रविवार, 21 जनवरी 2018

doha shatak: jayprakash shrivastava

दोहा शतक:
जयप्रकाश श्रीवास्तव













जन्म: ९.५.१९५१, नरसिंहपुर, मध्य प्रदेश।
आत्मज: स्व. सरयू देवी -स्व. प्रेमशंकर श्रीवास्तव।
जीवनसाथी:
शिक्षा: एम. ए., बी. एड. ।
लेखन विधा: गीत, दोहा।
प्रकाशित कृतियाँ: गीत संग्रह- मन का साकेत, परिंदे संवेदना के।
उपलब्धि:
संपर्क: आई.सी. ५ सैनिक सोसायटी, शक्ति नगर, जबलपुर ४८२००१।
           ०७६१ २४२६७८८, ७८६९१९३९१७। jaiprakash09shrivasta@vagmail.com
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कच्ची कैरी आम की, पन्हा मधुर रसदार।
सत्तू पीकर धूप भी करती है प्रतिवार।।
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नदी रेत में खो गई, घाट हुए वीरान।
सन्नाटा ओढ़े खड़ा, राहों में दिनमान।।
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नासमिटा सूरज मुआ, खींचे सबकी खाल।
बादल कहाँ हिरा गया, ढूँढो मिल तत्काल।।
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लू-लपटों के तीर से, घायल चिड़िया प्यास।
धूल-बवंडर में 'कहाँ, पानी' की अरदास।।
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तपते मौसम के लिए, लिख दो थोड़ी छाँव।
गीत-गजल कुछ भी लिखो, शहर लिखो या गाँव।।
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पीपल का पट्टा हिला, ठंडी चली बयार।
माटी रखकर कोख में, बीज रही पुचकार।।
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फिर पगडंडी-खेत के, दिन आए खुशहाल।
सूरज जगा मेड़ पर, साँझ जगी चौपाल।।
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भोर बाँटती फिरे है. ठिठुरन की सौगात।
लोग कुनकुनी धूप में, सुलझाते जज्बात।।
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शिशिर चाँदनी दमकती, चाँद बना चितचोर।
तारों की बारात में, नाच रहा मनमोर।।
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मन अकुलाया घूमता, पढ़ने प्रणय-किताब।
रात पहेली बूझती, रख सिरहाने ख्वाब।।
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किरणों की ले पालकी, सूरज चला कहार।
उषा कुलवधू सी लगे, धूप लगे गुलनार।।
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फूल खिले कलियाँ खिलीं, और खिले मन मोर।
धरती के आँगन खिली, उजली-उजली भोर।।
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चाँद उठाकर ले गई, रात डुबाने झील।
सभी सितारे खो गए, बुझी पड़ी कंदील।।
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नदी किनारे पर हुआ, एक परिंदा लाश।
मौसम के इस खेल में, शामिल था आकाश।।
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यूँ तो सूरज नापता, धरती का भूगोल।
पर कोई सुनता नहीं, गौरैया के बोल।।
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खेत सभी बंजर मिले, मिले सदी के घाव।
संसद में पारित हुआ, सूखे का प्रस्ताव।।
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आदम के हाथों हुआ, जंगल लहूलुहान।
और नियति के सामने, दिखा रहा अभिमान।।
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कुछ पाने की चाह में, गुमा चैन अध्याय।
जीवन के लघु खेल में,  उम्र खड़ी निरुपाय।।
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रात हुई दीपक जला, जली न तम की बात।
सूरज से मिलती रही, उजियारी सौगात।।
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मौसम खिलते फूल का, रिमझिम सी बरसात।
लोग सभी मिल कह रहे, बरस रही सौगात।।
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दिन सूरज के आ गए, खिलखिल करती धूप।
निखरेंगे फिर धरा के, मनभावन से रूप।।
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पेड़ हुए फिर से नए, पहन धुले परिधान।
फूलों ने हँसकर किया, मौसम का सम्मान।।
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कभी बादलों से घिरा, कभी धूप के संग।
कभी हवा पर नाचता, मौसम हुआ पतंग।।
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एक दिया भर चाँदनी, आई लेकर रात।
बदल के घर से निकल, बाँट रही सौगात।।
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मौसम-रंग अनेक हैं, बन जा इसका रंग।
वर्ना फिर पछताएगा, होगा जब बदरंग।।
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झेल रहा पर्यावरण, मौसम के बदलाव।
सूरज की जागीर में, ठंडे पड़े अलाव।।
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चमक-दमकमय चाँदनी, मौसम है चितचोर।
चाँद पहरुआ रात का, दिवस कुनकुनी भोर।।
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चुहलबाजियाँ धूप की, दिखलाए यह ठण्ड।
सर्द हवाएँ हो गईं, ज्यादा ही उद्दंड।।
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हवा ठिठुरती घूमती, कुम्हलाती सी धूप।
ओस बूँद भागी भीगा, कली-कली के रूप।।
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पानी-पानी हो गया मौसम पानीदार।
पानी-पानी से मिला, पानी सब संसार।।
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पानी रूप अनेक हैं, बन पानी का रूप।
बहता पानी जिंदगी, ठहरा पानी कूप ।।
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पानी पर लिखता रहा, पानी से तकदीर।
पानी आँखों से बहा, बही न मन की पीर।।
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पानी की गहराई में, छिपा उमर का सार।
सतहों पर मिलता नहीं, जीवन का आधार।।
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महल हमारे गाँव के, झेल रहे भूचाल।
आँखों में है तैरता, प्यासा एक सवाल।।
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पनघट करे न चाकरी, सरवर देत न नीर।
किसने देखी ही भला, होते नदी फ़कीर।।
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सँकुचाई सी घूमती, हवा उघारे देह।
धरती का सीना फटा, रीत गया सब नेह।।
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रंगमंच औंधे गिरे, नेपथ्यों की खोज।
मरा पड़ा अभिनय यहाँ, तू जिंदा की सोच।।
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खेल रहा है अन्य के, दबे-छिपे सब राज।
घोटालों के राज में, हर घोटालेबाज।।
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इस बढ़ती मँहगाई में, लोग बिके बेदाम।
राजनीति कीहाट में, चढ़े वोट के दाम।।
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बूँद-बूँद दर्पण हुई, धरती देखे रूप।
सूरज कहाँ हिरा गया, कहाँ हिरानी धूप।।
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नदी गाय सी मरती, सींगन पैनी धार।
लहरें पकड़े जाल में, मछुआ अपढ़ गँवार।।
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हवा हो गई बाँसुरी, बादल हुआ मृदंग।
बिजली-पायल बाँध कर, नाचे बरखा संग।।
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दादुर मोर पपीहरा, गाएँ राग मल्हार।
छप्पर छानी से कहे, लइयो बहन! उबार।।
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वन-उपवन के मन बसी, पावस की मृदु गंध।
ऋतु के दस्तावेज पर, मौसम के अनुबंध।।
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श्रम की अंगुली थामकर. चले समय के पाँव।
पगडंडी से पूछिए, कहाँ हिरा गए गाँव।।
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जीवन सुख का मूल है, अनुशासित परिवार।
सूर्य-चंद्र से ज्यों चले, नभ का कारोबार ।।
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एक सुखी परिवार की, इतनी ही पहचान।
घर में दो ही फूल खिल, बिखराएँ मुस्कान।।
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आँखों से आँखें मिला, बैठ न आँखें मूँद।
बन मत आँसू आँख का, बन स्वाती की बूँद।।
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दुःशासन हरते यहाँ, जब अबला के चीर।
पहले से ज्यादा घनी, हुई कृष्ण की पीर।।
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फिर झुलसाने आ गए, गर्म जेठ-बैसाख।
मँहगाई में हो गयी, जनता जलकर राख।।
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नदी चुराई रेत ने, नाव खोजता गाँव।
अकुलाई सी धूप भी, खोज रही है छाँव।।
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पगलाई सी है हवा, मौसम हाल विचित्र।
लगी धूल भी टाँगने, नभ पर अपने चित्र।।
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तन के रेगिस्तान में, मन हिरना की प्यास।
तृप्ति खोजती फिर रही, झुलसे बदन उदास।।
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सूरज संपादक बना, आँधी का अखबार।
लिखता लू की कलम से, गरमागरम विचार।।
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नदी किनारे बैठकर, गहराई मत नाप।
गहरे पानी पैठकर, चुन ममोती चुपचाप।।
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आँगन में तुलसी उगा, मन में उगा सुगंध।
जीव जगत पर्यावरण, सबसे कर अनुबंध।।
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पाँवों को छाले मिले, मिले सदी को घाव।
रेत हुई नदिया मुई, नाहक खेते नाव।।
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गुणवत्ता खोती गई, शिक्षा हो व्यवसाय। 
नंबरवाली दौड़ में, है बचपन असहाय।।
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संविधान असफल हुआ, गलत हुए अनुमान। 
लोकतंत्र के घाट पर, नंगा हिन्दुस्तान।।
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रही ठिठुरती याद में, उसकी ही तस्वीर।
सौंप नहीं पाया उसे, बटुए की जागीर।।
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सपनों के आकाश में, चाँद दिखता रूप। 
खुलती है जब आँख तो, याद फिसलती धूप।।
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यादों के सागर हिले, हिली न मन से याद।
नदी बिचारी पूछती, कहाँ करूँ फ़रियाद?
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तुम आते हो याद तो, खिल जाते हैं फूल। 
लगता हूँ मैं झाड़ने, गुलदानों से धूल।।
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साँसों की वंशी बजा, रच-गा मधुरिम गीत। 
भावों की गागर लिए, खड़ी द्वार पर प्रीत।।
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उतर धुएँ की ओट में, तम पसरा चहुँ ओर।
रात महकने लगी है, बंध सपनों की डोर।।
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फागुन तन-मन भिगाता, लगे बहकने रंग। 
पिचकारी की धार से, पैनी हुई उमंग।।
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टेसू रंग अबीर की, गाँव गली में धाक।
सेमल पूछे काट दी, किसने मेरी नाक।।
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मस्ती के आँगन खड़े, मदहोशी के यार। 
दहरी ने लाँघे सभी, मर्यादा के द्वार।।
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कान पकड़कर हवा को, समझाती है घाम.
मौसम की बदमाशियाँ, कर देंगी बदनाम।।७० 
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