सोमवार, 31 अक्तूबर 2016

doha

दोहा की दीपावली 
*
दोहा की दीपावली, तेरह-ग्यारह दीप 
बाल 'सलिल' के साथ मिल, मन हो तभी समीप 

गो-वर्धन गोपाल बन, करें शुद्ध पय-पान
अन्न-कूट कर पकाकर, खाएँ हो श्री-वान
*
जो अव्यक्त है उसी को, व्यक्त करे हर पर्व
जुड़ औरों की म्द्द्कर, करिए खुद पर गर्व
*
शांत न रहिए शांत अब, है समाज दिग्भ्रांत
कूड़ा फैला पर्व पर, गर्व करे संभ्रांत
*
श्री वास्तव में पा सकें, तब जब बाँटें प्रीत
गुण पूजन की बढ़ सके, 'सलिल' जगत में रीत
*
बहिना का आशीष ही, भाई की तकदीर
शुभाशीष पा बहिन का, भाई होता वीर
*
मंजु मूर्ति श्री लक्ष्मी, महिमावान गणेश
सदा सदय हों नित मिले, कीर्ति -समृद्धि अशेष
*
दीप-कांति उजियार दे, जीवन भरे प्रकाश
वामन-पग भी छू सकें, हाथ उठा आकाश
*
दूरभाष चलभाष हो, या सम्मुख संवाद
भाष सुभाष सदा करे, स्नेह-जगत आबाद
*
अमन-चैन रख सलामत, निभा रहे कुछ फर्ज़
शेष तोड़ते हैं नियम, लाइलाज यह मर्ज़
*
लागू कर पायें नियम, भेदभाव बिन मित्र!
तब यह निश्चय मानिए, बदल सकेगा चित्र
*
शशि तम हर उजियार दे, भू को रहकर मौन
कर्मव्रती ऐसा कहाँ, अन्य बताये कौन?
*
यथातथ्य बतला सके, संजय जैसी दृष्टि
कर सच को स्वीकार-बढ़, करे सुखों की वृष्टि
*
खुद से आँख मिला सके, जो वह है रणवीर
तम को आँख दिखा सके, रख दीपक सम धीर
*
शक-सेना को जीत ले, जिसका दृढ़ विश्वास
उसकी आभा अपरिमित, जग में भरे उजास
*
वर्मा वह जो सच बचा लें, करे असत का नाश
तभी असत के तिमिर का, होगा 'सलिल' विनाश
*
हर रजनी दीपावली, अगर कृपालु महेश
हर दिन को होली करें, प्रमुदित उमा-उमेश
*
आशा जिसके साथ हो, होता वही अशोक
स्वर्ग-सदृश सुख भोगता, स्वर्ग बने भू लोक
*
श्याम अमावस शुक्ल हो, थाम कांति का हाथ
नत मस्तक करता 'सलिल', नमन जोड़कर हाथ
*
तिमिर अमावस का हरे, शुक्ल करे रह मौन
दींप वंद्य है जगत में, कहें दूसरा कौन?
*
जो चाहें राजेश हों, पहले करे प्रयास
दीप-वर्तिका बन जले, तब हो दीप्त उजास
*

vyangya geet

एक रचना
दीवाली और दीवाला
*
सजनी मना रही दीवाली
पर साजन का दीवाला है
दूने दाम बेच दिन दूना
होता लाला, घोटाला है
*
धन ते रस, बिन धन सब सूना,
निर्धन हर त्यौहार उपासा
नरक चौदहों दिन हैं उसको,
निर्जल व्रत बिन भी है प्यासा
कौन बताये, किससे पूछें?
क्यों ऐसा गड़बड़झाला है?
सजनी मना रही दीवाली
पर साजन का दीवाला है
*
छोड़ विष्णु आयी है लछमी,
रिद्धि-सिद्धि तजकर गणेश भी
एक साथ रह पुजते दोनों
विस्मित चूहा, चुप उलूक भी
शेष करें तो रोक रहा जग
कहता करते मुँह काला है
सजनी मना रही दीवाली
पर साजन का दीवाला है
*
समय न मिलता, भूमि नहीं है
पाले गाय कब-कहाँ बोलो
गोबर धन, गौ-मूत्र कौन ले?
किससे कहें खरीदो-तोलो?
'गो वर धन' बोले मम्मी तो
'जा धन कमा' अर्थ आला है
सजनी मना रही दीवाली
पर साजन का दीवाला है
*
अन्न कूटना अब न सुहाता
ब्रेड-बटर-बिस्कुट भाता है
छप्पन भोग पचायें कैसे?
डॉक्टर डाइट बतलाता है
कैलोरी ज्यादा खाई तो
खतरा भी ज्यादा पाला है
सजनी मना रही दीवाली
पर साजन का दीवाला है
*
भाई दूज का मतलब जानो
दूजा रहे हमेशा भाई
पहला सगा स्वार्थ निज जानो
फिर हैं बच्चे और लुगाई
बुढ़ऊ-डुकरिया से क्या मतलब?
निज कर्तव्य भूल टाला है
सजनी मना रही दीवाली
पर साजन का दीवाला है
*
चित्र गुप्त, मूरत-तस्वीरें
खुद गढ़ पूज रहे हैं लाला
दस सदस्य पर सभा बीस हैं
घर-घर काट-छाँट घोटाला
घरवाली हावी दहेज ला
मन मारे हर घरवाला है
सजनी मना रही दीवाली
पर साजन का दीवाला है
*

gazal

​हिंदी ग़ज़ल -
बहर --- २२-२२ २२-२२ २२२१ १२२२
*
है वह ही सारी दुनिया में, किसको गैर कहूँ बोलो?
औरों के क्यों दोष दिखाऊँ?, मन बोले 'खुद को तोलो'
*
​खोया-पाया, पाया-खोया, कर्म-कथानक अपना है
क्यों चंदा के दाग दिखाते?, मन के दाग प्रथम धो लो
*
जो बोया है काटोगे भी, चाहो या मत चाहो रे!
तम में, गम में, सम जी पाओ, पीड़ा में कुछ सुख घोलो
*
जो होना है वह होगा ही, जग को सत्य नहीं भाता
छोडो भी दुनिया की चिंता, गाँठें निज मन की खोलो
*
राजभवन-शमशान न देखो, पल-पल याद करो उसको
आग लगे बस्ती में चाहे, तुम हो मगन 'सलिल' डोलो
***

doha

दोहा की दीपावली
*
दोहा की दीपावली, तेरह-ग्यारह दीप
बाल 'सलिल' के साथ मिल, मन हो तभी समीप
*
गो-वर्धन गोपाल बन, करें शुद्ध पय-पान
अन्न-कूट कर पकाकर, खाएँ हो श्री-वान
*
जो अव्यक्त है उसी को, व्यक्त करे हर पर्व
जुड़ औरों की म्द्द्कर, करिए खुद पर गर्व
*
शांत न रहिए शांत अब, है समाज दिग्भ्रांत
कूड़ा फैला पर्व पर, गर्व करे संभ्रांत
*
श्री वास्तव में पा सकें, तब जब बाँटें प्रीत
गुण पूजन की बढ़ सके, 'सलिल' जगत में रीत
*
बहिना का आशीष ही, भाई की तकदीर
शुभाशीष पा बहिन का, भाई होता वीर
*
मंजु मूर्ति श्री लक्ष्मी, महिमावान गणेश
सदा सदय हों नित मिले, कीर्ति -समृद्धि अशेष
*
दीप-कांति उजियार दे, जीवन भरे प्रकाश
वामन-पग भी छू सकें, हाथ उठा आकाश
*
दूरभाष चलभाष हो, या सम्मुख संवाद
भाष सुभाष सदा करे, स्नेह-जगत आबाद
*
अमन-चैन रख सलामत, निभा रहे कुछ फर्ज़
शेष तोड़ते हैं नियम, लाइलाज यह मर्ज़
*
लागू कर पायें नियम, भेदभाव बिन मित्र!
तब यह निश्चय मानिए, बदल सकेगा चित्र
*
शशि तम हर उजियार दे, भू को रहकर मौन
कर्मव्रती ऐसा कहाँ, अन्य बताये कौन?
*
यथातथ्य बतला सके, संजय जैसी दृष्टि
कर सच को स्वीकार-बढ़, करे सुखों की वृष्टि
*
खुद से आँख मिला सके, जो वह है रणवीर
तम को आँख दिखा सके, रख दीपक सम धीर
*
शक-सेना को जीत ले, जिसका दृढ़ विश्वास
उसकी आभा अपरिमित, जग में भरे उजास
*
वर्मा वह जो सच बचा लें, करे असत का नाश
तभी असत के तिमिर का, होगा 'सलिल' विनाश
*
हर रजनी दीपावली, अगर कृपालु महेश
हर दिन को होली करें, प्रमुदित उमा-उमेश
*
आशा जिसके साथ हो, होता वही अशोक
स्वर्ग-सदृश सुख भोगता, स्वर्ग बने भू लोक
*
श्याम अमावस शुक्ल हो, थाम कांति का हाथ
नत मस्तक करता 'सलिल', नमन जोड़कर हाथ
*
तिमिर अमावस का हरे, शुक्ल करे रह मौन
दींप वंद्य है जगत में, कहें दूसरा कौन?
*
जो चाहें राजेश हों, पहले करे प्रयास 
दीप-वर्तिका बन जले, तब हो दीप्त उजास
*

शनिवार, 29 अक्तूबर 2016

दिव्य नर्मदा हिंदी पत्रिका divyanarmada Hindi patrika : geet

दिव्य नर्मदा हिंदी पत्रिका divyanarmada Hindi patrika : geet: दीपमालिके  !       दीपमालिके! दीप बाल के बैठे हैं हम आ भी जाओ अब तक जो बीता सो बीता कलश भरा कम, ज्यादा रीता जिसने बोया...

muktak

मुक्तक 
*
स्नेह का उपहार तो अनमोल है
कौन श्रद्धा-मान सकता तौल है? 
भोग प्रभु भी आपसे ही पा रहे
रूप चौदस भावना का घोल है
*
स्नेह पल-पल है लुटाया आपने।
स्नेह को जाएँ कभी मत मापने
सही है मन समंदर है भाव का
इष्ट को भी है झुकाया भाव ने
*
फूल अंग्रेजी का मैं,यह जानता
फूल हिंदी की कदर पहचानता
इसलिए कलियाँ खिलता बाग़ में
सुरभि दस दिश हो यही हठ ठानता
*
उसी का आभार जो लिखवा रही
बिना फुरसत प्रेरणा पठवा रही
पढ़ाकर कहती, लिखूँगी आज पढ़
सांस ही मानो गले अटका रही 

*
छंद
राम के काम को, करे प्रणाम जो, उसी अनाम को, राम मिलेगा
नाम के दाम को, काम के काम को, ध्यायेगा जो, विधि वाम मिलेगा
देश ललाम को, भू अभिराम को, स्वच्छ करे इंसान तरेगा
रूप को चाम को, भोर को शाम को, पूजेगा जो, वो गुलाम मिलेगा
*
विदा दें, बाद में बात करेंगे, नेता सा वादा किया, आज जिसने
जुमला न हो यह, सोचूँ हो हैरां, ठेंगा दिखा ही दिया आज उसने
गोदी में खेला जो, बोले दलाल वो, चाचा-भतीजा निभाएं न कसमें


छाती कठोर है नाम मुलायम, लगें विरोधाभास ये रसमें
*

गुरुवार, 27 अक्तूबर 2016

kavitta

कवित्त 
*
राम-राम, श्याम-श्याम भजें, तजें नहीं काम 
ऐसे संतों-साधुओं के पास न फटकिए। 
रूप-रंग-देह ही हो इष्ट जिन नारियों का 
भूलो ऐसे नारियों को संग न मटकिए।।
प्राण से भी ज्यादा जिन्हें प्यारी धन-दौलत हो
ऐसे धन-लोलुपों के साथ न विचरिए।
जोड़-तोड़ अक्षरों की मात्र तुकबन्दी बिठा
भावों-छंदों-रसों हीन कविता न कीजिए।।
***
मान-सम्मान न हो जहाँ, वहाँ जाएँ नहीं
स्नेह-बन्धुत्व के ही नाते ख़ास मानिए।
सुख में भले हो दूर, दुःख में जो साथ रहे
ऐसे इंसान को ही मीत आप जानिए।।
धूप-छाँव-बरसात कहाँ कैसा मौसम हो?
दोष न किसी को भी दें, पहले अनुमानिए।
मुश्किलों से, संकटों से हारना नहीं है यदि
धीरज धरकर जीतने की जिद ठानिए।।
***

मुक्तक

मुक्तक
*
पाक न तन्नक रहो पाक है?
बाकी बची न कहूँ धाक है।। 
सूपनखा सें चाल-चलन कर 
काटी अपनें हाथ नाक है।।
*
वन्दना प्रार्थना साधना अर्चना 
हिंद-हिंदी की करिये, रहे सर तना 
विश्व-भाषा बने भारती हम 'सलिल'
पा सकें हर्ष-आनंद नित नव घना 
*
वाह! शब्दों की क्या ख़ूब जादूगरी
चाह, रस-भाव की भी हो बाजीगरी 
बिम्ब, रूपक, प्रतीकों से कर मित्रता 
हो अलंकार की भी तो कारीगरी 
*
ज़िन्दगी को प्रीत का उत्सव बनाइये 
बन्दगी को नित्य महोत्सव मनाइये 
सीमा पे जो डटा हुआ है रात-दिन 'सलिल' 
ले सीख उससे देश के कुछ काम आइये
*
उत्सव नित्य मनाइए, बाल शुभाशा-दीप 
श्रम-सीकर अवगाहिए, बनकर मोती-सीप 
वर्धन हो धन-धन्य का, तुलसी पूजें आप
राँगोली डालीं 'सलिल', ड्योढ़ी-आँगन लीप
*
सरहद के बाहर चलकर, चलिए बम फोड़ें 
आतंकी हौसले सभी हम मिलकर तोड़ें 
शत-शत मुक्तक लिखें सुनें दोनों शरीफ जब 
सर टकराकर आपस में, झट दुनिया छोड़ें 
*

आँख दिखाकर, डरा-डराकर कहती 'डरती हूँ' 
ठेंगा दिखा-दिखाकर कहती 'तुझ पर मरती हूँ' 
गले लगाती नहीं नायिका, नायक से कहती 
'जाओ भाड़ में,समय हो गया अब मैं चलती हूँ 

*
जब 'अशोक' मन, 'व्यग्र' हो करता शब्द प्रहार 
तब 'नीरव' में 'ॐ' की गूँज उठे झनकार
'कलानाथ' रसधार में झलकाते निज बिम्ब 
'रामानुज' से मिल रहे 'ममता' लिए अपार

*
कुछ ग़लत हैं आचार्य जी, बाकी सभी कुछ ठीक है 
बस चुप रहें प्राचार्य जी, बाकी सभी कुछ ठीक है 
दीवार की शोभा बढ़ाते, चित्र भाते ही नहीं 
थूकें तमाखू-पान खा, बाकी सभी कुछ ठीक है 
*

लाजवाब आप हो गुलाब हुए
स्नेह की अनपढ़ी किताब हुए 
हमको उत्तर नहीं सूझा जब भी 
आपके प्रश्न ही जवाब हुए
*
हाय रे! हुस्न रुआंसा क्यों है?
ख्वाब कोई हुआ बासा क्यों है?
हास्य-जिंदादिली उपहार समझ
दूर श्वासा से हुलासा क्यों है?
*
हाँ कह दूँ तो पत्नी पीटे, झूठ अगर ना बोलूँ
करूँ वंदना प्रेम आपसे है रहस्य क्यों खोलूँ ?
रोना है सौभाग्य हमारा, सब तनाव मिट जाता
क्यों न हास्य कर प्रेम-तराजू पर मैं खुद को तोलूँ
*
आप = स्वयं, आत्मा सो परमात्मा = ईश्वर

*
आपने चाहा जिसे वह गीत चाहत के लिखेगा
नहीं चाहा जिसे कैसे वह मिलन-अमृत चखेगा?
राह रपटीली बहुत है चाह की, पग सम्हल धरना 
जान लेकर हथेली पर जो चले, आगे दिखेगा
*

भोर से संझा हुई,कर कार्य, रवि जब थक चला 
तिमिर छा जाए न जग में सोच, चिंतित जब ढला 
कौन रोके तम?, बढ़ा लघु दीप बोला-' शक्ति भर
मैं हरूँगा' तभी दीवाली मनाने का सलिल' प्रचलन चला
*

करे मुक्त मन मुदित हो, जगवाणी में बात 
हिंदी कह -पढ़-लिख सतत, हो जग में विख्यात 
परभाषा का मोह तज, जनभाषा को जान 
जो बढ़ते उनको नहीं, लगता है आघात
*

दीपावली 
*
सत्य-शिव-सुन्दर का अनुसन्धान है दीपावली 
सत-चित-आनंद का अनुगान है दीपावली 
अकेले लड़कर तिमिर से, समर को चुप जीतता
जो उसी दीपक के यश का गान है दीपावली
*
अँधेरे पर रौशनी की जीत है दीपावली
दिलों में पलती मनुज की प्रीत है दीपावली
मिटा अंतर से सभी अंतर मनों को जोड़ दे
एकता-संदेश देती रीत है दीपावली
*
स्वदेशी की गूँज, श्रम का मान है दीपावली
भारती की कीर्ति, भारत-गान है दीपावली
चीन की उद्दंडता को दंड दे धिक्कारता
देश के जनगण का नव अरमान है दीपावली
***

मैं औरों की धुन पर कलम चलाऊँ क्यों?, मिली प्रेरणा माँ से जो वह गाऊँगा
नहीं बिकेगी कलम, न लूँगा मोल कभी, नेह-नर्मदावत मैं बहता जाऊँगा
अभिनंदन-सम्मान न मेरा ध्येय रहा, नई कलम से गीत नए रचवाऊँगा
शपथ शब्द-अक्षर की चित्रगुप्त मुझको, शीश रहे या जाए, नहीं झुकाऊँगा
*


मुक्तक

समस्या पूर्ति 
मुक्तक 
*
जीते जी मिलता प्यार नहीं, मरने पर बनते ताजमहल
यह स्वाभाविक है, स्मृतियाँ बिन बिछड़े होती नहीं प्रबल 
क्यों दोष किसी को दें हम-तुम, जो साथ उसे कब याद किया?
बिन शीश कटाये बना रहे, नेता खुद अपने शीशमहल
*
जीवन में हुआ न मूल्यांकन, शिव को भी पीना पड़ा गरल
जीते जी मिलता प्यार नहीं, मरने पर बनते ताजमहल
यह दुनिया पत्थर को पूजे, सम्प्राणित को ठुकराती है
जो सचल पूजता हाथ जोड़ उसको जो निष्ठुर अटल-अचल
*
कविता होती तब सरस-सरल, जब भाव निहित हों सहज-तरल
मन से मन तक रच सेतु सबल, हों शब्द-शब्द मुखरित अविचल
जीते जी मिलता प्यार नहीं, मरने पर बनते ताजमहल
हँस रूपक बिम्ब प्रतीकों में, रस धार बहा करती अविकल
*
जन-भाषा हिंदी की जय-जय, चिरजीवी हो हिंदी पिंगल
सुरवाणी प्राकृत पाली बृज, कन्नौजी अपभ्रंशी डिंगल
इतिहास यही बतलाता है, जो सम्मुख वह अनदेखा हो
जीते जी मिलता प्यार नहीं, मरने पर बनते ताजमहल
*

samiksha

पुस्तक सलिला
एक पेग जिंदगी’ लघुकथा के नाम 
आचार्य संजीव वर्मा सलिल
*
[पुस्तक विवरण एक पेग जिंदगी, पूनम डोगरा, लघुकथा संग्रह, प्रथम संस्करण २०१६, ISBN९७८-८१-८६८१०-५१-X, आकार डिमाई, आवरण बहुरंगी, पेपरबैक, पृष्ठ १३८, मूल्य२८०/-, समय साक्ष्य प्रकाशन १५, फालतू लाइन, देहरादून २४८००१, दूरभाष ०१३५ २६५८८९४]
*
            कहना और सुनना चेतना का गुण है. जो प्राणी जितना अधिक चैतन्य होता है उतना अधिक अनुभव कर अनुभूति को अन्यों से कहता और अन्यों की अनुभूति को उनसे सुनता है.  कहना, सुनना और गुनना मानव सभ्यता का वैशिष्ट्य है. कहना-सुनना लेखक-पाठक या वक्ता-श्रोता के मध्य सह-अनुभूति का संपर्क-सेतु बनाकर अनुभूतियों को साझा करता है. चिरकाल से लोक कथा, बुजुर्गों द्वारा बच्चों को सुनाये गए किस्से, पर्व कथाएँ, धार्मिक कहानियाँ, प्रेम कहानियाँ, रोमांचक कहानियाँ, बोध कथाएँ, उपदेश कथाएँ, दृष्टांत कथाएँ, जातक कथाएँ, अवतार कथाएँ, शौर्य कथाएँ, सृष्टि उत्पत्ति कथाएँ, प्रलय कथाएँ आदि भारत और अन्य विकसित देशों में कही-सुनी जाती रही हैं.  ये कथाएँ गद्य और पद्य दोनों में कही-सुनी जाती रही हैं.                                                              
            आधुनिक हिंदी का विकास और भारत की स्वतंत्रता इन दो घटनाओं ने हिंदी को राष्ट्र भाषा के पथ से होते हुए विश्व वाणी बनने के पथ पर सतत आगे बढ़ाया. हिंदी के उद्भव काल में तत्कालीन विदेश संप्रभुओं की भाषा अंग्रेजी के साहित्य को देख-सुन कर नकल करने की प्रवृत्ति विकसित होना स्वाभाविक है. कोंग्रेसियों द्वारा सत्ता और साम्यवादियों द्वारा शिक्षा संस्थानों की बन्दरबांट ने हिंदी-साहित्य और समीक्षा में साम्यवादी वर्ग संघर्ष सिद्धांत को बढ़ाने के लिए असंगतियों, विसंगतियों, विडंबनाओं, टकरावों, शोषण आदि के एकांगी चित्रण को विधान का रूप दे दिया. फलत:, समीक्षकों द्वारा नकारे जाने से बचने के लिए रचनाकारों विशेषकर लघुकथाकारों, व्यंग्यकारों तथा नवगीतकारों ने अपने सर्जन से उल्लास, उत्साह, सद्भाव, सहकार, समरसता, बन्धुत्व आदि को वर्जित मानकर बाहर ही रखा. इस पृष्ठभूमि में मूलत: देहरादून निवासी, अब साल्टलेक सिटी अमेरिका निवासी पूनम डोगरा की सद्य प्रकाशित कृति ‘एक पेग जिंदगी’ वर्तमान लघुकथा की झलक प्रस्तुत करती है.
            कृति की भूमिका में चर्चित लघुकथाकार कांता रॉय कुछ रचनाओं में ‘मैत्रेयी पुष्पा जी की कहानियों के तेवर, अमृता प्रीतम जी की शैली, तथा चित्रा मुद्गल जी का विन्यास’ अनुभव करती हैं. मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि पूनम जी लघुकथाओं के विषय अपने चतुर्दिक घट रही घटनाओं से चुनती हैं, वे घटना के कारण, प्रभाव तथा निराकरण को लेकर चिंतन करती हैं और तब लघुकथा को रूपाकार प्रदान करती हैं. इन लघुकथाओं के विषय दैनंदिन  जीवन से लिए गए हैं.
            स्त्री-विमर्श पूनम जी का प्रिय विषय है. छोटी कहानी ‘एक पेग जिंदगी’, ‘वैलेंटाइन’ तथा कड़वे घूँट में हिंदी की संन्य लघुकथाओं से कुछ लंबी, कहानियों से कुछ छोटी, अंग्रजी की शोर्ट स्टोरी की तरह हैं. स्त्री-पुरुष संबंधों पर केन्द्रित लघुकथाओं में पूनम जी की संयत भाषा, संतुलित विचारदृष्टि  उन्हें एकांगी होने से बचाती है.
            गरम गोश्त, सॉरी, उसका नाम, अश्क, इज्ज़त, आखिरी किश्त, चुपड़ी रोटी जैसी लघुकथाएँ कम शब्दों में अधिक संप्रेषित करने में समर्थ हैं. ‘डोज़-ए-इन्सुलिन, सॉरी, बोन्डिंग, रिफ्युजिए, ओवर टाइम, कनेक्शन, फुल सर्किल ट्रेनिंग कैम्प, करेंसी, शो, लव, ब्लैक एंड व्हाइट, लव यू आलवेज, वैलेंटाइन’ जैसे आंग्ल शीर्षक रखने की विवशता समझ से परे है. इनसे कथा या कृति की विशेषता में कोई वृद्धि नहीं होती.
            पूनम जी ने कुछ लघुकथाओं में हास्य का पुट देने का प्रयास कर एक खतरा उठाया है. आरम्भ में कुछ स्वनामधन्य साहित्यकारों ने लघुकथा को चुटकुला कहकर नकारा था. ‘माधुरी अलानी जूही फलानी’ में नेताओं पर व्यंग्य, ‘हाय मेरा दिल’ में दो पुराने मित्रों द्वारा एक-दुसरे से उम्र के प्रभाव  छिपाने के प्रयास से उपजा सहज हास्य नई लीक बनाने का प्रयास है. कहते हैं ‘लीक तोड़ तीनों चलें, शायर सिंह सपूत / ली-लीक तीनों चलें कायर भीत कपूत’. पूनम जी द्वारा अपनी लीक आप बनाने की आलोचना तो होगी पर उन्हें इसे समृद्ध करना चाहिए .
           पूनम जी हिंदी के प्रचलित शब्दों के साथ तत्सम-तद्भव शब्दों, देशज शब्दों, उर्दू-अंग्रेजी शब्दों का मुक्त भाव से प्रयाग करती हैं. सारत:, पूनम जी की यह प्रथम लघुकथा कृति उनमें विधा की समझ, शब्द-भण्डार, भाषा-शैली, नव प्रयोग का साहस और घटनाओं को कथा रूप देने की सामर्थ्य के प्रति आश्वस्त करता है. मेरी कामना है ‘अल्लाह करे जोरे कलम और जियादा’.

संपर्क- आचार्य संजीव वर्मा’सलिल’, २०४ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१, ९४२५१८३२४४, salil.sanjiv@gmail.              

बुधवार, 26 अक्तूबर 2016

geet

कार्य शाला 
नव गीत-  
जीवन की बगिया में
महकाये मोगरा
पल-पल दिन आज का।
(मुखड़ा ३ पंक्तियाँ, मात्राएँ १२+११+११ =३४)  
*
श्वास-श्वास महक उठे
आस-आस चहक उठे
नयनों से नयन मिलें
कर में कर बहक उठे
(अंतरा- ४ पंक्तियाँ, मात्राएँ १२+१२+१२+१२=४८)
प्यासों की अँजुरी में
मुस्काये हरसिंगार
छिन-छिन दिन आज का।
(सम मुखड़ा- ३ पंक्तियाँ, मात्राएँ १२+१२+११=३५)
जीवन की बगिया में
महकाये मोगरा
पल-पल दिन आज का।
(मुखड़ा ३ पंक्तियाँ, मात्राएँ १२+११+११ =३४)
*

रूप देख गमक उठे
चहरा चुप चमक उठे
वाक् हो अवाक 'सलिल'
शब्द-शब्द गमक उठे
(अंतरा- ४ पंक्तियाँ, मात्राएँ १२+१२+१२+१२=४८)
मंजरी में गीत की
खिलखिलाये सिर्फ प्यार
गिन -गिन दिन आज का।
(सम मुखड़ा- ३ पंक्तियाँ, मात्राएँ १२+१३+११=३६ )
जीवन की बगिया में
महकाये मोगरा
पल-पल दिन आज का।
(मुखड़ा ३ पंक्तियाँ, मात्राएँ १२+११+११ =३४)
*