मंगलवार, 23 जनवरी 2018

छाया सक्सेना 'प्रभु'
चित्र 
जन्म: तिथि, स्थान 
आत्मज: 
जीवन साथी: 
शिक्षा:
व्यवसाय:
प्रकाशित कृतियाँ:
उपलब्धि:
संपर्क:

चलभाष: ०७०२४२८५७८८ ।   

​प्रियवर! 
स्वागत आपका, पुष्प गुच्छ ले आज।
चंदन वंदन आरती, करता सकल समाज।।
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नित नव उन्नति हो रही, हर्ष मनाओ मीत।
अमर रहे साहित्य में, सुंदर सुफल सुनीत।।
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मिलकर करना है सदा, सबको गुरु का ध्यान।
गुरु-चरणों में आइये, तभी मिलेगा ज्ञान।।
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करें सभी साहित्य में, अपने गुरु का नाम।
बिन गुरुवर मिलता नहीं, हमको हरि का धाम।।
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गुरु-चरणों में ही मिले, सकल जगत का सार।
द्वेष, कपट, छल त्यागिए, अर्पित कर अधिकार।।
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नदियाँ साग़र से मिलें, नैसर्गिक अधिकार।
कर्तव्यों को कीजिए, तभी मिलेगा प्यार।।
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प्रेम, त्याग, विश्वास से, सुधरे सकल समाज।
गुरु-सुमिरन से ही बने, बिगड़े सारे काज।।
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गुरु के चरणों का करें, जो सुमिरन दिन रैन।
काज सुफल उसके हुए, आदि-अंत तक चैन।।
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पंछी बैठा डाल पर, देखे अंबर-ओर।
मनहर लाली सज रही, उदित हो रही भोर।।
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सभी सहेजें प्रकृति को, अति उत्तम यह काज।
जन-मन को प्रेरित करें, प्रण लें लें सब आज।।
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रंग-बिरंगी कल्पना, आज हुई साकार।
सुखद-सरस परिकल्पना, दृश्य-श्रव्य आधार।।
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निशिचर दानव दैत्य शठ, असुर अधम दनु दीन।
राम-नाम जप  मुक्त हों, भव-बंधन से हीन।।
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अनावृष्टि दुर्भिक्ष से, जब भी पड़े अकाल।
सूखी धरती  भुखमरी, हो जीवन का काल।। 
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अनल आग पावक अगन, ज्वाला दाहक तेज।
वायुसखा ही अग्नि है, जल को रखो सहेज।।
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भूधर पर्वत शैल गिरि, नग या शिखर पहाड़।
धरणीधर अद्री अचल, शिलागार बाड़।।
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उत्तम अद्भुत सी लगे, अनुपम  अपनी प्रीत।
अप्रतिम उपमा दीजिए, अतुलनीय मनमीत।।
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अमिय अमी सुरभोग है, सोम सुधा रसधार।
अमृत सम साहित्य पर, हँसकर जीवन वार।।
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बिन सोचे करिए नहीं, अपने मत का दान।
बड़ा धर्म से कर्म है, मतदाता ले जान।।
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पाँच साल के बाद ही, कर पाते मतदान।
जागो मतदाता सभी, रहो नहीं अनजान।।
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छंदों की लय ही बनी, लेखन का आधार।
सरल हृदय को 'प्रभु' सदृश, लगे छंद परिवार।। 
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नेक कर्म कर कीर्ति पा, मंगल हो चहुँ ओर।
परहित कर इंसान तो, नाच उठे मन मोर।।
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आध्यात्मिक शुभ कर्म से, मनुज मनुज हो मीत।
मिलतीं शत शुभकामना, सके ह्रदय भी जीत।।
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महिमा माने योग की, विश्व कर रहा नित्य।
सब रोगों से मुक्ति पा, सतत करे सत्कृत्य।।
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अजर-अमर वह लेखनी, जो लिखती नित सत्य।
माँ वाणी की कृपा से, करती सदा सुकृत्य।।  
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कर्म  हमारा धर्म है, कहते वेद पुरान।
सच्चे मन से कीजिए, हों प्रसन्न भगवान।।
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जैसे होंगे कर्म फल, वैसे होंगे मीत।
अपनों के संग गाइये, प्रभु के मधुरिम गीत।।
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बच्चे तो भगवान का, होते हैं प्रतिरूप।
दर्शन इनमें कीजिए, राम-कृष्ण के रूप।।
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सुघड़ लाड़ली जानकी, हिय प्रियतम रघुनाथ।
थकन भुला मुस्का रहीं, वन में रघुवर साथ।।
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सुफल सुफल ही सुफल है, जब हों सुफल सुकाज।
सुयश सुयश बढ़ता रहे, संगम प्रभु का आज ।।
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रघुवर शोभित हो रहे, जनक-लली प्रभु-साथ।
जगत जगत को मोहते, सरस सरस रघुनाथ।।
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रमण-रमण सुंदर रमण, रमण-रमण तन श्याम ।।
रमण-रमण सम राधिका, रमण-रमण घनश्याम ।।
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सुमन सुमन चहुँ चहुँ दिशा, सुमन सुमन अरु माल ।
सुमन सुसज्जित भवन है, सुमन सुमन प्रभु लाल ।।
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सुमित सुमित प्रिय सुमित है, सुमित सुमित मन आज ।
चरण-चरण रज चरण है, हृदय हृदय रघुराज ।।
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खोया है बचपन  कहीं, सारे देखो आज ।
गुम हो गईं कहानियाँ, छूटे सकल सुकाज ।।३५ 
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मेल जोल से दूर हैं, मोबाइल ही यार ।
वाहन लेकर चल दिये, कहीं ढूंढने प्यार ।।
बातें लगती हैं बुरी, जो कोई समझाय ।
छोटी सी ही उमर में ,स्वयं गुरू बन जाय ।।
मानव मूल्यों का करो,  सतत् सदा  सत्कार ।
प्रेम भाव मिलकर रहें, तभी  चलत  संसार  ।।
सच्ची मानवता वही, जिससे हो  कल्याण ।
मानव हिय अनमोल है, इसमें बसते  प्राण ।।
फैली है चहुँ ओर ही, ममतामयी  सुवास  ।
मधुरिम- मधुरिम  हो गया, प्रिय पर अब विश्वास ।।
शिव शंकर के शीश पे, आय विराजी आप ।
निर्मल जल की स्वामिनी, पूजो कटते पाप ।।
सागर  नदियाँ अमिय हैं, जानो तुम यह रीत ।
आशा  पूरी  करत  है,  भक्ति  रत्न अरु प्रीत ।।
प्रेम  रत्न चहुँ ओर है,  सारे  मानो आज ।
मिलत जगत है भगत को, जीवन का यह राज ।।
मुश्किल घटती  है तभी , जब लें  प्रभु का नाम ।
अभी समय है  जागिए,  मिल    जायेंगे राम ।।
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बिन मुश्किल के नहिं बने, जग में कोई काज ।
कदम बढ़ा साथी तभी, मिले सफलता  आज ।।
सबको नित प्रति चाहिए, अच्छा भोजन रोज ।
मिलजुल कर रहते सभी, तब बढ़ जाता ओज ।।
नित्य योग को कीजिए, मिलकर सह परिवार ।
यश वैभव उन्नति  मिले, बने  सुखद  आधार ।।
सच्चाई की राह में, काँटे  मिलते जाय ।
प्रेम भाव से प्रभु मिले, सच्चा सुख उपजाय ।।
श्रद्धा अरु विश्वास का,   अद्भुत है  संयोग ।
अंध भक्ति  से दूर  हो, बने  जागरुक  लोग ।।
दुर्लभ  मानव  जन्म है, इसे बनाएँ  खास ।
दुर्व्यसनों को छोड़ के, मधुर  जागाएँ  आस ।।
अति होती है सदा से,  हरदम  ही बेकार ।
भक्ति भाव जीवन जिएँ,  हों प्रभु पर बलिहार ।।
कथनी करनी में नहीं,  करना  कोई  भेद ।
कठिन भले जीवन लगे, नहिं रखना  मतभेद ।।
लगन लगी श्री राम की, भजती प्रभु को आन।
हाथ जोड़ विनती करूँ,  अज्ञानी  मोहि  जान।।
धनुष विराजे हाथ में,  संकट काटो नाथ ।
शरण तिहारे आ गयी, कीजे आप सनाथ ।।
* बप्पा  को पूजें सभी, गौरा भोले संग ।
चारों वेदों ने कहा,  मैय्या मोहे रंग ।।
संगम के * साहित्य को, देखो जाने लोग ।
जैसी होगी लेखनी,  वैसा होगा भोग ।।
संगम होवे ज्ञान का,  ऐसा कीजे कर्म ।
गुरु आज्ञा को  मान के, पालें साँचा धर्म।।
मनुज सदा  साहित्य में,  रचो नित्य आयाम ।
हिंदी का सम्मान हो,  ज्योतित आठो याम ।।
दोहे का होवे सृजन, आओ वीर सुजान ।
छंदों से शाला सजे, बढ़े ज्ञान अरु शान ।।
दोहे  लिखना  है सभी , रखो ध्यान तुम धीर ।
भाव शिल्प आधार हो, तभी बनोगे वीर ।।
कठिन परीक्षा की घड़ी, जब भी सम्मुख आय ।
याद प्रभू को जो करे,  वही  जीतता जाय ।।
शिव की पूजा कीजिए, शुभ होंगे सब काज ।
चंदन वंदन अर्चना,   मिल के कीजे  आज ।।
लक्ष्मी पूजन कीजिए, हाथ जोड़ कर रोज ।
विष्णु प्रिया माँ आप हैं, सुरभित सुमन सरोज ।।
नाम सुजाता है भला,  जग को जो जी जाय ।
मधुर मधुर जो बोलता , मधुर मधुर फल पाय ।।
अवध सुहावन  लग रहा, देखो कैसा आज ।
सिय  सियवर  का आगमन, शोभित सुफल सुकाज ।।
अधम अधम  अरु अधम ही, करे सुयश का नाश ।
पापी हिय में बसत है, दुष्ट जीव कर पाश ।।
मंजिल उनको ही मिले, जो चलते अविराम ।
एक लक्ष्य को साधिए, तभी बढ़ेगा नाम ।।
सतत परिश्रम जो करे, वह ही विजयी होय ।
भक्ति भाव हिय धार ले, मनुज नहीं वह रोय ।।
राम राम श्री राम हैं, जग के पालनहार ।
नित्य भजन  जो भी करे, वो हो भव से पार ।।
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धरती अम्बर एक से, लगते हैं प्रभु आज ।
ओम मंत्र गुणगान से, सुधरे सकल समाज ।।
करती विनती हूँ  सदा,  शारद मैया रोज ।
भक्तों को माँ ज्ञान दें, भरें  हृदय में ओज ।।
चमत्कार की आस में,  मत बैठो बलवीर ।
कर्म करो योगी बनो,  मनुज बनो रणवीर ।।
चमत्कार होवे तभी,  जब गुरु  किरपा होय ।
शरण गुरू की जो गया, भगवन मिलते  सोय ।।
ओजमयी व्यक्तित्व ही, है जिनकी पहचान ।
चमत्कार हो कर्म से,  बढ़े  मान  अरु शान ।।
मातु पिता आशीष से, चमत्कार  हो जाय ।
नाम करे जग में सदा,  जन्म सफ़ल कहलाय ।।
चमत्कार  हो जात है, यदि दृढ़ हो विश्वास ।
मंगल मंगल हो सदा, पूरण होती  आस ।।
सच्ची मानवता वही, जो  कर दे कल्याण ।
मानव हिय अनमोल है, इसमें बसते प्राण ।।
चलो सजायें पटल को, आत्मकथ्य लिख  धीर ।
सहज  सुखद संदेश हो,  कभी नहीं  हो  पीर  ।।
खट्टी- मीठी  याद को,  लिखना होगा  आज ।
कुछ मनचाही बात भी, बनती सुखद  सुकाज ।।
मान तिरंगे का रखा, जब तक तन में प्राण ।
ऐसे वीर शहीद को,    बारम्बार  प्रणाम ।।
आस और विश्वास की, बड़ी अनोखी प्रीत ।
हिय में धारण जो करे, वो जग जाए जीत ।।
गीत प्रभू के गाइए, मन में रख विश्वास ।
शरण गहे के पूरते, सारे सुफल प्रयास।।
मन मोहन में रम गया, ज्यों सागर में नीर ।
कृपा करें गोपाल जी, रहे नहीं तन पीर ।।
नाम जपो श्री कृष्ण का, तभी मिटेंगे पाप ।
सच्चे मन से कीजिए, दान पुण्य सब आप ।
दानों में सबसे बड़ा , अन्न दान को जान ।
जीवन इससे ही चले , माने सकल जहान ।।
सबसे मीठा जगत में, वाणी का है प्यार।
इससे हिय को जीत के, बन जाते  रसधार ।।
मुश्किल घटती  है सभी , जप लो प्रभु का नाम ।
अभी समय है जागिए, मिल जायेंगे राम ।।
बिन मुश्किल के नहिं बने, जग में कोई काज ।
कदम बढ़ा साथी तभी, मिले सफलता  आज ।।
अहंकार अभिमान ही,  करते  सबका नाश ।
दम्भ दर्प को छोड़ के, करिए  सफ़ल  प्रयास ।।
जीवन के ये चार दिन, देखो हैं अनमोल ।
भजन भगत तब सफल हो,जब हों मीठे बोल ।।
वाणी  तो  वरदान  है, शारद मातु महान ।
वंदन पूजन  कीजिए, मानत सकल जहान ।।
लक्ष्य बना कर कीजिये, सपनों को साकार ।
तब ही मंजिल मिलत है, बनत सुखद आकार ।।
नेक कर्म जो करत है, जग में सफल कहाय ।
चार दिनों की  जिंदगी, सब  के  बनो सहाय ।।
हर्षित हैं साथी सभी, दिखती नयी तरंग ।
झूम झूम नाचे सभी, हिय में  उठी  उमंग ।।
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मनमोहन राधा बने, नील वर्ण भरमाय।
धरती मधुवन सम लगे, रोम- रोम हरषाय।।?
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अकड़-अकड़ कर दंभ ही, अभिमानी बन जाय ।
ठसक  हेकड़ी  दर्प से,  अहंकार पनपाय ।। 
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साहित्यिक उपहार को, चलो सहेजें आज ।
संगम नदियों सा रहे, सुरभित सुफल सुकाज ।।
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आओ! मिलकर प्रण करें, स्वदेशी अपनाय।
प्रकृति धरा के रंग से,  सुरभित तन खिल जाय।।
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अजर -अमर होवे सदा, साचे-साचे कर्म ।
मनवा तू बस धीर से,  सदा निभाये धर्म ।। 
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अंधेरा अरु अंध ही, अंधकार कहलाय ।
तिमिर स्याह तम अंधता,  अँधियारा  बन जाय ।।
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सरस सुहावन बाग है, मधुर मधुर महकाय।
सुरभि सुरभि पावन लगे, मनुज मनुज हरषाय ।।
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पढ़ने बैठी जब भूगोल इतिहास उसमें नज़र आया पीछे था सामान्य ज्ञान और था गणित का काला साया । अंग्रेजी लगा रूठ गयी है दूर व्याकरण को भी कर चुकी है वो किताब से हंस रही थी मानो उपहास कर रही थी । हिंदी ,संस्कृत बोल रही थीं शायद वार्तालाप कर रही थीं चुप चाप उनको सुन रही थी उनकी बातों को सोच रही थी । सारे विषय सामने आने लगे विज्ञान का ज्ञान देने लगे मन मनतिष्क भी सुन रहा था लगा यह भी कुछ कह रहा था । बन्द करके आँखों को बैठी सोचा सबसे मुक्ति मिलेगी पर आये ख़्वाबों में सभी विषय बोले आओ सब नाचे गायें । खोली आँखे -थम गये विषय अंधेरों में जैसे जम गये विषय किताबों में निराश ही बैठे रहे खुद अपना इतिहास रचते रहे । फिर अचानक से रौशनी आई देखा सामने एक कंप्यूटर था गूगल खोल कर जब खोजा सारे विषय फिर यहाँ भी पाये ।
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