बचपन के दिन
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फिर याद आ गया, मुझे, बचपन का, जमाना,, वो मस्त जिंदगी थी सफर था वो सुहाना*
बचपन की सुनहरी यादों को लिपिबद्ध करने में स्वयं बचपन की देहरी ,आंगन बगिया ,खेल पढ़ाई सभी एक साथ मन: पटल पर टकराने लगे, कहां से आरंभ करें ,यादों की बाढ़ में सबसे पहले,,, बाबूजी जो सामने खड़े हैं, और मुझे 'मेरी जुगनू' कह कर बुला रहे है।
मैं कूदती फांदती उनकी गोद में जा बैठती,, अम्मा जब पान बना कर कहतीं, बाबूजी को देकर आओ, तब तो मुझे बहुत दुलारते,, क्योंकि मैं सभी भाई बहनों में छोटी थी। मेरे बाद मेरी छोटी बहन और, मुझमें 5 वर्ष का अंतर है । उनके दुलार की मिठास अभी भी याद करने पर, मुझे वही बचपन में ला खड़ा करता है।
हमारे घर से पाठशाला की दूरी करीब 1 किलोमीटर थी, पैदल ही बस्ता लेकर जाना होता था ।सरकारी स्कूलों में जमीन में टाट पट्टी पर बैठकर, बाल भारती, पाठ्य पुस्तक की कविताएं, और पहाड़े जोर-जोर से बोल कर याद करते थे।
सबसे अधिक मनोरंजक मजेदार पढ़ाई का आखिरी घंटा लगता था, जिसमें तरह-तरह खेल, खो-खो अंताक्षरी हुआ करते थे।
घर से गरम खाने का टिफिन ठीक 2:00 बजे मध्यान्ह में खाने की छुट्टी आता था,, खाना खाने के बाद भी 10 पैसे के चने, मुरमुरे या मिर्च का भजिया जरूरी होता था।
स्कूल से वापस लौटने में भी जल्दी-जल्दी पैदल चलने की होड़ होती,, घर पहले कौन पहुंचेगा , कभी-कभी इसी बात पर शर्त लग जाती थी,, सामने वाले पेड़ को पहले जाकर कौन छूएगा।
पढ़ाई लालटेन की रोशनी में होती थी,,, जमीन पर दरी बिछाकर लिखने पढ़ने में कोई असुविधा नहीं महसूस होतीथी।
प्राकृतिक सौंदर्य से घिरा हुआ गांव,, जहां आम के बड़े बगीचे,खलिहान
और खलिहान में एक झोपड़ी ,जहां एक खटिया और कुर्सी, पानी की मटकी
रखी रहती थी, रविवार के दोपहर को दो-तीनघंटे खलिहान में जाना पड़ता था। वहां खेतीहर मजदूर अपना भोजन बनाते, चावल (भात)और सिलबट्टे की चटनी,,
हम लोग कभी-कभी उसका भी स्वाद लिया करते थे। ,,, कभी-कभी पत्ते में चावल का आटा लपेटकर रोटी बनाई जाती थी, जिसे पनपूर्वा रोटी कहते हैं,, अंगार में सिकने के कारण उसका स्वाद , सोंधापन और मिठास जो व्यक्त नहीं किया जा सकता। खाने काआनंद लेते थे।
घर पर बैलगाड़ी थी, कभी-कभी हम मेला देखने या, शहर बैलगाड़ी में जाया करते थे,, गाड़ी में दरी गद्दा चादर बिछाकर गाड़ीसजाई जाती थी,, कभी-कभी गाड़ी वाहक के बगल में बैठकर बैलगाड़ी चलाया करतेथे।
बैलों के गले में बंधी रस्सी कुछ संभाल लेते थे।
गर्मी की छुट्टियों में आम के बगीचे में ,रखवाली को जाते वही ढेर सारे ,आम चूसने वाले बाल्टी में पानी भरकर डुबो दिए जाते थे, और वे बेहिसाब खाया करते थे।
आज भी सपने में वही घर आता है , जहां बचपन बीता
बड़े-बड़े बरामदे बड़ा सा आंगन ,भंडार गृह, तुलसी चौरा, गौशाला कुआं बहुत बड़ी बगिया फूलों वाली, हुआ करती थी ।घर के आगे पीछे,, आम ,जामुन, अनार करौंदे, सीताफल, आंवला अमरूद,, सब फल लगते,,
खुद पेड़ पर चढ़कर तोड़कर खाया करते थे।
घर के पीछे तरफ एक
सब्जियों की अलग बाड़ी थी,
इसमें टमाटर, धनिया, पालक, मेथी मटर बैंगन सेम, चने की भाजी, सभी कुछ लगाई जाती और ताजी-ताजी थोड़ी भी जाती थी। खेत में कभी-कभी गन्ना आलू और शकरकंद, लगाया जाता ,,जिसके लगाने की विधि भी बिल्कुल अलग है,,
अभी भी वह बावली कुंआ,
वहां बगीचे में नमी बनी रहती थी। सीताफल के मौसम में कच्चे सीताफल तोड़कर टोकनी में ,पैरा डालकर पकाए जाते थे सुबह उठकर पहले काम था ,कि देखें, किसके कितने सीताफल पक गए,, टोकनी रखने के भी अलग-अलग ठिकाने थे।
नित्य खाना चूल्हे की आज परिपकता था दूध मिट्टी की मटकी में ही पका था दही भी मटकी में ही जमता था,, दही रबड़ी मलाई सब स्वास्थ्य वर्धक और अमृतमय था,,,
शुद्ध शाकाहारी सात्विक भोजन दोनों समय गरम बनता था,, और हम क्या पूरा परिवार स्वस्थ और निरोग रहता था।
थोड़े बहुत सर्दी बुखार में अदरक शहद अदरक का रस ही काफी होता था। चोट में हल्दी प्याज का लेप लगा दिया जाता था।
आंगन के बीचो-बीच तुलसी चौरा था या अम्मा दादी शंकर जी को जल चढ़ाया करती थी और बगिया के फूल चढ़ाकर शिव चालीसा पढ़ती थी जो, सुन सुनकर हम सभी भाई बहनों को आज भी याद है।
सांध्य प्रार्थना तुलसी जी के सामने लाइन से खड़े होकर सब भाई बहन करते,,
""हे प्रभु आनंद दाता ज्ञान हमको दीजिए,, शीघ्र सारे दुर्गुणों को, दूर हमसे कीजिए लीजिए हमको शरण में ,हम सदाचारी बने, सत्य बोले झूठ त्यागे ,प्रेम आपस में करें, निंदा किसी की हम किसी से भूल कर भी ना करें, सत्य बोले झूठ त्यागे मेल आपस में रखें,
हे प्रभु आनंद दाता ज्ञान हमको दीजिए,
***,
प्रार्थना के पश्चात सभी बड़े छोटे एक दूसरे को अभिवादन करते।
बाबा दादी को कुछ विशेष दिनों में ,,जैसे राम जन्म में रामायण बालकांड निकालकर पढ़कर सुनाना ,शिवरात्रि के दिन शिव विवाह जरूर सुनाते थे ,राधे श्याम पढ़ते , पढ़ कर सुनाते थे,, रामायण के दोहा, चौपाई और छंद की लय बाबा से सीखी कैसे गाया जाता है,,
बाबा खुद हमारे साथ गाते थे । संध्या समय लालटेन की बत्ती कांच सब साफ करना,
बिस्तर लगाना ,मच्छरदानी लगाना सभी के काम बटे हुए थे,,, हम सब अपने अपने काम यथासमय कर लेते थे।
बचपन के दिनों को मैंने गीत माला में पिरोया है,,,
बचपन के दिन,,
फिर याद आ गया मुझे बचपन का जमाना,, वो मस्त जिंदगी थी,, सफर था वो सुहाना,,,,
१) खुद आम और अमरुद जामुन तोड़कर खाना,,आमों के बागानों में रखवाली को जाना,, चूल्हे की आंच में सुबह चिले का बनाना
***
फिर याद आ गया
वह पटियों से बने झूले में झूला झूलना,,, वो बहनों को बिठाकर रोज साइकिल चलाना,, कभी भूल ना पाएंगे खो-खो का खेलना
फिर याद आ गया
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३) राखी और भाई दूज में पकवान बनाना,, वो रुमाल काढना और उन्हें ,,भेंट में देना,, मधुर याद को, रेशमीं रिश्तो में पिरोना,,
फिर याद आ गया
***
मन करता है बच्चों के साथ बचपन को जी लूं,,
संध्या के मंत्र, और आरती गालूं,,, अम्मा के जैसे बच्चों को सांचे में ढांलना
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जीवन के खट्टे मीठे वादों को चख लिया,, कृष्णा की रहमतों से सब कुछ अदा हुआ,,,,
तेरी शरण हो कृष्णा मुझे पार लगाना तुम भूल न जाना करना ना बहाना,,,
वो मस्त जिंदगी थी सफर था वो सुहाना,,, फिर याद आ गया मुझे बचपन का जमाना,, वो मस्त जिंदगी थी सफर था वो सुहाना
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बचपन के मधुर संस्मरणों के साथ आगे,,,
वहां बगीचे में नमी बनी रहती थी। सीताफल के मौसम में कच्चे सीताफल तोड़कर टोकनी में ,पैरा डालकर पकाए जाते थे सुबह उठकर पहले काम था ,कि देखें, किसके कितने सीताफल पक गए,, टोकनी रखने के भी अलग-अलग ठिकाने थे।
नित्य खाना चूल्हे की आज पर पकता था, दूध मिट्टी की मटकी में ही पकता था दही, भी, मटकी में ही जमता था,, दही रबड़ी मलाई सब स्वास्थ्य वर्धक और अमृतमय होता था,,,
शुद्ध शाकाहारी सात्विक भोजन दोनों समय गरम बनता था,, और हम क्या पूरा परिवार स्वस्थ और निरोग रहता था।
थोड़े बहुत सर्दी बुखार में अदरक शहद अदरक का रस ही काफी होता था। चोट में हल्दी प्याज का लेप लगा दिया जाता था।
आंगन के बीचो-बीच तुलसी चौरा था । अम्मा दादी शंकर जी को जल चढ़ाया करती थी ,और बगिया के फूल चढ़ाकर शिव चालीसा पढ़ती थी जो, सुन सुनकर हम सभी भाई बहनों को आज भी याद है।
सांध्य प्रार्थना तुलसी जी के सामने लाइन से खड़े होकर सब भाई बहन करते,,
""हे प्रभु आनंद दाता ज्ञान हमको दीजिए,, शीघ्र सारे दुर्गुणों को, दूर हमसे कीजिए लीजिए हमको शरण में ,हम सदाचारी बने, सत्य बोले झूठ त्यागे ,प्रेम आपस में करें, निंदा किसी की हम किसी से भूल कर भी ना करें, सत्य बोले झूठ त्यागे मेल आपस में रखें,
हे प्रभु आनंद दाता ज्ञान हमको दीजिए,
***,
प्रार्थना के पश्चात सभी बड़े छोटे एक दूसरे को अभिवादन करते।
बाबा दादी को कुछ विशेष दिनों में जैसे राम जन्म में रामायण बालकांड निकालकर पढ़कर सुनाना शिवरात्रि के दिन शिव विवाह जरूर सुनाते थे ,राधे श्याम पढ़ते , पढ़ कर सुनाते थे,, रामायण के दोहा, चौपाई और छंद की लय बाबा से सीखी कैसे गाया जाता है,,
बाबा खुद हमारे साथ गाते थे । संध्या समय लालटेन की बत्ती कांच सब साफ करना,
बिस्तर लगाना ,मच्छरदानी लगाना सभी के काम बटे हुए थे,,, हम सब अपने अपने काम यथासमय कर लेते थे।
बचपन में त्योहारों की अलग ही मस्ती होती थी ।प्रिय त्योहारों में राखी और दीपावली हुआ करती थी ,राखी में हमारा और हमारी बूआ का परिवार , हम साथ-साथ मनाते थे, राखी में भाइयों को हाथ की कड़ाई से बना रुमाल अवश्य भेंट करते थे,,
बुआ के बेटे और हम सब हम उम्र हुआ करते थे ,उन त्योहारों का आनंद आज भी मन को राखी उत्सव के उमंगो से भर देता है।
दूसरे दिन कजलिया विसर्जन में भी बाजे गाजे के साथ बड़े उत्साह से भजन गीत गाते विसर्जित किया जाता था।
दीपावली आई तो नए कपड़ों के साथ-साथ सबके बैग भी अलग-अलग होते। बैगों में पटाखे रखे जाते और पटाखे गिनती से बांटे जातेथे।
इसी तरह त्योहारों में होली का भी अलग आनंद होता ठंडाई घर पर बनती और बाहर चबूतरे में फाग गाया जाता,, फाग में हमारे बाबा की बढ़-चढ़कर हिस्सेदारी होती थी।
गुझिया पपड़िया की मात्रा इतनी होती थी, कि एक सप्ताह तक हम वही खाते थे।
तीज पर्व का तो मतलब ही रात जागरण और फुलेहरा से होता था,, रात में ही फुलेहरा विसर्जन की योजना बना ली जाती नदी में स्नान,, करना उत्सव जैसा होता रात में ही कपड़ों की तैयारी हो जाती थी।
बचपन में अम्मा बाबूजी का अनुशासन मार्गदर्शन और मितव्ययिता, संस्कार, जीवन के हर उतार-चढ़ाव में जूझने की शक्ति देता है।
सच्चाई सन्मार्ग ,सादगी जैसे देवीय गुण कूट-कूट कर बचपन में ही भर दिए गए।
आज भी उन्हें संस्कारों पर चलकर सत्य मार्ग अपनाना और किसी विशेष परिस्थितियों में अपने संस्कारी फैसलों पर अडिग रहकर सुकून, संतुष्टि और शांति से जीवन जीना सिखाता है।
चलिए मैं बचपन की उन यादगार लम्हों से परिचित कराती हूं,, जहां बहुत कड़ाई से,, अम्मा अपनी आदेशों का पालन करवाती थी।
स्कूल का कोई भी सबक याद ना हो ,धूप में खड़ा कर देती थी,, जो सबक दिए गए हैं वह याद कर सुनाते थे, भाई बहन एक दूसरे को भी सुनाते थे, पर अम्मा को जानकारी रहती थी, कि हमें याद हुआ या नहीं।
घर में कपड़ों की दो दुकान थी एक खुले कपड़ों की और दूसरी रेडीमेड वस्त्रों की,,,
कुछ कपड़े घर पर सिलाई के लिए आते थे,, जिन्हें अम्मा सिलाई कर दी थी,,, मेरे संस्मरण में वह वाक्या आज भी कौंधता,, है ,जब मैंने कपड़ा काट कर झूठ कहा कि मैंने ,कपड़े नहीं काटे हैं।
तब अम्मा ने झूठ बोलने पर घर से बाहर कर दिया ,जब तक मैंने अपनी गलती नहीं मान ली ,, तब तकअम्मा ने घर के अंदर आने नहीं दिया,
बाल मां पर सच्चाई की बीज बोने वाली अम्मा की नई इतनी गहरी है कि कितनी भी आंच आ जाए,, सत्य का मार्ग नहीं छोड़ना,, सन्मार्ग पर ही शांति सफलता और संतुष्टि मिलती है यही संस्कार मिले।
हर सप्ताह बाबूजी पेशी लेते थे, उनको अपने काम का व्योरा देना पड़ता था। दंड और इनाम दोनों मिलता था।
कपड़े की दुकान में दोनों बड़े भैया संभालते थे,, भैया के बाहर जाने पर, हमें दुकान संभालने की जवाबदारी होती थी,,, बही खाते में उधारी वसूली लिखना सीखा।
दुकान में अखबार के अलावा पत्र पत्रिकाएं भी आते जिसमें धर्म योग अखंड ज्योति कल्याण माधुरी फिल्मी कलियां सब होता,,
फिल्मी पत्रिका देखते हुए बाबूजी की नजर पड़ गई ,तो किसी कर्मचारी के हाथ कहला भेजा कि उससे बोलो अखंड ज्योति पढ़ेगी ।फिल्मी पत्रिकाएं पढ़ना सख्त मना था। फिल्में देखने की मनाही थी ,चाहे वह देशभक्ति वाली हो या धार्मिक हो ।
हर शनिवार को बसना में हाट लगता है,, कपड़ों की सीमित दुकान होने की वजह से हमारा कपड़ों , का काम बहुत अच्छे से चलता था।
हर रविवार की सुबह पैसे गिनने का काम,,, के साथ-साथ₹१०, रुपए ५ रुपए और१०० रुपए के नोट के अलग-अलग बंडल बनाकर एक पर्ची में लिखकर तिजोरी में रख दिया जाता था।
इसी तरह पढ़ाई के साथ बचपन के स्मरणीय पलआज भी याद करने पर ताजे हो जाते हैं,, मधुर यादों के साथ प्रसन्नता ,खुशी भी दे जाते हैं।
सरला वर्मा 'शील'
भोपाल २०२५