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सोमवार, 30 नवंबर 2020

अक्षर गीत

अक्षर गीत 
संजीव   
*
अक्षर स्वर-व्यंजन सुन-पढ़-लिख 
आओ! गाएँ  अक्षर गीत। 
माँ शारद को नमस्कार कर 
शुभाशीष पा हँसिए मीत। 
स्वर : 
'अ' से अनुपम; अवनि; अमर; अब,   
'आ' से आ; आई; आबाद।
'इ' से इरा; इला; इमली; इस,    
'ई' ईश्वरी; ईख; ईजाद।   
'उ' से उषा; उजाला; उगना,  
'ऊ' से ऊर्जा; ऊष्मा; ऊन।  
'ए' से एड़ी; एक; एकता, 
'ऐ' ऐश्वर्या; ऐनक; ऐन। 
'ओ' से ओम; ओढ़नी; ओला,   
'औ' औरत; औषधि; औलाद। 
'अं' से अंक; अंग, अंगारा, 
'अ': खेल-हँस हो फौलाद।   
*
व्यंजन 
'क' से कमल; कलम; कर; करवट,
'ख' खजूर; खटिया; खरगोश।    
'ग' से गणपति; गज; गिरि; गठरी, 
'घ' से घट; घर; घाटी; घोष।  
'ङ' शामिल है वाङ्मय में 
पंचम ध्वनि है सार्थक रीत। 
अक्षर स्वर-व्यंजन सुन-पढ़-लिख 
आओ! गायें अक्षर गीत। 
*
'च' से चका; चटकनी; चमचम, 
'छ' छप्पर; छतरी; छकड़ा। 
'ज' जनेऊ; जसुमति; जग; जड़; जल,   
'झ' झबला; झमझम, झरना।   
'ञ' हँस व्यञ्जन में आ बैठा, 
व्यर्थ न लड़ना; करना प्रीत। 
अक्षर स्वर-व्यंजन सुन-पढ़-लिख 
आओ! गायें अक्षर गीत। 

'ट'  टमटम; टब; टका; टमाटर,  
'ठ' ठग; ठसक; ठहाका; ठुमरी।  
'ड' डमरू; डग; डगर; डाल; डफ, 
'ढ' ढक्कन; ढोलक; ढल; ढिबरी।
'ण' कण; प्राण; घ्राण; तृण में है  
मन लो जीत; तभी है जीत।  
अक्षर स्वर-व्यंजन सुन-पढ़-लिख 
आओ! गायें अक्षर गीत। 
*    
'त'  तकिया; तबला; तसला; तट,
'थ' से थपकी; थप्पड़; थान।  
'द' दरवाजा; दवा, दशहरा, 
'ध' धन; धरा; धनुष; धनवान।   
'न' नटवर; नटराज; नगाड़ा,  
गिर न हार; उठ जय पा मीत।  
अक्षर स्वर-व्यंजन सुन-पढ़-लिख 
आओ! गायें अक्षर गीत। 
'प' पथ; पग; पगड़ी; पहाड़; पट, 
'फ' फल; फसल; फलित; फलवान।  
'ब' बकरी; बरतन, बबूल; बस, 
'भ' से भवन; भक्त; भगवान। 
'म' मइया; मछली; मणि; मसनद,
आगे बढ़; मत भुला अतीत।
अक्षर स्वर-व्यंजन सुन-पढ़-लिख 
आओ! गायें अक्षर गीत। 
'य' से यज्ञ; यमी-यम; यंत्री, 
'र' से रथ; रस्सी; रस, रास। 
'ल' लकीर; लब; लड़का-लड़की; 
'व' से वन; वसंत; वनवास।  
'श' से शतक; शरीफा; शरबत,  
मीठा बोलो; अच्छी नीत। 
अक्षर स्वर-व्यंजन सुन-पढ़-लिख 
आओ! गायें अक्षर गीत। 
'ष' से षट; षटकोण; षट्भुजी,
'स' से सबक; सदन; सरगम।    
'ह' से हल; हलधर; हलवाई, 
'क्ष' क्षमता; क्षत्रिय; क्षय; क्षम। 
'त्र' से त्रय, त्रिभुवन; त्रिलोचनी,
'ज्ञ' से ज्ञानी; ज्ञाता; ज्ञान।    
'ऋ' से ऋषि, ऋतु, ऋण, ऋतंभरा, 
जानो पढ़ो; नहीं हो भीत
अक्षर स्वर-व्यंजन सुन-पढ़-लिख 
आओ! गायें अक्षर गीत। 
*   
२९-३० नवंबर २०२० 

घनाक्षरी

 घनाक्षरी

*
चलो कुछ काम करो, न केवल नाम धरो,
उठो जग लक्ष्य वरो, नहीं बिन मौत मरो।
रखो पग रुको नहीं, बढ़ो हँस चुको नहीं,
बिना लड़ झुको नहीं, तजो मत पीर हरो।।
गिरो उठ आप बढ़ो, स्वप्न नव नित्य गढ़ो,
थको मत शिखर चढ़ो, विफलता से न डरो।
न अपनों को ठगना, न सपनों को तजना,
न स्वारथ ही भजना, लोक हित करो तरो।।
***
संजीव ३०.११.२०१८

विजया घनाक्षरी

विजया घनाक्षरी

*
राम कहे राम-राम, सिया कैसे कहें राम?,
होंठ रहे मौन थाम, नैना बात कर रहे।
मौन बोलता है आज, न अधूरा रहे काज,
लाल गाल लिए लाज, नैना घात कर रहे।।
हेर उर्मिला-लखन, देख द्वंद है सघन,
राम-सिया सिया-राम, बोल प्रात कर रहे।
श्रुतिकीर्ति-शत्रुघन, मांडवी भरत हँस,
जय-जय सिया-राम मात-तात कर रहे।।
***
संजीव
३०.११.२०१८

नवगीत

नवगीत:
संजीव 
*
नयन झुकाये बैठे हैं तो
मत सोचो पथ हेर रहे हैं
*
चहचह करते पंछी गाते झूम तराना
पौ फटते ही, नहीं ठण्ड का करें बहाना
सलिल-लहरियों में ऊषा का बिम्ब निराला
देख तृप्त मन डूबा खुद में बन बेगाना
सुन पाती हूँ चूजे जगकर
कहाँ चिरैया? टेर रहे हैं
*
मोरपंख को थाम हाथ में आँखें देखें
दृश्य अदेखे या अतीत को फिर-फिर लेखें
रीती गगरी, सूना पनघट,सखी-सहेली
पगडंडी पर कदम तुम्हारे जा अवरेखें
श्याम लटों में पवन देव बन
श्याम उँगलियाँ फेर रहे हैं
*
नील-गुलाबी वसन या कि है झाँइ तुम्हारी
जाकर भी तुम गए न मन से क्यों बनवारी?
नेताओं जैसा आश्वासन दिया न झूठा-
दोषी कैसे कहें तुम्हें रणछोड़ मुरारी?
ज्ञानी ऊधौ कैसे समझें
याद-मेघ मिल घेर रहे हैं?
*
३०-११-२०१७

क्षणिका / मुक्तक

क्षणिका / मुक्तक 
संजीव 
*
घर-घर में गान्धारियाँ हैं,
कोई क्या करे?
करती न रफ़ू आरियाँ हैं,
कोई क्या करे?
कुन्ती, विदुर न धर्मराज
शेष रहे हैं-
शकुनी-अशेष पारियाँ हैं,
कोई क्या करे?
*
उस्ताद अखाड़ा नहीं,
दंगल हुआ?, हुआ.
बाकी ने वृक्ष एक भी,
जंगल हुआ? हुआ.
दस्तूरी जमाने का अजब,
गजब ढा रहा-
हाय-हाय कर कहे
मंगल हुआ? हुआ.
*
शिकवों-शिकायतो ने कहा
हाले-दिल सनम.
लब सिर्फ़ मुस्कुराते रहे,
आँख थी न नम.
कानों में लगी रुई ने किया
काम ही तमाम-
हम ही से चूक हो गई
फ़ोड़ा नहीं जो बम.
*
३०-११-२०१७

नवगीत

नवगीत:
संजीव
*
नयन झुकाये बैठे हैं तो
मत सोचो पथ हेर रहे हैं
*
चहचह करते पंछी गाते झूम तराना
पौ फटते ही, नहीं ठण्ड का करें बहाना
सलिल-लहरियों में ऊषा का बिम्ब निराला
देख तृप्त मन डूबा खुद में बन बेगाना
सुन पाती हूँ चूजे जगकर
कहाँ चिरैया? टेर रहे हैं
*
मोरपंख को थाम हाथ में आँखें देखें
दृश्य अदेखे या अतीत को फिर-फिर लेखें
रीती गगरी, सूना पनघट,सखी-सहेली
पगडंडी पर कदम तुम्हारे जा अवरेखें
श्याम लटों में पवन देव बन
श्याम उँगलियाँ फेर रहे हैं
*
नील-गुलाबी वसन या कि है झाँइ तुम्हारी
जाकर भी तुम गए न मन से क्यों बनवारी?
नेताओं जैसा आश्वासन दिया न झूठा-
दोषी कैसे कहें तुम्हें रणछोड़ मुरारी?
ज्ञानी ऊधौ कैसे समझें
याद-मेघ मिल घेर रहे हैं?
*
३०-११-२०१४

नवगीत

नवगीत:
संजीव 
*
अनेक वर्णा पत्तियाँ हैं
शाख पर तो क्या हुआ?
अपर्णा तो है नहीं अमराई
सुख से सोइये
बज रहा चलभाष सुनिए
काम अपना छोड़कर
पत्र आते ही कहाँ जो रखें
उनको मोड़कर
किताबों में गुलाबों की
पंखुड़ी मिलती नहीं
याद की फसलें कहें, किस नदी
तट पर बोइये?
सैंकड़ों शुभकामनायें
मिल रही हैं चैट पर
सिमट सब नाते गए हैं
आजकल अब नैट पर
ज़िंदगी के पृष्ठ पर कर
बंदगी जो मीत हैं
पड़ गये यदि सामने तो
चीन्ह पहचाने नहीं
चैन मन का, बचा रखिए
भीड़ में मत खोइए
*** 
३०-११-२०१४ 

गीत

गीत:
हर सड़क के किनारे
संजीव 'सलिल'
*
हर सड़क के किनारे हैं उखड़े हुए,
धूसरित धूल में, अश्रु लिथड़े हुए.....
*
कुछ जवां, कुछ हसीं, हँस मटकते हुए,
नाज़नीनों के नखरे लचकते हुए।
कहकहे गूँजते, पीर-दुःख भूलते-
दिलफरेबी लटें, पग थिरकते हुए।।
बेतहाशा खुशी, मुक्त मति चंचला,
गति नियंत्रित नहीं, दिग्भ्रमित मनचला।
कीमती थे वसन किन्तु चिथड़े हुए-
हर सड़क के किनारे हैं उखड़े हुए,
धूसरित धूल में, अश्रु लिथड़े हुए.....
*
चाह की रैलियाँ, ध्वज उठाती मिलीं,
डाह की थैलियाँ, खनखनाती मिलीं।
आह की राह परवाह करती नहीं-
वाह की थाह नजरें भुलातीं मिलीं।।
दृष्टि थी लक्ष्य पर पंथ-पग भूलकर,
स्वप्न सत्ता के, सुख के ठगें झूलकर।
साध्य-साधन मलिन, मंजु मुखड़े हुए
हर सड़क के किनारे हैं उखड़े हुए,
धूसरित धूल में, अश्रु लिथड़े हुए.....
*
ज़िन्दगी बन्दगी बन न पायी कभी,
प्यास की रास हाथों न आयी कभी।
श्वास ने आस से नेह जोड़ा नहीं-
हास-परिहास कुलिया न भायी कभी।।
जो असल था तजा, जो नकल था वरा,
स्वेद को फेंककर, सिर्फ सिक्का ।
साध्य-साधन मलिन, मंजु उजड़े हुए
हर सड़क के किनारे हैं उखड़े हुए,
धूसरित धूल में, अश्रु लिथड़े हुए.....
३०-११-२०१२ 

रविवार, 29 नवंबर 2020

गोष्ठी आचार्य संजीव वर्मा सलिल के गीत

आचार्य संजीव सलिल के गीत, सुनिए ७.३० बजे

दोहा सलिला


दोहा सलिला 
*
मुकुल हुआ मिथलेश मन, सीता सुता सहर्ष 
रघुवर को पा द्वार पर, वरे नवल उत्कर्ष 
*
भाव भावना शुद्ध हो, शब्द सुमन अविनाश
छाया मिले बसंत में,  सपना छू आकाश  
*
बिना मंजरी श्याम कब, कर संतोष प्रसन्न 
सरला भाषा वर सलिल, भक्ति भाव आसन्न
*
 
 

मुक्तक

एक मुक्तक
*
हमारा टर्न तो हरदम नवीन हो जाता
तुम्हारा टर्न गया वक्त जो नहीं आता
न फिक्र और की करना हमें सुहाता है
हमारा टर्म द्रौपदी का चीर हो जाता
*
खींचकर चीर, चीर सका नहीं दु:शासन 
आम जन की न पीर दूर करे कुशासन 
धीर चुक गया है किसान का सम्हल जाओ-
मूका बहरा न बने; चेत जा जरा शासन 
*

लेख नशा: कारण और निवारण

विशेष लेख
नशा: कारण और निवारण
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
नशा क्या है-
किसी सामान्य मनुष्य की मानसिक स्थिति को बदलकर नींद या मदहोशी की हालत में ला देने वाले पदार्थ नारकॉटिक्स, ड्रग्स या नशा कहलाते है। मॉर्फिन, कोडेन, मेथाडोन, फेंटाइनाइल आदि नारकॉटिक्स चूर्ण (पाउडर), गोली (टैब्लेट) और सुई (इंजेक्शन) के रूप में मिलते हैं। ये मस्तिष्क और आसपास के ऊतकों (टिशू) को उत्तेजित करते हैं। किसी मरीज को दर्द से राहत दिलाने के लिए कभी-कभी चिकित्सक अल्प मात्रा में इनका उपयोग करते हैं। केवल मौज-मजे के लिए पारंपरिक नशे (ज़र्दा, बीड़ी, सिगरेट, चिलम, गाँजा, भाँग, चरस, गांजा, अफीम, छिपकली की पूँछ, शराब आदि), सिंथेटिक ड्रग्स (स्मैक, हीरोइन, आईस आदि), ब्राउन शुगर, सल्फ़ी, मेडिकल नशा (मोमोटिल, कैरीसोमा, आयोडेक्स, कफ सिरप आदि), स्निफर्स (लिक्विड व्हाइट फ्लूड, पेट्रोल सूँघना, पंक्चर सेल्यूशन को सूँघना आदि) आदि का बार-बार उपयोग करना लत बनकर बेचैनी, पागलपन या मौत का कारण हो सकता है।
। जो पदार्थ मदहोश कर, हर लेते हैं शक्ति। 
।। उनका सेवन मत करें, रखिए सदा विरक्ति।। 
*
। बुद्धि-विवेक हरे नशा, ताकत लेता छीन। 
।। पात्र हँसी का बनाता, मानव होता दीन।।
*
नशा करने का दुष्प्रभाव-
नशा करने के बाद आँखें लाल होना, जबान तुतलाना, पसीना आना, अकारण गुस्सा आना या ख़ुशी होना, पैर लड़खड़ाना, शरीर टूटना, नींद-भूख कम होना, बेमतलब की बातें करना, घबराहट होना, उबासी आना, दस्त लगना, दौरे पड़ना आदि दुष्प्रभाव दिखते हैं।
। लाल आँख टूटे बदन, आता गुस्सा खूब।
।। बेमतलब बातें करें, मनुज नशे में डूब।।
नशा करनेवाले की पहचान-
पैसों की बढ़ती माँग, पुराने दोस्त छोड़ कर नये दोस्त बनाना, अकेला रहने की कोशिश करना, घर में नई किस्म की दवाएं या खाली इंजेक्शन मिलना आदि से नशे की आदत का अनुमान लगाया जा सकता है।
। धन चाहे, क्रोधित रहे, घबराए धन चाह। 
।। काली ऊँगली बताते, करता नशा तबाह।।
नशा करने का कारण-
नशीला पदार्थ खून में जाते ही आदमी को खुशी और स्फूर्ति की अनुभूति कराता है। प्राय: लोग अन्य नशैलची की संगत में आकर दबाव या शौकवश नशा करने लगते हैं। मानसिक तनाव, अपमान, अभाव, प्रताड़ना, सजा, उपहास, द्वेष, बदला आदि स्थितियाँ नशा करने का कारण बन जाती हैं। नशे की प्रवृत्ति बढ़ने का मुख्य कारण नशीले पदार्थ का सुलभता से मिल जाना है।
। द्वेष, हानि, अपमान, दुःख, शौक नशे के मूल।
।।गन्दी संगत लत लगा, कर दे सोना धूल।।
नशा करने में महिलायें पीछे नहीं-
पहले सामान्यत: पुरुष ही नशा करते थे किन्तु अब लड़कियाँ और महिलाएँ भी पीछे नहीं हैं। पढ़ाई, नौकरी और उससे उपजे तनाव, खुद को आधुनिक दिखाने या बुरी संगत के कारण नशा करती महिला आसानी से दैहिक शोषण का शिकार बन जाती है। महिला का शरीर पुरुष के शरीर की तुलना में कोमल होता है। इसलिए नशा उसे अधिक हानि पहुँचाता है। महिला के नशा गर्भस्थ शिशु के मस्तिष्क तथा शरीर के विकास पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। भारत में महिलाएँ परिवार की मान-प्रतिष्ठा की प्रतीक मानी जाती हैं। महिला के नशा करने से परिवार की प्रतिष्ठा पर आघात पहुँचता है तथा बच्चे आसानी से नशे के आदी हो जाते हैं। न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसन में छपे शोध के अनुसार धूम्रपान के कारण पुरुषों की ही तरह महिलाएं भी बड़ी संख्या में मर रही हैं। सिगरेट का अधिक सेवन करने से वर्ष २००० से २०१० के बीच धूम्रपान करने वाली महिलाओं में फेफड़े के कैंसर से मौत की आशंका सामान्य लोगों की तुलना २५ गुना अधिक हो गई। शोध २० लाख से अधिक अमरीकी महिलाओं से एकत्र जानकारी पर आधारित है।
। नशा शत्रु है नारियाँ, रहें हमेशा दूर।
।। काया घर परिवार की, रक्षा तभी हुजूर।।
नशा नाश का दूत-
नशा किसी भी प्रकार का हो, एक सामाजिक अभिशाप है। नशा करना और कराना अपराध है। कभी भी किसी भी कारण से धूम्रपान, सुरापान अथवा अन्य नशा न करें। नशा आरम्भ करने के बाद उसकी लत बढ़ती ही जाती है जिसे छोड़ना असम्भव न भी हो किन्तु बहुत कथन तो होता ही है। इसलिए बेहतर यही है कि नशा किया ही न जाए। नशा एक ऐसी बुराई है, जिससे इंसान समय से पहले ही मौत का शिकार हो जाता है । जहरीले नशीले पदार्थों के सेवन से व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक और आर्थिक हानि पहुँचने के साथ ही सामाजिक वातावरण प्रदूषित होता है। अपनी और परिवार की सामाजिक तथा आर्थिक स्थिति को भारी नुकसान होता है । नशैलची व्यक्ति समाज में हेय की दृष्टि से देखा जाता है। वह परिवार के लिए बोझ हो जाता है। समाज एवं राष्ट्र के लिये उसकी उपादेयता शून्य हो जाती है । वह नशे से अपराध की ओर अग्रसर होकर शांतिपूर्ण समाज के लिए अभिशाप बन जाता है ।
आजकल बच्चे, किशोर, युवा, प्रौढ़, वयस्क वृद्ध सभी नशे की चपेट में हैं । इस अभिशाप से समय रहते मुक्ति पा लेने में ही मानव समाज की भलाई है । मादक प्रदार्थों के सेवन का प्रचलन किसी भी स्थिति में किसी भी सभ्य समाज के लिए वर्जनीय होना चाहिए। धूम्रपान स्वास्थ्य के लिए हानिकारक और कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी का कारण है। यह चेतावनी सभी तम्बाकू उत्पादों पर अनिवार्य रूप से लिखी होने और सभी को पता होने पर भी लोग इसका सेवन बहुत चाव से करते हैं । समाज में पनप रहे अपराधों का एक कारण नशा भी है। नशाखोरी में वृध्दि के साथ-साथ अपराधियों की संख्या में भी वृध्दि होती है। ध्रूमपान से निकट के व्यक्ति को फेफड़ों में कैंसर और अन्य रोग हो सकते हैं। इसलिए न खुद धूम्रपान करें, न ही किसी को करने दें । कोकीन, चरस, अफीम जैसे उत्तेजक पदार्थों के प्रभाव में व्यक्ति अपराध कर बैठता है । इनके अधिक सेवन से व्यक्ति पागल या विक्षिप्त हो जाता है। तंबाखू के सेवन से तपेदिक, निमोनिया और सांस की बीमारियों सहित मुख, फेफड़े और गुर्दे में कैंसर, हृदय रोग और उच्च रक्तचाप हो जाता है।
शराब के सेवन से किडनी और लीवर खराब होते हैं, मुख में छाले पड़ सकते हैं या पेट का कैंसर हो सकता है । इससे अल्सर होता है, गले और पेट को जोड़ने वाली नली में सूजन आ जाती है और बाद में कैंसर भी हो सकता है । गांजा -भांग आदि पदार्थ मनुष्य के मस्तिष्क पर बुरा असर डालते हैं । देश का विकास उसके नागरिकों के स्वास्थ्य पर निर्भर करता है, लेकिन नशे की बुराई के कारण यदि मानव स्वास्थ्य खराब होगा तो देश का भी विकास नहीं हो सकता । नशा व्यक्ति को तन-मन-धन से खोखला कर देता है। इस बुराई को समाप्त करने के लिए शासन के साथ ही समाज के हर तबके को आगे आना होगा।
। नशा नाश का दूत है, असमय लाता मौत।
।। हँसी-ख़ुशी-सुख छीन ले, लत श्वासों की सौत।। 
*
। धूम्रपान से फेफड़े, होते हैं कमजोर। 
।। कैंसर अतिशय कष्ट दे, काटे जीवन-डोर।।
*
। किडनी-लीवर का करे, सुरा-पान नुकसान।
।। तंबाकू-ज़र्दा नहीं, खाते हैं मतिमान।।
*
। स्मैक, चरस, कोकीन हैं, यम जैसे विकराल।
।। सेवन कर मत जाइये, आप काल के गाल।।
*
नशा रोकने के उपाय-
शासन - प्रशासन मादक पदार्थों पर रोक लगाकर नशे से हो रही हानि को घटा सकता है। आजकल सरकारें दोमुँही नीति अपना रही हैं। एक ओर मद्यपान को समाप्त करना चाहती हैं, दूसरी ओर शराब की दुकानें नीलाम करती हैं। िासि तरह बीड़ी, सिगरेट, तंबाकू के उत्पादों का उत्पादन बंद नहीं कर उन पर चेतावनी चाप कर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेती हैं। यह ठीक है कि मादक पदार्थों का उत्पादन और प्रयोग पूरी तरह से बंद कर देने से राजस्व का घाटा होगा किन्तु कोेे भी धनराशि मानव जीवन से अधिक मूल्यवान नहीं हो सकती। राजस्व का यह घाटा बीमारियों के कम होने से चिकित्सा, औषधि, शल्यक्रिया आदि पर संभावित व्यय में कमी तथा अन्य उपायों से पूरी की जा सकती है।
नशे की आदत लगने पर दृढ़ संकल्प, प्यार और अपने पण से छुड़ाई जा सकती है। नशैलची से घृणा कर दूर भागने के स्थान पर उसने अपनापन रखकर मित्र की तरह व्यवहार करें। उसे नशे से हानि के बारे में जानकारी दें। पढ़ाई या अन्य गृह कार्य का अत्यधिक बोझ न डालें। उसकी संगत का ध्यान रखें कि नशा करनेवाला अन्य साथी न मिल सके। उसे हल्के-फुल्के मन बहलाव के कार्य में व्यस्त रखें। नशा न करने के कारण हो रहे कष्ट को सहन करने और भूलने में उसकी सहायता करें। कई संस्थाएं भी इस दिशा में कार्य कर रही हैं। बहुधा व्यक्ति कुछ समय के लिए नशा छोड़ने के बाद फिर नशा करने लगता है। इसका एकमात्र उपाय दृढ़ संकल्प है।
प्रबंधों के बावजूद चोरी-छिपे मादक पदार्थों का क्रय-विक्रय करने वालों के विरुद्ध कड़े कदम उठाकर उनकी गिरफ्तारियाँ कर दण्ड दिया जा सके तो जा सके तो नशे की प्रवृत्ति पर अंकुश लगेगा।
नशे की लत घटाने और मिटाने का एक प्रभावी उपाय ग्राम्यांचलों में स्वस्थ्य मनोरंजन के साधन उपलब्ध कराना है। गाँव-गाँव में योग कक्षाएँ, व्यायाम शालाएँ, अखाड़े, वाचनालय, पुस्तकालय, कला तथा साहित्य की कार्यशालाएँ निरन्तर चलें तो आम जन निरंतर व्यस्त रहेंगे और नशे की प्रवृत्ति पर अंकुश लग सकेगा। ग्राम्य अंचलों की कलाओं को प्रोत्साहन देकर रामलीला, नौटंकी, आल्हा गायन, कजरी गायन, फाग गायन आदि की प्रतियोगिताएँ कर प्रशासन द्वारा पुरस्कृत किया जाए तो इनकी तैयारी में व्यस्त रहने से आम लोगों में नशे की और उन्मुख होने का चाव घटेगा।
। अपनापन संयम ख़ुशी, सरल - सुगम उपचार।
।। व्यस्त रखें खुद को सदा, पायें - बाँटें प्यार।।
*
। मादक तत्वों का नहीं, उत्पादन हो और।
।।शासन चेते नीतियाँ, बदले ला नव दौर।।
*
। अब न दुकानें मद्य की, खुलें, खुली हों बंद।
।।नीति आबकारी बदल, विहँस मिटायें गंद।।
*
।गाँजा भाँग अफीम का, जो करते व्यापार।
।। कड़ा दण्ड उनको मिले, जनगण करे पुकार।।
*
।पहले बीमारी बढ़ा, फिर करना उपचार।
।।जनहितकारी राज्य में, क्यों शासन लाचार।।
*
।आय घटे राजस्व की, खोजें अन्य उपाय।
।।सुरा बेच मत कीजिए, जनता को लाचार।।
*
।ग्राम्य कला-साहित्य की, कक्षाएँ हों रोज।
।।योग और व्यायाम की, प्रतिभाएँ लें खोज।।
*
।कजरी आल्हा फाग का, गायन हो हर शाम।
।।नौटंकी मंचन करें, कोेेई न हो बेकाम।।
*****
नशा मुक्ति संदेश
*
नशा दूत है मौत का 
नाम साँस की सौत का। 
छोड़, मिले जीवन नया 
जो न तजे मरघट गया। 
*
सुरा तमाखू स्मैक हैं, घातक तज दें आप 
सेवन करना-कराना, है सर्वाधिक पाप 
*
बीड़ी-सिगरेट मौत को, लाते असमय पास
भूले कभी न पीजिए, दूर रहे संत्रास 
*
नशा नाश-पैगाम है, रहें नशे से दूर 
जो नादां करता नशा, आँखे रहते सूर 
*
१४-७-२०१६

गीति-काव्य में छंद

आलेख:
गीति-काव्य में छंद
आचार्य ​संजीव​ वर्मा​ 'सलिल' 
*
भूमिका: ध्वनि और भाषा
​आध्यात्म, धर्म और विज्ञान तीनों सृष्टि की उत्पत्ति नाद अथवा ध्वनि से मानते हैं। सदियों पूर्व वैदिक ऋषियों ने ॐ से सृष्टि की उत्पत्ति बताई, अब विज्ञान नवीनतम खोज के अनुसार सूर्य से नि:सृत ध्वनि तरंगों का रेखांकन कर उसे ॐ के आकार का पा रहे हैं। ऋषि परंपरा ने इस सत्य की प्रतीति कर सर्व ​सामान्य को बताया कि धार्मिक अनुष्ठानों में ध्वनि पर आधारित मंत्रपाठ या जप ॐ से आरम्भ करने पर ही फलता है। यह ॐ परब्रम्ह है, जिसका अंश हर जीव में जीवात्मा के रूप में है। नव जन्मे जातक की रुदन-ध्वनि बताती है कि नया प्राणी आ गया है जो आजीवन अपने सुख-दुःख की अभिव्यक्ति ध्वनि के माध्यम से करेगा। आदि मानव वर्तमान में प्रचलित भाषाओँ तथा लिपियों से अपरिचित था। प्राकृतिक घटनाओं तथा पशु-पक्षियों के माध्यम से सुनी ध्वनियों ने उसमें हर्ष, भय, शोक आदि भावों का संचार किया। शांत सलिल-प्रवाह की कलकल, कोयल की कूक, पंछियों की चहचहाहट, शांत समीरण, धीमी जलवृष्टि आदि ने सुख तथा मेघ व तङित्पात की गड़गड़ाहट, शेर आदि की गर्जना, तूफानी हवाओं व मूसलाधार वर्ष के स्वर ने उसमें भय का संचार किया। इन ध्वनियों को स्मृति में संचित कर, उनका दोहराव कर उसने अपने साथियों तक अपनी​ ​अनुभूतियाँ सम्प्रेषित कीं। यही आदिम भाषा का जन्म था। वर्षों पूर्व पकड़ा गया भेड़िया बालक भी ऐसी ही ध्वनियों से शांत, भयभीत, क्रोधित होता देखा गया था।
कालांतर में सभ्यता के बढ़ते चरणों के साथ करोड़ों वर्षों में ध्वनियों को सुनने-समझने, व्यक्त करने का कोष संपन्न होता गया। विविध भौगोलिक कारणों से मनुष्य समूह पृथ्वी के विभिन्न भागों में गये और उनमें अलग-अलग ध्वनि संकेत विकसित और प्रचलित हुए जिनसे विविध भाषाओँ तथा बोलिओं का विकास हुआ। सुनने-कहने की यह परंपरा ही श्रुति-स्मृति के रूप में सहस्त्रों वर्षों तक भारत में फली-फूली। भारत में मानव कंठ में ध्वनि के उच्चारण स्थानों की पहचान कर उनसे उच्चरित हो सकनेवाली ध्वनियों को वर्गीकृत कर शुद्ध ध्वनि पर विशेष ध्यान दिया गया। इन्हें हम स्वर के तीन वर्ग हृस्व, दीर्घ व् संयुक्त तथा व्यंजन के ६ वर्गों क वर्ग, च वर्ग, ट वर्ग, त वर्ग, प वर्ग, य वर्ग आदि के रूप में जानते हैं। अब समस्या इस मौखिक ज्ञान को सुरक्षित रखने की थी ताकि पीढ़ी दर पीढ़ी उसे सही तरीके से पढ़ा-सुना तथा सही अर्थों में समझा-समझाया जा सके। निराकार ध्वनियों का आकार या चित्र नहीं था, जिस शक्ति के माध्यम से इन ध्वनियों के लिये अलग-अलग संकेत मिले उसे आकार या चित्र से परे मानते हुए चित्र​ ​गुप्त संज्ञा दी जाकर ॐ से अभिव्यक्त कर ध्वन्यांकन के अपरिहार्य उपादानों असि-मसि तथा लिपि का अधिष्ठाता कहा गया। इसीलिए वैदिक काल से मुग़ल काल तक धर्म ग्रंथों में चित्रगुप्त का उल्लेख होने पर भी उनका कोई मंदिर, पुराण, उपनिषद, व्रत, कथा, चालीसा, त्यौहार आदि नहीं बनाये गये।
निराकार का साकार होना, अव्यक्त का व्यक्त होना, ध्वनि का लिपि, लेखनी, शिलापट के माध्यम से ​स्थायित्व पाना और सर्व साधारण तक पहुँचना मानव सभ्यता ​का ​सर्वाधिक महत्वपूर्ण चरण है। किसी भी नयी पद्धति का परंपरावादियों द्वारा विरोध किया ही जाता है। लिपि द्वारा ज्ञान को संचित करने का विरोध हुआ ही होगा और तब ऐसी-मसि-लिपि के अधिष्ठाता को कर्म देवता कहकर विरोध का शमन किया गया। लिपि का विरोध अर्थात अंत समय में पाप-पुण्य का ले​खा रखनेवाले का विरोध कौन करता? आरम्भ में वनस्पतियों की टहनियों को पैना कर वनस्पतियों के रस में डुबाकर शिलाओं पर संकेत अंकित-चित्रित किये गये। ये शैल-चित्र तत्कालीन मनुष्य की शिकारादि क्रियाओं, पशु-पक्षी​, सहचरों ​आदि ​से संबंधित हैं। इनमें प्रयुक्त संकेत क्रमश: रुढ़, सर्वमान्य और सर्वज्ञात हुए। इस प्रकार भाषा के लिखित रूप लिपि (स्क्रिप्ट) का उद्भव हुआ। लिप्यांकन में प्रवीणता प्राप्त कायस्थ वर्ग को समाज, शासन तथा प्रशासन में सर्वोच्च स्थान सहस्त्रों वर्षों तक प्राप्त ​होता रहा जबकि ब्राम्हण वर्ग शिक्षा प्रदाय हेतु जिम्मेदार था। ध्वनि के उच्चारण तथा अंकन का ​शास्त्र विकसित होने से शब्द-भंडार का समृद्ध होना, शब्दों से भावों की अभिव्यक्ति कर सकना तथा इसके समानांतर लिपि का विकास होने से ज्ञान का आदान-प्रदान, नव शोध और सकल मानव जीवन व संस्कृति का विकास संभव हो सका।
रोचक तथ्य यह भी है कि मौसम, पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों, तथा वनस्पति ने भी भाषा और लिपि के विकास में योगदान किया। जिस अंचल में पत्तों से भोजपत्र और टहनियों या पक्षियों के पंखों कलम बनायीं जा सकी वहाँ मुड्ढे (अक्षर पर आड़ी रेखा) युक्त लिपि विकसित हुई जबकि जहाँ ताड़पत्र पर लिखा जाता था वहाँ मुड्ढा खींचने पर उसके चिर जाने के कारण बिना मुड्ढे वाली लिपियाँ विकसित हुईं। क्रमश: उत्तर व दक्षिण भारत में इस तरह की लिपियों का अस्तित्व आज भी है। मुड्ढे हीन लिपियों के अनेक प्रकार कागज़ और कलम की किस्म तथा लिखनेवालों की अँगुलियों क्षमता के आधार पर बने। जिन क्षेत्रों के निवासी वृत्ताकार बनाने में निपुण थे वहाँ की लिपियाँ तेलुगु, कन्नड़ , बांग्ला, उड़िया आदि की तरह हैं जिनके अक्षर किसी बच्चे को जलेबी-इमरती की तरह लग सकते हैं। यहाँ बनायी जानेवाली अल्पना, रंगोली, चौक आदि में भी गोलाकृतियाँ अधिक हैं। यहाँ के बर्तन थाली, परात, कटोरी, तवा, बटलोई आदि और खाद्य रोटी, पूड़ी, डोसा, इडली, रसगुल्ला आदि भी वृत्त या गोल आकार के हैं।
रेगिस्तानों में पत्तों का उपचार कर उन पर लिखने की मजबूरी थी इसलिए छोटी-छोटी रेखाओं से निर्मित अरबी, फ़ारसी जैसी लिपियाँ विकसित हुईं। बर्फ, ठंड और नमी वाले क्षेत्रों में रोमन लिपि का विकास हुआ। चित्र अंकन करने की रूचि ने चित्रात्मक लिपि​यों​ के विकास का पथ प्रशस्त किया। इसी तरह ​ वातावरण तथा ​खान-पान के कारण विविध अंचल के निवासियों में विविध ध्वनियों के उच्चारण की क्षमता भी अलग-अलग होने से वहाँ विकसित भाषाओँ में वैसी ध्वनियुक्त शब्द बने। जिन अंचलों में जीवन संघर्ष कड़ा था वहाँ की भाषाओँ में कठोर ध्वनियाँ अधिक हैं, जबकि अपेक्षाकृत शांत और सरल जीवन वाले क्षेत्रों की भाषाओँ में कोमल ध्वनियाँ अधिक हैं। यह अंतर हरयाणवी, राजस्थानी, काठियावाड़ी और बांग्ला, बृज, अव​धी भाषाओँ में अनुभव किया जा सकता है।
सार यह कि भाषा और लिपि के विकास में ध्वनि का योगदान सर्वाधिक है। भावनाओं और अनुभूतियों को व्यक्त करने में सक्षम मानव ने गद्य और पद्य दो शैलियों का विकास किया। इसका उत्स पशु-पक्षियों और प्रकृति से प्राप्त ध्वनियाँ ही बनीं। अलग-अलग रुक-रुक कर हुई ध्वनियों ने गद्य विधा को जन्म दिया जबकि नदी के कलकल प्रवाह या निरंतर कूकती कोयल की सी ध्वनियों से पद्य का जन्म हुआ। पद्य के सतत विकास ने गीति काव्य का रूप लिया जिसे गाया जा सके। गीतिकाव्य के मूल तत्व ध्वनियों का नियमित अंतराल पर दुहराव, बीच-बीच में ठहराव और किसी अन्य ध्वनि खंड के प्रवेश से हुआ। किसी नदी तट के किनारे कलकल प्रवाह के साथ निरंतर कूकती कोयल को सुनें तो एक ध्वनि आदि से अंत तक, दूसरी के बीच-बीच में प्रवेश से गीत के मुखड़े और अँतरे की प्रतीति होगी। मैथुनरत क्रौंच युगल में से ​व्याध द्वारा ​​नर का ​वध, मादा का आर्तनाद और आदिकवि वाल्मिकी के मुख से प्रथम कविता का प्रागट्य इसी सत्य की पुष्टि करता है​​। ​हो इस प्रसंग से प्रेरित होकर​​ ​हिरण शावक के वध के पश्चात अश्रुपात करती हिरणी के रोदन से ग़ज़ल की उत्पत्ति ​जैसी मान्यताएँ गीति काव्य की उत्पत्ति में प्रकृति​-पर्यावरण का योगदान इंगित करते हैं​।
व्याकरण और पिंगल का विकास-
भारत में गुरुकुल परम्परा में साहित्य की सारस्वत आराधना का जैसा वातावरण रहा वैसा अन्यत्र कहीं नहीं रह सका​​।​​ इसलिये भारत में कविता का जन्म ही नहीं हुआ पाणिनि व पिंगल ने विश्व के सर्वाधिक व्यवस्थित, विस्तृत और समृद्ध व्याकरण और पिंगल शास्त्रों का सृजन किया जिनका कमोबेश अनुकरण और प्रयोग विश्व की अधिकांश भाषाओँ में हुआ। जिस तरह व्याकरण के अंतर्गत स्वर-व्यंजन का अध्ययन ध्वनि विज्ञान के आधारभूत तत्वों के आधार पर हुआ वैसे ही ​ छंद शास्त्र के अंतर्गत छंदों का निर्माण ध्वनि खण्डों की आवृत्तिकाल के आधार पर हुआ। पिंगल ने लय या गीतात्मकता के दो मूल तत्वों गति-यति को पहचान कर उनके मध्य प्रयुक्त की जा रही लघु-दीर्घ ध्वनियों को वर्ण या अक्षर ​मात्रा ​के माध्यम से पहचाना तथा उन्हें क्रमश: १-२ मात्रा भार देकर उनके उच्चारण काल की गणना बिना किसी यंत्र या विधि न विशेष का प्रयोग किये संभव बना दी। ध्वनि खंड विशेष के प्रयोग और आवृत्ति के आधार पर छंद पहचाने गये। छंद में प्रयुक्त वर्ण तथा मात्रा के आधार पर छंद के दो वर्ग वर्णिक तथा मात्रिक बनाये गये। मात्रिक छंदों के अध्ययन को सरल करने के लिये ८ लयखंड (गण) प्रयोग में लाये गये सहज बनाने के लिए एक सूत्र 'यमाताराजभानसलगा' बनाया गया।
गीति काव्य में छंद-
गणित के समुच्चय सिद्धांत (सेट थ्योरी) तथा क्रमचय और समुच्चय (परमुटेशन-कॉम्बिनेशन) का प्रयोग कर दोनों वर्गों में छंदों की संख्या का निर्धारण किया गया। वर्ण तथा मात्रा संख्या के आधार पर छंदों का नामकरण गणितीय आधार पर किया गया। मात्रिक छंद के लगभग एक करोड़ तथा वर्णिक छंदों के लगभग डेढ़ करोड़ प्रकार गणितीय आधार पर ही बताये गये हैं। इसका परोक्षार्थ यह है कि वर्णों या मात्राओं का उपयोग कर जब भी कुछ कहा जाता है वह किसी न किसी ज्ञात या अज्ञात छंद का छोटा-बड़ा अंश होता है।इसे इस तरह समझें कि जब भी कुछ कहा जाता है वह अक्षर होता है। संस्कृत के अतिरिक्त विश्व की किसी अन्य भाषा में गीति काव्य का इतना विशद और व्यवस्थित अध्ययन नहीं हो सका। संस्कृत से यह विरासत हिंदी को प्राप्त हुई तथा संस्कृत से कुछ अंश अरबी, फ़ारसी, अंग्रेजी , चीनी, जापानी आदि तक भी गयी। यह अलग बात है कि व्यावहारिक दृष्टि से हिंदी में भी वर्णिक और मात्रिक दोनों वर्गों के लगभग पचास छंद ही मुख्यतः: प्रयोग हो रहे हैं। रचनाओं के गेय और अगेय वर्गों का अंतर लय होने और न होने पर ही है। गद्य गीत और अगीत ऐसे वर्ग हैं जो दोनों वर्गों की सीमा रेखा पर हैं अर्थात जिनमें भाषिक प्रवाह यत्किंचित गेयता की प्रतीति कराता है। यह निर्विवाद है कि समस्त गीति काव्य ऋचा, मन्त्र, श्लोक, लोक गीत, भजन, आरती आदि किसी भी देश रची गयी हों छंदाधारित है। यह हो सकता है कि उस छंद से अपरिचय, छंद के आंशिक प्रयोग अथवा एकाधिक छंदों के मिश्रण के कारण छंद की पहचान न की जा सके।
वैदिक साहित्य में ऋग्वेद एवं सामवेद की ऋचाएँ गीत का आदि रूप हैं। गीत की दो अनिवार्य शर्तें विशिष्ट सांगीतिक लय तथा आरोह-अवरोह अथवा गायन शैली हैं। कालांतर में 'लय' के निर्वहन हेतु छंद विधान और अंत्यानुप्रास (तुकांत-पदांत) का अनुपालन संस्कृत काव्य की वार्णिक छंद परंपरा तक किया जाता रहा। संस्कृत काव्य के समान्तर प्राकृत, अपभ्रंश आदि में भी 'लय' का महत्व यथावत रहा। सधुक्कड़ी में शब्दों के सामान्य रूप का विरूपण सहज स्वीकार्य हुआ किन्तु 'लय' का नहीं। शब्दों के रूप विरूपण और प्रचलित से हटकर भिन्नार्थ में प्रयोग करने पर कबीर को आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने 'भाषा का डिक्टेटर' कहा।
अंग्रेजों और अंगरेजी के आगमन और प्रभुत्व-स्थापन की प्रतिक्रिया स्वरूप सामान्य जन अंग्रेजी साहित्य से जुड़ नहीं सका और स्थानीय देशज साहित्य की सृजन धारा क्रमशः खड़ी हिंदी का बाना धारण करती गयी जिसकी शैलियाँ उससे अधिक पुरानी होते हुए भी उससे जुड़ती गयीं। छंद, तुकांत और लय आधृत काव्य रचनाएँ और महाकाव्य लोक में प्रतिष्ठित और लोकप्रिय हुए। आल्हा, रासो, राई, कजरी, होरी, कबीर आदि गीत रूपों में लय तथा तुकांत-पदांत सहज साध्य रहे। यह अवश्य हुआ कि सीमित शिक्षा तथा शब्द-भण्डार के कारण शब्दों के संकुचन या दीर्घता से लय बनाये रखा गया या शब्दों के देशज भदेसी रूप का व्यवहार किया गया। विविध छंद प्रकारों यथा छप्पय, घनाक्षरी, सवैया आदि में यह समन्वय सहज दृष्टव्य है।खड़ी हिंदी जैसे-जैसे वर्तमान रूप में आती गयी शिक्षा के प्रचार-प्रसार के साथ कवियों में छंद-शुद्धता के समर्थन या विरोध की प्रवृत्ति बढ़ी जो पारम्परिक और प्रगतिवादी दो खेमों में बँट गयी।
छंदमुक्तता और छंद हीनता-
लम्बे काल खंड के पश्चात हिंदी पिंगल को महाप्राण निराला ने कालजयी अवदान छंदमुक्त गीति रचनाओं के रूप में दिया। उत्तर भारत के लोककाव्य व संगीत तथा रवींद्र संगीत में असाधारण पैठ के कारण निराला की छंद पर पकड़ समय से आगे की थी। उनकी प्रयोगधर्मिता ने पारम्परिक छंदों के स्थान पर सांगीतिक राग-ताल को वरीयता देते हुए जो रचनाएँ उन्हें प्रस्तुत कीं उन्हें भ्रम-वश छंद विहीन समझ लिया गया, जबकि उनकी गेयता ही इस बात का प्रमाण है कि उनमें लय अर्थात छंद अन्तर्निहित है। निराला की रचनाओं और तथाकथित प्रगतिशील कवियों की रचनाओं के सस्वर पाठ से छंदमुक्तता और छंदहीनता के अंतर को सहज ही समझा जा सकता है।
दूसरी ओर पारम्परिक काव्यधारा के पक्षधर रचनाकार छंदविधान की पूर्ण जानकारी और उस पर अधिकार न होने के कारण उर्दू काव्यरूपों के प्रति आकृष्ट हुए अथवा मात्रिक-वार्णिक छंद के रूढ़ रूपों को साधने के प्रयास में लालित्य, चारुत्व आदि काव्य गुणों को नहीं साध सके। इस खींच-तान और ऊहापोह के वातावरण में हिंदी काव्य विशेषकर गीत 'रस' तथा 'लय' से दूर होकर जिन्दा तो रहा किन्तु जीवनशक्ति गँवा बैठा। निराला के बाद प्रगतिवादी धारा के कवि छंद को कथ्य की सटीक अभिव्यक्ति में बाधक मानते हुए छंदहीनता के पक्षधर हो गये। इनमें से कुछ समर्थ कवि छंद के पारम्परिक ढाँचे को परिवर्तित कर या छोड़कर 'लय' तथा 'रस' आधारित रचनाओं से सार्थक रचना कर्मकार सके किन्तु अधिकांश कविगण नीरस-क्लिष्ट प्रयोगवादी कवितायेँ रचकर जनमानस में काव्य के प्रति वितृष्णा उत्पन्न करने का कारण बने। विश्वविद्यालयों में हिंदी को शोधोपाधियां प्राप्त किन्तु छंद रचना हेतु आवश्यक प्रतिभा से हीं प्राध्यापकों का एक नया वर्ग पैदा हो गया जिसने अमरता की चाह ने अगीत, प्रगीत, गद्यगीत, अनुगीत, प्रलंब गीत जैसे न जाने कितने प्रयोग किये पर बात नहीं बनी। प्रारंभिक आकर्षण, सत्तासीन राजनेताओं और शिक्षा संस्थानों, पत्रिकाओं और समीक्षकों के समर्थन के बाद भी नयी कविता अपनी नीरसता और जटिलता के कारण जन-मन से दूर होती गयी। गीत के मरने की घोषणा करनेवाले प्रगतिवादी कवि और समीक्षक स्वयं काल के गाल में समा गये पर गीत लोक मानस में जीवित रहा। हिंदी छंदों को कालातीत अथवा अप्रासंगिक मानने की मिथ्या अवधारणा पाल रहे रचनाकार जाने-अनजाने में उन्हीं छंदों का प्रयोग बहर में करते हैं।
उर्दू काव्य विधाओं में छंद-
भारत के विविध भागों में विविध भाषाएँ तथा हिंदी के विविध रूप (शैलियाँ) प्रचलित हैं। उर्दू हिंदी का वह भाषिक रूप है जिसमें अरबी-फ़ारसी शब्दों के साथ-साथ मात्र गणना की पद्धति (तक़्ती) का प्रयोग किया जाता है जो अरबी लोगों द्वारा शब्द उच्चारण के समय पर आधारित हैं। पंक्ति भार गणना की भिन्न पद्धतियाँ, नुक्ते का प्रयोग, काफ़िया-रदीफ़ संबंधी नियम आदि ही हिंदी-उर्दू रचनाओं को वर्गीकृत करते हैं। हिंदी में मात्रिक छंद-लेखन को व्यवस्थित करने के लिये प्रयुक्त गण के समान, उर्दू बहर में रुक्न का प्रयोग किया जाता है। उर्दू गीतिकाव्य की विधा ग़ज़ल की ७ मुफ़र्रद (शुद्ध) तथा १२ मुरक्कब (मिश्रित) कुल १९ बहरें मूलत: २ पंच हर्फ़ी (फ़ऊलुन = यगण यमाता तथा फ़ाइलुन = रगण राजभा ) + ५ सात हर्फ़ी (मुस्तफ़इलुन = भगणनगण = भानसनसल, मफ़ाईलुन = जगणनगण = जभानसलगा, फ़ाइलातुन = भगणनगण = भानसनसल, मुतफ़ाइलुन = सगणनगण = सलगानसल तथा मफऊलात = नगणजगण = नसलजभान) कुल ७ रुक्न (बहुवचन इरकॉन) पर ही आधारित हैं जो गण का ही भिन्न रूप है। दृष्टव्य है कि हिंदी के गण त्रिअक्षरी होने के कारण उनका अधिकतम मात्र भार ६ है जबकि सप्तमात्रिक रुक्न दो गानों का योग कर बनाये गये हैं। संधिस्थल के दो लघु मिलाकर दीर्घ अक्षर लिखा जाता है। इसे गण का विकास कहा जा सकता है।
वर्णिक छंद मुनिशेखर - २० वर्ण = सगण जगण जगण भगण रगण सगण लघु गुरु
चल आज हम करते सुलह मिल बैर भाव भुला सकें
बहरे कामिल - मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन
पसे मर्ग मेरे मज़ार परजो दिया किसी ने जला दिया
उसे आह दामने-बाद ने सरे-शाम से ही बुझा दिया
उक्त वर्णित मुनिशेखर वर्णिक छंद और बहरे कामिल वस्तुत: एक ही हैं।
अट्ठाईस मात्रिक यौगिक जातीय विधाता (शुद्धगा) छंद में पहली, आठवीं और पंद्रहवीं मात्रा लघु तथा पंक्त्यांत में गुरु रखने का विधान है।
कहें हिंदी, लिखें हिंदी, पढ़ें हिंदी, गुनें हिंदी
न भूले थे, न भूलें हैं, न भूलेंगे, कभी हिंदी
हमारी थी, हमारी है, हमारी हो, सदा हिंदी
कभी सोहर, कभी गारी, बहुत प्यारी, लगे हिंदी - सलिल 
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हमें अपने वतन में आजकल अच्छा नहीं लगता
हमारा देश जैसा था हमें वैसा नहीं लगता
दिया विश्वास ने धोखा, भरोसा घात कर बैठा
हमारा खून भी 'सागर', हमने अपना नहीं लगता -रसूल अहमद 'सागर'
अरकान मफाईलुन मफाईलुन मफाईलुन मफाईलुन से बनी उर्दू बहर हज़ज मुसम्मन सालिम, विधाता छंद ही है। इसी तरह अन्य बहरें भी मूलत: छंद पर ही आधारित हैं।
रुबाई के २४ औज़ान जिन ४ मूल औज़ानों (१. मफ़ऊलु मफ़ाईलु मफ़ाईलु फ़अल, २. मफ़ऊलु मफ़ाइलुन् मफ़ाईलु फ़अल, ३. मफ़ऊलु मफ़ाईलु मफ़ाईलु फ़ऊल तथा ४. मफ़ऊलु मफ़ाइलुन् मफ़ाईलु फ़ऊल) से बने हैं उनमें ५ लय खण्डों (मफ़ऊलु, मफ़ाईलु, मफ़ाइलुन् , फ़अल तथा फ़ऊल) के विविध समायोजन हैं जो क्रमश: सगण लघु, यगण लघु, जगण २ लघु / जगण गुरु, नगण तथा जगण ही हैं। रुक्न और औज़ान का मूल आधार गण हैं जिनसे मात्रिक छंद बने हैं तो इनमें यत्किंचित परिवर्तन कर बनाये गये (रुक्नों) अरकान से निर्मित बहर और औज़ान छंदहीन कैसे हो सकती हैं?
औज़ान- मफ़ऊलु मफ़ाईलुन् मफ़ऊलु फ़अल
सगण लघु जगण २ लघु सगण लघु नगण
सलगा ल जभान ल ल सलगा ल नसल
इंसान बने मनुज भगवान नहीं
भगवान बने मनुज शैवान नहीं 
धरती न करे मना, पाले सबको-
दूषित न करो बनो हैवान नहीं -सलिल
गीत / नवगीत का शिल्प, कथ्य और छंद-
गीत और नवगीत शैल्पिक संरचना की दृष्टि से समगोत्रीय है। अन्य अनेक उपविधाओं की तरह यह दोनों भी कुछ समानता और कुछ असमानता रखते हैं। नवगीत नामकरण के पहले भी गीत और दोनों नवगीत रचे जाते रहे आज भी रहे जा रहे हैं और भविष्य में भी रचे जाते रहेंगे। अनेक गीति रचनाओं में गीत और नवगीत दोनों के तत्व देखे जा सकते हैं। इन्हें किसी वर्ग विशेष में रखे जाने या न रखे जाने संबंधी समीक्षकीय विवेचना बेसिर पैर की कवायद कही जा सकती है। इससे पाचनकाए या समीक्षक विशेष के अहं की तुष्टि भले हो विधा या भाषा का भला नहीं होता।
गीत - नवगीत दोनों में मुखड़े (स्थाई) और अंतरे का समायोजन होता है, दोनों को पढ़ा, गुनगुनाया और गाया जा सकता है। मुखड़ा अंतरा मुखड़ा अंतरा यह क्रम सामान्यत: चलता है। गीत में अंतरों की संख्या प्राय: विषम यदा-कदा सम भी होती है । अँतरे में पंक्ति संख्या तथा पंक्ति में शब्द संख्या आवश्यकतानुसार घटाई - बढ़ाई जा सकती है। नवगीत में सामान्यतः २-३ अँतरे तथा अंतरों में ४-६ पंक्ति होती हैं। बहुधा मुखड़ा दोहराने के पूर्व अंतरे के अंत में मुखड़े के समतुल्य मात्रिक / वर्णिक भार की पंक्ति, पंक्तियाँ या पंक्त्यांश रखा जाता है। अंतरा और मुखड़ा में प्रयुक्त छंद समान भी हो सकते हैं और भिन्न भी। गीत के प्रासाद में छंद विधान और अंतरे का आकार व संख्या उसका विस्तार करते हैं। नवगीत के भवन में स्थाई और अंतरों की सीमित संख्या और अपेक्षाकृत लघ्वाकार व्यवस्थित गृह का सा आभास कराते हैं। प्रयोगधर्मी रचनाकार इनमें एकाधिक छंदों, मुक्तक छंदों अथवा हिंदीतर भाषाओँ के छंदों का प्रयोग करते रहे हैं।गीत में पारम्परिक छंद चयन के कारण छंद विधान पूर्वनिर्धारित गति-यति को नियंत्रित करता है। नवगीत में छान्दस स्वतंत्रता होती है अर्थात मात्रा सन्तुलनजनित गेयता और लयबद्धता पर्याप्त है। दोहा, सोरठा, रोला, उल्लाला, त्रिभंगी, आल्हा, सखी, मानव, नरेंद्र छंद (फाग), जनक छंद, लावणी, हाइकु आदि का प्रयोग गीत-नवगीत में किया जाता रहा है।
गीत - नवगीत दोनों में कथ्य के अनुसार रस, प्रतीक और बिम्ब चुने जाते हैं। गेयता या लयबद्धता दोनों में होती है। गीत में शिल्प को वरीयता प्राप्त होती है जबकि नवगीत में कथ्य प्रधान होता है। गीत में कथ्य वर्णन के लिये प्रचुर मात्र में बिम्बों, प्रतीकों और उपमाओं के उपयोग का अवकाश होता है जबकि नवगीत में गागर में सागर, बिंदु में सिंधु की तरह इंगितों में बात कही जाती है। 'कम बोले से अधिक समझना' की उक्ति नवगीत पर पूरी तरह लागू होती है। नवगीत की विषय वस्तु सामायिक और प्रासंगिक होती है। तात्कालिकता नवगीत का प्रमुख लक्षण है जबकि सनातनता, निरंतरता गीत का। गीत रचना का उद्देश्य सत्य-शिव-सुंदर की प्रतीति तथा सत-चित-आनंद की प्राप्ति कही जा सकती है जबकि नवगीत रचना का उद्देश्य इसमें बाधक कारकों और स्थितियों का इंगित कर उन्हें परिवर्तित करने की सरचनात्मक प्रयास कहा जा सकता है। गीत महाकाल का विस्तार है तो नवगीत काल की सापेक्षता।​
*
२९-११-२०१७ 

दोहा सलिला

 दोहा सलिला

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नारी के दो-दो जगत, वह दोनों की शान
पाती है वरदान वह, जब हो कन्यादान.
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नारी को माँगे बिना, मिल जाता नर-दास.
कुल-वधु ले नर दान में, सहता जग-उपहास.
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दल-बल सह जा दान ले, भिक्षुक नर हो दीन.
नारी बनती स्वामिनी, बजा चैन से बीन.
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चीन्ह-चीन्ह आदेश दे, बीन-बीन ले हक.
समता कर सकता न नर, तज कोशिश नाहक.
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दो-दो मात्रा अधिक है, नारी नर से जान.
कुशल चाहता तो कभी, बैर न उससे ठान.
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यह उसका रहमान है, वह इसकी रसखान.
उसमें इसकी जान है, इसमें उसकी जान.
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२९-११-२०१७

षट्पदी

 षट्पदी 
*
नाक के बाल ने, नाक रगड़कर, नाक कटाने का काम किया है
नाकों चने चबवाए, घुसेड़ के नाक, न नाक का मान रखा है
नाक न ऊँची रखें अपनी, दम नाक में हो तो भी नाक दिखा लें
नाक पे मक्खी न बैठन दें, है सवाल ये नाक का, नाक बचा लें
नाक के नीचे अघट न घटे, जो घटे तो जुड़े कुछ राह निकालें
नाक नकेल भी डाल सखे हो, न कटे जंजाल तो बाँह चढ़ा लें
*
२९-११-२०१४ 

नवगीत

नवगीत:

कौन बताये
नाम खेल का?
.
तोल-तोल के बोल रहे हैं
इक-दूजे को तोल रहे हैं
कौन बताये पर्दे पीछे
किसके कितने मोल रहे हैं?
साध रहे संतुलन
मेल का
.
तुम इतने लो, हम इतने लें
जनता भौचक कब कितने ले?
जैसी की तैसी है हालत
आश्वासन चाहे जितने ले
मेल नीर के
साथ तेल का?
.
केर-बेर का साथ निराला
स्वार्थ साधने बदलें पाला
सत्ता खातिर खेल खेलते
सिद्धांतों पर डाला ताला
मौसम आया
धकापेल का
.
२९-११-२०१४

नवगीत

 नवगीत:

कब रूठें
कब हाथ मिलायें?
नहीं, देव भी
कुछ कह पायें
.
ये जनगण-मन के नायक हैं
वे बमबारी के गायक हैं
इनकी चाह विकास कराना
उनकी राह विनाश बुलाना
लोकतंत्र ने
तोपतंत्र को
कब चाहा है
गले लगायें?
.
सारे कुनबाई बैठे हैं
ये अकड़े हैं, वे ऐंठे हैं
उनका जन आधार बड़ा पर
ये जन मन मंदिर पैठे हैं
आपस में
सहयोग बढ़ायें
इनको-उनको
सब समझायें
. . .
(सार्क सम्मलेन काठमांडू, २६.१.२०१४ )

काव्यपाठ

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काव्य गोष्ठी

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शनिवार, 28 नवंबर 2020

व्यंग्य कविता

 एक व्यंग्य कविता

*
ऊधौ! का सरकारै सब कछु?
'विथ डिफ़रेंस' पार्टी अद्भुत, महबूबा से पेंग लड़ावै
बात न मन की हो पाए तो, पलक झपकते जेल पठावै
मनमाना किरदारै सब कछु?
कम जनमत पा येन-केन भी, लपक-लपक सरकार बनावै
'गो-आ' खेल आँख में धूला, झोंक-झोंककर वक्ष फुलावै
सत्ता पा फुँफकारै सब कछु?
मिले पटकनी तो रो-रोकर, नाहक नंगा नाच दिखावै
रातों रात शपथ ले छाती, फुला-फुला धरती थर्रावै
कैसऊ करो, जुगारै सब कछु
जोड़ी पूँजी लुटा-खर्चकर, धनपतियों को शीश चढ़ावै
रोजगार पर डाका डाले, भूखों को कानून पढ़ावै
अफरा पेट, डकारै सब कछु?
खेत ख़त्म कर भू सेठों को दे-दे पार्टी फंड जुटावै
असफलता औरों पर थोपे, दिशाहीन हर कदम उठावै
गुंडा बन दुत्कारै सब कछु?
***

भोजपुरी सरस्वती वंदना

 भोजपुरी सरस्वती वंदना

माँ शारदे, माँ शारदे माँ शारदे
हमनी के जीवन सँवार दे
माँ शारदे ....
मन में तोहर दर्शन के आस बा
आइल बानी हम सभे तोहरे पास माँ
छवि अँखियन में उतार दे माँ
शारदे माँ....
हमनी के बचवन हईं अज्ञानी
अब ना करब जा हमनी मनमानी
हमनी के तू सुविचार दे
माँ शारदे माँ...
आवे ना हमनी के छंद बंद्य माँ
हमके सिखा द अक्षर चंद माँ
सुर हमनी के निखार दे माँ
शारदे माँ...
हमनी के दे द आतना बुद्धि
मन में ना रहे कवनो अशुद्धि
अब ना कवनो विकार दे माँ
माँ शारदे ... माँ शारदे... माँ शारदे
जीवन हमनी के सँवार दे, माँ शारदे
आपन लिखल
गीता चौबे
G 4 A, Green Garden Apartment
Hesag, Hatia, Ranchi, Jharkhand

नवगीत

नवगीत
कहता मैं स्वाधीन
*
संविधान
इस हाथ से
दे, उससे ले छीन।
*
जन ही जनप्रतिनिधि चुने,
देता है अधिकार।
लाद रहा जन पर मगर,
पद का दावेदार।।
शूल बिछाकर
राह में, कहे
फूल लो बीन।
*
समता का वादा करे,
लगा विषमता बाग।
चीन्ह-चीन्ह कर बाँटता,
रेवड़ी, दूषित राग।।
दो दूनी
बतला रहा हाय!
पाँच या तीन।
*
शिक्षा मिले न एक सी,
अवसर नहीं समान।
जनभाषा ठुकरा रह,
न्यायालय मतिमान।।
नीलामी है
न्याय की
काले कोटाधीन।
*
तब गोरे थे, अब हुए,
शोषक काले लोग।
खुर्द-बुर्द का लग गया,
इनको घातक रोग।।
बजा रहा है
भैंस के, सम्मुख
जनगण बीन।
*
इंग्लिश को तरजीह दे,
हिंदी माँ को भूल।
चंदन फेंका गटर में,
माथे मलता धूल।।
भारत को लिख
इंडिया, कहता
मैं स्वाधीन।
***
संजीव
२८-११-२०१८

घनाक्षरी

घनाक्षरी
*
नागनाथ साँपनाथ, जोड़ते मिले हों हाथ, मतदान का दिवस, फिर निकट है मानिए।
चुप रहे आज तक, अब न रहेंगे अब चुप, ई वी एम से जवाब, दें न बैर ठानिए।।
सारी गंदगी की जड़, दलवाद है 'सलिल', नोटा का बटन चुन, निज मत बताइए-
लोकतंत्र जनतंत्र, प्रजातंत्र गणतंत्र, कैदी न दलों का रहे, नव आजादी लाइए।। ***
संजीव, २८-११-२०१८

लघुकथा- विकल्प

 लघुकथा- विकल्प

पहली बार मतदान का अवसर पाकर वह खुद को गौरवान्वित अनुभव कर रहा था। एक प्रश्न परेशान कर रहा था कि किसके पक्ष में मतदान करे? दल की नीति को प्राथमिकता दे या उम्मीदवार के चरित्र को? उसने प्रमुख दलों का घोषणापत्र पढ़े, दूरदर्शन पर प्रवक्ताओं के वक्तव्य सुने, उम्मीदवीरों की शिक्षा, व्यवसाय, संपत्ति और कर-विवरण की जानकारी ली। उसकी जानकारी और निराशा लगातार बढ़ती गई।
सब दलों ने धन और बाहुबल को सच्चरित्रता और योग्यता पर वरीयता दी थी। अधिकांश उम्मीदवारों पर आपराधिक प्रकरण थे और असाधारण संपत्ति वृद्धि हुई थी। किसी उम्मीदवार का जीवनस्तर और जीवनशैली सामान्य मतदाता की तरह नहीं थी।
गहन मन-मंथन के बाद उसने तय कर लिया था कि देश को दिशाहीन उम्मीदवारों के चंगुल से बचाने और राजनैतिक अवसरवादी दलों के शिकंजे से मुक्त रखने का एक ही उपाय है। मित्रों से विमर्श किया तो उनके विचार एक जैसे मिले। उन सबने परिवर्तन के लिए चुन लिया 'नोटा' अर्थात 'कोई नहीं' का विकल्प।
२८-११-२०१८
***

द्विपदियाँ

द्विपदियाँ 
*
तज कर वाद-विवाद कर,
आँसू का अनुवाद.
राग-विराग भुला "सलिल"
सुख पा कर अनुराग.
.
भट का शौर्य न हारता,
नागर धरता धीर.
हरि से हारे आपदा,
बौनी होती पीर.
.
प्राची से आ अरुणिमा,
देती है संदेश.
हो निरोग ले तूलिका,
रच कुछ नया विशेष.
.
साँस पटरियों पर रही,
जीवन-गाडी दौड़.
ईधन आस न कम पड़े,
प्यास-प्रयास ने छोड़.
.
इसको भारी जिलहरी,
भक्ति कर रहा नित्य.
उसे रुची है तिलहरी,
लिखता सत्य अनित्य.
.
यह प्रशांत तर्रार वह,
माया खेले मौन.
अजय रमेश रमा सहित,
वर्ना पूछे कौन?
.
सत्या निष्ठा सिंह सदृश,
भूली आत्म प्रताप.
स्वार्थ न वर सर्वार्थ तज,
मिले आप से आप.
.
नेह नर्मदा में नहा,
कलकल करें निनाद.
किलकिल करे नहीं लहर,
रहे सदा आबाद.
.
२८-११-२०१७ 

मुक्तक

 मुक्तक

बहुत सुन्दर प्रेरणा है
सत्य ही यह धारणा है
यदि न प्रेरित हो सका मन
तो मिली बहु तारणा है
*
कार्यशाला में न आये, वाह सर
आये तो कुछ लिख न लाये, वाह सर
आप ही लिखते रहें, पढ़ते रहें
कौन इसमें सर खपाए वाह सर
*
आइये मिलकर गले मुक्तक कहें
गले शिकवे गिले, हँस मुक्तक कहें
महाकाव्यों को न पढ़ते हैं युवा
युवा मन को पढ़ सके, मुक्तक कहें
*
जगाते रहते गुरूजी मगर सोना है
जागता है नहीं है जग यही रोना है
कह रहे हम पा सकें सब इसी जीवन में
जबकि हम यह जानते सब यहीं खोना है


नवगीत

नवगीत:
*
गीत पुराने छायावादी
मरे नहीं
अब भी जीवित हैं.
तब अमूर्त
अब मूर्त हुई हैं
संकल्पना अल्पनाओं की
कोमल-रेशम सी रचना की
छुअन अनसजी वनिताओं सी
गेहूँ, आटा, रोटी है परिवर्तन यात्रा
लेकिन सच भी
संभावनाऐं शेष जीवन की
चाहे थोड़ी पर जीवित हैं.
बिम्ब-प्रतीक
वसन बदले हैं
अलंकार भी बदल गए हैं.
लय, रस, भाव अभी भी जीवित
रचनाएँ हैं कविताओं सी
लज्जा, हया, शर्म की मात्रा
घटी भले ही
संभावनाऐं प्रणय-मिलन की
चाहे थोड़ी पर जीवित हैं.
कहे कुंडली
गृह नौ के नौ
किन्तु दशाएँ वही नहीं हैं
इस पर उसकी दृष्टि जब पडी
मुदित मग्न कामना अनछुई
कौन कहे है कितनी पात्रा
याकि अपात्रा?
मर्यादाएँ शेष जीवन की
चाहे थोड़ी पर जीवित हैं.
२८-११-२०१४
***

त्रिपदियाँ

त्रिपदियाँ

*
प्राण फूँक निष्प्राण में, गुंजित करता नाद
जो- उससे करिये 'सलिल', आजीवन संवाद
सुख-दुःख जी वह दे गहें, हँस- न करें फ़रियाद।
*
शर्मा मत गलती हुई, कर सुधार फिर झूम
चल गिर उठ फिर पग बढ़ा, अपनी मंज़िल चूम
फल की आस किये बिना, काम करे हो धूम।
*
करी देश की तिजोरी, हमने अब तक साफ़
लें अब भूल सुधार तो, खुदा करेगा माफ़?
भष्टाचार न कर- रहें, साफ़ यही इन्साफ।
*

मुक्तक

मुक्तक
संजीव 
*
रात गई है छोड़कर यादों की बारात
रात साथ ले गई है साँसों के नग्मात
रात प्रसव पीड़ा से रह एकाकी मौन
रात न हो तो किस तरह कहिए आए प्रात
*
कोशिश पति को रात भर रात सुलाती थाम
श्रांत-क्लांत श्रम-शिशु को दे जी भर आराम
काट आँख ही आँख में रात उनींदी रात
सहे उपेक्षा मौन रह ऊषा ननदी वाम
*
२८-११-२०२०

शुक्रवार, 27 नवंबर 2020

नवगीत घर तो है

नवगीत
घर तो है
*
घर तो है
लेकिन आँगन
या तुलसी चौरा
रहा नहीं है।
*
अलस्सुबह
उगता है सूरज
किंतु चिरैया
नहीं चहकती।
दलहन-तिलहन,
फटकन चुगने
अब न गिलहरी
मिले मटकती।
कामधेनुएँ
निष्कासित हैं,
भैरव-वाहन
चाट रहे मुख।
वन न रहे,
गिरि रहे न गौरी
ब्यौरा गौरा
रहा नहीं है।
*
घरनी छोड़
पड़ोसन ताकें।
अमिय समझ
विष गुटखा फाँकें।
नगदी सौदा
अब न सुहाये,
लुटते नित
उधार ला-ला के।
संबंधों की
नीलामी कर-
पाल रहे खुद
दुःख
कहकर सुख।
छिपा सकें मुख
जिस आँचल में
माँ का ठौरा
रहा नहीं है।
२१-२-२०१६ 
***

मुक्तिका

मुक्तिका
*
ऋतुएँ रहीं सपना जगा।
मनु दे रहा खुद को दगा।।
*
अपना नहीं अपना रहा।
किसका हुआ सपना सगा।।
*
रखना नहीं सिर के तले
तकिया कभी पगले तगा।।
*
कहना नहीं रहना सदा
मन प्रेम में नित ही पगा।।
*
जिससे न हो कुछ वासता
अपना हमें वह ही लगा।।
***
संजीव
२७-११-२०१८

मुक्तक

मुक्तक
*
मतदान कर, मत दान कर, जो पात्र उसको मत मिले।
सब जन अगर न पात्र हों, खुल कह, न रखना लब सिले।।
मत व्यक्त कर, मत लोभ-भय से, तू बदलना राय निज-
जन मत डरे, जनमत कहे, जनतंत्र तब फूले-फले।।
*
भाषा न भूषा, जात-नाता-कुल नहीं तुम देखना।
क्या योग्यता, क्या कार्यक्षमता, मौन रह अवलोकना।।
क्या नीति दल की?, क्या दिशा दे?, देश को यह सोचना-
उसको न चुनना जो न काबिल, चुन न खुद को कोसना।।
*
जो नीति केवल राज करने हेतु हो, वह त्याज्य है।
जो कर सके कल्याण जन का, बस वही आराध्य है।
जनहित करेगा खाक वह, दल-नीति से जो बाध्य है-
क्यों देश-हित में सत नहीं, आधार सच्चा साध्य है।।
*
शासन-प्रशासन मात्र सेवक, लोक के स्वामी नहीं।
सुविधा बटोरें, भूल जनगण, क्या यही खामी नहीं?
भत्ते व वेतन तज सभी, जो लोकसेवा कर सके-
वही जनप्रतिनिधि बने, क्यों भरें सब हामी नहीं??
*
संजीव
२७-११-२०१८

गुरुवार, 26 नवंबर 2020

अकथा नैवेद्य

एक अकथा 
नैवेद्य 
*
- प्रभु! मैं तुम सबका सेवक हूँ। तुम सब मेरे आराध्य हो। मुझे आलीशान महल दो। ऊँचा वेतन, निशुल्क भोजन, भत्ते, गाड़ी, मुफ्त इलाज का व्यवस्था कर दो ताकि तुम्हारी सेवा-पूजा कर सकूँ। बच्चे ने प्रार्थना की।
= प्रभु की पूजा तो उनको सुमिरन से होती है। इन सुविधाओं की क्या जरूरत है? 
- जरूरत है, प्रभु त्रिलोक के स्वामी हैं। उन्हें छप्पन भोग अर्पण तभी कर सकूँगा जब यह सब होगा।
= प्रभु भोग नहीं भाव के भूखे होते हैं। 
- फिर भाव अर्पित करनेवालों को अभाव में क्यों रखते हैं?
= वह तो उनकी करनी का फल है। 
- इसीलिये तो, प्रभु से माँगना गलत कैसे हो सकता है? फिर जो माँगा उन्हीं के लिए
= लेकिन यह गलत है। ऐसा कोई नहीं करता ।
- क्यों नहीं करता? किसान का कर्जा उतारने के लिए एक दल से दूसरे दल में जाकर सरकार बनाने की जनसेवा हो सकती है तो प्रभु से माँगकर प्रभु की जन सेवा क्यों नहीं हो सकती? 
मंदिर में दो बच्चों की वार्ता सुनकर स्तब्ध थे प्रभु लेकिन पुजारी प्रभु को दिखाकर ग्रहण कर रहा था नैवेद्य।
***
संजीव
७९९९५५९६१८ 
२६-११-२०१९