बुधवार, 24 जनवरी 2018

शिव दोहावली

शिव हैं शून्य-अनंत भी,
निर्विकार-सविकार।
शिव-पिण्डी का सत् समझ,
कर भवसागर पार।।
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दारुल वन में ऋषि-मुनि,
बसे सहित परिवार।
काल कल्प वाराह था,
करती उषा विहार।।
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वन-विचरण कर ला रहे,
कुश फल समिधा संत।
हो प्रवृत्तिकामी करें,
संचय व्यर्थ न तंत।।
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मार्ग निवृत्ति का दिखाएं,
हर ने किया विचार।
रूप दिगंबर मनोहर,
ले वन-करें विहार।।
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नील वर्ण, रक्ताभ दृग,
भुज विशाल, सिंह-चाल।
जटा बिखर नर्तन करें,
चंदन चर्चित भाल।।
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झूल रहे थे कण्ठ में,
नग-रुद्राक्ष अपार।
कामदेव को लजाता,
पुरुष लावण्य निहार।।
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मुग्ध हुईं ऋषि पत्नियां,
मन में उठा विकार।
काश! पधारे युवा ऋषि,
स्वीकारे सत्कार।।
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शिव मुस्कराए देखकर,
मिटा न मोह-विका
रहे विचरते निरंतर,
उच्चारें ओंकार।।
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संयम तज ऋषि पत्नियां,
छूतीं बाहु विशाल।
कुछ संग-संग नर्तन करें,
देख तरुण पग-ताल।।
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समझ अरुंधति गईं सच,
करती रहीं निषेध।
रुकी नहीं ऋषि पत्नियां,
दिया काम ने वेध।।
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शिव निस्पृह चुप घूमते,
कब लौटें‌, ऋषि-संत।
समझें ‌सत्य निवृत्ति का,
तजें ‌प्रवृत्ति अतंत।।
*
क्रमशः
२४.१.२०१८, जबलपुर

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