचरित ऊपर जायें ↑ प्रतापसिंह विरुदावली ऊपर जायें ↑ कवितावली : बाल. 11 धीरेंद्र, वर्मा “भाग- 1 पर आधारित”, हिंदी साहित्य कोश (हिंदी), 250।
लक्षण छन्द-
रोला के पद चार, मत्त चौबीस धारिये।
उल्लाला पद दोय, अंत माहीं सुधारिये।।
कहूँ अट्ठाइस होंय, मत्त छब्बिस कहुँ देखौ।
छप्पय के सब भेद मीत, इकहत्तर लेखौ।।
लघु-गुरु के क्रम तें भये,बानी कवि मंगल करन।
प्रगट कवित की रीती भल, 'भानु' भये पिंगल सरन।। -जगन्नाथ प्रसाद 'भानु' 
*
उल्लाला से योग, तभी छप्पय हो रोला।
छाया जग में प्यार, समर्पित सुर में बोला।। .
मुखरित हो साहित्य, घुमड़ती छंद घटायें।
बरसे रस की धार, सृजन की चलें हवायें।।
है चार चरण का अर्धसम, पन्द्रह तेरह प्रति चरण। 
सुन्दर उल्लाला सुशोभित, भाये रोला से वरण।। -अम्बरीश श्रीवास्तव
*
उदाहरण- 
०१. कौन करै बस वस्तु कौन यहि लोक बड़ो अति। 
को साहस को सिन्धु कौन रज लाज धरे मति।।
को चकवा को सुखद बसै को सकल सुमन महि।
अष्ट सिद्धि नव निद्धि देत माँगे को सो कहि।।
जग बूझत उत्तर देत इमि, कवि भूषण कवि कुल सचिव।
दच्छिन नरेस सरजा सुभट साहिनंद मकरंद सिव।। -महाकवि भूषण, शिवा बावनी
(सिन्धु = समुद्र; ocean or sea । रज = मिट्टी; mud, earth । सुमन = फूल; flower । इमि = इस प्रकार; this way । सचिव = मन्त्री; minister, secretary । सुभट = बहुत बड़ा योद्धा या वीर; great warrior.)
भावार्थ- संसार जानना चाहता है, कि वह कौन व्यक्ति है जो किसी वस्तु को अपने वश में कर सकता है, और वह कौन है जो इस पृथ्वी-लोक में सबसे महान है? साहस का समुद्र कौन है और वह कौन है जो अपनी जन्मभूमि की माटी की लाज की रक्षा करने का विचार सदैव अपने मन में रखेता है? चक्रवाक पक्षी को सुख प्रदान करने वाला१ कौन है? धरती के समस्त सात्विक-मनों में कौन बसा हुआ है? मांगते ही जो आठों प्रकार की सिद्धियों २ और नवों प्रकार की निधियों३ से परिपूर्ण बना देने का सामर्थ्य रखता है, वह कौन है? इन सभी प्रश्नों को जानने की उत्कट आकांक्षा संसार के मन में उत्पन्न हो गयी है। इसलिये कवियों के कुल के सचिव भूषण कवि, सभी प्रश्नों का उत्तर इस प्रकार देते है − वे है दक्षिण के राजा, मनुष्यों में सर्वोत्कृष्ट एवं साहजी के कुल में जो उसी तरह उत्पन्न हुए हैं, जैसे फूलों में सुगंध फैलाने वाला पराग उत्पन्न होता है, अर्थात शिवाजी महाराज। शिवाजी के दादा, मालोजी को मालमकरन्द भी कहा जाता था। Who has the power to conquer all; who is the greatest of them all? Who is the ocean of courage; who is consumed by the thought of protecting the motherland? Who offers bliss to the Chakrawaak; who resides in every flower-like innocent souls? Who, in this world grants Ashtasiddhi and Navnidhi? The world seeks answers, and I, the minister of the poets’ clan, answer thus, He is the ruler of the Deccan, the great warrior, son of Shahaji, grandson of Maloji, i.e. Shivaji.

संकेतार्थ- १. शिवाजी का शौर्य सूर्य समान दमकता है। चकवा नर-मादा सूर्य-प्रकाश में ही मिलन करते है। शिवाजी का शौर्य-सूर्य रात-दिन चमकता रहता है, अत: चकवा पक्षी को अब रात होने का डर नहीं है। अतः वह सुख के सागर में डूबा हुआ है। २. अष्टसिद्धियाँ : अणिमा- अपने को सूक्ष्म बना लेने की क्षमता, महिमा: अपने को बड़ा बना लेने की क्षमता, गरिमा: अपने को भारी बना लेने की क्षमता, लघिमा: अपने को हल्का बना लेने की क्षमता, प्राप्ति: कुछ भी निर्माण कर लेने की क्षमता, प्रकाम्य: कोई भी रूप धारण कर लेने की क्षमता, ईशित्व: हर सत्ता को जान लेना और उस पर नियंत्रण करना, वैशित्व: जीवन और मृत्यु पर नियंत्रण पा लेने की क्षमता ३. नवनिधियाँ: महापद्म, पद्म, शंख, मकर, कच्छप, मुकुन्द, कुन्द, नील और खर्ब।
काव्य-सुषमा और वैशिष्ट्य- 'साहस को सिंधु' तथा 'मकरंद सिव' रूपक अलंकार है। शिवाजी को साहस का समुद्र तथा शिवाजी महाराज मकरंद कहा गया है उपमेय, (जिसका वर्णन किया जा रहा हो, शिवाजी), को उपमान (जिससे तुलना की जाए समुद्र, मकरंद) बना दिया जाये तो रूपक अलंकार होता है। “सुमन”- श्लेष अलंकार है। एक बार प्रयुक्त किसी शब्द से दो अर्थ निकलें तो श्लेष अलंकार होता है। यहाँ सुमन = पुष्प तथा अच्छा मन। “सरजा सुभट साहिनंद”– अनुप्रास अलंकार है। एक वर्ण की आवृत्ति एकाधिक बार हो तो अनुप्रास अलंकार होता है। यहाँ ‘स’ वर्ण की आवृत्ति तीन बार हुई है। “अष्ट सिद्धि नव निद्धि देत माँगे को सो कहि?” अतिशयोक्ति अलंकार है। वास्तविकता से बहुत अधिक बढ़ा-चढ़ाकर कहने पर अतिशयोक्ति अलंकार होता है। यह राज्याश्रित कवियों की परंपरा रही है। प्रश्नोत्तर या पहेली-शैली का प्रयोग किया गया है। ०२. बूढ़े या कि ज़वान, सभी के मन को भाये। गीत-ग़ज़ल के रंग, अलग हट कर दिखलाये।। सात समंदर पार, अमन के दीप जलाये। जग जीता, जगजीत, ग़ज़ल सम्राट कहाये।। तुमने तो सहसा कहा था, मुझको अब तक याद है। गीत-ग़ज़ल से ही जगत ये, शाद और आबाद है।। -नवीन चतुर्वेदी, (जगजीत सिंह ग़ज़ल गायक के प्रति)
०३. लेकर पूजन-थाल प्रात ही बहिना आई।
उपजे नेह प्रभाव, बहुत हर्षित हो भाई।।
पूजे वह सब देव, तिलक माथे पर सोहे।
बँधे दायें हाथ, शुभद राखी मन मोहे।।
हों धागे कच्चे ही भले, बंधन दिल के शेष हैं।
पुनि सौम्य उतारे आरती, राखी पर्व विशेष है।। -अम्बरीश श्रीवास्तव (राखी पर)
==================
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', २०४ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, ९४२५१ ८३२४४, salil.sanjiv@gmail.com

doha

दोहा
जितना पाया खो दिया, जो खोया है साथ। 
झुका उठ गया, उठाया झुकता पाया माथ।। 
*

मुक्तक

मुक्तक
मुक्तक
*
मन मंदिर में जो बसा, उसको भी पहचान.
जग कहता भगवान पर वह भी है इंसान..
जो खुद सब में देखता है ईश्वर का अंश-
दाना है वह ही 'सलिल' शेष सभी नादान..
*
चित्र न जिसका गुप्त है, है नश्वर संसार
चित्र गुप्त जिसका वही, सृष्टि रचे साकार
काया रच निज अंश को, रख करता जीवंत-
कायस्थ होता ब्रह्म ही, ले नाना आकार
*

रविवार, 24 मार्च 2019

चित्रगुप्त-रहस्य

चित्रगुप्त-रहस्य
संजीव
*
चित्रगुप्त पर ब्रम्ह हैं, ॐ अनाहद नाद
योगी पल-पल ध्यानकर, कर पाते संवाद
निराकार पर ब्रम्ह का, बिन आकार न चित्र
चित्र गुप्त कहते इन्हें, सकल जीव के मित्र
नाद तरंगें संघनित, मिलें आप से आप
सूक्ष्म कणों का रूप ले, सकें शून्य में व्याप
कण जब गहते भार तो, नाम मिले बोसॉन
प्रभु! पदार्थ निर्माण कर, डालें उसमें जान
काया रच निज अंश से, करते प्रभु संप्राण
कहलाते कायस्थ- कर, अंध तिमिर से त्राण
परम आत्म ही आत्म है, कण-कण में जो व्याप्त
परम सत्य सब जानते, वेद वचन यह आप्त
कंकर कंकर में बसे, शंकर कहता लोक
चित्रगुप्त फल कर्म के, दें बिन हर्ष, न शोक
मन मंदिर में रहें प्रभु!, सत्य देव! वे एक
सृष्टि रचें पालें मिटा, सकें अनेकानेक
अगणित हैं ब्रम्हांड, है हर का ब्रम्हा भिन्न
विष्णु पाल शिव नाश कर, होते सदा अभिन्न
चित्रगुप्त के रूप हैं, तीनों- करें न भेद
भिन्न उन्हें जो देखता, तिमिर न सकता भेद
पुत्र पिता का पिता है, सत्य लोक की बात
इसी अर्थ में देव का, रूप हुआ विख्यात
मुख से उपजे विप्र का, आशय उपजा ज्ञान
कहकर देते अन्य को, सदा मनुज विद्वान
भुजा बचाये देह को, जो क्षत्रिय का काम
क्षत्रिय उपजे भुजा से, कहते ग्रन्थ तमाम
उदर पालने के लिये, करे लोक व्यापार
वैश्य उदर से जन्मते, का यह सच्चा सार
पैर वहाँ करते रहे, सकल देह का भार
सेवक उपजे पैर से, कहे सहज संसार
दीन-हीन होता नहीं, तन का कोई भाग
हर हिस्से से कीजिये, 'सलिल' नेह-अनुराग
सकल सृष्टि कायस्थ है, परम सत्य लें जान
चित्रगुप्त का अंश तज, तत्क्षण हो बेजान
आत्म मिले परमात्म से, तभी मिल सके मुक्ति
भोग कर्म-फल मुक्त हों, कैसे खोजें युक्ति?
सत्कर्मों की संहिता, धर्म- अधर्म अकर्म
सदाचार में मुक्ति है, यही धर्म का मर्म
नारायण ही सत्य हैं, माया सृष्टि असत्य
तज असत्य भज सत्य को, धर्म कहे कर कृत्य
किसी रूप में भी भजे, हैं अरूप भगवान्
चित्र गुप्त है सभी का, भ्रमित न हों मतिमान
*

फगुआ में क्रिकेट पैरोडी

पैरोडी
'लेट इज बैटर दैन नेवर', कबहुँ नहीं से गैर भली 
होली पर दिवाली खातिर धोनी और सब मनई के मुट्ठी भर अबीर और बोतल भर ठंडाई ......
होली पर एगो ’भोजपुरी’ गीत रऊआ लोग के सेवा में ....
नीक लागी तऽ ठीक , ना नीक लागी तऽ कवनो बात नाहीं....
ई गीत के पहिले चार लाईन अऊरी सुन लेईं
माना कि गीत ई पुरान बा
हर घर कऽ इहे बयान बा
होली कऽ मस्ती बयार मे-
मत पूछऽ बुढ़वो जवान बा--- कबीरा स र र र र ऽ
अब हमहूँ ६३-के ऊपरे चलत, मग्गर ३६ का हौसला रखत बानी ..
भोजपुरी गीत : होली पर....
कईसे मनाईब होली ? हो धोनी !
कईसे मनाईब होली..ऽऽऽऽऽऽ
बैटिंग के गईला त रनहू नऽ अईला
एक गिरउला ,तऽ दूसर पठऊला
कईसे चलाइलऽ चैनल चरचा
कोहली त धवन, रनहू कम दईला
निगली का भंग की गोली? हो धोनी !
मिलके मनाईब होली ?ऽऽऽऽऽ
ओवर में कम से कम चउका तऽ चाही
मौका बेमौका बाऽ ,छक्का तऽ चाही
बीस रनन का रउआ रे टोटा
सम्हरो न दुनिया में होवे हँसाई
रीती न रखियो झोली? हो राजा !
लड़ के मनाईब होली ?,ऽऽऽऽऽऽऽ
मारे बँगलदेसीऽ रह-रह के बोली
मुँहझँऊसा मुँह की खाऽ बिसरा ठिठोली
दूध छठी का याद कराइल
अश्विन-जडेजा? कऽ टोली
बद लीनी बाजी अबोली हो राजा
भिड़ के मनाईब होली ?,ऽऽऽऽऽऽऽ
जमके लगायल रे! चउआ-छक्का
कैच भयल गए ले के मुँह लटका
नानी स्टंपन ने याद कराइल
फूटा बजरिया में मटका
दै दिहिन पटकी सदा जय हो राजा
जम के मनाईब होली ?,ऽऽऽऽऽऽऽ
अरे! अईसे मनाईब होली हो राजा, अईसे मनाईब होली...

समस्या पूर्ति

समस्या पूर्ति

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उक्त चित्र पर गद्य या पद्य में कुछ लिखें।
शब्द सीमा २५० शब्द 

गीत नदी

नदी मर रही है
*
नदी नीरधारी, नदी जीवधारी,
नदी मौन सहती उपेक्षा हमारी
नदी पेड़-पौधे, नदी जिंदगी है-
भुलाया है हमने नदी माँ हमारी
नदी ही मनुज का
सदा घर रही है।
नदी मर रही है
*
नदी वीर-दानी, नदी चीर-धानी
नदी ही पिलाती बिना मोल पानी,
नदी रौद्र-तनया, नदी शिव-सुता है-
नदी सर-सरोवर नहीं दीन, मानी
नदी निज सुतों पर सदय, डर रही है
नदी मर रही है
*
नदी है तो जल है, जल है तो कल है
नदी में नहाता जो वो बेअकल है
नदी में जहर घोलती देव-प्रतिमा
नदी में बहाता मनुज मैल-मल है
नदी अब सलिल का नहीं घर रही है
नदी मर रही है
*
नदी खोद गहरी, नदी को बचाओ
नदी के किनारे सघन वन लगाओ
नदी को नदी से मिला जल बचाओ
नदी का न पानी निरर्थक बहाओ
नदी ही नहीं, यह सदी मर रही है
नदी मर रही है
***
संजीव वर्मा 'सलिल'
७९९९५५९६१८
१२.३.२०१८

शनिवार, 23 मार्च 2019

मनहरण घनाक्षरी

मनहरण घनाक्षरी (३१ वर्ण)
*
मनहरण घनाक्षरी में १६,१५ वर्ण पर यति तथा चरणांत में गुरू होता है। 
*
शालिनी हो, माननी हो, नहीं अभिमाननी हो, 
श्वास-आस स्वामिनी हो मीत मेरी कविता
गति यति लय रस भाव बिंब रूप जस,
प्राण मन आत्मा हो प्रीत मेरी कविता
साधना हो वंदंना हो प्रार्थना हो अर्चना हो
मोहिनी आराधना हो रीत मेरी कविता
शब्द शब्द हो निशब्द सुनें सभी श्रोता गण
हो अतीत अव्यतीत गीत मेरी कविता
***

समीक्षा जिस जगह यह नाव है राजा अवस्थी

पुस्तक सलिला:
'जिस जगह यह नाव है' नवगीत का वह घाट है
-आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
[कृति विवरण- जिस जगह यह नाव है, नवगीत संग्रह, राजा अवस्थी, वर्ष २००६, आकार डिमाई, आवरण सजिल्द, बहुरंगी, जैकेट सहित, पृष्ठ १३६, मूल्य १२०रु., अनुभव प्रकाशन, ई २८ लाजपत नगर, साहिबाबाद, गाज़ियाबाद २०१००५, ०१२० ४११२२१०, रचनाकार संपर्क- गाटरघाट मार्ग, आजाद चौक, कटनी ४८३५०१, चलभाष ९६१७९१३२८७}
*
सनातन सलिला नर्मदा के अंचल में आधुनिक हिंदी के उद्भव काल से ही साहित्य की हर विधा में सतत सत्साहित्य का सृजन होता रहा है। वर्तमान पीढ़ी के सृजनशील नवगीतकारों में राजा अवस्थी का नाम साहित्य सृजन को सारस्वत पूजन की तरह समर्पित भाव से निरंतर कर रहे रचनाकारों में सम्मिलित है। हिंदी साहित्य के श्रेष्ठ-ज्येष्ठ हस्ताक्षर डॉ. देवेन्द्र शर्मा 'इंद्र' तथा नर्मदांचल के वरिष्ठ साहित्य साधक श्यामनारायण मिश्र द्वारा आशीषित 'जिस जगह यह नाव है' ७८ समसामयिक, सरस नवगीतों का पठनीय संग्रह है। मध्य प्रदेश के बड़े जंक्शन कटनी में बसे राजा के नवगीत विंध्याटवी के नैसर्गिक सौंदर्य, ग्राम्यांचल के संघर्ष, नगरीकरण की घुटन, राजनीति के दिशाभ्रम, आम जन के अंतर्द्वंद तथा युवाओं के सपनों के बहुदिशायी रेलगाड़ियों में यात्रारत मनोभावों को मन में बसाते हैं। करुणा और व्यथा काव्य का उत्स है. गाँव की माटी की व्यथा-कथा गाँव के बेटों तक न पहुँचे यह कैसे संभव है?
आज गाँव की व्यथा बाँचती / चिट्ठी मेरे नाम मिली
विधवा हुई रमोली की भी / किस्मत कैसी फूटी
जेठ-ससुर की मैली नज़रें / अब टूटीं, तब टूटीं
तमाम विसंगतियों से लड़ते-जूझते हुए भी अक्षर आराधना किसी सैनिक के पराक्रम से कम नहीं है।
चंदन वन काट-काट / शव का श्रृंगार करें
शिशुओं को दें शव सा जीवन
यौवन में सन्नाटा / मरघट सा छाता है
आस-ओस दुर्लभ आजीवन
यश अर्जन को होता
भूख को हमारी, साहित्य में उतारना
माँ शारदा को क्षुधा-दीप समर्पित करती कलम का संघर्ष गाँव और शहर हर जगह एक सा है। विडम्बनाओं व विसंगतियों से जूझना ही नियति है-
स्वार्थ-पोषित आचरण को / यंत्रवत निष्ठुर शहर को / सौपने बैठा
भाव की पहचान भूले / चेहरे पढ़ना कठिन है
धुंध, सन्नाटा, अँधेरा / और बहरापन कठिन है
विवशताएँ, व्यस्तताएँ / ह्रदय में छल वर्जनाएं / थोपने बैठा
अनचाही पीड़ाएँ प्रकृति प्रदत्त कम, मनुष्य रचित अधिक हैं-
गाँव के पंचों ने मिलकर / फिर खड़ी दीवार की
फिर वही हालत, नियति / वह ही प्रकृति के प्यार की
किशनवा-रधिया की / घुटती साँस का मौसम।
किसी समाज के सामने सर्वाधिक चिंतनीय स्थिति तब होती है जब बिखराव के कारण मानव-मन दूर होने लगें। राजा इस परिस्थिति का अनुमान कर अपनी चिंता नवगीत में उड़ेल देते हैं-
अंतस के समतल की / चिकनाई गायब अब
रोज बढ़े, फैले, ज़हरीला बिखराव
रिश्तों का ताप चुका / आ बैठा ठंडापन
चहक-पुलक में में पसरा जाता ठहराव
कैसी इच्छाओं के / ज्वार और भाटे ये
दूर हुए जाते मन, सदियों के द्वीप
विषमताओं के कुम्भ में सपनों की आहट बेमानी प्रतीत होने लगे तो नवगीत मन की पीड़ा को स्वर देता है -
किसलिए सजें / सपने, तो बस विशुद्ध रेत हैं
नरभक्षी पौधों से / आश्रय की आशा क्या?
सब के सब इक जैसे / टोला क्या, माशा क्या?
कोई भी अमृत फल / इन पर आ पायेगा?
छोडो भी आशा, ये बेंत हैं
बेशर्मी जेहन से / आँखों में उतरी
ढंकेंगी कब तक / ये पोशाकें सुथरी
बच पाना मुश्किल है / ये भोंडे संस्कार
दम लेंगे हंसकर ही, ये करैत हैं
राजा केवल नाम के ही नहीं अनुभूतियों और अभिव्यक्ति-क्षमता के भी राजा हैं। लोकतंत्र में भी सामंतवादी प्रवृत्तियों का बढ़ते जाना, प्रगति की मरीचिका मैं आम आदमी का दर्द बढ़ते जाना उनके मन की पीड़ा को बढ़ाता है-
फिर उसी सामंतवादी / जड़ प्रकृति को रोपता
एक विध्वंसक समय को / हाथ बाँधे न्योतता
जड़ तमाचे पर तमाचे / अमन के मुँह पर
पढ़ कसीदे पर कसीदे / दमन के मुँह पर
गर्व से मुस्की दबाये / है प्रगति का देवता
मुहावरेदार भाषा राजा अवस्थी के नवगीतों की जान है। रेवड़ी बेभाव बाँटी / प्रगति को दे दी धता, ढिबरी का तेल चुका / फैला अँधियार, खेतिहर बिजूकों से / भय खाएं राम, मस्तक में बोकर नासूर / टोपी के ये नकली बाल क्या सँवारना?, संविधान के मकड़जाल में / उलझा अक्सर न्याय हमारा, तार पर दे जीवन आघात / बेसुरे सुर दे रहे धता, कुँवारी इच्छाएं ऐसी / खिले ज्यों हरसिंगार के फूल जैसी अभिव्यक्तियाँ कम शब्दों में अधिक अनुभूतियों से पाठक का साक्षात करा देती हैं।
ग्राम्यांचली पृष्ठभूमि राजा अवस्थी को देशज शब्दों के उस ख़ज़ाने से संपन्न करती है जो शहरों के कोंवेंटी कवि के लिए आकाश कुसुम है। बरुआ, ठकुरवा, छप्पर, छुअन, झरोखा, निठुराई, बिजूका, झोपड़, जांगर. कहतें, पांग, बढ़ानी, हिय, पर्भाती, सुग्गे, ढिबरी, किशनवा, कुछबन्दियों, खटती, बहुँटा, अंकुई, दलिद्दर, चरित्तर, पैताने आदि ग्रामीण शब्दों के साथ उर्दू लफ्ज़ खातिर, रैयत, खबर, गुजरे, बैर, ज़ुल्मों, खस्ताहाल, नज़रें, ख्याल, आमद, बदन, यकीन, ज़ेहन, नुस्खे, नासूर, इन्तिज़ार, ज़हर, आफत, एहसान, तकादा, एहसान, चस्पा, लफ़्फ़ाज़ी आदि मिलकर उस गंगो-जमुनी जीवन की बानगी पेश करते हैं जिसमें शुद्ध हिंदी के अनुपूरित, प्रतिकार, अंतर्मन, उल्लास, ग्रसित, व्याल, आतंकित, प्रतिबंधित, मराल, भ्रान्ति, आलिंगन, उत्कंठा, वीथिकाएँ, वर्जनाएं,अंतस, निष्कलुष, बड़वानल, हिमगलित, संभरण आदि पुलाव में मेवे की तरह प्रतीत होते हैं। राजा अवस्थी ने शब्द-युग्मों की शक्ति और उपदेयता को पहचाना और उपयोग किया है। खबर-दबर, जेठ-ससुर, माँ-दद्दा, रात-दिन, हम-तुम, मन-मान, आस-ओस, उठना-गिरना, साँझ-सँझवाती, लड़ी-फड़ी, डगर-मगर, सुख-दुःख, घर-गाँव, सुबह-शाम, दोपहरी-रात, नून-तेल, आस-पास, दूध-भात, मरते-कटते, चोर-लबार, अमन-चैन, चहक-पुलक, सीलन-सन्नाटे, दंभ-छ्ल्, है-मेल, हवा-पानी, प्रीति-गीति-रीति, मोह-ममता-नेह, तन-मन-जेहन आदि शब्द युगन इन नवगीतों की भाषा को जीवंतता देते हैं।
राजा अवस्थी की प्रयोगधर्मी वृत्ति फाइलबाजों, कंठ-लावनी, वर्ण-कंपित, हिटलरी डकार, श्रध्दाशा, ममता की अलगनी, सुधियों की डोर, काँटों की गलियाँ, मुस्कानों के झोंके, शब्दों का संत्रास, पीड़ाओं के शिलाखंड जैसे शब्दावलियों से पाठक को बाँध पाये हैं। शब्द-सामर्थ्य, भाषा-शैली, नव बिम्ब, नए प्रतीक, मौलिक कथ्य की कसौटी पर ये गीत खरे उतरते हैं। इन नवगीतों में मात्रिक छंदों का प्रयोग किया गया है। दो से लेकर चार पंक्तियों तक के मुखड़े तथा आठ पंक्तियों तक के अंतरे प्रयुक्त हुए हैं। नवगीतों में अंतरों की संख्या दो या तीन है।
हिंदी के समर्थ समीक्षक डॉ. विजय बहादुर सिंह ने इन गीतों में 'समकालीन जीवन व् उसके यथार्थ के प्रति अत्यधिक सजगता एवं संवेदनशीलता, स्थानीयता के रंगों से कुछ अधिक रंगीनियत' ठीक ही लक्षित की है। इस कृति के प्रकाशन के एक दशक बाद राजा अवस्थी की कलम अधिक पैनी हुई है, उनके नवगीतों के नये संकलन की प्रतीक्षा स्वाभाविक है।
२३.३२०१६ 
**************
समन्वयम, २०४ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, salil.sanjiv@gmail.com, ९४२५१८३२४४

कज्जल छंद

छंद सलिला:
कज्जल छंद
संजीव
*
लक्षण: सममात्रिक छंद, जाति मानव, प्रति चरण मात्रा १४ मात्रा, चरणांत लघु-गुरु
लक्षण छंद:
कज्जल कोर निहार मौन,
चौदह रत्न न चाह कौन?
गुरु-लघु अंत रखें समान,
रचिए छंद सरस सुजान
उदाहरण:
१. देव! निहार मेरी ओर,
रखें कर में जीवन-डोर
शांत रहे मन भूल शोर,
नयी आस दे नित्य भोर
२. कोई नहीं तुमसा ईश
तुम्हीं नदीश, तुम्ही गिरीश।
अगनि गगन तुम्हीं पृथीश
मनुज हो सके प्रभु मनीष।
३. करेंगे हिंदी में काम
तभी हो भारत का नाम
तजिए मत लें धैर्य थाम
समय ठीक या रहे वाम
२३.३.२०१४
(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, ककुभ, कज्जल, कीर्ति, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, छवि, जाया, तांडव, तोमर, दीप, दोधक, नित, निधि, प्रदोष, प्रेमा, बाला, भव, मधुभार, मनहरण घनाक्षरी, मानव, माली, माया, माला, ऋद्धि, राजीव, रामा, लीला, वाणी, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शिव, शुभगति, सार, सिद्धि, सुगति, सुजान, हंसी)

विज्ञापन या ठगी

विज्ञापन या ठगी ??????
1) घोटालों से परेशान ना हों, Tata की चाय पीयें, इससे देश बदल
जाएगा|
2) पानी की जगह Coca Cola और Pepsi पीयें और प्यास बुझायें|
3) Lifebuoy और Dettol 99.9% कीटाणु मारते है पर 0.1 %
पुनः प्रजनन के लिए छोड़ ही देते हैं|
4) महिलाओं को बचाने और बटन खुले होने
की चेतावनी देने का ठेका केवल Akshay Kumar ने लिया है|
5) अगर आप Sprite पीते हैं तो लड़की पटाना आपके बाये हाँथ
का खेल है|
6) Salman Khan के अनुसार
महीने भर का Wheel Detergent ले आओ
और कई किलो सोने के मालिक बन जाओ.
आपको नौकरी करने की कोई जरुरत नहीं|
7) Saif Ali Khan और Kreena Kapoor ने शादी एक दुसरे के सर
का Dandruff देख कर की है|
8)यदि किसी के Toothpaste में नमक है तो; यह पूछने के लिए आप
किसी के भी घर का बाथरूम तोड़ सकते हैं|
9) Samsung Galaxy S3 फोन के
अलावा बाकी सभी फोन बंदरों के लिए बने हैं| केवल यही फ़ोन
इंसानों के लिए है!
10) Mountain Dew पीकर पहाड़ से कूद जाइये, कुछ नहीं होगा|
11) Cadbury Dairy Milk Silk Chocolate खाएं कम और मुंह
पर ज्यादा लगायें|
12) Happident चबाइए और बिजली का कनेक्शन कटवा लीजिये|
13) आपके insurance Agents को अपने पापा से
ज्यादा आपकी फ़िक्र रहती हैं|
14) फलमंडी से ज्यादा फल आपके Shampoo में होते हैं|
15) अपने घर का Toilet सदा साफ़ रखें अन्यथा एक Handsome
सा लड़का Harpic और Camera लेकर आपकेToilet की सफाई
का Live Broadcast
करने लगेगा|
16) अगर आपने घर में Asian Paints किया है तो आप दुनिया के
सबसे Intelligent इन्सान हैं|
17) अगर आपने Lux Cozy Big Shot
नहीं पहनी तो आपको मर्द कहलाने काकोई हक़ नहीं|
18) अगर तुम्हारा बेटा Bournvita
नहीं पीता तो वो मंदबुद्धि हो जायेगा|
२३.३.२०१४ 

कुण्डलिया होली

होली की कुण्डलियाँ:
मनायें जमकर होली
संजीव 'सलिल'
*
होली अनहोली न हो, रखिए इसका ध्यान.
मही पाल बन जायेंगे, खायें भंग का पान..
खायें भंग का पान, मान का पान न छोड़ें.
छान पियें ठंडाई, गत रिकोर्ड को तोड़ें..
कहे 'सलिल' कविराय, टेंट में खोंसे गोली.
भोली से लग गले, मनायें जमकर होली..
*
होली ने खोली सभी, नेताओं की पोल.
जिसका जैसा ढोल है, वैसी उसकी पोल..
वैसी उसकी पोल, तोलकर करता बातें.
लेकिन भीतर ही भीतर करता हैं घातें..
नकली कुश्ती देख भ्रनित है जनता भोली.
एक साथ मिल भत्ते बढ़वा करते होली..
*
होली में फीका पड़ा, सेवा का हर रंग.
माया को भायी सदा, सत्ता खातिर जंग..
सत्ता खातिर जंग, सोनिया को भी भाया.
जया, उमा, ममता, सुषमा का भारी पाया..
मर्दों पर भारी है, महिलाओं की टोली.
पुरुष सम्हालें चूल्हा-चक्की अबकी होली..
*

२३.३.२०१३ 

दोहा मुक्तक

दोहा
पर्वत शिखरों पर बसी, धूप-छाँव सँग शाम.
वृक्षों पर कलरव करें, नभचर आ आराम..
फागुन के मुक्तक
संजीव 'सलिल'
*
बसा है आपके ही दिल में प्रिय कब से हमारा दिल.
बनाया उसको माशूका जो बिल देने के है काबिल..
चढ़ायी भाँग करके स्वांग उससे गले मिल लेंगे-
रहे अब तक न लेकिन अब रहेंगे हम तनिक गाफिल..
*
दिया होता नहीं तो दिया दिल का ही जला लेते.
अगर सजती नहीं सजनी न उससे दिल मिला लेते..
वज़न उसका अधिक या मेक-अप का कौन बतलाये?
करा खुद पैक-अप हम क्यों न उसको बिल दिला लेते..
*
फागुन में गुन भुलाइए बेगुन हुजूर हों.
किशमिश न बनिए आप अब सूखा खजूर हों..
माशूक को रंग दीजिए रंग से, गुलाल से-
भागिए मत रंग छुड़ाने खुद मजूर हों..
२३-३-२०१३ 
*
salil.sanjiv@gmail.com
divyanarmada.blogspot.in

कविता विडंबना

कविता 
विडंबना 
*
कोई न चाहे 
पुत्र बने निज 
भगत गुरु सुखदेव. 
नेता जी से पूछो भाई .
व्यापारी से पूछो भाई .
अधिकारी से पूछो भाई .
न्यायमूर्ति से पूछो भाई
वकील साब से पूछो भाई
सब चाहें केवल यश गाना.
भाषण देना चित्र छपाना.
कोई न चाहे
पुत्र बने निज
भगत गुरु सुखदेव.
*
कोई न चाहे
पत्नि-सुता हो
रानी लक्ष्मी बाई.
नेता जी से पूछो भाई .
व्यापारी से पूछो भाई .
अधिकारी से पूछो भाई .
न्यायमूर्ति से पूछो भाई
वकील साब से पूछो भाई
सब चाहें केवल यश गाना.
भाषण देना चित्र छपाना.
कोई न चाहे
पत्नि-सुता हो
रानी लक्ष्मी बाई.
*
मेरे घर में
रहे लक्ष्मी
तेरे घर में काली.
तू ले ले वनवास विरासत
सत्ता मैंने पा ली.
वादे किये न पूरे लेकिन
मुझसे तू मत पूछ.
मुँह मत खोल भले ही मैंने
दी जी भर कर गाली.
चार साल की पूछ न बातें
सत्तर की बतला दे.
अपना वोट मुझे दे दे
जुमलेबाजी बिसरा दे.
***

शुक्रवार, 22 मार्च 2019

हास्य कविता

हास्य कविता
*
कविता कविता जप रहे, 
नासमिटी है कौन?
पूछ रहीं श्रीमती जी, 
हम भय से हैं मौन।
हम भय से हैं मौन, 
न ताली आप बजाएँ।
दुर्गा काली हुई,
किस तरह जान बचाएँ।
हाथ जोड़, पड़ पैर,
मनाते खुश हो सविता।
लाख कहे मिथलेश,
ऩ लिखना हमको कविता।।

२२.३.२०१८ 
***

हाइकु गीत

हाइकु गीत 
*
लोकतंत्र में 
मनमानी की छूट 
सभी ने पाई। 
*
सबको प्यारा
अपना दल-दल
कहते न्यारा।
बुरा शेष का
तुरत ख़तम हो
फिर पौबारा।
लाज लूटते
मिल जनगण की
कह भौजाई।
*
जिसने लूटा
वह कहता: 'तुम
सबने लूटा।
अवसर पा
लूटता देश, हर
नेता झूठा।
वादा करते
जुमला कहकर
जीभ चिढ़ाई।
*
खुद अपनी
मूरत बनवाते
शर्म बेच दी।
संसद ठप
भत्ते लें, लाज न
शेष है रही।
कर बढ़वा
मँहगाई सबने
खूब बढ़ाई।
***

दोहा-दो पदी

दोहा 
सावन-फागुन कह रहे, लड़े न मन का मीत। 
गले मिले, रच कुछ नया, बढ़े जगत में प्रीत।
दो पदी  
सुबह उषा का पीछा करता, फिर संध्या से आँख मिला 
रजनी के आँचल में छिपता, सूरज किससे करें गिला?
२२.३.२०१७ 

त्रिभंगी फागुन

त्रिभंगी छंद:
संजीव 'सलिल'
*
ऋतु फागुन आये, मस्ती लाये, हर मन भाये, यह मौसम।
अमुआ बौराये, महुआ भाये, टेसू गाये, को मो सम।।
होलिका जलायें, फागें गायें, विधि-हर शारद-रमा मगन-
बौरा सँग गौरा, भूँजें होरा, डमरू बाजे, डिम डिम डम।।
२१.३.२०१३ 
*

हाइकु गीत आया वसंत

हाइकु गीत 
*
आया वसंत, 
इन्द्रधनुषी हुए 
दिशा-दिगंत.. 
शोभा अनंत
हुए मोहित, सुर
मानव संत..
.
प्रीत के गीत
गुनगुनाती धूप
बनालो मीत.
जलाते दिए
एक-दूजे के लिए
कामिनी-कंत..
.
पीताभी पर्ण
संभावित जननी
जैसे विवर्ण..
हो हरियाली
मिलेगी खुशहाली
होगे श्रीमंत..
.
चूमता कली
मधुकर गुंजार
लजाती लली..
सूरज हुआ
उषा पर निसार
लाली अनंत..
.
प्रीत की रीत
जानकर न जाने
नीत-अनीत.
क्यों कन्यादान?
'सलिल' वरदान
दें एकदंत..

२२.३.२०१७
***

chunavi muktak

चुनावी मुक्तक 
'दिग्गी राजा' भटक रहा है, 'योगी' को सिंहासन अर्पण 
बैठ न गद्दी बिठलाता है, 'शाह' निराला करे समर्पण 
आ 'अखिलेश' बधाई दें, हँस कौतुक से देखा 'नरेंद्र' ने 
साइकिल-पंजा-हाथी का मिल जनगण ने कर डाला तर्पण 

२२.३.२०१७
**

दो कुण्डलिया

कुंडलिया १  
*
रूठी राधा से कहें, इठलाकर घनश्याम 
मैंने अपना दिल किया, गोपी तेरे नाम 
गोपी तेरे नाम, राधिका बोली जा-जा 
काला दिल ले श्याम, निकट मेरे मत आ, जा
झूठा है तू ग्वाल, प्रीत भी तेरी झूठी
ठेंगा दिखा हँसें मन ही मन, राधा रूठी
*
कुंडलिया २ 
कुंडल पहना कान में, कुंडलिनी ने आज
कान न देती, कान पर कुण्डलिनी लट साज
कुण्डलिनी लट साज, राज करती कुंडल पर
मौन कमंडल बैठ, भेजता हाथी को घर
पंजा-साइकिल सर धुनते, गिरते जा दलदल
खिला कमल हँस पड़ा, फन लो तीनों कुंडल

२२.३.२०१७
***

मुक्तिका खर्चे अधिक

मुक्तिका 
*
खर्चे अधिक आय है कम. 
दिल रोता आँखें हैं नम.. 
*
पाला शौक तमाखू का.
बना मौत का फंदा यम्..
*
जो करता जग उजियारा
उस दीपक के नीचे तम..
*
सीमाओं की फ़िक्र नहीं.
ठोंक रहे संसद में ख़म..
*
जब पाया तो खुश न हुए.
खोया तो करते क्यों गम?
*
टन-टन रुचे न मन्दिर की.
रुचती कोठे की छम-छम..
*
वीर भोग्या वसुंधरा
'सलिल' रखो हाथों में दम.. 

२२.३.२०१७ 
************

होली की कुण्डलियाँ

होली की कुण्डलियाँ:
मनायें जमकर होली
संजीव 'सलिल'
*
होली अनहोली न हो, रखिए इसका ध्यान.
बने केजरीवाल जो खाए भंग का पान..
खायें भंग का पान, मान का पान न छोड़ें.
छान पियें ठंडाई, पी गिलास भी तोड़ें..
कहे 'सलिल' कविराय, टेंट में खोंसे गोली.
मम्मी से मिल गले मनाये पप्पू होली..
*
होली ने खोली सभी, नेताओं की पोल.
जिसका जैसा ढोल है, वैसी उसकी पोल..
वैसी उसकी पोल, तोल ममता बातें.
माया भीतर ही भीतर करटी हैं घातें..
भेंट मुलायम-लालू करते हँसी-ठिठोली .
नीतिश गोबर लिए मनाते जमकर होली..
*
होली में फीका पड़ा, सेवा का हर रंग.
माया को भायी सदा, सत्ता खातिर जंग..
सत्ता खातिर जंग, सोनिया को भी भाया.
जया, उमा, ममता, सुषमा का भारी पाया..
मर्दों पर भारी है, महिलाओं की टोली.
पुरुष सम्हालें चूल्हा-चक्की अबकी होली..

२२.३.२०१६
*

फाग दिल्ली के रंग

सामयिक फाग:
दिल्ली के रंग
*
दिल्ली के रंग रँगो गुइयाँ।
जुलुस मिलें दिन-रैन, लगें नारे कई बार सुनो गुइयाँ।।
जे एन यू में बसो कनैया, उगले ज़हर बचो गुइयाँ।
संसद में कालिया कई, चक्कर में नाँय फँसो गुइयाँ।।
मम्मी-पप्पू की बलिहारी, माथा ठोंक हँसो गुइयाँ।।
छप्पन इंची छाती पंचर, सूजा लाओ सियों गुइयाँ।।
पैले आप-आप कर रए रे, छूटी ट्रेन न रो गुइयाँ।।
नेताजी खों दाँव चूक रओ, माया माँय धँसो गुइयाँ।।
थाना फुँका बता रईं ममता, अपराधी छूटो गुइयाँ।।
सुसमा-ईरानी जब बोलें, चुप्पै-चाप भगो गुइयाँ।।

२२.३.२०१६
***

दो पदी

एक दो पदी 
कांत सफलता पाते तब ही, रहे कांति जब साथ सदा 
मिले श्रेय जब भी जीवन में, कांता की जयकार लिखें
२२.३.२०१७ 

दोहा पिचकारी लिये

दोहा सलिला:
दोहा पिचकारी लिये
संजीव 'सलिल'
*
दोहा पिचकारी लिये,फेंक रहा है रंग.
बरजोरी कुंडलि करे, रोला कहे अभंग..
*
नैन मटक्का कर रहा, हाइकु होरी संग.
फागें ढोलक पीटती, झांझ-मंजीरा तंग..
*
नैन झुके, धड़कन बढ़ी, हुआ रंग बदरंग.
पनघट के गालों चढ़ा, खलिहानों का रंग..
*
चौपालों पर बह रही, प्रीत-प्यार की गंग.
सद्भावों की नर्मदा, बजा रही है चंग..
*
गले ईद से मिल रही, होली-पुलकित अंग.
क्रिसमस-दीवाली हुलस, नर्तित हैं निस्संग..
*
गुझिया मुँह मीठा करे, खाता जाये मलंग.
दाँत न खट्टे कर- कहे, दहीबड़े से भंग..
*
मटक-मटक मटका हुआ, जीवित हास्य प्रसंग.
मुग्ध, सुराही को तके, तन-मन हुए तुरंग..
*
बेलन से बोला पटा, लग रोटी के अंग.
आज लाज तज एक हैं, दोनों नंग-अनंग..
*
फुँकनी को छेड़े तवा, 'तू लग रही सुरंग'.
फुँकनी बोली: 'हाय रे! करिया लगे भुजंग'..
*
मादल-टिमकी में छिड़ी, महुआ पीने जंग.
'और-और' दोनों करें, एक-दूजे से मंग..
*
हाला-प्याला यों लगे, ज्यों तलवार-निहंग.
भावों के आवेश में, उड़ते गगन विहंग..
*
खटिया से नैना मिला, भरता माँग पलंग.
उसने बरजा तो कहे:, 'यही प्रीत का ढंग'..
*
भंग भवानी की कृपा, मच्छर हुआ मतंग.
पैर न धरती पर पड़ें, बेपर उड़े पतंग..
*
रंग पर चढ़ा अबीर या, है अबीर पर रंग.
बूझ न कोई पा रहा, सारी दुनिया दंग..
*
मतंग=हाथी, विहंग = पक्षी,      
२२.३.२०१३  
शब्द-शब्द अनुभूतियाँ, अक्षर-अक्षर भाव.
नाद, थाप, सुर, ताल से, मिटते सकल अभाव..
सलिल साधना स्नेह की, सच्ची पूजा जान.
प्रति पल कर निष्काम तू, जीवन हो रस-खान..
२२.३.२०१०

गुरुवार, 21 मार्च 2019

कुण्डलिया

कुण्डलिया 
*
हिंदू मरते हों मरें, नहीं कहीं भी जिक्र।
काँटा चुभे न अन्य को, सबको इसकी फ़िक्र।।

सबको इसकी फ़िक्र, किस तरह सत्ता पाएँ?
स्वार्थ साध लें अपना, लोग भाड़ में जाएँ।।
कैसे बचे घास जब रखवाले चरते हों?
नहीं किसी को फ़िक्र, अगर हिन्दू  मरते हों।।

कुण्डलिया

कुण्डलिया 
*
रूठी राधा से कहें, इठलाकर घनश्याम 
मैंने अपना दिल किया, गोपी तेरे नाम 
गोपी तेरे नाम, राधिका बोली जा-जा 
काला दिल ले श्याम, निकट मेरे मत आ, जा
झूठा है तू ग्वाल, प्रीत भी तेरी झूठी
ठेंगा दिखा न भाग, खिजाती राधा रूठी
२१-३-२०१७ 

*

विमर्श कविता और कारुण्य

विमर्श: 
कुछ सवाल-
१. मिथुनरत नर क्रौंच के वध पश्चात क्रौंची के आर्तनाद को सुनकर विश्व की पहली कविता कही गयी। क्या कविता में केवल विलाप और कारुण्य हो, शेष रसों या अनुभूतियाँ के लिये कोई जगह न हो?
२. यदि विलाप से उत्पन्न कविता में आनंद का स्थान हो सकता है तो अभाव और विसंगति प्रधान नवगीत में पर्वजनित अनुभूतियाँ क्यों नहीं हो सकतीं?
३. यदि नवगीत केवल और केवल पीड़ा, दर्द, अभाव की अभिव्यक्ति हेतु है तो क्यों ने उसे शोक गीत कहा जाए?
४. क्या इसका अर्थ यह है कि नवगीत में दर्द के अलावा अन्य अनुभूतियों के लिये कोई स्थान नहीं और उन्हें केंद्र में रखकर रची गयी गीति रचनाओं के लिये कोई नया नाम खोज जाए?
५. यदि नवगीत सिर्फ और सिर्फ दलित और दरिद्र वर्ग की विधा है तो उसमें उस वर्ग में प्रचलित गीति विधाओं कबीरा, ढिमरयाई, आल्हा, बटोही, कजरी, फाग, रास आदि तथा उस वर्ग विशेष में प्रचलित शब्दावली का स्थान क्यों नहीं है?
६. क्या समीक्षा करने का एकाधिकार विचारधारा विशेष के समीक्षकों का है?
७. समीक्षा व्यक्तिगत विचारधारा और आग्रहों के अनुसार हो या रचना के गुण-धर्म पर? क्या समीक्षक अपनी व्यक्तिगत विचारधारा से विपरीत विचारधारा की श्रेष्ठ कृति को सराहे या उसकी निंदा करे?
८. रचनाकार समीक्षक और समीक्षक रचनाकार हो सकता है या नहीं?
९. साहित्य समग्र समाज के कल्याण हेतु है या केवल सर्वहारा वर्ग के अधिकारों का घोषणापत्र है?

२१-३-२०१६ 

लेख गीति-काव्य में छंदों की उपयोगिता और प्रासंगिकता


आलेख:
गीति-काव्य में छंदों की उपयोगिता और प्रासंगिकता / गीत, नवगीत तथा नई कविता
संजीव 'सलिल' 
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[लेखक परिचय- आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' गत ३ दशकों से हिंदी साहित्य, भाषा के विकास के लिये सतत समर्पित और सक्रिय हैं। गद्य,-पद्य की लगभग सभी विधाओं, समीक्षा, तकनीकी लेखन, शोध लेख, संस्मरण, यात्रा वृत्त, साक्षात्कार आदि में आपने निरंतर सृजन कर अपनी पहचान स्थापित की है। १२ राज्यों की साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्थाओं द्वारा शताधिक अलंकरणों, पुरस्कारों आदि से सम्मानित किये जा चुके सलिल जी के ४ पुस्तकें (१. कलम के देव भक्ति गीत संग्रह, २ लोकतंत्र का मक़बरा कविता संग्रह, ३. मीत मेरे कविता संग्रह, ४. भूकम्प के साथ जीना सीखें तकनीकी लोकोपयोगी) प्रकाशित हैं जबकि लघुकथा, दोहा, गीत, नवगीत, मुक्तक, मुक्तिका, लेख, आदि की १० पांडुलिपियाँ प्रकाशन की प्रतीक्षा में हैं। हिंदी भाषा के व्याकरण तथा पिंगल अधिकारी विद्वान सलिल जी ने सिविल अभियंता तथा अधिवक्ता होते हुए भी हिंदी के समांतर बुंदेली, ब्रज, भोजपुरी, अवधी, छत्तीसगढ़ी, मालवी, निमाड़ी, राजस्थानी, हरयाणवी, सिरायकी तथा अंग्रेजी में भी लेखन किया है। मेकलसुता पत्रिका तथा साइट हिन्दयुग्म व् साहित्य शिल्पी पर भाषा, छंद, अलंकार आदि पर आपकी धारावाहिक लेखमालाएँ बहुचर्चित रही हैं। अपनी बुआ श्री महीयसी महादेवी जी तथा माताजी कवयित्री शांति देवी को साहित्य व भाषा प्रेम की प्रेरणा माननेवाले सलिल जी प्रस्तुत लेख में गीत, नवगीत, ग़ज़ल और कविता के लेखन में छंद की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला है।] 
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भूमिका: ध्वनि और भाषा
अध्यात्म, धर्म और विज्ञान तीनों सृष्टि की उत्पत्ति नाद अथवा ध्वनि से मानते हैं। सदियों पूर्व वैदिक ऋषियों ने ॐ से सृष्टि की उत्पत्ति बताई, अब विज्ञान नवीनतम खोज के अनुसार सूर्य से नि:सृत ध्वनि तरंगों का रेखांकन कर उसे ॐ के आकार का पा रहे हैं। ऋषि परंपरा ने इस सत्य की प्रतीति कर सर्व सामने को बताया कि धार्मिक अनुष्ठानों में ध्वनि पर आधारित मंत्रपाठ या जप ॐ से आरम्भ करने पर ही फलता है। यह ॐ परब्रम्ह है, जिसका अंश हर जीव में जीवात्मा के रूप में है। नव जन्मे जातक की रुदन-ध्वनि बताती है कि नया प्राणी आ गया है जो आजीवन अपने सुख-दुःख की अभिव्यक्ति ध्वनि के माध्यम से करेगा। आदि मानव वर्तमान में प्रचलित भाषाओँ तथा लिपियों से अपरिचित था। प्राकृतिक घटनाओं तथा पशु-पक्षियों के माध्यम से सुनी ध्वनियों ने उसमें हर्ष, भय, शोक आदि भावों का संचार किया। शांत सलिल-प्रवाह की कलकल, कोयल की कूक, पंछियों की चहचहाहट, शांत समीरण, धीमी जलवृष्टि आदि ने सुख तथा मेघ व तङित्पात की गड़गड़ाहट, शेर आदि की गर्जना, तूफानी हवाओं व मूसलाधार वर्ष के स्वर ने उसमें भय का संचार किया। इन ध्वनियों को स्मृति में संचित कर, उनका दोहराव कर उसने अपने साथियों तक अपनीअनुभूतियाँ सम्प्रेषित कीं। यही आदिम भाषा का जन्म था। वर्षों पूर्व पकड़ा गया भेड़िया बालक भी ऐसी ही ध्वनियों से शांत, भयभीत, क्रोधित होता देखा गया था।
कालांतर में सभ्यता के बढ़ते चरणों के साथ करोड़ों वर्षों में ध्वनियों को सुनने-समझने, व्यक्त करने का कोष संपन्न होता गया। विविध भौगोलिक कारणों से मनुष्य समूह पृथ्वी के विभिन्न भागों में गये और उनमें अलग-अलग ध्वनि संकेत विकसित और प्रचलित हुए जिनसे विविध भाषाओँ तथा बोलिओं का विकास हुआ। सुनने-कहने की यह परंपरा ही श्रुति-स्मृति के रूप में सहस्त्रों वर्षों तक भारत में फली-फूली। भारत में मानव कंठ में ध्वनि के उच्चारण स्थानों की पहचान कर उनसे उच्चरित हो सकनेवाली ध्वनियों को वर्गीकृत कर शुद्ध ध्वनि पर विशेष ध्यान दिया गया। इन्हें हम स्वर के तीन वर्ग हृस्व, दीर्घ व् संयुक्त तथा व्यंजन के ६ वर्गों क वर्ग, च वर्ग, ट वर्ग, त वर्ग, प वर्ग, य वर्ग आदि के रूप में जानते हैं। अब समस्या इस मौखिक ज्ञान को सुरक्षित रखने की थी ताकि पीढ़ी दर पीढ़ी उसे सही तरीके से पढ़ा-सुना तथा सही अर्थों में समझा-समझाया जा सके। निराकार ध्वनियों का आकार या चित्र नहीं था, जिस शक्ति के माध्यम से इन ध्वनियों के लिये अलग-अलग संकेत मिले उसे आकार या चित्र से परे मानते हुए चित्रगुप्त संज्ञा दी जाकर ॐ से अभिव्यक्त कर ध्वन्यांकन के अपरिहार्य उपादानों असि-मसि तथा लिपि का अधिष्ठाता कहा गया। इसीलिए वैदिक काल से मुग़ल काल तक धर्म ग्रंथों में चित्रगुप्त का उल्लेख होने पर भी उनका कोई मंदिर, पुराण, उपनिषद, व्रत, कथा, चालीसा, त्यौहार आदि नहीं बनाये गये।
निराकार का साकार होना, अव्यक्त का व्यक्त होना, ध्वनि का लिपि, लेखनी, शिलापट के माध्यम से स्थयित्व पाना और सर्व साधारण तक पहुँचना मानव सभ्यता सर्वाधिक महत्वपूर्ण चरण है। किसी भी नयी पद्धति का परंपरावादियों द्वारा विरोध किया ही जाता है। लिपि द्वारा ज्ञान को संचित करने का विरोध हुआ ही होगा और तब ऐसी-मसि-लिपि के अधिष्ठाता को कर्म देवता कहकर विरोध का शमन किया गया। लिपि का विरोध अर्थात अंत समय में पाप-पुण्य का लेख रखनेवाले का विरोध कौन करता? आरम्भ में वनस्पतियों की टहनियों को पैना कर वनस्पतियों के रस में डुबाकर शिलाओं पर संकेत अंकित-चित्रित किये गये। ये शैल-चित्र तत्कालीन मनुष्य की शिकारादि क्रियाओं, पशु-पक्षी आदि सहचरों से संबंधित हैं। इनमें प्रयुक्त संकेत क्रमश: रुढ़, सर्वमान्य और सर्वज्ञात हुए। इस प्रकार भाषा के लिखित रूप लिपि (स्क्रिप्ट) का उद्भव हुआ। लिप्यांकन में प्रवीणता प्राप्त ब्राम्हण-कायस्थ वर्ग को समाज, शासन तथा प्रशासन में सर्वोच्च स्थान सहस्त्रों वर्षों तक प्राप्त हुआ। ध्वनि के उच्चारण तथा अंकन का विज्ञानं विकसित होने से शब्द-भंडार का समृद्ध होना, शब्दों से भावों की अभिव्यक्ति कर सकना तथा इसके समानांतर लिपि का विकास होने से ज्ञान का आदान-प्रदान, नव शोध और सकल मानव जीवन व संस्कृति का विकास संभव हो सका।
रोचक तथ्य यह भी है कि मौसम, पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों, तथा वनस्पति ने भी भाषा और लिपि के विकास में योगदान किया। जिस अंचल में पत्तों से भोजपत्र और टहनियों या पक्षियों के पंखों कलम बनायीं जा सकी वहाँ मुड्ढे (अक्षर पर आड़ी रेखा) युक्त लिपि विकसित हुई जबकि जहाँ ताड़पत्र पर लिखा जाता था वहाँ मुड्ढा खींचने पर उसके चिर जाने के कारण बिना मुड्ढे वाली लिपियाँ विकसित हुईं। क्रमश: उत्तर व दक्षिण भारत में इस तरह की लिपियों का अस्तित्व आज भी है। मुड्ढे हीन लिपियों के अनेक प्रकार कागज़ और कलम की किस्म तथा लिखनेवालों की अँगुलियों क्षमता के आधार पर बने। जिन क्षेत्रों के निवासी वृत्ताकार बनाने में निपुण थे वहाँ की लिपियाँ तेलुगु, कन्नड़ , बांग्ला, उड़िया आदि की तरह हैं जिनके अक्षर किसी बच्चे को जलेबी-इमरती की तरह लग सकते हैं। यहाँ बनायी जानेवाली अल्पना, रंगोली, चौक आदि में भी गोलाकृतियाँ अधिक हैं। यहाँ के बर्तन थाली, परात, कटोरी, तवा, बटलोई आदि और खाद्य रोटी, पूड़ी, डोसा, इडली, रसगुल्ला आदि भी वृत्त या गोल आकार के हैं।
रेगिस्तानों में पत्तों का उपचार कर उन पर लिखने की मजबूरी थी इसलिए छोटी-छोटी रेखाओं से निर्मित अरबी, फ़ारसी जैसी लिपियाँ विकसित हुईं। बर्फ, ठंड और नमी वाले क्षेत्रों में रोमन लिपि का विकास हुआ। चित्र अंकन करने की रूचि ने चीनी जैसी चित्रात्मक लिपि के विकास का पथ प्रशस्त किया। इसी तरह खान-पान के कारण विविध अंचल के निवासियों में विविध ध्वनियों के उच्चारण की क्षमता भी अलग-अलग होने से वहाँ विकसित भाषाओँ में वैसी ध्वनियुक्त शब्द बने। जिन अंचलों में जीवन संघर्ष कड़ा था वहाँ की भाषाओँ में कठोर ध्वनियाँ अधिक हैं, जबकि अपेक्षाकृत शांत और सरल जीवन वाले क्षेत्रों की भाषाओँ में कोमल ध्वनियाँ अधिक हैं। यह अंतर हरयाणवी, राजस्थानी, काठियावाड़ी और बांग्ला., बृज, अवधि भाषाओँ में अनुभव किया जा सकता है।
सार यह कि भाषा और लिपि के विकास में ध्वनि का योगदान सर्वाधिक है। भावनाओं और अनुभूतियों को व्यक्त करने में सक्षम मानव ने गद्य और पद्य दो शैलियों का विकास किया। इसका उत्स पशु-पक्षियों और प्रकृति से प्राप्त ध्वनियाँ ही बनीं। अलग-अलग रुक-रुक कर हुई ध्वनियों ने गद्य विधा को जन्म दिया जबकि नदी के कलकल प्रवाह या निरंतर कूकती कोयल की सी ध्वनियों से पद्य का जन्म हुआ। पद्य के सतत विकास ने गीति काव्य का रूप लिया जिसे गाया जा सके। गीतिकाव्य के मूल तत्व ध्वनियों का नियमित अंतराल पर दुहराव, बीच-बीच में ठहराव और किसी अन्य ध्वनि खंड के प्रवेश से हुआ। किसी नदी तट के किनारे कलकल प्रवाह के साथ निरंतर कूकती कोयल को सुनें तो एक ध्वनि आदि से अंत तक, दूसरी के बीच-बीच में प्रवेश से गीत के मुखड़े और अँतरे की प्रतीति होगी। मैथुनरत क्रौंच युगल में से नर का व्याध द्वारा वध, मादा का आर्तनाद और आदिकवि वाल्मिकी के मुख से प्रथम कविता का प्रागट्य इसी सत्य की पुष्टि करता है। हिरण शावक के वध के पश्चात अश्रुपात करती हिरणी के रोदन से ग़ज़ल की उत्पत्ति की मान्यताएँ गीति काव्य की उत्पत्ति में प्रकृति और पर्यावरण का योगदान ही इंगित करते हैं।
व्याकरण और पिंगल का विकास-
भारत में गुरुकुल परम्परा में साहित्य की सारस्वत आराधना का जैसा वातावरण रहा वैसा अन्यत्र कहीं नहीं रह सका, इसलिये भारत में कविता का जन्म ही नहीं हुआ पाणिनि व पिंगल ने विश्व के सर्वाधिक व्यवस्थित, विस्तृत और समृद्ध व्याकरण और पिंगल शास्त्रों का सृजन किया जिनका कमोबेश अनुकरण और प्रयोग विश्व की अधिकांश भाषाओँ में हुआ। जिस तरह व्याकरण के अंतर्गत स्वर-व्यंजन का अध्ययन ध्वनि विज्ञानं के आधारभूत तत्वों के आधार पर हुआ वैसे ही पिंगल के अंतर्गत छंदों का निर्माण ध्वनि खण्डों की आवृत्तिकाल के आधार पर हुआ। पिंगल ने लय या गीतात्मकता के दो मूल तत्वों गति-यति को पहचान कर उनके मध्य प्रयुक्त की जा रही लघु-दीर्घ ध्वनियों को वर्ण या अक्षर के माध्यम से पहचाना तथा उन्हें क्रमश: १-२ मात्रा भार देकर उनके उच्चारण काल की गणना बिना किसी यंत्र या विधि न विशेष का प्रयोग किये संभव बना दी। ध्वनि खंड विशेष के प्रयोग और आवृत्ति के आधार पर छंद पहचाने गये। छंद में प्रयुक्त वर्ण तथा मात्रा के आधार पर छंद के दो वर्ग वर्णिक तथा मात्रिक बनाये गये। मात्रिक छंदों के अध्ययन को सरल करने के लिये ८ लयखंड (गण) प्रयोग में लाये गये सहज बनाने के लिए एक सूत्र 'यमाताराजभानसलगा' बनाया गया।
गीति काव्य में छंद-
गणित के समुच्चय सिद्धांत (सेट थ्योरी) तथा क्रमचय और समुच्चय (परमुटेशन-कॉम्बिनेशन) का प्रयोग कर दोनों वर्गों में छंदों की संख्या का निर्धारण किया गया। वर्ण तथा मात्रा संख्या के आधार पर छंदों का नामकरण गणितीय आधार पर किया गया। मात्रिक छंद के लगभग एक करोड़ तथा वर्णिक छंदों के लगभग डेढ़ करोड़ प्रकार गणितीय आधार पर ही बताये गये हैं। इसका परोक्षार्थ यह है कि वर्णों या मात्राओं का उपयोग कर जब भी कुछ कहा जाता है वह किसी न किसी ज्ञात या अज्ञात छंद का छोटा-बड़ा अंश होता है।इसे इस तरह समझें कि जब भी कुछ कहा जाता है वह अक्षर होता है। संस्कृत के अतिरिक्त विश्व की किसी अन्य भाषा में गीति काव्य का इतना विशद और व्यवस्थित अध्ययन नहीं हो सका। संस्कृत से यह विरासत हिंदी को प्राप्त हुई तथा संस्कृत से कुछ अंश अरबी, फ़ारसी, अंग्रेजी , चीनी, जापानी आदि तक भी गयी। यह अलग बात है कि व्यावहारिक दृष्टि से हिंदी में भी वर्णिक और मात्रिक दोनों वर्गों के लगभग पचास छंद ही मुख्यतः: प्रयोग हो रहे हैं। रचनाओं के गेय और अगेय वर्गों का अंतर लय होने और न होने पर ही है। गद्य गीत और अगीत ऐसे वर्ग हैं जो दोनों वर्गों की सीमा रेखा पर हैं अर्थात जिनमें भाषिक प्रवाह यत्किंचित गेयता की प्रतीति कराता है। यह निर्विवाद है कि समस्त गीति काव्य ऋचा, मन्त्र, श्लोक, लोक गीत, भजन, आरती आदि किसी भी देश रची गयी हों छंदाधारित है। यह हो सकता है कि उस छंद से अपरिचय, छंद के आंशिक प्रयोग अथवा एकाधिक छंदों के मिश्रण के कारण छंद की पहचान न की जा सके।
वैदिक साहित्य में ऋग्वेद एवं सामवेद की ऋचाएँ गीत का आदि रूप हैं। गीत की दो अनिवार्य शर्तें विशिष्ट सांगीतिक लय तथा आरोह-अवरोह अथवा गायन शैली हैं। कालांतर में 'लय' के निर्वहन हेतु छंद विधान और अंत्यानुप्रास (तुकांत-पदांत) का अनुपालन संस्कृत काव्य की वार्णिक छंद परंपरा तक किया जाता रहा। संस्कृत काव्य के समान्तर प्राकृत, अपभ्रंश आदि में भी 'लय' का महत्व यथावत रहा। सधुक्कड़ी में शब्दों के सामान्य रूप का विरूपण सहज स्वीकार्य हुआ किन्तु 'लय' का नहीं। शब्दों के रूप विरूपण और प्रचलित से हटकर भिन्नार्थ में प्रयोग करने पर कबीर को आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने 'भाषा का डिक्टेटर' कहा।
अंग्रेजों और अंगरेजी के आगमन और प्रभुत्व-स्थापन की प्रतिक्रिया स्वरूप सामान्य जन अंग्रेजी साहित्य से जुड़ नहीं सका और स्थानीय देशज साहित्य की सृजन धारा क्रमशः खड़ी हिंदी का बाना धारण करती गयी जिसकी शैलियाँ उससे अधिक पुरानी होते हुए भी उससे जुड़ती गयीं। छंद, तुकांत और लय आधृत काव्य रचनाएँ और महाकाव्य लोक में प्रतिष्ठित और लोकप्रिय हुए। आल्हा, रासो, राई, कजरी, होरी, कबीर आदि गीत रूपों में लय तथा तुकांत-पदांत सहज साध्य रहे। यह अवश्य हुआ कि सीमित शिक्षा तथा शब्द-भण्डार के कारण शब्दों के संकुचन या दीर्घता से लय बनाये रखा गया या शब्दों के देशज भदेसी रूप का व्यवहार किया गया। विविध छंद प्रकारों यथा छप्पय, घनाक्षरी, सवैया आदि में यह समन्वय सहज दृष्टव्य है।खड़ी हिंदी जैसे-जैसे वर्तमान रूप में आती गयी शिक्षा के प्रचार-प्रसार के साथ कवियों में छंद-शुद्धता के समर्थन या विरोध की प्रवृत्ति बढ़ी जो पारम्परिक और प्रगतिवादी दो खेमों में बँट गयी।
छंदमुक्तता और छंद हीनता-
लम्बे काल खंड के पश्चात हिंदी पिंगल को महाप्राण निराला ने कालजयी अवदान छंदमुक्त गीति रचनाओं के रूप में दिया। उत्तर भारत के लोककाव्य व संगीत तथा रवींद्र संगीत में असाधारण पैठ के कारण निराला की छंद पर पकड़ समय से आगे की थी। उनकी प्रयोगधर्मिता ने पारम्परिक छंदों के स्थान पर सांगीतिक राग-ताल को वरीयता देते हुए जो रचनाएँ उन्हें प्रस्तुत कीं उन्हें भ्रम-वश छंद विहीन समझ लिया गया, जबकि उनकी गेयता ही इस बात का प्रमाण है कि उनमें लय अर्थात छंद अन्तर्निहित है। निराला की रचनाओं और तथाकथित प्रगतिशील कवियों की रचनाओं के सस्वर पाठ से छंदमुक्तता और छंदहीनता के अंतर को सहज ही समझा जा सकता है।
दूसरी ओर पारम्परिक काव्यधारा के पक्षधर रचनाकार छंदविधान की पूर्ण जानकारी और उस पर अधिकार न होने के कारण उर्दू काव्यरूपों के प्रति आकृष्ट हुए अथवा मात्रिक-वार्णिक छंद के रूढ़ रूपों को साधने के प्रयास में लालित्य, चारुत्व आदि काव्य गुणों को नहीं साध सके। इस खींच-तान और ऊहापोह के वातावरण में हिंदी काव्य विशेषकर गीत 'रस' तथा 'लय' से दूर होकर जिन्दा तो रहा किन्तु जीवनशक्ति गँवा बैठा। निराला के बाद प्रगतिवादी धारा के कवि छंद को कथ्य की सटीक अभिव्यक्ति में बाधक मानते हुए छंदहीनता के पक्षधर हो गये। इनमें से कुछ समर्थ कवि छंद के पारम्परिक ढाँचे को परिवर्तित कर या छोड़कर 'लय' तथा 'रस' आधारित रचनाओं से सार्थक रचना कर्मकार सके किन्तु अधिकांश कविगण नीरस-क्लिष्ट प्रयोगवादी कवितायेँ रचकर जनमानस में काव्य के प्रति वितृष्णा उत्पन्न करने का कारण बने। विश्वविद्यालयों में हिंदी को शोधोपाधियां प्राप्त किन्तु छंद रचना हेतु आवश्यक प्रतिभा से हीं प्राध्यापकों का एक नया वर्ग पैदा हो गया जिसने अमरता की चाह ने अगीत, प्रगीत, गद्यगीत, अनुगीत, प्रलंब गीत जैसे न जाने कितने प्रयोग किये पर बात नहीं बनी। प्रारंभिक आकर्षण, सत्तासीन राजनेताओं और शिक्षा संस्थानों, पत्रिकाओं और समीक्षकों के समर्थन के बाद भी नयी कविता अपनी नीरसता और जटिलता के कारण जन-मन से दूर होती गयी। गीत के मरने की घोषणा करनेवाले प्रगतिवादी कवि और समीक्षक स्वयं काल के गाल में समा गये पर गीत लोक मानस में जीवित रहा। हिंदी छंदों को कालातीत अथवा अप्रासंगिक मानने की मिथ्या अवधारणा पाल रहे रचनाकार जाने-अनजाने में उन्हीं छंदों का प्रयोग बहर में करते हैं।
उर्दू काव्य विधाओं में छंद-
भारत के विविध भागों में विविध भाषाएँ तथा हिंदी के विविध रूप (शैलियाँ) प्रचलित हैं। उर्दू हिंदी का वह भाषिक रूप है जिसमें अरबी-फ़ारसी शब्दों के साथ-साथ मात्र गणना की पद्धति (तक़्ती) का प्रयोग किया जाता है जो अरबी लोगों द्वारा शब्द उच्चारण के समय पर आधारित हैं। पंक्ति भार गणना की भिन्न पद्धतियाँ, नुक्ते का प्रयोग, काफ़िया-रदीफ़ संबंधी नियम आदि ही हिंदी-उर्दू रचनाओं को वर्गीकृत करते हैं। हिंदी में मात्रिक छंद-लेखन को व्यवस्थित करने के लिये प्रयुक्त गण के समान, उर्दू बहर में रुक्न का प्रयोग किया जाता है। उर्दू गीतिकाव्य की विधा ग़ज़ल की ७ मुफ़र्रद (शुद्ध) तथा १२ मुरक्कब (मिश्रित) कुल १९ बहरें मूलत: २ पंच हर्फ़ी (फ़ऊलुन = यगण यमाता तथा फ़ाइलुन = रगण राजभा ) + ५ सात हर्फ़ी (मुस्तफ़इलुन = भगणनगण = भानसनसल, मफ़ाईलुन = जगणनगण = जभानसलगा, फ़ाइलातुन = भगणनगण = भानसनसल, मुतफ़ाइलुन = सगणनगण = सलगानसल तथा मफऊलात = नगणजगण = नसलजभान) कुल ७ रुक्न (बहुवचन इरकॉन) पर ही आधारित हैं जो गण का ही भिन्न रूप है। दृष्टव्य है कि हिंदी के गण त्रिअक्षरी होने के कारण उनका अधिकतम मात्र भार ६ है जबकि सप्तमात्रिक रुक्न दो गानों का योग कर बनाये गये हैं। संधिस्थल के दो लघु मिलाकर दीर्घ अक्षर लिखा जाता है। इसे गण का विकास कहा जा सकता है।
वर्णिक छंद मुनिशेखर - २० वर्ण = सगण जगण जगण भगण रगण सगण लघु गुरु
चल आज हम करते सुलह मिल बैर भाव भुला सकें
बहरे कामिल - मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन
पसे मर्ग मेरे मज़ार परजो दिया किसी ने जला दिया
उसे आह दामने-बाद ने सरे-शाम से ही बुझा दिया
उक्त वर्णित मुनिशेखर वर्णिक छंद और बहरे कामिल वस्तुत: एक ही हैं।
अट्ठाईस मात्रिक यौगिक जातीय विधाता (शुद्धगा) छंद में पहली, आठवीं और पंद्रहवीं मात्रा लघु तथा पंक्त्यांत में गुरु रखने का विधान है।
कहें हिंदी, लिखें हिंदी, पढ़ें हिंदी, गुनें हिंदी
न भूले थे, न भूलें हैं, न भूलेंगे, कभी हिंदी
हमारी थी, हमारी है, हमारी हो, सदा हिंदी
कभी सोहर, कभी गारी, बहुत प्यारी, लगे हिंदी - सलिल 
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हमें अपने वतन में आजकल अच्छा नहीं लगता
हमारा देश जैसा था हमें वैसा नहीं लगता
दिया विश्वास ने धोखा, भरोसा घात कर बैठा
हमारा खून भी 'सागर', हमने अपना नहीं लगता -रसूल अहमद 'सागर'
अरकान मफाईलुन मफाईलुन मफाईलुन मफाईलुन से बनी उर्दू बहर हज़ज मुसम्मन सालिम, विधाता छंद ही है। इसी तरह अन्य बहरें भी मूलत: छंद पर ही आधारित हैं।
रुबाई के २४ औज़ान जिन ४ मूल औज़ानों (१. मफ़ऊलु मफ़ाईलु मफ़ाईलु फ़अल, २. मफ़ऊलु मफ़ाइलुन् मफ़ाईलु फ़अल, ३. मफ़ऊलु मफ़ाईलु मफ़ाईलु फ़ऊल तथा ४. मफ़ऊलु मफ़ाइलुन् मफ़ाईलु फ़ऊल) से बने हैं उनमें ५ लय खण्डों (मफ़ऊलु, मफ़ाईलु, मफ़ाइलुन् , फ़अल तथा फ़ऊल) के विविध समायोजन हैं जो क्रमश: सगण लघु, यगण लघु, जगण २ लघु / जगण गुरु, नगण तथा जगण ही हैं। रुक्न और औज़ान का मूल आधार गण हैं जिनसे मात्रिक छंद बने हैं तो इनमें यत्किंचित परिवर्तन कर बनाये गये (रुक्नों) अरकान से निर्मित बहर और औज़ान छंदहीन कैसे हो सकती हैं?
औज़ान- मफ़ऊलु मफ़ाईलुन् मफ़ऊलु फ़अल
सगण लघु जगण २ लघु सगण लघु नगण
सलगा ल जभान ल ल सलगा ल नसल
इंसान बने मनुज भगवान नहीं
भगवान बने मनुज शैवान नहीं 
धरती न करे मना, पाले सबको-
दूषित न करो बनो हैवान नहीं -सलिल
गीत / नवगीत का शिल्प, कथ्य और छंद-
गीत और नवगीत शैल्पिक संरचना की दृष्टि से समगोत्रीय है। अन्य अनेक उपविधाओं की तरह यह दोनों भी कुछ समानता और कुछ असमानता रखते हैं। नवगीत नामकरण के पहले भी गीत और दोनों नवगीत रचे जाते रहे आज भी रहे जा रहे हैं और भविष्य में भी रचे जाते रहेंगे। अनेक गीति रचनाओं में गीत और नवगीत दोनों के तत्व देखे जा सकते हैं। इन्हें किसी वर्ग विशेष में रखे जाने या न रखे जाने संबंधी समीक्षकीय विवेचना बेसिर पैर की कवायद कही जा सकती है। इससे पाचनकाए या समीक्षक विशेष के अहं की तुष्टि भले हो विधा या भाषा का भला नहीं होता।
गीत - नवगीत दोनों में मुखड़े (स्थाई) और अंतरे का समायोजन होता है, दोनों को पढ़ा, गुनगुनाया और गाया जा सकता है। मुखड़ा अंतरा मुखड़ा अंतरा यह क्रम सामान्यत: चलता है। गीत में अंतरों की संख्या प्राय: विषम यदा-कदा सम भी होती है । अँतरे में पंक्ति संख्या तथा पंक्ति में शब्द संख्या आवश्यकतानुसार घटाई - बढ़ाई जा सकती है। नवगीत में सामान्यतः २-३ अँतरे तथा अंतरों में ४-६ पंक्ति होती हैं। बहुधा मुखड़ा दोहराने के पूर्व अंतरे के अंत में मुखड़े के समतुल्य मात्रिक / वर्णिक भार की पंक्ति, पंक्तियाँ या पंक्त्यांश रखा जाता है। अंतरा और मुखड़ा में प्रयुक्त छंद समान भी हो सकते हैं और भिन्न भी। गीत के प्रासाद में छंद विधान और अंतरे का आकार व संख्या उसका विस्तार करते हैं। नवगीत के भवन में स्थाई और अंतरों की सीमित संख्या और अपेक्षाकृत लघ्वाकार व्यवस्थित गृह का सा आभास कराते हैं। प्रयोगधर्मी रचनाकार इनमें एकाधिक छंदों, मुक्तक छंदों अथवा हिंदीतर भाषाओँ के छंदों का प्रयोग करते रहे हैं।गीत में पारम्परिक छंद चयन के कारण छंद विधान पूर्वनिर्धारित गति-यति को नियंत्रित करता है। नवगीत में छान्दस स्वतंत्रता होती है अर्थात मात्रा सन्तुलनजनित गेयता और लयबद्धता पर्याप्त है। दोहा, सोरठा, रोला, उल्लाला, त्रिभंगी, आल्हा, सखी, मानव, नरेंद्र छंद (फाग), जनक छंद, लावणी, हाइकु आदि का प्रयोग गीत-नवगीत में किया जाता रहा है।
गीत - नवगीत दोनों में कथ्य के अनुसार रस, प्रतीक और बिम्ब चुने जाते हैं। गेयता या लयबद्धता दोनों में होती है। गीत में शिल्प को वरीयता प्राप्त होती है जबकि नवगीत में कथ्य प्रधान होता है। गीत में कथ्य वर्णन के लिये प्रचुर मात्र में बिम्बों, प्रतीकों और उपमाओं के उपयोग का अवकाश होता है जबकि नवगीत में गागर में सागर, बिंदु में सिंधु की तरह इंगितों में बात कही जाती है। 'कम बोले से अधिक समझना' की उक्ति नवगीत पर पूरी तरह लागू होती है। नवगीत की विषय वस्तु सामायिक और प्रासंगिक होती है। तात्कालिकता नवगीत का प्रमुख लक्षण है जबकि सनातनता, निरंतरता गीत का। गीत रचना का उद्देश्य सत्य-शिव-सुंदर की प्रतीति तथा सत-चित-आनंद की प्राप्ति कही जा सकती है जबकि नवगीत रचना का उद्देश्य इसमें बाधक कारकों और स्थितियों का इंगित कर उन्हें परिवर्तित करने की सरचनात्मक प्रयास कहा जा सकता है। गीत महाकाल का विस्तार है तो नवगीत काल की सापेक्षता। गीत का कथ्य व्यक्ति को समष्टि से जोड़कर उदात्तता के पथ पर बढ़ाता है तो नवगीत कथ्य समष्टि की विरूपता पर व्यक्ति को केंद्रित कर परिष्कार की राह सुझाता है।
नवगीत का विशिष्ट लक्षण नवता बताया जाता है किन्तु यह तत्व गीत में भी हो सकता है और किसी नवगीत में अल्प या नहीं भी हो सकता है। जो विचार एक नवगीतकार के लिए पूर्व ज्ञात हो वह अन्य के लिये नया हो सकता है। अत:, नवता अनुल्लंघनीय मानक नहीं हो सकता। पारम्परिक तुलनाओं, उपमाओं, बिम्बों तथा कथ्यों को नवगीत में वर्ज्य कहनेवालों को उसके लोकस्वीकार्यता को भी ध्यान में रखना होगा। सामान्य पाठक या श्रोता को सामान्यत: पुस्तकीय मानकों से अधिक रास रंजकता आकर्षित करती है। अत: कथ्य की माँग पर मिथकों एवं पारम्परिक तत्वों के प्रयोग के संबंध में लचीला दृष्टिकोण आवश्यक है।
नवगीत में पारिस्थितिक शब्द चित्रण (विशेषकर वैषम्य और विडम्बना) मय कथ्य की अनिवार्यता, काल्पनिक रूमानियत और लिजलिजेपन से परहेज, यथार्थ की धरती पर 'है' और 'होना चाहिए' के ताने-बाने से विषमता के बेल-बूटे सामने लाना, आम आदमी के दर्द-पीड़ा, चीत्कार, असंतोष के वर्णन को साध्य मानने के पक्षधर नवगीत में प्रगतिवादी कवित्त के तत्वों का पिछले दरवाज़े से प्रवेश कराने का प्रयास करते है। यदि यह कुचेष्टा सफल हुई तो नवगीत भी शीघ्र ही प्रगतिशील कविता की सी मरणासन्न स्थिति में होगा। सौभाग्य से नवगीत रचना के क्षेत्र में प्रविष्ट नयी पीढ़ी एकांगी चिंतन को अमान्य कर, मानकों से हटकर सामायिक विषयों, घटनाओं, व्यक्तित्वों, जीवनमूल्यों, टकरावों, स्खलनों के समान्तर आदर्शों, उपलब्धियों, आकांक्षाओं, को नवगीत का विषय बना रही है।
फिर मुँडेरों पर सजे / कचनार के दिन
बैंगनी से श्वेत तक / खिलती हुई मोहक अदाएँ
शाम लेकर उड़ चलीं / रंगीन ध्वज सी ये छटाएँ
फूल गिन-गिन / मुदित भिन-भिन
फिर हवाओं में / बजे कचनार के दिन
खिड़कियाँ, खपरैल, घर, छत / डाल, पत्ते आँख मीचे
आरती सी दीप्त पँखुरी / उतरती है शांत नीचे
रूप झिलमिल / चाल स्वप्निल
फिर दिशाओं ने / भजे कचनार के दिन -पूर्णिमा बर्मन
नवगीत लिखते समय इन बातों का ध्यान रखें-१. संस्कृति व लोकतत्त्व का समावेश हो। २. तुकान्तता पर लयात्मकता को वरीयता दें। ३. नये प्रतीक व बिम्बों का प्रयोग करें। ४. दृष्टिकोण वैज्ञानिकतामय अथवा यथार्थपरक हो। ५. सकारात्मक सोच हो। ६. बात कहने का ढंग नया हो और प्रभावशाली ढंग हो। ७. प्रचुर शब्द-भंडार सम्यक शब्द-चयन में सहायक होता है। ८. नवगीत छन्द के रूढ़ बंधन से मुक्त किन्तु लय परक गति-यति से सज्जित होता है। ९. प्रकृति का सूक्ष्मता के साथ निरीक्षण, कथ्य की जानकारी, मौलिक विश्लेषण और लीक से हटकर अभिव्यक्ति नवगीत लेखन हेतु रचना सामग्री है। भाषा के स्तर पर गीत में संकेतन का महत्वपूर्ण स्थान होता है जबकि नवगीत में स्पष्टता आवश्यक है। गीत पारम्परिकता का पोषक होता है तो नवगीत नव्यता को महत्व देता है। गीत में छंद योजना को वरीयता होती है तो नवगीत में गेयता अथवा लयात्मकता को महत्व मिलता है।
हिंदी छंद और भाषा का वैशिष्ट्य-
हिंदी भाषा का वैशिष्ट्य संस्कृत से अन्य भाषाओँ की तुलना में अधिक प्रभावी तथा ध्वनि विज्ञानं सम्मत उच्चारण प्रणाली ग्रहण करना, सरल अक्षराकृतियाँ, स्वर-व्यंजन,उपयुक्त संयुक्ताक्षर, शब्द-भेद, सटीक संधि नियम, भाषिक शक्तियाँ (अमिधा, व्यंजना, लक्षणा), शताधिक अलंकार, करोड़ों छंद, अगणित मुहावरे तथा लोकोक्तियाँ, तत्सम-तद्भव शब्द, उपसर्ग-प्रत्यय, ५० से अधिक आंचलिक भाषा-रूप, विशव में किसी भी एनी भाषा की तुलना में अधिक समझने-बोलने-लिखनेवाला जनगण आदि के साथ महासागर की तरह निरंतर कुछ नया ग्रहण करने की प्रवृत्ति है। इस कारण हिंदी ने संस्कृत, पाली, प्राकृत, अपभ्रंश, ब्राम्ही की विरासत के साथ २० से अधिक भारतीय भाषाओँ के अरबी, फ़ारसी, अंग्रेजी, जापानी आदि से प्राप्त शब्दों, साहित्य की रचना विधाओं आदि को ग्रहण मात्र नहीं किया अपितु उनके मूल रूप को अपने भाषिक-देशिक संस्कार के अनुरूप परिवर्तित कर उनमें प्रचुर साहित्य रचना कर उसे अपना बना लिया। हिंदी ने मराठी के लावणी, अभंग आदि छंद, पंजाबी के माहिया छंद, अंग्रेजी के सोनेट, कप्लेट, बैलेड आदि छंद, जापानी के हाइकु, स्नैर्यु, ताँका, वांका आदि छंदों सहजता से अपना ही नहीं लिये अपितु उन्हें भारतीय संस्कृति, जनमानस, लोकप्रवृत्ति के नुरूप ढालकर उनका भारतीयकरण भी किया है। विश्व में सर्वाधिक बोली जा रही हिंदी ने भारत में राजनैतिक और आंचलिक विरोध द्वारा विकास-पथ रोकने की कोशिश के बावजूद विश्ववाणी का स्तर पाया है। हिंदी के छंद विश्व की कई भाषाओँ में अनूदित किये और रचे जा रहे हैं। सारत: यह निष्कर्ष निस्संकोच व्यक्त किया जा सकता है कि गीति रचनाओं का अस्तित्व ही छंद पर निर्भर है। छंदों के व्यापक, गहन और उच्च प्रभाव की अभिवृद्धि के लिये उन्हें सरलतम रूप में, स्पष्ट किन्तु लचीले रचना नियमों, मात्रा बाँट निर्धारण आदि सहित प्रस्तुत कृते रहा जाना चाहिए ताकि नयी पीढ़ी उन्हें ग्रहण कर सके और उनके विकास में अपना योगदान कर हिंदी को विश्ववाणी के पद पर आसीन करा सके।
संदर्भ ग्रन्थ-
१. छंद प्रभाकर, जगन्नाथ प्रसाद 'भानु'
२. छंद क्षीरधि राम देव लाल 'विभोर'
३. छ्न्दोलक्षण, नारायणदास 
४. छंद मंजरी, सौरभ पाण्डेय 
५. काव्य मनीषा, डॉ. भागीरथ मिश्र 
६. उर्दू कविता और छंद शास्त्र, नरेश नदीम 
७. गजल छंद चेतना, महावीर प्रसाद मूकेश 
८. गजल सृजन रामप्रसाद शर्मा 'महर्षि'
९. गजल ज्ञान, राम देव लाल 'विभोर'
१०. नव गजलपुर, सागर मीरज़ापुरी 
११. गीतिकायनम, सागर मीरज़ापुरी
१२. सत्यं शिवं सुन्दरं, स्वामी श्यामानंद सरस्वती 
१३. संवेदनाओं के क्षितिज, रसूल अहमद सागर 
१४. चोंच में आकाश, पूर्णिमा बर्मन 
१५. भारतीय काव्य शास्त्र, डॉ. कृष्णदेव शर्मा 
१६. उर्दू साहित्य का इतिहास, डॉ. सभापति मिश्र 
१७. हिंदी का सरल भाषा विज्ञान, गोपाल लाल खन्ना 
१८. समकालीन नवगीत की अवधारणा और जीवन मूल्य, डॉ. उर्वशी सिंह 
१९. नवगीत के नये प्रतिमान, राधेश्याम 'बंधु' 
२०. आलोचना शास्त्र, मोहनवल्लभ पन्त है.।
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२१.३.२०१६ 
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