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मंगलवार, 3 मार्च 2026

मार्च ३,वन्य जीवन दिवस, हाइकु गीत, सॉनेट, विकास, दोहा, होली, लघुकथा, बरवै, नवगीत, हास्य

सलिल सृजन मार्च ३
*
जोगी जी सा रा रा रा
होली खेलें छंद की, पिएँ गीत की भांग।
गुझियाँ बने कहानियाँ, व्यंग लेख हों स्वांग।।
जोगी जी सा रा रा रा
टैरिफ-लकड़ी सँग जले, अकड़ ट्रंप की आज।
पुतिन-पिंग हों गुलेरी, भारत पहने ताज।।
जोगी जी सा रा रा रा
राहुल के माथे मलें, मोदी लाल गुलाल।
ममता को रंग निर्मला, कर दें नया धमाल।।
जोगी जी सा रा रा रा
आप केजरीवाल की, पिचकारी की मार।
अमित शाह चुप झेलते, रेखा पांय न पार।।
जोगी जी सा रा रा रा
तेजस्वी-अखिलेश मिल, बाँह बाँह में डाल।
भाँग चढ़ा खा रहे हैं, गुझिया भरकर थाल।
जोगी जी सा रा रा रा
योगी बुलडोजर लिए, जा पहुँचे जापान।
राजदूत से कह रहे,
ला झटपट जा पान।।
जोगी जी सा रा रा रा
३.३.२०२६
०००
मैं
मैं खुद पर ही मुग्ध रहा हूँ
काश! मुग्ध हो पाते मुझ पर
कुछ अपने
कुछ पुरा-पड़ोसी
कुछ दुश्मन, अनजान बटोही।
यह न हुआ तो
चोटिल-घायल
अहंकार दानव फुँफकारा,
मैंने उसको आप न रोका
क्रोध सुरा देकर पुचकारा
डॉलर की नगरी में बैठा
हिरनकशिपु मैं
माँग रहा था नोबल केबल।
नहीं दे सकी गर दुनिया तो
अब देखे मेरी नफ़रत को,
शांति दूत कह सकी न दुनिया
अब अशांति-रक्षक ही माने,
खोज-खोजकर नए ठिकाने
मैं विनाश को दावत दूँगा।
कहीं उठाऊँगा शासक को
पलक झपकते राजमहल से,
कहीं पलट दूँगा सत्ता मैं,
कहीं हड़प लूँ खनिज-तेल सब
और लगा टैरिफ मनमाना
सबको कर हैरान-परेशां
अट्टहास कर कथा लिखूँगा
अहंकार के तुष्टिकरण की।
विश्व शांति को कफन उढ़ाकर
निजी लाभ ले, दफन करूँगा,
लौकतंत्र को रौंद बूट से
नित स्वार्थों हित हवन करूँगा।
आसमान से बरसा गोले
आग लगा दूँगा दुनिया में,
शकुनि तुम्हारा नाटा-बौना
अगर महाभारत रच पाया,
तो मैं ऊँचा महाबली हूँ
उससे हार नहीं मानूँगा।
मेरा दृढ़ संकल्प यही है
हिटलर, गोरी, चंगेजों से
इतना आगे जाना मुझको,
जितना कोई कभी न जाए।
जितने तारे झंडे में हैं
उतने महायुद्ध करवाऊँ।
मानवता को धता बताकर
दानवता की जय जय गाऊँ।
मात्र तीन पाँसों से भारत
झुलस महाभारत कर पाया,
लिए हाथ में बावन पत्ते
ट्रंप कार्ड का अहंकार भी
रक्त बीज को पीछे छोड़ूँ।
शुंभ-निशुंभ दशानन के भी
हर रिकॉर्ड को मसलूँ-तोड़ूँ।
हो मसान यह दुनिया सारी
खुद को खुद तब दूँगा नोबल
३.३.२०२६
०००
हास्य  लघुकथा  
जुगाड़ टेक्नोलॉजी
फागुन के महीने में एक इंटरव्यू के लिए बुलावा आया। मुझे पता चला कि नौकरी सांसद के रिश्तेदार को दी जाना है, दिखावे के लिये इंटरव्यू हो रहा है। ऐसे सवाल पूछे जा रहे थे, जिनका कोई जवाब संभव नहीं था, एक के बाद एक केंडीडेट आ रहे थे, बिना जवाब दिए असफल होकर जा रहे थे।
मेरी बारी आई तो सवाल पूछा गया- 'आप नदी के बीच एक बोट पर हैं, और आपके पास दो candle के अलावा कुछ भी नहीं है। आपको एक candle जलानी है, कैसे जलाओगे?'
मैंने जुगाड़ टेक्नोलॉजी का उपयोग कर उत्तर दिया- 'सर! इसके तीन-चार सोल्युशन हो सकते हैं।'
प्रश्नकर्ता को बहुत आश्चर्य हुआ कि जिस सवाल का एक भी जवाब नहीं हो सकता, उसके तीन-चार जवाब कैसे हो सकते हैं? उसने कहा- 'बताओ।'
मैंने हिंगलिश में कहा- 'एक candle पानी में फेंक दो, then boat will become lighter (हल्की), और "lighter" से आप candle जला सकते हैं।'
इन्टरव्यू बोर्ड के सदस्य एक दूसरे का मुँह ताकने लगे।
अब एक दादी अम्मा टाइप की महिला ने दादागिरी करते हुए पूछा- 'दूसरा उत्तर क्या है?'
मैंने सोचने की मुद्रा बनाते हुए कहा- 'Throw a candle up and catch it. Catches win the Matches. Using the matches that you win, you can light the candle. दादी अम्मा की बोलती बंद हो गई।
अब बारी थी एक तेज तर्रार आधुनिका की। नायक पर टिके चश्मे में से झाँकते हुए उसने फरमाया- Next option?
मैंने उत्तर दिया- 'Take some water in your hand and drop it, drop-by-drop. It will sound like .. Tip.. Tip-Tip.. Tip
आधुनिका- So what?
मैं- 'Madam! आपने वो गाना नही सुना टिप-टिप बरसा पानी, पानी ने आग लगाई। इस आग से आप अपनी candle जला सकती हैं। यदि ये काफी नही हैं तो एक और उपाय है। आप एक candle से प्यार करने लगिए, दूसरी को जलन होगी, वह अपने आप जलने लगेगी।
प्रश्न पूछने वाली चारों खाने चित्त। मैंने जैसे ही कहा आप कहे तो एक और तो सब के सब बोल पड़े- संसद के रिश्तेदार को मारो गोली, नौकरी तो इस जुगाड़ टेक्नोलॉजी वाले को दी जाती है।
कार्य शाला
दोहा + रोला = कुंडलिया
नयन नयन को देखते, दोनों नयन विलोम!
ज्यों वसुधा को देखता, सदा सर्वदा व्योम।। - अशोक व्यग्र भोपाल
सदा सर्वदा व्योम, निरंतर रंग बदलता।
मलती उषा गुलाल, हरा वन झूम मचलता।।
नीले पीले लाल, गुलाबी सुमन कर चयन।
करे गगन को भेंट, धरा हँस मूँदकर नयन।।
०००
वन्य जीवन दिवस
हाइकु
वन्य जीवन
शहरी जीवन से
अधिक नैतिक।
.
जानवर है
अधिक अहिंसक
इंसान से।
.
कभी न देखा
रिश्वत लेते हुए
पशु-पक्षी को
.
नहीं जानते
बलात्कार करना
ये जानवर।
.
बेइज्जती है
इंसान को कहना
पशु, पशु की।
.
जमा करते
नहीं परदेश में
ये पशु धन।
.
कभी देखा है
दगाबाजी करते
जानवरों को?
.
होते हैं नंगे
पर बेशर्म नहीं
जंगलवासी।
३.३.२०२५
***
हाइकु गीत
प्रभु कृपा से / राम किंकर हुए / युग तुलसी।
नर्मदा तट / अवतरित फिर / रामबोला ही।।
जबलपुर / नगरी सुपावन / है मनोहर।
नर्मदा तट / सलिल अविकल / नाद सुंदर।।
कथावाचक / बसे शिवनायक / सरल मन।
मृदु स्वभावी / धनेसरा का साथ / था पावन।।
सुत हुआ था / श्याम सुंदर छवि / सुदर्शन थी।
प्रभु कृपा से / राम किंकर हुए / युग तुलसी।।
शांत बालक / प्रखर मतिमय / श्लोक रुचते।
लीन होकर / कथा सुनता / पिता कहते।।
भजन गातीं / दोउ बेरा जननि / सुनता वह।
मौन रहता / अर्थ उनमें छिपा / गुनता वह।।
पुलकते थे / पिता-माता सहित परिजन भी।
प्रभु कृपा से / राम किंकर हुए / युग तुलसी।।
सीख आखर / पढ़े-पूछे अर्थ भी / चिंतन करे।
संस्कृत-हिंदी / पढ़े, हल गणित कर/ कीर्तन करे।।
पितृ ममता / मातृ अनुशासन / सुखद पल।
विधि विचारे / घटित अघटित / हो न खो कल।।
नहीं कहतीं / कभी कुछ माँ पर / नहीं हुलसी।
प्रभु कृपा से / राम किंकर हुए / युग तुलसी।।
३.३.२०२४
•••
क्रमश:
***
सॉनेट
हम
हम अपने ही दुश्मन क्यों हैं?
कहें भला पर बुरा कर रहे।
आत्मनाश से नहीं डर रहे।।
बिना काम के कंचन क्यों हैं?
बिना नींव, प्रासाद बनाते।
कह विकास करते विनाश हम।
तम फैलाते कालांश हम।।
अपनों की बलि, बली चढ़ाते।
अहं-दंभ की सुरा पी रहे।
शंका भय के साथ जी रहे।
नाश-यज्ञ दुष्कर्म घी रहे।।
वन पर्वत सलिलाएँ सिसकें।
करें अनसुनी मनुज न हिचकें।
हाय विधाता! कहीं तो रुकें।।
३.३.२०२२
•••
मुक्तिका
°
खामियाँ खोजते नादां ऐसे।
खुद नहीं हैं, हुए खुदा जैसे।।
ख्वाहिशें ही हमें नचाती हैं।
बिक रहे हम खरीदते पैसे।।
आँसू पोछें नहीं, न दें राहत।
जिंदगी जी,न जी कभी कैसे?
आदमी कह रहे, न हैं लेकिन।
हम हुए जंगली बली भैंसे।।
काश रब दे अकल जरा हमको।
हों नहीं हम डरावने ऐसे।।
३-३-२०२२
•••
लेख:
सतत स्थाई विकास : मानव सभ्यता की प्राथमिक आवश्यकता
*
स्थायी-निरंतर विकास : हमारी विरासत
मानव सभ्यता का विकास सतत स्थाई विकास की कहानी है। निस्संदेह इस अंतराल में बहुत सा अस्थायी विकास भी हुआ है किन्तु अंतत: वह सब भी स्थाई विकास की पृष्ठ भूमि या नींव ही सिद्ध हुआ। विकास एक दिन में नहीं होता, एक व्यक्ति द्वारा भी नहीं हो सकता, किसी एक के लिए भी नहीं किया जाता। 'सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे सन्तु निरामय:, सर्वे भद्राणु पश्यन्ति, माँ कश्चिद दुःखभाग्भवेद" अर्थात ''सभी सुखी हों, सभी स्वस्थ्य हों, शुभ देखें सब, दुःख न कहीं हो"का वैदिक आदर्श तभी प्राप्त हो सकता है जब विकास, निरंतर विकास, सबकी आवश्यकता पूर्ति हित विकास, स्थाई विकास होता रहे। ऐसा सतत और स्थाई विकास जो मानव की भावी पीढ़ियों की आवश्यकताओं और उनके समक्ष उपस्थित होने वाले संकटों और अभावों का पूर्वानुमान कर किया जाए, ही हमारा लक्ष्य हो सकता है। सनातन वैदिक चिंतन धारा द्वारा प्रदत्त वसुधैव कुटुम्बकम" तथा 'विश्वैक नीडं' के मन्त्र ही वर्तमान में 'ग्लोबलाइज विलेज' की अवधारणा का आधार हैं।
'सस्टेनेबल डेवलपमेंट अर्थ स्थायी या टिकाऊ विकास से हमारा अभिप्राय विकास ऐसे कार्यों की निरन्तरता से है जो मानव ही नहीं, सकल जीव जंतुओं की भावी पीढ़ियों का आकलन कर, उनकी प्राप्ति सुनिश्चित करते हुए, वर्तमान समय की आवश्यकताएँ पूरी करे। दुर्गा सप्तशतीकार कहता है 'या देवी सर्व भूतेषु प्रकृतिरूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:'। पौर्वात्य चिन्तन प्रकृति को 'माँ' और सभी प्राणियों को उसकी संतान मानता है। इसका आशय यही है कि जैसे शिशु माँ का स्तन पान इस तरह करता है की माँ को कोई नहीं होती, अपितु उसका जीवन पूर्णता पता है, वैसे ही मनुष्य प्रकृति संसाधनों का उपयोग इस कि प्रकृति अधिक समृद्ध हो। भारतीय परंपरा में प्रकृति के अनुकूल विकास की मानता है, प्रकृति के प्रतिकूल विकास की नहीं।'सस्टेनेबल डवलेपमेन्ट कैन ओनली बी इन एकॉर्डेंस विथ नेचर एन्ड नॉट, अगेंस्ट और एक्सप्लोयटिंग द नेचर।'
प्रकृति माता - मनुष्य पुत्र
स्वयं को प्रकृति पुत्र मानने की अवधारणा ही पृथ्वी, नदी, गौ और भाषा को माता मानने की परंपरा बनकर भारत के जान-जन के मन में बसी है। गाँवों में गरीब से गरीब परिवार भी गाय और कुत्ते के लिए रोटी बनाकर उन्हें खिलाते हैं। देहरी से भिक्षुक को खाली हाथ नहीं लौटाते। आंवला, नीम, पीपल, बेल, तुलसी, कमल, दूब, महुआ, धान, जौ, लाई, आदि पूज्यनीय हैं। नर्मदा ,गंगा, यमुना, क्षिप्रा आदि नदियाँ पूज्य हैं। नर्मदा कुम्भ, गंगा दशहरा, यमुना जयंती आदि पर्व मनाये जाते हैं। पोला लोक पर्व पोला पर पशुधन का पूजन किया जाता है। आँवला नवमी, तुलसी जयंती आदि लोक पर्व मनाये जाते हैं। नीम व जासौन को देवी, बेल व धतूरा को शिव, कदंब व करील को कृष्ण, कमल व धान को लक्ष्मी, हरसिंगार को विष्णु से जोड़कर पूज्यनीय कहा गया है। यही नहीं पशुओं और पक्षियों को भी देवी-देवताओं से संयुक्त किया गया ताकि उनका शोषण न कर, उनका ध्यान रखा जाए। बैल, सर्प व नीलकंठ को शिव, शेर व बाघ को देवी, राजहंस व मोर को सरस्वती, हाथी को लक्ष्मी, मोर को कृष्ण आदि देवताओं के साथ संबद्ध बताया गया ताकि उनका संरक्षण किया जाता रहे। यही नहीं हनुमान जी को वायु, लक्ष्मी जी को जल, पार्वती जी को पर्वत, सीता जी भूमि की संतान कहा गया ताकि जन सामान्य इन प्राकृतिक तत्वों तत्वों की शुद्धता और सीमित सदुपयोग के प्रति सचेष्ट हो।
विश्व रूपांतरण : युग की महती आवश्यकता
हम पृथ्वी को माता मानते है और सतत विकास सदैव हमारे दर्शन और विचारधारा का मूल सिद्धांत रहा है। सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए अनेक मोर्चों पर कार्य करते हुए हमें महात्मा गांधी की याद आती है, जिन्होंने हमें चेतावनी दी थी कि धरती प्रत्येक व्यक्ति की आवश्यकताओं को तो पूरा कर सकती है, पर प्रत्येक व्यक्ति के लालच को नहीं। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा पारित 'ट्रांस्फॉर्मिंग आवर वर्ल्ड : द 2030 एजेंडा फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट' के संकल्प कोभारत सहित १९३ देशों ने सितंबर, २०१५ में संयुक्त राष्ट्र महासभा की उच्च स्तरीय पूर्ण बैठक में स्वीकार और इसे एक जनवरी, २०१६ से लागू किया। इसे सतत विकास लक्ष्यों के घोषणापत्र के नाम से भी जाना जाता है। सतत विकास का उद्देश्य सबके लिए समान, न्यायसंगत, सुरक्षित, शांतिपूर्ण, समृद्ध और रहने योग्य विश्व का निर्माण हेतु विकास में सामाजिक परिवेश, आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण को व्यापक रूप से समाविष्ट करना है। २००० से २०१५ तक के लिए निर्धारित नए लक्ष्यों का उद्देश्य विकास के अधूरे कार्य को पूरा करना और ऐसे विश्व की संकल्पना को मूर्त रूप देना है, जिसमें चुनौतियाँ कम और आशाएँ अधिक हों। भारत विश्व कल्याणपरक विकास के मूलभूत सिद्धांतों को अपनी विभिन्न विकास नीतियों में आराम से ही सम्मिलित करता रहा है। वर्तमान विश्वव्यापी अर्थ संकट के संक्रमण काल में भी विकास की अच्छी दर बनाए रखने में भारत सफल है। गाँधी जी ने 'आखिरी आदमी के भले', विनोबा जी ने सर्वोदय और दीनदयाल उपाध्याय ने अंत्योदय के माध्यम से निर्धनों को को गरीबी रेखा से ऊपर लाने और निर्बल को सबल बनाने की संकल्पना का विकास किया। वर्ष २०३० तक निर्धनता को समाप्त करने का लक्ष्य हमारा नैतिक दायित्व ही नहीं, शांतिपूर्ण, न्यायप्रिय और चिरस्थायी भारत और विश्व को सुनिश्चित करने के लिए अनिवार्य प्राथमिकता भी है।
सतत विकास कार्यक्रम : लक्ष्य
वित्तीय लक्ष्य:
विकसित देश सरकारी विकास सहायत का अपना लक्ष्य प्राप्त कर, अपनी सकल राष्ट्रीय आय का ०.७%० विकासशील देशों को तथा ०.१५% से ०.२०% सबसे कम विकसित राष्ट्रों को दें। विकासशील देश एकाधिक स्रोत से साधन जुटाएँ तथा समन्वित नीतियों द्वारा दीर्घिकालिक ऋण संवहनीयता प्राप्त कर अत्यधिक ऋणग्रस्त निर्धन देशों पर ऋण बोझ कम कर निवेश संवर्धन को करें।
तकनीकी लक्ष्य:
विकसित, विकासशील व् अविकसित देशों के मध्य विज्ञान, प्रौद्योगिकी, तकनालोजी व नवाचार सुलभ कर अंतर्राष्ट्रीय सहयोग बढ़ाना। वैश्विक तकनॉलॉजी तंत्र का विकास करना। परस्पर सहमति पर रियायती और वरीयता देते हुए हितकारी शर्तों पर पर्यावरण अनुकूल तकनोलॉजी का विकास, हस्तांतरण, प्रसार व् समन्वय करना। तकनोलॉजी बैंक बनाकर सामर्थ्यवान तकनोलॉजी का प्रयोग बढ़ाना।
क्षमता निर्माण तथा व्यापार :
विकाशील देशों में लक्ष्य क्षमता निर्माण कर अंतर्राष्ट्रीय सहयोग बढ़ाना। राष्ट्रीय योजनाओं को समर्थन दिलाना। विश्व व्यापार संगठन के अन्तर्गत सार्वभौम, नियमाधारित, भेदभावहीन, खुली और समान बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली को प्रोत्साहित करना। विकासशील देशों के निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि कर, सबसे कम देशों की भागीदारी दोगुनी करना। सबसे कम विकसित देशों को शुल्क और कोटा मुक्त बाजार प्रवेश सुविधा देना, पारदर्शी व् सरल व्यापार नियम बनाकर बाजार में प्रवेश सरल बनाना।
नीतिगत-संस्थागत सामंजस्य:
सतत विकास हेतु वैश्विक वृहद आर्थिक स्थिरता वृद्धि हेतु नीतिगत-संस्थागत सामंजस्य बनाना। गरीबी मिटाने हेतु पारस्परिक नीतिगय क्षमता और नेतृत्व का सम्मान करना। सभी देशों के साथ सतत विकास लक्ष्य पाने में सहायक बहुहितकारी भागीदारियाँ कर विशेषज्ञता, तकनोलॉजी, तहा संसाधन जुटाना। प्रभावी सार्वजनिक व् निजी संसाधन जुटाना। सबसे कम विकसित, द्वीपीय व विकासशील देशों के लिए क्षमता निर्माण समर्थन बढ़ाना। २०३० तक सकल घेरलू उत्पाद के पूरक प्रगति के पैमाने विकसित करना।
स्थायी विकास लक्ष्य : केंद्र के प्रयास
सतत् विकास लक्ष्‍यों को हासिल करने के लिए खरबों डॉलर के निजी संसाधनों की काया पलट ताकत जुटाने, पुनःनिर्देशित करने और बंधन मुक्‍त करने हेतु तत्‍काल कार्रवाई करने, विकासशील देशों में संवहनीय ऊर्जा, बुनियादी सुविधाओं, परिवहन - सूचना - संचार प्रौद्योगिकी आदि महत्‍वपूर्ण क्षेत्रों में प्रत्‍यक्ष विदेशी निवेश सहित दीर्घकालिक निवेश जुटाने के साथ सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के लिए एक स्‍पष्‍ट दिशा निर्धारित करनी है। इस हेतु सहायक समीक्षा व निगरानी तंत्रों के विनियमन और प्रोत्‍साहक संरचनाओं हेतु नए साधन जुटाकर निवेश आकर्षित कर सतत विकास को पुष्‍ट करना प्राथमिक आवश्यकता है। सर्वोच्‍च ऑडिट संस्‍थाओं, राष्‍ट्रीय निगरानी तंत्र और विधायिका द्वारा निगरानी के कामकाज को अविलंब पुष्‍ट किया जाना है। हमारे मेक इन इंडिया, स्वच्छ भारत अभियान, बेटी बचाओ-बेटी पढाओ, राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, प्रधानमंत्री ग्रामीण और शहरी आवास योजना, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, डिजिटल इंडिया, दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना, स्किल इंडिया और प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना शामिल हैं। इसके अलावा अधिक बजट आवंटनों से बुनियादी सुविधाओं के विकास और गरीबी समाप्त करने से जुड़े कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया जा रहा है। केंद्र सरकार ने सतत विकास लक्ष्यों के कार्यान्वयन पर निगरानी रखने तथा इसके समन्वय की जिम्मेदारी नीति आयोग को, संयुक्त राष्ट्र आर्थिक और सामाजिक परिषद द्वारा प्रस्तावित संकेतकों की वैश्विक सूची से उपयोगी संकेतकों की पहचान कर राष्ट्रीय संकेतक तैयार करने का कार्य सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय को सौंपा है।न्यूयार्क में जुलाई, २०१७ में आयोजित होने वाले उच्च स्तरीय राजनीतिक मंच (एचएलपीएफ) पर अपनी पहली स्वैच्छिक राष्ट्रीय समीक्षा (वीएनआर) प्रस्तुत कर भारत सरकार ने सतत विकास लक्ष्यों के सफल कार्यान्वयन को सर्वोच्च महत्व दिया है।
राज्यों की भूमिका :
भारत के संविधान केंद्रों और राज्यों के मध्य राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक शक्ति संतुलन के अनुरूप राज्यों में विभिन्न राज्य स्तरीय विकास योजनायें कार्यान्वित की जा रही हैं। इन योजनाओं का सतत विकास लक्ष्यों के साथ तालमेल है। केंद्र और राज्य सरकारों को सतत विकास लक्ष्यों के कार्यान्वयन में आनेवाली विभिन्न चुनौतियों का मुकाबला मिलकर करना है। भारतीय संसद विभिन्न हितधारकों के साथ सतत विकास लक्ष्यों के कार्यान्वयन को सुविधाजनक बनाने के लिए सक्रिय है। अध्यक्षीय शोध कदम (एसआरआई) सतत विकास लक्ष्यों से संबंधित विभिन्न मुद्दों पर सांसदों और विशेषज्ञों के मध्य विमर्श हेतु है। नीति आयोग सतत विकास लक्ष्यों पर राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर परामर्श शृंखलाएं आयोजित कर विशेषज्ञों, विद्वानों, संस्थाओं, सिविल सोसाइटियों, अंतरराष्ट्रीय संगठनों और केंद्रीय मंत्रालयों राज्य सरकारों व हितधारकों के साथ गहन विचार-विमर्श कर रहा है। पर्यावरण संरक्षण व संपूर्ण विकास हेतु जन आकांक्षा पूर्ण करने हेतु राष्ट्रीय, राज्यीय, स्थानीय प्रशासन तथा जन सामान्य द्वारा सतत समन्वयकर कार्य किये जा रहे हैं।
जन सामान्य की भूमिका :
भारत के संदर्भ में दृष्टव्य है कि सतत स्थाई कार्यक्रमों की प्रगति में जान सामान्य की भूमिका नगण्य है। इसका कारण उनका समन्वयहीन धार्मिक-राजनैतिक संगठनों से जुड़ाव, प्रशासन तंत्र में जनमत और जनहित के प्रति उपेक्षा, व्यापारी वर्ग में येन-केन-प्रकारेण अधिकतम लाभार्जन की प्रवृत्ति तथा संपन्न वर्ग में विपन्न वर्ग के शोषण की प्रवृत्ति का होना है। किसी लोकतंत्र में सब कुछ तंत्र के हाथों में केंद्रित हो तो लोक निराशा होना स्वाभाविक है। सतत विकास नीतियाँ गाँधी के 'आखिरी आदमी' अर्थात सबसे कमजोर को उसकी योग्यता और सामर्थ्य के अनुरूप आजीविका साधन उपलब्ध करा सकें तभी उनकी सार्थकता है। सरकारी अनुदान आश्रित जनगण कमजोर और तंत्र द्वारा शोषित होता है। भारत के राजनीतिक नेतृत्व को दलीय हितों पर राष्ट्रीय हितों को वरीयता देकर राष्ट्रोन्नयनपरक सतत विकास कार्यों में परस्पर सहायक होना होगा तभी संविधान की मंशा के अनुरूप लोकहितकारी नीतियों का क्रियान्वय कर मानव ही नहीं, समस्त प्राणियों और प्रकृति की सुरक्षा और विकास का पथ प्रशस्त सकेगा।
३.३.२०२०
===
दोहा की होली
*
दीवाली में दीप हो, होली रंग-गुलाल
दोहा है बहुरूपिया, शब्दों की जयमाल
*
जड़ को हँस चेतन करे, चेतन को संजीव
जिसको दोहा रंग दे, वह न रहे निर्जीव
*
दोहा की महिमा बड़ी, कीर्ति निरुपमा जान
दोहा कांतावत लगे, होली पर रसखान
*
प्रथम चरण होली जले, दूजे पूजें लोग
रँग-गुलाल है तीसरा, चौथा गुझिया-भोग
*
दोहा होली खेलता, ले पिचकारी शिल्प
बरसाता रस-रंग हँस, साक्षी है युग-कल्प
*
दोहा गुझिया, पपडिया, रास कबीरा फाग
दोहा ढोलक-मँजीरा, यारों का अनुराग
*
दोहा रच-गा, झूम सुन, होला-होली धन्य
दोहा सम दूजा नहीं. यह है छंद अनन्य
होलिकोत्सव २-३-२०१८
***
लघुकथा-
बदलाव का मतलब
*
जन प्रतिनिधियों के भ्रष्टाचरण, लगातार बढ़ते कर और मँहगाई, संवेदनहीन प्रशासन ने जीवन दूभर कर दिया तो जनता जनार्दन ने अपने वज्रास्त्र का प्रयोग कर सत्ताधारी दल को चारों खाने चित्त कर वोपक्षवोपक्ष को सत्तासीन कर दिया।
अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में निरंतर पेट्रोल-डीजल की कीमत में गिरावट के बावजूद ईंधन के दाम न घटने, बीच सत्र में अहिनियमों के द्वारा परोक्ष कर वृद्धि और बजट में आम कर्मचारी को मजबूर कर सरकार द्वारा काटे और कम ब्याज पर लंबे समय तक उपयोग किये गये भविष्य निधि कोष पर करारोपण से ठगा अनुभव कर रहे मतदाता को समझ ही नहीं आया बदलाव का मतलब।
***
मुक्तिका:
*
जब भी होती है हव्वा बेघर
आदम रोता है मेरे भीतर
*
आरक्षण की फाँस बनी बंदूक
जले घोंसले, मरे विवश तीतर
*
बगुले तालाबों को दे धाढ़स
मार रहे मछली घुसकर भीतर
*
नहीं चेतना-चिंतन संसद में
बजट निचोड़े खूं थोपे जब कर
*
खुद के हाथ तमाचा गालों पर
मार रहे जनतंत्र अश्रु से तर
*
पीड़ा-लाश सियासत का औज़ार
शांति-कपोतों के कतरें नित पर
*
भक्षक के पहरे पर रक्षक दीन
तक्षक कुंडली मार बना अफसर
***
छंद शाला
बरवै (नंदा दोहा)
बरवै अर्ध सम मात्रिक छंद है जिसके विषम चरण (प्रथम, तृतीय) में बारह तथा सम चरण ( द्वितीय, चतुर्थ) में सात मात्राएँ रखने का विधान है। सम चरणों के अन्त में जगण (जभान = लघु गुरु लघु) या तगण (ताराज = गुरु गुरु लघु) होने से बरवै की मिठास बढ़ जाती है।
बरवै छंद के प्रणेता अकबर के नवरत्नों में से एक महाकवि अब्दुर्रहीम खानखाना 'रहीम' कहे जाते हैं। किंवदन्ती है कि रहीम का कोई सेवक अवकाश लेकर विवाह करने गया। वापिस आते समय उसकी विरहाकुल नवोढा पत्नी ने उसके मन में अपनी स्मृति बनाये रखने के लिए दो पंक्तियाँ लिखकर दीं। रहीम का साहित्य-प्रेम सर्व विदित था सो सेवक ने वे पंक्तियाँ रहीम को सुनायीं।सुनते ही रहीम चकित रह गये। पंक्तियों में उन्हें ज्ञात छंदों से अलग गति-यति का समायोजन था। सेवक को ईनाम देने के बाद रहीम ने पंक्ति पर गौर किया और मात्रा गणना कर उसे 'बरवै' नाम दिया। मूल पंक्ति में प्रथम चरण के अंत 'बिरवा' शब्द का प्रयोग होने से रहीम ने इसे बरवै कहा। रहीम के लगभग २२५ तथा तुलसी के ७० बरवै हैं। विषम चरण की बारह (भोजपुरी में बरवै) मात्रायें भी बरवै नाम का कारण कही जाती है। सम चरण के अंत में गुरु लघु (ताल या नन्द) होने से इसे 'नंदा' और दोहा की तरह दो पंक्ति और चार चरण होने से नंदा दोहा कहा गया। पहले बरवै की मूल पंक्तियाँ इस प्रकार है:
प्रेम-प्रीति कौ बिरवा, चले लगाइ।
सींचन की सुधि लीज्यौ, मुरझि न जाइ।।
रहीम ने इस छंद का प्रयोग कर 'बरवै नायिका भेद' नामक ग्रन्थ की रचना की। गोस्वामी तुलसीदास की कृति 'बरवै रामायण में इसी का प्रयोग किया गया है। भारतेंदु हरिश्चंद्र तथा जगन्नाथ प्रसाद 'रत्नाकर' आदि ने भी इसे अपनाया। उस समय बरवै रचना साहित्यिक कुशलता और प्रतिष्ठा का पर्याय था। दोहा की ही तरह दो पद, चार चरण तथा लय के लिए विख्यात छंद नंदा दोहा या बरवै लोक काव्य में प्रयुक्त होता रहा है। ( सन्दर्भ: डॉ. सुमन शर्मा, मेकलसुता, अंक ११, पृष्ठ २३२)
रहीम ने फ़ारसी में भी इस छंद का प्रयोग किया-
मीं गुज़रद ईं दिलरा, बेदिलदार।
इक-इक साअत हमचो, साल हज़ार।।
इस दिल पर यूँ बीती, हृदयविहीन!
पल-पल वर्ष सहस्त्र, हुई मैं दीन
बरवै को 'ध्रुव' तथा' कुरंग' नाम भी मिले। ( छ्न्दाचार्य ओमप्रकाश बरसैंया 'ओंकार', छंद-क्षीरधि' पृष्ठ ८८)
मात्रा बाँट-
बरवै के चरणों की मात्रा बाँट ८+४ तथा ४+३ है। छन्दार्णवकार भिखारीदास के अनुसार-
पहिलहि बारह कल करु, बहरहुँ सत्त।
यही बिधि छंद ध्रुवा रचु, उनीस मत्त।।
पहले बारह मात्रा, बाहर सात।
इस विधि छंद ध्रुवा रच, उन्निस मात्र।।
उदाहरण-
०१. वाम अंग शिव शोभित, शिवा उदार ।
SI SI II SII IS ISI
सरद सुवारिद में जनु, तड़ित बिहार ॥
III ISII S II III ISI
०२. चंपक हरवा अँग मिलि, अधिक सुहाय।
जानि परै सिय हियरे, जब कुम्हलाय।।
०३. गरब करहु रघुनन्दन, जनि मन मांह।
देखहु अपनी मूरति, सिय की छांह।। -तुलसीदास
०४. मन-मतंग वश रह जब, बिगड़ न काज।
बिन अंकुश विचलत जब, कुचल समाज।। -ओमप्रकाश बरसैंया 'ओंकार'
०५. 'सलिल' लगाये चन्दन, भज हरि नाम।
पण्डे ठगें जगत को, नित बेदाम।।
०६. हाय!, हलो!! अभिवादन, तनिक न नेह।
भटक शहर में भूले, अपना गेह।।
०७. पाँव पड़ें अफसर के, भूले बाप।
रोज पुण्य कह करते, छिपकर पाप।।
शन्नो अग्रवाल -
०८. उथल पुथल करे पेट, न पचे बात।
मंत्री को पचे नोट, बन सौगात।।
०९. चश्में बदले फिर भी, नहीं सुझात।
मन के चक्षु खोल तो, बनती बात।।
१०. गरीब के पेट नहीं, मारो लात।
कम पैसे से बिगड़े, हैं हालात।।
११. पैसे ठूंसे फिर भी, भरी न जेब।
हर दिन करते मंत्री, नये फरेब।।
१२. मैं हूँ छोटा सा कण, नश्वर गात।
परम ब्रह्म के आगे, नहीं बिसात।।
१३. महुए के फूलों का, पा आभास।
कागा उड़-उड़ आये, उनके पास।।
१४. अकल के खोले पाट, जो थे बंद।
आया तभी समझ में, बरवै छंद।
अजित गुप्ता-
१५. बारह मात्रा पहले, फिर लिख सात।
कठिन बहुत है लिख ले, मिलती मात।।
१६. कैसे पकडूँ इनको, भागे छात्र।
रचना आवे जिनको, रहते मात्र।।
३-३-२०१६
***
नवगीत:
गीत! हाज़िर हो
.
समय न्यायाधीश की
लगती अदालत.
गीत! हाज़िर हो.
.
लगा है इलज़ाम
तुम पर
गिरगिटों सा
बदलते हो रंग.
श्रुति-ऋचा
या अनुष्टुप बन
छेड़ डी थी
सरसता की जंग.
रूप धरकर
मन्त्र का
या श्लोक का
शून्य करते भंग.
काल की
बनकर कलम तुम
स्वार्थ को
करते रहे हो तंग.
भुलाई ना
क्यों सखावत?
गीत! हाज़िर हो.
.
छेड़ते थे
जंग हँस
आक्रामकों
से तुम.
जान जाए
या बचे
करते न सुख
या गम.
जूझते थे
बूझते थे
मनुजता को
पूजते थे.
ढाल बनकर
देश की
दस दिशा में
घूमते थे.
मिटायी क्यों
हर अदावत?
गीत! हाज़िर हो.
.
पराजित होकर
न हारे,
दैव को
ले आये द्वारे.
भक्ति सलिला
में नहाये
कर दिये
सब तम उजारे.
बने संबल
भीत जन का-
‘त्राहि’ दनु हर
हर पुकारे.
दलित से
लगकर गले तुम
सत्य का
बनते रहे भुजदंड .
अनय की
क्यों की मलामत?
गीत! हाज़िर हो.
.
एक पल में
जिरह-बखतर
दूसरे पल
पहन चीवर.
योग के सँग
भोग अनुपम
रूप को
वरकर दिया वर.
नव रसों में
निमज्जित हो
हर असुन्दर
किया सुंदर.
हास की
बनकर फसल
कर्तव्य का ही
भुला बैठे संग?
नाश की वर
ली अलामत?
गीत! हाज़िर हो.
.
श्रमित काया
खोज छाया,
लगी कहने-
‘जगत माया’.
मूर्ति में भी
अमूरत को
छिपा- देखा,
पूज पाया.
सँग सुन्दर के
वरा शिव
शिवा को
मस्तक नवाया.
आज का आधार
कल कर,
स्वप्न कल का
नव सजाया.
तंत्र जन का
क्यों नियामत?
गीत! हाज़िर हो.
.
स्वप्न टूटा,
धैर्य छूटा.
सेवकों ने
देश लूटा.
दीनता का
प्रदर्शन ही -
प्रगतिवादी
बेल-बूटा.
छंद से हो तंग
कर रस-भंग
कविता गढ़ी
श्रोता मिला सोता.
हुआ मरकर
पुनर्जीवित
बोल कैसे
गीत-तोता?
छंद अब भी
क्यों सलामत?
गीत! हाज़िर हो.
.
हो गये इल्जाम
पूरे? तो बतायें
शेष हों कुछ और
तो वे भी सुनायें.
मिले अनुमति अगर
तो मैं अधर खोलूँ.
बात पहले आप तोलूँ
बाद उसके असत्य बोलूँ
मैं न मैं था,
हूँ न होऊँ.
अश्रु पोछूं,
आस बोऊँ.
बात जन की
है न मन की
फ़िक्र की
जग या वतन की.
साथ थी हर-
दम सखावत
प्रीत! हाज़िर हो.
.
नाम मुझको
मिले कितने,
काम मैंने
किये कितने.
याद हैं मुझको
न उतने-
कह रहा है
समय जितने.
छंद लय रस
बिम्ब साधन
साध्य मेरा
सत सुपावन
चित रखा है
शांत निश-दिन
दिया है आनंद
पल-छिन
इष्ट है परमार्थ
आ कह
नीत! हाज़िर हो.
.
स्वयंभू जो
गढ़ें मानक,
हो न सकते
वे नियामक.
नर्मदा सा
बह रहा हूँ.
कुछ न खुद का
गह रहा हूँ.
लोक से ले
लोक को ही,
लोक को दे-
लोक का ही.
रहा खाली हाथ
रखा ऊँचा माथ,
सब रहें सानंद
वरें परमानन्द.
विवादों को भूल
रच नव
रीत! हाज़िर हो.
.

शनिवार, 7 फ़रवरी 2026

फरवरी ७, हिंगलिश, ग़ज़ल, हाइकु गीत, ताण्डव छंद, शे'र, लोकतंत्र, लघुकथा, मुण्डकोपनिषद, गाय, मुक्तिका

सलिल सृजन फरवरी ७

सरला जी को नमस्कार है . सुबह-सुबह बगिया में जातीं सूर्य देव को शीश नवातीं फूल न तोड़ें, पौधे सींचें कलियों को हँसकर दुलरातीं संग हमेशा सद्विचार है सरला जी को नमस्कार है ० हरी दूब पर लगता आसन सब बगिया पर चलता शासन किसे उखाड़ें, किसको रोपें दें-लें दाना-पानी राशन कोई न जाने चमत्कार है सरला जी को नमस्कार है

७ . २ . २०१६ ०००

अभिनव प्रयोग
हिंगलिश ग़ज़ल
*
Get well soon.
दे दुश्मन को भून।
है विपक्ष अभिशाप।
Power party boon.
Be officer first.
तब ही मिले सुकून।
कर धरती को नष्ट।
Let us go to moon.
Fight for the change.
कुतर नहीं नाखून।
न्यायमूर्ति भगवान।
Every plaintiff coon.
Always do your best.
तब ही मिले सुकून।
*
coon = हबशी गुलाम
७.२.२०२४
***
विमर्श
लोकतंत्र है तो विरोध की गुंजाइश भी बनी रहे!
स्रोतः स्व. खुशवंत सिंह
सरकार के खिलाफ अपना विरोध दर्ज करने वालों के लिए भी कोई कायदे−कानून होने चाहिए। उसके लिए हमें बहुत दूर जाने की जरूरत नहीं है। अपने बापू तो दुनिया के महानतम विरोध करने वाले थे। उनके जेहन में बिल्कुल साफ था कि क्या सही है और क्या गलत? बॉयकॉट उनके लिए जायज तरीका था। उन्होंने विदेशी कपड़ों के बॉयकॉट की अपील की। आखिर जो इस देश में बन रहा है, उसका इस्तेमाल होना चाहिए। उन्होंने चीजों का ही बॉयकॉट नहीं किया, लोगों का भी किया। वे लोग जिनको हिन्दुस्तान में नहीं होना चाहिए था, उनके बॉयकॉट के लिए भी कहा। उन्होंने 'अंग्रेजों भारत छोड़ो' का नारा दिया। विरोध−प्रदर्शन का बापू का तरीका किसी की जिंदगी में परेशानी लाने के लिए नहीं था। वह जिंदगी को रोकना भी नहीं चाहते थे। वह तो बस अपना विरोध दर्ज करना चाहते थे।
बापू का दांडी मार्च गजब की मिसाल थी। उन्होंने पहले सरकार को नोटिस दिया। उसमें कहा कि नमक तो गरीबों के लिए भी जरूरी है। सो, नमक बनाने का हक सिर्फ सरकार का नहीं हो सकता। सरकार जो कर रही है, वह गलत है। इसलिए वह उस कानून को तोड़ने जा रहे हैं। उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। मुजरिम करार दिए गए। जेल भेज दिया गया। तब भी उनकी जीत हुई। वह जीते, क्योंकि वह सही थे। उनका मुद्दा जन−जन से जुड़ा था। विरोध के जब तमाम तरीके काम न आए तो वह अनशन पर बैठ गए। लोगों ने उसे महसूस किया और उन्हें जम कर समर्थन दिया। उन्होंने अपने अनशन का पब्लिक प्रदर्शन नहीं किया।
बापू के तरीकों के उलट आज के विरोध−प्रदर्शन हैं। जरा गौर तो फरमाइए। रास्ता रोको, बंद, घेराव वगैरह−वगैरह। इन सबसे हमारी आम जिंदगी पर असर पड़ता है। ये सब कुल मिलाकर किसी को ब्लैकमेल करने या परेशान करने के लिए होते हैं। इसीलिए वे गलत हैं और अपने मकसद को पूरा नहीं कर पाते। बापू इस तरह के विरोध को अपनी रजामंदी नहीं देते।
विरोध के जायज तरीकों के लिए हमारे रोल मॉडल सांसद और विधायक हो सकते हैं, लेकिन वे अपना रोल ठीक से कर नहीं पा रहे हैं। पंडित नेहरू जब तक प्रधानमंत्री थे, तब तक ये लोग कायदे से विरोध करते थे। शायद ही कभी वे सदन में अध्यक्ष की ओर भागते हों। सदन न चलने वाला शोर−शराबा करते हों। आज तो जरा−सी बात पर हंगामा हो जाता है और सदन को रोक दिया जाता है। ऐसा लगता है कि संसदीय प्रणाली वाला लोकतंत्र अपने यहां चुक गया है। हम आसानी से सारी तोहमत आज के नेताओं पर लगा देते हैं। ऐसा करने से पहले हमें सोचना चाहिए कि क्या उन्हें हमने नहीं चुना है? क्या हमने उन्हें कानून बनाने की जिम्मेदारी नहीं सौंपी?
टिड्डी दल
एक बार दिल्ली में जबर्दस्त आंधी आई थी। फिर जबर्दस्त बारिश हुई थी। दिन में ऐसा महसूस होता था मानो रात हो गई हो। उस वक्त मुझे अपने लड़कपन के दिन याद आए। तब भी मैंने ऐसा ही तूफान देखा था। कुछ−कुछ ऐसा हुआ था। अचानक आसमान पर बादल घिर आए थे। टिडि्डयों का जबर्दस्त हमला हुआ था। अरबों की तादाद में ये दल हर पेड़ पर छा गए थे और पत्तों को खाने लगे थे। कुछ मुसलमान भाई तो अपनी छत पर चादर लेकर चढ़ गए थे, उसे बिछा कर
टिडि्डयों को इकट्ठा करने लगे, ताकि उसके पकोड़े बना सकें। तभी जोरों की आंधी आई थी। फिर आई थी जबर्दस्त बरसात। देखते ही देखते मौसम ठंडा हो गया था। बारिश के तमाम धूल−मिट्टी को धो−पोंछ दिया था। हर तरफ गजब की सफाई और हरियाली ही हरियाली बिखर गई थी।
मेरे मुसलमान दोस्त कहते नहीं थकते थे कि उनके पूर्वज टिडि्डयों को खाते थे। ये टिडि्डयां उत्तरी अफ्रीका से आती हैं। वह अक्सर घूमती रहती हैं। अपनी जगह बदलती रहती हैं। ये पूरे मध्य एशिया में छा जाती हैं। वहां से होते हुए हिन्दुस्तान और पाकिस्तान चली आती हैं। लातीनी अमेरिका में उसे लोकस्ट माइग्रेटोरिया कहते हैं। ये बर्बादी करने वाली होती हैं। उसका जिक्र बाइबिल में भी आता है। वहां इनकी वजह से भयंकर तबाही के बारे में चर्चा है। उसे जंगली शहद भी कहा गया है। इन दिनों हम लोग टिड्डी दलों का हमला नहीं देखते हैं, लेकिन उसकी कई यादें मेरे जेहन में हैं। अगर वे कभी वापसी करती हैं और मैं आसपास होता हूं तो मजा आ जाएगा। मैं अपने रसोइए से गुजारिश करूंगा कि वह मुझे उनके पकोड़े बना कर खिलाए। मैं अपने शाम के ड्रिंक के साथ उनका मजा लेना चाहूंगा।
टिप्पणीः यह आलेख स्व. खुशवंत सिंह के पुरालेखों में से एक है।
***
लघुकथा
बाज
.
नीम आसमान में परवाज भर रहा था बाज। समीप ही उड़ रहे रेवेन पक्षी ने बाज को ऊपर उठते देखा तो लपक कर बाज की गर्दन के ऊपर जा बैठा और लगा चोंच मारने। रेवेन सोच रहा था बाज उससे लड़ने के लिए नीचे उतरेगा और वह पल भर में आसमान में ऊपर जाकर बाज को नीचा दिखा देगा।
बाज को आसमान का बादशाह कहा जाता है और यह रेवेन को बर्दाश्त नहीं होता था।
बाज ने रेवेन के चंचु-प्रहार सहते हुए ऊपर उठना जारी रखा। बाज की सहनशीलता रंग लाई। जैसे जैसे बाज आसमान में ऊपर उठता गया, वायुमंडल में ओषजन वायु कम होती गई। हमेशा ऊँचाई पर उड़नेवाला बाज कम ओषजन में उड़ने का अभ्यस्त था किंतु रेवेन के लिए यह पहला अवसर था। बाज अपनी ऊँचाई और गति बढ़ाता गया। रेवेन के लिए बाज की गर्दन पर टिके रहना कठिन होता गया और अंतत: रेवेन धराशायी हो गया औरआसमान छूता रहा बाज ।
७-३-२०२३
***
लघुकथा
अपराधी
.
अपराधी के कटघरे में एक बालक खड़ा था। न्यायाधीश ने उस पर दृष्टि डाली, ऐसा प्रतीत हुआ बादलों में चंद्रमा छिपा हो। बालक उदास, नीची निगाह किए, चिंताग्रस्त दिख रहा था। न्यायाधीश अनुभवी थे, समझ गए कि यह आदतन अपराधी नहीं है।
सरकारी वकील ने बालक का अपराध बताया कि वह होटल से खाद्य सामग्री चुरा रहा था, तभी उसे पकड़ लिया गया। होटल मालिक ने बालक के जुर्म की तस्दीक करते हुए गर्व के साथ कहा कि उसीने अपने कर्मचारियों की मदद से बालक को पकड़ कर मरम्मत भी की थी ताकि फिर चोरी करने की हिम्मत न पड़े।
न्यायाधीश के पूछने पर लड़के ने स्वीकार किया कि उसने डबलरोटी उठाई थी हुए बिस्कुट उठाने के पहले ही उसे दबोच लिया गया था। यह भी बताया कि वहाँ कई तरह की मिठाइयाँ भी थीं, उसे मिठाई बहुत अच्छी लगती है।
'जब तुम्हें मिठाई बहुत अच्छी लगती है और वहां कई प्रकार की मिठाइयाँ रखी थीं तो तुमने मिठाई न उठकर डबलरोटी क्यों उठाई, पैसे क्यों नहीं दिए?' -न्यायाधीश ने पूछा।
''घर पर माँ बीमार है, उसे डबलरोटी खिलानी थी, मेरे पास या घर में एक भी रुपया नहीं था।''
'तो किसी से माँग लेते, चोरी बुरी बात है न?'
"कई लोगों से रोटी या पैसे माँगे सबने दुतकार दिया, इनसे भी डबलरोटी माँगी थी और कहा था कि माँ को खिलाकर आकर होटल में काम कर दूँगा पर इन्होंने भी डाँटकर भगा दिया।" -होटलवाले की तरफ देखकर बालक बोला।
मुकदमे के फैसला दोपहर भोजन काल के बाद सुनाने का आदेश देते हुए न्यायाधीश ने भूखे बालक को सरकारी व्यय पर भोजन कराए जाने का आदेश दिया।
डफरबाद अदालत बैठी तो न्यायाधीश ने कहा- 'यह किसी सभ्य समाज के लिए शर्म की बात है कि लोककल्याणकारी गणराज्य में किसी असहाय स्त्री हुए बालक को रोटी भी नसीब न हो। सरकार, प्रशासन, समाज और नागरिक सभी इस परिस्थिति के लिए दोषी हैं कि हम अपने वर्तमान और भविष्य की समुचित देखभाल नहीं कर पा रहे और नौनिहालों को मजबूरन चोरी करने के लिए विवश होना पड़े, अगर हर चोरी दंडनीय होती तो माखन-मिसरी चुराने के लिए कन्हैया को भी दंड दिया जाता। लोकोक्ति है 'भूखे भजन न होय गुपाला'।
इस बालक के अपराध के लिए हम सब दोषी हैं, स्वयं मैं भी। इसलिए मुझ समेत इस अदालत में उपस्थित हर व्यक्ति दस-दस रुपए जमा करे। होटल मालिक को संवेदनहीनता तथा बालक को बिना अधिकार पीटने के लिए एक हजार रुपए जमा करने होंगे। यह राशि बालक की माँ को दे दी जाए जिससे वह स्वस्थ्य होने तकअपने तथा बालक के भोजन की व्यवस्था कर सके। जिलाधिकारी को निर्देश है कि बालक की निशुल्क शिक्षा का प्रबंध करें तथा माँ को गरीबी रेखा से नीचे होने का प्रमाणपत्र देकर शासकीय योजनाओं से मिलनेवाले लाभ दिलाकर इस न्यायालय को सूचित करें। न्याय देने का अर्थ केवल दंड देना नहीं होता, ऐसी परिस्थिति का निर्माण करना होता है ताकि भविष्य में कोई अन्य निर्दोष विवश होकर न बने अपराधी।
७-२-२०२३
***
मुण्डकोपनिषद १
परा सत्य अव्यक्त जो, अपरा वह जो व्यक्त।
ग्राह्य परा-अपरा, नहीं कहें किसी को त्यक्त।।
परा पुरुष अपरा प्रकृति, दोनों भिन्न-अभिन्न।
जो जाने वह लीन हो, अनजाना है खिन्न।।
जो विदेह है देह में, उसे सकें हम जान।
भव सागर अज्ञान है, अक्षर जो वह ज्ञान।।
मन इंद्रिय अरु विषय को, मान रहा मनु सत्य।
ईश कृपा तप त्याग ही, बल दे तजो असत्य।।
भोले को भोले मिलें, असंतोष दुःख-कोष।
शिशु सम निश्छल मन रखें, करें सदा संतोष।।
पाना सुखकारक नहीं, खोना दुखद न मान।
पाकर खो, खोकर मिले, इस सच को पहचान।।
'कुछ होने' का छोड़ पथ, 'कुछ मत हो' कर चाह।
जो रीता वह भर सके, भरा रीत भर आह।।
तन को पहले जान ले, तब मन का हो ज्ञान।
अपरा बिना; न परा का, हो सकता अनुमान।।
सांसारिक विज्ञान है, अपरा माध्यम मान।
गुरु अपरा से परा की, करा सके पहचान।।
अक्षर अविनाशी परा, अपरा क्षर ले जान।
अपरा प्रगटे परा से, त्याग परा पहचान।।
मन्त्र हवन अपरा समझ, परा सत्य का भान।
इससे उसको पा सके, कर अभ्यास सुजान।।
अपरा पर्दा कर रही, दुनियावी आचार।
परा न पर्दा जानती, करे नहीं व्यापार।।
दृष्टा दृष्ट न दो रहें, अपरा-परा न भिन्न।
क्षर-अक्षर हों एक तो, सत्यासत्य अभिन्न।।
***
मुक्तिका
किसे दिखाएँ मन के छाले?
पिला रहे सब तन को प्याले
संयम मैखाने में मेहमां
सती बहकती कौन सम्हाले?
वेणु झूमती पीकर पब में
ब्रज की रेणु क्रशर के पाले
पचा न पाएँ इतना खाते
कुछ, कुछ को कौरों के लाले
आदम मन की देख कालिमा
शरमा रहे श्याम पट काले
***
मुक्तिका
घातक सपनों के लिए जीवन का यह दौर
फागुन से डर काँपती कोमल कमसिन बौर
महुआ मर ही गया है, हो बोतल में कैद
मस्ती को मिलती नहीं मानव मन में ठौर
नेता जुमलेबाज है, जनता पत्थरबाज
भूख-प्यास का राज है, नंगापन सिरमौर
सपने मोहनभोग के छपा घोषणा पत्र
छीन-खा रहे रात-दिन जन-हित का कागौर
'सलिल' सियासत मनचली मुई हुई निर्लज्ज
छलती जन विश्वास को, भुला तरीके-तौर
७-६-२०२०
***
मुक्तिका
जंगल जंगल
*
जंगल जंगल कहाँ रहे अब
नदी सरोवर पूर रहे अब
काटे तरु, बोई इमारतें
चंद ठूँठ बेनूर रहे अब
कली मुरझती असमय ही लख
कामुक भौंरे क्रूर हुए अब
होली हो ली, अनहोली अब
रंग तंग हो दूर हुए अब
शेष न शर्म रही नैनों में
स्नेहिल नाते सूर हुए अब
पुष्पा पुष्प कहें काँटों से
झुक खट्टे अंगूर हुए अब
मिटी न खुद से खुद की दूरी
सपने चकनाचूर हुए अब
***
एक रचना
*
गाय
*
गाय हमारी माता है
पूजो गैया को पूजो
*
पिता कहाँ है?, ज़िक्र नहीं
माता की कुछ फ़िक्र नहीं
सदा भाई से है लेना-
नहीं बहिन को कुछ देना
है निज मनमानी करना
कोई तो रस्तों सूझो
पूजो गैया को पूजो
*
गौरक्षक हम आप बने
लाठी जैसे खड़े-तने
मौका मिलते ही ठोंके-
बात किसी की नहीं सुनें
जबरा मारें रों न देंय
कार्य, न कारण तुम बूझो
पूजो गैया को पूजो
*
गैया को माना माता
बैल हो गया बाप है
अकल बैल सी हुई मुई
बात अक्ल की पाप है
सींग मारते जिस-तिस को
भागो-बचो रे! मत जूझो
पूजो गैया को पूजो
*
मुक्तिका
*
मुक्त मन मुस्कान मंजुल मुक्तिका
नर्मदा का गान किलकिल मुक्तिका
मुक्तकों से पा रही विस्तार यह
षोडशी का भान खिलखिल मुक्तिका
बीज अंकुर कुसुम कंटक धूल सह
करे जीवन गान हिलमिल मुक्तिका
क्या कहे कैसे कहाँ कब, जानती
ज्योत्सना नभ-शान झिलमिल मुक्तिका
रूपसी अपरूप उज्वल धूपसी
मनुजता का मान प्रांजल मुक्तिका
नर्मदा रस-भाव-लय की गतिमयी
कथ्य की है जान, निश्छल मुक्तिका
सत्य-शिव-सुंदर सलिल आराध्य है
मीत गुरु गंभीर-चंचल मुक्तिका
७-२-२०२०
***
नवगीत
पकौड़ा-चाय
*
तलो पकौड़ा
बेचो चाय
*
हमने सबको साथ ले,
सबका किया विकास।
'बना देश में' का दिया,
नारा खासुलखास।
नव धंधा-आजीविका
रोजी का पर्याय
तलो पकौड़ा
बेचो चाय
*
सब मिल उत्पादन करो,
साधो लक्ष्य अचूक।
'भारत में ही बना है'
पीट ढिंढोरा मूक।।
हम कुर्सी तुम सड़क पर
बैठो यही उपाय
तलो पकौड़ा
बेचो चाय
*
लाइसेंस-जीएसटी,
बिना नोट व्यापार।
इनकम कम, कर दो अधिक,
बच्चे भूखे मार।।
तीन-पांच दो गुणित दो
देशभक्ति अध्याय
तलो पकौड़ा
बेचो चाय
***
छंद: दोहा
***
नवगीत
*
तू कल था
मैं आज हूं
*
उगते की जय बोलना
दुनिया का दस्तूर।
ढलते को सब भूलते,
यह है सत्य हुजूर।।
तू सिर तो
मैं ताज हूं
*
मुझको भी बिसराएंगे,
कहकर लोग अतीत।
हुआ न कोई भी यहां,
जो हो नहीं व्यतीत।।
तू है सुर
मैं साज हूं।।
*
नहीं धूप में किए हैं,
मैंने बाल सफेद।
कल बीता हो तजूंगा,
जगत न किंचित खेेद।।
क्या जाने
किस व्याज हूं?
***
७.२.२०१८
***
लघुकथा-
बेटा
*
गलत संगत के कारण उसे चोरी की लत लग गयी. समझाने-बुझाने का कोई प्रभाव नहीं हुआ तो उसे विद्यालय से निकाल दिया गया. अपने बेटे को जैसे-तैसे पढ़ा-लिखा कर भला आदमी बनाने का सपना जी रही बीमार माँ को समाचार मिला तो सदमे के कारण लकवा लग गया.
एक रात प्यास से बेचैन माँ को निकट रखे पानी का गिलास उठाने में भी असमर्थ देखकर बेटे से रहा नहीं गया. पानी पिलाकर वह माँ के समीप बैठ गया और बोला 'माँ! तेरे बिना मुझसे रोटी नहीं खाई जाती.' बेबस माँ को आँखों से बहते आँसू पोंछने के बाद बेटा सवेरे ही घर से चला जाता है.
दिन भर बेटे के घर न आने से चिंतित माँ ने आहत सुन दरवाजे से बेटे के साथ एक अजनबी को घर में घुसते हुए देखा तो उठने की कोशिश की किन्तु कमजोरी के कारण उठ न सकी. अजनबी ने अपना परिचय देते हुए बताया कि बेटे ने उनके गोदाम में चोरी करनेवाले चोरों को पकड़वाया है. इसलिए वे बेटे को चौकीदार रखेंगे. वह काम करने के साथ-साथ पढ़ भी सकेगा.
अजनबी के प्रति आभार व्यक्त करने की कोशिश में हाथ जोड़ने की कोशिश करती माँ के मुँह से निकला 'बेटा'
***
मुक्तक
मेटते रह गए कब मिटीं दूरियाँ?
पीटती ही रहीं, कब पिटी दूरियाँ?
द्वैत मिटता कहाँ, लाख अद्वैत हो
सच यही कुछ बढ़ीं, कुछ घटीं दूरियाँ
*
कुण्डलिया
जल-थल हो जब एक तो, कैसे करूँ निबाह
जल की, थल की मिल सके, कैसे-किसको थाह?
कैसे-किसको थाह?, सहायक अगर शारदे
संभव है पल भर में, भव से विहँस तार दे
कहत कवि संजीव, हरेक मुश्किल होती हल
करें देखकर पार, एक हो जब भी जल-थल
*
***
एक प्रश्न:
*
लिखता नहीं हूँ,
लिखाता है कोई
*
वियोगी होगा पहला कवि
आह से उपजा होगा गान
*
शब्द तो शोर हैं तमाशा हैं
भावना के सिंधु में बताशा हैं
मर्म की बात होंठ से न कहो
मौन ही भावना की भाषा है
*
हैं सबसे मधुर वो गीत जिन्हें हम दर्द के सुर में गाते हैं,
*
अवर स्वीटेस्ट सांग्स आर दोज विच टेल ऑफ़ सैडेस्ट थॉट.
*
जितने मुँह उतनी बातें के समान जितने कवि उतनी अभिव्यक्तियाँ
प्रश्न यह कि क्या मनुष्य का सृजन उसके विवाह अथवा प्रणय संबंधों से प्रभावित होता है? क्या अविवाहित, एकतरफा प्रणय, परस्पर प्रणय, वाग्दत्त (सम्बन्ध तय), सहजीवी (लिव इन), प्रेम में असफल, विवाहित, परित्यक्त, तलाकदाता, तलाकगृहीता, विधवा/विधुर, पुनर्विवाहित, बहुविवाहित, एक ही व्यक्ति से दोबारा विवाहित, निस्संतान, संतानवान जैसी स्थिति सृजन को प्रभावित करती है?
यह प्रभाव कब, कैसे, कितना और कैसा होता है? इस पर विचार दें.
आपके विचारों का स्वागत और प्रतीक्षा है.
७-२-२०१७
***
द्विपदियाँ (अश'आर)
*
उगते सूरज को करे, दुनिया सदा प्रणाम
तपते से बच,डूबते देख न लेती नाम
*
औरों के ऐब देखना, आसान है बहुत
तू एक निगाह, अपने आप पे भी डाल ले
*
आगाज़ के पहले जरा अंजाम सोच ले
शुरुआत किसी काम की कर, बाद में 'सलिल'
*
उगते सूरज को करे, दुनिया सदा प्रणाम
तपते से बच,डूबते देख न लेती नाम
*
३-२-२०१६
अमरकंटक एक्सप्रेस बी २ /३५, बिलासपुर-भाटापारा
***
एक रचना
परिंदा
*
करें पत्ते परिंदों से गुफ्तगू
व्यर्थ रहते हैं भटकते आप क्यूँ?
बंद पिंजरों में रहें तो हर्ज़ क्या?
भटकने का आपको है मर्ज़ क्या??
परिंदे बोले: 'न बंधन चाहिए
जमीं घर, आकाश आँगन चाहिए
फुदक दाना चुन सकें हम खुद जहाँ
उड़ानों पर भी न हो बंदिश वहाँ
क्यों रहें हम दूर अपनी डाल से?
मरें चाहे, जूझ तो लें हाल से
चुगा दें चुग्गा उन्हें असमर्थ जो
तोल कर पर नाप लें वे गगन को
हम नहीं इंसान जो खुद के लिये
जियें, हम जीते यहाँ सबके लिये'
मौन पत्ता छोड़ शाखा गिर गया
परिंदा झट से गगन में उड़ गया
२०-१२-२०१५
***
हाइकु गीत:
.
रेवा लहरें
झुनझुना बजातीं
लोरी सुनातीं
.
मन लुभातीं
अठखेलियाँ कर
पीड़ा भुलातीं
.
राई सुनातीं
मछलियों के संग
रासें रचातीं
.
रेवा लहरें
हँस खिलखिलातीं
ठेंगा दिखातीं
.
कुनमुनातीं
सुबह से गले मिल
जागें मुस्कातीं
.
चहचहातीं
चिरैयाँ तो खुद भी
गुनगुनातीं
.
रेवा लहरें
झट फिसल जातीं
हाथ न आतीं
***
कविता
प्रश्नोत्तर
कल क्या होगा?
कौन बचेगा? कौन मरेगा?
कौन कहे?
.
आज न डरकर
कल की खातिर
शिव मस्तक से सतत बहे बहे
.
कल क्या थे?
यह सोच-सोचकर
कल कैसे गढ़ पाएँगे?
.
दादा चढ़े
हिमालय पर
क्या हम भी कदम बढ़ाएँगे?
.
समय
सवाल कर रहा
मिलकर उत्तर दें
.
चुप रहने से
प्रश्न न हल
हो पाएँगे।
७-२-२०१५
***
छंद सलिला :
ताण्डव छंद
*
(अब तक प्रस्तुत छंद: अग्र, अचल, अचल धृति, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, कीर्ति, घनाक्षरी, छवि, ताण्डव, तोमर, दीप, दोधक, निधि, प्रेमा, मधुभार,माला, वाणी, शक्तिपूजा, शाला, शिव, शुभगति, सार, सुगति, सुजान, हंसी)
*
तांडव रौद्र कुल का बारह मात्रीय छंद है जिसके हर चरण के आदि-अंत में लघु वर्ण अनिवार्य है.
उदाहरण:
१. भर जाता भव में रव, शिव करते जब ताण्डव
शिवा रहित शिव हों शव, आदि -अंत लघु अभिनव
बारह आदित्य मॉस राशि वर्ण 'सलिल' खास
अधरों पर रखें हास, अनथक करिए प्रयास
२. नाश करें प्रलयंकर, भय हरते अभ्यंकर
बसते कंकर शंकर, जगत्पिता बाधा हर
महादेव हर हर हर, नाश-सृजन अविनश्वर
त्रिपुरारी उमानाथ, 'सलिल' सके अब भव तर
३. जग चाहे रहे वाम, कठिनाई सह तमाम
कभी नहीं करें डाह, कभी नहीं भरें आह
मन न तजे कभी चाह, तन न तजे तनिक राह
जी भरकर करें काम, तभी भला करें राम
३०.१.२०१४
बिहार और कायस्थ
बंगाल से बिहार का अलग होना और राष्ट्र भाषा हिंदी के लिए आन्दोलन व हिंदी को राष्ट्र भाषा बनाने वाले कायस्थ ही हैं :-
राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम के आरंभिक बिहारी नेता यथा महेश नारायण, सच्चिदानन्द सिन्हा एवं अन्य सभी अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेतृत्व में चल रहे स्वतंत्रता आंदोलन के प्रति ‘सचेत’ उदासीन भाव रखते हुए बंगाल से बिहार को अलग करने के आंदोलन से गहरे जुड़े थे। बिहार के नवजागरण का एक अत्यंत रोचक तथ्य है कि सन् १९१२ से पहले प्रतिक्रियावादी जमींदार वर्ग कांग्रेस अर्थात् राष्ट्रीय आंदोलन के साथ है और बंगाल से बिहार के पृथक्करण के विरोध में है जबकि प्रगतिशील मध्यवर्ग पृथक्करण के तो पक्ष में है लेकिन राष्ट्रीय आंदोलन के प्रति उदासीन है। बल्कि कई बार यह प्रगतिशील तबका अपनी ‘राजभक्ति’ भी प्रदर्शित करता है।
हसन इमाम ने कहा कि महेश नारायण ‘बिहारी जनमत के जनक’ हैं तो सिन्हा ने उन्हें ‘बिहारी नवजागरण का जनक’ कहा। कहना न होगा कि यह नवजागरण बिहार के पृथक्करण की शक्ल में था। महेश नारायण के बड़े भाई गोविंद नारायण कलकत्ता विश्वविद्यालय में एम. ए. की डिग्री पानेवाले पहले बिहारी थे। उनके ही नेतृत्व में बिहार में सर्वप्रथम राष्ट्रभाषा का आंदोलन आरंभ किया गया था और यह उन्हीं की प्रेरणा का फल था कि हिंदी का प्रवेश उस समय स्कूलों और कचहरियों में हो सका।
बंगाल से बिहार के पृथक्करण में महेश नारायण, डा. सच्चिादानंद सिन्हा, नंदकिशोर लाल, परमेश्वर लाल, राम बहादुर कृष्ण सहाय, भगवती सहाय तथा आरा के हरवंश सहाय समेत लगभग तमाम लोग, जिनकी भूमिका महत्त्वपूर्ण कही जा सकती है, जाति से कायस्थ थे और अंग्रेजी पढ़े-लिखे लोगों में उनकी जाति अग्रणी थी। सुमित सरकार(बंगाली कायस्थ ) ने बंगालियों के प्रभुत्त्व को चुनौती देते बिहार की कायस्थ जाति के लोगों के द्वारा पृथक बिहार हेतु आंदोलन का नेतृत्त्व करने की बात पर प्रकाश डाला है। यह अकारण नहीं था कि १९०७ में महेश नारायण के निधन के बाद डा. सच्चिदानंद सिन्हा ने बंगालियों के प्रभुत्त्व को तोड़नेवाले नेतृत्त्व की अगुआई की और अंततः इस जाति ने बंगाली प्रभुत्त्व को समाप्त कर अपनी प्रभुता कायम कर ली। इस वर्ग की बढ़ती महत्त्वाकांक्षा ने एक बार पुनः बिहार से उड़ीसा को अलग करने का ‘साहसिक’ कार्य किया। डा. अखिलेश कुमार ने अन्यत्र डा. सच्चिदानंद सिन्हा की उस भूमिका को रेखांकित करने का प्रयास किया गया है जिससे इस बात की पुष्टि होती है कि वे उड़ीसा के पृथक्करण के भी प्रमुख हिमायती थे। शिक्षित बिहारी युवकों ने महसूस किया था कि अपना अलग प्रांत नहीं होगा तो उनका कोई भविष्य नहीं है। इन युवकों में अधिकतर कायस्थ थे। अतएव वे अलग बिहार प्रांत बनाने के आंदोलन में स्वाभाविक रूप से कायस्थ जाति के लोग ही आगे आए। जाहिर है, रोजगार एवं अवसर की तलाश की इस मध्यवर्गीय लड़ाई को सच्चिदानंद सिन्हा ने एक व्यापक आधार प्रदान करने हेतु ‘बिहारी पहचान’ एवं ‘बिहारी नवजागरण’ की बात ‘गढ़ी’। उन्होंने अपने संस्मरण में लिखा है, ‘सिर्फ खुद बिहारियों को छोड़कर बाकी लोगों में बिहार का नाम भी लगभग अनजान था।’ आगे उन्होंने लिखा, ‘पिछली सदी के ९० के दशक के प्रारंभ में मैं जब एक छात्र के रूप में लंदन में था, तब मुझे जबरन इस ओर ध्यान दिलाया गया। तभी मैंने यह दर्दनाक और शर्मनाक खोज की कि आम बर्तानवी के लिए तो बिहार एक अनजान जगह है ही, और यहां तक कि अवकाशप्राप्त आंग्ल-भारतीयों के बहुमत के लिए भी बिहार अनजाना ही है। …मेरे लिए आज के बिहारियों को यह बताना बड़ा कठिन है कि उस वक्त मुझे और कुछ दूसरे उतने ही संवेदनशील बिहारी मित्रों को कितनी शर्मिंदगी और हीनता महसूस हुई जब हमें महसूस हुआ कि हम ऐसे लोग हैं जिनकी अपनी कोई अलग पहचान नहीं है, कोई प्रांत नहीं है जिसको वे अपना होने का दावा करें, दरअसल उनकी कोई स्थानीय वासभूमि नहीं है जिसका कोई नाम हो। यह पीड़ादायक भावना उस वक्त और टीस बन गई जब सन् १८९३ में स्वदेश लौटने पर बिहार में प्रवेश करते-करते पहले ही रेलवे स्टेशन पर एक लंबे-तगड़े बिहारी सिपाही के बैज पर ‘बंगाल पुलिस’ अंकित देखा। घर लौटने की खुशियां गायब हो गईं और मन खट्टा हो गया। …पर सहसा ख्याल आया कि बिहार को एक अलग और सम्मानजनक इकाई का दर्जा दिलाने के लिए, जिसकी देश के अन्य महत्वपूर्ण प्रांतों की तरह अपनी एक अलग पहचान हो, मैं सब कुछ करने का संकल्प लूं जो करना मेरे बूते में है। एक शब्द में कहूं तो यही मेरे जीवन का मिशन बन गया और इसको हासिल करना मेरे सार्वजनिक क्रियाकलापों की प्रेरणा का सबसे बड़ा स्रोत।’
***
सामयिक कविता:
रंग-बिरंगे नेता करते बात चटपटी.
ठगते सबके सब जनता को बात अटपटी.
लोकतन्त्र को लोभतंत्र में बदल हँस रहे.
कभी फाँसते हैं औरों को कभी फँस रहे.
ढंग कहो, बेढंग कहो चल रही जंग है.
हर चहरे की अलग कहानी, अलग रंग है.
***
हर चेहरे की अलग कहानी, अलग रंग है.
अलग तरीका, अलग सलीका, अलग ढंग है...
यह नेता भैंसों को ब्लैक बोर्ड बनवाता.
कुर्सी पड़े छोड़ना, बीबी को बैठाता.
घर में रबड़ी रखे मगर खाता था चारा.
जनता ने ठुकराया अब तडपे बेचारा.
मोटा-ताज़ा लगे, अँधेरे में वह भालू.
जल्द पहेली बूझो नाम बताओ........?
*
भगवा कमल चढ़ा सत्ता पर जिसको लेकर
गया पाक बस में, आया हो बेबस होकर.
भाषण लच्छेदार सुनाये, काव्य सुहाये.
धोती कुरता गमछा धारे सबको भाये.
बरस-बरस उसकी छवि हमने विहँस निहारी.
ताली पीटो, नाम बताओ-...
*
गोरी परदेसिन की महिमा कही न जाए.
सास और पति के पथ पर चल सत्ता पाए.
बिखर गया परिवार मगर क्या खूब सम्हाला?
देवरानी से मन न मिला यह गड़बड़ झाला.
इटली में जन्मी, भारत का ढंग ले लिया.
बहू दुलारी भारत माँ की नाम? .........
*
छोटी दाढीवाला यह नेता तेजस्वी.
कम बोले करता ज्यादा है श्रमी-मनस्वी.
नष्ट प्रान्त को पुनः बनाया, जन-मन जीता.
मरू-गुर्जर प्रदेश सिंचित कर दिया सुभीता.
गोली को गोली दे, हिंसा की जड़ खोदी.
कर्मवीर नेता है भैया ...
*
माया की माया न छोड़ती है माया को.
बना रही निज मूर्ति, तको बेढब काया को.
सत्ता प्रेमी, कांसी-चेली, दलित नायिका.
नचा रही है एक इशारे पर विधायिका.
गुर्राना-गरियाना ही इसके मन भाया.
चलो पहेली बूझो, नाम बताओ...
*
मध्य प्रदेशी जनता के मन को जो भाया.
दोबारा सत्ता पाकर भी ना इतराया.
जिसे लाडली बेटी पर आता दुलार है.
करता नव निर्माण, कर रहा नित सुधार है.
दुपहर भोजन बाँट, बना जन-मन का तारा.
जल्दी नाम बताओ वह ............. हमारा.
*
बंगालिन बिल्ली जाने क्या सोच रही है?
भय से हँसिया पार्टी खम्बा नोच रही है.
हाथ लिए तृण-मूल, करारी दी है टक्कर.
दिल्ली-सत्ताधारी काटें इसके चक्कर.
दूर-दूर तक देखो इसका हुआ असर जी.
पहचानो तो कौन? नाम ...
*
तेजस्वी वाचाल साध्वी पथ भटकी है.
कौन बताये किस मरीचिका में अटकी है?
ढाँचा गिरा अवध में उसने नाम काया.
बनी मुख्य मंत्री, सत्ता सुख अधिक न भाया.
बड़बोलापन ले डूबा, अब है गुहारती.
शिव-संगिनी का नाम मिला, है ...
*
डर से डरकर बैठना सही न लगती राह.
हिम्मत गजब जवान की, मुँह से निकले वाह.
घूम रहा है प्रान्त-प्रान्त में नाम कमाता.
गाँधी कुल का दीपक, नव पीढी को भाता.
जन मत परिवर्तन करने की लाता आँधी.
बूझो-बूझो नाम बताओ ...
*
बूढा शेर बैठ मुम्बई में चीख रहा है.
देश बाँटता, हाय! भतीजा दीख रहा है.
पहलवान है नहीं मुलायम अब कठोर है.
धनपति नेता डूब गया है, कटी डोर है.
शुगर किंग मँहगाई अब तक रोक न पाया.
रबर किंग पगड़ी बाँधे, पहचानो भाया.
*
७-२-२०१०
***

बुधवार, 31 दिसंबर 2025

दिसंबर ३१, नया साल, सॉनेट, भर्तृहरि, लघुकथा, गीत, व्यंग्य, दोहा, भवन, चित्रगुप्त, हाइकु गीत,

सलिल सृजन दिसंबर ३१
*
गीत आता रवि ले आए हँसियाँ जाता साल लुटाए खुशियाँ . अपने अपनापन दे पाएँ सपने सारे सच हो जाएँ कच्चा-पक्का जो जब खाएँ बिना देर झट विहँस पचाएँ मिलें दोस्तों की गलबहियाँ जाता साल लुटाए खुशियाँ . साथ रह सकें फूल-शूल मिल रहे निरापद कली सके खिल तितली-भँवरे नाचें-गाएँ रहे न कोई होंठों को सिल श्रम तरु पर झूलें सुख फलियाँ जाता साल लुटाए खुशियाँ . पथ पर बढ़े कदम की जय हो आखर-काव्य-कलम निर्भय हो आँसू पोंछ सकें मुस्कानें जीवट का जयकारा तय हो मन-मंदिर महकें सुख-कलियाँ जाता साल लुटाए खुशियाँ ३१.१२.२०२५ ०००
गीत
साल जाएगा
साल आएगा
क्या इंसान बदल पाएगा?
अगर नहीं तो केक काटकर
जला पटाखे, सुरा पानकर
इससे पिटकर, उससे पीटकर
क्या पाएगा?
.
नौ दिन पूज; शेष दिन शोषण
उसका जो जाये; दे पोषण।
अँगुली पकड़ काँध पर जिसके
बैठा; सेवा करी नहीं क्षण।
ऋण पुरखों का नहीं उतारा
कैसे अमन-चैन पाएगा?
साल जाएगा
साल आएगा
क्या इंसान बदल पाएगा?
.
जिसकी राखी सजी कलाई
उसको कहता हुई पराई।
गृह लक्ष्मी कह जिसको लाया
सेवा करे न; सिर्फ कराई।
भुला भाई को भाईचारा
किससे कैसे कब पाएगा?
साल जाएगा
साल आएगा
क्या इंसान बदल पाएगा?
.
जिनके सुत से ब्याह रचाया
उनके सपनों को बिखराया।
कुल मर्यादा नहीं निभाई
रिश्ता रिसता घाव बनाया।
कपड़ों जैसे बदले नाते
कोई किस तरह अपनाएगा?
साल जाएगा
साल आएगा
क्या इंसान बदल पाएगा?
.
धरा-नदी को कहता मैया
छीन रहा उनसे ही छैया।
भुला देश-हित स्वार्थ साधता
कैसे खुश हो राम रमैया?
जोड़-जोड़ कर मरा जा रहा
काम न कुछ तेरे आएगा
साल जाएगा
साल आएगा
क्या इंसान बदल पाएगा?
३१-१२-२०२४
०००
सॉनेट
कल-आज-कल
*
जाने वाला राह बनाता आने वाला चलता है,
पलता है सपना आँखों में तब ही जब हम सोए हों,
फसल काटता केवल वह ही जिसने बीजे बोए हों,
उगता सूरज तब ही जब वह नित संझा में ढलता है।
वह न पनपता जिसको सुख-सौभाग्य अन्य का खलता है,
मुस्कानों की कीमत जानें केवल वे जो रोए हों,
अपनापन पाते हैं वे जो अपनेपन में खोए हों,
लोहा हो फौलाद आग में तप जब कभी पिघलता है।
कल कल करता निर्झर बहता कल पाता मन बैठ निकट,
किलकिल करता जो हो बेकल उसमें सचमुच नहीं अकल,
दास न होना कल का मानव कल-पुर्जों का स्वामी बन।
ठोकर मार न कंकर को तू शंकर उससे हुए प्रगट,
काट न जंगल खोद न पर्वत मिटा न नदी बचा ले जल,
कल से कल को जोड़ आज तू होकर नम्र न नाहक तन।।
३१.१२.२०२३
***
भर्तृहरि का कथन है --
'को लाभो गुणिसंगमः' अर्थात् ( लाभ क्या है? गुणियों का साथ) ।
अंतर्जाल ने मुझे इस लाभ से परिचित करवाया है।
आशा करता हूँ नये साल में मैं इससे और भी ज्यादा लाभान्वित हो सकूँगा।
नये साल में हम सभी एक दूसरे के विचारों लाभ प्राप्त कर सके इसी आशा के साथ इस पुराने साल को हार्दिक विदाई । डॉ. राधाकृष्णन के अनुसार- 'सब से अधिक आनंद इस भावना में है कि हमने मानवता की प्रगति में कुछ योगदान दिया है। भले ही वह कितना कम, यहाँ तक कि बिल्कुल ही तुच्छ क्यों न हो?'
अपने रचे को इस कसौटी पर परखें और लिखें, लिखते रहें।
नव वर्ष मंगलमय हो ।
***
सॉनेट
राग दरबारी
*
मेघ आच्छादित गगन है, रवि न दिखता खोज लाएँ।
लॉकडाउन कर चुनावी भीड़ बन हम गर्व करते।
खोद कब्रें, हड्डियों को अस्थियाँ कह मार मरते।।
राग दरबारी निरंतर सुनाकर नव वर्ष लाएँ।।
आम्रपाली के पुजारी, आपका बंटी सिरजते।
एक था चंदर सुधा को विवाहे, फिर छोड़ जाए।
थाम सत्ता सुंदरी की बाँह, जाने किसे ध्याए?
अब न दिव्या रही भव्या, चित्रलेखा सँग थिरकते।।
लक्ष्य मुर्दे उखाड़ें परिधान पहना नाम बदलें।
दुश्मनों के हाथ खाकर मात, नव उपलब्धि कह लें।।
असहमत को खोज कुचलें, देख दिल अपनों के दहलें।।
प्रदूषित कर हर नदी, बन अंधश्रद्धा सुमन बह लें।।
जड़ें खोदें रात-दिन, जड़मति न बोलें, अनय सह लें।।
अधर क्या कहते न सुनकर, लाठियाँ को हाथ धर लें।।
१-१-२०२२
***
गीत
काल चक्र का
महाकाल के भक्त
करो अगवानी
.
तपूँ , जड़ाऊँ या बरसूँ
नाखुश होंगे बहुतेरे
शोर-शांति
चाहो ना चाहो
तुम्हें रहेंगे घेरे
तुम लड़कर जय वरना
चाहे सूखा हो या पानी
बहा पसीना
मेहनत कर
करना मेरी अगवानी
.
चलो, गिरो उठ बढ़ो
शूल कितने ही आँख तरेरे
बाधा दें या
रहें सहायक
दिन-निशि, साँझ-सवेरे
कदम-हाथ गर रहे साथ
कर लेंगे धरती धानी
कलम उठाकर
करें शब्द के भक्त
मेरी अगवानी
.
शिकवे गिले शिकायत
कर हल होती नहीं समस्या
सतत साधना
से ही होती
हरदम पूर्ण तपस्या
स्वार्थ तजो, सर्वार्थ साधने
बोलो मीठी बानी
फिर जेपी-अन्ना
बनकर तुम करो
मेरी अगवानी
...
गीत
सूरज उगाएँ
*
चलो! हम सूरज उगाएँ...
सघन तम से क्यों डरें हम?
भीत होकर क्यों मरें हम?
मरुस्थल भी जी उठेंगे-
हरितिमा मिल हम उगाएँ....
विमल जल की सुनें कल-कल।
भुला दें स्वार्थों की किल-किल।
सत्य-शिव-सुंदर रचें हम-
सभी सब के काम आएँ...
लाए क्या?, ले जाएँगे क्या?,
किसी के मन भाएँगे क्या?
सोच यह जीवन जिएँ हम।
हाथ-हाथों से मिलाएँ...
आत्म में विश्वात्म देखें।
हर जगह परमात्म लेखें।
छिपा है कंकर में शंकर।
देख हम मस्तक नवाएँ...
तिमिर में दीपक बनेंगे।
शून्य में भी सुनेंगे।
नाद अनहद गूँजता जो
सुन 'सलिल' सबको सुनाएँ...
***
नवगीत:
नए साल
मत हिचक
बता दे क्या होगा?
.
सियासती गुटबाजी
क्या रंग लाएगी?
'देश एक' की नीति
कभी फल पाएगी?
धारा तीन सौ सत्तर
बनी रहेगी क्या?
गई हटाई
तो क्या
घटनाक्रम होगा?
.
काशी, मथुरा, अवध
विवाद मिटेंगे क्या?
नक्सलवादी
तज विद्रोह
हटेंगे क्या?
पूर्वांचल में
अमन-चैन का
क्या होगा?
.
धर्म भाव
कर्तव्य कभी
बन पाएगा?
मानवता की
मानव जय
गुंजाएगा?
मंगल छू
भू के मंगल
का क्या होगा?
***
नव वर्ष हाइकु
*
हो नया हर्ष
हर नए दिन में
नया उत्कर्ष
.
प्राची के गाल
रवि करता लाल
है नया साल
.
हाइकु लिखो
हर दिवस एक
इरादा नेक
३१-१२-२०१७
***
नवगीत
*
पुनर्जन्म हर सुबह हो रहा
पुनर्मरण हर रात।
चलो बैठ पल दो पल कर लें
मीत! प्रीत की बात।
*
गौरैयों ने खोल लिए पर
नापें गगन विशाल।
बिजली गिरी बाज पर
उसका जीना हुआ मुहाल।
हमलावर हो लगा रहा है
लुक-छिपकर नित घात
पुनर्जन्म हर सुबह हो रहा
पुनर्मरण हर रात।
*
आ बुहार लें मन की बाखर
कहें न ऊँचे मोल।
तनिक झाँक लें अंतर्मन में
निज करनी लें तोल।
दोष दूसरों के मत देखें
खुद उजले हों तात!
पुनर्जन्म हर सुबह हो रहा
पुनर्मरण हर रात।
*
स्वेद-'सलिल' में करें स्नान नित
पूजें श्रम का दैव।
निर्माणों से ध्वंसों को दें
मिलकर मात सदैव।
भूखे को दें पहले, फिर हम
खाएँ रोटी-भात।
पुनर्जन्म हर सुबह हो रहा
पुनर्मरण हर रात।
*
साक्षी समय न हमने मानी
आतंकों से हार।
जैसे को तैसा लौटाएँ
सरहद पर इस बार।
नहीं बात कर बात मानता
जो खाए वह लात।
पुनर्जन्म हर सुबह हो रहा
पुनर्मरण हर रात।
*
लोकतंत्र में लोभतंत्र क्यों
खुद से करें सवाल?
कोशिश कर उत्तर भी खोजें
दें न हँसी में टाल।
रात रहे कितनी भी काली
उसके बाद प्रभात।
पुनर्जन्म हर सुबह हो रहा
पुनर्मरण हर रात।
*****
२४-९-२०१६
गीत
देश हमारा है
सरकार हमारी है,
क्यों न निभाई
हमने जिम्मेदारी है?
*
नियम व्यवस्था का
पालन हम नहीं करें,
दोष गैर पर-
निज, दोषों का नहीं धरें।
खुद क्या बेहतर
कर सकते हैं, वही करें।
सोचें त्रुटियाँ कितनी
कहाँ सुधारी हैं?
देश हमारा है
सरकार हमारी है,
क्यों न निभाई
हमने जिम्मेदारी है?
*
भाँग कुएँ में
घोल, हुए मदहोश सभी,
किसके मन में
किसके प्रति आक्रोश नहीं?
खोज-थके, हारे
पाया सन्तोष नहीं।
फ़र्ज़ भुला, हक़ चाहें
मति गई मारी है।
देश हमारा है
सरकार हमारी है,
क्यों न निभाई
हमने जिम्मेदारी है?
*
एक अँगुली जब
तुम को मैंने दिखलाई।
तीन अंगुलियाँ उठीं
आप पर, शरमाईं
मति न दोष खुद के देखे
थी भरमाई।
सोचें क्या-कब
हमने दशा सुधारी है?
देश हमारा है
सरकार हमारी है,
क्यों न निभाई
हमने जिम्मेदारी है?
*
जैसा भी है
तन्त्र, हमारा अपना है।
यह भी सच है
बेमानी हर नपना है।
अँधा न्याय-प्रशासन,
सत्य न तकना है।
कद्र न उसकी
जिसमें कुछ खुद्दारी है।
देश हमारा है
सरकार हमारी है,
क्यों न निभाई
हमने जिम्मेदारी है?
*
कौन सुधारे किसको?
आप सुधर जाएँ।
देखें अपनी कमी,
न केवल दिखलायें।
स्वार्थ भुला,
सर्वार्थों की जय-जय गायें।
अपनी माटी
सारे जग से न्यारी है।
देश हमारा है
सरकार हमारी है,
क्यों न निभायी
हमने जिम्मेदारी है?
*
११-८-२०१६
***
गीत
कौन?
*
कौन रचेगा राम-कहानी?
कौन कहेगा कृष्ण-कथाएँ??
खुशियों की खेती अनसिंचित,
सिंचित खरपतवार व्यथाएँ।
*
खेत
कारखाने-कॉलोनी
बनकर, बिना मौत मरते हैं।
असुर हुए इंसान,
न दाना-पानी खा,
दौलत चरते हैं।
वन भेजी जाती सीताएँ,
मन्दिर पुजतीं शूर्पणखाएँ।
कौन रचेगा राम-कहानी?
कौन कहेगा कृष्ण-कथाएँ??
*
गौरैयों की देखभाल कर
मिली बाज को जिम्मेदारी।
अय्यारी का पाठ रटाती,
पैठ मदरसों में बटमारी।
एसिड की शिकार राधाएँ
कंस जाँच आयोग बिठाएँ।
कौन रचेगा राम-कहानी?
कौन कहेगा कृष्ण-कथाएँ??
*
रिद्धि-सिद्धि, हरि करें न शिक़वा,
लछमी पूजती है गणेश सँग।
'ऑनर किलिंग' कर रहे दद्दू
मूँछ ऐंठकर, जमा रहे रंग।
ठगते मोह-मान-मायाएँ
घर-घर कुरुक्षेत्र-गाथाएँ।
कौन रचेगा राम-कहानी?
कौन कहेगा कृष्ण-कथाएँ??
*
हर कर्तव्य तुझे करना है,
हर अधिकार मुझे वरना है।
माँग भरो, हर माँग पूर्ण कर
वरना रपट मुझे करना है।
देह मात्र होतीं वनिताएँ
घर को होटल मात्र बनाएँ।
कौन रचेगा राम-कहानी?
कौन कहेगा कृष्ण-कथाएँ??
*
दोष न देखें दल के अंदर,
और न गुण दिखते दल-बाहर।
तोड़ रहे कानून बना, सांसद,
संसद मंडी-जलसा घर।
बस में हो तो साँसों पर भी
सरकारें अब टैक्स लगाएँ।
कौन रचेगा राम-कहानी?
कौन कहेगा कृष्ण-कथाएँ??
९-८-२०१६
गोरखपुर दंत चिकित्सालय जबलपुर
***
गीत
कौन हैं हम?
**
कौन हैं हम?
देह नश्वर,
या कि हैं आत्मा चिरन्तन??
*
स्नेह सलिला नर्मदा हैं।
सत्य-रक्षक वर्मदा हैं।
कोई माने या न माने
श्वास सारी धर्मदा हैं।
जान या
मत जान लेकिन
मित्र है साहस-प्रभंजन।
कौन हैं हम?
देह नश्वर,
या कि हैं आत्मा चिरन्तन??
*
सभ्यता के सिंधु हैं हम,
भले लघुतम बिंदु हैं हम।
गरल धारे कण्ठ में पर
शीश अमृत-बिंदु हैं हम।
अमरकंटक-
सतपुड़ा हम,
विंध्य हैं सह हर विखण्डन।
कौन हैं हम?
देह नश्वर,
या कि हैं आत्मा चिरन्तन??
*
ब्रम्हपुत्रा की लहर हैं,
गंग-यमुना की भँवर हैं।
गोमती-सरयू-सरस्वति
अवध-ब्रज की रज-डगर हैं।
बेतवा, शिव-
नाथ, ताप्ती,
हमीं क्षिप्रा, शिव निरंजन।
कौन हैं हम?
देह नश्वर,
या कि हैं आत्मा चिरन्तन??
*
तुंगभद्रा पतित पावन,
कृष्णा-कावेरी सुहावन।
सुनो साबरमती हैं हम,
सोन-कोसी-हिरन भावन।
व्यास-झेलम,
लूनी-सतलज
हमीं हैं गण्डक सुपावन।
कौन हैं हम?
देह नश्वर,
या कि हैं आत्मा चिरन्तन??
*
मेघ बरसे भरी गागर,
करी खाली पहुँच सागर।
शारदा, चितवन किनारे-
नागरी लिखते सुनागर।
हमीं पेनर
चारु चंबल
घाटियाँ हम, शिखर- गिरिवन
कौन हैं हम?
देह नश्वर,
या कि हैं आत्मा चिरन्तन??
१०-९-२०१६
***
नवगीत
*
सिया हरण को देख रहे हैं
आँखें फाड़ लोग अनगिन।
द्रुपद सुता के चीरहरण सम
घटनाएँ होतीं हर दिन।
*
'गिरि गोपाद्रि' न नाम रहा क्यों?
'सुलेमान टापू' क्यों है?
'हरि पर्वत' का 'कोह महाजन'
नाम किया किसने क्यों है?
नाम 'अनंतनाग' को क्यों हम
अब 'इस्लामाबाद' कहें?
घर में घुस परदेसी मारें
हम ज़िल्लत सह आप दहें?
बजा रहे हैं बीन सपेरे
राजनीति नाचे तिक-धिन
द्रुपद सुता के चीरहरण सम
घटनाएँ होतीं हर दिन।
*
हम सबका 'श्रीनगर' दुलारा
क्यों हो शहरे-ख़ास कहो?
'मुख्य चौक' को 'चौक मदीना'
कहने से सब दूर रहो
नाम 'उमा नगरी' है जिसका
क्यों हो 'शेखपुरा' वह अब?
'नदी किशन गंगा' को 'दरिया-
नीलम' कह मत करो जिबह
प्यार न जिनको है भारत से
पकड़ो-मारो अब गईं-गईं
द्रुपद सुता के चीरहरण सम
घटनाएँ होतीं हर दिन।
*
पण्डित वापिस जाएँ बसाए
स्वर्ग बनें फिर से कश्मीर
दहशतगर्द नहीं बच पाएं
कायम कर दो नई नज़ीर
सेना को आज़ादी दे दो
आज नया इतिहास बने
बंगला देश जाए दोहराया
रावलपिंडी समर ठने
हँस बलूच-पख्तून संग
सिंधी आज़ाद रहें हर दिन
द्रुपद सुता के चीरहरण सम
घटनाएँ होतीं हर दिन।
(कश्मीर में हिन्दू नामों को बदलकर योजनाबद्ध तरीके से मुस्लिम नाम रखे जानेके विरोध में)
***
गीत
*
नए साल!
आजा कतार में
आगे मत जा।
*
देश दिनों से खड़ा हुआ है,
जो जैसा है अड़ा हुआ है,
किसे फ़िक्र जनहित का पेड़ा-
बसा रहा है, सड़ा हुआ है।
चचा-भतीजा ताल ठोंकते,
पिता-पुत्र ज्यों श्वान भौंकते,
कोई काट न ले तुझको भी-
इसीलिए
कहता हूँ-
रुक जा।
नए साल!
आजा कतार में
आगे मत जा।
*
वादे जुमले बन जाते हैं,
घपले सारे धुल जाते हैं,
लोकतंत्र के मूल्य स्वार्थ की-
दीमक खाती, घुन जाते हैं।
मौनी बाबा बोल रहे हैं
पप्पू जहँ-तहँ डोल रहे हैं
गाल बजाते जब-तब लालू
मत टकराना
बच जा झुक जा।
नए साल!
आजा कतार में
आगे मत जा।
*
एक आदमी एक न पाता,
दूजा लाख-करोड़ जुटाता,
मार रही मरते को दुनिया-
पिटता रोये, नहीं सुहाता।
हुई देर, अंधेर यहाँ है,
रही अनसुनी टेर यहाँ है,
शुद्ध दलाली, न्याय कहाँ है?
जलने से
पहले मत
बुझ जा।
नए साल!
आजा कतार में
***
नवगीत
समय वृक्ष है
*
समय वृक्ष है
सूखा पत्ता एक झरेगा
आँखें मूँदे.
नव पल्लव तब
एक उगेगा
आँखे खोले.
*
कहो अशुभ या
शुभ बोलो
कुछ फर्क नहीं है.
चिरजीवी होने का
कोई अर्क नहीं है.
कितने हुए?
होएँगे कितने?
कौन बताये?
किसका कितना वजन?
तराजू कोई न तोले.
ठोस दिख रहे
लेकिन हैं
भीतर से पोले.
नव पल्लव
किस तरह उगेगा
आँखें खोले?
*
वाम-अवाम
न एक साथ
मिल रह सकते हैं.
काम-अकाम
न एक साथ
खिल-दह सकते हैं.
पूरब-पश्चिम
उत्तर-दक्षिण
ऊपर-नीचे
कर परिक्रमा
नव संकल्प
अमिय नित घोले.
श्रेष्ठ वही जो
श्रम-सीकर की
जय-जय बोले.
बिन प्रयास
किस तरह कर्मफल
आँखें खोले?
*
जाग,
छेड़ दे, राग नया
चुप से क्या हासिल?
आग
न बुझने देना
तू मत होना गाफिल.
आते-जाते रहें
साल-दर-साल
नए कुछ.
कौन जानता
समय-चक्र
दे हिम या शोले ?
नोट बंद हों या जारी
नव आशा बो ले.
उसे दिखेगी उषा
जाग जो
आँखें खोले
३१-१२-२०१६
***
गीत
साल निराला हो
*
बहुत हो चुके
होएँगे भी
पर यह साल निराला हो
*
सुख पीड़ा के आँसू पोंछे
हर्ष दर्द से गले मिले
जिनसे शिकवे रहे उम्र भर
उन्हें न तिल भर रहें गिले
मुखर हो सकें वही वैखरी
जिसके लब थे रहे सिले
जिनके पद तल
सत्ता उनके
उर में कंठी माला हो
बहुत हो चुके
होएँगे भी
पर यह साल निराला हो
*
पग-ठोकर में रहे मित्रता
काँटा साझा साखी हो
शाख-गगन के बीच सेतु बन
भोर-साँझ नव पाखी हो
शासक और विपक्षी के कर
संसद में अब राखी हो
अबला सबला बने
अनय जब मिले
आँख में ज्वाला हो
बहुत हो चुके
होएँगे भी
पर यह साल निराला हो
*
मानक तोड़ पुराने नव रच
जो कह चुके, न वह कह कवि बच
बाँध न रचना को नियमों में
दिल की, मन की बातें कह सच
नचा समय को हँस छिन्गुली पर
रे सत्ता! जनमत सुन कर नच
समता-सुरा
पिलानेवाली
बाला हो, मधुशाला हो
बहुत हो चुके
होएँगे भी
पर यह साल निराला हो
***
काम न काज
*
काम न काज
जुबानी खर्चा
नये वर्ष का कोरा पर्चा
*
कल सा सूरज उगे आज भी
झूठा सच को ठगे आज भी
सरहद पर गोलीबारी है
वक्ष रक्त से सने आज भी
किन्तु सियासत कहे करेंगे
अब हम प्रेम
भाव की अर्चा
*
अपना खून खून है भैया
औरों का पानी रे दैया!
दल दलबंदी के मारे हैं
डूबे लोकतंत्र की नैया
लिये ले रहा जान प्रशासन
संसद करती
केवल चर्चा
*
मत रोओ, तस्वीर बदल दो
पैर तले दुःख-पीर मसल दो
कृत्रिम संवेदन नेता के
लौटा, थोड़ी सीख असल दो
सरकारों पर निर्भर मत हो
पायें आम से
खास अनर्चा
***
लघु कथा -
आदमी जिंदा है
*
साहित्यिक आयोजन में वक्ता गण साहित्य की प्रासंगिकता पर चिंतन कम और चिंता अधिक व्यक्त कर रहे थे। अधिकांश चाहते थे कि सरकार साहित्यकारों को आर्थिक सहयोग दे क्योंकि साहित्य बिकता नहीं, उसका असर नहीं होता।
भोजन काल में मैं एक वरिष्ठ साहित्यकार से भेंट करने उनके निवास पर जा ही रहा था कि हरयाणा से पधारे अन्य साहित्यकार भी साथ हो लिये। राह में उन्हें आप बीती बताई- 'कई वर्ष पहले व्यापार में लगातार घाटे से परेशं होकर मैंने आत्महत्या का निर्णय लिया और रेल स्टेशन पहुँच गया, रेलगाड़ी एक घंटे विलंब से थी। मरता क्या न करता प्लेटफ़ॉर्म पर टहलने लगा। वहां गीताप्रेस गोरखपुर का पुस्तक विक्रय केंद्र खुला देख तो समय बिताने के लिये एक किताब खरीद कर पढ़ने लगा। किताब में एक दृष्टान्त को पढ़कर न जाने क्या हुआ, वापिस घर आ गया। फिर कोशिश की और सफलता की सीढ़ियाँ चढ़कर आज सुखी हूँ। व्यापार बेटों को सौंप कर साहित्य रचता हूँ। शायद इसे पढ़कर कल कोई और मौत के दरवाजे से लौट सके। भोजन छोड़कर आपको आते देख रुक न सका, आप जिनसे मिलाने जा रहे हैं, उन्हीं की पुस्तक ने मुझे नवजीवन दिया।
साहित्यिक सत्र की चर्चा से हो रही खिन्नता यह सुनते ही दूर हो गयी। प्रत्यक्ष को प्रमाण की क्या आवश्यकता? सत्य सामने था कि साहित्य का असर आज भी बरकरार है, इसीलिये आदमी जिंदा है।
***
नवगीत
काम न काज
*
काम न काज
जुबानी खर्चा
नये वर्ष का कोरा पर्चा
*
कल सा सूरज उगे आज भी
झूठा सच को ठगे आज भी
सरहद पर गोलीबारी है
वक्ष रक्त से सने आज भी
किन्तु सियासत कहे करेंगे
अब हम प्रेम
भाव की अर्चा
*
अपना खून खून है भैया
औरों का पानी रे दैया!
दल दलबंदी के मारे हैं
डूबे लोकतंत्र की नैया
लिये ले रहा जान प्रशासन
संसद करती
केवल चर्चा
*
मत रोओ, तस्वीर बदल दो
पैर तले दुःख-पीर मसल दो
कृत्रिम संवेदन नेता के
लौटा, थोड़ी सीख असल दो
सरकारों पर निर्भर मत हो
पायें आम से
खास अनर्चा
३१-१२-२०१५
***
गीत
चलो हम सूरज उगायें
आचार्य संजीव 'सलिल'
चलो! हम सूरज उगायें...
सघन तम से क्यों डरें हम?
भीत होकर क्यों मरें हम?
मरुस्थल भी जी उठेंगे-
हरितिमा मिल हम उगायें....
विमल जल की सुनें कल-कल।
भुला दें स्वार्थों की किल-किल।
सत्य-शिव-सुंदर रचें हम-
सभी सब के काम आयें...
लाये क्या?, ले जायेंगे क्या?,
किसी के मन भाएंगे क्या?
सोच यह जीवन जियें हम।
हाथ-हाथों से मिलायें...
आत्म में विश्वात्म देखें।
हर जगह परमात्म लेखें।
छिपा है कंकर में शंकर।
देख हम मस्तक नवायें...
तिमिर में दीपक बनेंगे।
शून्य में भी सुनेंगे।
नाद अनहद गूँजता जो
सुन 'सलिल' सबको सुनायें...
***
नवगीत:
.
कुण्डी खटकी
उठ खोल द्वार
है नया साल
कर द्वारचार
.
छोडो खटिया
कोशिश बिटिया
थोड़ा तो खुद को
लो सँवार
.
श्रम साला
करता अगवानी
मुस्का चहरे पर
ला निखार
.
पग द्वय बाबुल
मंज़िल मैया
देते आशिष
पल-पल हजार
***
नवगीत:
नए साल
मत हिचक
बता दे क्या होगा?
.
सियासती गुटबाजी
क्या रंग लाएगी?
'देश एक' की नीति
कभी फल पायेगी?
धारा तीन सौ सत्तर
बनी रहेगी क्या?
गयी हटायी
तो क्या
घटनाक्रम होगा?
.
काशी, मथुरा, अवध
विवाद मिटेंगे क्या?
नक्सलवादी
तज विद्रोह
हटेंगे क्या?
पूर्वांचल में
अमन-चैन का
क्या होगा?
.
धर्म भाव
कर्तव्य कभी
बन पायेगा?
मानवता की
मानव जय
गुंजायेगा?
मंगल छू
भू के मंगल
का क्या होगा?
*
***
दोहा सलिला :
भवन माहात्म्य
*
[इंस्टिट्यूशन ऑफ़ इंजीनियर्स, लोकल सेंटर जबलपुर द्वारा गगनचुम्बी भवन (हाई राइज बिल्डिंग) पर १०-११ अगस्त २०१३ को आयोजित अखिल भारतीय संगोष्ठी की स्मारिका में प्रकाशित कुछ दोहे।]
*
भवन मनुज की सभ्यता, ईश्वर का वरदान।
रहना चाहें भवन में, भू पर आ भगवान।१।
*
भवन बिना हो जिंदगी, आवारा-असहाय।
अपने सपने ज्यों 'सलिल', हों अनाथ-निरुपाय।२।
*
मन से मन जोड़े भवन, दो हों मिलकर एक।
सब सपने साकार हों, खुशियाँ मिलें अनेक।३।
*
भवन बचाते ज़िन्दगी, सड़क जोड़ती देश।
पुल बिछुडों को मिलाते, तरु दें वायु हमेश।४।
*
राष्ट्रीय संपत्ति पुल, सड़क इमारत वृक्ष।
बना करें रक्षा सदा, अभियंतागण दक्ष।५।
*
भवन सड़क पुल रच बना, आदम जब इंसान।
करें देव-दानव तभी, मानव का गुणगान।६।
*
कंकर को शंकर करें, अभियंता दिन-रात।
तभी तिमिर का अंत हो, उगे नवल प्रभात७।
*
भवन सड़क पुल से बने, देश सुखी संपन्न।
भवन सेतु पथ के बिना, होता देश विपन्न।८।
*
इमारतों की सुदृढ़ता, फूंके उनमें जान।
देश सुखी-संपन्न हो, बढ़े विश्व में शान।९।
*
भारत का नव तीर्थ है, हर सुदृढ़ निर्माण।
स्वेद परिश्रम फूँकता, निर्माणों में प्राण।१०।
*
अभियंता तकनीक से, करते नव निर्माण।
होता है जीवंत तब, बिना प्राण पाषाण।११।
*
भवन सड़क पुल ही रखें, राष्ट्र-प्रगति की नींव।
सेतु बना- तब पा सके, सीता करुणासींव।१२।
*
करे इमारत को सुदृढ़, शिल्प-ज्ञान-तकनीक।
लगन-परिश्रम से बने, बीहड़ में भी लीक।१३।
*
करें कल्पना शून्य में, पहले फिर साकार।
आंकें रूप अरूप में, यंत्री दे आकार।१४।
*
सिर्फ लक्ष्य पर ही रखें, हर पल अपनी दृष्टि।
अभियंता-मजदूर मिल, रचें नयी नित सृष्टि।१५।
*
सडक देश की धड़कनें, भवन ह्रदय पुल पैर।
वृक्ष श्वास-प्रश्वास दें, कर जीवन निर्वैर।१६।
*
भवन सेतु पथ से मिले, जीवन में सुख-चैन।
इनकी रक्षा कीजिए, सब मिलकर दिन-रैन।१७।
*
काँच न तोड़ें भवन के, मत खुरचें दीवार।
याद रखें हैं भवन ही, जीवन के आगार।१८।
*
भवन न गन्दा हो 'सलिल', सब मिल रखें खयाल।
कचरा तुरत हटाइए, गर दे कोई डाल।१९।
*
भवनों के चहुँ और हों, ऊँची वृक्ष-कतार।
शुद्ध वायु आरोग्य दे, पायें ख़ुशी अपार।२०।
*
कंकर से शंकर गढ़े, शिल्प ज्ञान तकनीक।
भवन गगनचुम्बी बनें, गढ़ सुखप्रद नव लीक।२१।
*
वहीं गढ़ें अट्टालिका जहाँ भूमि मजबूत।
जन-जीवन हो सुरक्षित, खुशियाँ मिलें अकूत।२२।
*
ऊँचे भवनों में रखें, ऊँचा 'सलिल' चरित्र।
रहें प्रकृति के मित्र बन, जीवन रहे पवित्र।२३।
*
रूपांकन हो भवन का, प्रकृति के अनुसार।
अनुकूलन हो ताप का, मौसम के अनुसार।२४।
*
वायु-प्रवाह बना रहे, ऊर्जा पायें प्राण।
भवन-वास्तु शुभ कर सके, मानव को सम्प्राण।२५।
***
चित्रगुप्त वंदना:
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
हे चित्रगुप्त भगवान आपकी जय-जय
हे परमेश्वर मतिमान आपकी जय-जय
हे अक्षर अजर अमर अविनाशी अक्षय
हे अजित अमित गुणवान आपकी जय-जय
हे तमहर शुभकर विधि-हरि-हर के स्वामी
हे आत्मा-प्राण निधान आपकी जय-जय
हे चारु ललित शालीन सौम्य शुचि सुंदर
हे अविकारी संप्राण आपकी जय-जय
हे चिंतन मनन सृजन रचना वरदानी
हे सृजनधर्मिता-खान आपकी जय-जय
बेटे को कहती बाप बाप का दुनिया
विधि-पिता ब्रम्ह संतान आपकी जय-जय
विधि-हरि-हर को प्रगटाकर, विधि से प्रगटे
दिन संध्या निशा विहान आपकी जय-जय
सत-शिव-सुंदर सत-चित-आनंद हो देवा
श्री क्ली ह्री कीर्तिवितान आपकी जय-जय
तुम कारण-कार्य तुम्हीं परिणाम अनामी
हे शून्य सनातन गान आपकी जय-जय
सब कुछ तुमसे सब कुछ तुममें अविनाशी
हे कण-कण के भगवान आपकी जय-जय
हे काया-माया-छाया-पति परमेश्वर
हे सृष्टि-सृजन अभियान आपकी जय-जय
३१-१२-२०१४
***
नवगीत:
.
बहुत-बहुत आभार तुम्हारा
ओ जाते मेहमान!
.
पल-पल तुमने
साथ निभाया
कभी रुलाया
कभी हँसाया
फिसल गिरे, आ तुरत उठाया
पीठ ठोंक
उत्साह बढ़ाया
दूर किया हँस कष्ट हमारा
मुरझाते मेहमान
.
भूल न तुमको
पायेंगे हम
गीत तुम्हारे
गायेंगे हम
सच्ची बोलो कभी तुम्हें भी
याद तनिक क्या
आयेंगे हम?
याद मधुर बन, बनो सहारा
मुस्काते मेहमान
.
तुम समिधा हो
काल यज्ञ की
तुम ही थाती
हो भविष्य की
तुमसे लेकर सतत प्रेरणा
मन:स्थिति गढ़
हम हविष्य की
'सलिल' करेंगे नहीं किनारा
मनभाते मेहमान
३१-१२-२०१४
***
हाइकु गीत:
रूप अपना
*
रूप अपना / सराहती रही है / रूपसी आप
किसे बताये / प्रिय के नयनों में / गयी है व्याप...
*
है विधु लता / सी चंचल-चपल / अल्हड कौन
बोले अबोले / दे निशा निमंत्रण / प्रिय को मौन
नेह नर्मदा / ले रही हिलोरें ज्यों / मन्त्र का जाप...
*
कुसुम कली / किरण की कोर सी / है मुस्कुराई
आशा-आकांक्षा / मन में बसी पर / हाथ न आई
धर अधर / अधर में, अधर / अंकित छाप...
*
जीभ चिढ़ाये / नवोढ़ा सी लजाये / ठेंगा दिखाये
हरेक पल / समुद से सलिला / दूरी मिटाये
अरूणाभित / सिन्दूरी कपोलों को / छिपाये काँप...
*
अमराई में / कूकती कोकिला सी / देती आनंद
मठा-महेरी / पुरवैया-पछुआ / साँसों के छंद
समय देव ! / मनौती, नहीं देना / विरह शाप...
*
राग-रागिनी / सुर-सरगम सा / अटूट नाता
कभी न टूटे / हे सत्य नारायण! / भाग्य विधाता!!
हे नये वर्ष! / मिले अनंत हर्ष / रहें निष्पाप...
३१-१२-२०१३
***
व्यंग्य रचना:
हो गया इंसां कमीना...
*
गली थी सुनसान, कुतिया एक थी जाती अकेली.
दिखे कुछ कुत्ते, सहम संकुचा रही थी वह नवेली..
कहा कुत्तों ने: 'न डरिए, श्वान हैं इंसां नहीं हम.
आँच इज्जत पर न आएगी, भरोसा रखें मैडम..
जाइए चाहे जहाँ सर उठा, है खतरा न कोई.
आदमी से दूर रहिए, शराफत उसने है खोई..'
कहा कुतिया ने:'करें हड़ताल लेकर एक नारा.
आदमी खुद को कहे कुत्ता नहीं हमको गवारा..'
'ठीक कहती हो बहिन तुम, जानवर कुछ तुरत बोले.
माँग हो अब जानवर खुद को नहीं इंसां बोले.
थे सभी सहमत, न अब इन्सान को मुँह लगाएँगे.
आदमी लुच्चा कमीना 'बचो' सब को बताएँगे..
***
नए वर्ष का गीत:
झाँक रही है...
*
झाँक रही है
खोल झरोखा
नए वर्ष में धूप सुबह की...
*
चुन-चुन करती चिड़ियों के संग
कमरे में आ.
बिन बोले बोले मुझसे
उठ! गीत गुनगुना.
सपने देखे बहुत, करे
साकार न क्यों तू?
मुश्किल से मत डर, ले
उनको बना झुनझुना.
आँक रही
अल्पना कल्पना
नए वर्ष में धूप सुबह की...
*
कॉफ़ी का प्याला थामे
अखबार आज का.
अधिक मूल से मोह पीला
क्यों कहो ब्याज का?
लिए बांह में बांह
डाह तज, छह पल रही-
कशिश न कोशिश की कम हो
है सबक आज का.
टाँक रही है
अपने सपने
नए वर्ष में धूप सुबह की...
***
नया वर्ष
हम नया वर्ष जरूर मनाएंगे
दामिनी के आंसुओं, चीखों और कराहों को
याद करने के लिए
और यह संकल्प करने के लिए
कि हम अपनी ज़िंदगी में
किसी नारी का अपमान नहीं करेंगे
अपने बच्चों को ऐसे संस्कार देंगे
कि वह नारी को सिर्फ भोग्या न माने।
हम अपने शहर के हर थाने में
नारी का सम्मान करने और
तत्काल ऍफ़. आई. आर.दर्ज करने
सम्ब्नाधी पोस्टर चिपकाएँ।
सरकार से मांग करें कि
पुलिस विभाग को
अपराध-संख्या बढ़ने पर
दण्डित न किया जाए क्योंकि
संख्या घटने के लिए ही
अपराध दर्ज नहीं किये जाते।
हम एक दिन ही नहीं हर दिन
दामिनी वर्ष मनाएं।
नारी सम्मान की अलख जलाएं
३१-१२-२०१२
***
नव वर्ष पर नवगीत:
महाकाल के महाग्रंथ का
महाकाल के महाग्रंथ का
नया पृष्ठ फिर आज खुल रहा....
*
वह काटोगे,
जो बोया है.
वह पाओगे,
जो खोया है.
सत्य-असत, शुभ-अशुभ तुला पर
कर्म-मर्म सब आज तुल रहा....
*
खुद अपना
मूल्यांकन कर लो.
निज मन का
छायांकन कर लो.
तम-उजास को जोड़ सके जो
कहीं बनाया कोई पुल रहा?...
*
तुमने कितने
बाग़ लगाये?
श्रम-सीकर
कब-कहाँ बहाए?
स्नेह-सलिल कब सींचा?
बगिया में आभारी कौन गुल रहा?...
*
स्नेह-साधना करी
'सलिल' कब.
दीन-हीन में
दिखे कभी रब?
चित्रगुप्त की कर्म-तुला पर
खरा कौन सा कर्म तुल रहा?...
*
खाली हाथ?
न रो-पछताओ.
कंकर से
शंकर बन जाओ.
ज़हर पियो, हँस अमृत बाँटो.
देखोगे मन मलिन धुल रहा...
***
नये साल का गीत
*
कुछ ऐसा हो साल नया,
जैसा अब तक नहीं हुआ.
अमराई में मैना संग
झूमे-गाये फाग सुआ...
*
बम्बुलिया की छेड़े तान.
रात-रातभर जाग किसान.
कोई खेत न उजड़ा हो-
सूना मिले न कोई मचान.
प्यासा खुसरो रहे नहीं
गैल-गैल में मिले कुआ...
*
पनघट पर पैंजनी बजे,
बीर दिखे, भौजाई लजे.
चौपालों पर झाँझ बजा-
दास कबीरा राम भजे.
तजें सियासत राम-रहीम
देख न देखें कोई खुआ...
स्वर्ग करे भू का गुणगान.
मनुज देव से अधिक महान.
रसनिधि पा रसलीन 'सलिल'
हो अपना यह हिंदुस्तान.
हर दिल हो रसखान रहे
हरेक हाथ में मालपुआ...
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दोहा सलिला
सुबह बिना नागा उगे, सूर्य ढले हर शाम।
यत्न सतत करते रहें, बिना रुके निष्काम।।
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अंतिम पल तक तिमिर से, दिया न माने हार।
'सलिल' न कोशिश तज कभी, करो हार जयहार।।
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संयम तज मत बजाएँ, मीत कभी भी गाल।
बन संतोषी हो सुखी, उन्नत रखकर भाल।।
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ढाई आखर सीखकर, वर अद्वैत तज द्वैत।
मैं-तुम मिल हम हो सकें, जब जब खेलें बैत।।
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गए हार कर जीत हम, ऐसा हुआ कमाल।
गए जीत कर हार भी, अद्भुत है नव साल।।
३१-१२-२०१०

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