गुरुवार, 31 अगस्त 2017

doha

एक दोहा
*
भूल भुलाई, भूल न भूली, भूलभुलैयां भूली भूल.
भुला न भूले भूली भूलें, भूल न भूली भाती भूल.
*

doha


दोहा सलिला
दोहा पढ़िए चाह कर
*
दोहा पढ़िये चाह कर, अनचाहे जा भूल
चाह मन बसे सुमन सम, अनचाहे हो शूल
*
चाह अंजली मल हुई, श्वेता लाल गुलाल
दीपा दीपित दीप ले, चली उठाये भाल
*
चाह शिवानी ने करी, शिव की झुलसा काम चाह मिल गयी चाह को, रति तडपे विधि वाम *
जान जानकी में बसी, हुई जानकी गैर देख विकल मिथलेश को, राम मनाएं खैर *
दशकंधर की चाह ने, सब कुछ किया तबाह इन्द्रजीत कर पराजित, इन्द्रजीत भर आह *
चाह-चाह कर चाह को, बनो चाह की चाह.
बरबस चाहे चाह फिर, भरे आह कह वाह.
*
चाह चाह की राह में, खड़ा देखता राह. चाह चाह को खिझाने, रही दिखाती राह. *
चाह चाह से झगड़ कर, बनी चाह की चाह
चाह चाह से हारकर, जीत गया पा चाह
*
चाह चाह की थाह ले, उथला या गंभीर? चाह चली मुँह फेरकर, चाह न चाह फकीर *
चाह चाह कर चाह को, हो निर्जीव सजीव
डाह दाह से झुलसकर, हो सजीव निर्जीव
*
गौ-भाषा को नित दुहें, यदि दोहा की चाह दो-दो हा-हा मिल करें, राही की परवाह *
चाह भारती बन सके, जगवाणी जग जीत भारतीय ही राह में, बाधक इंग्लिश-प्रीत *
चाह-चाह कर चाह को, करी चाह की चाह
चाह न चाहे चाह को, चाह फँसा कर चाह
*
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बुधवार, 30 अगस्त 2017

doha karyashala

कार्यशाला:
चर्चा डॉ. शिवानी सिंह के दोहों पर
*
गागर मे सागर भरें भरें नयन मे नीर|
पिया गए परदेश तो कासे कह दे पीर||
तो अनावश्यक, प्रिय के जाने के बाद प्रिया पीर कहना चाहेगी या मन में छिपाना? प्रेम की विरह भावना को गुप्त रखना जाना करुणा को जन्म देता है.
.
गागर मे सागर भरें, भरें नयन मे नीर|
पिया गए परदेश मन, चुप रह, मत कह पीर||
*
सावन भादव तो गया गई सुहानी तीज|
कौनो जतन बताइए साजन जाए पसीज||
साजन जाए पसीज = १२
सावन-भादों तो गया, गई सुहानी तीज|
कुछ तो जतन बताइए, साजन सके पसीज||
*
प्रेम विरह की आग मे झुलस गई ये गात|
मिलन भई ना सांवरे उमर चली बलखात||
गात पुल्लिंग है., सांवरा पुल्लिंग, नारी देह की विशेषता उसकी कोमलता है, 'ये' तो कठोर भी हो सकता है.
प्रेम-विरह की आग में, झुलस गया मृदु गात|
किंतु न आया सांवरा, उमर चली बलखात||
*
प्रियतम तेरी याद में झुलस गई ये नार|
नयन बहे जो रात दिन भया समुन्दर खार||
.
प्रियतम! तेरी याद में, मुरझी मैं कचनार|
अश्रु बहे जो रात-दिन, हुआ समुन्दर खार||
कचनार में श्लेष एक पुष्प, कच्ची उम्र की नारी,
नयन नहीं अश्रु बहते हैं, जलना विरह की अंतिम अवस्था है, मुरझाना से सदी विरह की प्रतीति होती है.
*
अब तो दरस दिखाइए, क्यों है इतनी देर?
दर्पण देखूं रूप भी ढले साँझ की बेर|
क्यों है इतनी देर में दोषारोपण कर कारण पूछता है. दर्पण देखना सामान्य क्रिया है, इसमें उत्कंठा, ऊब, खीझ किसी भाव की अभिव्यक्ति नहीं है. रूप भी अर्थात रूप के साथ कुछ और भी ढल रहा है, वह क्या है?
.
अब तो दरस दिखाइए, सही न जाए देर.
रूप देख दर्पण थका, ढली साँझ की बेर
सही न जार देर - बेकली का भाव, रूप देख दर्पण थका श्लेष- रूप को बार-बार देखकर दर्पण थका, दर्पण में खुद को बार-बार देखकर रूप थका
*
टिप्पणी- १३-११ मात्रावृत्त, पदादि-चरणान्त व पदांत का लघु गुरु विधान-पालन या लय मात्र ही दोहा नहीं है. इन विधानों से दोहा की देह निर्मित होती है. उसमें प्राण संक्षिप्तता, सारगर्भितता, लाक्षणिकता, मर्मबेधकता तथा चारुता के पञ्च तत्वों से पड़ते हैं. इसलिए दोहा लिखकर तत्क्षण प्रकाशन न करें, उसका शिल्प और कथ्य दोनों जाँचें, तराशें, संवारें तब प्रस्तुत करें.
***

mukatak

 मुक्तक
साधना की साधना पल-पल सफल हो
कर्म की आराधना पल-पल सफल हो
ज़िन्दगी जीना महज जीवन नहीं है
मर्म मन की भावना सुरभित सजल हो
***

navgeet

नवगीत -
*
पहले मन-दर्पण तोड़ दिया
फिर जोड़ रहे हो
ठोंक कील।
*
कैसा निजाम जिसमें
दो दूनी
तीन-पाँच ही होता है।
जो काट रहा है पौधों को
वह हँसिया
फसलें बोता है।
कीचड़ धोता है दाग
रगड़कर
कालिख गोर चेहरे पर।
अंधे बैठे हैं देख
सुनयना राहें रोके पहरे पर।
ठुमकी दे उठा, गिराते हो
खुद ही पतंग
दे रहे ढील।
पहले मन-दर्पण तोड़ दिया
फिर जोड़ रहे हो
ठोंक कील।
*
कैसा मजहब जिसमें
भक्तों की
जेब देख प्रभु वर देता?
कैसा मलहम जो घायल के
ज़ख्मों पर
नमक छिड़क देता।
अधनँगी देहें कहती हैं
हम सुरुचि
पूर्ण, कपड़े पहने।
ज्यों काँटे चुभा बबूल कहे
धारण कर
लो प्रेमिल गहने।
गौरैया निकट बुलाते हो
फिर छोड़ रहे हो
कैद चील।
पहले मन-दर्पण तोड़ दिया
फिर जोड़ रहे हो
ठोंक कील।
****
३०-८-२०१६
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मंगलवार, 29 अगस्त 2017

पौधारोपण

chhand shala

छंद चर्चा
.
नाम क्या इस छंद का बतलाइए?
किस तरह यह रचा जाता, नियम भी समझाइए.
लिख सकें तो छंद लिखकर हमें भी सिखलाईए.
.
पाखंड बाबा नित्य कर फ़ैला रहे हैं जाल.
नेता बने चारण रहे, इन ढोंगियों को पाल.
सरकार ही अक्षम हुई, दंगा  न पाई रोक.
थू-थू हुई हर दिशा में, जनगण मनाता शोक.
...

dwipadi

द्विपदी सलिला:
इस आभासी जग में :

इस आभासी जग में सचमुच, कोई न पहरेदार
शिक्षित-बुद्धिमान हमलावर, देते कष्ट हजार
*
जिन्हें जानते हैं जीवन में, उन्हें बनायें मित्र
'सलिल' सुरक्षित आप रहेंगे, मलिन न होगा चित्र
*
भली-भाँति कर जाँच- बाद में, भले मित्र लें जोड़
संख्या अधिक बढ़ाने की प्रिय!, कभी न करिए होड़
*
नकली खाते बना-बनाकर, छलिए ठगते मीत
प्रोफाइल लें जाँच, यही है, सीधी-सच्ची रीत
*
पढ़ें पोस्ट खाताधारी की, कितनी-कैसे लेख
लेखक मन की देख सकेंगे, रचनाओं में रेख
*
नकली चित्र लगाते हैं जो, उनसे रहिए दूर
छल करना ही उनकी फितरत, रहिए सजग जरूर
*
खाताधारक के मित्रों को देखें, चुप सायास
वस्त्र-भाव मुद्राओं से भी, होता कुछ आभास
*
देह-दर्शनी मोहकतामय, व्याल-जाल जंजाल
दिखें सोचिए इनके पीछे, कैसा है कंकाल?
*
संचित चित्रों-सामग्री को, देख करें अनुमान
जुड़ें-ना जुड़ें आप सकेंगे, उनका सच पहचान
*
शिक्षा, स्वजन, जीविका पर भी, तनिक दीजिए ध्यान
चिंतन धारा से भी होता, चिन्तक का अनुमान
*
नेता अभिनेता फूलों या, प्रभु के चिपका चित्र
जो परदे में छिपे- न उसका, विश्वसनीय चरित्र
*
स्वजनों के प्रोफाइल देखें, सच्चे या अनमेल?
गलत जानकारी देकर, कर सके न कोई खेल
*
शब्द और भाषा भी करते, गुपचुप कुछ संकेत
देवमूर्ति से तन में मन का, स्वामी कहीं न प्रेत
*
आक्रामक-अपशब्दों का जो, करते 'सलिल' प्रयोग
दूर रहें ऐसे लोगों से- हैं समाज के रोग
*
पासवर्ड रख गुप्त- बदलते रहिए बारम्बार
जान न पाए अन्य, सावधानी की है दरकार
*
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laghukatha

लघु (संवाद) कथा
अनदेखी
संजीव
*
'पोता विद्यालय जाने से मना करता है कि रास्ते में बच्चे गाली-गलौज करते हैं, उसे भय लगता है।' मित्र  बताया। 
अगले दिन मैं मित्र के पोते के साथ स्थानीय भँवरताल उद्यान गया। मार्ग में एक हाथी मिला जिसके पीछे कुत्ते भौंक रहे थे।
'क्यों बेटे? क्या देख रहे हो?'
बाबा जी! हाथी के पीछे कुत्ते भौंक रहे हैं।
'हाथी कितने हैं?'
बाबाजी ! एक।
'और कुत्ते?'
कई।
'अच्छा, हाथी क्या कर रहा है?'
कुत्तों की ओर बिना देखे अपने रास्ते जा रहा है।
हम उद्यान पहुँच गए तो उस मौलश्री वृक्ष के नीचे जा बैठे जहाँ ओशो को सम्बोधि प्राप्त हुई थी। बच्चे से मैंने पूछा: ' इस वृक्ष के बारे में कुछ जानते हो?'
जी, बाबा जी! इसके नीचे आचार्य रजनीश को ज्ञान प्राप्त हुआ था जिसके बाद उन्हें 'ओशो' कहा गया।
मैंने बच्चे को बताया कि ओशो को पहले स्थानीय विरोध और बाद में अमरीकी सरकार का विरोध झेलना पड़ा, लेकिन उन्होंने अपनी राह नहीं बदली और अंत में महान चिन्तक के रूप में इतिहास में अमर हुए।
वापिस लौटते हुए मैंने बच्चे से पूछा: 'बेटे! यदि हाथी या ओशो राह रोकनेवालों पर ध्यान देकर रुक जाते तो क्या अपनी मंजिल पा लेते?'
नहीं बाबा जी! समझ गया कोई कितना भी रास्ता रोके, मंजिल आगे बढ़ने से ही मिलती है।
''यार! आज तो गज़ब हो गया, पोता अपने आप विद्यालय जाने को तैयार हो गया। उसके पीछे-पीछे मैं भी गया लेकिन वह रास्ते में भौकते कुत्तों से न डरा, न उन पर ध्यान दिया, सीधे विद्यालय जाकर ही रुका।'' मित्र ने प्रसन्नता से बताया.
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doha

दोहा सलिला
*
राधा धारा भक्ति की, कृष्ण कर्म-पर्याय.
प्रेम-समर्पण रुक्मिणी, कृष्णा ले-दे न्याय
*
कर मत कर तू होड़ अब, कर मन में संतोष
कर ने कर से कहा तो, कर को आया होश
*
दिनकर-निशिकर सँग दिखे, कर में कर ले आज
ऊषा-संध्या छिप गयीं, क्या जाने किस व्याज?
*
मिले सुधाकर-प्रभाकर, गले-जले हो मौन
गले न लगते, दूर से पूछें कैसा कौन?
*
प्रणव नाद सुन कुसुम ले, कर जुड़ होते धन्य
लख घनश्याम-महेश कर, नतशिर हुए अनन्य
*
खाकर-पीकर चोर जी, लौकर लॉकर तोड़
लगे भागने पुलिस ने, पकड़ा पटक-झिंझोर
*
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आज की बात

कल से नयी पारी आरम्भ हो गई-शासकीय कला निकेतन पोलीटेक निक में पदार्थ तकनीकी मटीरियल टैकनालाजी पढाना आरम्भ कर दिया.
.
बाबा राम रहीम को, 
गोली मारो यार.
सीख-सिखाये कुछ नया,
स्वप्न करें साकार.
.
सु मन रहे तो ही गहे,
श्री वास्तव मे आप.
सुमन सुरभि सम कीर्ति-यश,
जाए जग में व्याप.
.
सिंधु-सायना ने किया,
असामान्य संघर्ष.
महिला जीवट को मिला,
एक और उत्कर्ष.
.
सीमा से संदेश है,
रहिये सदा सतर्क.
शान्ति शक्ति से ही रहे,
करें न व्यर्थ कुतर्क.
.
नन्हा दीपक भी सके,
विपुल अन्धेरा लील.
न्यायिक देरी को कफ़न,
मिले ठोंक दें कील.
.
अवध शरण अवधेश को,
देकर है न प्रसन्न.
रामालय में राज्य हो,
रहे न कोई विपन्न.
.
सुषमा तभी स्वराज की,
जब प्रभु हो हर आम.
सेवक प्रथम नरेंद्र हो,
काम करे निष्काम.
.

सोमवार, 28 अगस्त 2017

छंद सीखें- गीतिका

छंद शाला
.
नाम क्या इस छंद का बतलाइए?
समझकर फ़िर अन्य को समझाइए.
रच सकें तो सौ गुना आनंद हो-
सिखा कर शारद कृपा भी पाइए.
.
गीतिका रचना सरल है, कवि न यह व्यायाम है.
भाव रस लय बिम्ब गति यति, युक्त नव आयाम है.
छवि अलंकारित सुभाषा, ध्वनि निनादित नर्मदा.
काम माया मोह तज कर,  कर्म केवल धर्मदा.
.

रविवार, 27 अगस्त 2017

aaj ki rachna

कवि-मन की बात
*
कैसा राष्ट्रवाद यह जिसमें अपराधी संरक्षित?
रहें न बाकी कहीं विपक्षी, सत्ता हेतु बुभुक्षित.
*
गूँगे अफसर, अंधे नेता, लोकतंत्र बेहोश.
बिना मौत मरती है जनता, गरजो धरकर जोश.
*
परंपरा धृतराष्ट्र की, खट्टर कर निर्वाह.
चीर-हरण जनतंत्र का, करवाते कह 'वाह'
*
राज कौरवी हुआ नपुंसक, अँधा हुआ प्रशासन.
न्यायी विदुर उपेक्षित उनकी, बात न माने शासन.
*
अंधभक्ति ने देशभक्ति का, आज किया है खून.
नाकारा सरकार-प्रशासन, शेर बिना नाखून.
*
भारतमाता के दामन पर, लगा रहे हैं कीच.
देश डायर बाबा-चेले, हद दर्जे के नीच.
*
राज-धर्म ही नहीं जानते, राज कर रहे कैसे लोग?
सत्य-न्याय की नीलामी कर, देशभक्ति का करते ढोंग.
*
लोग न भूलो, याद रखो यह, फिर आयेंगे द्ववार पर.
इन्हें न चुनना, मार भागना, लोकतंत्र से प्यार कर.
*
अंधभक्त घर जाकर सोचे, क्या पाया है क्या खोया?
आड़ धर्म की, दुराचार का, बीज आप ही क्यों बोया??
***
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२०४ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन
जबलपुर ४८२००१

शनिवार, 26 अगस्त 2017

paudharopan, swachchhta, pustak

पौधारोपण अभियान : सच्चा समर्पण  
।। जन्म ब्याह राखी तिलक, गृह-प्रवेश त्यौहार।। सलिल बचा पौधे लगा, दें पुस्तक उपहार ।।
*
जबलपुर, २६ अगस्त २०१७। म. पर. शासन द्वारा एक करोड़ पौधे रोपने और संवर्धन की कोइ व्यवस्था न होने के कारण असमय काल-कवलित होने के पाखंड के सर्वथा विपरीत समर्पण और अभियान जैसी स्वैच्छिक संस्थाएँ गत ३ वर्षों से प्रति वर्ष किसी सुरक्षित परिसर में अपने सीमित संसाधनों से सीमित संख्या में पौधे लगाकर, उनकी सिंचाई और सुरक्षा की व्यवस्था करती आई हैं। इस वर्ष कैंटूनमेंट बोर्ड खालसा कन्या उच्चतर माध्यमिक कन्या शाला, सदर बाज़ार, जबलपुर के प्रांगण में प्रात: ११ बजे से पौधारोपण महोत्सव है। समर्पण संस्था के अध्यक्ष निर्मल अग्रवाल इस अनुष्ठान के प्रति प्राण प्रण से समर्पित हैं। 

'स्वच्छ पर्यावरण और हमारा दायित्व' विषय पर  शालेय विद्यार्थियों हेतु आयोजित व्याख्यान, निबन्ध तथा चित्रकला प्रतियोगिताओं के विजेताओं को पुरस्कृत किया जा रहा है। इस अवसर पर आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' द्वारा प्रस्तुत काव्य रचना - 
सत्य ईश है, शीश ईश के सम्मुख नत करना है। 
मानवता के लिए समर्पण, कर मराल बनना है।।
*
गुरु तो गुरु हैं, बहती निर्मल नेह-नर्मदा धारा। 
चौकस रहकर करें साधना, शांति-पंथ चलना है।।
*
पाता है जस वीर तभी जब संत सुशील रहा हो। 
पारस सैम लोहे को कंचन कर कुछ नाम गहा हो।।
*
करे वंदना जग दिनेश की, परमजीत तम हरता। 
राधा ने आराधा  हरि को, जो गोवर्धन धरता।।
*
गो-वर्धन हित वन, तरुवर हों, सरवर पंछी कलरव। 
पौध लगाये, वृक्ष बनाये, नित नव पीढ़ी संभव।।
*
राज दिलों पर करने जब राजेन्द्र स्वच्छता वरता। 
चंद्र कांत उतरे धरती पर, रूप राह नव गढ़ता।।
*
वाणी वीणा-स्वर बनकर जब करे अर्चना मनहर। 
मन-मंदिर को रश्मि विनीता, करे प्रकाशित सस्वर।।
*
तुल सी गयी आस्था-निष्ठा, डिग यदि गया मनोबल। 
तुलसी-चौरा दीप बाल कर जोड़ मना शुभ हर पल।।
*
चंचल-चपल चेतना जब बन सलिल-धार बहती है। 
तब नरेश दीक्षित गौतम हो संजीवनी तहती है।।
*
'बुके नहीं बुक' की संस्कृति गढ़ वाल बनायें दृढ़ हम। 
पुस्तक के प्रति नया चाव ला, मूल्य रचें नव उत्तम।।
*
संजय सैम सच देख बता, हम दुनिया नयी बनायें। 
इतना सुख हो, प्रभु भारत में, रहने फिर-फिर आयें।।
***
।। हिंदी भाषा बोलिए, उर्दू मोयन डाल।। सलिल संस्कृत सां दे पूड़ी बने कमाल।।
  *
'स्वच्छ पर्यावरण हेतु भावी पीढ़ी का योगदान' विषयक परिचर्चा में सर्व श्री / श्रीमती एन. के. चौकसे जिला शिक्षा अधिकारी, डॉ. गार्गीशरण मिश्र 'मराल' शिक्षाविद, एस. एन. रूपराह, सचिव सिक्ख एजुकेशन सोसायटी, राजेन्द्र चंद्रकांत राय पर्यावरणविद, कंचनलता जैन पूर्व सहायक संचालक शिक्षा तथा वृक्षमित्र आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' प्रख्यात साहित्यकार नई पीढ़ी को संबोधित कर पर्यावरण संरक्षण व स्वच्छता हेतु प्रेरित करेंगे। स्वागताध्यक्ष परमजीत कौर प्राचार्य कैंटूनमेंट बोर्ड खालसा कन्या उच्चतर माध्यमिक कन्या शाला, सदर बाज़ार, जबलपुर, साधना शुक्ला, रश्मि मिश्रा, व्ही. के पाण्डे, डॉ. के. एन. तिवारी, सरदार सरबजीत सिंह, जे. पी. जैन, प्रो. आर. एन. श्रीवास्तव, डॉ. द्रौपदी राधा अग्रवाल, वीणा वाजपेयी, कंचन होरा, तुलसीराम तिवारी, वंदना श्रीवास्तव, अर्चना त्रिवेदी, बबीता रवीन्द्र गुप्ता, इंजी. सुनील चावला, एम. नाज्वाले, नीना खेत्रपाल, मालती श्रीवास्तव, आर. के. शर्मा, विनीता राय, एल.एल. साहू, संजय सूबेदार, अवधेश गौतम, सुशील दुबे, आर. के. गढ़वाल आदि की भूमिका सराहनीय है। 
*** 


navgeet

आज की रचना-
लेकिन संध्या खिन्न न होती
*
उषा सहित आ,
दे उजास फिर
खुद ही ढल जाता है सूरज,
लेकिन संध्या खिन्न न होती
चंदा की अगवानी करती।
*
जन-मन परवश होकर
खुद ही जब निज घर में
आग लगाता।
कुटिल शकुनि-संचालित
सत्तातंत्र नाश देख
हँसता-मुस्काता।
विवश भीष्म
अन्याय-न्याय की
परिभाषा दे रहे कागज़ी-
अपराधी बनकर महंत,
हा! दैव
रँगीला भी पुज जाता ,
नारी की इज्जत खुद नारी 
लूट जाए, परवाह न करती।
उषा सहित आ,
दे उजास फिर
खुद ही ढल जाता है सूरज,
लेकिन संध्या खिन्न न होती
चंदा की अगवानी करती।
*
गुरुघंटालों ने गुरु बनकर 
शिष्याओं को
जब-जब लूटा।
वक्र हो गया भाग्य तभी 
दुष्कर्मों का घट
भरकर फूटा।
मौन भले पर
मूक न जनगण 
आज नहीं तो कल जागेगा।
समय क्षमा किसको कब करता?
युग-युग तक 
हिसाब माँगेगा। 
समय हताशा का जब तब भी  
धरती धैर्य न तजती, धरती।
उषा सहित आ,
दे उजास फिर
खुद ही ढल जाता है सूरज,
लेकिन संध्या खिन्न न होती
चंदा की अगवानी करती।
*
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शुक्रवार, 25 अगस्त 2017

muktak

मुक्तक रेल  के
प्रभु तो प्रभु है, ऊपर हो या नीचे हो।
नहीं रेल के प्रभु सा आँखें मीचे हो।।
निचली श्रेणी की करता कुछ फ़िक्र न हो-
ऊँची श्रेणी के  हित लिए गलीचे हो।।
***
ट्रेन पटरी से उतरती जा रही।
यात्रियों को अंत तक पहुँचा रही।।
टिकिट थोड़ी यात्रा का था लिया-
पार भव  से मुफ्त में करवा रही।।
***
आभार करिए रेलवे का रात-दिन।
काम चलता ही नहीं है ट्रेन बिन।।
करें पल-पल याद प्रभु को आप फिर-
समय काटें यार चलती श्वास गिन।।
***
जो चाहे भगवान् वही तो होता है।
दोष रेल मंत्री को क्यों जग देता है।।
चित्रगुप्त प्रभु दुर्घटना में मार रहे-
नाव आप तू कर्म नदी में खेता है।।
***
आय घटे, वेतन रुके तो हो हाहाकार।
बढ़े टिकिट दर तो हुई जनता ही बेज़ार।।
रिश्वत लेना छोड़ता कभी नहीं स्टाफ-
दोष न मंत्री का तनिक, सत्य करें स्वीकार।।
***
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doha-soratha

आज का दोहा
*
मुल्ला जी ने मुर्गियाँ, जमकर करीं हलाल।
अब न हाथ लग सकेंगी, मन में आज मलाल।।
*
मुल्ला चाहें हलाला, इज़्ज़त करें हलाक़।
गयी हाथ से औरतें, अगर न रहा तलाक़।।
*
आज का सोरठा
घर का मालिक आज, महीनों बाद न पिट रहा।
नहीं पद रही डाँट, रखे हुए व्रत मालकिन।।
*
आज तनिक आराम, बेलन-झाड़ू को मिला।
बार-बार हो तीज, मन रहे हैं ईश से।।
*

  

bhasha geet

भाषा गीत  

हिंद और हिंदी की जय-जयकार करें हम 
भारत की माटी, हिंदी से प्यार करें हम 
*
भाषा सहोदरी होती है, हर प्राणी की 
अक्षर-शब्द बसी छवि, शारद कल्याणी की 
नाद-ताल, रस-छंद, व्याकरण शुद्ध सरलतम 
जो बोले वह लिखें-पढ़ें, विधि जगवाणी की 
संस्कृत सुरवाणी अपना, गलहार करें हम 
हिंद और हिंदी की, जय-जयकार करें हम 
भारत की माटी, हिंदी से प्यार करें हम 
*
असमी, उड़िया, कश्मीरी, डोगरी, कोंकणी,
कन्नड़, तमिल, तेलुगु, गुजराती, नेपाली,
मलयालम, मणिपुरी, मैथिली, बोडो, उर्दू 
पंजाबी, बांगला, मराठी सह संथाली 
सिंधी सीखें बोल, लिखें व्यवहार करें हम 
हिंद और हिंदी की, जय-जयकार करें हम 
भारत की माटी, हिंदी से प्यार करें हम 

ब्राम्ही, प्राकृत, पाली, बृज, अपभ्रंश, बघेली,
अवधी, कैथी, गढ़वाली, गोंडी, बुन्देली, 
राजस्थानी, हल्बी, छत्तीसगढ़ी, मालवी, 
भोजपुरी, मारिया, कोरकू, मुड़िया, नहली,
परजा, गड़वा, कोलमी से सत्कार करें हम 
हिंद और हिंदी की, जय-जयकार करें हम 
भारत की माटी, हिंदी से प्यार करें हम 

शेखावाटी, डिंगल, हाड़ौती, मेवाड़ी 
कन्नौजी, मागधी, खोंड, सादरी, निमाड़ी, 
सरायकी, डिंगल, खासी, अंगिका, बज्जिका, 
जटकी, हरयाणवी, बैंसवाड़ी, मारवाड़ी,
मीज़ो, मुंडारी, गारो मनुहार करें हम 
हिन्द और हिंदी की जय-जयकार करें हम 
भारत की माटी, हिंदी से प्यार करें हम 
*
देवनागरी लिपि, स्वर-व्यंजन, अलंकार पढ़ 
शब्द-शक्तियाँ, तत्सम-तद्भव, संधि, बिंब गढ़ 
गीत, कहानी, लेख, समीक्षा, नाटक रचकर 
समय, समाज, मूल्य मानव के नए सकें मढ़ 
'सलिल' विश्व, मानव, प्रकृति-उद्धार करें हम 
हिन्द और हिंदी की जय-जयकार करें हम 
भारत की माटी, हिंदी से प्यार करें हम 
**** 
गीत में ५ पद ६६ (२२+२३+२१) भाषाएँ / बोलियाँ हैं। १,२ तथा ३ अंतरे लघुरूप में पढ़े जा सकते हैं। पहले दो अंतरे पढ़ें तो भी संविधान में मान्य भाषाओँ की वन्दना हो जाएगी।
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नवगीत:
अपना हर पल है हिन्दीमय....
संजीव 'सलिल'
*
अपना हर पल है हिन्दीमय 
एक दिवस क्या खाक मनाएँ?

बोलें-लिखें नित्य अंग्रेजी 
जो वे एक दिवस जय गाएँ...
*
निज भाषा को कहते पिछडी. 
पर भाषा उन्नत बतलाते. 

घरवाली से आँख फेरकर
देख पडोसन को ललचाते. 

ऐसों की जमात में बोलो,
हम कैसे शामिल हो जाएँ?...
*
हिंदी है दासों की बोली,
अंग्रेजी शासक की भाषा. 

जिसकी ऐसी गलत सोच है,
उससे क्या पालें हम आशा?

इन जयचंदों की खातिर
हिंदीसुत पृथ्वीराज बन जाएँ...
*
ध्वनिविज्ञान-नियम हिंदी के
शब्द-शब्द में माने जाते.

कुछ लिख, कुछ का कुछ पढने की 
रीत न हम हिंदी में पाते. 

वैज्ञानिक लिपि, उच्चारण भी 
शब्द-अर्थ में साम्य बताएँ...
*
अलंकार, रस, छंद बिम्ब,
शक्तियाँ शब्द की बिम्ब अनूठे. 

नहीं किसी भाषा में मिलते,
दावे करलें चाहे झूठे. 

देश-विदेशों में हिन्दीभाषी 
दिन-प्रतिदिन बढ़ते जाएँ...
*
अन्तरिक्ष में संप्रेषण की 
भाषा हिंदी सबसे उत्तम. 

सूक्ष्म और विस्तृत वर्णन में
हिंदी है सर्वाधिक सक्षम.

हिंदी भावी जग-वाणी है 
निज आत्मा में 'सलिल' बसाएँ...
*
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एक रचना -
हिंदी भाषी
*
हिंदी भाषी ही
हिंदी की 
क्षमता पर क्यों प्रश्न उठाते?
हिंदी जिनको
रास न आती
दीगर भाषा बोल न पाते।
*
हिंदी बोल, समझ, लिख, पढ़ते
सीढ़ी-दर सीढ़ी है चढ़ते
हिंदी माटी,हिंदी पानी
श्रम करके मूरत हैं गढ़ते
मैया के माथे
पर बिंदी
मदर, मम्मी की क्यों चिपकाते?
हिंदी भाषी ही
हिंदी की
क्षमता पर क्यों प्रश्न उठाते?
*
जो बोलें वह सुनें - समझते
जो समझें वह लिखकर पढ़ते
शब्द-शब्द में अर्थ समाहित
शुद्ध-सही उच्चारण करते
माँ को ठुकरा
मौसी को क्यों
उसकी जगह आप बिठलाते?
हिंदी भाषी ही
हिंदी की
क्षमता पर क्यों प्रश्न उठाते?
*
मनुज-काठ में पंचस्थल हैं
जो ध्वनि के निर्गमस्थल हैं
तदनुसार ही वर्ण विभाजित
शब्द नर्मदा नद कलकल है
दोष हमारा
यदि उच्चारण
सीख शुद्ध हम नहीं सिखाते
हिंदी भाषी ही
हिंदी की
क्षमता पर क्यों प्रश्न उठाते?
*
अंग्रेजी के मोह में फँसे
भ्रम-दलदल में पैर हैं धँसे
भरम पाले यह जगभाषा है
जाग पायें तो मोह मत ग्रसे
निज भाषा का
ध्वज मिल जग में
हम सब काश कभी फहराते
***
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हाइकू गीत 
*
बोल रे हिंदी 
कान में अमरित 
घोल रे हिंदी 
*
नहीं है भाषा
है सभ्यता पावन
डोल रे हिंदी
*
कौन हो पाए
उऋण तुझसे, दे
मोल रे हिंदी?
*
आंग्ल प्रेमी जो
तुरत देना खोल
पोल रे हिंदी
*
झूठा है नेता
कहाँ सच कितना?
तोल रे हिंदी
*
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मुक्तक
हिंदी का उद्घोष छोड़, उपयोग सतत करना है
कदम-कदम चल लक्ष्य प्राप्ति तक संग-संग बढ़ना है
भेद-भाव की खाई पाट, सद्भाव जगाएँ मिलकर
गत-आगत को जोड़ सके जो वह पीढ़ी गढ़ना है
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गीत
*
देश-हितों हित
जो जीते हैं
उनका हर दिन अच्छा दिन है।
वही बुरा दिन
जिसे बिताया
हिंद और हिंदी के बिन है।
*
अपने मन में
झाँक देख लें
क्या औरों के लिए किया है?
या पशु, सुर,
असुरों सा जीवन
केवल निज के हेतु जिया है?
क्षुधा-तृषा की
तृप्त किसी की,
या अपना ही पेट भरा है?
औरों का सुख छीन
बना जो धनी
कहूँ सच?, वह निर्धन है।
*
जो उत्पादक
या निर्माता
वही देश का भाग्य-विधाता,
बाँट, भोग या
लूट रहा जो
वही सकल संकट का दाता।
आवश्यकता
से ज्यादा हम
लुटा सकें, तो स्वर्ग रचेंगे
जोड़-छोड़ कर
मर जाता जो
सज्जन दिखे मगर दुर्जन है।
*
बल में नहीं
मोह-ममता में
जन्मे-विकसे जीवन-आशा।
निबल-नासमझ
करता-रहता
अपने बल का व्यर्थ तमाशा।
पागल सांड
अगर सत्ता तो
जन-गण सबक सिखा देता है
नहीं सभ्यता
राजाओं की,
आम जनों की कथा-भजन है
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हिंदी पर दोहे
हिंदी कलश...
संजीव
*
घर-घर धर हिंदी कलश, हिंदी-मन्त्र  उचार.
हिन्दवासियों  का 'सलिल', हिंदी से उद्धार..
*
दक्षिणभाषी सीखते, हिंदी स्नेह समेत.
उनकी  भाषा सीख ले, होकर 'सलिल' सचेत..
*
हिंदी मैया- मौसियाँ, भाषा-बोली अन्य.
मातृ-भक्ति में रमा रह, मौसी होगी धन्य..
*
पशु-पक्षी तक बोलते, अपनी भाषा मीत.
निज भाषा भूलते, कैसी अजब अनीत??
*
माँ को आदर दे नहीं, मौसी से जय राम.
करे जगत में हो हँसी, माया मिली न राम..
*
हिंदी की तस्वीर
*
हिंदी की तस्वीर के, अनगिन उजले पक्ष 
जो बोलें वह लिख-पढ़ें, आम लोग, कवि दक्ष 
*
हिदी की तस्वीर में, भारत एकाकार
फुट डाल कर राज की, अंग्रेजी आधार
*
हिंदी की तस्वीर में, सरस सार्थक छंद
जितने उतने हैं कहाँ, नित्य रचें कविवृंद
*
हिंदी की तस्वीर या, पूरा भारत देश
हर बोली मिलती गले, है आनंद अशेष
*
हिंदी की तस्वीर में, भरिए अभिनव रंग
उनकी बात न कीजिए, जो खुद ही भदरंग
*
हिंदी की तस्वीर पर अंग्रेजी का फेम
नौकरशाही मढ़ रही, नहीं चाहती क्षेम
*
हिंदी की तस्वीर में, गाँव-शहर हैं एक
संस्कार-साहित्य मिल, मूल्य जी रहे नेक
*
करता है मन-प्राण जब, अर्पित रचनाकार
तब भाषा की मृदा से, रचना ले आकार
*
भाषा तन साहित्य की, आत्मा बिन निष्प्राण
शिवा रहित शिव शव सदृश, धनुष बिना ज्यों बाण
*
भाषा रथ को हाँकता, सत्ता सूत अजान
दिशा-दशा साहित्य दे, कैसे? दूर सुजान
*
अवगुंठन ही ज़िन्दगी, अनावृत्त है ईश
प्रणव नाद में लीन हो, पाते सत्य मनीष
*
पढ़ ली मन की बात पर, ममता साधे मौन
अपनापन जैसा भला, नाहक तोड़े कौन
*
जीव किरायेदार है, मालिक है भगवान
हुआ किरायेदार के, वश में दयानिधान
*
रचना रचनाकार से, रच ना कहे न आप
रचना रचनाकार में, रच जाती है व्याप
*
जल-बुझकर वंदन करे, जुगनू रजनी मग्न
चाँद-चाँदनी का हुआ, जब पूनम को लग्न
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तिमिर-उजाले में रही, सत्य संतान प्रीति
चोली-दामन के सदृश, संग निभाते रीति
*
जिसे हुआ संतोष वह, रंक अमीर समान
असंतोषमय धनिक सम, दीन न कोई जान
*