सोमवार, 8 जनवरी 2018

दोहा दुनिया

शिव सुरमय हैं, असुर को
सदा पढ़ाते पाठ।
सब चाहें जो वही गा,
तब ही होगा ठाठ।।
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निज-पर हित दो शंकु ले,
रहे संतुलन पूर्ण।
राग चर्म वैराग की,
रही बिना अपूर्ण।।
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बम-बम अनहद नाद कर,
भोले का जयघोष।
भोलेपन का आचरण,
देता सुख-संतोष।।
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पौरुष डमरू जब बजे,
करे सफलता नृत्य।
विघ्न सर्प फुंफकार कर,
करे वंदना नित्य।।
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कर-पग के कंगन बजे,
करते जय-जयकार।
जटा सर्पिणी झूमती,
मुदित नर्मदा- धार।।
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उन्मीलित सरसिज नयन,
सत-शिव-सुंदर रूप।
लास-रास का समन्वय,
अद्भुत दिव्य अनूप।।
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