कुल पेज दृश्य

तसलीस लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
तसलीस लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 30 जनवरी 2026

३० जनवरी, सॉनेट, सोरठा, गोपाल उत्तर तापनीय उपनिषद, मत्तगयंद सवैया, पद्मिनी, तसलीस, लघुकथा, नज़्म

सलिल सृजन ३० जनवरी
नज़्म ० भटके तमाम उम्र हम दीदार के लिए, उसके न जिसका नाम-पता ना वजूद है, लेकिन है वही हर जगह हर वक्त साथ में, कोई तो दे मिला मुझे उससे जो लापता। कोई पता बताए कहाँ है वो जा छिपा, जो हर बशर, हर ज़र्रे में रहता सभी कहें। 'मैं' थक गया है, हार गया खोज-खोजकर, जह 'हम' हुआ, हमदम मिला रहबर भी मिल गया। ३०.१.२०२६ ०००
कार्य शाला
हिंदी से अंग्रेजी काव्यानुवाद
*
भीगा भीगा है समा,
ऐसे में है तू कहाँ?
मेरा दिल ये पुकारे आजा,
मेरे ग़म के सहारे आजा।
वैट वैट इज एटमॉस्फियर,
व्हेयर आर यू माई डियर!
माई हार्ट काल्स यू कम ऑन,
माई सपोर्ट इन सॉरो कम ऑन।
कार्यशाला
संकष्टी गणेश चतुर्थी
रेखा श्रीवास्तव
*
संकट हरण गणेश जी,हर लो सबकी पीर ।
विघ्नों का अंबार हो, करना मति को धीर ।।1।।
निरा जल उपवास करें, लेकर तेरा नाम ।
चांद देख पूजन करें,बनते बिगड़े काम।।2।।
तिल गुड़ अर्पित है तुम्हे,कर लेना स्वीकार ।
धूप दीप है साथ में,‌अरु फूलों का हार ।।3।।
तुम ही मेरी शक्ति हो,सदा खड़े हो साथ ।
भाव सुमन है थाल में, चरणों में है माथ ।।4।।
मति भ्रमित न हो कभी,सही दिखाना राह ।
तृप्ति सदा मन में रहे,‌नहीं किसी की चाह ।।5।।
*
करना मति को धीर?
धीरज धरा और धराया जाता है, 'धीरज करना' मैंने सुना-पढ़ा नहीं।
'धरना रे मति धीर' / 'धर ले रे मति धीर' / 'धारण कर ले धीर' आदि।
दोहा २
प्रथम चरण- ३२२३३ सही कलबाँट नहीं, लय भंग,
तृतीय चरण- ३३२२३ सही कलबाँट,
बिन पानी उपवास कर / बिना नीर उपवास कर
दोहा ५
मन भ्रमित न हो कभी- न्यून मात्रा दोष ११ मात्रा
कभी न हो मति-भ्रम प्रभो!
मति भ्रम कभी न हो मुझे
**
***
सॉनेट
वाक् बंद है
*
बकर-बकर बोलेंगे नेता।
सुन, जनता की वाक् बंद है।
यह वादे, वह जुमले देता।।
दल का दलदल, मची गंद है।।
अंधभक्त खुद को सराहता।
जातिवाद है तुरुपी इक्का।
कैसे भी हो, ताज चाहता।।
खोटा दलित दलों का सिक्का।।
जोड़-घटाने, गुणा-भाग में।
सबके सब हैं चतुर-सयाने।
तेल छिड़कते लगी आग में।।
बाज परिंदे लगे रिझाने।।
खैर न जनमत की है भैया!
घर फूँकें नच ता ता थैया।।
३०-१०२०२२
***
सॉनेट
सुतवधु
*
विनत सुशीला सुतवधु प्यारी।
हिलती-मिलती नीर-क्षीर सी।
नव नातों की गाथा न्यारी।।
गति-यति संगम धरा-धीर सी।।
तज निज जनक, श्वसुर गृह आई।
नयनों में अनगिनती सपने।
सासू माँ ने की पहुनाई।।
जो थे गैर, वही अब अपने।।
नव कुल, नव पहचान मिली है।
नई डगर नव मंज़िल पाना।
हृदय कली हो मुदित खिली है।।
नित्य सफलता-गीत सुनाना।।
शुभाशीष जो चाहो पाओ।
जग-जीवन को पूर्ण बनाओ।।
३०-१-२०२२
विमर्श
वैवाहिक रीति-रिवाज़
आभा सक्सेना : मैंने बचपन में अपने सक्सेना परिवार में अपनी मां को एक परंपरा निभाते हुए देखा था अब तो वह परंपरा लुप्त ही हो गई है जो मुझे अब भी याद है ...मेरी माँ जब भी परिवार में किसी के घर जातीं थीं तो साड़ी के ऊपर गुलाबी रंग की सूती ओढ़नी ओढ़ कर जातीं थीं ...उनके घर जाने पर घर की किसी महिला को अपनी चादर का कोना छुआ देतीं थीं तब ही वह उस घर में बैठतीं थीं ...इस के बाद घर की महिला चाची ताई या फिर दादी उन्हें सम्मान स्वरूप पान खाने को दिया करती थीं..उस समय चाय आदि का तो चलन था ही नहीं
शिल्पा सक्सेना : इसका सिग्नीफिकेन्स क्या है?
आभा : इसका सिगनिफेन्स जो मैं समझ पाई हूँ, एक दूसरे को रेस्पेक्ट देना था। विदेशों में आपका पहिना हुआ कोट रेस्पेक्ट देने के लिए होस्ट (आतिथेय) ही उतारता है।
शिल्पा : वाह। चलो, इस परंपरा को आगे बढ़ाते हैं, बाज़ार से गुलाबी सूती धोती खरीद कर लाते हैं।
आभा : सूती धोती नहीं सूती चादर।
बबिता अग्रवाल कंवल : हमारे यहाँ ओढ़नी ओढ़कर आया-जाया करते थे
मनोरंजन सहाय : सूती चादर ओढ़ना पर्दे का शरीर को आवृत्त रखने की परम्परा का अंश था। जैसे आजकल युवतियाँ कपड़ों पर कोटनुमा एप्रिन पहने रहती हैं। मेजबान का मेहमान की चादर हाथ में लेकर उसे सम्मानपूर्वक निश्चित स्थान पर रखना उसके प्रति सम्मान प्रदर्शन था, आज की तरह नहीं, अपने स्थान से हिले बिना 'कम कम, सिट सिट' कह दिया और आवभगत हो गई, आगन्तुक की। उसके बाद पहले पीने को पानी दिया जाता था।
बंगाल में आज भी करनेवाले सांस्कृतिक परम्पराओं के अनुयायी चादर धारण करते हैं और आगन्तुक को पहले बताशा और पानी देते हैं। संस्कृत में एक श्लोक है-
तृणानि भूमि, उद्कम च वाक चतुर्थी व शून्रता।
ऐतान्यप संताम गेहे, नोछिद्यन्ते कदाचना:।।
इसका अर्थ है कि भूमि पर आसन , और अतिथि से बातचीत करनेवाला यह सज्जन व्यक्ति के घर में सदैव उपलब्ध होंगे।
तुलसीदास ने इसी सन्दर्भ में एक नीतिपरक दोहा कहा है-
आबत ही हरसे नहीं, नैनन नहीं सनेह।
तुलसी तहाँ न जाइये, कंचन बरसे मेह।।
किसी प्राचीन परम्परा का उपहास करने के लिये सूती साड़ी खरीदने की बात करने की जगह हमारी परम्पराओं के पीछे निहित तर्क और उपादेयता को समझने की जरूरत है।
मंजु काला : ओह ...बहुत सुन्दर परंपरा से अवगत कराया आपने आभा जी! ये "हैरिटैज"परंपराएँ हैं... fruitful for mee.
मंजू सक्सेना : हाँ....बिलकुल ऐसा ही होता था...तब पान को मान सम्मान समझा जाता था....यहाँ तक कि किसी के घर गमी हो जाने पर भी एक बार मेरी मम्मी उसके घर पान का टुकड़ा खाने ज़रूर जाती थीं...शायद ये औपचारिकता थी गमी खत्म करने की.. शादी में कितने रीत-रिवाज़ होते थे... सब गायब हो गए
आभा : होली आने से पहले बड़ी मुंगोड़ी तोड़ी जातीं थीं, बन्ने, बन्नी, सोहर गीत सब लुप्त हो गए ...मुझे तो अभी भी याद है कुछ... होली से पहले रंगपाशी का त्योहार मनाया जाता था सही मायनों में होली उसी दिनसे शुरू हो जाती थी सारे पकवान भी उस दिन से पहले ही बना लिए जाते थे ... लड़की के विवाह में उसकी विदाई से पहले एक रस्म होती थी कुंवर कलेवा ...जिसमें दूल्हे के टीका करके उसे उपहार दिए जाते थे
राम अशोक सक्सेना : शादी के अवसर पर लड़कीवालों की तरफ से एक पानदान जरूर आता था।
मंजू सक्सेना : शादी में तिलक चढ़ते ही ढोलक पूज कर बन्नी-बन्ना शुरू हो जाते थे... एक दिन रतजगा होता था जिसे 'ताई' कहते थे उस दिन दोपहर मे कढ़ी-चावल बनता था...फिर मांगर होता था। चूल्हा बनाकर उस पर बड़े सिकते थे। बारात की निकरौसी से पहले लड़के की शादी मे कुँआबरा होता था जिसमें घर की औरतें पास के कुएँ पर जाती थीं और लड़के की माँ कुएँ मे पैर लटका कर बैठ कर लड़के से पूछती थी कि वो बाँदी लाएगा या रानी? जब तक वो यह कह नहीं देता था कि 'तेरे लिए बाँदी लाऊँगा माँ' 'तब तक वह उठती नहीं थी।
मनोरंजन सहाय : हम लोग मूल रूप से मैनपुरी से हैं। मुगल दरबार से, हमारे पूर्वजों को पंचहजारी का मनसब और वर्तमान कुरावली तहसील तथा आसपास के ८ गाँवों की जमींदारी मिलीं हुई थी। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में मुगल सल्तनत के पतन के बाद हमारे पूर्वजों को पलायन करना पड़ा। मेरे दादाजी आपने बड़े भाई के साथ तत्कालीन धौलपुर- वर्तमान में उ. प्र. के महानगर आगरा और म. प्र. के मुरैना के मध्य स्थित कोटा राजस्थान जिला में आ पहुँचे। फारसी के आलिम होने के कारण उन्हे रियासत में नौकरी मिल गई, और शीघ्र ही तहसीलदार बना दिया गया। वहीं मेरे पिता जी और उनके ४ अन्य भाई बहिनों का जन्म हुआ। सभी की सन्तानें राजकीय सेवाओं में अधिकारी वर्ग की सेवा कर सेवानिवृत्त हुईं। मैं पिछले ४० वर्ष से जयपुर में हूँ। राज्य राजस्व सेवा से करनिर्धारण अधिकारी के रूप में २००२ से सेवा निवृत्त हूँ। मेरा एकमात्र पुत्र जयपुर नेशनल यूनिवर्सिटी में कम्प्यूटर विभाग मैं निदेशक पद पर कार्यरत है। कायस्थ अन्य जातियों की अपेक्षा अल्प संख्या में हैंं इसलिये आपस में पारिवारिक सम्बन्ध निकल ही आते हैं।
आभा : माँगरवाले दिन एक दूसरे के पीठ पर हल्दी के थापे लगाए जाते थे। एक दूसरे से मज़ाक, हँसी-ठिठोली सब इसी बहाने हो जाया करते थे, होली जैसा माहौल होता था उस दिन। खोरिया में सारी रात जाग कर महिलाएँ हँसी-मजाक करके अपने दिल की सारी भड़ास निकाल लिया करतीं थीं क्योंकि घर के सारे मर्द तो बारात में गए होते थे । उन दिनों घर की महिलाएँ बारात में नहीं जाया करतीं थीं।
मंजू : बिलकुल सहीक्या मज़ा आता था उन दिनों शादी में.... लड़के की बारात के पहले बरौंगा और लड़की की शादी में दिखावे की गुझिया सजाने मे पूरी कलाएँ दिखाई जाती थीं.... और लड़के की बारात जाते ही रात में औरतों का खोरिया....गज़ब का हुआ करता था....अब तो शादी के रीत-रिवाज़ बस नाम भर के हैं... अगली पीढ़ी तो उस का आनंद ही नहीं समझ पाएगी जो हम लोगों ने लिया है..
मंजू : एक बार मैं खोरिया में दुल्हन बनी तब मै कुँवारी थी और मेरी भाभी दूल्हा... मैं थोड़ी शरमीली थी और उन्होंने आँख मार मार के मेरी हालत खराब कर दी मुझे इतनी शर्म आ रही थी जैसे वह सचमुच ही लड़का हों.
संजीव : सक्सेना कायस्थ मैं भी हूँ। मेरे पूर्वज भोगाँव मैनपुरी से जबलपुर मध्य प्रदेश आये थे। मैं ५वी पीढ़ी में हूँ। मेरे नाना रायबहादुर माताप्रसाद सिन्हा 'रईस' मैनपुरी में ऑनरेरी मजिस्ट्रेट थे। सराऊगियान (गाड़ीवान) मोहल्ला में उनकी हवेली है। उनके बारे में कोई कुछ बता सके तो स्वागत है। गाँधी जी से जुड़कर उन्होंने सब पद और उपाधियाँ त्याग दीं और सत्याग्रही हो गए। संदेहास्पद परिस्थिति में उनकी मृत्यु हुई, परिवार की अल्प शिक्षित महिलाएँ जमीन-जायदाद, धन-संपत्ति सम्हाल नहीं सकीं, सब नष्ट हो गया। तब मेरे मामा हरप्रसाद सिन्हा मात्र ५-६ वर्षों के थे। नाना जी, राजकुमार कॉलेज आगरा से पढ़े थे। वे शक्कर मिल तथा किसी बैंक के डायरेक्टर भी थे। मामा ने बड़े होकर कुछ जमीन-जायदाद सम्हाली, उन्हीं के मित्रों ने उनके साथ विश्वासघात किया और विवाह के २ दिनों के अंदर उनका निधन हो गया। हमारी अल्ल 'ऊमरे' है। मेरे एक मित्र ओमप्रकाश सक्सेना 'कामठान' इंदौर में थे, एक कायस्थ पत्रिका का संपादन करते थे। बरेली, एटा, इटावा, कासगंज, फर्रुखाबाद, आगरा आदि में कई रिश्तेदार थे।
मनोरंजन सहाय : सलिल जी! कमठान हमारी भी अल्ह है, क्या कामठान अलग है? अपने रिश्तेदारों के बारे में बताइये।
हम जिला मैनपूरी के कुरावली या किरावली से ह़ै। हमारे पूर्वजों को मुगलदरवार से पंचहजारी का मनसब अता किया हुआ था और तत्कालीन कुरावली के अलावा आठ गांव की जमींदारी थी। मुगल सल्तनत के पतन के बाद हमारे पूर्वजों को मैनपुरी से पलायन करना पड़ा और मेरे पूर्वजों में मेरे दादाजी धोलपुर में बस गये। फारसी के आलिम थे इसलिये यहाँ स्टेट के तत्कालीन ए.जी. आफिस जैसे किसी दफ्तर में नौकरी मिल गई मगर पॉलिटीकल ऐजेंट की अनुशंसा पर तहसीलदार बने और उनकी ईमानदारी के चर्चे काफी समय तक लोगों की जुबान पर रहे।
अलका कुदेसिया : मेरी शादी में भी पान-दान दिया गया था।
सभी पाठक-पाठिकाएँ अपने-अपने परिवारों में प्रचलित रस्मों की जानकारियाँ दें।
३०.१.२०२२
***
सोरठा सलिला
राम राम अविराम, जपकर हो भव-पार।
पल में देते तार, निर्बल के बल राम।।
राम न छोड़ें सत्य, कष्ट भोगते अनगिनत।
करें धर्म-हित कृत्य, हँस अधर्म का नाश भी।।
पल-पल कह आ राम, प्रभु को ध्याएँ निरंतर।
प्रभु न करें आराम, शबरी से जा खुद मिलें।।
•••
गोपाल उत्तर तापनीय उपनिषद
भोग कामना युक्त, जो भोगे कामी वही।
भोग कामनाहीन, जो भोगे निष्काम वह।।
गोपालक हैं कृष्ण, पहचानें हम किस तरह?
सबसे पहले कृष्ण, फिर विधि-हरि-हर प्रगट हों।।
मथुरा कैसे सुरक्षित, बारह वन से है घिरी।
कृष्ण-चक्र से सुरक्षित, ज्यों सरवर में कमल हो।।
पद्म यंत्र का केंद्र, मथुरा दलवत वन सकल।
चौबिस शिव के लिंग, जो पूजे भाव पार हो।।
एक ब्रह्म के रूप, चार किस तरह हो गए?
मुक्ताक्षरी अनूप, मैं अव्यक्त व व्यक्त भी।।
क्लीं ॐ हैं एक, मूल प्रकृति हैं रुक्मिणी।
राधा आद्या शक्ति, हों विलीन द्वय कृष्ण में।।
पूजे मानव लोक, मानव रूपी कृष्ण को।
मिटे रोग भय शोक, मुक्ति मिले संतृष्ण को।।
काम करे निष्काम, जो वह फल से मुक्त हो।
माया मिले न राम, मन में पाले अहं जो।।
•••
अजमल सुल्तानपुरी की याद में -
*
हँसे फिर अपना हिंदुस्तान
विरासत गीता-ग्रंथ-कुरान
ख्वाब हम करें मुकम्मल
*
जहाँ खुसरो कबीर हैं साथ
ताज बीबी के कान्हा नाथ
एक रामानुज औ' रैदास
ईसुरी जगनिक बिना उदास
प्रवीणा केशव का अरमान
यहीं है अपना हिंदुस्तान
ख्वाब हम करें मुकम्मल
*
शारदा पूत अलाउद्दीन
सिखाते रविशंकर को बीन
यहीं होली-दीवाली-ईद
जिए मर सेंखों वीर हमीद
यहीं तुलसी रहीम रसखान
यहीं है अपना हिंदुस्तान
ख्वाब मिल करें मुकम्मिल
*
बँटे पर मिटे नहीं ज़ज़्बात
बदल लेंगे फिर से हालात
हमारा धर्म दीन इंसान
बसे कंकर-कंकर भगवान
मोहब्बत ही अपना ईमान
यहीं है अपना हिंदुस्तान
ख्वाब फिर करें मुकम्मिल
*
यहीं पर खिले धूल में फूल
मिटा दे नफरत प्रेम-त्रिशूल
एक केरल-कश्मीर न भिन्न
पूर्व-पश्चिम हैं संग अभिन्न
शक्ति-शिव, राम-सिया में जान
यहीं है अपना हिंदुस्तान
ख्वाब फिर करें मुकम्मिल
*
यहीं गौतम गाँधी गुरुदेव
विवेकानंद कलाम सदैव
बताते जला प्रेम का दीप
बनो मोती जीवन है सीप
लिखें इतिहास नया है आन
यही है अपना हिंदुस्तान
ख्वाब हम करें मुकम्मिल
३०-१-२०२०
***
छंद सलिला
मत्तगयंद सवैया
*
आज कहें कल भूल रहे जुमला बतला छलते जनता को
बाप-चचा चित चुप्प पड़े नित कोस रहे अपनी ममता को
केर व बेर हुए सँग-साथ तपाक मिले तजते समता को
चाह मिले कुरसी फिर से ठगते जनको भज स्वाराथता को
*
विमर्श
वीरांगना पद्मिनी का आत्मोत्सर्ग और फिल्मांकन
*
जिन पौराणिक और ऐतिहासिक चरित्रों से मानव जाति सहस्त्रों वर्षों तक प्रेरणा लेती रही है उनकी विश्वसनीयता पर प्रश्न चिन्ह लगाना और उन्हें केंद्र में रखकर मन-माने तरीके से फिल्मांकित करना गौरवपूर्ण इतिहास के साथ खिलवाड़ करने के साथ-साथ उन घटनाओं और व्यक्तित्वों से सदियों से प्रेरणा ले रहे असंख्य मानव समुदाय को मानसिक आघात पहुँचाने के कारण जघन्य अपराध है. ऐसा कृत्य समकालिक जन सामान्य को आहत करने के साथ-साथ भावी पीढ़ी को उसके इतिहास, जीवन मूल्यों, मानकों, परम्पराओं आदि की गलत व्याख्या देकर पथ-भ्रष्ट भी करता है. ऐसा कृत्य न तो क्षम्य हो सकता है न सहनीय.
अक्षम्य अपराध
राजस्थान ही नहीं भारत के इतिहास में चित्तौडगढ की वीरांगना रानी पद्मावती को हथियाने की अलाउद्दीन खिलजी की कोशिशों, राजपूतों द्वारा मान-रक्षा के प्रयासों, युद्ध टालने के लिए रानी का प्रतिबिम्ब दिखाने, मित्रता की आड़ में छलपूर्वक राणा को बंदी बनाने, गोरा-बादल के अप्रतिम बलिदान और चतुराई से बनाई योजना को क्रियान्वित कर राणा को मुक्त कराने, कई महीनों तक किले की घेराबंदी के कारण अन्न-जल का अभाव होने पर पुरुषों द्वारा शत्रुओं से अंतिम श्वास तक लड़ने तथा स्त्रियों द्वारा शत्रु के हाथों में पड़कर बलात्कृत होने के स्थान पर सामूहिक आत्मदाह 'जौहर' करने का निर्णय लिया जाना और अविचलित रहकर क्रियान्वित करना अपनी मिसाल आप है . ऐसी ऐतिहासिक घटना को झुठलाया जाना और फिर उन्हीं पात्रों का नाम रखकर उन्हीं स्थानों पर अपमान जनक पटकथा रचकर फिल्माना अक्षम्य अपराध है.
जौहर और सती प्रथा
जौहर का सती प्रथा से कोई संबंध नहीं था. जौहर ऐसा साहस है जो हर कोई नहीं कर सकता. जौहर विधर्मी स्वदेशी सेनाओं की पराजय के बाद शत्रुओं के हाथों में पड़कर बलात्कृत होने से बचने के लिए पराजित सैनिकों की पत्नियों द्वारा स्वेच्छा से किया जाता था. जौहर के ३ चरण होते थे - १. योद्धाओं द्वारा अंतिम दम तक लड़कर मृत्यु का वरण, २. जन सामान्य द्वारा खेतों, अनाज के गोदामों आदि में आग लगा देना, ३. स्त्रियों और बच्चियों द्वारा अग्नि स्नान. इसके पीछे भावना यह थी कि शत्रु की गुलामी न करना पड़े तथा शत्रु को उसके काम या लाभ की कोई वस्तु न मिले. वह पछताता रह जाए कि नाहक ही आक्रमण कर इतनी मौतों का कारण बना जबकि उसके हाथ कुछ भी न लगा.
पति की मृत्यु होने पर पत्नि स्वेच्छा से प्राण त्याग कर सती होती थी. दोनों में कोई समानता नहीं है.
हजारों पद्मिनियाँ
स्मरण हो जौहर अकेली पद्मिनी ने नहीं किया था. एक नारी के सम्मान पर आघात का प्रतिकार १५००० नारियों ने आत्मदाह कर किया जबकि उनके जीवन साथी लड़ते-लड़ते मर गए थे. ऐसा वीरोचित उदाहरण अन्य नहीं है. जब कोई अन्य उपाय शेष न रहे तब मानवीय अस्मिता और आत्म-गरिमा खोकर जीने से बेहतर आत्माहुति होती है. इसमें कोई संदेह नहीं है. ऐसे भी लाखों भारतीय स्त्री-पुरुष हैं जिन्होंने मुग़ल आक्रान्ताओं के सामने घुटने टेक दिए और आज के मुसलमानों को जन्म दिया जो आज भी भारत नहीं मक्का-मदीना को तीर्थ मानते हैं, जन गण मन गाने से परहेज करते हैं. ऐसे प्रसंगों पर इस तरह के प्रश्न जो प्रष्ठभूमि से हटकर हों, आहत करते हैं. एक संवेदनशील विदुषी से यह अपेक्षा नहीं होती. प्रश्न ऐसा हो जो पूर्ण घटना और चरित्रों के साथ न्याय करे.
आज भी यदि ऐसी परिस्थिति बनेगी तो ऐसा ही किया जाना उचित होगा. परिस्थिति विशेष में कोई अन्य मार्ग न रहने पर प्राण को दाँव पर लगाना बलिदान होता है. जौहर करनेवाली रानी पद्मिनी हों, या देश कि आज़ादी के लिए प्राण गँवानेवाले क्रांन्तिकारी या भ्रष्टाचार मिटने हेतु आमरण अनशन करनेवाले अन्ना सब का कार्य अप्रतिम और अनुकरणीय है. वीरांगना देवी पद्मिनी सदियों से देशवासियों कि प्रेरणा का स्रोत हैं. आओ बच्चों तुम्हें दिखाएँ झांकी हिंदुस्तान कि गीत में याद करें ये हैं अपना राजपुताना नाज इसे तलवारों पर ... कूद पड़ी थीं यहाँ हजारों पद्मिनियाँ अंगारों पे'.
आत्माहुति पाप नहीं
मुश्किलों से घबराकर समस्त उपाय किये बिना मरना कायरता और निंदनीय है किन्तु समस्त प्रयास कर लेने के बाद भी मानवीय अस्मिता और गरिमा सहित जीवन संभव न हो अथवा जीवन का उद्देश्य पूर्ण हो गया हो तो मृत्यु का वरण कायरता या पाप नहीं है.
देव जाति को असुरों से बचाने के लिए महर्षि दधीचि द्वारा अस्थि दान कर प्राण विसर्जन को गलत कैसे कहा जा सकता है?
क्या जीवनोद्देश्य पूर्ण होने पर भगवन राम द्वारा जल-समाधि लेने को पाप कहा जायेगा?
क्या गांधी जी, अन्ना जी आदि द्वारा किये गए आमरण अनशन भी पाप कहे जायेंगे?
एक सैनिक यह जानते हुए भी कि संखया और शास्त्र बल में अधिक शत्रु से लड़ने पर मारा जायेगा, कारन पथ पर कदम बढ़ाता है, यह भी मृत्यु का वरण है. क्या इसे भी गलत कहेंगी?
जैन मतावलंबी संथारा (एक व्रत जिसमें निराहार रहकर प्राण त्यागते हैं) द्वारा म्रत्यु का वरण करते हैं. विनोबा भावे ने इसी प्रकार देह त्यागी थी वह भी त्याज्य कहा जायेगा?
हर घटना का विश्लेषण आवश्यक है. आत्मोत्सर्ग को उदात्ततम कहा गया है.
सोचिए-
एक पति के साथ पत्नि के रमण करने और एक वैश्य के साथ ग्राहक के सम्भोग करने में भौतिक क्रिया तो एक ही होती है किन्तु समाज और कानून उन्हें सामान नहीं मानता. एक सर्व स्वीकार्य है दूसरी दंडनीय. दैहिक तृप्ति दोनों से होती हो तो भी दोनों को समान कैसे माना जा सकता है?
अपने जीवन से जुडी घटनाओं में निर्णय का अधिकार आपका है या आपसे सदियों बाद पैदा होनेवालों का?
एक अपराधी द्वारा हत्या और सीमा पर सैनिक द्वारा शत्रु सैनिक कि हत्या को एक ही तराजू पर तौलने जैसा है यह कुतर्क. वीरगाथाकाल के जीवन मूल्यों की कसौटी पर जौहर आत्महत्या नहीं राष्ट्र और जाति के स्वाभिमान कि रक्षा हेतु उठाया गया धर्म सम्मत, लोक मान्य और विधि सम्मत आचरण था जिसके लिए अपार साहस आवश्यक था. १५००० स्त्रियों का जौहर एक साथ चाँद सेकेण्ड में नहीं हो सकता था, न कोई इतनी बड़ी संख्या में किसी को बाध्य कर सकता था. सैकड़ों चिताओं पर रानी पद्मावती और अन्य रानियों के कूदने के बाद शेष स्त्रियाँ अग्नि के ताप, जलते शरीरों कि दुर्गन्ध और चीख-पुकारों से अप्रभावित रहकर आत्मोत्सर्ग करती रहीं और उनके जीवनसाथी जान हथेली पर लेकर शत्रु से लड़ते हुई बलिदान की अमर गाथा लिख गए जिसका दूसरा सानी नहीं है. यदि यह गलत होता तो सदियों से अनगिनत लोग उन स्थानों पर जाकर सर न झुका रहे होते.
अपने जीवन में नैतिक मूल्यों का पालन न करने वाले, सिर्फ मौज-मस्ती और धनार्जन को जीवनोद्देश्य माननेवाले अभिव्यक्ति कि स्वतंत्रता कि आड़ में सामाजिक समरसता को नष्ट कर्ण का प्रयास कैसे कर सकते हैं? लोक पूज्य चरित्रों पर कीचड उछालने कि मानसिकता निंदनीय है. परम वीरांगना पद्मावती के चरित्र को दूषित रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास सिर्फ निंदनीय नहीं दंडनीय भी है. शासन-प्रशासन पंगु हो तो जन सामान्य को ही यह कार्य करना होगा.
***
ऋतुएँ और मौसम
*
ऋतु एक वर्ष से छोटा कालखंड है जिसमें मौसम की दशाएँ एक खास प्रकार की होती हैं। यह कालखण्ड एक वर्ष को कई भागों में विभाजित करता है जिनके दौरान पृथ्वी के सूर्य की परिक्रमा के परिणामस्वरूप दिन की अवधि, तापमान, वर्षा, आर्द्रता इत्यादि मौसमी दशाएँ एक चक्रीय रूप में बदलती हैं। मौसम की दशाओं में वर्ष के दौरान इस चक्रीय बदलाव का प्रभाव पारितंत्र पर पड़ता है और इस प्रकार पारितंत्रीय ऋतुएँ निर्मित होती हैं यथा पश्चिम बंगाल में जुलाई से सितम्बर तक वर्षा ऋतु होती है, यानि पश्चिम बंगाल में जुलाई से अक्टूबर तक, वर्ष के अन्य कालखंडो की अपेक्षा अधिक वर्षा होती है। इसी प्रकार यदि कहा जाय कि तमिलनाडु में मार्च से जुलाई तक गृष्म ऋतु होती है, तो इसका अर्थ है कि तमिलनाडु में मार्च से जुलाई तक के महीने साल के अन्य समयों की अपेक्षा गर्म रहते हैं। एक ॠतु = २ मास। ऋतु साैर अाैर चान्द्र दाे प्रकार के हाेते हैं। धार्मिक कार्य में चन्द्र ऋतुएँ ली जाती हैं।
ऋतु चक्र-
भारत में मुख्यतः छः ऋतुएँ मान्य हैं -१. वसन्त (Spring) चैत्र से वैशाख (वैदिक मधु -माधव) मार्च से अप्रैल, २. ग्रीष्म (Summer) ज्येष्ठ से आषाढ (वैदिक शुक्र- शुचि) मई से जून, ३. वर्षा (Rainy) श्रावन से भाद्रपद (वैदिक नभः- नभस्य) जुलाई से सितम्बर, ४, शरद् (Autumn) आश्विन से कार्तिक (वैदिक इष- उर्ज) अक्टूबर से नवम्बर, ५. हेमन्त (pre-winter) मार्गशीर्ष से पौष (वैदिक सहः-सहस्य) दिसम्बर से 15 जनवरी, ६. शिशिर (Winter) माघ से फाल्गुन (वैदिक तपः-तपस्य) 16 जनवरी से फरवरी।
ऋतु परिवर्तन का कारण पृथ्वी द्वारा सूर्य के चारों ओर परिक्रमण और पृथ्वी का अक्षीय झुकाव है। पृथ्वी का डी घूर्णन अक्ष इसके परिक्रमा पथ से बनने वाले समतल पर लगभग ६६.५ अंश का कोण बनता है जिसके कारण उत्तरी या दक्षिणी गोलार्धों में से कोई एक गोलार्द्ध सूर्य की ओर झुका होता है। यह झुकाव सूर्य के चारो ओर परिक्रमा के कारण वर्ष के अलग-अलग समय अलग-अलग होता है जिससे दिन-रात की अवधियों में घट-बढ़ का एक वार्षिक चक्र निर्मित होता है। यही ऋतु परिवर्तन का मूल कारण बनता है।
विश्व में भारत ही एक ऐसा देश है जहां समय-समय पर छः ऋतुएँ (Six Types of Ritu) अपनी छटा बिखेरती हैं। प्रत्येक ऋतु दो मास की होती है।
चैत (Chaitra) और बैसाख़ (Baishakh) में बसंत ऋतु (Basant Ritu) अपनी शोभा का परिचय देती है। इस ऋतु को ऋतुराज (Rituraj) की संज्ञा दी गयी है। धरती का सौंदर्य इस प्राकृतिक आनंद के स्रोत में बढ़ जाता है। रंगों का त्यौहार होली बसंत ऋतु (Vasant) की शोभा को दुगना कर देता है। हमारा जीवन चारों ओर के मोहक वातावरण को देखकर मुस्करा उठता है।
ज्येष्ठ -आषाण ( ग्रीष्म ऋतु) में सू्र्य उत्तरायण की ओर बढ़ता है। ग्रीष्म ऋतु प्राणी मात्र के लिये कष्टकारी अवश्य है पर तप के बिना सुख-सुविधा को प्राप्त नहीं किया जा सकता। यदि गर्मी न पड़े तो हमें पका हुआ अन्न भी प्राप्त न हो।
श्रावण -भाद्र (वर्षा ऋतु) में मेघ गर्जन के साथ मोर नाचते हैं । तीज, रक्षाबंधन आदि त्यौहार (Festivals) इस ऋतु में आते हैं।
अश्विन (Ashvin) और कातिर्क (Kartik) के मास शरद ऋतु (Sharad Ritu) के मास हैं। शरद ऋतु प्रभाव की दृश्र्टि से बसंत ऋतु का ही दूसरा रूप है। वातावरण में स्वच्छता का प्रसार दिखा़ई पड़ता है। दशहरा (Dussehra) और दीपावली (Dipawali) के त्यौहार इसी ऋतु में आते हैं।
मार्गशीर्ष (Margshirsh) और पौष (Paush) हेमन्त ऋतु (Hemant Ritu) के मास हैं। इस ऋतु में शरीर प्राय स्वस्थ रहता है। पाचन शक्ति बढ़ जाती है।
माघ (Magh) और फाल्गुन (Falgun) शिशिर अर्थात पतझड़ (Shishir / Patjhar Ritu) के मास हैं। इसका आरम्भ मकर संक्राति (Makar Sankranti) से होता है। इस ऋतु में प्रकृति पर बुढ़ापा छा जाता है। वृक्षों के पत्ते झड़ने लगते हैं। चारों ओर कुहरा छाया रहता है।
भारत को भूलोक का गौरव तथा प्रकृति का पुण्य स्थल कहा गया है। इस प्रकार ये ऋतुएं जीवन रुपी फलक के भिन्न- भिन्न दृश्य हैं, जो जीवन में रोचकता, सरसता और पूर्णता लाती हैं।
ऋतु और राग- शिशिर - भैरव, बसंत - हिंडोल, ग्रीष्म - दीपक, वर्षा - मेघ, शरद - मलकन, हेमंत - श्री।
***
वासव जातीय अष्ट मात्रिक छंद
१. पदांत यगण
सजन! सजाना
सजनी! सजा? ना
काम न आना
बात बनाना
रूठ न जाना
मत फुसलाना
तुम्हें मनाना
लगे सुहाना
*
२. पदांत मगण
कब आओगे?
कब जाओगे?
कब सोओगे?
कब जागोगे?
कब रुठोगे?
कब मानोगे?
*
बोला कान्हा:
'मैया मोरी
तू है भोरी
फुसलाती है
गोपी गोरी
चपला राधा
बनती बाधा
आँखें मूँदे
देखे आधा
बंसी छीने
दौड़े-आगे
कहती ले लो
जाऊँ, भागे
*
३. पदांत तगण
सृजन की राह
चले जो चाह
न रुकना मीत
तभी हो वाह
न भय से भीत
नहीं हो डाह
मिले जो कष्ट
न भरना आह
*
४. पदांत रगण
रहीं बच्चियाँ
नहीं छोरियाँ
न मानो इन्हें
महज गोरियाँ
लगाओ नहीं
कभी बोलियाँ
न ठेलो कहीं
उठा डोलियाँ
*
५. पदांत रगण
जब हो दिनांत
रवि हो प्रशांत
पंछी किलोल
होते न भ्रांत
संझा ललाम
सूराज सुशांत
जाते सदैव
पश्चिम दिशांत
(छवि / मधुभार छंद)
*
६. पदांत भगण
बजता मादल
खनके पायल
बेकल है दिल
पड़े नहीं कल
कल तक क्यों हम
विलग रहें कह?
विरह व्यथा सह
और नहीं जल
*
७. पदांत नगण
बलम की कसम
न पालें भरम
चलें साथ हम
कदम दर कदम
न संकोच कुछ
नहीं है शरम
सुने सच समय
न रूठो सनम
*
८. पदांत सगण
जब तक न कहा
तब तक न सुना
सच ही कहना
झूठ न सहना
नेह नरमदा
बनकर बहना
करम चदरिया
निरमल तहना
सेवा जन की
करते रहना
शुचि संयम का
गहना गहना
३०-१-२०१७
***
खून के धब्बे धुलेंगे प्रेम की बारिश के बाद
तसलीस (उर्दू त्रिपदी)
सूरज
*
बिना नागा निकलता है सूरज,
कभी आलस नहीं करते देखा.
तभी पाता सफलता है सूरज..
*
सुबह खिड़की से झाँकता सूरज,
कह रहा जग को जीत लूँगा मैं.
कम नहीं खुद को आंकता सूरज..
*
उजाला सबको दे रहा सूरज,
कोई अपना न पराया कोई.
दुआएं सबकी ले रहा सूरज..
*
आँख रजनी से चुराता सूरज,
बाँह में एक, चाह में दूजी.
आँख ऊषा से लड़ाता सूरज..
*
जाल किरणों का बिछाता सूरज,
कोई चाचा न भतीजा कोई.
सभी सोयों को जगाता सूरज..
*
भोर पूरब में सुहाता सूरज,
दोपहर-देखना भी मुश्किल हो.
शाम पश्चिम को सजाता सूरज..
*
काम निष्काम ही करता सूरज,
मंजिलें नित नयी वरता सूरज.
खुद पे खुद ही नहीं मरता सूरज..
*
अपने पैरों पे ही बढ़ता सूरज,
डूबने हेतु क्यों चढ़ता सूरज?
भाग्य अपना खुदी गढ़ता सूरज..
*
लाख़ रोको नहीं रुकता सूरज,
मुश्किलों में नहीं झुकता सूरज.
मेहनती है नहीं चुकता सूरज..
***
लघुकथा -
अँगूठा
*
शत-प्रतिशत साक्षरता के नीति बनकर शासन ने करोड़ों रुपयों के दूरदर्शन, संगणक, लेखा सामग्री, चटाई, पुस्तकें , श्याम पट आदि खरीदे। हर स्थान से अधिकारी कर्मचारी सामग्री लेने भोपाल पहुँचे जिन्हें आवागमन हेतु यात्रा भत्ते का भुगतान किया गया। नेताओं ने जगह-जगह अध्ययन केन्द्रों का उद्घाटन किया, संवाददताओं ने दूरदर्शन और अख़बारों पर सरकार और अधिकारियों की प्रशंसा के पुल बाँध दिये। कलेक्टर ने सभी विभागों के शासकीय अधिकारियों / कर्मचारियों को अध्ययन केन्द्रों की गतिविधियों का निरीक्षण कर प्रतिवेदन देने के आदेश दिये।
हर गाँव में एक-एक बेरोजगार शिक्षित ग्रामीण को अध्ययन केंद्र का प्रभारी बनाकर नाममात्र मानदेय देने का प्रलोभन दिया गया। नेताओं ने अपने चमचों को नियुक्ति दिला कर अहसान से लाद दिया। खेतिहर तथा अन्य श्रमिकों के रात में आकर अध्ययन करना था। सवेरे जल्दी उठकर खा-पकाकर दिन भर काम कर लौटने पर फिर राँध-खा कर आनेवालों में पढ़ने की दम ही न बाकी रहती। दो-चार दिन में शौकिया आनेवाले भी बंद हो गये। प्रभारियों को दम दी गयी कि ८०% हाजिरी और परिणाम न होने पर मानदेय न मिलेगा। मानदेय की लालच में गलत प्रवेश और झूठी हाजिरी दिखा कर खाना पूरी की गयी। अब बारी आयी परीक्षा की।
कलेक्टर ने शिक्षाधिकारी से आदेश प्रसारित कराया कि कार्यक्रम का लक्ष्य साक्षरता है, विद्वता नहीं। इसे सफल बनाने के लिये अक्षर पहचानने पर अंक दें, शब्द के सही-गलत होने को महत्व न दें। प्रभारियों ने अपने संबंधियों और मित्रों के उनके भाई-बहिनों सहित परीक्षा में बैठाया की परिणाम न बिगड़े। कमल को कमाल, कलाम और कलम लिखने पर भी पूरे अंक देकर अधिक से अधिक परिणाम घोषित किये गये। अख़बारों ने कार्यक्रम की सफलता की खबरों से कालम रंग दिये। भरी-भरकम रिपोर्ट राजधानी गयी, कलेक्टर मुख्य मंत्री स्वर्ण पदक पाकर प्रौढ़ शिक्षा की आगामी योजनाओं हेतु शासकीय व्यय पर विदेश चले गये। प्रभारी अपने मानदेय के लिये लगाते रहे कलेक्टर कार्यालय के चक्कर और श्रमिक अँगूठा।
***
लघुकथा -
जनसेवा
*
अंतर्राष्ट्रीय बाजार में पैट्रोल-डीजल की कीमतें घटीं। मंत्रिमंडल की बैठक में वर्तमान और परिवर्तित दर से खपत का वर्ष भर में आनेवाले अंतर का आंकड़ा प्रस्तुत किया गया। बड़ी राशि को देखकर चिंतन हुआ कि जनता को इतनी राहत देने से कोई लाभ नहीं है। पैट्रोल के दाम घटे तो अन्य वस्तुओं के दाम काम करने की माँग कर विपक्षी दल अपनी लोकप्रियता बढ़ा लेंगे।
अत:, इस राशि का ९०% भाग नये कराधान कर सरकार के खजाने में डालकर विधायकों का वेतन-भत्ता आदि दोगुना कर दिया जाए, जनता तो नाम मात्र की राहत पाकर भी खुश हो जाएगी। विरोधी दल भी विधान सभा में भत्ते बढ़ाने का विरोध नहीं कर सकेगा।
ऐसा ही किया गया और नेतागण दत्तचित्त होकर कर रहे हैं जनसेवा।
३०-१-२०१६
***
मुक्तक
सांध्य सुंदरी ने मुस्काकर किया क्षितिज का अभिनंदन।
अस्ताचलगामी रवि बोला भू को कर नत शिर वंदन।।
दूब पौध तरु नीड़ जीव जड़-चेतन का जीवन आधार-
सहस किरण-कर से करता मैं नित अर्पित कुंकुम चंदन।।
३०.१.२०१५

*** 

शुक्रवार, 9 जनवरी 2026

जनवरी ९, सॉनेट, राधोपनिषद, राउत नाचा, हास्य, तसलीस, सूरज, सड़क, गीत, पूर्णिका, समीक्षा

सलिल सृजन जनवरी ९
पूर्णिका
जो सत्ता में वही मनस्वी
उससे बड़ा न कहीं तपस्वी
.
माल कमाया कहाँ-किस तरह
कभी न खोले राज धनस्वी
.
मैले मन की करे न चिंता
तन दमकाए नित्य तनस्वी
.
कहता-वारिस है कबीर का
कवयित्री को छेड़ रसस्वी
.
पढ़े और की, अपनी कहकर
ताली पाने सदा कविस्वी
.
बने मियाँ मिट्ठू अपने मुँह
निज करनी को छिपा छलस्वी
.
'सलिल' विमल रहता हो प्रवहित
कर प्रभु का अभिषेक यशस्वी
९.१.२०२६
०००
सॉनेट
गौरैया कलरव करे, तुलसी जाए झूम,
बरगद बब्बा खाँसते, पीपल कक्का मौन,
इमली दादी टेरतीं, चैया देगा कौन,
ठुमक गिलहरी नाचती, नन्हें शिशु को चूम।।
बया-कबूतर मचाते, बैठ मुँडेरे धूम।
शुगर समझ के डालती, नीम बहुरिया नौन।
ननद चमेली मजा ले, देख तमाशा भौन।।
बिखरी लट-बिंदी कहे, बिना कहे जो राज,
सदा सुहागन लाज से, हुई लाल रतनार,
चूड़ी खनक खनक कहे, भाया चंपा खूब।
बैंगन देवर खिजाता, शीश सजाए ताज,
बिन पेंदी का लुढ़कता, आलू खाता खार,
भोर भई सूरज-उषा, हँसे हर्ष में डूब।
९.१.२०२४
•••
राधोपनिषद
*
शंख विष्णु का घोष सुन, क्षीर सिंधु दधि मग्न।
रमा राधिका रुक्मिणी, है हरि साथ निमग्न।।
ब्रह्म साथ जो प्रगटते, वे वैकुण्ठी मित्र।
विविध रूप धर प्रगटते, है यह सत्य विचित्र।।
नीलांबर प्रभु-छत्र है, व्यास आदि वंदन करें।
प्रभु महिमा का गान, करें सिंधु भव वे तरें।।
गदा कालिका, धनुष है, माया शर है काल।
कमल धरें लीला करें, भक्ति धारते भाल।।
गोप-गोपियों से नहीं, भिन्न आप गोपाल।
स्वर्ग निवासी अवतरे, प्रभु के संग निहाल।।
कृष्ण धाम वैकुण्ठ है, जाने देहातीत।
राम-कृष्ण दोउ एक हैं, दो हों भले प्रतीत।।
भू पर आ वैकुण्ठ खुद, सत-रज-तम धरकर रूप।
प्रभु के साथ सतत रहे, है यह कथा अनूप।।
गूढ़ अर्थ सरला जमुन, रहें शारदा साथ।
कर संकल्प दाधीच सम, रानी थामे हाथ।।
वेद ऋचाएँ बन गईं, गोपी-रानी आप।
सत्यभामा भू रूप धर, सकीं कृष्ण में व्याप।।
देव कृष्ण सान्निन्ध्य पा, धन्य हो गए आप।
सलिल कृष्ण अभिषेक कर, तरा जमुन में व्याप।।
राधातापनीयोपनिषद
राधा पूजन क्यों करें, दे प्रकाश आदित्य।
कहें शक्ति दैवत्व की, है राधा भवितव्य।।
सकल जीव अस्तित्व में, राधा-शक्ति सुहेतु।
हैं इन्द्रियाँ समस्त सुर, चेष्टा राधा सेतु।।
भू भुव: स्व: आहुती, राधा शक्ति प्रणम्य।
राधा-कृष्ण न भिन्न हैं, युगल रूप अति रम्य।।
श्रुतियाँ विनत नमन करें, हो राधिका प्रसन्न।
कृष्ण आप सेवक बनें, चाहें कृपा विपन्न।।
दिव्य रासलीला निरख, भूले जस अस्तित्व।
अंक बसे श्रीकृष्ण जी, बिसरा दें निज स्वत्व।।
त्रय सप्तक स्वर सप्त मिल, गाएँ राधा-कीर्ति।
शक्ति-शक्तिधर एक हैं, भले दिखें दो मूर्ति।।
९.१.२०२३
***
छत्तीसगढ़ी रास राउत नाचा
*
छत्तीसगढ़ की लोकनृत्य की परंपरा में राउत नाचा ( अहीर नृत्य, मड़ई) का महत्वपूर्ण स्थान है। राउत नाचा नंद ग्राम के गोप-गोपिकाओं के साथ कृष्ण द्वारा गौ चरवाहे के रूप में गोवर्धन व कालिंदी के तट पर किए गए नृत्य नाट्य का ही रूपांतरित रूप है जो पार (दोहे) बोलकर कृष्ण भक्ति को अभिव्यक्त करने हेतु तन्मयता के साथ नृत्य प्रस्तुत कर भावातिरेक प्रसन्नता प्रदर्शित करते हैं। उनके विशेष परिधान में धोती के साथ सलूखा, जैकेटनुमा रंग-बिरंगा चमकदार आस्किट, पगड़ी या मुराठा बाँधकरकर गुलाबी, बैगनी, हरे, नीले रंग की कलगी व मयूरपंख खोंसे (लगाए) रहते हैं। साथ में बाँसुरी, सिंग बाजा, डाफ, टिमकी, गुरदुम, मोहरी, झुनझुना जैसे वाद्य यंत्र पंचम स्वर तक पहुँच कर नए दोहा पारने के अंतराल तक रुके रहते हैं और दोहा पारते ही वाद्य के साथ रंग-बिरंगे लउठी और फरी (लोहे का कछुआ आकृति का ढ़ाल जिसके ऊपरी सिरे पर अंकुश होता है जो ढाल के साथ-साथ नजदीकी लड़ाई या आक्रमण या सुरक्षा के समय अस्र के रूप में उपयोग किया जाता है) के साथ योद्धा की मुद्रा में शौर्य नृत्य करते हैं।
राउत प्रकृति से शांत व गौसेवक के रूप में धार्मिक-सहिष्णु होते हैं। पहले अलग-अलग गोलों में नाचते हुए पुरानी रंजिश को लेकर पहले मातर, मड़ई आपस में खूब झगड़ा करते थे। आजकल मंचीय व्यवस्था होने से वे कम झगड़ते हैं। हाथ में लाठी व ढाल के अस्त्र उन्हें योद्धा का रूप देता है और वे दोहा और वाद्य यंत्रों के थाप पर आक्रमण और बचाव करने के नाना रूपों में शौर्य नृत्य करते हैं। पहले दैहान में खोड़हर गाड़कर मातर पूजन करते हुये लोग खोड़हर के चारों ओर घूमते हुये गोल या दल बना कर राउत नृत्य करते थे। तात्कालीन मंत्री स्व. बी. आर. यादव जी के प्रयास से १९७७ से बिलासपुर में राउत नृत्य का नया रूप सामने आय। जब विविध गाँवों से आए राउत नाचा दल गोल बिलासपुर में रउताई नृत्य करते हुए शनीचरी का चक्कर लगाते थे। उनमें व्यक्तिगत व सामूहिक दुश्मनी लड़ाई में बदल जाती थी। इस दुश्मनी को समाप्त करने सभी गोल के लोगों के पढ़े-लिखे प्रमुखों के मध्य एक बैठक कर इस नृत्य को एक सांस्कृतिक मंच का रूप दिया गया। मंच के लिए सार्वजनिक संस्कृति समिति गठितकर शहर कोतवाली के पास राउत नृत्य का आयोजन किया जाने लगा। स्थान कम पड़ने पर राउत नृत्य मंच का स्थान बदल कर लालबहादुर शास्त्री विद्यालय के मैदान में पहले लकड़ी का मंच और बाद में ईंट-सीमेंट का पक्का मंच बनाकर राउत नाचा आयोजित किया जाने लगा। एक समय इन गोलों की संख्या सौ से ऊपर तक पहुँच गई थी किंतु ग्रामीण नवयुवकों के शहर की ओर पलायन के कारण अब राउत नाचा का अभ्यास करने वाले लोग कम संख्या में मिलते हैं। आजकल लगभग पचास नृत्य गोल (दल) रह गए हैं। इन गोलों की वृद्धि एवं संरक्षण हेतु प्रयास किए जाना आवश्यक है।
छेरता पूष पुन्नी के दिन सुबह घर-घर जाकर छेर-छेरता (शाकंभरी माँ और वामन देव के रूप में) दान याचना कर, दानदाता गृहस्थ किसान को अन्न धन से भंडार भरने व क्लेश से बचे रहने का आशीर्वाद देते हैं। इन आयोजनों में बतौर सुरक्षा पुलिस साथ रहती है जो भीड़ नियंत्रण व लोगों के अनधिकृत प्रवेश पर रोक लगाती है। इससे बाहर से आनेवाले यादव समाज का एक वर्ग नाराज रहता है। ७२ वर्षीय डा. मंतराम यादव ने राउत नाचा को १९९२-९३ से सांस्कृतिक मंच अहीर नृत्य कला परिषद का गठन, साहित्य सृजन हेतु रउताही स्मारिका प्रकाशन तथा साहित्यकार सम्मान का कर नाराज व असंतुष्ट वर्ग को विश्वास में लेकर देवरहट में अहीर नृत्य मंच आरंभ किया। उनके दादा जी के पास लगभग चार सौ गायें थीं तब छुरिया कलामी, लोरमी के जंगलों में दैहान-गोठान में गाय रखते थे। सभी गायें देशी थीं तथा एक गाय एक से डेढ़ लीटर दूध देती थी। औषधीय घास पत्ते, जड़ी बूटी चरने के कारण उनका दूध पौष्टिक व रोह दूर करनेवाला होता था। उउनके पूर्वज नाथ पंथी थे। जंगली हिंसक पशुओं से बचने के लिए नाथपंथी मंत्र (साबर मंत्र) जो वशीकरण मंत्र होता था से अपनी रक्षा कर लेते थे। दादा जी वैदकी जानते थे और सामान्य रोगों जैसे लाल आँखी हो जाना आदि को फूँककर तथा एक थपरा (तमाचा) मारकर शर्तिया ठीक कर दिया करते थे। दादा जी पशुओं का भी इलाज करते थे। पशुधन की महामारी से रक्षा करने के लिए सावन के सोमवार व गुरुवार को गाँव बाँधते थे। बैगा के साथ लोहार सभी घर के दरवाजे पर लोहे की कील ठोंकते थे, राउत लोग नीम पत्ता की डंडी बाँधकर अभिमंत्रित दही-मही छींटते थे। कोठा में ठुँआ (अर्जुन के बारह नाम लिखकर) टाँगने का टोटका करते थे। ठुँआ में आग को मंत्र से बाँधकर उस पर नंगे पैर चलते हैं। जैसे ज्वाला देवी की आग से पानी उबलता है पर पानी गर्म नहीं लगता उसी तंत्र का प्रकारांतर है ठुँआ। उनके पिता जी बारह भाई-बहन में सबसे छोटे थे तथा उनके पास दंवरी करने के लिए पर्याप्त बैल थे। आज भी बिलासपुर स्थित उनके घर में सात गोधन हैं। आजकल बच्चों में गौ सेवा में रुझान कम हो होते जाना चिंता का विषय है। गौ सेवा आर्यधर्म होने के कारण सभी हिंदुओं व विशेष कर नाथ परंपरा का पवित्र कर्म है।
आजकल लोग गायों को हरी घास, पैरा, कुट्टी नहीं खिलाकर जूठन या रोटी सब्जी, दाल, फास्टफुड, बिस्किट, ब्रेड आदि कुछ भी खिलाकर गौ सेवा का भाव प्रदर्शित करते हैं। धनपुत्रों द्वारा गौ शालाओं के लिए होटलों से सौ रोटी बनवाकर गौ सेवा का पुण्य कमाने का अहं दिखाने के स्थान पर हरी घास प्रदाय की व्यवस्था की जाए तो शुद्ध आयुर्वेदिक दुग्ध व पवित्र गोबर की प्राप्ति हो तथा घसियारों (घास की खेती वकरने वालों) को रोजगार मिले। अन्न आदि भोजन का गौ स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। देशी भारतीय गाय व संकर नस्ल की विदेशी गायों के दुग्ध व गोबर की गुणवत्ता में अंतर साफ दिखता है जिसे आम उपभोक्ता नजरंदाज करते दिख रहे है। गोबर में मैत्रेय जैविक संरचना व परि शोधन गुण होता है तथा पवित्रता भावित गुण से युक्त होता है जबकि गौमल अपशिष्ट का दुर्गंधयुक्त हानिकारक विसर्जन होता है। जंगल में चरनेवाली देशी गाय और डेरियों से प्रदाय किए जानेवाले दूध का पान करें तो पहले से स्वाद, गाढ़ापन व तृप्ति का अनुभव होगा जबकि दूसरे में महक तथा पतलापन अनुभव होगा।
नाथ पंथ:
सनातनधर्म के बौद्ध, जैन, सिख, आदि पंथों प्राचीन नाथ पंथ है जिनमें प्रमुख नौ नाथ व चौरासी उपनाथों की परंपरा है। नाथ पंथ की शक्ति स्रोत शिव (केदारनाथ, अमरनाथ, भोलेनाथ, भैरवनाथ,गोरखनाथ आदि) हैं। कलियुग में नाथ पंथ के प्रसिद्ध गुरु गोरखनाथ (गोरक्षनाथ) हुए हैं। लोकश्रुति के अनुसार गुरु गोरखनाथ का जन्म बारह वर्ष की अवस्थावाले बालक के रूप में गौ गोबर से हुआ, वे योनिज (स्त्री से उत्पन्न) नहीं थे। उन्होंने गौरक्षा के लिए जन जागरण अभियान चलाया तथा इस कार्य को साहित्य संहिताबद्ध कर अनेक ग्रंथ भी लिखे जिनमें अमवस्क, अवधूत गीता, गौरक्षक कौमुदी, गौरक्ष चिकित्सा, गौरक्ष पद्धति, गौरक्ष शतक आदि प्रमुख हैं। गुरु गोरख नाथ हठयोग सिद्ध योगी थे तथा गुरु मत्स्येंद्र नाथ के मानस पुत्र व शिव भगवान के अवतार थे। काया कल्प संपूर्णता उपरांत उन्होने समाधि ले ली। गोरखपुर में गुरु गोरखनाथ का प्रसिद्ध मंदिर है जिसके परंपरागत महंत योगी आदित्यनाथ आजकल उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री हैं।
साबर:
साबर मंत्र सरल होते हैं जो नवनाथ द्वारा मानव कल्याण के लिए बनाए गए थे। आम लोगों के जीवन की दैविक, दैविक, भौतिक ताप या समस्याओं का शमन करनेवाले इन मंत्रों की संख्या लगभग सौ करोड़ हैं। इन्हें एकांत में शुद्ध मन से शुद्ध वातावरण में सिद्ध अर्थात प्रत्येक मंत्र के लिए निर्धारित संख्या में उच्चरित कर याद कर मंत्रमुग्ध या सिद्ध किया जाता है। इन मंत्रों का प्रयोग मानव कल्याण के उद्देश्य से ही करने के गुरु निर्देश हैं, इन मंत्रों का अनुचित प्रयोग से संबंधित व्यक्ति के लिए क्षतिकारक व विपरीत प्रभाव डालने वाला होता है। इस मंत्र की सिद्धि के लिए तर्पण, न्यास, अनुष्ठान, हवन जैसे कर्मकांड की आवश्यकता नहीं पड़ती है। किसी भी जाति, वर्ण, आयु, लिंग का व्यक्ति इसकी साधना कर सकता है। इन मंत्रों का उपयोग धन, शिक्षा, प्रगति, सफलता, व्यापार व जोखिम से बचने के लिए किया जाता है। इन मंत्रों को सिद्ध योगी धमकी देकर एवं अन्य श्रद्धा भाव से प्रयोग कर सकते हैं। गुरु गोरखनाथ जी की ज्ञानगोदरी प्राप्त करने के लिए पवित्र संकल्प के साथ गौ सेवा व नाथ सेवा करनी पड़ती है।
सर्वप्रभावी मंत्र:
"ओम गुरुजी को आदेश, गुरुजी को प्रणाम, धरती माता, धरती पिता, धरनी धरे न धीर बाजे, श्रींगी बाजे, तुरतुरी आया, गोरखनाथ मीन का पूत मुंज का छड़ा लोहे का कड़ा, हमारी पीठ पीछे यति हनुमंत खड़ा,शब्द सांवा पिंड काचास्फुरो मंत्र ईश्वरो वाचा। "
भैरव मंत्र:
ॐ आदि भैरव जुगाद भैरव, भैरव है सब थाई। भैरो ब्रह्मा,भैरो ही भोला साइन।।
बाधा हरण मंत्र:
"काला कलवा चौसठ वीर वेगी आज माई, के वीर अजर तोड़ो बजर तोड़ो किले का, बंधन तोड़ो नजर तोड़ मूठ तोड़ो,जहाँ से आई वहीं को मोड़ो। जल खोलो जलवाई। खोलो बंद पड़े तुपक का खोलो, घर दुकान का बंधन खोलो, बँधे खेत खलिहान खोलो, बँधा हुआ मकान खोलो, बँधी नाव पतवार खोलो। इनका काम किया न करे तो तुझको माता का दूध पिया हराम है।
माता पार्वती की दुहाई। शब्द सांचा फुरो मंत्र वाचा।"
गुरु गोरखनाथ मंत्र:
ॐ सोऽहं तत्पुरुषाय विद्यहे शिव गोरक्षाय धीमहि तन्नो गोरक्ष प्रचोदयात् ॐ।
विद्या प्राप्ति मंत्र:
ॐ नमो श्रीं श्रीं शश वाग्दाद वाग्वादिनी भगवती सरस्वती नमः स्वाहा। विद्या देहि मम ऋण सरस्वती स्वाहा।।
लक्ष्मी प्राप्ति मंत्र:
ॐ ॐ ऋं ऋं श्रीं श्रीं ॐ क्रीं कृं स्थिरं स्थिरं ॐ।
उल्लेखनीय है कि राउत नाचा करनेवाले कृष्णभक्तों और नाथ संप्रदाय के शिवभक्तों के मध्य शृद्ध-विश्वास का ताना-बाना सदियों से सामाजिक स्तर पर बना। पाश्चात्य शिक्षा प्रणाली से शिक्षित पीढ़ी मंत्र-तंत्र को त्याज्य व् अन्धविश्वास कहती है जबकि पुरानी पीढ़ी इनकी सत्यता प्रमाणित करती है। वस्तुत: किसी भी पारंपरिक विद्या परीक्षण किए बिना उसे ख़ारिज नहीं किया जाना चाहिए। राउतों द्वारा गौ के आहार पर दूध की गुणवत्ता व प्रभाव तथा शाबर मंत्रों के प्रभावों पर विज्ञान सम्मत शोध कार्य होना चाहिए। मन्त्रों का ध्वनि विज्ञान सिद्धांतों पर परिक्षण हो, उनके सामाजिक तथा वैयक्तिक प्रभाव का आकलन हो। राउत नाचा और गौपालन तथा गौ संरक्षण विद्या आधुनिक डेयरी प्रणाली के दुग्ध उत्पाद गुणवत्ता और प्रभाव पर परीक्षण जाएँ तो विज्ञान सम्मत निष्पक्ष निष्कर्ष पर सकेगा।
***
पुस्तक सलिला-
'झील अनबुझी प्यास की' : गाथा नवगीती रास की
*
[पुस्तक विवरण - झील अनबुझी प्यास की, नवगीत संग्रह, डॉ. रामसनेही लाल शर्मा 'यायावर', वर्ष २०१६, आकार डिमाई, आवरण सजिल्द जैकेट सहित, बहुरंगी, पृष्ठ १२८, मूल्य ३०० रु., उत्तरायण प्रकाशन, के ३९७ आशियाना कॉलोनी, लखनऊ २२६०१२, नवगीतकार संपर्क ८६ तिलक नगर, बाई पास रोड, फीरोजाबाद २८३२०३, चलभाष ९४१२३ १६७७९, dr.yayavar@yahoo.co.in ]
सरसता, सरलता, सहजता, सारगर्भितता तथा सामयिकता साहित्य को समय साक्षी बनाकर सर्वजनीन स्वीकृति दिलाती हैं। डॉ. रामसनेही लाल शर्मा यायावर और गीत का नाता इस निकष पर सौ टका खरा है। गीत, मुक्तक, दोहा, हाइकु, ग़ज़ल, कुण्डलिनी, निबंध, समीक्षा तथा शोध के बहुआयामी सृजन में निरंतर संलग्न यायावर जी की सत्रह प्रकाशित कृतियाँ उनके सर्जन संसार की बानगी देती हैं। विवेच्य कृति 'झील अनबुझी प्यास की' का शीर्षक ही कृति में अन्तर्निहित रचना सूत्र का संकेत कर देता है। प्यास और झील का नाता आवश्यकता और तृप्ति का है किन्तु इस संकलन के नवगीतों में केवल यत्र-तत्र ही नहीं, सर्वत्र व्याप्त है प्यास वह भी अनबुझी जिसने झील की शक्ल अख्तियार कर ली है। झील ही क्यों नदी, झरना या सागर क्यों नहीं? यहाँ नवगीतकार शीर्षक में ही अंतर्वस्तु का संकेत करता है। कृति के नवगीतों में आदिम प्यास है, यह प्यास सतत प्रयासों के बावजूद बुझ नहीं सकी है, प्यास बुझाने के प्रयास जारी हैं तथा ये प्रयास न तो समुद्र की अथाह हैं कि प्यास को डूबा दें, न नदी के प्रवाह की तरह निरंतर हैं, न झरने की तरह आकस्मिक है बल्कि झील की तरह ठहराव लिये हैं। झील की ही तरह प्यास बुझाने के प्रयासों की भी सीमा है जिसने नवगीतों का रूप ग्रहण कर लिया है।
डॉ. यायावर समाज में व्याप्त विसंगतियों और पारिस्थितिक वैषम्य को असहनीय होता देखकर चिंतित होते हैं, उनकी शिक्षकीय दृष्टि सर्व मंगल की कामना करती है। 'मातु वागीश्वरी / दूर कर शर्वरी / सृष्टि को / प्राण को / ज्योति दे निर्झरी / मन रहे इस मनुज का / सदा छलरहित / उज्ज्वलम्, उज्ज्वलम्'। डॉ. यायावर के लिये नवगीत ही नहीं सकल साहित्य साधना 'उज्ज्वलम्' की प्राप्ति का माध्यम है, वे क्रांति की भ्रान्ति से दूर सर्व मंगल की कामना करते हैं। सभ्यता, संस्कृति, संस्कार के सोपानों से मानवीय उत्थान-पतन को देख यायावर जी का नवगीतकार मन चिंतित होता है 'खिड़कियाँ खुलती नहीं / वातायनों में / राम गायब / आधुनिक रामायणों में / तख्त पर बैठे मिले / अंधे अँधेरे / जुगनुओं से हारते / उजले सवेरे / जान्हवी अब पंक से / धोई हुई है / क्या करें? / कैसे बचायें?' विसंगतियों से निराश न होकर कवि उपाय खोजने के लिये प्रवृत्त होता है।
नवगीत को खौलाती संवेदन की वर्ण-व्यंजना अथवा मोम के अश्व पर सवार होकर दहकते मैदान पर चक्कर लगाने के समान माननेवाले यायावर जी के नवगीतों में संवेदना, यथार्थ, सामाजिक सरोकार तथा संप्रेषणीयता के निकष पर खरे उतरने वाले नवगीतों में गीत से भिन्न कथ्य और शिल्प होना स्वाभाविक है। 'अटकी आँधियाँ / कलेजों में / चेहरों पर लटकी मायूसी / जन-मन विश्वास / ठगा सा है / कर गया तंत्र फिर जासूसी / 'मौरूसी हक़' पा जाने में / राजा फिर समर्थ हुआ'।
यायावर जी का प्रकृतिप्रेमी मन जीवन को यांत्रिकता के मोह-पाश में दम तोड़ते देख व्याकुल है- ' 'रोबोटों की इस दुनिया में / प्रेम कथायें / पागल हो क्या? / मल्टीप्लेक्स, मॉल, कॉलोनी / सेंसेक्स या सेक्स सनसनी / क्रिकेट, कमेंट्री, काल, कैरियर / टेररिज़्म या पुलिस छावनी / खोज रहे हो यहाँ समर्पण / की निष्ठाएँ / पागल हो क्या? / लज्जा-घूँघट, हँसता पनघट / हँसी-ठिठौली, कान्हा नटखट / भरे भवन संवाद आँख के / मान-मनौवल नकली खटपट / खोज रहे हो वही प्यार / विश्वास-व्यथाएँ / पागल हो क्या?' जीवन के दो चेहरों के बीच आदमी ही खो गया है और यही आदमी यायावर के नवगीतों का नायक अथवा वर्ण्य विषय है- 'ढूँढ़ते हो आदमी / क्या बावले हो? / इस शहर में? / माल हैं, बाजार हैं / कालोनिया हैं - ऊबते दिन रात की / रंगीनियाँ हैं / भीड़ में कुचली / मरीं संवेदनाएँ / ढूँढ़ते स्वर मातमी / क्या बावले हो? / इस शहर में?
ये विसंगतियाँ सिर्फ शहरों में नहीं अपितु गाँवों में भी बरक़रार हैं। 'खर-पतवारों के / जंगल ने / घेर लिया उपवन / आदमखोर लताएँ लिपटीं / बरगद-पीपल से / आती ही / भीषण बदबू / जूही के अंचल से / नीम उदासी में / डूबा है / आम हुआ उन्मन।' गाँव की बात हो और पर्यावरण की फ़िक्र न हो यह कैसे संभव है? आम हुआ उन्मन, पुरवा ने सांकल खटकाई, कान उमेठे हैं, मौसम हुआ मिहिरकुल, कहाँ बची, भीतर एक नदी शीर्षक नवगीतों में प्रकृति और पर्यावरण की चिंता मुखर हुई है।
कुमार रवीन्द्र के अनुसार 'नवगीत दो शब्दों 'नव' तथा 'गीत' के योग से बना है। अत:, जब गीत से नवता का संयोग होता है तो नवगीत कहा जाता है। गीत से छांदसिकता और गेयता तथा नव का अर्थ ऐसी नव्यता से है जिसमें युगबोध, यथर्थ-चिंतन, सामाजिक सरोकार और परिवेशगत संवेदना हो।' डॉ. यायावर के नवगीत आम आदमी की पक्षधरता को अपना कथ्य बनाते हैं। यह आम आदमी, शहर में हो या गाँव में, सुसंस्कृत हो या भदेस, सभ्य हो या अशिष्ट, शुभ करे या अशुभ, ऐश करे या पीड़ित हो नवगीत में केवल उपस्थित अवश्य नहीं रहता अपितु अपनी व्यथा-कथा पूरी दमदारी से कहता है। आस्था और सनातनता के पक्षधर यायावर जी धार्मिक पाखंडों और अंधविश्वासों के विरोध में नवगीत को हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं। 'गौरी माता, भोले शंकर / संतोषी मैया / सबका देंगे दाम / बताते हैं दलाल भैया / अंधी इस सुरंग के / भीतर है / लकदक दुनिया / बड़े चतुर हैं / बता रहे थे / पश्चिम के बनिया / तुमको तरह-तीन करेंगे / बड़े घाघ बनजारे हैं / गोधन-गोरस / गाय गोरसी / सबकी है कीमत / भाभी के घूँघट के बदले / देंगे पक्की छत / मंदिर की जमीन पर / उठ जायेगा / माल नया / अच्छे दिन आ गए / समझ लो / खोटा वक़्त गया / देखो / ये बाजार-मंडियां / सब इनके हरकारे हैं।'
वैश्वीकरण और बाज़ारीकरण से अस्त-व्यस्त-संत्रस्त होते जन-जीवन का दर्द-दुःख इन नवगीतों में प्रायः मुखरित हुआ है। बिक जा रामखेलावन, वैश्वीकरण पधारे हैं, इस शहर में, पागल हो क्या?, बाज़ार, क्षरण ही क्षरण बंधु आदि में यह चिंता दृष्टव्य है। मानवीय मनोवृत्तियों में परिवर्तन से उपजी विडंबनाओं को उकेरने के यायावर जी को महारथ हासिल है। धर्म और राजनीति दोनों ने आम जन की मनोवृत्ति कलुषित करने में अहं भूमिका निभायी है।यायावर जी की सूक्ष्म दृष्टि ने यह युग सत्य रजनीचर सावधान, खुश हुए जिल्लेसुभानी, आदमी ने बघनखा पहना, शल्य हुआ, मंगल भवन अमंगलहारी, सबको साधे, शेष कुशल है शीर्षक नवगीतों में व्यक्त किया है।सामाजिक मर्यादा भंग के स्वर की अभिव्यक्ति देखिए- ' घर में जंगल / जंगल में घर / केवल यही कथा / तोताराम असल में / तेरी-मेरी एक व्यथा / धृष्ट अँधेरे ने कल / सूरज बुरी तरह डाँटा / झरबेरी ने बूढ़े बरगद / को मारा चाँटा / मौसम आवारा था / लेकिन / ऐसा कभी न था।'
डॉ. यायावार हिंदी के श्रेष्ठ-ज्येष्ठ प्राध्यापक, शोध लेखक, शोध निर्देशक, समीक्षक हैं इसलिए उनका शब्द भण्डार अन्य नवगीतकारों से अधिक संपन्न-समृद्ध होना स्वाभाविक है। बतियाती, खौंखियाती, कड़खे, जिकड़ी, पुरवा, गुइयाँ, चटसार, नहान, विध्न, मैका, बाबुल, चकरघिन्नी, चीकट, सँझवाती, पाहुन, आवन, गलकटियों, ग्यावन, बरमथान, पिछौरी जैसे देशज शब्द, निर्झरी, उन्मन, दृग, रजनीचर, वैश्वीकरण, तमचर, रसवंती, अर्चनाएं, देवार्पित , निर्माल्य, वैकल्य, शुभ्राचार, साफल्य, दौर्बल्य, दर्पण, चीनांशुक, त्राहिमाम, मृगमरीचिका, दिग्भ्रमित, उद्ग्रीव, कार्पण्य, सहस्त्रार, आश्वस्ति, लाक्षाग्रह, सार्थवाह, हुताशन जैसे शुद्ध संस्कृतनिष्ठ शब्द, आदमखोर, बदबू, किस्से, जुनून, जिल्लेसुभानी, मुहब्बत, मसनद, जाम, ख्वाबघर, आलमपनाही, मनसबदार, नफासत, तेज़ाब, फरेब, तुनकमिजाजी, नाज़ुकखयाली, परचम, मंज़िल, इबारत, हादसा आदि उर्दू शब्द, माल, कार, कंप्यूटर, कमेंट्री, मल्टीप्लेक्स, कॉलोनी, सेंसेक्स, क्रिकेट, कमेंट्री, काल, कैरियर, टेरिरज़्म, फ्रिज, ओज़ोन, कैलेंडर, ब्यूटीपार्लर, पेंटिंग, ड्राइडन, ड्रेगन, कांक्रीट, ओवरब्रिज आदि अंग्रेजी शब्द अपनी पूर्ण अर्थवत्ता सहित गलबहियाँ डाले हैं. परिनिष्ठित हिंदी के आग्रहियों को ऐसे अहिन्दी शब्दों के प्रयोग पर आपत्ति हो सकती है जिनके प्रचलित हिंदी समानार्थी उपलब्ध हैं। अहिन्दी शब्दों का उपयोग करते समय उनके वचन या लिंग हिंदी व्याकरण के अनुकूल रखे गये हैं जैसे कॉलोनियों, रोबोटों आदि।
यायावर जी ने शब्द-युगलों का भी व्यापक प्रयोग किया है। मान-मनौअल, जन-मन, हँसी-ठिठोली, खट-मिट्ठी, जाना-पहचाना, राग-रंग, सुलह-संधि, छुई-मुई, व्यथा-वेदना, ईमान-धरम, सत्ता-भरम, लाज-शर्म, खेत-मड़ैया, प्यार-बलैया, अच्छी-खासी, चन-चबेना, आकुल-व्याकुल आदि शब्द युग्मों में दोनों शब्द सार्थक हैं जबकि लदा-फदा, आटर-वाटर, आत्मा-वात्मा, आँसू-वाँसू, ईंगुर-वींगुर, इज्जत-विज्जत आदि में एक शब्द निरर्थक है। लक-दक , हबड-तबड़ आदि ऐसे शब्द युग्म हैं जिनका अर्थ एक साथ रहने पर ही व्यक्त होता है अलग करने पर दोनों अंश अपना अर्थ खो देते हैं। बाँछें खिलना, राम राखे, तीन तेरह करना, वारे-न्यारे होना आदि मुहावरों का प्रयोग सहजता से किया गया है।
गुडाकेश ध्वनियाँ, पैशाचिक हुंकारें, मादक छुअन, अवतारी छवियाँ, फागुन की बातून हवाएँ, संवाद आँख के, समर्पण की निष्ठाएँ, सपनों की मरमरी कथाएं, लौह की प्राचीर, आँखों की कुटिल अँगड़ाइयाँ, कुरुक्षेत्र समर के शल्य, मागधी मंत्र जैसे मौलिक और अर्थवत्ता पूर्ण प्रयोग डॉ. यायावर की भाषिक सामर्थ्य के परिचायक हैं।केसरी खीर में कंकर की तरह कुछ मुद्रण त्रुटियाँ खटकती हैं। जैसे- खीज, छबि, वेबश, उद्वत आदि। 'सूरज बुरी तरह डाँटा' में कारक की कमी खलती है।
'समकालीन गीतिकाव्य: संवेदना और शिल्प' विषय पर डी. लिट. उपाधि प्राप्त यायावर जी का छंद पर असाधारण अधिकार होना स्वाभाविक है। विवेच्य कृति के नवगीतों में अभिनव छांदस प्रयोग इस मत की पुष्टि करते हैं। 'मंगलम्-मंगलम्' में महादैशिक, आम हुआ उन्मन में 'महाभागवत', रजनीचर सावधान में 'महातैथिक' तथा 'यौगिक', पागल हो क्या में 'लाक्षणिक' जातीय छंदों के विविध प्रकारों का प्रयोग विविध पंक्तियों में कुशलतापूर्वक किया गया है। मुखड़े और अंतरे में एक जाति के भिन्न छंद प्रयोग करने के साथ यायावर जी अँतरे की भिन्न पंक्तियों में भी भिन्न छंद का प्रयोग लय को क्षति पहुंचाए बिना कर लेते है जो अत्यंत दुष्कर है। 'इस शहर में' शीर्षक नवगीत में मुखड़ा यौगिक छंद में है जबकि तीन अंतरों में क्रमश: १२, ९, १२, ९, ९, १२ / १४, ७, १४, ७, १०, १८ तथा ७, ७, ७, ९, १२, २१ मात्रिक पंक्तियाँ है। कमाल यह कि इतने वैविध्य के बावजूद लय-भंग नहीं होती।
नवगीतों से रास रचाते यायावर जी विसंगति और विषमत तक सीमित नहीं रहते। वे नवशा एयर युग परिवर्तन का आवाहन भी करते हैं। जागेंगे कुछ / जागरण गीत / सोयेंगे हिंसा, घृणा, द्वेष / हो अभय, हँसेंगे मंगलघट / स्वस्तिक को / भय का नहीं लेश / देखेगा संवत नया कि / जन-मन / फिर से सबल-समर्थ हुआ, चलो! रक्त की इन बूंदों से / थोड़े रक्तकमल बोते हैं / महका हुए चमन होते हैं, तोड़नी होंगी / दमन की श्रंखलायें / बस तभी, आश्वस्ति के / निर्झर झरेंगे आदि अभिव्यक्तियाँ नवगीत की जनगीति भावमुद्रा के निकट हैं। चंदनगंधी चुंबन गीले / सुधाकुम्भ रसवंत रसीले / वंशी का अनहद सम्मोहन, गंध नाचती महुआ वैन में / थिरकन-सिहरन जागी मन में, नीम की कोंपल हिलातीं / मृदु हवाएँ / तितलियाँ भौरों से मिलकर / गुनगुनायें / रातरानी ने सुरभि का / पत्र भेजा, एक मुरली ध्वनि / मधुर आनंद से भरती रही / रास में डूबी निशा में / चाँदनी झरती रही / 'गीत' कुछ 'गोविन्द' के / कुछ भ्रमर के, आलिंगनों की / गन्धमय सौगात में / रात की यह उर्वशी / बाँहें पसारे आ गयी / चंद्रवंशी पुरुरवा की / देह को सिहरा गयी / नृत्यरत केकी युगल / होने लगे / सर्वस्व खोये जैसी श्रंगारिक अभिव्यक्तियों को नवगीतों में गूंथ पाना यायावर जी के ही बस की बात है।
नवगीत के संकीर्ण मानकों के पक्षधर ऐसे प्रयोगों पर भले ही नाक-भौंह सिकोड़ें नवगीत का भविष्य ऐसी उदात्त अभिव्यक्तियों से ही समृद्ध होगा। सामाजिक मर्यादाओं के विखंडन के इस संक्रमण काल में नवता की संयमित अबिव्यक्ति अपरिहार्य है। 'धनुर्धर गुजर प्रिया को / अनुज को ले साथ में / मूल्य, मर्यादा, समर्पण / शील को ले हाथ में' जैसी प्रेरक पंक्तियाँ पथ-प्रदर्शन करने में समर्थ हैं। नवगीत के नव मानकों के निर्धारण में 'झील अनबुझी प्यास की' के नवगीत महती भूमिका निभायेंगे।
९.१.२०१६
***
तुम शब्द की संजीवनी का रूप अनूठा हो
शब्द जैसे सलिल सा बहता हुआ तुम्हीं हो- पंकज त्रिवेदी
.
पंकज बिना सलिल की शोभा नहीं रहेगी
सलिला हृदय मिलन की युग-युग कथा कहेगी
***
अष्ट मात्रिक छवि छंद
*
अष्ट मैट्रिक छन्दों को ८ वसुओं के आधार पर 'वासव छंद' कहा गया है. इस छंदों के ३४ भेद सम्भव हैं जिनकी मात्र बाँट निम्न अनुसार होगी:
अ. ८ लघु: (१) १. ११११११११,
आ. ६ लघु १ गुरु: (७) २. ११११११२ ३. १११११२१, ४. ११११२११, ५. १११२१११, ६. ११२११११, ७. १२१११११, ८. २११११११,
इ. ४ लघु २ गुरु: (१५) ९. ११११२२, १०. १११२१२, ११. १११२२१, १२, ११२१२१, १३. ११२२११, १४, १२१२११, १५. १२२१११, १६. २१२१११, १७. २२११११, १८. ११२११२,, १९. १२११२१, २०. २११२११, २२. १२१११२, २३. २१११२१,
ई. २ लघु ३ गुरु: (१०) २४. ११२२२, २५. १२१२२, २६. १२२१२, २७. १२२२१, २८. २१२२१, २९. २२१२१, ३०. २२२११, ३१. २११२२, ३२. २२११२, ३३. २१२१२
उ. ४ गुरु: (१) २२२२
विविध चरणों में इन भेड़ों का प्रयोग कर और अनेक उप प्रकार हो सकते हैं.
उदाहरण:
१. करुणानिधान! सुनिए पुकार, / रख दास-मान, भाव से उबार
२. कर ले सितार, दें छेड़ तार / नित तानसेन, सुध-बुध बिसार
३. जब लोकतंत्र, हो लोभतंत्र / बन कोकतंत्र, हो शोकतंत्र
--------
दोहा का रंग : छत्तीसगढ़ी के संग
*
महतारी छत्तिसगढ़ी, बार-बार परनाम.
माथ नबावों तोरला, बनहीं बिगरे काम..
*
बंधे रथे सुर-ताल से, छत्तिसगढ़िया गीत.
किसिम-किसिम पढ़तच बनत, गारी होरी मीत..
*
कब परधाबौं अरघ दे, सुरज देंव ल गाँव.
अँधियारी मिल दूर कर, छा ले छप्पर छाँव..
*
सुख-सुविधा के लोभ बर, कस्बा-कस्बा जात.
डउका-डउकी बाँट-खुट, दू-दू दाने खात..
*
खुल्ली आँखी निहारत, हन पीरा-संताप.
भोगत हन बदलाव चुप, आँचर बर मुँह ढांप..
*
कस्बा-कस्बा जात हे, लोकाचार निहार.
टुटका-टोना-बैगई, झांग-पाग उतार..
*
शोषण अउर अकाल बर, गिरवी भे घर-घाट.
खेत-खार खाता लीहस, निगल- सेठ के ठाठ..
*
हमर देस के गाँव मा, सुनहा सुरज बिहान.
अरघ देहे बद अंजुरी, रीती- रोय किसान..
*
जिनगानी के समंदर, गाँव-गँवई के रीत.
जिनगी गुजरत हे 'सलिल', कुरिय-कुंदरा मीत..
*
महतारी भुइयाँ असल, बंदत हौं दिन-रात.
दाई! पइयां परत हौं, मूँड़ा पर धर हात..
*
जाँघर टोरत सेठ बर, चिथरा झूलत भेस.
मुटियारी माथा पटक, चेलिक रथे बिदेस..
*
बाँग देही कुकराकस, जिनगी बन के छंद.
कुररी कस रोही 'सलिल', 'मावस दूबर चंद..
*
छेंका-बांधा बहुरिया, सारी-लुगरा संग.
अंतस मं किलकत-खिलत, हँसत- गाँव के रंग..
*
गुनगुनात-गावत-सुनत, अइसन हे दिन-रात.
दोहा जिनगी के चलन, जुरे-जुरे से गात..
***
हास्य सलिला:
याद
*
कालू से लालू कहें, 'दोस्त! हुआ हैरान.
घरवाली धमका रही, रोज खा रही जान.
पीना-खाना छोड़ दो, वरना दूँगी छोड़.
जाऊंगी मैं मायके, रिश्ता तुमसे तोड़'
कालू बोला: 'यार! हो, किस्मतवाले खूब.
पिया करोगे याद में, भाभी जी की डूब..
बहुत भली हैं जा रहीं, कर तुमको आजाद.
मेरी भी जाए कभी प्रभु से है फरियाद..'
९.१.२०१४
____________________
नवगीत:
निर्माणों के गीत गुँजाएँ ...
*
चलो सड़क एक नयी बनाएँ,
निर्माणों के गीत गुँजाएँ...
*
मतभेदों के गड्ढें पाटें,
सद्भावों की मुरम उठाएँ.
बाधाओं के टीले खोदें,
कोशिश-मिट्टी-सतह बिछाएँ.
निर्माणों के गीत गुँजाएँ...
*
निष्ठा की गेंती-कुदाल लें,
लगन-फावड़ा-तसला लाएँ.
बढ़ें हाथ से हाथ मिलाकर-
कदम-कदम पथ सुदृढ़ बनाएँ.
निर्माणों के गीत गुँजाएँ...
*
आस-इमल्शन को सींचें,
विश्वास गिट्टियाँ दबा-बिछाएँ.
गिट्टी-चूरा-रेत छिद्र में-
भर धुम्मस से खूब कुटाएँ.
निर्माणों के गीत गुँजाएँ...
*
है अतीत का लोड बहुत सा,
सतहें समकर नींव बनाएँ.
पेवर माल बिछाएँ एक सा-
पंजा बारंबार चलाएँ.
निर्माणों के गीत गुँजाएँ...
*
मतभेदों की सतह खुरदुरी,
मन-भेदों का रूप न पाएँ.
वाइब्रेशन-कोम्पैक्शन कर-
रोलर से मजबूत बनाएँ.
निर्माणों के गीत गुँजाएँ...
*
राष्ट्र-प्रेम का डामल डालें-
प्रगति-पंथ पर रथ दौड़ाएँ.
जनगण देखे स्वप्न सुनहरे,
कर साकार, बमुलियाँ गाएँ.
निर्माणों के गीत गुँजाएँ..
*
श्रम-सीकर का अमिय पान कर,
पग को मंजिल तक ले जाएँ.
बनें नींव के पत्थर हँसकर-
काँधे पर ध्वज-कलश उठाएँ.
निर्माणों के गीत गुँजाएँ...
*
टिप्पणी:
१. इमल्शन = सड़क निर्माण के पूर्व मिट्टी-गिट्टी की पकड़ बनाने के लिए छिड़का जानेवाला डामल-पानी का तरल मिश्रण, पेवर = डामल-गिट्टी का मिश्रण समान समतल बिछानेवाला यंत्र, पंजा = लोहे के मोटे तारों का पंजा आकार, गिट्टियों को खींचकर गड्ढों में भरने के लिये उपयोगी, वाइब्रेटरी रोलर से उत्पन्न कंपन तथा स्टेटिक रोलर से बना दबाव गिट्टी-डामल के मिश्रण को एकसार कर पर्त को ठोस बनाते हैं, बमुलिया = नर्मदा अंचल का लोकगीत।
२. इस नवगीत की नवता सड़क-निर्माण की प्रक्रिया वर्णित होने में है।
***
तसलीस (उर्दू त्रिपदी)
सूरज
*
बिना नागा निकलता है सूरज,
कभी आलस नहीं करते देखा.
तभी पाता सफलता है सूरज..
*
सुबह खिड़की से झाँकता सूरज,
कह रहा जग को जीत लूँगा मैं.
कम नहीं खुद को आंकता सूरज..
*
उजाला सबको दे रहा सूरज,
कोई अपना न पराया कोई.
दुआएं सबकी ले रहा सूरज..
*
आँख रजनी से चुराता सूरज,
बाँह में एक, चाह में दूजी.
आँख ऊषा से लड़ाता सूरज..
*
जाल किरणों का बिछाता सूरज,
कोई चाचा न भतीजा कोई.
सभी सोयों को जगाता सूरज..
*
भोर पूरब में सुहाता सूरज,
दोपहर-देखना भी मुश्किल हो.
शाम पश्चिम को सजाता सूरज..
*
काम निष्काम ही करता सूरज,
मंजिलें नित नयी वरता सूरज.
खुद पे खुद ही नहीं मरता सूरज..
*
अपने पैरों पे ही बढ़ता सूरज,
डूबने हेतु क्यों चढ़ता सूरज?
भाग्य अपना खुदी गढ़ता सूरज..
*
लाख़ रोको नहीं रुकता सूरज,
मुश्किलों में नहीं झुकता सूरज.
मेहनती है नहीं चुकता सूरज..
९-१-२०११

***