बुधवार, 17 अप्रैल 2019

एक रचना

एक रचना
आओ भौंकें
*
आओ भौंकें
लोकतंत्र का महापर्व है
हमको खुद पर बहुत गर्व है
चूक न जाए अवसर भौंकें
आओ भौंकें
*
क्यों सोचें क्या कहाँ ठीक है?
गलत बनाई यार लीक है
पान मान का नहीं सुहाता
दुर्वचनों का अधर-पीक है
मतलब तज, बेमतलब टोंकें
आओ भौंकें
*
दो दूनी हम चार न मानें
तीन-पाँच की छेड़ें तानें
गाली सुभाषितों सी भाए
बैर अकल से पल-पल ठानें
देख श्वान भी डरकर चौंकें
आओ भौंकें
*
बिल्ला काट रास्ता जाए
हमको नानी याद कराए
दंडों रे सम्मुख नतमस्तक
हमें न नियम-कायदे भाए
दुश्मन देखें झट से पौंकें
आओ भौंकें
*
हम क्या जानें इज्जत देना
हमें सभ्यता से क्या लेना?
ईश्वर को भी बीच घसीटें

मंगलवार, 16 अप्रैल 2019

भक्ति गीत : कहाँ गया

भक्ति गीत :
कहाँ गया
*
कहाँ गया रणछोड़ रे!
जला प्रेम की ज्योत 
*
कण-कण में तू रम रहा
घट-घट तेरा वास.
लेकिन अधरों पर नहीं
अब आता है हास.
लगे जेठ सम तप रहा
अब पावस-मधुमास
क्यों न गूंजती बाँसुरी
पूछ रहे खद्योत
कहाँ गया रणछोड़ रे!
जला प्रेम की ज्योत
*
श्वास-श्वास पर लिख लिया
जब से तेरा नाम.
आस-आस में तू बसा
तू ही काम-अकाम.
मन-मुरली, तन जमुन-जल
व्यथित विधाता वाम
बिसराया है बोल क्यों?
मिला ज्योत से ज्योत
कहाँ गया रणछोड़ रे!,
जला प्रेम की ज्योत
*
पल-पल हेरा है तुझे
पाया अपने पास.
दिखता-छिप जाता तुरत
ओ छलिया! दे त्रास.
ले-ले अपनीं शरण में
'सलिल' तिहारा दास
दूर न रहने दे तनिक
हम दोनों सहगोत
कहाँ गया रणछोड़ रे!
जला प्रेम की ज्योत 
१६.४.२०१७
***

ग्रीष्म के दोहे

ग्रीष्म के दोहे 
*
नित्य निनादित नर्मदा, कलकल सलिल प्रवाह
ताप किनारे ही रुका, लहर मिटाती दाह
*
परकम्मा करते चरण, वरते पुण्य असीम
छेंक धूप को छाँह दें, पीपल, बरगद, नीम
*
मन कठोर चट्टान सा, तप पा-देता कष्ट
जल संतों सा तप करे, हरता द्वेष-अनिष्ट
*
मग पर पग पनही बिना, नहीं उचित इस काल
बाल न बाँका लू करे, पनहा पी हर हाल
*
गाँठ प्याज की संग रख, लू से करे बचाव
मट्ठा पी ठट्ठा करो, व्यर्थ न खाओ ताव
*
भर गिलास लस्सी पियो, नित्य मलाईदार
कहो 'नर्मदे हर' सलिल, एक नहीं कई बार
*
पीस पोदीना पत्तियाँ, मिर्ची-कैरी-प्याज
काला नमक व गुड़ मिला, जमकर खा तज लाज
*
मीठी या नमकीन हो, रुचे महेरी खूब
सत्तू पी ले घोलकर, जा ठंडक में डूब
*
खरबूजे-तरबूज से, मिले तरावट खूब
लीची खा संजीव नित, मस्ती में जा डूब
*
गन्ना-रस ग्लूकोज़ का, करता दूर अभाव
गुड़-पानी अमृत सदृश, पार लगाता नाव 
१६.४.२०१७
*

कुंडल छंद

ॐ 
छंद बहर का मूल है: ४ 
कुंडल छंद
*
छंद परिचय:
बाईस मात्रिक महारौद्र जातीय कुंडल छंद
चौदह वार्णिक शर्करी जातीय छंद।
संरचना: SIS ISI SIS ISI SS
सूत्र: रजरजगग।
बहर: फ़ाइलुं मुफ़ाइलुं मुफ़ाइलुं फ़ऊलुं।
*
प्रात, शाम, रात रोज आप ही सुहाए
मौन हेरता रहा न आज आप आए
*
छंद-गीत, राग-रीत कौन सीखता है?
शारदा कृपा करें तभी न सीख पाए
*
है कहाँ छिपा हुआ, न चाँद दीखता है
दीप बाल-बाल रात ही न हार जाए
*
दूर बैठ ताकती , न भू भुला सकी है
सूर्य रश्मि-रूप धार श्वास में समाए
*
आसमान छेदता, दिशा-हवा न रोके
कामदेव चित्त को अशांत क्यों बनाये?
*
प्रेमिका न ज्ञान-दान प्रेम चाहती है
रुठती न, रूठना दिखा-दिखा खिझाए
*
हारता न, हार-हार प्रेम जीतता है
जीतता न जीत-जीत, प्रेम ही हराए
*
१६.४.२०१७
***

नवगीत बांस

नवगीत
संजीव 
.
बांसों के झुरमुट में 
धांय-धांय चीत्कार 
.
परिणिति
अव्यवस्था की
आम लोग
भोगते.
हाथ पटक
मूंड पर
खुद को ही
कोसते.
बाँसों में
उग आये
कल्लों को
पोसते.
चुभ जाती झरबेरी
करते हैं सीत्कार
.
असली हो
या नकली
वर्दी तो
है वर्दी.
असहायों
को पीटे
खाखी हो
या जर्दी.
गोलियाँ
सुरंग जहाँ
वहाँ सिर्फ
नामर्दी.
बिना किसी शत्रुता
अनजाने रहे मार
.
सूखेंगे
आँसू बह.
रक्खेंगे
पीड़ा तह.
बलि दो
या ईद हो
बकरी ही
हो जिबह.
कुंठा-वन
खिसियाकर
खुद ही खुद
होता दह
जो न तर सके उनका
दावा है रहे तार
***
१६-४-२०१५
=========

नवगीत

नवगीत:
संजीव
.
नेह नर्मदा-धारा मुखड़ा 
गंगा लहरी हुए अंतरे
.
कथ्य अमरकंटक पर
तरुवर बिम्ब झूमते
डाल भाव पर विहँस
बिम्ब कपि उछल लूमते
रस-रुद्राक्ष माल धारेंगे
लोक कंठ बस छंद कन्त रे!
नेह नर्मदा-धारा मुखड़ा
गंगा लहरी हुए अंतरे
.
दुग्ध-धार लहरें लय
देतीं नवल अर्थ कुछ
गहन गव्हर गिरि उच्च
सतत हरते अनर्थ कुछ
निर्मल सलिल-बिंदु तर-तारें
ब्रम्हलीन हों साधु-संत रे!
नेह नर्मदा-धारा मुखड़ा
गंगा लहरी हुए अंतरे
.
विलय करे लय मलय
न डूबे माया नगरी
सौंधापन माटी का
मिटा न दुनिया ठग री!
ढाई आखर बिना न कोई
किसी गीत में तनिक तंत रे!
नेह नर्मदा-धारा मुखड़ा
गंगा लहरी हुए अंतरे
.
१६-४-२०१५
***

गीत

गीत
खुद से खुद ही दूर
.
इसको-उसको परखा फिर-फिर
धोखा खाया खूब
नौका फिर भी तैर न पायी
रही किनारे डूब
दो दिन मन में बसी चाँदनी
फिर छाई क्यों ऊब?
काश! न होता मन पतंग सा
बन पाता हँस दूब
पतवारों के
वार न सहते
माँझी होकर सूर
अपने ही घर में
बेबस हैं
खुद से खुद ही दूर
.
एक हाथ दूजे का बैरी
फिर कैसे हो खैर?
पूर दिये तालाब, रेत में
कैसे पायें तैर?
फूल नोचकर शूल बिछाये
तब करते है सैर
अपने ही जब रहे न अपने
गैर रहें क्यों गैर?
रूप मर रहा
बेहूदों ने
देखा फिर-फिर घूर
अपने ही घर में
बेबस हैं
खुद से खुद ही दूर
.
संबंधों के अनुबंधों ने
थोप दिये प्रतिबंध
जूही-चमेली बिना नहाये
मलें विदेशी गंध
दिन दोपहरी किन्तु न छटती
फ़ैली कैसी धुंध
लंगड़े को काँधे बैठाकर
अब न चल रहे अंध
मन की किसको परख है
ताकें तन का नूर
***
१६-४-२०१५

गीत

माननीय राकेश जी को समर्पित
प्रति रचना:
जीवन के ढाई आखर को
संजीव
*
बीती उमर नहीं पढ़ पाये, जीवन के ढाई आखर को
गृह स्वामी की करी उपेक्षा, सेंत रहे जर्जर बाखर को...
*
रूप-रंग, रस-गंध चाहकर, खुदको समझे बहुत सयाना
समझ न पाये माया-ममता, मोहे मन को करे दिवाना
कंकर-पत्थर जोड़ बनायी मस्जिद, जिसे टेर हम हारे-
मन मंदिर में रहा विराजा, मिला न लेकिन हमें ठिकाना
निराकार को लाख दिये आकार न छवि उसकी गढ़ पाये-
नयन मुँदे मुस्काते पाया कण-कण में उस नटनागर को...
*
श्लोक-ऋचाएँ, मंत्र-प्रार्थना, प्रेयर सबद अजान न सुनता
भजन-कीर्तन,गीत-ग़ज़ल रच, मन अनगिनती सपने बुनता
पूजा-अनुष्ठान, मठ-महलों में रहना कब उसको भाया-
मेवे छोड़ पंजीरी फाके, देख पुजारी निज सर धुनता
खाये जूठे बेर, चुराये माखन, रागी किन्तु विरागी
एक बूँद पा तृप्त हुआ पर है अतृप्त पीकर सागर को...
*
अर्थ खोज-संचित कर हमने, बस अनर्थ ही सदा किया है
अमृत की कर चाह गरल का, घूँट पिलाया सतत पिया है
लूट तिजोरी दान टेक का कर खुद को पुण्यात्मा माना-
विस्मित वह पाखंड देखकर मनुज हुआ पाषाण-हिया है
कैकट्स उपजाये आँगन में, अब तुलसी पूजन हो कैसे?
देशनिकाला दिया हमीं ने चौपालों पनघट गागर को...
१६.४.२०१४ 
*
Sanjiv verma 'Salil'
salil.sanjiv@gmail.com
http://divyanarmada.blogspot.in
facebook: sahiyta salila / sanjiv verma 'salil'

छत्तीसगढ़ी दोहा

छत्तीसगढ़ी दोहा
*
हमर देस के गाँव मा, सुन्हा सुरुज विहान.
अरघ देहे बद अंजुरी, रीती रोय किसान..
*
जिनगानी के समंदर, गाँव-गँवई के रीत.
जिनगी गुजरत हे 'सलिल', कुरिया-कुंदरा मीत..
*
महतारी भुइयाँ असल, बंदत हौं दिन-रात.
दाई! पैयाँ परत हौं. मूंडा पर धर हात..
*
जाँघर तोड़त सेठ बर, चिथरा झूलत भेस.
मुटियारी माथा पटक, चेलिक रथे बिदेस..
*
बाँग देही कुकराकस, जिनगी बन के छंद.
कुररी कस रोही 'सलिल', मावस दूबर चंद..
१६.४.२०१०
***

सोमवार, 15 अप्रैल 2019

अहर्निश छंद

अहर्निश छंद:
*
विधान: प्रति पद तीन चरण, १०-८-६ पर यति, कुल कलाएँ २४, पदांत गुरु।

लक्षण छंद:
रच छंद अहर्निश, दस अठ छह नित, गुरु सुमिरो।
सिय राम पुकारो, मिल प्रभु प्यारों, भजन करो।।
जब जो घटना है, तब घटता है, सहन करो।
हनुमत सम चुप रह, कुछ न कभी कह, नमन करो।।
*
उदाहरण:
ध्वज लहर लहर कर, फहर फहर कर, गुण गाता।
जो बलिदानी हैं, उन्हें न भूलो, समझाता।।
कर गर्व देश पर, भारतवासी, तर जाता।
अरि-शीश काटकर, निज बलि देकर, जी जाता।।
***
टीप:  अहर्निश छंद की लय त्रिभंगी छंद से मिलती है। त्रिभंगी के १०-८-८-६ के ४ चार चरण में से ८ मात्रिक एक चरण निकल दें तो १०-८-६ के तीन चरण और पदांत गुरु शेष रहता है जो अहर्निश छंद है।
त्रिभंगी
रस-सागर पाकर, कवि ने आकर, अंजलि भर रस-पान किया।
ज्यों-ज्यों रस पाया, मन भरमाया, तन हर्षाया, मस्त हिया।।
कविता सविता सी, ले नवता सी, प्रगटी जैसे जला दिया।
सारस्वत पूजा, करे न दूजा, करे 'सलिल' ज्यों अमिय पिया।।
अहर्निश (उक्त का तीसरा चरण हटाकर)
रस-सागर पाकर, कवि ने आकर, पान किया।
ज्यों-ज्यों रस पाया, मन भरमाया, मस्त हिया।।
कविता सविता सी, ले नवता सी, जला दिया।
सारस्वत पूजा, करे न दूजा, अमिय पिया।।
उक्त का दूसरा चरण हटाकर 
रस-सागर पाकर, अंजलि भर रस-पान किया।
ज्यों-ज्यों रस पाया,  तन हर्षाया, मस्त हिया।।
कविता सविता सी, प्रगटी जैसे जला दिया।
सारस्वत पूजा, करे 'सलिल' ज्यों अमिय पिया।।
***

गीत तुम

चित्र पर रचना:
तुम



*
तुम हो या साकार है
बेला खुशबू मंद
आँख बोलती; देखती
जुबां; हो गयी बंद
*
अमलतास बिंदी मुई, चटक दहकती आग
भौंहें तनी कमान सी, अधर मौन गा फाग
हाथों में शतदल कमल 
राग-विरागी द्वन्द 
तुम हो या साकार है 
मद्धिम खुशबू मंद
*
कृष्ण घटाओं बीच में, बिजुरी जैसी माँग
अलस सुबह उल्लसित तुम, मन गदगद सुन बाँग
खनक-खनक कंगन कहें
मधुर अनसुने छंद
तुम हो या साकार है 
मनहर खुशबू मंद
*
पीताभित पुखराज सम, मृदुल गुलाब कपोल
जवा कुसुम से अधरद्वय, दिल जाता लख डोल 
हार कहें भुज हार दो
बनकर आनंदकंद
तुम हो या साकार है 
मन्मथ खुशबू मंद
*
संवस, १५.४.२०१९ 

राग छंद

ॐ 
छंद बहर का मूल है: ३
राग छंद
*
छंद परिचय:
बीस मात्रिक महादैशिक जातीय छंद।
तेरह वार्णिक अति जगती जातीय राग छंद।
संरचना: SIS ISI SIS ISI S
सूत्र: रजरजग।
बहर: फ़ाइलुं मुफ़ाइलुं मुफ़ाइलुं फ़अल।
*
आइये! मनाइए, रिझाइए हमें
प्यार का प्रमाण भी दिखाइए हमें
*
चाह में रहे, न सिर्फ बाँह में रहे
क्रोध से तलाक दे न जाइए हमें
*
''हैं न आप संग तो अजाब जिंदगी''
बोल प्यार बाँट संग पाइए हमें
*
जान हैं, बनें सुजान एक हों सदा
दे अजान रोज-रोज भाइये हमें
*
कौन छंद?, कौन बहर?, क्यों पता करें?
शब्द-भाव में पिरो बसाइए हमें
*
संत हों न साधु हों, न देवता बनें
आदमी बने तभी सुहाइये हमें
*
दो, न दो रहें, न एक बनें, क्यों कहो?
जान हमारी बनें बनाइए हमें
१५.४.२०१७
***

काजी नज़रुल इस्लाम

काजी नज़रुल इस्लाम - की रचनाओं में राष्ट्रीयता
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' 
*
विश्व का महानतम लोकतंत्र भारत अनेकता में एकता, विविधता में समानता, विशिष्टता में सामान्यता और स्व में सर्व के समन्वय और सामंजस्य का अभूतपूर्व उदाहरण था, है और रहेगा। समय-समय पर पारस्परिक टकराव, संघर्ष और विद्वेष के तूफ़ान आते-जाते रहे किन्तु राष्ट्रीयता, समानता, सहयोग, सद्भाव और वैश्विक चेतना के सनातन तत्व भारत में सदा व्याप्त रहे। स्वाधीनता सत्याग्रहों तथा स्वातंत्रयोत्तर काल में राष्ट्रीय एकात्मता की मशाल को ज्योति रखनेवाले महापुरुषों में २४ मई १८९९ को जन्में तथा २९ अगस्त १९७६ को दिवंगत अग्रणी बांग्ला कवि, संगीतज्ञ, संगीतस्रष्टा, दार्शनिक, गायक, नाटककार तथा अभिनेता काजी नज़रुल इस्लाम अग्रगण्य रहे हैं।

अवदान-सम्मान
वे बांग्ला भाषा के अन्यतम साहित्यकार, देशप्रेमी तथा बंगलादेश के राष्ट्रीय कवि हैं। भारत और बांग्लादेश दोनों ही जगह उनकी कविता और गान को समान आदर प्राप्त है। कविता में विद्रोह के स्वर प्रमुख होने के कारण वे 'विद्रोही कवि' कहे गये। उनकी कविता का वर्ण्यविषय 'मनुष्य पर मनुष्य का अत्याचार' तथा 'सामाजिक अनाचार तथा शोषण के विरुद्ध सोच्चार प्रतिवाद' है। कोल्कता विश्वविद्यालय ने उन्हें 'जगतारिणी पुरस्कार से सम्मनित कर खुद को धन्य किया। रवीन्द्र भारती संस्था तथा ढाका विश्वविद्यालय ने मानद डी.लिट्. उपाधि समर्पित की।भारत सरकार ने उन्हें १९६० में पद्मभूषण अलंकरण से अलंकृत किया गया। भारत ने १९९९ में एक स्मृति डाक टिकिट जरी किया। बांगला देश ने २८ जुलाई २०११ को एक स्मृति डाक टिकिट तथा ३ एकल और एक ४ डाक टिकिटों का सेट उनकी स्मृति में जारी किये।
जन्म, परिवार तथा संघर्ष-
अंतिम मुग़ल सम्राट बहादुर शाह ज़फ़र के शासनकाल में एक मुसलमान परिवार बंगाल के हाजीपुर को छोड़कर बर्दवान के पुरुलिया गाँव में आ बसा था। परिवार के किसी सदस्य के काज़ी होने के बाद से परिवार के सभी सदस्य नाम के साथ काजी जोड़ने लगे। इसी वंश के काज़ी फ़कीर अहमद की बेग़म ज़ाहिदा खातून माँ काली से पुत्र देने हेतु प्रार्थना किया करती थी। उन्होंने २४ मई को एक पुत्र जन्मा जिसे कालांतर में काजी नज़रुल इस्लाम के नाम से जाना गया। उनका १ बड़ा भाई, २ छोटे भाई तथा एक छोटी बहिन थी । केवल ८ वर्ष की उम्र में उनके वालिद जो एक मज़ार और मस्जिद की देख-रेख करते थे, का इंतकाल हो गया। अभाव और गरीबी इतनी कि लोग उन्हें 'दुक्खू मियाँ' कहने लगे। हालात से जूझते हुए उन्होंने १० साल की आयु में फजल अहमद के मार्गदर्शन में मखतब का इम्तिहान पास कर अरबी-फारसी पढ़ने के साथ-साथ भागवत, महाभारत, रामायण, पुराण और कुरआन आदि पढ़कर पढ़ाईं तथा माँ काली की आराधना करने लगे।
रानीगंज, बर्दवान के राजा से ७ रुपये छात्रवृत्ति, मुफ्त शिक्षा तथा मुस्लिम छात्रावास में मुफ्त खाना-कपड़े की व्यवस्था होने पर वे कक्षा में प्रथम आये। यहाँ आजीवन मित्र रहे निबारनचंद्र घटक तथा शैलजानंद मुखोपाध्याय से मित्रता हुई जो बाद में बांगला के प्रसिद्ध कहानीकार-उपन्यासकार हुए। किसी विषय में अनुत्तीर्ण होने पर वे आसनसोल लौटकर माथुरन हाई स्कूल में श्री कुमुदरंजन मलिक के विद्यार्थी रहे। परीक्षा शुल्क की व्यवस्था न होने पर वे पढ़ाई छोड़कर समाज की कुरीतियों पर व्यंग्य प्रधान नौटंकी करने वाले दल 'लीटो' में सम्मिलित होकर कलाकारों के लिये काव्यात्मक सवाल-जवाब लिखने लगे और केवल ११ वर्ष की आयु में इस दल के मुख्य 'कवियाल' बने। उन्होंने रेल गार्डों के घरों में काम किया, अब्दुल वहीद बेकारी में १रु. मासिक पर काम किया साथ ही संगीत गोष्ठियों में बाँसुरी बजाना जारी रखा जिससे प्रभावित होकर पुलिस सब इंस्पेक्टर रफीकुल्ला उन्हें अपने गाँव त्रिशाल जिला मैमनपुर बांगला देश ले गये। अंग्रेज बंगालियों को सेना के अयोग्य भीरु मानते थे किंतु स्कूल की अंतिम वर्ष की पढ़ाई छोड़कर १८ वर्षीय नजरुल १९१७ में 'डबल कंपनी' में यहाँ सैनिक शिक्षा लेने लगे।उन्हें ४९ वीं बंगाल रेजिमेंट के साथ नौशेरा उत्तर-पश्चिम सीमांत पर भेज दिया गया। वहाँ से कराची आकर ;कारपोरल' के निम्नतम पद से उन्नति कर कमीशन प्राप्त अफसर के रूप में १९१९ में 'हवलदार' हो गये। मई १९१९ में पहली गद्य रचना 'बाउडीलीयर आत्मकथा (आवारा की आत्मकथा) तथा जुलाई १९१९ में प्रसिद्ध कविता 'मुक्ति' प्रकाशित होने पर उन्हें ख्यति मिली।
एक पंजाबी मौलवी की मदद से उनहोंने फारसी सीखी और फारसी महाकवि हाफ़िज़ की 'रुबाइयाते हाफ़िज़' का अनुवाद आरम्भ किया जो राजनैतिक व्यस्तताओं के कारण १९३० में छप सकी। दूसरा अनुवाद 'काब्यापारा' १९३३ में तथा 'रुबाइयाते उमर खय्याम' १९५९-६० में छपी। ८ अगस्त १९४१ को टैगोर का निधन होने पर नजरुल न २ कविताओं की आल इंडिया रेडिओ पर सस्वर प्रस्तुति कर उन्हें श्रद्धान्जलि दी। बाल साहित्य प्रकाशक अली अकबर खाँ ने 'मुस्लिम भारत' समाचार पत्र कार्यालय में उनसे भेंट कर उन्हें अपना मित्र बनाकर नज्म 'लीचीचोर' माँग ली और मार्च-अप्रैल १९२१ में नजरुल को अपने साथ पूर्वी बंगाल के दौलतपुर गाँव, जिला तिपेरा, हैड ऑफिस कोमिल्ला ले गये। अली अकबर के मित्र वीरेंद्र के पिता श्री इंद्र कुमार सेनगुप्त, माँ बिराजसुन्दरी, बहिन गिरिबाला, बहिन की १३ वर्षीय पुत्री प्रमिला (दोलन) उन्हें परिवार जनों की तरह स्नेह करते। नजरुल बिराजसुंदरी को 'माँ' कहते। २ माह बाद अली अकबर की विधवा बहिन की बेटी नर्गिस बेगम के अस्त नजरुल का निकाह १७ जून १९२१ को होने के निमंत्रण पत्र बँट जाने के बाद अली अकबर द्वारा घर जमाई बनने की शर्त रखी जाने पर नजरुल निकाह रद्द कर दौलतपुर से कोमिल्ला लौट आये। उनकी कई कवितायेँ और गीत नर्गिस के लिये ही थे।अंग्रेज सरकार उन्हें सब रजिस्ट्रार बनाना चाहा पर अंग्रेजी-विरोध के कारण नजरुल ने स्वीकार नहीं किया। 'धूमकेतु' पत्रिका में अंग्रेज शासन विरोधी लेखन के कारण १९२३ में उन्हें एक वर्ष का कारावास दिया गया, छूटने पर वे कृष्ण नगर चले गये। १८ जून १९२१ से ३ जुलाई तक नजरुल सेनगुप्त परिवार के साथ रहे। नज्म 'रेशमी डोर' में ''तोरा कोथा होते केमने एशे मनीमालार मतो, आमार कंठे जड़ा ली'' अर्थात 'तुम लोग कैसे मेरे कंठ से मणिमाला की तरह लिपट गये हो?' लिखकर और 'स्नेहातुर' कविता में नजरुल ने सेनगुप्त परिवार से स्नेहिल संबंधों को अभिव्यक्त किया। वे इस नैराश्य काल में एकमात्र आशावादी कविता 'पलक' लिख सके। ब्रम्ह समाज से जुडी उक्त प्रमिला से २४ अप्रैल १९२४ को नजरुल ने विवाह कर लिया।
विपन्नता से जूझते नजरुल ने प्रथम संतान तथा १९२८ में प्रकाशित प्रथम काव्य संग्रह का नाम बुलबुल रखा। पुत्र अल्पजीवी हुआ किन्तु संग्रह चिरजीवी, इसका दूसरा भाग १९५२ में छपा। 'दारिद्र्य'शीर्षक रचना करने के साथ-साथ नजरुल ने अपने गाँव में विद्यालय खोला तथा 'कम्युनिस्ट इंटरनेशनल' का प्रथम अनुवाद किया।
सांप्रदायिक सद्भाव के अग्रदूत
नजरुल की कृष्णभक्ति परक रचनाओं में आज बन-उपवन में चंचल मेरे मन में, अरे अरे सखि बार बार छि छि, अगर तुम राधा होते श्याम, कृष्ण कन्हैया आयो मन में मोहन मुरली बजाओ, चक्र सुदर्शन छोड़ के मोहन तुम बने बनवारी, जन-जन मोहन संकटहारी, जपे त्रिभुवन कृष्ण के नाम, जयतु श्रीकृष्ण श्री कृष्ण मुरारी, झूले कदम के डार पे झूलना किशोर-किशोरी, झूलन झुलाए झाउ झक झोरे, तुम प्रेम के घन श्याम मैं प्रेम की श्याम-प्यारी, तुम हो मेरे प्रेम के मोहन मैं हूँ प्रेम अभिलाषी, देखो री मेरो गोपाल धरो है नवीन नट की साज , नाचे यशोदा के अँगना में शिशु गोपाल, प्रेम नगर का ठिकाना कर ले, मेरे तन के तुम अधिकारी ओ पीताम्बरधारी, यमुना के तीर पर सखी री सुनी मैं, राधा श्याम किशोर प्रीतम कृष्ण गोपाल, श्याम सुन्दर मन मन्दिर में आओ, सुन्दर हो तुम मनमोहन हो मेरे अंतर्यामी, सोवत-जागत आठूं जान रहत प्रभु मन में तुम्हरो ध्यान, हर का भजन कर ले मनुआ आदि नजरुल की प्रमुख कृष्ण भक्ति रचनाएँ हैं
टैगोर तथा शरत से प्रभावित नजरुल के लिखे दाता कर्ण, कवि कालिदास, शकुनि वध आदि नाटक खूब लोकप्रिय हुए।वे यथार्थ पर आधारित, प्रेम-गंध पूरित, देशी रागों और धुनों से सराबोर, वीरता, त्याग और करुणा प्रधान नाटक लिखते और खेलते थे। पारंपरिक रागों का शुद्ध प्रस्तुतीकरण करने के साथ आधुनिक धुनों में भी ओजस्वी बांगला ३००० से अधिक गीति-रचना तथा अधिकांश का गायन कर संगीत की विविध शैलियों को उन्होंने समृद्ध किया। इसे 'नजरूल गीति' या 'नजरुल संगीत' के नाम से जाना जाता है। विद्रोही, धूमकेतु, भांगरगान, राजबन्दिर, जबानबंदी तथा नजरुल गीति उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं। सांप्रदायिक कट्टरता या संकीर्णता से कोसों दूर नजरुल सांप्रदायिक सद्भाव के जीवंत प्रतीक हैं। रूद्र रचनावली, भाग १, पृष्ठ ७०७ पर प्रकाशित रचना उनके साम्प्रदायिकता विहीनविचारों का दर्पण है-
'हिन्दू और मुसलमान दोनों ही सहनीय हैं
लेकिन उनकी चोटी और दाढ़ी असहनीय है
क्योंकि यही दोनों विवाद कराती हैं।
चोटी में हिंदुत्व नहीं, शायद पांडित्य है
जैसे कि दाढ़ी में मुसल्मानत्व नहीं, शायद मौल्वित्व है।
और इस पांडित्य और मौल्वित्व के चिन्हों को,
बालों को लेकर दुनिया बाल की खाल का खेल खेल रही है
आज जो लड़ाई छिड़ती है
वो हिन्दू और मुसलमान की लड़ाई नहीं
वो तो पंडित और मौलवी की विपरीत विचारधारा का संघर्ष है
रोशनी को लेकर कोई इंसान नहीं लड़ा
इंसान तो सदा लड़ा गाय-बकरे को लेकर।
कविता में विद्रोह मंत्र-
अपनी कविताओं के माध्यम से नज़रूल ने देश के प्रति बलिदान और विदेशी शासन के प्रति विद्रोह के भाव जगाये। मुसलमान होते हुए भी वे माँ काली के समर्पित भक्त थे। उनकी अनेक रचनाएँ माँ काली को ही समर्पित हैं। भारत माता की गुलामी के बंधनों को काट फेंकने का आव्हान करने पर उनकी रचनाओं ने उन्हें 'विद्रोही कवि' का विरुद दिलवाया। अंग्रेजी सत्ता के प्रतिबन्ध भी उनकी ओजस्वी वाणी को दबा नहीं सके। कवि, गायक, संगीतकार होने के साथ-साथ वे श्रेष्ठ दार्शनिक भी थे। नज़रुल ने मनुष्य पर मनुष्य के अत्याचार, सामाजिक अनाचार, निर्बल के शोषण, साम्प्रदायिकता आदि के खिलाफ सशक्त स्वर बुलंद किया। नजरुल ने अपने लेखन के माध्यम से जमीन से जुड़े सामाजिक सत्यों-तथ्यों का इंगित कर इंसानियत के हक में आवाज़ उठायी। वे कवीन्द्र रविन्द्र नाथ ठाकुर के पश्चात् बांगला के दूसरा महान कवि हैं। स्वाभिमानी, समन्ता के पक्षधर नजरुल ने परम्परा तोड़ते हुए किसी शायर को अपना उस्ताद नहीं बनाया। अपने धर्म निरपेक्ष सिद्धांतों के अनुसार वे मस्जिद में इबादत और माँ काली की पूजा में विरोधाभास नहीं मानते थे।
एक अफ़्रीकी कवि ने काव्य को रोष या क्रोध की उपज कहा है। नजरुल के सन्दर्भ में यह सही है। नजरुल के लोकप्रिय नाटकों में १. चाशार शौंग, २. शौकुनी बोध, ३. राजा युधिष्ठिर, ४. दाता कोर्ना (कर्ण), ५. अकबर बादशाह, ६. कॉबि (कवि) कालिदास , ७. बिद्यान होतुम (विद्वान उल्लू), ८. आले आ १९२५-३१, ९. मधुमाला, १०. झली मली १९३०, ११. मधुमाला १९५९-६० मुख्य हैं। 'भंगार गान' में नजरुल का जुझारू और विद्रोही रूप दृष्टव्य है- 'करार आई लौह कपाट, भेंगे फेल कार-रे लोपात, रक्त जामात सिकाल पूजार पाषाण वेदी' अर्थात तोड़ डालो इस बंदीग्रह के लौह कपाट, रक्त स्नात पत्थर की वेदी पाश-पाश कर दो/ जो वेदी रुपी देव के पूजन हेतु खड़ी की गयी है। 'बोलो! वीर बोलो!!उन्नत मम शीर' अर्थात कहो, हे वीर कहो की मेरा शीश उन्नत है। श्री बारीन्द्र कुम घोष के संपादन में प्रकाशित साप्ताहिक पत्रिका 'बिजली' में यह कविता प्रकाशित होने पर जनता ने इसे गाँधी के नेतृत्व में संचालित असहयोग आन्दोलन से जोड़कर देखा। वह अंक भरी मांग के कारण दुबारा छापना पड़ा। गुरुदेव ने स्वयं उनसे यह रचना सुनकर उन्हें आशीष दिया।
नजरुल ने धूमकेतु पत्रिका का प्रकाशन सन १२ अगस्त १९२२ से रवीन्द्र नाथ ठाकुर, शरत चन्द्र चटर्जी, बारीन्द्र कुमार घोष आदि विभूतियों के आशीष से आरंभ कर 'जागिये दे रे चमक मेरे, आछे जारा अर्ध चेतन! (' अर्धचेतना में जो अब भी चमको उन्हें जगाओ रे!') सन्देश दिया। धूमकेतु में की गयी सम्पादकीय टिप्पणियाँ बाद में काव्य संग्रह 'अग्निबीना' (१९२२), दो निबन्ध संग्रहों दुर्दिनेर जात्री (१९३८), रूद्र मंगल, 'वशीर बंसी' तथा 'भंगारन' में प्रकाशित की गयीं जिन्हें सरकार ने अवैध घोषित कर दिया।
नजरुल रूसो के स्वतंत्रता, समानता और भ्रातत्व के सिद्धांत तथा रूस की क्रांति से बहुत प्रभावित थे। १६ जनवरी १९२३ में नजरुल को कैद होने के बाद धूमकेतु का प्रकाशन बंद हो गया। १९६१ में धुन्केतु शीर्षक से उनका निबन्ध संकलन छपा। साम्यवादी दल बंगाल के मुखिया बनकर नजरुल ने नौजूग (नवयुग) पत्रिका निकाली। नजरुल द्वारा १९२२ में प्रकाशित 'जूग बानी'(युगवाणी) की अपार लोकप्रियता को देखते हुए कविवर पन्त जी ने अपने कविता संग्रह को यही नाम दिया। नजरुल की क्रन्तिकारी गतिविधियों से त्रस्त सरकार उन्हें बार-बार काराग्रह भेजती थी। जनवरी १९२३ में नजरुल ने ४० दिनों तक जेल में भूख-हड़ताल की, टैगोर के लिखित अनुरोध पर भी अनशन न तोडा तो उनकी माँ को स्वयं काराग्रह पहुँचकर अनशन तुडवाना पड़ा।कारावासी नेताजी सुभाष ने उनकी प्रशंसा कर कहा- हम जैसे इंसान संगीत से दूर भागते हैं, हममें भी जोश जाग रहा है, हम भी नजरुल की तरह गीत गाने लगेंगे। अब से हम 'मार्च पास्ट' के समय ऐसे ही गीत गायेंगे। इनके गीत गाने और सुनने से हमें कैद भी कैद नहीं लगेगी। ग्यारह माह के कारावास में असंख्य गीटी और कवितायेँ रचकर पंद्रह दिसंबर १९२३ को नजरुल मुक्त किये गये।व्यंग्य रचना 'सुपेर बंदना' (जेल अधीक्षक की प्रार्थना) में नजरुल के लेखन का नया रूप सामने आया। 'एई शिकलपोरा छल आमादेर शिक-पोरा छल' (जो बेड़ी पहनी हमने वो केवल एक दिखावा है / इन्हें पहन निर्दयियों को ही कठिनाई में डाला है)।
शोचनीय आर्थिक परिस्थिति के बाद भी नजरुल की गतिविधियाँ बढ़ती जा रही थीं। गीत 'मरन-मरन' में 'एशो एशो ओगो मरन' (ओ री मृत्यु! आओ आओ) तथा कविता 'दुपहर अभिसार' में जाश कोथा शोई एकेला ओ तुई अलस बैसाखे? (कहाँ जा रहीं कहो अकेली? अलसाये बैसाख में) लिखते हुए नजरुल जनगन को निर्भयता का पाठ पढ़ा रहे थे। सन १९२४ में गाँधी जी के नेतृत्व में असहयोग आन्दोलन और कोंग्रेस व मुस्लिम लीग के बीच स्वार्थपरक राजनैतिक समझौते पर नजरुल ने 'बदना गाडूर पैक्ट' गीत में खिलाफत आन्दोलनजनित क्षणिक हिन्दू-मुस्लिम एकता पर करारा व्यंग्य कर कहा की हम ४० करोड़ भारतीय अलग-अलग निवास और विचारधारामें विभाजित होकर आज़ादी खो बैठे हैं। फिर एक बार संगठित हों, जाति, धर्म आदि के भेद-भाव भुलाकर शांति, साम्य, अन्न, वस्त्र आदि अर्जित करें।सांप्रदायिक एकता को जी रहे नजरुल ने न केवल हिन्दू महिला को शरीके-हयात बनाया अपितु अपने चार बेटों के नाम कृष्ण मुहम्मद, अरिंदम (शत्रुजयी), सव्यसाची (अर्जुन) और अनिरुद्ध (जिसे रोक न जा सके, श्रीकृष्ण का पौत्र) रखे।
स्वतंत्रता हेतु संघर्षरत लोगों का मनोबल बढ़ाते हुए नजरुल ने लिखा 'हे वीर! बोलो मेरा उन्नत सर देखा क्या कभी हिमाद्री शिखर ने अपना सर झुकाया?' आशय यह की अंग्रेजों के उठे सर देखकर तुम भी कभी अपना सर मत झुकाओ। प्रत्यक्षत: कुछ न कहकर परोक्षत: कहने की यही शैली दुष्यंत ने आपातकाल में 'अब तो इस तालाब का पानी बदल दो / ये कमल के फूल मुरझाने लगे हैं' लिखकर अपनायी। नर्गिस बेगम विवाह न हो पाने के बाद भीनजरुल को भुला न सकीं और बार-बार मिलने की चेष्टा करतीं। एक जुलाई १९३७ को एच एम् व्ही कंपनी के लिए रिकोर्ड गीत की पहली पंक्ति 'जार हाथ दिये माला, दिते पारो नाईं / कैनी मने राखा तारे? भूल जाओ तारे, भूले जाओ एके बारे।' (न हाथों में माला देकर भी न दे सकीं / क्यों करती हो याद?, बिसारो, भुला दो उसे एकदम)।
नजरुल ने कोमिल्ला में रहते हुए गाँधी जी के आन्दोलन संबंधी असंख्य गीत व् कवितायेँ रचकर जनानुभूतियों को अभिव्यक्ति दे अपर लोकप्रियता पाई। 'ए कोन पागल पथिक छोटे एलो बंदिनी मार आँगिनाये? ट्रीस कोटि भाई मरण हरण गान गेये तार संगे जाए' (बंदी माँ के आँगन में / जाता है कौन पथिक पागल? / तीस करोड़ बन्धु विस्मृत कर / मौत गा रहे गीत साथ मिल)।
नजरुल गाँधी-दर्शन से पूर्णत: सहमत न थे।उनके अनुसार 'राजबंदी जवानों का लक्ष्य स्पष्ट है,गाँधी जी जिसे दुष्ट सरकार कहते हैं उसकी और अधिक वैध तथा सामूहिक उपकरणों से भर्त्सना करना ही आज उद्दिष्ट है। कवि ईश्वर की एक ऐसी चुनी हुई आवाज़ है जो सदैव यथार्थ और सत्य का पृष्ठपोषण करती है। वह ईश्वर और न्याय का पक्ष ग्रहण करती है और सभी घृणा योग्य उपकरणों को नष्ट-भ्रष्ट करने का साधन है।' उर्दू शायर फैज़ अहमद 'फैज़' ने कारावास में लिखा था 'मताए लौहो-कलम छीन गयी तो क्या गम है?/ कि खूने-दिल में डुबो ली हैं अंगुलियाँ मैंने/ज़बां पर मुहर लगी है तो क्या कि रख दी है/हरेक हलक-ए-जंजीर में ज़बां मैंने।
नजरुल कहते है: 'मुझे पता चल गया है कि मैं सांसारिक विद्रोह करने के लिए ही उस ईश्वर का भेजा हुआ एक लाल सैनिक हूँ। सत्य-रक्षा और न्याय-प्राप्ति हेतु मैं सैनिक मात्र हूँ। उस दिव्य परम शक्ति ने मुझे बंगाल की हरी-भरी धरती पर जो आजकल किसी वशीकरण से वशीभूत है, भेजा है। मैं साधारण सैनिक मात्र हूँ। मैंने उसी ईश्वर के निर्देशों की पूर्ति करने यत्न ही किया है। नजरुल के क्रन्तिकारी विद्रोहात्मक विचार राष्ट्रीयतापरक गीतों में स्पष्ट हैं। दुर्गम गिरि कांतार, मरू दुस्तर पारावार / लांघिते हाबे रात्रि निशीथे, यात्रिरा हुँशियार (दुर्गम गिरि-वन, विकट मरुस्थल / सागर का विस्तार /निशा-तिमिर में, हमें लाँघना, पथिक रहें होशियार)। एक छात्र सम्मलेन के उद्घाटन-अवसर पर नजरुल ने परायण गीत गाया- आमरा शक्ति, आमरा बल, आमरा छात्र दल (हमारी शक्ति, हमारा बल, हमारा छात्र दल)। एक अन्य अवसर पर नजरुल ने परायण गीत गाया- चल रे चल चल, ऊर्ध्व गगने बाजे मादल / निम्ने उत्तला धरणि तल, अरुण प्रान्तेर तरुण दल, चल रे चल चल (चलो रे चलो, नभ में ढोल बजे / नीचे धरती कंपित है / उषा-काल में युवकों, आगे और बढ़ो)। नजरुल के मुख्या कहानी संग्रह ब्याथार दान १९२२, १९९२, रिक्तेर बेदना १९२५ तथा श्यूलीमाला १९३१ हैं।
संगीत में दक्षता-
नजरुल में शैशव से हो संगीत के प्रति अभिरुचि, लग्न तथा प्रतिभा की त्रिवेणी प्रवाहित थी।उनके ग्राम के शास्त्रीय संगीत के प्रकन्द विद्वान क्षितीश्चन्द्र कांजीलाल ने इसे तराशा-निखारा। नसरुल की हारमोनियम, ढोलक और तबला वादन ततः साथ-साथ गायन में महारत थी। उन्होंने लगभग ४००० गीत रचे। 'छन्दसी' नामक गीति काव्य में उन्होंने दस संस्कृत-छंदों का प्रयोग किया।आकाशवाणी के लिये 'नव राग मालिका' के अंतर्गत लगभग ५०० प्रेम-गीत रचे। नजरुल ने उदासी भैरव, रूद्र भैरव, आशा भैरव, अरुण रंजनी, योगिनी, देवयानी चांपा, संध्या मालती, वनकुंतला, शंकरी, मीनाक्षी, रूप्म्न्जरी, निर्झणी (निर्झरिणी) शिव सरस्वती, रक्त हंस सारंग आदि अनेक नये रागों का शोध किया। हिंदी-उर्दू के प्रसिद्द कवी आमिर खुसरो की तरह नजरुल ने भी कई तालों का अविष्कार किया जिनमें बीस मात्रा की नौनंद ताल तथा सात मात्रा की प्रियाछ्न्द ताल मुख्य हैं। उनहोंने बांगला भाषा, संगीत, भावों और अनुभूतियों के अनुकूल रागों के प्रयोग को प्राथमिकता दी। उनकी रचनाओं में लोक संगीत, शास्त्रीय संगीत, अरबी संगीत नीर-क्षीर की तरह प्रवाहमान होते रहे। १९३० से १९४० के मध्य उन्होंने प्रतिदिन कम से कम १२ गीत तथा कुल ४००० गीत रचे जिनमें से आधे आज भी प्राप्त हैं तथा शेष को शोधा जाना आवश्यक है।
नजरुल के गीत बाउल, झूमर, संथाली आदि तथा सँपेरों के भठियाली, भाउआ आदि लोक गीतों पर आधारित, काव्यात्मक सौन्दर्य तथा श्रेष्ठ संगीतात्मकता से परिपूर्ण हैं। नजरुल ने बांगला काव्य में सर्वप्रथम 'गजल' काव्य विधा का प्रयोग कर औरों को राह दिखाई। उनकी आत्मकथा 'बांडुलेयेर आत्मकाहिनी' जुलाई १९१९ में 'बंगला-मुस्लिम साहित्य पत्रिका में छपी। प्रथम काव्य संग्रह 'बोधान' तथा उपन्यास 'बंधनहारा १९२० में प्रकाशित हुआ। राष्ट्रभाषा परिषद् वर्धा के तत्वावधान में नजरुल की जीवनि, प्रमुख कवितायेँ व गीत गोपाल हालदार के संपादन में छपे। १९३२ से ३५ के मध्य उनके ८०० गीत १० संग्रहों में छप चुके थे जिनमें से ६०० शास्त्रीय रागों तथा लोक संगीत की कीर्तन धुनों पर आधारित और ३० राष्ट्रीय चेतना से परिपूर्ण थे। उनके अनेक गीतों में राग भैरव का प्रभाव दृष्टव्य है।
गुरुदेव रविन्द्र नाथ ठाकुर के बांगला उपन्यास 'गोरा' के चलचित्रीकरण में नजरुल संगीत निर्देशक रहे। सचिन सेनगुप्ता के नाटक 'सिराजुद्दौला' में नजरुल का गीत-संगीत कमाल का था। सं १९३८ में वे कोलकाता रेडियो स्टेशन में समस्त कार्यक्रमों के अधिष्ठाता थे। उन्होंने संगीताधारित डोक्युमेंट्रियाँ हारामोनी, नव्राग मल्लिका आदि प्रसारित कीं। नजरुल के गीतों में फीरोजा बेगम, सुपर्वा सरकार, अंगूरबाला, इंदु बाला, अंजली मुखर्जी, ज्ञानेंद्र प्रसाद मुखर्जी, नीलोफर, यास्मीन, मानवेन्द्र मुखर्जी, कनिका मजूमदार, दिपाली नाग, सुकुमार मित्रा, महेंद्र मित्रा, धीरेन बासु, पूर्बी दत्ता, फिरदौस आरा, शाहीन समद, सुष्मिता गोस्वामी आदि ने अपनी आवाज़ देने का सौभाग्य पाया। एच एम् व्ही कंपनी ने नजरुल के सुयोग्य शिष्यों सचिन देव बर्मन, जोथिका रॉय, सुपर्वा सरकार, के मलिक, गीता बासु, सीता चौधरी आदि के लिये रिकार्ड बनाये। कमल-काँटा, नदी में ज्वार, मेरी कैफियत, भिखारी तुम कौन हो,आज भी रोये मन में कोयलिया, सावन की रात में गर स्मरण तुम आये के लिए नजरुल चिरकाल तक याद किये जायेंगे।
नज़रुल राष्ट्रीयता के आंदोलनों में सक्रिय रहने के साथ-साथ चलचित्रों के माध्यम से जन चेतना जाग्रत करने में भी सफल हुए। उन्होंने कई चित्रपटीय गीतों में संगीत दिया। उनके कालजयी गीतों में से कुछ 'ये किसका तसव्वुर है (गायक अनीस खातून, संगीतकार काजी नजरुल इस्लाम-हनुमानप्रसाद शर्मा, गीतकार जिगर मुरादाबादी), वो कब के आये भी (गायक अनीस खातून, संगीतकार काजी नजरुल इस्लाम-हनुमानप्रसाद शर्मा, गीतकार जिगर मुरादाबादी), एक लफ्ज़ मुहब्बत का (संगीतकार काजी नजरुल इस्लाम-हनुमानप्रसाद शर्मा, गीतकार काजी नजरुल इस्लाम, आरजू लखनवी, मिर्ज़ा ग़ालिब, जिगर मुरादाबादी, परताऊ लखनवी), चौरंगी है ये चौरंगी (संगीतकार काजी नजरुल इस्लाम-हनुमानप्रसाद शर्मा, गीतकार काजी नजरुल इस्लाम), झूमे-झूमे मन मतवाला (संगीतकार काजी नजरुल इस्लाम-हनुमानप्रसाद शर्मा, गीतकार काजी नजरुल इस्लाम, आरजू लखनवी, मिर्ज़ा ग़ालिब, जिगर मुरादाबादी, परताऊ लखनवी), आजा री निंदिया तू (संगीतकार काजी नजरुल इस्लाम-हनुमानप्रसाद शर्मा, गीतकार काजी नजरुल इस्लाम, आरजू लखनवी, मिर्ज़ा ग़ालिब, जिगर मुरादाबादी, परताऊ लखनवी), कैसे खेलन जावे सावन मां कजरिया (संगीतकार काजी नजरुल इस्लाम-हनुमानप्रसाद शर्मा, गीतकार काजी नजरुल इस्लाम, आरजू लखनवी, मिर्ज़ा ग़ालिब, जिगर मुरादाबादी, परताऊ लखनवी),सारा दिन छत पीटी हाथ हूँ दुखाई रे (संगीतकार काजी नजरुल इस्लाम-हनुमानप्रसाद शर्मा, गीतकार काजी नजरुल इस्लाम), जो उनपे गुजरती है (संगीतकार काजी नजरुल इस्लाम-हनुमानप्रसाद शर्मा, गीतकार काजी नजरुल इस्लाम, आरजू लखनवी, मिर्ज़ा ग़ालिब, जिगर मुरादाबादी, परताऊ लखनवी), हम इश्क के मारों का इतना ही फसाना है (संगीतकार काजी नजरुल इस्लाम-हनुमानप्रसाद शर्मा, गीतकार काजी नजरुल इस्लाम, आरजू लखनवी, मिर्ज़ा ग़ालिब, जिगर मुरादाबादी, परताऊ लखनवी), कोई उम्मीद बर नहीं आती (संगीतकार काजी नजरुल इस्लाम-हनुमानप्रसाद शर्मा, गीतकार मिर्ज़ा ग़ालिब), आओ मेरी बिगड़ी के बनानेवाले (संगीतकार काजी नजरुल इस्लाम-हनुमानप्रसाद शर्मा, गीतकार आरजू लखनवी), दिल संगे मलामत का हर चाँद निशाना है (संगीतकार काजी नजरुल इस्लाम-हनुमानप्रसाद शर्मा, गीतकार काजी नजरुल इस्लाम, आरजू लखनवी, मिर्ज़ा ग़ालिब, जिगर मुरादाबादी, परताऊ लखनवी)' आदि हैं।
सन १९४२ में मात्र ४३ वर्ष की आयु में नजरुल अज्ञात रोग से ग्रस्त होकर बधिर हो गये। कोलकाता तथा कराँची में स्वस्थ्य लाभ न होने पर चिंतित शुभचिंतकों ने 'नजरूल ट्रीटमेंट सोसायटी' गठित की। श्री श्यामा प्रसाद मुखर्जी की संस्तुति पर उन्हें लन्दन भेजा गया। वियना में मस्तिष्क रोग विशेषज्ञों ने उन्हें 'मोरबस पिक्स' नामक घातक-विरल लाइलाज रोग से ग्रस्त पाया। सन १९६२ में उनकी पत्नी प्रमिला के निधन पश्चात् वे एकाकी रोग से जूझते रहे पर हार न मानी।सं १९७२ में नवनिर्मित बांग्ला देश सरकार के आमंत्रण पर भारत सरकार से अनुमति लेकर वे ढाका चले गये और अगस्त १९७६ को परलोकवासी हुए। नजरुल इस्लाम जैसे व्यक्तित्व और उनका कृतित्व कभी मरता नहीं। वे अपनी रचनाओं, अपनी यादों, अपने शिष्यों और अपने कार्यों के रूप में अजर-अमर हो जाते हैं। वर्तमान विद्वेष, विखंडन, अविश्वास, आतंक और अजनबियत के दौर में नजरुल का संघर्ष, नजरुल की राष्ट्रीयता, नजरुल की सफलता और नजरुल का सम्मान नयी पीढ़ी के लिये प्रकाश स्तंभ की तरह है। काजी नजरुल इस्लाम के एक कविता की निम्न पंक्तियाँ उनके राष्ट्रवाद को विश्ववाद के रूप में परिभाषित करते हुए ज़ुल्मो-सितम के खात्मे की कामना करती हैं-

"महाविद्रोही रण क्लांत
आमि शेई दिन होबो क्लांत
जोबे उतपीड़ितेर क्रंदनरोल
आकाशे बातासे ध्वनिबे ना
अत्याचारीर खंग-कृपाण
भीम रणेभूमे रणेबे ना
विद्रोही ओ रणेक्लांत
आमि शेई दिन होबो शांत"
(मैं विद्रोही थक लड़ाई से भले गया
पर शांत तभी हो पाऊँगा जब
आह या चीत्कार दुखी की
आग न नभ में लगा सकेगी।
और बंद तलवारें होंगी
चलना अत्याचारी की जब
तभी शांत मैं हो पाऊँगा
तभी शांत मैं हो जाऊँगा।)
*************************

शिव स्तवन

छंद सलिला;
शिव स्तवन
संजीव
*
(तांडव छंद, प्रति चरण बारह मात्रा, आदि-अंत लघु)
।। जय-जय-जय शिव शंकर । भव हरिए अभ्यंकर ।।
।। जगत्पिता श्वासा सम । जगननी आशा मम ।।
।। विघ्नेश्वर हरें कष्ट । कार्तिकेय करें पुष्ट ।।
।। अनथक अनहद निनाद । सुना प्रभो करो शाद।।
।। नंदी भव-बाधा हर। करो अभय डमरूधर।।
।। पल में हर तीन शूल। क्षमा करें देव भूल।।
।। अरि नाशें प्रलयंकर। दूर करें शंका हर।।
।। लख ताण्डव दशकंधर। विनत वदन चकितातुर।।
।। डम-डम-डम डमरूधर। डिम-डिम-डिम सुर नत शिर।।
।। लहर-लहर, घहर-घहर। रेवा बह हरें तिमिर।।
।। नीलकण्ठ सिहर प्रखर। सीकर कण रहे बिखर।।
।। शूल हुए फूल सँवर। नर्तित-हर्षित मणिधर ।।
।। दिग्दिगंत-शशि-दिनकर। यश गायें मुनि-कविवर।।
।। कार्तिक-गणपति सत्वर। मुदित झूम भू-अंबर।।
।। भू लुंठित त्रिपुर असुर। शरण हुआ भू से तर।।
।। ज्यों की त्यों धर चादर। गाऊँ ढाई आखर।।
।। नव ग्रह, दस दिशानाथ। शरणागत जोड़ हाथ।।
।। सफल साधना भवेश। करो- 'सलिल' नत हमेश।।
।। संजीवित मन्वन्तर। वसुधा हो ज्यों सुरपुर।।
।। सके नहीं माया ठग। ममता मन बसे उमग।।
।। लख वसुंधरा सुषमा। चुप गिरिजा मुग्ध उमा।।
।। तुहिना सम विमल नीर। प्रवहे गंधित समीर।।
।। भारत हो अग्रगण्य। भारती जगत वरेण्य ।।
।। जनसेवी तंत्र सकल। जनमत हो शक्ति अटल।।
।। बलिपंथी हो नरेंद्र। सत्पंथी हो सुरेंद्र।।
।। तुहिना सम विमल नीर। प्रवहे गंधित समीर।।
।। भारत हो अग्रगण्य। भारती जगत वरेण्य ।।
।। जनसेवी तंत्र सकल। जनमत हो शक्ति अटल।।
।। सदय रहें महाकाल। उम्मत हों देश-भाल।।
।। तुहिना सम विमल नीर। प्रवहे गंधित समीर।।
।। भारत हो अग्रगण्य। भारती जगत वरेण्य ।।
।। जनसेवी तंत्र सकल। जनमत हो शक्ति अटल।।
१५-४-२०१४ 
***

दोहा

दोहा
*
नर से वानर जब मिले, रावण का हो अंत.
'सलिल' न दानव मारते, कभी देव या संत..
*
अक्षर की आराधना, हो जीवन का ध्येय.
सत-शिव-सुंदर हो 'सलिल', तब मानव को ज्ञेय..
*
सत-चित-आनंद पा सके, नर हो अगर नरेंद्र.
जीवन की जय बोलकर, होता जीव जितेंद्र..
*
१५.४.२०१०

प्यार के दोहे

प्यार के दोहे: 
तन-मन हैं रथ-सारथी: 
संजीव 'सलिल' 
*
दो पहलू हैं एक ही, सिक्के के नर-नार। 
दोनों में पलता सतत, आदि काल से प्यार।।
*
प्यार कभी मनुहार है, प्यार कभी तकरार।
हो तन से अभिव्यक्त या, मन से हो इज़हार।।
*
बिन तन के मन का नहीं, किंचित भी आधार।
बिन मन के तन को नहीं, कर पाते स्वीकार।।
*
दो अपूर्ण मिल एक हों, तब हो पाते पूर्ण।
अंतर से अंतर मिटे, हों तब ही संपूर्ण।।
*
जब लेते स्वीकार तब, मिट जाता है द्वैत।
करते अंगीकार तो, स्थापित हो अद्वैत।।
*

१५.४.२०१० 

दोहे सम्मान

सामयिक दोहे
'वृद्ध-रत्न' सम्मान दें, बच्चों को यदि आप।
कहें न क्या अपमान यह, रहे किस तरह माप?
*
'उत्तम कोंग्रेसी' दिया, अलंकरण हो हर्ष।
भाजपाई किस तरह ले, उसे लगा अपकर्ष।।
*
'श्रेष्ठ यवन' क्यों दे रहे पंडित जी को मित्र।
'मर्द रत्न' महिला गहे, बहुत अजूबा चित्र।।
*
'फूल मित्र' ले रहे हैं, हँसकर शूल खिताब।
'उत्तम पत्थर'विरुद पा, पीटे शीश गुलाब।।
*
देने-लेने ने किया, सचमुच बंटाढार।
लेन-देन की सत्य ही महिमा सलिल अपार।।
***
संवस
१३.४.२०१९

गीत दूर रहो नोटा से

एक रचना 
*
दूर रहो नोटा से प्यारे!
*
इस-उस दल के यदि प्यादे हो
जिस-तिस नेता के वादे हो
पंडे की हो लिए पालकी
या झंडे सिर पर लादे हो
जाति-धर्म के दीवाने हो
या दल पर हो निज दिल हारे
दूर रहो नोटा से प्यारे!
*
आम आदमी से क्या लेना?
जी लेगा खा चना-चबेना
तुम अरबों के करो घोटाले
स्वार्थ नदी में नैया खेना
मंदिर-मस्जिद पर लड़वाकर
क्षेत्रवाद पर लड़ा-भिड़ा रे!
दूर रहो नोटा से प्यारे!
*
जा विपक्ष में रोको संसद
सत्ता पा बन जाओ अंगद०
भाषा की मर्यादा भूलो
निज हित हेतु तोड़ दो हर हद
जोड़-तोड़ बढ़ाकर भत्ते
बढ़ा टैक्स फिर गला दबा रे!
दूर रहो नोटा से प्यारे!
***
१४-४-२०१९

रविवार, 14 अप्रैल 2019

मुक्तक

मुक्तक सलिला: 
*
बोल जब भी जबान से निकले,
पान ज्यों पानदान से निकले। 
कान में घोल दे गुलकंद 'सलिल-
ज्यों उजाला विहान से निकले।।
*
जो मिला उससे है संतोष नहीं,
छोड़ता है कुबेर कोष नहीं।
नाग पी दूध ज़हर देता है-
यही फितरत है, कहीं दोष नहीं।।
*
बाग़ पुष्पा है, महकती क्यारी,
गंध में गंध घुल रही न्यारी।
मन्त्र पढ़ते हैं भ्रमर पंडित जी-
तितलियाँ ला रही हैं अग्यारी।।
*
आज प्रियदर्शी बना है अम्बर,
शिव लपेटे हैं नाग- बाघम्बर।
नेह की भेंट आप लाई हैं-
चुप उमा छोड़ सकल आडम्बर।।
*
ये प्रभाकर ही योगराज रहा,
स्नेह-सलिला के साथ मौन बहा।
ऊषा-संध्या के साथ रास रचा-
हाथ रजनी का खुले-आम गहा।।
*
करी कल्पना सत्य हो रही,
कालिख कपड़े श्वेत धो रही।
कांति न कांता के चहरे पर-
कलिका पथ में शूल बो रही।।
*
१८-४-२०१४

गीत- तुमने स्वर दे दिया

एक रचना:
तुमने स्वर दे दिया 
*
१. 
तुमने स्वर दे दिया 
बोलें, नहीं सुनेंगे अब ये
चीखें, रोएँ, सिसकी भर ये,
वे गुर्राते हैं दहाड़कर।
चिंघाड़े कोई इस बाजू
फुफकारे कोई गुहारकर।
हाय रे! अमन-चैन ले लिया
तुमने स्वर दे दिया
*
२.
तुमने स्वर दे दिया
यह नेता बेहद धाँसू है
ठठा रहा देकर आँसू है
हँसता पीड़ित को लताड़कर।
तृप्त न होता फिर भी दानव
चाकर पुलिस लुकाती है शव
जाँच रपट देती सुधारकर।
न योगी को हो दर्द मिया
तुमने स्वर दे दिया
*
३.
तुमने स्वर दे दिया
वादा कह जुमला बतलाया
हो विपक्ष यह तनिक न भाया
रख देंगे सबको उजाड़कर।
सरहद पर सर हद से ज्यादा
कटें, न नेता-अफसर-सुत हैं
हम बैठे हैं चुप निहारकर।
छप्पन इंची छाती है, न हिया
तुमने स्वर दे दिया
*
४.
तुमने स्वर दे दिया
खाला का घर है, घुस आओ
खूब पलीता यहाँ लगाओ
जनता को कूटो उभाड़कर।
अरबों-खरबों के घपले कर
मौज करो जाकर विदेश में
लड़ चुनाव लें, सच बिसारकर।
तीन-पाँच दो दूनी सदा किया
तुमने स्वर दे दिया
*

तुमने स्वर दे दिया
तोड़ तानपूरा फेंकेंगे
तबले पर रोटी सेकेंगे
संविधान बाँचें प्रहारकर।
सूरत नहीं सुधारेंगे हम
मूरत तोड़ बिगाड़ेंगे हम
मार-पीट, रोएँ गुहारकर
फर्जी हो प्यादे ने शोर किया
तुमने स्वर दे दिया
***
१४.४.२०१८
टीप: इस रचना का भारत से कुछ लेना-देना नहीं है।

मधुमालती छंद

नवलेखन कार्यशाला 
*
आ गुरूजी
एक प्रयास किया है । कृपया मार्गदर्शन दें । सादर ।
शारदे माँ ( मधुमालती छंद)
माँ शारदे वरदान दो
सद्बुद्धि दो संग ज्ञान दो
मन में नहीं अभिमान हों
अच्छे बुरे की पहचान दो ।
वाणी मधुर रसवान दो
मैं मैं का न गुणगान हों
बच्चे अभी नादान हम
निर्मल एक मुस्कान दो
न जाने कि हम कौन हैं
हमें अपनी पहचान दो
अल्प ज्ञानी मानो हमें
बस चरण में तुम स्थान दो ।।
कल्पना भट्ट, १४-४-२०१७
*
प्रिय कल्पना!
सदा खुश रहें।
मधुमालती १४-१४ के दो चरण, ७-७ पर यति, पदांत २१२ ।
शारदे माँ ( मधुमालती छंद)
माँ शारदे! वरदान दो
सदबुद्धि दो, सँग ज्ञान दो
मन में नहीं अभिमान हो
शुभ-अशुभ की पहचान दो।
वाणी मधुर रसवान दो
'मैं' का नहीं गुण गान हो
बच्चे अभी नादान हैं
निर्मल मधुर मुस्कान दो
किसको पता हम कौन हैं
अपनी हमें पहचान दो
हम अल्प ज्ञानी माँ! हमें
निज चरण में तुम स्थान दो ।।
*

समानिका छंद

ॐ 
छंद बहर का मूल है: २ 
*
छंद परिचय:
ग्यारह मात्रिक रौद्र जातीय छंद।
सप्तवार्णिक उष्णिक जातीय समानिका छंद।
संरचना: SIS ISI S
सूत्र: रगण जगण गुरु / रजग।
बहर: फ़ाइलुं मुफ़ाइलुं ।
*
सूर्य आप भी बने
*
सत्य को न मारना
झूठ से न हारना
गैर को न पूजना
दीन से न भागना
बात आत्म की सुनें
सूर्य आप भी बने
*
काम काम से रखें
राम-राम भी भजें
डूब राग-रंग में
धर्म-कर्म ना तजें
शुभ विचार कर गुनें
सूर्य आप भी बने
*
देव दैत्य आप हैं
पुण्य-पाप आप हैं
आप ही बुरे-भले
आप ही उगे-ढले
साक्ष्य भाव से जियें
सूर्य आप भी बने
१४.४.२०१७
***

सवैया

रसानंद दे छंद नर्मदा २५ : १४-०४-२०१६ 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'

दोहा, सोरठा, रोला, आल्हा, सार, ताटंक, रूपमाला (मदन), चौपाई, हरिगीतिका, उल्लाला, गीतिका, घनाक्षरी, बरवै, त्रिभंगी, सरसी, छप्पय, भुजंगप्रयात तथा कुण्डलिनी छंदों से साक्षात के पश्चात् अब मिलिए सवैया छन्द से.
दोहा, सोरठा, रोला, आल्हा, सार, ताटंक, रूपमाला (मदन), चौपाई, हरिगीतिका, उल्लाला, गीतिका, घनाक्षरी, बरवै, त्रिभंगी, सरसी, छप्पय, भुजंगप्रयात तथा कुण्डलिनी छंदों से साक्षात के पश्चात् अब मिलिए सवैया छन्द से.
सरस सवैया रच पढ़ें
गण की आवृत्ति सात हों, दो गुरु रहें पदांत।
सरस सवैया नित पढो, 'सलिल' न तनिक रसांत।।

बाइस से छब्बीस वर्णों के (सामान्य वृत्तो से बड़े और दंडक छंदों से छोटे) छंदों को सवैया कहा जाता है। सवैया वार्णिक छंद हैं। विविध गणों में से किसी एक गण की सात बार आवृत्तियाँ तथा अंत में दो दीर्घ अक्षरों का प्रयोग कर सवैये की रचना की जाती है। यह एक वर्णिक छन्द है। सवैया को वार्णिक मुक्तक अर्थात वर्ण संख्या के आधार पर रचित मुक्तक भी कहा जाता है। इसका कारन यह है की सवैया में गुरु को लघु पढ़ने की छूट है। जानकी नाथ सिंह ने अपने शोध निबन्ध 'द कंट्रीब्युशन ऑफ़ हिंदी पोयेट्स टु प्राजोडी के चौथे अध्याय में सवैया को वार्णिक सम वृत्त मानने का कारण हिंदी में लय में गाते समय 'गुरु' का 'लघु' की तरह उच्चारण किये जाने की प्रवृत्ति को बताया है। हिंदी में 'ए' के लघु उच्चारण हेतु कोई वर्ण या संकेत चिन्ह नहीं है। रीति काल और भक्ति काल में कवित्त और सवैया बहुत लोकप्रिय रहे हैं. कवितावलि में तुलसी ने इन्हीं दो छंदों का अधिक प्रयोग किया है। कवित्त की ही तरह सवैया भी लय-आधारित छंद है।
विविध गणों के प्रयोग के आधार पर इस छन्द के कई प्रकार (भेद) हैं। यगण, तगण तथा रगण पर आधारित सवैये की गति धीमी होती है जबकि भगण, जगण तथा सगण पर आधारित सवैया तेज गति युक्त होता है। ले के साथ कथ्य के भावपूर्ण शब्द-चित्र अंकित होते हैं। श्रृंगार तथा भक्ति परक वर्ण में विभव, अनुभव, आलंबन, उद्दीपन, संचारी भाव, नायक-नायिका भेद आदि के शब्द-चित्रण में तुलसी, रसखान, घनानंद, आलम आदि ने भावोद्वेग की उत्तम अभिव्यक्ति के लिए सवैया को ही उपयुक्त पाया। भूषण ने वीर रस के लिए सवैये का प्रयोग किया किन्तु वह अपेक्षाकृत फीका रहा।
प्रकार-
सवैया के मुख्य १४ प्रकार हैं। 
१. मदिरा, २. मत्तगयन्द, ३. सुमुखि, ४. दुर्मिल, ५. किरीट, ६. गंगोदक, ७. मुक्तहरा, ८. वाम, ९. अरसात, १०. सुन्दरी, ११. अरविन्द, १२. मानिनी, १३. महाभुजंगप्रयात, १४. सुखी सवैया।

मत्तगयंद (मालती) सवैया
इस वर्णिक छंद के चार चरण होते हैं। हर चरण में सात भगण (S I I) के पश्चात् अंत में दो गुरु (SS) वर्ण होते हैं।
उदाहरण:
१.
धूरि भरे अति सोभित स्यामजू, तैंसी बनी सिर सुन्दर चोटी। 
खेलत-खात फिरें अँगना, पग पैंजनिया, कटी पीरि कछौटी।। 
वा छवि को रसखान विलोकत, वारत काम कलानिधि कोटी।
काग के भाग बड़े सजनी, हरि हाथ सों ली गयो माखन-रोटी।।

२.
यौवन रूप त्रिया तन गोधन, भोग विनश्वर है जग भाई।
ज्यों चपला चमके नभ में, जिमि मंदर देखत जात बिलाई।। 
देव खगादि नरेन्द्र हरी मरते न बचावत कोई सहाई।
ज्यों मृग को हरि दौड़ दले, वन-रक्षक ताहि न कोई लखाई।।

३.
मोर पखा सिर ऊपर राखिहौं, गुंज की माल गले पहिरौंगी।
ओढ़ी पीताम्बर लै लकुटी, वन गोधन गजधन संग फिरौंगी।। 
भाव तो याहि कहो रसखान जो, तेरे कहे सब स्वांग करौंगी।
या मुरली मुरलीधर की अधरान धरी अधरा न धरौंगी।।

दुर्मिल (चन्द्रकला) सवैया
इस वर्णिक छंद के चार चरणों में से प्रत्येक में आठ सगण (I I S) और अंत में दो गुरु मिलाकर कुल २५ वर्ण होते हैं.
उदाहरण:
बरसा-बरसा कर प्रेम सुधा, वसुधा न सँवार सकी जिनको।
तरसा-तरसा कर वारि पिता, सु-रसा न सुधार सकी जिनको।।
सविता-कर सी कविता छवि ले, जनता न पुकार सकी जिनको।
नव तार सितार बजा करके, नरता न दुलार सकी जिनको।।

उपजाति सवैया (जिसमें दो भिन्न सवैया एक साथ प्रयुक्त हुए हों) तुलसी की देन है। सर्वप्रथम तुलसी ने 'कवितावली' में तथा बाद में रसखान व केशवदास ने इसका प्रयोग किया। 
मत्तगयन्द - सुन्दरी
प्रथम पद मत्तगयन्द (७ भगण + २ गुरु) - "या लटुकी अरु कामरिया पर राज तिहूँ पुरको तजि डारौ"। तीसरा पद सुन्दरी (७ सगन + १ गुरु) - "रसखानि कबों इन आँखिनते, ब्रजके बन बाग़ तड़ाग निहारौ"।

मदिरा - दुर्मिल 
तुलसी ने एक पद मदिरा का रखकर शेष दुर्मिल के पद रखे हैं। केशव ने भी इसका अनुसरण किया है। पहला मदिरा का पद (७ भगण + एक गुरु) - "ठाढ़े हैं नौ द्रम डार गहे, धनु काँधे धरे कर सायक लै"। दूसरा दुर्मिल का पद (८ सगण) - "बिकटी भृकुटी बड़री अँखियाँ, अनमोल कपोलन की छवि है"।

मत्तगयन्द-वाम और वाम-सुन्दरी की उपजातियाँ तुलसी (कवितावली) में तथा केशव (रसिकप्रिया) में सुप्राप्य है। कवियों ने भाव-चित्रण में अधिक सौन्दर्य तथा चमत्कार उत्पन्न करने हेतु ऐसे प्रयोग किये हैं।
आधुनिक कवियों में भारतेंदु हरिश्चन्द्र, लक्ष्मण सिंह, नाथूराम शंकर आदि ने इनका सुन्दर प्रयोग किया है। जगदीश गुप्त ने इस छन्द में आधुनिक लक्षणा शक्ति का समावेश किया है।
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